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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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  • सुनसान रास्ते पर सोम्या

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    सुनसान रास्ते पर सोम्या

     

    शाम ढल चुकी थी। आसमान पर बादल थे और सड़क के दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ खड़े थे। दूर तक कोई घर दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    सोम्या अकेली उस सुनसान रास्ते पर चली जा रही थी।

     

    उसकी उम्र करीब बीस साल थी। वह शहर से अपने गांव जा रही थी, लेकिन बस उसे मुख्य सड़क से कुछ दूर छोड़कर चली गई थी। गांव तक पहुंचने के लिए उसे करीब तीन किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करना था।

     

    सोम्या ने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क नहीं था।

     

    “बस थोड़ा रास्ता और है,” उसने खुद से कहा।

     

    उसने बैग कंधे पर ठीक किया और आगे बढ़ने लगी।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसे लगा कि कोई उसके पीछे चल रहा है।

     

    उसने कदम धीमे कर दिए।

     

    पीछे से भी कदमों की आवाज धीमी हो गई।

     

    सोम्या ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।

     

    सड़क खाली थी।

     

    सिर्फ हवा से पेड़ों की पत्तियां हिल रही थीं।

     

    उसने खुद को समझाया—

     

    “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    वह फिर आगे बढ़ गई।

     

    कुछ कदम बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    जैसे कोई उसके पीछे धीरे-धीरे चल रहा हो।

     

    सोम्या ने इस बार बिना पीछे देखे तेज कदम बढ़ा दिए।

     

    आवाज भी तेज हो गई।

     

    अब उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    तभी सड़क के किनारे उसे एक पुराना पत्थर दिखाई दिया। उस पर गांव का नाम लिखा था।

     

    “बस दो किलोमीटर…”

     

    सोम्या ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन तभी सामने उसे एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    वह सड़क के किनारे खड़ा था।

     

    सोम्या कुछ पल के लिए रुक गई।

     

    बूढ़े ने पूछा—

     

    “बेटी, कहां जा रही हो?”

     

    “गांव जा रही हूं।”

     

    “इस रास्ते से?”

     

    “जी।”

     

    बूढ़े ने चिंता से कहा—

     

    “अंधेरा होने से पहले पहुंच जाओ।”

     

    सोम्या ने पूछा—

     

    “क्या इस रास्ते पर कोई परेशानी है?”

     

    बूढ़े ने कुछ पल उसकी तरफ देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “परेशानी रास्ते में नहीं है।”

     

    सोम्या ने हैरानी से पूछा—

     

    “फिर?”

     

    बूढ़ा कुछ बोलता, उससे पहले दूर से किसी गाड़ी की रोशनी दिखाई दी।

     

    बूढ़ा तुरंत सड़क से हट गया।

     

    गाड़ी पास आई और बिना रुके आगे निकल गई।

     

    सोम्या ने राहत की सांस ली।

     

    जब उसने पीछे मुड़कर बूढ़े को देखना चाहा तो वहां कोई नहीं था।

     

    वह चौंक गई।

     

    “अभी तो यहीं थे…”

     

    उसने आसपास देखा।

     

    कोई दिखाई नहीं दिया।

     

    अब सोम्या के मन में डर बैठ चुका था।

     

    वह तेजी से आगे बढ़ने लगी।

     

    कुछ दूर जाकर उसे एक छोटा-सा पुराना मंदिर दिखाई दिया।

     

    मंदिर के बाहर एक लालटेन जल रही थी।

     

    सोम्या अंदर चली गई।

     

    वहां एक बुजुर्ग महिला बैठी थी।

     

    महिला ने उसे देखते ही कहा—

     

    “तुम देर से निकली हो।”

     

    सोम्या ने हैरानी से पूछा—

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “इस रास्ते से गुजरने वाले हर इंसान के चेहरे पर डर देखकर पता चल जाता है।”

     

    सोम्या बैठ गई।

     

    “मुझे लग रहा है कोई मेरा पीछा कर रहा है।”

     

    महिला ने तुरंत बाहर देखा।

     

    “किसी को देखा?”

     

    “नहीं। बस कदमों की आवाज आती है।”

     

    महिला कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “यह रास्ता पुराना है। पहले यहां से गांव के लोग पैदल आया-जाया करते थे।”

     

    “फिर अब इतना सुनसान क्यों है?”

     

    “क्योंकि लोगों ने नया रास्ता बना लिया।”

     

    सोम्या ने पूछा—

     

    “और पुराना रास्ता?”

     

    महिला ने कहा—

     

    “पुराने रास्ते पर चलने वाले अक्सर अपने डर के साथ चलते हैं।”

     

    सोम्या को बात समझ नहीं आई।

     

    महिला ने उसे पानी दिया।

     

    “कुछ देर यहीं बैठ जाओ। अंधेरा थोड़ा कम होने दो।”

     

    सोम्या ने मोबाइल देखा।

     

    अचानक उसमें नेटवर्क आ गया।

     

    उसने तुरंत अपनी मां को फोन किया।

     

    “मां, मैं रास्ते में हूं।”

     

    उधर से मां की घबराई आवाज आई—

     

    “तुम अभी तक नहीं पहुंची?”

     

    “नहीं, बस थोड़ी देर में पहुंच जाऊंगी।”

     

    मां ने कहा—

     

    “सोम्या, तुम पुराने रास्ते से तो नहीं आ रही?”

     

    सोम्या चौंक गई।

     

    “हां। क्यों?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    “तुम्हें पता नहीं इस रास्ते के बारे में?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे नाना इसी रास्ते से गांव लौटते समय कई साल पहले गायब हो गए थे।”

     

    सोम्या का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    “हमें बाद में उनका सामान मिला था। लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला।”

     

    सोम्या ने फोन काट दिया।

     

    उसने मंदिर में बैठी महिला की तरफ देखा।

     

    “आपको मेरे नाना के बारे में पता है?”

     

    महिला ने शांत स्वर में पूछा—

     

    “तुम्हारे नाना का नाम क्या था?”

     

    सोम्या ने नाम बताया।

     

    महिला की आंखें भर आईं।

     

    “वह मेरे भाई थे।”

     

    सोम्या जैसे पत्थर की हो गई।

     

    “क्या?”

     

    महिला ने कहा—

     

    “उस रात भी बहुत अंधेरा था। तुम्हारे नाना इस रास्ते से लौट रहे थे। उन्हें किसी ने रास्ते में रोक लिया था।”

     

    “कौन?”

     

    “मैं नहीं जानती।”

     

    सोम्या की आंखों में डर था।

     

    “फिर उनकी मौत…?”

     

    महिला ने सिर हिलाया।

     

    “मैंने कभी नहीं कहा कि वह मर गए थे।”

     

    सोम्या ने हैरानी से पूछा—

     

    “तो क्या वह जिंदा थे?”

     

    महिला ने मंदिर के पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    “उनका सामान वहां मिला था। लेकिन अगले दिन से वह गायब हो गए।”

     

    अचानक मंदिर के बाहर फिर वही आवाज सुनाई दी।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    सोम्या का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    महिला ने कहा—

     

    “डरो मत।”

     

    आवाज मंदिर के पास आ रही थी।

     

    फिर दरवाजे के सामने वही बूढ़ा आदमी दिखाई दिया जिसे सोम्या ने सड़क पर देखा था।

     

    सोम्या डर गई।

     

    बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “सोम्या?”

     

    सोम्या पीछे हट गई।

     

    “आप मेरा नाम कैसे जानते हैं?”

     

    बूढ़े ने अपना चेहरा उठाया।

     

    सोम्या की आंखें फैल गईं।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी अंगूठी थी, जो उसकी मां ने उसे अपने नाना की निशानी के रूप में दिखाई थी।

     

    बूढ़ा बोला—

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती हो।”

     

    सोम्या की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “नाना…?”

     

    बूढ़े ने सिर हिला दिया।

     

    वह उसका नाना ही था।

     

    वह कई साल पहले इस रास्ते पर हुई एक घटना के बाद गांव से दूर चला गया था। उसने अपनी पहचान छिपाकर जिंदगी बिताई थी, क्योंकि उस समय कुछ गलत लोगों से उसकी दुश्मनी हो गई थी और उसे डर था कि उसकी वजह से परिवार खतरे में पड़ सकता है।

     

    उसने कहा—

     

    “मैं तुम्हें अपने पास बुला नहीं सकता था। लेकिन आज जब मैंने तुम्हें इस रास्ते पर अकेले देखा, तो मैं तुम्हें यहां से सुरक्षित ले जाना चाहता था।”

     

    सोम्या रोते हुए उनके पास गई।

     

    “आप इतने साल कहां थे?”

     

    “बहुत दूर।”

     

    “हमने आपको मरा हुआ समझ लिया था।”

     

    बूढ़े की आंखें भी नम हो गईं।

     

    “मुझे पता था।”

     

    तभी मंदिर में बैठी महिला भी उठ खड़ी हुई।

     

    वह दोनों को देखकर मुस्कुराई।

     

    “अब मेरा काम पूरा हुआ।”

     

    सोम्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    महिला ने कहा—

     

    “जिसने इतने साल तुम्हारे नाना का इंतजार किया।”

     

    वह सोम्या के नाना की बहन थी।

     

    अगली सुबह सोम्या अपने नाना के साथ गांव पहुंची।

     

    मां ने दरवाजा खोला।

     

    सामने अपने पिता को देखकर वह कुछ पल तक बोल ही नहीं पाईं।

     

    फिर वह दौड़कर उनसे लिपट गईं।

     

    घर में सालों से जमा इंतजार उस दिन आंसुओं में बह निकला।

     

    सोम्या चुपचाप यह सब देखती रही।

     

    उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी सुनसान रास्ते सिर्फ डर की तरफ नहीं ले जाते।

     

    कुछ रास्ते हमें उन लोगों तक भी पहुंचा देते हैं, जिन्हें हम जिंदगी भर खोया हुआ समझते रहे।

     

    उस दिन के बाद गांव वालों ने उस पुराने रास्ते को फिर से ठीक करवाया।

     

    लेकिन सोम्या जब भी वहां से गुजरती, कुछ पल रुकती जरूर थी।

     

    वह उस पुराने मंदिर की तरफ देखती और मुस्कुरा देती।

     

    क्योंकि उसके लिए वह सुनसान रास्ता अब डर की जगह नहीं था।

     

    वह रास्ता उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खोई हुई खुशी तक पहुंचने का रास्ता बन चुका था।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • दिखावे की दुनियां में शौर्य

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    दिखावे की दुनिया में शौर्य

     

    शौर्य एक छोटे से शहर में रहने वाला 21 साल का लड़का था। उसके पिता एक छोटी-सी दुकान चलाते थे और मां घर संभालती थीं। परिवार की हालत ठीक थी, लेकिन इतनी भी नहीं कि शौर्य अपनी हर इच्छा आसानी से पूरी कर सके।

     

    लेकिन शौर्य को एक चीज बहुत पसंद थी—दिखावा।

     

    उसे हमेशा लगता था कि लोग उसे देखकर यही सोचें कि वह बहुत पैसे वाला है।

     

    महंगे ब्रांड जैसे कपड़े पहनना, दोस्तों के सामने बड़ी-बड़ी बातें करना, महंगे कैफे में बैठकर तस्वीरें खींचना और सोशल मीडिया पर अपनी जिंदगी को किसी बड़े अमीर लड़के जैसा दिखाना—ये सब उसकी आदत बन चुकी थी।

     

    असलियत यह थी कि उसके पास जेब में कई बार सौ-दो सौ रुपये भी नहीं होते थे।

     

    एक दिन उसका दोस्त कबीर उसके घर आया।

     

    उसने शौर्य को आईने के सामने खड़े देखा।

     

    शौर्य एक महंगी दिखने वाली जैकेट पहन रहा था।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “नई जैकेट?”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हां, पंद्रह हजार की है।”

     

    कबीर ने जैकेट को गौर से देखा।

     

    “पंद्रह हजार?”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    उसे पता था कि यह जैकेट शौर्य ने किस्तों पर खरीदी थी।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “घर में पापा की दुकान ठीक चल रही है?”

     

    शौर्य का चेहरा थोड़ा उतर गया।

     

    “बस ठीक ही है।”

     

    “तो फिर इतनी महंगी चीजें क्यों खरीदते हो?”

     

    शौर्य ने आईने में खुद को देखते हुए कहा—

     

    “लोगों को पता चलना चाहिए कि मैं कौन हूं।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन लोग वही देखते हैं जो तुम दिखाते हो।”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “बस मुझे यही चाहिए।”

     

    एक दिन कॉलेज में उसके दोस्तों ने शहर के सबसे महंगे होटल में पार्टी रखने की योजना बनाई।

     

    सबने पैसे मिलाने की बात की।

     

    जब शौर्य की बारी आई तो उसने कहा—

     

    “पूरी पार्टी का खर्च मैं कर दूंगा।”

     

    दोस्तों ने तालियां बजाईं।

     

    “वाह शौर्य!”

     

    शौर्य का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

     

    लेकिन उसी रात वह घर पहुंचा तो उसके पास पैसे नहीं थे।

     

    उसने मां से कहा—

     

    “मां, मुझे कुछ पैसे चाहिए।”

     

    मां ने पूछा—

     

    “कितने?”

     

    “दस हजार।”

     

    मां घबरा गई।

     

    “इतने पैसे किसलिए?”

     

    शौर्य ने झूठ बोला—

     

    “कॉलेज का जरूरी काम है।”

     

    मां ने अपनी बचत में से पैसे निकाल दिए।

     

    अगले दिन शौर्य ने पार्टी कर दी।

     

    दोस्तों ने उसकी खूब तारीफ की।

     

    “शौर्य, तू तो बड़ा आदमी निकला!”

     

    वह मुस्कुराता रहा।

     

    लेकिन उसे यह नहीं दिखा कि उन्हीं पैसों से उसकी मां घर का राशन खरीदने वाली थी।

     

    कुछ दिनों बाद घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया।

     

    पिता ने पूछा—

     

    “इस महीने पैसे कम पड़ रहे हैं। कुछ ज्यादा खर्च हुआ क्या?”

     

    मां चुप रही।

     

    शौर्य ने सब सुन लिया।

     

    उस रात उसे थोड़ी शर्म महसूस हुई, लेकिन अगले दिन फिर वही पुरानी आदत लौट आई।

     

    कुछ समय बाद कॉलेज में एक नई लड़की आई—आन्या।

     

    वह शांत स्वभाव की थी और पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।

     

    शौर्य को वह पसंद आ गई।

     

    उसने आन्या के सामने भी अपनी अमीरी का दिखावा शुरू कर दिया।

     

    “मेरे पास अपनी कार है।”

     

    असल में वह उसके चाचा की कार थी।

     

    “मैं हर महीने विदेश घूमने जाता हूं।”

     

    असल में वह बचपन में एक बार अपने परिवार के साथ पड़ोसी देश गया था।

     

    “हमारे पास शहर में बड़ा घर है।”

     

    असल में वह घर किराए का था।

     

    आन्या उसकी बातें सुनती रही।

     

    एक दिन उसने कहा—

     

    “तुम बहुत खुश रहते हो।”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “मेरी जिंदगी में कोई कमी नहीं है।”

     

    आन्या मुस्कुराई।

     

    “अच्छा है।”

     

    शौर्य को लगा कि वह प्रभावित हो गई है।

     

    उसने उसे महंगे रेस्तरां में ले जाना शुरू किया।

     

    हर बार बिल देखकर उसके हाथ कांपते, लेकिन वह चेहरे पर मुस्कान रखता।

     

    एक दिन आन्या ने पूछा—

     

    “तुम इतना खर्च क्यों करते हो?”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें अच्छी जिंदगी देना चाहता हूं।”

     

    आन्या ने कुछ नहीं कहा।

     

    कुछ दिनों बाद शौर्य के पिता की दुकान में बड़ा नुकसान हो गया।

     

    घर में पैसे की जरूरत थी।

     

    पिता ने शौर्य से कहा—

     

    “बेटा, इस महीने घर में हाथ थोड़ा तंग है। अगर तुम्हारे पास पैसे हों तो मदद कर देना।”

     

    शौर्य के पास पैसे नहीं थे।

     

    लेकिन उसने पिता से कहा—

     

    “मैं देखता हूं।”

     

    उसी शाम उसके दोस्तों ने एक और पार्टी की योजना बनाई।

     

    सबने शौर्य की तरफ देखा।

     

    “इस बार भी तू ही करवा दे।”

     

    शौर्य के पास कोई रास्ता नहीं था।

     

    उसने अपने मोबाइल से एक महंगा फोन बेच दिया।

     

    पार्टी हुई।

     

    दोस्तों ने फिर कहा—

     

    “शौर्य जैसा दोस्त किस्मत वालों को मिलता है।”

     

    लेकिन उस रात घर लौटते समय उसे पहली बार अपने ही ऊपर गुस्सा आया।

     

    उसने सोचा—

     

    “मैं किसे खुश करने के लिए यह सब कर रहा हूं?”

     

    अगले दिन उसकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ आया।

     

    उसके पिता दुकान पर काम करते समय अचानक बेहोश हो गए।

     

    शौर्य उन्हें अस्पताल लेकर गया।

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “कुछ दिनों तक इन्हें आराम की जरूरत है।”

     

    अस्पताल का खर्च देखकर शौर्य के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने दोस्तों को फोन किया।

     

    “मुझे कुछ पैसे चाहिए।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “भाई, अभी मेरे पास नहीं हैं।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “मैं अगले महीने दे दूंगा।”

     

    तीसरे ने फोन ही नहीं उठाया।

     

    शौर्य घंटों अस्पताल की कुर्सी पर बैठा रहा।

     

    तभी आन्या वहां आई।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    शौर्य ने पहली बार उससे कोई झूठ नहीं बोला।

     

    “मैं अमीर नहीं हूं।”

     

    आन्या शांत रही।

     

    “मुझे पता है।”

     

    शौर्य चौंका।

     

    “तुम्हें पता था?”

     

    “हां। तुम्हारी बातें बहुत बड़ी थीं, लेकिन तुम्हारी आंखों में हमेशा पैसे की चिंता दिखती थी।”

     

    शौर्य की आंखें भर आईं।

     

    “फिर तुमने कभी कुछ कहा क्यों नहीं?”

     

    आन्या ने कहा—

     

    “क्योंकि मुझे तुम्हारे पैसे नहीं, तुम्हारी सच्चाई देखनी थी।”

     

    शौर्य ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने पूरी जिंदगी लोगों को दिखाने में लगा दी कि मैं अमीर हूं। लेकिन जब सच में जरूरत पड़ी तो मेरे पास कुछ भी नहीं था।”

     

    आन्या ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास परिवार है। तुम्हारे पास मेहनत करने की क्षमता है। ये किसी भी दिखावे से बड़ी चीजें हैं।”

     

    उस दिन शौर्य ने अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया।

     

    उसने सोशल मीडिया से अपनी झूठी अमीरी वाली तस्वीरें हटा दीं।

     

    महंगे कपड़े खरीदना बंद किया।

     

    पार्टी में पैसे उड़ाना बंद किया।

     

    और सबसे जरूरी—उसने अपने पिता से सच बोल दिया।

     

    “पापा, मैंने बहुत पैसे बर्बाद किए हैं। मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    पिता ने कुछ देर उसे देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “गलती करने वाला बेटा बुरा नहीं होता। लेकिन गलती समझ आने के बाद भी उसे दोहराना गलत होता है।”

     

    शौर्य ने पिता का हाथ पकड़ लिया।

     

    उसने दुकान संभालनी शुरू की।

     

    सुबह कॉलेज और शाम दुकान।

     

    धीरे-धीरे उसने परिवार का कर्ज चुकाना शुरू किया।

     

    कई महीने बाद कबीर उससे मिला।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या हुआ? आजकल तू महंगे कपड़े नहीं पहनता?”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “अब मुझे अच्छा दिखने से ज्यादा अच्छा इंसान बनना जरूरी लगता है।”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आखिर समझ गया।”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “पहले मैं लोगों को अपनी जिंदगी दिखाता था। अब मैं अपनी जिंदगी जीता हूं।”

     

    उधर आन्या अब भी उसके साथ थी।

     

    एक दिन उसने शौर्य से कहा—

     

    “तुम अब पहले से ज्यादा खुश लगते हो।”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि अब मुझे किसी को साबित नहीं करना कि मैं अमीर हूं।”

     

    उसने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले।

     

    “देखो, आज मेरे पास सिर्फ पांच सौ रुपये हैं।”

     

    आन्या हंसने लगी।

     

    “तो?”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “लेकिन ये पैसे मेरे हैं। मैंने खुद कमाए हैं। अब इनसे मुझे किसी को प्रभावित नहीं करना।”

     

    आन्या ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब तुम सच में बड़े आदमी लगते हो।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    उसे आखिरकार समझ आ गया था—

     

    बड़ा दिखने और बड़ा होने में बहुत फर्क होता है।

     

    दिखावे से कुछ समय के लिए लोग प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन असली सम्मान मेहनत, सच्चाई और अपने परिवार के लिए खड़े होने से मिलता है।

     

    और शौर्य ने तय कर लिया था कि अब उसकी जिंदगी तस्वीरों में अमीर नहीं, बल्कि असल में मजबूत होगी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • पेसो की भूखी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    पैसों की भूखी लड़की

     

    शहर में कियारा नाम की एक लड़की रहती थी। देखने में वह बहुत शांत और समझदार लगती थी, लेकिन उसके दिल में एक ही चाहत थी—बहुत सारा पैसा।

     

    कियारा का मानना था कि दुनिया में इज्जत, प्यार और रिश्ते सब पैसों से खरीदे जा सकते हैं।

     

    वह अक्सर अपनी सहेलियों से कहती—

     

    “जिसके पास पैसा है, उसी की दुनिया में कीमत है।”

     

    उसका परिवार बहुत अमीर नहीं था। पिता छोटी-सी दुकान चलाते थे और मां घर संभालती थीं। उन्होंने अपनी हैसियत के हिसाब से कियारा को अच्छी परवरिश दी थी, लेकिन कियारा को हमेशा लगता था कि उसे इससे कहीं ज्यादा मिलना चाहिए।

     

    कॉलेज खत्म करने के बाद उसने नौकरी करने की कोशिश की, लेकिन कुछ महीनों में ही उसे नौकरी छोटी लगने लगी।

     

    तभी उसने एक अलग रास्ता चुन लिया।

     

    वह अमीर लड़कों से दोस्ती करने लगी।

     

    पहली बार उसकी मुलाकात एडवर्ड से हुई। एडवर्ड एक बड़े कारोबारी का बेटा था। महंगी कार, अच्छे कपड़े और हर समय दोस्तों से घिरा रहता था।

     

    कियारा ने उससे दोस्ती की।

     

    कुछ ही दिनों में एडवर्ड को कियारा पसंद आने लगी।

     

    एक शाम कियारा ने उदास चेहरा बनाकर कहा—

     

    “मेरी मां की तबीयत बहुत खराब है।”

     

    एडवर्ड तुरंत परेशान हो गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “डॉक्टर ने कुछ महंगी दवाइयां लिखी हैं। लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

     

    एडवर्ड ने बिना ज्यादा सवाल किए पैसे दे दिए।

     

    कियारा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम बहुत अच्छे हो।”

     

    कुछ दिनों बाद उसने फिर पैसे मांगे।

     

    फिर एक नया बहाना।

     

    फिर एक नई जरूरत।

     

    धीरे-धीरे एडवर्ड ने कियारा पर हजारों रुपये खर्च कर दिए।

     

    एक दिन जब एडवर्ड ने उससे शादी की बात की तो कियारा ने अचानक कहा—

     

    “मुझे लगता है हम दोनों एक-दूसरे के लिए सही नहीं हैं।”

     

    एडवर्ड हैरान रह गया।

     

    “लेकिन तुम तो कहती थी कि तुम मुझे पसंद करती हो।”

     

    कियारा ने ठंडी आवाज में कहा—

     

    “पसंद करना और शादी करना अलग बातें हैं।”

     

    और अगले ही दिन वह शहर छोड़कर चली गई।

     

    एडवर्ड को बाद में समझ आया कि कियारा को उससे प्यार नहीं था।

     

    उसे सिर्फ उसके पैसे से मतलब था।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    कियारा नए शहर में पहुंची।

     

    वहां उसकी मुलाकात लियाम से हुई।

     

    लियाम एक साधारण परिवार से था। वह नौकरी करता था और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा अपने माता-पिता को भेजता था।

     

    कियारा ने जब यह जाना कि लियाम अमीर नहीं है तो पहले उसने उससे दूरी बनाई।

     

    लेकिन लियाम का स्वभाव अच्छा था।

     

    वह हमेशा दूसरों की मदद करता।

     

    धीरे-धीरे कियारा ने सोचा—

     

    “अगर इसे मेरे लिए थोड़ा खर्च करने की आदत पड़ जाए तो?”

     

    उसने लियाम से दोस्ती शुरू कर दी।

     

    लियाम जल्दी ही उसे पसंद करने लगा।

     

    वह अपनी छोटी-सी सैलरी में भी कियारा को खुश करने की कोशिश करता।

     

    कभी उसके लिए फूल लाता।

     

    कभी छोटा-सा उपहार।

     

    कियारा को यह सब पसंद तो नहीं था, लेकिन वह उसे उम्मीद देती रही।

     

    एक दिन उसने कहा—

     

    “मेरे पास एक जरूरी काम है, लेकिन मुझे पैसे चाहिए।”

     

    लियाम ने पूछा—

     

    “कितने?”

     

    “जितने तुम दे सको।”

     

    लियाम ने अपनी कई महीनों की बचत में से कुछ पैसे उसे दे दिए।

     

    उसके पास ज्यादा नहीं था, फिर भी उसने अपनी जरूरतें रोक दीं।

     

    कुछ दिनों बाद कियारा ने फिर पैसे मांगे।

     

    इस बार लियाम ने कहा—

     

    “कियारा, मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं।”

     

    कियारा नाराज हो गई।

     

    “तो फिर तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?”

     

    लियाम चुप हो गया।

     

    उस दिन पहली बार उसे कियारा की बातों में प्यार नहीं, लालच दिखाई दिया।

     

    लेकिन उसने खुद को समझाया—

     

    “शायद वह किसी परेशानी में होगी।”

     

    कुछ समय बाद कियारा ने लियाम से और पैसे मांगे।

     

    लियाम ने मना कर दिया।

     

    “मेरे पिता की दवाइयां भी चल रही हैं। मैं अभी और पैसे नहीं दे सकता।”

     

    कियारा ने बिना सोचे कहा—

     

    “तुम इतने भी अच्छे नहीं हो जितना मैं समझती थी।”

     

    लियाम ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने तुम्हारे लिए अपनी क्षमता से ज्यादा किया है।”

     

    कियारा ने कहा—

     

    “लेकिन मुझे उससे क्या?”

     

    लियाम का दिल टूट गया।

     

    उसे समझ आ गया कि वह जिस लड़की के लिए इतना कुछ कर रहा था, उसके लिए वह सिर्फ पैसे देने वाला इंसान था।

     

    कुछ दिनों बाद कियारा वहां से भी चली गई।

     

    लेकिन इस बार वह किसी अमीर लड़के की तलाश में नहीं थी।

     

    वह एक बड़े शहर में पहुंची, जहां उसकी मुलाकात नोलन नाम के एक बहुत अमीर युवक से हुई।

     

    नोलन को कियारा बहुत पसंद आई।

     

    उसने उसे महंगे उपहार दिए।

     

    कियारा को लगा कि अब उसकी जिंदगी बदल गई है।

     

    उसने नोलन के साथ महंगे होटल, पार्टियां और यात्राएं शुरू कर दीं।

     

    लेकिन नोलन बहुत समझदार था।

     

    उसने जल्दी ही समझ लिया कि कियारा की दिलचस्पी उसमें नहीं, उसके पैसे में है।

     

    एक दिन उसने जानबूझकर कहा—

     

    “मेरे सारे पैसे खत्म हो गए हैं।”

     

    कियारा चौंक गई।

     

    “क्या?”

     

    “मेरी कंपनी में बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। अब मेरे पास कुछ नहीं बचा।”

     

    कियारा का व्यवहार उसी दिन बदल गया।

     

    वह बोली—

     

    “तो अब हमें अलग हो जाना चाहिए।”

     

    नोलन ने पूछा—

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    कियारा ने कहा—

     

    “मैं ऐसी जिंदगी नहीं जी सकती।”

     

    नोलन मुस्कुराया।

     

    “तो तुम्हें मुझसे नहीं, मेरे पैसों से प्यार था।”

     

    कियारा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    नोलन ने कहा—

     

    “मैंने तुम्हें परखने के लिए झूठ बोला था। मेरे पैसे खत्म नहीं हुए।”

     

    कियारा के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं।

     

    “नोलन, मेरी बात सुनो…”

     

    “नहीं।”

     

    नोलन ने उसे रोक दिया।

     

    “तुम्हें लगता है कि तुम लोगों को छोड़कर आगे बढ़ रही हो। लेकिन असल में तुम हर बार अपने अंदर कुछ खोती जा रही हो।”

     

    कियारा वहां से चली गई।

     

    पहली बार उसे किसी ने उसके लालच का आईना दिखाया था।

     

    कुछ दिनों तक वह अकेली रही।

     

    उसके पास पैसे थे, कपड़े थे, गहने थे, लेकिन कोई ऐसा इंसान नहीं था जिसे वह अपना कह सके।

     

    उसे एडवर्ड याद आया।

     

    लियाम याद आया।

     

    उनकी छोटी-छोटी बातें याद आईं।

     

    उसे एहसास हुआ कि उसने हर रिश्ते की कीमत पैसे से लगाई थी।

     

    एक दिन उसे खबर मिली कि लियाम की मां बीमार हैं।

     

    कियारा अचानक उसके शहर पहुंच गई।

     

    लियाम ने दरवाजा खोला तो उसे देखकर हैरान रह गया।

     

    “तुम यहां?”

     

    कियारा की आंखों में आंसू थे।

     

    “मैं माफी मांगने आई हूं।”

     

    लियाम कुछ नहीं बोला।

     

    “मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। तुमने मेरे लिए अपनी जरूरतें तक रोक दीं और मैंने तुम्हारे प्यार की कीमत पैसे से लगा दी।”

     

    लियाम ने धीरे से कहा—

     

    “मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”

     

    कियारा ने पूछा—

     

    “क्या तुम मुझे फिर से अपनी जिंदगी में जगह दोगे?”

     

    लियाम ने सिर हिला दिया।

     

    “माफ करना और वापस स्वीकार करना दो अलग बातें हैं।”

     

    कियारा की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उसे उस दिन समझ आया कि पैसा खोने का डर जितना बड़ा नहीं होता, उससे कहीं बड़ा डर होता है किसी का भरोसा खो देना।

     

    कियारा ने पहली बार खुद के लिए नौकरी शुरू की।

     

    शुरुआत में उसे छोटी नौकरी मिली।

     

    उसने शिकायत नहीं की।

     

    वह मेहनत करने लगी।

     

    धीरे-धीरे उसने अपने खर्च खुद उठाने शुरू किए।

     

    अब अगर कोई उसे महंगा उपहार देता तो वह पहले पूछती—

     

    “क्यों?”

     

    उसके लिए प्यार का मतलब बदल चुका था।

     

    कई साल बाद एक दिन वह उसी शहर के एक छोटे कैफे में बैठी थी।

     

    सामने एक गरीब बच्ची अपनी मां के साथ खाना खा रही थी।

     

    बच्ची की नजर कियारा के महंगे बैग पर थी।

     

    कियारा ने अपना बैग देखा और मुस्कुराई।

     

    उसने बैग नहीं दिया।

     

    बल्कि बच्ची के लिए खाना मंगवाया।

     

    बच्ची मुस्कुराई।

     

    कियारा के मन को पहली बार किसी चीज से सुकून मिला।

     

    उसे समझ आ गया था—

     

    पैसा जिंदगी को आराम दे सकता है, लेकिन किसी के दिल में अपनी जगह नहीं खरीद सकता।

     

    और जो इंसान हर रिश्ते को पैसों के तराजू पर तौलता है, एक दिन उसके पास बहुत कुछ होते हुए भी ऐसा कुछ नहीं बचता जिसे वह अपना कह सके।

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    Auther preeti Sharma

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  • हरियाला बगान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    वह हरा-भरा बगान जहां कोई नहीं जा सकता था

     

    एक छोटे से गांव के किनारे एक बहुत बड़ा बगान था। चारों तरफ घने पेड़, रंग-बिरंगे फूल और हरी घास से ढकी जमीन थी। दूर से देखने पर वह जगह इतनी खूबसूरत लगती कि हर कोई उसके अंदर जाने का मन बना लेता।

     

    लेकिन गांव में एक अजीब बात मशहूर थी।

     

    उस बगान में कोई नहीं जा सकता था।

     

    गांव के बुजुर्ग कहते थे कि जो भी वहां जाने की कोशिश करता है, वह रास्ता भूल जाता है।

     

    किसी ने कहा था कि वहां रात को पेड़ बातें करते हैं।

     

    किसी ने कहा था कि बगान के बीचों-बीच एक ऐसा पेड़ है, जिसके नीचे बैठकर इंसान अपनी सबसे बड़ी इच्छा मांग सकता है।

     

    लेकिन किसी ने आज तक उस पेड़ को देखा नहीं था।

     

    गांव में रहने वाला लियो इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    वह बीस साल का एक जिज्ञासु लड़का था। उसे हमेशा उन चीजों के पीछे का सच जानने की आदत थी, जिनसे बाकी लोग डरते थे।

     

    एक दिन उसने अपने दादा से पूछा—

     

    “दादा, आखिर उस बगान में ऐसा क्या है?”

     

    दादा ने गंभीर होकर कहा—

     

    “उसके बारे में ज्यादा मत पूछना।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि वह बगान किसी को अपने अंदर आने नहीं देता।”

     

    लियो हंस पड़ा।

     

    “बगान कोई इंसान थोड़ी है, जो किसी को रोक देगा।”

     

    दादा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें जो मजाक लगता है, उसके पीछे कई लोगों की जिंदगी जुड़ी है।”

     

    लियो चुप हो गया।

     

    उस रात वह अपने कमरे में सो रहा था कि अचानक उसकी खिड़की के बाहर से फूलों की खुशबू आई।

     

    वह उठकर बाहर आया।

     

    खिड़की से दूर बगान दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन आज वहां कुछ अलग था।

     

    बगान के बीचों-बीच हल्की सुनहरी रोशनी चमक रही थी।

     

    लियो ने सोचा शायद उसकी आंखों का भ्रम होगा।

     

    लेकिन रोशनी फिर चमकी।

     

    अगली सुबह उसने दादा से पूछा—

     

    “कल रात बगान में रोशनी क्यों थी?”

     

    दादा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “तुमने देखी?”

     

    “हां।”

     

    दादा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “इसका मतलब है कि बगान ने तुम्हें बुलाया है।”

     

    लियो हैरान हो गया।

     

    “बगान किसी को बुला भी सकता है?”

     

    दादा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बस इतना कहा—

     

    “अगर जाना ही है तो अकेले जाना। और चाहे कुछ भी हो, वहां से कोई चीज अपने साथ मत लाना।”

     

    लियो उसी शाम बगान के पास पहुंच गया।

     

    जैसे ही उसने पहला कदम आगे बढ़ाया, तेज हवा चली।

     

    पेड़ों की पत्तियां एक साथ हिलने लगीं।

     

    लियो ने पीछे देखा।

     

    गांव अब पहले से बहुत दूर दिखाई दे रहा था।

     

    उसने आगे कदम बढ़ाया।

     

    कुछ दूर चलने के बाद उसे एक बड़ा पत्थर दिखाई दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जो यहां अपने स्वार्थ से आता है, वह रास्ता खो देता है।”

     

    लियो मुस्कुराया।

     

    “मैं तो सिर्फ सच जानने आया हूं।”

     

    वह आगे बढ़ गया।

     

    बगान के अंदर का नजारा बाहर से भी ज्यादा खूबसूरत था।

     

    हर तरफ फूल थे।

     

    छोटी-छोटी धाराएं बह रही थीं।

     

    पक्षियों की आवाजें गूंज रही थीं।

     

    लेकिन अजीब बात यह थी कि उसे एक भी जानवर डरता हुआ नहीं दिखा।

     

    कुछ देर बाद वह बगान के बीचों-बीच पहुंच गया।

     

    वहां एक बहुत पुराना पेड़ खड़ा था।

     

    उसकी शाखाएं इतनी फैली थीं कि पूरा मैदान उसकी छांव में आ जाता था।

     

    पेड़ के तने पर एक छोटा-सा निशान बना था।

     

    वही निशान जो लियो ने बचपन में अपने दादा की पुरानी डायरी में देखा था।

     

    लियो ने पेड़ को छुआ।

     

    अचानक उसके सामने एक दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक बहुत पुराना गांव।

     

    लोग सूखे खेतों में परेशान घूम रहे थे।

     

    पानी नहीं था।

     

    फसलें बर्बाद हो चुकी थीं।

     

    फिर उसने देखा कि गांव के कुछ लोगों ने इसी बगान के पेड़ काटने शुरू कर दिए।

     

    जैसे ही पेड़ काटे गए, बगान की हरियाली खत्म होने लगी।

     

    दृश्य बदल गया।

     

    एक बूढ़ा आदमी गांव वालों के सामने खड़ा था।

     

    उसने कहा—

     

    “अगर तुमने इस बगान को बचाया नहीं, तो तुम्हारे गांव की जमीन भी बंजर हो जाएगी।”

     

    लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं मानी।

     

    कुछ लोगों ने पेड़ काटने की कोशिश की।

     

    तभी अचानक तेज आंधी आई।

     

    सभी लोग भाग गए।

     

    उस दिन के बाद बगान के चारों तरफ एक अदृश्य सीमा बन गई।

     

    कोई इंसान उसके अंदर नहीं जा सका।

     

    लियो ने आंखें खोलीं।

     

    वह समझ चुका था।

     

    यह बगान किसी जादू की वजह से बंद नहीं था।

     

    यह लोगों के लालच से खुद को बचा रहा था।

     

    तभी उसके पीछे किसी की आवाज आई—

     

    “अब तुम समझ गए?”

     

    लियो पलटा।

     

    वहां एक बूढ़ी महिला खड़ी थी।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “मैं इस बगान की रखवाली करती हूं।”

     

    लियो ने पूछा—

     

    “तो इतने सालों से किसी को अंदर क्यों नहीं आने दिया?”

     

    “क्योंकि जो भी यहां आया, उसने कुछ लेने की कोशिश की।”

     

    “और मैं?”

     

    “तुम पहली बार कुछ लेने नहीं, सच जानने आए हो।”

     

    लियो ने पूछा—

     

    “अब मुझे क्या करना होगा?”

     

    बूढ़ी महिला ने कहा—

     

    “बगान तुम्हें एक मौका देगा।”

     

    “कैसा मौका?”

     

    “तुम यहां से एक चीज ले जा सकते हो।”

     

    लियो की नजर पेड़ पर गई।

     

    “क्या?”

     

    “एक सुनहरा फल।”

     

    पेड़ पर एक ही फल लगा था।

     

    वह चमक रहा था।

     

    बूढ़ी महिला ने कहा—

     

    “इसे खाने से तुम्हारी जिंदगी बदल सकती है। तुम्हारे परिवार की गरीबी खत्म हो सकती है।”

     

    लियो कुछ देर उस फल को देखता रहा।

     

    फिर उसने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    बूढ़ी महिला चौंकी।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे दादा ने कहा था कि यहां से कुछ साथ लेकर मत जाना।”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “तुम्हें धन नहीं चाहिए?”

     

    “चाहिए। लेकिन अगर उसके लिए इस बगान से कुछ छीनना पड़े तो नहीं।”

     

    बूढ़ी महिला ने हाथ उठाया।

     

    अचानक पूरा बगान सुनहरी रोशनी से भर गया।

     

    पेड़ों की पत्तियां हवा में झूमने लगीं।

     

    “आज से यह बगान तुम्हारे लिए बंद नहीं रहेगा।”

     

    लियो हैरान रह गया।

     

    “लेकिन गांव के बाकी लोगों के लिए?”

     

    “जब तक वे इसे पाने की जगह बचाने की सोच नहीं बदलेंगे, तब तक नहीं।”

     

    लियो गांव वापस आया।

     

    उसने अपने दादा को पूरी बात बताई।

     

    दादा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुमने वही किया जो तुम्हारे पिता नहीं कर पाए।”

     

    लियो ने पूछा—

     

    “मेरे पिता?”

     

    दादा ने बताया कि कई साल पहले लियो के पिता भी उस बगान में गए थे। उन्होंने भी सुनहरा फल पाने की कोशिश की थी। लेकिन बगान ने उन्हें बाहर निकाल दिया था।

     

    उस दिन से वह बदल गए थे।

     

    लियो को पहली बार अपने पिता की अधूरी कहानी समझ आई।

     

    अगले दिन लियो ने गांव वालों को इकट्ठा किया।

     

    उसने कहा—

     

    “हम इस बगान से कुछ लेने की कोशिश करते रहे। लेकिन अगर हम इसकी हरियाली बचाएंगे, तो यह खुद हमें बहुत कुछ देगा।”

     

    गांव वालों ने पहले उसकी बात नहीं मानी।

     

    लेकिन लियो ने हार नहीं मानी।

     

    उसने गांव के सूखे तालाब की सफाई शुरू की।

     

    बच्चे उसके साथ आ गए।

     

    फिर बुजुर्ग भी।

     

    कुछ ही महीनों में गांव बदलने लगा।

     

    लोगों ने पेड़ लगाना शुरू किया।

     

    पानी बचाना शुरू किया।

     

    और एक सुबह गांव वालों ने देखा कि बगान की सीमा के पास लगी पुरानी बेल अपने आप हट गई थी।

     

    पहली बार गांव के लोगों के लिए रास्ता खुला था।

     

    लेकिन इस बार कोई दौड़कर अंदर नहीं गया।

     

    सबने दूर खड़े होकर उस हरे-भरे बगान को देखा।

     

    लियो मुस्कुराया।

     

    उसे समझ आ गया था कि बगान का रहस्य कोई जादुई फल नहीं था।

     

    उसका असली रहस्य यह था कि प्रकृति उन लोगों के लिए अपने दरवाजे खोल देती है, जो उसे जीतना नहीं, बचाना जानते हैं।

     

    उस दिन से वह बगान गांव की सबसे सुरक्षित जगह बन गया।

     

    और वहां जाने वाले हर व्यक्ति को एक ही बात याद दिलाई जाती—

     

    “हरियाली सिर्फ देखने की चीज नहीं, संभालने की जिम्मेदारी भी है।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अकेले ही काफी है

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    हम अकेले ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं

     

    “अब हमें किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।”

     

    सरला ने खिड़की के बाहर देखते हुए धीमी आवाज में कहा।

     

    सामने कुर्सी पर बैठे उसके पति गोविंद ने चश्मा उतारा और पत्नी की तरफ देखा।

     

    “किससे उम्मीद की तुमने?”

     

    सरला हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “किससे नहीं की?”

     

    गोविंद कुछ नहीं बोले।

     

    दोनों की उम्र सत्तर के पार हो चुकी थी। कभी उनका घर बच्चों की आवाजों से भरा रहता था। सुबह से शाम तक भागदौड़ रहती थी। तीन बच्चे थे—दो बेटे और एक बेटी। गोविंद ने पूरी जिंदगी नौकरी करके बच्चों को पढ़ाया, उनकी जरूरतें पूरी कीं और उनके भविष्य के लिए अपनी छोटी-छोटी खुशियां तक छोड़ दीं।

     

    जब बच्चे बड़े हुए तो तीनों अपने-अपने शहरों में चले गए।

     

    शुरुआत में हर दिन फोन आता था।

     

    “पापा, खाना खा लिया?”

     

    “मां, दवा समय पर लेना।”

     

    “जल्दी ही मिलने आएंगे।”

     

    सरला उन बातों को सुनकर खुश हो जाती।

     

    वह हर बार कहती—

     

    “बस तुम लोग खुश रहो, हमें और क्या चाहिए।”

     

    लेकिन धीरे-धीरे फोन कम होने लगे।

     

    फिर हफ्ते में एक बार।

     

    फिर महीने में।

     

    और आखिरकार कभी-कभी।

     

    एक शाम सरला ने गोविंद से कहा—

     

    “हमने बच्चों को बहुत प्यार दिया था ना?”

     

    गोविंद ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हां।”

     

    “फिर वो इतने दूर कैसे हो गए?”

     

    गोविंद ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    शायद उनके पास भी इस सवाल का जवाब नहीं था।

     

    एक दिन गोविंद अचानक सीढ़ियों से उतरते समय लड़खड़ा गए।

     

    सरला घबरा गई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं। पैर थोड़ा फिसल गया।”

     

    सरला ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें डॉक्टर के पास जाना चाहिए।”

     

    “कल चलेंगे।”

     

    “कल नहीं। अभी।”

     

    दोनों डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखीं और आराम करने को कहा।

     

    सरला ने उसी रात बड़े बेटे रोहन को फोन किया।

     

    “बेटा, तुम्हारे पापा की तबीयत थोड़ी खराब है।”

     

    रोहन ने चिंतित होकर कहा—

     

    “मां, दवा दिलवा देना। मैं अभी ऑफिस में बहुत व्यस्त हूं। अगले महीने आने की कोशिश करूंगा।”

     

    सरला ने फोन रख दिया।

     

    उसने कुछ नहीं कहा।

     

    गोविंद समझ गए।

     

    “क्या बोला?”

     

    “कुछ नहीं। काम में व्यस्त है।”

     

    कुछ दिनों बाद छोटी बेटी नैना का फोन आया।

     

    “मां, पापा कैसे हैं?”

     

    “अब ठीक हैं।”

     

    “अच्छा हुआ। बच्चों के स्कूल चल रहे हैं, इसलिए अभी आना मुश्किल है।”

     

    सरला ने कहा—

     

    “ठीक है बेटा।”

     

    फोन कट गया।

     

    सरला कुछ देर मोबाइल को देखती रही।

     

    गोविंद ने पूछा—

     

    “दुख हुआ?”

     

    सरला ने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    लेकिन उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    गोविंद उसके पास आकर बैठ गए।

     

    “रो लो। मेरे सामने रोने में शर्म कैसी?”

     

    सरला ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे बच्चों से शिकायत नहीं है। बस कभी-कभी लगता है कि हमने उन्हें अपने से इतना दूर कर दिया कि अब उन्हें हमारी जरूरत ही नहीं रही।”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “शायद उनकी अपनी जिंदगी है।”

     

    “हां,” सरला ने कहा, “लेकिन क्या हमारी जिंदगी में अब उनका कोई हिस्सा नहीं?”

     

    उस सवाल का जवाब दोनों में से किसी के पास नहीं था।

     

    समय बीतता गया।

     

    एक सर्द रात सरला की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    गोविंद घबरा गए।

     

    उन्होंने पड़ोसी अमन को फोन किया।

     

    अमन तुरंत आया और दोनों को अस्पताल ले गया।

     

    कुछ घंटों बाद डॉक्टर ने कहा—

     

    “अब खतरा नहीं है, लेकिन इन्हें अकेले नहीं रहना चाहिए।”

     

    गोविंद ने तुरंत बच्चों को फोन किया।

     

    इस बार उन्होंने पहली बार आवाज में शिकायत कर दी।

     

    “बेटा, अपनी मां को देखने आ जाओ।”

     

    रोहन ने कहा—

     

    “पापा, मैं कोशिश करता हूं।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “पापा, दो दिन में आने की कोशिश करूंगी।”

     

    छोटे बेटे विवेक ने तो फोन तक नहीं उठाया।

     

    दो दिन गुजर गए।

     

    तीन दिन।

     

    चार दिन।

     

    कोई नहीं आया।

     

    अमन रोज अस्पताल आता रहा।

     

    सरला को जब होश आया तो उसने सबसे पहले पूछा—

     

    “बच्चे आए?”

     

    गोविंद कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “नहीं।”

     

    सरला ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके चेहरे पर दुख था, लेकिन इस बार उसने आंसू नहीं बहाए।

     

    “गोविंद…”

     

    “हां।”

     

    “अब हमें किसी से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।”

     

    गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हां।”

     

    “हम अकेले ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं।”

     

    गोविंद ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बिल्कुल।”

     

    अस्पताल से लौटने के बाद दोनों ने अपनी जिंदगी का तरीका बदल लिया।

     

    उन्होंने किसी बच्चे से नाराजगी नहीं की।

     

    किसी को बुरा नहीं कहा।

     

    बस अपनी उम्मीदें कम कर दीं।

     

    सुबह गोविंद सरला के लिए चाय बनाते।

     

    सरला उनकी दवा समय पर देती।

     

    दोनों साथ बैठकर अखबार पढ़ते।

     

    शाम को छत पर कुर्सियां डालकर घंटों बातें करते।

     

    कभी पुरानी यादें याद करते।

     

    कभी बच्चों के बचपन की तस्वीरें देखते।

     

    एक दिन सरला ने पुराना फोटो एलबम खोला।

     

    उसमें तीनों बच्चे छोटे थे।

     

    रोहन गोविंद की उंगली पकड़े खड़ा था।

     

    नैना सरला की गोद में थी।

     

    विवेक जमीन पर बैठा मुस्कुरा रहा था।

     

    सरला की आंखें भर आईं।

     

    “देखो, कितने छोटे थे।”

     

    गोविंद ने तस्वीर को देखा।

     

    “हमने इन्हें बड़ा कर दिया।”

     

    “और खुद बूढ़े हो गए।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    अमन खड़ा था।

     

    उसके हाथ में दवाइयां थीं।

     

    “अंकल, आंटी, ये दवाइयां ले आया हूं।”

     

    सरला ने कहा—

     

    “बेटा, तुम रोज क्यों परेशान होते हो?”

     

    अमन हंसकर बोला—

     

    “क्योंकि आप दोनों मेरे अपने जैसे हैं।”

     

    सरला ने पहली बार महसूस किया कि रिश्ते हमेशा खून से नहीं बनते।

     

    कुछ रिश्ते व्यवहार से बनते हैं।

     

    कुछ परवाह से।

     

    और कुछ सिर्फ इसलिए बनते हैं क्योंकि कोई बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहता है।

     

    कुछ महीनों बाद रोहन अचानक घर आया।

     

    उसने दरवाजे पर खड़े होकर कहा—

     

    “मां…”

     

    सरला ने उसे देखा।

     

    “आ गए?”

     

    रोहन ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    सरला चुप रही।

     

    रोहन की आंखों में आंसू थे।

     

    “मुझे लगा था कि पैसे भेज देना और फोन कर लेना ही काफी है। लेकिन जब पिछले महीने मेरे ऑफिस में एक सहकर्मी ने अपनी मां को अस्पताल ले जाने के लिए छुट्टी ली, तब मुझे समझ आया कि मां-बाप को सिर्फ पैसों की नहीं, अपने बच्चों की जरूरत होती है।”

     

    सरला ने कुछ नहीं कहा।

     

    गोविंद ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तुम्हें समझ आ गया, यही बहुत है।”

     

    रोहन रोते हुए अपनी मां के पैरों के पास बैठ गया।

     

    “मैंने आपको अकेला छोड़ दिया।”

     

    सरला ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम हमें छोड़कर गए थे, बेटा। लेकिन मां-बाप बच्चों को छोड़ना नहीं सीखते।”

     

    रोहन ने मां को गले लगा लिया।

     

    कुछ दिनों बाद नैना भी आई।

     

    विवेक भी।

     

    घर फिर से बच्चों की आवाजों से भर गया।

     

    लेकिन इस बार सरला और गोविंद की सोच बदल चुकी थी।

     

    उन्होंने बच्चों से कोई शिकायत नहीं की।

     

    बस इतना कहा—

     

    “अपनी जिंदगी जियो। हमें तुमसे बड़ी-बड़ी चीजें नहीं चाहिए। कभी-कभी फोन कर लिया करो। और अगर हम तुम्हें याद आएं तो मिलने आ जाना।”

     

    विवेक ने कहा—

     

    “पापा, अब हम आपको अकेला नहीं छोड़ेंगे।”

     

    गोविंद मुस्कुराए।

     

    “यह वादा आज मत करो। बस इतना करना कि जब जिंदगी बहुत व्यस्त हो जाए, तब भी हमें याद रखना।”

     

    रात को जब बच्चे सो गए तो सरला और गोविंद बरामदे में बैठे थे।

     

    सरला ने धीमे से पूछा—

     

    “तुम्हें लगता है हमने बच्चों को माफ कर दिया?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “हमने उन्हें कभी छोड़ा ही नहीं था, तो माफ क्या करना।”

     

    सरला ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “एक बात कहूं?”

     

    “कहो।”

     

    “सच में… हम अकेले ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं।”

     

    गोविंद मुस्कुराए।

     

    “हां। लेकिन अगर बच्चे कभी साथ बैठ जाएं, तो अच्छा जरूर लगता है।”

     

    सरला भी मुस्कुरा दी।

     

    उसे समझ आ गया था कि बुढ़ापे में सबसे बड़ी जरूरत किसी से शिकायत करने की नहीं होती।

     

    बस एक ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो चुपचाप आपके पास बैठकर कह सके—

     

    “चिंता मत करो, मैं हूं ना।”

     

    और गोविंद और सरला के पास एक-दूसरे के लिए यही सबसे बड़ी दौलत थी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मुझे शादी नहीं करनी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    पापा, मुझे शादी नहीं करनी

     

    “पापा, पर मुझे शादी नहीं करनी! आप समझते क्यों नहीं?”

     

    पल्लवी की आवाज पूरे घर में गूंज गई। उसकी आंखों में आंसू थे और चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था।

     

    सामने उसके पिता महेश चुपचाप बैठे थे। उनके हाथ में पल्लवी की शादी का कार्ड था, जिसे वह बार-बार देख रहे थे।

     

    “पल्लवी, बेटा… इतनी जोर से मत बोलो। पड़ोसी क्या सोचेंगे?”

     

    “मुझे किसी पड़ोसी की परवाह नहीं है!”

     

    पल्लवी ने कार्ड उठाकर मेज पर रख दिया।

     

    “मुझे शादी नहीं करनी। बस! आप लोग मेरी बात क्यों नहीं समझ रहे?”

     

    उसकी मां सुशीला रोते हुए बोलीं, “बेटी, हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। तुम्हारी भलाई के लिए ही तो सोच रहे हैं।”

     

    “अगर मेरी भलाई चाहते हैं तो मेरी बात सुनिए!”

     

    घर में अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    पल्लवी की शादी अगले महीने कुणाल नाम के लड़के से तय हुई थी। कुणाल अच्छे परिवार से था, नौकरी करता था और परिवार के सभी लोगों को वह बहुत पसंद था।

     

    लेकिन पल्लवी उसे शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी।

     

    महेश ने धीरे से कहा, “कुणाल में ऐसी क्या कमी है?”

     

    “कमी कुणाल में नहीं है, पापा।”

     

    “तो फिर?”

     

    पल्लवी कुछ पल चुप रही।

     

    “कमी इस रिश्ते में नहीं… मेरे अंदर है।”

     

    महेश ने हैरानी से उसे देखा।

     

    “क्या मतलब?”

     

    पल्लवी ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं अभी शादी के लिए तैयार नहीं हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं अपनी जिंदगी का फैसला खुद करना चाहती हूं।”

     

    महेश ने गहरी सांस ली।

     

    “तुम्हें पढ़ने से किसने रोका? तुम्हें नौकरी करने से किसने रोका? हमने हमेशा तुम्हारा साथ दिया है।”

     

    “तो शादी के मामले में मेरी इच्छा क्यों नहीं पूछी?”

     

    यह सवाल सुनकर महेश चुप हो गए।

     

    पल्लवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “आपने लड़का देखा, परिवार देखा, नौकरी देखी… लेकिन मुझसे यह नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूं।”

     

    सुशीला उसके पास आईं।

     

    “बेटी, हमने तुमसे पूछा था।”

     

    पल्लवी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं मां। आपने पूछा था कि लड़का कैसा है। आपने ये नहीं पूछा कि मैं शादी के लिए तैयार हूं या नहीं।”

     

    महेश को अपनी गलती महसूस होने लगी।

     

    लेकिन समाज का डर उनके मन में था।

     

    उन्होंने कहा, “रिश्ता बहुत अच्छा है। हमने हां कर दी है। अब पीछे हटना अच्छा नहीं लगेगा।”

     

    पल्लवी ने गुस्से में कहा—

     

    “तो मेरी जिंदगी से ज्यादा जरूरी लोगों की बातें हैं?”

     

    महेश ने कुछ नहीं कहा।

     

    पल्लवी अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया।

     

    वह बिस्तर पर बैठकर रोने लगी।

     

    कुछ देर बाद उसकी मां कमरे में आईं।

     

    “पल्लवी…”

     

    “मां, मुझे अकेला छोड़ दो।”

     

    “मैं जानती हूं तुम परेशान हो।”

     

    पल्लवी ने आंसू पोंछे।

     

    “मां, मैं शादी के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन मैं सिर्फ इसलिए शादी नहीं करना चाहती क्योंकि उम्र हो गई है।”

     

    सुशीला उसके पास बैठ गईं।

     

    “क्या कोई और बात है?”

     

    पल्लवी कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, मैं अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हूं। मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं। मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि इतनी जल्दी मेरी शादी कर दी जाएगी।”

     

    सुशीला की आंखें भी भर आईं।

     

    “तुमने हमें पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “मैंने कई बार कोशिश की थी। लेकिन हर बार आपने कहा कि अच्छा रिश्ता बार-बार नहीं मिलता।”

     

    सुशीला के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    अगले दिन महेश ने पल्लवी से बात करने का फैसला किया।

     

    उन्होंने उसके कमरे में जाकर कहा—

     

    “बेटा, बैठो। आज मैं तुम्हारी बात सुनने आया हूं। बिना कोई फैसला सुनाए।”

     

    पल्लवी ने पहली बार अपने पिता की तरफ उम्मीद से देखा।

     

    महेश ने कहा—

     

    “मुझे बताओ, तुम असल में चाहती क्या हो?”

     

    पल्लवी ने धीरे से कहा—

     

    “मैं आगे पढ़ना चाहती हूं। फिर नौकरी करना चाहती हूं। और जब मुझे लगेगा कि मैं शादी के लिए तैयार हूं, तब शादी करूंगी।”

     

    महेश ने पूछा—

     

    “और अगर तब तक कुणाल जैसा रिश्ता नहीं मिला तो?”

     

    पल्लवी मुस्कुराई।

     

    “तो नहीं मिलेगा। शादी जिंदगी भर का रिश्ता है, पापा। सिर्फ इसलिए नहीं होनी चाहिए कि अभी अच्छा रिश्ता मिल गया है।”

     

    महेश की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उन्हें अचानक अपना बचपन याद आया।

     

    जब वह खुद अपनी पसंद की पढ़ाई करना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने कहा था कि परिवार की जिम्मेदारी पहले है।

     

    उन्होंने हमेशा उस बात का दुख अपने अंदर रखा था।

     

    और आज वह अनजाने में अपनी बेटी के साथ वही करने जा रहे थे।

     

    महेश ने पल्लवी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    पल्लवी चौंक गई।

     

    “पापा…”

     

    “मैंने सोचा कि मैं तुम्हारे लिए अच्छा कर रहा हूं। लेकिन मैंने तुम्हारी खुशी पूछना ही भूल गया।”

     

    पल्लवी रोते हुए अपने पिता से लिपट गई।

     

    “मुझे आपसे लड़ना नहीं था पापा। मैं बस चाहती थी कि आप मेरी बात सुनें।”

     

    महेश ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब तुम्हारी शादी तब होगी जब तुम खुद तैयार होगी।”

     

    अगले दिन महेश ने कुणाल के परिवार को बुलाया।

     

    घर में सभी थोड़े परेशान थे।

     

    कुणाल भी चुप बैठा था।

     

    महेश ने कहा—

     

    “हमें यह रिश्ता रोकना होगा।”

     

    कुणाल के पिता नाराज हुए।

     

    “लेकिन अचानक ऐसा क्यों?”

     

    महेश ने साफ कहा—

     

    “क्योंकि मेरी बेटी शादी के लिए तैयार नहीं है।”

     

    कुछ देर चुप्पी रही।

     

    तभी कुणाल ने पहली बार बात की।

     

    “अंकल, मैं पल्लवी से एक बात कहना चाहता हूं।”

     

    पल्लवी सामने आई।

     

    कुणाल ने कहा—

     

    “मुझे खुशी है कि तुमने अपनी बात साफ-साफ कही।”

     

    पल्लवी ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

     

    कुणाल मुस्कुराया।

     

    “मैं भी शादी जल्दी नहीं करना चाहता था। लेकिन परिवार के सामने बोल नहीं पाया।”

     

    महेश ने उसे देखा।

     

    “तो तुम भी तैयार नहीं थे?”

     

    कुणाल ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उसके पिता नाराज होकर बोले—

     

    “तुमने हमें बताया क्यों नहीं?”

     

    कुणाल ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

     

    “शायद मुझे भी पल्लवी की तरह अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं थी।”

     

    घर का माहौल अचानक बदल गया।

     

    दो परिवारों के बीच तनाव की जगह समझदारी ने ले ली।

     

    पल्लवी ने कुणाल से कहा—

     

    “शायद हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं।”

     

    कुणाल ने कहा—

     

    “शायद। और अगर कभी शादी का फैसला हुआ भी, तो हमारी मर्जी से होगा।”

     

    कुछ महीनों बाद पल्लवी ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर दी।

     

    महेश अब हर फैसला लेने से पहले उससे पूछते।

     

    एक दिन पल्लवी कॉलेज से घर लौटी तो उसने देखा कि उसके पिता उसके लिए मिठाई लेकर बैठे हैं।

     

    “क्या हुआ पापा?”

     

    महेश मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा कॉलेज में स्कॉलरशिप के लिए चयन हो गया।”

     

    पल्लवी खुशी से अपने पिता से लिपट गई।

     

    “पापा!”

     

    महेश ने कहा—

     

    “मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    पल्लवी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आपको बुरा नहीं लगता कि मैं अभी शादी नहीं कर रही?”

     

    महेश ने हंसकर कहा—

     

    “पहले मुझे लगता था कि बेटी की शादी कर देना मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।”

     

    फिर उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब समझ आया है कि बेटी को अपनी जिंदगी का फैसला लेने लायक बनाना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।”

     

    पल्लवी मुस्कुराई।

     

    उस दिन उसे लगा कि उसने शादी से इनकार करके अपने पिता को नहीं खोया।

     

    बल्कि पहली बार उसने अपने पिता को अपने साथ खड़ा पाया था।

     

    और महेश ने भी सीख लिया था—

     

    बेटी की जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला उसकी शादी नहीं, उसकी खुशी होती है।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • गोल्डन फिश रहस्मयी लड़का

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गोल्डन फिश और रहस्यमयी लड़का

     

    समुद्र से कुछ दूर बसे एक छोटे से तटीय शहर में एड्रियन नाम का 20 साल का लड़का रहता था। वह एक साधारण परिवार से था और अपने छोटे से घर में अपनी मां के साथ रहता था। उसके पिता कई साल पहले इस दुनिया से जा चुके थे।

     

    एड्रियन ज्यादा लोगों से घुलता-मिलता नहीं था। उसे समुद्र के किनारे घंटों बैठना पसंद था। उसका मानना था कि समुद्र के पास बैठकर इंसान अपने मन की सबसे बड़ी परेशानी भी भूल सकता है।

     

    एक शाम वह हमेशा की तरह समुद्र किनारे गया।

     

    उस दिन समुद्र कुछ ज्यादा ही उफान पर था। आसमान में बादल थे और तेज हवाएं चल रही थीं।

     

    एड्रियन वापस लौटने ही वाला था कि उसकी नजर रेत पर पड़ी एक चमकती हुई चीज पर गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    वह पास गया।

     

    वहां एक छोटी-सी सुनहरी मछली पड़ी थी।

     

    मछली बहुत खूबसूरत थी। उसके शरीर से हल्की सुनहरी रोशनी निकल रही थी।

     

    एड्रियन ने उसे सावधानी से उठाया और पास पड़े पानी के एक छोटे गड्ढे में डाल दिया।

     

    मछली कुछ पल तक शांत रही।

     

    फिर अचानक उसने इंसानी आवाज में कहा—

     

    “मुझे वापस समुद्र में मत छोड़ना।”

     

    एड्रियन डर के मारे पीछे हट गया।

     

    “तुम… बोल सकती हो?”

     

    मछली ने अपनी पूंछ हिलाई।

     

    “हां।”

     

    एड्रियन ने चारों तरफ देखा।

     

    “ये सपना तो नहीं है?”

     

    मछली ने कहा, “नहीं। और अगर तुमने मेरी मदद की तो मैं तुम्हारी भी मदद कर सकती हूं।”

     

    एड्रियन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    “मेरा नाम सेलेना है।”

     

    एड्रियन ने हैरानी से कहा, “एक मछली का नाम सेलेना?”

     

    “मैं कोई साधारण मछली नहीं हूं।”

     

    एड्रियन को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ।

     

    वह उसे अपने घर ले आया और एक बड़े कांच के बर्तन में पानी भरकर उसमें रख दिया।

     

    रात भर एड्रियन उसे देखता रहा।

     

    अगली सुबह उसने पूछा—

     

    “तुमने कहा था कि तुम मेरी मदद कर सकती हो। कैसे?”

     

    सेलेना ने कहा—

     

    “मैं तुम्हारी एक इच्छा पूरी कर सकती हूं।”

     

    एड्रियन मुस्कुराया।

     

    “तो मैं बहुत अमीर बनना चाहता हूं।”

     

    सेलेना कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “सोच लो। धन मांगना आसान है, लेकिन उसके साथ आने वाली चीजें हमेशा अच्छी नहीं होतीं।”

     

    एड्रियन ने कुछ नहीं मांगा।

     

    उसने कहा—

     

    “पहले मुझे बताओ कि तुम यहां आई कैसे?”

     

    सेलेना की आवाज अचानक गंभीर हो गई।

     

    “मैं समुद्र के उस हिस्से से आई हूं, जहां इंसानों का पहुंचना आसान नहीं। मेरे पीछे कुछ लोग पड़े हैं। अगर उन्होंने मुझे ढूंढ लिया तो मैं उनके हाथ लग जाऊंगी।”

     

    एड्रियन ने पूछा—

     

    “कौन लोग?”

     

    “एक आदमी है… विक्टर।”

     

    विक्टर शहर का एक बहुत अमीर और प्रभावशाली व्यापारी था। लोग कहते थे कि उसे समुद्र से जुड़ी पुरानी चीजों और रहस्यमयी वस्तुओं को इकट्ठा करने का जुनून था।

     

    सेलेना ने बताया कि विक्टर को उसके बारे में पता चल गया था।

     

    “वह मुझे पकड़कर मेरी शक्ति का इस्तेमाल करना चाहता है।”

     

    एड्रियन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन मैं तुम्हें उसके पास नहीं जाने दूंगा।”

     

    सेलेना ने पूछा—

     

    “तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता?”

     

    एड्रियन हंस पड़ा।

     

    “पहले लगा था। अब तुम मुझे मछली कम और दोस्त ज्यादा लगती हो।”

     

    उस दिन से सेलेना और एड्रियन की दोस्ती गहरी होने लगी।

     

    एड्रियन रोज उससे बातें करता।

     

    सेलेना भी उसे समुद्र के बारे में अनोखी बातें बताती।

     

    एक दिन उसने एड्रियन से कहा—

     

    “तुम्हारी मां बहुत परेशान रहती हैं।”

     

    एड्रियन ने सिर झुका लिया।

     

    “हम पर बहुत कर्ज है। मां चाहती हैं कि मैं अपनी पढ़ाई छोड़कर काम करूं।”

     

    सेलेना ने कहा—

     

    “तुम चाहो तो अपनी पहली इच्छा मांग सकते हो।”

     

    एड्रियन कुछ देर सोचता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “मैं चाहता हूं कि मेरी मां का कर्ज खत्म हो जाए।”

     

    सेलेना ने अपनी पूंछ पानी में घुमाई।

     

    अगली सुबह बैंक से खबर आई कि एड्रियन की मां के पुराने कर्ज की पूरी रकम किसी अज्ञात व्यक्ति ने चुका दी थी।

     

    एड्रियन हैरान था।

     

    उसे समझ आ गया कि सेलेना ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया था।

     

    लेकिन उसी दिन शहर में एक और खबर फैल गई।

     

    विक्टर को पता चल गया था कि सुनहरी मछली शहर में है।

     

    विक्टर ने अपने आदमियों को हर समुद्र किनारे भेज दिया।

     

    एड्रियन घबरा गया।

     

    “सेलेना, अब क्या होगा?”

     

    “हमें मुझे वापस समुद्र में पहुंचाना होगा।”

     

    “लेकिन अगर विक्टर ने तुम्हें रास्ते में पकड़ लिया तो?”

     

    “इसलिए तुम्हें मेरी मदद करनी होगी।”

     

    उस रात एड्रियन सेलेना को एक पुराने रास्ते से समुद्र तक ले गया।

     

    लेकिन जैसे ही वे समुद्र के पास पहुंचे, सामने विक्टर खड़ा था।

     

    उसके साथ कई आदमी थे।

     

    विक्टर मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार मुझे मेरी सुनहरी मछली मिल ही गई।”

     

    एड्रियन उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    “ये तुम्हारी नहीं है।”

     

    विक्टर ने कहा—

     

    “तुम नहीं जानते कि इसके पास कितनी ताकत है।”

     

    “मुझे उसकी ताकत नहीं चाहिए।”

     

    विक्टर हंसा।

     

    “तुम मूर्ख हो। अगर तुम्हारे पास यह मछली रहे तो तुम दुनिया के सबसे अमीर इंसान बन सकते हो।”

     

    एड्रियन ने कहा—

     

    “शायद। लेकिन किसी की आजादी छीनकर मिली दौलत मेरे किसी काम की नहीं।”

     

    विक्टर ने अपने आदमियों को आगे बढ़ने का इशारा किया।

     

    तभी समुद्र में अचानक तेज लहर उठी।

     

    आसमान में बिजली चमकी।

     

    सेलेना के शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

     

    विक्टर पीछे हट गया।

     

    सेलेना ने एड्रियन से कहा—

     

    “अब मुझे समुद्र में फेंक दो!”

     

    एड्रियन ने बिना देर किए उसे समुद्र में छोड़ दिया।

     

    जैसे ही सेलेना पानी में गई, समुद्र की लहरें अचानक शांत हो गईं।

     

    विक्टर और उसके आदमी कुछ समझ पाते, उससे पहले समुद्र की एक बड़ी लहर आई और उन्हें पीछे की ओर बहा ले गई।

     

    कुछ देर बाद सब शांत हो गया।

     

    एड्रियन समुद्र के किनारे बैठा रहा।

     

    उसे लगा कि उसने अपना सबसे अच्छा दोस्त खो दिया।

     

    तभी पानी के अंदर से सेलेना की आवाज आई—

     

    “एड्रियन!”

     

    वह चौंककर समुद्र की तरफ देखने लगा।

     

    सेलेना पानी के ऊपर आई।

     

    “तुमने मेरी आजादी बचाई। इसलिए आज से तुम्हें किसी जादुई इच्छा की जरूरत नहीं।”

     

    एड्रियन ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    सेलेना मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि तुम्हारे अंदर पहले से ही वह चीज है जो दुनिया के सबसे अमीर इंसानों के पास भी नहीं होती—एक साफ दिल।”

     

    एड्रियन की आंखें नम हो गईं।

     

    “क्या मैं तुम्हें फिर कभी देख पाऊंगा?”

     

    सेलेना ने कहा—

     

    “जब भी तुम्हें लगे कि तुम बिल्कुल अकेले हो, समुद्र के किनारे आ जाना।”

     

    इतना कहकर वह गहरे पानी में चली गई।

     

    एड्रियन कई देर तक समुद्र को देखता रहा।

     

    उस दिन के बाद उसकी जिंदगी धीरे-धीरे बदलने लगी।

     

    उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, एक छोटी-सी नौकरी शुरू की और अपनी मां का ख्याल रखने लगा।

     

    कई साल बाद भी वह हर रविवार समुद्र के किनारे जरूर जाता।

     

    लोग उसे देखकर पूछते—

     

    “तुम यहां किसका इंतजार करते हो?”

     

    एड्रियन बस मुस्कुरा देता।

     

    उसे पता था कि समुद्र की गहराइयों में उसकी एक ऐसी दोस्त रहती है, जिसे दुनिया शायद कभी देख भी न पाए।

     

    और कभी-कभी जब सूरज ढलने लगता, समुद्र की लहरों के बीच उसे एक हल्की सुनहरी चमक दिखाई देती।

     

    तब एड्रियन समझ जाता—

     

    सेलेना अब भी उसे याद करती है।

     

    और यही उस सुनहरी मछली की सबसे बड़ी जादुई शक्ति थी—उसने एड्रियन को दौलत नहीं दी थी।

     

    उसने उसे यह सिखाया था कि असली खुशी किसी जादुई इच्छा में नहीं, बल्कि किसी के लिए बिना किसी स्वार्थ के खड़े रहने में होती है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • दो घरों के बीच बटा एक आदमी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    दो घरों के बीच बंटा एक आदमी

     

    शहर से थोड़ा दूर बसे एक छोटे से गांव में शान अपने परिवार का सबसे बड़ा बेटा था। पिता की तबीयत अक्सर खराब रहती थी और घर की जिम्मेदारी धीरे-धीरे शान के कंधों पर आ गई थी। मां की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि बेटे का घर बस जाए, ताकि वह भी चैन से जी सके।

     

    शान की उम्र करीब पच्चीस साल थी, जब उसकी शादी परिवार वालों ने नंदिनी से कर दी।

     

    नंदिनी बहुत साधारण परिवार की शांत और समझदार लड़की थी। वह ज्यादा बोलती नहीं थी, लेकिन उसके मन में अपने पति और नए परिवार के लिए बहुत सम्मान था।

     

    शादी के बाद शान को नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा।

     

    जाते समय नंदिनी ने पूछा, “आप इतनी जल्दी चले जाएंगे?”

     

    शान ने मुस्कुराकर कहा, “क्या करूं? नौकरी है। कुछ साल मेहनत कर लूं, फिर तुम्हें भी अपने पास बुला लूंगा।”

     

    नंदिनी ने विश्वास से सिर हिला दिया।

     

    “मुझे आप पर भरोसा है।”

     

    शान शहर चला गया।

     

    कुछ महीनों बाद नंदिनी ने एक बेटे को जन्म दिया। उसका नाम रखा गया आरव।

     

    शान जब घर आया और पहली बार बेटे को गोद में उठाया तो उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “इतना छोटा है…”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “आपका बेटा है।”

     

    शान ने बच्चे के माथे को चूमा।

     

    “मैं इसके लिए बहुत कुछ करूंगा।”

     

    समय बीतता गया।

     

    दो साल बाद उनके घर दूसरा बेटा हुआ। उसका नाम रखा गया अंश।

     

    अब नंदिनी की पूरी दुनिया अपने दोनों बच्चों और शान के इर्द-गिर्द घूमती थी।

     

    शान हर महीने पैसे भेजता था। फोन पर बच्चों से बातें करता और नंदिनी से कहता—

     

    “बस थोड़ा और वक्त। फिर मैं तुम्हें और बच्चों को अपने पास ले आऊंगा।”

     

    नंदिनी हर बार यही कहती—

     

    “ठीक है, मैं इंतजार करूंगी।”

     

    लेकिन शहर की जिंदगी ने धीरे-धीरे शान को बदलना शुरू कर दिया।

     

    उसी शहर में उसके ऑफिस में रिया नाम की एक लड़की काम करती थी। दोनों की दोस्ती हुई और धीरे-धीरे वह दोस्ती ऐसी जगह पहुंच गई, जहां शान को अपनी पहली शादी, अपने बच्चों और नंदिनी का इंतजार सब कुछ छोटा लगने लगा।

     

    एक दिन रिया ने उससे कहा—

     

    “तुम हमेशा कहते हो कि तुम्हारा परिवार गांव में है। लेकिन तुम यहां अकेले रहते हो। आखिर कब तक?”

     

    शान ने नजरें झुका लीं।

     

    “मुझे पता नहीं।”

     

    रिया ने कहा, “अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो पुराने रिश्ते को खत्म कर दो।”

     

    शान चुप रहा।

     

    उसके मन में नंदिनी का चेहरा आया।

     

    लेकिन उसने उस आवाज को दबा दिया।

     

    कुछ ही समय बाद शान ने रिया से दूसरी शादी कर ली।

     

    उसने अपने परिवार को इसकी भनक तक नहीं लगने दी।

     

    गांव में नंदिनी अब भी उसका इंतजार कर रही थी।

     

    एक शाम दोनों बच्चे आंगन में खेल रहे थे।

     

    आरव ने पूछा, “मां, पापा कब आएंगे?”

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा, “जल्दी आएंगे बेटा।”

     

    अंश ने मासूमियत से पूछा, “पापा हमारे लिए खिलौना लाएंगे?”

     

    नंदिनी ने दोनों को गले लगा लिया।

     

    “हां, बहुत सारे खिलौने लाएंगे।”

     

    लेकिन उस रात नंदिनी के फोन पर शान का संदेश आया—

     

    “कुछ दिनों तक मुझे फोन मत करना। काम बहुत ज्यादा है।”

     

    नंदिनी को पहली बार कुछ अजीब लगा।

     

    उसने कई बार फोन किया, लेकिन शान ने फोन नहीं उठाया।

     

    कुछ दिन बाद शान के एक पुराने दोस्त ने नंदिनी को सच बता दिया।

     

    “भाभी… शान ने शहर में दूसरी शादी कर ली है।”

     

    नंदिनी कुछ पल तक बिल्कुल शांत बैठी रही।

     

    उसे लगा जैसे किसी ने उसके कानों में गलत बात कह दी हो।

     

    “क्या?”

     

    “मुझे बहुत पहले से पता था, लेकिन हिम्मत नहीं हुई बताने की।”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने अपने दोनों बच्चों को देखा।

     

    आरव और अंश अभी भी अपने पिता का इंतजार कर रहे थे।

     

    उस रात नंदिनी ने पहली बार अपने बच्चों के सामने रोने से खुद को रोक नहीं पाया।

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “मां, आपको क्या हुआ?”

     

    नंदिनी ने जल्दी से आंसू पोंछे।

     

    “कुछ नहीं बेटा।”

     

    “पापा ने आपको कुछ कहा?”

     

    नंदिनी ने उसे सीने से लगा लिया।

     

    “नहीं… तुम्हारे पापा ने कुछ नहीं कहा।”

     

    लेकिन उसके दिल में बहुत कुछ टूट चुका था।

     

    कुछ महीनों तक नंदिनी ने शान से कोई सवाल नहीं किया।

     

    वह बस अपने दोनों बच्चों को पालती रही।

     

    उधर शान अपनी दूसरी पत्नी रिया के साथ शहर में रहने लगा।

     

    शुरुआत में उसे लगा कि उसने अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा फैसला लिया है।

     

    लेकिन कुछ ही महीनों बाद रिया को शान की पहली शादी और बच्चों के बारे में पता चल गया।

     

    एक दिन उसने पूछा—

     

    “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि तुम्हारे दो बच्चे हैं?”

     

    शान चुप रहा।

     

    रिया ने गुस्से में कहा—

     

    “तुमने मेरे साथ भी झूठ बोला।”

     

    शान के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    जिस झूठ को वह अपनी पहली पत्नी से छिपा रहा था, वही झूठ अब उसके दूसरे रिश्ते को भी तोड़ने लगा था।

     

    एक दिन ऑफिस से लौटते समय शान को खबर मिली कि उसके पिता बहुत बीमार हैं।

     

    वह तुरंत गांव पहुंचा।

     

    घर के बाहर वही पुराना आंगन था।

     

    नंदिनी बच्चों के साथ बैठी थी।

     

    शान को देखते ही दोनों बच्चे दौड़ पड़े।

     

    “पापा!”

     

    आरव उससे लिपट गया।

     

    अंश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पापा, आप इतने दिनों बाद आए!”

     

    शान की आंखें भर आईं।

     

    उसने दोनों बच्चों को गले लगा लिया।

     

    फिर उसकी नजर नंदिनी पर पड़ी।

     

    वह पहले से बहुत शांत लग रही थी।

     

    शान ने धीमे से कहा—

     

    “नंदिनी…”

     

    नंदिनी ने सिर्फ इतना पूछा—

     

    “अब क्यों आए हो?”

     

    शान के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    “पापा बीमार हैं।”

     

    “मैं जानती हूं।”

     

    कुछ देर चुप्पी रही।

     

    फिर नंदिनी ने कहा—

     

    “तुमने दूसरी शादी कर ली, यह सुनकर मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का नहीं हुआ कि तुमने मुझे छोड़ दिया।”

     

    शान ने उसकी तरफ देखा।

     

    नंदिनी की आंखों में आंसू थे।

     

    “मुझे दुख इस बात का हुआ कि तुमने अपने बच्चों को भी छोड़ दिया।”

     

    शान सिर झुका कर खड़ा रहा।

     

    “आरव हर रात पूछता था कि पापा कब आएंगे। अंश तुम्हारे लिए दरवाजे पर बैठा रहता था।”

     

    शान की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “तुम्हें मुझसे प्यार नहीं था, ठीक है। लेकिन बच्चों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?”

     

    यह सवाल शान के दिल में उतर गया।

     

    वह पहली बार खुद को आईने में देख रहा था।

     

    उसे याद आया कि उसने कभी बच्चों से वादा किया था कि वह उनके लिए सब कुछ करेगा।

     

    लेकिन वह वादा भी वह भूल गया था।

     

    शान ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    नंदिनी ने सिर हिला दिया।

     

    “माफी मांगना आसान है शान। लेकिन जो साल तुमने हमसे छीन लिए, वो वापस नहीं आएंगे।”

     

    शान कुछ नहीं बोल पाया।

     

    उस दिन उसने अपने पिता के सामने भी सब सच स्वीकार कर लिया।

     

    पिता ने कमजोर आवाज में कहा—

     

    “बेटा, घर छोड़ना आसान होता है… लेकिन जिम्मेदारी से भागकर कोई खुश नहीं रह सकता।”

     

    शान के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    वह अपने बच्चों के पास गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “पापा, अब आप हमारे साथ रहोगे?”

     

    शान की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उसने बेटे को गले लगाकर कहा—

     

    “मैं तुम्हें फिर कभी अकेला महसूस नहीं होने दूंगा।”

     

    लेकिन नंदिनी ने तुरंत कहा—

     

    “बच्चों से किया वादा निभाना। मेरे लिए नहीं।”

     

    शान ने सिर झुका लिया।

     

    उसे समझ आ चुका था कि परिवार केवल एक छत के नीचे रहने का नाम नहीं है।

     

    परिवार वह रिश्ता है जिसमें किसी एक की खुशी के लिए दूसरे की पूरी जिंदगी नहीं कुचली जाती।

     

    शान ने अपनी गलतियों की जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया।

     

    उसने दूसरी पत्नी से भी सच-सच बात की और अपने दोनों बच्चों की जिम्मेदारी स्वीकार की।

     

    नंदिनी ने उसे वापस पति के रूप में स्वीकार किया या नहीं, यह फैसला उसने तुरंत नहीं किया।

     

    लेकिन एक मां होने के नाते उसने बच्चों को उनके पिता से दूर भी नहीं किया।

     

    समय के साथ शान रोज बच्चों से मिलने लगा।

     

    वह उनके स्कूल जाता, उनके साथ बैठता और उनकी छोटी-छोटी बातें सुनता।

     

    उसे अब समझ आ चुका था कि पैसे भेज देना पिता होने की पूरी जिम्मेदारी नहीं थी।

     

    कभी-कभी बच्चों को सिर्फ पिता की जरूरत होती है।

     

    और नंदिनी?

     

    उसने खुद को फिर से संभालना सीख लिया।

     

    उसने शान को माफ करने में समय लिया, क्योंकि टूटे हुए भरोसे को जोड़ना शब्दों से नहीं, सालों की सच्चाई से होता है।

     

    शान को आखिरकार समझ आया कि उसने दूसरी शादी करके कोई नया जीवन नहीं पाया था।

     

    उसने बस अपने पुराने जीवन की जिम्मेदारियों से भागने की कोशिश की थी।

     

    और जिम्मेदारियों से भागने वाला इंसान चाहे कितनी भी दूर चला जाए…

     

    एक दिन उसे अपने किए हुए फैसलों के सामने वापस खड़ा होना ही पड़ता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • महादेव माता पार्वती की नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बारिश में कैलाश की नोक-झोंक

    कैलाश पर्वत पर उस दिन सुबह से ही बादल घिरे हुए थे। ठंडी हवा चल रही थी और थोड़ी देर बाद बारिश की बूंदें गिरने लगीं। कैलाश का वातावरण और भी सुंदर हो गया था।

     

    माता पार्वती कैलाश के बाहर बैठकर बारिश देख रही थीं। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। तभी उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। महादेव हमेशा की तरह शांत बैठे ध्यान में मग्न थे।

     

    पार्वती जी ने कुछ देर उन्हें देखा और फिर बोलीं,

    “महादेव!”

     

    महादेव ने आँखें नहीं खोलीं।

     

    “महादेव…!”

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं आया।

     

    पार्वती जी थोड़ा पास गईं और बोलीं,

    “मैं आपसे बात कर रही हूँ।”

     

    महादेव ने धीरे से आँखें खोलीं।

     

    “कहो देवी।”

     

    पार्वती जी ने बाहर होती बारिश की ओर इशारा किया।

    “देखिए कितनी सुंदर बारिश हो रही है। चलिए बाहर चलते हैं।”

     

    महादेव ने शांत स्वर में कहा,

    “देवी, आप बाहर जाइए। मैं यहीं ठीक हूँ।”

     

    पार्वती जी ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “आप यहीं ठीक हैं? मतलब मेरे साथ बारिश में चलना आपको अच्छा नहीं लगता?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “ऐसी बात नहीं है।”

     

    “तो फिर चलिए।”

     

    “लेकिन मैं अभी ध्यान कर रहा था।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

    “आपका ध्यान तो हर समय चलता रहता है। कभी मेरे लिए भी समय निकाल लिया कीजिए।”

     

    महादेव कुछ बोलते, उससे पहले ही माता पार्वती उठकर बाहर चली गईं।

     

    वहाँ खड़े नंदी यह सब देख रहे थे। उन्होंने महादेव की तरफ देखा और फिर धीरे से अपना सिर हिला दिया।

     

    महादेव बोले,

    “नंदी, देवी आज कुछ अधिक ही नाराज़ लग रही हैं।”

     

    नंदी ने जैसे मन ही मन कहा हो—‘स्वामी, यह तो आपको ही समझना होगा।’

     

    महादेव बाहर आए। पार्वती जी बारिश में कुछ दूर खड़ी थीं। उन्होंने महादेव को आते देखा तो मुस्कुराने लगीं, लेकिन तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

     

    महादेव उनके पास जाकर बोले,

    “देवी, अब तो मैं आ गया।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “अब आने का क्या फायदा?”

     

    “क्यों?”

     

    “जब मैंने बुलाया था तब नहीं आए।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “तो क्या अब वापस चला जाऊँ?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको बस मौका चाहिए वापस जाने का!”

     

    महादेव ने हँसते हुए कहा,

    “नहीं देवी, मैं तो बस पूछ रहा था।”

     

    पार्वती जी ने बारिश की बूंदों को हथेली पर लेते हुए कहा,

    “मुझे बारिश बहुत पसंद है।”

     

    महादेव बोले,

    “यह तो मैं जानता हूँ।”

     

    “फिर भी आप मेरे साथ नहीं आए।”

     

    “अब तो आ गया।”

     

    “वो भी मेरे नाराज़ होने के बाद।”

     

    महादेव कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

    “देवी, अगर आप नाराज़ न होतीं तो शायद मुझे अपनी गलती का पता ही नहीं चलता।”

     

    पार्वती जी का गुस्सा थोड़ा कम हुआ।

     

    “अच्छा! तो आपको मानना है कि गलती आपकी थी?”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

    “हाँ।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

    “तो फिर क्षमा माँगिए।”

     

    महादेव ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “क्षमा कीजिए देवी।”

     

    पार्वती जी मुस्कुराने लगीं।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    “आपको मनाने में देर करूँगा तो बारिश खत्म हो जाएगी।”

     

    माता पार्वती हँस पड़ीं।

     

    तभी तेज हवा चली और बारिश की कुछ बूंदें महादेव के चेहरे पर पड़ीं। महादेव ने ऊपर देखा।

     

    “लगता है आज बादल भी बहुत प्रसन्न हैं।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “बादल प्रसन्न हैं या आपको देखकर हँस रहे हैं?”

     

    महादेव ने पूछा,

    “मुझे देखकर क्यों?”

     

    “क्योंकि आप बारिश में भी ऐसे ही बैठे रहेंगे जैसे ध्यान में बैठे हों।”

     

    महादेव हँसने लगे।

     

    “देवी, आप आज मेरी बहुत परीक्षा ले रही हैं।”

     

    “और आप हमेशा की तरह भोले बने हुए हैं।”

     

    दोनों कुछ देर बारिश में चलते रहे।

     

    अचानक पार्वती जी ने पीछे से पानी की कुछ बूंदें महादेव पर उछाल दीं।

     

    महादेव ने पलटकर देखा।

     

    “देवी!”

     

    पार्वती जी मासूम बनकर बोलीं,

    “क्या हुआ?”

     

    “आपने मुझ पर पानी डाला?”

     

    “मैंने? नहीं तो।”

     

    महादेव ने आसपास देखा।

     

    “यह पानी फिर कहाँ से आया?”

     

    पार्वती जी हँसने लगीं।

     

    “बारिश हो रही है महादेव। पानी तो आएगा ही।”

     

    महादेव समझ गए कि यह माता की शरारत थी।

     

    उन्होंने भी हाथ से थोड़ा पानी उठाया और पार्वती जी की ओर उछाल दिया।

     

    पार्वती जी पीछे हट गईं।

     

    “महादेव! आपने मुझ पर पानी डाला?”

     

    महादेव बोले,

    “मैंने? नहीं तो।”

     

    “अभी आपने ही डाला!”

     

    “बारिश हो रही है देवी। पानी तो आएगा ही।”

     

    पार्वती जी उनकी नकल सुनकर हँस पड़ीं।

     

    “आप भी ना!”

     

    तभी नंदी दूर से यह सब देख रहे थे। महादेव ने उन्हें देखा।

     

    “नंदी, तुम भी आ जाओ।”

     

    नंदी धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “नंदी को बीच में मत लाइए।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ये हमेशा आपका साथ देते हैं।”

     

    महादेव बोले,

    “नंदी मेरे वाहन हैं।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “और मैं आपकी पत्नी हूँ।”

     

    महादेव तुरंत बोले,

    “इसमें कोई संदेह नहीं देवी।”

     

    “तो फिर कभी मेरा पक्ष भी लिया कीजिए।”

     

    महादेव ने गंभीर होकर कहा,

    “मैं तो हमेशा आपका ही पक्ष लेता हूँ।”

     

    पार्वती जी ने आश्चर्य से पूछा,

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर अभी मेरी बात क्यों नहीं मान रहे थे?”

     

    महादेव कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले,

    “क्योंकि मैं चाहता था कि आप खुद मुझे बाहर लेकर आएँ।”

     

    पार्वती जी ने पूछा,

    “क्यों?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि जब आप मुझे अपने साथ चलने के लिए कहती हैं, तब कैलाश की सारी शांति भी मुझे छोटी लगने लगती है।”

     

    पार्वती जी कुछ पल उन्हें देखती रहीं।

     

    उनके चेहरे की नाराज़गी पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

    “आप कभी-कभी बहुत अच्छी बातें भी कर लेते हैं।”

     

    महादेव बोले,

    “कभी-कभी?”

     

    “हाँ, कभी-कभी।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    बारिश अब और तेज हो चुकी थी। चारों ओर पानी की बूंदों की आवाज गूँज रही थी।

     

    पार्वती जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “महादेव, चलिए।”

     

    महादेव ने उनका हाथ थाम लिया।

     

    “कहाँ?”

     

    “बारिश में थोड़ा और घूमने।”

     

    “अभी तो आप कह रही थीं कि मैं आपके साथ नहीं आया।”

     

    “अब शिकायत खत्म।”

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “हाँ, लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “आज आप ध्यान नहीं करेंगे।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “ठीक है।”

     

    “और मुझे अकेला भी नहीं छोड़ेंगे।”

     

    “यह भी ठीक है।”

     

    “और…”

     

    महादेव ने हँसकर पूछा,

    “और कितनी शर्तें हैं देवी?”

     

    पार्वती जी भी मुस्कुरा दीं।

    “बस एक आखिरी।”

    “कहो।”

    “आज की बारिश मेरे साथ देखेंगे।”

     

    महादेव ने उनकी ओर देखा और बोले,

    “यह शर्त तो मैं हर जन्म में मान लूँगा।”

    माता पार्वती मुस्कुरा उठीं।

    कैलाश पर बारिश होती रही। नंदी कुछ दूर खड़े उन्हें देखते रहे और शायद सोच रहे थे कि दुनिया में सबसे बड़ा रहस्य कोई मंत्र नहीं, बल्कि महादेव और माता पार्वती की यह छोटी-छोटी नोक-झोंक है, जिसमें नाराज़गी भी प्रेम होती है और मनाना भी प्रेम।

     

    उस दिन कैलाश की बारिश कुछ ज्यादा ही सुंदर थी, क्योंकि उसमें बादलों की बूंदों के साथ महादेव और माता पार्वती की हँसी भी घुली हुई थी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • एक राज़

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक राज, जिसका पता चल जाता तो उसका खात्मा हो जाता

     

    रुद्रपुर नाम का एक छोटा-सा शहर था। बाहर से देखने पर वह बिल्कुल शांत लगता था, लेकिन उस शहर के बीचों-बीच बनी एक पुरानी हवेली अपने अंदर ऐसा राज छिपाए बैठी थी, जिसके बारे में अगर किसी को पता चल जाता, तो कई लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकती थी।

     

    उस हवेली में रहने वाली थी काव्या।

     

    काव्या उम्र में जवान थी, शांत स्वभाव की और हमेशा अपने काम में लगी रहने वाली लड़की। शहर के लोग उसे एक साधारण लड़की समझते थे, लेकिन कोई नहीं जानता था कि पिछले सात सालों से वह एक ऐसा सच अपने सीने में दबाए घूम रही थी, जिसे जानने के लिए कई लोग कुछ भी करने को तैयार थे।

     

    उस राज की शुरुआत सात साल पहले हुई थी।

     

    तब काव्या सिर्फ सत्रह साल की थी।

     

    एक रात उसके पिता ने उसे अपने कमरे में बुलाया था। उनके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “काव्या, आज के बाद तुम मुझसे एक सवाल भी मत करना।”

     

    “लेकिन पापा हुआ क्या है?”

     

    उन्होंने कमरे का दरवाजा बंद किया और धीरे से बोले, “मेरे साथ कुछ भी हो जाए, इस हवेली के पीछे वाले कमरे में मत जाना। और सबसे जरूरी बात… किसी पर भरोसा मत करना।”

     

    काव्या कुछ समझ पाती, उससे पहले ही बाहर तेज आवाज हुई।

     

    उसके पिता घबरा गए।

     

    उन्होंने एक छोटी-सी लोहे की चाबी काव्या के हाथ में रखी और कहा, “इसे संभालकर रखना। जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम्हारे आसपास के लोग तुम्हें नुकसान पहुंचाना चाहते हैं, उस दिन इस चाबी का इस्तेमाल करना।”

     

    “इससे क्या खुलेगा?”

     

    पिता ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “एक ऐसा सच… जिसके सामने आने से बहुत लोगों का खात्मा हो सकता है।”

     

    उस रात उसके पिता गायब हो गए।

     

    अगले दिन शहर में खबर फैली कि उनकी गाड़ी पहाड़ी रास्ते में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी।

     

    लेकिन काव्या को कभी इस बात पर विश्वास नहीं हुआ।

     

    सात साल तक उसने उस चाबी को अपने पास छिपाकर रखा।

     

    फिर एक दिन हवेली में एक अजनबी आदमी आया।

     

    उसका नाम था विराज।

     

    वह खुद को काव्या के पिता का पुराना दोस्त बता रहा था।

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे तुम्हारी जिम्मेदारी दी थी,” विराज ने कहा।

     

    काव्या ने उसे गौर से देखा।

     

    “अगर आप उनके दोस्त थे, तो इतने साल कहां थे?”

     

    विराज कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि मैं जानता था कि तुम्हारे पिता की मौत हादसा नहीं थी।”

     

    काव्या के हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा।

     

    “आप क्या कह रहे हैं?”

     

    विराज ने धीमे स्वर में कहा, “तुम्हारे पिता ने जिस राज को छिपाया था, वह आज भी जिंदा है।”

     

    काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “कौन-सा राज?”

     

    विराज ने चारों तरफ देखा।

     

    “यह बात यहां नहीं हो सकती।”

     

    उसी रात काव्या को पहली बार महसूस हुआ कि हवेली के बाहर कोई उसे देख रहा है।

     

    खिड़की के पास जाकर उसने देखा तो दूर सड़क पर एक काली गाड़ी खड़ी थी।

     

    गाड़ी में कोई बैठा था।

     

    काव्या ने पर्दा बंद कर दिया।

     

    सुबह वह गाड़ी वहां नहीं थी।

     

    विराज ने काव्या को समझाया कि उसे कुछ दिनों के लिए हवेली छोड़ देनी चाहिए।

     

    लेकिन काव्या ने मना कर दिया।

     

    “मैं भागती रही तो यह राज कभी सामने नहीं आएगा।”

     

    विराज ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हें पता भी है कि तुम्हारे पिता ने क्या खोजा था?”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    विराज ने कहा, “तुम्हारे पिता ने सात साल पहले शहर के सबसे बड़े कारोबारियों और कुछ बड़े अधिकारियों के बीच चल रहे एक गुप्त सौदे का पता लगाया था। शहर के गरीब लोगों की जमीन बहुत कम कीमत में हथियाकर करोड़ों में बेची जा रही थी।”

     

    “लेकिन इसका मेरे पिता से क्या लेना-देना था?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता के पास उस पूरे खेल के सबूत थे।”

     

    काव्या की सांसें थम गईं।

     

    “और वह सबूत?”

     

    विराज ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “यहीं कहीं छिपा है।”

     

    काव्या को अचानक अपने पिता की दी हुई चाबी याद आई।

     

    उसी रात उसने हवेली के पीछे वाले कमरे का दरवाजा खोला।

     

    कमरा वर्षों से बंद था।

     

    धूल से भरी अलमारी, पुरानी किताबें और एक टूटी मेज।

     

    काव्या ने हर जगह तलाश की, लेकिन कुछ नहीं मिला।

     

    तभी उसकी नजर फर्श पर पड़ी।

     

    एक पत्थर बाकी पत्थरों से थोड़ा अलग था।

     

    उसने उसे हटाया।

     

    नीचे एक लोहे का छोटा डिब्बा था।

     

    काव्या के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने चाबी निकाली।

     

    चाबी ताले में बिल्कुल फिट बैठ गई।

     

    डिब्बा खुलते ही अंदर कुछ कागज, एक पुरानी डायरी और एक तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर देखकर काव्या सन्न रह गई।

     

    उसमें उसके पिता के साथ शहर के कई बड़े लोग खड़े थे।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे लिखी एक लाइन ने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी—

     

    “इनमें से किसी एक ने तुम्हारे पिता को धोखा दिया था।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई।

     

    “तुम्हें वह डिब्बा नहीं खोलना चाहिए था।”

     

    काव्या तेजी से पलटी।

     

    दरवाजे पर विराज खड़ा था।

     

    “आप?”

     

    विराज धीरे-धीरे कमरे में आया।

     

    काव्या पीछे हट गई।

     

    “आपको कैसे पता था कि मैं यहां हूं?”

     

    विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    काव्या ने डायरी अपने पीछे छिपा ली।

     

    “आप मेरे पिता के दोस्त नहीं हैं, है ना?”

     

    विराज की आंखों में अजीब-सी उदासी थी।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर कौन हैं आप?”

     

    विराज ने कहा, “वही आदमी जिसे तुम्हारे पिता ने आखिरी बार भरोसे के लायक समझा था।”

     

    “तो आपने इतने साल मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    तभी बाहर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    दोनों चौंक गए।

     

    विराज ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    काली गाड़ी फिर हवेली के सामने खड़ी थी।

     

    उसने तुरंत कहा, “अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

     

    काव्या ने पूछा, “कौन लोग हैं?”

     

    विराज ने डायरी की ओर इशारा किया।

     

    “तुम्हारे पिता ने इस डायरी में असली नाम लिखा था। अगर वह डायरी गलत हाथों में चली गई, तो तुम्हारा खात्मा तय है।”

     

    काव्या ने डायरी कसकर पकड़ ली।

     

    “लेकिन मैं इसे छिपाऊंगी नहीं।”

     

    विराज ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्यों?”

     

    काव्या की आंखों में पहली बार डर की जगह हिम्मत थी।

     

    “क्योंकि मेरे पिता इसी सच की वजह से मारे गए। मैं उनकी कुर्बानी बेकार नहीं जाने दूंगी।”

     

    अचानक हवेली के बाहर किसी ने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    विराज ने काव्या का हाथ पकड़ा।

     

    “पीछे का रास्ता अभी भी खुला है। हमें निकलना होगा।”

     

    दोनों पिछली खिड़की से बाहर निकल गए।

     

    लेकिन काव्या की नजर डायरी के आखिरी पन्ने पर पड़ी।

     

    वहां सिर्फ एक नाम लिखा था।

     

    विराज।

     

    काव्या के कदम रुक गए।

     

    विराज ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    उनकी आंखें मिल गईं।

     

    काव्या ने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “मेरे पिता ने आपका नाम क्यों लिखा था?”

     

    विराज कुछ नहीं बोला।

     

    बस इतना कहा—

     

    “क्योंकि जिस राज को तुम बचाने निकली हो… उसकी शुरुआत मुझसे ही हुई थी।”

     

    काव्या के चेहरे पर हैरानी जम गई।

     

    और तभी पीछे से हवेली का दरवाजा खुला।

     

    किसी ने धीमे से कहा—

     

    “विराज, अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    काव्या ने पलटकर देखा।

     

    दरवाजे पर खड़ा आदमी वही था, जिसकी तस्वीर उसके पिता की डायरी में सबसे ऊपर लगी थी।

     

    और उस आदमी को देखकर विराज ने पहली बार डरकर कहा—

     

    “काव्या… अब तुम्हें मुझ पर भरोसा करना ही पड़ेगा।”

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