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श्रेणी: श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता 🏆

  • एपिसोड 10: शेष अष्टभार्या और सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    द्वारका अब केवल एक नगरी नहीं रह गई थी। वह लीलाओं का केंद्र बन चुकी थी। रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और कालिन्दी के बाद श्रीकृष्ण की लीला में और चार प्रधान रानियाँ आईं – मित्रविंदा, नाग्नजिती, भद्रा और लक्ष्मणा। इन आठों को ही अष्टभार्या कहा जाता है। इनके बाद एक और अद्भुत अध्याय आया – नरकासुर से छुड़ाई गई सोलह हज़ार एक सौ राजकन्याएँ, जिन्हें श्रीकृष्ण ने पत्नी रूप में स्वीकार किया। यह एपिसोड उन्हीं सबकी कथा है।

     

    मित्रविंदा अवन्ती देश की राजकुमारी थीं। कुछ कथाओं में वे वसुदेव जी की बहन राजधिदेवी की पुत्री मानी जाती हैं, अर्थात् श्रीकृष्ण की फुफेरी बहन। उनका स्वभाव शांत और सत्त्वगुण से भरा था। उनके भाई विंद और अनुविंद कृष्ण के विरोधी थे। उन्होंने निश्चय किया कि मित्रविंदा का विवाह किसी ऐसे राजा से होगा जो यादवों का पक्ष न ले। स्वयंवर रचा गया। अनेक राजा आए, पर मित्रविंदा का मन पहले से श्रीकृष्ण में बस चुका था। उन्होंने उनके गुण, पराक्रम और धर्म की रक्षा की कथाएँ सुन रखी थीं।

     

    स्वयंवर के दिन जब मित्रविंदा सभा में आईं तो उनका हृदय द्वारका की ओर ही खिंचा जा रहा था। श्रीकृष्ण समय पर पहुँचे। विंद और अनुविंद ने विरोध किया, अन्य राजाओं ने घेरने का प्रयास किया, पर कृष्ण ने मित्रविंदा का हाथ पकड़कर उन्हें रथ पर बिठा लिया। यह दृश्य रुक्मिणी हरण जैसा था, पर भाव अलग था। मित्रविंदा भय से नहीं, भक्ति और विश्वास से रथ पर बैठीं। द्वारका पहुँचकर उनका पाणिग्रहण हुआ। वे अष्टभार्या में वह रानी बनीं जो कम बोलती थीं, पर घर की मर्यादा और परिवार के स्नेह को बड़ी गहराई से संभालती थीं। कृष्ण के लिए वे अपनी ही वंश की पुत्री थीं, इसलिए उनका संबंध केवल पति-पत्नी का नहीं, कुल की आत्मीयता का भी था।

     

    नाग्नजिती को सत्य्या भी कहा जाता है। वे कोशल नरेश नाग्नजित् की पुत्री थीं। नाग्नजित् अत्यंत बलशाली राजा थे। उन्होंने अपनी पुत्री के स्वयंवर की एक कठिन शर्त रखी। राजसभा में सात उन्मत्त, भयंकर बैल छोड़े गए थे। जो वीर इन सातों को एक साथ वश में कर ले, वही नाग्नजिती का वर हो सकता था। अनेक राजकुमार आए, पर बैलों के सामने टिक न सके। कोई घायल हुआ, कोई भाग खड़ा हुआ।

     

    जब श्रीकृष्ण को यह समाचार मिला तो वे कोशल पहुँचे। नाग्नजिती महल की गवाक्ष से देख रही थीं। उनके मन में पहले से ही कृष्ण के प्रति आकर्षण और श्रद्धा थी। उन्होंने सोचा – यदि ये सातों बैल वश में कर सकें तो निश्चय ही ये साधारण नर नहीं। कृष्ण अखाड़े में उतरे। उन्होंने न तो घबराहट दिखाई, न गर्व। एक-एक कर सातों बैलों को उन्होंने अपने दिव्य बल से काबू में कर लिया। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि उन्होंने एक साथ सातों को बाँध दिया। सभा स्तब्ध रह गई। नाग्नजित् राजा ने प्रसन्न होकर पुत्री सौंप दी।

     

    नाग्नजिती सत्य्या नाम से द्वारका की रानी बनीं। उनका नाम “सत्य्या” इसलिए भी लिया जाता है क्योंकि उनके पिता और कुल सत्य और वीरता के पक्षधर थे। वे तेजस्विनी रानी थीं। रूप में तेज था, स्वभाव में दृढ़ता थी। वे सत्यभामा जैसी उग्र नहीं थीं, पर कमज़ोर भी नहीं थीं। कृष्ण के जीवन में वे उस शक्ति की प्रतीक बनीं जो परीक्षा में खरा उतरकर प्राप्त होती है। उनका विवाह प्रेम पत्र से नहीं, पराक्रम की कसौटी से हुआ था।

     

    भद्रा कैकेय देश की राजकुमारी थीं। कैकेय के राजकुमार उनके भाई थे। भद्रा का स्वभाव कोमल और शालीन था। कुछ पुराणों के अनुसार उनके भाइयों ने स्वयं उन्हें श्रीकृष्ण को समर्पित किया, क्योंकि वे जानते थे कि इससे बढ़कर वर और कुल और कोई नहीं हो सकता। कुछ कथाओं में उनका भी स्वयंवर बताया जाता है, जिसमें कृष्ण विजयी हुए।

     

    भद्रा जब द्वारका आईं तो महल में एक नई शांति आई। वे विवादों से दूर रहती थीं। रुक्मिणी का सम्मान करतीं, छोटी रानियों का ध्यान रखतीं और कृष्ण की सेवा में चुपचाप लीन रहतीं। उनका नाम “भद्रा” अर्थात् कल्याणमयी स्वयं उनके स्वभाव को दर्शाता था। वे अष्टभार्या में वह कड़ी थीं जो घर को सौम्यता देती है। उनका कृष्ण से संबंध वैभव या युद्ध की कथा जितना चर्चित नहीं, पर गृहस्थ धर्म की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। कृष्ण के अनेक रूप थे – योद्धा, राजा, सखा, भगवान। भद्रा के पास वे गृहस्थ पति के रूप में अधिक प्रकट होते थे।

     

    लक्ष्मणा मद्र देश की राजकुमारी थीं। कुछ ग्रंथों में उन्हें माद्री भी कहा गया है। उनके स्वयंवर की शर्त बड़ी विलक्षण थी। आकाश में एक मछली घुमाई गई थी और उसकी छाया जल में दिखाई दे रही थी। जो वीर केवल छाया देखकर मछली की आँख में बाण मार दे, वही लक्ष्मणा का वर कहलाए। यह शर्त अर्जुन के द्रौपदी स्वयंवर की याद दिलाती है। अनेक राजाओं ने प्रयास किया, पर सफलता नहीं मिली।

     

    श्रीकृष्ण ने धनुष उठाया। उन्होंने न केवल लक्ष्य भेदा, बल्कि वह भी ऐसी सहजता से किया मानो बाल लीला कर रहे हों। सभा में जयघोष गूँज उठा। मद्र नरेश ने पुत्री का हाथ कृष्ण के हाथ में दिया। लक्ष्मणा द्वारका पहुँचीं। वे रूपवती और चतुर थीं। अष्टभार्या में उनका स्थान उस रानी का था जो कला, लावण्य और राजसी शिष्टाचार को साथ लेकर आई थीं। कृष्ण के साथ उनका संबंध प्रेम और सम्मान दोनों से बँधा था। वे जानती थीं कि उनका वर केवल धनुर्धर नहीं, जगत् का आधार है।

     

    इन चारों के आने के बाद अष्टभार्या पूर्ण हुईं – रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिन्दी, मित्रविंदा, नाग्नजिती, भद्रा और लक्ष्मणा। आठों अलग-अलग दिशाओं, अलग-अलग स्वभावों और अलग-अलग प्रकार की भक्ति का प्रतिनिधित्व करती थीं। कोई त्याग से आई, कोई पत्र लिखकर, कोई युद्ध के बाद, कोई तप से, कोई स्वयंवर की शर्त से, कोई कुल के समर्पण से। भगवान की लीला में एक ही रूप काफी नहीं था। आठ प्रधान भावों को आठ रानियों के रूप में स्थान दिया गया।

     

    अब वह प्रसंग आता है जो लोगों को सबसे अधिक आश्चर्य में डालता है – सोलह हज़ार एक सौ पत्नियाँ।

     

    प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर था, जिसे भौमासुर भी कहते हैं। वह पृथ्वी पुत्र कहा जाता था और अत्यंत अत्याचारी था। उसने देवताओं को भी त्रस्त कर रखा था। इंद्र की छत्र-मणि, कर्णकुंडल और अनेक दिव्य वस्तुएँ उसने छीन ली थीं। सबसे बड़ा पाप यह था कि उसने पृथ्वी के विभिन्न देशों से सोलह हज़ार एक सौ राजकन्याओं और स्त्रियों को बंदी बना रखा था। वे राजकन्याएँ उसके अंतःपुर में बंद थीं। उनका जीवन अपमान, भय और निराशा से भरा था। समाज की दृष्टि में बंदीगृह से निकली कन्या का सम्मान बचाना कठिन माना जाता था। नरकासुर उन्हें अपनी संपत्ति समझता था।

     

    देवताओं और पृथ्वी की पुकार जब चरम पर पहुँची तो श्रीकृष्ण द्वारका से निकले। कई कथाओं में सत्यभामा भी साथ गईं। गरुड़ पर सवार होकर कृष्ण प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। नगर के चारों ओर अग्निमय परकोटे, पाश और असुर सेना थी। कृष्ण ने एक-एक कर रक्षा-कवच तोड़े, मुर नामक राक्षस का वध किया और अंत में नरकासुर से युद्ध किया। युद्ध भीषण था। नरकासुर का बल अपार था, पर अधर्म का अंत निश्चित था। श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। सत्यभामा ने भी उस युद्ध में वीरता दिखाई, ऐसी कथाएँ प्रचलित हैं।

     

    जब बंदीगृह के द्वार खुले तो सोलह हज़ार एक सौ स्त्रियाँ बाहर आईं। उनके मुख पर मुक्ति की खुशी थी, पर आँखों में एक गहरा भय भी था। वे कृष्ण के सामने आकर नतमस्तक हुईं। उनकी प्रार्थना केवल मुक्त होने की नहीं थी। वे बोलीं, “नाथ, आपने हमें नरकासुर के कारागार से निकाला। पर संसार हमें कैसे स्वीकार करेगा? लोग कहेंगे ये उस असुर के घर रही हैं। हमारे पिता के घर लौटने पर भी कलंक का बोझ रहेगा। हमारा धर्म, हमारा सम्मान, हमारा भविष्य – सब संकट में है। आप त्रिलोकी के नाथ हैं। यदि आप हमें स्वीकार कर लें तो हमारा जीवन पुनः पवित्र और सुरक्षित हो जाएगा।”

     

    यह प्रार्थना साधारण नहीं थी। इसमें पीड़ा थी, लाचारी थी और विश्वास भी था। श्रीकृष्ण समझ गए। उन्होंने उन कन्याओं को वस्तु या भोग की दृष्टि से नहीं देखा। उन्होंने उन्हें उस समाज की पीड़िताओं के रूप में देखा जिनका सम्मान बचाना भी धर्म था। उन्होंने कहा, “तुम निर्दोष हो। तुम्हारा दोष नहीं, असुर का पाप था। मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। तुम मेरी पत्नियाँ कहलाओगी। तुम्हें द्वारका में सम्मान, सुरक्षा और गृहस्थ का अधिकार मिलेगा।”

     

    यह स्वीकार करना साधारण विवाह नहीं था। श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया और ऐश्वर्य से एक साथ अनेक रूप धारण किए। प्रत्येक रानी को अपना पति अलग-अलग प्रासाद में प्राप्त हुआ। हर एक को ऐसा अनुभव हुआ मानो कृष्ण केवल उसी के हैं। यह लीला इसलिए हुई ताकि कोई उपेक्षित न रह जाए। सोलह हज़ार एक सौ प्रासाद बने, सोलह हज़ार एक सौ घर triस्थ जीवन से भर गए। उन रानियों ने पुत्र भी जन्म दिए। भागवत में आता है कि प्रत्येक के दस-दस पुत्र हुए। यह संख्या लीला की विशालता को दर्शाती है, केवल गिनती को नहीं।

     

    अब प्रश्न यह है – वे पत्नियाँ क्यों थीं?

     

    पहला कारण था सम्मान की रक्षा। उस युग की सामाजिक व्यवस्था में बंदी बनाई गई राजकन्याओं का सामान्य विवाह कठिन था। भगवान ने उन्हें अपनी पत्नी बनाकर उनका कलंक मिटाया, उन्हें राजसी गरिमा दी।

     

    दूसरा कारण था शरणागति। उन्होंने कृष्ण को पति रूप में वरना चाहा। भगवान भक्त की पुकार ठुकराते नहीं। चाहे भक्त एक हो या सोलह हज़ार एक सौ।

     

    तीसरा कारण था लीला का विस्तार। कृष्ण केवल आठ भावों तक सीमित नहीं थे। वे अनंत हैं। अनंत पत्नियाँ उनके अनंत रूपों की ओर संकेत करती हैं। एक भगवान, अनेक हृदय, एक साथ सबमें पूर्ण उपस्थिति – यही तो उनकी विशेषता है।

     

    चौथा कारण था अधर्म के परिणाम को धर्म में बदलना। नरकासुर ने स्त्रियों को संपत्ति बनाया। कृष्ण ने उसी प्रसंग को मुक्ति और मर्यादा का प्रसंग बना दिया। अत्याचार का अंत केवल वध से नहीं हुआ, पीड़िताओं के जीवन को पुनर्स्थापित करके हुआ।

     

    इन सोलह हज़ार एक सौ रानियों के व्यक्तिगत नाम पुराणों में विस्तार से नहीं मिलते, जैसा अष्टभार्या के मिलते हैं। वे सामूहिक रूप में स्मरण की जाती हैं। यह भी एक संदेश है – भगवान की दृष्टि में नामहीन पीड़िता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी प्रधान रानी। रुक्मिणी महल की लक्ष्मी थीं, सत्यभामा तेज थीं, जाम्बवती प्राचीन भक्ति थीं, कालिन्दी तप थीं – और ये सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ करुणा थीं।

     

    द्वारका अब अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती थी। एक ओर आठ प्रधान महल, दूसरी ओर हज़ारों प्रासाद। कोई पूछ सकता था कि एक पुरुष इतने संबंध कैसे निभाए। उत्तर लीला में छिपा है। श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम हैं। समय, स्थान और रूप उनके अधीन हैं। वे एक काल में अनेक स्थानों पर पूर्ण रूप से उपस्थित रह सकते हैं। इसलिए यह कथा सामान्य गृहस्थ की नाप-तोल से नहीं देखी जाती। यह ऐश्वर्य और करुणा की कथा है।

     

    अष्टभार्या और सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ मिलाकर श्रीकृष्ण के दांपत्य जीवन का पूरा चित्र बनता है। आठ मुख्य स्तंभ हैं – अलग-अलग प्रदेशों, अलग-अलग परीक्षाओं और अलग-अलग स्वभावों से आए हुए। शेष रानियाँ उस विशाल करुणा का विस्तार हैं जो पीड़ित को भी अपना बना लेती है। कोई रानी प्रेम से आई, कोई पत्र से, कोई युद्ध से, कोई तप से, कोई स्वयंवर से, कोई पिता के समर्पण से, और कोई कारागार की मुक्ति से। मार्ग अलग थे, गंतव्य एक था – कृष्ण के चरण।

     

    इस संपूर्ण विस्तार का सार यही है कि श्रीकृष्ण का संबंध केवल एक भाव तक सीमित नहीं। राधा में निर्गुण प्रेम है, रुक्मिणी में धर्म और लक्ष्मी भाव है, सत्यभामा में तेज और अधिकार है, जाम्बवती में युगों की भक्ति है, कालिन्दी में तप और पवित्रता है, मित्रविंदा में पारिवारिक स्नेह है, नाग्नजिती में पराक्रम से प्राप्त सत्य है, भद्रा में कल्याण है, लक्ष्मणा में लक्ष्य-भेदन का वैभव है, और सोलह हज़ार एक सौ रानियों में शरणागत वत्सलता है।

     

    जो यह पूछता है कि इतनी पत्नियाँ क्यों थीं, उसे संख्या के पीछे का धर्म देखना चाहिए। भगवान ने भोग के लिए गृह नहीं भरे। उन्होंने हर प्रकार की आत्मा को स्थान दिया – राजसी, तपोमयी, अभिमानिनी, शांता, पीड़िता और शरणागता। द्वारका इसीलिए वैकुंठ धरती पर उतरी मानी गई, क्योंकि वहाँ कोई अंतःपुर की कैद नहीं रह गई, कोई राजकन्या अनाथ नहीं रह गई, और कोई भक्त यह नहीं कह सकी कि मेरे लिए स्थान नहीं बचा।

     

    यही अष्टभार्या और सोलह हज़ार एक सौ रानियों की कथा का मर्म है।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • एपिसोड 9: कालिन्दी – यमुना जो कृष्ण की रानी बनीं

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    भारत की पवित्र नदियों में यमुना का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। वह केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक दिव्य चेतना है। उसी यमुना को जब मानव रूप में प्रकट किया गया तो उनका नाम पड़ा – कालिन्दी। कालिन्दी श्रीकृष्ण की अष्टभार्या में से एक थीं। उनकी कथा जल की तरह गहन और भक्ति की तरह निर्मल है।

     

    कालिन्दी सूर्य देव की पुत्री थीं। सूर्य की पत्नी संज्ञा से उनका जन्म हुआ था। उनके भाई यमराज थे, जो धर्मराज कहलाते हैं। कालिन्दी का वर्ण श्याम था, ठीक वैसे ही जैसे यमुना का जल गहरा और श्यामल दिखाई देता है। बचपन से ही उनमें विलक्षण गुण थे। वे चंचल नहीं थीं, बल्कि गंभीर और एकाग्र थीं। जब अन्य देवकन्याएँ विलास और वैभव की बातें करतीं, कालिन्दी एकांत में बैठकर ध्यान करतीं।

     

    एक दिन उन्होंने नारद जी से श्रीकृष्ण की कथा सुनी। नारद जी ने बताया कि द्वापर युग में स्वयं नारायण कृष्ण रूप में अवतरित हुए हैं। वे गोकुल में लीलाएँ कर चुके हैं, मथुरा में कंस का वध कर चुके हैं और अब द्वारका में राज्य कर रहे हैं। कालिन्दी ने जब कृष्ण के रूप, गुण और लीलाओं का वर्णन सुना तो उनका हृदय जैसे थम गया। उन्होंने उसी क्षण निश्चय कर लिया – “मैं इन्हीं को पति के रूप में पाऊँगी। इनके अलावा और कोई मुझे स्वीकार नहीं।”

     

    कालिन्दी ने कठोर तप शुरू कर दिया। वे हिमालय की ऊँची कंदराओं में चली गईं। वहाँ उन्होंने सूर्य के सामने खड़े होकर तपस्या की। गर्मी हो या सर्दी, वर्षा हो या आँधी – वे अडिग रहीं। वर्षों तक वे केवल वायु पीकर रहीं। उनका शरीर कृश हो गया, पर उनकी भक्ति और प्रबल होती गई। वे प्रतिदिन प्रार्थना करतीं, “हे कृष्ण, हे यदुनाथ, हे द्वारकाधीश! यदि मैं सच में आपकी अनन्या दासी हूँ तो मुझे अपनाइए। मैं जल रूप में युगों से आपकी लीलाओं की साक्षी रही हूँ। अब मुझे अपनी पत्नी बनाकर मेरे तप को सफल कीजिए।”

     

    उनकी तपस्या से तीनों लोक प्रभावित हो गए। सूर्य देव स्वयं आकर बोले, “पुत्री, तुम इतना कठोर तप क्यों कर रही हो? कोई भी देवता या राजा तुम्हें पति के रूप में पाकर कृतार्थ हो जाएगा।”

     

    कालिन्दी ने सिर झुकाते हुए कहा, “पिता, मैंने अपना हृदय पहले ही श्रीकृष्ण को दे दिया है। अब मैं किसी और को स्वीकार नहीं कर सकती। या तो वे मुझे स्वीकार करें, या मैं इस शरीर को यहीं त्याग दूँ।”

     

    सूर्य देव समझ गए कि उनकी पुत्री का निश्चय अटल है। वे मौन हो गए।

     

    इधर द्वारका में श्रीकृष्ण सब जानते थे। भक्त की पुकार उन्हें कभी अनसुनी नहीं रहती। एक दिन वे अपने सारथि दारुक के साथ रथ पर बैठकर निकले। रथ सीधे उस स्थान की ओर बढ़ा जहाँ कालिन्दी तपस्या कर रही थीं। जब रथ पहुँचा तो कालिन्दी ध्यान में डूबी हुई थीं। उनके चारों ओर तेज फैला हुआ था। कृष्ण रथ से उतरे और धीरे से उनके पास गए।

     

    “कालिन्दी,” कृष्ण ने मधुर स्वर में पुकारा।

     

    कालिन्दी की समाधि टूटी। उन्होंने आँखें खोलीं तो सामने स्वयं वे खड़े थे जिनके लिए उन्होंने वर्षों तप किया था। श्याम वर्ण, पीतांबर, गले में वनर्माला और मुख पर वह दिव्य मुस्कान। कालिन्दी के नेत्रों में अश्रु भर आए। वे तत्काल भूमि पर गिरकर उनके चरणों में झुक गईं।

     

    “नाथ… आप आ गए,” उनकी आवाज काँप रही थी। “मैंने सोचा था कि मेरा तप अधूरा रह जाएगा। आपने कृपा कर दी।”

     

    कृष्ण ने उन्हें उठाया और बोले, “कालिन्दी, तुम्हारी भक्ति ने मुझे खींच लिया। तुमने शरीर की सुध-बुध खोकर मेरा स्मरण किया। जो भक्त इतनी तन्मयता से पुकारता है, मैं उसके पास बिना बुलाए चला जाता हूँ। आज मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ।”

     

    कालिन्दी ने सिर उठाकर देखा। उनके नेत्रों में विश्वास और प्रेम दोनों थे। वे बोलीं, “स्वामी, मैं यमुना हूँ। मैंने आपकी बाल लीलाएँ देखी हैं। जब आप गोकुल में थे तो मैंने अपने जल से आपके चरण धोए हैं। जब आपने कालीय नाग को नथना तो मेरा जल विषैला हो गया था, पर आपकी कृपा से फिर शुद्ध हो गया। अब आप मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें तो मेरा जीवन सफल हो जाएगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम जल रूप में मेरी लीला की साक्षी रही हो। अब मानव रूप में मेरी धर्मपत्नी बनो। द्वारका तुम्हारा नया घर होगा।”

     

    उसी पावन स्थल पर श्रीकृष्ण ने कालिन्दी के साथ विवाह रचाया। कोई विशाल समारोह नहीं हुआ, कोई राजसी ठाठ नहीं था। केवल दो हृदय थे – एक अनंत के और एक तपोमय के। सूर्य देव ने आकाश से पुष्प वर्षा की और यमराज ने दूर खड़े होकर प्रणाम किया।

     

    कालिन्दी द्वारका आईं। वहाँ की अन्य रानियाँ पहले तो आश्चर्यचकित हुईं कि यह श्यामवर्णा रानी कौन हैं जिनके नेत्रों में नदी जैसी गहराई है। पर जब उन्होंने कालिन्दी का शांत स्वभाव, उनकी सेवा भावना और कृष्ण के प्रति उनकी अनन्य भक्ति देखी तो सभी उन्हें सम्मान देने लगीं।

     

    कालिन्दी अन्य रानियों से अलग थीं। वे कम बोलती थीं। महल के कोलाहल से दूर रहना पसंद करती थीं। वे अक्सर महल के उस भाग में बैठी रहतीं जहाँ से समुद्र दिखाई देता था। कभी-कभी वे श्रीकृष्ण से कहतीं, “स्वामी, समुद्र कितना विशाल है, पर मेरा मन तो अब भी उस यमुना तट पर भटकता है जहाँ आपने बाल लीलाएँ की थीं।”

     

    कृष्ण उत्तर देते, “कालिन्दी, यमुना और तुम अब एक नहीं रहे। तुम मेरे साथ हो, अतः यमुना भी मेरे साथ है। तुम्हारे रूप में वह पवित्रता द्वारका में आ गई है।”

     

    कालिन्दी ने कृष्ण को पुत्र भी दिए। उनके पुत्रों में श्रुत और अन्य वीर योद्धा हुए। पर कालिन्दी मातृत्व में भी भक्ति को नहीं भूलीं। वे अपने पुत्रों को सदैव यही शिक्षा देतीं कि उनके पिता साधारण राजा नहीं, बल्कि तीनों लोकों के आधार हैं।

     

    एक बार सत्यभामा ने हल्के स्वर में कहा, “कालिन्दी, तुम इतनी शांत कैसे रहती हो? हमें तो छोटी-छोटी बातों में भी ईर्ष्या हो जाती है, पर तुम्हारे मुख पर कभी विकार नहीं आता।”

     

    कालिन्दी मुस्कुराईं और बोलीं, “बहन, मैं नदी हूँ। नदी का स्वभाव होता है बहना, न रुकना। मैंने तप करके स्वामी को पाया है। अब मुझे और क्या चाहिए? जो मिल गया है वह अनंत है। अनंत को पाकर फिर अल्पकालिक भावों में उलझना मूर्खता है।”

     

    कृष्ण जब भी कालिन्दी के कक्ष में जाते तो एक अजीब शांति अनुभव करते। रुक्मिणी के पास धर्म और गंभीरता थी, सत्यभामा के पास तेज और अधिकार था, जाम्बवती के पास प्राचीन भक्ति थी – पर कालिन्दी के पास वह गहराई थी जो केवल जल में होती है। वे कृष्ण के मन के भावों को बिना कहे समझ जाती थीं।

     

    कभी-कभी कृष्ण उनसे कहते, “कालिन्दी, तुम मुझे याद दिलाती हो कि मैं केवल द्वारकाधीश नहीं, बल्कि वह भी हूँ जो कभी यमुना तट पर गाय चरता था।”

     

    कालिन्दी उत्तर देतीं, “नाथ, आप चाहे जहाँ रहें, मैं तो वही रहूँगी – आपकी चरणरज को धारण करने वाली। चाहे नदी रूप में, चाहे रानी रूप में।”

     

    इस प्रकार कालिन्दी का जीवन श्रीकृष्ण के साथ भक्ति, समर्पण और गहन शांति से भरपूर रहा। वे अष्टभार्या में सबसे कम चर्चित रानी कही जाती हैं, पर उनकी कथा सबसे अधिक गहरी है। क्योंकि उन्होंने न रूप का अहंकार किया, न वैभव का, न अधिकार का। उन्होंने केवल तप किया और पा लिया।

     

    आज भी जब कोई यमुना तट पर खड़ा होता है तो लगता है मानो कालिन्दी अभी भी वहीं कहीं मौजूद हैं – अपने प्रभु की प्रतीक्षा में, या फिर उनके स्मरण में डूबी हुई। क्योंकि जो नदी भगवान की पत्नी बन जाए, उसका जल कभी साधारण नहीं रह जाता। वह जल फिर स्पर्श मात्र से पाप हर लेने वाला हो जाता है।

     

    कालिन्दी की कथा हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम माँगने से नहीं, तप और समर्पण से मिलता है। और जब वह मिल जाए तो फिर किसी और इच्छा की आवश्यकता नहीं रहती है। 

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • एपिसोड 8: जाम्बवती – जो रीछराज की पुत्री होकर भी कृष्ण की रानी बनीं

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    द्वारका की कथाओं में जब अष्टभार्या की बात आती है तो एक नाम अवश्य लिया जाता है – जाम्बवती। वे श्रीकृष्ण की प्रधान रानियों में से एक थीं। पर उनकी कहानी अन्य रानियों से बिलकुल अलग थी। वे किसी राजा की पुत्री नहीं थीं, न ही किसी सामान्य वंश की। वे थीं – जाम्बवान की पुत्री। और जाम्बवान कोई साधारण प्राणी नहीं थे। वे त्रेता युग से जीवित रीछराज थे, जिन्हें स्वयं भगवान राम ने वरदान दिया था।

     

    जाम्बवान का जन्म उस समय हुआ था जब समुद्र मंथन हो रहा था। वे अत्यंत बलशाली, बुद्धिमान और भगवान राम के परम भक्त थे। राम-रावण युद्ध में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राम ने प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया था कि वे त्रेता से द्वापर तक जीवित रहेंगे और अंत में स्वयं राम को ही फिर से देखेंगे। जाम्बवान उसी वरदान के कारण द्वापर युग तक जीवित थे। वे एक गुफा में अपनी पत्नी और पुत्री जाम्बवती के साथ रहते थे।

     

    जाम्बवती का रूप विचित्र सुंदर था। रीछ वंश में जन्म लेने के कारण उनका वर्ण श्याम था, पर उनके नेत्रों में अपूर्व चमक और गंभीरता थी। वे बचपन से ही पिता के मुख से राम कथा सुनती आ रही थीं। वे जानती थीं कि उनके पिता किसी साधारण व्यक्ति के भक्त नहीं, बल्कि स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनन्य सेवक हैं। जाम्बवती के हृदय में भी उसी भक्ति का बीज बोया जा चुका था।

     

    इधर द्वारका में एक दूसरी कथा चल रही थी – श्यामंतक मणि की।

     

    राजा सत्राजित को सूर्य भगवान से एक दिव्य मणि मिली थी। वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना उत्पन्न करती थी। सत्राजित ने वह मणि अपने भाई प्रसेन को पहनाई। प्रसेन मणि पहनकर वन में घूमने गए। वहाँ एक सिंह ने उन्हें मार डाला और मणि को ले लिया। उसी सिंह को जाम्बवान ने मारकर मणि अपने कब्जे में कर ली और अपनी गुफा में ले आए। वे उसे अपनी पुत्री जाम्बवती के खेलने के लिए दे दिया करते थे।

     

    जब प्रसेन वापस नहीं लौटे तो लोगों में चर्चा होने लगी कि कृष्ण ने लोभवश मणि के लिए प्रसेन की हत्या कर दी है। कृष्ण का नाम खराब हो रहा था। यदुवंशी और अन्य लोग भी संदेह करने लगे। कृष्ण ने निश्चय किया कि वे स्वयं इस कलंक को धोएँगे। वे प्रसेन के मार्ग का अनुसरण करते हुए वन में पहुँचे। वहाँ उन्होंने सिंह के पंजों के निशान देखे और फिर जाम्बवान की विशाल गुफा के द्वार तक पहुँच गए।

     

    गुफा के अंदर से बच्चों के खेलने की आवाज आ रही थी। कृष्ण अंदर घुसे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक छोटी बालिका श्यामंतक मणि को लेकर खेल रही है। वही बालिका जाम्बवती थीं। कृष्ण ने मणि की ओर हाथ बढ़ाया तो जाम्बवान बाहर निकल आए।

     

    जाम्बवान ने कृष्ण को देखा और उन्हें सामान्य मनुष्य समझकर ललकारा, “कौन है जो मेरी गुफा में घुस आया है? क्या तुम मणि चुराने आए हो?”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “हे जाम्बवान, यह मणि सत्राजित की है। मैं इसे वापस लेकर अपना कलंक धोना चाहता हूँ।”

     

    जाम्बवान को यह बात स्वीकार नहीं हुई। वे क्रुद्ध हो गए। दोनों में घमासान युद्ध शुरू हो गया। वह युद्ध साधारण नहीं था। जाम्बवान त्रेता युग के योद्धा थे। उनके प्रहार से पर्वत काँप उठते थे। कृष्ण भी सामान्य रूप में नहीं लड़ रहे थे। दोनों का युद्ध सत्ताईस दिनों तक निरंतर चला। दिन-रात एक जैसे बीत रहे थे। गुफा के बाहर द्वारका के लोग चिंतित थे कि कृष्ण अभी तक वापस क्यों नहीं लौटे।

     

    जाम्बवती इन सब दिनों में भयभीत होकर एक कोने में बैठी अपने पिता और उस अज्ञात योद्धा को देखती रहीं। उनके मन में एक अजीब भाव उठ रहा था। वह श्याम वर्ण का पुरुष जितना बलशाली था, उतना ही सुंदर और दिव्य भी लग रहा था। उनकी दृष्टि बार-बार कृष्ण पर चली जाती थी।

     

    अट्ठाईसवें दिन जाम्बवान थक चुके थे। उनके सारे अस्त्र-शस्त्र व्यर्थ हो चुके थे। कृष्ण ने अंत में उन्हें भूमि पर पटक दिया। जाम्बवान हार मानकर भूमि पर गिर पड़े। उसी क्षण उनकी आँखें खुल गईं। उन्होंने कृष्ण के मुख पर वह तेज देखा जो उन्होंने कभी अयोध्या में राम के मुख पर देखा था।

     

    जाम्बवान का कंठ अवरुद्ध हो गया। वे काँपते हुए बोले, “आप… आप तो मेरे राम हैं! हे रघुनंदन, हे जानकीनाथ! आपने मुझे फिर से दर्शन दिए। मैं अंधा हो गया था। मैं आपको पहचान नहीं पाया।”

     

    वे रोते हुए कृष्ण के चरणों में गिर पड़े। कृष्ण ने उन्हें उठाया और गले लगाया। बोले, “जाम्बवान, तुम मेरे पुराने सेवक हो। तुम्हारा बल और भक्ति दोनों अद्वितीय हैं। अब उठो।”

     

    जाम्बवान ने मणि कृष्ण के चरणों में रख दी और कहा, “नाथ, यह मणि आपकी ही है। इसे वापस ले जाइए। पर मैं केवल मणि देकर संतुष्ट नहीं हो सकता। मेरी सबसे अमूल्य वस्तु आपको अर्पण करता हूँ।”

     

    उन्होंने जाम्बवती को बुलाया। जाम्बवती उस समय घूँघट निकालकर खड़ी थीं। उनके नेत्रों में अश्रु और भक्ति दोनों थे। जाम्बवान ने कहा, “नाथ, यह मेरी पुत्री जाम्बवती है। मैं इसे आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। आप इसे स्वीकार कीजिए। यह आपकी दासी बनेगी।”

     

    कृष्ण ने जाम्बवती की ओर देखा। जाम्बवती ने सिर झुकाते हुए कहा, “स्वामी, मैं आपके चरणों की धूल माँगती हूँ। यदि आप स्वीकार करें तो मैं जीवन भर आपकी सेवा करूँगी।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराते हुए जाम्बवान से कहा, “जाम्बवान, तुम्हारी भक्ति ने आज मुझे बाँध लिया। मैं तुम्हारी पुत्री को स्वीकार करता हूँ।”

     

    उसी गुफा में, उसी दिव्य वातावरण में श्रीकृष्ण ने जाम्बवती का पाणिग्रहण किया। कोई राजसी ठाठ-बाट नहीं था, कोई स्वयंवर नहीं था, कोई रथ की भागदौड़ नहीं थी। केवल भक्ति थी, समर्पण था और एक पिता का असीम प्रेम था जिसने अपनी पुत्री को स्वयं भगवान को सौंप दिया।

     

    जब कृष्ण जाम्बवती और श्यामंतक मणि के साथ द्वारका लौटे तो सारा नगर आश्चर्यचकित रह गया। लोगों ने देखा कि कृष्ण के साथ एक नई रानी आई हैं जिनका रूप अलग है, पर जिनके नेत्रों में गहरी शांति और भक्ति है। सत्राजित को मणि वापस मिली और कृष्ण का सारा कलंक धुल गया।

     

    जाम्बवती द्वारका की रानी बन गईं। वे अन्य रानियों की तुलना में कम बोलती थीं। उनका स्वभाव शांत, गंभीर और अत्यंत भक्तवत् था। वे कृष्ण की सेवा में हमेशा तत्पर रहतीं। जब कृष्ण युद्ध पर जाते तो जाम्बवती घंटों मंदिर में बैठकर प्रार्थना करतीं। वे जानती थीं कि उनके पति साधारण नहीं, स्वयं वे हैं जिनके चरणों में उनके पिता ने युगों तक सेवा की थी।

     

    समय आने पर जाम्बवती ने कृष्ण को एक पुत्र दिया जिसका नाम साम्ब रखा गया। साम्ब बड़ा होकर अत्यंत बलशाली और रूपवान हुआ। जाम्बवती की मातृत्व और पत्नीत्व दोनों ही भूमिकाएँ भक्ति से ओतप्रोत रहीं।

     

    कभी-कभी रात के समय जब कृष्ण उनके कक्ष में आते तो जाम्बवती पूछ बैठतीं, “स्वामी, क्या आप सच में वे ही राम हैं जिनकी कथा मेरे पिता सुनाया करते थे?”

     

    कृष्ण मुस्कुराते हुए कहते, “जाम्बवती, नाम और रूप बदलते रहते हैं। पर जो भक्त का है, वह सदा उसी का रहता है। तुम्हारे पिता ने मुझे राम रूप में देखा, तुम मुझे कृष्ण रूप में देख रही हो। अंत में दोनों एक ही हैं।”

     

    जाम्बवती इन शब्दों को सुनकर कृतार्थ हो जातीं। वे समझ गई थीं कि उनका विवाह किसी राजसी समझौते या रूप के आकर्षण से नहीं हुआ था। उनका विवाह भक्ति की नींव पर हुआ था। उनके पिता ने उन्हें दान में नहीं दिया था, बल्कि स्वयं भगवान को अर्पण किया था।

     

    द्वारका के इतिहास में जाम्बवती का नाम इसलिए अमर हो गया क्योंकि वे उस सेतु थीं जो त्रेता और द्वापर को जोड़ता था। वे उस भक्ति की प्रतीक थीं जो बल और अहंकार के बाद भी बची रहती है। जब जाम्बवान हार गए तब उनकी भक्ति जीती, और उसी भक्ति ने उनकी पुत्री को भगवान की पत्नी बना दिया।

     

    आज भी जब कोई भक्त जाम्बवती का नाम लेता है तो याद आता है कि भगवान को पाने के लिए न रूप चाहिए, न वैभव, न राजसी ठाठ। केवल सच्ची पहचान और पूर्ण समर्पण काफी है। जाम्बवान ने पहचाना और दे दिया। जाम्बवती

    ने स्वीकार किया और अपना लिया। यही उनकी कथा का सार है।

     

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  • एपिसोड 7: तुलाधार – जब तीनों लोकों का भार तौला गया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    नारद जी ने सत्यभामा की आँखों में देखा और शांत स्वर में बोले, “सत्यभामा, तुमने कहा था कि तुम इतना दान दोगी कि मैं उसे समेट भी नहीं पाऊँगा। तो सुनो मेरी माँग। जितने वजन के श्रीकृष्ण हैं, उतने वजन का दान मुझे दे दो। चाहे वह सोना हो, चाँदी हो, हीरा हो, मोती हो या अनाज हो – जो तुम्हारी इच्छा हो। बस उनका वजन पूरा उतरना चाहिए।”

     

    यह सुनते ही सत्यभामा के मुख पर पहले की उदासी गायब हो गई। उनके नेत्रों में एक नई चमक आ गई। वे सोचने लगीं – केवल वजन भर का दान? इतना तो कुछ भी नहीं। मेरे पिता के श्यामंतक मणि से प्रतिदिन सोने की वर्षा होती थी। द्वारका का खजाना तो अथाह है। स्वामी का वजन भला कितना होगा? वे तो सामान्य मनुष्य जैसे दिखते हैं। इतना सोना तो मैं तुरंत दे दूँगी।

     

    वे प्रसन्न होकर बोलीं, “नारद जी, आप को बस इतना ही चाहिए? केवल उनके वजन भर का दान? ठीक है। मैं दूँगी। अभी दूँगी। आप निश्चिंत रहिए।”

     

    नारद जी ने फिर एक बार चेतावनी दी, “सत्यभामा, सोच लो। एक बार तुला पर बैठ गए तो फिर पीछे नहीं हटा जा सकता।”

     

    सत्यभामा ने गर्व भरे स्वर में कहा, “मैं सोच चुकी हूँ मुनिवर। आप आज्ञा दीजिए। तराजू लगवाया जाए।”

     

    तुरंत द्वारका के महल में हलचल मच गई। सत्यभामा के आदेश से एक विशाल तुलाधार तैयार किया गया। दो बड़े-बड़े पलड़े थे। एक पलड़े पर श्रीकृष्ण को विराजमान किया जाना था और दूसरे पर दान की सामग्री रखी जानी थी। सारे खजांची, सैनिक और दासीगण दौड़ने लगे। सोने के ढेर लगाए जाने लगे, चाँदी की थालियाँ लाई जाने लगीं, हीरे-मोती के पिटारे खोले जाने लगे।

     

    रुक्मिणी दूर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनके मुख पर चिंता थी। वे जानती थीं कि श्रीकृष्ण को तौलना साधारण बात नहीं। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे मौन खड़ी लीला का अंग बनकर देखती रहीं।

     

    जब सब तैयार हो गया तो नारद जी ने कहा, “अब श्रीकृष्ण को एक पलड़े पर बिठाओ।”

     

    श्रीकृष्ण शांत भाव से उस पलड़े पर जा बैठे। उनके मुख पर वही मधुर मुस्कान थी। मानो वे बच्चों का कोई खेल देख रहे हों। उन्होंने अपने दोनों चरण तुला पर रखे और सहज भाव से बैठ गए। दूसरे पलड़े पर सत्यभामा ने स्वयं पहले सोने की ईंटें रखनी शुरू कीं। एक… दो… दस… पचास… सौ। पलड़ा हिला तक नहीं।

     

    सत्यभामा की दासी ने और सोना लाकर रखा। फिर भी तुला में कोई हलचल नहीं हुई। सत्यभामा का माथा अब भी आश्वस्त था। उन्होंने कहा, “और लाओ। खजाने से और सोना निकालो।”

     

    ढेर के ढेर सोना आने लगा। चाँदी की बड़ी-बड़ी टिकियाँ रखी गईं। हीरों के पिटारे खाली किए गए। मोतियों की मालाएँ डाल दी गईं। पर तुला का पलड़ा एक इंच भी ऊपर नहीं उठा। श्रीकृष्ण जैसे बैठे थे वैसे ही बैठे रहे। उनके वजन का तिल भर भी प्रभाव नहीं दिखा।

     

    अब सत्यभामा के माथे पर पसीना आ गया। वे स्वयं नीचे उतरकर खजांचियों को आज्ञा देने लगीं, “और लाओ! महल का सारा सोना लाओ। रानियों के आभूषण लाओ। कुछ भी मत छोड़ो।”

     

    रानियों के गहने उतारे जाने लगे। सत्यभामा ने अपने स्वयं के गले का हार उतारकर तुला पर रख दिया। फिर भी कुछ नहीं हुआ। वे अब घबरा रही थीं। उन्होंने नारद जी की ओर देखा। नारद जी शांत खड़े मुस्कुरा रहे थे।

     

    सत्यभामा ने आवाज उठाई, “खजांची! राज्य का सारा खजाना यहाँ लाओ। एक भी मुद्रा पीछे मत छोड़ना।”

     

    अब तो द्वारका का अथाह खजाना तुला के दूसरे पलड़े पर डाला जाने लगा। सोने के कलश, रत्नों के संदूक, चाँदी के सिंहासन तक लाकर रख दिए गए। पूरा आँगन सोने-चाँदी से पट गया। पर तुला का पलड़ा जहाँ था वहीं रहा। श्रीकृष्ण का पलड़ा जरा भी नहीं हिला।

     

    सत्यभामा के पैर अब काँप रहे थे। उनके नेत्रों में अविश्वास और भय दोनों एक साथ थे। वे बार-बार तुला को देखतीं और फिर श्रीकृष्ण के मुख की ओर। कृष्ण शांत बैठे हुए थे। उनके नेत्र आधे बंद थे मानो वे ध्यान में हों। उनके मुख पर न गर्व था, न लज्जा। केवल एक अद्भुत शांति थी।

     

    अंत में सत्यभामा ने हार मानते हुए नारद जी से कहा, “मुनिवर… यह क्या हो रहा है? इतना वैभव डाल दिया… पूरा राज्य का खजाना डाल दिया… फिर भी तुला नहीं हिली। मेरे स्वामी का वजन ही नहीं उतर रहा।”

     

    नारद जी ने धीरे से कहा, “सत्यभामा, अब समझ में आया? जिन्हें तुमने साधारण पति समझकर दान कर दिया था, क्या वे साधारण हैं? तीनों लोक जिनके एक रोम में समा जाते हैं, क्या उन्हें सोने-चाँदी से तौला जा सकता है?”

     

    सत्यभामा की आँखों से आँसू बह निकले। वे तुला के पास जाकर बैठ गईं और रोते हुए बोलीं, “अब समझ में आया नारद जी… अब समझ में आया। इन्हें कोई नहीं तौल सकता। ये त्रिलोकीनाथ हैं। ये अनंत हैं। इनका आदि नहीं, अंत नहीं। मैं कितना सोना डालती, कैसे इनका वजन पूरा कर सकती थी?”

     

    वे श्रीकृष्ण की ओर देखने लगीं। उनके नेत्रों में पश्चाताप की नदी बह रही थी। वे बोलीं, “स्वामी… मैंने आपको कितना छोटा समझा था। मैंने सोचा था कि आप मेरे पति हैं, मेरे अधिकार की वस्तु हैं। मैंने सोचा था कि आपका वजन भी साधारण मनुष्यों जैसा होगा। पर आप तो… आप तो उस पार हैं जहाँ न सोना पहुँचता है, न चाँदी, न कोई भी वैभव।”

     

    रुक्मिणी पास आकर सत्यभामा के कंधे पर हाथ रखकर खड़ी हो गईं। उनके नेत्रों में करुणा थी। वे कुछ नहीं बोलीं। केवल मौन भाव से सत्यभामा का दुख बाँट रही थीं।

     

    सत्यभामा अब जोर-जोर से रो रही थीं। वे बार-बार कह रही थीं, “नारद जी, अब क्या होगा? मैं इनका वजन कैसे पूरा करूँ? मेरे पास और कुछ नहीं बचा। राज्य का सारा खजाना डाल दिया। फिर भी तुला एक इंच नहीं उठी। अब मैं क्या करूँ?”

     

    नारद जी ने शांत स्वर में कहा, “सत्यभामा, अब तुम्हें सत्य दिखाई दे गया है। जिन्हें तुमने दान में दे दिया था, वे केवल तुम्हारे पति नहीं। वे पूरे ब्रह्मांड के आधार हैं। उनकी एक उंगली पर गोवर्धन टिक गया था। उनके एक रोम में अनंत ब्रह्मांड हैं। उन्हें तौलने का विचार ही मूढ़ता था।”

     

    सत्यभामा ने श्रीकृष्ण के चरणों की ओर देखा। वे अभी भी तुला पर विराजमान थे। उनके चरण कमल जैसे शांत थे। सत्यभामा ने उन चरणों की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, “स्वामी… क्षमा कीजिए। मेरे अभिमान ने मुझे अंधा बना दिया था। मैंने आपको नापने की कोशिश की। पर आप नापे नहीं जा सकते। आप तो अनंत हैं।”

     

    पूरे आँगन में सन्नाटा छा गया था। सोने-चाँदी के ढेर इधर-उधर बिखरे पड़े थे। तुला का एक पलड़ा श्रीकृष्ण के भार से अटल खड़ा था और दूसरा पलड़ा वैभव से लदा होने के बावजूद हल्का था। यह दृश्य स्वयं में एक महान शिक्षा बन चुका था।

     

    सत्यभामा अब पूरी तरह टूट चुकी थीं। उनका गर्व धूल में मिल चुका था। वे समझ चुकी थीं कि श्रीकृष्ण को न तो दान में दिया जा सकता है और न ही किसी भी वस्तु से तौला जा सकता है। वे त्रिलोकी के स्वामी हैं। उनका वास्तविक भार केवल प्रेम और भक्ति से ही उतर सकता है – पर वह बात अभी उनके मन में पूरी तरह नहीं आई थी। अभी तो केवल यही समझ आई थी कि वे असमर्थ हैं।

     

    नारद जी ने अंतिम बार सत्यभामा की ओर देखा और बोले, “अब तुम जान गई हो कि जिन्हें तुमने हल्के में लिया था, वे कितने भारी हैं।”

     

     

    सत्यभामा ने केवल सिर झुकाया। उनके मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। आँसू ही उनकी भाषा बन चुके थे।

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  • एपिसोड 6: रुक्मिणी का हस्तक्षेप – जब दान का बोझ भारी पड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    द्वारका के महल में समाचार हवा की तरह फैल गया। सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को एक ब्राह्मण को दान कर दिया है। और वह ब्राह्मण कोई और नहीं, स्वयं देवर्षि नारद हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि श्रीकृष्ण ने वह दान स्वीकार भी कर लिया था। अब वे नारद जी के दास के रूप में उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।

     

    जब यह समाचार रुक्मिणी तक पहुँचा तो उनके नेत्र विस्फारित हो गए। वे कुछ क्षण के लिए वहीं स्तब्ध खड़ी रह गईं। फिर उनके मुख से निकला, “सत्यभामा ने क्या किया? तीनों लोकों के स्वामी को… दान में दे दिया?” उनके हृदय में एक साथ कई भाव उठे – आश्चर्य, दुख और हल्की सी व्यथा। वे तुरंत अपने कक्ष से निकलीं और सत्यभामा के महल की ओर चल दीं।

     

    सत्यभामा उस समय फर्श पर बैठी रो रही थीं। उनका सारा अभिमान चूर-चूर हो चुका था। रुक्मिणी ने उन्हें देखा तो पास जाकर धीरे से कहा, “सत्यभामा, क्या यह सच है? तुमने सच में स्वामी को दान कर दिया?”

     

    सत्यभामा ने सिर उठाया। उनकी आँखें सूजी हुई थीं। वे रोते हुए बोलीं, “जीजा जी… मैंने बड़ी मूर्खता कर दी। नारद जी ब्राह्मण बनकर आए। उन्होंने भिक्षा माँगी। मेरे गर्व ने मुझे अंधा बना दिया। मैंने सोच लिया कि स्वामी कभी मेरा दान स्वीकार नहीं करेंगे। पर वे स्वीकार कर लिया। अब वे नारद जी के दास बनकर उनके पीछे जा रहे हैं।”

     

    रुक्मिणी का मुख गंभीर हो गया। वे बोलीं, “चलो। अभी नारद जी के पास चलते हैं। यह बात यहीं समाप्त नहीं हो सकती।”

     

    दोनों रानियाँ साथ-साथ नारद जी के अस्थायी निवास की ओर गईं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जो दृश्य देखा, उससे उनके हृदय में और भी पीड़ा हुई। श्रीकृष्ण, जो तीनों लोकों के नाथ थे, जो द्वारका के राजा थे, जो स्वयं नारायण थे – वे नारद जी के चरण दबा रहे थे। उनके हाथ में चंवर था और वे नारद जी को हवा कर रहे थे। उनके मुख पर शांत भाव था, मानो यह सब उनकी लीला का ही एक अंग हो।

     

    रुक्मिणी का हृदय काँप उठा। वे आगे बढ़ीं और नारद जी के सामने खड़ी हो गईं। उनकी आवाज में दृढ़ता थी, पर सम्मान भी था। वे बोलीं, “नारद जी, यह क्या लीला रच रखी है आपने? ये मेरे स्वामी हैं। ये केवल सत्यभामा के पति नहीं हैं। ये मेरे भी पति हैं। आपने इन्हें अपना दास बनाने से पहले मुझसे भी तो पूछना चाहिए था।”

     

    नारद जी ने मुस्कुराते हुए रुक्मिणी की ओर देखा। उनकी आँखों में वह चंचल चमक थी जो सदैव लीला करते समय दिखाई देती थी। वे बोले, “रुक्मिणी, तुम ठीक कहती हो। सत्यभामा ने इन्हें दान दिया। इन्होंने स्वीकार भी कर लिया। पर तुम्हारा भी तो इन पर अधिकार है। अब बताओ, तुम्हारा इन पर कितना हिस्सा है?”

     

    रुक्मिणी कुछ क्षण चुप रहीं। नारद जी आगे बोले, “तुम अपना हिस्सा लेकर जा सकती हो। पर सत्यभामा का हिस्सा मेरे पास ही रहेगा। क्योंकि दिया हुआ दान वापस नहीं लिया जाता। यह धर्म की मर्यादा है।”

     

    सत्यभामा यह सुनकर और भी घबरा गईं। वे नारद जी के चरणों में गिर पड़ीं और बोलीं, “मुनिवर, मैंने गलती की। मेरे अभिमान ने मुझे बर्बाद कर दिया। आप दान वापस ले लीजिए। मैं आपको सोना-चाँदी, रत्न-राशि, सब कुछ दे दूँगी। पर मेरे स्वामी को छोड़ दीजिए।”

     

    नारद जी ने सिर हिलाया। “नहीं सत्यभामा। दान की हुई वस्तु वापस लेना महापाप है। अब तो केवल एक ही मार्ग है।”

     

    इतने में रुक्मिणी फिर बोलीं, “नारद जी, यदि हिस्से की बात है तो मेरा हिस्सा भी तो है। आप कैसे केवल सत्यभामा के दान को मानकर इन्हें अपने पास रख सकते हैं?”

     

    नारद जी ने दोनों रानियों की ओर देखा और कहा, “ठीक है। तो फिर इसका समाधान यही है कि सत्यभामा अपना हिस्सा यहाँ छोड़ जाएँ और रुक्मिणी अपना हिस्सा लेकर चली जाएँ। पर शरीर तो एक ही है। हिस्सा कैसे बाँटा जाएगा?”

     

    यह सुनकर सत्यभामा की समझ में कुछ आया। उनके मन में एक नया विचार उठा। वे अभी भी रो रही थीं, पर उनकी आवाज में अब थोड़ी दृढ़ता आ गई थी। वे उठीं और नारद जी के सामने खड़ी होकर बोलीं, “नारद जी, यदि आपको दान ही चाहिए तो ठीक है। मैं आपको दान दूँगी। मैं आपको इतना दूँगी कि आप उसे समेट भी नहीं पाएँगे।”

     

    यह सुनकर श्रीकृष्ण, जो अब तक चुपचाप खड़े चंवर झुला रहे थे, अचानक मुस्कुरा दिए। उनकी मुस्कान में वह दिव्य भाव था मानो वे जानते हों कि अब आगे क्या होने वाला है। उनकी मुस्कान देखकर नारद जी की आँखें और चमक उठीं।

     

    नारद जी ने सत्यभामा की ओर गंभीर दृष्टि से देखा और बोले, “सत्यभामा, सोच लीजिए। एक बार जो बात मुख से निकल जाएगी, फिर उसे वापस नहीं लिया जा सकेगा। आप अभी भी समय रहते सोच सकती हैं। दान का वचन बहुत भारी होता है।”

     

    सत्यभामा ने अपना दुपट्टा ठीक किया। उनकी आँखों में अभी भी अश्रु थे, पर अब उनमें एक अजीब सा निश्चय भी था। वे बोलीं, “नारद जी, मैं सोच चुकी हूँ। मेरे अभिमान ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया है। अब मैं वह सब कुछ दूँगी जो आप माँगेंगे। आप माँगिए। जो भी माँगना है, माँग लीजिए। मैं तैयार हूँ।”

     

    नारद जी ने एक बार फिर श्रीकृष्ण की ओर देखा। कृष्ण अभी भी मुस्कुरा रहे थे। मानो वे अपनी रानी के साहस पर प्रसन्न हों। नारद जी ने सत्यभामा से कहा, “ठीक है। जब तुम इतनी तैयार हो तो सुनो…”

     

    पर नारद जी ने अभी माँग नहीं की थी। वे सत्यभामा की आँखों में झाँक रहे थे। वे देखना चाहते थे कि सत्यभामा के गर्व का अंतिम अवशेष भी निकल चुका है या नहीं। सत्यभामा उनके सामने सिर झुकाए खड़ी थीं। उनके मुख पर पश्चाताप था, पर साथ ही एक अटल निश्चय भी था कि अब वे जो भी दान देंगी, वह ऐसा होगा जिससे नारद जी का मुख बंद हो जाए।

     

    रुक्मिणी भी वहाँ खड़ी सब कुछ देख रही थीं। उनके मन में कई भाव एक साथ चल रहे थे। वे जानती थीं कि सत्यभामा का स्वभाव उग्र है, पर आज उनका यह रूप देखकर वे आश्चर्यचकित थीं। उन्होंने सत्यभामा का हाथ पकड़ लिया और धीरे से कहा, “सत्यभामा, जो भी कहना हो सोच-समझकर कहना। वचन का भार बहुत भारी होता है।”

     

    सत्यभामा ने रुक्मिणी की ओर देखा और सिर हिलाया। फिर नारद जी की ओर मुड़कर बोलीं, “मुनिवर, अब देर मत कीजिए। आप माँगिए। मैं तैयार हूँ। इतना दूँगी कि आप उसे लेकर भी नहीं जा सकेंगे।”

     

    नारद जी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा। जब तुम इतने दृढ़ निश्चय के साथ कह रही हो तो मैं माँगता हूँ…”

     

    इतने में श्रीकृष्ण ने चंवर झुलाना बंद कर दिया। वे दोनों रानियों और नारद जी को बारी-बारी से देखने लगे। उनके नेत्रों में वह लीलामय भाव था जो तब दिखाई देता है जब कोई बड़ी लीला होने वाली हो। सत्यभामा अभी भी नारद जी के सामने खड़ी थीं। उनके हृदय की धड़कन तेज चल रही थी। वे जानती थीं कि अब जो माँगा जाएगा, उसे उन्हें देना ही होगा।

     

    रुक्मिणी ने आकाश की ओर दृष्टि उठाई मानो किसी अदृश्य शक्ति से प्रार्थना कर रही हों। नारद जी ने अपना कमंडल ठीक किया और सत्यभामा की ओर देखने लगे। वातावरण में एक अजीब सा तनाव छा गया था। लगता था मानो अगला शब्द पूरे द्वारका की दिशा बदलने वाला हो।

     

    सत्यभामा ने एक गहरी साँस ली और बोलीं, “नारद जी, अब आप बोलिए। मैं सुनने को तैयार हूँ।”

     

    नारद जी ने धीरे से अपने होठ खोले। पर जो माँग वे करने वाले थे, वह अभी बाकी थी। अभी तो केवल वचन की तैयारी पूरी हुई थी। दान का वास्तविक रूप अभी सामने आना बाकी था।

     

     

    और श्रीकृष्ण… वे अब भी मुस्कुरा रहे थे। मानो सब कुछ उनके खेल का ही एक अंग हो।

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  • एपिसोड 5: सत्यभामा – जिसने अपने पति को दान कर दिया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    द्वारका नगरी में श्रीकृष्ण की अनेक रानियाँ थीं, पर उनमें से एक ऐसी थीं जिनका स्वभाव सबसे अधिक तेज और अभिमानी माना जाता था। उनका नाम था – सत्यभामा।

     

    सत्यभामा राजा सत्राजित की पुत्री थीं। सत्राजित के पास सूर्य भगवान का दिया हुआ अमूल्य रत्न था – श्यामंतक मणि। वह मणि प्रतिदिन सोने की वर्षा करती थी। उसी मणि के कारण सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ था। जब श्यामंतक मणि का प्रसंग चला और कृष्ण ने उस मणि को वापस दिलाया, तब सत्राजित ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री सत्यभामा को कृष्ण को समर्पित कर दिया। इस प्रकार सत्यभामा द्वारका की रानी बनीं।

     

    सत्यभामा रूपवती थीं, चतुर थीं और अत्यंत साहसी भी। वे कृष्ण से बहुत प्रेम करती थीं, पर उनका प्रेम थोड़ा अलग था। रुक्मिणी का प्रेम शांत और गंभीर था, तो सत्यभामा का प्रेम उग्र, अधिकारपूर्ण और कभी-कभी ईर्ष्या से भरा होता था। वे चाहती थीं कि कृष्ण केवल उन्हीं के हों। वे अक्सर गर्व से कहा करतीं, “कृष्ण मुझे सबसे अधिक प्रेम करते हैं। मैंने ही उन्हें सबसे अधिक सुखी रखा है।”

     

    उनके इस अभिमान को देवर्षि नारद अच्छी तरह जानते थे। नारद जी सदैव लीलाओं के सूत्रधार रहते थे। वे चाहते थे कि सत्यभामा के अभिमान को थोड़ा तोड़ा जाए और उन्हें सच्चे प्रेम का पाठ पढ़ाया जाए। एक दिन उन्होंने सोचा कि अब समय आ गया है।

     

    नारद जी ने ब्राह्मण का वेश धारण किया। साधारण वस्त्र, हाथ में कमंडल और मस्तक पर चंदन का टीका लगाकर वे द्वारका के महल में पहुँचे। द्वारपालों ने उन्हें रोका तो उन्होंने कहा, “मैं एक दरिद्र ब्राह्मण हूँ। मुझे रानी सत्यभामा से भिक्षा माँगनी है।”

     

    जब सत्यभामा को सूचना मिली तो वे प्रसन्न हो गईं। वे दानवीर के रूप में प्रसिद्ध होना चाहती थीं। उन्होंने ब्राह्मण को अपने कक्ष में बुलाया। नारद जी अंदर आए और आशीर्वाद दिया, “पुत्री, तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे जैसे दानशील के घर आकर मेरा जन्म सफल हो गया।”

     

    सत्यभामा मुस्कुराईं। उन्होंने दासी से कहा, “इस ब्राह्मण को स्वर्ण मुद्राएँ दो, रत्न दो, वस्त्र दो। इन्हें संतुष्ट करके विदा करो।”

     

    नारद जी ने हाथ जोड़कर कहा, “रानी, मुझे धन की आवश्यकता नहीं। मुझे रत्नों की भी इच्छा नहीं। मैं तो ऐसी भिक्षा माँगने आया हूँ जो संसार में सबसे दुर्लभ है।”

     

    सत्यभामा का अभिमान जाग उठा। वे गर्व से बोलीं, “हे ब्राह्मण देव! इस द्वारका में ऐसी कौन सी वस्तु है जो मैं आपको न दे सकूँ? बोलिए, क्या चाहिए? सोना चाहिए? हाथी चाहिए? रथ चाहिए? राज्य का एक भाग चाहिए? बोलिए, मैं तुरंत दे दूँगी।”

     

    नारद जी ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “रानी, मुझे आपका पति चाहिए।”

     

    कक्ष में अचानक सन्नाटा छा गया। सत्यभामा की आँखें चौड़ी हो गईं। वे अविश्वास से नारद की ओर देखने लगीं। “क्या कहा आपने? मेरे पति? श्रीकृष्ण को?”

     

    नारद जी ने शांत भाव से कहा, “हाँ रानी। आपने कहा था कि इस घर में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो आप न दे सकें। श्रीकृष्ण आपके सबसे प्रिय हैं, आपके सबसे मूल्यवान हैं। अतः मैं भिक्षा में उन्हें ही माँगता हूँ। यदि आप सच में दानवीर हैं तो अपने पति को मुझे दान कर दीजिए।”

     

    सत्यभामा कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गईं। उनके मन में हजारों विचार एक साथ उठने लगे। वे सोचने लगीं – यदि मैं मना कर दूँ तो यह ब्राह्मण कहेगा कि सत्यभामा केवल बातें बनाती है, वास्तव में दान नहीं करती। यदि मैं दे दूँ तो… मेरे कृष्ण मुझसे छिन जाएँगे। पर अभिमान ने उन्हें फिर से घेर लिया। उन्होंने सोचा – कृष्ण मुझसे इतना प्रेम करते हैं कि यह ब्राह्मण उन्हें लेकर भी नहीं जा सकेगा। कृष्ण स्वयं मना कर देंगे। और यदि यह ब्राह्मण उन्हें ले भी गया तो कृष्ण मुझे छोड़कर कैसे रहेंगे? वे अवश्य लौट आएंगे।

     

    इसी गर्व में सत्यभामा ने अपना सिर ऊँचा किया और बोलीं, “हे ब्राह्मण देव! आपने सही कहा। मेरे लिए मेरे पति से बढ़कर कोई वस्तु नहीं। और जब आपने भिक्षा माँगी है तो मैं कैसे मना कर सकती हूँ? मैं अपनी इच्छा से अपने पति श्रीकृष्ण को आपको दान करती हूँ।”

     

    नारद जी ने तुरंत कहा, “तो फिर जल से संकल्प कीजिए रानी। दान तभी पूर्ण होता है जब संकल्प किया जाए।”

     

    सत्यभामा ने दासी से जल का पात्र मँगवाया। उनके हाथ काँप रहे थे, पर अभिमान ने उन्हें रोक रखा था। उन्होंने जल लिया और बोलीं, “आज इस ब्राह्मण को मैं अपने पति श्रीकृष्ण को दान स्वरूप प्रदान करती हूँ। अब ये मेरे नहीं, इन ब्राह्मण के हुए।”

     

    जैसे ही संकल्प के शब्द पूरे हुए, नारद जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “धन्य हो रानी! आपने सच में महान दान किया। अब मैं अपने दान को स्वीकार करने के लिए श्रीकृष्ण के पास चलता हूँ।”

     

    सत्यभामा अभी भी सोच रही थीं कि यह सब एक नाटक है। वे मान बैठी थीं कि कृष्ण इस दान को स्वीकार नहीं करेंगे। वे अपने कक्ष में बैठी इंतजार करने लगीं कि नारद जी खाली हाथ लौटेंगे और कहेंगे कि कृष्ण ने मना कर दिया।

     

    पर नारद जी सीधे वहाँ गए जहाँ कृष्ण विराजमान थे। उन्होंने जाकर कहा, “कृष्ण, आपकी पत्नी सत्यभामा ने आपको मुझे दान कर दिया है। अब आप मेरे हुए। चलिए मेरे साथ।”

     

    कृष्ण ने शांत भाव से सत्यभामा की ओर देखा। उनकी आँखों में हल्की सी मुस्कान थी, मानो वे सब कुछ पहले से जानते हों। उन्होंने कहा, “नारद जी, जब मेरी पत्नी ने संकल्प करके मुझे दान कर दिया है तो मैं कैसे मना कर सकता हूँ? दान की गई वस्तु वापस नहीं ली जाती। मैं तैयार हूँ।”

     

    जब सत्यभामा को यह समाचार मिला कि कृष्ण ने वास्तव में दान स्वीकार कर लिया है और नारद जी के साथ जाने को तैयार हैं, तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। अभिमान का महल एक पल में ढह गया। वे भागती हुई कृष्ण के कक्ष में आईं। उनके नेत्रों में आँसू भरे थे और आवाज काँप रही थी।

     

    “स्वामी… आप क्या कर रहे हैं? वह तो एक साधारण ब्राह्मण था। मैंने तो केवल… मैंने तो केवल…” सत्यभामा बोल नहीं पा रही थीं। गर्व के कारण उन्होंने जो शब्द कहे थे, वे अब उनके गले में काँटे बनकर चुभ रहे थे।

     

    कृष्ण ने शांत दृष्टि से उनकी ओर देखा और बोले, “सत्यभामा, तुमने स्वयं जल लेकर संकल्प किया था। अब तुम अपना शब्द वापस कैसे ले सकती हो? दान देकर पछताना धर्म नहीं है।”

     

    सत्यभामा के आँसू अब धारा बनकर बहने लगे। वे कृष्ण के चरणों में गिर पड़ीं और रोते हुए बोलीं, “स्वामी, मैंने मूर्खता की। मेरे अभिमान ने मुझे अंधा बना दिया। मैंने सोचा था कि आप मुझे कभी नहीं छोड़ेंगे। मैंने सोचा था कि मेरा प्रेम इतना बड़ा है कि कोई आपको मुझसे छीन नहीं सकता। पर मैं गलत थी। कृपया इस दान को स्वीकार न कीजिए। मैं वह सब कुछ दे दूँगी जो आप माँगेंगे, पर आप… आप मुझे छोड़कर मत जाइए।”

     

    नारद जी वहीं खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा, “रानी, अब देर हो चुकी है। संकल्प हो चुका है। श्रीकृष्ण अब मेरे हो गए हैं।”

     

    सत्यभामा बार-बार कृष्ण के चरण पकड़कर रो रही थीं। उनका सारा गर्व धुल चुका था। वे बार-बार कह रही थीं, “स्वामी, मैंने नहीं जाना था कि मेरे शब्द इतने भारी होंगे। मैंने नहीं जाना था कि दान की गई वस्तु इतनी जल्दी स्वीकार हो जाएगी। कृपया मुझे क्षमा करें।”

     

    कृष्ण ने धीरे से उन्हें उठाया। उनके मुख पर अभी भी वही शांत भाव था। वे बोले, “सत्यभामा, तुमने आज जो किया है उसके परिणाम तुम्हें भोगने होंगे। अब नारद जी मुझे लेकर जाएँगे। तुम सोचो कि जब पति ही न रहे तो पत्नी का क्या मूल्य रह जाता है।”

     

    सत्यभामा का हृदय टूट रहा था। वे बार-बार नारद जी के चरणों में गिरकर विनती कर रही थीं, “हे मुनिवर, आप दान वापस कर दीजिए। मैं आपको अपना सारा वैभव दे दूँगी। मैं आपको सोने के ढेर लगा दूँगी। पर मेरे पति को छोड़ दीजिए।”

     

    नारद जी ने शांत स्वर में कहा, “रानी, दान वापस नहीं होता। अब तो केवल एक ही उपाय है।”

     

    पर उस उपाय की बात आगे की है। अभी तो सत्यभामा अपने किए पर पछतावे के सागर में डूबी हुई थीं। उन्होंने गर्ववश अपने प्राणप्रिय पति को एक ब्राह्मण को दान कर दिया था। और वह दान स्वीकार भी हो चुका था।

     

    महल में सन्नाटा छा गया था। सत्यभामा रोते-रोते बार-बार उसी क्षण को कोस रही थीं जब उन्होंने जल लेकर संकल्प किया था। उनका अभिमान चूर-चूर हो चुका था। और श्रीकृष्ण… वे शांत खड़े नारद जी के साथ जाने को तैयार थे।

     

     

     

    यहीं तक की लीला आज पूरी हुई।

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  • एपिसोड 4: रुक्मिणी का प्रश्न – क्या प्रेमिका पत्नी से बड़ी होती है?

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    द्वारका का वह संध्याकाल अत्यंत शांत था। समुद्र की लहरें महल की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थीं। आकाश में तारे धीरे-धीरे चमकने लगे थे। महल के भीतरी कक्ष में दीपक जल रहे थे। सोने के सिंहासन पर श्रीकृष्ण विराजमान थे। उनके मुख पर वह शांत मुस्कान थी जो सदैव उनके चेहरे पर रहती थी। गले में वैजयन्ती माला और हाथ में बाँसुरी थी, पर वे बाँसुरी नहीं बजा रहे थे। बस समुद्र की ओर देखते हुए मौन बैठे थे।

     

    रुक्मिणी देवी उस समय अपने कक्ष में थीं। पर उनका मन व्याकुल था। कई दिनों से उनके कानों में एक नाम बार-बार गूँज रहा था – राधा। दासी लोग बातें करतीं, सैनिक गोकुल की कथाएँ सुनाते, और कभी-कभी स्वयं कृष्ण भी किसी प्रसंग में ब्रज और राधा का नाम ले लेते। हर बार जब वह नाम आता, रुक्मिणी के हृदय में एक अजीब सा दर्द उठता। वे जानती थीं कि वे कृष्ण की धर्मपत्नी हैं, उनकी प्रधान रानी हैं, लक्ष्मी रूप हैं। फिर भी वह नाम… वह राधा नाम उनके मन को क्यों मथ देता था?

     

    आज वे अधिक देर तक सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने अपना दुपट्टा ठीक किया, माथे पर चंदन का टीका लगाया और धीरे-धीरे कृष्ण के कक्ष की ओर चल दीं। द्वार पर पहुँचकर उन्होंने संकेत किया। कृष्ण ने दृष्टि उठाई और मुस्कुराते हुए कहा, “आओ रुक्मिणी। आज तुम्हारे मुख पर कुछ चिंता की रेखाएँ दिख रही हैं। क्या बात है?”

     

    रुक्मिणी अंदर आईं। उन्होंने कृष्ण के चरणों में अपना सिर रख दिया। कृष्ण ने उन्हें उठाया और पास बिठाया। रुक्मिणी कुछ देर तक चुप रहीं। उनकी आँखों में अश्रु की रेखाएँ थीं, पर वे बह नहीं रहे थे। फिर उन्होंने धीरे से अपना सिर उठाया और कृष्ण की आँखों में आँखें डालकर कहा –

     

    “स्वामी… मैं आपकी पत्नी हूँ। आपने मुझे कुंडिनपुर से उठाकर यहाँ लाया। आपने मुझे अपनी रानी बनाया। मैं आपके घर की लक्ष्मी हूँ। मैंने आपको अपना सब कुछ अर्पण कर दिया। फिर भी… आपके हृदय में वह नाम क्यों बसा रहता है?”

     

    कृष्ण शांत रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस रुक्मिणी को देखते रहे।

     

    रुक्मिणी की आवाज काँप उठी। वे आगे बोलीं, “राधा… वह राधा। ब्रज की वह गोपिका। मैंने सुना है कि आप उसके नाम से ही भर जाते हैं। कभी-कभी रात को जब आप बाँसुरी बजाते हैं तो उस धुन में भी वही नाम छिपा लगता है। स्वामी, मैं पूछना चाहती हूँ… क्या एक प्रेमिका का रिश्ता पत्नी से बड़ा होता है? क्या मेरा पतिधर्म, मेरा समर्पण, मेरा प्रेम… उस प्रेमिका के प्रेम से छोटा है?”

     

    कक्ष में गहरा सन्नाटा छा गया। केवल समुद्र की लहरों की आवाज दूर से आ रही थी। कृष्ण ने धीरे से रुक्मिणी का हाथ अपने हाथ में लिया। उनके स्पर्श में वह वही ममता थी जो सदैव रहती थी। फिर वे बोले –

     

    “रुक्मिणी, तुम्हारा प्रश्न केवल तुम्हारा नहीं है। यह प्रश्न उस हर आत्मा का है जो प्रेम के दो रूपों के बीच उलझ जाती है। तुम सुनो… मैं तुम्हें सत्य बताता हूँ।”

     

    कृष्ण की आवाज बहुत धीमी और गहरी थी। वे बोले, “राधा और तुम… दोनों मेरे जीवन के दो अलग-अलग अध्याय हो। तुम मेरी धर्मपत्नी हो। तुमने समाज के सामने मेरे साथ गृहस्थ आश्रम स्वीकार किया। तुमने मुझे पुत्र दिए। तुमने द्वारका के राज्य को लक्ष्मी का आशीर्वाद दिया। तुम्हारा प्रेम जिम्मेदारी से भरा है, कर्तव्य से भरा है, और त्याग से भरा है। जब मैं युद्ध पर जाता हूँ तो तुम मंदिर में बैठकर मेरी विजय की प्रार्थना करती हो। जब मैं लौटता हूँ तो पहले तुम्हारे चरण छूता हूँ। तुम मेरी अर्धांगिनी हो। यह सच है।”

     

    रुक्मिणी की आँखों में आँसू आ गए। वे बोलीं, “फिर वह राधा क्या है स्वामी? वह आपके हृदय में क्यों बसती है?”

     

    कृष्ण ने दृष्टि समुद्र की ओर कर ली। मानो वे दूर ब्रज को देख रहे हों। फिर बोले, “राधा… राधा प्रेम का वह रूप है जो किसी बंधन में नहीं बँधता। उसने मुझसे विवाह नहीं किया। उसने मुझसे कोई माँग नहीं की। उसने मुझसे राज्य नहीं माँगा, पुत्र नहीं माँगे, सुख नहीं माँगा। उसने केवल अपना हृदय दे दिया। जब मैं ब्रज छोड़कर आया तो वह रोई, पर उसने मुझे रोका नहीं। उसने कहा – ‘जाओ कान्हा, अपना धर्म निभाओ।’ जिस प्रेम में त्याग इतना गहरा हो कि वह अपने प्रिय को अपने पास बाँधने की इच्छा तक न करे… वह प्रेम साधारण नहीं होता।”

     

    रुक्मिणी अब जोर-जोर से रो रही थीं। वे बोलीं, “तो क्या मेरा प्रेम छोटा है? क्या मैंने कम त्याग किया? मैंने अपने भाई को छोड़ा, अपने पिता का राज्य छोड़ा, सब कुछ छोड़कर आपके रथ पर बैठ गई। क्या वह त्याग कुछ नहीं?”

     

    कृष्ण ने दोनों हाथों से रुक्मिणी के आँसू पोंछे। उनकी आवाज में अपार कोमलता थी। “नहीं मेरी रानी। तुम्हारा त्याग छोटा नहीं है। तुम्हारा प्रेम भी महान है। पर दोनों प्रेम की दिशा अलग है। तुम्हारा प्रेम जैसे नदी का है जो किनारे बाँधकर बहती है – सुंदर, जीवनदायिनी और स्थिर। राधा का प्रेम जैसे वर्षा का है जो आकाश से बिना किसी बाँध के बरसती है। वह जहाँ गिरती है वहाँ सब कुछ उगा देती है, पर खुद किसी खेत की सीमा में नहीं बँधती।”

     

    कृष्ण थोड़ा रुके। फिर बोले, “रुक्मिणी, जब मैं बाँसुरी बजाता हूँ तो वह धुन ब्रज की याद दिलाती है। वह याद मुझे कमजोर नहीं करती। वह मुझे याद दिलाती है कि प्रेम कितना निर्मल हो सकता है। राधा ने मुझे सिखाया कि असली प्रेम वह है जिसमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ नहीं होता। केवल ‘तुम’ होता है। तुमने मुझे सिखाया कि प्रेम जिम्मेदारी भी होता है, साथ निभाना भी होता है, और समाज के बीच धर्मपूर्वक रहना भी होता है। दोनों आवश्यक हैं।”

     

    रुक्मिणी ने सिर उठाया। उनकी आँखों में अभी भी अश्रु थे, पर अब उनमें समझ की एक हल्की सी रोशनी भी थी। वे बोलीं, “स्वामी… क्या आप कभी राधा को भूल सकते हैं?”

     

    कृष्ण ने धीरे से सिर हिलाया। “नहीं। जैसे मैं तुम्हें नहीं भूल सकता, वैसे ही उसे भी नहीं भूल सकता। पर भूलने और हृदय में स्थान देने में अंतर है। राधा मेरे हृदय के उस हिस्से में है जहाँ कोई दूसरा प्रवेश नहीं कर सकता। वह हिस्सा केवल प्रेम के लिए है – निर्गुण, निराकार और अनंत। और तुम मेरे जीवन के उस हिस्से में हो जहाँ मैं पति हूँ, राजा हूँ और गृहस्थ हूँ। तुम मेरे दिन हो, राधा मेरी रात की स्मृति है। दोनों मिलकर ही मैं पूरा होता हूँ।”

     

    रुक्मिणी अब शांत हो चली थीं। उन्होंने कृष्ण का हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया और बोलीं, “मुझे ईर्ष्या होती थी स्वामी। मुझे लगता था कि मैं अधूरी हूँ। लगता था कि आपकी पत्नी होकर भी मैं आपकी सबसे प्रिय नहीं हूँ। पर अब समझ में आया… प्रेम की तुलना नहीं होती। नदी और वर्षा दोनों जल देते हैं, पर उनका ढंग अलग है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने रुक्मिणी को अपने वक्ष से लगा लिया। “ठीक कहा तुमने। तुलना करना ही सबसे बड़ा भ्रम है। तुम मेरी लक्ष्मी हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं, वहाँ नारायण का वास अधूरा है। राधा मेरी भक्ति है। जहाँ भक्ति नहीं, वहाँ भगवान भी अधूरे हैं। तुम दोनों मिलकर मेरी लीला को पूर्ण करती हो।”

     

    कक्ष में दीपक की लौ हिल रही थी। बाहर समुद्र और जोर से गरज रहा था। रुक्मिणी ने कृष्ण के गले में बाहें डाल दीं और बोलीं, “स्वामी, आज के बाद मैं राधा के नाम से नहीं डरसँगी। मैं उन्हें प्रणाम करूँगी। क्योंकि उन्होंने आपको वह प्रेम दिया जो मैं नहीं दे सकती थी। और मैं आपको वह साथ देती हूँ जो वे नहीं दे सकती थीं। दोनों जरूरी हैं।”

     

    कृष्ण ने रुक्मिणी के माथे पर अपने होंठ रखे और बोले, “तुम सच्ची रानी हो रुक्मिणी। केवल द्वारका की नहीं, मेरे हृदय की भी। आज तुमने जो प्रश्न पूछा, उसने तुम्हें और महान बना दिया। ईर्ष्या से ऊपर उठकर समझ तक पहुँचना… यही तो सच्चा प्रेम है।”

     

    दोनों देर तक ऐसे ही बैठे रहे। कोई और शब्द नहीं बोला गया। केवल मौन था – वह मौन जिसमें सब कुछ कह दिया गया था। रुक्मिणी अब शांत थीं। उनके हृदय से वह काँटा निकल चुका था जो कई दिनों से चुभ रहा था। और कृष्ण… कृष्ण जानते थे कि उनकी पत्नी ने आज एक और सीढ़ी चढ़ ली है – प्रेम की उस सीढ़ी पर जहाँ केवल समझने वाले ही पहुँचते हैं।

     

    रात गहराती गई। दीपक धीरे-धीरे बुझने लगे। पर उस कक्ष में एक नई रोशनी जल उठी थी – समझ की, स्वीकार की और गहरे प्रेम की।

     

    रुक्मिणी ने अंतिम बार कहा, “स्वामी, अब आप बाँसुरी बजा सकते हैं। यदि उसमें राधा का नाम भी हो… तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। क्योंकि अब मैं जान गई हूँ कि वह नाम आपके हृदय का हिस्सा है, मेरे विरुद्ध नहीं।”

     

    कृष्ण ने बाँसुरी उठाई। और उस रात द्वारका के महल में जो धुन निकली, उसमें ब्रज भी था, द्वारका भी था… राधा भी थीं, और रुक्मिणी भी थीं।

     

     

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    Lakshmi Kumari

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  • एपिसोड 3: रुक्मिणी – जो लक्ष्मी बनकर आईं द्वारका

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    मथुरा में कंस का वध हो चुका था। कृष्ण अब केवल गोकुल के कान्हा नहीं रह गए थे। वे यदुवंश के रक्षक, धर्म के स्थापित करने वाले और द्वारका के भावी राजा बन चुके थे। समुद्र के बीचों-बीच उन्होंने एक अद्भुत नगरी बसाई – द्वारका। सोने की दीवारें, रत्नों के महल, और यमुना की जगह अब समुद्र की लहरें उनके चरण धोती थीं। पर उनके हृदय में अभी भी ब्रज की धूल और राधा की स्मृति बसी हुई थी। फिर भी लीला आगे बढ़नी थी।

     

    उधर, दक्षिण दिशा में विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर में एक अपूर्व सुंदरी जन्म ले चुकी थी। उसका नाम था – रुक्मिणी।

     

    रुक्मिणी राजा भीष्मक की पुत्री थीं। उनके बड़े भाई का नाम रुक्मी था, जो स्वभाव से घमंडी और महत्वाकांक्षी था। रुक्मिणी का रूप ऐसा था मानो स्वयं लक्ष्मी धरती पर अवतरित हो गई हों। श्याम वर्ण नहीं, बल्कि गौर वर्ण की वह राजकुमारी थीं। लंबे काले बाल, कमल जैसे नेत्र, और चलते समय ऐसी छवि मानो हिरणी वन में विचर रही हो। पर उनकी सबसे बड़ी सुंदरता उनके हृदय में थी। वे बचपन से ही भगवान विष्णु की परम भक्त थीं।

     

    जब रुक्मिणी किशोरावस्था में पहुंचीं, तो उनके कानों में एक नाम बार-बार पड़ने लगा – कृष्ण। यादव कुल के श्यामसुंदर, जिन्होंने कंस जैसे अत्याचारी का वध किया, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को एक अंगुली पर उठा लिया, और जिनकी बांसुरी की धुन से सारा ब्रज मोहित हो जाता था। राजकुमारियाँ जब उनकी कथाएँ सुनतीं तो मुग्ध हो जातीं, पर रुक्मिणी के हृदय में कुछ और ही घटित हुआ।

     

    एक दिन महल के उपवन में बैठी रुक्मिणी अपनी दासी से कह रही थीं, “सखी, क्या तुमने सुना है? द्वारका में जो कृष्ण रहते हैं, वे साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे तो स्वयं नारायण हैं।” दासी हँसी, “राजकुमारी, आप भी ना! कितने राजकुमार आपसे विवाह करना चाहते हैं, और आप किसी यादव की बात करती हैं?”

     

    रुक्मिणी मुस्कुराईं। उनके नेत्रों में एक अजीब चमक थी। “नहीं सखी। मैंने उनके गुण सुने हैं। वे सत्यवादी हैं, वे शरणागतवत्सल हैं, वे गरीबों के रक्षक हैं। रूप की बात तो बाद में आती है। पहले तो हृदय जीतना होता है। और मेरा हृदय तो उनके नाम से ही जीत लिया गया है।”

     

    धीरे-धीरे रुक्मिणी का प्रेम गहरा होता गया। वे प्रतिदिन मंदिर में जाकर विष्णु भगवान की पूजा करतीं और मन ही मन प्रार्थना करतीं, “हे नाथ! यदि आप वास्तव में कृष्ण रूप में अवतरित हुए हैं, तो मुझे स्वीकार कीजिए। मैं आपको ही अपना पति बनाना चाहती हूँ।”

     

    पर यहाँ विघ्न भी थे। रुक्मिणी के भाई रुक्मी को कृष्ण से गहरा द्वेष था। वह चाहता था कि उसकी बहन शिशुपाल से विवाह करे। शिशुपाल चेदि देश का राजा था और कंस का मित्र रहा था। रुक्मी ने पिता भीष्मक को समझा-बुझाकर तय कर दिया कि रुक्मिणी का स्वयंवर होगा और उसमें शिशुपाल को ही वरमाला पहनाई जाएगी।

     

    जब रुक्मिणी को यह समाचार मिला तो उनके प्राण जैसे सूख गए। महल के भीतरी कक्ष में वे अकेली बैठी रोने लगीं। उनकी प्रिय दासी ने कहा, “राजकुमारी, आप कुछ कीजिए। नहीं तो आपकी इच्छा अधूरी रह जाएगी।”

     

    रुक्मिणी ने उस रात निर्णय लिया। उन्होंने एक ब्राह्मण को बुलाया। उसका नाम था सुंदर। रुक्मिणी ने अपने हाथों से एक पत्र लिखा। पत्र में शब्दों में आग थी और प्रेम था। उन्होंने लिखा –

     

    “श्रीकृष्णचंद्र को सादर प्रणाम।

    मैं रुक्मिणी, विदर्भराज भीष्मक की पुत्री, आपको अपना हृदय अर्पण करती हूँ। मैंने आपके गुणों को सुनकर आपको अपना पति चुना है। पर मेरे भाई रुक्मी मुझे शिशुपाल को सौंपना चाहते हैं। स्वयंवर के दिन जब मैं मंदिर जाऊँगी, तब आप आकर मुझे अपना लीजिए। यदि आप नहीं आए तो मैं अपनी जान दे दूँगी, क्योंकि आपके बिना जीने का कोई अर्थ नहीं।”

     

    पत्र को ब्राह्मण के हाथों में देते हुए रुक्मिणी की आँखों में आँसू थे। उन्होंने कहा, “आप इसे स्वयं कृष्ण के हाथ में दीजिए। और उनसे कहना कि रुक्मिणी आपकी प्रतीक्षा कर रही है।”

     

    ब्राह्मण चल पड़े। कई दिनों की यात्रा के बाद वे द्वारका पहुँचे। कृष्ण उस समय सभा में बैठे थे। ब्राह्मण को देखकर वे स्वयं उठकर उनके पास गए और चरण छुए। जब ब्राह्मण ने रुक्मिणी का पत्र दिया तो कृष्ण ने उसे पढ़ा। पढ़ते-पढ़ते उनके मुख पर एक मधुर मुस्कान फैल गई।

     

    उन्होंने ब्राह्मण से कहा, “आप रुक्मिणी से कह देना कि मैं अवश्य आऊँगा। लक्ष्मी को नारायण कैसे छोड़ सकते हैं?”

     

    स्वयंवर का दिन आ गया। कुंडिनपुर में चारों ओर राजा-महाराजाओं का जमावड़ा था। शिशुपाल गर्व से भरा हुआ था। रुक्मी अपनी बहन को शिशुपाल की ओर ले जाने का सपना देख रहा था। भीष्मक राजा भी बाध्य होकर चुप थे।

     

    रुक्मिणी माता के मंदिर में पूजा करने गईं। लाल रंग के वस्त्रों में वे इतनी सुंदर लग रही थीं मानो स्वयं महालक्ष्मी हों। उनके हाथ में वरमाला थी, पर उनका हृदय द्वारका में था।

     

    ठीक उसी समय मंदिर के बाहर हलचल मच गई। एक रथ हवा की तरह उड़ता हुआ आया। रथ पर बैठे थे श्यामसुंदर कृष्ण। पीतांबर धारण किए, गले में वैजयन्ती माला, और मुख पर वह दिव्य तेज। उन्होंने रथ से उतरते ही रुक्मिणी का हाथ पकड़ लिया।

     

    रुक्मिणी ने जैसे ही कृष्ण को देखा, उनके नेत्रों से आँसू बह निकले – पर ये आँसू खुशी के थे। उन्होंने वरमाला कृष्ण के गले में डाल दी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। फिर कोलाहल मच गया।

     

    रुक्मी चिल्लाया, “कृष्ण! तुम मेरी बहन का हरण कैसे कर सकते हो?” शिशुपाल और अन्य राजाओं ने हथियार उठा लिए। पर कृष्ण ने रुक्मिणी को रथ पर बिठाया और रस्सियाँ पकड़ लीं। बलराम भी साथ थे। यादव सैनिकों ने शत्रुओं को रोका।

     

    रथ द्वारका की ओर दौड़ पड़ा। रास्ते में रुक्मी ने पीछा किया। उसने कृष्ण को ललकारा। दोनों में युद्ध हुआ। कृष्ण ने रुक्मी को हराया, पर रुक्मिणी के कहने पर उसकी जान छोड़ दी। केवल उसके सिर के बाल काट दिए और उसे अपमानित करके छोड़ दिया।

     

    जब रथ द्वारका पहुँचा तो सारी नगरी उत्सव में डूब गई। कृष्ण ने विधिवत रुक्मिणी के साथ विवाह किया। वे उनकी पत्नी बनीं – नहीं, उनकी प्रधान रानी बनीं। द्वारका के महल में लक्ष्मी आकर बस गईं।

     

    विवाह के बाद कृष्ण ने रुक्मिणी से कहा, “तुमने मेरे लिए सब कुछ त्याग दिया। अपने भाई को, अपने राज्य को, अपनी सुविधा को। तुम्हारा प्रेम राधा के प्रेम से भिन्न है, पर कम नहीं है। राधा का प्रेम आत्मसमर्पण था, तुम्हारा प्रेम साहस और भक्ति से भरा है।”

     

    रुक्मिणी मुस्कुराईं। उन्होंने कहा, “नाथ, मैं जानती हूँ कि आपके हृदय में ब्रज की राधा बसी हैं। मैं उनसे ईर्ष्या नहीं करती। मैं तो आपकी दासी हूँ। आपने मुझे स्वीकार किया, यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

     

    कृष्ण ने उनके माथे पर हाथ रखा और बोले, “रुक्मिणी, तुम मेरी लक्ष्मी हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं, वहाँ नारायण अधूरे हैं। तुम द्वारका की रानी बनकर रहो, और मेरी लीला में सदा साथ दो।”

     

    उस दिन के बाद रुक्मिणी कृष्ण की सबसे बड़ी सहयोगिनी बन गईं। वे उनकी सलाहकार थीं, उनकी पत्नी थीं, और उनकी परम भक्त थीं। जब भी कृष्ण युद्ध पर जाते, रुक्मिणी मंदिर में बैठकर उनकी विजय की प्रार्थना करतीं। जब वे लौटते तो पहले रुक्मिणी के ही चरण छुते।

     

    रुक्मिणी ने कृष्ण को एक पुत्र भी दिया – प्रद्युम्न, जो कामदेव के अवतार माने गए। उनके जीवन में सुख था, वैभव था, पर सबसे अधिक थी कृष्ण के प्रति अटूट भक्ति।

     

    कभी-कभी रात के समय जब कृष्ण समुद्र के किनारे खड़े बांसुरी बजाते, तो रुक्मिणी दूर से देखतीं। वे जानती थीं कि वह धुन ब्रज के लिए है, राधा के लिए है। पर वे कभी बीच में नहीं आतीं। वे समझती थीं कि कृष्ण का हृदय इतना विशाल है कि उसमें राधा भी समा सकती हैं और रुक्मिणी भी।

     

    रुक्मिणी की कहानी केवल विवाह की नहीं है। यह उस नारी की कहानी है जिसने समाज की रीति-नीति के विरुद्ध जाकर अपने प्रेम को चुना। जिसने पत्र लिखकर भगवान को बुलाया। जिसने रथ पर बैठकर सब कुछ त्याग दिया। और जिसने अंत तक कृष्ण के चरणों में अपना सब कुछ अर्पण कर दिया।

     

    द्वारका के इतिहास में रुक्मिणी का नाम सदा स्वर्णाक्षरों में लिखा रहेगा। क्योंकि वे केवल पत्नी नहीं थीं। वे कृष्ण की धर्मपत्नी थीं, उनकी लक्ष्मी थीं, और उनकी लीला की सहचरी थीं।

     

    और जब कभी कोई भक्त द्वारका जाता है, तो वह रुक्मिणी माता के मंदिर में अवश्य जाता है। वहाँ खड़े होकर कहता है, “माता, आपने साहस दिखाया था। आपने प्रेम को धर्म बनाया था। हमें भी उतना बल दीजिए।”

     

     

    क्योंकि रुक्मिणी केवल इतिहास की पात्र नहीं हैं। वे हर उस आत्मा का प्रतीक हैं जो भगवान को पाने के लिए सब कुछ छोड़ने को तैयार हो जाती है।

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    Lakshmi Kumari

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  • एपिसोड 2: बिछोह – जब यमुना भी रो पड़ी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    वृन्दावन अब पहले जैसा नहीं रहा था। प्रथम मिलन के बाद से राधा और कृष्ण का प्रेम दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा था। हर सुबह राधा बरसाना से दूध लेकर गोकुल आतीं और हर शाम कृष्ण अपनी गायों के साथ यमुना तट पर राधा का इंतजार करते। उनकी मुलाकातें अब छिपकर नहीं होती थीं। सखा-सहेलियाँ भी जान गई थीं कि राधा और कान्हा एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

     

    कई महीने ऐसे ही बीत गए। होली आई, जन्माष्टमी आई, राखी आई। हर त्योहार में दोनों का मिलन और भी मधुर होता गया। कृष्ण राधा के माथे पर चंदन लगाते, राधा कृष्ण के गले में वनमाला पहनातीं। कभी वे कुंज में छिपकर बैठते, कभी यमुना के जल में पैर डालकर घंटों बातें करते। उनका प्रेम इतना गहरा हो चुका था कि वृन्दावन की हवा में भी “राधे-कृष्ण” की गूंज सुनाई देने लगी थी।

     

    पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।

     

    एक दिन अचानक गोकुल में हलचल मच गई। मथुरा से अक्रूर जी आए थे। कंस ने उन्हें भेजा था। अक्रूर ने नंद बाबा से कहा, “कंस महाराज ने कान्हा और बलराम को मथुरा बुलाया है। वहाँ धनुष यज्ञ है। वे दोनों भाई अवश्य चलें।”

     

    नंद बाबा का हृदय काँप उठा। यशोदा माता तो जैसे पत्थर हो गईं। पर कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “माता, पिता… मुझे जाना ही होगा। कंस का अंत मेरे हाथों ही होना है। यह मेरा अवतार का उद्देश्य है।”

     

    समाचार हवा की तरह पूरे ब्रज में फैल गया। गोप-गोपियाँ रोने लगीं। गायें दुहना बंद कर बैठी रहीं। यमुना का जल जैसे भारी हो गया हो। पर सबसे अधिक पीड़ा हुई राधा को।

     

    जब राधा को यह बात पता चली तो वे जैसे मूच्छित हो गईं। ललिता और विशाखा ने उन्हें संभाला। राधा बार-बार एक ही बात दोहराती रहीं, “कान्हा… मेरे कान्हा जा रहे हैं? मुझसे दूर?”

     

    उस रात राधा ने आँखें नहीं मूंदीं। वे बार-बार अपने हृदय पर हाथ रखकर पूछतीं, “यह हृदय अब किसके लिए धड़केगा?” सुबह होते-होते उन्होंने निर्णय लिया। वे कान्हा से आखिरी बार मिलेंगी।

     

    अगले दिन अक्रूर जी का रथ गोकुल के द्वार पर खड़ा था। बलराम पहले से तैयार थे। कृष्ण ने यशोदा माता के चरण छुए। माता रोते-रोते कह रही थीं, “कान्हा, तुम जल्दी लौटना… मेरा मक्खन चुराता छोरा जल्दी लौटना।” कृष्ण ने माता के आँसू पोंछे और कहा, “माता, मैं शरीर से दूर जा रहा हूँ, पर आत्मा से कभी नहीं जाऊँगा।”

     

    फिर कृष्ण अपने सखाओं से मिले। सभी रो रहे थे। सुदामा ने कहा, “कान्हा, तुम्हारे बिना यह ब्रज सूना हो जाएगा।” कृष्ण ने सभी को गले लगाया।

     

    अब बारी थी राधा की।

     

    कृष्ण जानते थे कि राधा कहीं पास ही होंगी। वे चुपचाप यमुना तट की ओर चल दिए। वहाँ कदंब के पेड़ के नीचे राधा खड़ी थीं। उनके नेत्रों में आँसू भरे थे, होंठ काँप रहे थे। वे कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनके पास गईं और उनके चरणों में गिर पड़ीं।

     

    “कान्हा… तुम सच में जा रहे हो?” राधा की आवाज काँप रही थी।

     

    कृष्ण ने उन्हें उठाया। उनके अपने नेत्र भी गीले थे। उन्होंने राधा का मुख अपने दोनों हाथों में लिया और कहा, “राधे… मुझे जाना ही होगा। यह मेरी लीला है। कंस का वध करना है, धर्म की स्थापना करनी है। मैं यदि नहीं जाऊँगा तो अधर्म और बढ़ेगा।”

     

    राधा रोते हुए बोलीं, “धर्म… अधर्म… ये सब मुझे नहीं समझ आते कान्हा। मुझे तो केवल इतना पता है कि तुम्हारे बिना मेरा जीना असंभव है। तुम चले गए तो यह यमुना सूख जाएगी, ये कुंज मुरझा जाएंगे, मेरा हृदय पत्थर हो जाएगा।”

     

    कृष्ण ने उन्हें अपने वक्ष से लगा लिया। दोनों देर तक ऐसे ही खड़े रहे। आसपास की हवा भी जैसे रुक गई हो। फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, “राधे, सुनो… मैं शरीर से मथुरा जा रहा हूँ, पर तुम मेरे हृदय से कभी बाहर नहीं जा सकतीं। तुम मेरी आत्मा हो। जहाँ मैं रहूँगा, वहाँ तुम्हारा नाम मेरे होठों पर रहेगा। हर श्वास में तुम्हारा स्मरण होगा।”

     

    राधा ने सिर उठाया। उनके आँसू कृष्ण के वस्त्रों को भिगो रहे थे। वे बोलीं, “फिर भी तुम जा रहे हो। लोग कहेंगे राधा को छोड़कर कान्हा चले गए। क्या हमारा प्रेम इतना कमजोर था?”

     

    कृष्ण की आँखों से एक आँसू बह निकला। उन्होंने कहा, “नहीं राधे। हमारा प्रेम इतना मजबूत है कि बिछोह भी इसे और गहरा कर देगा। लोग शरीर के मिलन को प्रेम समझते हैं। पर असली प्रेम तो वह है जो बिछोह में भी बना रहे। तुम ब्रज में रहोगी, मैं द्वारका में। पर दोनों जगह एक ही प्रेम साँस लेगा।”

     

    राधा ने कृष्ण की बांसुरी अपने हाथ में ली। वह बांसुरी जो इतने दिनों से उनके हृदय की धड़कन बन चुकी थी। वे बोलीं, “यह बांसुरी मेरे पास रखो। जब तुम दूर होगे तो मैं इसे देखकर तुम्हें याद करूँगी। और तुम… तुम जब भी बांसुरी बजाओगे, तो याद रखना कि राधा कहीं दूर खड़ी तुम्हारी धुन सुन रही है।”

     

    कृष्ण ने बांसुरी राधा के हाथ में ही रहने दी। उन्होंने अपनी वनमाला उतारी और राधा के गले में पहनानी चाही, पर राधा ने रोक दिया। “नहीं कान्हा… यह माला तुम्हारे गले में ही रहनी चाहिए। जब लोग तुम्हें देखेंगे तो कहेंगे कि यह माला राधा ने पहनाई थी।”

     

    दोनों फिर चुप हो गए। शब्दों की कोई जरूरत नहीं थी। केवल नेत्र ही सब कुछ कह रहे थे। राधा ने अचानक कृष्ण के चरण छुए और कहा, “एक वचन दो कान्हा… कि तुम कभी मुझे भूलोगे नहीं।”

     

    कृष्ण ने राधा को फिर से गले लगाया और बोले, “राधे, जब तक सूरज निकलेगा, जब तक यमुना बहेगी, जब तक ब्रज की धूल रहेगी… तब तक मैं तुम्हें नहीं भूल सकता। तुम मेरे प्राण हो। प्राण भला कैसे भूले जाते हैं?”

     

    उसी समय अक्रूर जी का स्वर सुनाई दिया, “कान्हा… रथ तैयार है। देर हो रही है।”

     

    कृष्ण ने राधा से अपने को अलग किया। यह क्षण दोनों के लिए असह्य था। राधा के पैर काँप रहे थे। वे गिर न जाएँ, इसलिए ललिता और विशाखा ने उन्हें संभाल लिया। कृष्ण ने एक अंतिम बार राधा की ओर देखा। उनकी आँखों में अपार प्रेम और अपार वेदना दोनों साथ-साथ थे।

     

    फिर वे रथ की ओर चल दिए।

     

    रथ चल पड़ा। पहिए धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ने लगे। गोप-गोपियाँ रथ के पीछे-पीछे दौड़ने लगीं। कोई चीख रहा था, कोई रो रहा था। गायें रंभाने लगीं। यशोदा माता बेहोश हो गईं। नंद बाबा का हृदय जैसे टूट गया हो।

     

    पर राधा… राधा वहीं कदंब के पेड़ के नीचे खड़ी रहीं। वे दौड़ी नहीं। वे चिल्लाईं नहीं। केवल खड़े-खड़े देखती रहीं जैसे रथ धीरे-धीरे उनकी आँखों से ओझल होता जा रहा है। उनके हाथ में कृष्ण की बांसुरी थी। आँसू उनकी आँखों से लगातार बह रहे थे, पर वे पोंछती तक नहीं थीं।

     

    जब रथ दृष्टि से पूरी तरह गायब हो गया, तब राधा ने धीरे से बांसुरी को अपने हृदय से लगा लिया और बोलीं, “जाओ कान्हा… जाओ। अपना धर्म निभाओ। पर याद रखना… यहाँ ब्रज में एक राधा बैठी तुम्हारा इंतजार करेगी। चाहे जन्म बीत जाएँ, चाहे युग बीत जाएँ… मेरा इंतजार खत्म नहीं होगा।”

     

    उस दिन के बाद से वृन्दावन बदल गया।

     

    यमुना का जल पहले जैसा स्वच्छ नहीं रहा। लगता था मानो नदी भी रो रही हो। कुंज के फूल मुरझाने लगे। गायें दूध देना कम कर गईं। गोपियाँ अब हँसती नहीं थीं। और राधा… राधा अब पहले जैसी नहीं रहीं।

     

    वे पूरे दिन उस कदंब के पेड़ के नीचे बैठी रहतीं जहाँ अंतिम बार कान्हा से मिली थीं। कभी बांसुरी को देखतीं, कभी यमुना की ओर टकटकी लगाए रहतीं। ललिता उन्हें समझाती, “सखी, रोओ मत। कान्हा जरूर लौटेंगे।” पर राधा केवल सिर हिला देतीं।

     

    रात को जब सारा ब्रज सो जाता, तो राधा अकेली यमुना तट पर चली जातीं। वहाँ बैठकर वे धीरे-धीरे गातीं –

     

    “कान्हा तुमने छोड़ दिया ब्रज को…

    छोड़ दिया राधा को…

    अब यह हृदय कहाँ जाएगा…

    अब यह प्रेम किसे सौंपूँगी…”

     

    उनकी आवाज में इतना दर्द होता कि यमुना का जल भी थम सा जाता। हवा भी जैसे उनकी पीड़ा सुनने के लिए रुक जाती।

     

    दिन बीतते गए। समाचार आने लगे कि कृष्ण ने कंस का वध कर दिया। मथुरा में वे राजा बन गए। फिर द्वारका नगरी बसाई। रुक्मिणी से विवाह हुआ। फिर सत्यभामा से। समाचार पर समाचार आते रहे। पर राधा के पास केवल एक ही समाचार आता – कान्हा अब ब्रज नहीं लौटेंगे।

     

    फिर भी राधा ने प्रतीक्षा नहीं छोड़ी।

     

    वे कहतीं, “शरीर से भले ही दूर हों, पर मेरा कान्हा मुझे कभी नहीं छोड़ सकता। वह मेरे भीतर रहता है। हर साँस में, हर धड़कन में।”

     

    और सच में… जब भी कोई भक्त राधा-कृष्ण का नाम लेता, जब भी कोई बांसुरी की धुन सुनता, जब भी कोई यमुना तट पर बैठकर प्रेम की बात करता… तो लगता मानो राधा और कृष्ण अभी भी वहीं कहीं मौजूद हैं।

     

    क्योंकि उनका बिछोह शरीर का था।

    आत्मा का नहीं।

     

    और जो प्रेम आत्मा से जुड़ा हो,

    वह कभी बिछड़ नहीं सकता।

     

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  • एपिसोड 1: प्रथम मिलन – यमुना के तट पर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एपिसोड 1: प्रथम मिलन – यमुना के तट प

     

    वृन्दावन की भूमि उस समय स्वर्ग से भी अधिक सुंदर लगती थी। वर्षा ऋतु अभी-अभी विदा हुई थी और शरद् का स्वच्छ आकाश नीले रंग से चमक रहा था। यमुना नदी का जल स्वच्छ और शांत बह रहा था। दोनों तटों पर कदंब, तमाल और आम के वृक्ष अपनी छाया फैलाए खड़े थे। गोप-गोपियों के हंसी-खेल की गूंज दूर-दूर तक फैल रही थी, पर आज का दिन कुछ और ही विशेष होने वाला था।

     

    उस दिन गोकुल के नंद बाबा के आंगन में बालक कृष्ण अपनी सखाओं के साथ खेल रहे थे। उनकी आयु लगभग ग्यारह-बारह वर्ष की थी, पर उनके नेत्रों में वह दिव्य चमक थी जो सामान्य बालक में नहीं होती। मां यशोदा ने उन्हें दूध-दही खिलाया, गले में वनमाला पहनाई और कहा, “कान्हा, आज यमुना तट पर ज्यादा देर मत लगाना। शाम होते-होते लौट आना।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। उनके मुख पर वह मधुर मुस्कान थी जिससे सारी सृष्टि मोहित हो जाती थी। वे बांसुरी लेकर सखाओं सुदामा, मधुमंगल, श्रीदाम और सुबल के साथ यमुना की ओर चल पड़े। रास्ते में वे गायों को हांकते जा रहे थे। उनकी बांसुरी की धुन इतनी मधुर थी कि पेड़-पौधे भी झूमने लगते थे और पक्षी चुपचाप सुनने लगते थे।

     

    उधर बरसाना की ओर, वृषभानु बाबा की पुत्री राधा भी अपनी सहेलियों के साथ यमुना तट पर जा रही थीं। राधा उस समय किशोरावस्था में थीं। उनका रूप ऐसा था मानो लक्ष्मी स्वयं धरती पर उतर आई हों। श्याम वर्ण के बालों में वेणी बंधी हुई, माथे पर सिंदूर की जगह चंदन का टीका, गले में मोतियों की माला और पीतांबर रंग का घाघरा-चोली। उनके नेत्रों में वह भाव था जो प्रेम और करुणा दोनों को एक साथ समेटे हुए थे।

     

    राधा की सहेलियाँ – ललिता, विशाखा, चित्रा, इन्दुलेखा और रंगदेवी – उनके साथ थीं। ललिता ने कहा, “सखी, आज तुम्हारा मन किसी और ही लोक में घूम रहा है। क्या बात है?”

     

    राधा ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “कुछ नहीं सखी… बस यमुना का जल आज बहुत स्वच्छ लग रहा है।” पर वास्तव में उनके हृदय में एक अजीब सी बेचैनी थी। रात भर उन्हें स्वप्न में एक श्याम वर्ण का बालक बांसुरी बजाता दिखाई दिया था। उसकी धुन इतनी मधुर थी कि जागने के बाद भी वह उनके कानों में गूंज रही थी।

     

    जब राधा और उसकी सहेलियाँ यमुना के घाट पर पहुंचीं, तब कृष्ण भी दूसरी ओर से घाट पर आ चुके थे। गायें पानी पी रही थीं और सखागण पेड़ों की छाया में बैठकर फल खा रहे थे। कृष्ण ने बांसुरी अपने होठों पर रखी और एक धीमी, मधुर धुन बजानी शुरू की।

     

    वह धुन…

     

    जैसे ही वह स्वर यमुना के जल पर तैरता हुआ राधा तक पहुंचा, उनके कदम रुक गए। उनके हृदय की धड़कन अचानक तेज हो गई। ललिता ने पीछे से पुकारा, “राधे! क्या हुआ?” पर राधा कुछ सुन ही नहीं पा रही थीं। उनकी दृष्टि उस दिशा में चली गई जहाँ से बांसुरी की आवाज आ रही थी।

     

    कृष्ण ने भी अपनी आँखें उठाईं। और उसी क्षण…

     

    समय थम गया।

     

    दोनों की दृष्टि एक-दूसरे से टकराई। यमुना का जल बहना बंद हो गया हो ऐसा आभास हुआ। हवा में अचानक मधु की सुगंध फैल गई। पेड़ों के पत्ते हिलना बंद हो गए। सखा और सहेलियाँ यह देखकर अचंभित रह गए कि दोनों एक-दूसरे को ऐसे देख रहे हैं मानो युगों-युगों से एक-दूसरे को खोज रहे हों।

     

    कृष्ण की बांसुरी उसके होठों से अलग हो गई। उन्होंने धीरे से कहा, मानो स्वयं से बात कर रहे हों, “तुम… तुम वही हो ना?”

     

    राधा कुछ बोल न सकीं। उनके नेत्रों में अश्रु भर आए, पर वे अश्रु दुख के नहीं, अपार आनंद के थे। वे धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनके पैर जैसे स्वयं ही उस ओर जा रहे थे। ललिता और विशाखा ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, पर राधा ने केवल हाथ हिलाकर संकेत किया कि वे कुछ न बोलें।

     

    दोनों के बीच की दूरी कम होती गई। जब वे एक-दूसरे के निकट पहुंचे तो कृष्ण ने धीरे से अपना दाहिना हाथ बढ़ाया। राधा ने भी अपना बायाँ हाथ आगे किया। दोनों के हाथ हवा में मिले… और उसी क्षण एक दिव्य प्रकाश चारों ओर फैल गया। यमुना का जल सोने के समान चमक उठा। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “मैंने तुम्हें युगों से खोजा है। प्रत्येक जन्म में, प्रत्येक लोक में… और आज यहाँ, यमुना के इस तट पर, मैंने तुम्हें पा लिया।”

     

    राधा की आँखों से अश्रु बह निकले। उन्होंने धीरे से उत्तर दिया, “और मैंने भी तुम्हें खोजा है कान्हा… प्रत्येक श्वास में, प्रत्येक धड़कन में। आज जब तुम्हारी बांसुरी ने पुकारा, तो मेरा हृदय पहचान गया कि वह आवाज मेरी ही है।”

     

    दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। कोई और शब्द नहीं बोले। बस नेत्रों से ही सारा प्रेम कह दिया। वह प्रेम जो शरीर का नहीं, आत्मा का था। जो इस लोक का नहीं, लोकों के पार का था।

     

    सखा मधुमंगल जो स्वभाव से थोड़े चंचल थे, आगे बढ़े और बोले, “अरे कान्हा! यह कौन है? इतनी सुंदर तो मैंने कभी नहीं देखी।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह राधा है… मेरी राधा।”

     

    ललिता ने भी आगे बढ़कर कहा, “और यह कान्हा है… हमारी राधा के कान्हा।”

     

    उस दिन दोनों ने बहुत देर तक यमुना के तट पर समय बिताया। कृष्ण ने राधा के लिए बांसुरी बजाई। राधा ने कृष्ण के बालों में फूल लगाए। उन्होंने एक-दूसरे से बचपन की बातें कीं, गोकुल और बरसाना की बातें कीं। कृष्ण ने बताया कि कैसे वे मक्खन चुराते हैं और राधा ने हँसते हुए कहा कि वे भी कभी-कभी दूध में पानी मिला देती हैं।

     

    सूरज ढलने लगा था। आकाश में लालिमा फैल गई थी। यशोदा माता का डर कृष्ण के मन में था, और वृषभानु बाबा का डर राधा के मन में। दोनों को लौटना था।

     

    बिछड़ने से पहले कृष्ण ने राधा का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “राधे, आज जो मिलन हुआ है, वह केवल इस जन्म का नहीं है। यह तो केवल आरंभ है। तुम मेरी प्राण हो, मेरी आत्मा हो। जब तक यह सृष्टि है, तब तक हमारा यह प्रेम रहेगा।”

     

    राधा ने भी उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “कान्हा, मैं तुम्हारी छाया बनकर रहूँगी। चाहे तुम गोकुल में रहो या द्वारका में, चाहे तुम ग्वाला बने रहो या राजा… मेरा हृदय सदैव तुम्हारे पास रहेगा।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को अंतिम बार देखा। फिर कृष्ण अपनी गायों और सखाओं के साथ गोकुल की ओर चल दिए, और राधा अपनी सहेलियों के साथ बरसाना की ओर।

     

    पर उस दिन के बाद से…

     

    हर शाम जब कृष्ण बांसुरी बजाते, तो राधा यमुना तट पर आ जातीं। और हर सुबह जब राधा दूध लेकर गोकुल जातीं, तो रास्ते में कृष्ण उनसे मिलने आ जाते। उनका प्रेम दिन-ब-दिन गहरा होता गया। वह प्रेम जो शब्दों से परे था, जो लोक-लाज से ऊपर था, जो केवल दो आत्माओं के मिलन का नाम था।

     

    यमुना आज भी उस मिलन की साक्षी है। कदंब के वृक्ष आज भी उस दिन की बातें करते हैं। और जब कभी कोई भक्त वृन्दावन आता है और यमुना के तट पर बैठता है, तो उसे आज भी कभी-कभी वह मधुर बांसुरी की धुन सुनाई दे जाती है… और साथ ही राधा की हल्की सी हंसी भी।

     

    क्योंकि जो मिलन दिव्य होता है, वह कभी समाप्त नहीं होता। वह तो केवल रूप बदल-बदल कर सदा बना रहता है।

     

     

     

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