द्वारका नगरी में श्रीकृष्ण की अनेक रानियाँ थीं, पर उनमें से एक ऐसी थीं जिनका स्वभाव सबसे अधिक तेज और अभिमानी माना जाता था। उनका नाम था – सत्यभामा।
सत्यभामा राजा सत्राजित की पुत्री थीं। सत्राजित के पास सूर्य भगवान का दिया हुआ अमूल्य रत्न था – श्यामंतक मणि। वह मणि प्रतिदिन सोने की वर्षा करती थी। उसी मणि के कारण सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ था। जब श्यामंतक मणि का प्रसंग चला और कृष्ण ने उस मणि को वापस दिलाया, तब सत्राजित ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री सत्यभामा को कृष्ण को समर्पित कर दिया। इस प्रकार सत्यभामा द्वारका की रानी बनीं।
सत्यभामा रूपवती थीं, चतुर थीं और अत्यंत साहसी भी। वे कृष्ण से बहुत प्रेम करती थीं, पर उनका प्रेम थोड़ा अलग था। रुक्मिणी का प्रेम शांत और गंभीर था, तो सत्यभामा का प्रेम उग्र, अधिकारपूर्ण और कभी-कभी ईर्ष्या से भरा होता था। वे चाहती थीं कि कृष्ण केवल उन्हीं के हों। वे अक्सर गर्व से कहा करतीं, “कृष्ण मुझे सबसे अधिक प्रेम करते हैं। मैंने ही उन्हें सबसे अधिक सुखी रखा है।”
उनके इस अभिमान को देवर्षि नारद अच्छी तरह जानते थे। नारद जी सदैव लीलाओं के सूत्रधार रहते थे। वे चाहते थे कि सत्यभामा के अभिमान को थोड़ा तोड़ा जाए और उन्हें सच्चे प्रेम का पाठ पढ़ाया जाए। एक दिन उन्होंने सोचा कि अब समय आ गया है।
नारद जी ने ब्राह्मण का वेश धारण किया। साधारण वस्त्र, हाथ में कमंडल और मस्तक पर चंदन का टीका लगाकर वे द्वारका के महल में पहुँचे। द्वारपालों ने उन्हें रोका तो उन्होंने कहा, “मैं एक दरिद्र ब्राह्मण हूँ। मुझे रानी सत्यभामा से भिक्षा माँगनी है।”
जब सत्यभामा को सूचना मिली तो वे प्रसन्न हो गईं। वे दानवीर के रूप में प्रसिद्ध होना चाहती थीं। उन्होंने ब्राह्मण को अपने कक्ष में बुलाया। नारद जी अंदर आए और आशीर्वाद दिया, “पुत्री, तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे जैसे दानशील के घर आकर मेरा जन्म सफल हो गया।”
सत्यभामा मुस्कुराईं। उन्होंने दासी से कहा, “इस ब्राह्मण को स्वर्ण मुद्राएँ दो, रत्न दो, वस्त्र दो। इन्हें संतुष्ट करके विदा करो।”
नारद जी ने हाथ जोड़कर कहा, “रानी, मुझे धन की आवश्यकता नहीं। मुझे रत्नों की भी इच्छा नहीं। मैं तो ऐसी भिक्षा माँगने आया हूँ जो संसार में सबसे दुर्लभ है।”
सत्यभामा का अभिमान जाग उठा। वे गर्व से बोलीं, “हे ब्राह्मण देव! इस द्वारका में ऐसी कौन सी वस्तु है जो मैं आपको न दे सकूँ? बोलिए, क्या चाहिए? सोना चाहिए? हाथी चाहिए? रथ चाहिए? राज्य का एक भाग चाहिए? बोलिए, मैं तुरंत दे दूँगी।”
नारद जी ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “रानी, मुझे आपका पति चाहिए।”
कक्ष में अचानक सन्नाटा छा गया। सत्यभामा की आँखें चौड़ी हो गईं। वे अविश्वास से नारद की ओर देखने लगीं। “क्या कहा आपने? मेरे पति? श्रीकृष्ण को?”
नारद जी ने शांत भाव से कहा, “हाँ रानी। आपने कहा था कि इस घर में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो आप न दे सकें। श्रीकृष्ण आपके सबसे प्रिय हैं, आपके सबसे मूल्यवान हैं। अतः मैं भिक्षा में उन्हें ही माँगता हूँ। यदि आप सच में दानवीर हैं तो अपने पति को मुझे दान कर दीजिए।”
सत्यभामा कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गईं। उनके मन में हजारों विचार एक साथ उठने लगे। वे सोचने लगीं – यदि मैं मना कर दूँ तो यह ब्राह्मण कहेगा कि सत्यभामा केवल बातें बनाती है, वास्तव में दान नहीं करती। यदि मैं दे दूँ तो… मेरे कृष्ण मुझसे छिन जाएँगे। पर अभिमान ने उन्हें फिर से घेर लिया। उन्होंने सोचा – कृष्ण मुझसे इतना प्रेम करते हैं कि यह ब्राह्मण उन्हें लेकर भी नहीं जा सकेगा। कृष्ण स्वयं मना कर देंगे। और यदि यह ब्राह्मण उन्हें ले भी गया तो कृष्ण मुझे छोड़कर कैसे रहेंगे? वे अवश्य लौट आएंगे।
इसी गर्व में सत्यभामा ने अपना सिर ऊँचा किया और बोलीं, “हे ब्राह्मण देव! आपने सही कहा। मेरे लिए मेरे पति से बढ़कर कोई वस्तु नहीं। और जब आपने भिक्षा माँगी है तो मैं कैसे मना कर सकती हूँ? मैं अपनी इच्छा से अपने पति श्रीकृष्ण को आपको दान करती हूँ।”
नारद जी ने तुरंत कहा, “तो फिर जल से संकल्प कीजिए रानी। दान तभी पूर्ण होता है जब संकल्प किया जाए।”
सत्यभामा ने दासी से जल का पात्र मँगवाया। उनके हाथ काँप रहे थे, पर अभिमान ने उन्हें रोक रखा था। उन्होंने जल लिया और बोलीं, “आज इस ब्राह्मण को मैं अपने पति श्रीकृष्ण को दान स्वरूप प्रदान करती हूँ। अब ये मेरे नहीं, इन ब्राह्मण के हुए।”
जैसे ही संकल्प के शब्द पूरे हुए, नारद जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “धन्य हो रानी! आपने सच में महान दान किया। अब मैं अपने दान को स्वीकार करने के लिए श्रीकृष्ण के पास चलता हूँ।”
सत्यभामा अभी भी सोच रही थीं कि यह सब एक नाटक है। वे मान बैठी थीं कि कृष्ण इस दान को स्वीकार नहीं करेंगे। वे अपने कक्ष में बैठी इंतजार करने लगीं कि नारद जी खाली हाथ लौटेंगे और कहेंगे कि कृष्ण ने मना कर दिया।
पर नारद जी सीधे वहाँ गए जहाँ कृष्ण विराजमान थे। उन्होंने जाकर कहा, “कृष्ण, आपकी पत्नी सत्यभामा ने आपको मुझे दान कर दिया है। अब आप मेरे हुए। चलिए मेरे साथ।”
कृष्ण ने शांत भाव से सत्यभामा की ओर देखा। उनकी आँखों में हल्की सी मुस्कान थी, मानो वे सब कुछ पहले से जानते हों। उन्होंने कहा, “नारद जी, जब मेरी पत्नी ने संकल्प करके मुझे दान कर दिया है तो मैं कैसे मना कर सकता हूँ? दान की गई वस्तु वापस नहीं ली जाती। मैं तैयार हूँ।”
जब सत्यभामा को यह समाचार मिला कि कृष्ण ने वास्तव में दान स्वीकार कर लिया है और नारद जी के साथ जाने को तैयार हैं, तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। अभिमान का महल एक पल में ढह गया। वे भागती हुई कृष्ण के कक्ष में आईं। उनके नेत्रों में आँसू भरे थे और आवाज काँप रही थी।
“स्वामी… आप क्या कर रहे हैं? वह तो एक साधारण ब्राह्मण था। मैंने तो केवल… मैंने तो केवल…” सत्यभामा बोल नहीं पा रही थीं। गर्व के कारण उन्होंने जो शब्द कहे थे, वे अब उनके गले में काँटे बनकर चुभ रहे थे।
कृष्ण ने शांत दृष्टि से उनकी ओर देखा और बोले, “सत्यभामा, तुमने स्वयं जल लेकर संकल्प किया था। अब तुम अपना शब्द वापस कैसे ले सकती हो? दान देकर पछताना धर्म नहीं है।”
सत्यभामा के आँसू अब धारा बनकर बहने लगे। वे कृष्ण के चरणों में गिर पड़ीं और रोते हुए बोलीं, “स्वामी, मैंने मूर्खता की। मेरे अभिमान ने मुझे अंधा बना दिया। मैंने सोचा था कि आप मुझे कभी नहीं छोड़ेंगे। मैंने सोचा था कि मेरा प्रेम इतना बड़ा है कि कोई आपको मुझसे छीन नहीं सकता। पर मैं गलत थी। कृपया इस दान को स्वीकार न कीजिए। मैं वह सब कुछ दे दूँगी जो आप माँगेंगे, पर आप… आप मुझे छोड़कर मत जाइए।”
नारद जी वहीं खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा, “रानी, अब देर हो चुकी है। संकल्प हो चुका है। श्रीकृष्ण अब मेरे हो गए हैं।”
सत्यभामा बार-बार कृष्ण के चरण पकड़कर रो रही थीं। उनका सारा गर्व धुल चुका था। वे बार-बार कह रही थीं, “स्वामी, मैंने नहीं जाना था कि मेरे शब्द इतने भारी होंगे। मैंने नहीं जाना था कि दान की गई वस्तु इतनी जल्दी स्वीकार हो जाएगी। कृपया मुझे क्षमा करें।”
कृष्ण ने धीरे से उन्हें उठाया। उनके मुख पर अभी भी वही शांत भाव था। वे बोले, “सत्यभामा, तुमने आज जो किया है उसके परिणाम तुम्हें भोगने होंगे। अब नारद जी मुझे लेकर जाएँगे। तुम सोचो कि जब पति ही न रहे तो पत्नी का क्या मूल्य रह जाता है।”
सत्यभामा का हृदय टूट रहा था। वे बार-बार नारद जी के चरणों में गिरकर विनती कर रही थीं, “हे मुनिवर, आप दान वापस कर दीजिए। मैं आपको अपना सारा वैभव दे दूँगी। मैं आपको सोने के ढेर लगा दूँगी। पर मेरे पति को छोड़ दीजिए।”
नारद जी ने शांत स्वर में कहा, “रानी, दान वापस नहीं होता। अब तो केवल एक ही उपाय है।”
पर उस उपाय की बात आगे की है। अभी तो सत्यभामा अपने किए पर पछतावे के सागर में डूबी हुई थीं। उन्होंने गर्ववश अपने प्राणप्रिय पति को एक ब्राह्मण को दान कर दिया था। और वह दान स्वीकार भी हो चुका था।
महल में सन्नाटा छा गया था। सत्यभामा रोते-रोते बार-बार उसी क्षण को कोस रही थीं जब उन्होंने जल लेकर संकल्प किया था। उनका अभिमान चूर-चूर हो चुका था। और श्रीकृष्ण… वे शांत खड़े नारद जी के साथ जाने को तैयार थे।
यहीं तक की लीला आज पूरी हुई।

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