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श्रेणी: श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता 🏆

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     

     

    (भाग 6 — माखनचोर नंदलाल)

     

     

     

     

    गोकुल की गलियों में उन दिनों एक ही नाम हर किसी की जुबान पर था—कान्हा।

     

    जिस घर में उनका नाम लिया जाता, वहाँ जैसे अपने आप मुस्कान खिल उठती। कोई उन्हें नंदबाबा का लाड़ला कहता, कोई यशोदा मैया का नटखट लाल, तो कोई उन्हें गोकुल का सबसे बड़ा शरारती बालक बताता।

     

    लेकिन गोकुल की गोपियों के लिए कान्हा की एक और पहचान बन चुकी थी—

     

    माखनचोर!

     

    हाँ, वही नन्हा-सा कृष्ण, जिसकी मुस्कान देखकर बड़े-बड़े क्रोधी भी अपना गुस्सा भूल जाते थे, अब गोकुल की गोपियों की मटकी से माखन चुराने लगा था।

     

    और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि कृष्ण को केवल माखन खाने में ही आनंद नहीं आता था।

     

    उन्हें आनंद आता था—

     

    माखन चुराने में!

     

    सुबह का समय था। गोकुल की गलियों में गायों की घंटियों की मधुर आवाज सुनाई दे रही थी। कहीं कोई गोपी आँगन में झाड़ू लगा रही थी, कहीं कोई दूध दुह रही थी और कहीं मटकी में दही मथने की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    यशोदा मैया भी अपने आँगन में बैठी थीं। उनके सामने बड़ी-सी मटकी रखी थी और वे प्रेम से दही मथ रही थीं।

     

    दही मथते हुए उनके मन में अपने कान्हा का ही ध्यान था।

     

    वे धीरे-धीरे मुस्कुरातीं और फिर सोचने लगतीं—

     

    “न जाने मेरा लाल इस समय कहाँ खेल रहा होगा?”

     

    उन्हें क्या पता था कि उनका वही लाल उस समय कुछ ऐसी योजना बना रहा था, जिसके कारण थोड़ी ही देर में पूरे गोकुल में हँसी और शिकायतों की लहर दौड़ने वाली थी।

     

    कान्हा की नई योजना

     

    कृष्ण अपने कुछ सखा बालकों के साथ एक पेड़ के पीछे छिपे हुए थे।

     

    उनके साथ थे—श्रीदामा, सुभल और कुछ अन्य ग्वाल-बाल।

     

    कृष्ण ने धीरे से अपने साथियों की ओर देखा और आँखों ही आँखों में कुछ संकेत किया।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “कान्हा, आज कहाँ चलना है?”

     

    कृष्ण ने होंठों पर शरारती मुस्कान लाते हुए कहा,

     

    “आज हम उस घर में चलेंगे जहाँ सबसे स्वादिष्ट माखन मिलता है।”

     

    सुभल ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “लेकिन कान्हा, वहाँ तो माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर टंगी रहती है। हम पहुँचेंगे कैसे?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “जहाँ प्रेम हो, वहाँ रास्ता अपने आप बन जाता है।”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “और जहाँ माखन हो?”

     

    कृष्ण ने तुरंत उत्तर दिया,

     

    “वहाँ तो मैं स्वयं रास्ता बना देता हूँ!”

     

    सभी बालक खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा। किसी को पता नहीं था कि वे कहाँ जा रहे हैं।

     

    फिर वे दबे पाँव एक गोपी के घर की ओर बढ़ चले।

     

    उस गोपी ने कई दिनों से अपनी मटकी का माखन कृष्ण से बचाकर रखा था।

     

    वह रोज अपने घर की मटकी को ऊँचाई पर टाँग देती और सोचती—

     

    “आज तो देखती हूँ, मेरा माखन कौन चुराता है!”

     

    उसे विश्वास था कि इतनी ऊँचाई पर रखी मटकी तक कृष्ण नहीं पहुँच पाएँगे।

     

    लेकिन वह कृष्ण को अभी अच्छी तरह पहचान नहीं पाई थी।

     

    माखन की खोज

     

    कृष्ण अपने सखाओं के साथ घर के भीतर पहुँचे।

     

    सबसे पहले उन्होंने चारों ओर देखा।

     

    एक कोने में दूध की मटकी थी।

     

    दूसरे कोने में दही रखा था।

     

    लेकिन कृष्ण की दृष्टि सीधे उस मटकी पर जाकर टिक गई, जिसमें सफेद, मुलायम और सुगंधित माखन भरा था।

     

    कृष्ण की आँखें चमक उठीं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “यही है!”

     

    श्रीदामा ने ऊपर देखा।

     

    मटकी सचमुच बहुत ऊँचाई पर टंगी थी।

     

    वह बोला,

     

    “कान्हा, अब?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अब तुम सब मेरी सहायता करो।”

     

    एक के ऊपर एक बालक खड़े होने लगे।

     

    सबसे नीचे एक बालक।

     

    उसके ऊपर दूसरा।

     

    फिर तीसरा।

     

    और सबसे ऊपर स्वयं कृष्ण।

     

    कृष्ण ने अपना हाथ ऊपर बढ़ाया।

     

    लेकिन मटकी अभी भी थोड़ी दूर थी।

     

    उन्होंने अपनी एड़ी पर खड़े होकर हाथ और ऊपर किया।

     

    फिर भी मटकी नहीं मिली।

     

    सभी बालक हँसी रोककर कृष्ण को देख रहे थे।

     

    कृष्ण ने एक क्षण के लिए आँखें बंद कीं, फिर हल्की-सी छलाँग लगाई।

     

    उनकी उँगलियाँ मटकी तक पहुँच गईं।

     

    मटकी हल्के से हिली।

     

    सभी बालक घबरा गए।

     

    “कान्हा! धीरे!”

     

    लेकिन कृष्ण के चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी।

     

    उन्होंने मटकी को थोड़ा नीचे खींचा और जैसे ही वह उनके हाथ में आई, उनकी आँखों में आनंद भर गया।

     

    माखन देखकर कृष्ण का चेहरा खिल उठा।

     

    उन्होंने पहले थोड़ा-सा माखन स्वयं खाया।

     

    फिर श्रीदामा को दिया।

     

    फिर सुभल को।

     

    और देखते ही देखते सभी बालक माखन खाने लगे।

     

    लेकिन कृष्ण की शरारत यहीं समाप्त नहीं हुई।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “अरे! अकेले हम ही क्यों खाएँ? हमारे बंदर मित्र कहाँ हैं?”

     

    कृष्ण और उनके बंदर मित्र

     

    कृष्ण को बंदरों से बहुत प्रेम था।

     

    उन्होंने माखन का एक बड़ा हिस्सा लेकर आँगन में बैठे बंदरों को बुलाया।

     

    “आओ! आओ! तुम्हारे लिए भी माखन है।”

     

    बंदर उछलते-कूदते कृष्ण के पास आ गए।

     

    कृष्ण उन्हें अपने हाथों से माखन खिलाने लगे।

     

    एक बंदर ने उनके हाथ से माखन लिया।

     

    दूसरा उनके कंधे पर चढ़ गया।

     

    तीसरा उनके पास बैठकर माखन खाने लगा।

     

    कृष्ण हँसते जा रहे थे।

     

    उनके सखा भी हँस रहे थे।

     

    कुछ ही देर में घर की स्थिति ऐसी हो गई कि कहीं माखन गिरा था, कहीं दही फैल गया था और कहीं बंदर मटकी के पास बैठकर मुँह चाट रहे थे।

     

    तभी बाहर से किसी के आने की आहट हुई।

     

    सब बालक चौंक गए।

     

    “गोपी आ रही है!”

     

    श्रीदामा ने कहा।

     

    कृष्ण ने तुरंत इधर-उधर देखा।

     

    “सब छिप जाओ!”

     

    लेकिन छिपने की जगह कहाँ थी?

     

    कोई अनाज के पीछे छिप गया।

     

    कोई दरवाजे के पीछे।

     

    कोई मटकी के पास।

     

    और कृष्ण?

     

    वे तो ऐसे खड़े हो गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।

     

    गोपी अंदर आई।

     

    उसने जैसे ही अपना घर देखा, उसकी आँखें फैल गईं।

     

    माखन यहाँ-वहाँ बिखरा हुआ था।

     

    मटकी आधी खाली थी।

     

    बंदर मुँह पर माखन लगाए बैठे थे।

     

    और बीच में कृष्ण खड़े थे।

     

    गोपी ने दोनों हाथ कमर पर रखे और बोली,

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण ने मासूम बनकर उसकी ओर देखा।

     

    “जी?”

     

    “यह सब किसने किया?”

     

    कृष्ण ने बड़ी मासूमियत से कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    गोपी ने माखन से सने उनके हाथों की ओर देखा।

     

    फिर उनके होंठों पर लगे माखन को देखा।

     

    फिर बोली,

     

    “तुम्हें नहीं पता?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो तुम्हारे मुँह पर माखन कैसे लगा?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “शायद माखन स्वयं मेरे पास आ गया होगा।”

     

    गोपी हँसी रोक नहीं पाई।

     

    लेकिन फिर उसे अपनी मटकी याद आ गई।

     

    वह बोली,

     

    “अच्छा! तो माखन स्वयं मटकी से निकलकर तुम्हारे मुँह में भी चला गया?”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा,

     

    “हाँ, मैया!”

     

    गोपी ने कहा,

     

    “मैं तुम्हारी मैया नहीं हूँ!”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो फिर आप इतनी चिंता क्यों करती हैं?”

     

    गोपी का क्रोध जैसे पल भर में पिघल गया।

     

    लेकिन वह कृष्ण को यूँ ही जाने भी नहीं देना चाहती थी।

     

    उसने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो, आज तुम्हारी शिकायत यशोदा मैया से करूँगी।”

     

    कृष्ण ने तुरंत अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

     

    “नहीं! मैया से मत कहना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैया मुझे डाँटेंगी।”

     

    गोपी बोली,

     

    “आज तो डाँट पड़ेगी ही।”

     

    कृष्ण ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उसकी ओर देखा।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराए।

     

    “अगर मैं आपको थोड़ा-सा माखन और दे दूँ तो?”

     

    गोपी फिर हँस पड़ी।

     

    “नहीं! आज मैं नहीं मानूँगी।”

     

    लेकिन मन ही मन वह भी सोच रही थी—

     

    “यह बालक है ही इतना प्यारा कि इससे नाराज़ कैसे रहा जाए?”

     

    गोकुल में शिकायतों की कतार

     

    यह तो केवल एक घर की बात थी।

     

    गोकुल में कई गोपियों के घरों में यही हाल था।

     

    कहीं मटकी खाली।

     

    कहीं दही फर्श पर।

     

    कहीं माखन बंदरों को खिला दिया गया।

     

    और कहीं कृष्ण ने माखन खाकर मटकी के पास अपनी छोटी-सी हथेली के निशान छोड़ दिए।

     

    धीरे-धीरे गोपियाँ एक-दूसरे के घर पहुँचने लगीं।

     

    एक बोली,

     

    “आज फिर मेरे घर से माखन गायब!”

     

    दूसरी बोली,

     

    “मेरे घर में तो मटकी इतनी ऊँचाई पर रखी थी, फिर भी कान्हा पहुँच गया!”

     

    तीसरी बोली,

     

    “मेरे घर में तो उसने पहले माखन खाया और फिर बंदरों को बाँट दिया।”

     

    चौथी हँसते हुए बोली,

     

    “मेरे घर में तो माखन चुराने के बाद वह मुझे ही समझाने लगा कि माखन उसे स्वयं बुला रहा था!”

     

    सब गोपियाँ कृष्ण की शिकायत करने के लिए यशोदा मैया के पास जाने लगीं।

     

    लेकिन उनके चेहरों पर गुस्से से अधिक प्रेम था।

     

    यशोदा मैया के सामने शिकायत

     

    यशोदा मैया उस समय अपने आँगन में बैठी थीं।

     

    कृष्ण अभी वहाँ नहीं पहुँचे थे।

     

    अचानक कई गोपियाँ एक साथ आ गईं।

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “अरे बहनों! क्या हुआ?”

     

    एक गोपी बोली,

     

    “मैया! अपने लाल को समझाइए।”

     

    यशोदा मैया ने चिंतित होकर पूछा,

     

    “क्या किया मेरे कान्हा ने?”

     

    दूसरी गोपी बोली,

     

    “क्या नहीं किया, यह पूछिए!”

     

    तीसरी बोली,

     

    “हमारे घरों का माखन चुरा-चुराकर खाता है।”

     

    चौथी बोली,

     

    “और अकेला नहीं खाता।”

     

    यशोदा मैया ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “तो?”

     

    “बंदरों को भी खिलाता है!”

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण की ओर से सफाई देते हुए कहा,

     

    “अरे, वह तो अभी छोटा है। शायद भूख लगती होगी।”

     

    गोपियाँ बोलीं,

     

    “भूख लगती है तो हमारे घर आकर माँग ले। हम माखन दे देंगे।”

     

    एक गोपी ने कहा,

     

    “लेकिन नहीं! वह चोरी करके ही खाएगा।”

     

    दूसरी हँसते हुए बोली,

     

    “और जब हम पकड़ लें तो ऐसी मुस्कान देगा कि हमारा सारा गुस्सा गायब हो जाएगा।”

     

    यशोदा मैया भी हँसने लगीं।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “अच्छा, आज मैं उसे खूब समझाऊँगी।”

     

    तभी पीछे से एक मधुर आवाज आई—

     

    “मैया!”

     

    सभी गोपियाँ एक साथ पीछे मुड़ीं।

     

    कृष्ण वहाँ खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर भोली-सी मुस्कान थी।

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “कान्हा, इधर आओ।”

     

    कृष्ण धीरे-धीरे मैया के पास आए।

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “तुमने इन सबके घरों से माखन चुराया?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं!”

     

    गोपियाँ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “तो फिर माखन किसने चुराया?”

     

    कृष्ण ने थोड़ा सोचा।

     

    फिर बोले,

     

    “मैया, मुझे लगता है कि… बंदरों ने चुराया होगा।”

     

    गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “अच्छा! तो बंदर माखन खाते हैं और तुम्हारे मुँह पर लगा देते हैं?”

     

    कृष्ण मुस्कुराने लगे।

     

    मैया ने उनके गाल पर हाथ फेरा।

     

    उनकी आँखों में ममता थी।

     

    वे अपने लाल को डाँटना चाहती थीं, लेकिन उसकी भोली मुस्कान देखकर उनका हृदय पिघल गया।

     

    फिर भी उन्होंने प्रेम से कहा,

     

    “कान्हा, दूसरों के घर से माखन नहीं चुराना चाहिए।”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से पूछा,

     

    “लेकिन मैया, अगर वे मुझे माखन दे दें तो?”

     

    “तो खा लेना।”

     

    “और अगर न दें?”

     

    यशोदा मैया कुछ क्षण चुप रहीं।

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराए।

     

    मैया समझ गईं कि उनका कान्हा अपनी शरारत छोड़ने वाला नहीं है।

     

    माखन से भी मीठा प्रेम

     

    उस दिन के बाद गोकुल की गोपियाँ अपनी मटकी और भी ऊँचाई पर रखने लगीं।

     

    लेकिन कृष्ण के लिए ऊँचाई कोई बाधा नहीं थी।

     

    कभी वे सखाओं की सहायता लेते।

     

    कभी किसी छोटी चौकी को खिसकाकर उसके ऊपर चढ़ जाते।

     

    कभी रस्सी पकड़ लेते।

     

    और कभी तो ऐसा लगता जैसे मटकी स्वयं झुककर कृष्ण के हाथों में आ गई हो।

     

    लेकिन कृष्ण केवल माखन नहीं चुराते थे।

     

    वे तो गोकुलवासियों के हृदय चुराते थे।

     

    जिस घर में वे जाते, वहाँ हँसी छोड़ आते।

     

    जिसके घर से माखन लेते, उसे प्रेम दे जाते।

     

    और जिन गोपियों को लगता कि कृष्ण ने उनके घर की मटकी खाली कर दी, वे कुछ ही देर बाद यही सोचतीं—

     

    “काश! हमारा कान्हा फिर आए।”

     

    क्योंकि सच तो यह था कि उन्हें माखन के जाने का दुख नहीं था।

     

    उन्हें तो कृष्ण के चले जाने का दुख था।

     

    गोकुल की गलियों में अब एक नई चर्चा थी—

     

    “कान्हा कब आएगा?”

     

    कोई माखन छिपाता था ताकि कृष्ण उसे ढूँढ़ें।

     

    कोई जान-बूझकर मटकी नीचे रख देता था।

     

    और कोई तो अपने घर के बाहर तक माखन की कटोरी रख देता था।

     

    कृष्ण सब समझते थे।

     

    वे मुस्कुराते हुए कहते,

     

    “तुम लोग मुझे चोर बनाना चाहती हो?”

     

    गोपियाँ कहतीं,

     

    “हाँ कान्हा! क्योंकि तुम्हारे हाथों से हमारा माखन जाए तो हमें कोई शिकायत नहीं।”

     

    कृष्ण हँस पड़ते।

     

    एक दिन कुछ अलग हुआ…

     

    लेकिन एक दिन कृष्ण की शरारत कुछ अधिक बढ़ गई।

     

    उस दिन यशोदा मैया ने सोचा कि आज वे अपने कान्हा को स्वयं माखन खिलाएँगी।

     

    उन्होंने बड़े प्रेम से माखन निकाला।

     

    एक छोटी कटोरी में रखा।

     

    और कृष्ण को पुकारा—

     

    “कान्हा! आओ बेटा, आज मैया तुम्हें अपने हाथों से माखन खिलाएगी।”

     

    कृष्ण दौड़ते हुए आए।

     

    मैया ने उन्हें अपने पास बैठाया।

     

    माखन का पहला निवाला उनके मुँह में रखा।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    मैया ने दूसरा निवाला खिलाया।

     

    तभी बाहर से उनके सखाओं की आवाज आई—

     

    “कान्हा! चलो!”

     

    कृष्ण ने तुरंत मैया की ओर देखा।

     

    मैया ने कहा,

     

    “पहले माखन खा लो।”

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “फिर खेलने जाने दोगी?”

     

    “हाँ।”

     

    कृष्ण ने जल्दी-जल्दी माखन खाना शुरू किया।

     

    लेकिन उनके मन में एक और शरारत जन्म ले चुकी थी।

     

    उन्होंने मैया की ओर देखा…

     

    फिर मटकी की ओर…

     

    फिर आँगन में रखी दूसरी मटकी की ओर।

     

    उनकी आँखों में चमक थी।

     

    मैया ने उस चमक को देख लिया।

     

    “कान्हा… तुम कुछ सोच रहे हो न?”

     

    कृष्ण ने तुरंत मासूम चेहरा बना लिया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “सच?”

     

    “बिल्कुल सच।”

     

    यशोदा मैया मुस्कुराईं।

     

    उन्हें क्या पता था कि अगले ही पल उनका नन्हा कान्हा ऐसी शरारत करने वाला है, जिसके कारण केवल गोकुल की गोपियाँ ही नहीं, स्वयं यशोदा मैया भी परेशान हो उठेंगी।

     

    और इस बार बात केवल माखन चुराने तक नहीं रहने वाली थी…

     

    क्योंकि कृष्ण की नजर अब एक ऐसी मटकी पर थी, जिसे यशोदा मैया ने स्वयं बहुत सँभालकर रखा था।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़े।

     

    उनके कदम छोटे थे…

     

    लेकिन शरारत बहुत बड़ी।

     

    आखिर उस मटकी में ऐसा क्या था?

     

    और क्या कृष्ण इस बार भी अपनी शरारत में सफल हो पाएँगे?

     

    जानिए अगली कड़ी में—

     

    भाग 7 — मटकी फोड़ने की शरारत

     

    जहाँ कान्हा की एक छोटी-सी शरारत पूरे गोकुल में हँसी का कारण बन जाएगी और यशोदा मैया को पहली बार अपने नटखट लाल को पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ना पड़ेगा…|

     

    BE CONTINUE….✍️✍️

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • महल के द्वार पर सुदामा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    अध्याय 8 — महल के द्वार पर सुदामा और कृष्ण तक पहुँची खबर

     

    द्वारका के विशाल महल के सामने सुदामा चुपचाप खड़े थे।

     

    उनकी आँखें महल के ऊँचे द्वार पर टिकी थीं।

     

    वर्षों पहले जिस कृष्ण के साथ उन्होंने गुरुकुल की छोटी सी कुटिया में बैठकर भोजन किया था, आज वही कृष्ण इस विशाल राजमहल में रहते थे।

     

    सुदामा के मन में तरह-तरह के विचार उठ रहे थे।

     

    पहरेदार अब भी उन्हें देख रहा था।

     

    उसने फिर पूछा,

     

    “तुमने कहा कि तुम कृष्ण से मिलने आए हो?”

     

    सुदामा ने सिर झुकाकर कहा,

     

    “हाँ।”

     

    “क्या तुम्हारे पास कोई संदेश है?”

     

    सुदामा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर मुस्कुराकर बोले,

     

    “संदेश?”

     

    पहरेदार ने कहा,

     

    “हाँ। द्वारकाधीश से मिलने हर व्यक्ति सीधे अंदर नहीं जा सकता।”

     

    सुदामा ने अपनी छोटी सी पोटली को हाथ में कसकर पकड़ लिया।

     

    “मेरे पास कोई संदेश नहीं है।”

     

    पहरेदार ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “बस उनसे कहना कि उनका पुराना मित्र सुदामा उनसे मिलने आया है।”

     

    पहरेदार ने एक-दूसरे की ओर देखा।

     

    उनमें से एक को शायद विश्वास नहीं हुआ।

     

    उसने पूछा,

     

    “तुम सच में उनके मित्र हो?”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिए।

     

    “यह बात अब वही बता सकते हैं।”

     

    पहरेदार ने कुछ क्षण उन्हें देखा।

     

    सुदामा के कपड़े साधारण थे। पैरों में यात्रा की धूल थी। कंधे पर पुराना थैला था और हाथ में छोटी सी पोटली।

     

    उनका रूप किसी बड़े व्यक्ति जैसा नहीं था।

     

    लेकिन उनकी आँखों में ऐसा अपनापन था, जिसे देखकर पहरेदार भी कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    आखिरकार उसने कहा,

     

    “ठहरो। मैं भीतर जाकर सूचना देता हूँ।”

     

    पहरेदार अंदर चला गया।

     

    सुदामा वहीं खड़े रहे।

     

    उनका दिल तेजी से धड़क रहा था।

     

    अब तक वह रास्ते भर कृष्ण से मिलने की कल्पना करते आए थे।

     

    लेकिन अब जब वह महल के सामने खड़े थे, तो अचानक उनके मन में संकोच भर गया।

     

    उन्होंने मन ही मन कहा,

     

    “कृष्ण… अगर तुमने मुझे पहचान लिया तो?”

     

    फिर उनके मन में दूसरा विचार आया—

     

    “और अगर नहीं पहचाना तो?”

     

    यह विचार आते ही उनका चेहरा उदास हो गया।

     

    उन्होंने तुरंत स्वयं को समझाया,

     

    “नहीं। वह कृष्ण हैं। मेरे मित्र हैं। वह मुझे जरूर पहचानेंगे।”

     

    उधर महल के भीतर कृष्ण अपने राजकार्य में व्यस्त थे।

     

    उनके सामने कई लोग अपनी समस्याएँ लेकर उपस्थित थे।

     

    कृष्ण सबकी बातें ध्यान से सुन रहे थे।

     

    तभी एक सेवक तेजी से अंदर आया।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “महाराज…”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “कहो।”

     

    सेवक कुछ पल झिझका।

     

    “महल के द्वार पर एक व्यक्ति आपसे मिलने आया है।”

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    सेवक ने कहा,

     

    “उन्होंने अपना नाम सुदामा बताया है।”

     

    बस…

     

    इतना सुनना था कि कृष्ण जैसे एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गए।

     

    उनके चेहरे पर जो गंभीरता थी, वह अचानक गायब हो गई।

     

    आँखों में एक अलग ही चमक आ गई।

     

    उन्होंने दोबारा पूछा,

     

    “क्या कहा तुमने?”

     

    सेवक ने कहा,

     

    “सुदामा।”

     

    कृष्ण तुरंत अपने आसन से उठ खड़े हुए।

     

    पास बैठे लोग हैरान रह गए।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मेरा सुदामा?”

     

    सेवक ने सिर झुका दिया।

     

    “जी।”

     

    कृष्ण के चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, जैसी वर्षों से किसी ने नहीं देखी थी।

     

    उन्हें अचानक गुरुकुल का वह छोटा सा आँगन याद आ गया।

     

    उन्हें सुदामा की आवाज याद आई।

     

    वह दिन याद आया जब दोनों एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    वह बारिश याद आई, जिसमें दोनों भीगते हुए भी हँस रहे थे।

     

    उन्हें वह विदाई याद आई, जब सुदामा ने पूछा था—

     

    “क्या तुम मुझे पहचानोगे?”

     

    और कृष्ण ने कहा था—

     

    “सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    कृष्ण की आँखें नम हो गईं।

     

    उन्होंने बिना एक पल गँवाए कहा,

     

    “उन्हें यहीं लेकर आओ।”

     

    सेवक ने कहा,

     

    “जी महाराज।”

     

    लेकिन कृष्ण तुरंत आगे बढ़े।

     

    “नहीं।”

     

    सब उनकी ओर देखने लगे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “उन्हें लाने की जरूरत नहीं।”

     

    उन्होंने स्वयं महल के द्वार की ओर कदम बढ़ा दिए।

     

    सेवक और अन्य लोग उनके पीछे चल पड़े।

     

    उधर सुदामा अभी भी महल के बाहर खड़े थे।

     

    उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अंदर से क्या उत्तर आएगा।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि महल के भीतर से बहुत से लोग उनकी ओर आ रहे हैं।

     

    सुदामा ने सोचा,

     

    “शायद अब मुझे अंदर बुलाया जाएगा।”

     

    लेकिन तभी भीड़ के बीच उन्हें एक परिचित चेहरा दिखाई दिया।

     

    उनके कदम वहीं रुक गए।

     

    वह चेहरा…

     

    वह मुस्कान…

     

    वह आँखें…

     

    सुदामा की साँस जैसे थम गई।

     

    “कृष्ण…”

     

    उनके मुँह से बस इतना ही निकला।

     

    कृष्ण भी उन्हें देखते ही रुक गए।

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    समय जैसे ठहर गया था।

     

    सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    कृष्ण की आँखें भी नम थीं।

     

    फिर कृष्ण अचानक आगे बढ़े।

     

    उन्होंने सुदामा को अपने गले से लगा लिया।

     

    सुदामा कुछ क्षण तक बिल्कुल शांत रहे।

     

    फिर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “कृष्ण…”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “सुदामा!”

     

    दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को पकड़े रहे।

     

    वर्षों की दूरी उस एक आलिंगन में समाप्त हो गई।

     

    महल के आसपास खड़े लोग यह दृश्य देखकर स्तब्ध थे।

     

    किसी ने शायद पहली बार देखा था कि उनका राजा किसी साधारण वस्त्र पहने व्यक्ति से इतनी आत्मीयता से मिल रहा है।

     

    कृष्ण ने सुदामा के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तुमने आने में इतनी देर क्यों कर दी?”

     

    सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा,

     

    “तुमने भी तो कभी बुलाया नहीं।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “तो क्या मित्रों के बीच बुलावा भेजना पड़ता है?”

     

    सुदामा भी मुस्कुरा दिए।

     

    “मुझे लगा… तुम्हारा जीवन बदल गया होगा।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा,

     

    “जीवन बदला है, सुदामा। मित्रता नहीं।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    कृष्ण ने उन्हें ध्यान से देखा।

     

    “तुम बहुत बदल गए हो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “तुम भी।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “लेकिन तुम मुझे पहचान गए।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे नहीं पहचानता?”

     

    कृष्ण ने हँसकर कहा,

     

    “तो फिर गुरुकुल वाली बात सच निकली।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “कौन सी?”

     

    “कि सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं होती।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    कृष्ण ने सुदामा का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो।”

     

    “कहाँ?”

     

    “अंदर।”

     

    सुदामा अचानक रुक गए।

     

    उन्होंने महल की ओर देखा।

     

    “मैं?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “हाँ, तुम।”

     

    सुदामा झिझकते हुए बोले,

     

    “कृष्ण, मैं ऐसे ही…”

     

    कृष्ण ने उनकी बात पूरी नहीं होने दी।

     

    “जैसे आए हो, वैसे ही मेरे साथ चलो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “लेकिन लोग क्या सोचेंगे?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “लोगों को सोचने दो।”

     

    फिर उन्होंने सुदामा का हाथ पकड़ा और स्वयं उन्हें महल के अंदर ले गए।

     

    महल के भीतर कदम रखते ही सुदामा ने चारों ओर देखा।

     

    सब कुछ बहुत भव्य था।

     

    लेकिन कृष्ण के लिए वह सब जैसे कुछ भी नहीं था।

     

    उनके लिए उस समय सबसे कीमती चीज सामने खड़ी थी—

     

    उनका मित्र।

     

    कृष्ण उन्हें एक कक्ष में ले गए।

     

    वहाँ पहुँचकर उन्होंने सुदामा को आसन पर बैठाया।

     

    सुदामा तुरंत उठने लगे।

     

    “नहीं कृष्ण, मैं यहाँ कैसे…”

     

    कृष्ण ने उन्हें बैठाते हुए कहा,

     

    “आज तुम मेरे अतिथि नहीं हो।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “आज तुम मेरे पुराने मित्र हो। और पुराने मित्रों को औपचारिकता की जरूरत नहीं होती।”

     

    सुदामा बैठ गए।

     

    कृष्ण स्वयं उनके सामने बैठ गए।

     

    दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर कृष्ण ने पूछा,

     

    “बताओ, गुरुकुल के बाद क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने हँसते हुए कहा,

     

    “इतने वर्षों की बातें एक साथ कैसे बताऊँ?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “आज हमारे पास समय ही समय है।”

     

    सुदामा ने अपनी जिंदगी के बारे में बताना शुरू किया।

     

    गाँव।

     

    घर।

     

    परिवार।

     

    बच्चे।

     

    छोटी-छोटी खुशियाँ।

     

    और संघर्ष।

     

    कृष्ण ध्यान से सुनते रहे।

     

    उन्होंने बीच में एक बार भी सुदामा को रोका नहीं।

     

    फिर कृष्ण ने पूछा,

     

    “और तुम्हें मेरी याद आई?”

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्या तुम सच में यह पूछ रहे हो?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “मैं तो बस सुनना चाहता हूँ।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “हर बार जब जीवन कठिन हुआ।”

     

    कृष्ण की मुस्कान कुछ पल के लिए शांत हो गई।

     

    उन्होंने सुदामा की आँखों में देखा।

     

    उन्हें समझ आ गया कि उनके मित्र ने बहुत कुछ सहा है।

     

    लेकिन कृष्ण ने कोई प्रश्न नहीं किया।

     

    उन्होंने बस सुदामा का हाथ पकड़ लिया।

     

    फिर उनकी नजर सुदामा की छोटी सी पोटली पर पड़ी।

     

    कृष्ण ने शरारत से पूछा,

     

    “यह क्या है?”

     

    सुदामा तुरंत पोटली को पीछे करने लगे।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “इतने वर्षों बाद मिले हो और अब भी मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”

     

    सुदामा ने हँसते हुए कहा,

     

    “यह बहुत साधारण चीज है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मेरे लिए?”

     

    सुदामा चुप हो गए।

     

    कृष्ण ने पोटली की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “मुझे दिखाओ।”

     

    सुदामा झिझकते रहे।

     

    आखिरकार उन्होंने वह छोटी पोटली कृष्ण के हाथ में दे दी।

     

    कृष्ण ने उसे खोला।

     

    अंदर थोड़ा सा चिवड़ा था।

     

    कृष्ण की आँखों में चमक आ गई।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “सुदामा…”

     

    सुदामा शर्माते हुए बोले,

     

    “बहुत थोड़ा है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मेरे लिए तो यह संसार की सबसे बड़ी भेंट है।”

     

    उन्होंने चिवड़ा अपने हाथ में लिया।

     

    एक मुट्ठी खाई।

     

    उनके चेहरे पर वही बचपन वाली खुशी थी।

     

    सुदामा उन्हें देखता रहा।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “रो क्यों रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे लग रहा है कि इतने वर्षों बाद भी मेरा कृष्ण वैसा ही है।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और मुझे लग रहा है कि मेरा सुदामा भी वैसा ही है।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    लेकिन उस मिलन के पीछे सुदामा के मन में एक बात अब भी छिपी थी।

     

    वह कृष्ण से कुछ माँगने नहीं आया था।

     

    लेकिन उसके घर की स्थिति…

     

    उसके परिवार की परेशानी…

     

    सब उसके मन में था।

     

    कृष्ण शायद यह बात समझ चुके थे।

     

    उन्होंने सुदामा की आँखों में देखकर धीरे से पूछा,

     

    “सुदामा, तुम मेरे पास केवल मिलने आए हो… या तुम्हारे मन में कोई और बात भी है?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    उसने कृष्ण की ओर देखा।

     

    और पहली बार उसे लगा…

     

    शायद उसे अपने मित्र से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं।

     

    कृष्ण पहले से सब समझ चुके थे।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    भाग 5 — माखनचोर नंदलाल: जब कान्हा ने गोकुल में मचा दी धूम

     

     

     

    गोकुल की गलियों में अब एक नया नाम बहुत तेजी से प्रसिद्ध हो रहा था।

     

    वह नाम था—

     

    माखनचोर कन्हैया।

     

    लेकिन यह नाम किसी ने प्रेम से रखा था या शिकायत करते हुए, यह कहना कठिन था।

     

    क्योंकि गोकुल की गोपियों के घरों में जब भी कोई माखन की मटकी खाली मिलती, तो सबसे पहले सबकी निगाहें नंद बाबा के घर की ओर उठतीं।

     

    और वहाँ क्या मिलता?

     

    एक नन्हा-सा बालक।

     

    घुँघराले बाल।

     

    माथे पर छोटी-सी लट।

     

    आँखों में शरारत।

     

    होंठों पर मुस्कान।

     

    और चेहरे पर ऐसा भाव—

     

    मानो उसने कुछ किया ही न हो।

     

    वह थे हमारे नंदलाल।

     

    श्रीकृष्ण।

     

    —

     

    माखन से कृष्ण का प्रेम

     

    यशोदा मैया प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर घर के काम में लग जाती थीं।

     

    गायों का दूध दुहा जाता।

     

    दूध को उबाला जाता।

     

    फिर उससे दही जमाया जाता।

     

    और अगले दिन सुबह यशोदा मैया बड़े प्रेम से दही मथकर उसमें से सफेद-सफेद माखन निकालतीं।

     

    माखन को देखकर कृष्ण की आँखें चमक उठतीं।

     

    जब वे बहुत छोटे थे, तब बस दूर से माखन को देखते थे।

     

    लेकिन अब तो घुटनों के बल चलना सीख चुके थे।

     

    इसलिए माखन उनके लिए केवल देखने की वस्तु नहीं रह गया था।

     

    वह उनके लिए अधिकार की वस्तु बन चुका था।

     

    एक दिन यशोदा मैया माखन निकाल रही थीं।

     

    कृष्ण पास में बैठे उन्हें ध्यान से देख रहे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या देख रहे हो लाला?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    यशोदा ने फिर पूछा—

     

    “माखन चाहिए?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिला दिया।

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी देती हूँ।”

     

    उन्होंने एक छोटी-सी कटोरी में माखन निकाला और कृष्ण को दे दिया।

     

    कृष्ण ने दोनों हाथों से कटोरी पकड़ ली।

     

    पहले थोड़ा-सा माखन खाया।

     

    फिर मैया की ओर देखा।

     

    फिर थोड़ा और खाया।

     

    और फिर पूरी कटोरी खाली कर दी।

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “बस भी कर! इतना माखन खाएगा तो पेट दुखेगा।”

     

    कृष्ण ने कटोरी आगे बढ़ा दी।

     

    मानो कह रहे हों—

     

    “मैया, अभी तो शुरुआत हुई है।”

     

    —

     

    कृष्ण को अपना माखन क्यों पसंद नहीं था?

     

    गोकुल की एक विचित्र बात थी।

     

    हर घर में माखन था।

     

    कृष्ण को जब भी माखन चाहिए होता, यशोदा मैया उन्हें माखन दे देतीं।

     

    फिर भी कृष्ण को दूसरे घरों का माखन अधिक प्रिय था।

     

    एक दिन यशोदा मैया ने कृष्ण से पूछा—

     

    “लाला, मेरे घर का माखन अच्छा नहीं लगता क्या?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिला दिया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तो फिर पड़ोस की गोपी के घर क्यों जाते हो?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    यशोदा ने उनकी आँखों में देखा।

     

    “अच्छा! अब समझी। तुम्हें माखन से ज्यादा चोरी करना पसंद है।”

     

    कृष्ण खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    —

     

    पहली बड़ी चोरी

     

    एक सुबह यशोदा मैया किसी काम से बाहर गई थीं।

     

    कृष्ण ने देखा कि घर में माखन की मटकी ऊपर टँगी हुई है।

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर देखा।

     

    फिर अपने छोटे-छोटे हाथों की ओर देखा।

     

    फिर आसपास देखा।

     

    कोई दिखाई नहीं दिया।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “आज तो अवसर अच्छा है।”

     

    लेकिन मटकी बहुत ऊँचाई पर थी।

     

    कृष्ण अकेले उसे नहीं पहुँच सकते थे।

     

    तभी उन्हें अपने ग्वाल-बाल मित्र दिखाई दिए।

     

    कृष्ण ने उन्हें संकेत किया।

     

    सब बच्चे पास आए।

     

    एक बोला—

     

    “क्या हुआ कन्हैया?”

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर उँगली की।

     

    बच्चे समझ गए।

     

    एक ने कहा—

     

    “माखन?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

     

    अब योजना बननी शुरू हुई।

     

    सबसे पहले एक बालक नीचे बैठा।

     

    उसके ऊपर दूसरा।

     

    फिर उसके ऊपर तीसरा।

     

    और सबसे ऊपर चढ़े—

     

    कन्हैया।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे ऊपर पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी पकड़ ली।

     

    लेकिन मटकी बहुत कसकर बाँधी गई थी।

     

    कृष्ण ने खींचा।

     

    नहीं निकली।

     

    उन्होंने फिर खींचा।

     

    फिर भी नहीं निकली।

     

    तब उन्होंने अपने मित्रों से कहा—

     

    “और जोर लगाओ!”

     

    सभी बच्चों ने एक साथ जोर लगाया।

     

    मटकी हिली।

     

    फिर हिली।

     

    और अचानक—

     

    धड़ाम!

     

    मटकी नीचे गिर गई।

     

    दही और माखन चारों ओर फैल गया।

     

    कृष्ण ने तुरंत माखन उठाया।

     

    एक मित्र के मुँह में लगाया।

     

    फिर दूसरे के।

     

    फिर स्वयं खाने लगे।

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    —

     

    गोपी ने देख लिया

     

    लेकिन उन्हें पता नहीं था कि पास की खिड़की से एक गोपी यह सब देख रही थी।

     

    वह चुपचाप खड़ी होकर सब देखती रही।

     

    उसने सोचा—

     

    “आज तो नंदलाल को रंगे हाथों पकड़ लिया।”

     

    वह तुरंत यशोदा मैया के पास पहुँची।

     

    “यशोदा!”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    गोपिका बोली—

     

    “अपने लाला को समझाओ।”

     

    यशोदा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्यों? क्या कर दिया उसने?”

     

    गोपिका बोली—

     

    “तुम्हारा लाल हमारे घर का माखन चुराने लगा है।”

     

    यशोदा ने हँसकर कहा—

     

    “अरे, मेरा कन्हैया ऐसा नहीं कर सकता।”

     

    गोपी बोली—

     

    “अच्छा? तो मेरे साथ चलो।”

     

    यशोदा उनके साथ चल पड़ीं।

     

    —

     

    शिकायतों की शुरुआत

     

    अब तो जैसे गोकुल की सभी गोपियों को एक अवसर मिल गया।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा कृष्ण मेरे घर से माखन चुरा ले जाता है।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “मेरे घर में तो मटकी ही फोड़ दी।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “मेरे घर का माखन खाकर बंदरों को भी खिला देता है।”

     

    चौथी बोली—

     

    “और मेरे घर में तो माखन खाकर ऊपर से मुस्कुराता है!”

     

    यशोदा मैया सबकी बातें सुनती रहीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “सच कह रही हो?”

     

    एक साथ कई गोपियाँ बोलीं—

     

    “हाँ!”

     

    तभी पीछे से किसी ने हँसकर कहा—

     

    “यशोदा, तुम्हारा लाल बहुत बड़ा चोर है।”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण चुपचाप खड़े थे।

     

    उनके होंठों पर माखन लगा हुआ था।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कन्हैया! यह क्या है?”

     

    कृष्ण ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    सभी गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    —

     

    कृष्ण की मासूम सफाई

     

    यशोदा ने कृष्ण को अपनी ओर बुलाया।

     

    “इधर आओ।”

     

    कृष्ण धीरे-धीरे आगे आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुमने माखन चुराया?”

     

    कृष्ण ने सिर हिला दिया—

     

    “नहीं।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तो तुम्हारे मुँह पर माखन कैसे लगा?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    यशोदा ने फिर पूछा—

     

    “बोलो।”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें बड़ी कर लीं।

     

    फिर धीरे से बोले—

     

    “मैया… मुझे तो बंदर ने लगाया।”

     

    गोपियाँ हँसते-हँसते दोहरी हो गईं।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा! अब बंदर तुम्हारे मुँह पर माखन लगाने लगे?”

     

    कृष्ण मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा समझ गईं कि उनका लाल सच नहीं बोल रहा।

     

    लेकिन उनका मन कठोर कैसे होता?

     

    उन्होंने कृष्ण को गोद में उठा लिया।

     

    गोपियाँ बोलीं—

     

    “देखा! फिर बच गया।”

     

    —

     

    एक नई शरारत

     

    लेकिन कृष्ण कहाँ रुकने वाले थे?

     

    अगले दिन उन्होंने एक नई योजना बनाई।

     

    अब वह अकेले चोरी नहीं करते थे।

     

    उन्होंने अपने मित्रों की पूरी टोली बना ली थी।

     

    एक बालक दरवाजे पर पहरा देता।

     

    दूसरा खिड़की के पास खड़ा रहता।

     

    तीसरा मटकी तक पहुँचने की व्यवस्था करता।

     

    और कृष्ण?

     

    वे तो स्वयं सेनापति थे।

     

    कृष्ण ने कहा—

     

    “जब मैं संकेत करूँ, तब सब माखन खाना।”

     

    सबने सिर हिलाया।

     

    कृष्ण घर में घुसे।

     

    मटकी देखी।

     

    धीरे से उसे नीचे उतारा।

     

    माखन निकाला।

     

    पहले स्वयं खाया।

     

    फिर सबको बाँट दिया।

     

    फिर बोले—

     

    “जो यहाँ आया है, उसे खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”

     

    उन्होंने थोड़ा माखन बाहर बैठे बंदरों को भी दे दिया।

     

    बंदर माखन खाते रहे।

     

    बच्चे हँसते रहे।

     

    कृष्ण भी हँसते रहे।

     

    उन्हें देखकर ऐसा लगता था जैसे गोकुल में कोई बड़ा उत्सव चल रहा हो।

     

    —

     

    गोपियों ने बनाई योजना

     

    अब गोपियाँ भी कृष्ण की शरारतों से परेशान होने लगीं।

     

    उन्होंने आपस में सलाह की।

     

    एक बोली—

     

    “अब माखन ऐसी जगह रखेंगे जहाँ कृष्ण पहुँच ही न सके।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “मटकी बहुत ऊँचाई पर बाँधेंगे।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “घर के दरवाजे बंद रखेंगे।”

     

    चौथी बोली—

     

    “देखते हैं अब नंदलाल कैसे चोरी करते हैं।”

     

    सब हँस पड़ीं।

     

    लेकिन वे कृष्ण को अभी ठीक से जानती नहीं थीं।

     

    कृष्ण ने जब यह योजना सुनी तो मुस्कुरा दिए।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “माखन छिपाओगी?”

     

    उनकी आँखों में शरारत चमक रही थी।

     

    “तो हम भी देखेंगे।”

     

    —

     

    ऊँची मटकी और नंदलाल

     

    अगले दिन गोपियों ने माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर बाँध दी।

     

    कृष्ण घर में आए।

     

    उन्होंने ऊपर देखा।

     

    मटकी बहुत दूर थी।

     

    कृष्ण ने अपने हाथ कमर पर रखे।

     

    कुछ क्षण सोचा।

     

    फिर बाहर गए।

     

    अपने मित्रों को बुलाया।

     

    सबने मिलकर एक-दूसरे के ऊपर चढ़ना शुरू किया।

     

    कृष्ण सबसे ऊपर पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी को देखा।

     

    मटकी भी जैसे उन्हें देखकर डर रही हो।

     

    कृष्ण ने धीरे से हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी—

     

    दरवाजे के बाहर से आवाज आई—

     

    “अरे! कौन है वहाँ?”

     

    सभी बच्चे घबरा गए।

     

    कृष्ण ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “शांत!”

     

    सब चुप हो गए।

     

    गोपी अंदर आई।

     

    उसने देखा कि बच्चे दीवार के पास खड़े हैं।

     

    मटकी सुरक्षित थी।

     

    वह मुस्कुराकर बाहर चली गई।

     

    जैसे ही वह गई, कृष्ण ने मटकी की ओर देखा।

     

    फिर मित्रों की ओर।

     

    और अचानक—

     

    मटकी फूट गई।

     

    माखन नीचे गिरा।

     

    बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    —

     

    यशोदा मैया की चिंता

     

    धीरे-धीरे कृष्ण की शरारतें इतनी बढ़ने लगीं कि यशोदा मैया को चिंता होने लगी।

     

    वह एक दिन नंद बाबा से बोलीं—

     

    “आप अपने लाल को कुछ समझाते क्यों नहीं?”

     

    नंद बाबा हँसकर बोले—

     

    “मैं क्या समझाऊँ? जब वह मुस्कुराता है तो मैं स्वयं सब भूल जाता हूँ।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन यह दूसरे घरों की मटकी फोड़ता है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो गोपियाँ शिकायत करने आती हैं?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “और फिर?”

     

    यशोदा मुस्कुराकर बोलीं—

     

    “फिर मैं भी उसे देखकर कुछ कह नहीं पाती।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    —

     

    माखनचोर का अर्थ

     

    धीरे-धीरे “माखनचोर” नाम कृष्ण के लिए प्रेम का नाम बन गया।

     

    गोपियाँ शिकायत करतीं, लेकिन भीतर से चाहतीं कि कृष्ण उनके घर भी आएँ।

     

    क्योंकि जिस घर में कृष्ण आते थे, वहाँ केवल माखन नहीं चोरी होता था।

     

    वहाँ तो—

     

    मन की उदासी भी चोरी हो जाती थी।

     

    कृष्ण आते और घर हँसी से भर जाता।

     

    बच्चे उनके पीछे दौड़ते।

     

    गोपियाँ उन्हें पकड़ने का नाटक करतीं।

     

    कृष्ण भागते।

     

    कभी छिपते।

     

    कभी माखन किसी के हाथ पर लगा देते।

     

    और कभी स्वयं मुँह पर माखन लगाकर ऐसे खड़े हो जाते जैसे कोई अपराध ही न किया हो।

     

    इसीलिए तो ब्रजवासी कहते—

     

    “हमारा माखन जाए तो जाए, पर कन्हैया की मुस्कान न जाए।”

     

    —

     

    कृष्ण और बंदर

     

    कृष्ण को बंदरों से भी बहुत प्रेम था।

     

    जब वह माखन चुराते, तो उसका कुछ भाग बंदरों को अवश्य खिलाते।

     

    एक दिन यशोदा मैया ने उन्हें ऐसा करते देख लिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “लाला! यह क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण बोले—

     

    “मैया, ये भी तो भूखे हैं।”

     

    यशोदा मैया कुछ कह न सकीं।

     

    उन्होंने देखा कि कृष्ण स्वयं कम खा रहे हैं और बंदरों को अधिक खिला रहे हैं।

     

    उनका हृदय भर आया।

     

    उन्होंने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    “तू सच में बहुत दयालु है मेरे लाल।”

     

    कृष्ण मुस्कुरा दिए।

     

    —

     

    माखन-चोरी की लीला का रहस्य

     

    कृष्ण की माखन-चोरी केवल बाल-शरारत नहीं मानी जाती।

     

    भक्ति की दृष्टि से “माखन” को मन की निर्मलता का प्रतीक माना जाता है।

     

    जैसे दूध को मथकर माखन निकाला जाता है, वैसे ही प्रेम और भक्ति से मन को मथने पर उसके भीतर से निर्मल भाव निकलता है।

     

    और कृष्ण उस निर्मल प्रेम को अपने पास खींच लेते हैं।

     

    इसीलिए भक्त प्रेम से कहते हैं—

     

    “कृष्ण चोर हैं, पर माखन के नहीं—वे भक्तों के हृदय चुराते हैं।”

     

    वे किसी के घर की मटकी तोड़ते हैं तो किसी के भीतर का अहंकार भी तोड़ देते हैं।

     

    वे माखन खाते हैं तो किसी के जीवन से चिंता भी खा जाते हैं।

     

    और वे मुस्कुराते हैं तो भक्त का मन अपने आप उनके चरणों में लग जाता है।

     

    —

     

    एक दिन की बड़ी शिकायत

     

    एक दिन गोकुल की सभी गोपियाँ एक साथ यशोदा मैया के घर पहुँचीं।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    एक गोपी बोली—

     

    “आज तो हद हो गई।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “हाँ! तुम्हारे लाल ने हमारी सारी मटकी फोड़ दी।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “और जाते-जाते खिड़की पर माखन से अपना नाम भी लिख गया।”

     

    यशोदा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्या?”

     

    सब हँसने लगीं।

     

    तभी बाहर से कृष्ण की हँसी सुनाई दी।

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण दरवाजे पर खड़े थे।

     

    उनके हाथ में माखन था।

     

    और चेहरे पर वही मासूम मुस्कान।

     

    गोपियों ने एक साथ कहा—

     

    “यही है अपराधी!”

     

    कृष्ण भागे।

     

    सभी गोपियाँ उनके पीछे दौड़ीं।

     

    कृष्ण हँसते हुए आँगन में भागने लगे।

     

    यशोदा मैया भी पीछे दौड़ीं।

     

    “रुक जा कन्हैया!”

     

    कृष्ण और तेज भागे।

     

    गोपियाँ हँसती रहीं।

     

    पूरा गोकुल हँसी से गूँज उठा।

     

    और उस दिन सबको समझ में आ गया—

     

    माखन की मटकी चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न रखो, नंदलाल तक पहुँचने से उसे कोई नहीं रोक सकता।

     

    लेकिन किसी को क्या पता था कि कृष्ण की यह नटखट माखन-चोरी जल्द ही एक ऐसी घटना का रूप लेने वाली है, जिसमें यशोदा मैया अपने कन्हैया को पकड़ लेंगी।

     

    उस दिन पहली बार गोकुल देखेगा कि—

     

    जिस भगवान को पूरा संसार बाँध नहीं सकता, वही अपनी माँ के प्रेम से बँध जाएगा।

     

    और यशोदा मैया के हाथ में होगी—

     

    एक साधारण-सी रस्सी।

     

    लेकिन उस रस्सी में संसार की सबसे बड़ी शक्ति होगी—

     

    माँ का प्रेम।

     

    क्रमशः…

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

     

     

                         (भाग 4)

    ( तृणावर्त का अंत: जब नन्हे कृष्ण ने बवंडर को भी रोक दिया)

     

     

     

    गोकुल में नंदलाल की बाल-लीलाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थीं।

     

    अभी कुछ ही समय पहले की बात थी, जब एक भारी बैलगाड़ी के नीचे सोए हुए नन्हे कृष्ण ने अपने छोटे-से पैर से उसे पलट दिया था। गोकुलवासी उस घटना को लेकर आज भी चर्चा करते थे।

     

    कोई कहता—

     

    “यह अवश्य कोई दैवी शक्ति है।”

     

    कोई कहता—

     

    “न जाने इस बालक के जन्म के साथ गोकुल में कैसी-कैसी अद्भुत घटनाएँ होने लगी हैं!”

     

    लेकिन यशोदा मैया इन बातों को सुनकर मुस्कुरा देतीं।

     

    उनके लिए कृष्ण कोई रहस्यमय शक्ति नहीं थे।

     

    वे तो बस उनके लाला थे।

     

    उनकी आँखों का तारा।

     

    उनकी गोद की शोभा।

     

    उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी।

     

    कृष्ण अब थोड़ा बड़े होने लगे थे। उनके हाथ-पैरों में चंचलता आ गई थी। वे कभी करवट लेने का प्रयास करते, कभी हाथ-पैर चलाकर अपने पास रखे खिलौनों को छूने की कोशिश करते।

     

    जब भी वे मुस्कुराते, यशोदा मैया की आँखों में खुशी छलक उठती।

     

    वह अक्सर अपनी सखियों से कहतीं—

     

    “मेरा कन्हैया जब मुस्कुराता है न, तब लगता है जैसे पूरा घर उजाला हो गया।”

     

    गोपियाँ हँसतीं और कहतीं—

     

    “यशोदा, तुम्हें तो अपने लाल के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता।”

     

    यशोदा कहतीं—

     

    “माँ को अपने बच्चे के अलावा भला क्या दिखाई देगा?”

     

    और सच ही तो था।

     

    माँ का हृदय अपने बच्चे में ही संसार देखता है।

     

    लेकिन उस दिन गोकुल में जो होने वाला था, वह यशोदा मैया के हृदय को कंपा देने वाला था।

     

    —

     

    कंस की बेचैनी फिर बढ़ी

     

    उधर मथुरा में कंस को जब यह समाचार मिला कि पूतना का भी अंत हो गया, तो उसका भय और बढ़ गया।

     

    वह अपने महल में क्रोध से इधर-उधर घूमने लगा।

     

    उसने अपने मंत्रियों से कहा—

     

    “पूतना जैसी शक्तिशाली राक्षसी उस बालक का कुछ नहीं बिगाड़ सकी। आखिर वह बालक है कौन?”

     

    एक मंत्री ने धीरे से कहा—

     

    “महाराज, संभव है कि वह साधारण बालक न हो।”

     

    कंस ने घूरकर देखा।

     

    “क्या कहना चाहते हो?”

     

    मंत्री काँपते हुए बोला—

     

    “शायद आकाशवाणी सत्य होने वाली है।”

     

    यह सुनते ही कंस का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।

     

    “चुप!”

     

    उसने अपना मुकुट उतारकर फेंक दिया।

     

    “मैं किसी बालक से नहीं हार सकता। चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।”

     

    तभी सभा में उपस्थित एक राक्षस आगे आया।

     

    उसका नाम था—

     

    तृणावर्त।

     

    वह अत्यंत शक्तिशाली मायावी राक्षस था।

     

    वह अपने शरीर को भयंकर बवंडर में बदल सकता था।

     

    जहाँ वह जाता, वहाँ धूल का ऐसा तूफान उठता कि कुछ दिखाई नहीं देता।

     

    तृणावर्त ने कंस से कहा—

     

    “महाराज, यदि आपको उस बालक की चिंता है तो मुझे गोकुल जाने की अनुमति दीजिए।”

     

    कंस ने पूछा—

     

    “तुम क्या करोगे?”

     

    तृणावर्त मुस्कुराया।

     

    “मैं उसे आकाश में ले जाऊँगा। इतनी ऊँचाई पर कि कोई उसे बचा नहीं सकेगा।”

     

    कंस की आँखों में चमक आ गई।

     

    “जाओ।”

     

    तृणावर्त ने प्रणाम किया।

     

    “उस बालक को मैं आपके पास वापस नहीं आने दूँगा।”

     

    कंस को क्या पता था कि वह स्वयं अपने विनाश की ओर एक और कदम बढ़ा रहा है।

     

    —

     

    गोकुल का शांत दिन

     

    उधर गोकुल में एक दिन सब कुछ सामान्य था।

     

    सुबह की हल्की धूप चारों ओर फैल रही थी।

     

    गायें चरने के लिए बाहर जा रही थीं।

     

    गोप अपने काम में व्यस्त थे।

     

    गोपियाँ घरों में दही मथ रही थीं।

     

    यशोदा मैया अपने कन्हैया को लेकर आँगन में बैठी थीं।

     

    कृष्ण आज कुछ अधिक ही चंचल दिखाई दे रहे थे।

     

    वे बार-बार यशोदा मैया की ओर हाथ बढ़ा रहे थे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “क्या चाहिए मेरे लाला?”

     

    कृष्ण ने अपनी छोटी-सी उँगली से बाहर की ओर संकेत किया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “बाहर जाना है?”

     

    कृष्ण मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा हँसकर बोलीं—

     

    “अभी नहीं। बाहर धूप है।”

     

    कृष्ण ने फिर अपनी उँगली हिलाई।

     

    “अच्छा-अच्छा, मेरी बात नहीं मानोगे?”

     

    कृष्ण खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।

     

    “बड़े नटखट हो गए हो।”

     

    पास बैठी एक गोपी बोली—

     

    “अभी से नटखट है, यशोदा। बड़ा होकर तो पूरे गोकुल को नचा देगा।”

     

    सभी हँसने लगीं।

     

    —

     

    अचानक मौसम बदल गया

     

    कुछ समय बाद अचानक वातावरण बदलने लगा।

     

    आकाश पर धूल छाने लगी।

     

    हवा धीरे-धीरे तेज होने लगी।

     

    पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया।

     

    लेकिन थोड़ी ही देर में हवा इतनी तेज हो गई कि पेड़ों की डालियाँ जोर-जोर से हिलने लगीं।

     

    गायें बेचैन होकर रंभाने लगीं।

     

    पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौटने लगे।

     

    गोपियाँ अपने बच्चों को घर के भीतर बुलाने लगीं।

     

    एक गोपी ने आकाश की ओर देखकर कहा—

     

    “अरे! यह अचानक कैसी आँधी आ गई?”

     

    दूसरी बोली—

     

    “इतनी तेज हवा तो मैंने बहुत दिनों से नहीं देखी।”

     

    तीसरी ने अपने बच्चे को पकड़ते हुए कहा—

     

    “सब लोग अपने-अपने घरों में चले जाओ।”

     

    धीरे-धीरे हवा का वेग बढ़ता गया।

     

    आकाश में धूल ही धूल दिखाई देने लगी।

     

    कुछ ही क्षणों में ऐसा लगने लगा कि दिन के समय भी रात उतर आई हो।

     

    —

     

    यशोदा मैया की गोद में कृष्ण

     

    उस समय कृष्ण यशोदा मैया की गोद में थे।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “डरना मत मेरे लाल। मैया यहीं है।”

     

    कृष्ण बिल्कुल शांत थे।

     

    वह अपनी माँ की ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    लेकिन अचानक उनका शरीर यशोदा मैया को बहुत भारी लगने लगा।

     

    यशोदा ने आश्चर्य से उन्हें संभाला।

     

    “अरे! मेरा लाला इतना भारी कब हो गया?”

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में सँभालने की कोशिश की।

     

    लेकिन कुछ ही क्षणों में उन्हें लगा कि वह बालक को उठा नहीं पा रही हैं।

     

    यशोदा ने उन्हें धीरे से नीचे बैठा दिया।

     

    “अच्छा, तू यहीं रह। मैया अभी आती है।”

     

    उन्होंने कृष्ण को सुरक्षित स्थान पर लिटाया।

     

    उन्हें क्या पता था कि यह सब उसी मायावी शक्ति का प्रभाव था।

     

    तृणावर्त अपना समय देख चुका था।

     

    —

     

    तृणावर्त का आगमन

     

    अचानक हवा का एक भयंकर चक्र उठा।

     

    वह धूल और मिट्टी को अपने भीतर समेटता हुआ तेजी से घूमने लगा।

     

    किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    वह कोई साधारण आँधी नहीं थी।

     

    वह स्वयं तृणावर्त था।

     

    उसने बवंडर का रूप धारण कर लिया था।

     

    उसकी गति इतनी तेज थी कि वृक्षों की शाखाएँ टूटने लगीं।

     

    छप्पर उड़ने लगे।

     

    गोपियाँ अपने बच्चों को पकड़कर घरों में छिपने लगीं।

     

    गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं।

     

    किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसा संकट आ गया।

     

    तृणावर्त ने कृष्ण को देखा।

     

    नन्हा बालक शांत पड़ा था।

     

    उसने मन ही मन कहा—

     

    “यही है वह बालक!”

     

    वह तेज गति से नीचे आया और देखते ही देखते कृष्ण को अपने साथ आकाश में उठा ले गया।

     

    —

     

    यशोदा मैया का हृदय काँप उठा

     

    जब यशोदा मैया वापस आईं, तो उन्होंने देखा—

     

    जहाँ कृष्ण लेटे थे, वहाँ कोई नहीं था।

     

    “कन्हैया?”

     

    उन्होंने इधर-उधर देखा।

     

    “कन्हैया!”

     

    लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।

     

    यशोदा की आँखें भय से फैल गईं।

     

    उन्होंने चारों ओर देखा।

     

    कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दिए।

     

    उन्होंने घबराकर पुकारा—

     

    “मेरा लाल कहाँ गया?”

     

    गोपियाँ दौड़कर उनके पास आईं।

     

    “क्या हुआ यशोदा?”

     

    यशोदा रोते हुए बोलीं—

     

    “मेरा कन्हैया… मेरा कन्हैया यहाँ था। अभी यहीं था। मैं थोड़ी देर के लिए गई और…”

     

    उनकी आवाज रुक गई।

     

    उन्होंने अपने सिर पर हाथ रख लिया।

     

    “हे भगवान! मेरा बच्चा कहाँ चला गया?”

     

    गोपियाँ भी घबरा गईं।

     

    किसी ने कहा—

     

    “शायद कहीं लुढ़क गया हो।”

     

    किसी ने कहा—

     

    “आँगन में खोजो।”

     

    किसी ने घर के भीतर देखा।

     

    लेकिन कृष्ण कहीं नहीं थे।

     

    —

     

    आकाश में तृणावर्त

     

    उधर तृणावर्त कृष्ण को लेकर बहुत ऊँचाई तक पहुँच चुका था।

     

    उसे लगा—

     

    “अब यह बालक मेरे हाथ से नहीं बच सकता।”

     

    वह और ऊपर जाने लगा।

     

    नीचे पूरा गोकुल बहुत छोटा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन तभी उसे अपने शरीर पर एक विचित्र भार महसूस हुआ।

     

    पहले उसे लगा कि शायद हवा का प्रभाव है।

     

    लेकिन भार बढ़ता गया।

     

    तृणावर्त ने सोचा—

     

    “यह क्या हो रहा है?”

     

    उसने कृष्ण को और ऊपर ले जाने का प्रयास किया।

     

    लेकिन अब कृष्ण का शरीर उसे अत्यंत भारी लगने लगा।

     

    कुछ ही क्षणों में उसकी गति रुक गई।

     

    उसकी साँसें भारी होने लगीं।

     

    वह सोचने लगा—

     

    “यह बालक इतना भारी कैसे हो गया?”

     

    तृणावर्त ने पूरी शक्ति लगा दी।

     

    लेकिन अब तो वह स्वयं नीचे खिंचने लगा।

     

    —

     

    भगवान का अद्भुत रूप

     

    तृणावर्त को अब समझ में आने लगा कि यह कोई साधारण बालक नहीं है।

     

    उसने कृष्ण को अपने शरीर से अलग करने का प्रयास किया।

     

    लेकिन कृष्ण ने अपनी छोटी-सी भुजा उसके गले के चारों ओर डाल दी।

     

    और देखते ही देखते उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई कि तृणावर्त का दम घुटने लगा।

     

    उसकी आँखें बाहर निकल आईं।

     

    उसने अपनी पूरी शक्ति लगा दी।

     

    लेकिन भगवान के सामने उसकी सारी शक्ति समाप्त हो गई।

     

    तृणावर्त की गति रुक गई।

     

    उसका बवंडर समाप्त होने लगा।

     

    आकाश से धूल नीचे गिरने लगी।

     

    गोकुल में धीरे-धीरे प्रकाश लौटने लगा।

     

    और फिर—

     

    धड़ाम!

     

    तृणावर्त का विशाल शरीर एक ऊँचे स्थान से धरती पर आ गिरा।

     

    उसका प्राणांत हो चुका था।

     

    और उसके ऊपर नन्हे कृष्ण सुरक्षित बैठे थे।

     

    —

     

    गोकुलवासियों ने देखा अद्भुत दृश्य

     

    जैसे ही धूल बैठी, गोकुलवासियों ने देखा कि एक विशाल राक्षस धरती पर पड़ा है।

     

    उसके ऊपर नन्हा कृष्ण सुरक्षित था।

     

    एक गोप चिल्लाया—

     

    “कन्हैया!”

     

    सब लोग दौड़ पड़े।

     

    यशोदा मैया तो अपने लाल को देखते ही रोती हुई दौड़ीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया।

     

    “मेरा लाल!”

     

    उन्होंने कृष्ण को बार-बार चूमा।

     

    उनके आँसू रुक ही नहीं रहे थे।

     

    “तुझे कुछ हो जाता तो?”

     

    कृष्ण अपनी माँ की गोद में शांत थे।

     

    जैसे उन्हें कुछ हुआ ही न हो।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें अपने आँचल में छिपा लिया।

     

    “अब मैं तुझे पलभर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ूँगी।”

     

    —

     

    नंद बाबा की चिंता

     

    जब नंद बाबा को घटना का समाचार मिला, वे भी तुरंत वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने तृणावर्त का विशाल शरीर देखा और फिर कृष्ण को देखा।

     

    उनका मन भय और आश्चर्य से भर गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “यह कैसी अद्भुत घटना है?”

     

    एक वृद्ध गोप ने कहा—

     

    “नंद बाबा, यह बालक साधारण नहीं लगता।”

     

    नंद बाबा कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “जो भी हो, भगवान ने आज मेरे बालक की रक्षा की है।”

     

    उन्होंने कृष्ण को गोद में लिया।

     

    कृष्ण ने उनकी दाढ़ी पकड़ ली।

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “अरे! तुझे तो कोई चिंता ही नहीं है।”

     

    गोपियाँ भी मुस्कुराने लगीं।

     

    कुछ ही समय पहले जिस गोकुल में भय छाया हुआ था, वहीं अब हँसी लौटने लगी थी।

     

    —

     

    यशोदा मैया की ममता

     

    उस रात यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी गोद से नीचे नहीं उतारा।

     

    वह उन्हें देखती रहीं।

     

    कभी उनके माथे पर हाथ फेरतीं।

     

    कभी उनके पैरों को सहलातीं।

     

    फिर धीरे से बोलीं—

     

    “लाला, आज तू मुझे बहुत डरा गया।”

     

    कृष्ण ने आँखें खोलकर माँ की ओर देखा।

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “क्या देख रहा है?”

     

    कृष्ण ने अपनी छोटी-सी उँगली से यशोदा के चेहरे को छुआ।

     

    यशोदा की आँखों से फिर आँसू निकल आए।

     

    उन्होंने कृष्ण को चूमते हुए कहा—

     

    “तू मेरा है।”

     

    भगवान स्वयं उनके सामने थे।

     

    फिर भी यशोदा उन्हें अपना मानती थीं।

     

    यही तो प्रेम की शक्ति है।

     

    —

     

    इस लीला का गहरा संदेश

     

    तृणावर्त केवल एक राक्षस का नाम नहीं था।

     

    वह अहंकार और अंधी शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है।

     

    उसे अपनी शक्ति पर इतना अभिमान था कि उसने सोचा—

     

    “मैं इस छोटे-से बालक को आकाश में ले जाकर समाप्त कर दूँगा।”

     

    लेकिन जिस बालक को उसने कमजोर समझा, वही उसके लिए सबसे भारी बन गया।

     

    यह लीला हमें सिखाती है कि केवल बाहरी शक्ति ही सब कुछ नहीं होती।

     

    जिसके भीतर अहंकार होता है, वह अपनी ही शक्ति के कारण विनाश की ओर जा सकता है।

     

    और जो भगवान की शरण में होता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।

     

    —

     

    गोकुल में फिर मुस्कान लौटी

     

    अगली सुबह गोकुल में फिर वही चहल-पहल थी।

     

    गोपियाँ एक-दूसरे से कल की घटना के बारे में बातें कर रही थीं।

     

    एक बोली—

     

    “मैंने तो ऐसा बवंडर कभी नहीं देखा।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “और देखो, हमारा कन्हैया फिर बच गया।”

     

    तीसरी हँसते हुए बोली—

     

    “अब तो मुझे लगता है कि यह बालक स्वयं गोकुल की रक्षा करने आया है।”

     

    यशोदा मैया ने यह बात सुनी तो बोलीं—

     

    “अरे, ऐसी बातें मत करो। मेरा लाला तो अभी बहुत छोटा है।”

     

    गोपियाँ हँसने लगीं।

     

    “हाँ-हाँ, तुम्हारा लाला बहुत छोटा है!”

     

    यशोदा भी मुस्कुरा दीं।

     

    लेकिन मन ही मन वह कल की घटना को भूल नहीं पा रही थीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को देखा।

     

    कृष्ण उस समय एक छोटी-सी लकड़ी की वस्तु से खेल रहे थे।

     

    यशोदा ने सोचा—

     

    “यह मेरा नन्हा-सा बालक आखिर कौन है?”

     

    लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने उस विचार को मन से निकाल दिया।

     

    “जो भी है, मेरा तो है।”

     

    उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी गोद में भर लिया।

     

    और कृष्ण ने अपनी माँ के गले में हाथ डाल दिए।

     

    —

     

    आगे की लीला की शुरुआत

     

    गोकुल में अब कृष्ण की ख्याति बढ़ती जा रही थी।

     

    हर दिन कोई नई शरारत।

     

    हर दिन कोई नई मुस्कान।

     

    हर दिन कोई नई लीला।

     

    लेकिन अब उनकी सबसे बड़ी शरारतें आरंभ होने वाली थीं।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे घुटनों के बल चलना सीखने वाले थे।

     

    वे घर के एक कोने से दूसरे कोने तक जाते।

     

    माखन की मटकी को देखते।

     

    दही को देखते।

     

    और फिर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से यशोदा मैया की ओर देखते।

     

    यशोदा समझ जातीं—

     

    “कुछ तो शरारत होने वाली है।”

     

    लेकिन वह शरारत क्या थी?

     

    एक दिन कृष्ण ने अपने छोटे-से हाथ से माखन की मटकी की ओर बढ़ना शुरू किया।

     

    गोपियों ने उन्हें देख लिया।

     

    एक गोपी चिल्लाई—

     

    “अरी यशोदा! संभाल अपने लाल को!”

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण मटकी की ओर बढ़ रहे थे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “कन्हैया! उधर क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण तुरंत रुक गए।

     

    यशोदा उनकी ओर बढ़ीं।

     

    कृष्ण ने मासूम चेहरा बना लिया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तू माखन खाने जा रहा था न?”

     

    कृष्ण ने आँखें झुका लीं।

     

    गोपियाँ हँसने लगीं।

     

    यशोदा भी मुस्कुरा उठीं।

     

    लेकिन उस दिन से गोकुल में एक नई पहचान बनने वाली थी—

     

    माखनचोर कन्हैया की।

     

    जो माखन चुराएगा।

     

    जो मटकी फोड़ेगा।

     

    जो गोपियों को सताएगा।

     

    और फिर ऐसी मासूम मुस्कान देगा कि कोई उसे डाँट ही नहीं पाएगा।

     

    यही थी नंदलाल की अगली लीला की शुरुआत।

     

    क्रमशः…

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    (भाग 3 — शकटासुर का उद्धार)

     

    गोकुल में श्रीकृष्ण के जन्म को कुछ समय बीत चुका था।

     

    पूतना जैसी भयंकर राक्षसी का अंत होने के बाद भी गोकुलवासियों का जीवन पहले जैसा ही चलता रहा। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि नंद बाबा का यह नन्हा-सा बालक बार-बार बड़े संकटों से कैसे बच जाता है।

     

    परंतु यशोदा मैया के लिए तो उनका कन्हैया अभी भी वही नन्हा बालक था, जिसे हर समय अपनी आँखों के सामने रखने का मन करता था।

     

    कृष्ण अब धीरे-धीरे बड़े होने लगे थे।

     

    उनके हाथ-पैरों में पहले से अधिक चंचलता आ गई थी।

     

    कभी वे अपनी छोटी-सी उँगली से यशोदा मैया की उँगली पकड़ लेते, तो कभी पैरों को हिलाते हुए खिलखिलाकर हँसने लगते।

     

    उनकी मुस्कान देखते ही यशोदा मैया की सारी थकान दूर हो जाती।

     

    एक दिन सुबह यशोदा मैया कृष्ण को गोद में लेकर आँगन में बैठी थीं।

     

    कृष्ण बार-बार उनकी ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    यशोदा मैया ने उनके गालों को सहलाते हुए कहा—

     

    “क्या हुआ मेरे लाला? आज बड़े प्रसन्न हो!”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    बस अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मैया को देखते रहे।

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी से इतना मुस्कुराते हो? लगता है कोई बड़ी शरारत सोच रहे हो।”

     

    कृष्ण ने फिर मुस्कुरा दिया।

     

    —

     

    गोकुल में उत्सव की तैयारी

     

    कुछ समय बाद नंद बाबा के घर एक विशेष उत्सव मनाने की तैयारी होने लगी।

     

    गोकुल में ऐसे अवसरों पर सभी गोप-गोपियाँ एकत्र होते थे।

     

    घर को सजाया गया।

     

    आँगन में सुंदर रंगोली बनाई गई।

     

    गायों को नहलाकर उनके सींगों पर रंग लगाया गया।

     

    उनके गले में नई घंटियाँ बाँधी गईं।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों से दही, माखन, दूध और मिठाइयाँ लेकर नंद भवन पहुँचने लगीं।

     

    पूरा गोकुल जैसे एक परिवार बन गया था।

     

    कहीं गीत गाए जा रहे थे।

     

    कहीं ढोलक बज रही थी।

     

    कहीं बच्चे खेल रहे थे।

     

    और नंद भवन में तो विशेष चहल-पहल थी।

     

    यशोदा मैया सुबह से ही काम में लगी थीं।

     

    कभी रसोई में जातीं, कभी आँगन में आतीं, कभी मेहमानों का स्वागत करतीं।

     

    लेकिन बार-बार उनकी दृष्टि अपने कन्हैया पर चली जाती।

     

    “मेरा लाल कहाँ है?”

     

    वह पूछतीं।

     

    एक गोपी हँसकर कहती—

     

    “अरी यशोदा! आज तो पूरे गोकुल की चिंता छोड़कर बस अपने लाला की चिंता कर रही हो।”

     

    यशोदा मुस्कुराकर कहतीं—

     

    “क्या करूँ? यह है ही ऐसा।”

     

    दूसरी गोपी बोली—

     

    “अभी छोटा है, थोड़ा बड़ा होने दो। फिर तुम्हें पता चलेगा इसकी शरारतों का।”

     

    यशोदा ने हँसकर कहा—

     

    “मेरा कन्हैया तो बहुत सीधा है।”

     

    सभी गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    किसी को क्या पता था कि यही “सीधा” बालक आगे चलकर पूरे गोकुल की मटकी चुराने वाला है!

     

    —

     

    वह पुरानी बैलगाड़ी

     

    उत्सव के कारण नंद भवन के आँगन में बहुत-सा सामान रखा हुआ था।

     

    दूध के मटके, दही के घड़े, मक्खन के पात्र और अन्य घरेलू वस्तुएँ एक बड़ी पुरानी बैलगाड़ी के ऊपर रखी थीं।

     

    वह बैलगाड़ी बहुत भारी थी।

     

    उसे आँगन के एक कोने में खड़ा कर दिया गया था।

     

    यशोदा मैया ने सोचा कि कुछ समय के लिए कृष्ण को उसी गाड़ी के नीचे छाया में सुला दिया जाए।

     

    उन्होंने कृष्ण को एक सुंदर वस्त्र पर लिटाया।

     

    फिर उनके सिर के पास बैठकर बोलीं—

     

    “लाला, मैं अभी आती हूँ। तुम यहीं सोना।”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें खोलकर मैया की ओर देखा।

     

    यशोदा ने उनके माथे को चूमा और काम में लग गईं।

     

    आँगन में उत्सव का शोर बढ़ता जा रहा था।

     

    कहीं कोई गीत गा रहा था।

     

    कहीं बच्चे हँस रहे थे।

     

    कहीं मटकी में दही मथा जा रहा था।

     

    और उस सबके बीच नन्हा कृष्ण उस भारी बैलगाड़ी के नीचे लेटे हुए थे।

     

    —

     

    संकट की आहट

     

    कहानी के अनुसार, कंस ने कृष्ण को समाप्त करने के लिए एक और राक्षस भेजा था।

     

    उस राक्षस का नाम था—

     

    शकटासुर।

     

    वह मायावी राक्षस था।

     

    उसने सोचा—

     

    “पूतना असफल हो गई। अब मैं इस बालक को समाप्त करूँगा।”

     

    शकटासुर ने अपनी मायावी शक्ति से उस भारी बैलगाड़ी में प्रवेश कर लिया।

     

    अब वह बैलगाड़ी केवल लकड़ी और पहियों की गाड़ी नहीं थी।

     

    उसमें एक भयंकर राक्षसी शक्ति समा चुकी थी।

     

    शकटासुर मन ही मन प्रसन्न हुआ।

     

    “यह बालक तो मेरे नीचे लेटा है। जैसे ही अवसर मिलेगा, मैं इस गाड़ी को इसके ऊपर गिरा दूँगा।”

     

    लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वह जिस बालक के ऊपर अपनी शक्ति आजमाने आया है, उसके लिए पर्वत भी खिलौने के समान हैं।

     

    —

     

    कृष्ण को भूख लगी

     

    कुछ समय बीता।

     

    कृष्ण की आँख खुल गई।

     

    उन्होंने इधर-उधर देखा।

     

    मैया कहीं दिखाई नहीं दीं।

     

    उन्होंने अपनी छोटी-सी मुट्ठी हिलाई।

     

    फिर अपने पैरों को चलाया।

     

    लेकिन मैया काम में व्यस्त थीं।

     

    कृष्ण को भूख लगी।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे रोना शुरू किया।

     

    पहले हल्की-सी आवाज निकली।

     

    फिर रोना बढ़ गया।

     

    आँगन में उपस्थित कुछ गोपियों ने कृष्ण की आवाज सुनी।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “लगता है यशोदा का लाला जाग गया।”

     

    दूसरी ने कहा—

     

    “यशोदा तो अभी रसोई में हैं।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “अरे, कोई जाकर देखो!”

     

    लेकिन उत्सव की भीड़ और शोर के कारण किसी का ध्यान ठीक से कृष्ण की ओर नहीं गया।

     

    कृष्ण अब और जोर से रोने लगे।

     

    उन्होंने अपने छोटे-छोटे पैर चलाने शुरू किए।

     

    एक बार उन्होंने अपना पैर ऊपर उठाया।

     

    फिर नीचे किया।

     

    और फिर—

     

    उनका नन्हा-सा पैर उस भारी बैलगाड़ी से जा लगा।

     

    अगले ही क्षण जो हुआ, उसे देखकर सभी के होश उड़ गए।

     

    —

     

    भारी गाड़ी का पलटना

     

    एक भयंकर आवाज हुई—

     

    धड़ाम!

     

    वह विशाल और भारी बैलगाड़ी उलट गई।

     

    उस पर रखे सारे मटके और घड़े टूटकर चारों ओर बिखर गए।

     

    दही और दूध आँगन में फैल गया।

     

    लकड़ी के पहिए एक ओर जा गिरे।

     

    बर्तन टूटने की आवाज सुनकर पूरा गोकुल दौड़ पड़ा।

     

    गोपियाँ चिल्लाईं—

     

    “अरे! यह क्या हो गया?”

     

    “गाड़ी कैसे पलट गई?”

     

    “कहीं बालक कृष्ण को तो कुछ नहीं हुआ?”

     

    यशोदा मैया ने जैसे ही आवाज सुनी, उनके हाथ-पैर काँपने लगे।

     

    वह सब काम छोड़कर दौड़ती हुई आईं।

     

    “मेरा लाल!”

     

    उनकी आँखें सीधे कृष्ण को खोजने लगीं।

     

    उन्होंने देखा—

     

    कृष्ण बिल्कुल सुरक्षित थे।

     

    वह वहीं लेटे हुए थे और अपने छोटे-छोटे हाथ-पैर हिला रहे थे।

     

    यशोदा मैया ने तुरंत उन्हें उठाकर अपनी गोद में भर लिया।

     

    “मेरे लाल! तुझे कुछ तो नहीं हुआ?”

     

    वह कृष्ण के हाथ-पैर देखने लगीं।

     

    उनके माथे को चूमा।

     

    फिर उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

     

    उनकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    —

     

    गोकुलवासियों का आश्चर्य

     

    गोप और गोपियाँ उस उलटी हुई गाड़ी को देखकर हैरान थे।

     

    एक गोप बोला—

     

    “यह गाड़ी इतनी भारी थी। इसे तो चार-पाँच आदमी मिलकर भी मुश्किल से हिला पाते हैं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “फिर यह अपने आप कैसे उलट गई?”

     

    तीसरा बोला—

     

    “क्या किसी ने इसे धक्का दिया था?”

     

    एक बालक बोला—

     

    “मैंने देखा था! कन्हैया ने पैर मारा था।”

     

    सभी उसकी ओर देखने लगे।

     

    एक गोपी हँसकर बोली—

     

    “अरे पगले! इतने-से पैर में इतनी शक्ति कहाँ से आएगी?”

     

    बालक बोला—

     

    “मैंने सच में देखा था!”

     

    दूसरे बच्चे भी कहने लगे—

     

    “हाँ! कन्हैया ने पैर मारा था।”

     

    गोपियाँ हँसने लगीं।

     

    उन्हें लगा कि बच्चे अपने प्रिय मित्र की प्रशंसा कर रहे हैं।

     

    किसी ने कल्पना भी नहीं की कि सचमुच उस गाड़ी को नन्हे कृष्ण ने ही पलटा था।

     

    —

     

    शकटासुर का अंत

     

    वास्तव में उस गाड़ी के भीतर छिपा शकटासुर भगवान कृष्ण के चरण-स्पर्श से नष्ट हो चुका था।

     

    जिस शक्ति के भरोसे वह आया था, वही शक्ति उसके लिए विनाश का कारण बन गई।

     

    भगवान ने न तो कोई अस्त्र उठाया।

     

    न कोई युद्ध किया।

     

    न कोई बड़ी शक्ति दिखाई।

     

    उन्होंने केवल अपने नन्हे-से पैर को थोड़ा-सा हिलाया।

     

    और राक्षस का अंत हो गया।

     

    यही तो कृष्ण की बाल-लीला थी।

     

    जो कार्य साधारण मनुष्य के लिए असंभव था, वह उनके लिए खेल मात्र था।

     

    —

     

    यशोदा मैया की चिंता

     

    लेकिन यशोदा मैया को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था।

     

    उनके लिए बस इतना महत्वपूर्ण था कि उनका लाल सुरक्षित रहे।

     

    वह कृष्ण को गोद में लेकर बोलीं—

     

    “तू वहाँ अकेला क्यों लेटा था?”

     

    कृष्ण उन्हें देखते रहे।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मैंने कहा था न, मैया अभी आती है!”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें झपकाईं।

     

    यशोदा का हृदय पिघल गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अच्छा, अब रोना मत।”

     

    और फिर उन्हें अपने आँचल से ढक लिया।

     

    गोपियाँ यह दृश्य देखकर मुस्कुराने लगीं।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा लाल तो बहुत भाग्यशाली है। उसे ऐसी माँ मिली है जो उसे पलभर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया।

     

    —

     

    नंद बाबा को समाचार मिला

     

    जब नंद बाबा को इस घटना के बारे में पता चला, तो वे भी तुरंत वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने उलटी हुई बैलगाड़ी देखी।

     

    टूटे हुए मटके देखे।

     

    फिर अपने बालक को देखा।

     

    नंद बाबा कुछ क्षण तक कुछ बोल ही नहीं पाए।

     

    उन्होंने कृष्ण को गोद में लिया।

     

    “कन्हैया!”

     

    उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया।

     

    फिर बोले—

     

    “आज तो भगवान ने मेरे लाल की रक्षा कर दी।”

     

    नंद बाबा को क्या पता था कि भगवान स्वयं उनके हाथों में हैं।

     

    —

     

    ब्रज के बुजुर्गों की चर्चा

     

    गोकुल के कुछ वृद्ध लोग वहाँ एकत्र हुए।

     

    उन्होंने घटना को ध्यान से देखा।

     

    एक वृद्ध बोले—

     

    “यह कोई साधारण घटना नहीं है।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “बच्चों की बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन इतनी भारी गाड़ी का अपने आप उलटना भी तो संभव नहीं।”

     

    तीसरे ने कहा—

     

    “हो सकता है इसमें कोई अदृश्य शक्ति हो।”

     

    एक अन्य वृद्ध बोले—

     

    “हमें अपने बालक की रक्षा के लिए भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए।”

     

    सभी ने मिलकर भगवान का नाम लिया।

     

    लेकिन कृष्ण अपनी माँ की गोद में आराम से मुस्कुरा रहे थे।

     

    मानो उन्हें सब पता हो।

     

    —

     

    नंदलाल की नटखट मुस्कान

     

    उस शाम यशोदा मैया कृष्ण को अपने घर के भीतर लेकर आईं।

     

    उन्होंने उन्हें एक सुंदर शैया पर लिटाया।

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा और मुस्कुराने लगे।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “क्या बात है? आज बड़ी खुशी हो रही है?”

     

    कृष्ण ने पैर हिलाया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “अच्छा! आज गाड़ी भी तुमने ही पलटाई थी क्या?”

     

    कृष्ण फिर मुस्कुराए।

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अरे! तू तो बड़ा शरारती निकलेगा।”

     

    कृष्ण ने जैसे अपनी आँखों से उत्तर दिया—

     

    “मैया, अभी तो शुरुआत है।”

     

    —

     

    इस लीला का रहस्य

     

    शकटासुर की कथा में एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी माना जाता है।

     

    वह भारी बैलगाड़ी जैसे हमारे जीवन के उन बोझों का प्रतीक मानी जा सकती है, जिन्हें हम अपने मन में ढोते रहते हैं।

     

    अहंकार।

     

    भय।

     

    लोभ।

     

    क्रोध।

     

    पुरानी चिंताएँ।

     

    और अनेक प्रकार के मानसिक बोझ।

     

    जब मनुष्य भगवान का स्मरण करता है, तो उसके भीतर ऐसी शक्ति आती है जो बड़े से बड़े बोझ को भी दूर करने का सामर्थ्य देती है।

     

    श्रीकृष्ण ने इस लीला में यह दिखाया कि भगवान के लिए कोई संकट बड़ा नहीं होता।

     

    और सबसे सुंदर बात यह थी कि उन्होंने यह लीला किसी बड़े योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक छोटे-से बालक के रूप में की।

     

    यही कृष्ण की बाल-लीलाओं की विशेषता है।

     

    वे कभी रोते हैं।

     

    कभी हँसते हैं।

     

    कभी खेलते हैं।

     

    कभी शरारत करते हैं।

     

    और आवश्यकता पड़ने पर संसार की रक्षा भी कर देते हैं।

     

    —

     

    गोकुल में फिर लौटी खुशी

     

    घटना के बाद गोकुलवासियों ने भगवान का धन्यवाद किया।

     

    टूटे हुए मटकों को हटाया गया।

     

    आँगन साफ किया गया।

     

    गायों को फिर से बाँधा गया।

     

    बच्चे थोड़ी देर तक उस घटना की चर्चा करते रहे।

     

    एक बालक दूसरे से कह रहा था—

     

    “मैंने तो पहले ही कहा था, कन्हैया ने पैर मारा था।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “हाँ, लेकिन कोई हमारी बात मानता ही नहीं।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    उधर कृष्ण यशोदा मैया की गोद में आराम से सो चुके थे।

     

    उनके मुख पर हल्की-सी मुस्कान थी।

     

    यशोदा मैया उन्हें देखती रहीं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “मेरे लाला, तू हमेशा ऐसे ही हँसता रहना।”

     

    बाहर रात उतरने लगी।

     

    आकाश में तारे चमकने लगे।

     

    यमुना जी की धारा शांत होकर बह रही थी।

     

    गोकुल में सब लोग सोने लगे।

     

    लेकिन भगवान की लीला कहाँ रुकने वाली थी?

     

    जिस बालक ने अभी अपने पैर से एक भारी गाड़ी पलट दी थी, वह शीघ्र ही ऐसी लीला करने वाला था जिसमें एक भयंकर बवंडर पूरे गोकुल को अपनी चपेट में ले लेगा।

     

    लोग भय से काँप उठेंगे।

     

    यशोदा मैया अपने लाल को खोजती हुई व्याकुल हो जाएँगी।

     

    और तब गोकुलवासियों को एक बार फिर अनुभव होगा कि उनका नन्हा कन्हैया कोई साधारण बालक नहीं है।

     

    क्योंकि अगली लीला में आने वाला था—

     

    तृणावर्त।

     

    एक ऐसा राक्षस, जो स्वयं बवंडर का रूप धारण करके नंदलाल को आकाश में ले जाएगा।

     

    लेकिन वह नहीं जानता था कि जिसे वह आकाश में ले जा रहा है, वही संपूर्ण आकाश का स्वामी है।

     

    क्रमशः…

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

     

     

    (भाग 2 — पूतना का गोकुल आगमन)

     

    पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस प्रकार भाद्रपद मास की अष्टमी की अर्धरात्रि में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया और वसुदेव जी उन्हें यमुना पार करके गोकुल ले आए।

     

    गोकुल में उस समय किसी को यह ज्ञात नहीं था कि नंद बाबा के घर जन्म लेने वाला वह नन्हा बालक कोई साधारण शिशु नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं।

     

    यशोदा मैया तो उन्हें अपना लाल समझकर ही दुलार रही थीं।

     

    कभी उन्हें गोद में लेकर चूमतीं, कभी उनके नन्हे हाथों को अपनी उँगली पकड़ातीं और कभी उनके मुख को निहारते-निहारते स्वयं मुस्कुराने लगतीं।

     

    गोकुल में हर ओर आनंद था।

     

    लेकिन इसी आनंद के बीच मथुरा में बैठा कंस बेचैन था।

     

    उसे उस आकाशवाणी की बात बार-बार याद आ रही थी—

     

    “तेरा काल गोकुल में जन्म ले चुका है।”

     

    कंस के मन में भय ने घर कर लिया था।

     

    उसने अपने सैनिकों और राक्षसों को आदेश दिया—

     

    “गोकुल और उसके आसपास जितने भी नवजात बालक हैं, उन्हें खोजो। मुझे किसी भी कीमत पर उस बालक का पता चाहिए।”

     

    कंस को क्या पता था कि जिस बालक को वह खोज रहा है, वह उसके महलों से बहुत दूर नहीं, बल्कि एक छोटे-से गाँव में अपनी माँ की गोद में मुस्कुरा रहा है।

     

    —

     

    कंस की चिंता

     

    मथुरा के राजमहल में उस रात कंस सो नहीं पाया।

     

    वह बार-बार अपने महल की खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगता।

     

    चाँदनी रात थी, लेकिन कंस के मन में अंधकार था।

     

    उसने अपने एक मंत्री से कहा—

     

    “मुझे वह बालक चाहिए। चाहे वह कहीं भी छिपा हो।”

     

    मंत्री ने डरते हुए कहा—

     

    “महाराज, यदि वह बालक गोकुल में है तो वहाँ पहुँचने वाले हमारे राक्षस उसे खोज लेंगे।”

     

    कंस ने क्रोध से कहा—

     

    “मुझे आश्वासन नहीं चाहिए! मुझे परिणाम चाहिए।”

     

    तभी उसके मन में एक विचार आया।

     

    उसे याद आई एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षसी—

     

    पूतना।

     

    पूतना मायावी थी।

     

    वह अपना रूप बदल सकती थी।

     

    कभी सुंदर स्त्री बन सकती थी, तो कभी भयंकर राक्षसी।

     

    वह छोटे बच्चों को छल से अपने पास बुलाती और अपने विषैले स्तनों का दूध पिलाकर उनका जीवन समाप्त कर देती।

     

    कंस ने तुरंत उसे बुलवाया।

     

    कुछ ही समय बाद पूतना उसके सामने उपस्थित हुई।

     

    उसका विशाल शरीर, लाल आँखें और भयंकर रूप देखकर राजमहल के सैनिक भी काँप उठे।

     

    कंस ने कहा—

     

    “पूतना! मुझे एक काम करना है।”

     

    पूतना ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “कैसा काम, महाराज?”

     

    कंस ने कहा—

     

    “गोकुल में एक बालक जन्मा है। मुझे संदेह है कि वही मेरे विनाश का कारण है। तुम गोकुल जाओ और उस बालक का वध कर दो।”

     

    पूतना ने ठहाका लगाया।

     

    “बस इतनी-सी बात?”

     

    कंस ने कहा—

     

    “उसे पहचानना आसान नहीं होगा। वहाँ नंद नाम का गोप रहता है। उसके घर एक बालक है। मुझे वही चाहिए।”

     

    पूतना ने उत्तर दिया—

     

    “महाराज, आप चिंता न करें। मैं उस बालक को ऐसी मृत्यु दूँगी कि किसी को संदेह तक नहीं होगा।”

     

    कंस के चेहरे पर दुष्ट मुस्कान फैल गई।

     

    उसे लगा कि अब उसका भय समाप्त हो जाएगा।

     

    लेकिन वह नहीं जानता था कि जिस बालक के पास पूतना जा रही है, उसके सामने मृत्यु स्वयं भी असहाय होने वाली है।

     

    —

     

    गोकुल की सुबह

     

    उधर गोकुल में एक सुंदर सुबह हुई।

     

    सूर्य की किरणें धीरे-धीरे गाँव की गलियों में फैलने लगीं।

     

    गायों के गले की घंटियाँ बजने लगीं।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों में दही मथने लगीं।

     

    कहीं मटकी में माखन निकाला जा रहा था, तो कहीं बालक खेलते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे।

     

    नंद बाबा के घर तो जैसे हर दिन उत्सव ही रहता था।

     

    यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लिए बैठी थीं।

     

    बालक कृष्ण उनकी उँगली पकड़कर खेल रहे थे।

     

    कभी अपनी छोटी-सी मुट्ठी बंद करते, कभी खोलते।

     

    यशोदा मैया हँसकर बोलीं—

     

    “अरे मेरे लाल! इतनी-सी मुट्ठी में क्या छिपा रखा है?”

     

    कृष्ण ने अपनी मुट्ठी और कसकर बंद कर ली।

     

    यशोदा मैया बोलीं—

     

    “अच्छा! मुझसे भी नहीं बताओगे?”

     

    कृष्ण मुस्कुराने लगे।

     

    यशोदा मैया उन्हें देखकर इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्हें अपने हृदय से लगा लिया।

     

    उन्हें क्या पता था कि आज उनके लाल के जीवन में एक बड़ी लीला होने वाली है।

     

    —

     

    पूतना का रूप परिवर्तन

     

    उधर पूतना गोकुल की ओर बढ़ रही थी।

     

    उसका असली रूप इतना भयंकर था कि कोई मनुष्य उसे देखकर जीवित न रह पाए।

     

    इसलिए उसने अपनी मायावी शक्ति से स्वयं को एक अत्यंत सुंदर स्त्री के रूप में बदल लिया।

     

    उसने सुंदर वस्त्र पहने।

     

    बालों में सुगंधित फूल लगाए।

     

    माथे पर सुंदर तिलक लगाया।

     

    उसका चेहरा इतना मनोहर बना दिया कि जो भी उसे देखता, उसे कोई राजमहल की देवी समझता।

     

    हाथ में उसने एक सुंदर पात्र लिया।

     

    लेकिन उस पात्र में अमृत नहीं, मृत्यु छिपी थी।

     

    उसने अपने स्तनों पर घोर विष लगा रखा था।

     

    उसका उद्देश्य स्पष्ट था—

     

    बालकृष्ण को अपने पास बुलाना और विषपान कराकर उनका वध करना।

     

    पूतना धीरे-धीरे गोकुल में प्रवेश कर गई।

     

    आश्चर्य की बात यह थी कि उसे देखकर किसी को भी उस पर संदेह नहीं हुआ।

     

    गोपियाँ उसकी सुंदरता देखकर एक-दूसरे से कहने लगीं—

     

    “यह कौन है?”

     

    दूसरी गोपी बोली—

     

    “शायद किसी दूर के नगर से आई कोई देवी है।”

     

    तीसरी ने कहा—

     

    “देखो, कितनी सुंदर है!”

     

    पूतना मन ही मन मुस्कुरा रही थी।

     

    वह सोच रही थी—

     

    “मूर्खों! तुम जिसे देवी समझ रहे हो, वही तुम्हारे प्रिय बालक की मृत्यु बनकर आई है।”

     

    लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि भगवान के नगर में छल कितनी देर टिक सकता है।

     

    —

     

    नंद भवन में प्रवेश

     

    पूतना सीधे नंद बाबा के घर पहुँची।

     

    उस समय यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लिए बैठी थीं।

     

    जैसे ही पूतना ने घर में प्रवेश किया, श्रीकृष्ण ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    कथा में कहा जाता है कि भगवान ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे अपनी लीला को पूर्ण करने वाले थे।

     

    पूतना धीरे-धीरे यशोदा के पास पहुँची।

     

    उसने मधुर स्वर में कहा—

     

    “बहन! कितना सुंदर बालक है तुम्हारा।”

     

    यशोदा मैया ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ, मेरा कन्हैया बहुत प्यारा है।”

     

    पूतना ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसके मन में दुष्ट विचार उठे—

     

    “यही है वह बालक।”

     

    लेकिन तभी उसके भीतर एक विचित्र भावना भी उठी।

     

    उसने ऐसा सुंदर बालक पहले कभी नहीं देखा था।

     

    कृष्ण का मुख चंद्रमा के समान चमक रहा था।

     

    उनके छोटे-छोटे हाथ और चरण देखकर कुछ क्षण के लिए पूतना का हृदय भी कोमल हो उठा।

     

    लेकिन उसके भीतर छिपी दुष्टता ने उस भावना को दबा दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “बहन, मुझे बालक को थोड़ी देर गोद में लेने दो।”

     

    यशोदा मैया ने सहजता से कृष्ण को उसकी गोद में दे दिया।

     

    यशोदा को क्या पता था कि जिस स्त्री की गोद में वह अपने लाल को दे रही हैं, वह उन्हें मारने के उद्देश्य से आई है।

     

    —

     

    पूतना की गोद में कृष्ण

     

    पूतना ने बालक कृष्ण को अपनी गोद में लिया।

     

    कृष्ण शांत थे।

     

    उन्होंने अपनी आँखें बंद कर रखी थीं।

     

    पूतना ने उन्हें अपने विषैले स्तन से दूध पिलाने के लिए अपने पास किया।

     

    वह मन ही मन सोच रही थी—

     

    “अब यह बालक कुछ ही क्षणों में समाप्त हो जाएगा।”

     

    लेकिन जैसे ही श्रीकृष्ण ने दूध पीना आरंभ किया, कुछ अद्भुत हुआ।

     

    उन्होंने केवल दूध ही नहीं पिया।

     

    उन्होंने पूतना के प्राण भी खींचने आरंभ कर दिए।

     

    पूतना का चेहरा बदलने लगा।

     

    उसकी आँखें फैल गईं।

     

    वह दर्द से तड़प उठी।

     

    उसने कृष्ण को अपने से अलग करने की कोशिश की।

     

    लेकिन बालक कृष्ण ने उसे और कसकर पकड़ लिया।

     

    पूतना चीख उठी—

     

    “छोड़ो! छोड़ो मुझे!”

     

    लेकिन नन्हे कृष्ण ने उसे नहीं छोड़ा।

     

    अब उसका सुंदर स्त्री वाला रूप समाप्त होने लगा।

     

    उसका शरीर विशाल होने लगा।

     

    उसके बाल बिखर गए।

     

    उसकी आँखें लाल हो गईं।

     

    उसके दाँत बाहर निकल आए।

     

    उसका वास्तविक राक्षसी रूप प्रकट होने लगा।

     

    गोकुल की धरती काँपने लगी।

     

    गोपियाँ भयभीत होकर चिल्लाने लगीं—

     

    “अरे! यह क्या हो रहा है?”

     

    —

     

    पूतना का भयंकर रूप

     

    अचानक पूतना अपने वास्तविक विशाल रूप में आ गई।

     

    उसका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया।

     

    वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

     

    उसकी चीख से पूरा गोकुल काँप उठा।

     

    पेड़ों से पक्षी उड़ गए।

     

    गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं।

     

    गोप और गोपियाँ अपने घरों से बाहर निकल आए।

     

    किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।

     

    पूतना ने कृष्ण को अपने शरीर से हटाने की बहुत कोशिश की।

     

    लेकिन भगवान कृष्ण उसके प्राणों को खींचते रहे।

     

    अंततः उसकी शक्ति समाप्त होने लगी।

     

    उसने अंतिम बार भयंकर गर्जना की—

     

    “आऽऽह!”

     

    और देखते ही देखते वह धरती पर गिर पड़ी।

     

    उसका विशाल शरीर गोकुल से बहुत दूर तक फैल गया।

     

    वृक्ष टूट गए।

     

    धरती काँप उठी।

     

    चारों ओर धूल उड़ने लगी।

     

    कुछ क्षण के लिए गोकुल में सन्नाटा छा गया।

     

    —

     

    यशोदा मैया की घबराहट

     

    जैसे ही धूल थोड़ी शांत हुई, यशोदा मैया की दृष्टि अपने कृष्ण पर पड़ी।

     

    उनका कलेजा मुँह को आ गया।

     

    “मेरा लाल!”

     

    वे दौड़कर कृष्ण को उठाने लगीं।

     

    उन्होंने देखा कि उनका कन्हैया बिल्कुल सुरक्षित है।

     

    न कोई चोट।

     

    न कोई भय।

     

    न कोई आँसू।

     

    वह तो ऐसे मुस्कुरा रहे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “मेरे लाल! तुझे कुछ हो जाता तो मैं क्या करती?”

     

    नंद बाबा भी दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने कृष्ण को देखा और राहत की साँस ली।

     

    गोपियाँ भी चारों ओर इकट्ठी हो गईं।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “यशोदा! तुम्हारा लाल तो बिल्कुल ठीक है!”

     

    दूसरी बोली—

     

    “देखो तो, यह तो हँस रहा है!”

     

    तीसरी ने आश्चर्य से कहा—

     

    “जिस राक्षसी ने पूरे गोकुल को हिला दिया, उसके ऊपर बैठकर यह बालक ऐसे मुस्कुरा रहा है जैसे खेल रहा हो!”

     

    सभी कृष्ण को आश्चर्य से देखने लगीं।

     

    —

     

    गोकुलवासियों ने क्या किया?

     

    गोपियों ने कृष्ण की रक्षा के लिए तुरंत उन्हें गोद में लेकर मंत्रों और भगवान के नाम का स्मरण किया।

     

    वे कहने लगीं—

     

    “हे नारायण! हमारे बालक की रक्षा करना।”

     

    “हे गोविंद! हमारे कन्हैया को अपनी छाया में रखना।”

     

    “हे माधव! इसे हर संकट से बचाना।”

     

    किसी ने कृष्ण के माथे पर गोबर और गोमूत्र से पारंपरिक रूप से रक्षा-चिह्न लगाया।

     

    किसी ने उनके चारों ओर पवित्र नामों का स्मरण किया।

     

    यशोदा मैया उन्हें बार-बार चूमती रहीं।

     

    वे बार-बार उनके हाथ-पैर देखतीं।

     

    “कहीं चोट तो नहीं लगी?”

     

    कृष्ण मुस्कुरा रहे थे।

     

    मानो कह रहे हों—

     

    “मैया, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

     

    लेकिन माँ का हृदय तो माँ का ही होता है।

     

    वह भगवान को भी बालक ही समझती है।

     

    —

     

    पूतना के शरीर का रहस्य

     

    अब गोकुलवासियों के सामने सबसे बड़ी समस्या थी—उस विशाल राक्षसी के शरीर का क्या किया जाए?

     

    उसका शरीर इतना विशाल था कि देखकर सभी भयभीत हो रहे थे।

     

    गोपों ने उसके शरीर को काटकर गोकुल से दूर ले जाकर जलाने का निर्णय किया।

     

    जब उसका शरीर जलाया गया तो आश्चर्यजनक रूप से वातावरण में एक सुगंध फैलने लगी।

     

    गोकुलवासी चकित रह गए।

     

    जिस राक्षसी के शरीर से मृत्यु और भय का संकेत मिलना चाहिए था, उसके शरीर से तो सुगंध आ रही थी।

     

    इसका कारण था—

     

    भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श ने उसे पवित्र कर दिया था।

     

    पूतना श्रीकृष्ण को मारने आई थी।

     

    उसके हृदय में प्रेम नहीं था।

     

    उसका उद्देश्य छल और हत्या था।

     

    फिर भी भगवान ने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसा एक माँ के साथ किया जाता है।

     

    क्यों?

     

    क्योंकि उसने भगवान को अपने स्तन से दूध पिलाने का भाव बनाया था, चाहे उसके मन में विष और छल ही क्यों न हो।

     

    इसीलिए भगवान ने उसे भी अपनी कृपा प्रदान की।

     

    यह श्रीकृष्ण की करुणा का अद्भुत उदाहरण है।

     

    —

     

    नंद बाबा का लौटना

     

    कुछ समय बाद नंद बाबा और गोकुल के अन्य पुरुष भी लौटकर आए।

     

    उन्होंने जब पूरी घटना सुनी तो वे आश्चर्य में पड़ गए।

     

    नंद बाबा ने कृष्ण को अपनी गोद में उठाया।

     

    उन्होंने अपने लाल को देखा और बोले—

     

    “कन्हैया! तू ठीक है न?”

     

    कृष्ण ने उनकी उँगली पकड़ ली।

     

    नंद बाबा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने मन ही मन भगवान से कहा—

     

    “हे प्रभु! मेरे बालक की सदैव रक्षा करना।”

     

    उन्हें यह नहीं पता था कि जिसे वे भगवान से बचाने की प्रार्थना कर रहे हैं, वही स्वयं भगवान है।

     

    —

     

    गोकुल में एक नई चर्चा

     

    उस दिन के बाद गोकुल में हर जगह केवल एक ही चर्चा होने लगी—

     

    “नंद बाबा का बालक साधारण नहीं है।”

     

    कोई कहता—

     

    “उसने उस भयंकर राक्षसी को कैसे मार दिया?”

     

    दूसरा कहता—

     

    “इतना छोटा बालक भला ऐसा कैसे कर सकता है?”

     

    तीसरा कहता—

     

    “शायद किसी देवता की कृपा है।”

     

    लेकिन यशोदा मैया को इन बातों से कोई लेना-देना नहीं था।

     

    उनके लिए कृष्ण भगवान नहीं थे।

     

    वे उनके लाल थे।

     

    उनका संसार थे।

     

    उनकी साँसों का आधार थे।

     

    रात को जब कृष्ण उनकी गोद में सोए, तो यशोदा मैया उन्हें निहारती रहीं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “तू जहाँ भी जाएगा, मैं तेरे साथ रहूँगी।”

     

    कृष्ण ने आँखें बंद कर लीं।

     

    यशोदा मैया ने उनके माथे को चूमा।

     

    बाहर यमुना की लहरें धीरे-धीरे बह रही थीं।

     

    आकाश में चाँद चमक रहा था।

     

    गोकुल शांत था।

     

    लेकिन यह शांति अधिक समय तक रहने वाली नहीं थी।

     

    क्योंकि नंदलाल अभी अपनी बाल-लीलाओं की शुरुआत ही कर रहे थे।

     

    —

     

    इस लीला का सबसे बड़ा संदेश

     

    श्रीकृष्ण की पूतना लीला केवल एक राक्षसी के वध की कथा नहीं है।

     

    यह भगवान की करुणा और कृपा का संदेश भी देती है।

     

    पूतना विष लेकर आई थी।

     

    उसके मन में हत्या का विचार था।

     

    फिर भी श्रीकृष्ण ने उसके भीतर से उस मातृत्व के बाहरी भाव को स्वीकार किया और उसे मुक्ति प्रदान की।

     

    इससे भक्तों को यह शिक्षा मिलती है कि भगवान की कृपा कितनी महान है।

     

    मनुष्य कितना भी दूर क्यों न चला गया हो, यदि उसका संबंध भगवान से किसी भी प्रकार जुड़ जाए, तो भगवान उसे अपने से दूर नहीं करते।

     

    और यही श्रीकृष्ण हैं—

     

    जो दुष्टों का अंत करते हैं,

    भक्तों की रक्षा करते हैं,

    और अपने शत्रुओं पर भी कृपा करते हैं।

     

    गोकुल के लोगों को उस दिन केवल इतना दिखाई दिया कि एक राक्षसी मारी गई और उनका कन्हैया बच गया।

     

    लेकिन देवताओं के लिए वह दिन कुछ और ही था।

     

    उन्होंने देखा था—

     

    स्वयं भगवान ने अपनी बाल-लीला आरंभ कर दी थी।

     

    अब गोकुल में कोई नहीं जानता था कि अगली बार क्या होगा।

     

    कभी कोई राक्षस आएगा।

     

    कभी कोई अद्भुत घटना घटेगी।

     

    और कभी नंदलाल अपनी ऐसी नटखट शरारत करेंगे कि पूरा गोकुल हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएगा।

     

    क्योंकि यह तो केवल शुरुआत थी।

     

    आगे आने वाली लीलाओं में कृष्ण कभी अपने नन्हे पैरों से ऐसी अद्भुत लीला करेंगे कि एक भारी गाड़ी पलट जाएगी…

     

    और गोकुलवासी फिर सोच में पड़ जाएँगे—

     

    “आखिर हमारा यह नन्हा-सा कन्हैया है कौन?”

     

    क्रमशः…

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    (भाग 1 — गोकुल में नंदलाल का आगमन)

     

     

    बहुत समय पहले की बात है। यमुना नदी के पवित्र तट के पास एक सुंदर-सा गाँव बसा हुआ था—गोकुल।

     

    गोकुल कोई बहुत बड़ा नगर नहीं था, लेकिन उसकी सुंदरता ऐसी थी कि मानो स्वयं प्रकृति ने अपने हाथों से उसे सजाया हो। चारों ओर हरे-भरे वृक्ष, लताओं से ढकी हुई पगडंडियाँ, फूलों की सुगंध से महकती हवाएँ और यमुना जी की कल-कल करती धारा।

     

    सुबह होते ही गोकुल में एक अलग ही जीवन दिखाई देता था।

     

    कहीं गायों की घंटियाँ बजतीं, कहीं गोपियाँ अपने घरों में दही मथतीं, कहीं बालक अपने मित्रों के साथ खेलते हुए गलियों में दौड़ते और कहीं ग्वाल अपने पशुओं को लेकर हरे-भरे मैदानों की ओर निकल जाते।

     

    गोकुल के मुखिया थे—नंद बाबा।

     

    नंद बाबा सरल हृदय, दयालु और धर्मात्मा थे। उनके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, उनके आँगन में असंख्य गायें थीं, परंतु उनके जीवन में एक कमी थी।

     

    वह कमी थी—संतान की।

     

    नंद बाबा और उनकी पत्नी यशोदा मैया के मन में एक ही इच्छा थी—

     

    “काश! हमारे घर भी कोई बालक होता, जिसे हम अपनी गोद में खिलाते, जिसके नन्हे-नन्हे चरणों की आहट से हमारा आँगन गूँज उठता।”

     

    यशोदा मैया जब कभी किसी अन्य माता को अपने बच्चे को गोद में खिलाते देखतीं, तो उनके हृदय में मातृत्व की लहर उठती।

     

    वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना करतीं—

     

    “हे प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए। न धन चाहिए, न वैभव। बस एक बार मुझे माँ कहकर पुकारने वाला कोई बालक दे दीजिए।”

     

    नंद बाबा भी यशोदा की इस इच्छा को समझते थे।

     

    वे उन्हें सांत्वना देते—

     

    “यशोदा, धैर्य रखो। भगवान जब देंगे, तब ऐसा देंगे कि हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।”

     

    लेकिन उन्हें क्या पता था कि भगवान स्वयं उनके घर आने वाले हैं।

     

    —

     

    कंस का अत्याचार

     

    उधर मथुरा में राजा कंस का अत्याचार बढ़ता जा रहा था।

     

    कंस अत्यंत शक्तिशाली था, परंतु उसके हृदय में दया का नाम तक नहीं था। वह अपने भय और अहंकार में इतना डूब गया था कि प्रजा उसके नाम से काँपती थी।

     

    एक दिन कंस अपनी बहन देवकी के विवाह के बाद उसे और उसके पति वसुदेव को रथ में बैठाकर स्वयं विदा करने जा रहा था।

     

    तभी आकाश में एक दिव्य वाणी गूँजी—

     

    “हे कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी देवकी की आठवीं संतान तेरे विनाश का कारण बनेगी।”

     

    यह सुनते ही कंस के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    उसने तलवार निकाल ली और देवकी को मारने के लिए आगे बढ़ा।

     

    वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “हे कंस! तुम्हें देवकी से क्या भय है? आकाशवाणी ने केवल उसकी आठवीं संतान के विषय में कहा है। मैं तुम्हें उसकी प्रत्येक संतान तुम्हारे हाथों सौंप दूँगा।”

     

    कंस ने वसुदेव की बात मान ली और दोनों को कारागार में बंद कर दिया।

     

    समय बीतता गया।

     

    देवकी की एक-एक करके छह संतानों का जन्म हुआ और कंस ने निर्दयतापूर्वक उनका वध कर दिया।

     

    सातवीं संतान के रूप में भगवान शेष के अंश बलराम जी प्रकट हुए, जिन्हें योगमाया की शक्ति से देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया।

     

    अब आठवीं संतान का समय निकट आ चुका था।

     

    मथुरा के कारागार में उस रात असाधारण शांति थी।

     

    आकाश में बादल छाए हुए थे।

     

    यमुना की धारा गंभीर होकर बह रही थी।

     

    चारों ओर अंधकार था।

     

    लेकिन उस अंधकार के भीतर एक ऐसी ज्योति जन्म लेने वाली थी, जो आने वाले युगों तक संसार को प्रकाशित करने वाली थी।

     

    —

     

    श्रीकृष्ण का दिव्य जन्म

     

    भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात थी।

     

    चारों ओर गहरा अंधकार था।

     

    कारागार के भीतर देवकी और वसुदेव भगवान से प्रार्थना कर रहे थे।

     

    तभी अचानक पूरा कारागार दिव्य प्रकाश से भर उठा।

     

    देवकी ने देखा—उनके सामने एक अद्भुत बालक प्रकट हुआ।

     

    उस बालक के सिर पर मुकुट था, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे तथा उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था।

     

    देवकी और वसुदेव समझ गए—

     

    स्वयं भगवान विष्णु उनके पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं।

     

    वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “हे प्रभु! आप स्वयं हमारे सामने प्रकट हुए हैं। हम अत्यंत भाग्यशाली हैं।”

     

    देवकी की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “प्रभु! कंस को यदि आपके जन्म का पता चल गया तो वह आपको भी मारने का प्रयास करेगा। कृपा करके अपनी यह दिव्य छवि छिपा लीजिए।”

     

    भगवान मुस्कुराए।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “माता, मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में पृथ्वी पर आया हूँ। तुम चिंता मत करो। मुझे अभी गोकुल ले जाओ। वहाँ नंद बाबा के घर यशोदा के यहाँ एक कन्या जन्मी है। तुम मुझे वहाँ छोड़कर उस कन्या को यहाँ ले आना।”

     

    इतना कहकर भगवान ने अपना दिव्य रूप त्याग दिया और एक साधारण नवजात शिशु के रूप में दिखाई देने लगे।

     

    उसी क्षण कारागार के सभी द्वार अपने-आप खुल गए।

     

    पहरेदार गहरी नींद में सो गए।

     

    वसुदेव ने बालक को एक टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर उठा लिया।

     

    वे कारागार से बाहर निकल पड़े।

     

    —

     

    यमुना की परीक्षा

     

    बाहर भयंकर वर्षा हो रही थी।

     

    बिजलियाँ चमक रही थीं।

     

    वसुदेव जी बालक को लेकर यमुना की ओर बढ़ने लगे।

     

    उनके मन में एक ही विचार था—

     

    “मुझे किसी भी प्रकार इस बालक को सुरक्षित गोकुल पहुँचाना है।”

     

    जब वे यमुना जी के पास पहुँचे तो नदी उफान पर थी।

     

    वसुदेव जी कुछ क्षण रुक गए।

     

    लेकिन तभी उनके पीछे से एक दिव्य दृश्य दिखाई दिया।

     

    शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर वसुदेव और बालक कृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया।

     

    तेज वर्षा होने के बाद भी बालक कृष्ण पर एक बूंद तक नहीं पड़ी।

     

    वसुदेव जी यमुना में उतर गए।

     

    यमुना का जल उनके कंधों तक पहुँचने लगा।

     

    तभी यमुना जी ने जैसे अपने प्रियतम को पहचान लिया।

     

    जल की एक लहर उठी और श्रीकृष्ण के चरणों को स्पर्श कर गई।

     

    मानो यमुना माता कह रही हों—

     

    “प्रभु! इतने वर्षों से आपकी प्रतीक्षा थी। आज मेरे तट पर आपका आगमन हुआ है।”

     

    वसुदेव जी सुरक्षित रूप से यमुना पार करके गोकुल पहुँच गए।

     

    —

     

    नंद भवन में आनंद

     

    उस समय गोकुल में सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे।

     

    नंद बाबा के घर भी एक बालिका का जन्म हुआ था।

     

    योगमाया की शक्ति से सभी लोग निद्रा में थे।

     

    वसुदेव जी ने देखा कि यशोदा मैया अपने शिशु के पास सो रही हैं।

     

    उन्होंने धीरे से श्रीकृष्ण को वहाँ सुला दिया और वहाँ जन्मी कन्या को उठाकर वापस मथुरा की ओर चल पड़े।

     

    उन्हें पता ही नहीं चला कि संसार का पालन करने वाला स्वयं उनके घर से होकर उनके घर को धन्य कर गया है।

     

    वसुदेव जी वापस कारागार पहुँचे।

     

    द्वार फिर अपने-आप बंद हो गए।

     

    पहरेदार जाग गए।

     

    और जैसे ही बालिका ने रोना आरंभ किया, कारागार में हलचल मच गई।

     

    कंस को समाचार दिया गया—

     

    “देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो गया है।”

     

    कंस तुरंत कारागार में पहुँचा।

     

    उसने उस नवजात कन्या को उठाकर पत्थर पर पटकना चाहा।

     

    लेकिन तभी वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई।

     

    उसका रूप दिव्य हो गया।

     

    उसने कहा—

     

    “हे कंस! मुझे मारकर तुझे क्या मिलेगा? तेरा काल तो गोकुल में जन्म ले चुका है।”

     

    यह कहकर वह देवी आकाश में विलीन हो गई।

     

    कंस के चेहरे पर भय छा गया।

     

    उधर गोकुल में किसी को कुछ पता नहीं था कि उनके बीच कौन आया है।

     

    —

     

    गोकुल में उत्सव

     

    प्रातःकाल होते ही गोकुल में एक अद्भुत आनंद फैल गया।

     

    यशोदा मैया की आँख खुली।

     

    उन्होंने अपने पास एक सुंदर बालक को देखा।

     

    बालक अत्यंत मनोहर था।

     

    श्याम वर्ण, घुँघराले बाल, गुलाबी होंठ और बंद आँखों पर झुकी हुई लंबी पलकें।

     

    यशोदा मैया कुछ क्षण तक उसे निहारती रह गईं।

     

    फिर उनके हृदय में ऐसी ममता उमड़ी कि उन्होंने बालक को अपनी छाती से लगा लिया।

     

    उनके मुख से अनायास निकला—

     

    “मेरे लाल!”

     

    जैसे ही यह समाचार गोकुल में फैला कि नंद बाबा के घर पुत्र हुआ है, पूरा गोकुल खुशी से झूम उठा।

     

    गोपियाँ दौड़-दौड़कर नंद भवन आने लगीं।

     

    कोई दही लेकर आई।

     

    कोई माखन लेकर आई।

     

    कोई शिशु के लिए सुंदर वस्त्र लेकर आई।

     

    किसी ने कहा—

     

    “अरे! नंद बाबा के घर तो चाँद उतर आया है!”

     

    दूसरी गोपी बोली—

     

    “नहीं-नहीं, चाँद तो आज फीका पड़ गया होगा। इतना सुंदर बालक उसने भी नहीं देखा होगा!”

     

    तीसरी गोपी हँसते हुए बोली—

     

    “देखना, यह बालक बड़ा होकर पूरे गोकुल की मटकी खाली कर देगा।”

     

    तब किसे पता था कि उसकी यह बात एक दिन सच होने वाली है!

     

    नंद बाबा तो आनंद से फूले नहीं समा रहे थे।

     

    उन्होंने गोकुल के लोगों के लिए दान बाँटा।

     

    गायों को सजाया गया।

     

    घर-घर दीप जलाए गए।

     

    ढोल और नगाड़े बजने लगे।

     

    गोप और गोपियाँ नाचने लगे।

     

    चारों ओर एक ही नाम गूँज रहा था—

     

    “नंद के घर आनंद भयो!”

     

    और उस दिन से वह नन्हा बालक सबके लिए बन गया—

     

    नंदलाल।

     

    —

     

    पहली बार यशोदा ने कृष्ण को देखा

     

    उत्सव समाप्त होने के बाद जब सब लोग चले गए, तब यशोदा मैया अपने लाल को लेकर अकेली बैठीं।

     

    वे उसके छोटे-छोटे हाथों को देखतीं।

     

    कभी उसके पैरों को चूमतीं।

     

    कभी उसके माथे पर हाथ फेरतीं।

     

    बालक कृष्ण ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं।

     

    उनकी आँखें इतनी सुंदर थीं कि यशोदा मैया उनमें खो गईं।

     

    उन्होंने प्रेम से पूछा—

     

    “लाला! तू कहाँ से आया है?”

     

    बालक मुस्कुराया।

     

    यशोदा मैया हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी से मुझसे बातें करेगा?”

     

    उन्होंने उसे अपनी गोद में उठाया और धीरे-धीरे झुलाने लगीं।

     

    उन्हें क्या पता था कि जिस बालक को वह अपनी गोद में झुला रही हैं, उसी के चरणों में अनंत ब्रह्मांड झूलते हैं।

     

    जिसे वे अपना पुत्र समझकर दुलार रही हैं, वही समस्त संसार का पालनकर्ता है।

     

    परंतु भगवान को भी तो यही चाहिए था।

     

    उन्हें वैकुंठ का वैभव नहीं चाहिए था।

     

    उन्हें चाहिए था—

     

    माँ का प्रेम।

     

    इसीलिए तो वे गोकुल आए थे।

     

    —

     

    गोकुल क्यों बना भगवान का घर?

     

    भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल को इसलिए चुना क्योंकि वहाँ प्रेम था।

     

    वहाँ छल नहीं था।

     

    वहाँ अहंकार नहीं था।

     

    वहाँ लोग भगवान को किसी स्वार्थ से नहीं, प्रेम से चाहते थे।

     

    यशोदा के लिए कृष्ण भगवान नहीं थे।

     

    वे उनके लाला थे।

     

    नंद बाबा के लिए वे संसार के स्वामी नहीं थे।

     

    वे उनके कन्हैया थे।

     

    गोपियों के लिए वे कोई महान देवता नहीं थे।

     

    वे उनके गोकुल के नटखट बालक थे।

     

    और यही कृष्ण की सबसे सुंदर लीला थी—

     

    भगवान होकर भी भक्तों के प्रेम के वश में हो जाना।

     

    गोकुल की गलियों में अब एक नई चहल-पहल थी।

     

    हर घर में कृष्ण की चर्चा होने लगी।

     

    किसी को उनके सुंदर मुख की चिंता थी।

     

    किसी को उनकी मुस्कान की।

     

    कोई कहता—

     

    “नंदलाल बहुत सुंदर हैं।”

     

    कोई कहता—

     

    “इनकी आँखें तो कमल जैसी हैं।”

     

    और कोई हँसकर कहता—

     

    “अभी से इतना सुंदर है, बड़ा होकर जाने कितनी गोपियों की मटकी फोड़ेगा!”

     

    सभी हँस पड़ते।

     

    लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि आने वाले दिनों में यही नन्हा बालक गोकुल की गलियों में ऐसी-ऐसी लीलाएँ करने वाला है कि लोग अपनी सारी चिंताएँ भूल जाएँगे।

     

    वह कभी माखन चुराएगा।

     

    कभी गोपियों को सताएगा।

     

    कभी यशोदा मैया से डाँट खाएगा।

     

    कभी ग्वाल-बालों के साथ गाय चराने जाएगा।

     

    और कभी अपनी छोटी-सी मुस्कान से पूरे ब्रज को मोहित कर देगा।

     

    लेकिन अभी तो वह केवल एक नन्हा शिशु था।

     

    यशोदा मैया की गोद में सोया हुआ।

     

    उनकी उँगली पकड़े हुए।

     

    और बाहर गोकुल की गलियों में गूँज रहा था—

     

    “जय कन्हैया लाल की!”

     

    यमुना की लहरें मंद-मंद बह रही थीं।

     

    गायें रंभा रही थीं।

     

    वृक्षों पर पक्षी मधुर स्वर में चहक रहे थे।

     

    मानो पूरी प्रकृति स्वयं कह रही हो—

     

    “गोकुल धन्य हो गया।”

     

    और सचमुच उस दिन से गोकुल केवल एक गाँव नहीं रहा।

     

    वह बन गया—

     

    श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं की पवित्र भूमि।

     

    जहाँ भगवान ने ईश्वर बनकर नहीं,

    एक नटखट बालक बनकर जीवन जिया।

     

    जहाँ भक्तों ने उन्हें पूजा नहीं,

    उन्हें प्रेम किया।

     

    और जहाँ एक माँ ने संसार के स्वामी को अपनी गोद में लेकर कहा—

     

    “सो जा मेरे लाल… मेरी आँखों के तारे, मेरे कान्हा।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    और उस मुस्कान में जैसे पूरा ब्रह्मांड समा गया।

     

    यहीं से आरंभ होती है नंदलाल की अद्भुत बाल-लीलाओं की कथा…

     

    लेकिन गोकुल को अभी कहाँ पता था कि उसके आँगन में आया यह नन्हा-सा बालक शीघ्र ही ऐसी लीला करने वाला है, जिससे एक भयानक राक्षसी का अंत होगा और पूरे ब्रज को पहली बार अपने कान्हा की दिव्यता का आभास होगा…|

     

     

    Continue…. ✍️✍️(Story pasand are to comment jarur de🙏)

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • सुदामा की द्वारिका की ओर यात्रा

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    अध्याय 7 — सुदामा की द्वारका की ओर यात्रा

    सूरज निकलने से पहले ही सुदामा अपने घर से निकल पड़े।

     

    गाँव अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था। कहीं-कहीं घरों से धुएँ की पतली लकीरें उठ रही थीं। पक्षियों की आवाज धीरे-धीरे वातावरण में फैल रही थी। सुदामा ने एक बार पीछे मुड़कर अपने छोटे से घर को देखा।

     

    वही मिट्टी की दीवारें।

     

    वही साधारण आँगन।

     

    वही घर, जहाँ उसने जीवन के कितने ही सुख-दुख देखे थे।

     

    दरवाजे पर उसकी पत्नी खड़ी थी।

     

    उसकी आँखों में चिंता भी थी और उम्मीद भी।

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जल्द लौटने की कोशिश करूँगा।”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा, “रास्ते का ध्यान रखिएगा।”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    फिर उसकी पत्नी ने उसके हाथ में रखी छोटी सी पोटली को देखा।

     

    उसमें वही थोड़ा सा चिवड़ा था, जो वह कृष्ण के लिए लेकर जा रहा था।

     

    पत्नी ने कहा, “इसे संभालकर रखिएगा।”

     

    सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगाया।

     

    “यह मेरे पास सबसे कीमती चीज है।”

     

    पत्नी मुस्कुराई।

     

    सुदामा ने एक बार फिर अपने घर की ओर देखा और फिर आगे बढ़ गया।

     

    अब उसके सामने एक लंबी यात्रा थी।

     

    द्वारका बहुत दूर थी।

     

    सुदामा ने कभी इतनी लंबी यात्रा अकेले नहीं की थी। लेकिन इस बार उसके मन में एक ऐसी शक्ति थी, जो उसके पैरों को आगे बढ़ाती जा रही थी।

     

    वह शक्ति थी—

     

    अपने मित्र कृष्ण से मिलने की इच्छा।

     

    चलते-चलते उसे गुरुकुल की बातें याद आने लगीं।

     

    उसे याद आया जब वह पहली बार आश्रम पहुँचा था।

     

    वह कितना चुप और संकोची था।

     

    उसे किसी से बात करने की आदत नहीं थी।

     

    तभी कृष्ण उसके पास आए थे और पूछा था—

     

    “तुम नए आए हो?”

     

    सुदामा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “कृष्ण…” उसने धीरे से कहा।

     

    उसका मन जैसे वर्षों पीछे चला गया।

     

    उसे याद आया कि कृष्ण कैसे छोटी-छोटी बातों में भी खुशी ढूँढ लेते थे।

     

    जब वह परेशान होता, कृष्ण उसे हँसा देते।

     

    जब उसे डर लगता, कृष्ण उसका हाथ पकड़ लेते।

     

    और जब वह स्वयं को दूसरों से छोटा समझता, कृष्ण उसे समझाते—

     

    “मित्रता में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता।”

     

    सुदामा की आँखें हल्की नम हो गईं।

     

    वह सोचने लगा—

     

    क्या कृष्ण आज भी वैसे ही होंगे?

     

    फिर उसने स्वयं से कहा—

     

    “कृष्ण बदल भी गए होंगे, तो क्या हुआ? मैं उनसे मिलने जा रहा हूँ।”

     

    रास्ता आसान नहीं था।

     

    दिन चढ़ते ही धूप तेज हो गई।

     

    सुदामा कई कोस तक चलता रहा।

     

    उसके पास यात्रा के लिए अधिक भोजन नहीं था।

     

    कभी वह किसी पेड़ की छाया में बैठ जाता और कुछ देर आराम करता।

     

    फिर उठकर चल पड़ता।

     

    एक दोपहर वह एक छोटे से गाँव के पास पहुँचा।

     

    वहाँ एक कुआँ था।

     

    सुदामा ने पानी पिया और वहीं कुछ देर बैठ गया।

     

    कुछ लोग उसके पास आए।

     

    उनमें से एक व्यक्ति ने पूछा,

     

    “बाबा, आप कहाँ जा रहे हैं?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “द्वारका।”

     

    वह व्यक्ति हैरान हुआ।

     

    “द्वारका? इतनी दूर?”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “हाँ।”

     

    “वहाँ किससे मिलने जा रहे हैं?”

     

    सुदामा कुछ क्षण चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “अपने मित्र से।”

     

    उस व्यक्ति ने पूछा,

     

    “कौन है आपका मित्र?”

     

    सुदामा ने शांत स्वर में कहा,

     

    “कृष्ण।”

     

    कुछ लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

     

    एक व्यक्ति मुस्कुराते हुए बोला,

     

    “हमारे द्वारकाधीश श्री कृष्ण?”

     

    सुदामा ने सिर हिला दिया।

     

    कुछ लोग हँस पड़े।

     

    “आप उनसे मिलने जा रहे हैं?”

     

    सुदामा ने बिना बुरा माने कहा,

     

    “हाँ।”

     

    एक वृद्ध व्यक्ति ने पूछा,

     

    “और वह आपको पहचानेंगे?”

     

    यह प्रश्न सुनकर सुदामा कुछ क्षण चुप हो गया।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “यह मुझे नहीं पता।”

     

    लोगों की हँसी धीरे-धीरे शांत हो गई।

     

    सुदामा आगे बोला,

     

    “लेकिन मैं उन्हें पहचानता हूँ।”

     

    उसके शब्दों में इतना विश्वास था कि कोई आगे कुछ नहीं कह पाया।

     

    कुछ देर आराम करने के बाद वह फिर चल पड़ा।

     

    लेकिन अब उसके मन में वही प्रश्न बार-बार आने लगा—

     

    क्या कृष्ण मुझे पहचानेंगे?

     

    उसने अपने साधारण कपड़ों की ओर देखा।

     

    उसके पैरों में धूल लगी हुई थी।

     

    उसके कंधे पर एक पुराना सा थैला था।

     

    उसने सोचा—

     

    “द्वारका के लोग मुझे देखकर क्या सोचेंगे?”

     

    फिर उसने अपनी छोटी पोटली को छुआ।

     

    और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “मैं वहाँ किसी को प्रभावित करने नहीं जा रहा।”

     

    उसने मन ही मन कहा,

     

    “मैं अपने मित्र से मिलने जा रहा हूँ।”

     

    यात्रा के कई दिन बीत गए।

     

    सुदामा लगातार आगे बढ़ता रहा।

     

    कभी किसी गाँव में रात बिताता।

     

    कभी किसी पेड़ के नीचे आराम करता।

     

    कभी रास्ते में मिलने वाले लोगों से द्वारका का रास्ता पूछता।

     

    हर दिन उसके पैरों की थकान बढ़ती जाती।

     

    लेकिन हर दिन कृष्ण से मिलने की इच्छा भी और मजबूत होती जाती।

     

    एक शाम वह एक नदी के किनारे बैठा था।

     

    सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।

     

    आकाश का रंग बदल रहा था।

     

    सुदामा ने नदी के पानी में अपना चेहरा देखा।

     

    वह पहले जैसा नहीं था।

     

    बालों में सफेदी आ चुकी थी।

     

    चेहरे पर समय की लकीरें थीं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण, अगर तुम मुझे देखोगे तो क्या पहचान पाओगे?”

     

    अचानक उसे वर्षों पुरानी बात याद आ गई।

     

    गुरुकुल से विदा होते समय उसने कृष्ण से पूछा था—

     

    “अगर मैं कभी तुम्हारे पास आया तो तुम मुझे पहचानोगे?”

     

    और कृष्ण ने कहा था—

     

    “सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    उसने सिर उठाकर आसमान की ओर देखा।

     

    “मैं तुम्हें याद दिलाने नहीं आ रहा, कृष्ण,” उसने कहा।

     

    “मैं बस यह देखने आ रहा हूँ कि हमारी मित्रता आज भी वैसी ही है या नहीं।”

     

    अगले दिन यात्रा फिर शुरू हुई।

     

    अब रास्ते में लोग अधिक दिखाई देने लगे।

     

    कुछ व्यापारी द्वारका की ओर जा रहे थे।

     

    सुदामा उनके साथ कुछ दूर तक चलता रहा।

     

    एक व्यापारी ने उससे पूछा,

     

    “आप अकेले कहाँ जा रहे हैं?”

     

    सुदामा ने फिर वही उत्तर दिया,

     

    “द्वारका।”

     

    “काम से?”

     

    “मित्र से मिलने।”

     

    “कौन मित्र?”

     

    “कृष्ण।”

     

    इस बार व्यापारी हँसा नहीं।

     

    उसने सुदामा को ध्यान से देखा।

     

    फिर पूछा,

     

    “क्या आप वास्तव में उन्हें जानते हैं?”

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “एक समय था जब हम दोनों एक-दूसरे को रोज देखते थे।”

     

    व्यापारी कुछ क्षण चुप रहा।

     

    सुदामा की बातों में कोई दिखावा नहीं था।

     

    उसने कहा,

     

    “अगर यह सच है, तो आप बहुत भाग्यशाली हैं।”

     

    सुदामा ने उत्तर दिया,

     

    “सच्चा मित्र मिलना ही सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

     

    यात्रा आगे बढ़ती रही।

     

    कुछ दिनों बाद सुदामा पहली बार एक ऊँची जगह पर पहुँचा, जहाँ से दूर तक फैली भूमि दिखाई देती थी।

     

    वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

     

    एक यात्री ने उसकी ओर इशारा करते हुए कहा,

     

    “वहीं आगे द्वारका है।”

     

    सुदामा की साँस जैसे कुछ क्षणों के लिए रुक गई।

     

    उसने दूर देखा।

     

    उसके सामने वह नगरी थी, जहाँ उसका बचपन का मित्र रहता था।

     

    वर्षों की दूरी।

     

    अनेक यादें।

     

    अनगिनत प्रश्न।

     

    सब जैसे एक ही क्षण में उसके मन में उमड़ आए।

     

    उसके कदम अचानक भारी हो गए।

     

    अब तक वह लगातार कृष्ण से मिलने के लिए चल रहा था।

     

    लेकिन द्वारका को सामने देखकर उसके मन में संकोच लौट आया।

     

    “क्या मैं सचमुच अंदर जा पाऊँगा?”

     

    उसने अपने वस्त्रों की ओर देखा।

     

    फिर उस पोटली को छुआ, जिसमें चिवड़ा रखा था।

     

    उसे लगा जैसे उसकी छोटी सी भेंट उस विशाल नगरी के सामने बहुत साधारण है।

     

    वह कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।

     

    तभी उसके मन में कृष्ण की मुस्कान उभर आई।

     

    और उसे याद आया—

     

    “अगर यादें कम पड़ जाएँ, तो मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने गहरी साँस ली।

     

    “मैं आ गया हूँ, मित्र।”

     

    वह धीरे-धीरे द्वारका की ओर बढ़ने लगा।

     

    जैसे-जैसे वह नगर के पास पहुँचता गया, उसकी आँखों में आश्चर्य बढ़ता गया।

     

    द्वारका बहुत सुंदर और विशाल थी।

     

    साफ रास्ते।

     

    भव्य भवन।

     

    चारों ओर लोगों की चहल-पहल।

     

    सुदामा ने ऐसा नगर पहले कभी नहीं देखा था।

     

    उसे एक क्षण के लिए लगा जैसे वह किसी दूसरे संसार में आ गया हो।

     

    लेकिन फिर उसने स्वयं को याद दिलाया—

     

    “इस नगर में कहीं मेरा मित्र कृष्ण रहता है।”

     

    वह आगे बढ़ता गया।

     

    लोग उसे देखकर अपने काम में व्यस्त रहते।

     

    किसी को नहीं पता था कि साधारण कपड़ों में चल रहा यह व्यक्ति वर्षों बाद द्वारका के राजा से मिलने आया है।

     

    आखिरकार सुदामा उस स्थान के पास पहुँचा जहाँ कृष्ण का महल था।

     

    महल के ऊँचे द्वार देखकर उसके कदम रुक गए।

     

    उसने कभी इतने बड़े महल की कल्पना भी नहीं की थी।

     

    वह द्वार के बाहर खड़ा होकर भीतर देखने लगा।

     

    अंदर पहरेदार थे।

     

    लोग आते-जाते दिखाई दे रहे थे।

     

    सुदामा ने अपने पुराने वस्त्र ठीक किए।

     

    उसने अपनी पोटली को संभाला।

     

    फिर धीरे-धीरे द्वार की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन उसके मन में एक ही प्रश्न था—

     

    क्या इन विशाल द्वारों के पीछे रहने वाला द्वारकाधीश अब भी वही कृष्ण है, जो कभी जंगल में उसके साथ बारिश में भीगा था?

     

    वह पहरेदारों के सामने पहुँच गया।

     

    एक पहरेदार ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

     

    “कौन हो तुम?”

     

    सुदामा के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

     

    वर्षों बाद वह क्षण आ ही गया था।

     

    उसने शांत स्वर में कहा—

     

    “मेरा नाम सुदामा है।”

     

    पहरेदार ने पूछा,

     

    “और तुम यहाँ किससे मिलने आए हो?”

     

    सुदामा ने महल की ओर देखा।

     

    उसकी आँखों में वर्षों पुरानी मित्रता की चमक थी।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मैं अपने मित्र कृष्ण से मिलने आया हूँ।”

     

    पहरेदार कुछ क्षण उसे देखता रहा।

     

    और यहीं से शुरू होने वाला था…

     

    • वर्षों बाद दो मित्रों के मिलन का सबसे भावुक प्रसंग।
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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • सुदामा का संघर्ष और कृष्ण की याद

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    अध्याय 6 — सुदामा का संघर्ष और कृष्ण की याद

     

    गुरुकुल से विदा हुए कई वर्ष बीत चुके थे।

     

    समय ने कृष्ण और सुदामा दोनों के जीवन को अलग-अलग दिशाओं में पहुँचा दिया था। बचपन में जो दो मित्र एक ही पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बाँटते थे, आज उनके जीवन की परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग थीं।

     

    सुदामा अपने गाँव में ही रहने लगा था।

     

    उसने अपने गुरुकुल की शिक्षा को कभी भुलाया नहीं। वह बच्चों को पढ़ाता, लोगों को अच्छी बातें समझाता और जो कुछ जानता था, उसे दूसरों के साथ बाँट देता था। गाँव के लोग उसका सम्मान करते थे, क्योंकि सुदामा का मन बहुत साफ था।

     

    लेकिन सम्मान से घर का चूल्हा नहीं जलता।

     

    समय बीतने के साथ सुदामा का जीवन कठिन होता चला गया।

     

    उसके पास धन नहीं था।

     

    एक छोटा सा घर था, जिसकी छत बरसात में कई जगह से टपकती थी। घर में जरूरत की चीजें भी बहुत कम थीं। फिर भी सुदामा ने कभी किसी से शिकायत नहीं की।

     

    वह अक्सर कहता था,

     

    “जिसके पास संतोष है, वह कभी पूरी तरह गरीब नहीं होता।”

     

    लेकिन जीवन की कठिनाइयाँ केवल संतोष से हमेशा आसान नहीं होतीं।

     

    धीरे-धीरे सुदामा का परिवार बढ़ा। घर की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ने लगीं। अब केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए भी सोचना पड़ता था।

     

    एक दिन सुदामा की पत्नी ने घर में रखे मिट्टी के बर्तनों को देखा।

     

    एक बर्तन लगभग खाली था।

     

    दूसरे में बस थोड़े से अनाज के दाने बचे थे।

     

    वह कुछ देर तक चुप रही।

     

    सुदामा घर के बाहर बैठा था और बच्चों को कुछ पढ़ा रहा था।

     

    बच्चे चले गए तो वह अंदर आया।

     

    पत्नी ने उसे देखा और पूछा,

     

    “आज बच्चों को क्या पढ़ा रहे थे?”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “सच्चाई और धैर्य के बारे में।”

     

    पत्नी ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “और क्या धैर्य से भूख भी शांत हो जाती है?”

     

    सुदामा का चेहरा शांत हो गया।

     

    वह समझ गया कि उसकी पत्नी क्या कहना चाहती है।

     

    कुछ क्षणों तक घर में चुप्पी रही।

     

    फिर सुदामा ने कहा,

     

    “मैं जानता हूँ कि हमारे दिन कठिन चल रहे हैं।”

     

    पत्नी ने तुरंत कहा,

     

    “मैं आपसे शिकायत नहीं कर रही।”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो फिर तुम्हारी आँखों में चिंता क्यों है?”

     

    पत्नी की आँखें भर आईं।

     

    “क्योंकि मैं आपको परेशान देखती हूँ।”

     

    सुदामा कुछ कह नहीं पाया।

     

    वह जानता था कि उसके पास अपनी पत्नी को देने के लिए बहुत कम था।

     

    फिर भी वह हर दिन कोशिश करता था कि उसके चेहरे पर निराशा न दिखाई दे।

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “आपके गुरुकुल के मित्र कृष्ण…”

     

    सुदामा अचानक शांत हो गया।

     

    कृष्ण का नाम सुनते ही जैसे उसके सामने वर्षों पुरानी यादें आ गईं।

     

    गुरुकुल का आँगन।

     

    पेड़ों के नीचे बैठा कृष्ण।

     

    उनकी मुस्कान।

     

    जंगल की बारिश।

     

    दोनों का साथ भोजन बाँटना।

     

    विदाई के समय कृष्ण का कहना—

     

    “अगर तुम्हें कभी लगे कि तुम अकेले हो, तो यह मत सोचना कि मैं बहुत दूर हूँ।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसकी पत्नी ने पूछा,

     

    “आप उन्हें याद करते हैं?”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हर सच्चे मित्र को उसका मित्र याद रहता है।”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “तो फिर आप उनसे मिलने क्यों नहीं जाते?”

     

    सुदामा ने तुरंत उसकी ओर देखा।

     

    “कृष्ण से?”

     

    पत्नी ने सिर हिला दिया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा कुछ क्षण तक चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “इतने वर्षों बाद?”

     

    “तो क्या हुआ?”

     

    “उनका जीवन अब बहुत अलग होगा।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या मित्रता परिस्थितियाँ देखकर बदल जाती है?”

     

    सुदामा के पास इस प्रश्न का उत्तर था।

     

    लेकिन वह बोल नहीं पाया।

     

    पत्नी आगे बोली,

     

    “आपने मुझे कितनी बार बताया है कि आपके मित्र कृष्ण आपको अपने बराबर मानते थे। फिर आज आप उनके पास जाने से क्यों डर रहे हैं?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “मैं उनसे कुछ माँगने नहीं जा सकता।”

     

    पत्नी ने शांत स्वर में कहा,

     

    “किसने कहा कि आपको कुछ माँगना है?”

     

    “लेकिन अगर मैं इस समय उनके पास जाऊँगा, तो उन्हें लगेगा कि मैं किसी जरूरत के कारण आया हूँ।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “तो क्या जरूरत के समय अपने मित्र से मिलना गलत है?”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    उसे कृष्ण से मिलने की इच्छा तो हमेशा से थी।

     

    लेकिन वर्षों की दूरी ने उसके मन में संकोच भर दिया था।

     

    वह सोचने लगा—

     

    क्या कृष्ण मुझे पहचानेंगे?

     

    क्या वे वैसे ही मुस्कुराएँगे?

     

    क्या वे मुझे देखकर खुश होंगे?

     

    फिर उसके मन में एक और विचार आया।

     

    अगर मैं उनके सामने अपने साधारण वस्त्रों में खड़ा हुआ तो?

     

    यह सोचकर सुदामा स्वयं को ही समझाने लगा।

     

    “कृष्ण मेरे मित्र हैं। वह मुझे कभी धन या वस्त्रों से नहीं आँकेंगे।”

     

    लेकिन फिर भी उसका मन उसे रोक रहा था।

     

    उस रात सुदामा देर तक सो नहीं सका।

     

    वह घर के बाहर बैठा आसमान की ओर देख रहा था।

     

    उसे याद आया कि गुरुकुल में भी वह और कृष्ण कई रातों में इसी तरह तारों को देखते थे।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण… क्या तुम्हें भी कभी मेरी याद आती होगी?”

     

    हवा हल्के से चली।

     

    सुदामा के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उसे लगा जैसे वर्षों की दूरी अचानक कम हो गई हो।

     

    अगले दिन भी जीवन वैसे ही चलता रहा।

     

    सुदामा सुबह उठा।

     

    कुछ बच्चों को पढ़ाया।

     

    फिर गाँव के एक वृद्ध व्यक्ति की सहायता की।

     

    शाम को घर लौटा।

     

    लेकिन घर का वातावरण देखकर उसका मन भारी हो गया।

     

    उसकी पत्नी चुप बैठी थी।

     

    बच्चे भी शांत थे।

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “आज घर में जो थोड़ा सा अनाज था, वह भी समाप्त हो गया।”

     

    सुदामा के कदम रुक गए।

     

    उसने चारों ओर देखा।

     

    घर में सचमुच बहुत कम चीजें बची थीं।

     

    उस क्षण उसके मन में दुख आया।

     

    अपने लिए नहीं।

     

    अपने परिवार के लिए।

     

    वह बाहर जाकर बैठ गया।

     

    उसकी पत्नी उसके पास आई।

     

    “आप चिंता मत कीजिए।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “कैसे न करूँ?”

     

    पत्नी ने पहली बार उसके सामने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी।

     

    “कृष्ण से मिलने जाइए।”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं उनके पास सहायता माँगने नहीं जाऊँगा।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “तो सहायता मत माँगिए। बस अपने मित्र से मिल आइए।”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    पत्नी बोली,

     

    “क्या मित्र से मिलने के लिए कोई कारण चाहिए?”

     

    यह बात सुदामा के हृदय में उतर गई।

     

    सच ही तो था।

     

    वह कृष्ण के पास धन माँगने नहीं जाना चाहता था।

     

    उसे बस अपने मित्र से मिलना था।

     

    उसे देखना था।

     

    उनसे बातें करनी थीं।

     

    वर्षों से मन में जमा बातें कहनी थीं।

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन मैं उनके पास खाली हाथ कैसे जाऊँ?”

     

    पत्नी ने कुछ क्षण सोचा।

     

    फिर वह घर के अंदर गई।

     

    वहाँ उसने बहुत खोजा।

     

    कुछ देर बाद वह एक छोटी सी पोटली लेकर आई।

     

    उसमें थोड़ा सा चिवड़ा था।

     

    बहुत साधारण।

     

    बहुत कम।

     

    लेकिन उसके पास देने के लिए वही सबसे कीमती चीज थी।

     

    पत्नी ने पोटली सुदामा की ओर बढ़ाई।

     

    “इसे अपने मित्र के लिए ले जाइए।”

     

    सुदामा ने पोटली को देखा।

     

    उसकी आँखें भर आईं।

     

    उसे गुरुकुल का समय याद आ गया।

     

    जब वह और कृष्ण थोड़े से दाने भी बाँटकर खा लेते थे।

     

    उसने पोटली अपने हाथों में ली।

     

    “यह बहुत कम है।”

     

    पत्नी मुस्कुराई।

     

    “प्रेम में दिया गया थोड़ा भी बहुत होता है।”

     

    सुदामा के मन में जैसे कोई पुरानी आवाज गूँज उठी।

     

    “जो चीज प्रेम से बाँटी जाए, वह कभी कम नहीं होती।”

     

    यह बात कृष्ण ने उससे वर्षों पहले कही थी।

     

    सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

     

    अब उसका मन दृढ़ होने लगा था।

     

    उसने पत्नी से कहा,

     

    “मैं जाऊँगा।”

     

    पत्नी के चेहरे पर हल्की खुशी आ गई।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। मैं कृष्ण से मिलने जाऊँगा।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “और उनसे कहना कि उनका एक पुराना मित्र उन्हें कभी नहीं भूला।”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर उनकी मित्रता सच्ची है, तो शायद उन्हें पहले से पता होगा।”

     

    पत्नी ने उसे यात्रा के लिए तैयार होने में सहायता की।

     

    सुदामा के पास पहनने के लिए साधारण वस्त्र थे।

     

    उसने अपनी छोटी सी पोटली संभालकर रखी।

     

    सुबह होते ही उसने अपने परिवार को देखा।

     

    बच्चों के सिर पर हाथ रखा।

     

    पत्नी ने उसके चरण छुए और कहा,

     

    “जल्दी लौट आइए।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “मैं लौटूँगा।”

     

    फिर वह कुछ क्षण रुका।

     

    “लेकिन शायद पहले से अलग होकर।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि इतने वर्षों बाद मैं अपने बचपन के मित्र से मिलने जा रहा हूँ।”

     

    उसके कदमों में एक अलग ही उत्साह था।

     

    रास्ता लंबा था।

     

    लेकिन इस बार सुदामा को यात्रा की कठिनाई महसूस नहीं हो रही थी।

     

    उसके मन में बस एक ही बात थी—

     

    कृष्ण।

     

    वह चलते-चलते पुराने दिनों को याद करता रहा।

     

    उसे याद आया कि कृष्ण कैसे हर कठिन परिस्थिति में मुस्कुरा देते थे।

     

    कैसे वे उसकी चिंता को हल्का कर देते थे।

     

    कैसे उन्होंने कहा था—

     

    “अगर यादें कम पड़ जाएँ, तो मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा।

     

    “कृष्ण, मैं तुम्हें ढूँढने आ रहा हूँ।”

     

    लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वर्षों में कृष्ण का जीवन कितना बदल चुका है।

     

    जिस मित्र के साथ वह कभी जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करता था…

     

    जिसके साथ वह एक पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बाँटता था…

     

    आज वही कृष्ण एक महान राजा के रूप में द्वारका में रहते थे।

     

    सुदामा को नहीं पता था कि द्वारका कैसी होगी।

     

    वहाँ पहुँचने पर उसके साथ कैसा व्यवहार होगा।

     

    क्या महल के द्वारपाल उसे अंदर जाने देंगे?

     

    क्या कोई उसकी बात पर विश्वास करेगा कि वह स्वयं श्री कृष्ण का बचपन का मित्र है?

     

    उसके मन में हल्की चिंता फिर जागी।

     

    लेकिन उसने अपने कपड़ों के भीतर रखी चिवड़े की छोटी सी पोटली को छुआ।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “मैं राजा से मिलने नहीं जा रहा,” उसने मन ही मन कहा।

     

    “मैं अपने मित्र कृष्ण से मिलने जा रहा हूँ।”

     

    और इसी विश्वास के साथ…

     

    सुदामा ने द्वारका की ओर अपनी यात्रा जारी रखी।

     

    लेकिन उसके सामने अभी एक लंबा रास्ता था।

     

    एक ऐसा रास्ता, जहाँ हर कदम के साथ उसके मन में कृष्ण से मिलने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।

     

    उधर…

     

    बहुत दूर द्वारका में…

     

    कृष्ण अपने राजकार्य में व्यस्त थे।

     

    लेकिन कौन जानता था कि वर्षों पहले गुरुकुल में उनके साथ बैठकर भोजन बाँटने वाला उनका प्रिय मित्र…

     

    अब उनसे मिलने के लिए चल पड़ा है।

     

    और बहुत जल्द…

     

    दो पुराने मित्रों के बीच वर्षों की दूरी समाप्त होने वाली थी।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Part 5 गुरुकुल से विदाई

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    अध्याय 5 — गुरुकुल से विदाई और दो राहों का सफर

     

    समय किसी के लिए नहीं रुकता।

     

    गुरु सांदीपनि के आश्रम में बिताए हुए दिन कब बीत गए, कृष्ण और सुदामा को स्वयं भी पता नहीं चला। कभी जो दोनों बालक पहली बार आश्रम में मिले थे, अब वे युवावस्था की ओर बढ़ चुके थे।

     

    उनके पास यादों का एक पूरा संसार था।

     

    कभी साथ मिलकर नदी से जल लाना, कभी जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करना, कभी गुरु माता के लिए काम करना, तो कभी रात को देर तक बैठकर जीवन और भविष्य के बारे में बातें करना।

     

    लेकिन अब उन दिनों के समाप्त होने का समय आ गया था।

     

    उस सुबह आश्रम का वातावरण कुछ अलग था।

     

    सभी शिष्य गुरु सांदीपनि के सामने एकत्र हुए थे। कई लोगों के चेहरों पर खुशी थी कि उनकी शिक्षा पूरी होने वाली है, लेकिन कुछ की आँखों में अपने आश्रम को छोड़ने का दुख भी था।

     

    कृष्ण और सुदामा एक-दूसरे के पास बैठे थे।

     

    सुदामा चुप था।

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा, “आज तुम बहुत शांत हो।”

     

    सुदामा ने बिना उनकी ओर देखे कहा, “आज तुम भी बहुत ज्यादा बातें नहीं कर रहे।”

     

    कृष्ण हल्का सा मुस्कुराए।

     

    “तो तुम्हें पता है कि मैं भी समझ रहा हूँ।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    “क्या?”

     

    “कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है।”

     

    सुदामा ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी गुरु सांदीपनि की आवाज गूँजी।

     

    “मेरे प्रिय शिष्यों।”

     

    सभी शांत हो गए।

     

    गुरु सांदीपनि ने एक-एक करके अपने सामने बैठे शिष्यों को देखा।

     

    “जब तुम इस आश्रम में आए थे, तब तुममें से अधिकांश बच्चे थे। तुम यहाँ ज्ञान पाने आए थे। लेकिन आज मैं तुम्हें देखकर केवल अपने शिष्य नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य देख रहा हूँ जो जीवन की राह पर चलने के लिए तैयार हैं।”

     

    सभी शिष्य ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।

     

    “याद रखना, शिक्षा का अंत किसी आश्रम से विदा लेने पर नहीं होता। असली शिक्षा तो उसके बाद शुरू होती है, जब जीवन तुम्हारी परीक्षा लेता है।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    गुरु की बातें उसके मन को छू रही थीं।

     

    गुरु आगे बोले, “जीवन में तुम्हें सुख भी मिलेगा और दुख भी। सम्मान भी मिलेगा और अपमान भी। कभी तुम्हारे पास बहुत कुछ होगा और कभी बहुत कम। लेकिन किसी भी परिस्थिति को अपने मन से बड़ा मत होने देना।”

     

    फिर उन्होंने हाथ उठाकर सभी को आशीर्वाद दिया।

     

    “जाओ और अपने ज्ञान से केवल अपना नहीं, दूसरों का जीवन भी बेहतर बनाने का प्रयास करो।”

     

    शिष्यों ने एक साथ गुरु के चरणों में प्रणाम किया।

     

    अब विदाई का समय सचमुच आ चुका था।

     

    सभी शिष्य अपने-अपने सामान को समेटने लगे।

     

    किसी के पास अधिक सामान था, किसी के पास कम।

     

    सुदामा के पास हमेशा की तरह एक छोटा सा कपड़े का थैला था।

     

    वह उसे उठाकर कुछ देर तक देखता रहा।

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “चलो?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “इतनी जल्दी?”

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    “समय जल्दी नहीं जा रहा, सुदामा। हम बस उसे रोक नहीं सकते।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    “मैंने सोचा था कि यह दिन बहुत दूर है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “मैंने भी।”

     

    दोनों कुछ देर तक उसी स्थान को देखते रहे जहाँ उन्होंने अपने जीवन के इतने वर्ष बिताए थे।

     

    फिर गुरु माता उनके पास आईं।

     

    उन्होंने सबसे पहले सुदामा को अपने पास बुलाया।

     

    सुदामा ने उनके चरण छुए।

     

    गुरु माता ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम हमेशा शांत और सरल रहे हो, पुत्र। जीवन चाहे तुम्हें कितनी भी कठिनाइयाँ दे, अपने मन की सच्चाई मत खोना।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “माता, आपने मुझे माँ जैसा प्रेम दिया।”

     

    गुरु माता मुस्कुराईं।

     

    “तो फिर मुझे भूलना मत।”

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “कभी नहीं।”

     

    फिर कृष्ण उनके चरणों में झुके।

     

    गुरु माता ने उन्हें देखते हुए कहा, “और तुम…”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं क्या, माता?”

     

    गुरु माता ने कहा, “तुम्हारी मुस्कान कभी खत्म नहीं होगी, यह मुझे पता है। लेकिन याद रखना, जहाँ भी जाओ, लोगों के जीवन में वही प्रेम बाँटना जो तुमने इस आश्रम में बाँटा है।”

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा, “आपका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहेगा।”

     

    गुरु माता ने दोनों मित्रों को एक साथ देखा।

     

    उनकी आँखों में भी भावनाएँ थीं।

     

    “तुम दोनों की मित्रता ऐसी ही बनी रहे।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “यह तो बनी ही रहेगी।”

     

    लेकिन अब सबसे कठिन क्षण आने वाला था।

     

    दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना था।

     

    सुदामा को अपने गाँव लौटना था।

     

    वहीं कृष्ण को अपने परिवार और अपने जीवन की राह की ओर बढ़ना था।

     

    आश्रम से बाहर निकलते ही रास्ता दो दिशाओं में बँट जाता था।

     

    एक रास्ता सुदामा के गाँव की ओर जाता था।

     

    दूसरा रास्ता कृष्ण की यात्रा की ओर।

     

    दोनों धीरे-धीरे उस मोड़ तक पहुँचे।

     

    सुदामा के कदम भारी होते जा रहे थे।

     

    वह बार-बार कुछ कहना चाहता, लेकिन शब्द उसके गले में ही रुक जाते।

     

    आखिरकार वह रुक गया।

     

    कृष्ण भी रुक गए।

     

    दोनों कुछ क्षण तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “तो… अब हमें जाना होगा?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उसने जल्दी से अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    कृष्ण ने कहा, “सुदामा।”

     

    “हूँ?”

     

    “मुझसे नजरें क्यों चुरा रहे हो?”

     

    सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे रोते हुए देखो।”

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे हँसते हुए याद रखो।”

     

    कृष्ण की मुस्कान हल्की हो गई।

     

    “मैं तुम्हें वैसे ही याद रखूँगा जैसे तुम हो।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    उसने कहा, “कृष्ण, तुम कहाँ जाओगे? तुम्हारा जीवन कैसा होगा? क्या मैं कभी तुम्हें फिर देख पाऊँगा?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर बोले, “जीवन हमें कहाँ ले जाएगा, यह मैं अभी तुम्हें नहीं बता सकता। लेकिन एक बात जानता हूँ।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर तुम्हारे मन में मेरे लिए सच्ची मित्रता रहेगी, तो तुम मुझे कभी खो नहीं सकते।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें ढूँढूँगा कहाँ?”

     

    कृष्ण ने अपने हृदय पर हाथ रखा।

     

    “यहाँ।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “कृष्ण…”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “और जब भी जीवन में तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो, तो यह मत सोचना कि मैं बहुत दूर हूँ।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम वादा करो कि अगर मैं तुम्हारे पास कभी आऊँ तो तुम मुझे पहचानोगे।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “क्या तुम सच में सोचते हो कि मैं अपने मित्र को नहीं पहचानूँगा?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कृष्ण ने आगे कहा, “समय हमारे वस्त्र बदल सकता है, हमारे बाल बदल सकता है, हमारे घर और जीवन बदल सकता है। लेकिन सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो फिर एक बात और वादा करो।”

     

    “कहो।”

     

    “हमारी मित्रता कभी नहीं बदलेगी।”

     

    कृष्ण ने उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया।

     

    “मित्रता बदलने वाली चीज नहीं होती, सुदामा। अगर वह बदल जाए तो शायद वह सच्ची मित्रता थी ही नहीं।”

     

    दोनों कुछ देर तक चुप रहे।

     

    फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, “अब चलो।”

     

    सुदामा का मन नहीं मान रहा था।

     

    लेकिन वह जानता था कि अब रुकना संभव नहीं था।

     

    उसने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    दोनों मित्र कुछ क्षण तक वैसे ही खड़े रहे।

     

    उनके बीच कोई शब्द नहीं थे।

     

    लेकिन उस मौन में वर्षों की यादें थीं।

     

    आश्रम था।

     

    गुरु माता थीं।

     

    जंगल की बारिश थी।

     

    साथ बाँटा हुआ भोजन था।

     

    हँसी थी।

     

    छोटी-छोटी बहसें थीं।

     

    और एक ऐसी मित्रता थी, जिसे दोनों अपने जीवन की सबसे कीमती चीज मानते थे।

     

    कुछ देर बाद दोनों अलग हुए।

     

    सुदामा ने आँसू पोंछे।

     

    “फिर मिलेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “जरूर मिलेंगे।”

     

    सुदामा ने एक बार फिर कृष्ण को देखा।

     

    फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा।

     

    कृष्ण भी दूसरी दिशा में आगे बढ़ गए।

     

    सुदामा कुछ दूर चला।

     

    लेकिन उसके कदम रुक गए।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण भी पीछे मुड़कर उसे देख रहे थे।

     

    दोनों मुस्कुराए।

     

    फिर धीरे-धीरे वे अपनी-अपनी राहों पर आगे बढ़ गए।

     

    समय बीतने लगा।

     

    सुदामा अपने गाँव पहुँचा।

     

    उसके माता-पिता उसे देखकर बहुत खुश हुए।

     

    वह पहले से अधिक समझदार हो चुका था।

     

    उसने अपने घर के साधारण जीवन को अपनाया।

     

    वह लोगों को ज्ञान देता, बच्चों को पढ़ाता और अपने जीवन को सरलता से जीने का प्रयास करता।

     

    लेकिन हर शाम…

     

    जब वह अकेला बैठता…

     

    उसे कृष्ण की याद आती।

     

    कभी किसी बात पर मुस्कान आ जाती।

     

    कभी आँखें नम हो जातीं।

     

    वह सोचता—

     

    कृष्ण कहाँ होंगे?

     

    क्या वह मुझे याद करते होंगे?

     

    उधर कृष्ण का जीवन भी तेजी से बदल रहा था।

     

    उनके सामने बड़ी जिम्मेदारियाँ आने वाली थीं।

     

    जीवन उन्हें कई नए संघर्षों की ओर ले जाने वाला था।

     

    लेकिन समय की तेज रफ्तार में भी कुछ रिश्ते पीछे नहीं छूटते।

     

    कृष्ण के मन में भी सुदामा की याद हमेशा बनी रही।

     

    वर्ष बीत गए।

     

    दोनों मित्र अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ते गए।

     

    लेकिन उनके जीवन एक जैसे नहीं थे।

     

    एक ओर कृष्ण का जीवन धीरे-धीरे महान जिम्मेदारियों और राजसी वैभव की ओर बढ़ रहा था।

     

    दूसरी ओर सुदामा का जीवन सादगी और संघर्षों से भरा था।

     

    फिर भी…

     

    एक समय था जब दोनों के बीच कोई अंतर नहीं था।

     

    वे बस दो मित्र थे।

     

    दो बालक।

     

    जो बारिश में भीगते हुए साथ खड़े रहते थे।

     

    जो थोड़ा सा भोजन भी बाँटकर खाते थे।

     

    जो एक-दूसरे के बिना अपने दिन की कल्पना भी नहीं करते थे।

     

    लेकिन अब जीवन उन्हें एक ऐसी दूरी तक ले जा चुका था, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

     

    और बहुत जल्द…

     

    वह समय आने वाला था जब सुदामा का जीवन कठिनाइयों से भर जाएगा।

     

    उसके सामने ऐसी परिस्थितियाँ आएँगी, जब उसे अपने पुराने मित्र कृष्ण की याद पहले से भी अधिक आएगी।

     

    लेकिन क्या सुदामा इतने वर्षों बाद कृष्ण के पास जा पाएगा?

     

    क्या वह अपने पुराने मित्र को वैसे ही पा सकेगा?

     

    या समय और परिस्थितियाँ उनके बीच इतनी दूरी बना चुकी होंगी कि मिलना केवल एक सपना रह जाएगा?

     

    इन सवालों का जवाब अभी भविष्य के पास था।

     

    लेकिन एक बात निश्चित थी—

     

    उनकी मित्रता की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

     

    असल में…

     

    उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होने वाली थी।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं