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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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जुलाई 2026
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  • नाराज़गी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नाराजगी इतनी बढ़ गई कि रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच गया

     

    माही और काव्या की शादी को पांच साल हो चुके थे। दोनों की शादी परिवार की पसंद से हुई थी, लेकिन इन पांच सालों में उन्होंने एक-दूसरे को इतना समझ लिया था कि अब उनके बीच पति-पत्नी से ज्यादा अच्छे दोस्त जैसा रिश्ता था।

     

    उनका एक छोटा-सा बेटा भी था—अंश।

     

    घर में हंसी-मजाक रहता था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से सब कुछ बदलने लगा था।

     

    माही का काम बहुत बढ़ गया था। वह सुबह जल्दी घर से निकलता और देर रात लौटता। काव्या दिनभर घर, बच्चे और अपनी जिम्मेदारियों में लगी रहती।

     

    शुरुआत में वह माही की मजबूरी समझती थी।

     

    लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में शिकायतें जमा होने लगीं।

     

    एक रात माही करीब ग्यारह बजे घर आया।

     

    काव्या सोफे पर बैठी उसका इंतजार कर रही थी।

     

    माही ने जूते उतारते हुए पूछा, “अंश सो गया?”

     

    “हां।”

     

    “तुम अभी तक सोई नहीं?”

     

    काव्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपका इंतजार कर रही थी।”

     

    माही थका हुआ था।

     

    “काव्या, आज बहुत काम था। तुम सो जाया करो। मेरा इंतजार मत किया करो।”

     

    बस यही बात काव्या को चुभ गई।

     

    “आपके लिए तो आसान है कहना कि इंतजार मत करो।”

     

    माही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “तो फिर बात खत्म करो।”

     

    काव्या चुप हो गई।

     

    लेकिन उस रात उसके मन में एक बात बैठ गई—

     

    माही को अब उसकी परवाह नहीं रही।

     

    अगले दिन भी दोनों के बीच ठीक से बात नहीं हुई।

     

    फिर छोटी-छोटी बातें बड़ी बनने लगीं।

     

    माही अगर फोन करना भूल जाता तो काव्या नाराज हो जाती।

     

    काव्या अगर घर की कोई बात नहीं बताती तो माही को लगता कि वह जानबूझकर उसे दूर कर रही है।

     

    दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे, लेकिन एक-दूसरे की बात समझने के बजाय अपने मन की बात को सच मानने लगे थे।

     

    एक दिन काव्या की तबीयत ठीक नहीं थी।

     

    उसने माही को फोन किया।

     

    “आज जल्दी आ सकते हो?”

     

    माही एक जरूरी मीटिंग में था।

     

    “आज मुश्किल है। तुम डॉक्टर को दिखा लो।”

     

    काव्या ने फोन रख दिया।

     

    शाम को माही घर आया तो उसने देखा कि काव्या चुपचाप बैठी है।

     

    “अब कैसी तबीयत है?”

     

    “ठीक हूं।”

     

    “डॉक्टर को दिखाया?”

     

    “नहीं।”

     

    माही परेशान हो गया।

     

    “क्यों?”

     

    काव्या ने कहा, “क्योंकि मुझे लगा, जब आपको समय ही नहीं है तो मैं अकेली ही ठीक हो जाऊंगी।”

     

    माही को गुस्सा आ गया।

     

    “हर बात को मेरे खिलाफ क्यों कर देती हो?”

     

    “क्योंकि हर बार मैं ही समझौता करती हूं।”

     

    “तो मत करो!”

     

    माही के मुंह से ये शब्द निकलते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    “ठीक है। अब नहीं करूंगी।”

     

    वह कमरे में चली गई।

     

    माही वहीं खड़ा रह गया।

     

    उसे एहसास था कि उसने गुस्से में बहुत बड़ी बात कह दी है।

     

    लेकिन अहंकार ने उसे रोक दिया।

     

    उसने माफी नहीं मांगी।

     

    अगले कुछ दिनों तक दोनों एक ही घर में रहते हुए भी अजनबियों की तरह रहने लगे।

     

    अंश बीच में फंस गया।

     

    वह कभी मां के पास जाता तो मां चुप रहती। पिता के पास जाता तो पिता फोन में व्यस्त होने का बहाना कर लेते।

     

    एक शाम अंश ने मासूमियत से पूछा—

     

    “पापा, आप मम्मी से बात क्यों नहीं करते?”

     

    माही के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    उधर काव्या ने यह बात सुन ली।

     

    उस रात उसने माही से कहा—

     

    “हमारी लड़ाई का असर अंश पर पड़ रहा है।”

     

    माही ने धीरे से कहा, “मुझे पता है।”

     

    “तो फिर इसे खत्म क्यों नहीं करते?”

     

    माही कुछ कहने वाला था, तभी उसका फोन बजा।

     

    काम का फोन था।

     

    वह उठकर दूसरे कमरे में चला गया।

     

    काव्या ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे लगा, शायद उनका रिश्ता अब माही की जिंदगी में आखिरी प्राथमिकता बन चुका है।

     

    कुछ दिनों बाद काव्या ने अपने मायके जाने का फैसला कर लिया।

     

    उसने अपना सामान बांधा।

     

    माही कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

     

    “तुम सच में जा रही हो?”

     

    “हां।”

     

    “कितने दिन के लिए?”

     

    काव्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पता नहीं।”

     

    माही का दिल बैठ गया।

     

    “काव्या… बात इतनी बड़ी नहीं है।”

     

    वह हल्की-सी हंसी।

     

    “बात बड़ी नहीं थी माही। हमने उसे बड़ा बना दिया।”

     

    “तो मत जाओ।”

     

    “क्यों?”

     

    माही चुप हो गया।

     

    काव्या ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर मैं आज नहीं गई तो शायद हम दोनों कभी समझ नहीं पाएंगे कि हम एक-दूसरे को खो रहे हैं।”

     

    वह चली गई।

     

    घर अचानक खाली हो गया।

     

    अंश भी कुछ दिनों के लिए नानी के घर चला गया।

     

    अब उस घर में सिर्फ माही था।

     

    वही घर, जहां कभी हंसी गूंजती थी, अब बिल्कुल शांत था।

     

    एक रात माही को अलमारी में काव्या की पुरानी डायरी मिली।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया।

     

    उसमें कोई शिकायत नहीं थी।

     

    बस छोटी-छोटी बातें थीं।

     

    “आज माही बहुत थका था, इसलिए मैंने उससे ज्यादा बात नहीं की।”

     

    “आज उसका प्रेजेंटेशन था। उसने नहीं बताया, लेकिन मुझे पता है कि वह तनाव में है।”

     

    “आज उसने मुझे चाय बनाकर दी। बहुत छोटी बात थी, लेकिन मेरा दिन अच्छा हो गया।”

     

    माही की आंखें नम हो गईं।

     

    उसे पहली बार समझ आया कि काव्या हर दिन उसके लिए छोटी-छोटी खुशियां जमा करती रही थी और वह उन्हीं खुशियों को सामान्य समझता रहा।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैं माही से नाराज हूं, लेकिन उससे प्यार करना बंद नहीं कर सकती। बस चाहती हूं कि कभी वह मेरी चुप्पी भी समझे।”

     

    माही ने डायरी बंद कर दी।

     

    उस रात उसे नींद नहीं आई।

     

    अगली सुबह वह सीधे काव्या के मायके पहुंच गया।

     

    काव्या उसे देखकर चौंक गई।

     

    “आप यहां?”

     

    माही ने कहा—

     

    “तुम्हें लेने नहीं आया हूं।”

     

    काव्या चुप रही।

     

    “मैं माफी मांगने आया हूं।”

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    माही ने कहा—

     

    “मैं समझता रहा कि मैं परिवार के लिए मेहनत कर रहा हूं। लेकिन मैं भूल गया कि परिवार सिर्फ पैसे और जिम्मेदारियों से नहीं चलता। उसमें वक्त भी देना पड़ता है।”

     

    काव्या कुछ नहीं बोली।

     

    माही ने आगे कहा—

     

    “तुम्हारी नाराजगी मुझे परेशान करती थी, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा कि उस नाराजगी के पीछे तुम्हारा अकेलापन था।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “और मैंने भी गलतियां कीं,” उसने धीरे से कहा। “मैंने अपनी बात समझाने के बजाय चुप रहना शुरू कर दिया। मुझे लगा आप खुद समझ जाएंगे।”

     

    माही ने सिर झुका लिया।

     

    “शायद हम दोनों यही गलती करते रहे।”

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    फिर माही ने कहा—

     

    “अगर तुम चाहो तो हम वापस शुरुआत कर सकते हैं।”

     

    काव्या ने पूछा—

     

    “और अगर फिर वही हुआ?”

     

    माही ने उसकी तरफ देखकर कहा—

     

    “तो इस बार हम चुप नहीं रहेंगे। बात करेंगे। गुस्सा होगा तो भी बात करेंगे। नाराज होंगे तो भी बात करेंगे। लेकिन एक-दूसरे से दूर नहीं जाएंगे।”

     

    काव्या की आंखों में हल्की मुस्कान आई।

     

    “पक्का?”

     

    “पक्का।”

     

    तभी अंश दौड़ता हुआ आया।

     

    “मम्मी! पापा!”

     

    दोनों ने उसे अपने बीच पकड़ लिया।

     

    अंश खुशी से बोला—

     

    “अब आप दोनों लड़ोगे नहीं?”

     

    काव्या और माही एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।

     

    माही ने कहा—

     

    “लड़ाई होगी तो भी जल्दी खत्म कर देंगे।”

     

    अंश बोला—

     

    “क्यों?”

     

    काव्या ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “क्योंकि हमें एक-दूसरे से ज्यादा अपनी नाराजगी प्यारी नहीं है।”

     

    उस दिन दोनों घर लौट आए।

     

    उनकी जिंदगी एक ही दिन में परफेक्ट नहीं हुई।

     

    कभी फिर बहस होती, कभी कोई बात बुरी लगती।

     

    लेकिन अब एक फर्क था।

     

    वे चुप नहीं रहते थे।

     

    क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि रिश्ते हमेशा किसी बड़े धोखे से नहीं टूटते।

     

    कई बार रिश्ते छोटी-छोटी अनकही बातों, जमा होती नाराजगी और लंबे समय की चुप्पी से टूटने लगते हैं।

     

    और कभी-कभी रिश्ते को बचाने के लिए किसी बड़े चमत्कार की जरूरत नहीं होती।

     

    बस एक इंसान को अहंकार छोड़कर कहना पड़ता है—

     

    “चलो, फिर से बात करते हैं।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बारिश में मिला प्यार

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश में मिला प्यार

     

    पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा-सा गांव था—देवगढ़। चारों तरफ ऊंचे पहाड़, घने पेड़ और उनके बीच कुछ छोटे-छोटे घर। गांव से कुछ दूर सेना की एक चौकी थी, जहां तैनात जवान अक्सर कठिन मौसम में भी अपनी ड्यूटी निभाते थे।

     

    उन्हीं जवानों में से एक था कैप्टन आदित्य, जिसकी उम्र अट्ठाईस साल थी। वह शांत स्वभाव का था और अपने काम को लेकर बहुत गंभीर रहता था।

     

    एक रात आदित्य को एक जरूरी मिशन के लिए पहाड़ी रास्ते से आगे जाना था। मौसम अचानक बिगड़ गया। तेज बारिश, घना कोहरा और रास्ते पर गिरते पत्थरों के कारण आगे बढ़ना मुश्किल हो गया।

     

    उसके साथ दो जवान और थे।

     

    आदित्य ने आसपास देखा।

     

    “आगे जाना अभी ठीक नहीं होगा। मौसम थोड़ा संभलने तक हमें कहीं रुकना पड़ेगा।”

     

    पास ही उसे एक छोटा-सा घर दिखाई दिया।

     

    उसने दरवाजा खटखटाया।

     

    कुछ देर बाद एक बुजुर्ग आदमी ने दरवाजा खोला।

     

    “कौन?”

     

    आदित्य ने अपना परिचय दिया।

     

    “हम सेना से हैं। मौसम बहुत खराब हो गया है। अगर कुछ देर यहां रुकने की इजाजत मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी।”

     

    बुजुर्ग ने तुरंत दरवाजा खोल दिया।

     

    “बेटा, इसमें पूछने की क्या बात है? अंदर आओ।”

     

    घर में आदित्य और उसके साथियों के लिए चाय बनाई गई। बाहर बारिश लगातार तेज होती जा रही थी।

     

    तभी कमरे की दीवार पर लगी एक तस्वीर पर आदित्य की नजर पड़ी।

     

    तस्वीर में एक लड़की मुस्कुराती हुई खड़ी थी। उसकी आंखों में एक अजीब-सी सादगी थी।

     

    आदित्य कुछ पल तस्वीर को देखता रहा।

     

    बुजुर्ग ने उसकी नजर देख ली।

     

    “मेरी बेटी है—नंदिनी।”

     

    आदित्य ने तुरंत नजरें हटा लीं।

     

    “बहुत अच्छी तस्वीर है।”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “वह अभी शहर में पढ़ाती है। छुट्टियों में ही घर आती है।”

     

    आदित्य ने सिर हिलाया।

     

    उसे खुद समझ नहीं आया कि उस तस्वीर ने उसका ध्यान इतना क्यों खींच लिया था।

     

    रात बढ़ती गई।

     

    कुछ घंटों बाद मौसम थोड़ा शांत हुआ और आदित्य अपने साथियों के साथ वहां से निकल गया।

     

    जाते समय उसने बुजुर्ग से कहा—

     

    “आपने हमारी मदद की, इसे मैं कभी नहीं भूलूंगा।”

     

    बुजुर्ग ने कहा, “बेटा, तुम लोग हमारी रक्षा करते हो। आज अगर हम तुम्हें थोड़ी देर छत दे पाए तो इसे अपना सौभाग्य समझेंगे।”

     

    आदित्य मुस्कुराया और वहां से चला गया।

     

    लेकिन वह घर और दीवार पर लगी वह तस्वीर उसके मन में कहीं रह गई।

     

    अगले कुछ दिनों तक मिशन बेहद कठिन रहा। आदित्य अपने काम में व्यस्त हो गया। फिर भी कभी-कभी उसे उस घर की याद आ जाती।

     

    एक महीने बाद उसकी ड्यूटी उसी इलाके में लगी।

     

    आदित्य को पता चला कि उस गांव के आसपास सेना का एक छोटा अभियान चलना है। काम खत्म होने के बाद वह उसी घर के पास से गुजर रहा था।

     

    दरवाजे के बाहर वही बुजुर्ग बैठे थे।

     

    उन्होंने आदित्य को पहचान लिया।

     

    “अरे बेटा! तुम?”

     

    “जी अंकल।”

     

    “अंदर आओ।”

     

    आदित्य अंदर गया तो इस बार दीवार के पास वही लड़की खड़ी थी, जिसकी तस्वीर उसने उस रात देखी थी।

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “ये मेरी बेटी नंदिनी।”

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर नमस्ते किया।

     

    “नमस्ते।”

     

    आदित्य ने भी सिर झुकाया।

     

    “नमस्ते।”

     

    दोनों की पहली मुलाकात बस इतनी ही थी।

     

    लेकिन उस छोटी-सी मुलाकात में आदित्य को महसूस हुआ कि तस्वीर में दिखने वाली मुस्कान असल में उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत थी।

     

    नंदिनी ने चाय रखते हुए पूछा—

     

    “आप उस रात भी यहां रुके थे ना?”

     

    आदित्य थोड़ा हैरान हुआ।

     

    “आपको पता है?”

     

    नंदिनी हंस दी।

     

    “पापा ने बताया था।”

     

    फिर उसने कहा—

     

    “उस रात मौसम बहुत खराब था। आपको डर नहीं लगा?”

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “डर तो लगा था। लेकिन मिशन पर निकले जवान डर से ज्यादा अपने काम के बारे में सोचते हैं।”

     

    नंदिनी ने गंभीर होकर कहा—

     

    “शायद इसी वजह से लोग आप लोगों पर भरोसा करते हैं।”

     

    उसकी बात आदित्य के दिल में उतर गई।

     

    इसके बाद जब भी आदित्य को समय मिलता, वह उस घर के पास चला जाता। कभी नंदिनी से गांव के बारे में बात होती, कभी किताबों के बारे में।

     

    नंदिनी गांव के बच्चों को पढ़ाती थी। उसे लगता था कि पहाड़ों में रहने वाले बच्चों को भी अच्छे अवसर मिलने चाहिए।

     

    आदित्य को उसकी यह सोच बहुत पसंद थी।

     

    एक दिन नंदिनी ने पूछा—

     

    “आप हमेशा ऐसे ही मिशन पर रहते हैं?”

     

    “अक्सर।”

     

    “और घर?”

     

    आदित्य कुछ पल चुप रहा।

     

    “घर बहुत दूर है। मां-पापा हैं। उनसे मिलने का समय कम मिलता है।”

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा—

     

    “आपको उनकी बहुत याद आती होगी।”

     

    “हां।”

     

    फिर आदित्य ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “आपको?”

     

    “मुझे भी। लेकिन मेरा घर तो यही है।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होने लगी।

     

    आदित्य को एहसास हो चुका था कि वह नंदिनी को पसंद करने लगा है। लेकिन वह जानता था कि उसकी जिंदगी सामान्य नहीं थी।

     

    उसने कभी नंदिनी से कोई वादा नहीं किया।

     

    एक शाम उसे अचानक आदेश मिला।

     

    उसे अगले दिन एक लंबे मिशन पर जाना था।

     

    आदित्य नंदिनी के घर पहुंचा।

     

    नंदिनी ने उसे देखते ही पूछा—

     

    “सब ठीक है?”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    “कहां?”

     

    “ये नहीं बता सकता।”

     

    नंदिनी कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “आप लौटेंगे?”

     

    आदित्य ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “कोशिश पूरी रहेगी।”

     

    नंदिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

     

    “तो मैं इंतजार करूंगी।”

     

    आदित्य ने पहली बार महसूस किया कि उसके लिए लौटना अब सिर्फ ड्यूटी नहीं रहा था।

     

    उसके पीछे कोई इंतजार करने वाला भी था।

     

    कई सप्ताह गुजर गए।

     

    नंदिनी को आदित्य की कोई खबर नहीं मिली। वह रोज शाम गांव के रास्ते की तरफ देखती।

     

    उसके पिता ने कहा—

     

    “बेटी, फौज की जिंदगी ऐसी ही होती है। खबर न मिले तो इसका मतलब हमेशा बुरा नहीं होता।”

     

    नंदिनी चुप रहती।

     

    फिर एक दिन दूर से सेना की गाड़ी दिखाई दी।

     

    गाड़ी से आदित्य उतरा।

     

    नंदिनी उसे देखते ही दरवाजे तक आ गई।

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “कहा था ना… कोशिश पूरी रहेगी।”

     

    नंदिनी की आंखें नम थीं।

     

    “बहुत देर कर दी।”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “माफ करना।”

     

    “मैं नाराज नहीं हूं।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर आदित्य ने उसके पिता के सामने कहा—

     

    “अंकल, मैं नंदिनी को पसंद करता हूं। मेरी जिंदगी आसान नहीं है। कभी मुझे महीनों दूर रहना पड़ सकता है। कभी मेरी ड्यूटी मुझे कहीं भी ले जा सकती है। मैं नंदिनी से कोई झूठा वादा नहीं करना चाहता। लेकिन अगर आप दोनों की सहमति हो तो मैं उसके साथ अपनी जिंदगी बिताने की इच्छा रखता हूं।”

     

    नंदिनी के पिता कुछ देर उसे देखते रहे।

     

    फिर मुस्कुराकर बोले—

     

    “बेटा, तुमने मेरी बेटी से प्यार करने से पहले उसकी जिंदगी की सच्चाई समझी है। इससे बड़ी बात मेरे लिए कुछ नहीं।”

     

    नंदिनी की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

     

    कुछ महीनों बाद दोनों ने परिवार की सहमति से शादी कर ली।

     

    शादी के बाद भी आदित्य की ड्यूटी चलती रही। वह अक्सर दूर रहता, लेकिन जब भी छुट्टी मिलती, उसी पहाड़ी घर में लौटता।

     

    एक दिन वह उसी कमरे में बैठा था, जहां पहली बार उसने नंदिनी की तस्वीर देखी थी।

     

    अब उसी दीवार पर उनकी शादी की तस्वीर लगी थी।

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “उस रात मेरी तस्वीर देखकर आपको क्या लगा था?”

     

    आदित्य हंस पड़ा।

     

    “सच बताऊं?”

     

    “हां।”

     

    “मुझे लगा था कि मौसम खराब होने की वजह से मैं बस कुछ घंटों के लिए इस घर में रुका हूं।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    आदित्य ने उसकी ओर देखकर कहा—

     

    “फिर पता चला कि वो बारिश मुझे जिंदगी का सबसे खूबसूरत रास्ता दिखाने आई थी।”

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    आदित्य ने खिड़की से बाहर देखा और मुस्कुराया।

     

    जिस तूफान ने उसे उस रात रास्ते में रोक दिया था, उसी तूफान ने उसे उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत रिश्ता दे दिया था।

     

    और नंदिनी के लिए भी वह सिर्फ एक फौजी नहीं था।

     

    वह उस रात की बारिश से मिला वह इंसान था, जिसने उसे सिखाया था कि कभी-कभी जिंदगी की सबसे खूबसूरत मुलाकातें बिल्कुल अनजाने में होती हैं।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • वफादार कुत्ता

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    वफादार पालतू कुत्ता

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटे से गांव में अर्जुन अपनी पत्नी सीमा और दस साल के बेटे रोहन के साथ रहता था। उनका घर छोटा था, लेकिन परिवार बहुत खुश था। घर के बाहर एक बड़ा-सा आंगन था और आंगन के एक कोने में लकड़ी का छोटा-सा शेड बना था।

     

    एक दिन अर्जुन बाजार से लौट रहा था। रास्ते में उसे सड़क किनारे एक छोटा-सा घायल पिल्ला दिखाई दिया। पिल्ला लगातार कराह रहा था और डर के मारे एक पेड़ के पीछे छिपा था।

     

    अर्जुन ने उसे धीरे से उठाया।

     

    “अरे बेचारे… तुझे किसने इतना चोट पहुंचा दी?”

     

    पिल्ले ने डरते हुए अर्जुन की तरफ देखा।

     

    अर्जुन उसे घर ले आया।

     

    रोहन पिल्ले को देखते ही खुश हो गया।

     

    “पापा! ये हमारे साथ रहेगा?”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “अगर इसकी तबीयत ठीक हो गई तो क्यों नहीं?”

     

    सीमा ने उसके घाव साफ किए और उसे दूध दिया।

     

    कुछ ही दिनों में पिल्ला ठीक होने लगा। रोहन ने उसका नाम रखा—शेरू।

     

    शेरू बहुत समझदार था। वह पूरे दिन रोहन के आसपास रहता। रोहन स्कूल जाता तो दरवाजे तक छोड़ने जाता और जब तक वह लौटकर नहीं आता, दरवाजे के पास बैठा रहता।

     

    एक दिन रोहन स्कूल से लौटकर आया तो उसके हाथ में एक छोटा-सा बिस्कुट का पैकेट था।

     

    उसने शेरू को देखकर कहा, “देख, तेरे लिए क्या लाया हूं!”

     

    शेरू खुशी से पूंछ हिलाने लगा।

     

    रोहन ने उसे बिस्कुट दिया और बोला, “तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त है।”

     

    शेरू ने जैसे उसकी बात समझ ली। वह उसके पैरों के पास बैठ गया।

     

    समय बीतता गया और छोटा-सा पिल्ला बड़ा होकर मजबूत कुत्ता बन गया। उसका रंग भूरा था और गले में लाल पट्टा बंधा रहता था।

     

    अर्जुन ने घर की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी शेरू को दे दी।

     

    लेकिन शेरू सिर्फ घर की रखवाली नहीं करता था। वह परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखता था।

     

    सुबह अर्जुन खेत पर जाता तो शेरू कुछ दूर तक उसके साथ जाता।

     

    सीमा कुएं से पानी भरने जाती तो शेरू उसके पीछे चलता।

     

    और रोहन स्कूल जाता तो शेरू हमेशा गेट तक उसे छोड़ने जाता।

     

    एक दिन रोहन ने हंसते हुए कहा, “शेरू, तू मुझे स्कूल छोड़ने क्यों आता है? मैं बच्चा नहीं हूं।”

     

    शेरू ने उसकी तरफ देखा और पूंछ हिलाई।

     

    रोहन हंस पड़ा।

     

    “अच्छा बाबा, चल।”

     

    एक शाम अचानक गांव में तेज बारिश शुरू हो गई। बिजली चमक रही थी और हवा बहुत तेज चल रही थी।

     

    अर्जुन घर लौटने में देर कर रहा था।

     

    सीमा बार-बार दरवाजे की तरफ देख रही थी।

     

    “पता नहीं आज इतनी देर क्यों हो गई।”

     

    शेरू भी बेचैन था।

     

    वह बार-बार दरवाजे तक जाता और बाहर देखने लगता।

     

    रात काफी हो गई, लेकिन अर्जुन नहीं आया।

     

    सीमा ने पड़ोसियों को खबर की।

     

    कुछ लोग टॉर्च लेकर अर्जुन को खोजने निकल पड़े।

     

    शेरू भी उनके साथ दौड़ पड़ा।

     

    करीब एक किलोमीटर दूर खेत के पास उन्हें अर्जुन की साइकिल मिली।

     

    लेकिन अर्जुन वहां नहीं था।

     

    शेरू जमीन सूंघते हुए आगे बढ़ने लगा।

     

    एक आदमी बोला, “लगता है कुत्ता किसी तरफ जा रहा है।”

     

    सब लोग उसके पीछे चल दिए।

     

    थोड़ी दूर जाकर शेरू एक गड्ढे के पास रुक गया और जोर-जोर से भौंकने लगा।

     

    नीचे अर्जुन गिरा हुआ था।

     

    वह घायल था और उठ नहीं पा रहा था।

     

    लोगों ने तुरंत उसे बाहर निकाला और अस्पताल ले गए।

     

    डॉक्टर ने कहा, “अगर थोड़ी और देर हो जाती तो मुश्किल हो सकती थी।”

     

    सीमा ने शेरू को गले लगा लिया।

     

    “तूने आज मेरे पति की जान बचा ली।”

     

    शेरू चुपचाप उसके पैरों के पास बैठ गया।

     

    उस दिन के बाद पूरे गांव में शेरू की चर्चा होने लगी।

     

    लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    कुछ महीनों बाद अर्जुन को काम के सिलसिले में शहर जाना पड़ा। सीमा और रोहन भी उसके साथ गए। घर की देखभाल के लिए शेरू को पड़ोसी चाचा के पास छोड़ दिया गया।

     

    रोहन जाते समय शेरू को गले लगाकर बोला, “हम जल्दी वापस आएंगे।”

     

    शेरू ने रोहन को जाते हुए बहुत देर तक देखा।

     

    तीन दिन बाद परिवार वापस लौट आया।

     

    गाड़ी घर के पास रुकी।

     

    दरवाजा खुलते ही शेरू दौड़ता हुआ आया।

     

    वह कभी अर्जुन के पास जाता, कभी सीमा के और फिर रोहन के पास जाकर उछलने लगा।

     

    रोहन ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मुझे पता था तू हमें बहुत याद कर रहा होगा।”

     

    शेरू खुशी से पूंछ हिलाता रहा।

     

    कुछ दिन बाद एक रात घर में अजीब आवाज हुई।

     

    शेरू अचानक उठ गया।

     

    वह दरवाजे की तरफ देखने लगा।

     

    अर्जुन ने नींद में पूछा, “क्या हुआ?”

     

    शेरू धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया और जोर से भौंकने लगा।

     

    अर्जुन उठकर बाहर आया।

     

    आंगन में सब कुछ शांत था।

     

    “कुछ नहीं है शेरू। सो जा।”

     

    लेकिन शेरू शांत नहीं हुआ।

     

    वह घर के पीछे की तरफ भागा।

     

    अर्जुन भी उसके पीछे गया।

     

    वहां दीवार के पास एक आदमी छिपा हुआ था। अर्जुन को देखते ही वह भागने लगा।

     

    शेरू उसके पीछे दौड़ा और जोर-जोर से भौंकने लगा।

     

    आवाज सुनकर पड़ोसी भी बाहर आ गए।

     

    वह आदमी पकड़ा गया।

     

    पता चला कि वह कई दिनों से गांव के घरों की रेकी कर रहा था।

     

    अर्जुन ने शेरू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “तू सच में हमारे घर का रखवाला है।”

     

    शेरू ने जैसे जवाब में उसकी हथेली चाट ली।

     

    समय बीतता गया।

     

    रोहन बड़ा होने लगा।

     

    अब वह स्कूल के बाद पढ़ाई करने बैठता तो शेरू उसके पास ही लेट जाता।

     

    परीक्षा के दिनों में रोहन देर रात तक पढ़ता।

     

    सीमा कहती, “रोहन, अब सो जाओ।”

     

    रोहन कहता, “बस थोड़ा और।”

     

    शेरू उसके पैरों के पास बैठा रहता।

     

    एक रात रोहन किताब पढ़ते-पढ़ते वहीं सो गया।

     

    सुबह सीमा ने देखा कि शेरू पूरी रात उसके पास बैठा रहा था।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “तू भी ना… इसे अकेला नहीं छोड़ता।”

     

    शेरू ने आंखें झपकाईं।

     

    कुछ साल बाद शेरू बूढ़ा हो गया।

     

    अब वह पहले की तरह तेज नहीं दौड़ पाता था। ज्यादा समय आंगन में बैठकर बिताता।

     

    रोहन अब कॉलेज जाने लगा था।

     

    एक दिन वह शहर जाने के लिए बस में बैठ रहा था।

     

    शेरू गेट तक आया।

     

    रोहन ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “मैं जल्दी वापस आऊंगा दोस्त।”

     

    शेरू बस को तब तक देखता रहा, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गई।

     

    उस दिन शाम को शेरू खाना भी नहीं खा रहा था।

     

    सीमा ने कहा, “रोहन को याद कर रहा है।”

     

    अर्जुन बोला, “वो जल्दी आएगा।”

     

    दो दिन बाद रोहन अचानक घर लौट आया।

     

    शेरू ने जैसे ही उसकी आवाज सुनी, वह अपनी पूरी ताकत से उठकर दरवाजे तक पहुंचा।

     

    रोहन ने उसे गले लगा लिया।

     

    “शेरू!”

     

    दोनों कुछ देर वैसे ही बैठे रहे।

     

    रोहन की आंखों में आंसू थे।

     

    “तूने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।”

     

    शेरू ने धीरे से अपना सिर उसकी गोद में रख दिया।

     

    कुछ महीने बाद शेरू बहुत कमजोर हो गया।

     

    एक शाम पूरा परिवार उसके पास बैठा था।

     

    रोहन उसका सिर सहला रहा था।

     

    “तूने हमारे लिए बहुत कुछ किया है शेरू।”

     

    अर्जुन ने कहा, “ये सिर्फ हमारा पालतू कुत्ता नहीं था… ये हमारे परिवार का हिस्सा था।”

     

    सीमा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    शेरू ने एक-एक करके तीनों की तरफ देखा।

     

    फिर उसने धीरे से अपनी पूंछ हिलाई।

     

    उस रात परिवार उसके पास ही बैठा रहा।

     

    अगली सुबह शेरू शांत था।

     

    उसने अपनी जिंदगी प्यार और वफादारी से जी थी।

     

    रोहन ने उसकी पुरानी लाल पट्टी हाथ में लेकर कहा—

     

    “लोग कहते हैं कुत्ता इंसान का सबसे वफादार दोस्त होता है… लेकिन मेरे लिए शेरू सिर्फ दोस्त नहीं था। वह मेरा परिवार था।”

     

    अर्जुन ने शेरू की याद में आंगन के उसी नीम के पेड़ के नीचे एक छोटा-सा पत्थर रखा।

    उस पर लिखा“शेरू — जिसने घर की रखवाली नहीं, हमारे दिलों की रखवाली की।”

     

    और आज भी जब रोहन गांव आता, वह उस जगह बैठकर कुछ देर शेरू को याद करता।

     

    क्योंकि कुछ रिश्ते बोलकर नहीं निभाए जाते।

     

    वे बस दिल से निभाए जाते हैं।

     

    और शेरू ने अपने पूरे जीवन में यही साबित किया था कि सच्ची वफादारी शब्दों की मोहताज नहीं होती।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बूढ़ी अम्मा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बूढ़ी अम्मा अकेली रहती थी

     

    गांव के आखिरी छोर पर एक छोटी-सी मिट्टी की झोपड़ी थी। झोपड़ी के बाहर नीम का पुराना पेड़ और उसके नीचे लकड़ी की एक टूटी हुई चौकी पड़ी रहती थी। उसी झोपड़ी में करीब सत्तर साल की एक बूढ़ी अम्मा अकेली रहती थी।

     

    गांव वाले उसे प्यार से जमुना अम्मा कहते थे।

     

    अम्मा की जिंदगी बहुत साधारण थी। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना, आंगन में झाड़ू लगाना, चूल्हे पर चाय बनाना और फिर नीम के पेड़ के नीचे बैठकर भगवान का नाम लेना।

     

    लेकिन उसकी जिंदगी में एक चीज बहुत बड़ी थी—अकेलापन।

     

    उसका पति कई साल पहले गुजर चुका था। उनका एक बेटा था, मोहन। मोहन नौकरी की तलाश में शहर गया और वहीं शादी करके बस गया। शुरुआत में वह हर महीने अम्मा को पैसे भेजता था और फोन भी करता था।

     

    फिर धीरे-धीरे फोन कम हो गए।

     

    एक दिन अम्मा ने फोन किया।

     

    “बेटा, बहुत दिन हो गए तेरी आवाज नहीं सुनी।”

     

    उधर से मोहन ने जल्दी में कहा, “अम्मा, काम बहुत है। बाद में बात करता हूं।”

     

    “बेटा… घर कब आएगा?”

     

    “जल्दी आऊंगा।”

     

    फोन कट गया।

     

    अम्मा कुछ देर तक मोबाइल को देखती रही। फिर मुस्कुराकर बोली, “मेरा बेटा बहुत काम करता है… बेचारा।”

     

    वह हमेशा अपने बेटे के लिए कोई न कोई बहाना बना लेती थी।

     

    गांव के कुछ लोग कहते थे, “अम्मा को मोहन के पास चले जाना चाहिए।”

     

    अम्मा बस इतना कहती, “बेटे का अपना घर है। मैं यहां ठीक हूं।”

     

    असल में वह ठीक नहीं थी।

     

    रात को जब चारों तरफ सन्नाटा छा जाता, तब उसे अपने पति की याद आती। कभी बेटे के बचपन की आवाजें सुनाई देतीं, कभी लगता जैसे मोहन आंगन में दौड़ रहा हो।

     

    लेकिन आंखें खोलती तो सामने खाली आंगन होता।

     

    एक बरसात की रात बहुत तेज बारिश हो रही थी। अम्मा ने दरवाजा बंद किया और चूल्हे के पास बैठ गई। तभी बाहर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    अम्मा चौंक गई।

     

    “इतनी रात को कौन बच्चा रो रहा है?”

     

    वह छड़ी लेकर बाहर निकली।

     

    दरवाजे के पास एक छोटा-सा लड़का बारिश में भीगा हुआ बैठा था।

     

    अम्मा ने उसे तुरंत अंदर खींच लिया।

     

    “अरे बेटा! कौन हो तुम? यहां कैसे आए?”

     

    लड़का कांपते हुए बोला, “मेरा नाम सोनू है… मैं रास्ता भूल गया हूं।”

     

    अम्मा ने उसे सूखा कपड़ा दिया और चूल्हे के पास बैठाया।

     

    “डर मत। आज रात तू यहीं रहेगा।”

     

    उसने गर्म दूध बनाया और बच्चे को पिला दिया।

     

    कुछ देर बाद सोनू सो गया।

     

    अम्मा उसे देखते हुए देर तक बैठी रही।

     

    कई साल बाद उसके घर में किसी बच्चे की सांसों की आवाज गूंज रही थी।

     

    उस रात अम्मा को पहली बार अपना घर खाली नहीं लगा।

     

    सुबह होते ही सोनू को गांव के लोग पहचान गए। वह पड़ोस के गांव का बच्चा था, जो अपनी मां के साथ मेले में आया था और भीड़ में बिछड़ गया था।

     

    उसकी मां रोती हुई अम्मा के घर पहुंची।

     

    “अम्मा, आपने मेरे बेटे को बचा लिया। मैं आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी।”

     

    अम्मा मुस्कुराई।

     

    “अरे इसमें एहसान की क्या बात है? बच्चा था, उसे घर दे दिया।”

     

    सोनू जाते-जाते अम्मा के गले लग गया।

     

    “अम्मा, मैं फिर आऊंगा।”

     

    अम्मा की आंखें भर आईं।

     

    “जरूर आना बेटा।”

     

    उस दिन के बाद सोनू सच में हर कुछ दिनों में अम्मा से मिलने आने लगा।

     

    कभी उसके लिए फल लाता, कभी आंगन में झाड़ू लगा देता।

     

    धीरे-धीरे गांव के दूसरे बच्चे भी अम्मा के घर आने लगे।

     

    कोई कहानी सुनने आता, कोई गुड़ खाने।

     

    अम्मा का सूना आंगन बच्चों की हंसी से भरने लगा।

     

    लेकिन गांव में एक आदमी ऐसा भी था जिसे यह सब पसंद नहीं था। उसका नाम रघु था। वह अम्मा की जमीन पर नजर रखता था।

     

    एक दिन उसने अम्मा से कहा, “अम्मा, तुम्हारी उम्र हो गई है। ये जमीन मुझे दे दो। मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगा।”

     

    अम्मा ने साफ मना कर दिया।

     

    “मेरी जमीन मेरे पति की आखिरी निशानी है।”

     

    रघु नाराज हो गया।

     

    “अकेली औरत कब तक संभाल पाएगी इसे?”

     

    अम्मा ने उसकी आंखों में देखकर कहा, “जब तक सांस है, अपने घर की रखवाली खुद करूंगी।”

     

    कुछ दिनों बाद अम्मा अचानक बीमार पड़ गई।

     

    गांव वालों ने डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने कहा कि अम्मा को आराम की जरूरत है।

     

    उस रात अम्मा ने अपने पुराने संदूक से बेटे की बचपन की तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर को सीने से लगाकर बोली, “मोहन… तू जहां भी है, खुश रहना।”

     

    उसी समय बाहर से आवाज आई।

     

    “अम्मा!”

     

    सोनू दरवाजे पर खड़ा था।

     

    उसके साथ उसकी मां भी थी।

     

    “अम्मा, आप बीमार हैं और आपने हमें बताया भी नहीं?”

     

    अम्मा ने कमजोर आवाज में कहा, “मैं ठीक हूं बेटा।”

     

    सोनू की मां बोली, “अब आप अकेली नहीं रहेंगी। हम रोज आपके पास आएंगे।”

     

    अम्मा की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “मैंने तो सोचा था, बुढ़ापे में किसी को मेरी जरूरत नहीं होगी।”

     

    सोनू ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे आपकी जरूरत है अम्मा।”

     

    यह सुनकर अम्मा मुस्कुरा दी।

     

    कुछ दिनों बाद मोहन अचानक गांव आया।

     

    अम्मा उसे देखते ही दरवाजे तक दौड़ी।

     

    “मोहन!”

     

    मोहन ने मां को गले लगा लिया।

     

    काफी देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर मोहन की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “अम्मा, मुझे माफ कर दो।”

     

    अम्मा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटा, मां अपने बच्चे से नाराज नहीं रहती।”

     

    मोहन बोला, “मैंने सोचा था आप गांव में खुश होंगी। लेकिन मुझे पता नहीं था कि आप इतनी अकेली हो गई हैं।”

     

    अम्मा ने मुस्कुराकर कहा, “अब अकेली कहां हूं?”

     

    तभी बाहर से सोनू की आवाज आई—

     

    “अम्मा! मैं आ गया!”

     

    फिर कई बच्चे दौड़ते हुए अंदर आए।

     

    मोहन उन्हें देखकर मुस्कुराया।

     

    उसने मां की ओर देखा और कहा, “अम्मा, लगता है आपने अपना पूरा परिवार बना लिया।”

     

    अम्मा हंस पड़ी।

     

    “परिवार खून से नहीं, बेटा… अपनापन से बनता है।”

     

    उस दिन मोहन ने फैसला किया कि वह हर महीने गांव आएगा और मां को अपने साथ ले जाने की जिद नहीं करेगा। क्योंकि अब वह समझ चुका था कि अम्मा को सिर्फ छत नहीं चाहिए थी।

     

    उसे अपनों की जरूरत थी।

     

    उसके बाद अम्मा का घर गांव का सबसे प्यारा घर बन गया।

     

    सुबह बच्चे वहां आते, दोपहर में पड़ोस की औरतें बैठतीं और शाम को मोहन फोन करता।

     

    नीम के पेड़ के नीचे बैठी अम्मा अक्सर आसमान की ओर देखकर कहती—

     

    “भगवान, मैंने सोचा था बुढ़ापे में मेरा घर सूना हो जाएगा… लेकिन आपने तो इसे लोगों के प्यार से भर दिया।”

     

    और सच ही तो था।

     

    अम्मा पहले अकेली रहती थी।

     

    लेकिन अब उसके घर में रहने वाला कोई एक इंसान नहीं था।

     

    उसका घर पूरे गांव का घर बन चुका था।

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    Auther preeti Sharma

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  • दोस्ती जो हादसे से नहीं बदली

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दोस्ती जो हादसे के बाद भी नहीं बदली

     

    राघव और समीर बचपन से दोस्त थे। दोनों एक ही छोटे से गांव में पले-बढ़े थे। घर की हालत साधारण थी, लेकिन दोनों के सपने बड़े थे।

     

    राघव हमेशा कहता था, “मैं पुलिस वाला बनूंगा।”

     

    समीर हंसकर कहता, “और मैं बड़ा बिजनेसमैन बनूंगा।”

     

    दोनों घंटों अपने भविष्य की बातें करते।

     

    समय बीता तो राघव ने मेहनत करके पुलिस की नौकरी हासिल कर ली। गांव में उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। समीर ने भी शहर जाकर काम शुरू कर दिया।

     

    नौकरी लगने के बाद राघव ने एक दिन समीर से कहा—

     

    “अब तेरी बारी है। तू भी अपना सपना पूरा कर।”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “मेरा सपना थोड़ा बड़ा है दोस्त, वक्त लगेगा।”

     

    राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “वक्त चाहे जितना लगे, मैं तेरे साथ हूं।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया कि जिंदगी चाहे जहां ले जाए, उनकी दोस्ती कभी नहीं बदलेगी।

     

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

     

    एक रात समीर अपनी बाइक से शहर से गांव लौट रहा था। रास्ते में एक तेज रफ्तार वाहन से उसकी बाइक की टक्कर हो गई।

     

    हादसा इतना गंभीर था कि समीर कई दिनों तक अस्पताल में रहा।

     

    जब उसे होश आया, तो वह अपने आसपास किसी को पहचान नहीं पा रहा था।

     

    उसकी याददाश्त बुरी तरह प्रभावित हुई थी। इलाज के बाद भी वह पहले जैसा नहीं हो पाया।

     

    परिवार की आर्थिक हालत खराब थी। कुछ समय बाद उसके घरवालों ने उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन समीर अक्सर घर से निकल जाता।

     

    वह शहर की सड़कों पर भटकने लगा।

     

    धीरे-धीरे लोग उसे पागल समझने लगे।

     

    कोई उसे देखकर हंसता, कोई चिढ़ाता और कोई उसे सड़क से हटाने के लिए डांट देता।

     

    समीर को कुछ बातें याद थीं, मगर सब कुछ धुंधला था।

     

    उसे सिर्फ एक नाम याद था—

     

    “राघव…”

     

    एक दिन वह पुलिस थाने के सामने बैठा था।

     

    उसी समय राघव की नजर उस पर पड़ी।

     

    राघव कुछ पल के लिए वहीं खड़ा रह गया।

     

    “समीर?”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में पहचान नहीं थी।

    राघव उसके पास बैठ गया।

     

    “मुझे पहचानता है?”

    समीर चुप रहा।

     

    राघव ने धीरे से कहा

    “हमने बचपन में नदी के किनारे पतंग उड़ाई थी। तू पतंग उड़ाता था और मैं धागा पकड़ता था।”

     

    समीर के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    लेकिन अगले ही पल वह फिर चुप हो गया।

     

    राघव की आंखें भर आईं।

     

    उस दिन उसने तय कर लिया कि वह अपने दोस्त को अकेला नहीं छोड़ेगा।

     

    उसने समीर के लिए खाना लाना शुरू किया।

     

    हर दिन ड्यूटी खत्म होने के बाद वह उसे ढूंढने निकलता।

     

    कभी समीर मंदिर के पास मिलता, कभी बस स्टैंड पर और कभी किसी दुकान के बाहर बैठा हुआ।

     

    राघव उसके पास बैठकर घंटों बातें करता।

     

    “आज पता है क्या हुआ?”

    समीर उसकी तरफ देखता।

    “क्या?”

    “आज थाने में एक आदमी अपनी पत्नी से झगड़कर आया था।”

     

    समीर हंसने लगता।

    राघव भी हंस देता।

    कई लोग राघव से कहते

    “साहब, आप इतना समय इस आदमी पर क्यों लगाते हैं?”

     

    राघव जवाब देता

    “क्योंकि ये कोई सड़क पर रहने वाला पागल नहीं है। ये मेरा दोस्त है।”

     

    एक दिन राघव ने समीर के लिए नए कपड़े खरीदे।

    “ले, पहनकर देख।”

    समीर ने कपड़े हाथ में लिए और बोला

    “मेरे पास पैसे नहीं हैं।”राघव मुस्कुराया।

     

    “तूने कब से अपने दोस्त से पैसे देने शुरू कर दिए?”

     

    समीर कुछ देर उसे देखता रहा।

    फिर अचानक बोला

    “दोस्त…”

    राघव के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

    “हां, दोस्त।”

    उस दिन समीर ने पहली बार राघव को पुराने दिनों की तरह देखा था।

     

    लेकिन उसकी याद पूरी तरह वापस नहीं आई।

     

    कुछ महीने बाद शहर में एक बड़ा अपराध हुआ। पुलिस अपराधी की तलाश कर रही थी।

    राघव जांच में लगा हुआ था।

    एक दिन समीर अचानक थाने के बाहर आया।

     

    उसने राघव से कहा

    “मुझे एक जगह याद आ रही है।”

    राघव ने पूछा “कहां?”

    समीर ने शहर के पुराने गोदाम का नाम लिया।

    “वहां… कोई मुझे ले गया था।”

    राघव चौंक गया।

    हादसे से पहले समीर ने उसी इलाके में कुछ संदिग्ध लोगों को देखा था। वह शायद किसी महत्वपूर्ण घटना का गवाह था।

     

    राघव ने उसकी बात गंभीरता से ली।

    जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि समीर ने सच में कुछ महत्वपूर्ण देखा था।

     

    उसकी जानकारी से पुलिस को अपराधियों तक पहुंचने में मदद मिली।

    मामला सुलझ गया।

    लेकिन राघव के लिए सबसे बड़ी खुशी यह नहीं थी।

     

    उसके लिए खुशी की बात यह थी कि उसका दोस्त धीरे-धीरे अपनी पुरानी यादें वापस पा रहा था।

     

    एक शाम दोनों उसी नदी के किनारे बैठे थे जहां बचपन में पतंग उड़ाते थे।

     

    समीर ने पानी की तरफ देखते हुए कहा

    “राघव… मुझे सब याद नहीं है।”

    राघव ने कहा“कोई बात नहीं।”

    “मुझे डर लगता है कि मैं कभी पहले जैसा नहीं बन पाऊंगा।”

     

    राघव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

    “तुझे पहले जैसा बनने की जरूरत नहीं है।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

    राघव मुस्कुराया।

    “तू आज भी मेरा वही दोस्त है। बस तेरी जिंदगी ने रास्ता थोड़ा मुश्किल कर दिया है।”

    समीर की आंखों में आंसू आ गए।

    “तूने मेरा साथ क्यों नहीं छोड़ा?”

    राघव ने हंसते हुए कहा

    “क्योंकि दोस्ती नौकरी नहीं है कि मन हुआ तो छोड़ दी।”दोनों हंस पड़े।

    कुछ समय बाद समीर का इलाज बेहतर अस्पताल में शुरू हुआ। उसकी हालत धीरे-धीरे सुधरने लगी।

     

    वह अब सड़क पर नहीं भटकता था। राघव ने उसके परिवार से भी संपर्क किया और उसकी देखभाल का इंतजाम कराया।

     

    समीर की जिंदगी पूरी तरह पहले जैसी नहीं हुई, लेकिन अब उसके पास एक सुरक्षित जगह थी, इलाज था और सबसे बढ़कर उसका दोस्त था।

     

    एक दिन समीर ने राघव से कहा

    “मेरा बिजनेस वाला सपना तो पूरा नहीं हुआ।”

    राघव ने कहा“तो नया सपना बना।”

    समीर ने पूछा“क्या?”

    राघव मुस्कुराया।

    “ऐसे लोगों के लिए कुछ करना जो हादसे के बाद अकेले रह जाते हैं।”

    समीर ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बोला“शायद यही मेरा असली सपना हो।”

    दोनों ने हाथ मिलाया।

     

    कुछ साल बाद समीर ने सड़क पर रहने वाले जरूरतमंद लोगों के लिए एक छोटा-सा सहायता केंद्र शुरू किया।

     

    राघव जब भी ड्यूटी से छुट्टी पाता, वहां जरूर जाता।

     

    लोग अक्सर पूछते“आप दोनों की दोस्ती इतनी मजबूत कैसे है?”

    राघव मुस्कुराकर कहता

    “क्योंकि असली दोस्त वही होता है जो तब भी साथ खड़ा रहे, जब पूरी दुनिया तुम्हें पहचानना बंद कर दे।”

    और समीर हर बार उसकी बात पूरी करता

    “किस्मत ने मुझे सड़क पर ला दिया था… लेकिन मेरे दोस्त ने मुझे फिर से जिंदगी की राह पर खड़ा कर दिया।”

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मदहोश भिखारी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    मदहोश भिखारी

     

    शहर के पुराने हिस्से में एक चौराहा था, जहां हर सुबह भीड़ जमा होती थी। उसी चौराहे के किनारे एक बूढ़ा भिखारी बैठा रहता था। लोग उसे मदहोश बाबा कहते थे।

     

    उसके कपड़े पुराने थे, बाल बिखरे रहते और हाथ में हमेशा मिट्टी का एक छोटा-सा प्याला रहता। वह दिनभर कभी मुस्कुराता, कभी खुद से बातें करता और कभी आने-जाने वालों को ऐसी बातें कह देता जिनका मतलब किसी को समझ नहीं आता।

     

    लोग उसका मजाक उड़ाते।

     

    “देखो, फिर मदहोश हो गया।”

     

    “इससे दूर रहना, पता नहीं क्या बड़बड़ाता रहता है।”

     

    लेकिन कोई नहीं जानता था कि उस बूढ़े के पीछे एक ऐसा राज छिपा था, जिसे जानकर पूरा शहर हैरान होने वाला था।

     

    एक सुबह शहर का बड़ा व्यापारी रतनलाल अपनी कार से उसी चौराहे से गुजर रहा था।

     

    भिखारी ने अचानक कार के सामने हाथ उठा दिया।

     

    ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिया।

     

    रतनलाल गुस्से में बाहर आया।

     

    “अरे पागल! रास्ता क्यों रोक रहा है?”

     

    भिखारी मुस्कुराया।

     

    “रास्ता मैंने नहीं रोका सेठ… रास्ता तो तुम्हारे कर्मों ने रोका है।”

     

    रतनलाल चौंक गया।

     

    “क्या बकवास कर रहे हो?”

     

    भिखारी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “जिस जमीन पर तुम अपना नया महल बना रहे हो, उसके नीचे किसी गरीब की बद्दुआ दबी है।”

     

    रतनलाल का चेहरा बदल गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    भिखारी हंसने लगा।

     

    “जिस शहर में लोग आंखें बंद करके चलते हैं, वहां सच देखने के लिए आंखों की नहीं, यादों की जरूरत होती है।”

     

    रतनलाल वहां से चला गया, लेकिन भिखारी की बात उसके मन में अटक गई।

     

    कुछ दिन बाद शहर में खबर फैली कि रतनलाल के निर्माण स्थल की जमीन का पुराना मालिक एक गरीब किसान था, जिसकी जमीन धोखे से हड़पी गई थी।

     

    लोगों को पहली बार मदहोश बाबा की बात याद आई।

     

    इसी बीच शहर में रहने वाली मीरा नाम की एक छोटी लड़की रोज उस भिखारी को खाना देने लगी।

     

    एक दिन उसने पूछा—

     

    “बाबा, लोग आपको मदहोश क्यों कहते हैं?”

     

    भिखारी मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं उस चीज में मदहोश हूं जो उन्हें दिखाई नहीं देती।”

     

    “क्या?”

     

    “सच में।”

     

    मीरा हंस पड़ी।

     

    “सच भी कोई नशा है?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “दुनिया के सारे नशे उतर जाते हैं बेटी, लेकिन सच का नशा इंसान को अंदर से जगा देता है।”

     

    मीरा को उसकी बातें अच्छी लगती थीं।

     

    एक शाम अचानक शहर के पुराने मंदिर में चोरी हो गई। मंदिर की दानपेटी गायब थी।

     

    पुलिस ने कई लोगों से पूछताछ की, लेकिन चोर का पता नहीं चला।

     

    अगली सुबह मदहोश बाबा ने चौराहे पर बैठे-बैठे कहा—

     

    “जिसने मंदिर से लिया है, वह उसे वापस करेगा।”

     

    लोग हंसने लगे।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    बाबा ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि जिसने भगवान के घर से चोरी की है, उसके घर में चैन नहीं रहेगा।”

     

    उस रात मंदिर की दानपेटी वापस मंदिर के पीछे रखी मिली।

     

    सभी हैरान रह गए।

     

    अब लोगों ने बाबा की बातों को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया।

     

    लेकिन शहर का नया पुलिस अधिकारी विजय उस पर विश्वास नहीं करता था।

     

    उसने कहा—

     

    “यह आदमी कोई चाल चल रहा है। इसकी जांच होनी चाहिए।”

     

    विजय ने बाबा के पुराने सामान की तलाशी ली।

     

    उसे एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “रघुवीर सिंह, पुलिस विभाग।”

     

    विजय के हाथ रुक गए।

     

    रघुवीर सिंह नाम उसके पिता की पुरानी फाइलों में था।

     

    बीस साल पहले एक ईमानदार पुलिस अधिकारी रघुवीर अचानक गायब हो गए थे।

     

    विजय ने तुरंत बाबा से पूछा—

     

    “तुम्हारा असली नाम क्या है?”

     

    बूढ़ा चुप रहा।

     

    विजय ने फिर पूछा—

     

    “क्या तुम रघुवीर सिंह हो?”

     

    बूढ़े ने धीरे से सिर उठा लिया।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    “हां।”

     

    विजय के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “लेकिन आप बीस साल से कहां थे?”

     

    रघुवीर ने लंबी सांस ली।

     

    “मैंने शहर के सबसे बड़े अपराधियों का सच पकड़ लिया था। लेकिन जिन लोगों के खिलाफ सबूत थे, वे बहुत ताकतवर थे। उन्होंने मुझे खत्म करने की कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं बच गया, लेकिन दुनिया से गायब हो गया।”

     

    विजय ने पूछा—

     

    “फिर भिखारी बनकर क्यों रहे?”

     

    रघुवीर मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि जब मैं वर्दी में था, लोग मेरी बात सुनते थे। लेकिन जब मैं भिखारी बना, लोगों ने मुझे पागल समझ लिया। तब मैंने शहर के सबसे बड़े राज अपनी आंखों से देखे।”

     

    विजय ने डायरी खोली।

     

    उसमें शहर के कई बड़े अपराधियों के नाम थे।

     

    रतनलाल का नाम भी था।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “बीस साल पहले जो लोग गरीबों की जमीन हड़पते थे, आज वही शहर के मालिक बने बैठे हैं।”

     

    विजय ने तुरंत जांच शुरू कर दी।

     

    कुछ ही दिनों में पुराने दस्तावेज, गवाह और सबूत सामने आने लगे।

     

    रतनलाल समेत कई बड़े लोगों के पुराने अपराध सामने आ गए।

     

    शहर में हड़कंप मच गया।

     

    लोग उसी चौराहे पर जमा हुए जहां कभी वे मदहोश बाबा का मजाक उड़ाते थे।

     

    रघुवीर वहीं बैठा था।

     

    मीरा उसके पास आकर बोली—

     

    “बाबा, अब लोग आपको पागल नहीं कहेंगे।”

     

    रघुवीर मुस्कुराया।

     

    “लोग क्या कहते हैं, उससे क्या फर्क पड़ता है?”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “फिर फर्क किससे पड़ता है?”

     

    रघुवीर ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा—

     

    “इससे कि जब पूरी दुनिया गलत रास्ते पर जा रही हो, तब भी तुम सही रास्ते पर चलो।”

     

    कुछ दिनों बाद रघुवीर को उसकी पुरानी पहचान और सम्मान वापस मिला।

     

    लेकिन उसने फिर से वर्दी पहनने से इनकार कर दिया।

     

    वह उसी चौराहे पर बैठा रहा।

     

    बस अब लोग उसे भीख नहीं देते थे।

     

    लोग उसके पास अपनी परेशानियां लेकर आते थे।

     

    और वह हर किसी से बस एक ही बात कहता—

     

    “मुझे मदहोश मत समझना… मैं दुनिया के झूठ को देखकर सच के नशे में हूं।”

     

    समय बीतता गया।

     

    चौराहे पर अब भी वह बूढ़ा बैठता था।

     

    लेकिन अब कोई उसे पागल नहीं कहता था।

     

    क्योंकि शहर को समझ आ चुका था—

     

    कभी-कभी जिस इंसान को दुनिया सबसे ज्यादा बेवकूफ समझती है…

     

    वही इंसान सबसे ज्यादा सच देख रहा होता है।

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    Auther preeti Sharma

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  • कोयल की मीठी आवाज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कोयल की मधुर आवाज और सुबह का रहस्य

     

    हरे-भरे पेड़ों और छोटे-छोटे खेतों के बीच बसा था सुरमई गांव। गांव छोटा था, लेकिन वहां के लोग बहुत खुश रहते थे। शाम होते ही बच्चे खेलकर घर लौट आते और बुजुर्ग चौपाल पर बैठकर बातें करने लगते।

     

    लेकिन एक दिन गांव में एक अजीब-सी कोयल आ गई।

     

    वह कोयल बाकी कोयलों जैसी नहीं थी। उसकी आवाज इतनी मीठी थी कि जो भी उसे सुनता, कुछ ही देर में उसे नींद आने लगती।

     

    पहली बार उसकी आवाज गांव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ से सुनाई दी।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    पास खेल रहे बच्चों ने अचानक खेलना बंद कर दिया।

     

    एक बच्चा बोला, “मुझे बहुत नींद आ रही है।”

     

    कुछ ही मिनटों में बच्चे घर चले गए और सो गए।

     

    उस शाम गांव के लोगों ने भी वही आवाज सुनी।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    एक किसान अपनी पत्नी से बात कर रहा था।

     

    “आज खेत में पानी—”

    उसकी बात पूरी होने से पहले ही उसकी आंखें बंद होने लगीं।

    पत्नी ने पूछा, “क्या हुआ?”

    किसान ने जम्हाई लेते हुए कहा, “पता नहीं… बहुत नींद आ रही है।”

     

    कुछ ही देर में पूरा गांव सो गया।

     

    अगली सुबह जब लोगों की आंखें खुलीं तो सभी हैरान रह गए।

     

    किसी के घर का दरवाजा खुला था।

     

    किसी के आंगन में रखा अनाज गायब था।

     

    किसी के घर से चांदी के बर्तन नहीं थे।

     

    और सबसे हैरानी की बात…

     

    गांव के मुखिया के घर से उसकी पुरानी संदूकची गायब थी।

     

    मुखिया चिल्लाया, “रात को गांव में चोरी हुई है!”

     

    सभी लोग एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “लेकिन चोर आया कैसे?”

     

    “किसी ने आवाज तक नहीं सुनी।”

     

    “सबको इतनी गहरी नींद कैसे आ गई?”

     

    तभी एक बुजुर्ग बोले—

     

    “वह कोयल…”

     

    सबकी नजर उनकी तरफ गई।

     

    “कौन-सी कोयल?”

     

    “कल बरगद पर बैठी थी। उसकी आवाज सुनते ही सब सो गए थे।”

     

    गांव वालों को बात समझ आ गई।

     

    उस दिन से सभी ने तय किया कि रात होते ही कोई बरगद के पास नहीं जाएगा।

     

    लेकिन अगले दिन फिर वही हुआ।

     

    शाम होते ही कोयल ने गाना शुरू किया।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    एक-एक करके गांव वाले सोते चले गए।

     

    सुबह फिर कई घरों से सामान गायब था।

     

    अब गांव में डर फैल गया।

     

    गांव की बारह साल की लड़की गौरी इन सब बातों को ध्यान से देख रही थी।

     

    उसे विश्वास नहीं था कि एक छोटी-सी कोयल चोरी कर सकती है।

     

    उसने अपनी दादी से पूछा—

     

    “दादी, अगर कोयल चोरी नहीं करती तो उसकी आवाज सुनते ही सब क्यों सो जाते हैं?”

     

    दादी ने कहा, “शायद कोई उसकी आवाज का फायदा उठा रहा है।”

     

    गौरी की आंखें चमक उठीं।

     

    “मतलब चोर कोई इंसान है?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    उस रात गौरी ने सोने का नाटक किया।

     

    उसने अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखा।

     

    कुछ देर बाद बरगद के पेड़ से वही आवाज आई।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    गौरी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ देर बाद उसे बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    वह धीरे से खिड़की के पास पहुंची।

     

    एक आदमी गांव की गली में दबे पांव चल रहा था।

     

    उसके हाथ में कपड़े की बड़ी थैली थी।

     

    गौरी ने पहचानने की कोशिश की।

     

    अंधेरा होने के कारण चेहरा साफ नहीं दिखाई दे रहा था।

     

    वह आदमी सीधे मुखिया के घर की तरफ गया।

     

    गौरी तुरंत अपनी दादी को जगाने दौड़ी।

     

    लेकिन दादी भी गहरी नींद में थीं।

     

    गौरी ने अकेले ही उसका पीछा करने का फैसला किया।

     

    वह थोड़ी दूरी बनाकर उस आदमी के पीछे चलती रही।

     

    आदमी गांव से बाहर गया और पुराने खंडहर के पास पहुंच गया।

     

    वहां पहले से दो और आदमी मौजूद थे।

     

    एक ने पूछा—

     

    “आज क्या मिला?”

     

    चोर ने थैली जमीन पर रखी।

     

    “बहुत कुछ।”

     

    गौरी यह देखकर घबरा गई।

     

    अब उसे पूरा यकीन हो गया था कि गांव में चोरी कोयल नहीं, बल्कि ये लोग कर रहे हैं।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर एक अजीब चीज पर पड़ी।

     

    उनके पास एक छोटा-सा पिंजरा रखा था।

     

    पिंजरे के अंदर वही कोयल बैठी थी।

     

    गौरी समझ गई कि असली रहस्य क्या है।

     

    चोरों ने उस कोयल को पकड़ रखा था और उसकी मधुर आवाज का इस्तेमाल पूरे गांव को सुलाने के लिए कर रहे थे।

     

    गौरी चुपचाप वापस गांव की तरफ भागी।

     

    लेकिन रास्ते में उसका पैर पत्थर से टकरा गया।

     

    आवाज सुनकर चोरों ने पीछे देखा।

     

    “कौन है?”

     

    गौरी डरकर भागी।

     

    चोर उसके पीछे दौड़े।

     

    गौरी सीधे गांव के चौकीदार के घर पहुंची और जोर-जोर से दरवाजा पीटने लगी।

     

    “काका! जल्दी उठो!”

     

    चौकीदार ने दरवाजा खोला।

     

    गौरी ने सारी बात बता दी।

     

    कुछ ही देर में गांव के कई लोग इकट्ठे हो गए।

     

    सबने मिलकर खंडहर को घेर लिया।

     

    चोरों को भागने का मौका नहीं मिला।

     

    उनके पास गांव से चोरी किया हुआ सारा सामान भी बरामद हो गया।

     

    मुखिया ने पूछा—

     

    “इस कोयल को कहां से पकड़ा?”

     

    चोरों के सरदार ने सिर झुका लिया।

     

    “हमें जंगल में मिली थी। इसकी आवाज सुनकर हमें समझ आया कि इसके गाने से लोग तुरंत सो जाते हैं। फिर हमने इसे पकड़ लिया और गांव में चोरी करने लगे।”

     

    गांव वालों ने कोयल को आजाद कर दिया।

     

    वह उड़कर बरगद की सबसे ऊंची डाल पर जाकर बैठ गई।

     

    गौरी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब ये किसी को नहीं सुलाएगी।”

     

    लेकिन उसी समय कोयल ने गाना शुरू कर दिया।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    गांव वाले एक-दूसरे को देखकर हंसने लगे।

     

    इस बार किसी को नींद नहीं आई।

     

    क्योंकि अब उन्हें पता था कि उसकी आवाज में कोई जादू नहीं था।

     

    असल में चोरों ने गांव में ऐसी चीज मिला दी थी जिसकी खुशबू से लोगों को बहुत गहरी नींद आती थी।

     

    कोयल सिर्फ उनकी योजना का एक हिस्सा बन गई थी।

     

    उस दिन के बाद गांव वालों ने उस कोयल को अपने गांव की रक्षा करने वाली मान लिया।

     

    हर शाम वह बरगद पर बैठकर गाती।

     

    • बच्चे उसकी आवाज सुनकर खुश होते और बुजुर्ग कहते

    “देखो, हमारी मीठी आवाज वाली मेहमान आ गई।”

     

    गौरी रोज उसे दाना डालती।

     

    और कोयल भी जैसे गौरी को पहचानने लगी थी।

    लेकिन कई साल बाद भी सुरमई गांव में एक बात मशहूर रही

    “जिस रात कोयल ने पहली बार गाया था, पूरा गांव सो गया था… और जिस सुबह आंखें खुलीं, तब गांव वालों को समझ आया कि सबसे मीठी आवाज के पीछे छिपा सच कितना बड़ा हो सकता है।”

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    Auther preeti Sharma

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  • देश में मिला सच्चा प्यार

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जापानी लड़का जिसे भारत में सच्चा प्यार मिला

     

    हिरोतो जापान के टोक्यो शहर में रहता था। उम्र करीब तेईस साल थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे एक भारतीय कंपनी में छह महीने के प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका मिला। उसके परिवार ने उसे भारत जाने की खबर सुनकर बहुत सारी हिदायतें दीं।

     

    “खाने का ध्यान रखना।”

     

    “भीड़ में संभलकर रहना।”

     

    “और सबसे जरूरी… अपना काम पूरा करके जल्दी वापस आ जाना।”

     

    हिरोतो बस मुस्कुरा देता।

     

    उसे भारत के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। उसने फिल्मों और इंटरनेट पर भारत की कुछ तस्वीरें जरूर देखी थीं, लेकिन असली भारत कैसा है, यह उसे नहीं पता था।

     

    भारत पहुंचते ही उसे हर चीज नई लगी। अलग भाषा, अलग खाना, सड़क की भीड़, रंग-बिरंगे कपड़े और लोगों का एक-दूसरे से बेझिझक बात करना।

     

    शुरुआत में वह थोड़ा परेशान रहा।

     

    एक दिन ऑफिस जाते समय अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। हिरोतो सड़क किनारे खड़ा बारिश रुकने का इंतजार करने लगा।

     

    तभी उसके पास एक लड़की छाता लेकर आई।

     

    “आप जापान से हैं ना?”

     

    हिरोतो ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “हां… लेकिन आपको कैसे पता?”

     

    लड़की हंस पड़ी।

     

    “आपके ऑफिस का कार्ड उल्टा लगा हुआ है।”

     

    हिरोतो ने अपना कार्ड देखा और झेंप गया।

     

    “ओह… धन्यवाद।”

     

    लड़की का नाम अनाया था।

     

    वह पास के कॉलेज में पढ़ती थी और उसी रास्ते से रोज आती-जाती थी।

     

    अनाया ने अपना छाता थोड़ा उसकी तरफ करते हुए कहा, “बारिश में ऐसे खड़े रहेंगे तो पूरी तरह भीग जाएंगे।”

     

    हिरोतो ने कहा, “लेकिन आपका छाता छोटा है।”

     

    “तो क्या हुआ? थोड़ा आप भीगिए, थोड़ा मैं।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    वह उनकी पहली मुलाकात थी।

     

    इसके बाद वे अक्सर रास्ते में मिल जाते।

     

    कभी अनाया उससे हिंदी के शब्द सिखाती तो कभी हिरोतो उसे जापानी शब्द बताता।

     

    एक दिन अनाया ने पूछा, “तुम्हें भारत कैसा लग रहा है?”

     

    हिरोतो ने थोड़ी देर सोचकर कहा, “भारत… बहुत शोर वाला है।”

     

    अनाया ने आंखें बड़ी कर लीं।

     

    “बस?”

    हिरोतो मुस्कुराया।

    “और बहुत दिल वाला भी।”

    अनाया चुप हो गई।

    धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती गहरी होने लगी।

     

    हिरोतो को पहली बार महसूस हुआ कि वह भारत में अकेला नहीं है।

     

    जब उसे भारतीय खाना समझ नहीं आता, अनाया उसे बताती कि क्या खाना है। जब वह हिंदी बोलते हुए गलती करता, अनाया हंसती जरूर, लेकिन फिर सही शब्द भी सिखाती।

     

    एक दिन हिरोतो ने अनाया से कहा

    “मेरे जापान में बहुत दोस्त थे, लेकिन उनसे बात करते समय मुझे हमेशा लगता था कि मुझे खुद को सही साबित करना है।”

     

    अनाया ने पूछा, “और मेरे साथ?”

     

    “तुम्हारे साथ मुझे कुछ साबित नहीं करना पड़ता।”

     

    अनाया के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    कुछ महीनों में हिरोतो को एहसास हो गया कि अनाया उसके लिए सिर्फ दोस्त नहीं रही।

    लेकिन वह अपनी भावनाएं कहने से डरता था।

    उसे पता था कि उसका प्रोजेक्ट खत्म होने वाला है।

    आखिर वह दिन भी आ गया।

     

    हिरोतो को जापान लौटना था।

    उसने अपना सामान पैक कर लिया।

     

    आखिरी शाम वह उसी जगह गया जहां उसकी और अनाया की पहली मुलाकात हुई थी।

     

    बारिश फिर हो रही थी।

    कुछ देर बाद अनाया वहां आई।

    उसने हिरोतो को देखकर पूछा“तो… कल जा रहे हो?”

    हिरोतो ने सिर हिला दिया।

    “हां।”

    दोनों कुछ देर चुप रहे।

    फिर अनाया ने पूछा

    “तुम वापस आओगे?”

    हिरोतो ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर मैं कहूं कि तुम्हारी वजह से आना चाहता हूं?”

     

    अनाया की आंखों में नमी आ गई।

    “तो मैं कहूंगी… देर मत करना।”

    हिरोतो जापान चला गया

    लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी भारत उसके मन से नहीं निकला।

     

    वह अपने काम में व्यस्त रहता, लेकिन हर शाम अनाया से बात करता।

     

    दोनों के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी थी, मगर बातचीत में वह दूरी कभी महसूस नहीं होती थी।

     

    एक दिन हिरोतो के पिता ने पूछा

    “तुम भारत को इतना याद क्यों करते हो?”

    हिरोतो ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा

    “क्योंकि वहां मुझे एक ऐसा इंसान मिला, जिसके सामने मैं खुद को छिपाना नहीं चाहता।”

    पिता ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा

    “क्या तुम उससे प्यार करते हो?”

    हिरोतो ने पहली बार बिना झिझक जवाब दिया

    “हां।”

    कुछ महीनों बाद हिरोतो वापस भारत आया।

    इस बार छह महीने के प्रोजेक्ट के लिए नहीं।

    वह हमेशा के लिए यहां काम करने आया था।

    अनाया को इस बारे में कुछ पता नहीं था।

     

    एक शाम वह उसी पुराने रास्ते पर जा रही थी, जहां पहली बार दोनों मिले थे।

    अचानक पीछे से आवाज आई

    “बारिश में ऐसे अकेले चलोगी तो पूरी तरह भीग जाओगी।”

    अनाया ने पलटकर देखा।सामने हिरोतो खड़ा था।

    उसके हाथ में वही छोटा-सा छाता था।

    अनाया कुछ बोल नहीं पाई।

    “तुम… वापस आ गए?”

    हिरोतो मुस्कुराया।

    “मैंने कहा था ना… अगर भारत में मेरा कोई इंतजार कर रहा होगा, तो मैं जरूर लौटूंगा।”

     

    अनाया की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

    “और अगर मैं इंतजार नहीं करती?”

    हिरोतो ने मुस्कुराकर कहा“तो मैं तुम्हें ढूंढता।”

    अनाया हंस पड़ी।

    बारिश तेज हो गई।

    हिरोतो ने छाता उसकी तरफ बढ़ाया।

    “अबकी बार पूरा छाता तुम्हारा।”

    अनाया ने कहा“नहीं, आधा-आधा।”

    दोनों एक ही छाते के नीचे आगे बढ़ने लगे।

     

    हिरोतो को उस दिन समझ आया कि सच्चा प्यार हमेशा एक जैसी भाषा बोलने वालों के बीच नहीं मिलता।

     

    कभी-कभी दो लोग अलग देश, अलग संस्कृति और अलग भाषा से होते हैं…

     

    फिर भी उनके दिल एक-दूसरे को बिना किसी अनुवाद के समझ लेते हैं।

    और हिरोतो के लिए भारत अब सिर्फ एक देश नहीं था।

     

    यह वही जगह थी जहां उसे अपना घर नहीं मिला था…

     

    बल्कि अपना इंसान मिल गया था।

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    Auther preeti Sharma

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  • अंधेरी नगरी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    अंधेरी नगरी और कातिल निगाहें

     

    शहर का नाम था काली नगरी।

     

    दिन में यह शहर बाकी शहरों जैसा ही दिखाई देता था। बाजारों में भीड़ रहती, दुकानें खुलतीं और लोग अपने काम में व्यस्त रहते। लेकिन जैसे ही सूरज डूबता, पूरा शहर बदल जाता।

     

    सड़कें सुनसान हो जातीं। घरों के दरवाजे बंद हो जाते और लोग खिड़कियों पर भी पर्दे डाल देते।

     

    क्योंकि इस शहर में एक अजीब डर था।

     

    लोग कहते थे कि रात में गलियों में एक जोड़ी कातिल निगाहें घूमती हैं।

     

    जिसकी नजर उन आंखों से मिल जाती, उसके बाद वह इंसान हमेशा के लिए गायब हो जाता।

     

    पुलिस ने कई बार तलाश की, लेकिन हर बार कोई सुराग नहीं मिला।

     

    इसी शहर में आरव नाम का एक लड़का रहता था। वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक रात उसका दोस्त निखिल उसके घर आया।

     

    “आरव, आज मेरे घर चलना मत। देर हो गई है।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “तुम भी इन अफवाहों पर विश्वास करने लगे?”

     

    निखिल ने गंभीर होकर कहा, “अफवाह होती तो अब तक इतने लोग गायब क्यों होते?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी रात उसे अपनी दादी की दवा लेने बाजार जाना पड़ा।

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे।

     

    जैसे ही आरव पुरानी गली में पहुंचा, उसे लगा कोई उसके पीछे चल रहा है।

     

    वह रुका।

     

    पीछे देखा।

     

    गली खाली थी।

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    कुछ कदम बाद उसे एक खिड़की में दो चमकती आंखें दिखाई दीं।

     

    आरव ठिठक गया।

     

    आंखें बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    वह कुछ समझ पाता, उससे पहले खिड़की बंद हो गई।

     

    आरव तेजी से आगे बढ़ा।

     

    तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज आई—

     

    “रुको!”

     

    आरव पलटा।

     

    एक लड़की काले दुपट्टे में उसके सामने खड़ी थी।

     

    “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

     

    आरव ने कहा, “दवा लेने जा रहा हूं।”

     

    लड़की ने घबराकर उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी बात ध्यान से सुनो। आगे मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहां से कोई वापस नहीं आता।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की कुछ पल चुप रही।

     

    “मेरा नाम तारा है।”

     

    तभी दूर से किसी दरवाजे के बंद होने की आवाज आई।

     

    तारा घबरा गई।

     

    “चलो!”

     

    दोनों पास की एक पुरानी हवेली में छिप गए।

     

    आरव ने पूछा, “तुम्हें उन आंखों के बारे में क्या पता है?”

     

    तारा ने धीमी आवाज में कहा, “बहुत कुछ।”

     

    “तो बताओ।”

     

    “ये आंखें किसी भूत की नहीं हैं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    तारा ने कहा, “इस शहर में पिछले पांच सालों से लोग गायब हो रहे हैं। सबको लगता है कि कोई अदृश्य ताकत उन्हें उठा ले जाती है। लेकिन असली सच इंसानों से भी ज्यादा डरावना है।”

     

    “कौन है इसके पीछे?”

     

    तारा ने हवेली की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    वहां पुराने शहर का नक्शा बना था।

     

    “इन सभी गायब हुए लोगों के घर एक ही रास्ते के आसपास थे।”

     

    आरव ने नक्शा देखा।

     

    “तो?”

     

    “ये रास्ता सीधे शहर के पुराने महल तक जाता है।”

     

    आरव ने पूछा, “पुराना महल तो बीस साल से बंद है।”

     

    “हां।”

     

    “फिर वहां कौन रहता है?”

     

    तारा ने कहा, “यही पता लगाने मैं यहां आई हूं।”

     

    दोनों उसी रात महल की ओर निकल पड़े।

     

    महल का बड़ा दरवाजा आधा खुला था।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    तारा ने आरव का हाथ पकड़कर कहा, “सावधान रहना।”

     

    वे धीरे-धीरे अंदर बढ़े।

     

    अचानक सामने दीवार पर दो चमकती आंखें दिखाई दीं।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तारा ने फुसफुसाकर कहा, “यही हैं… कातिल निगाहें।”

     

    लेकिन तभी उन आंखों के नीचे एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    वह एक बूढ़ा आदमी था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम दोनों यहां क्यों आए हो?”

     

    आरव ने पूछा, “लोग कहां गायब हो रहे हैं?”

     

    बूढ़ा कुछ देर उन्हें देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “क्योंकि इस शहर का असली मालिक कोई इंसान नहीं… उसका लालच है।”

     

    बूढ़े ने उन्हें एक तहखाने में ले जाकर दिखाया कि वहां पुराने कागज और जमीन के दस्तावेज रखे थे।

     

    असल में शहर के कुछ बड़े लोग गरीब लोगों की जमीन हड़पना चाहते थे। जो भी उनके खिलाफ आवाज उठाता, उसे डराकर शहर से गायब कर दिया जाता।

     

    और कातिल निगाहें कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं थीं।

     

    वे एक गुप्त सुरंग में लगाए गए चमकीले शीशों और रोशनी का हिस्सा थीं, जिनसे लोगों को दूर से ऐसा लगता था जैसे अंधेरे में कोई डरावनी आंखें उन्हें देख रही हों।

     

    लेकिन एक सवाल बाकी था।

     

    “लोगों को गायब कौन करता है?” आरव ने पूछा।

     

    बूढ़े ने जवाब दिया—

     

    “शहर का सबसे बड़ा व्यापारी… रुद्रसेन।”

     

    तारा ने तुरंत कहा, “लेकिन वह तो लोगों की मदद करने के लिए मशहूर है।”

     

    बूढ़ा हंस पड़ा।

     

    “सबसे खतरनाक चेहरा वही होता है जो हमेशा नेक दिखाई दे।”

     

    अचानक पीछे से आवाज आई—

     

    “बहुत बातें हो गईं।”

     

    तीनों पलटे।

     

    दरवाजे पर रुद्रसेन खड़ा था।

     

    उसके साथ कई आदमी थे।

     

    रुद्रसेन ने कहा, “तुम दोनों को यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा, “लोगों को क्यों गायब किया?”

     

    रुद्रसेन ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि डर सबसे सस्ता हथियार है।”

     

    लेकिन उसे पता नहीं था कि तारा पहले ही सारे दस्तावेजों की तस्वीरें अपने फोन में ले चुकी थी।

     

    उसने मौका मिलते ही वे तस्वीरें पुलिस को भेज दीं।

     

    कुछ ही देर में महल को पुलिस ने घेर लिया।

     

    रुद्रसेन पकड़ा गया।

     

    उसके साथ कई और लोगों के नाम सामने आए।

     

    अगली सुबह पहली बार काली नगरी के लोगों ने बिना डर के अपने घरों के दरवाजे खोले।

    रात हुई।

    लेकिन इस बार किसी खिड़की में चमकती आंखें नहीं थीं।

    आरव उसी पुरानी गली से गुजर रहा था।तारा उसके साथ थी।

    आरव ने मुस्कुराकर कहा

    “तो खत्म हुआ कातिल निगाहों का डर।”

     

    तारा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा

    “डर कभी खत्म नहीं होता आरव… बस उसका सच सामने आ जाता है।”

     

    दोनों आगे बढ़ गए।

     

    लेकिन शहर के सबसे पुराने मकान की बंद खिड़की के पीछे…

     

    अचानक दो चमकती आंखें फिर दिखाई दीं।

     

    कुछ सेकंड बाद खिड़की अपने आप बंद हो गई।

     

    और अंधेरे में किसी की धीमी आवाज सुनाई दी

    “कहानी खत्म नहीं हुई…”

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  • श्मशान की राख

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    श्मशान की राख

     

    रात के करीब बारह बजे थे। आसमान पर बादल छाए हुए थे और पूरे गांव में अजीब-सी खामोशी पसरी थी। गांव से थोड़ा दूर नदी के किनारे एक पुराना श्मशान घाट था, जहां रात में जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था।

     

    लोग कहते थे कि वहां जलती चिताओं की राख में कुछ ऐसा था, जो मुर्दों की अधूरी इच्छाओं को अपने अंदर समेट लेता था। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि अमावस्या की रात उस राख से किसी का नाम पुकारा जाता था।

     

    गांव का बीस साल का लड़का मोहन इन बातों को सिर्फ अंधविश्वास मानता था।

     

    उस रात उसके पिता अचानक बहुत बीमार पड़ गए। गांव में दवा नहीं मिली, इसलिए वैद्य के घर से जरूरी जड़ी-बूटी लेने मोहन को नदी के उस पार जाना पड़ा।

     

    वापसी में उसे श्मशान के पास से होकर गुजरना था।

     

    जैसे ही वह श्मशान के सामने पहुंचा, उसे पीछे से किसी बूढ़े आदमी की आवाज सुनाई दी।

     

    “मोहन…”

     

    मोहन के कदम वहीं रुक गए।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    उसने खुद को समझाया, “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    वह आगे बढ़ने लगा।

     

    फिर आवाज आई।

     

    “मोहन… वापस मत जाना…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    मोहन ने डरते हुए श्मशान की तरफ देखा। वहां एक पुरानी चिता की राख हल्की-हल्की उड़ रही थी, जबकि हवा बिल्कुल बंद थी।

     

    फिर राख के बीच उसे कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया।

     

    मोहन धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    वह एक छोटी-सी चांदी की अंगूठी थी।

     

    जैसे ही उसने अंगूठी उठाई, अचानक श्मशान की सारी बुझी चिताओं से राख हवा में उठने लगी।

     

    मोहन घबराकर पीछे हट गया।

     

    राख हवा में घूमते-घूमते एक इंसान जैसी आकृति बनाने लगी।

     

    आकृति ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “मेरी बात गांव तक पहुंचा दो…”

     

    मोहन का शरीर डर से कांपने लगा।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    आकृति ने जवाब दिया—

     

    “जिसे इस श्मशान ने बीस साल से अपने अंदर छिपा रखा है।”

     

    अचानक राख जमीन पर गिर गई और सब कुछ शांत हो गया।

     

    मोहन अंगूठी लेकर भागता हुआ घर पहुंचा।

     

    अगली सुबह उसने गांव के सबसे बूढ़े आदमी हरिदास से सारी बात बताई।

     

    हरिदास का चेहरा सुनते ही सफेद पड़ गया।

     

    “तुमने अंगूठी कहां से पाई?”

     

    मोहन ने अंगूठी दिखा दी।

     

    हरिदास की आंखों में डर उतर आया।

     

    “ये अंगूठी रघुवीर की है।”

     

    “कौन रघुवीर?”

     

    हरिदास कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “बीस साल पहले गांव में एक आदमी रहता था। उसका नाम रघुवीर था। वह बहुत ईमानदार था। एक रात अचानक उसकी मौत हो गई और उसका अंतिम संस्कार इसी श्मशान में किया गया।”

     

    “तो इसमें डरने वाली क्या बात है?”

     

    हरिदास ने धीमे से कहा, “उसकी मौत स्वाभाविक नहीं थी।”

     

    मोहन चौंक गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    हरिदास ने चारों तरफ देखा और धीरे से कहा—

     

    “रघुवीर ने मरने से कुछ दिन पहले गांव के मुखिया के खिलाफ आवाज उठाई थी। उसे पता चला था कि गांव की जमीनों के कागजों में धोखा किया जा रहा है। उसने सबूत इकट्ठे कर लिए थे।”

     

    “फिर?”

     

    “उसके मरने के बाद सारे सबूत गायब हो गए।”

     

    मोहन को पिछली रात की आवाज याद आ गई।

     

    “क्या रघुवीर की आत्मा अभी भी यहीं है?”

     

    हरिदास ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी रात मोहन फिर श्मशान पहुंचा।

     

    इस बार उसके हाथ में वही चांदी की अंगूठी थी।

     

    जैसे ही उसने अंगूठी राख के पास रखी, अचानक जमीन के नीचे से हल्की आवाज आई।

     

    “पीपल के पेड़ के नीचे…”

     

    मोहन ने सामने पुराने पीपल के पेड़ को देखा।

     

    वहां जमीन थोड़ी उभरी हुई थी।

     

    मोहन ने हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की। कुछ देर बाद उसकी उंगलियां एक लोहे के डिब्बे से टकराईं।

     

    डिब्बे के अंदर पुराने कागज थे।

     

    लेकिन उनमें एक कागज ऐसा था जिसने मोहन के होश उड़ा दिए।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर मेरे साथ कुछ होता है, तो समझ लेना मेरी मौत के पीछे गांव का मुखिया देवकरण है।”

     

    मोहन अगले दिन यह कागज लेकर गांव के लोगों के सामने पहुंचा।

     

    देवकरण ने कागज देखते ही उसे छीनने की कोशिश की।

     

    लेकिन तभी हरिदास आगे आ गए।

     

    “अब बहुत हो चुका।”

     

    देवकरण घबरा गया।

     

    हरिदास ने सबके सामने बताया कि बीस साल पहले रघुवीर ने उसकी जमीन की चोरी का सच पकड़ लिया था। देवकरण ने अपने लोगों की मदद से उसे रास्ते से हटाया और उसकी मौत को हादसा बताया था।

     

    गांव में हड़कंप मच गया।

     

    देवकरण से सवाल होने लगे।

     

    आखिरकार पुराने डर के कारण चुप रहे कुछ लोग भी सच बोलने लगे।

     

    देवकरण का राज खुल गया।

     

    उस रात मोहन फिर श्मशान गया।

     

    आसमान साफ था।

     

    उसने रघुवीर की अंगूठी चिता की राख के पास रख दी।

     

    कुछ पल तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर हल्की हवा चली।

     

    राख धीरे-धीरे उठी और उसके सामने वही धुंधली आकृति दिखाई दी।

     

    इस बार उसकी आवाज में डर नहीं था।

     

    “सच सामने आ गया… अब मुझे जाने दो।”

     

    मोहन ने सिर झुका दिया।

     

    “तुम्हारा सच गांव तक पहुंच गया है।”

     

    आकृति कुछ पल शांत रही।

     

    फिर हवा में बिखरने लगी।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने मोहन से कहा—

     

    “याद रखना… राख कभी झूठ नहीं बोलती। उसमें आग से ज्यादा यादें रहती हैं।”

     

    अगली सुबह श्मशान की सारी राख नदी में बहा दी गई।

     

    उस दिन के बाद गांव में कभी किसी ने रघुवीर की आवाज नहीं सुनी।

     

    लेकिन श्मशान के पास वह पुराना पीपल का पेड़ आज भी खड़ा है।

     

    लोग कहते हैं, अमावस्या की रात अगर कोई वहां से गुजरता है, तो हवा में राख उड़ती हुई दिखाई देती है।

     

    डरने की जरूरत नहीं।

     

    क्योंकि अब उस राख में कोई अधूरी आत्मा नहीं रहती।

     

    बस एक पुरानी कहानी रहती है—

     

    एक ऐसे इंसान की, जिसकी मौत को छिपाया जा सकता था, लेकिन उसकी राख में दबा सच कभी नहीं।

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