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मुझे शादी नहीं करनी

पढ़ने का समय : 6 मिनट

पापा, मुझे शादी नहीं करनी

 

“पापा, पर मुझे शादी नहीं करनी! आप समझते क्यों नहीं?”

 

पल्लवी की आवाज पूरे घर में गूंज गई। उसकी आंखों में आंसू थे और चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था।

 

सामने उसके पिता महेश चुपचाप बैठे थे। उनके हाथ में पल्लवी की शादी का कार्ड था, जिसे वह बार-बार देख रहे थे।

 

“पल्लवी, बेटा… इतनी जोर से मत बोलो। पड़ोसी क्या सोचेंगे?”

 

“मुझे किसी पड़ोसी की परवाह नहीं है!”

 

पल्लवी ने कार्ड उठाकर मेज पर रख दिया।

 

“मुझे शादी नहीं करनी। बस! आप लोग मेरी बात क्यों नहीं समझ रहे?”

 

उसकी मां सुशीला रोते हुए बोलीं, “बेटी, हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। तुम्हारी भलाई के लिए ही तो सोच रहे हैं।”

 

“अगर मेरी भलाई चाहते हैं तो मेरी बात सुनिए!”

 

घर में अचानक सन्नाटा छा गया।

 

पल्लवी की शादी अगले महीने कुणाल नाम के लड़के से तय हुई थी। कुणाल अच्छे परिवार से था, नौकरी करता था और परिवार के सभी लोगों को वह बहुत पसंद था।

 

लेकिन पल्लवी उसे शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी।

 

महेश ने धीरे से कहा, “कुणाल में ऐसी क्या कमी है?”

 

“कमी कुणाल में नहीं है, पापा।”

 

“तो फिर?”

 

पल्लवी कुछ पल चुप रही।

 

“कमी इस रिश्ते में नहीं… मेरे अंदर है।”

 

महेश ने हैरानी से उसे देखा।

 

“क्या मतलब?”

 

पल्लवी ने नजरें झुका लीं।

 

“मैं अभी शादी के लिए तैयार नहीं हूं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मैं अपनी जिंदगी का फैसला खुद करना चाहती हूं।”

 

महेश ने गहरी सांस ली।

 

“तुम्हें पढ़ने से किसने रोका? तुम्हें नौकरी करने से किसने रोका? हमने हमेशा तुम्हारा साथ दिया है।”

 

“तो शादी के मामले में मेरी इच्छा क्यों नहीं पूछी?”

 

यह सवाल सुनकर महेश चुप हो गए।

 

पल्लवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“आपने लड़का देखा, परिवार देखा, नौकरी देखी… लेकिन मुझसे यह नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूं।”

 

सुशीला उसके पास आईं।

 

“बेटी, हमने तुमसे पूछा था।”

 

पल्लवी ने सिर हिलाया।

 

“नहीं मां। आपने पूछा था कि लड़का कैसा है। आपने ये नहीं पूछा कि मैं शादी के लिए तैयार हूं या नहीं।”

 

महेश को अपनी गलती महसूस होने लगी।

 

लेकिन समाज का डर उनके मन में था।

 

उन्होंने कहा, “रिश्ता बहुत अच्छा है। हमने हां कर दी है। अब पीछे हटना अच्छा नहीं लगेगा।”

 

पल्लवी ने गुस्से में कहा—

 

“तो मेरी जिंदगी से ज्यादा जरूरी लोगों की बातें हैं?”

 

महेश ने कुछ नहीं कहा।

 

पल्लवी अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया।

 

वह बिस्तर पर बैठकर रोने लगी।

 

कुछ देर बाद उसकी मां कमरे में आईं।

 

“पल्लवी…”

 

“मां, मुझे अकेला छोड़ दो।”

 

“मैं जानती हूं तुम परेशान हो।”

 

पल्लवी ने आंसू पोंछे।

 

“मां, मैं शादी के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन मैं सिर्फ इसलिए शादी नहीं करना चाहती क्योंकि उम्र हो गई है।”

 

सुशीला उसके पास बैठ गईं।

 

“क्या कोई और बात है?”

 

पल्लवी कुछ देर चुप रही।

 

फिर उसने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।

 

“मां, मैं अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हूं। मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं। मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि इतनी जल्दी मेरी शादी कर दी जाएगी।”

 

सुशीला की आंखें भी भर आईं।

 

“तुमने हमें पहले क्यों नहीं बताया?”

 

“मैंने कई बार कोशिश की थी। लेकिन हर बार आपने कहा कि अच्छा रिश्ता बार-बार नहीं मिलता।”

 

सुशीला के पास कोई जवाब नहीं था।

 

अगले दिन महेश ने पल्लवी से बात करने का फैसला किया।

 

उन्होंने उसके कमरे में जाकर कहा—

 

“बेटा, बैठो। आज मैं तुम्हारी बात सुनने आया हूं। बिना कोई फैसला सुनाए।”

 

पल्लवी ने पहली बार अपने पिता की तरफ उम्मीद से देखा।

 

महेश ने कहा—

 

“मुझे बताओ, तुम असल में चाहती क्या हो?”

 

पल्लवी ने धीरे से कहा—

 

“मैं आगे पढ़ना चाहती हूं। फिर नौकरी करना चाहती हूं। और जब मुझे लगेगा कि मैं शादी के लिए तैयार हूं, तब शादी करूंगी।”

 

महेश ने पूछा—

 

“और अगर तब तक कुणाल जैसा रिश्ता नहीं मिला तो?”

 

पल्लवी मुस्कुराई।

 

“तो नहीं मिलेगा। शादी जिंदगी भर का रिश्ता है, पापा। सिर्फ इसलिए नहीं होनी चाहिए कि अभी अच्छा रिश्ता मिल गया है।”

 

महेश की आंखों में आंसू आ गए।

 

उन्हें अचानक अपना बचपन याद आया।

 

जब वह खुद अपनी पसंद की पढ़ाई करना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने कहा था कि परिवार की जिम्मेदारी पहले है।

 

उन्होंने हमेशा उस बात का दुख अपने अंदर रखा था।

 

और आज वह अनजाने में अपनी बेटी के साथ वही करने जा रहे थे।

 

महेश ने पल्लवी का हाथ पकड़ लिया।

 

“मुझे माफ कर दो।”

 

पल्लवी चौंक गई।

 

“पापा…”

 

“मैंने सोचा कि मैं तुम्हारे लिए अच्छा कर रहा हूं। लेकिन मैंने तुम्हारी खुशी पूछना ही भूल गया।”

 

पल्लवी रोते हुए अपने पिता से लिपट गई।

 

“मुझे आपसे लड़ना नहीं था पापा। मैं बस चाहती थी कि आप मेरी बात सुनें।”

 

महेश ने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“अब तुम्हारी शादी तब होगी जब तुम खुद तैयार होगी।”

 

अगले दिन महेश ने कुणाल के परिवार को बुलाया।

 

घर में सभी थोड़े परेशान थे।

 

कुणाल भी चुप बैठा था।

 

महेश ने कहा—

 

“हमें यह रिश्ता रोकना होगा।”

 

कुणाल के पिता नाराज हुए।

 

“लेकिन अचानक ऐसा क्यों?”

 

महेश ने साफ कहा—

 

“क्योंकि मेरी बेटी शादी के लिए तैयार नहीं है।”

 

कुछ देर चुप्पी रही।

 

तभी कुणाल ने पहली बार बात की।

 

“अंकल, मैं पल्लवी से एक बात कहना चाहता हूं।”

 

पल्लवी सामने आई।

 

कुणाल ने कहा—

 

“मुझे खुशी है कि तुमने अपनी बात साफ-साफ कही।”

 

पल्लवी ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

 

कुणाल मुस्कुराया।

 

“मैं भी शादी जल्दी नहीं करना चाहता था। लेकिन परिवार के सामने बोल नहीं पाया।”

 

महेश ने उसे देखा।

 

“तो तुम भी तैयार नहीं थे?”

 

कुणाल ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

उसके पिता नाराज होकर बोले—

 

“तुमने हमें बताया क्यों नहीं?”

 

कुणाल ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

 

“शायद मुझे भी पल्लवी की तरह अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं थी।”

 

घर का माहौल अचानक बदल गया।

 

दो परिवारों के बीच तनाव की जगह समझदारी ने ले ली।

 

पल्लवी ने कुणाल से कहा—

 

“शायद हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं।”

 

कुणाल ने कहा—

 

“शायद। और अगर कभी शादी का फैसला हुआ भी, तो हमारी मर्जी से होगा।”

 

कुछ महीनों बाद पल्लवी ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर दी।

 

महेश अब हर फैसला लेने से पहले उससे पूछते।

 

एक दिन पल्लवी कॉलेज से घर लौटी तो उसने देखा कि उसके पिता उसके लिए मिठाई लेकर बैठे हैं।

 

“क्या हुआ पापा?”

 

महेश मुस्कुराए।

 

“तुम्हारा कॉलेज में स्कॉलरशिप के लिए चयन हो गया।”

 

पल्लवी खुशी से अपने पिता से लिपट गई।

 

“पापा!”

 

महेश ने कहा—

 

“मुझे तुम पर गर्व है।”

 

पल्लवी की आंखों में आंसू आ गए।

 

“आपको बुरा नहीं लगता कि मैं अभी शादी नहीं कर रही?”

 

महेश ने हंसकर कहा—

 

“पहले मुझे लगता था कि बेटी की शादी कर देना मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।”

 

फिर उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“अब समझ आया है कि बेटी को अपनी जिंदगी का फैसला लेने लायक बनाना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।”

 

पल्लवी मुस्कुराई।

 

उस दिन उसे लगा कि उसने शादी से इनकार करके अपने पिता को नहीं खोया।

 

बल्कि पहली बार उसने अपने पिता को अपने साथ खड़ा पाया था।

 

और महेश ने भी सीख लिया था—

 

बेटी की जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला उसकी शादी नहीं, उसकी खुशी होती है।

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