द्वारका की कथाओं में जब अष्टभार्या की बात आती है तो एक नाम अवश्य लिया जाता है – जाम्बवती। वे श्रीकृष्ण की प्रधान रानियों में से एक थीं। पर उनकी कहानी अन्य रानियों से बिलकुल अलग थी। वे किसी राजा की पुत्री नहीं थीं, न ही किसी सामान्य वंश की। वे थीं – जाम्बवान की पुत्री। और जाम्बवान कोई साधारण प्राणी नहीं थे। वे त्रेता युग से जीवित रीछराज थे, जिन्हें स्वयं भगवान राम ने वरदान दिया था।
जाम्बवान का जन्म उस समय हुआ था जब समुद्र मंथन हो रहा था। वे अत्यंत बलशाली, बुद्धिमान और भगवान राम के परम भक्त थे। राम-रावण युद्ध में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राम ने प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया था कि वे त्रेता से द्वापर तक जीवित रहेंगे और अंत में स्वयं राम को ही फिर से देखेंगे। जाम्बवान उसी वरदान के कारण द्वापर युग तक जीवित थे। वे एक गुफा में अपनी पत्नी और पुत्री जाम्बवती के साथ रहते थे।
जाम्बवती का रूप विचित्र सुंदर था। रीछ वंश में जन्म लेने के कारण उनका वर्ण श्याम था, पर उनके नेत्रों में अपूर्व चमक और गंभीरता थी। वे बचपन से ही पिता के मुख से राम कथा सुनती आ रही थीं। वे जानती थीं कि उनके पिता किसी साधारण व्यक्ति के भक्त नहीं, बल्कि स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनन्य सेवक हैं। जाम्बवती के हृदय में भी उसी भक्ति का बीज बोया जा चुका था।
इधर द्वारका में एक दूसरी कथा चल रही थी – श्यामंतक मणि की।
राजा सत्राजित को सूर्य भगवान से एक दिव्य मणि मिली थी। वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना उत्पन्न करती थी। सत्राजित ने वह मणि अपने भाई प्रसेन को पहनाई। प्रसेन मणि पहनकर वन में घूमने गए। वहाँ एक सिंह ने उन्हें मार डाला और मणि को ले लिया। उसी सिंह को जाम्बवान ने मारकर मणि अपने कब्जे में कर ली और अपनी गुफा में ले आए। वे उसे अपनी पुत्री जाम्बवती के खेलने के लिए दे दिया करते थे।
जब प्रसेन वापस नहीं लौटे तो लोगों में चर्चा होने लगी कि कृष्ण ने लोभवश मणि के लिए प्रसेन की हत्या कर दी है। कृष्ण का नाम खराब हो रहा था। यदुवंशी और अन्य लोग भी संदेह करने लगे। कृष्ण ने निश्चय किया कि वे स्वयं इस कलंक को धोएँगे। वे प्रसेन के मार्ग का अनुसरण करते हुए वन में पहुँचे। वहाँ उन्होंने सिंह के पंजों के निशान देखे और फिर जाम्बवान की विशाल गुफा के द्वार तक पहुँच गए।
गुफा के अंदर से बच्चों के खेलने की आवाज आ रही थी। कृष्ण अंदर घुसे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक छोटी बालिका श्यामंतक मणि को लेकर खेल रही है। वही बालिका जाम्बवती थीं। कृष्ण ने मणि की ओर हाथ बढ़ाया तो जाम्बवान बाहर निकल आए।
जाम्बवान ने कृष्ण को देखा और उन्हें सामान्य मनुष्य समझकर ललकारा, “कौन है जो मेरी गुफा में घुस आया है? क्या तुम मणि चुराने आए हो?”
कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “हे जाम्बवान, यह मणि सत्राजित की है। मैं इसे वापस लेकर अपना कलंक धोना चाहता हूँ।”
जाम्बवान को यह बात स्वीकार नहीं हुई। वे क्रुद्ध हो गए। दोनों में घमासान युद्ध शुरू हो गया। वह युद्ध साधारण नहीं था। जाम्बवान त्रेता युग के योद्धा थे। उनके प्रहार से पर्वत काँप उठते थे। कृष्ण भी सामान्य रूप में नहीं लड़ रहे थे। दोनों का युद्ध सत्ताईस दिनों तक निरंतर चला। दिन-रात एक जैसे बीत रहे थे। गुफा के बाहर द्वारका के लोग चिंतित थे कि कृष्ण अभी तक वापस क्यों नहीं लौटे।
जाम्बवती इन सब दिनों में भयभीत होकर एक कोने में बैठी अपने पिता और उस अज्ञात योद्धा को देखती रहीं। उनके मन में एक अजीब भाव उठ रहा था। वह श्याम वर्ण का पुरुष जितना बलशाली था, उतना ही सुंदर और दिव्य भी लग रहा था। उनकी दृष्टि बार-बार कृष्ण पर चली जाती थी।
अट्ठाईसवें दिन जाम्बवान थक चुके थे। उनके सारे अस्त्र-शस्त्र व्यर्थ हो चुके थे। कृष्ण ने अंत में उन्हें भूमि पर पटक दिया। जाम्बवान हार मानकर भूमि पर गिर पड़े। उसी क्षण उनकी आँखें खुल गईं। उन्होंने कृष्ण के मुख पर वह तेज देखा जो उन्होंने कभी अयोध्या में राम के मुख पर देखा था।
जाम्बवान का कंठ अवरुद्ध हो गया। वे काँपते हुए बोले, “आप… आप तो मेरे राम हैं! हे रघुनंदन, हे जानकीनाथ! आपने मुझे फिर से दर्शन दिए। मैं अंधा हो गया था। मैं आपको पहचान नहीं पाया।”
वे रोते हुए कृष्ण के चरणों में गिर पड़े। कृष्ण ने उन्हें उठाया और गले लगाया। बोले, “जाम्बवान, तुम मेरे पुराने सेवक हो। तुम्हारा बल और भक्ति दोनों अद्वितीय हैं। अब उठो।”
जाम्बवान ने मणि कृष्ण के चरणों में रख दी और कहा, “नाथ, यह मणि आपकी ही है। इसे वापस ले जाइए। पर मैं केवल मणि देकर संतुष्ट नहीं हो सकता। मेरी सबसे अमूल्य वस्तु आपको अर्पण करता हूँ।”
उन्होंने जाम्बवती को बुलाया। जाम्बवती उस समय घूँघट निकालकर खड़ी थीं। उनके नेत्रों में अश्रु और भक्ति दोनों थे। जाम्बवान ने कहा, “नाथ, यह मेरी पुत्री जाम्बवती है। मैं इसे आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। आप इसे स्वीकार कीजिए। यह आपकी दासी बनेगी।”
कृष्ण ने जाम्बवती की ओर देखा। जाम्बवती ने सिर झुकाते हुए कहा, “स्वामी, मैं आपके चरणों की धूल माँगती हूँ। यदि आप स्वीकार करें तो मैं जीवन भर आपकी सेवा करूँगी।”
कृष्ण ने मुस्कुराते हुए जाम्बवान से कहा, “जाम्बवान, तुम्हारी भक्ति ने आज मुझे बाँध लिया। मैं तुम्हारी पुत्री को स्वीकार करता हूँ।”
उसी गुफा में, उसी दिव्य वातावरण में श्रीकृष्ण ने जाम्बवती का पाणिग्रहण किया। कोई राजसी ठाठ-बाट नहीं था, कोई स्वयंवर नहीं था, कोई रथ की भागदौड़ नहीं थी। केवल भक्ति थी, समर्पण था और एक पिता का असीम प्रेम था जिसने अपनी पुत्री को स्वयं भगवान को सौंप दिया।
जब कृष्ण जाम्बवती और श्यामंतक मणि के साथ द्वारका लौटे तो सारा नगर आश्चर्यचकित रह गया। लोगों ने देखा कि कृष्ण के साथ एक नई रानी आई हैं जिनका रूप अलग है, पर जिनके नेत्रों में गहरी शांति और भक्ति है। सत्राजित को मणि वापस मिली और कृष्ण का सारा कलंक धुल गया।
जाम्बवती द्वारका की रानी बन गईं। वे अन्य रानियों की तुलना में कम बोलती थीं। उनका स्वभाव शांत, गंभीर और अत्यंत भक्तवत् था। वे कृष्ण की सेवा में हमेशा तत्पर रहतीं। जब कृष्ण युद्ध पर जाते तो जाम्बवती घंटों मंदिर में बैठकर प्रार्थना करतीं। वे जानती थीं कि उनके पति साधारण नहीं, स्वयं वे हैं जिनके चरणों में उनके पिता ने युगों तक सेवा की थी।
समय आने पर जाम्बवती ने कृष्ण को एक पुत्र दिया जिसका नाम साम्ब रखा गया। साम्ब बड़ा होकर अत्यंत बलशाली और रूपवान हुआ। जाम्बवती की मातृत्व और पत्नीत्व दोनों ही भूमिकाएँ भक्ति से ओतप्रोत रहीं।
कभी-कभी रात के समय जब कृष्ण उनके कक्ष में आते तो जाम्बवती पूछ बैठतीं, “स्वामी, क्या आप सच में वे ही राम हैं जिनकी कथा मेरे पिता सुनाया करते थे?”
कृष्ण मुस्कुराते हुए कहते, “जाम्बवती, नाम और रूप बदलते रहते हैं। पर जो भक्त का है, वह सदा उसी का रहता है। तुम्हारे पिता ने मुझे राम रूप में देखा, तुम मुझे कृष्ण रूप में देख रही हो। अंत में दोनों एक ही हैं।”
जाम्बवती इन शब्दों को सुनकर कृतार्थ हो जातीं। वे समझ गई थीं कि उनका विवाह किसी राजसी समझौते या रूप के आकर्षण से नहीं हुआ था। उनका विवाह भक्ति की नींव पर हुआ था। उनके पिता ने उन्हें दान में नहीं दिया था, बल्कि स्वयं भगवान को अर्पण किया था।
द्वारका के इतिहास में जाम्बवती का नाम इसलिए अमर हो गया क्योंकि वे उस सेतु थीं जो त्रेता और द्वापर को जोड़ता था। वे उस भक्ति की प्रतीक थीं जो बल और अहंकार के बाद भी बची रहती है। जब जाम्बवान हार गए तब उनकी भक्ति जीती, और उसी भक्ति ने उनकी पुत्री को भगवान की पत्नी बना दिया।
आज भी जब कोई भक्त जाम्बवती का नाम लेता है तो याद आता है कि भगवान को पाने के लिए न रूप चाहिए, न वैभव, न राजसी ठाठ। केवल सच्ची पहचान और पूर्ण समर्पण काफी है। जाम्बवान ने पहचाना और दे दिया। जाम्बवती
ने स्वीकार किया और अपना लिया। यही उनकी कथा का सार है।

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