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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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जुलाई 2026
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  • पायल की अधूरी मुस्कान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    पायल पूरे घर की जान थी। अठारह साल की पायल जहां होती, वहां जैसे हंसी अपने आप चली आती थी। कभी वह आंगन में अपनी छोटी बहन के साथ खेलती, कभी छत पर कपड़े सुखाते हुए गाना गुनगुनाती और कभी दादी के पास बैठकर उनकी पुरानी बातें सुनते-सुनते खुद ही हंसने लगती। उसकी मां अक्सर उसे देखकर कहतीं, “पायल, तू कभी बड़ी भी होगी या हमेशा ऐसी ही बच्ची बनी रहेगी?” पायल हंसकर जवाब देती, “मां, बड़ी होकर क्या करना है? अभी तो मैं बिल्कुल ठीक हूं।” पिता भी मुस्कुराकर कहते, “इसे अभी बड़ा मत करो। हमारी बेटी अभी बच्ची ही है।” लेकिन पायल के अठारह साल के होते ही घर का माहौल थोड़ा बदल गया। एक दिन उसकी मां रसोई में काम कर रही थीं कि पड़ोस की चाची आ गईं। “बहन, तुम्हारी बेटी के लिए एक अच्छा रिश्ता आया है।” मां ने तुरंत कहा, “अभी तो पायल अठारह की हुई है। इतनी जल्दी शादी की क्या जरूरत है?” पिता ने भी साफ कह दिया, “अभी उसकी पढ़ाई पूरी होने दो। शादी बाद में करेंगे।” पायल ने दूर से उनकी बातें सुनीं तो राहत की सांस ली। उसे शादी का मतलब ही समझ नहीं आता था। उसके लिए जिंदगी का मतलब था अपनी सहेलियों के साथ घूमना, पढ़ाई करना, मां के साथ बाजार जाना और दादी के पास बैठकर उनकी बातें सुनना। लेकिन घर में सबसे ज्यादा चिंता दादी को थी। कुछ दिनों बाद दादी ने पायल के पिता को अपने पास बुलाया। “बेटा, मैं जानती हूं तुम्हें लगता है कि पायल अभी छोटी है। लेकिन मेरी उम्र भी तो देख।” पिता चुप रहे। दादी ने धीरे से कहा, “पता नहीं मेरी सांसें कब तक साथ देंगी। मैं बस अपनी पोती को दुल्हन बने देखना चाहती हूं।” “मां, ऐसी बातें मत करो।” “बेटा, मेरी एक इच्छा है। क्या तू वो भी पूरी नहीं करेगा?” पिता के पास कोई जवाब नहीं था। मां ने भी समझाया, “मांजी, रिश्ता अच्छा होना चाहिए। सिर्फ आपकी इच्छा के लिए इतनी जल्दी फैसला लेना ठीक नहीं।” लेकिन दादी अपनी बात पर अड़ी रहीं। आखिरकार एक रिश्ता आया। लड़के का नाम था वेद। वेद एक अच्छे परिवार से था। नौकरी करता था और देखने में भी शांत स्वभाव का लगता था। उसके परिवार ने पायल को देखा और रिश्ता पसंद कर लिया। पायल से जब पूछा गया तो उसने धीमे से कहा, “जैसा आप लोगों को सही लगे।” वह खुद शादी के लिए तैयार थी या नहीं, यह शायद वह खुद भी नहीं जानती थी। कुछ ही महीनों में पायल दुल्हन बन गई। लाल जोड़े में बैठी पायल को देखकर दादी की आंखों में खुशी के आंसू थे। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “आज मेरी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई।” पायल मुस्कुरा दी। लेकिन उसे क्या पता था कि जिस मुस्कान के पीछे पूरा घर खुश था, उसी मुस्कान को आने वाले दिनों में बहुत कुछ सहना पड़ेगा। शादी के बाद जब पायल पहली बार वेद के घर पहुंची तो उसने मन में सोचा, “अब यही मेरा घर है।” वह वेद को खुश करने की पूरी कोशिश करती। सुबह उसके लिए चाय बनाती। रात को पूछती, “थक गए हो?” लेकिन वेद का व्यवहार बिल्कुल अलग था। वह पायल से ज्यादा बातें नहीं करता था। पायल पहले तो समझ नहीं पाई। एक दिन उसने हिम्मत करके पूछा, “वेद, आप मुझसे नाराज हैं क्या?” वेद ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “नहीं।” “फिर आप मुझसे बात क्यों नहीं करते?” वेद कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “पायल, मुझे थोड़ा समय चाहिए।” पायल ने मासूमियत से पूछा, “किस चीज के लिए?” वेद ने कोई जवाब नहीं दिया। दिन गुजरते गए। पायल की हंसी अब घर में कम सुनाई देने लगी। एक शाम वह कमरे में सामान रख रही थी कि वेद का फोन बजा। वेद फोन लेकर बाहर चला गया। पायल ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन रात को जब वह कमरे में लौटा तो उसके चेहरे पर अजीब सी बेचैनी थी। पायल ने पूछा, “सब ठीक है?” “हां।” “आप कुछ परेशान लग रहे हो।” वेद ने कहा, “पायल, हर बात पूछना जरूरी नहीं होता।” उस एक वाक्य ने पायल को अंदर तक चुप कर दिया। कुछ दिनों बाद उसे असली बात पता चली। वेद किसी और लड़की को पसंद करता था। शादी से पहले भी वह उसी लड़की के करीब था। वेद के परिवार ने किसी वजह से उस रिश्ते को स्वीकार नहीं किया और उसकी शादी पायल से करवा दी। पायल को यह बात वेद की बहन से पता चली। उस रात वह बहुत देर तक अपने कमरे में बैठी रही। जब वेद आया तो पायल ने सीधे पूछा, “क्या आपको कोई और पसंद है?” वेद अचानक रुक गया। उसकी चुप्पी ही पायल के लिए जवाब थी। “तो फिर आपने मुझसे शादी क्यों की?” वेद ने धीमे स्वर में कहा, “मैंने शादी अपनी मर्जी से नहीं की थी।” पायल की आंखों में आंसू आ गए। “और इसमें मेरी क्या गलती है?” वेद चुप रहा। “मैंने तो कभी आपसे कुछ नहीं मांगा। बस इतना चाहती थी कि आप मुझे अपना समझें।” वेद ने नजरें झुका लीं। पायल ने अपने आंसू पोंछे। “आप मुझे पसंद नहीं करते, ये बात मैं समझ सकती हूं। लेकिन मेरी कोई गलती नहीं है। मुझे सजा क्यों मिल रही है?” वेद के पास कोई जवाब नहीं था। उस रात पायल पहली बार अपनी शादी के जोड़े को देखकर रोई। जिस लाल जोड़े को पहनकर उसने सोचा था कि उसकी नई जिंदगी शुरू होगी, वही जोड़ा अब उसे अपनी मजबूरी की याद दिला रहा था। अगले दिन पायल ने दादी को फोन किया। “दादी…” “क्या हुआ मेरी बच्ची?” पायल कुछ बोल नहीं पाई। दादी समझ गईं। “तू रो रही है?” पायल ने आंसुओं के बीच कहा, “दादी, आपने कहा था ना कि मुझे दुल्हन बने देखना चाहती हो?” “हां बेटा।” “देख लिया ना?” दादी कुछ समझ नहीं पाईं। पायल बोली, “लेकिन दादी… मुझे खुश दुल्हन देखना था ना?” दादी के हाथ कांपने लगे। उन्हें पहली बार अपनी जिद का एहसास हुआ। उन्होंने कहा, “पायल, मुझसे गलती हो गई।” पायल रोते हुए बोली, “आपकी गलती नहीं थी दादी। शायद किसी की गलती नहीं थी। बस मेरी जिंदगी का फैसला बहुत जल्दी कर दिया गया।” दादी की आंखों से आंसू बहने लगे। उधर वेद भी सब सुन रहा था। उस रात उसे पहली बार महसूस हुआ कि पायल सिर्फ उसकी पत्नी नहीं, बल्कि एक ऐसी लड़की थी जिसे बिना उसकी इच्छा जाने एक ऐसे रिश्ते में डाल दिया गया था जहां उसे अपनापन तक नहीं मिल रहा था। अगले दिन वेद पायल के सामने आया। “पायल।” पायल ने उसकी तरफ देखा। वेद ने कहा, “मैं तुम्हारे साथ गलत कर रहा था।” पायल चुप रही। “मेरे मन में किसी और के लिए भावनाएं थीं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हें नजरअंदाज करना सही था।” पायल ने धीमे से पूछा, “अब क्या चाहते हो?” वेद कुछ पल चुप रहा। “मैं चाहता हूं कि हम जल्दबाजी में कोई फैसला न लें। पहले दोनों परिवार बैठकर बात करें। तुम्हारी जिंदगी का फैसला तुम्हारी इच्छा के बिना अब कोई नहीं करेगा।” पायल ने पहली बार उसकी आंखों में देखा। उसे नहीं पता था कि वेद बदल पाएगा या नहीं। लेकिन पहली बार उसे लगा कि शायद उसकी आवाज भी मायने रखती है। और उसी दिन उसने मन में एक बात तय कर ली— शादी हो जाने से लड़की की जिंदगी खत्म नहीं होती। उसकी खुशी, उसकी इच्छा और उसका सम्मान भी उतना ही जरूरी है। पायल की मुस्कान अभी पूरी तरह वापस नहीं आई थी। लेकिन उसके अंदर अपनी जिंदगी के लिए खड़े होने की हिम्मत जरूर लौटने लगी थी।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • लौटाया जंगल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    शहर से थोड़ा दूर एक सुनसान सड़क थी। सड़क के दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे और शाम होते ही वहां लोगों का आना-जाना बहुत कम हो जाता था।

     

    एक दिन राजेश अपनी बाइक से उसी रास्ते से घर लौट रहा था। अचानक उसे सड़क किनारे से किसी छोटे जानवर के रोने की आवाज सुनाई दी।

     

    राजेश ने बाइक रोक दी।

     

    “ये आवाज कैसी है?”

     

    वह आवाज की तरफ बढ़ा तो झाड़ियों के पास उसे एक छोटा सा बच्चा दिखाई दिया।

     

    पहले तो राजेश समझ नहीं पाया कि वह कौन सा जानवर है। लेकिन जब उसने ध्यान से देखा तो उसके होश उड़ गए।

     

    वह शेर का बच्चा था।

     

    बच्चा बहुत कमजोर था और लगातार आवाज कर रहा था। उसके आसपास कोई दूसरा जानवर नहीं था।

     

    राजेश ने काफी देर तक आसपास देखा।

     

    “इसकी मां कहां है?”

     

    लेकिन वहां कोई नहीं था।

     

    राजेश ने वन विभाग को सूचना देने की कोशिश की, मगर उस समय आसपास नेटवर्क नहीं था। बच्चा ठंड से कांप रहा था।

     

    राजेश का दिल नहीं माना।

     

    उसने उसे सावधानी से उठाया और अपनी बाइक पर रख लिया।

     

    “चल छोटे… पहले तुझे सुरक्षित जगह ले चलता हूं।”

     

    वह उसे अपने घर ले आया।

     

    घर पहुंचते ही उसकी पत्नी सीमा घबरा गई।

     

    “राजेश! ये क्या लेकर आए हो?”

     

    राजेश ने कहा,

     

    “सड़क किनारे अकेला मिला था। बहुत छोटा है। अगर वहीं छोड़ देता तो शायद बचता नहीं।”

     

    सीमा ने बच्चे को देखा तो उसका दिल भी पिघल गया।

     

    “लेकिन ये शेर है।”

     

    राजेश ने सिर हिलाया।

     

    “जानता हूं। इसे हमेशा अपने पास नहीं रखेंगे। जब तक ये ठीक नहीं हो जाता, तब तक इसकी देखभाल करेंगे।”

     

    उन्होंने उसका नाम रखा—शेरू।

     

    कुछ ही दिनों में शेरू घर का हिस्सा बन गया।

     

    वह राजेश के पीछे-पीछे चलता।

     

    राजेश जहां बैठता, शेरू वहीं आकर बैठ जाता।

     

    राजेश काम से बाहर जाता तो शेरू दरवाजे के पास बैठकर उसका इंतजार करता।

     

    धीरे-धीरे वह इतना राजेश से जुड़ गया कि उसे देखते ही दौड़कर उसके पास आता।

     

    सीमा अक्सर हंसकर कहती,

     

    “लगता है इसे तुम इंसान नहीं, इसकी मां समझ में आते हो।”

     

    राजेश मुस्कुराकर कहता,

     

    “मैंने इसे सड़क से उठाया था, लेकिन अब लगता है इसने मुझे ही अपना घर बना लिया है।”

     

    समय गुजरता गया।

     

    कुछ महीने बाद शेरू बड़ा होने लगा।

     

    उसके पंजे बड़े हो गए।

     

    उसकी आवाज में भी पहले से ज्यादा ताकत आ गई।

     

    अब वह घर में दौड़ता तो छोटे-मोटे सामान गिर जाते।

     

    एक दिन राजेश ने उसे खेलते हुए देखा और उसके चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

     

    उसे समझ आ गया था कि अब शेरू को हमेशा घर में रखना संभव नहीं होगा।

     

    वह शेर था।

     

    उसका असली घर जंगल था।

     

    रात को राजेश देर तक सो नहीं पाया।

     

    सीमा ने पूछा,

     

    “क्या सोच रहे हो?”

     

    राजेश ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “शेरू को जंगल वापस छोड़ना पड़ेगा।”

     

    सीमा कुछ पल चुप रही।

     

    “तुम उसे छोड़ पाओगे?”

     

    राजेश की आंखें भर आईं।

     

    “पता नहीं।”

     

    अगले दिन राजेश ने वन विभाग से संपर्क किया। अधिकारियों ने उसे समझाया कि शेरू जैसे-जैसे बड़ा होगा, उसके लिए घर का माहौल खतरनाक भी हो सकता है और उसके प्राकृतिक व्यवहार पर भी असर पड़ सकता है।

     

    राजेश सब समझ रहा था।

     

    लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था।

     

    शेरू को क्या पता था कि उसका मालिक उसके भविष्य के बारे में फैसला कर रहा है।

     

    उस रात शेरू हमेशा की तरह राजेश के पास आकर लेट गया।

     

    राजेश ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “शेरू… तू मुझसे नाराज मत होना।”

     

    शेरू ने उसकी तरफ देखा।

     

    राजेश की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं तुझे छोड़ना नहीं चाहता। लेकिन तुझे आजाद करना जरूरी है।”

     

    अगले कुछ दिनों में वन विभाग ने शेरू को जंगल में वापस भेजने की तैयारी शुरू कर दी।

     

    जिस दिन उसे ले जाना था, सुबह से ही राजेश बहुत चुप था।

     

    सीमा की आंखें भी नम थीं।

     

    शेरू को जैसे कुछ समझ आ रहा था। वह बार-बार राजेश के पास आ रहा था।

     

    राजेश ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तू जहां भी रहेगा, खुश रहना।”

     

    फिर शेरू को वाहन में ले जाया गया।

     

    राजेश भी उसके साथ जंगल तक गया।

     

    गाड़ी जंगल के एक सुरक्षित हिस्से में रुकी।

     

    अधिकारी ने कहा,

     

    “अब इसे यहीं छोड़ना होगा।”

     

    राजेश कुछ कदम पीछे हट गया।

     

    शेरू बाहर आया।

     

    उसने चारों तरफ देखा।

     

    फिर अचानक पीछे मुड़ा।

     

    सीधे राजेश की तरफ।

     

    वह कुछ कदम आगे बढ़ा और राजेश के पास आकर खड़ा हो गया।

     

    राजेश का दिल टूट गया।

     

    उसने शेरू के सिर पर आखिरी बार हाथ फेरा।

     

    “जा… अब यही तेरा घर है।”

     

    शेरू ने राजेश को कुछ पल तक देखा।

     

    फिर वह धीरे-धीरे जंगल की तरफ बढ़ने लगा।

     

    कुछ कदम बाद वह फिर पलटा।

     

    राजेश वहीं खड़ा था।

     

    उसने हाथ उठाकर कहा,

     

    “जा शेरू।”

     

    इस बार शेरू जंगल की ओर बढ़ गया।

     

    कुछ ही देर में वह पेड़ों के बीच गायब हो गया।

     

    राजेश वहीं खड़ा रहा।

     

    उसकी आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    सीमा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तुमने उसे छोड़ा नहीं है राजेश… तुमने उसे उसकी जिंदगी वापस दी है।”

     

    राजेश ने जंगल की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “जानता हूं… लेकिन दिल तो यही चाहता है कि वो वापस आ जाए।”

     

    कई महीने बीत गए।

     

    राजेश अक्सर उसी जंगल के आसपास जाता, लेकिन शेरू उसे कभी दिखाई नहीं देता।

     

    एक दिन वन विभाग के एक अधिकारी ने राजेश को फोन किया।

     

    “राजेश जी, आपको एक खबर देनी है।”

     

    राजेश घबरा गया।

     

    “क्या हुआ शेरू को?”

     

    अधिकारी हंसते हुए बोले,

     

    “घबराइए मत। शेरू बिल्कुल ठीक है। हमने उसे जंगल में कई बार देखा है। अब वह दूसरे शेरों के साथ रहना सीख गया है।”

     

    राजेश की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

     

    “सच?”

     

    “हां। और एक बात और…”

     

    “क्या?”

     

    “वह अब बिल्कुल जंगली शेर की तरह व्यवहार करता है।”

     

    राजेश कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर मुस्कुराकर बोला,

     

    “तो आखिरकार वो अपने घर पहुंच ही गया।”

     

    उस शाम राजेश जंगल के बाहर काफी देर तक खड़ा रहा।

     

    उसे दूर से शेर की दहाड़ सुनाई दी।

     

    राजेश की आंखें भर आईं।

     

    उसे लगा जैसे वह आवाज कह रही हो—

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

    राजेश ने आसमान की तरफ देखा और मुस्कुराकर कहा,

     

    “खुश रहना शेरू… अब मुझे तेरी चिंता नहीं।”

     

    उस दिन राजेश समझ गया कि प्यार हमेशा किसी को अपने पास रखने का नाम नहीं होता।

     

    कभी-कभी सच्चा प्यार वह होता है…

     

    जब हम अपने सबसे प्यारे को अपने से दूर करके भी

    उसकी आजादी चुनते हैं।

    और शेरू?

     

    वह जंगल में लौट चुका था।

     

    लेकिन उसके दिल में शायद आज भी उस इंसान के लिए एक जगह थी…

     

    जिसने उसे सड़क किनारे लावारिस पाया था,

     

    उसे घर दिया था,

     

    प्यार दिया था,

     

    और आखिर में…

     

    उसे उसकी असली दुनिया लौटा दी थी।

     

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    Auther preeti Sharma

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  • दो अजनबी भाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दो अजनबी भाई — राम और श्याम शहर की एक बड़ी कंपनी में राम की नौकरी को करीब दो साल हो चुके थे। राम शांत स्वभाव का लड़का था। वह अपने काम से काम रखता और ऑफिस में किसी से ज्यादा घुलता-मिलता नहीं था। उसी ऑफिस में एक दिन नया लड़का आया—श्याम। श्याम की उम्र करीब राम के बराबर ही थी। चेहरे पर हमेशा हल्की मुस्कान रहती और बात करने का अंदाज ऐसा था कि सामने वाला कुछ ही मिनटों में उससे घुल-मिल जाता। पहले दिन ही श्याम को राम के पास वाली सीट मिली। श्याम ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “भाई, मैं श्याम हूं। उम्मीद है तुम मुझे देखकर परेशान नहीं होगे।” राम हंस पड़ा। “परेशान तो नहीं होऊंगा, लेकिन ज्यादा सवाल पूछे तो जरूर हो जाऊंगा।” श्याम ने तुरंत हाथ बढ़ाया। “पक्का दोस्त?” राम ने उसका हाथ पकड़ लिया। “पक्का दोस्त।” बस, उसी दिन से दोनों की दोस्ती शुरू हो गई। कुछ ही दिनों में राम और श्याम ऑफिस के सबसे अच्छे दोस्तों में गिने जाने लगे। दोनों साथ लंच करते, काम में एक-दूसरे की मदद करते और ऑफिस खत्म होने के बाद चाय पीने भी चले जाते। लेकिन दोनों की जिंदगी के बारे में एक अजीब बात थी। राम अपने परिवार के बारे में ज्यादा बात नहीं करता था। और श्याम भी अपने परिवार का जिक्र आते ही बात बदल देता था। एक दिन लंच करते समय श्याम ने पूछा, “राम, तुम्हारे घर में कौन-कौन है?” राम कुछ पल चुप रहा। “मां-पापा हैं।” “भाई-बहन?” राम ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं।” श्याम मुस्कुराया। “मेरे भी मां-पापा हैं। लेकिन मेरी मां हमेशा कहती हैं कि अगर मेरा एक भाई होता तो शायद मैं इतना जिद्दी नहीं होता।” राम हंसते हुए बोला, “मेरी मां भी कभी-कभी कहती थीं कि काश मेरा कोई भाई होता।” दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे। फिर श्याम ने मजाक में कहा, “लगता है हम दोनों को भाई की कमी थी, इसलिए दोस्त बन गए।” राम ने भी हंसते हुए कहा, “शायद।” उन्हें क्या पता था कि उनकी यह बात सच से इतनी करीब थी। दरअसल, राम और श्याम सगे भाई थे। लेकिन दोनों को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी। करीब पच्चीस साल पहले राम और श्याम का जन्म एक ही परिवार में हुआ था। परिस्थितियों के कारण बचपन में दोनों अलग हो गए थे। राम को उसके नाना-नानी अपने साथ ले गए थे, जबकि श्याम अपने माता-पिता के साथ दूसरे शहर चला गया था। समय बीतता गया। राम बड़ा होकर अपने नाना-नानी को ही अपना माता-पिता समझता रहा। श्याम भी अपने घर में यही मानकर बड़ा हुआ कि उसका कोई भाई नहीं है। उनके माता-पिता ने कभी पुराने रिश्तों की बात नहीं की थी। लेकिन किस्मत ने दोनों भाइयों को एक ही ऑफिस में ला खड़ा किया था। एक शाम ऑफिस में अचानक बिजली चली गई। पूरा ऑफिस अंधेरे में डूब गया। श्याम ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और मजाक किया, “अगर भूत आया तो तुम मुझे बचाना।” राम हंस पड़ा। “पहले तुम मुझे बचाना। तुम मुझसे ज्यादा बहादुर दिखते हो।” श्याम ने कहा, “ठीक है भाई।” राम ने मजाक में उसे देखा। “भाई मत बोलना।” श्याम हंस पड़ा। “क्यों? अच्छा नहीं लगता?” राम कुछ पल चुप रहा। “पता नहीं… अजीब सा लगता है।” श्याम ने उसकी बात को मजाक समझकर छोड़ दिया। अगले दिन ऑफिस में एक जरूरी प्रोजेक्ट की मीटिंग थी। राम और श्याम को एक ही टीम में रखा गया। दोनों ने पूरी मेहनत की और प्रोजेक्ट सफल हो गया। कंपनी के मालिक ने दोनों की तारीफ करते हुए कहा, “तुम दोनों की सोच बिल्कुल एक जैसी है। लगता है जैसे कई सालों से साथ काम कर रहे हो।” श्याम ने राम की तरफ देखकर कहा, “हमारी दोस्ती ही ऐसी है।” राम मुस्कुराया। लेकिन उसी शाम एक ऐसी घटना हुई जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। श्याम ऑफिस से घर जाने ही वाला था कि उसके पिता का फोन आया। “श्याम, आज जल्दी घर आ जाना। तुम्हारी मां की तबीयत थोड़ी खराब है।” श्याम तुरंत घर निकल गया। घर पहुंचते ही उसने देखा कि उसकी मां के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी। श्याम ने पूछा, “मां, क्या हुआ?” मां ने कांपती आवाज में कहा, “आज मुझे तुम्हारे पुराने दिनों की एक चीज मिली।” उन्होंने तस्वीर श्याम की तरफ बढ़ाई। श्याम ने तस्वीर देखी। उसमें एक छोटी उम्र की महिला अपने साथ दो छोटे बच्चों को पकड़े हुए थी। एक बच्चा बिल्कुल श्याम जैसा दिख रहा था। और दूसरा… श्याम की नजर उस दूसरे बच्चे के चेहरे पर टिक गई। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। “मां… ये दूसरा बच्चा कौन है?” उसकी मां की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने धीरे से कहा, “तुम्हारा बड़ा भाई।” श्याम जैसे पत्थर का हो गया। “मेरा… भाई?” मां ने सिर झुका लिया। “हां। लेकिन हालात ऐसे बने कि तुम दोनों अलग हो गए। हमें कभी मौका ही नहीं मिला तुम्हें सब सच बताने का।” श्याम के हाथ से तस्वीर लगभग गिर गई। उसी समय उसे राम का चेहरा याद आया। राम की आवाज। उसकी मुस्कान। उसकी आदतें। यहां तक कि दोनों की कुछ छोटी-छोटी पसंद भी एक जैसी थीं। श्याम ने तस्वीर को गौर से देखा। फिर अचानक उसकी नजर तस्वीर के पीछे लिखे नाम पर पड़ी। “राम।” श्याम की सांस रुक गई। अगली सुबह वह ऑफिस पहुंचा तो राम अपनी सीट पर बैठा काम कर रहा था। श्याम कुछ देर तक उसे देखता रहा। राम ने पूछा, “क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रहे हो?” श्याम ने धीरे से कहा, “राम… तुम्हारे पास अपने बचपन की कोई पुरानी तस्वीर है?” राम ने हैरानी से पूछा, “अचानक क्यों?” “बस दिखाओ।” राम ने अपना फोन खोला और एक पुरानी तस्वीर निकाली। श्याम की आंखें फैल गईं। वही चेहरा। वही तस्वीर में मौजूद मां। वही बचपन। श्याम की आंखों में आंसू आ गए। राम घबरा गया। “श्याम, क्या हुआ?” श्याम ने कांपते हाथों से अपनी जेब से वही पुरानी तस्वीर निकाली। राम ने तस्वीर देखी। कुछ पल तक वह कुछ बोल ही नहीं पाया। फिर उसने तस्वीर को पलटा। पीछे वही नाम लिखा था। राम और श्याम। राम की आंखों से आंसू निकल पड़े। “तुम… मेरे भाई हो?” श्याम ने कुछ नहीं कहा। बस आगे बढ़कर राम को गले लगा लिया। दोनों भाई काफी देर तक एक-दूसरे को पकड़े खड़े रहे। जिस रिश्ते से दोनों अनजान थे, वही रिश्ता उनकी दोस्ती की सबसे बड़ी वजह बन चुका था। राम रोते हुए बोला, “इतने सालों से मैं सोचता रहा कि मेरा कोई भाई नहीं है।” श्याम ने कहा, “और मैं सोचता रहा कि मेरी जिंदगी में भाई की कमी क्यों महसूस होती है।” राम ने उसकी पीठ थपथपाई। “शायद इसलिए… क्योंकि दिल को पहले से पता था कि मेरा भाई कहीं है।” दोनों हंसते हुए रोने लगे। उस दिन ऑफिस में बाकी लोगों को कुछ समझ नहीं आया कि दोनों एक-दूसरे को देखकर बार-बार क्यों मुस्कुरा रहे हैं। कुछ दिनों बाद दोनों अपने माता-पिता के सामने साथ खड़े थे। पुराने रिश्तों की सारी गलतफहमियां धीरे-धीरे दूर होने लगीं। राम और श्याम ने तय किया कि अब वे कभी एक-दूसरे से दूर नहीं होंगे। श्याम ने मजाक करते हुए कहा, “वैसे एक बात बताऊं?” राम ने पूछा, “क्या?” “तुम मेरे दोस्त तो पहले ही बन गए थे।” राम मुस्कुराया। “और अब?” श्याम ने उसे गले लगाते हुए कहा, “अब तुम मेरे दोस्त नहीं… मेरे भाई हो।” राम ने हंसकर कहा, “लेकिन ऑफिस में दोस्त ही रहेंगे।” दोनों हंस पड़े। कभी दो अजनबी एक ही ऑफिस में मिले थे। फिर दोस्त बने। और आखिर में उन्हें पता चला कि जिस इंसान को वे अपना सबसे अच्छा दोस्त समझ रहे थे… वही इंसान उनका अपना सगा भाई था। कभी-कभी जिंदगी रिश्ते पहले नहीं बताती, बस लोगों को मिलाती है। रिश्ता बाद में सामने आता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • चुनरी वाली चुड़ैल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    घुटनों तक लटकी चुनरी वाली चुड़ैल

    राजपुर गांव में एक ऐसा रास्ता था, जिस पर दिन में भी लोग अकेले जाने से डरते थे।

    गांव से बाजार जाने वाला वही रास्ता सबसे छोटा था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से लोग उसे छोड़कर लंबा रास्ता अपनाने लगे थे।

    क्योंकि उस रास्ते पर दोपहर के समय एक औरत दिखाई देती थी।

    लाल चुनरी ओढ़े।

    उसकी चुनरी सिर से शुरू होकर घुटनों तक लटकी रहती थी। चेहरा कभी साफ दिखाई नहीं देता था। वह बस धीरे-धीरे सड़क के बीचों-बीच चलती रहती।

    और सबसे डरावनी बात यह थी कि…

    जिसकी नजर उससे टकराती, उसकी मौत कुछ ही मिनटों में हो जाती।

    गांव में इस बात की इतनी दहशत थी कि लोग दोपहर में भी अपनी खिड़कियां बंद रखते।

    एक दिन राजपुर का रहने वाला रमेश बाजार से घर लौट रहा था।

    उसने दूर सड़क पर एक लाल चुनरी देखी।

    वह अचानक रुक गया।

    “हे भगवान…”

    वह औरत सड़क के बीच खड़ी थी।

    रमेश ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

    उसे गांव के बुजुर्गों की बात याद थी।

    “उसे देखना मत। उसकी आंखों में आंखें मत डालना।”

    रमेश सिर झुकाकर आगे बढ़ने लगा।

    तभी पीछे से धीमी आवाज आई।

    “रमेश…”

    उसके कदम वहीं रुक गए।

    उसने पलटकर नहीं देखा।

    आवाज फिर आई।

    “रमेश…”

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके कान के पास से आई।

    रमेश का शरीर कांपने लगा।

    उसने आंखें बंद कर लीं।

    लेकिन तभी सड़क पर उसकी नजर सामने पड़े एक छोटे पत्थर पर गई।

    पत्थर के पास लाल चुनरी का एक कोना पड़ा था।

    रमेश डर गया।

    वह भागने ही वाला था कि सामने से आती हवा में चुनरी थोड़ा ऊपर उठी।

    रमेश की नजर अनजाने में उस औरत के चेहरे पर चली गई।

    बस कुछ पल के लिए।

    उसने दो चमकती हुई आंखें देखीं।

    औरत मुस्कुराई।

    रमेश के हाथ से सामान गिर गया।

    वह पीछे हटने लगा।

    “नहीं…”

    लेकिन कुछ ही मिनट बाद वह सड़क के किनारे बेहोश होकर गिर पड़ा।

    जब गांव वालों ने उसे देखा, तब तक उसकी सांसें थम चुकी थीं।

    उस दिन गांव में फिर वही सवाल उठ गया।

    आखिर वह चुड़ैल कौन थी?

    गांव के सबसे बूढ़े आदमी हरिदास ने सबको बुलाकर कहा,

    “मैंने इस औरत को पहले भी देखा है। बहुत साल पहले।”

    लोग चुप हो गए।

    हरिदास ने धीरे से कहा,

    “करीब बीस साल पहले इसी रास्ते से एक लड़की रोज अपने मायके जाया करती थी। उसका नाम था सुहानी।”

    “फिर क्या हुआ था?” किसी ने पूछा।

    हरिदास कुछ देर चुप रहा।

    “एक दिन वह इसी रास्ते पर गायब हो गई।”

    “गायब?”

    “हां। उसका कभी पता नहीं चला।”

    गांव की चंदा ने पूछा,

    “लेकिन उसका चुड़ैल से क्या संबंध है?”

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

    “यही तो कोई नहीं जानता।”

    अगले दिन चंदा की सहेली मीना बाजार जाने के लिए उसी रास्ते पर निकल गई।

    चंदा ने उसे रोकते हुए कहा,

    “मत जा। दूसरा रास्ता ले ले।”

    मीना हंस पड़ी।

    “दिन के उजाले में भी डरोगी?”

    चंदा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “मैं मजाक नहीं कर रही।”

    मीना ने हाथ छुड़ाया।

    “मैं दस मिनट में लौट आऊंगी।”

    चंदा उसे जाते हुए देखती रही।

    कुछ देर बाद गांव के बाहर से एक बच्चे की चीख सुनाई दी।

    “लाल चुनरी!”

    चंदा का दिल बैठ गया।

    वह दौड़कर बाहर आई।

    सड़क बिल्कुल खाली थी।

    लेकिन बीच रास्ते पर मीना की चप्पल पड़ी थी।

    मीना कहीं नहीं थी।

    उस रात गांव में किसी ने खाना नहीं खाया।

    हरिदास ने कहा,

    “अब हमें उस औरत का सच पता करना ही होगा।”

    चंदा ने पूछा,

    “कैसे?”

    हरिदास ने कहा,

    “सुहानी की कहानी से शुरू करेंगे।”

    अगली सुबह चंदा और हरिदास गांव के पुराने मंदिर के पीछे बने एक टूटे हुए कमरे में गए।

    हरिदास ने मिट्टी से ढका एक पुराना संदूक खोला।

    उसमें कुछ पुराने कागज और एक तस्वीर थी।

    तस्वीर में एक जवान लड़की खड़ी थी।

    सिर पर लाल चुनरी।

    चंदा तस्वीर देखते ही सिहर गई।

    “यही है…”

    हरिदास ने सिर हिलाया।

    “सुहानी।”

    तभी संदूक के अंदर से एक पुराना कागज नीचे गिरा।

    चंदा ने उसे उठाया।

    उस पर लिखा था—

    “जिस दिन मेरी लाल चुनरी सड़क पर दिखाई दे, समझ लेना मैं सच बताने वापस आ गई हूं।”

    चंदा ने घबराकर हरिदास की तरफ देखा।

    “इसका मतलब?”

    हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

    उसी समय बाहर से पायल की आवाज आई।

    छन…

    छन…

    छन…

    दोनों जम गए।

    दिन के ठीक बारह बजे थे।

    खिड़की से बाहर देखा तो सड़क पर वही लाल चुनरी वाली औरत खड़ी थी।

    इस बार वह गांव की तरफ देख रही थी।

    हरिदास ने फुसफुसाकर कहा,

    “आंखें मत मिलाना।”

    चंदा ने धीरे से पूछा,

    “अगर हम उसका चेहरा नहीं देखेंगे तो उसे कैसे रोकेंगे?”

    हरिदास ने कहा,

    “शायद रोकना ही गलत होगा। शायद हमें उसकी बात सुननी होगी।”

    अचानक औरत ने हाथ उठाया।

    उसकी उंगली गांव के पुराने कुएं की तरफ थी।

    फिर वह धीरे-धीरे चलने लगी।

    चंदा और हरिदास कुछ दूरी से उसके पीछे चल पड़े।

    औरत कुएं के पास जाकर रुक गई।

    उसने अपनी लाल चुनरी जमीन पर गिरा दी।

    पहली बार उसका चेहरा साफ दिखाई दिया।

    वह डरावना नहीं था।

    बल्कि उसकी आंखों में गहरा दुख था।

    चंदा ने कांपते हुए पूछा,

    “तुम सुहानी हो?”

    औरत ने धीरे से सिर हिलाया।

    हरिदास की आंखें फैल गईं।

    सुहानी ने कुएं की तरफ इशारा किया।

    हरिदास अचानक सब समझ गया।

    “तुम्हें यहां छिपाया गया था…”

    सुहानी की आंखों से आंसू बहने लगे।

    चंदा ने पूछा,

    “किसने?”

    सुहानी ने सड़क की तरफ देखा।

    फिर गांव के एक पुराने मकान की ओर इशारा किया।

    वह मकान गांव के सबसे अमीर आदमी के परिवार का था।

    हरिदास का चेहरा बदल गया।

    “नहीं…”

    उसी समय पीछे से एक आवाज आई।

    “तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?”

    दोनों पलटे।

    गांव का सरपंच खड़ा था।

    सुहानी को देखते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया।

    उसने कांपते हुए कहा,

    “इसे देखकर भी तुम जिंदा हो?”

    चंदा ने पूछा,

    “आप इसे जानते हैं?”

    सरपंच पीछे हटने लगा।

    “नहीं…”

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

    “झूठ मत बोलो।”

    सरपंच चुप रहा।

    तभी सुहानी ने जमीन से लाल चुनरी उठाई और सरपंच के सामने रख दी।

    सरपंच कांपने लगा।

    “मैंने कुछ नहीं किया था…”

    हरिदास चौंका।

    “तो फिर किसने किया था?”

    सरपंच ने सिर झुका लिया।

    “उस समय गांव का जमींदार…”

    वह आगे कुछ कह पाता, उससे पहले तेज हवा चली।

    सुहानी की चुनरी हवा में लहराई।

    सड़क पर अचानक सन्नाटा छा गया।

    सरपंच घबराकर पीछे हटने लगा।

    लेकिन सुहानी ने उसे छुआ तक नहीं।

    बस उसकी ओर देखकर बोली,

    “सच बोलो।”

    सरपंच की आंखों में डर उतर आया।

    उसने सबके सामने पुराना राज खोल दिया।

    सुहानी को कभी किसी ने नहीं मारा था।

    वह उस रात गांव छोड़कर चली गई थी।

    लेकिन जाते समय उसकी लाल चुनरी कुएं के पास गिर गई थी।

    लोगों ने उसके गायब होने की कहानी को डर और अफवाहों में बदल दिया।

    और वर्षों बाद जब सुहानी की मौत दूसरे शहर में हुई, तब उसकी आखिरी इच्छा थी कि गांव वालों को सच्चाई पता चले।

    लेकिन फिर सवाल था—

    फिर रास्ते पर दिखाई देने वाली चुड़ैल कौन थी?

    हरिदास ने सुहानी की तरफ देखा।

    “अगर तुम सुहानी नहीं हो… तो तुम कौन हो?”

    लाल चुनरी वाली औरत कुछ पल चुप रही।

    फिर उसने अपनी चुनरी उठाई।

    हवा में चुनरी लहराई।

    और उसके पीछे खड़ी एक दूसरी परछाईं दिखाई दी।

    एक और लाल चुनरी।

    घुटनों तक लटकी हुई।

    चंदा के मुंह से चीख निकल गई।

    सुहानी ने धीरे से अपना सिर झुका लिया।

    दूसरी परछाईं सड़क की ओर बढ़ने लगी।

    हरिदास फुसफुसाया

    “अब समझ आया…”

    “क्या?”

    “सुहानी चुड़ैल नहीं थी…”

    वह डरते हुए बोला”वह तो लोगों को असली चुड़ैल से बचाने के लिए यहां आती थी।”

    चंदा ने सड़क की ओर देखा।

    दूसरी लाल चुनरी धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रही थी।

    और इस बार…उसके पीछे कोई चेहरा नहीं था।

    सिर्फ दो चमकती हुई आंखें थीं।

    और गांव के रास्ते पर फिर से वही आवाज गूंजी

    छन… छन… छन…

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    Auther preeti Sharma

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  • बारिश से दुश्मनी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश से थी कियाना की दुश्मनी

     

    कियाना को बचपन से ही बारिश बिल्कुल पसंद नहीं थी।

     

    दूसरों के लिए बारिश मतलब ठंडी हवा, मिट्टी की खुशबू, पकौड़े और खिड़की के पास बैठकर चाय पीना था।

     

    लेकिन कियाना के लिए बारिश मतलब डर।

     

    क्योंकि उसके शरीर को बारिश की बूंदें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती थीं। जैसे ही वह बारिश में भीगती, कुछ ही देर में उसके शरीर पर लाल-लाल रैशेज और तेज खुजली होने लगती। कई बार हालत इतनी खराब हो जाती कि उसे डॉक्टर के पास जाना पड़ता।

     

    बचपन में जब दूसरे बच्चे बारिश में खेलते थे, कियाना अपनी खिड़की के पीछे खड़ी होकर उन्हें देखा करती थी।

     

    उसकी मां कहतीं,

    “बेटा, बाहर मत जाना। बारिश तुम्हारे लिए ठीक नहीं है।”

     

    कियाना सिर हिला देती।

    लेकिन उसके मन में एक ही सवाल आता“आखिर मैं बाकी बच्चों जैसी क्यों नहीं हूं?”

     

    धीरे-धीरे वह बारिश से दूर होती गई।

     

    स्कूल में भी जब बारिश होती, बाकी बच्चे मैदान में दौड़ते हुए जाते और कियाना छत के नीचे अकेली खड़ी रहती।

     

    कुछ बच्चे उसे देखकर बातें भी बनाते।

     

    “इसे बारिश से एलर्जी है।”

    “अरे, इसे छूना मत कहीं तुम्हें भी न हो जाए।”

     

    कियाना जानती थी कि ऐसी बातें बेवकूफी थीं, लेकिन फिर भी हर बार उसके दिल को चोट लगती।

     

    वह कम बोलने लगी।

    फिर एक दिन उसकी मुलाकात रुद्र से हुई।

     

    रुद्र बिल्कुल कियाना के उलट था।वह हमेशा मुस्कुराता रहता था।

     

    किसी दिन परीक्षा में कम नंबर आते तो भी मुस्कुराता।

     

    किसी दोस्त से झगड़ा हो जाता तो कुछ देर बाद खुद ही हंसने लगता।

     

    और अगर कोई दुखी होता, तो उसके पास बैठकर उसे हंसाने की कोशिश करता।

     

    पहली मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई।

     

    कियाना एक कोने में बैठी किताब पढ़ रही थी।

     

    अचानक सामने से रुद्र आया और उसकी किताब उठाकर बोला,

    “ये किताब इतनी गंभीर क्यों है?”

     

    कियाना ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

    “क्या?”

     

    रुद्र हंस पड़ा।

    “मैं पूछ रहा हूं कि तुम इतनी गंभीर क्यों हो?”

     

    कियाना ने किताब वापस लेते हुए कहा,

     

    “मैं पढ़ रही हूं।”

     

    “अच्छा… तो पढ़ते समय मुस्कुराना मना है क्या?”

     

    कियाना ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रुद्र चला गया।

     

    अगले दिन फिर आया।

     

    फिर उसके अगले दिन भी।

     

    धीरे-धीरे कियाना को उसकी आदत होने लगी।

     

    एक दिन कियाना ने पूछ ही लिया,

     

    “तुम हमेशा खुश कैसे रहते हो?”

     

    रुद्र कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मैं हमेशा खुश नहीं रहता।”

     

    कियाना ने उसकी तरफ देखा।

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “बस दुखी रहने के बजाय खुश रहने की कोशिश करता हूं।”

     

    कियाना को उसकी बात समझ नहीं आई।

     

    “लेकिन हर किसी की जिंदगी में परेशानियां होती हैं।”

     

    “मेरी जिंदगी में भी हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर क्या? परेशानी को अपने ऊपर इतना अधिकार क्यों दूं कि वो मेरी मुस्कान भी छीन ले?”

     

    कियाना पहली बार मुस्कुराई।

     

    उस दिन के बाद दोनों दोस्त बन गए।

     

    रुद्र को कियाना की बारिश वाली परेशानी के बारे में पता था।

     

    वह कभी उसे बारिश में बाहर आने के लिए नहीं कहता था।

     

    बल्कि जब बारिश शुरू होती तो खुद उसके लिए छाता लेकर आता।

     

    एक दिन उसने मजाक में कहा,

     

    “तुम्हारी बारिश से दुश्मनी है, लेकिन मेरी छाते से दोस्ती है।”

     

    कियाना हंस पड़ी।

     

    “तुम बहुत अजीब हो।”

     

    “और तुम बहुत ज्यादा सोचती हो।”

     

    “क्योंकि मुझे हर चीज से डर लगता है।”

     

    रुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “डरना गलत नहीं है। लेकिन डर की वजह से जिंदगी जीना छोड़ देना गलत है।”

     

    कियाना चुप हो गई।

     

    उसे पहली बार लगा कि कोई उसकी परेशानी को देखकर उससे दूर नहीं जा रहा था।

     

    समय बीतता गया।

     

    कियाना की जिंदगी में रुद्र की मौजूदगी बढ़ती गई।

     

    जब वह उदास होती, रुद्र उसे हंसाता।

     

    जब वह अपने शरीर को लेकर परेशान होती, रुद्र उसे समझाता,

     

    “तुम्हारे शरीर पर रैशेज आ जाते हैं, इसका मतलब ये नहीं कि तुम खराब हो।”

     

    कियाना की आंखें भर आतीं।

     

    “लेकिन लोग मुझे देखकर घबरा जाते हैं।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “लोगों की नजर से खुद को देखना बंद करो।”

     

    कियाना ने पूछा,

     

    “और तुम्हारी नजर से?”

     

    रुद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मेरी नजर में तुम वही कियाना हो जो मुझे रोज परेशान करती है।”

     

    कियाना हंस पड़ी।

     

    लेकिन उसके दिल में उस दिन कुछ बदल गया।

     

    अब वह रुद्र की मुस्कान का इंतजार करने लगी थी।

     

    फिर एक दिन कॉलेज में अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    कियाना कैंपस के बाहर खड़ी थी।

     

    उसके पास छाता नहीं था।

     

    रुद्र कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    बारिश तेज होती जा रही थी।

     

    तभी कियाना ने देखा कि उसके सामने एक छोटा बच्चा सड़क के किनारे फंस गया था।

     

    वह भीग रहा था और रो रहा था।

     

    कियाना कुछ कदम आगे बढ़ी।

     

    फिर रुक गई।

     

    उसे पता था कि बारिश में जाना उसके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।

     

    लेकिन बच्चा लगातार रो रहा था।

     

    कियाना ने अपने डर को पीछे छोड़ा और दौड़कर बच्चे को पास की दुकान की छत के नीचे ले आई।

     

    कुछ ही मिनटों में उसकी त्वचा पर लाल रैशेज दिखाई देने लगे।

     

    खुजली भी शुरू हो गई।

     

    लेकिन उसने बच्चे को सुरक्षित कर दिया था।

     

    तभी पीछे से रुद्र दौड़ता हुआ आया।

     

    उसके हाथ में छाता था।

     

    उसने कियाना को देखा तो घबरा गया।

     

    “तुम बारिश में क्यों आई?”

     

    कियाना ने बच्चे की तरफ देखकर कहा,

     

    “वो अकेला था।”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में गुस्सा नहीं, चिंता थी।

     

    “तुम्हें पता है तुम्हारी हालत क्या हो सकती है?”

     

    कियाना ने धीरे से कहा,

     

    “हां।”

     

    “फिर भी?”

     

    कियाना मुस्कुराई।

     

    “तुमने ही तो कहा था… डर की वजह से जिंदगी जीना नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    रुद्र कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसने छाता कियाना के ऊपर कर दिया।

     

    “तुम मेरी बातें याद रखती हो?”

     

    कियाना ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “कुछ बातें याद रखने लायक होती हैं।”

     

    रुद्र भी मुस्कुरा दिया।

     

    उस दिन पहली बार कियाना को अपनी परेशानी से उतनी नफरत नहीं हुई।

     

    उसे समझ आया कि बारिश उसके लिए मुश्किल हो सकती है, लेकिन उसकी पूरी जिंदगी नहीं।

     

    कुछ दिनों बाद रुद्र उसे एक जगह लेकर गया।

     

    वह एक छोटी सी पहाड़ी थी, जहां से पूरा शहर दिखाई देता था।

     

    आसमान में बादल थे।

     

    कियाना ने डरते हुए पूछा,

     

    “यहां क्यों लाए हो?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि आज बारिश होने वाली है।”

     

    कियाना तुरंत पीछे हट गई।

     

    “तुम पागल हो?”

     

    रुद्र हंस पड़ा।

     

    “मैं तुम्हें भीगने के लिए नहीं कह रहा।”

     

    उसने अपनी जेब से एक छोटा सा कांच का जार निकाला।

     

    बारिश की पहली बूंदें उसमें गिरने लगीं।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम बारिश को छू नहीं सकतीं, लेकिन उसे देख तो सकती हो।”

     

    कियाना जार को देखने लगी।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    रुद्र ने पूछा,

     

    “अब भी बारिश से नफरत है?”

     

    कियाना ने सिर हिलाया।

     

    “थोड़ी।”

     

    “और जिंदगी से?”

     

    कियाना ने रुद्र की तरफ देखा।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    कियाना मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि अब उसमें तुम हो।”

     

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर हमेशा की तरह मुस्कुरा दिया।

     

    बारिश तेज होती गई।

     

    कियाना और रुद्र छत के नीचे खड़े उसे देखते रहे।

     

    कियाना बारिश में नहीं भीगी।

     

    लेकिन पहली बार उसे ऐसा लगा जैसे उसके अंदर बरसों से जमा उदासी जरूर भीगकर धुल गई हो।

     

    उस दिन कियाना को समझ आया कि जिंदगी हमेशा हमारी पसंद के हिसाब से नहीं बदलती।

     

    कभी-कभी हमें अपनी मुश्किलों के साथ जीना सीखना पड़ता है।

     

    और अगर रास्ते में कोई ऐसा इंसान मिल जाए जो हमारी परेशानी देखकर हमसे दूर जाने के बजाय हमारा हाथ थाम ले…

     

    तो जिंदगी थोड़ी आसान जरूर हो जाती है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • इंसानी हैवान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    इंसानी हैवान

     

    शहर के सबसे अमीर परिवारों में अगर किसी का नाम लिया जाता था, तो सबसे पहले रुद्र प्रताप सिंह का नाम आता था।

     

    करोड़ों की संपत्ति, आलीशान हवेली और शहर में हर जगह उनका दबदबा था। लेकिन उस परिवार का बड़ा बेटा रुद्र लोगों के बीच अपनी दौलत के लिए नहीं, बल्कि अपने अजीब और डरावने व्यवहार के लिए जाना जाता था।

     

    रुद्र अपने घर में भी किसी से बात नहीं करता था।

     

    न पिता से।

     

    न मां से।

     

    न अपने छोटे भाई रोहन से।

     

    कई बार उसकी मां उसके कमरे के बाहर घंटों खड़ी रहती, लेकिन दरवाजा खुलता ही नहीं था।

     

    रोहन की शादी तय हो चुकी थी। घर में खुशी का माहौल था, लेकिन उसके माता-पिता की एक ही चिंता थी।

     

    “रोहन की शादी कैसे हो सकती है?” पिता ने कहा, “जब तक रुद्र की शादी नहीं होगी, लोग क्या कहेंगे?”

     

    मां ने धीमे से कहा, “लेकिन रुद्र को कौन लड़की पसंद करेगी?”

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    आखिर पूरे शहर में रुद्र को लोग इंसानी हैवान कहते थे।

     

    उसकी आंखों में हमेशा एक अजीब सी कठोरता रहती थी। किसी से बात करते समय उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आता था।

     

    फिर एक दिन उसके पिता को एक गरीब परिवार के बारे में पता चला।

     

    उस परिवार की बेटी थी मीरा।

     

    मीरा के पिता पर बहुत कर्ज था और घर की हालत खराब थी। रुद्र के पिता ने उसके परिवार के सामने शादी का प्रस्ताव रखा।

     

    “तुम्हारे सारे कर्ज हम चुका देंगे।”

     

    मीरा के पिता ने मजबूरी में हामी भर दी।

     

    मीरा को जब पता चला तो उसने पूछा, “मुझे किससे शादी करनी है?”

     

    उसकी मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “रुद्र से।”

     

    मीरा ने पहली बार उसका नाम सुना था।

     

    शादी हो गई।

     

    लेकिन शादी के बाद दोनों के बीच अजीब सी खामोशी थी।

     

    एक ही घर।

     

    एक ही कमरा।

     

    लेकिन दोनों के बीच जैसे कई दीवारें थीं।

     

    रुद्र रात को कमरे में आता, कुछ देर खिड़की के पास खड़ा रहता और फिर बिना कुछ कहे बाहर चला जाता।

     

    मीरा भी उससे सवाल नहीं करती।

     

    एक रात मीरा ने हिम्मत करके पूछा,

     

    “आप रात में कहां जाते हैं?”

     

    रुद्र अचानक उसकी तरफ मुड़ा।

     

    उसकी आंखों में ऐसी सख्ती थी कि मीरा सहम गई।

     

    “जहां मुझे जाना होता है।”

     

    बस इतना कहकर वह चला गया।

     

    मीरा ने उस रात पहली बार महसूस किया कि उसके पति के भीतर कुछ ऐसा था, जिसे वह किसी से छिपा रहा था।

     

    दिन बीतते गए।

     

    रुद्र का व्यवहार वैसा ही रहा।

     

    लेकिन मीरा ने एक चीज नोटिस की।

     

    हर रात ठीक बारह बजे के बाद रुद्र घर से निकलता था।

     

    और सुबह होने से पहले वापस आ जाता था।

     

    एक रात मीरा की नींद अचानक खुली।

     

    कमरे में रुद्र नहीं था।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    मीरा उठकर बाहर आई।

     

    हवेली में पूरी तरह सन्नाटा था।

     

    तभी उसे दूर से किसी लोहे की चीज के घिसटने जैसी आवाज सुनाई दी।

     

    छन्न… छन्न…

     

    मीरा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने देखा, रुद्र पीछे के दरवाजे से बाहर जा रहा था।

     

    मीरा ने चुपचाप उसका पीछा करने का फैसला किया।

     

    रुद्र हवेली के पीछे बने पुराने हिस्से की तरफ जा रहा था।

     

    वह जगह सालों से बंद थी।

     

    मीरा एक पेड़ के पीछे छिप गई।

     

    रुद्र ने अपनी जेब से एक पुरानी चाबी निकाली और दीवार में बने छोटे से दरवाजे का ताला खोल दिया।

     

    दरवाजा खुलते ही अंदर से ठंडी हवा का झोंका आया।

     

    रुद्र अंदर चला गया।

     

    मीरा भी कुछ देर बाद डरते-डरते दरवाजे तक पहुंची।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    दीवारों पर नमी थी।

     

    जैसे वह कोई कमरा नहीं बल्कि पुरानी कालकोठरी हो।

     

    मीरा ने धीरे से आगे कदम बढ़ाया।

     

    तभी अंदर से लोहे की आवाज आई।

     

    छन्न…!

     

    मीरा ने सामने देखा और उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    कमरे के बीचोंबीच रुद्र बैठा था।

     

    उसके हाथ और पैर मोटी लोहे की जंजीरों से बंधे हुए थे।

     

    मीरा के मुंह से चीख निकलने ही वाली थी कि उसने अपना मुंह दबा लिया।

     

    “ये… ये क्या है?”

     

    रुद्र ने अचानक सिर उठाया।

     

    उसकी नजर मीरा पर पड़ी।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रुद्र ने बेहद धीमी आवाज में कहा,

     

    “तुम यहां क्यों आई?”

     

    मीरा डरते हुए बोली,

     

    “आप खुद को जंजीरों से क्यों बांधते हैं?”

     

    रुद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    मीरा उसके पास जाने लगी।

     

    तभी दीवार के पीछे से किसी के फुसफुसाने की आवाज आई।

     

    “उसे मत खोलना…”

     

    मीरा वहीं रुक गई।

     

    उसने घबराकर चारों तरफ देखा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    रुद्र ने जोर से कहा,

     

    “मीरा! यहां से चली जाओ!”

     

    लेकिन तभी कमरे के एक कोने में रखा पुराना आईना अपने आप हिलने लगा।

     

    मीरा की नजर उसमें पड़ी।

     

    आईने में उसे रुद्र दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन उसके पीछे…

     

    एक काली परछाई खड़ी थी।

     

    मीरा ने पलटकर देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    उसने फिर आईने में देखा।

     

    परछाई अब रुद्र के बिल्कुल पीछे थी।

     

    मीरा चीख पड़ी।

     

    रुद्र ने अपनी जंजीर खींचते हुए कहा,

     

    “मत देखो!”

     

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    आईने में परछाई ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।

     

    और मीरा ने देखा…

     

    वह चेहरा रुद्र जैसा ही था।

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    “ये कौन है?”

     

    रुद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    काफी देर बाद उसने कहा,

     

    “वो मैं हूं।”

     

    मीरा के होश उड़ गए।

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने भारी आवाज में कहा,

     

    “मेरे अंदर कुछ है… जो मुझे खुद भी नहीं पता कि इंसान है या कुछ और।”

     

    मीरा चुप रही।

     

    रुद्र ने आगे कहा,

     

    “जब मैं छोटा था, इस हवेली में एक हादसा हुआ था। उसके बाद से मेरे अंदर ये अजीब बदलाव शुरू हुए। रात होते ही मुझे कुछ याद नहीं रहता। सुबह उठता हूं तो कई बार घर की चीजें टूटी मिलती हैं।”

     

    “तो आप खुद को यहां क्यों बांधते हैं?”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ताकि रात में मैं किसी और को नुकसान न पहुंचा सकूं।”

     

    मीरा की आंखों में डर के साथ अब हैरानी भी थी।

     

    तभी बाहर से दरवाजा जोर से बंद होने की आवाज आई।

    धड़ाम!

    दोनों चौंक गए।

     

    रुद्र ने तुरंत कहा,“मीरा, भागो!”

    “लेकिन आप?”

    “मेरी चिंता मत करो!”

     

    अचानक जंजीरें अपने आप हिलने लगीं।

     

    छन्न… छन्न… छन्न…

    रुद्र का चेहरा बदलने लगा।

     

    उसकी आंखों में अजीब सी चमक आ गई।

     

    मीरा पीछे हट गई।

    रुद्र ने दांत भींचकर कहा,

    “मैंने कहा था… भागो!”

     

    लेकिन मीरा भागी नहीं।

    उसने देखा कि रुद्र जंजीरों को तोड़ने की कोशिश नहीं कर रहा था।

     

    बल्कि उन्हें और कसकर पकड़ रहा था।

    जैसे वह अपने ही शरीर से लड़ रहा हो।

     

    तभी दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर नीचे गिर गई।

    मीरा ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में रुद्र के पिता, मां और एक छोटा बच्चा खड़े थे।

    लेकिन तस्वीर के पीछे हाथ से कुछ लिखा था।

     

    मीरा ने पढ़ा“रुद्र वह नहीं है जिसे तुम समझ रहे हो।”

    मीरा का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने तस्वीर को पलटा।

    पीछे एक और लाइन थी।

     

    “असली राज हवेली के मालिक के कमरे में छिपा है।”

    मीरा ने धीरे से रुद्र की तरफ देखा।

     

    रुद्र अब बिल्कुल शांत था।

    उसने धीमे से कहा,

     

    “अब तुम्हें सच जानना ही होगा।”

     

    मीरा ने पूछा,“कौन सा सच?”

    रुद्र ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “जिस दिन तुम इस घर में आई थीं… उसी दिन से तुम्हारी जिंदगी खतरे में थी।”

     

    मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    रुद्र ने आगे कहा,“और सबसे बड़ा सवाल ये नहीं है कि मैं रात में खुद को जंजीरों से क्यों बांधता हूं…”

     

    वह कुछ पल के लिए रुका।

     

    फिर बोला“सवाल ये है कि हर रात बारह बजे मुझे यहां कौन लाता है?”

    मीरा की नजर दरवाजे पर गई।दरवाजा बाहर से बंद था।

    और तभी बाहर किसी के कदमों की आवाज आने लगी।

    धीरे-धीरे…बहुत धीरे…

    कोई कालकोठरी की तरफ बढ़ रहा था।ठक… ठक… ठक…

    रुद्र ने पहली बार डरकर दरवाजे की तरफ देखा।

    “वो आ गया…”मीरा ने पूछा,

    “कौन?”

    रुद्र ने फुसफुसाकर कहा “मेरे पिता।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Online मिला प्यार

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    ऑनलाइन मिला प्यार

     

    देहरादून की रहने वाली अनाया बहुत शांत स्वभाव की लड़की थी। उसे किताबें पढ़ना, कविताएं लिखना और खाली समय में इंटरनेट पर नई-नई चीजें देखना पसंद था। पढ़ाई और घर की जिम्मेदारियों के बीच उसकी जिंदगी काफी सीधी-सादी चल रही थी।

     

    दूसरी तरफ केरल के एक छोटे से शहर में रहने वाला आरव बिल्कुल अलग स्वभाव का था। वह हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश करता रहता था। पढ़ाई के साथ-साथ उसे फोटोग्राफी और अलग-अलग जगहों के बारे में जानने का बहुत शौक था।

     

    दोनों की मुलाकात इंटरनेट पर एक साहित्यिक ग्रुप में हुई।

     

    अनाया ने एक दिन अपनी लिखी हुई छोटी-सी कविता वहां पोस्ट की थी। उस कविता के नीचे रियाज ने सिर्फ एक लाइन लिखी—

     

    “शब्द कम हैं, लेकिन एहसास बहुत ज्यादा है।”

     

    अनाया ने पहली बार किसी अनजान इंसान की ऐसी बात पढ़ी तो उसे अच्छा लगा। उसने धन्यवाद कहा।

     

    वहीं से दोनों की बातचीत शुरू हुई।

     

    पहले बातें सिर्फ कविताओं और किताबों तक सीमित थीं।

     

    फिर धीरे-धीरे पढ़ाई, परिवार, पसंद-नापसंद और जिंदगी के छोटे-छोटे किस्से भी बातचीत का हिस्सा बन गए।

     

    अनाया को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात की होती थी कि केरल में रहने वाला रियाज़ उसकी पहाड़ी जिंदगी को इतनी दिलचस्पी से सुनता था।

     

    एक दिन उसने पूछा, “तुम्हें सच में देहरादून इतना अच्छा लगता है?”

     

    रियाज़ ने जवाब दिया, “मैं वहां कभी गया नहीं हूं, लेकिन तुम्हारी बातें सुनकर लगता है जैसे वहां की बारिश और पहाड़ों को थोड़ा-बहुत समझने लगा हूं।”

     

    अनाया मुस्कुरा दी।

     

    समय बीतता गया।

     

    दोनों को महसूस होने लगा कि उनकी दोस्ती अब सिर्फ दोस्ती नहीं रह गई थी।

     

    लेकिन इसी के साथ मुश्किलें भी शुरू हो गईं।

     

    सबसे पहली परेशानी थी दूरी।

     

    देहरादून और केरल के बीच हजारों किलोमीटर का फासला था।

     

    अनाया की मां अक्सर उससे कहती थीं, “ऑनलाइन मिले लोगों पर इतनी जल्दी भरोसा मत करना। हर इंसान वैसा नहीं होता जैसा वह इंटरनेट पर दिखाई देता है।”

     

    अनाया अपनी मां की बात समझती थी, लेकिन रियाज़ पर उसका भरोसा बढ़ चुका था।

     

    उधर रियाज के परिवार को भी उसकी ऑनलाइन दोस्ती पसंद नहीं थी।

     

    उसके बड़े भाई ने एक दिन साफ कहा, “दूर बैठा कोई इंसान कितना भी अच्छा लगे, असली जिंदगी में उसे समझना आसान नहीं होता।”

     

    रियाज़ चुप रहा।

     

    उसे भी पता था कि उसके भाई की बात पूरी तरह गलत नहीं थी।

     

    फिर एक दिन छोटी-सी बात ने दोनों के बीच बड़ा झगड़ा खड़ा कर दिया।

     

    रियाज़ ने अनाया को संदेश भेजा, लेकिन वह कई घंटे तक जवाब नहीं दे पाई।

     

    वह अपने परिवार के साथ बाहर गई हुई थी।

     

    रियाज़ ने लगातार कुछ संदेश भेजे।

     

    जब अनाया ने रात में फोन देखा तो उसे कई मिस्ड मैसेज मिले।

     

    उसने लिखा, “सॉरी, आज फोन मेरे पास नहीं था।”

     

    रियाज़ ने जवाब दिया, “अगर बात नहीं करनी थी तो सीधे कह देती।”

     

    अनाया को यह बात बुरी लगी।

     

    “हर वक्त फोन मेरे हाथ में नहीं रहता। इसका मतलब ये नहीं कि मैं बात नहीं करना चाहती।”

     

    रियाज़ ने भी गुस्से में लिख दिया, “शायद मैं तुम्हें जितना महत्व देता हूं, तुम मुझे उतना नहीं देती।”

     

    अनाया ने फोन रख दिया।

     

    उस रात दोनों ने एक-दूसरे से बात नहीं की।

     

    अगले दिन आरव ने माफी मांगी।

     

    “मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था। मैं बस तुम्हें खोने से डर गया था।”

     

    अनाया कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने कहा, “डर की वजह से अगर हम एक-दूसरे पर शक करने लगें तो ये रिश्ता हमें खुश करने के बजाय परेशान करेगा।”

     

    रियाज ने उसकी बात समझ ली।

     

    दोनों ने तय किया कि आगे से किसी बात को लेकर गलतफहमी होगी तो गुस्से में फैसला नहीं करेंगे।

     

    लेकिन जिंदगी ने उनके लिए अभी और परीक्षाएं रखी थीं।

     

    कुछ समय बाद आरव को पढ़ाई के सिलसिले में दूसरे शहर जाना पड़ा। वहां उसका फोन और इंटरनेट दोनों सीमित हो गए।

     

    अनाया को उसकी कम बातचीत से चिंता होने लगी।

     

    उसी दौरान किसी ने अनाया से कहा कि शायद रियाज अब किसी और से बात करता है।

     

    अनाया ने बिना पूरी बात जाने रियाज से सवाल कर दिया।

     

    “क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई और आ गया है?”

     

    रियाज यह पढ़कर हैरान रह गया।

     

    “तुमने मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं किया?”

     

    “मैं सिर्फ पूछ रही हूं।”

     

    “नहीं, तुम शक कर रही हो।”

     

    दोनों के बीच फिर बहस हुई।

     

    इस बार बात इतनी बढ़ गई कि रियाज ने कहा, “शायद हमें कुछ समय के लिए दूर रहना चाहिए।”

     

    अनाया का दिल बैठ गया।

     

    उसने सिर्फ इतना लिखा, “अगर तुम्हें यही सही लगता है तो ठीक है।”

     

    फिर दोनों ने बातचीत बंद कर दी।

     

    दिन बीतने लगे।

     

    अनाया बाहर से सामान्य रहने की कोशिश करती, लेकिन उसके मन में लगातार वही बातें चलती रहतीं।

     

    रियाज भी खुश नहीं था।

     

    उसे एहसास हो चुका था कि दूरी सिर्फ किलोमीटर की नहीं थी। उनके बीच गलतफहमियां भी एक दूरी बनती जा रही थीं।

     

    एक शाम रियाज ने अनाया की पुरानी कविता दोबारा पढ़ी।

     

    उस कविता में एक लाइन थी—

     

    “सच्चे रिश्ते रास्ते नहीं ढूंढते, वे रास्ते बनाते हैं।”

     

    रियाज काफी देर तक उस लाइन को देखता रहा।

     

    अगले दिन उसने अनाया को एक लंबा संदेश भेजा।

     

    “हम दोनों अलग जगहों से हैं। हमारी भाषा, परिवार और जिंदगी का तरीका भी अलग है। शायद इसी वजह से हमें एक-दूसरे को समझने में समय लगेगा। लेकिन अगर हर मुश्किल पर हम पीछे हट गए तो फिर हमारी सारी बातें सिर्फ कुछ महीनों की याद बनकर रह जाएंगी। मैं तुमसे कोई वादा नहीं करना चाहता जिसे निभाना मुश्किल हो। बस इतना चाहता हूं कि हम एक-दूसरे को समझने की कोशिश बंद न करें।”

     

    अनाया ने संदेश कई बार पढ़ा।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    उसने जवाब दिया “मुझे भी डर लगता है। दूरी से, परिवार से और इस बात से कि कहीं हम एक-दूसरे को खो न दें। लेकिन शायद डर की वजह से किसी अच्छे रिश्ते को खत्म कर देना भी सही नहीं होगा।”

     

    उस दिन दोनों ने पहली बार अपने रिश्ते के बारे में गंभीरता से बात की।

     

    उन्होंने तय किया कि जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करेंगे।

     

    पहले अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे, अपने परिवारों का भरोसा जीतेंगे और फिर भविष्य के बारे में सोचेंगे।

     

    कई महीनों बाद आखिरकार वह दिन आया जब दोनों पहली बार आमने-सामने मिलने वाले थे।

     

    रियाज देहरादून आया।

     

    अनाया स्टेशन पर पहुंची तो दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखकर बस मुस्कुराते रहे।

     

    इतने महीनों की बातें सामने खड़ी थीं, लेकिन उस पल दोनों के पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं था।

     

    रियाज ने हंसते हुए कहा, “तुम ऑनलाइन से ज्यादा चुप हो।”

     

    अनाया भी मुस्कुरा दी।

     

    “और तुम ऑनलाइन से ज्यादा परेशान करने वाले हो।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन उनकी मुलाकात सिर्फ खुशियों से भरी नहीं थी।

     

    कुछ ही दिनों में दोनों को एहसास हुआ कि ऑनलाइन बातचीत और असली जिंदगी में काफी फर्क होता है।

     

    रियाज को अनाया का परिवार बहुत सख्त लगा।

     

    अनाया को रियाज का हर बात पर तुरंत फैसला लेने वाला स्वभाव पसंद नहीं आया।

     

    एक दिन दोनों के बीच फिर बहस हो गई।

     

    अनाया ने कहा, “शायद हम ऑनलाइन एक-दूसरे को जितना समझते थे, असल जिंदगी में उतना आसान नहीं है।”

     

    रियाज कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा, “शायद प्यार का मतलब ये नहीं कि सामने वाला हमेशा हमारी उम्मीद के मुताबिक हो। शायद प्यार का मतलब है कि उसकी कमियां समझने के बाद भी हम तय करें कि हमें साथ चलना है या नहीं।”

    अनाया ने उसकी तरफ देखा।

    उसे समझ आ गया कि उनका रिश्ता किसी कहानी की तरह आसान नहीं होने वाला था।

    उन्हें दूरी से लड़ना था।

    परिवार की चिंताओं को समझना था।

    गलतफहमियों को संभालना था।

    और सबसे ज्यादा अपने गुस्से और डर पर काबू पाना था।

    जब रियाज वापस केरल जाने लगा तो अनाया उसे छोड़ने आई।

    दोनों जानते थे कि फिर दूरी शुरू होने वाली है।

    रियाज ने कहा, “अबकी बार दूरी से डरना मत।”

    अनाया मुस्कुराई।

    “और तुम भी हर देर से आए जवाब को शक की नजर से मत देखना।”

    “पक्का।”

    ट्रेन चल पड़ी।

    अनाया प्लेटफॉर्म पर खड़ी रही और रियाज दूर होता गया।

    उनकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

    बल्कि शायद असली कहानी अब शुरू हुई थी।

    क्योंकि उन्हें अब समझ आ चुका था कि ऑनलाइन मिल जाना आसान था, लेकिन एक-दूसरे को समझकर साथ निभाना असली परीक्षा थी।

     

    और देहरादून से केरल के बीच की हजारों किलोमीटर की दूरी के बावजूद, दोनों ने एक बात सीख ली थी—

     

    अगर रिश्ते में भरोसा, सम्मान और समझ हो, तो दूरी सिर्फ रास्ता होती है, मंजिल के बीच की दीवार नहीं।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • गांव की गलियों में

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    गांव की गलियों में पहला एहसास

     

    काव्या अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी। छोटे से परिवार में उसकी दुनिया बस उसके पापा और मां तक ही सीमित थी। उसके पापा सरकारी नौकरी करते थे और कुछ सालों से शहर में ही पोस्टेड थे। काव्या ने भी अपना बचपन उसी शहर में बिताया था।

     

    शहर की जिंदगी उसे बहुत पसंद थी। सुबह कॉलेज, शाम को अपनी सहेलियों के साथ थोड़ी बातें और रात को पढ़ाई। उसे बेवजह बाहर घूमना बिल्कुल पसंद नहीं था।

     

    लेकिन एक दिन उसके पापा घर लौटे तो उनके चेहरे पर कुछ परेशानी थी।

     

    “क्या हुआ पापा?” काव्या ने पूछा।

     

    पापा ने लंबी सांस लेते हुए कहा, “मेरा ट्रांसफर हो गया है।”

     

    “कहां?”

     

    “एक छोटे से गांव में।”

     

    काव्या कुछ पल चुप रही।

     

    “गांव में? लेकिन पापा… मेरी पढ़ाई?”

     

    “वहीं पास के कॉलेज में तुम्हारा एडमिशन करवा देंगे। बस कुछ साल की ही तो बात है।”

     

    काव्या ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वह खुश नहीं थी।

     

    कुछ दिनों बाद पूरा परिवार उस छोटे से गांव में पहुंच गया।

     

    गांव शहर से बिल्कुल अलग था। यहां शाम होते ही ज्यादातर दुकानें बंद हो जाती थीं। लड़कियां ज्यादा देर तक घर से बाहर रहें तो लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगते थे। पढ़ाई से ज्यादा लोगों को इस बात की चिंता रहती थी कि कौन किसके साथ घूम रहा है।

     

    काव्या को यह सब बहुत अजीब लगता था।

     

    एक सुबह वह अपने नए कॉलेज जाने के लिए तैयार हुई।

     

    मां ने उसके बाल ठीक करते हुए कहा, “देख बेटा, यहां का माहौल शहर जैसा नहीं है। संभलकर रहना।”

     

    “हां मां, आप चिंता मत करो।”

     

    काव्या ने अपना बैग उठाया और घर से निकल गई।

     

    कॉलेज गांव से थोड़ी दूर था। रास्ते में मिट्टी की सड़क, दोनों तरफ खेत और जगह-जगह बैठे लड़कों के छोटे-छोटे समूह नजर आते थे।

     

    काव्या ने नजरें नीचे कर लीं और चुपचाप आगे बढ़ती रही।

     

    उसी समय कॉलेज के गेट के पास खड़ा अनुराग अपने दोस्तों के साथ बातें कर रहा था।

     

    अनुराग उसी गांव का रहने वाला था। कॉलेज में उसका नाम तो था, लेकिन पढ़ाई से ज्यादा उसका ध्यान दोस्तों और घूमने-फिरने में रहता था।

     

    तभी उसकी नजर काव्या पर पड़ी।

     

    वह अचानक चुप हो गया।

     

    “क्या हुआ?” उसके दोस्त ने पूछा।

     

    अनुराग ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर बस काव्या पर थी।

     

    काव्या बिना किसी को देखे कॉलेज के अंदर चली गई।

     

    अनुराग के दोस्त ने मुस्कुराते हुए कहा, “लगता है भाई को कोई पसंद आ गया।”

     

    अनुराग ने उसे घूरकर देखा।

     

    “चुप कर।”

     

    लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान छिप नहीं पाई।

     

    उस दिन के बाद अनुराग की नजर अक्सर काव्या को ढूंढने लगी।

     

    काव्या बिल्कुल शांत स्वभाव की थी। वह कॉलेज आती, अपनी क्लास करती और छुट्टी होते ही घर चली जाती।

     

    न उसे किसी से ज्यादा बात करनी थी और न ही किसी के साथ बेवजह घूमना।

     

    एक दिन काव्या कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठी अपनी किताब पढ़ रही थी। तभी उसे महसूस हुआ कि कोई उसे देख रहा है।

     

    उसने नजर उठाई।

     

    दूर अनुराग खड़ा था।

     

    दोनों की नजरें मिलीं।

     

    काव्या तुरंत अपनी किताब में देखने लगी।

     

    अनुराग मुस्कुराकर वहां से चला गया।

     

    काव्या को समझ नहीं आया कि वह लड़का उसे क्यों देख रहा था।

     

    अगले दिन भी वही हुआ।

     

    फिर अगले दिन भी।

     

    आखिर एक दिन काव्या से रहा नहीं गया।

     

    वह कॉलेज की सीढ़ियों से उतर रही थी तभी अनुराग सामने आ गया।

     

    काव्या ने पहली बार सीधे उससे पूछा,

     

    “आप मुझे रोज क्यों देखते हैं?”

     

    अनुराग कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    “मैं… बस ऐसे ही।”

     

    “ऐसे ही कोई किसी को रोज नहीं देखता।”

     

    अनुराग मुस्कुराया।

     

    “सही कह रही हो।”

     

    “तो फिर?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “क्या पता नहीं?”

     

    अनुराग ने धीरे से कहा, “शायद मुझे तुम अच्छी लगती हो।”

     

    काव्या का चेहरा लाल हो गया।

     

    उसने तुरंत नजरें झुका लीं।

     

    “मुझे ऐसी बातें पसंद नहीं हैं।”

     

    इतना कहकर वह वहां से चली गई।

     

    अनुराग उसे जाते हुए देखता रहा।

     

    उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि शायद उसकी जिंदगी में किसी के लिए सच में कुछ बदल रहा था।

     

    लेकिन काव्या के लिए बात इतनी आसान नहीं थी।

     

    वह घर लौटकर काफी देर तक सोचती रही।

     

    मां ने पूछा, “क्या हुआ? आज बहुत चुप हो।”

     

    “कुछ नहीं मां।”

     

    “कॉलेज में किसी से झगड़ा हुआ?”

     

    “नहीं।”

     

    काव्या ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    लेकिन उसके मन में बार-बार वही बात घूम रही थी।

     

    “शायद मुझे तुम अच्छी लगती हो।”

     

    वह खुद से सवाल कर रही थी कि आखिर उसे उस लड़के की बात इतनी याद क्यों आ रही है।

     

    अगले कुछ दिनों तक अनुराग ने काव्या से बात करने की कोशिश नहीं की। वह दूर से उसे देखता, लेकिन उसके पास नहीं जाता।

     

    काव्या ने भी इस बदलाव को महसूस किया।

     

    एक दिन कॉलेज की छुट्टी के बाद अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। काव्या कॉलेज के बरामदे में खड़ी होकर बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी।

     

    तभी अनुराग वहां आया।

     

    उसके हाथ में छाता था।

     

    “तुम्हें घर जाना है?”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    “बारिश बहुत तेज है।”

     

    अनुराग ने छाता उसकी तरफ बढ़ा दिया।

     

    “तुम ले जाओ।”

     

    “और आप?”

     

    “मैं चला जाऊंगा।”

     

    “लेकिन आपके पास छाता नहीं होगा।”

     

    “मैं भीग जाऊंगा।”

     

    काव्या ने पहली बार हल्की सी मुस्कान दी।

     

    “आप अजीब हैं।”

     

    अनुराग भी मुस्कुरा दिया।

     

    “तुम्हारे लिए शायद।”

     

    काव्या ने छाता लिया और कुछ कदम आगे बढ़ी।

     

    फिर अचानक पीछे मुड़ी।

     

    “धन्यवाद।”

     

    “इतने से धन्यवाद से काम नहीं चलेगा।”

     

    काव्या ने हैरानी से पूछा, “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस… कभी मुझसे नाराज मत होना।”

     

    काव्या कुछ नहीं बोली।

     

    बस हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई और वह वहां से चली गई।

     

    उस दिन के बाद दोनों के बीच एक छोटी सी दोस्ती शुरू हो गई।

     

    अनुराग अब काव्या की पढ़ाई में मदद करने लगा। काव्या भी उसे पढ़ाई के लिए समझाती।

     

    “तुम्हें कॉलेज में पढ़ने के लिए भेजा गया है, घूमने के लिए नहीं,” काव्या अक्सर कहती।

     

    अनुराग हंसकर कहता, “अब तुम बोलोगी तो पढ़ना ही पड़ेगा।”

     

    धीरे-धीरे अनुराग बदलने लगा।

     

    जो लड़का पहले कॉलेज से भागने के बहाने ढूंढता था, अब लाइब्रेरी में बैठने लगा।

     

    उसके दोस्तों को यह बदलाव समझ नहीं आ रहा था।

     

    एक दिन उसके दोस्त ने पूछा, “भाई, तू बदल कैसे गया?”

     

    अनुराग ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “किसी को देखकर अच्छा इंसान बनने का मन हो जाए, तो उसे पसंद करना कहते हैं शायद।”

     

    उधर काव्या भी अनुराग को लेकर कुछ महसूस करने लगी थी।

     

    लेकिन उसने अपने मन की बात किसी को नहीं बताई।

     

    उसे डर था कि कहीं उसके पापा को पता चल गया तो?

     

    उसके पापा बहुत सख्त थे। वह अपनी बेटी को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे।

     

    एक शाम काव्या कॉलेज से घर लौट रही थी। रास्ते में उसने देखा कि उसके पापा घर के बाहर किसी से बात कर रहे थे।

     

    वह पास पहुंची तो उनके हाथ में एक कागज था।

     

    “क्या हुआ पापा?”

     

    पापा ने उसकी तरफ देखा और बोले,

     

    “कुछ नहीं बेटा। तुम्हारे कॉलेज के बारे में किसी ने शिकायत की है।”

     

    काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “मेरी?”

     

    “नहीं… बस गांव में कुछ लड़कों के बारे में बातें हो रही थीं। मुझे उम्मीद है तुम किसी परेशानी में नहीं पड़ोगी।”

     

    काव्या चुप रही।

     

    उसे अचानक अनुराग का चेहरा याद आ गया।

     

    उस रात वह अपने कमरे में बैठी बहुत देर तक सोचती रही।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपने दिल की बात सुने या अपने परिवार का डर।

     

    और उसे यह भी नहीं पता था कि अगले दिन कॉलेज में उसके और अनुराग के बीच ऐसा क्या होने वाला है, जो उनकी इस छोटी सी दोस्ती को हमेशा के लिए बदल देगा।

     

    अगली सुबह काव्या कॉलेज पहुंची तो उसका मन बिल्कुल ठीक नहीं था। पिछली रात पापा की बात उसके दिमाग में घूमती रही थी।

     

    कॉलेज के गेट पर अनुराग उसे देखते ही पास आया।

     

    “क्या हुआ? तुम इतनी परेशान क्यों हो?”

     

    काव्या ने धीरे से कहा, “पापा को हमारे बारे में पता चल गया है।”

     

    अनुराग का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “क्या कहा उन्होंने?”

     

    “बस इतना कहा कि गांव में बातें हो रही हैं। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं किसी परेशानी में तो नहीं हूं।”

     

    अनुराग कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला, “काव्या, अगर मेरी वजह से तुम्हें कोई परेशानी हो रही है तो मैं तुमसे दूर हो जाऊंगा।”

     

    काव्या ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “नहीं अनुराग, बात इतनी भी बड़ी नहीं है।”

     

    “लेकिन तुम्हारे पापा तुम्हें लेकर परेशान हैं। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हारी पढ़ाई खराब हो।”

     

    काव्या कुछ नहीं बोली।

     

    तभी कॉलेज के कुछ लड़के वहां से गुजरते हुए दोनों को देखकर हंसने लगे।

     

    “देखो, शहर से आई मैडम और गांव का अनुराग।”

     

    काव्या ने नजरें झुका लीं।

     

    अनुराग को गुस्सा आया, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस दिन से उसने काव्या से दूरी बनानी शुरू कर दी। न वह उससे बात करता और न ही उसके पास जाता।

    काव्या को यह बदलाव बहुत बुरा लग रहा था।

    एक दिन उसने आखिर अनुराग को रोक लिया।

    “मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे?”

    “क्योंकि तुम्हें परेशानी हो रही है।”

    “लेकिन फैसला तुम अकेले कैसे कर सकते हो?”

    अनुराग चुप रहा।

    काव्या ने कहा, “अगर तुम सच में मेरे दोस्त हो तो मुश्किल वक्त में मेरा साथ छोड़कर मत जाओ।”

    अनुराग ने पहली बार उसकी आंखों में देखा।

    “मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा रहा काव्या। मैं बस चाहता हूं कि तुम्हारे पापा को मुझ पर भरोसा हो।”

    उसी समय काव्या के पापा कॉलेज पहुंच गए। उन्होंने दूर से दोनों को बात करते देख लिया।

    अनुराग ने उन्हें आते हुए देखा तो सीधा उनके सामने चला गया।

    “अंकल, मुझे आपसे कुछ कहना है।”

    काव्या घबरा गई।

    पापा ने गंभीर आवाज में पूछा, “क्या?”

    अनुराग बोला, “काव्या ने कभी पढ़ाई से समझौता नहीं किया। अगर गांव में कोई उसके बारे में गलत बात कह रहा है तो उसकी गलती नहीं है। और अगर मेरी वजह से आपको चिंता हुई है तो मैं माफी चाहता हूं।”

    पापा कुछ देर उसे देखते रहे।

    फिर बोले, “तुम्हें पता है मैं अपनी बेटी को लेकर इतना सख्त क्यों हूं?”

    “जी।”

    “क्योंकि मैं चाहता हूं कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो।”

    अनुराग ने सिर हिलाया।

    “मैं भी यही चाहता हूं अंकल।”

    पापा ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

    “तो फिर पहले अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। बाकी चीजों का फैसला वक्त करेगा।”

    काव्या ने राहत की सांस ली।

    अनुराग मुस्कुराया।

    उस दिन दोनों समझ गए कि उनका रिश्ता अभी किसी नाम का मोहताज नहीं था।

    बस एक भरोसा था जो धीरे-धीरे दोस्ती से बढ़कर एक खूबसूरत एहसास बन रहा था।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • रहस्मयी बोतल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक घने जंगल के किनारे एक छोटा-सा गांव था। गांव से थोड़ी दूर एक बहुत पुराना पेड़ खड़ा था। इतना पुराना कि उसकी मोटी शाखाओं को देखकर लगता था जैसे उसने कई पीढ़ियों को आते-जाते देखा हो।

     

    उस पेड़ के तने में ऊपर की तरफ एक गहरा-सा खोखल था। उसी खोखल में एक छोटी-सी बोतल हमेशा से रखी हुई थी।

     

    वह बोतल देखने में बिल्कुल साधारण थी। कांच की बनी हुई, थोड़ी पुरानी और धूल से ढकी हुई।

     

    लेकिन उसमें एक अजीब बात थी।

     

    हर रात उस बोतल से हल्की सुनहरी रोशनी निकलती थी।

     

    दूर से देखने पर ऐसा लगता जैसे पेड़ के अंदर कोई छोटा-सा दीपक जल रहा हो। वह रोशनी इतनी सुंदर होती कि जंगल से गुजरने वाले लोग कुछ देर रुककर उसे देखते रहते।

     

    लेकिन जैसे ही कोई उस रोशनी के पास जाने की कोशिश करता, वह अचानक गायब हो जाती।

     

    लोगों ने कई बार उस पेड़ के पास जाकर देखा था।

     

    किसी ने कहा, “शायद ये जुगनुओं की रोशनी है।”

     

    किसी ने कहा, “नहीं, जरूर कोई जादू है।”

     

    गांव के बूढ़े लोग हमेशा बच्चों को उस पेड़ से दूर रहने की सलाह देते।

     

    “उस पेड़ के पास मत जाना। वहां कुछ ऐसा है जिसे इंसानों को देखने की इजाजत नहीं।”

     

    लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि उस बोतल में आखिर था क्या।

     

    उसी गांव में एक लड़का रहता था, जिसका नाम था आरव।

     

    आरव बहुत शांत स्वभाव का था। कुछ समय पहले तक वह हमेशा हंसता रहता था। गांव के बच्चों के साथ खेलता, अपनी मां के काम में हाथ बंटाता और शाम को नदी के किनारे बैठकर सपने देखा करता।

     

    लेकिन पिछले कुछ दिनों से वह बिल्कुल बदल गया था।

     

    उसके पिता शहर में काम करते थे। एक दिन अचानक उनकी नौकरी चली गई। घर की हालत खराब होने लगी। मां दिन-रात चिंता करती रहती और आरव खुद को घर की परेशानी के लिए जिम्मेदार समझने लगा था।

     

    एक शाम मां ने उसे समझाते हुए कहा, “बेटा, तू इतना परेशान मत हो। वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता।”

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “मां, अगर मैं बड़ा होता तो आपके लिए कुछ कर पाता।”

     

    मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू अभी बच्चा है। तुझे अपनी जिंदगी जीनी चाहिए, हमारी चिंता नहीं करनी चाहिए।”

     

    लेकिन आरव के मन में चिंता बैठ चुकी थी।

     

    उस रात वह चुपचाप घर से निकल गया।

     

    उसे खुद नहीं पता था कि वह कहां जा रहा है।

     

    चलते-चलते वह उसी पुराने पेड़ के पास पहुंच गया, जिसके बारे में गांव में तरह-तरह की बातें होती थीं।

     

    आरव थका हुआ था।

     

    वह पेड़ के नीचे बैठ गया और अपना सिर घुटनों पर रख लिया।

     

    “काश… कोई मेरी परेशानी दूर कर देता।”

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    तभी कुछ अजीब हुआ।

     

    पेड़ के खोखल में रखी बोतल हल्की-सी चमकी।

     

    फिर उसकी रोशनी बढ़ने लगी।

     

    आरव ने सिर उठाया।

     

    “ये कैसी रोशनी है?”

     

    वह हैरान होकर बोतल को देखने लगा।

     

    जिस बोतल की रोशनी दूसरों को पास जाते ही दिखाई नहीं देती थी, वह इस बार आरव के सामने लगातार चमक रही थी।

     

    आरव धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

     

    वह पेड़ के तने के करीब गया।

     

    रोशनी और तेज हो गई।

     

    उसने हाथ बढ़ाकर बोतल को बाहर निकाल लिया।

     

    जैसे ही उसकी उंगलियां बोतल से छुईं, उसके अंदर से एक हल्की-सी आवाज आई।

     

    “तुमने मुझे देख लिया…”

     

    आरव डरकर पीछे हट गया।

     

    “क-कौन?”

     

    बोतल के अंदर सुनहरी रोशनी घूमने लगी।

     

    फिर उसी रोशनी से एक छोटी-सी आकृति बनी।

     

    वह किसी बच्चे जैसी दिखाई दे रही थी, लेकिन पूरी तरह रोशनी से बनी हुई थी।

     

    आरव ने डरते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    उस आकृति ने मुस्कुराकर कहा, “मैं इस बोतल की रखवाली करती हूं।”

     

    “और ये बोतल?”

     

    “ये इच्छा की बोतल है।”

     

    आरव की आंखें बड़ी हो गईं।

     

    “क्या इसमें कोई जादू है?”

     

    “हां। लेकिन इसका जादू हर किसी के लिए नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा, “तो मेरे लिए क्यों?”

     

    आकृति कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली, “क्योंकि तुम यहां अपनी इच्छा मांगने नहीं आए थे। तुम यहां इसलिए आए क्योंकि तुम्हारा दिल दुखी था।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    आकृति ने आगे कहा, “यह बोतल सिर्फ उसी इंसान के सामने चमकती है जिसके दिल में सच्चाई होती है। जो अपनी खुशी से ज्यादा अपने अपनों की चिंता करता है।”

     

    आरव की आंखों में फिर आंसू आ गए।

     

    “अगर तुम्हारे पास जादू है तो मेरे पिता की नौकरी वापस कर दो।”

     

    आकृति ने सिर हिलाया।

     

    “मैं किसी की किस्मत को सीधे नहीं बदल सकती।”

     

    आरव उदास हो गया।

     

    “तो फिर इस जादू का क्या फायदा?”

     

    आकृति मुस्कुराई।

     

    “जादू हमेशा समस्या को खत्म नहीं करता, आरव। कभी-कभी वह इंसान को रास्ता दिखाता है।”

     

    अचानक बोतल की रोशनी पेड़ के नीचे फैल गई।

     

    आरव के सामने जमीन पर कुछ चमकने लगा।

     

    वह एक छोटा-सा पुराना कागज था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिसके हाथ में हुनर है, उसके लिए रास्ते कभी खत्म नहीं होते।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    आकृति ने कहा, “तुम्हारे पिता को काम की जरूरत है। लेकिन तुम्हें उनके साथ मिलकर रास्ता ढूंढना होगा।”

     

    “लेकिन मैं क्या कर सकता हूं?”

     

    “तुम्हें अपने गांव में देखना होगा। तुम्हारे पास जो चीजें हैं, उन्हीं से शुरुआत करो।”

     

    अगली सुबह आरव घर लौट आया।

     

    उसने अपने पिता को बोतल के बारे में कुछ नहीं बताया।

     

    लेकिन उसने एक बात जरूर बताई।

     

    “पिताजी, हमारे गांव में लोग शहर से सामान खरीदने जाते हैं। अगर हम गांव में ही छोटी-सी दुकान शुरू करें तो?”

     

    पिता ने उसे देखा।

     

    “हमारे पास पैसे नहीं हैं बेटा।”

     

    आरव ने कहा, “हम छोटी शुरुआत कर सकते हैं।”

     

    दोनों ने मिलकर घर में रखी पुरानी चीजों को देखा। कुछ सामान बेचकर थोड़े पैसे जुटाए। आरव ने गांव के लोगों से बात की और पता किया कि उन्हें रोजमर्रा में किन चीजों की जरूरत पड़ती है।

     

    धीरे-धीरे उन्होंने घर के बाहर छोटी-सी दुकान शुरू कर दी।

     

    पहले दिन सिर्फ दो ग्राहक आए।

     

    दूसरे दिन चार।

     

    फिर धीरे-धीरे गांव के लोग उनकी दुकान से सामान लेने लगे।

     

    कुछ महीनों में दुकान अच्छी चलने लगी।

     

    एक रात आरव फिर उसी पेड़ के नीचे गया।

     

    उसके हाथ में वही बोतल थी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा, “तुमने मेरा सपना पूरा नहीं किया।”

     

    बोतल हल्की-सी चमकी।

     

    आरव हंसा।

     

    “लेकिन तुमने मुझे रास्ता जरूर दिखा दिया।”

     

    तभी रोशनी में वही छोटी आकृति दिखाई दी।

     

    “क्योंकि असली जादू बोतल में नहीं था।”

     

    आरव ने पूछा, “तो फिर कहां था?”

     

    आकृति ने उसके सीने की ओर इशारा किया।

     

    “तुम्हारे अंदर।”

     

    आरव कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    “लेकिन फिर ये बोतल यहां क्यों रहती है?”

     

    आकृति मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि हर पीढ़ी में कोई न कोई ऐसा इंसान जरूर आता है जो अंधेरे में भी उम्मीद ढूंढता है। बोतल उसी का इंतजार करती है।”

     

    इतना कहकर वह आकृति धीरे-धीरे रोशनी में बदल गई।

     

    बोतल फिर शांत हो गई।

     

    आरव ने उसे वापस उसी खोखल में रख दिया।

     

    अगली रात दूर से उस पेड़ में फिर सुनहरी रोशनी दिखाई दी।

     

    गांव वालों ने उसे देखा।

     

    एक आदमी पेड़ के पास गया।

     

    लेकिन जैसे ही वह करीब पहुंचा, रोशनी गायब हो गई।

     

    लोग हैरान होकर लौट गए।

     

    किसी को पता नहीं चला कि उस पेड़ का जादू किसके लिए था।

     

    और उस दिन के बाद आरव जब भी किसी परेशान इंसान को देखता, उसे एक ही बात कहता—

     

    “मुश्किल वक्त में जादू का इंतजार मत करना… कभी-कभी जादू हमारे अंदर ही छिपा होता है, बस हमें उसे पहचानने की जरूरत होती है।”

     

    लेकिन उस पुराने पेड़ के खोखल में वह बोतल आज भी रखी थी।

     

    और उसकी सुनहरी रोशनी आज भी दूर से दिखाई देती थी।

     

    शायद वह किसी और दुखी इंसान का इंतजार कर रही थी…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • चार चोर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक छोटे से गांव में चार दोस्त रहते थे—कालू, भीमा, नंदू और गोपाल। पूरे गांव में उनकी पहचान चोरों के रूप में थी, लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था। लोग उन्हें देखते ही अपने दरवाज़े बंद कर लेते थे। बच्चे उनसे डरते थे और बड़े लोग उन्हें बुरा-भला कहते थे।

     

    असल में चारों बचपन से अनाथ थे। उनके पास न जमीन थी, न घर, न कोई अपना। कई बार उन्होंने मजदूरी की, लेकिन कभी काम मिलता तो कभी कई-कई दिन तक नहीं मिलता। कई रातें उन्होंने भूखे पेट बिताईं। आखिर एक दिन मजबूरी में उन्होंने चोरी का रास्ता चुन लिया।

     

    लेकिन एक अजीब बात थी।

     

    वे हर बार चोरी करने निकलते, मगर किसी न किसी वजह से उनका दिल बदल जाता और वे खाली हाथ लौट आते।

     

    एक रात कालू ने कहा, “दोस्तों, अब बहुत हो गया। आज अगर चोरी नहीं की तो कल खाने को कुछ नहीं होगा।”

     

    चारों गांव के सबसे अमीर सेठ की हवेली की ओर चल पड़े।

     

    आधी रात को वे दीवार फांदकर अंदर घुसे। तिजोरी वाला कमरा सामने था। जैसे ही कालू ने ताला खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी पास के कमरे से किसी बच्ची के रोने की आवाज आई।

     

    उन्होंने धीरे से झांककर देखा।

     

    सेठ अपनी छोटी बेटी को गोद में लिए बैठा था।

     

    वह कह रहा था, “बेटा, सुबह शहर के बड़े डॉक्टर के पास चलेंगे। तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।”

     

    बेटी ने कमजोर आवाज में कहा, “पापा… मेरे लिए इतना परेशान मत होइए।”

     

    यह सुनते ही गोपाल की आंखें भर आईं।

     

    उसने फुसफुसाकर कहा, “जिस बाप की बेटी बीमार हो, उसका पैसा चुराकर हम कैसे चैन से जी पाएंगे?”

     

    चारों बिना कुछ लिए वापस लौट आए।

     

    अगले दिन उनके पास खाने के लिए सिर्फ एक सूखी रोटी थी। चारों ने उसे बराबर-बराबर बांटकर खाया।

     

    भीमा बोला, “अगर हर बार ऐसे ही लौटेंगे तो एक दिन भूख ही मार डालेगी।”

     

    कालू ने गहरी सांस ली।

     

    “भूख से लड़ लेंगे… लेकिन अपने ज़मीर से नहीं।”

     

    कुछ दिन बाद उन्होंने शहर के मशहूर सुनार की दुकान को निशाना बनाया।

     

    रात के अंधेरे में वे दुकान के अंदर पहुंच गए।

     

    तभी नंदू की नजर एक कागज पर पड़ी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर इस महीने बैंक का कर्ज नहीं चुका पाया, तो दुकान और घर दोनों नीलाम हो जाएंगे।”

     

    कुछ ही दूरी पर सुनार अपनी पत्नी से कह रहा था,

     

    “चिंता मत करो। भगवान चाहेगा तो सब ठीक हो जाएगा।”

     

    चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर बिना कुछ उठाए वहां से निकल गए।

     

    अब उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था।

     

    तीन दिन तक उन्होंने सिर्फ पानी पीकर गुजारा किया।

     

    चौथे दिन गोपाल बोला, “अब गांव छोड़ देते हैं। शायद किसी दूसरे शहर में किस्मत बदल जाए।”

     

    चारों एक बड़े शहर पहुंच गए।

     

    वहां उन्होंने एक आलीशान हवेली देखी।

     

    उन्हें लगा कि इस बार जरूर माल मिलेगा।

     

    रात को वे अंदर घुसे।

     

    लेकिन अंदर सिर्फ एक बूढ़ी मां बैठी थी।

     

    वह भगवान के सामने हाथ जोड़कर रो रही थी।

     

    “हे भगवान… मेरा बेटा छह महीने से सीमा पर गया है। बस उसे सही-सलामत वापस भेज देना। मुझे धन नहीं चाहिए।”

     

    भीमा बोला, “चलो… यहां भी चोरी नहीं करेंगे।”

     

    चारों फिर लौट आए।

     

    अब तो उन्हें खुद पर हंसी भी आने लगी।

     

    नंदू बोला, “दुनिया में शायद हम ही ऐसे चोर हैं जो हर बार चोरी करने जाते हैं और खाली हाथ लौट आते हैं।”

     

    सभी हंस पड़े।

     

    एक शाम उन्हें रास्ते में एक बूढ़ा भिखारी मिला।

     

    वह कई दिनों से भूखा था।

     

    चारों के पास खाने के लिए सिर्फ दो रोटियां थीं।

     

    उन्होंने वे दोनों रोटियां उसी बूढ़े को खिला दीं।

     

    बूढ़े ने दुआ देते हुए कहा,

     

    “भगवान तुम्हें मेहनत की ऐसी कमाई देगा कि कभी किसी का हक नहीं छीनना पड़ेगा।”

     

    चारों मुस्कुरा दिए, लेकिन उन्हें यह बात उस समय सिर्फ एक दिलासा लगी।

     

    कुछ दिनों बाद गांव में खबर फैली कि एक बड़ा व्यापारी मेले से लौट रहा है। उसके पास सोने-चांदी और बहुत सारा पैसा है।

     

    चारों ने सोचा,

     

    “बस… यही आखिरी चोरी होगी। इसके बाद मेहनत से जिंदगी बिताएंगे।”

     

    वे जंगल में जाकर छिप गए।

     

    थोड़ी देर बाद व्यापारी की बैलगाड़ी वहां पहुंची।

     

    जैसे ही चारों बाहर निकले, अचानक झाड़ियों से दस-पंद्रह असली डाकू निकल आए।

     

    उन्होंने व्यापारी और उसके नौकरों पर हमला कर दिया।

     

    एक डाकू तलवार लेकर व्यापारी की तरफ बढ़ा।

     

    कालू जोर से चिल्लाया,

     

    “इसे बचाओ!”

     

    चारों बिना सोचे-समझे डाकुओं से भिड़ गए।

     

    लाठियां चलीं, पत्थर चले, कई घूंसे लगे।

     

    गोपाल के सिर से खून बहने लगा।

     

    भीमा के हाथ में चोट लगी।

     

    लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

     

    आखिरकार डाकू वहां से भाग गए।

     

    व्यापारी की जान बच गई।

     

    वह हैरान होकर बोला,

     

    “तुम लोग कौन हो?”

     

    कालू ने सिर झुका लिया।

     

    “सच कहें तो… हम तुम्हें लूटने आए थे।”

     

    व्यापारी कुछ पल तक उन्हें देखता रहा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “जो लोग अपनी जान जोखिम में डालकर किसी अनजान इंसान की रक्षा कर सकते हैं, वे चोर नहीं हो सकते।”

     

    उसने चारों को अपने साथ शहर चलने का निमंत्रण दिया।

     

    अगले ही दिन उसने अपने गोदाम में उन्हें काम दे दिया।

     

    चारों ने पूरी ईमानदारी से काम करना शुरू किया।

     

    वे सुबह सबसे पहले पहुंचते और सबसे आखिर में घर लौटते।

     

    कुछ महीनों में ही व्यापारी का कारोबार पहले से दोगुना हो गया।

     

    लोग कहने लगे,

     

    “ये चारों जहां काम करते हैं, वहां बरकत आ जाती है।”

     

    एक दिन व्यापारी ने सबके सामने कहा,

     

    “आज से तुम मेरे नौकर नहीं, मेरे साझेदार हो।”

     

    चारों की आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े।

     

    उन्हें पहली बार लगा कि ईमानदारी का रास्ता कठिन जरूर होता है, लेकिन मंजिल सबसे खूबसूरत होती है।

     

    कुछ साल बाद चारों ने अपना खुद का व्यापार शुरू किया।

     

    उन्होंने गांव में एक छोटा-सा अनाथालय भी बनवाया, ताकि कोई बच्चा उनकी तरह मजबूरी में गलत रास्ते पर न जाए।

     

    एक दिन गांव के बच्चों ने उनसे पूछा,

     

    “चाचा, क्या आप सच में पहले चोर थे?”

     

    कालू हंसते हुए बोला,

     

    “हां बेटा, चोरी करने जाते थे।”

     

    “फिर करते क्यों नहीं थे?”

     

    गोपाल मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि हर बार हमारा दिल कह देता था कि किसी की मेहनत की कमाई छीनकर कभी सुकून नहीं मिलेगा।”

     

    भीमा बोला,

     

    “गरीबी इंसान को मजबूर कर सकती है, लेकिन उसका ज़मीर अगर ज़िंदा हो, तो वह उसे सही रास्ते पर जरूर वापस ले आता है।”

     

    नंदू ने बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “याद रखना, मेहनत से कमाया हुआ एक रुपया भी चोरी के हजार रुपयों से ज्यादा कीमती होता है।”

     

    उस दिन पूरे गांव ने पहली बार उन्हें चोर नहीं, बल्कि ईमानदार और नेकदिल इंसान कहा।

     

    चारों दोस्तों ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन उस बूढ़े भिखारी की दुआ को याद किया।

     

    उन्हें अब यकीन हो गया था कि भगवान देर जरूर करता है, लेकिन मेहनत और अच्छे दिल का फल कभी अधूरा नहीं छोड़ता।

     

     

    मुश्किल हालात इंसान की परीक्षा लेते हैं, लेकिन उसका चरित्र यह तय करता है कि वह गिरकर बुरा बनेगा या संभलकर बेहतर इंसान।

     

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