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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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  • साथियों से बिछड़ गया

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    बादलों का गुच्छा जो अपने साथियों से बिछड़ गया 

     

    तूफान लगातार बढ़ता जा रहा था।

     

    एक तरफ बादलू था और दूसरी तरफ उसके साथी।

     

    बीच में काले बादलों और तेज हवाओं की एक बड़ी दीवार खड़ी थी।

     

    धवल बार-बार चिल्ला रहा था—

     

    “बादलू! हमारी तरफ मत आना! तूफान बहुत तेज है!”

     

    लेकिन बादलू अपने दोस्तों को देखकर रुकना नहीं चाहता था।

     

    वह बोला—

     

    “मैं तुम्हें छोड़कर फिर कहीं नहीं जाऊँगा!”

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    हवा उसे पीछे धकेल रही थी।

     

    कभी वह ऊपर चला जाता, कभी नीचे।

     

    उसने अपनी पूरी ताकत लगाई।

     

    धीरे-धीरे वह तूफान की दीवार के पास पहुँच गया।

     

    लेकिन तभी बिजली चमकी और जोरदार गरज हुई।

     

    बादलू डरकर पीछे हट गया।

     

    उसने पहली बार समझा कि सिर्फ अपने साथियों तक पहुँचने की इच्छा काफी नहीं थी। उसे सही रास्ता भी खोजना होगा।

     

    तभी उसे बूढ़े पेड़ की बात याद आई—

     

    “हवा को दुश्मन मत समझना। वही हवा तुम्हें उनके पास पहुँचा सकती है।”

     

    बादलू ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने हवा को महसूस किया।

     

    एक दिशा से हवा बहुत तेज आ रही थी, लेकिन दूसरी दिशा में हवा धीरे-धीरे घूम रही थी।

     

    बादलू ने उसी दिशा को चुना।

     

    वह सीधे तूफान में जाने के बजाय उसके किनारे-किनारे आगे बढ़ने लगा।

     

    कुछ देर बाद तूफान थोड़ा कमजोर हुआ।

     

    धवल ने उसे देखा।

     

    “बादलू! अब दाईं तरफ आओ!”

     

    बादलू धवल की बताई दिशा में बढ़ने लगा।

     

    धीरे-धीरे दोनों के बीच की दूरी कम होने लगी।

     

    और आखिरकार…

     

    बादलू अपने साथियों के पास पहुँच गया।

     

    धवल ने उसे देखते ही कहा—

     

    “तुम्हें पता है हमने तुम्हें कितना ढूँढ़ा?”

     

    बादलू की आँखों में खुशी थी।

     

    “मुझे लगा था मैं तुम्हें कभी नहीं देख पाऊँगा।”

     

    बाकी बादल भी उसके चारों तरफ इकट्ठा हो गए।

     

    एक छोटा सा बादल बोला—

     

    “तुम बहुत बदल गए हो।”

     

    बादलू ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    छोटे बादल ने कहा—

     

    “पहले तुम्हें सिर्फ दूर-दूर घूमना था। अब तुम वापस आने की बात कर रहे हो।”

     

    सभी हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी धवल ने कहा—

     

    “हमें जल्दी आगे बढ़ना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    धवल ने नीचे धरती की तरफ इशारा किया।

     

    “देखो।”

     

    नीचे एक बहुत बड़ा इलाका सूखा पड़ा था।

     

    नदियाँ छोटी हो गई थीं।

     

    तालाब लगभग सूख चुके थे।

     

    खेतों में फसल मुरझा रही थी।

     

    बादलू को उस छोटे गांव की याद आ गई, जहाँ उसने थोड़ी-सी बारिश की थी।

     

    उसने कहा—

     

    “हमें बारिश करनी होगी।”

     

    एक बड़ा बादल बोला—

     

    “लेकिन हमारे पास इतना पानी नहीं है।”

     

    बादलू ने कहा—

     

    “अगर हम सब एक साथ मिल जाएँ तो?”

     

    धवल ने उसकी बात समझ ली।

     

    “तुम कहना चाहते हो कि हमें अपना पानी एक जगह इकट्ठा करना चाहिए?”

     

    “हाँ।”

     

    सभी बादल एक साथ आने लगे।

     

    हवा भी उनकी मदद करने लगी।

     

    धीरे-धीरे बादलों का बड़ा गुच्छा तैयार हो गया।

     

    पहले एक बूंद गिरी।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    नीचे खेतों में पानी पहुँचने लगा।

     

    सूखी नदी में हल्की धारा बहने लगी।

     

    गांव के लोग घरों से बाहर निकल आए।

     

    वही छोटी बच्ची जिसने पहले बारिश के लिए आसमान की ओर देखा था, खुशी से चिल्लाई—

     

    “बारिश आ गई!”

     

    बादलू उसे ऊपर से देख रहा था।

     

    उसके मन में एक अलग ही खुशी थी।

     

    धवल ने कहा—

     

    “अब समझ आया कि तुम उस दिन अकेले होकर भी इतने खुश क्यों थे।”

     

    बादलू ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    धवल बोला—

     

    “क्योंकि तुमने किसी की मदद की थी।”

     

    बादलू मुस्कुराया।

     

    “हाँ। उस दिन मुझे लगा था कि मैं अपने साथियों से बिछड़ गया हूँ। लेकिन शायद उसी वजह से मैं उस गांव तक पहुँच पाया।”

     

    कुछ दिनों बाद मौसम साफ हो गया।

     

    बादलों का गुच्छा फिर अपने पुराने रास्ते पर चल पड़ा।

     

    बादलू अब पहले जैसा नहीं था।

     

    उसे अभी भी नई जगहें देखना पसंद था, लेकिन अब वह बिना बताए कहीं नहीं जाता था।

     

    एक दिन उसने धवल से कहा—

     

    “अगर मैं फिर कभी दूर जाना चाहूँ तो?”

     

    धवल ने हँसकर कहा—

     

    “तो पहले हमें बताना।”

     

    “और अगर हवा मुझे उड़ा ले गई?”

     

    “तो हम तुम्हें ढूँढ़ने निकल पड़ेंगे।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    समय बीतता गया।

     

    बादलू ने कई जगहों पर बारिश की।

     

    कहीं सूखे खेतों को पानी मिला, कहीं जंगलों को नई हरियाली मिली और कहीं छोटे बच्चों ने बारिश में खेलकर खुशी मनाई।

     

    एक दिन वही बूढ़ा पेड़ दूर से बादलू को देख रहा था।

     

    बादलू ने उसे पहचान लिया।

     

    वह नीचे आया और बोला—

     

    “आपने सही कहा था। कभी-कभी रास्ता भटकना जरूरी होता है।”

     

    बूढ़ा पेड़ मुस्कुराया।

     

    “अब तुम्हें समझ आया?”

     

    बादलू ने कहा—

     

    “हाँ। मैं अपने साथियों से बिछड़ा जरूर था, लेकिन उस सफर ने मुझे अपने बारे में बहुत कुछ सिखाया।”

     

    पेड़ ने पूछा—

     

    “और सबसे बड़ी बात?”

     

    बादलू ने आसमान में अपने साथियों की ओर देखा।

     

    “कि अकेले उड़ना अच्छा लग सकता है, लेकिन अपनों के साथ लौटना उससे भी ज्यादा खूबसूरत होता है।”

     

    धवल ने दूर से आवाज लगाई—

     

    “बादलू! चलो!”

     

    बादलू मुस्कुराया और अपने साथियों के पास लौट गया।

     

    उस दिन से बादलों का वह गुच्छा हमेशा साथ-साथ चलता।

     

    कभी कोई बादल थोड़ा दूर निकल जाता तो बाकी उसे आवाज देकर वापस बुला लेते।

     

    और जब भी तेज हवा चलती, बादलू सबसे पहले कहता—

     

    “सब साथ रहना!”

     

    सभी हँसते और एक-दूसरे के करीब आ जाते।

     

    कहते हैं, आसमान में बादलों के कई गुच्छे आज भी एक साथ चलते दिखाई देते हैं।

     

    शायद उनमें से कोई बादलू का परिवार भी हो।

     

    और जब कभी कोई छोटा सा बादल अपने साथियों से दूर चला जाता है, तो हवा उसके कानों में जैसे एक बात कहती है—

     

    “रास्ते कितने भी लंबे हों, अगर अपने साथ हों तो कोई भी सफर मुश्किल नहीं होता।”

     

    और बादलू की कहानी हमें यही सिखाती है कि कभी-कभी जिंदगी हमें अपनों से दूर जरूर ले जाती है, लेकिन अगर दिल में उनका प्यार और वापस लौटने की इच्छा हो, तो कोई दूरी हमेशा के लिए नहीं रहती।

     

    समाप्त।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बादलों का गुच्छा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बादलों का गुच्छा जो अपने साथियों से बिछड़ गया — भाग 1

     

    आसमान के बहुत ऊपर, नीले आकाश के बीच सफेद-सफेद बादलों का एक बड़ा सा गुच्छा रहता था। उसका नाम था बादलू। बादलू बाकी बादलों से थोड़ा अलग था। वह बहुत चंचल था, हर समय इधर-उधर घूमता रहता और नई-नई जगहें देखने का सपना देखता था।

     

    उसका सबसे अच्छा दोस्त था धवल, जो हमेशा उसे समझाता था।

     

    “बादलू, ज्यादा दूर मत जाना। हवा कभी भी अपना रुख बदल सकती है।”

     

    बादलू हँसकर कहता, “अरे धवल, मैं कोई छोटा बच्चा थोड़ी हूँ। देखना, एक दिन मैं पूरे आसमान की सैर करके आऊँगा।”

     

    उनका पूरा बादलों का परिवार एक साथ रहता था। सुबह सूरज निकलता तो बादल चमकने लगते। शाम को आसमान नारंगी हो जाता तो सभी बादल एक-दूसरे के पास आकर दिनभर की बातें करते।

     

    बादलू को अपने साथियों के साथ रहना बहुत अच्छा लगता था, लेकिन उसके मन में हमेशा एक सवाल रहता था—

     

    “आखिर आसमान के उस पार क्या है?”

     

    एक दिन हवा बहुत तेज चल रही थी।

     

    धवल ने कहा, “आज कहीं मत जाना। हवा बहुत तेज है।”

     

    बादलू बोला, “बस थोड़ी दूर तक जाऊँगा। फिर वापस आ जाऊँगा।”

     

    वह धीरे-धीरे अपने साथियों से अलग होकर आगे बढ़ने लगा।

     

    शुरुआत में सब ठीक था।

     

    हवा उसे हल्के-हल्के आगे ले जा रही थी। बादलू नीचे धरती को देखकर खुश हो रहा था।

     

    नीचे हरे-भरे खेत थे, छोटी-छोटी नदियाँ थीं और गांवों के बीच बने घर खिलौनों जैसे लग रहे थे।

     

    “वाह! दुनिया तो कितनी बड़ी है!” बादलू ने कहा।

     

    लेकिन तभी हवा अचानक बहुत तेज हो गई।

     

    बादलू संभल नहीं पाया।

     

    “अरे! रुको!”

     

    हवा उसे तेजी से अपने साथ बहाकर दूर ले गई।

     

    बादलू ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    उसके साथी अब बहुत छोटे दिखाई दे रहे थे।

     

    “धवल!”

     

    उसने जोर से आवाज लगाई।

     

    लेकिन तेज हवा में उसकी आवाज कहीं खो गई।

     

    कुछ ही देर में उसके साथी पूरी तरह दिखाई देना बंद हो गए।

     

    अब बादलू अकेला था।

     

    पहली बार उसे अपने फैसले पर पछतावा हुआ।

     

    “काश मैंने धवल की बात मान ली होती।”

     

    हवा उसे एक अनजान इलाके में ले गई।

     

    वहाँ आसमान बहुत साफ था। आसपास कोई दूसरा बादल नहीं था।

     

    बादलू ने चारों तरफ देखा।

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    कुछ समय बाद उसे नीचे एक छोटा सा गांव दिखाई दिया।

     

    गांव के लोग आसमान की ओर देख रहे थे।

     

    बादलू ने ध्यान से देखा तो खेत सूखे हुए थे।

     

    तालाब में पानी बहुत कम था।

     

    पेड़ों के पत्ते भी मुरझाए हुए थे।

     

    एक छोटी बच्ची अपने पिता से पूछ रही थी—

     

    “पिताजी, बारिश कब होगी?”

     

    पिता ने उदास होकर कहा—

     

    “पता नहीं बेटी। अगर जल्द बारिश नहीं हुई तो फसल खराब हो जाएगी।”

     

    बादलू को बहुत दुख हुआ।

     

    वह खुद भी बारिश का बादल था, लेकिन इस समय उसके पास बारिश करने जितना पानी नहीं था।

     

    फिर भी उसने कोशिश की।

     

    वह गांव के ऊपर जाकर रुका और अपने अंदर जमा थोड़ी-सी नमी को बूंदों में बदलने लगा।

     

    टप…

     

    एक बूंद नीचे गिरी।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    बच्ची ने आसमान की ओर देखा।

     

    “बारिश!”

     

    लोग खुशी से बाहर आ गए।

     

    बादलू ने जितना पानी उसके पास था, सब बरसा दिया।

     

    लेकिन कुछ ही मिनटों में उसकी सारी नमी खत्म हो गई।

     

    वह फिर हल्का होकर आसमान में तैरने लगा।

     

    गांव में लोगों के चेहरे पर मुस्कान देखकर उसे खुशी हुई।

     

    लेकिन उसके मन में अपने साथियों की याद और भी बढ़ गई।

     

    “अगर धवल यहाँ होता तो मैं उसे बताता कि मैंने आज किसी की मदद की।”

     

    उसी समय एक बूढ़ा पेड़ हवा में झूमते हुए बोला—

     

    “बादल, तुम उदास क्यों हो?”

     

    बादलू चौंक गया।

     

    “आपने मुझे देखा?”

     

    पेड़ हँसा।

     

    “मैंने तुम्हें आते हुए देखा था। तुम बाकी बादलों जैसे नहीं हो। तुम्हारे चेहरे पर खुशी भी है और चिंता भी।”

     

    बादलू ने अपनी पूरी कहानी पेड़ को बता दी।

     

    पेड़ ने कहा—

     

    “कभी-कभी रास्ता भटकना भी जरूरी होता है। इससे हमें पता चलता है कि हम वास्तव में किसके लिए बने हैं।”

     

    बादलू बोला—

     

    “लेकिन मुझे अपने साथियों के पास वापस जाना है।”

     

    पेड़ ने कहा—

     

    “तो रास्ता खोजो। मगर याद रखना, हवा को सिर्फ दुश्मन मत समझना। वही हवा तुम्हें उनके पास भी पहुँचा सकती है।”

     

    बादलू ने उम्मीद से आसमान की तरफ देखा।

     

    उसी समय दूर से ठंडी हवा आई।

     

    बादलू ने महसूस किया कि यह हवा बाकी हवाओं से अलग थी।

     

    वह एक दिशा में लगातार बह रही थी।

     

    “शायद यही रास्ता है!”

     

    बादलू हवा के साथ आगे बढ़ गया।

     

    कई घंटे बीत गए।

     

    लेकिन उसके साथी कहीं दिखाई नहीं दिए।

     

    अचानक आसमान में काले बादल छाने लगे।

     

    बादलू डर गया।

     

    उसने देखा कि बिजली चमक रही थी।

     

    तेज हवा और गरज ने पूरे आसमान को घेर लिया।

     

    वह पीछे हटने की कोशिश करने लगा, लेकिन तूफान ने उसे अपने बीच खींच लिया।

     

    “मैं कहाँ आ गया?”

     

    बादलू चारों तरफ घूम रहा था।

     

    उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी बिजली चमकी और उसे दूर एक बड़ी सी सफेद आकृति दिखाई दी।

     

    वह कोई पहाड़ नहीं था।

     

    वह बादलों का एक विशाल समूह था।

     

    बादलू ने उम्मीद से पुकारा—

     

    “क्या मेरे साथी वहाँ हैं?”

     

    लेकिन तूफान की आवाज इतनी तेज थी कि उसे कोई जवाब नहीं मिला।

     

    वह उस विशाल बादल समूह की तरफ बढ़ने लगा।

     

    जैसे ही वह पास पहुँचा, उसे एक परिचित आवाज सुनाई दी—

     

    “बादलू!”

     

    बादलू अचानक रुक गया।

     

    यह आवाज…

     

    यह तो धवल की थी!

     

    उसने पूरी ताकत से पुकारा—

     

    “धवल!”

     

    तूफान के बीच से जवाब आया—

     

    “बादलू, तुम कहाँ थे?”

     

    बादलू खुशी से भर गया।

     

    लेकिन तभी तेज हवा ने दोनों को फिर अलग-अलग दिशाओं में धकेल दिया।

     

    “धवल!”

     

    “बादलू!”

     

    दोनों एक-दूसरे को पुकारते रहे।

     

    लेकिन तूफान और तेज होता गया।

     

    और तभी बादलू ने देखा कि धवल के पीछे उसका पूरा बादलों का परिवार मौजूद था।

     

    वे सभी उसे ढूँढ़ते हुए यहाँ तक पहुँच गए थे।

     

    लेकिन उनके बीच एक बड़ी काली आँधी खड़ी थी।

     

    बादलू ने सोचा—

     

    “क्या मैं अपने साथियों तक पहुँच पाऊँगा?”

     

    उसे नहीं पता था कि अगले कुछ पल उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाले थे।

     

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • सुनहरी पंखों वाली

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी — भाग 2

     

    सुनहरी रोशनी पूरे महल पर फैल चुकी थी।

     

    सुवर्णा अपने पंखों को देखकर खुद भी डर गई थी। उसके पंख पहले से कहीं ज्यादा चमक रहे थे।

     

    राजा वीरेंद्र ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “सुवर्णा, ध्यान से सुनो। तुम्हें उस पक्षी के पीछे नहीं जाना है।”

     

    “लेकिन आपने कहा था कि वह मुझे लेने आया है।”

     

    “हाँ… लेकिन मुझे नहीं पता कि वह तुम्हें कहाँ ले जाएगा।”

     

    महल के बाहर कालकेतु की सेना आगे बढ़ रही थी।

     

    राजा ने गुप्त रास्ता खोल दिया।

     

    “अब जाओ।”

     

    “और आप?”

     

    राजा मुस्कुराए।

     

    “एक पिता अपनी बेटी के लिए इतना तो कर ही सकता है।”

     

    सुवर्णा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैं वापस आऊँगी।”

     

    वह गुप्त रास्ते से जंगल में निकल गई।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसके सुनहरे पंख फिर चमकने लगे।

     

    आसमान में वही विशाल पक्षी उसके ऊपर मंडराने लगा।

     

    सुवर्णा ने कहा, “अगर तुम मुझे सच में जानते हो, तो मुझे रास्ता दिखाओ।”

     

    पक्षी आगे उड़ गया।

     

    सुवर्णा उसके पीछे उड़ने लगी।

     

    काफी देर बाद वह जंगल के बीच एक पुराने मंदिर के सामने पहुँची।

     

    मंदिर के दरवाजे पर वही सुनहरा सूरज बना था।

     

    जैसे ही सुवर्णा ने दरवाजे को छुआ, वह अपने आप खुल गया।

     

    अंदर एक बूढ़ी औरत बैठी थी।

     

    वही औरत जिसने उसे पहली बार उड़ते हुए देखा था।

     

    “तुम कौन हो?” सुवर्णा ने पूछा।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “मैं तुम्हारी दादी की रखवाली करती थी।”

     

    सुवर्णा चौंक गई।

     

    “मेरी दादी?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारी असली दादी एक साधारण रानी नहीं थीं। वह सुनहरे पंखों वाले लोगों की आखिरी रानी थीं।”

     

    सुवर्णा ने अपने पंखों को देखा।

     

    “तो ये पंख मुझे उनसे मिले हैं?”

     

    “हाँ। लेकिन तुम्हारे पंखों की असली शक्ति अभी जागी नहीं है।”

     

    “उसे कैसे जगाया जा सकता है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “शक्ति पंखों में नहीं होती, सुवर्णा। शक्ति उस दिल में होती है जो उनका इस्तेमाल करता है।”

     

    उसी समय मंदिर के बाहर घोड़ों की आवाज सुनाई दी।

     

    कालकेतु वहाँ पहुँच चुका था।

     

    बूढ़ी औरत ने सुवर्णा को पीछे की तरफ ले जाकर एक गुप्त दरवाजा खोला।

     

    “तुम्हें उस पहाड़ की चोटी पर जाना होगा। वहाँ तुम्हें अपने सवालों का आखिरी जवाब मिलेगा।”

     

    “और मेरे पिता?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी ओर देखा।

     

    “अगर तुमने समय रहते अपनी शक्ति समझ ली, तो शायद तुम उन्हें बचा सको।”

     

    सुवर्णा पहाड़ की ओर उड़ चली।

     

    इधर कालकेतु ने महल पर कब्जा कर लिया था।

     

    वह राजा वीरेंद्र के सामने खड़ा था।

     

    “अब बताइए, राजकुमारी कहाँ है?”

     

    राजा ने कुछ नहीं कहा।

     

    कालकेतु ने गुस्से में कहा—

     

    “आप समझते क्यों नहीं? उसके पंखों की शक्ति से मैं पूरे संसार का सबसे ताकतवर राजा बन सकता हूँ!”

     

    राजा ने शांत स्वर में कहा—

     

    “तुम उसकी शक्ति कभी हासिल नहीं कर पाओगे।”

     

    उधर सुवर्णा पहाड़ की चोटी पर पहुँच चुकी थी।

     

    वहाँ उसे एक विशाल पत्थर दिखाई दिया।

     

    पत्थर पर लिखा था—

     

    “जिस दिन सुनहरी राजकुमारी अपने लिए नहीं, किसी और के लिए अपने पंख खोलेगी, उसी दिन उसकी असली शक्ति जागेगी।”

     

    सुवर्णा कुछ समझ नहीं पाई।

     

    तभी उसे दूर से आवाज सुनाई दी।

     

    “सुवर्णा!”

     

    वह पलटी।

     

    एक घायल सैनिक पहाड़ पर चढ़ता हुआ आ रहा था।

     

    “राजकुमारी… राजा को कालकेतु ले गया है।”

     

    सुवर्णा के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “मेरे पिता को?”

     

    सैनिक ने सिर हिलाया।

     

    सुवर्णा ने अपने पंख फैलाए।

     

    “मुझे वापस जाना होगा।”

     

    वह पूरी गति से महल की ओर उड़ चली।

     

    महल पहुँचते ही उसने देखा कि कालकेतु राजा को लेकर मुख्य आंगन में खड़ा था।

     

    “आ गई मेरी सुनहरी राजकुमारी।”

     

    सुवर्णा नीचे उतरी।

     

    “मेरे पिता को छोड़ दो।”

     

    कालकेतु हँसा।

     

    “पहले अपने पंखों की शक्ति मुझे दो।”

     

    “अगर मैंने मना कर दिया?”

     

    “तो तुम्हारे पिता को नुकसान होगा।”

     

    सुवर्णा कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने अपने पंख बंद कर लिए।

     

    “ठीक है।”

     

    राजा चिल्लाए—

     

    “नहीं, सुवर्णा!”

     

    सुवर्णा ने कालकेतु की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी उसके पंखों से सुनहरी रोशनी निकली और पूरे आंगन में फैल गई।

     

    कालकेतु पीछे हट गया।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    सुवर्णा के पंखों से निकली रोशनी किसी हथियार की तरह नहीं थी।

     

    वह महल के चारों तरफ फैल गई।

     

    जहाँ-जहाँ रोशनी पहुँची, वहाँ बंद दरवाजे खुल गए, सैनिकों के हथियार जमीन पर गिर गए और लोगों के चेहरों पर डर की जगह हिम्मत दिखाई देने लगी।

     

    कालकेतु घबरा गया।

     

    “तुमने अपनी शक्ति मुझे क्यों नहीं दी?”

     

    सुवर्णा मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि ये शक्ति किसी एक इंसान की नहीं है। ये लोगों की रक्षा के लिए है।”

     

    कालकेतु ने तलवार उठाई, लेकिन उसके अपने सैनिक उसके सामने खड़े हो गए।

     

    “हम तुम्हारे लिए अपने राजा के खिलाफ नहीं लड़ेंगे।”

     

    कालकेतु अकेला रह गया।

     

    राजा वीरेंद्र को आजाद कर दिया गया।

     

    उन्होंने अपनी बेटी को गले लगा लिया।

     

    “अब तुम सच जान चुकी हो।”

     

    सुवर्णा ने कहा—

     

    “और अब मैं अपने पंखों से डरूँगी नहीं।”

     

    कुछ महीनों बाद सूर्यगढ़ पहले से भी खुशहाल हो गया।

     

    सुवर्णा ने अपने पंखों को छिपाना छोड़ दिया।

     

    वह रोज राज्य के लोगों के बीच जाती और जरूरतमंदों की मदद करती।

     

    एक दिन वही विशाल सुनहरा पक्षी फिर महल के ऊपर आया।

     

    सुवर्णा ने आसमान की ओर देखा।

     

    पक्षी कुछ देर उसके ऊपर उड़ता रहा और फिर दूर पहाड़ों की ओर चला गया।

     

    सुवर्णा समझ गई कि उसकी कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी।

     

    उसने अपने पंख फैलाए और आसमान की ओर उड़ गई।

     

    नीचे खड़े राजा मुस्कुराते हुए बोले—

     

    “जाओ मेरी बेटी… अब तुम्हें किसी से छिपने की जरूरत नहीं।”

     

    सुवर्णा बादलों के पार निकल गई।

     

    • और उस दिन से लोग उसे सिर्फ सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी नहीं, बल्कि अपने राज्य की रक्षक कहने लगे।

     

    कहते हैं, आज भी जब किसी जरूरतमंद के लिए आसमान में अचानक सुनहरी रोशनी दिखाई देती है, तो लोग कहते हैं—

     

    “राजकुमारी सुवर्णा अभी भी अपने पंखों के साथ हमारी रक्षा कर रही है।”

     

    समाप्त।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी — भाग 1

     

    बहुत दूर, ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच एक खूबसूरत राज्य था—सूर्यगढ़। उस राज्य की सबसे बड़ी खासियत उसका महल नहीं, बल्कि वहां रहने वाली एक राजकुमारी थी, जिसका नाम था सुवर्णा।

     

    सुवर्णा बाकी राजकुमारियों जैसी नहीं थी। उसके लंबे काले बाल थे, चेहरे पर हमेशा हल्की मुस्कान रहती थी और उसकी सबसे बड़ी खासियत थी उसके सुनहरी पंख।

     

    जब वह छोटी थी, तभी उसके माता-पिता को पता चल गया था कि उसकी पीठ पर दो छोटे-छोटे सुनहरे पंख हैं। जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, पंख भी बड़े होते गए। सूरज की रोशनी पड़ते ही वे ऐसे चमकते जैसे किसी ने उन पर सोना चढ़ा दिया हो।

     

    राजा वीरेंद्र अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे, लेकिन उन्हें हमेशा एक डर सताता था।

     

    “सुवर्णा, तुम्हें अपने पंख किसी के सामने नहीं दिखाने हैं,” राजा ने एक दिन कहा।

     

    सुवर्णा ने हैरानी से पूछा, “लेकिन पिता जी, क्यों?”

     

    राजा कुछ पल चुप रहे।

     

    “क्योंकि हर कोई खूबसूरत चीज की कद्र नहीं करता। कुछ लोग उसे पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।”

     

    सुवर्णा ने पिता की बात मान ली।

     

    लेकिन महल की ऊँची दीवारों के बीच रहने से उसका मन घुटता था। उसे आसमान देखना बहुत पसंद था। रात में वह महल की छत पर जाकर तारों को देखती और सोचती कि आखिर उसके पंख उसे किस जगह ले जाना चाहते हैं।

     

    एक रात चाँदनी बहुत तेज थी। सुवर्णा चुपके से महल की छत पर पहुँची। उसने चारों तरफ देखा और धीरे-धीरे अपने सुनहरे पंख फैला दिए।

     

    अचानक उसके शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

     

    और अगले ही पल वह हवा में थी।

     

    सुवर्णा हँस पड़ी।

     

    “तो ये है उड़ने की आज़ादी!”

     

    वह बादलों के बीच उड़ती हुई महल से बहुत दूर निकल गई।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि जंगल के दूसरी तरफ कोई उसे देख रहा था।

     

    एक काले पत्थर की पहाड़ी पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसके हाथ में पुरानी किताब थी।

     

    उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा—

     

    “आखिरकार… सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी जाग गई।”

     

    अगली सुबह सुवर्णा वापस महल आ गई।

     

    लेकिन महल में कुछ अजीब था।

     

    सभी सैनिक परेशान थे। राजा अपने कमरे में किसी से जोर-जोर से बात कर रहे थे।

     

    सुवर्णा ने दरवाजे के बाहर खड़े होकर सुना।

     

    “वह वापस आ गया है,” राजा कह रहे थे।

     

    सुवर्णा अंदर चली गई।

     

    “कौन वापस आ गया है, पिता जी?”

     

    राजा अचानक चुप हो गए।

     

    “कोई नहीं। तुम अपने कमरे में जाओ।”

     

    “आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं।”

     

    राजा ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    “सुवर्णा, आज रात तुम महल से बाहर नहीं निकलोगी। चाहे कुछ भी हो जाए।”

     

    “लेकिन—”

     

    “ये मेरा आदेश है!”

     

    राजा पहली बार उससे इतने कठोर स्वर में बोले थे।

     

    सुवर्णा चुप होकर कमरे में चली गई।

     

    रात होते ही महल के बाहर घोड़ों की आवाज सुनाई दी।

     

    सैनिक दौड़ते हुए मुख्य द्वार की तरफ गए।

     

    कुछ देर बाद महल में एक अजनबी आदमी दाखिल हुआ। उसने काले कपड़े पहन रखे थे और उसके साथ कई सैनिक थे।

     

    उसका नाम था कालकेतु।

     

    वह पड़ोसी राज्य का शासक था और अपनी ताकत के लिए पूरे इलाके में मशहूर था।

     

    कालकेतु ने राजा से कहा—

     

    “मुझे वह चाहिए जो तुम्हारे पास छिपा है।”

     

    राजा ने जवाब दिया, “मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।”

     

    कालकेतु मुस्कुराया।

     

    “आप जानते हैं मैं किसकी बात कर रहा हूँ।”

     

    राजा का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी बेटी को भूल जाओ।”

     

    कालकेतु की आँखों में लालच चमक उठा।

     

    “उसके सुनहरे पंख सिर्फ सुंदर नहीं हैं, वीरेंद्र। उनमें ऐसी शक्ति है जिससे पूरा राज्य बदला जा सकता है।”

     

    “मैं अपनी बेटी को तुम्हारे हवाले कभी नहीं करूँगा।”

     

    कालकेतु ने तलवार की मूठ पकड़ ली।

     

    उसी समय ऊपर खिड़की के पीछे खड़ी सुवर्णा ने सब कुछ सुन लिया।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसे पहली बार समझ आया कि उसके पिता उसके पंखों को छिपाने के लिए इतने डरे हुए क्यों रहते थे।

     

    लेकिन असली रहस्य अभी बाकी था।

     

    उसी रात महल के पुराने हिस्से में सुवर्णा को एक बंद कमरा दिखाई दिया। उसके पिता ने उस कमरे में जाने से हमेशा मना किया था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था जो उसके पंखों पर था—एक सुनहरा सूरज।

     

    सुवर्णा ने दरवाजा खोला।

     

    अंदर धूल से ढकी एक पुरानी किताब रखी थी।

     

    उसने किताब खोली तो पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी का जन्म हर सौ साल में होता है। लेकिन उसकी शक्ति तभी पूरी होती है, जब वह अपने असली वंश का सच जान ले।”

     

    सुवर्णा के हाथ काँपने लगे।

     

    “असली वंश?”

     

    तभी पीछे से किसी की आवाज आई—

     

    “अब तुम्हें सब पता चल ही गया है।”

     

    सुवर्णा ने पलटकर देखा।

     

    दरवाजे पर राजा वीरेंद्र खड़े थे।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे।

     

    “पिता जी… मैं कौन हूँ?”

     

    राजा कुछ नहीं बोले।

     

    सुवर्णा ने फिर पूछा—

     

    “मैं आपकी बेटी हूँ या नहीं?”

     

    राजा धीरे-धीरे उसके पास आए।

     

    उन्होंने किताब उठाई और बोले—

     

    “तुम मेरी बेटी हो… लेकिन तुम्हारी कहानी मेरे जन्म से भी बहुत पहले शुरू हुई थी।”

     

    अचानक महल के बाहर जोरदार धमाका हुआ।

     

    सैनिकों की आवाजें आने लगीं।

     

    कालकेतु ने महल पर हमला कर दिया था।

     

    राजा ने सुवर्णा का हाथ पकड़ा।

     

    “अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। तुम्हें यहां से जाना होगा।”

     

    “लेकिन मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी।”

     

    “तुम्हें जाना ही होगा!”

     

    राजा ने उसे महल के पीछे बने गुप्त रास्ते की ओर धकेला।

     

    सुवर्णा रोते हुए बोली—

     

    “आपने मुझसे इतने सालों तक सच क्यों छिपाया?”

     

    राजा ने सिर्फ इतना कहा—

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें सच पता चल जाता… तो वे तुम्हें ढूँढ़ लेते।”

     

    सुवर्णा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    महल की दीवारें हिल रही थीं।

     

    और तभी उसकी नजर आसमान पर पड़ी।

     

    बादलों के बीच एक विशाल सुनहरा पक्षी उड़ रहा था।

     

    उसने सुवर्णा की तरफ देखा और जोर से आवाज की।

     

    राजा ने घबराकर कहा—

     

    “नहीं… इतनी जल्दी नहीं!”

     

    सुवर्णा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    राजा ने उसकी ओर देखा।

     

    “वह तुम्हें लेने आया है।”

     

    और उसी पल सुवर्णा के सुनहरे पंख अपने आप फैल गए।

     

    आसमान में बिजली चमकी।

     

    महल के ऊपर सुनहरी रोशनी फैल गई।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि वह विशाल पक्षी दोस्त था… या दुश्मन।

    •  
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  • हँसी की दुकान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    चार दोस्तों की हँसी की दुकान

     

    एक छोटे से गाँव में चार पक्के दोस्त रहते थे—गोलू, पप्पू, चिंटू और बंटी।

     

    चारों की जिंदगी में कोई अपना नहीं था। न कोई बड़ा परिवार, न कोई ऐसा रिश्तेदार जो उनके सुख-दुख में हमेशा साथ खड़ा रहे। चारों ने बचपन से ही अपनी जिंदगी खुद संभाली थी।

     

    लेकिन एक बात उन्हें बाकी लोगों से अलग बनाती थी।

     

    चारों ने कभी उदास रहना सीखा ही नहीं था।

     

    गोलू हमेशा कहता, “भाई, दुख तो मेहमान की तरह होता है। ज्यादा देर बैठने दो तो चाय भी मांगने लगता है!”

     

    पप्पू तुरंत बोलता, “और चाय के साथ बिस्कुट भी!”

     

    चिंटू कहता, “तो फिर दुख को दरवाजे पर ही बोल दो—बिस्कुट खत्म हैं!”

     

    बंटी सबसे समझदार था, लेकिन उसकी समझदारी भी ज्यादा देर टिकती नहीं थी।

     

    चारों गाँव के पुराने चबूतरे पर बैठते, बातें करते और हँसते रहते।

     

    गाँव वालों ने उनका नाम ही रख दिया था—चार हँसोड़े।

     

    एक दिन चारों बैठे थे कि गाँव का एक आदमी उदास चेहरा लेकर वहाँ से गुजरा।

     

    गोलू ने उसे देखते ही पूछा, “काका, चेहरा ऐसा क्यों बना रखा है जैसे आपकी भैंस ने आपका मोबाइल चबा लिया हो?”

     

    आदमी ने कहा, “बेटा, मेरी भैंस खो गई है।”

     

    चारों चुप हो गए।

     

    फिर पप्पू बोला, “अच्छा… भैंस खो गई है। कोई बात नहीं काका, हम ढूँढेंगे।”

     

    चिंटू बोला, “लेकिन पहले भैंस का फोटो दिखाओ।”

     

    काका ने जेब से फोटो निकाला।

     

    बंटी ने फोटो देखा और बोला, “काका, ये भैंस है या घर का मालिक?”

     

    काका पहली बार मुस्कुराया।

     

    चारों दोस्त भैंस ढूँढने निकल पड़े।

     

    करीब एक घंटे बाद भैंस खेत के पास मिल गई।

     

    काका खुशी से बोला, “बेटा, तुम चारों न होते तो पता नहीं मैं क्या करता।”

     

    गोलू ने कहा, “कुछ नहीं करते काका, घर जाकर भैंस को समझाते कि अगली बार बिना बताए घूमने मत जाना।”

     

    भैंस ने उसी समय जोर से आवाज निकाली।

     

    पप्पू बोला, “देखो, माफी भी मांग रही है!”

     

    काका हँसते-हँसते घर चला गया।

     

    चारों की यही आदत थी।

     

    किसी का मन खराब हो, वे उसे हँसा देते।

     

    किसी का काम बिगड़ जाए, वे मदद कर देते।

     

    और अगर कोई बहुत ज्यादा उदास हो, तो चारों उसके पास बैठ जाते।

     

    एक दिन गाँव में रहने वाला रघु चबूतरे पर अकेला बैठा था। उसके चेहरे पर बहुत चिंता थी।

     

    बंटी ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    रघु ने कहा, “मेरी दुकान में लगातार नुकसान हो रहा है। समझ नहीं आता क्या करूँ।”

     

    गोलू बोला, “हम चारों मिलकर तुम्हारी दुकान चलाएँगे।”

     

    रघु ने आश्चर्य से पूछा, “तुम लोगों को दुकानदारी आती है?”

     

    चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    पप्पू बोला, “नहीं।”

     

    रघु ने माथा पकड़ लिया।

     

    चिंटू बोला, “लेकिन ग्राहक को हँसाना आता है।”

     

    रघु हँस पड़ा।

     

    अगले दिन चारों उसकी दुकान पर पहुँच गए।

     

    गोलू ग्राहक को सामान देता, पप्पू पैसे गिनता, चिंटू सामान जमाता और बंटी बाहर खड़े होकर आवाज लगाता—

     

    “आओ भाई आओ! ऐसी दुकान जहाँ सामान भी मिलेगा और मुफ्त में हँसी भी!”

     

    कुछ ही दिनों में दुकान पर भीड़ बढ़ने लगी।

     

    लोग सामान लेने से ज्यादा चारों की बातें सुनने आने लगे।

     

    रघु की दुकान चल निकली।

     

    रघु ने खुश होकर कहा, “तुम चारों ने मेरी जिंदगी बदल दी।”

     

    गोलू बोला, “बस पैसे समय पर देना।”

     

    रघु ने पूछा, “कितने?”

     

    गोलू बोला, “चार समोसे रोज।”

     

    रघु ने हँसकर कहा, “इतना ही?”

     

    पप्पू बोला, “और चटनी ज्यादा।”

     

    एक दिन चारों ने सोचा कि उन्हें अपना भी कोई काम शुरू करना चाहिए।

     

    बंटी ने कहा, “क्यों न हम हँसी की दुकान खोलें?”

     

    चिंटू बोला, “लोग पैसे देकर हँसने आएँगे?”

     

    गोलू बोला, “क्यों नहीं? आजकल लोग बिना पैसे दिए भी रो रहे हैं।”

     

    आखिर उन्होंने गाँव के चबूतरे के पास एक छोटा सा बोर्ड लगा दिया—

     

    “चार दोस्तों की हँसी की दुकान—दुख लेकर आओ, मुस्कान लेकर जाओ।”

     

    नीचे लिखा था—

     

    “पहली हँसी मुफ्त, दूसरी भी मुफ्त, तीसरी के लिए समोसा जरूरी।”

     

    गाँव वाले बोर्ड पढ़कर हँसने लगे।

     

    धीरे-धीरे लोग सच में उनके पास आने लगे।

     

    कोई घर की परेशानी बताता, कोई नौकरी की चिंता, कोई अपनी पत्नी से झगड़े की कहानी।

     

    चारों सबकी बातें सुनते और फिर मजाक-मजाक में उसका मन हल्का कर देते।

     

    एक दिन गाँव का सबसे गंभीर आदमी, ठाकुर साहब, उनके पास आए।

     

    पूरे गाँव में उनकी धाक थी। उन्हें कभी हँसते हुए किसी ने नहीं देखा था।

     

    गोलू ने उन्हें देखते ही कहा, “आज सूरज पश्चिम से कैसे निकला?”

     

    ठाकुर साहब ने घूरकर देखा।

     

    पप्पू ने धीरे से कहा, “भाई, लगता है आज हमारी दुकान बंद हो जाएगी।”

     

    ठाकुर साहब बोले, “मेरी चिंता का मजाक मत बनाओ।”

     

    बंटी तुरंत गंभीर हो गया।

     

    “ठाकुर साहब, हम मजाक नहीं उड़ाएँगे। आप बताइए क्या परेशानी है?”

     

    ठाकुर साहब ने बताया कि उनका बेटा शहर चला गया था और कई दिनों से फोन नहीं कर रहा था। उन्हें उसकी चिंता थी।

     

    इस बार चारों ने कोई मजाक नहीं किया।

     

    वे उनके पास बैठ गए।

     

    चिंटू बोला, “आप अकेले मत सोचिए। हम आपके साथ हैं।”

     

    अगले दिन चारों ने शहर जाकर उनके बेटे का पता लगाया। पता चला कि उसका फोन खराब हो गया था और वह काम में व्यस्त था।

     

    जब बेटा गाँव वापस आया तो ठाकुर साहब की आँखों में खुशी के आँसू थे।

     

    उन्होंने चारों को गले लगाकर कहा, “तुम लोगों के पास अपना कोई नहीं है, फिर भी तुम दूसरों को अपना बना लेते हो।”

     

    गोलू मुस्कुराया।

     

    “ठाकुर साहब, अपना होना खून के रिश्ते से ही थोड़ी होता है।”

     

    पप्पू बोला, “कुछ लोग समोसे खिलाकर भी अपने बन जाते हैं।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    समय बीतता गया।

     

    चारों दोस्त अब गाँव में हर किसी के काम आने लगे थे।

     

    किसी के घर शादी हो तो मदद करते।

     

    किसी का बच्चा बीमार हो तो अस्पताल ले जाते।

     

    किसी का मन दुखी हो तो उसके पास बैठ जाते।

     

    और अपनी जिंदगी में चाहे कितनी भी परेशानी क्यों न हो, वे एक-दूसरे को हँसाना नहीं भूलते।

     

    एक शाम चारों चबूतरे पर बैठे थे।

     

    बंटी ने आसमान की तरफ देखकर कहा, “हम चारों का अपना कोई नहीं था ना?”

     

    गोलू ने कहा, “गलत।”

     

    “कैसे?”

     

    गोलू ने सामने पूरे गाँव की तरफ इशारा किया।

     

    “देख, अब पूरा गाँव अपना है।”

     

    पप्पू बोला, “और अगर पूरा गाँव अपना है तो शादी में खाना भी पूरा गाँव खिलाएगा।”

     

    चिंटू ने तुरंत कहा, “तुम्हारी नजर रिश्तों पर नहीं, खाने पर रहती है।”

     

    चारों जोर से हँस पड़े।

     

    उसी समय एक छोटा बच्चा उनके पास आया और बोला, “चाचा, मैं भी आपके साथ बैठूँ?”

     

    बंटी ने उसे अपने पास बैठा लिया।

     

    गोलू ने कहा, “क्यों नहीं? हमारी हँसी की दुकान में उम्र की कोई पाबंदी नहीं।”

     

    बच्चा भी हँसने लगा।

     

    चारों दोस्तों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    उन्हें समझ आ गया था कि जिंदगी ने उनसे बहुत कुछ छीना जरूर था, लेकिन बदले में उन्हें एक ऐसी चीज दी थी जो बहुत कम लोगों के पास होती है—

     

    दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की ताकत।

     

    और उस दिन से गाँव में एक कहावत मशहूर हो गई—

     

    “जिसके घर में चार हँसोड़े दोस्त हों, उसके दरवाजे पर दुख ज्यादा देर टिक ही नहीं सकता।”

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  • सुनहरी हिरन मायावी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनहरी हिरनी और मायावी शिकारी

     

    बहुत दूर, ऊँचे पहाड़ों और घने पेड़ों से घिरे एक जंगल में एक छोटी सी सुनहरी हिरनी रहती थी। उसका नाम कनक था। उसका शरीर हल्की सुनहरी रोशनी जैसा चमकता था और उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में मासूमियत थी।

     

    जंगल के जानवर कहते थे कि कनक साधारण हिरनी नहीं थी। जब वह सुबह की धूप में दौड़ती, तो उसके शरीर से सुनहरी चमक फैल जाती और उसके पैरों के निशान कुछ देर तक जमीन पर चमकते रहते।

     

    लेकिन जंगल में एक मायावी शिकारी भी रहता था—मायासुर।

     

    वह किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए जंगल में नहीं रहता था, बल्कि उसे कनक की सुनहरी शक्ति चाहिए थी। उसे विश्वास था कि अगर वह कनक को पकड़ लेगा, तो उसकी जादुई शक्ति से वह पूरे जंगल पर अपना अधिकार कर सकता है।

     

    एक सुबह कनक नदी के किनारे पानी पी रही थी। अचानक उसे झाड़ियों के पीछे किसी की आहट सुनाई दी।

     

    वह चौकन्नी हुई।

     

    जैसे ही उसने पीछे देखा, वहाँ कोई नहीं था।

     

    कनक तेजी से जंगल की ओर भागी।

     

    उसके पीछे से एक आवाज आई, “भाग लो कनक… लेकिन मुझसे ज्यादा देर तक नहीं भाग पाओगी।”

     

    कनक समझ गई कि मायासुर फिर उसके पीछे पड़ चुका है।

     

    वह जंगल के सबसे पुराने हिस्से की ओर दौड़ी। वहाँ एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसकी जड़ों के नीचे जंगल की रक्षा करने वाली शक्ति रहती है।

     

    कनक उस पेड़ के पीछे छिप गई।

     

    कुछ ही देर में मायासुर वहाँ पहुँचा।

     

    उसने चारों तरफ देखा और मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है तुम यहीं कहीं हो।”

     

    उसने अपनी जादुई छड़ी घुमाई।

     

    अचानक जंगल की सारी पगडंडियाँ बदल गईं। जहाँ रास्ता था, वहाँ घनी झाड़ियाँ उग आईं और जहाँ झाड़ियाँ थीं, वहाँ रास्ता बन गया।

     

    कनक डर गई।

     

    मायासुर बोला, “अब देखता हूँ तुम कहाँ जाती हो।”

     

    कनक ने हिम्मत जुटाई और एक संकरी पगडंडी पर दौड़ पड़ी।

     

    मायासुर ने अपनी जादुई शक्ति से उसके आगे एक ऊँची दीवार खड़ी कर दी।

     

    कनक रुक गई।

     

    मायासुर धीरे-धीरे उसके पास आने लगा।

     

    “अब तुम बच नहीं सकती।”

     

    तभी कनक ने ऊपर देखा। पेड़ की एक मजबूत डाल ठीक उसके सिर के ऊपर थी।

     

    वह तेजी से पीछे हटी और छलांग लगाकर डाल के ऊपर चढ़ गई।

     

    मायासुर नीचे खड़ा रह गया।

     

    “तुम पेड़ पर चढ़ सकती हो?” वह गुस्से में बोला।

     

    कनक दूसरी डाल पर कूद गई और फिर पेड़ों के बीच से भागती हुई दूर निकल गई।

     

    लेकिन मायासुर ने हार नहीं मानी।

     

    उसने अपना रूप बदल लिया।

     

    कुछ ही क्षण में वह एक बूढ़े साधु के रूप में कनक के सामने दिखाई दिया।

     

    “बेटी, तुम बहुत डरी हुई लग रही हो। मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें सुरक्षित जगह पहुँचा दूँगा।”

     

    कनक कुछ पल उसे देखती रही।

     

    तभी उसे साधु के पैरों के पास पड़ी छाया दिखाई दी। बूढ़े साधु की छाया के बजाय वहाँ किसी लंबे राक्षस जैसी आकृति थी।

     

    कनक समझ गई कि यह मायासुर है।

     

    वह बिना कुछ बोले दूसरी दिशा में भाग गई।

     

    मायासुर का चेहरा बदल गया।

     

    “तुम इतनी आसानी से मेरी चाल समझ गई?”

     

    कनक जंगल के अंदर और गहराई में चली गई।

     

    भागते-भागते उसे एक घायल खरगोश दिखाई दिया।

     

    खरगोश काँटों में फँसा था।

     

    कनक रुक गई।

     

    उसने अपने सींगों से काँटों को हटाया और खरगोश को बाहर निकाला।

     

    खरगोश ने कहा, “तुम्हें रुकना नहीं चाहिए था। मायासुर तुम्हारे पीछे है।”

     

    कनक ने कहा, “अगर मैं इसे छोड़ देती तो यह मर जाता। डर के कारण किसी की मदद करना नहीं छोड़ सकती।”

     

    खरगोश ने उसे जंगल के एक गुप्त रास्ते के बारे में बताया।

     

    “उस रास्ते से पहाड़ के पीछे एक पुरानी गुफा है। वहाँ जंगल की रक्षक देवी की शक्ति है। शायद वही तुम्हारी मदद कर सके।”

     

    कनक उस रास्ते पर चल पड़ी।

     

    लेकिन मायासुर को भी उसकी दिशा का पता चल गया।

     

    वह गरजते हुए बोला, “तुम उस गुफा तक नहीं पहुँचोगी!”

     

    उसने अपने मंत्र से तेज हवा पैदा कर दी।

     

    पेड़ हिलने लगे। पत्ते उड़ने लगे।

     

    कनक कई बार गिरते-गिरते बची, लेकिन उसने दौड़ना नहीं छोड़ा।

     

    आखिरकार वह गुफा तक पहुँच गई।

     

    अंदर एक बड़ा पत्थर था, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—

     

    “जिसके मन में डर से बड़ा साहस हो, वही इस शक्ति को जगा सकता है।”

     

    कनक ने पत्थर को छुआ।

     

    अचानक पूरी गुफा सुनहरी रोशनी से भर गई।

     

    एक शांत आवाज सुनाई दी, “कनक, तुम्हारी शक्ति तुम्हारे शरीर की चमक में नहीं, तुम्हारे दिल की अच्छाई में है।”

     

    कनक ने पूछा, “क्या मैं मायासुर को हरा सकती हूँ?”

     

    आवाज आई, “उसे उसकी ही माया से हराना होगा।”

     

    उसी समय मायासुर गुफा में पहुँच गया।

     

    “आखिर तुम यहाँ आ ही गई!”

     

    उसने हाथ उठाया और चारों तरफ अंधेरा छा गया।

     

    कनक ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने डरने के बजाय अपने मन में जंगल के सभी जानवरों को याद किया—वह खरगोश जिसे उसने बचाया था, पक्षी, पेड़ और वे छोटे जीव जो हमेशा उसकी रक्षा करते थे।

     

    अचानक उसके शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

     

    मायासुर ने अपनी जादुई शक्ति बढ़ाई, लेकिन सुनहरी रोशनी उसके चारों तरफ फैल गई।

     

    उसकी बनाई हुई सारी मायावी तस्वीरें टूटने लगीं।

     

    मायासुर घबरा गया।

     

    “यह कैसे हो सकता है?”

     

    कनक ने कहा, “तुम दूसरों को डराकर शक्तिशाली बनना चाहते थे। लेकिन असली शक्ति किसी को डराने में नहीं, किसी की मदद करने में होती है।”

     

    मायासुर ने आखिरी बार हमला करने की कोशिश की।

     

    लेकिन इस बार जंगल के सारे जानवर गुफा के बाहर आ गए।

     

    हजारों पक्षी आसमान में उड़ने लगे। हिरणों का झुंड उसके सामने खड़ा हो गया और हाथियों ने जोर से चिंघाड़कर उसका रास्ता रोक दिया।

     

    मायासुर की माया कमजोर पड़ने लगी।

     

    उसकी जादुई छड़ी जमीन पर गिर गई।

     

    जैसे ही उसने उसे उठाने की कोशिश की, वह पत्थर बन गई।

     

    मायासुर की सारी शक्ति खत्म हो गई।

     

    वह घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मैं हार गया।”

     

    कनक उसके पास गई और बोली, “अगर तुम अपनी शक्ति का इस्तेमाल दूसरों की रक्षा के लिए करोगे, तो शायद जंगल तुम्हें माफ कर दे।”

     

    मायासुर ने पहली बार सिर झुका लिया।

     

    उस दिन के बाद वह जंगल छोड़कर दूर पहाड़ों में चला गया। कहते हैं कि उसने अपनी बाकी जिंदगी अपनी मायावी शक्तियों से लोगों को डराने के बजाय जरूरतमंदों की मदद करने में लगा दी।

     

    और कनक?

     

    वह जंगल की सबसे प्रिय हिरनी बन गई।

     

    अब जब वह सुबह जंगल में दौड़ती, तो उसकी सुनहरी चमक पहले से भी ज्यादा दिखाई देती।

     

    जानवर उसे देखकर कहते—

     

    “कनक सिर्फ सुनहरी हिरनी नहीं है। वह हमारे जंगल की बहादुर रक्षक है।”

     

    कनक मुस्कुराती और खुले जंगल में दौड़ जाती।

     

    उसकी चमकती हुई चाल जैसे हर किसी को एक ही बात सिखाती थी—

     

    सच्ची ताकत उस जादू में नहीं होती जो दूसरों को अपने वश में कर ले, बल्कि उस दिल में होती है जो डर के बावजूद सही काम करने का साहस रखता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • राजा दुष्यंत ओर शकुंतला

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    राजा दुष्यंत और शकुंतला

     

    बहुत समय पहले की बात है। हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत अपनी वीरता, न्याय और प्रजा के प्रति प्रेम के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। एक दिन वह शिकार के लिए वन की ओर निकले। घने जंगल में हिरण का पीछा करते-करते उनका रथ काफी दूर निकल गया।

     

    अचानक उनकी नजर एक शांत और सुंदर आश्रम पर पड़ी। वहाँ हिरण निडर होकर घूम रहे थे, पक्षियों की आवाज गूंज रही थी और ऋषियों के शिष्य अपने काम में लगे थे।

     

    राजा ने अपना धनुष नीचे रखा और आश्रम के भीतर जाने लगे।

     

    तभी उन्हें एक युवती दिखाई दी। उसके हाथ में पानी का पात्र था और वह आश्रम के पौधों में पानी डाल रही थी। उसके चेहरे पर सादगी और आँखों में अजीब सी शांति थी।

     

    वह थी शकुंतला।

     

    शकुंतला ऋषि कण्व के आश्रम में पली-बढ़ी थी। वह अपने सरल स्वभाव और दयालु मन के लिए जानी जाती थी।

     

    राजा दुष्यंत कुछ पल उसे देखते रहे।

     

    शकुंतला ने राजा को देखा तो विनम्रता से पूछा, “आप कौन हैं? क्या आप रास्ता भटककर यहाँ आए हैं?”

     

    दुष्यंत ने मुस्कुराकर कहा, “मैं हस्तिनापुर का राजा दुष्यंत हूँ। शिकार करते हुए इस आश्रम तक आ पहुँचा।”

     

    शकुंतला ने हाथ जोड़कर कहा, “राजन, आपका आश्रम में स्वागत है। आप थक गए होंगे। कृपया कुछ देर विश्राम कीजिए।”

     

    दुष्यंत ने आश्रम में विश्राम किया, लेकिन उनका मन बार-बार शकुंतला की ओर जा रहा था।

     

    कुछ दिन तक वह किसी न किसी बहाने आश्रम के आसपास रहने लगे। शकुंतला भी राजा की बातों और उनके सरल व्यवहार से प्रभावित होने लगी।

     

    धीरे-धीरे दोनों के बीच प्रेम हो गया।

     

    एक दिन दुष्यंत ने कहा, “शकुंतला, मैं तुम्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहता हूँ।”

     

    शकुंतला ने धीमे स्वर में पूछा, “लेकिन राजन, आपका राज्य? आपकी प्रजा? क्या आप मुझे कभी भूल तो नहीं जाएंगे?”

     

    दुष्यंत ने उसका हाथ थामकर कहा, “मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा। तुम मेरी पत्नी बनोगी और मैं तुम्हें सम्मान के साथ हस्तिनापुर ले जाऊँगा।”

     

    दोनों ने गंधर्व विवाह किया।

     

    कुछ समय बाद दुष्यंत को राज्य लौटना पड़ा। जाने से पहले उन्होंने शकुंतला से कहा, “मुझे राज्य के जरूरी काम निपटाने हैं। मैं जल्द ही तुम्हें लेने वापस आऊँगा।”

     

    शकुंतला ने विश्वास के साथ कहा, “मैं आपका इंतजार करूँगी।”

     

    दुष्यंत हस्तिनापुर लौट गए।

     

    इधर एक दिन शकुंतला आश्रम में बैठी राजा के बारे में सोच रही थी। तभी ऋषि दुर्वासा वहाँ आए। शकुंतला राजा की यादों में इतनी खोई हुई थी कि वह उनका स्वागत नहीं कर सकी।

     

    ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गए।

     

    उन्होंने कहा, “जिसके विचारों में खोकर तुमने मेरा अपमान किया है, वही व्यक्ति तुम्हें भूल जाएगा।”

     

    शकुंतला घबरा गई।

     

    वह हाथ जोड़कर बोली, “ऋषिवर, मुझसे भूल हो गई। मुझे क्षमा कर दीजिए।”

     

    शकुंतला की विनती देखकर ऋषि का क्रोध कुछ शांत हुआ। उन्होंने कहा, “जब राजा को तुम्हारे प्रेम की कोई निशानी दिखाई जाएगी, तब उसे सब याद आ जाएगा।”

     

    शकुंतला के पास दुष्यंत की दी हुई एक अंगूठी थी।

     

    कुछ समय बाद शकुंतला गर्भवती हुई। ऋषि कण्व ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि अब उसे अपने पति के पास जाना चाहिए।

     

    शकुंतला राजा दुष्यंत से मिलने हस्तिनापुर के लिए निकल पड़ी।

     

    रास्ते में वह एक नदी के किनारे रुकी। पानी में हाथ डालते समय उसकी उंगली से राजा की दी हुई अंगूठी निकलकर नदी में गिर गई। उसे इसका पता ही नहीं चला।

     

    जब वह हस्तिनापुर पहुँची तो राजा दुष्यंत के सामने गई।

     

    राजा ने उसे देखा, लेकिन श्राप के कारण उन्हें कुछ याद नहीं था।

     

    शकुंतला की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “राजन, क्या आप मुझे पहचानते नहीं?”

     

    दुष्यंत ने गंभीर होकर कहा, “मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूँ। तुम कौन हो?”

     

    शकुंतला का दिल टूट गया।

     

    “मैं वही शकुंतला हूँ, जिससे आपने विवाह किया था। आपने वचन दिया था कि आप मुझे अपने साथ ले जाएंगे।”

     

    दुष्यंत परेशान हो गए। उन्हें शकुंतला की बातें समझ नहीं आ रही थीं।

     

    शकुंतला ने अपनी अंगूठी दिखाने के लिए हाथ देखा, लेकिन अंगूठी वहाँ थी ही नहीं।

     

    वह समझ गई कि शायद रास्ते में अंगूठी खो गई है।

     

    अपमान और दुख से वह वहाँ से चली गई।

     

    कुछ समय बाद एक मछुआरे को नदी में एक बड़ी मछली मिली। मछली काटने पर उसके अंदर से एक चमकती हुई अंगूठी निकली। अंगूठी पर राजा दुष्यंत का नाम खुदा था।

     

    मछुआरा वह अंगूठी लेकर राजमहल पहुँचा।

     

    जैसे ही दुष्यंत ने अंगूठी देखी, अचानक उनके मन में पुरानी सारी यादें लौट आईं।

     

    उन्हें आश्रम, शकुंतला, उनका विवाह और अपना वादा—सब कुछ याद आ गया।

     

    राजा पछतावे से भर गए।

     

    “मैंने शकुंतला के साथ क्या कर दिया?”

     

    उन्होंने तुरंत सैनिकों को उसे खोजने भेजा, लेकिन शकुंतला आश्रम छोड़ चुकी थी।

     

    कई वर्षों तक राजा उसे खोजते रहे।

     

    उधर शकुंतला ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम था भरत। बालक बचपन से ही बहुत साहसी और निडर था।

     

    एक दिन राजा दुष्यंत वन में गए। वहाँ उन्होंने एक छोटे बालक को सिंह के बच्चे के साथ निडर होकर खेलते देखा।

     

    राजा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    बालक ने गर्व से कहा, “मैं भरत हूँ।”

     

    दुष्यंत के मन में अजीब सी भावना उठी।

     

    उन्होंने पूछा, “तुम्हारे पिता कौन हैं?”

     

    भरत ने कहा, “मेरे पिता हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत हैं।”

     

    दुष्यंत स्तब्ध रह गए।

     

    तभी सामने शकुंतला आ गई।

     

    दोनों की आँखें मिलते ही कई वर्षों की दूरी जैसे एक पल में खत्म हो गई।

     

    दुष्यंत उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

     

    “शकुंतला, मुझे क्षमा कर दो। मैंने तुम्हें कभी जानबूझकर नहीं ठुकराया था। मैं उस समय तुम्हें पहचान नहीं पा रहा था।”

     

    शकुंतला की आँखों में आँसू थे।

     

    उसने कहा, “राजन, दुख मुझे आपके भूलने का नहीं था। दुख इस बात का था कि जिस व्यक्ति पर मैंने सबसे ज्यादा विश्वास किया, उसी के सामने मुझे अपने प्रेम को साबित करना पड़ा।”

     

    दुष्यंत ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं तुम्हारा विश्वास फिर से जीतना चाहता हूँ।”

     

    शकुंतला कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा, “विश्वास टूटने के बाद उसे वापस पाने में समय लगता है। लेकिन अगर आपका मन सच में बदल गया है, तो मैं अपने बेटे को उसके पिता से दूर नहीं रखूँगी।”

     

    दुष्यंत ने भरत को अपने पास बुलाया और उसे गले लगा लिया।

     

    इसके बाद राजा दुष्यंत शकुंतला और भरत को सम्मान के साथ हस्तिनापुर ले गए।

     

    समय के साथ भरत बड़ा हुआ और अपनी वीरता, न्याय और साहस के लिए प्रसिद्ध हुआ। आगे चलकर उसी के नाम पर इस भूमि को भारतवर्ष कहा गया।

     

    राजा दुष्यंत और शकुंतला की कहानी केवल प्रेम की कहानी नहीं थी। यह विश्वास, वचन और इंतजार की कहानी थी।

     

    उनका प्रेम यह सिखाता है कि सच्चे रिश्ते केवल वादों से नहीं, बल्कि उन्हें निभाने की हिम्मत से मजबूत होते हैं।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • घर का बंटवारा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    घर का बंटवारा

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटे से गाँव में रामदीन का बड़ा सा पुश्तैनी घर था। घर पुराना जरूर था, लेकिन उसमें परिवार की बहुत सारी यादें बसी थीं। रामदीन के दो बेटे थे—बड़ा बेटा मोहन और छोटा बेटा सोहन।

     

    दोनों भाई बचपन में एक-दूसरे के बिना नहीं रहते थे। एक ही थाली में खाना, साथ स्कूल जाना और खेतों में पिता का हाथ बँटाना—उनका बचपन ऐसे ही बीता था।

     

    लेकिन समय के साथ दोनों की सोच बदलने लगी।

     

    मोहन की शादी हो चुकी थी और उसके दो बच्चे थे। वह खेती संभालता था। सोहन शहर में नौकरी करता था और महीने में एक-दो बार ही गाँव आता था।

     

    रामदीन बूढ़े हो चुके थे। एक दिन उन्होंने दोनों बेटों को पास बुलाकर कहा, “बेटा, अब मेरी उम्र हो गई है। मैं चाहता हूँ कि मेरे रहते घर और खेत का बंटवारा कर दूँ, ताकि मेरे जाने के बाद तुम दोनों के बीच कोई झगड़ा न हो।”

     

    मोहन तुरंत बोला, “बाबा, मुझे बंटवारा नहीं चाहिए। हम दोनों भाई मिलकर रहेंगे।”

     

    सोहन भी मुस्कुराकर बोला, “बड़े भैया सही कह रहे हैं।”

     

    रामदीन ने दोनों की तरफ देखा और कहा, “आज तुम ऐसा कह रहे हो, लेकिन जिंदगी कब बदल जाए, कोई नहीं जानता।”

     

    कुछ महीने बाद रामदीन की तबीयत बहुत बिगड़ गई। जाते-जाते उन्होंने दोनों बेटों से सिर्फ इतना कहा, “घर चाहे बाँट लेना, लेकिन अपना रिश्ता मत बाँटना।”

     

    उनकी मृत्यु के बाद घर में शोक का माहौल था। तेरहवीं के बाद एक दिन मोहन की पत्नी ने कहा, “अब पिताजी नहीं रहे। घर और खेत का हिसाब साफ कर लेना चाहिए।”

     

    सोहन की पत्नी ने भी यही बात कही।

     

    दोनों भाइयों ने जमीन के कागज निकाले। खेत बराबर बाँट दिए गए। दुकान भी आधी-आधी हो गई।

     

    सब ठीक चल रहा था, लेकिन असली परेशानी पुश्तैनी घर को लेकर शुरू हुई।

     

    मोहन बोला, “मुझे घर का आगे वाला हिस्सा चाहिए। बच्चों के लिए जगह ज्यादा है।”

     

    सोहन ने कहा, “लेकिन आगे वाला हिस्सा सड़क से लगा है। उसकी कीमत भी ज्यादा है।”

     

    “तो तुम पीछे वाला हिस्सा ले लो और खेत में तुम्हारा हिस्सा थोड़ा बढ़ा देंगे।”

     

    “नहीं भैया, मुझे बराबर का हिस्सा चाहिए।”

     

    बात धीरे-धीरे बहस में बदल गई।

     

    मोहन गुस्से में बोला, “तुम शहर में रहते हो, तुम्हें इस घर से क्या लेना-देना?”

     

    सोहन को यह बात चुभ गई।

     

    “और आप गाँव में रहते हैं तो क्या पूरा घर आपका हो गया? पिताजी ने दोनों को बराबर दिया है।”

     

    उस दिन पहली बार दोनों भाइयों के बीच आवाज ऊँची हुई।

     

    अगले दिन राजमिस्त्री बुलाया गया और घर के बीच दीवार खड़ी करने की बात तय हुई।

     

    जब मजदूर दीवार बनाने लगे तो दोनों भाई दूर खड़े होकर एक-दूसरे को देखते रहे। जिस आँगन में दोनों बचपन में खेलते थे, उसी आँगन के बीच अब ईंटें रखी जा रही थीं।

     

    मोहन की बेटी रोते हुए बोली, “पापा, दादाजी के घर में दीवार क्यों बन रही है?”

     

    मोहन ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ दिनों में दीवार खड़ी हो गई।

     

    अब दोनों भाइयों के हिस्से अलग थे। रसोई अलग, आँगन अलग और दरवाजे भी अलग।

     

    एक शाम मोहन की पत्नी का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से गिरते-गिरते बची। सोहन ने आवाज सुनते ही दौड़कर उसे संभाल लिया।

     

    मोहन कुछ पल चुप रहा।

     

    “धन्यवाद,” उसने धीरे से कहा।

     

    सोहन ने बस इतना कहा, “भाभी हैं आप मेरी।”

     

    लेकिन दोनों फिर अपने-अपने हिस्से में चले गए।

     

    दिन बीतते गए। घर का बंटवारा तो हो गया था, मगर रिश्ते में आई दूरी बढ़ती गई।

     

    एक रात तेज बारिश शुरू हुई। बारिश इतनी ज्यादा थी कि पुराने घर की छत से पानी टपकने लगा। अचानक मोहन के हिस्से की पिछली दीवार कमजोर होकर गिर गई।

     

    अंदर बच्चे सो रहे थे।

     

    सोहन ने आवाज सुनी तो तुरंत दीवार के पास पहुँचा। उसने बिना कुछ सोचे बच्चों को बाहर निकाला।

     

    मोहन भी दौड़कर आया।

     

    कुछ देर दोनों भाई अपने बच्चों को सीने से लगाए खड़े रहे।

     

    मोहन की आँखों में आँसू थे।

     

    वह बोला, “सोहन… अगर तुम समय पर नहीं आते तो पता नहीं क्या होता।”

     

    सोहन ने कहा, “भैया, बच्चों की जान के सामने ये दीवार क्या मायने रखती है?”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    फिर उसकी नजर उसी दीवार पर गई, जिसे कुछ महीने पहले दोनों ने मिलकर खड़ा करवाया था।

     

    उसने कहा, “हमने घर बाँट लिया, लेकिन शायद हम ये भूल गए कि घर ईंटों से नहीं, रिश्तों से बनता है।”

     

    सोहन की आँखें भी भर आईं।

     

    “भैया, मुझे भी उस दिन की बात का अफसोस है। मुझे बराबर हिस्सा चाहिए था, लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि बराबर हिस्सा जमीन का होता है, भाई का नहीं।”

     

    मोहन ने आगे बढ़कर सोहन को गले लगा लिया।

     

    दोनों काफी देर तक चुपचाप खड़े रहे।

     

    अगली सुबह मजदूर बुलाए गए।

     

    मोहन ने कहा, “यह दीवार तोड़ दो।”

     

    सोहन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पक्का?”

     

    मोहन मुस्कुराया, “हाँ। पिताजी की आखिरी बात याद है ना? उन्होंने कहा था—घर चाहे बाँट लेना, रिश्ता मत बाँटना।”

     

    दीवार टूटने लगी।

     

    हर ईंट के गिरने के साथ जैसे दोनों भाइयों के बीच की नाराजगी भी गिरती जा रही थी।

     

    कुछ दिनों बाद घर फिर पहले जैसा हो गया। अब रसोई अलग नहीं थी। शाम को दोनों परिवार एक साथ बैठकर खाना खाते थे। बच्चे फिर उसी आँगन में खेलने लगे।

     

    एक दिन मोहन ने पुराने संदूक से पिता की तस्वीर निकाली और आँगन में रख दी।

     

    सोहन ने तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, देर से सही, लेकिन आपकी बात समझ आ गई।”

     

    मोहन ने कहा, “आपने हमें जमीन नहीं, एक परिवार दिया था। हम ही उसे बाँटने चले थे।”

     

    दोनों भाइयों ने तय किया कि खेत और संपत्ति का हिसाब कागजों में चाहे अलग रहे, लेकिन घर में कभी दीवार नहीं होगी।

     

    क्योंकि उस दिन उन्हें समझ आया था कि संपत्ति का बंटवारा आसान होता है, लेकिन रिश्तों का बंटवारा इंसान को अंदर से तोड़ देता है।

     

    और पिता की सबसे बड़ी विरासत जमीन नहीं थी।

     

    वह था—दो भाइयों का साथ।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • चार सब्जियां की लड़ाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    चार सब्जियों की अनोखी लड़ाई

     

    एक छोटे से शहर में मार्था नाम की एक बूढ़ी महिला रहती थी। उसका एक छोटा-सा बगीचा था, जिसमें वह तरह-तरह की सब्जियां उगाती थी। टमाटर, आलू, बैंगन, भिंडी, गाजर, मटर और कई तरह की हरी सब्जियां उसके बगीचे की शोभा बढ़ाती थीं।

     

    लेकिन उस बगीचे में चार सब्जियां ऐसी थीं, जो खुद को सबसे ज्यादा खास समझती थीं।

     

    टमाटर, आलू, बैंगन और भिंडी।

     

    चारों में हमेशा किसी न किसी बात पर बहस होती रहती थी।

     

    एक सुबह टमाटर ने अपनी लाल चमक दिखाते हुए कहा—

     

    “देखो मुझे! मैं कितनी सुंदर हूं। मेरे बिना सलाद की कल्पना भी नहीं की जा सकती।”

     

    आलू तुरंत बोला—

     

    “सुंदर होने से क्या होता है? सबसे ज्यादा काम तो मेरा आता है। सब्जी बनानी हो, पराठे हों, चाट हो या पकौड़े… हर जगह मैं काम आता हूं।”

     

    भिंडी ने गर्दन हिलाई।

     

    “तुम दोनों अपनी-अपनी तारीफ कर लो। लेकिन मेरे जैसा स्वाद किसके पास है?”

     

    बैंगन हंसते हुए बोला—

     

    “तुम तीनों भूल रहे हो कि असली सब्जियों का राजा कौन है।”

     

    टमाटर ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    बैंगन ने गर्व से कहा—

     

    “मैं! मुझसे भरता बनता है, सब्जी बनती है और मसालेदार पकवान भी।”

     

    आलू ने हंसकर कहा—

     

    “तुम्हें कौन पसंद करता है? बच्चे तो तुम्हारा नाम सुनकर ही मुंह बना लेते हैं।”

     

    बैंगन गुस्से में लाल पड़ गया।

     

    “कम से कम मैं तुम्हारी तरह हर सब्जी में घुसकर अपनी पहचान नहीं खोता!”

     

    आलू ने कहा—

     

    “क्या कहा?”

     

    भिंडी बीच में बोली—

     

    “बस करो तुम दोनों!”

     

    टमाटर ने कहा—

     

    “आज फैसला हो ही जाना चाहिए कि हम चारों में सबसे जरूरी कौन है।”

     

    चारों सब्जियां मान गईं।

     

    उन्होंने तय किया कि अगले दिन बगीचे में एक प्रतियोगिता होगी।

     

    जिस सब्जी को मार्था सबसे ज्यादा पसंद करेगी, वही सबसे खास मानी जाएगी।

     

    अगली सुबह मार्था बगीचे में आई।

     

    उसने टोकरी उठाई और चारों सब्जियों को देखा।

     

    सबसे पहले उसने टमाटर तोड़े।

     

    टमाटर खुशी से फूल गया।

     

    “देखा! सबसे पहले मुझे चुना।”

     

    आलू बोला—

     

    “अभी फैसला मत करो।”

     

    कुछ देर बाद मार्था ने आलू भी खोद लिए।

     

    आलू मुस्कुराया।

     

    “अब बताओ, कौन ज्यादा जरूरी है?”

     

    भिंडी और बैंगन भी टोकरी में रख दिए गए।

     

    चारों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    टमाटर बोला—

     

    “अब तो हम सब बराबर हो गए।”

     

    आलू ने कहा—

     

    “नहीं। असली फैसला रसोई में होगा।”

     

    मार्था सब्जियां लेकर रसोई में पहुंची।

     

    उसने टमाटर से चटनी बनाई।

     

    टमाटर खुशी से बोला—

     

    “देखा! मेरा इस्तेमाल सबसे पहले हुआ।”

     

    फिर आलू की सब्जी बनी।

     

    आलू ने गर्व से कहा—

     

    “अब मेरी बारी।”

     

    इसके बाद भिंडी मसाले के साथ पकाई गई।

     

    भिंडी बोली—

     

    “अब समझ आया कि स्वाद किसमें है?”

     

    अंत में बैंगन का भरता बना।

     

    बैंगन मुस्कुराया।

     

    “अब तो सबको मानना पड़ेगा कि मैं सबसे खास हूं।”

     

    लेकिन तभी रसोई में मार्था की छोटी पोती एलीना आई।

     

    उसने पूछा—

     

    “दादी, आज इतनी सारी सब्जियां?”

     

    मार्था मुस्कुराई।

     

    “हां बेटा। आज सबकी पसंद की चीज बनेगी।”

     

    एलीना ने चारों पकवान चखे।

     

    “दादी, सब बहुत अच्छे हैं!”

     

    चारों सब्जियां एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    लेकिन उनकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी।

     

    टमाटर बोला—

     

    “एलीना ने पहले मेरी चटनी की तारीफ की थी।”

     

    आलू बोला—

     

    “लेकिन उसने मेरी सब्जी ज्यादा खाई।”

     

    भिंडी ने कहा—

     

    “उसने मेरी प्लेट पूरी खत्म की।”

     

    बैंगन बोला—

     

    “और भरता दोबारा मांगा।”

     

    अब चारों फिर झगड़ने लगे।

     

    मार्था रसोई साफ करने के बाद आराम करने बैठी थी। उसने उनकी बातें सुन लीं।

     

    वह मुस्कुराई और बोली—

     

    “तुम चारों लड़ क्यों रहे हो?”

     

    सब्जियां चुप हो गईं।

     

    टमाटर बोला—

     

    “हममें से सबसे अच्छी कौन है, इसी का फैसला कर रहे हैं।”

     

    मार्था हंस पड़ी।

     

    “सबसे अच्छी?”

     

    “हां।”

     

    मार्था ने कहा—

     

    “तुम चारों अलग हो। कोई सलाद में अच्छा लगता है, कोई सब्जी में, कोई भरते में और कोई अलग-अलग पकवानों में।”

     

    आलू बोला—

     

    “लेकिन सबसे जरूरी कौन है?”

     

    मार्था ने कहा—

     

    “अगर तुममें से एक भी न हो तो खाना थोड़ा कम स्वादिष्ट हो सकता है। लेकिन अगर तुम सब मिलकर रहो तो रसोई और भी अच्छी बनती है।”

     

    चारों सब्जियां एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    फिर भी बैंगन बोला—

     

    “लेकिन क्या हम अपनी-अपनी खासियत नहीं बता सकते?”

     

    मार्था ने कहा—

     

    “बिल्कुल बता सकते हो। अपनी अच्छाई पर गर्व करना गलत नहीं है। लेकिन अपनी अच्छाई को दूसरों को छोटा दिखाने के लिए इस्तेमाल करना गलत है।”

     

    यह बात चारों के दिल में उतर गई।

     

    लेकिन उसी समय बगीचे से एक आवाज आई।

     

    “अरे! मेरी बात कोई नहीं कर रहा!”

     

    चारों ने पीछे देखा।

     

    वह गाजर थी।

     

    गाजर ने कहा—

     

    “मैं भी तो हूं!”

     

    भिंडी हंस पड़ी।

     

    “तुम्हें तो हम भूल ही गए।”

     

    गाजर नाराज होकर बोली—

     

    “यही तो समस्या है। तुम चारों खुद को सबसे बड़ा समझते हो।”

     

    चारों चुप हो गए।

     

    गाजर ने कहा—

     

    “इस बगीचे में हर सब्जी की अपनी जगह है। किसी की जरूरत कम नहीं।”

     

    आलू ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम सही कह रही हो।”

     

    टमाटर बोला—

     

    “हम बिना वजह लड़ रहे थे।”

     

    भिंडी ने कहा—

     

    “हमें अपनी खूबियां पता हैं, लेकिन दूसरों की खूबियां देखना भूल गए।”

     

    बैंगन मुस्कुराया।

     

    “तो क्या आज से कोई नहीं लड़ेगा?”

     

    आलू ने मजाक में कहा—

     

    “अगर तुमने खुद को राजा कहना बंद कर दिया तो।”

     

    बैंगन हंस पड़ा।

     

    “ठीक है।”

     

    चारों ने एक-दूसरे से दोस्ती कर ली।

     

    अब जब भी बगीचे में कोई सब्जी खुद को सबसे खास बताती, चारों उसे समझाते—

     

    “सबसे खास बनने की जरूरत नहीं है। अपनी जगह अच्छी तरह निभाना ही काफी है।”

     

    कुछ दिनों बाद मार्था ने बगीचे में एक बड़ा बोर्ड लगाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “इस बगीचे में कोई सब्जी छोटी-बड़ी नहीं। हर किसी की अपनी खासियत है।”

     

    चारों सब्जियां उस बोर्ड को देखकर मुस्कुराने लगीं।

     

    टमाटर ने कहा—

     

    “अब समझ आया, लाल होने का मतलब सिर्फ गुस्सा करना नहीं है।”

     

    आलू बोला—

     

    “और हर जगह काम आने का मतलब सबसे बड़ा होना नहीं।”

     

    भिंडी हंसी—

     

    “मेरी लंबाई ज्यादा है, इसका मतलब मैं दूसरों से बड़ी नहीं।”

     

    बैंगन ने कहा—

     

    “और मेरा भरता मशहूर है, इसका मतलब मैं सब्जियों का राजा नहीं।”

     

    सभी हंस पड़े।

     

    उस दिन के बाद बगीचे में चारों की दोस्ती पूरे शहर में मशहूर हो गई।

     

    जब भी मार्था चारों को एक साथ रसोई में लाती, वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “लड़ाई में कोई जीतता नहीं। लेकिन जब सब मिलकर रहें, तो हर किसी की खूबसूरती और स्वाद और बढ़ जाता है।”

     

    और चारों सब्जियों ने हमेशा के लिए यह सीख याद रखी—

     

    दूसरों से बेहतर साबित होने से ज्यादा जरूरी है, अपनी खासियत को पहचानना और दूसरों की खासियत की कद्र करना।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • तीखी मिर्ची का अनोखा राज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    तीखी मिर्ची का अनोखा राज

     

    एक छोटे से गांव का नाम था हरियापुर। गांव के चारों तरफ खेत थे और उन्हीं खेतों के बीच एक बूढ़े किसान जॉर्ज का छोटा-सा खेत था। जॉर्ज के खेत में तरह-तरह की सब्जियां उगती थीं, लेकिन उसकी सबसे खास फसल थी—हरी मिर्च।

     

    जॉर्ज की मिर्चें पूरे इलाके में मशहूर थीं।

     

    लोग कहते थे कि उसकी एक मिर्च खा लो तो पानी पीते-पीते पूरा घड़ा खाली कर दो, फिर भी जीभ की जलन कम नहीं होती।

     

    लेकिन जॉर्ज को अपनी मिर्चों पर बहुत गर्व था।

     

    वह हमेशा कहता—

     

    “मेरे खेत की मिर्च सिर्फ तीखी नहीं है, इसमें मेहनत का स्वाद है।”

     

    उसका पोता लुकास शहर से छुट्टियों में गांव आया हुआ था।

     

    एक सुबह वह खेत में दादा के साथ घूम रहा था।

     

    लुकास ने एक बड़ी-सी चमकदार हरी मिर्च देखकर पूछा—

     

    “दादा, ये इतनी बड़ी और चमकदार क्यों है?”

     

    जॉर्ज ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उसे मत छूना।”

     

    लुकास हंस पड़ा।

     

    “क्यों? मिर्च है, कोई सांप थोड़ी है।”

     

    जॉर्ज ने गंभीर होकर कहा—

     

    “वह साधारण मिर्च नहीं है।”

     

    लुकास की उत्सुकता बढ़ गई।

     

    “फिर कैसी है?”

     

    जॉर्ज ने आसपास देखा और धीरे से कहा—

     

    “यह मेरे खेत की सबसे तीखी मिर्च है। इसे मैंने बीस साल पहले एक बूढ़े साधु से मिले बीज से उगाया था।”

     

    “तो?”

     

    “जिसने भी इसे खाया, उसे अपने अंदर छिपा सच बोलना पड़ा।”

     

    लुकास हंसने लगा।

     

    “दादा, आप भी ना! मिर्च खाने से कोई सच कैसे बोल सकता है?”

     

    जॉर्ज ने कुछ नहीं कहा।

     

    लुकास को लगा दादा उसे डराने की कोशिश कर रहे हैं।

     

    दोपहर को जब जॉर्ज खाना खाने घर गया, लुकास चुपके से खेत में वापस आया।

     

    उसने वही मिर्च तोड़ी।

     

    “आज पता चल ही जाएगा कि दादा सच बोल रहे थे या नहीं।”

     

    उसने मिर्च का छोटा-सा टुकड़ा मुंह में डाल लिया।

     

    पहले कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर अचानक उसकी आंखों से पानी निकलने लगा।

     

    “आह! ये क्या है!”

     

    उसका मुंह जलने लगा।

     

    वह पानी की तरफ भागा।

     

    एक गिलास पानी पिया।

     

    फिर दूसरा।

     

    लेकिन जलन कम नहीं हुई।

     

    तभी उसके मुंह से अचानक निकल गया—

     

    “मैंने दादा की अलमारी से पैसे चुराए थे!”

     

    लुकास खुद चौंक गया।

     

    “मैंने ये क्या बोल दिया?”

     

    उसे पिछले साल की बात याद आ गई।

     

    उसने सच में दादा की अलमारी से कुछ पैसे लिए थे और कभी किसी को नहीं बताया था।

     

    जलन धीरे-धीरे कम हुई।

     

    लुकास डर गया।

     

    “दादा सच बोल रहे थे!”

     

    वह तुरंत घर पहुंचा और जॉर्ज के सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “दादा…”

     

    जॉर्ज ने उसे देखते ही समझ लिया।

     

    “तुमने मिर्च खा ली?”

     

    लुकास ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “और?”

     

    लुकास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मुझसे गलती हुई थी। मैंने पिछले साल आपके पैसे लिए थे।”

     

    जॉर्ज कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “मुझे पता था।”

     

    लुकास ने हैरानी से पूछा—

     

    “आपको पता था?”

     

    “हां। लेकिन मैं चाहता था कि तुम खुद एक दिन सच बताओ।”

     

    लुकास ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    जॉर्ज ने उसे गले लगा लिया।

     

    “गलती से बड़ा इंसान होता है वह, जो अपनी गलती मान ले।”

     

    लेकिन इस अजीब मिर्च का राज जल्द ही पूरे गांव में फैल गया।

     

    गांव का दुकानदार मार्टिन सबसे पहले जॉर्ज के पास आया।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे एक मिर्च चाहिए।”

     

    जॉर्ज ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    मार्टिन ने हंसकर कहा—

     

    “बस मजे के लिए।”

     

    जॉर्ज ने उसे मिर्च दे दी।

     

    मार्टिन ने जैसे ही थोड़ा सा टुकड़ा खाया, उसकी आंखों से पानी निकलने लगा।

     

    “मैंने पिछले महीने तुम्हारी दुकान से उधार लिए पैसे वापस नहीं किए क्योंकि मैंने वो पैसे खुद रख लिए थे!”

     

    जॉर्ज ने माथा पकड़ लिया।

     

    गांव वाले हैरान रह गए।

     

    अब हर कोई उस मिर्च को लेकर उत्सुक हो गया।

     

    किसी ने सोचा कि इससे झूठ पकड़ना आसान होगा।

     

    किसी ने सोचा कि गांव के सारे राज सामने आ जाएंगे।

     

    लेकिन जॉर्ज ने मिर्च देना बंद कर दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “सच जानने के लिए किसी को जलाना जरूरी नहीं।”

     

    लेकिन गांव का सबसे चालाक आदमी हेनरी इस मिर्च का फायदा उठाना चाहता था।

     

    वह जॉर्ज के पास आया।

     

    “तुम्हें इस मिर्च से बहुत पैसा कमाना चाहिए।”

     

    जॉर्ज ने कहा—

     

    “मैं इसे बेचने के लिए नहीं उगाता।”

     

    हेनरी ने लालच दिया—

     

    “मैं तुम्हें बहुत पैसे दूंगा।”

     

    जॉर्ज ने मना कर दिया।

     

    उस रात हेनरी चोरी-छिपे खेत में घुस गया।

     

    उसने पूरी मिर्च की बेल उखाड़ने की कोशिश की।

     

    लेकिन जैसे ही उसने मिर्च तोड़ी, उसे तेज जलन महसूस हुई।

     

    वह चीख पड़ा—

     

    “मैंने गांव के लोगों से झूठ बोलकर उनकी जमीन के कागज हथियाने की कोशिश की है!”

     

    सुबह तक गांव वालों को सब पता चल गया।

     

    हेनरी की सारी चाल सामने आ गई।

     

    लोग जॉर्ज के पास आए।

     

    “आपने ये मिर्च बचाकर बहुत अच्छा किया।”

     

    जॉर्ज ने कहा—

     

    “नहीं। असली बात मिर्च में नहीं है।”

     

    सबने पूछा—

     

    “तो फिर?”

     

    जॉर्ज ने खेत की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “मिर्च सिर्फ वही सच बाहर निकालती है, जिसे इंसान खुद अपने अंदर दबाकर बैठा होता है। सच पहले से उसके अंदर होता है।”

     

    लुकास ने दादा की बात ध्यान से सुनी।

     

    उस दिन से वह दादा के खेत में काम करने लगा।

     

    कुछ महीनों बाद एक दिन जॉर्ज ने उसे एक छोटा-सा बीज दिया।

     

    “इसे संभालकर रखना।”

     

    लुकास ने पूछा—

     

    “क्या यह उसी तीखी मिर्च का बीज है?”

     

    जॉर्ज मुस्कुराए।

     

    “हां।”

     

    “क्या मैं इसे उगा सकता हूं?”

     

    “उगा सकते हो। लेकिन याद रखना, इसकी ताकत का इस्तेमाल किसी को शर्मिंदा करने के लिए मत करना।”

     

    लुकास ने बीज संभालकर रख लिया।

     

    साल बीत गए।

     

    जॉर्ज बूढ़ा होता गया और एक दिन उसने खेती की जिम्मेदारी लुकास को सौंप दी।

     

    लुकास ने उस मिर्च की खेती जारी रखी, लेकिन उसने उसे कभी बाजार में नहीं बेचा।

     

    वह गांव के बच्चों को एक ही बात सिखाता—

     

    “सच बोलने के लिए किसी जादुई मिर्च की जरूरत नहीं होती।”

     

    एक दिन गांव में एक छोटा बच्चा उसके पास आया।

     

    उसने पूछा—

     

    “अगर कोई झूठ बोलता है तो क्या उसे वो मिर्च खिला देंगे?”

     

    लुकास हंस पड़ा।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि सच किसी के मुंह से जबरदस्ती नहीं निकलवाना चाहिए।”

     

    बच्चे ने पूछा—

     

    “फिर मिर्च किस काम की है?”

     

    लुकास ने खेत की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “ये हमें सिर्फ एक बात याद दिलाती है।”

     

    “क्या?”

     

    लुकास मुस्कुराया।

     

    “झूठ कितना भी छिपा लो, सबसे ज्यादा मुश्किल उसे अपने ही दिल से छिपाना होता है।”

     

    उस दिन से गांव में उस मिर्च को लोग “सच वाली मिर्च” कहने लगे।

     

    लेकिन लुकास के लिए वह सिर्फ एक मिर्च थी।

     

    उसे पता था कि असली तीखापन उस मिर्च में नहीं था।

     

    असली तीखापन उस सच में था, जिसे इंसान अपने फायदे के लिए छिपाता रहता है।

     

    और यही उस छोटी-सी हरी मिर्च ने पूरे गांव को सिखाया था—

    सच कभी-कभी तीखा जरूर होता है, लेकिन झूठ से कहीं बेहतर होता है।

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