द्वारका अब केवल एक नगरी नहीं रह गई थी। वह लीलाओं का केंद्र बन चुकी थी। रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और कालिन्दी के बाद श्रीकृष्ण की लीला में और चार प्रधान रानियाँ आईं – मित्रविंदा, नाग्नजिती, भद्रा और लक्ष्मणा। इन आठों को ही अष्टभार्या कहा जाता है। इनके बाद एक और अद्भुत अध्याय आया – नरकासुर से छुड़ाई गई सोलह हज़ार एक सौ राजकन्याएँ, जिन्हें श्रीकृष्ण ने पत्नी रूप में स्वीकार किया। यह एपिसोड उन्हीं सबकी कथा है।
मित्रविंदा अवन्ती देश की राजकुमारी थीं। कुछ कथाओं में वे वसुदेव जी की बहन राजधिदेवी की पुत्री मानी जाती हैं, अर्थात् श्रीकृष्ण की फुफेरी बहन। उनका स्वभाव शांत और सत्त्वगुण से भरा था। उनके भाई विंद और अनुविंद कृष्ण के विरोधी थे। उन्होंने निश्चय किया कि मित्रविंदा का विवाह किसी ऐसे राजा से होगा जो यादवों का पक्ष न ले। स्वयंवर रचा गया। अनेक राजा आए, पर मित्रविंदा का मन पहले से श्रीकृष्ण में बस चुका था। उन्होंने उनके गुण, पराक्रम और धर्म की रक्षा की कथाएँ सुन रखी थीं।
स्वयंवर के दिन जब मित्रविंदा सभा में आईं तो उनका हृदय द्वारका की ओर ही खिंचा जा रहा था। श्रीकृष्ण समय पर पहुँचे। विंद और अनुविंद ने विरोध किया, अन्य राजाओं ने घेरने का प्रयास किया, पर कृष्ण ने मित्रविंदा का हाथ पकड़कर उन्हें रथ पर बिठा लिया। यह दृश्य रुक्मिणी हरण जैसा था, पर भाव अलग था। मित्रविंदा भय से नहीं, भक्ति और विश्वास से रथ पर बैठीं। द्वारका पहुँचकर उनका पाणिग्रहण हुआ। वे अष्टभार्या में वह रानी बनीं जो कम बोलती थीं, पर घर की मर्यादा और परिवार के स्नेह को बड़ी गहराई से संभालती थीं। कृष्ण के लिए वे अपनी ही वंश की पुत्री थीं, इसलिए उनका संबंध केवल पति-पत्नी का नहीं, कुल की आत्मीयता का भी था।
नाग्नजिती को सत्य्या भी कहा जाता है। वे कोशल नरेश नाग्नजित् की पुत्री थीं। नाग्नजित् अत्यंत बलशाली राजा थे। उन्होंने अपनी पुत्री के स्वयंवर की एक कठिन शर्त रखी। राजसभा में सात उन्मत्त, भयंकर बैल छोड़े गए थे। जो वीर इन सातों को एक साथ वश में कर ले, वही नाग्नजिती का वर हो सकता था। अनेक राजकुमार आए, पर बैलों के सामने टिक न सके। कोई घायल हुआ, कोई भाग खड़ा हुआ।
जब श्रीकृष्ण को यह समाचार मिला तो वे कोशल पहुँचे। नाग्नजिती महल की गवाक्ष से देख रही थीं। उनके मन में पहले से ही कृष्ण के प्रति आकर्षण और श्रद्धा थी। उन्होंने सोचा – यदि ये सातों बैल वश में कर सकें तो निश्चय ही ये साधारण नर नहीं। कृष्ण अखाड़े में उतरे। उन्होंने न तो घबराहट दिखाई, न गर्व। एक-एक कर सातों बैलों को उन्होंने अपने दिव्य बल से काबू में कर लिया। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि उन्होंने एक साथ सातों को बाँध दिया। सभा स्तब्ध रह गई। नाग्नजित् राजा ने प्रसन्न होकर पुत्री सौंप दी।
नाग्नजिती सत्य्या नाम से द्वारका की रानी बनीं। उनका नाम “सत्य्या” इसलिए भी लिया जाता है क्योंकि उनके पिता और कुल सत्य और वीरता के पक्षधर थे। वे तेजस्विनी रानी थीं। रूप में तेज था, स्वभाव में दृढ़ता थी। वे सत्यभामा जैसी उग्र नहीं थीं, पर कमज़ोर भी नहीं थीं। कृष्ण के जीवन में वे उस शक्ति की प्रतीक बनीं जो परीक्षा में खरा उतरकर प्राप्त होती है। उनका विवाह प्रेम पत्र से नहीं, पराक्रम की कसौटी से हुआ था।
भद्रा कैकेय देश की राजकुमारी थीं। कैकेय के राजकुमार उनके भाई थे। भद्रा का स्वभाव कोमल और शालीन था। कुछ पुराणों के अनुसार उनके भाइयों ने स्वयं उन्हें श्रीकृष्ण को समर्पित किया, क्योंकि वे जानते थे कि इससे बढ़कर वर और कुल और कोई नहीं हो सकता। कुछ कथाओं में उनका भी स्वयंवर बताया जाता है, जिसमें कृष्ण विजयी हुए।
भद्रा जब द्वारका आईं तो महल में एक नई शांति आई। वे विवादों से दूर रहती थीं। रुक्मिणी का सम्मान करतीं, छोटी रानियों का ध्यान रखतीं और कृष्ण की सेवा में चुपचाप लीन रहतीं। उनका नाम “भद्रा” अर्थात् कल्याणमयी स्वयं उनके स्वभाव को दर्शाता था। वे अष्टभार्या में वह कड़ी थीं जो घर को सौम्यता देती है। उनका कृष्ण से संबंध वैभव या युद्ध की कथा जितना चर्चित नहीं, पर गृहस्थ धर्म की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। कृष्ण के अनेक रूप थे – योद्धा, राजा, सखा, भगवान। भद्रा के पास वे गृहस्थ पति के रूप में अधिक प्रकट होते थे।
लक्ष्मणा मद्र देश की राजकुमारी थीं। कुछ ग्रंथों में उन्हें माद्री भी कहा गया है। उनके स्वयंवर की शर्त बड़ी विलक्षण थी। आकाश में एक मछली घुमाई गई थी और उसकी छाया जल में दिखाई दे रही थी। जो वीर केवल छाया देखकर मछली की आँख में बाण मार दे, वही लक्ष्मणा का वर कहलाए। यह शर्त अर्जुन के द्रौपदी स्वयंवर की याद दिलाती है। अनेक राजाओं ने प्रयास किया, पर सफलता नहीं मिली।
श्रीकृष्ण ने धनुष उठाया। उन्होंने न केवल लक्ष्य भेदा, बल्कि वह भी ऐसी सहजता से किया मानो बाल लीला कर रहे हों। सभा में जयघोष गूँज उठा। मद्र नरेश ने पुत्री का हाथ कृष्ण के हाथ में दिया। लक्ष्मणा द्वारका पहुँचीं। वे रूपवती और चतुर थीं। अष्टभार्या में उनका स्थान उस रानी का था जो कला, लावण्य और राजसी शिष्टाचार को साथ लेकर आई थीं। कृष्ण के साथ उनका संबंध प्रेम और सम्मान दोनों से बँधा था। वे जानती थीं कि उनका वर केवल धनुर्धर नहीं, जगत् का आधार है।
इन चारों के आने के बाद अष्टभार्या पूर्ण हुईं – रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिन्दी, मित्रविंदा, नाग्नजिती, भद्रा और लक्ष्मणा। आठों अलग-अलग दिशाओं, अलग-अलग स्वभावों और अलग-अलग प्रकार की भक्ति का प्रतिनिधित्व करती थीं। कोई त्याग से आई, कोई पत्र लिखकर, कोई युद्ध के बाद, कोई तप से, कोई स्वयंवर की शर्त से, कोई कुल के समर्पण से। भगवान की लीला में एक ही रूप काफी नहीं था। आठ प्रधान भावों को आठ रानियों के रूप में स्थान दिया गया।
अब वह प्रसंग आता है जो लोगों को सबसे अधिक आश्चर्य में डालता है – सोलह हज़ार एक सौ पत्नियाँ।
प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर था, जिसे भौमासुर भी कहते हैं। वह पृथ्वी पुत्र कहा जाता था और अत्यंत अत्याचारी था। उसने देवताओं को भी त्रस्त कर रखा था। इंद्र की छत्र-मणि, कर्णकुंडल और अनेक दिव्य वस्तुएँ उसने छीन ली थीं। सबसे बड़ा पाप यह था कि उसने पृथ्वी के विभिन्न देशों से सोलह हज़ार एक सौ राजकन्याओं और स्त्रियों को बंदी बना रखा था। वे राजकन्याएँ उसके अंतःपुर में बंद थीं। उनका जीवन अपमान, भय और निराशा से भरा था। समाज की दृष्टि में बंदीगृह से निकली कन्या का सम्मान बचाना कठिन माना जाता था। नरकासुर उन्हें अपनी संपत्ति समझता था।
देवताओं और पृथ्वी की पुकार जब चरम पर पहुँची तो श्रीकृष्ण द्वारका से निकले। कई कथाओं में सत्यभामा भी साथ गईं। गरुड़ पर सवार होकर कृष्ण प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। नगर के चारों ओर अग्निमय परकोटे, पाश और असुर सेना थी। कृष्ण ने एक-एक कर रक्षा-कवच तोड़े, मुर नामक राक्षस का वध किया और अंत में नरकासुर से युद्ध किया। युद्ध भीषण था। नरकासुर का बल अपार था, पर अधर्म का अंत निश्चित था। श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। सत्यभामा ने भी उस युद्ध में वीरता दिखाई, ऐसी कथाएँ प्रचलित हैं।
जब बंदीगृह के द्वार खुले तो सोलह हज़ार एक सौ स्त्रियाँ बाहर आईं। उनके मुख पर मुक्ति की खुशी थी, पर आँखों में एक गहरा भय भी था। वे कृष्ण के सामने आकर नतमस्तक हुईं। उनकी प्रार्थना केवल मुक्त होने की नहीं थी। वे बोलीं, “नाथ, आपने हमें नरकासुर के कारागार से निकाला। पर संसार हमें कैसे स्वीकार करेगा? लोग कहेंगे ये उस असुर के घर रही हैं। हमारे पिता के घर लौटने पर भी कलंक का बोझ रहेगा। हमारा धर्म, हमारा सम्मान, हमारा भविष्य – सब संकट में है। आप त्रिलोकी के नाथ हैं। यदि आप हमें स्वीकार कर लें तो हमारा जीवन पुनः पवित्र और सुरक्षित हो जाएगा।”
यह प्रार्थना साधारण नहीं थी। इसमें पीड़ा थी, लाचारी थी और विश्वास भी था। श्रीकृष्ण समझ गए। उन्होंने उन कन्याओं को वस्तु या भोग की दृष्टि से नहीं देखा। उन्होंने उन्हें उस समाज की पीड़िताओं के रूप में देखा जिनका सम्मान बचाना भी धर्म था। उन्होंने कहा, “तुम निर्दोष हो। तुम्हारा दोष नहीं, असुर का पाप था। मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। तुम मेरी पत्नियाँ कहलाओगी। तुम्हें द्वारका में सम्मान, सुरक्षा और गृहस्थ का अधिकार मिलेगा।”
यह स्वीकार करना साधारण विवाह नहीं था। श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया और ऐश्वर्य से एक साथ अनेक रूप धारण किए। प्रत्येक रानी को अपना पति अलग-अलग प्रासाद में प्राप्त हुआ। हर एक को ऐसा अनुभव हुआ मानो कृष्ण केवल उसी के हैं। यह लीला इसलिए हुई ताकि कोई उपेक्षित न रह जाए। सोलह हज़ार एक सौ प्रासाद बने, सोलह हज़ार एक सौ घर triस्थ जीवन से भर गए। उन रानियों ने पुत्र भी जन्म दिए। भागवत में आता है कि प्रत्येक के दस-दस पुत्र हुए। यह संख्या लीला की विशालता को दर्शाती है, केवल गिनती को नहीं।
अब प्रश्न यह है – वे पत्नियाँ क्यों थीं?
पहला कारण था सम्मान की रक्षा। उस युग की सामाजिक व्यवस्था में बंदी बनाई गई राजकन्याओं का सामान्य विवाह कठिन था। भगवान ने उन्हें अपनी पत्नी बनाकर उनका कलंक मिटाया, उन्हें राजसी गरिमा दी।
दूसरा कारण था शरणागति। उन्होंने कृष्ण को पति रूप में वरना चाहा। भगवान भक्त की पुकार ठुकराते नहीं। चाहे भक्त एक हो या सोलह हज़ार एक सौ।
तीसरा कारण था लीला का विस्तार। कृष्ण केवल आठ भावों तक सीमित नहीं थे। वे अनंत हैं। अनंत पत्नियाँ उनके अनंत रूपों की ओर संकेत करती हैं। एक भगवान, अनेक हृदय, एक साथ सबमें पूर्ण उपस्थिति – यही तो उनकी विशेषता है।
चौथा कारण था अधर्म के परिणाम को धर्म में बदलना। नरकासुर ने स्त्रियों को संपत्ति बनाया। कृष्ण ने उसी प्रसंग को मुक्ति और मर्यादा का प्रसंग बना दिया। अत्याचार का अंत केवल वध से नहीं हुआ, पीड़िताओं के जीवन को पुनर्स्थापित करके हुआ।
इन सोलह हज़ार एक सौ रानियों के व्यक्तिगत नाम पुराणों में विस्तार से नहीं मिलते, जैसा अष्टभार्या के मिलते हैं। वे सामूहिक रूप में स्मरण की जाती हैं। यह भी एक संदेश है – भगवान की दृष्टि में नामहीन पीड़िता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी प्रधान रानी। रुक्मिणी महल की लक्ष्मी थीं, सत्यभामा तेज थीं, जाम्बवती प्राचीन भक्ति थीं, कालिन्दी तप थीं – और ये सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ करुणा थीं।
द्वारका अब अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती थी। एक ओर आठ प्रधान महल, दूसरी ओर हज़ारों प्रासाद। कोई पूछ सकता था कि एक पुरुष इतने संबंध कैसे निभाए। उत्तर लीला में छिपा है। श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम हैं। समय, स्थान और रूप उनके अधीन हैं। वे एक काल में अनेक स्थानों पर पूर्ण रूप से उपस्थित रह सकते हैं। इसलिए यह कथा सामान्य गृहस्थ की नाप-तोल से नहीं देखी जाती। यह ऐश्वर्य और करुणा की कथा है।
अष्टभार्या और सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ मिलाकर श्रीकृष्ण के दांपत्य जीवन का पूरा चित्र बनता है। आठ मुख्य स्तंभ हैं – अलग-अलग प्रदेशों, अलग-अलग परीक्षाओं और अलग-अलग स्वभावों से आए हुए। शेष रानियाँ उस विशाल करुणा का विस्तार हैं जो पीड़ित को भी अपना बना लेती है। कोई रानी प्रेम से आई, कोई पत्र से, कोई युद्ध से, कोई तप से, कोई स्वयंवर से, कोई पिता के समर्पण से, और कोई कारागार की मुक्ति से। मार्ग अलग थे, गंतव्य एक था – कृष्ण के चरण।
इस संपूर्ण विस्तार का सार यही है कि श्रीकृष्ण का संबंध केवल एक भाव तक सीमित नहीं। राधा में निर्गुण प्रेम है, रुक्मिणी में धर्म और लक्ष्मी भाव है, सत्यभामा में तेज और अधिकार है, जाम्बवती में युगों की भक्ति है, कालिन्दी में तप और पवित्रता है, मित्रविंदा में पारिवारिक स्नेह है, नाग्नजिती में पराक्रम से प्राप्त सत्य है, भद्रा में कल्याण है, लक्ष्मणा में लक्ष्य-भेदन का वैभव है, और सोलह हज़ार एक सौ रानियों में शरणागत वत्सलता है।
जो यह पूछता है कि इतनी पत्नियाँ क्यों थीं, उसे संख्या के पीछे का धर्म देखना चाहिए। भगवान ने भोग के लिए गृह नहीं भरे। उन्होंने हर प्रकार की आत्मा को स्थान दिया – राजसी, तपोमयी, अभिमानिनी, शांता, पीड़िता और शरणागता। द्वारका इसीलिए वैकुंठ धरती पर उतरी मानी गई, क्योंकि वहाँ कोई अंतःपुर की कैद नहीं रह गई, कोई राजकन्या अनाथ नहीं रह गई, और कोई भक्त यह नहीं कह सकी कि मेरे लिए स्थान नहीं बचा।
यही अष्टभार्या और सोलह हज़ार एक सौ रानियों की कथा का मर्म है।








