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श्रेणी: श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता 🏆

  • Part 4 गुरुकुल की अंतिम परीक्षा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    श्री कृष्ण और सुदामा — अटूट मित्रता की कहानी

    अध्याय 4 — गुरुकुल की अंतिम परीक्षा और बिछड़ने का डर

     

    समय धीरे-धीरे बीत रहा था।

     

    गुरु सांदीपनि के आश्रम में आए हुए कृष्ण और सुदामा को कई वर्ष बीत चुके थे। जो दो बालक पहली बार एक-दूसरे से मिले थे, अब बड़े हो रहे थे। उनकी समझ बढ़ चुकी थी, उनके विचार बदल रहे थे, लेकिन एक चीज बिल्कुल नहीं बदली थी—उनकी मित्रता।

     

    हर सुबह दोनों साथ उठते।

     

    नदी तक जाते।

     

    आश्रम के कार्य करते।

     

    गुरु के सामने बैठकर शिक्षा प्राप्त करते।

     

    और शाम होते ही दिनभर की बातें करते हुए एक-दूसरे के पास बैठ जाते।

     

    लेकिन अब आश्रम का वातावरण थोड़ा बदलने लगा था।

     

    कई शिष्यों की शिक्षा पूरी हो चुकी थी और वे अपने घर लौटने लगे थे।

     

    जब भी कोई शिष्य गुरु सांदीपनि और गुरु माता का आशीर्वाद लेकर आश्रम से विदा होता, सुदामा उसे चुपचाप देखता रहता।

     

    एक दिन कृष्ण ने उससे पूछा, “तुम इतने शांत क्यों हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा यह ‘कुछ नहीं’ हमेशा बहुत कुछ होता है।”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें सब पता चल जाता है।”

     

    “क्योंकि तुम मेरे मित्र हो।”

     

    कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने सामने जाते हुए एक शिष्य को देखा और धीरे से कहा, “कृष्ण, एक दिन हमें भी जाना होगा ना?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    सुदामा आगे बोला, “एक दिन हमारी शिक्षा भी पूरी होगी। फिर तुम अपने घर चले जाओगे और मैं अपने घर।”

     

    कृष्ण ने कुछ क्षण तक कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हें कभी इस बात का डर नहीं लगता?”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “डर लगता है।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

     

    “तुम्हें?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं भी तुम्हारी तरह ही हूँ।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    “नहीं, तुम मेरी तरह बिल्कुल नहीं हो।”

     

    कृष्ण ने कहा, “ठीक है, लेकिन मित्र को खोने का डर मुझे भी होता है।”

     

    सुदामा का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “तो फिर क्या होगा?”

     

    कृष्ण ने पूछा, “किसका?”

     

    “हमारी मित्रता का।”

     

    कृष्ण ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, “क्या तुम रोज सूरज को देखते हो?”

     

    “हाँ।”

     

    “और रात को?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर भी तुम्हें विश्वास होता है कि सुबह सूरज वापस आएगा?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ।”

     

    कृष्ण बोले, “मित्रता भी ऐसी ही होती है। कभी-कभी जीवन की रात हमें अलग कर देती है, लेकिन सच्चा प्रेम फिर भी मन में बना रहता है।”

     

    सुदामा कुछ देर तक कृष्ण की बात सोचता रहा।

     

    उसने धीरे से कहा, “लेकिन मैं तुम्हें रोज देखना चाहता हूँ।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो मेरी यादों को अपने पास रखना।”

     

    “और अगर यादें कम पड़ गईं तो?”

     

    “तो फिर मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने पहली बार खुलकर हँसते हुए कहा, “तुम्हें ढूँढना आसान होगा?”

     

    कृष्ण ने आँखों में शरारत भरकर कहा, “नहीं, लेकिन तुम मेरे मित्र हो। तुम्हें रास्ता मिल जाएगा।”

     

    दोनों की हँसी आश्रम के शांत वातावरण में फैल गई।

     

    लेकिन सुदामा के मन में बिछड़ने का डर फिर भी कहीं न कहीं बना रहा।

     

    कुछ दिनों बाद गुरु सांदीपनि ने सभी बड़े शिष्यों को अपने पास बुलाया।

     

    उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

     

    कृष्ण और सुदामा एक-दूसरे के पास बैठ गए।

     

    गुरु ने कहा, “तुम सभी कई वर्षों से इस आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे हो। अब समय आ गया है कि तुम अपनी शिक्षा के अंतिम चरण में प्रवेश करो।”

     

    सभी शिष्य ध्यान से सुनने लगे।

     

    “शिक्षा केवल शास्त्र पढ़ लेने से पूरी नहीं होती। मनुष्य को अपने ज्ञान की परीक्षा जीवन में देनी पड़ती है।”

     

    एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, क्या हमें कोई परीक्षा देनी होगी?”

     

    गुरु सांदीपनि ने कहा, “हाँ। लेकिन यह परीक्षा केवल पुस्तकों की नहीं होगी।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण मुस्कुरा रहे थे, जैसे उन्हें पहले से पता हो कि कुछ रोचक होने वाला है।

     

    गुरु सांदीपनि आगे बोले, “तुम सभी को अलग-अलग कार्य दिए जाएँगे। उन कार्यों के माध्यम से मैं देखूँगा कि तुमने यहाँ केवल ज्ञान सीखा है या जीवन को भी समझा है।”

     

    कुछ शिष्यों के चेहरे पर उत्साह था और कुछ चिंतित हो गए।

     

    सुदामा के मन में भी हल्की चिंता थी।

     

    उस रात वह देर तक सो नहीं सका।

     

    कृष्ण ने पूछा, “अब क्या सोच रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “परीक्षा के बारे में।”

     

    कृष्ण ने करवट बदलते हुए कहा, “तुम हर आने वाली बात से पहले ही डर क्यों जाते हो?”

     

    “क्योंकि मुझे सब कुछ सही करना है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “हर समय सही होने की कोशिश करने वाला व्यक्ति सबसे ज्यादा परेशान रहता है।”

     

    सुदामा ने पूछा, “तो क्या गलतियाँ करनी चाहिए?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “नहीं, लेकिन गलती के डर से काम करना छोड़ भी नहीं देना चाहिए।”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद कृष्ण ने कहा, “कल जो होगा, देखा जाएगा। आज आराम करो।”

     

    अगली सुबह सभी शिष्य गुरु सांदीपनि के सामने एकत्र हुए।

     

    गुरु ने एक-एक करके सभी को उनके कार्य बताए।

     

    कुछ को दूर गाँवों में जाकर लोगों की सहायता करनी थी।

     

    कुछ को कठिन विषयों पर अध्ययन करना था।

     

    कुछ को आश्रम की जिम्मेदारियाँ संभालनी थीं।

     

    फिर गुरु ने कृष्ण और सुदामा की ओर देखा।

     

    “तुम दोनों…”

     

    सुदामा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “तुम दोनों को साथ में एक कार्य करना होगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सुदामा की ओर देखा।

     

    सुदामा के चेहरे पर राहत आ गई।

     

    गुरु ने कहा, “तुम्हें तीन दिनों के लिए आश्रम से दूर एक गाँव जाना होगा। वहाँ के लोग पानी की कमी से परेशान हैं। पास की एक पुरानी जलधारा मिट्टी और पत्थरों से बंद हो गई है।”

     

    सुदामा ध्यान से सुन रहा था।

     

    गुरु ने आगे कहा, “तुम दोनों वहाँ जाकर लोगों की सहायता करोगे। लेकिन याद रखना, तुम्हें यह काम केवल अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि लोगों को साथ लेकर करना होगा।”

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा, “जैसी आज्ञा, गुरुदेव।”

     

    दोनों उसी दिन यात्रा पर निकल पड़े।

     

    रास्ता लंबा था।

     

    कृष्ण पूरे रास्ते बातें करते रहे, लेकिन सुदामा इस बार कुछ ज्यादा ही चुप था।

     

    कुछ समय बाद कृष्ण ने पूछा, “अब क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि हम इतने बड़े काम को कैसे पूरा करेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “पहले गाँव पहुँचते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “सुदामा।”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “तुम भविष्य की चिंता करते-करते वर्तमान को थका देते हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “और तुम वर्तमान में इतने खुश रहते हो कि कभी भविष्य की चिंता ही नहीं करते।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “शायद इसीलिए हम मित्र हैं। तुम मुझे सावधान रखते हो और मैं तुम्हें मुस्कुराना सिखाता हूँ।”

     

    दोनों आगे बढ़ते गए।

     

    शाम तक वे उस गाँव में पहुँच गए।

     

    गाँव छोटा था।

     

    वहाँ के लोग परेशान दिखाई दे रहे थे।

     

    एक वृद्ध व्यक्ति ने उन्हें बताया कि पहले गाँव के पास एक छोटी जलधारा बहती थी, लेकिन कई महीनों पहले तेज बारिश और मिट्टी के बहाव से उसका रास्ता बंद हो गया।

     

    अब लोगों को बहुत दूर से पानी लाना पड़ता था।

     

    सुदामा ने जलधारा का रास्ता देखा।

     

    वहाँ बड़े-बड़े पत्थर और मिट्टी जमा थी।

     

    वह चिंतित हो गया।

     

    “यह काम बहुत कठिन है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो कठिन काम शुरू करते हैं।”

     

    अगली सुबह दोनों गाँव वालों के साथ वहाँ पहुँचे।

     

    कृष्ण ने कहा, “अगर हम सब मिलकर काम करें, तो यह काम जल्दी पूरा हो सकता है।”

     

    कुछ लोग तैयार हो गए।

     

    कुछ ने कहा, “यह बहुत बड़ा काम है।”

     

    कुछ लोग निराश थे।

     

    सुदामा को लगा कि शायद यह कार्य पूरा नहीं होगा।

     

    लेकिन कृष्ण ने हार नहीं मानी।

     

    उन्होंने सबसे पहले स्वयं मिट्टी हटानी शुरू कर दी।

     

    उन्हें देखकर कुछ बच्चे भी आ गए।

     

    फिर कुछ युवक।

     

    फिर धीरे-धीरे गाँव के अन्य लोग भी जुड़ने लगे।

     

    सुदामा ने देखा कि कृष्ण केवल बातें नहीं कर रहे थे।

     

    वह सबसे पहले स्वयं काम कर रहे थे।

     

    सुदामा भी उनके साथ लग गया।

     

    पूरा दिन मिट्टी हटाने में निकल गया।

     

    शाम तक सब थक चुके थे।

     

    लेकिन जलधारा का रास्ता अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ था।

     

    सुदामा ने थके हुए स्वर में कहा, “शायद हमसे नहीं होगा।”

     

    कृष्ण ने कहा, “आज नहीं हुआ तो कल होगा।”

     

    “लेकिन तीन दिन में?”

     

    “तो तीन दिन तक पूरी कोशिश करेंगे।”

     

    दूसरे दिन सुबह सभी फिर जुट गए।

     

    इस बार काम पहले से तेज हुआ।

     

    कृष्ण और सुदामा ने लोगों को अलग-अलग काम बाँट दिए।

     

    कोई मिट्टी हटा रहा था।

     

    कोई पत्थर सरका रहा था।

     

    कोई रास्ता साफ कर रहा था।

     

    दोपहर तक अचानक मिट्टी के नीचे से पानी की एक छोटी धारा दिखाई देने लगी।

     

    सभी लोग उत्साहित हो गए।

     

    “पानी!”

     

    बच्चे खुशी से चिल्लाने लगे।

     

    लेकिन अभी रास्ता पूरी तरह खुला नहीं था।

     

    कृष्ण ने कहा, “रुकना मत।”

     

    सबने फिर काम शुरू कर दिया।

     

    कुछ देर बाद आखिरी बड़ा पत्थर हटाया गया।

     

    और उसके साथ ही पानी तेजी से बहने लगा।

     

    पूरा गाँव खुशी से भर गया।

     

    लोगों ने कृष्ण और सुदामा का धन्यवाद किया।

     

    लेकिन कृष्ण ने कहा, “हम दोनों ने नहीं किया। यह काम आप सबने मिलकर किया है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे समझ आया कि सच्चा नेतृत्व वही होता है जो दूसरों को अपनी शक्ति का एहसास करा दे।

     

    तीन दिन बाद दोनों आश्रम लौट आए।

     

    गुरु सांदीपनि ने उनसे पूछा, “कार्य पूरा हुआ?”

     

    कृष्ण ने कहा, “हाँ, गुरुदेव।”

     

    सुदामा ने पूरी घटना विस्तार से बताई।

     

    गुरु ध्यान से सुनते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “तुम दोनों ने अपनी परीक्षा में बहुत कुछ सीखा है।”

     

    सुदामा ने पूछा, “गुरुदेव, क्या हमारी शिक्षा अब पूरी हो गई?”

     

    गुरु सांदीपनि कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “अभी नहीं… लेकिन वह दिन अब दूर भी नहीं है।”

     

    सुदामा का मन अचानक भारी हो गया।

     

    वही बात…

     

    जिससे वह इतने दिनों से डर रहा था।

     

    गुरुकुल छोड़ना।

     

    कृष्ण से अलग होना।

     

    उस रात वह फिर से चुप बैठा था।

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “तुम फिर सोच रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ।”

     

    “बिछड़ने के बारे में?”

     

    सुदामा ने सिर हिला दिया।

     

    कृष्ण उसके पास बैठ गए।

     

    कुछ देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने कहा, “कृष्ण, अगर हमारे जीवन की राहें सच में अलग हो गईं तो?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “तो हमारी राहें अलग होंगी… हम नहीं।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “मुझसे वादा करो कि चाहे कुछ भी हो जाए, तुम मुझे कभी नहीं भूलोगे।”

     

    कृष्ण ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

     

    “सुदामा, मित्र को याद रखने के लिए वादा नहीं करना पड़ता। सच्चा मित्र मन में रहता है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    उसे नहीं पता था कि आने वाला समय उनकी परीक्षा सचमुच लेने वाला है।

     

    बहुत जल्द…

     

    गुरुकुल की शिक्षा पूरी होने वाली थी।

     

    और उसके बाद…

     

    दोनों मित्रों के सामने जीवन की दो अलग-अलग राहें खड़ी थीं।

     

    लेकिन उस रात…

     

    दोनों ने आसमान में चमकते तारों को देखा।

     

    और मन ही मन एक ही बात महसूस की—

     

    समय चाहे उन्हें कितनी भी दूर ले जाए, उनकी मित्रता की डोर कभी नहीं टूटेगी।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    भाग 2 — कंस का संदेश 🦚

     

    वृंदावन की उस सुबह के बाद दिन तो बीत गया था…

    लेकिन यशोदा मैया के मन की बेचैनी नहीं बीती।

     

    सूरज ढलने लगा था।

     

    आकाश पर लालिमा फैल चुकी थी। यमुना का जल सूर्य की अंतिम किरणों को अपने भीतर समेटे धीरे-धीरे शांत हो रहा था। गौएँ चरागाह से लौट रही थीं और उनके गलों में बंधी घंटियों की आवाज पूरे वृंदावन में एक मधुर संगीत की तरह फैल रही थी।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों के बाहर खड़ी होकर गायों का स्वागत कर रही थीं।

    ग्वालबाल दिनभर की शरारतों के किस्से सुनाते हुए अपने घरों की ओर जा रहे थे।

     

    और नंद भवन के आँगन में… श्री कृष्ण अपनी बाँसुरी लेकर बैठे थे, उनके पास ही बैठे थे उनके बड़े भाई बलराम 

     

    कभी कृष्ण कुछ कहते और बलराम हँस पड़ते।

    कभी दोनों बिना कुछ बोले ही यमुना की ओर देखते रहते। सब कुछ सामान्य था। फिर भी…

     

    मैया यशोदा को कुछ सामान्य नहीं लग रहा था।

    वह रसोई में खड़ी थीं, लेकिन बार-बार उनकी नजर कृष्ण पर जा रही थी।

     

    सुबह कृष्ण ने जो बात कही थी, वह उनके मन से निकल ही नहीं रही थी।

     

    “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    मैया ने सिर झटक दिया।

     

    “नहीं…” उन्होंने खुद से कहा। “मेरा कान्हा ऐसा कुछ नहीं कह सकता।”

     

    लेकिन मन था कि मान ही नहीं रहा था। तभी बाहर से नंद बाबा की आवाज आई, “यशोदा!”

     

    मैया ने वहीं से आवाज लगाई, “जी?”

     

    “जरा बाहर आना।”

     

    वो हाथ पोंछते हुए बाहर आईं, नंद बाबा मुख्य द्वार के पास खड़े थे। उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

     

    “क्या हुआ?” यशोदा ने पूछा।

     

    नंद बाबा ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी बाहर से घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनाई दी , टापों की आवाज धीरे-धीरे तेज होती गई।

     

    नंद भवन के द्वार पर खड़े सेवक ने बाहर झाँककर देखा।

    “महाराज…”

     

    नंद बाबा उसकी ओर मुड़े। “क्या हुआ?”

     

    “एक रथ आ रहा है।”

     

    “किसका?”

     

    सेवक ने दूर देखते हुए कहा, “पहचान में नहीं आ रहा।”

     

    नंद बाबा कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले, “द्वार खोल दो।”

     

    कुछ ही पल बाद एक सुंदर रथ नंद भवन के सामने आकर रुका। रथ से एक गंभीर, तेजस्वी पुरुष नीचे उतरे।

    चेहरे पर थकान थी… लेकिन आँखों में गहरी भक्ति।

     

    उन्होंने जैसे ही नंद बाबा को देखा, हाथ जोड़ दिए। “नंद महाराज।”

     

    नंद बाबा आगे बढ़े। “आप?”

     

    उन्होंने ध्यान से देखा। फिर पहचानते ही बोले, “अक्रूर जी!”

    यशोदा भी उनके पास आ गईं।

     

    अक्रूर ने दोनों को प्रणाम किया। “महाराज, मैया…”

     

    नंद बाबा ने उनका स्वागत करते हुए कहा, “आइए। इतनी संध्या के समय आपका आगमन… सब कुशल तो है?”

     

    अक्रूर ने एक क्षण नंद बाबा की ओर देखा। उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था कि नंद बाबा का मन और भी बेचैन हो गया।

     

    “सब कुशल है ना?” इस बार नंद बाबा की आवाज में चिंता स्पष्ट थी।

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुकाया। “मैं एक संदेश लेकर आया हूँ।”

     

    यशोदा के हृदय में जैसे अचानक कोई अनजाना भय जाग उठा। उन्होंने बिना जाने ही कृष्ण की ओर देखा।

    कृष्ण अब भी आँगन में बैठे थे। लेकिन उनकी आँखें…

    सीधे अक्रूर पर थीं।

     

    जैसे वह पहले से जानते हों कि अक्रूर क्यों आए हैं।

     

    —

     

    नंद बाबा अक्रूर को भीतर ले गए।

     

    कृष्ण और बलराम भी कुछ दूरी पर खड़े हो गए।

     

    मैया ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। “तुम यहीं रहना।”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “क्यों मैया?”

     

    “बस…” यशोदा के पास कोई कारण नहीं था।

     

    उन्हें स्वयं समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कह रही हैं। अंदर सभा-कक्ष में नंद बाबा ने अक्रूर को आसन दिया।

    “बताइए।”

     

    अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, “महाराज… मैं मथुरा से आया हूँ।”

     

    “मथुरा से?”

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा का चेहरा गंभीर हो गया, “किसलिए?”

     

    अक्रूर ने गहरी साँस ली। “महाराज कंस ने एक धनुष यज्ञ का आयोजन किया है।”

     

    नंद बाबा ने सिर हिलाया। “यह तो सुना है।”

     

    “उसने वृंदावन से भी लोगों को आमंत्रित किया है।”

     

    “ठीक है।”

    नंद बाबा कुछ सहज हुए।

     

    लेकिन अगले ही शब्दों ने उनके चेहरे का रंग बदल दिया।

     

    “विशेष रूप से कृष्ण और बलराम को।”

     

    कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। यशोदा के हाथ से पानी का पात्र लगभग छूट गया।

    “कृष्ण… और बलराम?”

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया। “हाँ, मैया।”

     

    यशोदा ने तुरंत कहा, “लेकिन क्यों?”

     

    अक्रूर ने उनकी ओर देखा। उनकी आँखों में करुणा थी।

     

    “राजा कंस ने उन्हें मथुरा बुलाया है।”

     

    यशोदा आगे बढ़ीं। “कितने दिनों के लिए?”

     

    अक्रूर चुप रहे, यशोदा की आँखें फैल गईं।

    “मैंने पूछा… कितने दिनों के लिए?”

     

    अक्रूर ने कोई उत्तर नहीं दिया, नंद बाबा समझ गए।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में पूछा, “क्या यह केवल धनुष यज्ञ के लिए बुलावा है?”

     

    अक्रूर ने उनकी आँखों में देखा। “नहीं।”

     

    बस एक शब्द और नंद भवन की सारी शांति जैसे टूट गई।

     

    —

     

    यशोदा ने तुरंत कृष्ण को अपनी ओर खींच लिया। “मेरा बेटा कहीं नहीं जाएगा।”

     

    कृष्ण शांत खड़े रहे। “मैया…”

     

    “नहीं!” यशोदा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे नहीं पता राजा कंस ने क्यों बुलाया है। मुझे यह भी नहीं जानना कि वहाँ क्या उत्सव है, क्या यज्ञ है… मेरा कान्हा कहीं नहीं जाएगा।”

     

    नंद बाबा ने उन्हें समझाने की कोशिश की। “यशोदा…”

     

    “नहीं जी!” यशोदा ने उनकी ओर देखा।

    “आप कुछ मत कहिए।”

     

    फिर वह अक्रूर की ओर मुड़ीं। “आप वापस चले जाइए।”

     

    अक्रूर स्तब्ध रह गए। “मैया…”

     

    “कह दीजिए कंस से कि कृष्ण नहीं आएगा।”

     

    अक्रूर ने सिर झुका लिया। “काश मैं ऐसा कर पाता।”

     

    “तो कीजिए।” यशोदा की आवाज टूट गई। “आप नहीं जानते… वह मेरे लिए क्या है।”

     

    अक्रूर की आँखें नम हो गईं। “मैं जानता हूँ, मैया।”

     

    “नहीं!” यशोदा ने कृष्ण का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। “कोई नहीं जानता।”

     

    उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। “मेरे लिए यह भगवान नहीं है…”

    उनकी आवाज काँप रही थी। “यह मेरा पुत्र है।”

     

    कृष्ण ने धीरे से उनकी पीठ पर हाथ रखा। “मैया…”

     

    “तुम कहीं नहीं जाओगे।”

    कृष्ण चुप रहे। उनकी आँखें कुछ पल के लिए नंद बाबा पर गईं।

     

    नंद बाबा की आँखों में भी चिंता थी। लेकिन उस चिंता के पीछे कुछ और था।

     

    जैसे उन्हें भीतर से पता हो कि यह बुलावा केवल एक उत्सव का निमंत्रण नहीं है।

     

    —

     

    अक्रूर ने धीरे से कहा, “नंद महाराज, मुझे एक बात कहनी है।”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “कहिए।”

     

    “मैं स्वयं भी इस यात्रा को लेकर प्रसन्न नहीं हूँ।”

     

    यशोदा ने उनकी ओर देखा।

     

    अक्रूर बोले, “लेकिन मुझे विश्वास है कि कृष्ण और बलराम का मथुरा जाना किसी बड़े उद्देश्य का भाग है।”

     

    नंद बाबा ने तुरंत पूछा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

     

    अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, “क्योंकि कंस कृष्ण से भयभीत है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया। “भयभीत?” नंद बाबा ने दोहराया।

     

    अक्रूर ने सिर हिलाया। “हाँ।”

     

    “लेकिन कृष्ण ने उसका क्या बिगाड़ा है?”

     

    “यही तो बात है।”

     

    अक्रूर की आवाज धीमी थी। “कंस कृष्ण से इसलिए नहीं डरता कि कृष्ण ने उसका कुछ बिगाड़ा है… वह इसलिए डरता है क्योंकि उसे अपने अंत का भय है।”

     

    यशोदा का हृदय धक से रह गया। “कैसा अंत?”

     

    अक्रूर ने उत्तर नहीं दिया।

    नंद बाबा ने गंभीर होकर पूछा, “क्या भविष्यवाणी वाली बात…”

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया, यशोदा ने कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया। उनके मन में वर्षों पुरानी बातें कौंधने लगीं।

    कृष्ण का जन्म… उस रात की रहस्यमयी घटनाएँ…

    गोकुल में उनका आना… कंस के भेजे असुर…

    पूतना… शकटासुर… त्रिणावर्त… कालिया…

    गोवर्धन…

     

    एक-एक घटना जैसे अचानक उनके सामने जीवित हो उठी।

    क्या यह सब उसी दिन की ओर बढ़ रहा था? क्या कृष्ण का वृंदावन में रहना अब संभव नहीं था?

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा, वह शांत थे।

     

    असामान्य रूप से शांत। “कान्हा…”

     

    कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा। “हाँ, मैया।”

     

    “तुम्हें डर नहीं लग रहा?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “किस बात का?”

     

    “मथुरा जाने का।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “जहाँ आपका आशीर्वाद हो, वहाँ डर कैसा?”

     

    यशोदा की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    वह नहीं चाहती थीं कि कृष्ण उन्हें रोते हुए देखें, लेकिन कृष्ण सब समझ रहे थे।

     

    —

     

    उस रात नंद भवन में किसी ने ठीक से भोजन नहीं किया।

     

    गोपियों तक यह समाचार पहुँच चुका था, धीरे-धीरे पूरा वृंदावन जान गया, कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया गया है।

     

    गलियों में फुसफुसाहट होने लगी।

    किसी ने कहा, “कृष्ण को नहीं जाना चाहिए।”

     

    किसी ने कहा, “कंस पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?”

    किसी ने कहा, “यह जरूर कोई चाल है।”

     

    और किसी ने बस इतना कहा, “अगर कृष्ण चले गए तो वृंदावन का क्या होगा?”

     

    यमुना किनारे राधा खड़ी थीं, उन्हें भी समाचार मिल चुका था। हवा में वही बाँसुरी की धुन जैसे अब भी तैर रही थी।

     

    लेकिन आज… वह धुन उन्हें खुश नहीं कर रही थी।

    उनकी आँखों के सामने कृष्ण का चेहरा था। सुबह का वही प्रश्न याद आ रहा था, “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    राधा की आँखों से एक आँसू गिरा, उन्होंने यमुना की ओर देखा।

    “तो क्या सच में…” उनकी आवाज हवा में खो गई।

    “कान्हा हमसे दूर जाने वाले हैं?”

     

    —

     

    नंद भवन में उस रात कृष्ण अपने कक्ष में बैठे थे, बलराम उनके सामने थे।

    कुछ देर दोनों भाई मौन रहे। फिर बलराम ने पूछा, “तुम्हें पहले से पता था?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा। “क्या?”

     

    “अक्रूर के आने के बारे में।”

     

    कृष्ण ने उत्तर नहीं दिया। बलराम समझ गए। “तुम जानते थे।”

     

    कृष्ण ने धीरे से बाँसुरी उठाई। “दाऊ…”

     

    “हूँ?”

     

    “कभी-कभी जीवन हमें वहाँ ले जाता है जहाँ जाने की हमने इच्छा नहीं की होती।”

     

    बलराम ने उनकी आँखों में देखा। “और अगर कोई तुम्हें रोकना चाहे?”

     

    कृष्ण ने कुछ क्षण सोचा, फिर मुस्कुराए।

    “तो उसे प्रेम से समझाना होगा।”

     

    “और अगर प्रेम ही तुम्हें रोक ले?”

     

    इस बार कृष्ण की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई, उन्होंने बाहर देखा। आँगन में यशोदा मैया बैठी थीं, उनकी आँखें कृष्ण के कक्ष की ओर थीं।

     

    कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे। फिर धीरे से बोले, “तब सबसे कठिन होता है… जाना।”

     

    उनकी उँगलियाँ बाँसुरी पर ठहर गईं, बाहर रात गहरी होती जा रही थी।

    वृंदावन सो रहा था, लेकिन उस रात… नंद भवन में कोई नहीं सोया।

    एक माँ अपने पुत्र को खोने के भय में जाग रही थी।

     

    एक पिता अपने कर्तव्य और पुत्र के बीच खड़ा था।

    एक भाई आने वाले संघर्ष को महसूस कर रहा था।

     

    एक युवती यमुना किनारे अपने प्रिय के जाने की आहट सुन रही थी।

     

    और कृष्ण… वह सबसे शांत बैठे थे।

    जैसे उन्हें पता हो कि अगली सुबह से वृंदावन की हर साँस बदलने वाली है।

     

    क्योंकि अक्रूर केवल कंस का संदेश लेकर नहीं आए थे।

     

    वह अपने साथ…

    वृंदावन के विरह की पहली सुबह भी लेकर आए थे। 🦚❤️

     

    हम दिन में जाने कितने बुरे विचार लाते हैं या कहते हैं इसलिए एक बार साफ मन से 

    🌺 राधे राधे 🌺 कहते जाइए।

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    भाग 1 — वृंदावन की वो सुबह 🦚

     

    वृंदावन में सुबह कभी केवल सुबह नहीं होती थी।

     

    वहाँ सूरज की पहली किरण के साथ जैसे कोई बाँसुरी जन्म लेती थी…

    यमुना की लहरें उसे सुनती थीं, कदंब के वृक्ष झूमकर उसका स्वागत करते थे और गलियों में बिखरी धूल भी जैसे उस धुन पर नाचने लगती थी।

     

    उस दिन भी वृंदावन वैसा ही जागा था।

     

    आकाश अभी पूरी तरह लालिमा से नहीं भरा था। पूर्व दिशा में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। यमुना का जल शांत था और उसके ऊपर तैरती धुंध की पतली चादर धीरे-धीरे सूरज की किरणों में घुल रही थी।

     

    कहीं गौशाला से गायों के रंभाने की आवाज आ रही थी, तो कहीं घरों के आँगन में गोपियाँ मटके लिए निकल चुकी थीं।

     

    लेकिन उस सुबह वृंदावन की हवा में कुछ अलग था।

    बहुत हल्का-सा…

     

    इतना हल्का कि कोई उसे महसूस तो कर सकता था, पर उसका नाम नहीं रख सकता था।

    नंद भवन में यशोदा मैया रोज की तरह सुबह-सुबह उठ चुकी थीं।

     

    उन्होंने आँगन में गोबर से सुंदर-सी रंगोली बनाई, तुलसी माता को जल चढ़ाया और फिर माखन मथने बैठ गईं।

     

    मथानी की आवाज पूरे आँगन में गूँज रही थी।

     

    छन्न… छन्न… छन्न…

     

    यशोदा मैया के होंठों पर मुस्कान थी।

    लेकिन उनकी आँखें बार-बार उस कमरे की ओर उठ जातीं जहाँ उनका कान्हा सो रहा था।

    “पता नहीं कब बड़ा हो गया मेरा लल्ला…”

    उन्होंने धीरे से खुद से कहा।

     

    फिर मुस्कुराकर सिर हिलाया।

    “बड़ा कहाँ हुआ है? अभी भी तो सुबह उठते ही माखन के पीछे भागता है।”

     

    उसी क्षण कमरे के भीतर से कुछ गिरने की आवाज आई।

    धड़ाम!

     

    मैया यशोदा की मथानी रुक गई। उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

    “लो… उठ गया मेरा नटखट।” उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभर आई। 

     

    अगले ही पल उनकी आवाज पूरे भवन में गूँज उठी, “कान्हा!”

     

    अंदर से कोई उत्तर नहीं आया। “कान्हा!”

     

    फिर भी शांति। मैया यशोदा ने हाथ कमर पर रखे और कमरे की ओर बढ़ गईं।

    दरवाजा खोलते ही उनकी नजर बिखरे हुए बिस्तर पर पड़ी।

     

    सबकुछ अस्त व्यस्त था लेकिन कृष्णा… कमरे में थे ही नहीं।

     

    मैया यशोदा कुछ क्षण उन्हें ढूँढती रहीं। फिर उनकी नजर खिड़की से बाहर गई।

    कदंब के पेड़ के पास वो खड़े थे।

     

    हाथ में बाँसुरी लिए। 

    नीली आभा से घिरा उनका मुख सुबह की पहली किरणों में ऐसा चमक रहा था जैसे स्वयं आकाश ने उन्हें अपने रंग में रंग दिया हो।

     

    कृष्ण की आँखें यमुना की ओर थीं और उनके होंठों पर एक हल्की मुस्कान।

     

    यशोदा खिड़की से ही पुकार उठीं, 

    “कान्हा! इतनी सुबह-सुबह वहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा। “मैया…”

     

    उनकी आवाज में वही मासूमियत थी। “आप जाग गईं?”

     

    यशोदा ने भौंहें चढ़ाईं। “हाँ, क्योंकि मेरा लाल कमरे में सोने के बजाय पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम रहा है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो बस जल्दी भोर में ही यमुना मैया से मिलने आया था।”

     

    “यमुना मैया से मिलने?” यशोदा बाहर आईं और उनके पास पहुँचकर कान पकड़ लिया। “और मुझे बिना बताए?”

     

    कृष्ण हँस पड़े। “मैया, आप तो सो रही थीं।”

     

    “तो क्या मुझे जगाते?”

     

    “जगाता तो आप मुझे जाने देतीं?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल उन्हें देखती रहीं। फिर उनके चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। “नहीं।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “इसीलिए तो नहीं जगाया।”

     

    यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।

    “बहुत चालाक हो गए हो, रे।”

     

    कृष्ण हँसने लगे। उनकी हँसी सुनकर पास से गुजरती एक गोपी भी मुस्कुरा उठी।

     

    “मैया, आपका कान्हा तो आज फिर माखन चुराने की तैयारी में है।”

     

    कृष्ण तुरंत बोले, “मैंने आज माखन नहीं चुराया।”

     

    यशोदा ने आँखें तरेरीं। “आज?”

     

    कृष्ण चुप हो गए, गोपी हँस पड़ी।

     

    “मैया, कल की मटकी याद है?”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा। “तो कल किसने माखन चुराया था?”

     

    कृष्ण ने तुरंत आकाश की ओर देखा। “मैया, मुझे लगता है आज मौसम बहुत सुंदर है।”

     

    और इतना कहकर भागने लगे। “कान्हा!”

     

    मैया यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं।

     

    पूरा आँगन कृष्ण की हँसी से भर गया। कुछ ही देर में नंद भवन की वही पुरानी चहल-पहल लौट आई।

     

    कहीं ग्वाल-बाल कृष्ण को ढूँढते हुए आ रहे थे। कहीं गोपियाँ उनकी शिकायत लेकर यशोदा के पास पहुँच रही थीं।

     

    कहीं गायों के बीच जाकर कृष्ण उन्हें पुकार रहे थे।

     

    वृंदावन के लिए कृष्ण केवल नंद बाबा के पुत्र नहीं थे, वह वृंदावन की धड़कन थे।

     

    उनके बिना जैसे हर चीज अधूरी लगती थी।

     

    —

     

    सुबह कुछ और चढ़ी तो कृष्ण अपने सखाओं के साथ यमुना किनारे जा पहुँचे।

     

    बलराम भी उनके साथ थे। मित्र ने कृष्ण के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “कान्हा, आज कहाँ चलें?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सामने देखा। “जहाँ मन करे।”

     

    “तो फिर कदंब वन!” एक ग्वालबाल चिल्लाया।

     

    सब दौड़ पड़े, कृष्ण पीछे रह गए।

    उनकी नजर यमुना पर टिक गई। बलराम ने यह देखा तो उनके कदम भी रुक गए। “कृष्ण?”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “हाँ, दाऊ?”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    बलराम कुछ क्षण उन्हें देखते रहे। “तुम आज कुछ बदले-बदले लग रहे हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो वही हूँ।”

     

    बलराम ने सिर हिलाया। “नहीं। आज तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही हैं।”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने अपनी बाँसुरी निकाली।

     

    और अगले ही क्षण यमुना के किनारे वह धुन गूँज उठी।

     

    मधुर… शांत… और ऐसी कि जैसे किसी ने हवा में प्रेम घोल दिया हो।

     

    बांसुरी की वो धुन सुनकर, गायें चरना भूल गईं। पक्षियों का कलरव थम गया।

     

    यमुना की लहरें जैसे धीमी हो गईं। दूर खड़ी कुछ गोपियाँ भी उस धुन को सुनकर ठिठक गईं।

     

    उनमें राधा भी थीं। राधा ने आँखें बंद कर लीं। लेकिन आज…

    उस बाँसुरी में कुछ अलग था। वही धुन थी, वही कृष्ण थे, वही वृंदावन था।

    फिर भी दिल के भीतर एक अनजाना डर उतर आया था।

     

    राधा ने धीरे से आँखें खोलीं। “कान्हा…”

     

    उनके होंठों से बस इतना ही निकला।

     

    —

     

    उधर नंद भवन में यशोदा कृष्ण के लिए भोजन तैयार कर रही थीं।

     

    उन्होंने थाली में माखन रखा, मिश्री रखी।

     

    गरम-गरम रोटियाँ रखीं फिर अचानक उनके हाथ रुक गए। उनकी नजर थाली पर टिक गई।

    उन्हें जाने क्यों आज मन में एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी।

     

    उन्होंने खुद को समझाया, “शायद थक गई हूँ।”

     

    लेकिन मन नहीं माना। उन्होंने आँगन में बैठे नंद बाबा को देखा। “सुनते हो?”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “क्या हुआ?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल चुप रहीं। “आज न जाने क्यों मन घबरा रहा है।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा, “लल्ला को लेकर?”

     

    मैया यशोदा ने सिर हिला दिया। “पता नहीं… बस ऐसा लगता है जैसे…” वह रुक गईं।

     

    “जैसे क्या?”

     

    मैया यशोदा के पास कोई उत्तर नहीं था। उन्होंने धीरे से कहा, “जैसे कुछ बदलने वाला है।”

     

    नंद बाबा का चेहरा भी कुछ क्षण गंभीर हो गया। उन्होंने आकाश की ओर देखा। “सब कुछ तो भगवान की इच्छा से होता है, यशोदा।”

     

    मैया ने तुरंत उनकी बात काट दी। “भगवान की इच्छा अपनी जगह है। लेकिन मेरा लल्ला…”

     

    उनकी आवाज भर्रा गई। “मेरा कान्हा मेरी आँखों के सामने रहे… बस इतनी-सी इच्छा है।”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। लेकिन इस बार उनके पास भी कोई उत्तर नहीं था।

     

    —

     

    दोपहर होने लगी थी। कृष्ण वापस लौटे। मैया यशोदा ने उन्हें देखते ही थाली आगे कर दी। “आओ, लल्ला। खाना खा लो।”

     

    कृष्ण उनके पास बैठ गए, यशोदा अपने हाथों से उन्हें खिलाने लगीं।

    एक निवाला… फिर दूसरा… कृष्ण उन्हें देखते रहे।

    “क्या हुआ?” मैया ने पूछा।

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया। “कुछ नहीं।”

     

    “तो ऐसे क्यों देख रहे हो?”

     

    कृष्ण ने उनकी उँगलियों को अपने हाथ में ले लिया। “मैया…”

     

    “हम्म?”

     

    “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    यशोदा के हाथ अचानक रुक गए, अनायास ही उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। “ऐसी बातें क्यों कर रहे हो?” उनकी आँखें गमगीन हो चुकी थी। 

     

    कृष्ण चुप रहे, यशोदा ने उनका चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। 

     

    “कहीं नहीं जाओगे तुम।”

     

    कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “और अगर जाना पड़ा तो?”

     

    “नहीं।” यशोदा की आवाज इस बार दृढ़ थी।

    “तुम्हें कहीं नहीं जाना।”

     

    कृष्ण उनकी आँखों में देखते रहे, उन आँखों में माँ का प्रेम था।

    ऐसा प्रेम जिसे संसार की कोई शक्ति बाँट नहीं सकती थी।

    कृष्ण ने धीरे से अपना सिर अपनी मैया की गोद में रख दिया।

    “ठीक है मैया।”

     

    उन्होंने उनके बाल सहलाने शुरू कर दिए। उन्हें क्या पता था… कि कभी-कभी कृष्ण अपने सबसे प्रिय लोगों को भी आने वाले समय का पूरा सत्य नहीं बताते।

     

    क्योंकि कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं… जिन्हें रोकने का अधिकार प्रेम के पास भी नहीं होता।

     

    और वृंदावन की उस शांत सुबह में… किसी को नहीं पता था कि समय की धारा धीरे-धीरे उस क्षण की ओर बढ़ रही है…

     

    जब कृष्ण को अपना सबसे प्रिय स्थान छोड़ना होगा।

    लेकिन अभी… वृंदावन अनजान था। यमुना अनजान थी।

    गोपियाँ अनजान थीं। राधा अनजान थीं।

     

    और सबसे ज्यादा… यशोदा मैया अनजान थीं।

    कि उनके कान्हा के साथ बिताई जा रही यह साधारण-सी सुबह…

    वास्तव में वृंदावन की सबसे अनमोल सुबहों में से एक थी।

     

    क्योंकि आने वाला समय… वृं

    दावन से उसका कृष्ण माँगने वाला था।

     

    और उस दिन… पूरे वृंदावन को पहली बार समझ आएगा—

     

    कृष्ण सा प्रेम करना कितना आसान है…

    लेकिन कृष्ण से विरह सहना कितना कठिन। 🦚❤️

     

    अगर आपको कहानी पसंद आए तो कमेंट में राधे राधे जरूर लिखें।

    🌺 राधे राधे 🌺 

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • Part 3 गुरु माता की आज्ञा

    पढ़ने का समय : 10 मिनट
    • अध्याय 3 — गुरु माता की आज्ञा और मित्रता की परीक्षा

     

    जंगल में बिताई उस रात के बाद कृष्ण और सुदामा की मित्रता पहले से भी अधिक गहरी हो गई थी।

     

    अब आश्रम के दूसरे शिष्य भी अक्सर उनकी दोस्ती की चर्चा करते थे। सभी जानते थे कि दोनों का स्वभाव अलग है, जीवन अलग है और सोचने का तरीका भी अलग है, लेकिन फिर भी दोनों हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं।

     

    सुदामा शांत था और कृष्ण चंचल।

     

    सुदामा किसी काम को शुरू करने से पहले कई बार सोचता था, जबकि कृष्ण मुस्कुराते हुए सबसे कठिन काम भी कर देते थे।

     

    लेकिन दोनों में एक बात समान थी—वे एक-दूसरे के लिए सच्चे मन से समर्पित थे।

     

    उस सुबह आश्रम में रोज की तरह काम चल रहा था। कुछ शिष्य नदी से जल भरकर ला रहे थे। कुछ पेड़ों के नीचे बैठकर पाठ याद कर रहे थे। कृष्ण और सुदामा आश्रम के आँगन की सफाई कर रहे थे।

     

    कृष्ण झाड़ू चलाते हुए धीरे-धीरे कोई धुन गुनगुना रहे थे।

     

    सुदामा ने कहा, “कृष्ण, तुम कोई काम बिना गाना गाए नहीं कर सकते क्या?”

     

    कृष्ण ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “कर सकता हूँ।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल कृष्ण ने कहा, “लेकिन फिर काम इतना मजेदार नहीं रहेगा।”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिया।

     

    “तुम्हारे लिए हर काम खेल ही है।”

     

    “और तुम्हारे लिए हर काम परीक्षा है।”

     

    “क्योंकि मैं जिम्मेदारी समझता हूँ।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “और मैं खुशी समझता हूँ।”

     

    सुदामा ने झाड़ू एक तरफ रखते हुए कहा, “जिम्मेदारी और खुशी दोनों साथ हो सकती हैं।”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो तुम भी धीरे-धीरे मेरी तरह समझदार हो रहे हो।”

     

    “तुम्हारी तरह?”

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    “कृष्ण, तुम कभी-कभी खुद को बहुत महान समझते हो।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “कभी-कभी नहीं, सुदामा। हमेशा।”

     

    दोनों जोर से हँस पड़े।

     

    उसी समय गुरु माता वहाँ आईं।

     

    दोनों तुरंत शांत हो गए और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए।

     

    गुरु माता ने कहा, “तुम दोनों से एक काम है।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “बताइए माता।”

     

    गुरु माता ने एक कपड़े की छोटी पोटली उनकी ओर बढ़ाई।

     

    “इसमें कुछ भोजन है। जंगल के उस पार रहने वाले एक वृद्ध साधु कई दिनों से अस्वस्थ हैं। मैंने उनके लिए यह भोजन तैयार किया है। तुम दोनों यह उनके पास पहुँचा आओ।”

     

    सुदामा ने पोटली हाथ में ली।

     

    “हम अभी चले जाते हैं, माता।”

     

    गुरु माता ने कहा, “ध्यान रखना, जंगल का रास्ता लंबा है। इस बार देर मत करना।”

     

    कृष्ण ने सुदामा की ओर देखकर आँख दबाई।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “माता, मैं ध्यान रखूँगा।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “मतलब तुम मुझ पर ध्यान रखोगे।”

     

    दोनों ने गुरु माता का आशीर्वाद लिया और यात्रा पर निकल पड़े।

     

    सुबह का समय था।

     

    रास्ते में हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

     

    सुदामा के हाथ में भोजन की पोटली थी और कृष्ण एक पतली लकड़ी हाथ में घुमाते हुए चल रहे थे।

     

    कुछ दूरी चलने के बाद कृष्ण ने पूछा, “सुदामा, तुम्हें पता है इस पोटली में क्या है?”

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो खोलकर देख लेते हैं।”

     

    सुदामा ने तुरंत पोटली को पीछे कर लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह हमारे लिए नहीं है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं सिर्फ देखने की बात कर रहा हूँ।”

     

    “तुम्हें मैं जानता हूँ।”

     

    कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “क्या जानता हो?”

     

    “पहले तुम कहोगे सिर्फ देख लेते हैं, फिर कहोगे सिर्फ थोड़ा सा चख लेते हैं।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “तुम मुझे गलत समझते हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं, मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह समझता हूँ।”

     

    दोनों आगे बढ़ते रहे।

     

    जंगल में प्रवेश करते ही रास्ता थोड़ा कठिन हो गया।

     

    कुछ जगह पेड़ गिरे हुए थे। कहीं-कहीं घनी झाड़ियाँ थीं।

     

    लेकिन दोनों एक-दूसरे का साथ देते हुए आगे बढ़ते रहे।

     

    कुछ समय बाद कृष्ण ने कहा, “थोड़ी देर आराम कर लें?”

     

    सुदामा ने कहा, “हमारे पास समय कम है।”

     

    “थोड़ा सा आराम करने से समय नहीं रुक जाएगा।”

     

    “और चलते रहने से समय बढ़ भी नहीं जाएगा।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “तुम्हारे साथ बहस करना बहुत कठिन है।”

     

    “तो मत किया करो।”

     

    “लेकिन तुम्हारे बिना किससे करूँ?”

     

    सुदामा कुछ कह नहीं पाया।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए।

     

    सुदामा ने पोटली को अपने पास रख दिया।

     

    कृष्ण ने पोटली की ओर देखा।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “कृष्ण!”

     

    कृष्ण ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

     

    “मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हारी आँखें सब बता रही हैं।”

     

    “मेरी आँखें क्या कह रही हैं?”

     

    “कि तुम्हें भूख लगी है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले, “थोड़ी सी।”

     

    सुदामा ने अपनी छोटी पोटली निकाली।

     

    उसमें कुछ सूखे दाने थे, जो वह सुबह अपने साथ लेकर आया था।

     

    उसने उन्हें कृष्ण की ओर बढ़ाया।

     

    “लो।”

     

    कृष्ण ने पूछा, “और तुम?”

     

    “हम दोनों बाँटकर खाएँगे।”

     

    कृष्ण ने कुछ दाने लिए और बाकी सुदामा की ओर बढ़ा दिए।

     

    “तुम भी।”

     

    सुदामा ने कहा, “मैंने तुमसे कहा था, ये कम हैं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “जो चीज मित्र के साथ बाँटी जाए, वह कम नहीं लगती।”

     

    सुदामा को उनकी पुरानी बात याद आ गई।

     

    उसने कहा, “तुम यह बात पहले भी कह चुके हो।”

     

    कृष्ण ने हँसकर कहा, “अच्छी बातें दोहराने में क्या बुराई है?”

     

    कुछ देर बाद दोनों फिर चल पड़े।

     

    दोपहर होते-होते मौसम बदलने लगा।

     

    आसमान में बादल आ गए।

     

    सुदामा ने ऊपर देखा।

     

    “कृष्ण, लगता है बारिश आने वाली है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “इस बार हम रास्ता नहीं भूलेंगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “इस बार भूलना ही मत।”

     

    लेकिन कुछ ही समय बाद तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    सुदामा ने भोजन की पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

     

    “हमें जल्दी चलना चाहिए।”

     

    कृष्ण ने कहा, “हाँ।”

     

    दोनों तेज कदमों से आगे बढ़ने लगे।

     

    तभी रास्ते में एक बूढ़े व्यक्ति दिखाई दिए।

     

    वह एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    उनके कपड़े गीले हो चुके थे और वह बहुत कमजोर लग रहे थे।

     

    सुदामा तुरंत उनके पास गया।

     

    “बाबा, आप ठीक हैं?”

     

    वृद्ध ने कमजोर आवाज में कहा, “मैं कई घंटों से यहाँ बैठा हूँ। मेरे पैर में चोट लग गई है।”

     

    कृष्ण ने उनके पैर की ओर देखा।

     

    “आप अकेले हैं?”

     

    वृद्ध ने सिर हिला दिया।

     

    सुदामा ने चिंता से कृष्ण की ओर देखा।

     

    “हमें साधु के पास भी पहुँचना है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले, “पहले इनकी सहायता करते हैं।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन गुरु माता ने भोजन समय पर पहुँचाने को कहा था।”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “और अगर किसी जरूरतमंद को हमारे सामने सहायता चाहिए, तो क्या हम उसे छोड़कर आगे बढ़ जाएँ?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    उसे कृष्ण की बात सही लगी।

     

    दोनों ने वृद्ध को सहारा देकर सुरक्षित जगह बैठाया।

     

    सुदामा ने अपनी पोटली से थोड़ा पानी उन्हें दिया।

     

    कृष्ण ने आसपास से कुछ पत्ते और लकड़ी लाकर उनके पैर को सहारा दिया।

     

    बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    अब दोनों को चिंता होने लगी कि भोजन की पोटली भीग न जाए।

     

    सुदामा ने उसे अपने कपड़े के अंदर सुरक्षित कर लिया।

     

    कुछ देर बाद वृद्ध ने कहा, “तुम दोनों कौन हो?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “दो मित्र।”

     

    वृद्ध ने पूछा, “और कहाँ जा रहे हो?”

     

    सुदामा ने बताया कि वे गुरु माता के कहने पर भोजन लेकर जा रहे हैं।

     

    वृद्ध ने उनकी ओर ध्यान से देखा।

     

    “तुम दोनों पहले अपने काम पर जा सकते थे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “अगर हम ऐसा करते, तो हमारा काम अधूरा रहता।”

     

    वृद्ध की आँखों में चमक आ गई।

     

    उन्होंने कहा, “याद रखना, बेटा। दूसरों के लिए किया गया छोटा सा कार्य भी जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा बन सकता है।”

     

    कुछ समय बाद रास्ते से कुछ लोग गुजरे।

     

    कृष्ण और सुदामा ने उनसे वृद्ध की सहायता करने को कहा।

     

    अब दोनों फिर अपने रास्ते पर आगे बढ़े।

     

    लेकिन बारिश तेज हो चुकी थी।

     

    रास्ता कीचड़ से भर गया था।

     

    सुदामा कई बार फिसलते-फिसलते बचा।

     

    कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “धीरे चलो।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुमने ही तो जल्दी चलने को कहा था।”

     

    “जल्दी का मतलब उड़ना नहीं होता।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    कठिन रास्ते के बाद आखिरकार दोनों उस स्थान पर पहुँचे जहाँ वृद्ध साधु रहते थे।

     

    साधु एक छोटी सी कुटिया के बाहर बैठे थे।

     

    उन्हें देखकर सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    दोनों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

     

    “गुरु माता ने आपके लिए भोजन भेजा है।”

     

    साधु ने पोटली स्वीकार की।

     

    उन्होंने दोनों को ध्यान से देखा।

     

    “तुम दोनों बहुत देर से आए हो।”

     

    सुदामा तुरंत परेशान हो गया।

     

    “क्षमा कीजिए, रास्ते में…”

     

    कृष्ण ने कहा, “रास्ते में एक वृद्ध व्यक्ति घायल मिले थे। हम उनकी सहायता करने के लिए रुक गए।”

     

    साधु कुछ देर शांत रहे।

     

    फिर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “तो तुम देर से नहीं आए, पुत्रों। तुम सही समय पर पहुँचे।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

     

    साधु बोले, “जो व्यक्ति दूसरों की पीड़ा देखकर रुकना जानता है, वह जीवन का सबसे बड़ा पाठ सीख चुका होता है।”

     

    सुदामा के मन में खुशी हुई।

     

    लेकिन अब एक नई चिंता थी।

     

    शाम होने लगी थी।

     

    उन्हें वापस आश्रम पहुँचना था।

     

    दोनों जल्दी से वापस चल पड़े।

     

    रास्ते में सुदामा ने कहा, “कृष्ण, अगर गुरु माता हमसे नाराज़ हुईं तो?”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो हम सच बता देंगे।”

     

    “और अगर उन्होंने कहा कि हमें पहले अपना काम पूरा करना चाहिए था?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो हम उनसे सीखेंगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम हर बात को इतना आसान कैसे बना देते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि कठिन बातों को कठिन सोचते रहने से वे और कठिन हो जाती हैं।”

     

    दोनों चलते रहे।

     

    रात होने से पहले वे आश्रम पहुँच गए।

     

    गुरु माता उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।

     

    सुदामा का दिल तेजी से धड़क रहा था।

     

    “माता…”

     

    गुरु माता ने पूछा, “तुम दोनों देर से क्यों आए?”

     

    सुदामा कुछ कहता, उससे पहले कृष्ण ने सारी बात सच-सच बता दी।

     

    गुरु माता ध्यान से सुनती रहीं।

     

    सुदामा सिर झुकाए खड़ा रहा।

     

    कुछ क्षणों तक वहाँ शांति रही।

     

    फिर गुरु माता ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम दोनों ने आज वही किया, जो एक सच्चे विद्यार्थी को करना चाहिए।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।

     

    उस रात दोनों आश्रम के बाहर बैठे थे।

     

    आसमान साफ हो चुका था।

     

    तारे चमक रहे थे।

     

    सुदामा ने कहा, “आज अगर तुम न होते तो शायद मैं उस वृद्ध की सहायता किए बिना आगे बढ़ जाता।”

     

    कृष्ण ने कहा, “और अगर तुम न होते, तो शायद मैं उसे अकेले सहारा नहीं दे पाता।”

     

    सुदामा ने पूछा, “तुम हमेशा मुझे अपने बराबर क्यों समझते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मित्रता में बराबरी नहीं समझनी पड़ती, सुदामा। मित्र बस मित्र होता है।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसने धीरे से कहा, “मैं हमेशा तुम्हारा मित्र रहूँगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जानता हूँ।”

     

    दोनों कुछ देर तक शांत बैठे रहे।

     

    उन्हें नहीं पता था कि समय धीरे-धीरे उन्हें उनके जीवन की अलग-अलग राहों की ओर ले जा रहा था।

     

    अभी उनके पास साथ बिताने के लिए कई दिन थे।

     

    कई बातें थीं।

     

    कई यादें थीं।

     

    लेकिन एक दिन ऐसा भी आने वाला था, जब गुरुकुल की शिक्षा पूरी होगी और दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना पड़ेगा।

     

    और उस दिन…

     

    उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होगी।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Part 2 मित्रता की पहली परीक्षा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    अध्याय 2 — गुरुकुल के दिन और मित्रता की पहली परीक्षा

     

    गुरुकुल में कृष्ण और सुदामा की मित्रता दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही थी।

     

    अब ऐसा शायद ही कोई दिन गुजरता, जब दोनों एक साथ न दिखाई दें। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना हो, नदी से जल भरकर लाना हो, आश्रम की सफाई करनी हो या गुरु सांदीपनि के सामने बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी हो—दोनों हर काम साथ करते थे।

     

    हालाँकि दोनों के स्वभाव बिल्कुल अलग थे।

     

    सुदामा शांत और गंभीर था। वह हर बात को सोच-समझकर करता था। उसे नियमों का पालन करना पसंद था। दूसरी ओर कृष्ण हर काम में मुस्कान ढूँढ लेते थे। उनके भीतर एक अलग ही चंचलता थी। लेकिन जब बात किसी अपने की आती, तो वही चंचल कृष्ण सबसे अधिक गंभीर हो जाते थे।

     

    एक सुबह सुदामा नदी से जल भरकर लौट रहा था। उसके हाथ में मिट्टी का घड़ा था। रास्ता थोड़ा फिसलन भरा था। अचानक उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह संभलते-संभलते जमीन पर गिर गया।

     

    घड़ा उसके हाथ से छूटकर टूट गया।

     

    सुदामा कुछ क्षण वहीं बैठा रह गया।

     

    उसे घड़े के टूटने का दुख कम था, लेकिन उसे डर था कि अब उसे आश्रम लौटकर क्या कहना होगा।

     

    तभी पीछे से कृष्ण की आवाज आई।

     

    “सुदामा!”

     

    सुदामा ने मुड़कर देखा। कृष्ण दौड़ते हुए उसके पास आ रहे थे।

     

    “तुम ठीक तो हो?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “हाँ, मैं ठीक हूँ।”

     

    कृष्ण ने टूटे हुए घड़े की ओर देखा।

     

    “और यह?”

     

    “यह ठीक नहीं है,” सुदामा ने उदास होकर कहा।

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    सुदामा ने उन्हें घूरकर देखा।

     

    “तुम्हें हँसी आ रही है?”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “नहीं, मुझे तुम्हारा चेहरा देखकर हँसी आ रही है। तुम ऐसे परेशान हो जैसे पूरे आश्रम का जल समाप्त हो गया हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “गुरु माता ने मुझे घड़ा संभालकर लाने को कहा था।”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तो चलो, नया घड़ा लेते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन क्या?”

     

    “अगर किसी ने पूछा कि पुराना घड़ा कैसे टूटा?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “तो सच बता देना।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “कभी-कभी सच बोलना आसान नहीं होता।”

     

    कृष्ण का चेहरा शांत हो गया।

     

    उन्होंने कहा, “सुदामा, सच बोलने के बाद मिलने वाली डाँट कुछ समय के लिए होती है, लेकिन झूठ बोलने का बोझ मन पर बहुत समय तक रहता है।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    उसे लगा जैसे कृष्ण उससे उम्र में छोटे नहीं, बल्कि बहुत अधिक समझदार हों।

     

    दोनों वापस आश्रम आए और गुरु माता को सब बता दिया।

     

    गुरु माता ने पहले सुदामा को ध्यान से देखा, फिर कृष्ण को।

     

    “तुम दोनों ने सच बताया, इसलिए मैं नाराज़ नहीं हूँ। अगली बार सावधान रहना।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    आश्रम से बाहर आते ही कृष्ण ने कहा, “देखा? मैंने कहा था ना, सच बोलने से मन हल्का हो जाता है।”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “लेकिन तुमने मुझे पहले ही डराना क्यों शुरू कर दिया था?”

     

    कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “मैंने कब डराया?”

     

    “तुम्हारी बातें सुनकर लगता है जैसे तुम सब कुछ पहले से जानते हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए और आगे बढ़ गए।

     

    “अगर मैं सब कुछ जानता होता, तो तुम्हारा घड़ा टूटने से पहले तुम्हें रोक देता।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    उस दिन के बाद सुदामा ने महसूस किया कि कृष्ण केवल उसके मित्र नहीं थे। वह उसके जीवन में एक ऐसे साथी बनते जा रहे थे, जिनसे वह अपनी हर बात कह सकता था।

     

    लेकिन गुरुकुल का जीवन केवल हँसी और खेल का नाम नहीं था।

     

    वहाँ हर दिन कुछ नया सीखना पड़ता था।

     

    एक दिन गुरु सांदीपनि सभी शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे।

     

    उन्होंने कहा, “मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका धन, शक्ति या परिवार नहीं होता। उसकी सबसे बड़ी पहचान उसके कर्म होते हैं।”

     

    एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, अगर कोई व्यक्ति बहुत गरीब हो, तो क्या लोग उसे हमेशा छोटा समझेंगे?”

     

    सुदामा अचानक चुप हो गया।

     

    उसे लगा जैसे यह प्रश्न उसके अपने मन का हो।

     

    गुरु सांदीपनि ने उत्तर दिया, “गरीबी किसी मनुष्य को छोटा नहीं बनाती। छोटा मनुष्य तब बनता है, जब उसके विचार छोटे हो जाते हैं।”

     

    कृष्ण ने धीरे से सुदामा की ओर देखा।

     

    सुदामा ने नजरें नीचे कर लीं।

     

    पाठ समाप्त होने के बाद कृष्ण उसके पास आए।

     

    “तुम कुछ सोच रहे हो?”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम जब भी दुखी होते हो, यही कहते हो।”

     

    सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “कृष्ण, क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि हम दोनों बहुत अलग हैं?”

     

    कृष्ण ने पूछा, “किस बात में?”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हारे पास सब कुछ है। तुम्हारा परिवार बड़ा है। लोग तुम्हें प्रेम करते हैं। और मैं…”

     

    वह रुक गया।

     

    कृष्ण ने कहा, “और तुम मेरे मित्र हो।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में कौन बड़ा और कौन छोटा होता है?”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोला।

     

    कृष्ण आगे बोले, “अगर तुम्हारे पास धन नहीं है, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे पास कुछ नहीं है। तुम्हारे पास एक सच्चा मन है, ज्ञान पाने की इच्छा है और अपने मित्र के लिए प्रेम है। क्या यह कम है?”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसने धीरे से कहा, “तुम्हारी बातें सुनकर सब आसान लगने लगता है।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “तो फिर तुम रोज मुझसे बातें किया करो।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    कुछ दिन बाद गुरु माता ने कृष्ण और सुदामा को अपने पास बुलाया।

     

    उनके चेहरे पर चिंता थी।

     

    “आश्रम के लिए कुछ सूखी लकड़ियों की आवश्यकता है। जंगल से लकड़ियाँ लानी होंगी।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “हम दोनों जाएँगे।”

     

    सुदामा ने भी सिर हिला दिया।

     

    गुरु माता ने कहा, “जंगल थोड़ा दूर है। समय पर लौट आना।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “चिंता मत कीजिए, माता।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे पता था कि जब भी कृष्ण कहते हैं कि चिंता मत कीजिए, तब कुछ न कुछ जरूर होने वाला होता है।

     

    दोनों सुबह-सुबह जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    रास्ते भर कृष्ण बातें करते रहे।

     

    कभी किसी पक्षी की आवाज की नकल करते, कभी पेड़ पर लगे फलों को देखकर अनुमान लगाते कि कौन सा फल मीठा होगा।

     

    सुदामा ने कहा, “कृष्ण, हम लकड़ियाँ लेने जा रहे हैं या घूमने?”

     

    कृष्ण ने कहा, “दोनों काम साथ-साथ हो सकते हैं।”

     

    “लेकिन गुरु माता ने कहा था कि जल्दी लौटना है।”

     

    “तो जल्दी लौटेंगे।”

     

    “तुम्हारे लिए जल्दी का मतलब क्या है?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “जब तुम परेशान होने लगो।”

     

    सुदामा ने सिर पकड़ लिया।

     

    जंगल पहुँचने के बाद दोनों सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।

     

    कुछ ही समय में उनके पास काफी लकड़ियाँ हो गईं।

     

    सुदामा ने कहा, “अब चलें?”

     

    कृष्ण ने कहा, “बस थोड़ी और।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुमने यही बात आधा समय पहले भी कही थी।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी आसमान में अचानक काले बादल छा गए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    सुदामा ने ऊपर देखा।

     

    “कृष्ण, मुझे लगता है बारिश आने वाली है।”

     

    कुछ ही क्षणों में तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों ने लकड़ियों को एक साथ बाँधा और पेड़ों के बीच सुरक्षित जगह ढूँढने लगे।

     

    लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि रास्ता दिखाई देना मुश्किल हो गया।

     

    कुछ समय बाद दोनों को एहसास हुआ कि वे आश्रम का रास्ता भूल चुके हैं।

     

    सुदामा घबरा गया।

     

    “अब क्या होगा?”

     

    कृष्ण ने कहा, “कुछ नहीं होगा।”

     

    “लेकिन हमें रास्ता नहीं पता।”

     

    “तो रास्ता ढूँढेंगे।”

     

    “और अगर रात हो गई?”

     

    “तो सुबह होने तक इंतजार करेंगे।”

     

    “और अगर कोई जंगली जानवर आ गया?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा, “तुम एक ही बार में इतनी सारी चिंताएँ कहाँ से ढूँढ लेते हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “क्योंकि तुम बिल्कुल चिंता नहीं करते।”

     

    कृष्ण कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले, “सुदामा, चिंता और सावधानी में अंतर होता है। सावधान रहना जरूरी है, लेकिन हर समय डरते रहना हमें कमजोर कर देता है।”

     

    बारिश लगातार हो रही थी।

     

    दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

     

    ठंडी हवा चल रही थी।

     

    सुदामा काँपने लगा।

     

    कृष्ण ने अपनी ओर का कपड़ा उसके कंधों पर रख दिया।

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं, तुम्हें ठंड लगेगी।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में हिसाब नहीं रखा जाता।”

     

    सुदामा कुछ कह पाता, उससे पहले तेज हवा चली और उनके ऊपर की कुछ सूखी शाखाएँ टूटकर नीचे गिर गईं।

     

    दोनों पीछे हट गए।

     

    अब जंगल और भी डरावना लगने लगा।

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “कृष्ण, मुझे डर लग रहा है।”

     

    कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो मेरा हाथ मत छोड़ना।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    धीरे-धीरे शाम होने लगी।

     

    आसमान अंधेरा हो गया।

     

    आश्रम में गुरु सांदीपनि और गुरु माता दोनों चिंतित थे।

     

    “दोनों अभी तक लौटे नहीं,” गुरु माता ने कहा।

     

    गुरु सांदीपनि ने कुछ शिष्यों को बुलाया।

     

    “तुम लोग उन्हें खोजने जाओ।”

     

    उधर जंगल में कृष्ण और सुदामा एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    सुदामा ने अपना सिर पेड़ से टिकाया।

     

    “अगर हम आज वापस नहीं पहुँचे तो?”

     

    कृष्ण ने कहा, “हम पहुँचेंगे।”

     

    “तुम्हें इतना विश्वास कैसे है?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ। तुम मेरे साथ हो।”

     

    सुदामा की आँखों में हल्की मुस्कान आ गई।

     

    कुछ देर बाद उसने कहा, “और मैं इसलिए नहीं डर रहा क्योंकि तुम मेरे साथ हो।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो फिर हम दोनों ठीक हैं।”

     

    रात बीतती रही।

     

    दोनों ने एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।

     

    सुबह होने के कुछ समय बाद आश्रम के शिष्यों की आवाज सुनाई दी।

     

    “कृष्ण! सुदामा!”

     

    सुदामा तुरंत खड़ा हो गया।

     

    “वे हमें ढूँढ रहे हैं!”

     

    कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि स्वयं वहाँ पहुँच गए।

     

    उन्होंने दोनों को देखा।

     

    “तुम दोनों ठीक हो?”

     

    कृष्ण और सुदामा ने एक साथ सिर हिलाया।

     

    गुरु सांदीपनि ने उन्हें अपने पास बुलाया।

     

    “तुम दोनों पूरी रात यहाँ रहे?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ, गुरुदेव।”

     

    गुरु ने पूछा, “डर नहीं लगा?”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    फिर मुस्कुराकर कहा, “लगा था… लेकिन मैं अकेला नहीं था।”

     

    कृष्ण ने भी सुदामा की ओर देखा।

     

    गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।

     

    उस दिन आश्रम लौटते समय सुदामा के मन में एक बात हमेशा के लिए बस गई।

     

    जीवन में कितनी भी कठिन राह क्यों न हो…

     

    अगर साथ में एक सच्चा मित्र हो, तो डर आधा हो जाता है।

     

    लेकिन सुदामा नहीं जानता था कि आने वाले दिनों में उसकी और कृष्ण की मित्रता को एक और बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा।

     

    एक ऐसी घटना…

     

    जिसे वर्षों बाद भी सुदामा भूल नहीं पाएगा।

     

    और शायद वही घटना उनके बीच की मित्रता को हमेशा के लिए अमर कर देगी।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • श्री कृष्ण ओर सुदामा की मित्रता की कहानी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अध्याय 1 — दो मित्रों की पहली मुलाकात

    बहुत समय पहले की बात है। भारत की धरती पर अनेक छोटे-बड़े राज्य बसे हुए थे। उन्हीं दिनों दो ऐसे बालक थे, जिनकी जिंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी। एक ओर थे द्वारका के भावी नायक, वसुदेव और देवकी के पुत्र श्री कृष्ण, जिनका बचपन गोकुल और वृंदावन की गलियों में बीता था। दूसरी ओर था एक साधारण ब्राह्मण बालक—सुदामा।

     

    सुदामा का जीवन बहुत साधारण था। उसके पास धन-दौलत नहीं थी, न ही सुंदर वस्त्र और न ही कोई बड़ा घर। लेकिन उसके पास एक बहुत बड़ी चीज थी—ज्ञान पाने की इच्छा और एक सच्चा, निर्मल हृदय।

     

    जब सुदामा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसके माता-पिता ने सोचा कि उसे शिक्षा के लिए एक अच्छे गुरु के आश्रम में भेजना चाहिए। उस समय गुरुकुल में शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती थी। वहाँ बच्चों को जीवन जीना, मेहनत करना, बड़ों का सम्मान करना और हर परिस्थिति में धैर्य रखना भी सिखाया जाता था।

     

    इसलिए एक दिन सुदामा अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर गुरु सांदीपनि के आश्रम की ओर चल पड़ा।

     

    उसके पास सामान के नाम पर बहुत कम चीजें थीं। एक छोटा सा कपड़े का थैला, पहनने के लिए साधारण वस्त्र और मन में ज्ञान पाने का सपना।

     

    कई दिनों की यात्रा के बाद वह आश्रम पहुँचा।

     

    आश्रम प्रकृति के बीच बसा हुआ था। वहाँ अनेक बालक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। कोई जल भर रहा था, कोई लकड़ियाँ ला रहा था और कोई गुरु के सामने बैठकर पाठ सीख रहा था।

     

    सुदामा ने आश्रम में प्रवेश किया और गुरु सांदीपनि के सामने जाकर हाथ जोड़ दिए।

     

    “गुरुदेव, मैं आपके पास शिक्षा प्राप्त करने आया हूँ।”

     

    गुरु सांदीपनि ने उस दुबले-पतले बालक को ध्यान से देखा।

     

    “तुम्हारा नाम क्या है, पुत्र?”

     

    “सुदामा।”

     

    “और तुम शिक्षा क्यों प्राप्त करना चाहते हो?”

     

    सुदामा ने बिना देर किए उत्तर दिया, “ताकि मैं ज्ञानवान बन सकूँ और जीवन में सही मार्ग पर चल सकूँ।”

     

    गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।

     

    “ज्ञान केवल पढ़ने से नहीं मिलता, सुदामा। ज्ञान पाने के लिए मन को भी सच्चा रखना पड़ता है।”

     

    सुदामा ने सिर झुका दिया।

     

    “मैं प्रयास करूँगा, गुरुदेव।”

     

    उसी दिन सुदामा को आश्रम में रहने की अनुमति मिल गई।

     

    उस शाम वह अपने नए स्थान को समझने की कोशिश कर रहा था। बहुत से बालक आपस में पहले से मित्र थे। कोई खेल रहा था, कोई बातें कर रहा था। सुदामा थोड़ा संकोची स्वभाव का था। वह चुपचाप एक पेड़ के पास बैठ गया।

     

    तभी उसके पास एक बालक आया।

     

    उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान थी। उसकी आँखों में शरारत भी थी और एक अजीब सी अपनापन भी।

     

    उसने सुदामा के पास बैठते हुए पूछा, “तुम नए आए हो?”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “नाम?”

     

    “सुदामा।”

     

    बालक मुस्कुराया।

     

    “मैं कृष्ण हूँ।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम भी आज ही आए हो?”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “नहीं, लेकिन हर दिन नया ही लगता है।”

     

    सुदामा को उसका उत्तर समझ नहीं आया, लेकिन वह मुस्कुरा दिया।

     

    कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

     

    फिर कृष्ण ने सुदामा के कपड़ों की ओर देखा। वे साधारण और पुराने थे। सुदामा को लगा कि शायद अब यह बालक भी उसका मजाक उड़ाएगा, जैसे कई बच्चे कभी-कभी करते थे।

     

    लेकिन कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने अपने पास रखा फल निकालकर सुदामा की ओर बढ़ाया।

     

    “भूख लगी है?”

     

    सुदामा ने संकोच से कहा, “नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “अगर तुम्हें नहीं चाहिए तो मैं अकेले खा लूँगा। लेकिन फिर मुझे बहुत बुरा लगेगा।”

     

    सुदामा उनकी बात सुनकर हँस पड़ा।

     

    “तुम अजीब हो।”

     

    “और तुम बहुत चुप रहते हो,” कृष्ण ने तुरंत कहा।

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    शायद उसी छोटी सी हँसी के साथ एक ऐसी मित्रता की शुरुआत हुई, जो समय के साथ और गहरी होने वाली थी।

     

    अगले दिन से दोनों का साथ बढ़ने लगा।

     

    सुबह जल्दी उठना, नदी से जल लाना, आश्रम की सफाई करना, गुरु के पास बैठकर शिक्षा लेना—धीरे-धीरे दोनों हर काम साथ करने लगे।

     

    कृष्ण किसी भी काम को बोझ की तरह नहीं लेते थे।

     

    एक दिन गुरु माता ने सभी बालकों से कहा कि आश्रम के लिए जंगल से सूखी लकड़ियाँ लेकर आनी हैं।

     

    कई बालक अपने-अपने साथियों के साथ जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    कृष्ण ने सुदामा से कहा, “चलो, हम भी चलते हैं।”

     

    सुदामा ने लकड़ियाँ बाँधने के लिए रस्सी उठाई और दोनों जंगल की ओर चल पड़े।

     

    रास्ते में कृष्ण कभी पेड़ों को देखते, कभी पक्षियों की आवाज सुनते और कभी कोई मजेदार बात कह देते।

     

    सुदामा ने पूछा, “तुम हर समय इतने खुश कैसे रहते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि दुख आने से पहले ही अगर हम दुखी हो जाएँ, तो खुशी कब मिलेगी?”

     

    सुदामा कुछ देर तक उस बात को सोचता रहा।

     

    जंगल पहुँचकर दोनों लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।

     

    कुछ समय बाद अचानक आसमान में बादल घिर आए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    सुदामा ने चिंतित होकर कहा, “कृष्ण, हमें जल्दी वापस चलना चाहिए।”

     

    लेकिन देखते ही देखते बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

     

    बारिश तेज होती जा रही थी।

     

    सुदामा ने अपने छोटे से कपड़े के थैले को सीने से लगा लिया।

     

    कृष्ण ने पूछा, “उसमें क्या है?”

     

    सुदामा थोड़ा घबरा गया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण ने शरारत से कहा, “कुछ नहीं है तो इतनी मजबूती से क्यों पकड़ा हुआ है?”

     

    सुदामा चुप रहा।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “अच्छा, ठीक है। मत बताओ।”

     

    कुछ देर बाद सुदामा ने धीरे से कहा, “मेरी माँ ने रास्ते के लिए थोड़े से चने दिए हैं।”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो हम दोनों मिलकर खाएँगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन ये बहुत कम हैं।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “जो चीज प्रेम से बाँटी जाए, वह कभी कम नहीं होती।”

     

    सुदामा ने थैले से चने निकाले और दोनों ने उन्हें बाँटकर खा लिया।

     

    उस दिन पहली बार सुदामा ने महसूस किया कि उसके सामने बैठा यह मित्र दूसरे लोगों से अलग है।

     

    कृष्ण ने कभी उससे यह नहीं पूछा कि वह गरीब क्यों है।

     

    कभी उसके कपड़ों पर हँसे नहीं।

     

    कभी यह नहीं कहा कि उसके पास क्या नहीं है।

     

    वह बस उसके साथ रहते थे।

     

    बारिश कम हुई तो दोनों आश्रम लौट आए।

     

    लेकिन आश्रम पहुँचने पर पता चला कि गुरु माता चिंतित थीं।

     

    “तुम दोनों कहाँ रह गए थे?”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “माता, जंगल में बारिश आ गई थी।”

     

    कृष्ण तुरंत बोले, “गलती मेरी है। मैं रास्ते में बातें करता रहा और हमें देर हो गई।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे पता था कि कृष्ण ऐसा क्यों कह रहे हैं।

     

    वह अपने मित्र को डाँट से बचाने की कोशिश कर रहे थे।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “नहीं, माता। गलती हम दोनों की है।”

     

    गुरु माता ने दोनों को देखा।

     

    फिर मुस्कुराते हुए कहा, “मित्रता में एक-दूसरे का साथ देना अच्छी बात है, लेकिन सच्चाई से दूर नहीं जाना चाहिए।”

     

    दोनों ने सिर झुका दिया।

     

    उस रात सुदामा देर तक सो नहीं सका।

     

    कृष्ण उसके पास ही लेटे हुए थे।

     

    सुदामा ने धीरे से पूछा, “कृष्ण?”

     

    “हूँ?”

     

    “अगर एक दिन हम दोनों अलग हो गए तो?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “सच्चे मित्र पास रहने से मित्र नहीं होते, सुदामा। अगर मन में प्रेम और विश्वास हो, तो दूरी भी मित्रता को अलग नहीं कर सकती।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहता।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो मत भूलना।”

     

    “और तुम?”

     

    “मैं भी नहीं भूलूँगा।”

     

    सुदामा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उसे नहीं पता था कि आने वाले वर्षों में जीवन दोनों को कितनी दूर ले जाएगा।

     

    उसे यह भी नहीं पता था कि एक दिन यही कृष्ण एक महान राजा के रूप में पहचाने जाएँगे और वह स्वयं कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताएगा।

     

    लेकिन उस समय…

     

    वे दोनों केवल दो बालक थे।

     

    एक साधारण ब्राह्मण पुत्र।

     

    और दूसरा उसका प्यारा मित्र कृष्ण।

     

    अगली सुबह सूर्य की किरणों के साथ दोनों फिर से आश्रम के कार्यों में लग गए।

     

    उन्हें नहीं पता था कि उनकी मित्रता की असली परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि दोनों को एक ऐसा कार्य सौंपने वाले थे, जो उनकी दोस्ती को और गहरा कर देगा।

     

    और उस दिन सुदामा को पहली बार समझ आएगा कि कृष्ण केवल एक अच्छे मित्र ही नहीं…

     

    बल्कि एक ऐसे साथी हैं, जो हर कठिन समय में उसका हाथ थामकर खड़े रहेंगे।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

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  • श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता

    श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग = 1 “जिस दिन नंदलाल ने गोकुल में कदम रखा”

    🌸 एक ऐसी शुरुआत, जहाँ जन्म लेता है सिर्फ़ एक बालक नहीं… बल्कि पूरी दुनिया का विश्वास! 🌸

    गोकुल की उस सुबह में कुछ अलग ही बात थी। सूरज रोज़ की तरह ही निकला था, यमुना की लहरें भी रोज़ की तरह ही बह रही थीं, गायों की घंटियाँ भी वही मधुर संगीत सुना रही थीं, लेकिन फिर भी वातावरण में एक अनजानी-सी खुशी तैर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति स्वयं किसी बहुत बड़े उत्सव की तैयारी कर रही हो। पेड़ों पर बैठे पक्षी बिना किसी कारण चहचहा रहे थे, फूल अपनी खुशबू पहले से कहीं अधिक बिखेर रहे थे और यमुना का जल भी जैसे आज कुछ ज्यादा ही शांत था। किसी को पता नहीं था कि आज से संसार की एक ऐसी कथा शुरू होने वाली है। जिसे युगों-युगों तक प्रेम, भक्ति और धर्म के नाम से याद किया जाएगा। मथुरा की जेल में देवकी और वसुदेव के जीवन की सबसे कठिन रात चल रही थी। कंस का अत्याचार अपनी सीमा पार कर चुका था। देवकी की आँखों में आँसू थे।

     

    लेकिन उन आँसुओं के पीछे एक अद्भुत विश्वास भी था। उन्हें पता था कि उनके गर्भ में पल रहा बालक साधारण नहीं है। वही बालक कंस के अत्याचार का अंत करने वाला था। आधी रात का समय हुआ। चारों ओर घना अंधकार था। अचानक जेल की कोठरी दिव्य प्रकाश से भर उठी। देवकी और वसुदेव ने देखा कि उनके सामने स्वयं भगवान श्रीहरि का दिव्य रूप प्रकट हुआ है। उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जिसे देखकर भय भी जैसे अपना रास्ता भूल जाए। भगवान ने वसुदेव से कहा कि वे उन्हें लेकर गोकुल जाएँ और वहाँ नंद बाबा के घर जन्मी कन्या को लेकर वापस लौट आएँ। वसुदेव ने अपने नवजात पुत्र को टोकरी में रखा और जैसे ही जेल से बाहर निकलने का प्रयास किया, चमत्कार होने लगे। जिन दरवाजों पर भारी पहरे थे, वे अपने आप खुलते चले गए। पहरेदार गहरी नींद में सो गए। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं समय भी उस बालक के मार्ग में झुक गया हो। वसुदेव अपने सिर पर नन्हे कृष्ण को लेकर यमुना की ओर बढ़े। उस रात बारिश बहुत तेज़ थी। बादल गरज रहे थे और बिजली आकाश को चीर रही थी। वसुदेव के कदम डगमगा रहे थे, लेकिन उनके मन में केवल एक ही बात थी।

     

    “मुझे अपने लाल को सुरक्षित गोकुल पहुँचाना है।” जैसे ही वे यमुना के पास पहुँचे, नदी उफान पर थी। वसुदेव ने कृष्ण को और मजबूती से थाम लिया और धीरे-धीरे पानी में उतर गए। तभी एक अद्भुत दृश्य हुआ। शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर बाल कृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया। बारिश की बूंदें कृष्ण तक पहुँचने से पहले ही उस दिव्य छत्र पर गिरने लगीं। यमुना भी जैसे अपने आराध्य को पहचान गई। उसका जल धीरे-धीरे शांत होने लगा। वसुदेव आगे बढ़ते गए और अंततः गोकुल पहुँच गए। वहाँ नंद बाबा के घर सब लोग गहरी नींद में थे। वसुदेव ने चुपचाप कृष्ण को यशोदा माता के पास सुलाया और वहाँ जन्मी कन्या को अपने साथ लेकर वापस मथुरा लौट गए। किसी को पता तक नहीं चला कि उसी रात गोकुल की धरती पर स्वयं प्रेम ने जन्म लिया है। सुबह होते ही गोकुल में अचानक शंख, नगाड़े और ढोल बजने लगे। नंद बाबा के घर पुत्र जन्म की खबर फैल चुकी थी। “नंद के घर आनंद भयो!” की आवाज़ हर गली में गूँज उठी। गोपियाँ अपने घरों से दौड़ती हुई नंद भवन की ओर आने लगीं। किसी के हाथ में दही था।

     

     

    किसी के हाथ में मक्खन, कोई फूल लेकर आई थी तो कोई बालक के लिए नए वस्त्र। यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लेकर बस निहारती ही रह गईं। उनके लिए संसार में उस समय सबसे सुंदर कोई था तो वह उनका नन्हा कान्हा था। बाल कृष्ण की आँखें बंद थीं और उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। यशोदा ने प्यार से उनके माथे को चूमा और कहा, “मेरे लाल, तू हमेशा ऐसे ही मुस्कुराता रहना।” उन्हें क्या पता था कि जिस बालक को वे अपना बेटा समझकर गोद में झुला रही हैं, वही आने वाले समय में लाखों दिलों का सहारा बनने वाला है। गोकुल में उत्सव शुरू हो गया। नंद बाबा ने पूरे गाँव में मिठाइयाँ बँटवाईं। गोप-ग्वाल बालक नाचने लगे। गोपियाँ गीत गाने लगीं। हर तरफ़ रंग, फूल और खुशियाँ थीं। लेकिन इसी खुशी के बीच मथुरा में कंस को जैसे किसी अनहोनी का एहसास हो गया। उसे खबर मिली कि देवकी के घर आठवीं संतान का जन्म हो चुका है। कंस तुरंत जेल की ओर दौड़ा। उसके चेहरे पर क्रोध था। उसने नवजात कन्या को देखा और उसे समाप्त करने के लिए उसे ऊपर उठाया। लेकिन तभी वह कन्या उसके हाथों से छूटकर आकाश में दिव्य रूप में प्रकट हो गई। उसने कंस को चेतावनी दी कि “जिससे तू डरता है, वह जन्म ले चुका है और वह तेरे अंत का कारण बनेगा।” कंस के चेहरे का रंग उड़ गया। अब उसका डर और भी बढ़ गया। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे गोकुल और आसपास के सभी गाँवों में जन्मे नवजात बालकों पर नज़र रखें। उधर गोकुल में कृष्ण की बाल लीलाएँ शुरू हो चुकी थीं। कोई उन्हें नंदलाल कहता। 

     

    कोई कान्हा, कोई माखनचोर, तो कोई लड्डू गोपाल। यशोदा मैया का पूरा संसार ही अपने कान्हा के इर्द-गिर्द घूमने लगा। कृष्ण धीरे-धीरे बड़े होने लगे। उनकी शरारतें पूरे गोकुल में प्रसिद्ध होने लगीं। कभी वे किसी के घर से माखन चुरा लेते, कभी गोपियों की मटकी छिपा देते, कभी ग्वाल-बालों के साथ मिलकर ऐसी शरारत करते कि पूरा गाँव हँसने लगता। एक दिन कई गोपियाँ शिकायत लेकर यशोदा मैया के पास पहुँचीं। “मैया! आपका कान्हा हमारे घर से माखन चुरा ले जाता है।” यशोदा ने कृष्ण को देखा और पूछा, “कान्हा, तूने माखन चुराया?” कृष्ण ने मासूमियत से सिर हिलाया, “नहीं मैया!” एक गोपी तुरंत बोली, “मैया, इसके मुँह पर माखन लगा है!” कृष्ण ने तुरंत अपना मुँह पोंछा और बोले, “मैया, ये तो बिल्ली ने लगाया होगा!” यह सुनते ही सब गोपियाँ हँस पड़ीं। यशोदा भी अपनी हँसी रोक नहीं पाईं। लेकिन कान्हा की शरारत यहीं नहीं रुकी। अगले दिन उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर एक योजना बनाई। माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर टंगी थी। ग्वाल-बाल एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते गए और सबसे ऊपर कृष्ण जा पहुँचे। उन्होंने मटकी उतारी और सबको माखन बाँट दिया। कुछ माखन बंदरों को भी खिला दिया। तभी पीछे से एक आवाज़ आई।

     

    “कान्हा!” कृष्ण ने पलटकर देखा। सामने यशोदा मैया खड़ी थीं। सब ग्वाल-बाल भाग गए, लेकिन कृष्ण वहीं खड़े रहे। यशोदा ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोलीं, “आज तो तुझे पकड़ ही लिया।” कृष्ण ने मासूम बनकर कहा, “मैया, मैंने क्या किया?” यशोदा बोलीं, “माखन चोरी!” कृष्ण मुस्कुराकर बोले, “मैया, माखन तो आपका है, मैं भी तो आपका हूँ… फिर चोरी कैसी?” यशोदा के चेहरे पर मुस्कान आ गई, लेकिन उन्होंने दिखावे के लिए डाँटते हुए कहा, “बहुत बातें बनाने लगे हो!” कृष्ण की आँखों में शरारत चमकी। वह भागने लगे और यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं। पूरा गोकुल इस दृश्य को देखकर मुस्कुराने लगा। लेकिन कृष्ण की हर लीला के पीछे कोई न कोई गहरा रहस्य छिपा था। वे सिर्फ़ माखन नहीं चुराते थे, वे तो अपने भक्तों के हृदय चुरा लेते थे। उनका बचपन जितना मासूम था, उतना ही अद्भुत भी। गोकुल के लोगों को अभी अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके बीच पल रहा यह नन्हा बालक आगे चलकर कितनी बड़ी-बड़ी लीलाएँ करने वाला है। एक दिन गोकुल के बच्चों ने कृष्ण से शिकायत की कि उन्होंने मिट्टी खाई है। वे दौड़कर यशोदा मैया के पास गए और बोले, “मैया! कान्हा ने मिट्टी खाई है।” यशोदा ने कृष्ण से पूछा, “क्या तूने मिट्टी खाई?” कृष्ण ने तुरंत कहा, “नहीं मैया, मैंने कुछ नहीं खाया।” लेकिन बच्चों ने ज़ोर देकर कहा, “हमने अपनी आँखों से देखा है!” यशोदा ने कहा, “कान्हा, मुँह खोल!” कृष्ण ने धीरे से अपना मुँह खोला। और तभी यशोदा मैया स्तब्ध रह गईं। उन्हें कृष्ण के मुँह में मिट्टी नहीं, बल्कि पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया। आकाश, चंद्रमा, सूर्य, पर्वत, नदियाँ, धरती—सब कुछ उसी छोटे-से मुँह में दिखाई दे रहा था। यशोदा की आँखें आश्चर्य से भर गईं। एक पल के लिए उन्हें लगा कि उनका कान्हा कोई साधारण बालक नहीं है। लेकिन अगले ही क्षण ममता ने उनके सारे विचारों पर पर्दा डाल दिया। उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। कृष्ण ने अपनी नन्ही बाहों से माँ को पकड़ लिया। उस क्षण भगवान और भक्त के बीच का सबसे सुंदर रिश्ता दिखाई दे रहा था। जहाँ भगवान स्वयं माँ के प्रेम के आगे बालक बन जाते हैं। उधर कंस को लगातार कृष्ण के जीवित होने की चिंता सताने लगी थी। उसने कई असुरों को गोकुल भेजना शुरू किया। उसका उद्देश्य केवल एक था। कृष्ण को किसी भी तरह समाप्त करना। लेकिन हर बार कृष्ण अपनी बाल लीला से उस संकट को टाल देते। गोकुल वालों को धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि उनके कान्हा में कोई दिव्य शक्ति है। फिर भी उनके लिए वह भगवान से पहले उनका अपना था। नंद का लाल, यशोदा का कान्हा, ग्वाल-बालों का मित्र और गोपियों की आँखों का तारा। शाम होते ही जब कृष्ण गायों के साथ लौटते, तो पूरा गोकुल उनकी बाँसुरी की धुन सुनने के लिए जैसे ठहर जाता। उनकी बाँसुरी की आवाज़ में ऐसा आकर्षण था कि पशु-पक्षी तक शांत हो जाते। यमुना की लहरें धीरे-धीरे बहने लगतीं और पेड़ भी जैसे उस संगीत को सुनने के लिए झुक जाते। लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। गोकुल की गलियों में अभी बहुत-सी लीलाएँ बाकी थीं। कंस की साजिशें बढ़ने वाली थीं। कृष्ण के सामने नए-नए संकट आने वाले थे।

     

     

    पूतना का आगमन होने वाला था, शकटासुर और तृणावर्त जैसे असुरों का सामना होने वाला था, और फिर एक दिन पूरा गोकुल उस लीला का साक्षी बनने वाला था जिसने कृष्ण को केवल नंदलाल नहीं, बल्कि गोकुल का रक्षक बना दिया। उस रात यशोदा मैया ने कान्हा को अपने पास सुलाया। कृष्ण गहरी नींद में मुस्कुरा रहे थे। यशोदा ने उनके बालों पर हाथ फेरते हुए धीरे से कहा, “मेरे लाल, तुझे किसी की नज़र न लगे।” कृष्ण ने आँखें बंद किए हुए ही जैसे मुस्कुराकर माँ को जवाब दिया। बाहर चाँदनी गोकुल पर बिखरी थी और दूर कहीं बाँसुरी की बहुत हल्की धुन सुनाई दे रही थी। किसी को पता नहीं था कि आने वाली सुबह गोकुल के लिए एक नई परीक्षा लेकर आने वाली है। क्योंकि अब कंस का पहला बड़ा दूत गोकुल की ओर बढ़ चुका था… और उसका निशाना था—नन्हा कान्हा। 🦚💙✨

     

     

    • श्वेता अग्रवाल ✍️💐
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    Sweta Agrawal