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नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

पढ़ने का समय : 13 मिनट

 

 

(भाग 2 — पूतना का गोकुल आगमन)

 

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस प्रकार भाद्रपद मास की अष्टमी की अर्धरात्रि में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया और वसुदेव जी उन्हें यमुना पार करके गोकुल ले आए।

 

गोकुल में उस समय किसी को यह ज्ञात नहीं था कि नंद बाबा के घर जन्म लेने वाला वह नन्हा बालक कोई साधारण शिशु नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं।

 

यशोदा मैया तो उन्हें अपना लाल समझकर ही दुलार रही थीं।

 

कभी उन्हें गोद में लेकर चूमतीं, कभी उनके नन्हे हाथों को अपनी उँगली पकड़ातीं और कभी उनके मुख को निहारते-निहारते स्वयं मुस्कुराने लगतीं।

 

गोकुल में हर ओर आनंद था।

 

लेकिन इसी आनंद के बीच मथुरा में बैठा कंस बेचैन था।

 

उसे उस आकाशवाणी की बात बार-बार याद आ रही थी—

 

“तेरा काल गोकुल में जन्म ले चुका है।”

 

कंस के मन में भय ने घर कर लिया था।

 

उसने अपने सैनिकों और राक्षसों को आदेश दिया—

 

“गोकुल और उसके आसपास जितने भी नवजात बालक हैं, उन्हें खोजो। मुझे किसी भी कीमत पर उस बालक का पता चाहिए।”

 

कंस को क्या पता था कि जिस बालक को वह खोज रहा है, वह उसके महलों से बहुत दूर नहीं, बल्कि एक छोटे-से गाँव में अपनी माँ की गोद में मुस्कुरा रहा है।

 

—

 

कंस की चिंता

 

मथुरा के राजमहल में उस रात कंस सो नहीं पाया।

 

वह बार-बार अपने महल की खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगता।

 

चाँदनी रात थी, लेकिन कंस के मन में अंधकार था।

 

उसने अपने एक मंत्री से कहा—

 

“मुझे वह बालक चाहिए। चाहे वह कहीं भी छिपा हो।”

 

मंत्री ने डरते हुए कहा—

 

“महाराज, यदि वह बालक गोकुल में है तो वहाँ पहुँचने वाले हमारे राक्षस उसे खोज लेंगे।”

 

कंस ने क्रोध से कहा—

 

“मुझे आश्वासन नहीं चाहिए! मुझे परिणाम चाहिए।”

 

तभी उसके मन में एक विचार आया।

 

उसे याद आई एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षसी—

 

पूतना।

 

पूतना मायावी थी।

 

वह अपना रूप बदल सकती थी।

 

कभी सुंदर स्त्री बन सकती थी, तो कभी भयंकर राक्षसी।

 

वह छोटे बच्चों को छल से अपने पास बुलाती और अपने विषैले स्तनों का दूध पिलाकर उनका जीवन समाप्त कर देती।

 

कंस ने तुरंत उसे बुलवाया।

 

कुछ ही समय बाद पूतना उसके सामने उपस्थित हुई।

 

उसका विशाल शरीर, लाल आँखें और भयंकर रूप देखकर राजमहल के सैनिक भी काँप उठे।

 

कंस ने कहा—

 

“पूतना! मुझे एक काम करना है।”

 

पूतना ने मुस्कुराकर पूछा—

 

“कैसा काम, महाराज?”

 

कंस ने कहा—

 

“गोकुल में एक बालक जन्मा है। मुझे संदेह है कि वही मेरे विनाश का कारण है। तुम गोकुल जाओ और उस बालक का वध कर दो।”

 

पूतना ने ठहाका लगाया।

 

“बस इतनी-सी बात?”

 

कंस ने कहा—

 

“उसे पहचानना आसान नहीं होगा। वहाँ नंद नाम का गोप रहता है। उसके घर एक बालक है। मुझे वही चाहिए।”

 

पूतना ने उत्तर दिया—

 

“महाराज, आप चिंता न करें। मैं उस बालक को ऐसी मृत्यु दूँगी कि किसी को संदेह तक नहीं होगा।”

 

कंस के चेहरे पर दुष्ट मुस्कान फैल गई।

 

उसे लगा कि अब उसका भय समाप्त हो जाएगा।

 

लेकिन वह नहीं जानता था कि जिस बालक के पास पूतना जा रही है, उसके सामने मृत्यु स्वयं भी असहाय होने वाली है।

 

—

 

गोकुल की सुबह

 

उधर गोकुल में एक सुंदर सुबह हुई।

 

सूर्य की किरणें धीरे-धीरे गाँव की गलियों में फैलने लगीं।

 

गायों के गले की घंटियाँ बजने लगीं।

 

गोपियाँ अपने-अपने घरों में दही मथने लगीं।

 

कहीं मटकी में माखन निकाला जा रहा था, तो कहीं बालक खेलते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे।

 

नंद बाबा के घर तो जैसे हर दिन उत्सव ही रहता था।

 

यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लिए बैठी थीं।

 

बालक कृष्ण उनकी उँगली पकड़कर खेल रहे थे।

 

कभी अपनी छोटी-सी मुट्ठी बंद करते, कभी खोलते।

 

यशोदा मैया हँसकर बोलीं—

 

“अरे मेरे लाल! इतनी-सी मुट्ठी में क्या छिपा रखा है?”

 

कृष्ण ने अपनी मुट्ठी और कसकर बंद कर ली।

 

यशोदा मैया बोलीं—

 

“अच्छा! मुझसे भी नहीं बताओगे?”

 

कृष्ण मुस्कुराने लगे।

 

यशोदा मैया उन्हें देखकर इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्हें अपने हृदय से लगा लिया।

 

उन्हें क्या पता था कि आज उनके लाल के जीवन में एक बड़ी लीला होने वाली है।

 

—

 

पूतना का रूप परिवर्तन

 

उधर पूतना गोकुल की ओर बढ़ रही थी।

 

उसका असली रूप इतना भयंकर था कि कोई मनुष्य उसे देखकर जीवित न रह पाए।

 

इसलिए उसने अपनी मायावी शक्ति से स्वयं को एक अत्यंत सुंदर स्त्री के रूप में बदल लिया।

 

उसने सुंदर वस्त्र पहने।

 

बालों में सुगंधित फूल लगाए।

 

माथे पर सुंदर तिलक लगाया।

 

उसका चेहरा इतना मनोहर बना दिया कि जो भी उसे देखता, उसे कोई राजमहल की देवी समझता।

 

हाथ में उसने एक सुंदर पात्र लिया।

 

लेकिन उस पात्र में अमृत नहीं, मृत्यु छिपी थी।

 

उसने अपने स्तनों पर घोर विष लगा रखा था।

 

उसका उद्देश्य स्पष्ट था—

 

बालकृष्ण को अपने पास बुलाना और विषपान कराकर उनका वध करना।

 

पूतना धीरे-धीरे गोकुल में प्रवेश कर गई।

 

आश्चर्य की बात यह थी कि उसे देखकर किसी को भी उस पर संदेह नहीं हुआ।

 

गोपियाँ उसकी सुंदरता देखकर एक-दूसरे से कहने लगीं—

 

“यह कौन है?”

 

दूसरी गोपी बोली—

 

“शायद किसी दूर के नगर से आई कोई देवी है।”

 

तीसरी ने कहा—

 

“देखो, कितनी सुंदर है!”

 

पूतना मन ही मन मुस्कुरा रही थी।

 

वह सोच रही थी—

 

“मूर्खों! तुम जिसे देवी समझ रहे हो, वही तुम्हारे प्रिय बालक की मृत्यु बनकर आई है।”

 

लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि भगवान के नगर में छल कितनी देर टिक सकता है।

 

—

 

नंद भवन में प्रवेश

 

पूतना सीधे नंद बाबा के घर पहुँची।

 

उस समय यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लिए बैठी थीं।

 

जैसे ही पूतना ने घर में प्रवेश किया, श्रीकृष्ण ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

 

कथा में कहा जाता है कि भगवान ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे अपनी लीला को पूर्ण करने वाले थे।

 

पूतना धीरे-धीरे यशोदा के पास पहुँची।

 

उसने मधुर स्वर में कहा—

 

“बहन! कितना सुंदर बालक है तुम्हारा।”

 

यशोदा मैया ने मुस्कुराकर कहा—

 

“हाँ, मेरा कन्हैया बहुत प्यारा है।”

 

पूतना ने कृष्ण की ओर देखा।

 

उसके मन में दुष्ट विचार उठे—

 

“यही है वह बालक।”

 

लेकिन तभी उसके भीतर एक विचित्र भावना भी उठी।

 

उसने ऐसा सुंदर बालक पहले कभी नहीं देखा था।

 

कृष्ण का मुख चंद्रमा के समान चमक रहा था।

 

उनके छोटे-छोटे हाथ और चरण देखकर कुछ क्षण के लिए पूतना का हृदय भी कोमल हो उठा।

 

लेकिन उसके भीतर छिपी दुष्टता ने उस भावना को दबा दिया।

 

उसने कहा—

 

“बहन, मुझे बालक को थोड़ी देर गोद में लेने दो।”

 

यशोदा मैया ने सहजता से कृष्ण को उसकी गोद में दे दिया।

 

यशोदा को क्या पता था कि जिस स्त्री की गोद में वह अपने लाल को दे रही हैं, वह उन्हें मारने के उद्देश्य से आई है।

 

—

 

पूतना की गोद में कृष्ण

 

पूतना ने बालक कृष्ण को अपनी गोद में लिया।

 

कृष्ण शांत थे।

 

उन्होंने अपनी आँखें बंद कर रखी थीं।

 

पूतना ने उन्हें अपने विषैले स्तन से दूध पिलाने के लिए अपने पास किया।

 

वह मन ही मन सोच रही थी—

 

“अब यह बालक कुछ ही क्षणों में समाप्त हो जाएगा।”

 

लेकिन जैसे ही श्रीकृष्ण ने दूध पीना आरंभ किया, कुछ अद्भुत हुआ।

 

उन्होंने केवल दूध ही नहीं पिया।

 

उन्होंने पूतना के प्राण भी खींचने आरंभ कर दिए।

 

पूतना का चेहरा बदलने लगा।

 

उसकी आँखें फैल गईं।

 

वह दर्द से तड़प उठी।

 

उसने कृष्ण को अपने से अलग करने की कोशिश की।

 

लेकिन बालक कृष्ण ने उसे और कसकर पकड़ लिया।

 

पूतना चीख उठी—

 

“छोड़ो! छोड़ो मुझे!”

 

लेकिन नन्हे कृष्ण ने उसे नहीं छोड़ा।

 

अब उसका सुंदर स्त्री वाला रूप समाप्त होने लगा।

 

उसका शरीर विशाल होने लगा।

 

उसके बाल बिखर गए।

 

उसकी आँखें लाल हो गईं।

 

उसके दाँत बाहर निकल आए।

 

उसका वास्तविक राक्षसी रूप प्रकट होने लगा।

 

गोकुल की धरती काँपने लगी।

 

गोपियाँ भयभीत होकर चिल्लाने लगीं—

 

“अरे! यह क्या हो रहा है?”

 

—

 

पूतना का भयंकर रूप

 

अचानक पूतना अपने वास्तविक विशाल रूप में आ गई।

 

उसका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया।

 

वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

 

उसकी चीख से पूरा गोकुल काँप उठा।

 

पेड़ों से पक्षी उड़ गए।

 

गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं।

 

गोप और गोपियाँ अपने घरों से बाहर निकल आए।

 

किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।

 

पूतना ने कृष्ण को अपने शरीर से हटाने की बहुत कोशिश की।

 

लेकिन भगवान कृष्ण उसके प्राणों को खींचते रहे।

 

अंततः उसकी शक्ति समाप्त होने लगी।

 

उसने अंतिम बार भयंकर गर्जना की—

 

“आऽऽह!”

 

और देखते ही देखते वह धरती पर गिर पड़ी।

 

उसका विशाल शरीर गोकुल से बहुत दूर तक फैल गया।

 

वृक्ष टूट गए।

 

धरती काँप उठी।

 

चारों ओर धूल उड़ने लगी।

 

कुछ क्षण के लिए गोकुल में सन्नाटा छा गया।

 

—

 

यशोदा मैया की घबराहट

 

जैसे ही धूल थोड़ी शांत हुई, यशोदा मैया की दृष्टि अपने कृष्ण पर पड़ी।

 

उनका कलेजा मुँह को आ गया।

 

“मेरा लाल!”

 

वे दौड़कर कृष्ण को उठाने लगीं।

 

उन्होंने देखा कि उनका कन्हैया बिल्कुल सुरक्षित है।

 

न कोई चोट।

 

न कोई भय।

 

न कोई आँसू।

 

वह तो ऐसे मुस्कुरा रहे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो।

 

यशोदा मैया ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

 

उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

 

“मेरे लाल! तुझे कुछ हो जाता तो मैं क्या करती?”

 

नंद बाबा भी दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे।

 

उन्होंने कृष्ण को देखा और राहत की साँस ली।

 

गोपियाँ भी चारों ओर इकट्ठी हो गईं।

 

एक गोपी बोली—

 

“यशोदा! तुम्हारा लाल तो बिल्कुल ठीक है!”

 

दूसरी बोली—

 

“देखो तो, यह तो हँस रहा है!”

 

तीसरी ने आश्चर्य से कहा—

 

“जिस राक्षसी ने पूरे गोकुल को हिला दिया, उसके ऊपर बैठकर यह बालक ऐसे मुस्कुरा रहा है जैसे खेल रहा हो!”

 

सभी कृष्ण को आश्चर्य से देखने लगीं।

 

—

 

गोकुलवासियों ने क्या किया?

 

गोपियों ने कृष्ण की रक्षा के लिए तुरंत उन्हें गोद में लेकर मंत्रों और भगवान के नाम का स्मरण किया।

 

वे कहने लगीं—

 

“हे नारायण! हमारे बालक की रक्षा करना।”

 

“हे गोविंद! हमारे कन्हैया को अपनी छाया में रखना।”

 

“हे माधव! इसे हर संकट से बचाना।”

 

किसी ने कृष्ण के माथे पर गोबर और गोमूत्र से पारंपरिक रूप से रक्षा-चिह्न लगाया।

 

किसी ने उनके चारों ओर पवित्र नामों का स्मरण किया।

 

यशोदा मैया उन्हें बार-बार चूमती रहीं।

 

वे बार-बार उनके हाथ-पैर देखतीं।

 

“कहीं चोट तो नहीं लगी?”

 

कृष्ण मुस्कुरा रहे थे।

 

मानो कह रहे हों—

 

“मैया, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

 

लेकिन माँ का हृदय तो माँ का ही होता है।

 

वह भगवान को भी बालक ही समझती है।

 

—

 

पूतना के शरीर का रहस्य

 

अब गोकुलवासियों के सामने सबसे बड़ी समस्या थी—उस विशाल राक्षसी के शरीर का क्या किया जाए?

 

उसका शरीर इतना विशाल था कि देखकर सभी भयभीत हो रहे थे।

 

गोपों ने उसके शरीर को काटकर गोकुल से दूर ले जाकर जलाने का निर्णय किया।

 

जब उसका शरीर जलाया गया तो आश्चर्यजनक रूप से वातावरण में एक सुगंध फैलने लगी।

 

गोकुलवासी चकित रह गए।

 

जिस राक्षसी के शरीर से मृत्यु और भय का संकेत मिलना चाहिए था, उसके शरीर से तो सुगंध आ रही थी।

 

इसका कारण था—

 

भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श ने उसे पवित्र कर दिया था।

 

पूतना श्रीकृष्ण को मारने आई थी।

 

उसके हृदय में प्रेम नहीं था।

 

उसका उद्देश्य छल और हत्या था।

 

फिर भी भगवान ने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसा एक माँ के साथ किया जाता है।

 

क्यों?

 

क्योंकि उसने भगवान को अपने स्तन से दूध पिलाने का भाव बनाया था, चाहे उसके मन में विष और छल ही क्यों न हो।

 

इसीलिए भगवान ने उसे भी अपनी कृपा प्रदान की।

 

यह श्रीकृष्ण की करुणा का अद्भुत उदाहरण है।

 

—

 

नंद बाबा का लौटना

 

कुछ समय बाद नंद बाबा और गोकुल के अन्य पुरुष भी लौटकर आए।

 

उन्होंने जब पूरी घटना सुनी तो वे आश्चर्य में पड़ गए।

 

नंद बाबा ने कृष्ण को अपनी गोद में उठाया।

 

उन्होंने अपने लाल को देखा और बोले—

 

“कन्हैया! तू ठीक है न?”

 

कृष्ण ने उनकी उँगली पकड़ ली।

 

नंद बाबा की आँखें भर आईं।

 

उन्होंने मन ही मन भगवान से कहा—

 

“हे प्रभु! मेरे बालक की सदैव रक्षा करना।”

 

उन्हें यह नहीं पता था कि जिसे वे भगवान से बचाने की प्रार्थना कर रहे हैं, वही स्वयं भगवान है।

 

—

 

गोकुल में एक नई चर्चा

 

उस दिन के बाद गोकुल में हर जगह केवल एक ही चर्चा होने लगी—

 

“नंद बाबा का बालक साधारण नहीं है।”

 

कोई कहता—

 

“उसने उस भयंकर राक्षसी को कैसे मार दिया?”

 

दूसरा कहता—

 

“इतना छोटा बालक भला ऐसा कैसे कर सकता है?”

 

तीसरा कहता—

 

“शायद किसी देवता की कृपा है।”

 

लेकिन यशोदा मैया को इन बातों से कोई लेना-देना नहीं था।

 

उनके लिए कृष्ण भगवान नहीं थे।

 

वे उनके लाल थे।

 

उनका संसार थे।

 

उनकी साँसों का आधार थे।

 

रात को जब कृष्ण उनकी गोद में सोए, तो यशोदा मैया उन्हें निहारती रहीं।

 

उन्होंने धीरे से कहा—

 

“तू जहाँ भी जाएगा, मैं तेरे साथ रहूँगी।”

 

कृष्ण ने आँखें बंद कर लीं।

 

यशोदा मैया ने उनके माथे को चूमा।

 

बाहर यमुना की लहरें धीरे-धीरे बह रही थीं।

 

आकाश में चाँद चमक रहा था।

 

गोकुल शांत था।

 

लेकिन यह शांति अधिक समय तक रहने वाली नहीं थी।

 

क्योंकि नंदलाल अभी अपनी बाल-लीलाओं की शुरुआत ही कर रहे थे।

 

—

 

इस लीला का सबसे बड़ा संदेश

 

श्रीकृष्ण की पूतना लीला केवल एक राक्षसी के वध की कथा नहीं है।

 

यह भगवान की करुणा और कृपा का संदेश भी देती है।

 

पूतना विष लेकर आई थी।

 

उसके मन में हत्या का विचार था।

 

फिर भी श्रीकृष्ण ने उसके भीतर से उस मातृत्व के बाहरी भाव को स्वीकार किया और उसे मुक्ति प्रदान की।

 

इससे भक्तों को यह शिक्षा मिलती है कि भगवान की कृपा कितनी महान है।

 

मनुष्य कितना भी दूर क्यों न चला गया हो, यदि उसका संबंध भगवान से किसी भी प्रकार जुड़ जाए, तो भगवान उसे अपने से दूर नहीं करते।

 

और यही श्रीकृष्ण हैं—

 

जो दुष्टों का अंत करते हैं,

भक्तों की रक्षा करते हैं,

और अपने शत्रुओं पर भी कृपा करते हैं।

 

गोकुल के लोगों को उस दिन केवल इतना दिखाई दिया कि एक राक्षसी मारी गई और उनका कन्हैया बच गया।

 

लेकिन देवताओं के लिए वह दिन कुछ और ही था।

 

उन्होंने देखा था—

 

स्वयं भगवान ने अपनी बाल-लीला आरंभ कर दी थी।

 

अब गोकुल में कोई नहीं जानता था कि अगली बार क्या होगा।

 

कभी कोई राक्षस आएगा।

 

कभी कोई अद्भुत घटना घटेगी।

 

और कभी नंदलाल अपनी ऐसी नटखट शरारत करेंगे कि पूरा गोकुल हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएगा।

 

क्योंकि यह तो केवल शुरुआत थी।

 

आगे आने वाली लीलाओं में कृष्ण कभी अपने नन्हे पैरों से ऐसी अद्भुत लीला करेंगे कि एक भारी गाड़ी पलट जाएगी…

 

और गोकुलवासी फिर सोच में पड़ जाएँगे—

 

“आखिर हमारा यह नन्हा-सा कन्हैया है कौन?”

 

क्रमशः…

 

 

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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