नारद जी ने सत्यभामा की आँखों में देखा और शांत स्वर में बोले, “सत्यभामा, तुमने कहा था कि तुम इतना दान दोगी कि मैं उसे समेट भी नहीं पाऊँगा। तो सुनो मेरी माँग। जितने वजन के श्रीकृष्ण हैं, उतने वजन का दान मुझे दे दो। चाहे वह सोना हो, चाँदी हो, हीरा हो, मोती हो या अनाज हो – जो तुम्हारी इच्छा हो। बस उनका वजन पूरा उतरना चाहिए।”
यह सुनते ही सत्यभामा के मुख पर पहले की उदासी गायब हो गई। उनके नेत्रों में एक नई चमक आ गई। वे सोचने लगीं – केवल वजन भर का दान? इतना तो कुछ भी नहीं। मेरे पिता के श्यामंतक मणि से प्रतिदिन सोने की वर्षा होती थी। द्वारका का खजाना तो अथाह है। स्वामी का वजन भला कितना होगा? वे तो सामान्य मनुष्य जैसे दिखते हैं। इतना सोना तो मैं तुरंत दे दूँगी।
वे प्रसन्न होकर बोलीं, “नारद जी, आप को बस इतना ही चाहिए? केवल उनके वजन भर का दान? ठीक है। मैं दूँगी। अभी दूँगी। आप निश्चिंत रहिए।”
नारद जी ने फिर एक बार चेतावनी दी, “सत्यभामा, सोच लो। एक बार तुला पर बैठ गए तो फिर पीछे नहीं हटा जा सकता।”
सत्यभामा ने गर्व भरे स्वर में कहा, “मैं सोच चुकी हूँ मुनिवर। आप आज्ञा दीजिए। तराजू लगवाया जाए।”
तुरंत द्वारका के महल में हलचल मच गई। सत्यभामा के आदेश से एक विशाल तुलाधार तैयार किया गया। दो बड़े-बड़े पलड़े थे। एक पलड़े पर श्रीकृष्ण को विराजमान किया जाना था और दूसरे पर दान की सामग्री रखी जानी थी। सारे खजांची, सैनिक और दासीगण दौड़ने लगे। सोने के ढेर लगाए जाने लगे, चाँदी की थालियाँ लाई जाने लगीं, हीरे-मोती के पिटारे खोले जाने लगे।
रुक्मिणी दूर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनके मुख पर चिंता थी। वे जानती थीं कि श्रीकृष्ण को तौलना साधारण बात नहीं। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे मौन खड़ी लीला का अंग बनकर देखती रहीं।
जब सब तैयार हो गया तो नारद जी ने कहा, “अब श्रीकृष्ण को एक पलड़े पर बिठाओ।”
श्रीकृष्ण शांत भाव से उस पलड़े पर जा बैठे। उनके मुख पर वही मधुर मुस्कान थी। मानो वे बच्चों का कोई खेल देख रहे हों। उन्होंने अपने दोनों चरण तुला पर रखे और सहज भाव से बैठ गए। दूसरे पलड़े पर सत्यभामा ने स्वयं पहले सोने की ईंटें रखनी शुरू कीं। एक… दो… दस… पचास… सौ। पलड़ा हिला तक नहीं।
सत्यभामा की दासी ने और सोना लाकर रखा। फिर भी तुला में कोई हलचल नहीं हुई। सत्यभामा का माथा अब भी आश्वस्त था। उन्होंने कहा, “और लाओ। खजाने से और सोना निकालो।”
ढेर के ढेर सोना आने लगा। चाँदी की बड़ी-बड़ी टिकियाँ रखी गईं। हीरों के पिटारे खाली किए गए। मोतियों की मालाएँ डाल दी गईं। पर तुला का पलड़ा एक इंच भी ऊपर नहीं उठा। श्रीकृष्ण जैसे बैठे थे वैसे ही बैठे रहे। उनके वजन का तिल भर भी प्रभाव नहीं दिखा।
अब सत्यभामा के माथे पर पसीना आ गया। वे स्वयं नीचे उतरकर खजांचियों को आज्ञा देने लगीं, “और लाओ! महल का सारा सोना लाओ। रानियों के आभूषण लाओ। कुछ भी मत छोड़ो।”
रानियों के गहने उतारे जाने लगे। सत्यभामा ने अपने स्वयं के गले का हार उतारकर तुला पर रख दिया। फिर भी कुछ नहीं हुआ। वे अब घबरा रही थीं। उन्होंने नारद जी की ओर देखा। नारद जी शांत खड़े मुस्कुरा रहे थे।
सत्यभामा ने आवाज उठाई, “खजांची! राज्य का सारा खजाना यहाँ लाओ। एक भी मुद्रा पीछे मत छोड़ना।”
अब तो द्वारका का अथाह खजाना तुला के दूसरे पलड़े पर डाला जाने लगा। सोने के कलश, रत्नों के संदूक, चाँदी के सिंहासन तक लाकर रख दिए गए। पूरा आँगन सोने-चाँदी से पट गया। पर तुला का पलड़ा जहाँ था वहीं रहा। श्रीकृष्ण का पलड़ा जरा भी नहीं हिला।
सत्यभामा के पैर अब काँप रहे थे। उनके नेत्रों में अविश्वास और भय दोनों एक साथ थे। वे बार-बार तुला को देखतीं और फिर श्रीकृष्ण के मुख की ओर। कृष्ण शांत बैठे हुए थे। उनके नेत्र आधे बंद थे मानो वे ध्यान में हों। उनके मुख पर न गर्व था, न लज्जा। केवल एक अद्भुत शांति थी।
अंत में सत्यभामा ने हार मानते हुए नारद जी से कहा, “मुनिवर… यह क्या हो रहा है? इतना वैभव डाल दिया… पूरा राज्य का खजाना डाल दिया… फिर भी तुला नहीं हिली। मेरे स्वामी का वजन ही नहीं उतर रहा।”
नारद जी ने धीरे से कहा, “सत्यभामा, अब समझ में आया? जिन्हें तुमने साधारण पति समझकर दान कर दिया था, क्या वे साधारण हैं? तीनों लोक जिनके एक रोम में समा जाते हैं, क्या उन्हें सोने-चाँदी से तौला जा सकता है?”
सत्यभामा की आँखों से आँसू बह निकले। वे तुला के पास जाकर बैठ गईं और रोते हुए बोलीं, “अब समझ में आया नारद जी… अब समझ में आया। इन्हें कोई नहीं तौल सकता। ये त्रिलोकीनाथ हैं। ये अनंत हैं। इनका आदि नहीं, अंत नहीं। मैं कितना सोना डालती, कैसे इनका वजन पूरा कर सकती थी?”
वे श्रीकृष्ण की ओर देखने लगीं। उनके नेत्रों में पश्चाताप की नदी बह रही थी। वे बोलीं, “स्वामी… मैंने आपको कितना छोटा समझा था। मैंने सोचा था कि आप मेरे पति हैं, मेरे अधिकार की वस्तु हैं। मैंने सोचा था कि आपका वजन भी साधारण मनुष्यों जैसा होगा। पर आप तो… आप तो उस पार हैं जहाँ न सोना पहुँचता है, न चाँदी, न कोई भी वैभव।”
रुक्मिणी पास आकर सत्यभामा के कंधे पर हाथ रखकर खड़ी हो गईं। उनके नेत्रों में करुणा थी। वे कुछ नहीं बोलीं। केवल मौन भाव से सत्यभामा का दुख बाँट रही थीं।
सत्यभामा अब जोर-जोर से रो रही थीं। वे बार-बार कह रही थीं, “नारद जी, अब क्या होगा? मैं इनका वजन कैसे पूरा करूँ? मेरे पास और कुछ नहीं बचा। राज्य का सारा खजाना डाल दिया। फिर भी तुला एक इंच नहीं उठी। अब मैं क्या करूँ?”
नारद जी ने शांत स्वर में कहा, “सत्यभामा, अब तुम्हें सत्य दिखाई दे गया है। जिन्हें तुमने दान में दे दिया था, वे केवल तुम्हारे पति नहीं। वे पूरे ब्रह्मांड के आधार हैं। उनकी एक उंगली पर गोवर्धन टिक गया था। उनके एक रोम में अनंत ब्रह्मांड हैं। उन्हें तौलने का विचार ही मूढ़ता था।”
सत्यभामा ने श्रीकृष्ण के चरणों की ओर देखा। वे अभी भी तुला पर विराजमान थे। उनके चरण कमल जैसे शांत थे। सत्यभामा ने उन चरणों की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, “स्वामी… क्षमा कीजिए। मेरे अभिमान ने मुझे अंधा बना दिया था। मैंने आपको नापने की कोशिश की। पर आप नापे नहीं जा सकते। आप तो अनंत हैं।”
पूरे आँगन में सन्नाटा छा गया था। सोने-चाँदी के ढेर इधर-उधर बिखरे पड़े थे। तुला का एक पलड़ा श्रीकृष्ण के भार से अटल खड़ा था और दूसरा पलड़ा वैभव से लदा होने के बावजूद हल्का था। यह दृश्य स्वयं में एक महान शिक्षा बन चुका था।
सत्यभामा अब पूरी तरह टूट चुकी थीं। उनका गर्व धूल में मिल चुका था। वे समझ चुकी थीं कि श्रीकृष्ण को न तो दान में दिया जा सकता है और न ही किसी भी वस्तु से तौला जा सकता है। वे त्रिलोकी के स्वामी हैं। उनका वास्तविक भार केवल प्रेम और भक्ति से ही उतर सकता है – पर वह बात अभी उनके मन में पूरी तरह नहीं आई थी। अभी तो केवल यही समझ आई थी कि वे असमर्थ हैं।
नारद जी ने अंतिम बार सत्यभामा की ओर देखा और बोले, “अब तुम जान गई हो कि जिन्हें तुमने हल्के में लिया था, वे कितने भारी हैं।”
सत्यभामा ने केवल सिर झुकाया। उनके मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। आँसू ही उनकी भाषा बन चुके थे।

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