वृन्दावन अब पहले जैसा नहीं रहा था। प्रथम मिलन के बाद से राधा और कृष्ण का प्रेम दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा था। हर सुबह राधा बरसाना से दूध लेकर गोकुल आतीं और हर शाम कृष्ण अपनी गायों के साथ यमुना तट पर राधा का इंतजार करते। उनकी मुलाकातें अब छिपकर नहीं होती थीं। सखा-सहेलियाँ भी जान गई थीं कि राधा और कान्हा एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
कई महीने ऐसे ही बीत गए। होली आई, जन्माष्टमी आई, राखी आई। हर त्योहार में दोनों का मिलन और भी मधुर होता गया। कृष्ण राधा के माथे पर चंदन लगाते, राधा कृष्ण के गले में वनमाला पहनातीं। कभी वे कुंज में छिपकर बैठते, कभी यमुना के जल में पैर डालकर घंटों बातें करते। उनका प्रेम इतना गहरा हो चुका था कि वृन्दावन की हवा में भी “राधे-कृष्ण” की गूंज सुनाई देने लगी थी।
पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।
एक दिन अचानक गोकुल में हलचल मच गई। मथुरा से अक्रूर जी आए थे। कंस ने उन्हें भेजा था। अक्रूर ने नंद बाबा से कहा, “कंस महाराज ने कान्हा और बलराम को मथुरा बुलाया है। वहाँ धनुष यज्ञ है। वे दोनों भाई अवश्य चलें।”
नंद बाबा का हृदय काँप उठा। यशोदा माता तो जैसे पत्थर हो गईं। पर कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “माता, पिता… मुझे जाना ही होगा। कंस का अंत मेरे हाथों ही होना है। यह मेरा अवतार का उद्देश्य है।”
समाचार हवा की तरह पूरे ब्रज में फैल गया। गोप-गोपियाँ रोने लगीं। गायें दुहना बंद कर बैठी रहीं। यमुना का जल जैसे भारी हो गया हो। पर सबसे अधिक पीड़ा हुई राधा को।
जब राधा को यह बात पता चली तो वे जैसे मूच्छित हो गईं। ललिता और विशाखा ने उन्हें संभाला। राधा बार-बार एक ही बात दोहराती रहीं, “कान्हा… मेरे कान्हा जा रहे हैं? मुझसे दूर?”
उस रात राधा ने आँखें नहीं मूंदीं। वे बार-बार अपने हृदय पर हाथ रखकर पूछतीं, “यह हृदय अब किसके लिए धड़केगा?” सुबह होते-होते उन्होंने निर्णय लिया। वे कान्हा से आखिरी बार मिलेंगी।
अगले दिन अक्रूर जी का रथ गोकुल के द्वार पर खड़ा था। बलराम पहले से तैयार थे। कृष्ण ने यशोदा माता के चरण छुए। माता रोते-रोते कह रही थीं, “कान्हा, तुम जल्दी लौटना… मेरा मक्खन चुराता छोरा जल्दी लौटना।” कृष्ण ने माता के आँसू पोंछे और कहा, “माता, मैं शरीर से दूर जा रहा हूँ, पर आत्मा से कभी नहीं जाऊँगा।”
फिर कृष्ण अपने सखाओं से मिले। सभी रो रहे थे। सुदामा ने कहा, “कान्हा, तुम्हारे बिना यह ब्रज सूना हो जाएगा।” कृष्ण ने सभी को गले लगाया।
अब बारी थी राधा की।
कृष्ण जानते थे कि राधा कहीं पास ही होंगी। वे चुपचाप यमुना तट की ओर चल दिए। वहाँ कदंब के पेड़ के नीचे राधा खड़ी थीं। उनके नेत्रों में आँसू भरे थे, होंठ काँप रहे थे। वे कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनके पास गईं और उनके चरणों में गिर पड़ीं।
“कान्हा… तुम सच में जा रहे हो?” राधा की आवाज काँप रही थी।
कृष्ण ने उन्हें उठाया। उनके अपने नेत्र भी गीले थे। उन्होंने राधा का मुख अपने दोनों हाथों में लिया और कहा, “राधे… मुझे जाना ही होगा। यह मेरी लीला है। कंस का वध करना है, धर्म की स्थापना करनी है। मैं यदि नहीं जाऊँगा तो अधर्म और बढ़ेगा।”
राधा रोते हुए बोलीं, “धर्म… अधर्म… ये सब मुझे नहीं समझ आते कान्हा। मुझे तो केवल इतना पता है कि तुम्हारे बिना मेरा जीना असंभव है। तुम चले गए तो यह यमुना सूख जाएगी, ये कुंज मुरझा जाएंगे, मेरा हृदय पत्थर हो जाएगा।”
कृष्ण ने उन्हें अपने वक्ष से लगा लिया। दोनों देर तक ऐसे ही खड़े रहे। आसपास की हवा भी जैसे रुक गई हो। फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, “राधे, सुनो… मैं शरीर से मथुरा जा रहा हूँ, पर तुम मेरे हृदय से कभी बाहर नहीं जा सकतीं। तुम मेरी आत्मा हो। जहाँ मैं रहूँगा, वहाँ तुम्हारा नाम मेरे होठों पर रहेगा। हर श्वास में तुम्हारा स्मरण होगा।”
राधा ने सिर उठाया। उनके आँसू कृष्ण के वस्त्रों को भिगो रहे थे। वे बोलीं, “फिर भी तुम जा रहे हो। लोग कहेंगे राधा को छोड़कर कान्हा चले गए। क्या हमारा प्रेम इतना कमजोर था?”
कृष्ण की आँखों से एक आँसू बह निकला। उन्होंने कहा, “नहीं राधे। हमारा प्रेम इतना मजबूत है कि बिछोह भी इसे और गहरा कर देगा। लोग शरीर के मिलन को प्रेम समझते हैं। पर असली प्रेम तो वह है जो बिछोह में भी बना रहे। तुम ब्रज में रहोगी, मैं द्वारका में। पर दोनों जगह एक ही प्रेम साँस लेगा।”
राधा ने कृष्ण की बांसुरी अपने हाथ में ली। वह बांसुरी जो इतने दिनों से उनके हृदय की धड़कन बन चुकी थी। वे बोलीं, “यह बांसुरी मेरे पास रखो। जब तुम दूर होगे तो मैं इसे देखकर तुम्हें याद करूँगी। और तुम… तुम जब भी बांसुरी बजाओगे, तो याद रखना कि राधा कहीं दूर खड़ी तुम्हारी धुन सुन रही है।”
कृष्ण ने बांसुरी राधा के हाथ में ही रहने दी। उन्होंने अपनी वनमाला उतारी और राधा के गले में पहनानी चाही, पर राधा ने रोक दिया। “नहीं कान्हा… यह माला तुम्हारे गले में ही रहनी चाहिए। जब लोग तुम्हें देखेंगे तो कहेंगे कि यह माला राधा ने पहनाई थी।”
दोनों फिर चुप हो गए। शब्दों की कोई जरूरत नहीं थी। केवल नेत्र ही सब कुछ कह रहे थे। राधा ने अचानक कृष्ण के चरण छुए और कहा, “एक वचन दो कान्हा… कि तुम कभी मुझे भूलोगे नहीं।”
कृष्ण ने राधा को फिर से गले लगाया और बोले, “राधे, जब तक सूरज निकलेगा, जब तक यमुना बहेगी, जब तक ब्रज की धूल रहेगी… तब तक मैं तुम्हें नहीं भूल सकता। तुम मेरे प्राण हो। प्राण भला कैसे भूले जाते हैं?”
उसी समय अक्रूर जी का स्वर सुनाई दिया, “कान्हा… रथ तैयार है। देर हो रही है।”
कृष्ण ने राधा से अपने को अलग किया। यह क्षण दोनों के लिए असह्य था। राधा के पैर काँप रहे थे। वे गिर न जाएँ, इसलिए ललिता और विशाखा ने उन्हें संभाल लिया। कृष्ण ने एक अंतिम बार राधा की ओर देखा। उनकी आँखों में अपार प्रेम और अपार वेदना दोनों साथ-साथ थे।
फिर वे रथ की ओर चल दिए।
रथ चल पड़ा। पहिए धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ने लगे। गोप-गोपियाँ रथ के पीछे-पीछे दौड़ने लगीं। कोई चीख रहा था, कोई रो रहा था। गायें रंभाने लगीं। यशोदा माता बेहोश हो गईं। नंद बाबा का हृदय जैसे टूट गया हो।
पर राधा… राधा वहीं कदंब के पेड़ के नीचे खड़ी रहीं। वे दौड़ी नहीं। वे चिल्लाईं नहीं। केवल खड़े-खड़े देखती रहीं जैसे रथ धीरे-धीरे उनकी आँखों से ओझल होता जा रहा है। उनके हाथ में कृष्ण की बांसुरी थी। आँसू उनकी आँखों से लगातार बह रहे थे, पर वे पोंछती तक नहीं थीं।
जब रथ दृष्टि से पूरी तरह गायब हो गया, तब राधा ने धीरे से बांसुरी को अपने हृदय से लगा लिया और बोलीं, “जाओ कान्हा… जाओ। अपना धर्म निभाओ। पर याद रखना… यहाँ ब्रज में एक राधा बैठी तुम्हारा इंतजार करेगी। चाहे जन्म बीत जाएँ, चाहे युग बीत जाएँ… मेरा इंतजार खत्म नहीं होगा।”
उस दिन के बाद से वृन्दावन बदल गया।
यमुना का जल पहले जैसा स्वच्छ नहीं रहा। लगता था मानो नदी भी रो रही हो। कुंज के फूल मुरझाने लगे। गायें दूध देना कम कर गईं। गोपियाँ अब हँसती नहीं थीं। और राधा… राधा अब पहले जैसी नहीं रहीं।
वे पूरे दिन उस कदंब के पेड़ के नीचे बैठी रहतीं जहाँ अंतिम बार कान्हा से मिली थीं। कभी बांसुरी को देखतीं, कभी यमुना की ओर टकटकी लगाए रहतीं। ललिता उन्हें समझाती, “सखी, रोओ मत। कान्हा जरूर लौटेंगे।” पर राधा केवल सिर हिला देतीं।
रात को जब सारा ब्रज सो जाता, तो राधा अकेली यमुना तट पर चली जातीं। वहाँ बैठकर वे धीरे-धीरे गातीं –
“कान्हा तुमने छोड़ दिया ब्रज को…
छोड़ दिया राधा को…
अब यह हृदय कहाँ जाएगा…
अब यह प्रेम किसे सौंपूँगी…”
उनकी आवाज में इतना दर्द होता कि यमुना का जल भी थम सा जाता। हवा भी जैसे उनकी पीड़ा सुनने के लिए रुक जाती।
दिन बीतते गए। समाचार आने लगे कि कृष्ण ने कंस का वध कर दिया। मथुरा में वे राजा बन गए। फिर द्वारका नगरी बसाई। रुक्मिणी से विवाह हुआ। फिर सत्यभामा से। समाचार पर समाचार आते रहे। पर राधा के पास केवल एक ही समाचार आता – कान्हा अब ब्रज नहीं लौटेंगे।
फिर भी राधा ने प्रतीक्षा नहीं छोड़ी।
वे कहतीं, “शरीर से भले ही दूर हों, पर मेरा कान्हा मुझे कभी नहीं छोड़ सकता। वह मेरे भीतर रहता है। हर साँस में, हर धड़कन में।”
और सच में… जब भी कोई भक्त राधा-कृष्ण का नाम लेता, जब भी कोई बांसुरी की धुन सुनता, जब भी कोई यमुना तट पर बैठकर प्रेम की बात करता… तो लगता मानो राधा और कृष्ण अभी भी वहीं कहीं मौजूद हैं।
क्योंकि उनका बिछोह शरीर का था।
आत्मा का नहीं।
और जो प्रेम आत्मा से जुड़ा हो,
वह कभी बिछड़ नहीं सकता।

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