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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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जुलाई 2026
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  • पागल जादूगर

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    पागल जादूगर

     

    घने जंगल के बीच एक पुराना महल था। उस महल के बारे में आसपास के गांवों में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं। कोई कहता था कि वहां रात में दीवारें बातें करती हैं, कोई कहता था कि महल के अंदर जाने वाला कभी वापस नहीं आता।

     

    लेकिन सबसे ज्यादा डर लोगों को वहां रहने वाले एक जादूगर से लगता था।

     

    उसका नाम था विराज।

     

    लोग उसे पागल जादूगर कहते थे।

     

    कहते थे कि वह इंसानों से नफरत करता था और अपनी जादुई किताबों के साथ घंटों अकेले बातें करता रहता था। कभी आधी रात को महल की खिड़कियों से नीली रोशनी निकलती, तो कभी जंगल में किसी अनजान जानवर की आवाज सुनाई देती।

     

    एक दिन गांव की एक लड़की तारा जंगल में अपनी छोटी बहन को ढूंढते-ढूंढते उस महल तक पहुंच गई।

     

    महल का बड़ा दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    तारा डरते हुए अंदर गई।

     

    “कोई है?” उसने धीमी आवाज में पूछा।

     

    अचानक पीछे से आवाज आई।

     

    “यहां इंसानों का आना मना है।”

     

    तारा पलटी।

     

    सामने एक लंबा आदमी खड़ा था। उसके बाल बिखरे हुए थे, कपड़े पुराने थे और हाथ में एक चमकती हुई छड़ी थी।

     

    “तुम… जादूगर हो?” तारा ने पूछा।

     

    विराज ने अजीब सी हंसी हंसते हुए कहा, “लोग मुझे पागल जादूगर कहते हैं।”

     

    “मेरी बहन खो गई है। मैंने उसे पूरे जंगल में ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिली।”

     

    विराज की हंसी अचानक रुक गई।

     

    “तुम्हारी बहन कैसी दिखती है?”

     

    “उसकी उम्र दस साल है। उसने लाल रंग की पोशाक पहनी है। उसके हाथ में एक लकड़ी की गुड़िया है।”

     

    विराज ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल बाद उसने छड़ी जमीन पर रखी।

     

    महल की फर्श पर एक चमकता हुआ गोल निशान बन गया।

     

    उसमें जंगल का दृश्य दिखाई देने लगा।

     

    तारा हैरान रह गई।

     

    “ये… ये क्या है?”

     

    “जादू,” विराज ने कहा।

     

    दृश्य में तारा की बहन एक पेड़ के नीचे बैठी दिखाई दी।

     

    “वो वहां है!”

     

    तारा तुरंत बाहर भागने लगी।

     

    विराज ने उसका हाथ रोक लिया।

     

    “रुको।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो पेड़ साधारण पेड़ नहीं है।”

     

    तारा ने उसकी तरफ देखा।

     

    विराज ने कहा, “तुम्हारी बहन अकेली वहां नहीं है।”

     

    दोनों जंगल की ओर चल पड़े।

     

    कुछ दूर पहुंचने के बाद उन्हें बच्ची दिखाई दी।

     

    “दीदी!”

     

    तारा दौड़कर अपनी बहन के पास पहुंची और उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन तभी जमीन हिलने लगी।

     

    पेड़ की जड़ें जमीन से बाहर निकल आईं और चारों तरफ फैलने लगीं।

     

    तारा डर गई।

     

    “विराज!”

     

    जादूगर ने अपनी छड़ी उठाई।

     

    “पीछे हटो!”

     

    उसने मंत्र पढ़ा और छड़ी से रोशनी निकली। जड़ें पीछे हट गईं।

     

    बच्ची रोते हुए तारा से चिपक गई।

     

    तारा ने पहली बार गौर किया कि विराज के हाथ पर गहरा निशान था।

     

    “आपने हमें बचाया… फिर लोग आपको पागल क्यों कहते हैं?”

     

    विराज कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला, “क्योंकि लोग सच से ज्यादा डरावनी कहानी पर विश्वास करते हैं।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं हमेशा से ऐसा नहीं था।”

     

    उसने उन्हें महल में वापस लाकर एक पुराना कमरा खोला।

     

    कमरे में सैकड़ों किताबें थीं।

     

    बीच में एक बड़ी तस्वीर लगी थी।

     

    तारा ने तस्वीर देखते ही पूछा, “ये कौन हैं?”

     

    विराज ने धीरे से कहा, “मेरा परिवार।”

     

    तस्वीर में विराज अपनी पत्नी और छोटी बेटी के साथ खड़ा था।

     

    “मैं कभी इस राज्य का राज जादूगर था। लोग मुझ पर भरोसा करते थे। लेकिन एक रात कुछ लालची जादूगरों ने मेरी सबसे शक्तिशाली किताब चुराने की कोशिश की। उस किताब में ऐसा जादू था जो पूरे राज्य को बचा सकता था।”

     

    “फिर?”

     

    “मैंने किताब बचा ली, लेकिन उसी रात मेरी बेटी गायब हो गई।”

     

    तारा चौंक गई।

     

    “क्या वो मर गई?”

     

    विराज की आंखें भर आईं।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कमरे में अचानक एक किताब अपने आप खुल गई।

     

    उसके पन्नों पर चमकते अक्षर दिखाई दिए।

     

    “जिसे तुम खोया समझ रहे हो, वह अभी भी जीवित है।”

     

    विराज का चेहरा बदल गया।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    किताब के पन्ने तेजी से पलटने लगे।

     

    अचानक एक नक्शा सामने आया।

     

    उस पर जंगल के बीच एक लाल निशान चमक रहा था।

     

    तारा ने कहा, “शायद आपकी बेटी वहीं है।”

     

    विराज ने सिर हिलाया।

     

    “वह जगह… निषिद्ध जंगल है। वहां कोई जिंदा वापस नहीं आता।”

     

    तारा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपने मेरी बहन को बचाया। अब मैं आपकी बेटी को ढूंढने में आपकी मदद करूंगी।”

     

    विराज ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

     

    “तुम जानती भी हो कि तुम किस मुसीबत में पड़ रही हो?”

     

    “नहीं। लेकिन किसी को अपने परिवार से दूर रहने का दर्द मैं समझ सकती हूं।”

     

    अगली सुबह दोनों निषिद्ध जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    जंगल के बीच उन्हें एक टूटा हुआ मंदिर मिला।

     

    मंदिर के अंदर एक काला दरवाजा था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था जो विराज की किताब में था।

     

    विराज ने छड़ी उठाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    अचानक किसी बच्ची की आवाज आई—

     

    “पापा…”

     

    विराज के हाथ से छड़ी गिर गई।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “नहीं… ये आवाज…”

     

    तारा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “वो आपकी बेटी है।”

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    लेकिन जैसे ही वे आखिरी कमरे में पहुंचे, वहां एक बूढ़ा जादूगर खड़ा था।

     

    उसने हंसकर कहा—

     

    “आखिर तुम यहां आ ही गए, विराज।”

     

    विराज का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “तुम!”

     

    बूढ़ा जादूगर बोला, “जिसे तुमने सालों से मृत समझा, उसे मैंने जिंदा रखा। अब तुम्हारी सबसे शक्तिशाली जादुई किताब मुझे दे दो।”

     

    तभी पीछे से वही बच्ची दौड़ती हुई आई।

     

    “पापा!”

     

    विराज घुटनों पर बैठ गया।

     

    बाप-बेटी एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    तारा की आंखों में भी आंसू आ गए।

     

    लेकिन बूढ़े जादूगर ने अपनी छड़ी उठा ली।

     

    “अब असली खेल शुरू होगा।”

     

    विराज धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

     

    उसकी आंखों में इस बार पागलपन नहीं था।

     

    सिर्फ अपनी बेटी को बचाने का फैसला था।

     

    उसने छड़ी उठाई और कहा—

     

    “आज दुनिया देखेगी कि जिसे तुम पागल कहते रहे… वह असल में कितना शक्तिशाली जादूगर है।”

     

    और अगले ही पल पूरा जंगल तेज रोशनी से भर गया।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • एक कमरा दो अजनबी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक कमरा, दो अजनबी और एक अनकहा एहसास

     

    विदेश के एक बड़े कॉलेज में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए हॉस्टल की व्यवस्था थोड़ी अलग थी। वहाँ लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग हॉस्टल तो थे, लेकिन कुछ खास कमरों में अलग-अलग देशों के छात्रों को साथ रहने की अनुमति थी। कॉलेज का मानना था कि इससे छात्रों को अलग-अलग संस्कृतियों और लोगों को समझने का मौका मिलता है।

     

    ऐसे ही एक कमरे में पहले से तीन लड़कियाँ रहती थीं —सोम्या, एलिना और कैथरीन।

     

    सोम्या भारत से आई थी। वह बेहद शांत, मासूम और प्यारी लड़की थी। बात करते समय उसकी आवाज में एक अजीब-सी नरमी रहती थी। वह हर किसी से जल्दी घुलती-मिलती नहीं थी, लेकिन जिसे अपना मान लेती, उसके लिए पूरी तरह खड़ी रहती।

     

    एक शाम कमरे का दरवाजा खुला और कॉलेज का वार्डन एक लड़के के साथ अंदर आया।

     

    “यह तुम्हारा नया रूममेट है। नाम है सुशांत।”

     

    तीनों लड़कियाँ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।

     

    सुशांत ने बस हल्का-सा सिर हिलाया।

     

    “हैलो।”

     

    “बस इतना?” एलिना हँसते हुए बोली, “हमने सोचा था नए रूममेट का कम से कम परिचय तो होगा।”

     

    सुशांत ने अपना बैग नीचे रखा।

     

    “सुशांत। इंडिया से हूँ। बाकी… बाद में।”

     

    कैथरीन ने धीरे से एलिना के कान में कहा, “ये तो बहुत सीरियस है।”

     

    एलिना हँस पड़ी।

     

    सोम्या चुपचाप उसे देख रही थी।

     

    सुशांत ने कमरे में नजर दौड़ाई और फिर अपना सामान एक खाली कोने में रखने लगा। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कमरे में तीन लड़कियाँ हैं।

     

    एलिना ने पूछा, “तुम्हें अजीब नहीं लग रहा?”

     

    “क्या?”

     

    “हम तीन लड़कियाँ हैं और तुम अकेले लड़के।”

     

    सुशांत ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “मुझे पढ़ाई करनी है। कमरे में कौन है, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

     

    कैथरीन ने मजाक में कहा, “वाह! इतना सीरियस इंसान हमने पहली बार देखा है।”

     

    सोम्या के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उस रात सुशांत देर तक पढ़ता रहा। बाकी तीनों आपस में बातें करती रहीं। एलिना और कैथरीन लगातार उससे बात करने की कोशिश करतीं, लेकिन सुशांत के जवाब छोटे होते।

     

    “तुम्हारी गर्लफ्रेंड है?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “दिलचस्पी नहीं।”

     

    “कभी प्यार हुआ?”

     

    “नहीं।”

     

    “होगा भी नहीं लगता।”

     

    “शायद।”

     

    एलिना ने हँसते हुए कहा, “तुम इंसान हो या किताब?”

     

    सुशांत ने पहली बार मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा।

     

    “किताब शायद ज्यादा अच्छी होती।”

     

    सब हँस पड़ीं।

     

    बस सोम्या उसे चुपचाप देखती रही।

     

    अगले कुछ दिनों में कमरे का माहौल थोड़ा बदलने लगा। एलिना और कैथरीन सुशांत को परेशान करने के नए-नए तरीके ढूँढतीं। कभी उसका पेन छिपा देतीं, कभी उसकी किताब के ऊपर मजाकिया पर्ची रख देतीं।

     

    लेकिन सोम्या कभी उसे परेशान नहीं करती थी।

     

    एक दिन सुशांत लाइब्रेरी से वापस आया तो उसने देखा कि उसकी मेज पर खाना रखा था।

     

    वह हैरान हुआ।

     

    “ये किसने रखा?”

     

    सोम्या ने किताब से नजर उठाई।

     

    “मैंने।”

     

    “क्यों?”

     

    “सुबह से तुमने कुछ नहीं खाया था।”

     

    सुशांत कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    सोम्या मुस्कुराई।

     

    “जब कोई रोज एक ही समय पर खाना खाता हो और आज नहीं खाए, तो पता चल जाता है।”

     

    सुशांत ने पहली बार महसूस किया कि कमरे में कोई ऐसा भी था जो उसकी चुप्पी को समझने की कोशिश करता था।

     

    “थैंक यू।”

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    बस इतना ही।

     

    लेकिन उस छोटे-से पल के बाद सुशांत के अंदर कुछ बदलने लगा।

     

    अब कमरे में आते ही उसकी नजर सबसे पहले सोम्या को ढूँढती।

     

    वह खुद इस बदलाव को समझ नहीं पा रहा था।

     

    एक शाम बारिश हो रही थी। बिजली चली गई और कमरे में अंधेरा छा गया।

     

    एलिना और कैथरीन मोमबत्ती लेने बाहर चली गईं।

     

    कमरे में सिर्फ सुशांत और सोम्या रह गए।

     

    सोम्या खिड़की के पास बैठी बारिश देख रही थी।

     

    “तुम्हें बारिश पसंद है?” सुशांत ने अचानक पूछा।

     

    सोम्या ने पलटकर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “पता नहीं। बारिश में सब कुछ थोड़ा सच्चा लगता है।”

     

    सुशांत चुप हो गया।

     

    सोम्या ने पूछा, “तुम हमेशा इतने चुप क्यों रहते हो?”

     

    “शायद आदत है।”

     

    “किसी से बात करने का मन नहीं करता?”

     

    सुशांत ने कुछ पल सोचा।

     

    “पहले नहीं करता था।”

     

    सोम्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और अब?”

     

    सुशांत ने नजरें झुका लीं।

     

    “अब… कभी-कभी करता है।”

     

    सोम्या समझ नहीं पाई कि वह किसके बारे में कह रहा है।

     

    तभी एलिना और कैथरीन वापस आ गईं और कमरे का माहौल फिर सामान्य हो गया।

     

    लेकिन उस रात सुशांत देर तक सो नहीं पाया।

     

    उसे बार-बार सोम्या की मुस्कान याद आ रही थी।

     

    कुछ दिनों बाद कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। सभी छात्र तैयारी में व्यस्त थे। सोम्या भी एक प्रस्तुति की तैयारी कर रही थी। वह मंच के पीछे घबराई हुई खड़ी थी।

     

    सुशांत ने उसे देखा।

     

    “डर लग रहा है?”

     

    सोम्या ने धीरे से कहा, “थोड़ा।”

     

    “तुम कर लोगी।”

     

    “तुम्हें इतना भरोसा कैसे है?”

     

    “क्योंकि तुम जब किसी चीज को दिल से करती हो, तो उसे अच्छा ही करती हो।”

     

    सोम्या कुछ पल उसे देखती रही।

     

    “तुम आजकल बहुत बातें करने लगे हो।”

     

    सुशांत मुस्कुरा दिया।

     

    “शायद किसी की वजह से।”

     

    सोम्या के चेहरे पर हल्की-सी लाली आ गई।

     

    उस दिन सोम्या ने मंच पर शानदार प्रस्तुति दी।

     

    सबसे ज्यादा खुशी सुशांत के चेहरे पर थी।

     

    एलिना ने यह देख लिया।

     

    वह कैथरीन के पास जाकर धीरे से बोली, “मुझे लगता है हमारे सीरियस साहब बदल रहे हैं।”

     

    कैथरीन हँसते हुए बोली, “और वजह भी साफ है।”

     

    दोनों ने सोम्या और सुशांत की तरफ देखा।

     

    सुशांत को अब खुद से एक सवाल पूछना पड़ रहा था।

     

    जिस लड़के को कभी रिश्तों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वह अब हर दिन किसी एक लड़की के कमरे में आने का इंतजार क्यों करता था?

     

    उसे सोम्या की आवाज अच्छी क्यों लगती थी?

     

    उसकी मुस्कान देखकर मन हल्का क्यों हो जाता था?

     

    और सबसे बड़ी बात…

     

    अगर सोम्या एक दिन कमरे में न हो, तो पूरा कमरा खाली-खाली क्यों लगता था?

     

    सुशांत को जवाब पता था।

     

    बस वह उसे स्वीकार करने से डर रहा था।

     

    क्योंकि यह सिर्फ पसंद नहीं थी।

    उसके दिल में सोम्या के लिए एक ऐसा एहसास जन्म ले चुका था, जिसकी उसे खुद कभी उम्मीद नहीं थी।

     

    और सोम्या?

    वह भी शायद उस एहसास को महसूस करने लगी थी…

     

    लेकिन दोनों में से किसी ने अभी तक उसे शब्द नहीं दिए थे।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कदमों की आवाज

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    कदमों की आवाज

     

    रात के करीब बारह बज रहे थे। पूरे गांव में सन्नाटा पसरा था। सिर्फ राघव के पुराने मकान में ऊपर जाती लकड़ी की सीढ़ियां थीं, जो हर रात किसी के कदमों की आवाज से गूंजती थीं।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    पहले एक कदम।

     

    फिर दूसरा।

     

    फिर तीसरा।

     

    और फिर अचानक सब शांत।

     

    राघव उस आवाज से पिछले तीन महीने से परेशान था।

     

    मकान उसे अपने नाना से मिला था। नाना की मौत के बाद राघव अपनी पत्नी नंदिनी के साथ वहां रहने आया था।

     

    पहली रात ही नंदिनी ने पूछा था,

     

    “राघव, ऊपर कोई गया है क्या?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “नहीं, ऊपर तो कोई है ही नहीं।”

     

    नंदिनी ने हंसकर कहा,

     

    “तो फिर आवाज कैसी थी?”

     

    राघव ने बात टाल दी।

     

    लेकिन अगली रात फिर वही हुआ।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज नीचे से ऊपर जा रही थी।

     

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “ये आवाज सीढ़ियों से आ रही है।”

     

    राघव ने टॉर्च उठाई और सीढ़ियों के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगा।

     

    पहली सीढ़ी।

     

    दूसरी।

     

    तीसरी।

     

    जैसे ही वह पांचवीं सीढ़ी पर पहुंचा, ऊपर से किसी के भागने की आवाज आई।

     

    ठक-ठक-ठक-ठक!

     

    राघव ने तुरंत टॉर्च ऊपर की।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    लेकिन सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक छोटी-सी लाल रिबन पड़ी थी।

     

    राघव ने उसे उठा लिया।

     

    नंदिनी ने पूछा,

     

    “ये किसकी है?”

     

    राघव कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    “पता नहीं।”

     

    अगली सुबह राघव गांव के सबसे बुजुर्ग आदमी गोविंद काका के पास गया।

     

    उसने घर की बात बताई।

     

    काका का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “क्या तुम्हें सीढ़ियों पर कोई रिबन मिली?”

     

    राघव चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    काका कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “उस घर की सीढ़ियों की आवाज नई नहीं है।”

     

    “मतलब?”

     

    “करीब बीस साल पहले तुम्हारी नाना की बेटी… तुम्हारी मौसी आरती… इसी घर में रहती थी।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मेरी तो कोई मौसी नहीं थी।”

     

    गोविंद काका ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें यही बताया गया था।”

     

    राघव का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “सच क्या है?”

     

    काका ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “आरती एक रात ऊपर के कमरे में गई थी। उसके बाद वह कभी नीचे नहीं आई।”

    “क्या हुआ था उसके साथ?”

     

    काका ने सिर झुका लिया।

     

    “उस रात भी सीढ़ियों पर कदमों की आवाज आई थी।”

     

    राघव के हाथ से रिबन गिरते-गिरते बची।

    “फिर?”

     

    “तुम्हारे नाना ने कहा कि आरती घर छोड़कर चली गई। लेकिन गांव वालों को यकीन नहीं हुआ।”

     

    राघव घर वापस लौट आया।

     

    उसने उसी दिन ऊपर का बंद कमरा खोलने का फैसला किया।

     

    कमरे के दरवाजे पर पुराना ताला लगा था।

     

    चाबी उसे नाना की अलमारी से मिली।

     

    ताला खुलते ही धूल की मोटी परत हवा में उड़ गई।

     

    कमरे के अंदर एक पुरानी लकड़ी की मेज, कुछ किताबें और दीवार पर लगी एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके बालों में लाल रिबन लगी थी।

    राघव का दिल बैठ गया।

     

    वह रिबन बिल्कुल वही थी जो उसे सीढ़ियों पर मिली थी।

     

    तस्वीर के नीचे लिखा था आरती उम्र 12 साल।

    नंदिनी ने तस्वीर देखते हुए पूछा,“ये तुम्हारी मौसी हैं?”

     

    राघव ने धीरे से सिर हिलाया।

    “शायद…”

     

    तभी कमरे के बाहर से आवाज आई।

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों जम गए।

    आवाज सीढ़ियों से आ रही थी।

     

    नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा,

    “राघव… कोई ऊपर आ रहा है।”

     

    कदम धीरे-धीरे ऊपर आ रहे थे।

    ठक…ठक…ठक…

     

    राघव ने दरवाजे की ओर देखा।

    कदम दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गए।

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

    फिर दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।

     

    टक… टक…

    नंदिनी डरते हुए पीछे हट गई।

     

    राघव ने हिम्मत करके दरवाजा खोला।

    बाहर कोई नहीं था।

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान सीढ़ियों से शुरू होकर कमरे के अंदर आ रहे थे।

    और जाकर तस्वीर के सामने खत्म हो रहे थे।

     

    राघव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    अब तस्वीर में आरती के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

    उसकी आंखें जैसे सीधे राघव को देख रही थीं।

     

    उसी रात राघव ने नाना की पुरानी डायरी ढूंढ निकाली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था

    “मैंने आरती को नहीं मारा। लेकिन उसे बचाया भी नहीं।”

     

    राघव की आंखें फैल गईं।

    अगली लाइन पढ़कर उसके हाथ कांपने लगे।

     

    “उस रात आरती ने सीढ़ियों पर किसी को देखा था। वह डरकर ऊपर भागी। मैं उसके पीछे गया। लेकिन मैंने जो देखा, उसके बाद मैं खुद डर गया।”

     

    आगे का पन्ना फटा हुआ था।

     

    राघव ने पूरी डायरी उलट-पलट दी।

    आखिर में एक छोटी-सी पर्ची मिली।

     

    उस पर लिखा था“जिस रात कदमों की आवाज सुनाई दे, सीढ़ियों पर पीछे मुड़कर मत देखना।”

    राघव ने नंदिनी को कुछ नहीं बताया।

     

    लेकिन उसी रात ठीक बारह बजे फिर आवाज शुरू हो गई।

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज बहुत तेज थी।

    राघव और नंदिनी नीचे कमरे में बैठे थे।

     

    आवाज धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आने लगी।ठक… ठक… ठक…

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

    “राघव… ये नीचे आ रही है।”

    राघव ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    अंधेरे में किसी की परछाई दिखाई दी छोटी-सी।

    जैसे कोई बच्ची धीरे-धीरे सीढ़ियां उतर रही हो।

     

    राघव के मुंह से अचानक निकला,

    “आरती?”

    परछाई रुक गई।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई,“भैया…”

     

    राघव की आंखों में आंसू आ गए।

    “तुम्हें क्या हुआ था?”

     

    आवाज आई,मैं गिरी नहीं थी…

     

    राघव ने पूछा,तो?

    “मुझे धक्का दिया गया था।”

     

    नंदिनी ने राघव की तरफ देखा“किसने?”

     

    कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर जवाब आया“नाना ने नहीं…”

     

    राघव की सांस रुक गई।

    “फिर किसने?”

     

    परछाई ने धीरे से अपना हाथ ऊपर उठाया।

    और सीढ़ियों के ऊपर खड़े एक आदमी की ओर इशारा किया।

     

    राघव ने पलटकर देखा।

    ऊपर उसके नाना खड़े थे।

    लेकिन वह तो बीस साल पहले मर चुके थे।

    राघव पीछे हट गया।

     

    नाना की परछाई धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आने लगी।

     

    आरती की आवाज फिर सुनाई दी“उन्होंने मुझे नहीं धक्का दिया था…”

    राघव ने कांपते हुए पूछा,“फिर?”

    “उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    नाना की परछाई के हाथ में एक पुरानी लालटेन थी।

    अचानक राघव को सब समझ आने लगा।

     

    उस रात आरती सीढ़ियों से गिर गई थी। नाना उसे बचाने दौड़े थे। लेकिन आरती गंभीर रूप से घायल हो गई थी।

     

    नाना उसे अस्पताल ले जाने के बजाय डर गए।

    क्योंकि उसी समय घर के पुराने कागजों में एक बड़ा राज छिपा था आरती ने नाना को किसी जमीन के धोखे का सच पता चलते सुन लिया था।

     

    नाना डर गए कि अगर आरती बच गई तो सबको सच बता देगी।

    उन्होंने मदद बुलाने में देर कर दी।

    और आरती चली गई।

     

    नाना ने पूरी जिंदगी यह सच छिपाए रखा।

    तभी पुलिस की गाड़ी की आवाज बाहर सुनाई दी।

    राघव ने चौंककर दरवाजा खोला।

    उसने अपने नाना की डायरी पुलिस को सौंप दी।

    सालों पुराना सच सामने आ गया।

     

    अगली रात पहली बार उस घर की सीढ़ियों पर कोई कदमों की आवाज नहीं आई।

    राघव और नंदिनी चैन की सांस लेकर सोने चले गए।

    लेकिन आधी रात को राघव की नींद अचानक खुल गई। ठक… ठक… ठक…

    वही आवाज।

    वह धीरे से बिस्तर से उठा।सीढ़ियों की तरफ देखा।

    इस बार वहां कोई परछाई नहीं थी।

    बस आखिरी सीढ़ी पर लाल रिबन पड़ी थी।

    राघव ने उसे उठाया।

    तभी पीछे से एक बच्ची की बहुत धीमी आवाज आई“भैया…”

    राघव पलटा।वहां कोई नहीं था।

    लेकिन दीवार पर लगी आरती की पुरानी तस्वीर में अब उसके साथ एक और बच्चा खड़ा था।

    वह बच्चा बिल्कुल राघव जैसा दिख रहा था।

    तस्वीर के नीचे एक नई तारीख लिखी थी“अगली रात…”

    और उसके नीचे सिर्फ तीन शब्द थे“सीढ़ियां फिर गिनना।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कोई मरता नहीं था

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस घर में कोई मरता नहीं था

     

    शहर से करीब पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गांव था देवगढ़। गांव के आखिरी छोर पर एक बहुत पुराना मकान था, जिसे लोग “अमर हवेली” कहते थे।

     

    अजीब बात ये थी कि उस घर में पिछले सौ सालों से रहने वाला कोई भी इंसान कभी मरा नहीं था।

     

    लोगों को यह बात सुनने में अच्छी लगती थी, लेकिन गांव का कोई आदमी उस घर के पास तक नहीं जाता था।

     

    कहा जाता था कि जो भी उस घर में रहने जाता है, वह बूढ़ा तो होता है, बीमार भी पड़ता है, लेकिन उसकी मौत कभी नहीं होती।

     

    इसी गांव में एक दिन अमन नाम का लड़का अपनी मां के साथ आया। उसके पिता की मौत कई साल पहले हो चुकी थी और उसकी मां को गांव में पुश्तैनी जमीन मिली थी।

     

    अमन ने घर के बारे में सुना तो हंसते हुए बोला,

     

    “मां, लोग भी न… कुछ भी कहानी बना लेते हैं। कोई इंसान मरता नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है?”

     

    पास खड़े बूढ़े हरिदास ने उसकी बात सुन ली।

     

    उन्होंने अमन की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “बेटा, कहानी नहीं है। मैंने अपनी आंखों से उस घर के लोगों को देखा है।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “तो फिर वो लोग अभी तक जिंदा हैं?”

     

    हरिदास का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “हां… लेकिन जिंदा रहना और जिंदगी जीना दो अलग बातें हैं।”

     

    अमन कुछ समझ नहीं पाया।

     

    उस रात अमन और उसकी मां गांव के एक पुराने मकान में रुके। आधी रात को अचानक उनके दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने दरवाजा खोला।

     

    सामने हरिदास खड़े थे।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

     

    “कल अगर कोई तुम्हें अमर हवेली में जाने को कहे… तो मत जाना।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    हरिदास ने जवाब नहीं दिया।

     

    बस जाते-जाते इतना बोले,

     

    “उस घर में मौत नहीं आती… लेकिन वहां से कोई वापस भी नहीं आता।”

     

    अगली सुबह अमन अपनी मां के साथ खेत देखने निकला। रास्ते में उसकी मुलाकात एक बूढ़ी औरत से हुई।

     

    औरत ने अमन को देखते ही कहा,

     

    “तुम उसी घर के नए मालिक हो न?”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    औरत ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारे परिवार का नंबर आ गया है।”

     

    अमन को उसकी बात अजीब लगी।

     

    “कौन-सा नंबर?”

     

    औरत कुछ बोलती, उससे पहले उसकी मां ने अमन को वहां से चलने के लिए कहा।

     

    उस शाम उन्हें पुराने कागज मिले, जिनमें लिखा था कि अमर हवेली उनके परिवार की ही थी।

     

    अमन ने जिद की,

     

    “मां, हमें वो घर देखना चाहिए।”

     

    मां ने मना किया।

     

    लेकिन अमन अकेला ही हवेली पहुंच गया।

     

    लोहे का बड़ा दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    अंदर धूल से भरा आंगन था। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    लेकिन उन चित्रों में एक चीज अजीब थी।

     

    हर तस्वीर में एक ही परिवार दिखाई दे रहा था।

     

    और हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    1920… 1935… 1951… 1970… 1992… 2010…

     

    अमन ने गौर से देखा।

     

    तस्वीरों में मौजूद लोग उम्र में लगभग एक जैसे थे।

     

    तभी पीछे से आवाज आई,

     

    “तुम आ ही गए।”

     

    अमन पलटा।

     

    एक बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।

     

    उसकी आंखें बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “इस घर का रखवाला।”

     

    “यहां कौन रहता है?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे अपने लोग।”

     

    अमन ने दीवार पर लगी तस्वीर की ओर इशारा किया।

     

    “ये लोग कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “तुम्हारे दादा… परदादा… और उनसे भी पहले के लोग।”

     

    अमन के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “लेकिन ये सब तो मर चुके हैं।”

     

    बूढ़ा धीरे-धीरे उसके करीब आया।

     

    “नहीं। इस घर में कोई नहीं मरता।”

     

    अचानक ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने ऊपर देखा।

     

    बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    लेकिन तभी एक कमरे का दरवाजा खुला।

     

    अंदर से एक आदमी बाहर आया।

     

    अमन उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।

     

    “पापा?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “अमन…”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आप जिंदा हैं?”

     

    उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बस कहा,

     

    “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    अमन उसके पास जाने लगा।

     

    तभी बूढ़े ने चिल्लाकर कहा,

     

    “भागो!”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियां बंद हो गईं।

     

    दरवाजे अपने आप बंद हो गए।

     

    और दीवारों पर लगी तस्वीरों के चेहरे बदलने लगे।

     

    अब हर तस्वीर में अमन दिखाई दे रहा था।

     

    कहीं वह बच्चा था।

     

    कहीं बूढ़ा।

     

    कहीं बिल्कुल वैसा ही जैसा अभी था।

     

    अमन घबराकर दरवाजे की ओर भागा।

     

    लेकिन रास्ते में उसके पिता खड़े थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “अगर बाहर गए तो मैं हमेशा के लिए अकेला रह जाऊंगा।”

     

    अमन रुक गया।

     

    “आप मेरे पिता नहीं हैं।”

     

    उस आदमी की मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगा।

     

    और उसके पीछे दर्जनों लोग खड़े दिखाई दिए।

     

    वे सभी अमन के परिवार के पुराने सदस्य थे।

     

    सबकी आंखें अमन पर थीं।

     

    तभी बूढ़ा चिल्लाया,

     

    “इसे बाहर निकालो!”

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    फर्श पर बनी एक काली रेखा चमकी और अमन उसके बीच खिंचता चला गया।

     

    अगले ही पल सब शांत हो गया।

     

    सुबह अमन की मां हवेली के बाहर पहुंची।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    अंदर अमन नहीं था।

     

    सिर्फ एक नई तस्वीर दीवार पर टंगी थी।

     

    उस तस्वीर में अमन खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    नीचे तारीख लिखी थी

    11 अगस्त 2026

     

    मां चीख पड़ी।

     

    तभी पीछे से हरिदास की आवाज आई,

     

    “अब समझ आया कि इस घर में कोई क्यों नहीं मरता?”

     

    मां ने कांपते हुए पूछा,“क्यों?”

     

    हरिदास ने कहा,

     

    “क्योंकि मौत उन्हें लेने आती ही नहीं…”

     

    उन्होंने हवेली की तरफ देखा।

     

    “यह घर इंसानों को मारता नहीं है। यह उनकी मौत अपने अंदर कैद कर लेता है।”

    मां ने रोते हुए पूछा,

     

    “तो अमन?”

     

    हरिदास ने धीरे से कहा,

     

    “अब वह जिंदा है… हमेशा जिंदा रहेगा।”

    मां ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन हरिदास ने अगली बात कही तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “लेकिन वह अब इंसानों की दुनिया में नहीं है।”

     

    उसी समय हवेली के अंदर से अमन की आवाज आई

     

    “मां…”

     

    मां दौड़कर अंदर जाने लगी।

     

    हरिदास ने उसे रोक लिया।

    “मत जाना!”

    “वो मेरा बेटा है!”

    हरिदास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “वह आवाज अमन की नहीं है।”

     

    अंदर से फिर आवाज आई“मां… मुझे बचा लो…”

    मां दरवाजे पर खड़ी रोती रही।

     

    और हवेली की दीवार पर लगी नई तस्वीर में अमन की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    उसकी जगह उसके चेहरे पर डर दिखाई देने लगा।

    फिर तस्वीर के नीचे लिखी तारीख अपने आप बदल गई।

    11 अगस्त 2026 मिट गई।

     

    उसकी जगह लिखा आया अगला नाम: अमन की मां।

     

    और उसी पल हवेली का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    धड़ाम!

    उस दिन के बाद देवगढ़ गांव में एक और बात मशहूर हो गई “जिस घर में कोई मरता नहीं था, वहां रहने वालों की उम्र जरूर बढ़ती थी… लेकिन हर पीढ़ी के साथ वह घर एक नए इंसान को अपना बना लेता था।”

    और सबसे डरावनी बात?

    बस उसकी दीवार पर अब एक नई तस्वीर के लिए जगह खाली थी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बारिश की श्रापित मेढकी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश का मेढ़क और सात जन्मों की मेढ़की

     

    शहर से थोड़ा दूर एक पुराना जंगल था। उस जंगल के बीचों-बीच एक टूटी हुई हवेली थी, जिसके बारे में कहा जाता था कि वहां कभी एक बहुत ही घमंडी राजकुमार रहता था।

     

    उस राजकुमार का नाम था एडविन।

     

    एडविन देखने में बेहद सुंदर और राजसी था, लेकिन उसके अंदर घमंड कूट-कूटकर भरा हुआ था। उसे अपनी दौलत, अपने महल और अपनी खूबसूरती पर बहुत नाज था।

     

    एक दिन तेज बारिश हो रही थी। एडविन अपने घोड़े पर बैठकर जंगल के रास्ते से गुजर रहा था। रास्ते में उसे एक बूढ़ी औरत दिखाई दी, जो बारिश में भीगती हुई सड़क किनारे बैठी थी।

     

    बूढ़ी औरत ने हाथ उठाकर कहा,

     

    “बेटा, मुझे थोड़ा सहारा दे दो। बारिश रुकने तक मुझे कहीं बैठने की जगह चाहिए।”

     

    एडविन ने घमंड से उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरे पास तुम्हारे लिए समय नहीं है। रास्ते से हटो।”

     

    बूढ़ी औरत ने फिर कहा,

     

    “बस थोड़ी देर के लिए मुझे अपने महल में जगह दे दो।”

     

    एडविन हंस पड़ा।

     

    “तुम जैसी गरीब औरत मेरे महल में? वहां तुम्हारे लिए जगह नहीं है।”

     

    बूढ़ी औरत की आंखों में अचानक एक अजीब सी चमक आई।

     

    उसने शांत आवाज में कहा,”जिस खूबसूरती और राजसी जिंदगी पर तुम्हें इतना घमंड है, वही तुमसे छिन जाएगी। अब तुम तब तक इंसान नहीं बनोगे, जब तक तुम्हें सच्चा प्यार नहीं मिल जाता।”

     

    एडविन कुछ समझ पाता, उससे पहले ही आसमान में बिजली चमकी।

     

    अगले ही पल वह गायब हो गया।

    जब उसकी आंख खुली तो वह एक छोटे से गंदे पानी के गड्ढे में पड़ा था।

    वह अब राजकुमार नहीं था।वह एक मेढ़क बन चुका था।

     

    एडविन ने पानी में अपना चेहरा देखा और घबरा गया।

     

    “ये क्या हो गया?”

    उसने बोलने की कोशिश की, लेकिन उसके मुंह से सिर्फ टर्र-टर्र की आवाज निकली।

    दिन बीतते गए।

     

    बारिश आती तो नालियों और सड़कों का पानी बहकर जंगल के उस हिस्से में जमा हो जाता। वही गंदा पानी अब एडविन का घर बन गया था।

     

    महल की जगह कीचड़ थी।

    मखमली बिस्तर की जगह गीली मिट्टी थी।

     

    और राजसी भोजन की जगह छोटे-छोटे कीड़े।

     

    एडविन को धीरे-धीरे अपनी पुरानी जिंदगी याद आती और वह दुखी हो जाता।

     

    उधर उसी जंगल में एक छोटी सी मेढ़की रहती थी।

     

    उसका नाम था लिली।

     

    लेकिन लिली भी कोई साधारण मेढ़की नहीं थी।

     

    वह एक जादुई मेढ़की थी, जिसे भी एक श्राप मिला हुआ था।

     

    उसे अपनी जिंदगी के सात जन्म मेढ़की बनकर बिताने थे।

     

    लेकिन उसके श्राप में एक शर्त थी।

     

    “जब तक कोई इंसान तुम्हें तुम्हारे रूप के कारण नहीं, बल्कि तुम्हारे दिल के कारण सच्चा प्यार नहीं देगा, तब तक तुम अपने असली रूप में वापस नहीं आ पाओगी।”

     

    लिली को यह बात बचपन से पता थी।

     

    इसीलिए वह हमेशा सोचती थी कि शायद उसके लिए इंसानी प्यार कभी लिखा ही नहीं गया।

     

    एक शाम बहुत तेज बारिश हुई।

     

    बारिश का पानी बहते-बहते उसी गंदे गड्ढे में आ गया जहां एडविन रहता था।

     

    अचानक एक छोटी सी आवाज आई।

     

    “बचाओ!”

     

    एडविन ने देखा, लिली तेज पानी में बह रही थी।

     

    वह तुरंत पानी में कूद पड़ा।

     

    उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर लिली को एक पत्थर के पीछे पहुंचा दिया।

     

    लिली ने कांपते हुए उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे बचाया?”

     

    एडविन ने कुछ नहीं कहा।

     

    वह बस चुपचाप दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    लिली मुस्कुराई।

     

    “तुम बाकी मेढ़कों जैसे नहीं हो।”

     

    एडविन के मन में पहली बार किसी ने उसके लिए अच्छी बात कही थी।

     

    अगले दिन से दोनों साथ रहने लगे।

     

    लिली बहुत बातूनी थी।

     

    वह हर छोटी-बड़ी बात एडविन को बताती।

     

    कभी कहती,

     

    “देखो, आज बारिश का पानी कितना साफ है।”

     

    कभी कहती,

     

    “उस पेड़ पर जो पीला फूल खिला है, वो मुझे बहुत पसंद है।”

     

    एडविन पहले उसकी बातें सुनकर परेशान होता, लेकिन धीरे-धीरे उसे लिली की आवाज अच्छी लगने लगी।

     

    एक दिन लिली ने पूछा,

     

    “तुम हमेशा इतने उदास क्यों रहते हो?”

     

    एडविन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “क्योंकि मैं पहले कोई और था।”

     

    “कौन?”

     

    “एक राजकुमार।”

     

    लिली हंस पड़ी।

     

    “तुम? राजकुमार?”

     

    एडविन को बुरा लगा।

     

    “हंस क्यों रही हो?”

     

    लिली ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि राजकुमार तो बहुत घमंडी होते हैं। तुम तो इतने शांत हो।”

     

    एडविन ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं भी घमंडी था। बहुत ज्यादा।”

     

    फिर उसने उसे अपना पूरा सच बता दिया।

     

    लिली काफी देर तक चुप रही।

     

    उसने कहा,

     

    “शायद तुम्हें ये श्राप सजा देने के लिए नहीं, बदलने के लिए मिला है।”

     

    ये बात एडविन के दिल में उतर गई।

     

    समय गुजरता गया।

     

    बारिश का मौसम खत्म होने लगा।

     

    लेकिन एडविन और लिली की दोस्ती गहरी होती गई।

     

    एक रात अचानक जंगल में भयंकर बारिश शुरू हो गई।

     

    नाले का पानी तेजी से बढ़ने लगा।

     

    लिली पानी में फंस गई।

     

    एडविन उसे बचाने के लिए दौड़ा, लेकिन तेज बहाव में खुद भी बहने लगा।

     

    लिली चिल्लाई,

     

    “एडविन!”

     

    उसने पास की एक बेल पकड़ ली और पूरी ताकत से एडविन की तरफ बढ़ी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे को पकड़ लिया।

     

    काफी कोशिश के बाद वे एक बड़े पत्थर पर पहुंच गए।

     

    बारिश में दोनों चुपचाप बैठे रहे।

     

    लिली ने धीरे से कहा,

     

    “अगर तुम कभी इंसान बन गए तो मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

     

    एडविन ने उसकी तरफ देखा।

     

    पहली बार उसके मन में अपने पुराने महल, सोने और राजगद्दी से ज्यादा किसी और की चिंता थी।

     

    उसने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता मैं इंसान बनूंगा या नहीं। लेकिन इतना जानता हूं कि तुम्हें भूलना मेरे लिए सबसे मुश्किल होगा।”

     

    लिली की आंखों में चमक आ गई।

     

    अगली सुबह सूरज निकला।

     

    दोनों गंदे पानी के उसी छोटे से तालाब के किनारे बैठे थे।

     

    अचानक आसमान से सुनहरी रोशनी उतरी।

     

    वही बूढ़ी औरत उनके सामने आ खड़ी हुई।

     

    लिली डर गई।

     

    एडविन तुरंत उसके आगे आ गया।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “डरो मत। मैं तुम्हें सजा देने नहीं आई।”

     

    उसने एडविन की तरफ देखा।

     

    “राजकुमार, तुम्हारा घमंड खत्म हो चुका है। अब तुमने समझ लिया है कि किसी की कीमत उसके रूप या हैसियत से नहीं होती।”

     

    फिर उसने लिली की तरफ देखा।

     

    “और तुम्हारा श्राप भी अब खत्म हो सकता है।”

     

    अचानक दोनों के चारों तरफ सुनहरी रोशनी फैल गई।

     

    कुछ ही पलों में वहां दो इंसान खड़े थे।

     

    एडविन फिर से राजकुमार बन चुका था।

     

    और लिली एक सुंदर लड़की के रूप में उसके सामने खड़ी थी।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखकर हैरान रह गए।

     

    बूढ़ी औरत ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “सच्चा प्यार वही है जो बुरे समय में साथ रहे। तुम्हें इंसान बनाने वाली चीज कोई जादू नहीं, बल्कि तुम्हारा बदला हुआ दिल था।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    एडविन ने लिली की तरफ देखा।

     

    अब उसके सामने एक राजकुमार नहीं, बल्कि वही साधारण दिल वाला लड़का खड़ा था जिसे लिली ने गंदे पानी के बीच जाना था।

     

    एडविन ने कहा,

     

    “मुझे राजमहल वापस मिल गया, लेकिन अगर तुम मेरे साथ नहीं हो तो वो महल मेरे लिए फिर से खाली है।”

     

    लिली मुस्कुराई।

     

    “और मुझे अपने सात जन्मों का श्राप खत्म होने की खुशी से ज्यादा इस बात की खुशी है कि मुझे मेरा दोस्त वापस मिल गया।”

     

    उस दिन के बाद एडविन ने कभी अपनी दौलत और हैसियत पर घमंड नहीं किया।

     

    उसने जंगल के पास रहने वाले गरीब लोगों के लिए एक बड़ा आश्रय बनवाया, जहां बारिश के दिनों में कोई भी इंसान भीगने के लिए मजबूर न हो।

     

    और जब भी बारिश होती, एडविन और लिली उस पुराने तालाब के पास जरूर जाते।

     

    क्योंकि वहीं गंदे पानी के बीच एक घमंडी राजकुमार ने अपना घमंड खोया था…

     

    और वहीं एक मेढ़की ने उसे सिखाया था कि सच्चा प्यार चेहरे से नहीं, दिल से पहचाना जाता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • सुनियना कि मुस्कान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनैना की मुस्कान

     

    सुनैना को बचपन से ही एक बात बार-बार समझाई जाती थ उसे मुस्कुराना नहीं है।

     

    जब भी उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आती, उसकी दादी तुरंत उसे घूरकर कहतीं,

    “सुनैना! दांत मत दिखाया कर। तेरी मुस्कान इस घर के लिए अच्छी नहीं है।”

     

    सुनैना छोटी थी, इसलिए उसे समझ नहीं आता था कि उसकी मुस्कान से घर को क्या नुकसान हो सकता है।

     

    एक दिन वह आंगन में अपनी सहेली के साथ खेल रही थी। सहेली ने कोई मजेदार बात कही तो सुनैना जोर से हंस पड़ी।

     

    तभी दादी की आवाज आई,

    “कितनी बार कहा है तुझे, हंसना बंद कर!”

     

    सुनैना की हंसी अचानक रुक गई।

     

    वह चुपचाप नीचे देखने लगी।

     

    दादी उसके पास आईं और बोलीं,

    “जब भी तू हंसती है, घर में कोई न कोई परेशानी आ जाती है। याद नहीं पिछले साल तू ऐसे ही हंसी थी और उसी रात तेरे पिताजी का कारोबार बंद हो गया था?”

     

    सुनैना ने मासूमियत से पूछा,

    “लेकिन दादी, मेरी हंसी से पापा का कारोबार कैसे बंद हो सकता है?”

     

    दादी ने तुरंत कहा,

    “बहस मत कर। बड़ों की बात मानना सीख।”

     

    सुनैना चुप हो गई।

     

    उस दिन के बाद उसने अपने चेहरे से मुस्कान जैसे छीन ही ली।

     

    स्कूल में उसकी सहेलियां उसे हंसाने की कोशिश करतीं, लेकिन वह बस हल्का सा मुस्कुराकर रह जाती।

     

    एक दिन उसकी दोस्त रिया ने पूछा,

    “तू इतनी उदास क्यों रहती है? पहले तो तू सबसे ज्यादा हंसती थी।”

     

    सुनैना ने धीरे से कहा,

    “मुझे हंसने से मना किया गया है।”

     

    रिया हैरान होकर बोली,

    “किसने?”

     

    “घरवालों ने।”

     

    “क्यों?”

     

    सुनैना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,

    “उन्हें लगता है कि मेरी मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है।”

     

    रिया कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर उसने कहा,

    “सुनैना, अगर मुस्कुराने से गरीबी आती तो दुनिया का हर खुश इंसान गरीब होता।”

     

    सुनैना के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

     

    घर में वैसे भी हालात अच्छे नहीं थे। उसके पिता रमेश की छोटी सी कपड़ों की दुकान थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से बिक्री कम हो गई थी। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था।

     

    दादी हर परेशानी का कारण सुनैना को ही मानतीं।

     

    कभी घर में दूध कम पड़ जाता तो कहतीं,

    “सुबह-सुबह इसे हंसते देखा था, तभी से दिन खराब जा रहा है।”

     

    कभी बिजली का बिल ज्यादा आ जाता तो कहतीं,

    “इस लड़की की हंसी घर का सुख खा रही है।”

     

    सुनैना हर बार अपना चेहरा छिपा लेती।

     

    उसकी मां कमला सब सुनतीं, लेकिन कुछ नहीं कहतीं। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने सुनैना का साथ दिया तो घर में झगड़ा हो जाएगा।

     

    एक दिन सुनैना की छोटी बहन बीमार पड़ गई।

     

    दादी ने फिर सुनैना को दोष देते हुए कहा,

    “कल शाम तू आंगन में खिलखिला रही थी न? देख लिया उसका नतीजा!”

     

    इस बार सुनैना की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह अपने कमरे में गई और पहली बार अपनी मां से बोली,

    “मां, क्या सच में मेरी मुस्कान इतनी बुरी है?”

     

    कमला का दिल भर आया।

     

    उन्होंने सुनैना को गले लगा लिया।

     

    “नहीं बेटा। तेरी मुस्कान बुरी नहीं है।”

     

    “तो फिर सब मुझे हंसने से क्यों रोकते हैं?”

     

    मां के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    उन्होंने बस उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

    “कभी-कभी लोग डर के कारण ऐसी बातें मान लेते हैं, जिनका कोई सच नहीं होता।”

     

    सुनैना ने मां की तरफ देखा।

     

    “तो क्या मैं हंस सकती हूं?”

     

    कमला ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

    “जब दिल करे, हंस लेना।”

     

    उस रात बहुत दिनों बाद सुनैना अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी हुई।

     

    उसने खुद को देखा और धीरे से मुस्कुराई।

     

    आईने में उसे कोई अशुभ लड़की नहीं दिखाई दी।

     

    उसे बस एक मासूम लड़की दिखाई दी, जो बहुत दिनों से अपनी खुशी छिपाकर जी रही थी।

     

    अगले दिन स्कूल में उसकी अध्यापिका ने घोषणा की कि स्कूल में बच्चों के लिए एक कहानी प्रतियोगिता होने वाली है।

     

    सुनैना ने भी अपना नाम लिखवा दिया।

     

    उसने ऐसी कहानी लिखी जिसमें एक चिड़िया को उड़ने से रोक दिया जाता था क्योंकि गांव वालों को लगता था कि उसके उड़ने से तूफान आ जाएगा।

     

    प्रतियोगिता के दिन सुनैना ने पूरी कहानी सबके सामने सुनाई।

     

    कहानी खत्म होते ही पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा।

     

    सुनैना के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    उसे उस पल पहली बार लगा कि उसकी मुस्कान किसी मुसीबत का कारण नहीं, बल्कि उसकी ताकत है।

     

    उसे प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला।

     

    लेकिन घर लौटते समय उसे डर लग रहा था।

     

    वह सोच रही थी कि दादी को पता चला तो क्या होगा?

     

    जब वह घर पहुंची तो देखा कि पिता दुकान से लौटे हुए थे।

     

    उनके हाथ में एक बड़ा डिब्बा था।

     

    पिता ने मुस्कुराकर कहा,

    “सुनैना, पता है आज क्या हुआ?”

     

    सुनैना चुप रही।

     

    “दुकान पर एक बड़े व्यापारी का ऑर्डर मिला है। इतना बड़ा कि अगले कई महीनों तक घर की चिंता नहीं रहेगी।”

     

    सुनैना की आंखें चमक उठीं।

     

    वह खुशी से मुस्कुराने लगी।

     

    दादी वहीं बैठी थीं।

     

    उन्होंने सुनैना को मुस्कुराते देखा तो तुरंत बोलीं,

    “बस! अब इसे मत हंसने देना। कहीं फिर—”

     

    इस बार रमेश ने पहली बार अपनी मां की बात रोक दी।

     

    “बस मां।”

     

    दादी चुप हो गईं।

     

    रमेश ने कहा,

    “मेरी दुकान कई दिनों से इसलिए खराब चल रही थी क्योंकि मैं गलत जगह माल खरीद रहा था। आज मुझे सही ग्राहक मिला है। इसका सुनैना की मुस्कान से कोई लेना-देना नहीं है।”

     

    दादी कुछ नहीं बोलीं।

     

    रमेश ने सुनैना की तरफ देखा।

     

    “और अगर मेरी बेटी की मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है, तो आज पहली बार उसकी मुस्कान के साथ मेरे घर में खुशहाली क्यों आई?”

     

    कमला की आंखों में आंसू आ गए।

     

    सुनैना ने पिता को देखा और धीरे से पूछा,

    “पापा, क्या मैं अब खुलकर हंस सकती हूं?”

     

    रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “बिल्कुल। और आज से कोई तुम्हें हंसने से नहीं रोकेगा।”

     

    सुनैना ने पहली बार पूरे मन से हंसा।

     

    उसकी हंसी पूरे आंगन में गूंज उठी।

     

    दादी उसे देखती रहीं।

     

    कुछ दिनों बाद दादी खुद सुनैना के पास आईं।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

    “बेटा… शायद मैं गलत थी।”

     

    सुनैना ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।

     

    दादी बोलीं,

    “मेरी मां भी मुझे बचपन में यही कहा करती थी। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि ये बात सच है या नहीं। बस डरती रही और वही डर तुझ पर डाल दिया।”

     

    सुनैना की आंखें भर आईं।

     

    उसने दादी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “दादी, अब मुझे हंसने दोगी?”

     

    दादी की आंखों में भी मुस्कान आ गई।

     

    “हां बेटा… खूब हंस।”

     

    सुनैना खिलखिलाकर हंस पड़ी।

     

    उस दिन उस छोटे से घर में पहली बार किसी को डर नहीं लगा कि मुस्कान के साथ दरिद्रता आएगी।

     

    क्योंकि सब समझ चुके थे

     

    घर की खुशियां किसी की मुस्कान से नहीं जातीं।

    खुशियां तब चली जाती हैं, जब इंसान अंधविश्वास के डर से अपने ही घर की हंसी छीन लेता है।

     

    और सुनैना ने उसी दिन तय कर लिया कि अब वह अपनी मुस्कान कभी किसी डर के हवाले नहीं करेगी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • एकतरफा मुहब्बत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एकतरफा मोहब्बत 

     

    लविश की उम्र चालीस साल थी। शहर में उसका नाम एक बड़े बिजनेसमैन के तौर पर जाना जाता था। कई कंपनियां, आलीशान घर, महंगी गाड़ियां और हर सुविधा उसके पास थी। लेकिन इन सबके बावजूद उसकी जिंदगी में एक खालीपन था, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पाता था।

     

    फिर एक दिन उसकी मुलाकात लावण्या से हुई।

     

    लावण्या इक्कीस साल की कॉलेज स्टूडेंट थी। हंसमुख, आत्मविश्वासी और अपनी पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर। उसे दिखावे वाली जिंदगी बिल्कुल पसंद नहीं थी। वह अपने दम पर कुछ बनना चाहती थी।

     

    लविश की मुलाकात उससे पहली बार एक कॉलेज के कार्यक्रम में हुई, जहां उसकी कंपनी ने विद्यार्थियों के लिए एक स्कॉलरशिप कार्यक्रम रखा था।

     

    लावण्या मंच पर खड़ी होकर अपने प्रोजेक्ट के बारे में बता रही थी।

     

    लविश की नजर अचानक उसी पर जाकर रुक गई।

     

    उसने बहुत सी खूबसूरत लड़कियां देखी थीं, लेकिन लावण्या में उसे कुछ अलग लगा। शायद उसका आत्मविश्वास, शायद उसकी बात करने का तरीका या शायद उसकी आंखों में अपने सपनों को पूरा करने की चमक।

     

    कार्यक्रम खत्म हुआ तो लावण्या अपने दोस्तों के साथ बाहर निकलने लगी।

     

    तभी लविश ने उसे आवाज दी।

     

    “लावण्या?”

     

    वह पलटकर बोली, “जी?”

     

    “तुम्हारा प्रोजेक्ट काफी अच्छा था।”

     

    लावण्या मुस्कुराई।

     

    “थैंक यू।”

     

    “तुम आगे क्या करना चाहती हो?”

     

    “अपना खुद का बिजनेस शुरू करना चाहती हूं।”

     

    लविश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “अच्छा सपना है।”

     

    लावण्या ने हंसते हुए कहा, “सपना नहीं सर, प्लान है। सपना होता तो शायद मैं इतनी मेहनत नहीं करती।”

     

    उसकी बात सुनकर लविश कुछ पल चुप रहा।

     

    उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि वह लड़की सिर्फ खूबसूरत नहीं थी, बल्कि उसके अंदर कुछ बनने की जिद भी थी।

     

    समय बीतता गया।

     

    लविश किसी न किसी बहाने कॉलेज के कार्यक्रमों में आने लगा। कभी स्कॉलरशिप की मीटिंग, कभी विद्यार्थियों के प्रोजेक्ट की समीक्षा।

     

    और लगभग हर बार उसकी नजर लावण्या को ही ढूंढती।

     

    लावण्या के लिए लविश सिर्फ एक सम्मानित बिजनेसमैन था।

     

    लेकिन लविश के लिए बात धीरे-धीरे बदल चुकी थी।

     

    उसे लावण्या की छोटी-छोटी बातें याद रहने लगीं।

     

    उसे याद था कि लावण्या चाय में ज्यादा चीनी पसंद नहीं करती।

     

    उसे याद था कि वह बारिश में भीगने के बजाय छतरी लेकर चलती है।

     

    उसे याद था कि परीक्षा के दिनों में वह देर रात तक पढ़ती थी।

     

    लावण्या को इन बातों का अंदाजा तक नहीं था।

     

    एक शाम कॉलेज से निकलते समय लावण्या की मुलाकात लविश से हुई।

     

    “आप यहां?”

     

    लविश ने सहजता से कहा, “बस एक मीटिंग थी।”

     

    लावण्या ने सिर हिलाया।

     

    “अच्छा।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर लविश ने पूछा, “तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?”

     

    “बहुत अच्छी। अगले महीने मेरे फाइनल प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन है।”

     

    “ऑल द बेस्ट।”

     

    “थैंक यू।”

     

    लावण्या अपने रास्ते चली गई।

     

    लविश उसे जाते हुए देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन दिल में एक अजीब-सी बेचैनी।

     

    वह जानता था कि दोनों की उम्र में बहुत अंतर है।

     

    वह यह भी जानता था कि लावण्या की जिंदगी अभी शुरू ही हुई थी।

     

    उसके अपने सपने थे, अपनी दुनिया थी।

     

    और शायद सबसे बड़ी बात यह थी कि लावण्या ने कभी उसे उस नजर से देखा ही नहीं था।

     

    फिर भी लविश के दिल में उसके लिए भावनाएं बढ़ती चली गईं।

     

    एक दिन उसके दोस्त समीर ने उससे कहा,

     

    “तू पिछले कुछ महीनों से बदला-बदला सा है। बात क्या है?”

     

    लविश चुप रहा।

     

    समीर ने हंसते हुए कहा, “कहीं प्यार-व्यार तो नहीं हो गया?”

     

    लविश ने कुछ नहीं कहा।

     

    समीर समझ गया।

     

    “कौन है?”

     

    लविश ने धीमे से कहा, “लावण्या।”

     

    समीर कुछ पल चुप रहा।

     

    “वही कॉलेज वाली लड़की?”

     

    “हां।”

     

    “लविश, तू चालीस का है और वो इक्कीस की।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “और क्या उसे भी पता है कि तू उसके बारे में ऐसा सोचता है?”

     

    लविश ने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    समीर ने गंभीर होकर कहा,

     

    “तो फिर पहले खुद से पूछ कि तुझे उसका साथ चाहिए या सिर्फ उसकी जिंदगी में अपनी जगह चाहिए। दोनों चीजों में फर्क होता है।”

     

    लविश को उसकी बात दिल पर लगी।

     

    उस रात वह देर तक सो नहीं पाया।

     

    अगले दिन उसने फैसला किया कि वह लावण्या पर अपनी भावनाएं नहीं थोपेगा।

     

    वह उससे प्यार करता था, लेकिन उसके प्यार का मतलब यह नहीं था कि लावण्या भी उसे पसंद करे।

     

    कुछ दिन बाद लावण्या अपनी प्रेजेंटेशन के लिए परेशान थी।

     

    उसका प्रोजेक्ट बार-बार फेल हो रहा था।

     

    लविश को जब पता चला तो उसने सिर्फ इतना कहा,

     

    “अगर तुम्हें किसी सलाह की जरूरत हो तो बता देना। फैसला तुम्हारा होगा।”

     

    लावण्या ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

     

    “आप सच में मेरी मदद करेंगे?”

     

    “अगर मेरी सलाह तुम्हारे काम आए तो जरूर।”

     

    लावण्या ने उसकी मदद ली।

     

    लविश ने उसे रास्ता दिखाया, लेकिन प्रोजेक्ट खुद नहीं बनाया। उसने हमेशा उसकी मेहनत का सम्मान किया।

     

    कुछ हफ्तों बाद लावण्या का प्रोजेक्ट कॉलेज में सबसे अच्छा चुना गया।

     

    वह खुशी से लविश के पास आई।

     

    “सर! मेरा प्रोजेक्ट सिलेक्ट हो गया।”

     

    लविश मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था तुम कर लोगी।”

     

    लावण्या ने उत्साह में कहा,

     

    “आपकी वजह से हुआ।”

     

    “नहीं,” लविश ने कहा, “मेरी वजह से नहीं। तुमने मेहनत की थी।”

     

    लावण्या के मन में उस दिन लविश के लिए सम्मान और बढ़ गया।

     

    लेकिन प्यार?

     

    वह भावना अभी भी उसके दिल में नहीं थी।

     

    कुछ समय बाद लावण्या को एक बड़ी कंपनी में इंटर्नशिप मिल गई। वह अपने सपनों की तरफ बढ़ने लगी।

     

    लविश दूर से उसकी सफलता देखता रहा।

     

    एक दिन समीर ने फिर पूछा,

     

    “अब भी उससे प्यार करता है?”

     

    लविश मुस्कुराया।

     

    “हां। शायद हमेशा करूंगा।”

     

    “फिर उसे बता क्यों नहीं देता?”

     

    लविश ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,

     

    “क्योंकि प्यार सिर्फ अपनी बात कह देना नहीं होता। कभी-कभी सामने वाले की आजादी को समझना भी प्यार होता है।”

     

    समीर चुप हो गया।

     

    कुछ दिनों बाद लावण्या लविश से मिलने आई।

     

    उसने कहा,

    “सर, मुझे एक बात बतानी है। मुझे दूसरी कंपनी से ऑफर मिला है। मैं शायद दूसरे शहर चली जाऊंगी।”

     

    लविश के दिल को जैसे एक पल के लिए झटका लगा।

    लेकिन उसने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तो फिर जाना चाहिए।”

     

    “आपको बुरा नहीं लगेगा?”

    “क्यों लगेगा?”

     

    “आपने हमेशा मेरी मदद की है।”

     

    लविश ने कहा,”मैं चाहता हूं कि तुम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो। अगर मेरी वजह से तुम्हारे कदम रुक गए तो मेरी सारी मदद बेकार हो जाएगी।”

     

    लावण्या की आंखें नम हो गईं।”आप बहुत अच्छे इंसान हैं।”

     

    लविश हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “बस इतना ही काफी है।”

    लावण्या चली गई।

    दरवाजा बंद होते ही लविश कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

     

    उसकी आंखों में दर्द था, लेकिन चेहरे पर सुकून।

     

    उसने अपनी मोहब्बत को पाने की कोशिश नहीं की थी।

    उसने उसे आजाद छोड़ दिया था।

    क्योंकि लविश समझ चुका था कि सच्ची मोहब्बत हमेशा साथ रहने का नाम नहीं होती।

     

    कभी-कभी किसी की खुशी के लिए पीछे हट जाना भी मोहब्बत होती है।

    और लावण्या?

    वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ती रही।

    शायद उसे कभी पता नहीं चला कि एक चालीस साल का बिजनेसमैन उसे कितनी गहराई से चाहता था।

     

    लेकिन अगर कभी उसे यह बात पता भी चलती, तो शायद वह यही कहती

    “लविश ने मुझे पाया नहीं था, लेकिन उसने मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचने से कभी रोका भी नहीं।”

    और शायद यही उसकी एकतरफा मोहब्बत की सबसे खूबसूरत बात थी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • महादेव भक्त से मिलने पहुंचे

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    महादेव अपने भक्त से मिलने आए

     

    रतीराम और मतिराम दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे। दोनों की हालत पिछले कई सालों से खराब चल रही थी। घर में खाने तक के लाले पड़े रहते थे। कभी मजदूरी मिल जाती तो चूल्हा जल जाता, वरना दोनों परिवारों को खाली पेट ही सोना पड़ता।

     

    लेकिन गरीबी से ज्यादा उन्हें एक और चीज ने तोड़ दिया था—शराब।

     

    शाम होते ही दोनों गांव के बाहर बनी छोटी-सी शराब की दुकान पर पहुंच जाते और अपनी सारी कमाई वहीं उड़ा देते।

     

    उस दिन भी दोनों ने दिनभर मजदूरी की थी। शाम को हाथ में आए कुछ पैसे लेकर शराब की दुकान पर पहुंचे और खूब शराब पी ली।

     

    रतीराम लड़खड़ाते हुए बोला, “मतिराम… हमारी किस्मत ही खराब है रे। देख, दिनभर हड्डियां तोड़ो और रात को भी पेट खाली।”

     

    मतिराम ने हंसते हुए कहा, “किस्मत खराब नहीं है रतीराम… भगवान ही हमारे खिलाफ हैं।”

     

    रतीराम ने बोतल का आखिरी घूंट पीते हुए कहा, “हां… भगवान अगर होते तो हमारी ये हालत क्यों होती?”

     

    दोनों सड़क पर हिलते-डुलते आगे बढ़ने लगे।

     

    रात काफी हो चुकी थी। गांव की सड़क लगभग सुनसान थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।

     

    अचानक सामने से उन्हें एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    उसके हाथ में लकड़ी की एक पुरानी छड़ी थी। कपड़े बेहद साधारण थे और वह इतना धीरे-धीरे चल रहा था कि हर कदम पर ऐसा लगता जैसे अभी गिर जाएगा।

     

    मतिराम ने उसे देखकर कहा, “अरे हटो बाबा… सड़क के बीच में क्यों चल रहे हो?”

     

    बूढ़ा कुछ बोल पाता, उससे पहले दोनों उससे टकरा गए।

     

    धड़ाम!

     

    बूढ़ा सड़क पर गिर पड़ा।

     

    रतीराम और मतिराम भी लड़खड़ाकर कुछ कदम पीछे हो गए।

     

    मतिराम झल्लाकर बोला, “अरे बाबा! देखकर नहीं चल सकते?”

     

    बूढ़े ने धीरे से सिर उठाया।

     

    उसके चेहरे पर अजीब सी शांति थी।

     

    उसने कहा, “गलती तुम्हारी थी बेटा… फिर भी तुम मुझे ही दोष दे रहे हो?”

     

    रतीराम कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    उस बूढ़े की आंखों में उसे कुछ ऐसा दिखाई दे रहा था, जिसे वह समझ नहीं पा रहा था।

     

    उसने मतिराम से कहा, “चल, इसे उठा देते हैं।”

     

    दोनों ने बूढ़े को उठाया।

     

    बूढ़ा खड़ा हुआ और अपनी छड़ी के सहारे कुछ कदम आगे बढ़ा। फिर अचानक रुक गया।

     

    “रतीराम…”

     

    रतीराम के पैर वहीं जम गए।

     

    उसने घबराकर पूछा, “आप… मेरा नाम कैसे जानते हो?”

     

    बूढ़ा पलटा।

     

    “मतिराम… तुम भी यही सोच रहे हो न कि मैंने तुम्हारा नाम कैसे जाना?”

     

    मतिराम का नशा जैसे एक पल में उतरने लगा।

     

    वह बोला, “आप कौन हैं?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “जिसे तुमने आज शाम दोष दिया था… उसी को तुम सालों से पुकारते भी आए हो।”

     

    रतीराम और मतिराम एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    रतीराम बोला, “हमने तो भगवान को कभी देखा ही नहीं।”

     

    बूढ़े ने कहा, “लेकिन तुम्हारे घर के कोने में शिव की एक छोटी-सी मूर्ति आज भी रखी है।”

     

    रतीराम की आंखें फैल गईं।

     

    वह मूर्ति उसकी मां ने उसे बचपन में दी थी।

     

    मां के गुजरने के बाद भी उसने वह मूर्ति संभालकर रखी थी।

     

    बूढ़ा बोला, “तुम भूल गए रतीराम, लेकिन तुम्हारी मां नहीं भूली थी।”

     

    रतीराम के चेहरे पर डर और हैरानी साफ दिखाई देने लगी।

     

    बूढ़ा धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम बचपन में रोज मेरे सामने बैठकर प्रार्थना करते थे। कहते थे—’महादेव, जब मैं बड़ा होऊंगा तो गरीबों की मदद करूंगा। किसी भूखे को खाली हाथ नहीं लौटाऊंगा।’”

     

    रतीराम की आंखों में बचपन की तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    उसे अपनी मां याद आ गई।

     

    मंदिर की घंटियां याद आ गईं।

     

    और वह छोटी सी शिव प्रतिमा भी याद आ गई।

     

    वह कांपती आवाज में बोला, “लेकिन… मैं बदल गया।”

     

    बूढ़े ने कहा, “गरीबी ने तुम्हें नहीं बदला बेटा… तुम्हारे फैसलों ने बदला।”

     

    मतिराम चुपचाप खड़ा था।

     

    तभी बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और तुम मतिराम… तुम्हें याद है वह बरसात का दिन?”

     

    मतिराम ने सिर झुका लिया।

     

    “कौन सा दिन?”

     

    “जब तुम्हारे पास सिर्फ दो रोटियां थीं और तुमने उनमें से एक रोटी रास्ते में बैठे बूढ़े को दे दी थी?”

     

    मतिराम के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    वह घटना उसे धुंधली-सी याद थी।

     

    बूढ़े ने कहा, “उस दिन तुमने कहा था ‘बाबा, मेरे पास ज्यादा नहीं है, लेकिन आधा आपका है।’”

     

    मतिराम की आंखें भर आईं।

     

    “वो तो बहुत साल पहले की बात है।”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “भगवान के लिए साल पुराने नहीं होते। कर्म पुराने नहीं होते। इंसान भूल जाता है, लेकिन कर्म अपना रास्ता नहीं भूलते।”

     

    अचानक हवा तेज चलने लगी।

     

    बूढ़े की छड़ी जमीन पर गिर गई।

     

    रतीराम उसे उठाने के लिए झुका।

     

    लेकिन जैसे ही उसने सिर उठाया…

     

    वह बूढ़ा वहां नहीं था।

     

    सड़क के बीच सिर्फ उसकी लकड़ी की छड़ी पड़ी थी।

    दोनों घबरा गए।

     

    अचानक दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।

    टन… टन… टन…

    रतीराम की नजर आसमान की तरफ उठी।

     

    बादलों के बीच से चांद की रोशनी निकली और उसी रोशनी में उसे एक विशाल त्रिशूल की परछाईं दिखाई दी।

     

    मतिराम कांपते हुए बोला, “रतीराम… वो बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था।”

     

    रतीराम की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उसने हाथ जोड़ लिए।

     

    “महादेव…”

     

    तभी उनके कानों में एक शांत आवाज आई

     

    “मैं तुम्हें सजा देने नहीं आया था। मैं तुम्हें तुम्हारा रास्ता याद दिलाने आया था।”

     

    दोनों सड़क पर बैठ गए।

     

    रतीराम रोते हुए बोला, “महादेव… हमने आपको दोष दिया। अपनी गलतियों का दोष भी आपके सिर डाल दिया। हमें माफ कर दीजिए।”

     

    आवाज फिर आई”माफी शब्दों से नहीं, कर्मों से मांगो।”

     

    अगली सुबह गांव वालों ने देखा कि रतीराम और मतिराम शराब की दुकान पर नहीं गए।

     

    दोनों मजदूरी करने निकले।

     

    शाम को जब मजदूरी मिली तो रतीराम ने पैसे घर ले जाकर अपनी पत्नी के हाथ में रख दिए।

     

    पत्नी ने हैरानी से पूछा, “आज शराब नहीं पी?”

     

    रतीराम मुस्कुराया।

     

    “आज समझ आया है कि गरीबी हमारी दुश्मन नहीं थी… हमारी गलत आदतें थीं।”

     

    उधर मतिराम ने रास्ते में एक भूखे बच्चे को देखा।

     

    उसने अपनी मजदूरी से खाना खरीदा और बच्चे को दे दिया।

    बच्चे ने मुस्कुराकर कहा, “भगवान आपको खुश रखे।”

     

    मतिराम कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

    उसे वही बूढ़ा याद आ गया।

     

    कुछ दिनों बाद दोनों ने गांव के पुराने शिव मंदिर की सफाई शुरू कर दी।

     

    जिस मंदिर में कभी रतीराम बचपन में बैठकर महादेव से प्रार्थना करता था, वहां अब फिर दीपक जलने लगा।

     

    एक शाम रतीराम ने मंदिर में सिर झुकाकर कहा

     

    “महादेव, उस रात आपने बूढ़े का रूप लेकर हमें नहीं बचाया था… आपने हमें हमारे ही पुराने रूप से मिलाया था।”

     

    मतिराम ने कहा, “और हमारे कर्मों की याद दिलाकर हमें दूसरा मौका दिया।”

    मंदिर की घंटी अचानक अपने आप बज उठी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

    रतीराम मुस्कुराया।

     

    “चल मतिराम… लगता है महादेव ने हमारी बात सुन ली।”

     

    मतिराम ने हाथ जोड़कर कहा”महादेव को सुनाने के लिए शब्द नहीं चाहिए होते… सच्चा मन चाहिए।”

     

    उस दिन के बाद दोनों ने शराब छोड़ दी।

    गरीबी तुरंत खत्म नहीं हुई।

     

    मुश्किलें भी खत्म नहीं हुईं।

    लेकिन अब उनके पास मुश्किलों से लड़ने की हिम्मत थी।

    और गांव वाले अक्सर कहते थे

    “जिस रात दो नशे में डूबे आदमी एक बूढ़े से टकराए थे, उसी रात उनकी जिंदगी बदल गई थी। क्योंकि वह बूढ़ा कोई इंसान नहीं… स्वयं महादेव थे, जो अपने भूले हुए भक्तों को उनका रास्ता याद दिलाने आए थे।”

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  • ताक़तवर पेड़

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जादुई जंगल का ताकतवर पेड़

     

    बहुत दूर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच एक ऐसा जंगल था, जिसका नाम था मायावी वन।

     

    कहा जाता था कि यह कोई साधारण जंगल नहीं था। वहाँ पेड़ चलते थे, नदियाँ अपना रास्ता बदल लेती थीं और रात के समय आसमान में ऐसे सितारे दिखाई देते थे जो आम दुनिया में कभी नहीं दिखते थे।

     

    लेकिन उस जंगल की सबसे बड़ी पहचान एक पेड़ था।

     

    उसका नाम था अमरवृक्ष।

     

    लोग कहते थे कि अगर कोई इंसान उस पेड़ तक पहुँचकर उसे अपने हाथों से छू ले, तो उसके अंदर ऐसी शक्ति आ जाती थी कि वह दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान बन सकता था।

     

    वह हवा को अपने इशारे पर मोड़ सकता था, पानी को रोक सकता था और अपनी ताकत से बड़े-बड़े पत्थर तक उठा सकता था।

     

    लेकिन समस्या यह थी कि आज तक कोई उस पेड़ तक पहुँच ही नहीं पाया था।

     

    कई राजा, सैनिक और जादूगर उसे खोजने जंगल में गए थे।

     

    कुछ वापस लौट आए, लेकिन वे पेड़ तक नहीं पहुँच सके।

     

    और कुछ तो कभी वापस ही नहीं आए।

     

    धीरे-धीरे लोगों ने मान लिया कि अमरवृक्ष सिर्फ एक कहानी है।

     

    लेकिन पहाड़ों के पास रहने वाला एक सत्रह साल का लड़का सोहन इन बातों पर विश्वास करता था।

     

    उसके पिता बचपन से उसे उस पेड़ की कहानी सुनाते आए थे।

     

    एक दिन सोहन ने पूछा, “पिताजी, अगर वह पेड़ सच में इतना ताकतवर है तो किसी ने उसे देखा क्यों नहीं?”

     

    उसके पिता ने कहा, “क्योंकि वह पेड़ ताकत हर किसी को नहीं देता।”

     

    “तो किसे देता है?”

     

    पिता कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “जिसके दिल में ताकत पाने की लालच नहीं होती।”

     

    सोहन को यह बात समझ नहीं आई।

     

    “लेकिन कोई उस पेड़ को ढूंढेगा ही क्यों अगर उसे ताकत नहीं चाहिए?”

     

    पिता मुस्कुराए।

    “यही तो अमरवृक्ष की सबसे बड़ी पहेली है।”

     

    कुछ साल बाद सोहन के पिता अचानक गायब हो गए।

     

    उनके कमरे में सिर्फ एक पुराना नक्शा मिला।

     

    नक्शे पर मायावी वन बना था और उसके बीच लाल स्याही से एक निशान लगाया गया था।

     

    सोहन समझ गया कि उसके पिता अमरवृक्ष की तलाश में गए थे।

    उसने उसी दिन जंगल जाने का फैसला कर लिया।

     

    अगली सुबह वह अपना छोटा सा बैग लेकर मायावी वन की तरफ निकल पड़ा।

    जंगल के अंदर जाते ही उसे महसूस हुआ कि यहाँ कुछ अलग था।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

    फिर अचानक एक पेड़ की शाखा उसके सामने आकर रास्ता रोकने लगी।

    सोहन पीछे हट गया।

     

    शाखा धीरे-धीरे वापस ऊपर चली गई।

    “तो कहानी सच है,” सोहन ने खुद से कहा।

    वह आगे बढ़ता गया।

    कुछ दूर जाने के बाद उसे तीन रास्ते दिखाई दिए।

    नक्शे पर भी तीन रास्ते बने थे।

     

    पहले रास्ते के ऊपर लिखा था जो सबसे आसान दिखे, वही सबसे खतरनाक है।”

     

    दूसरे रास्ते के ऊपर लिखा था“जो डराए, जरूरी नहीं कि वह दुश्मन हो।”

     

    और तीसरे रास्ते पर लिखा था“जिसे चुनोगे, वही तुम्हें बदलेगा।”

     

    सोहन काफी देर तक तीनों रास्तों को देखता रहा।

     

    आखिर उसने दूसरा रास्ता चुना।

     

    जैसे ही वह आगे बढ़ा, जंगल अचानक अंधेरा हो गया।

     

    उसके सामने एक विशाल काला भेड़िया आकर खड़ा हो गया।

     

    सोहन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    भेड़िया गुर्राया।

     

    सोहन ने हाथ में पकड़ी लकड़ी कसकर पकड़ ली।

     

    लेकिन भेड़िया अचानक मुड़ा और आगे चलने लगा।

     

    सोहन को अपने पिता की बात याद आई—

     

    “जो डराए, जरूरी नहीं कि वह दुश्मन हो।”

     

    वह भेड़िए के पीछे चल पड़ा।

     

    कुछ दूर जाकर भेड़िया एक चट्टान के पास रुका और गायब हो गया।

     

    वहाँ पत्थर पर एक छोटा सा चिन्ह बना था।

     

    सोहन ने नक्शे को उससे मिलाया।

     

    “ये रास्ता सही है!”

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    लेकिन तभी जमीन हिलने लगी।

     

    पेड़ों के बीच से आवाज आई—

     

    “वापस चले जाओ…”

     

    सोहन रुक गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “तुम्हें ताकत चाहिए… इसलिए तुम यहाँ तक आए हो।”

     

    सोहन ने कहा, “नहीं!”

     

    जंगल में हँसी गूँज उठी।

     

    “हर इंसान ताकत चाहता है।”

     

    सोहन कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा, “मुझे ताकत चाहिए… लेकिन खुद के लिए नहीं।”

     

    जंगल अचानक शांत हो गया।

     

    सोहन ने आगे कहा

    “मेरे पिता को इस जंगल ने मुझसे छीन लिया है। मैं उन्हें ढूंढने आया हूँ। अगर अमरवृक्ष सच में उन्हें जानता है, तो मैं उसके पास जाऊँगा।”

     

    अचानक उसके सामने रास्ता खुल गया।

     

    पेड़ों के बीच से सुनहरी रोशनी आने लगी।

    सोहन की आँखें उस रोशनी से चौंधिया गईं।

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

    और फिर जो उसने देखा, उसे देखकर उसकी सांस रुक गई।

    एक विशाल पेड़ उसके सामने खड़ा था।

     

    उसका तना चाँदी जैसा चमक रहा था।

     

    उसकी शाखाएँ आसमान तक फैली थीं और उन पर हजारों सुनहरे पत्ते लगे थे।

     

    हर पत्ता हवा के बिना भी हिल रहा था।

    सोहन समझ गय यही अमरवृक्ष था।

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास गया।

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

    लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियाँ पेड़ को छूने वाली थीं, सामने अचानक उसके पिता दिखाई दिए।

     

    “सोहन!”

    वह खुशी से चिल्लाया।

    “पिताजी!”

    सोहन उनकी तरफ दौड़ा।

    लेकिन पिता धुंध की तरह गायब हो गए।

    सोहन समझ गया कि यह पेड़ की परीक्षा थी।

    तभी अमरवृक्ष से आवाज आई

    “अगर तुम्हें शक्ति मिल जाए, तो तुम सबसे पहले क्या करोगे?”

    सोहन ने कहा, “मैं अपने पिता को ढूंढूँगा।”

    “और उसके बाद?”

    “मैं उन लोगों की मदद करूँगा जिन्हें अपनी रक्षा करने के लिए किसी ताकतवर इंसान की जरूरत है।”

    “और अगर तुम्हारे पास दुनिया की सबसे बड़ी ताकत आ जाए?”

    सोहन ने कुछ पल सोचा।

    फिर बोला

    “तो मैं कोशिश करूँगा कि उस ताकत का इस्तेमाल किसी को डराने के लिए न हो।”

    पेड़ की शाखाएँ चमकने लगीं।

    सुनहरी रोशनी पूरे जंगल में फैल गई।

     

    सोहन ने धीरे से पेड़ को छू लिया।

    अचानक उसके शरीर के चारों तरफ तेज हवा घूमने लगी।

    जमीन हिलने लगी।

    उसके हाथों में चमकती रोशनी दिखाई दी।

    उसके अंदर एक ऐसी शक्ति जाग चुकी थी जिसकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी।

    लेकिन तभी पेड़ ने कहा“तुमने मेरी शक्ति पा ली है।”

    सोहन ने आश्चर्य से पूछा, “तो अब मैं दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान हूँ?”

    पेड़ ने उत्तर दिया नहीं।”

    सोहन चौंक गया।

    “क्यों?”

    “क्योंकि असली ताकत शरीर में नहीं होती।”

     

    पेड़ की जड़ें अचानक चमकने लगीं।

     

    और जमीन के नीचे से एक रास्ता खुल गया।

    सोहन ने नीचे देखा।

     

    वहाँ एक छोटी सी गुफा थी।

    गुफा की दीवार पर उसके पिता का नाम लिखा था।

     

    सोहन की आँखें भर आईं।

    वह समझ गया कि उसके पिता अभी जीवित हो सकते हैं।

     

    लेकिन तभी पेड़ की आवाज फिर गूँजी“अगर तुम उन्हें बचाना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी नई शक्ति की पहली परीक्षा देनी होगी।”

    सोहन ने पूछा “कैसी परीक्षा?”

    अचानक जंगल के दूसरे छोर से एक भयानक गर्जना सुनाई दी।

    पेड़ों के पत्ते कांपने लगे।

    सोहन ने पीछे मुड़कर देखा।

    अंधेरे के बीच दो विशाल चमकती आँखें दिखाई दे रही थीं।

     

    पेड़ ने कहा“वह इस जंगल का रक्षक है।”

     

    सोहन ने अपनी मुट्ठी बांधी।

    अब उसे समझ आ गया था कि अमरवृक्ष तक पहुँचना ही असली मंजिल नहीं थी।

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  • जंगल के बीच फंसे कियान नैन तारा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    पहाड़ों के जंगल में नैन तारा और कियान

     

    नैन तारा को बचपन से ही पहाड़ बहुत पसंद थे। जब भी टीवी पर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, झरने और घने जंगल दिखाई देते, वह घंटों उन्हें देखती रहती।

     

    एक दिन उसने अपने माता-पिता से कहा, “मुझे इस बार पहाड़ों की सैर पर अकेले जाना है।”

     

    उसकी माँ ने तुरंत मना कर दिया।

     

    “अकेले? बिल्कुल नहीं। तुम अभी इतनी बड़ी नहीं हुई हो कि अनजान जगह पर अकेली घूम सको।”

     

    नैन तारा ने मुँह बनाते हुए कहा, “माँ, मैं बच्ची नहीं हूँ। मैं अपना ध्यान रख सकती हूँ।”

     

    पिता ने भी समझाया, “बात तुम्हारे बच्ची होने की नहीं है। पहाड़ों पर रास्ते कभी भी बदल जाते हैं और जंगल में जाना तो बिल्कुल सुरक्षित नहीं।”

     

    लेकिन नैन तारा अपनी जिद पर अड़ी रही।

     

    कई दिनों तक वह माता-पिता से इसी बात को लेकर बहस करती रही। आखिरकार एक सुबह वह बिना किसी को बताए पास के पहाड़ी इलाके की तरफ निकल गई। उसके पास थोड़ा पानी, कुछ खाने का सामान, एक जैकेट और छोटा सा बैग था।

     

    शुरुआत में सब कुछ उसकी उम्मीद से भी अच्छा था।

     

    चारों तरफ ऊँचे पहाड़ थे। दूर कहीं झरने की आवाज आ रही थी और ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी।

     

    नैन तारा मुस्कुराई।

     

    “देखा! मैं बेकार में ही डर रही थी।”

     

    वह एक पतली पगडंडी पर आगे बढ़ती चली गई।

     

    उसे लगा कि यह रास्ता शायद किसी छोटे से गाँव तक जाता होगा।

     

    लेकिन लगभग एक घंटे बाद रास्ता अचानक दो हिस्सों में बंट गया।

     

    नैन तारा रुक गई।

     

    “अब किधर जाऊँ?”

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    जिस रास्ते से वह आई थी, वह भी पेड़ों के बीच कहीं गायब-सा हो चुका था।

     

    वह थोड़ी घबराई, लेकिन खुद को संभालते हुए बोली, “ठीक है… वापस चलते हैं।”

     

    वह वापस मुड़ी, मगर कुछ कदम चलने के बाद उसे एहसास हुआ कि वह रास्ता पहचान नहीं पा रही थी।

     

    धीरे-धीरे जंगल घना होता जा रहा था।

     

    पेड़ों की शाखाएँ ऊपर इतनी फैल चुकी थीं कि सूरज की रोशनी भी जमीन तक मुश्किल से पहुँच रही थी।

     

    नैन तारा के कदम रुक गए।

     

    “ओह नहीं… मैं सच में खो गई।”

     

    उसने अपना फोन निकाला, लेकिन नेटवर्क नहीं था।

     

    उसने माँ को फोन करने की कोशिश की।

     

    कॉल नहीं लगी।

     

    उसकी आँखों में डर साफ दिखाई देने लगा।

     

    तभी दूर झाड़ियों में कुछ हिला।

     

    नैन तारा ने ध्यान से देखा।

     

    दो चमकती हुई आँखें उसे घूर रही थीं।

     

    उसका शरीर डर से बिल्कुल स्थिर हो गया।

     

    झाड़ियों से एक भेड़िया धीरे-धीरे बाहर आया।

     

    नैन तारा पीछे हटने लगी।

     

    भेड़िया भी उसकी ओर बढ़ने लगा।

     

    उसके मुँह से हल्की गुर्राहट निकल रही थी।

     

    नैन तारा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने भागने की कोशिश नहीं की। उसे समझ आ गया था कि भागना स्थिति को और खतरनाक बना सकता है।

     

    वह धीरे-धीरे पीछे हटते हुए एक पेड़ के पास पहुँच गई।

     

    तभी ऊपर से पत्तों के हिलने की आवाज आई।

     

    नैन तारा ने डरकर ऊपर देखा।

     

    एक लड़का पेड़ की मोटी शाखा पर बैठा था।

     

    लगभग इक्कीस साल का वह लड़का शांत नजर आ रहा था। उसके कंधे पर एक छोटा बैग था और हाथ में लकड़ी की मजबूत छड़ी।

     

    अगले ही पल वह पेड़ से नीचे कूद गया और नैन तारा के सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “पीछे हटो!” उसने नैन तारा से कहा।

     

    लड़के की आवाज सख्त थी।

     

    नैन तारा तुरंत कुछ कदम पीछे हो गई।

     

    लड़के ने भेड़िए की तरफ देखा और ऊँची आवाज में उसे दूर जाने के लिए डराया।

     

    भेड़िया कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

     

    फिर लड़के की तरफ देखकर पीछे हटने लगा और थोड़ी देर बाद झाड़ियों के बीच गायब हो गया।

     

    नैन तारा ने राहत की सांस ली।

     

    “तुम… कौन हो?”

     

    लड़के ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरा नाम कियान है।”

     

    “तुम यहाँ अकेले क्या कर रहे हो?”

     

    कियान ने हल्की नाराजगी से पूछा, “पहले ये बताओ कि तुम यहाँ अकेली क्या कर रही हो?”

     

    नैन तारा चुप हो गई।

     

    “मैं… घूमने आई थी।”

     

    “घूमने?”

     

    “हाँ।”

     

    “और रास्ता भूल गई?”

     

    नैन तारा ने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    कियान ने लंबी सांस ली।

     

    “तुम्हें पता भी है कि तुम कितनी दूर जंगल के अंदर आ चुकी हो?”

     

    नैन तारा ने घबराकर पूछा, “कितनी?”

     

    “इतनी कि अकेले वापस जाना ठीक नहीं होगा।”

     

    यह सुनकर नैन तारा के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “तो अब क्या होगा?”

     

    कियान ने कहा, “पहले घबराना बंद करो। जब तक हम शांत रहेंगे, रास्ता ढूँढना आसान होगा।”

     

    नैन तारा उसके पीछे चलने लगी।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसने पूछा, “तुम्हें ये जंगल इतना अच्छी तरह कैसे पता है?”

     

    कियान ने जवाब दिया, “मैं यहीं आसपास रहता हूँ। बचपन से इन पहाड़ों और जंगलों में घूमता आया हूँ।”

     

    वह चलते-चलते पेड़ों पर बने छोटे निशान देख रहा था।

     

    नैन तारा ने पूछा, “तुम ये निशान क्यों देख रहे हो?”

     

    “ये पुराने रास्ते के संकेत हैं। बारिश और भूस्खलन की वजह से कई रास्ते बदल गए हैं, इसलिए ध्यान से चलना पड़ता है।”

     

    कुछ देर बाद दोनों को एक छोटी सी पहाड़ी धारा दिखाई दी।

     

    कियान ने कहा, “यहाँ थोड़ी देर आराम कर लेते हैं।”

     

    नैन तारा पत्थर पर बैठ गई।

     

    उसने अपना फोन फिर देखा।

     

    अब भी नेटवर्क नहीं था।

     

    उसकी आँखें भर आईं।

     

    “मेरे माँ-पापा बहुत परेशान हो रहे होंगे।”

     

    कियान कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “जब हम सुरक्षित बाहर निकलेंगे, सबसे पहले उन्हें फोन करना।”

     

    नैन तारा ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे उनसे झूठ बोलकर यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    कियान ने कहा, “गलती हो गई है तो अब उसे दोहराना मत। अभी हमारा ध्यान बाहर निकलने पर होना चाहिए।”

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    लेकिन शाम होते-होते मौसम अचानक बदल गया।

     

    आसमान पर काले बादल छा गए।

     

    ठंडी हवा तेज होने लगी।

     

    कियान ने चारों तरफ देखा।

     

    “हमें जल्दी कोई सुरक्षित जगह ढूँढनी होगी।”

    नैन तारा ने पूछा, “क्यों?”

    “पहाड़ों में मौसम का भरोसा नहीं होता।”

    कुछ ही मिनट बाद बारिश शुरू हो गई।

    दोनों एक बड़ी चट्टान के नीचे बने प्राकृतिक छज्जे में जाकर खड़े हो गए।

    बारिश तेज होती जा रही थी।

    नैन तारा चुपचाप बाहर देख रही थी।

    अचानक उसे दूर पहाड़ के दूसरी तरफ एक हल्की-सी रोशनी दिखाई दी।

    “कियान! वहाँ देखो!”

    कियान ने रोशनी की तरफ देखा।

    उसके चेहरे पर पहली बार राहत की झलक आई।

     

    “वो शायद पहाड़ी रास्ते पर बने पुराने वन-चौकी की रोशनी है।”

    “तो हम वहाँ जा सकते हैं?”

    “बारिश थोड़ी कम होने दो।”

    नैन तारा ने धीरे से पूछा, “कियान… अगर तुम आज यहाँ नहीं होते तो?”

    कियान ने उसकी बात बीच में रोक दी।

    “उस बारे में मत सोचो। अब तुम सुरक्षित हो।”

    बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी।

    कियान ने अपना बैग उठाया।“चलो।”

    दोनों सावधानी से उस रोशनी की दिशा में बढ़ने लगे।

    लेकिन जैसे ही वे चट्टान के पीछे से निकले, कियान अचानक रुक गया।

    उसने जमीन पर कुछ देखा।

    कीचड़ में बने ताजे पैरों के निशान।

    वे किसी इंसान के थे।

    नैन तारा ने पूछा, “क्या हुआ?”

    कियान ने जवाब नहीं दिया।

    उसने कुछ दूर जंगल की ओर देखा।

    फिर धीमी आवाज में बोला“हम इस जंगल में अकेले नहीं हैं।”

    नैन तारा का चेहरा डर से बदल गया।

    “मतलब?”

    कियान ने उसकी ओर देखा।

    “मुझे नहीं पता… लेकिन ये निशान अभी-अभी किसी ने छोड़े हैं।”

    दोनों कुछ पल वहीं खड़े रहे।

     

    दूर अंधेरे जंगल में अचानक किसी सूखी टहनी के टूटने की आवाज आई।

    कियान ने नैन तारा को पीछे रहने का इशारा किया।

    और उसी पल पेड़ों के बीच एक परछाईं तेजी से हिली…

    नैन तारा ने डरकर कियान की तरफ देखा।

     

    अब सवाल सिर्फ जंगल से बाहर निकलने का नहीं था।

     

    सवाल यह था कि उस सुनसान जंगल में उनके अलावा तीसरा कौन था?

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं