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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

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  • कान्हा और गाय की घंटी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     कान्हा और गाय की नई घंटी

     

    अगली सुबह नंद भवन के आँगन में एक नई आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा ने खेलते-खेलते अपना सिर उठाया।

     

    “ये कैसी आवाज है?”

     

    उनके दोस्त ने कहा—

     

    “चलो देखते हैं।”

     

    सभी बच्चे दौड़कर आँगन में पहुँचे।

     

    वहाँ नंद बाबा एक सुंदर सी गाय के गले में नया घंटी वाला पट्टा बाँध रहे थे। घंटी चमक रही थी और उसके हिलते ही मधुर आवाज निकल रही थी।

     

    कान्हा उस गाय के पास जाकर खड़े हो गए।

     

    उन्होंने घंटी को ध्यान से देखा।

     

    “बाबा, ये नई है?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ बेटा। आज इसे नई घंटी पहनाई है।”

     

    कान्हा ने घंटी को हल्के से छुआ।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “अब जब ये दूर जाएगी, तो इसकी आवाज से पता चल जाएगा कि ये कहाँ है।”

     

    कान्हा ने तुरंत पूछा—

     

    “तो अगर मैं भी इसे पहन लूँ तो आपको पता चल जाएगा कि मैं कहाँ हूँ?”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें घंटी की जरूरत नहीं है। तुम्हारी शरारतों की आवाज दूर से ही सुनाई दे जाती है।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने मुँह बना लिया।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अच्छा, नाराज मत हो।”

     

    कान्हा फिर घंटी को देखने लगे।

     

    उसके साथ लाल रंग का सुंदर पट्टा भी लगा था।

     

    उनके मन में तुरंत एक विचार आया।

     

    उन्होंने अपने दोस्त को आँख से इशारा किया।

     

    दोस्त समझ गया कि कुछ होने वाला है।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “अगर ये घंटी किसी और को पहना दें तो?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “किसे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अभी नहीं बताऊँगा।”

     

    नंद बाबा गाय को लेकर बाहर चले गए।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ पीछे-पीछे चल दिए।

     

    गाय थोड़ी दूर जाकर पेड़ के नीचे घास खाने लगी।

     

    कान्हा उसकी घंटी की आवाज सुनते रहे।

     

    टन… टन…

     

    उन्हें यह आवाज बहुत पसंद आ रही थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुम इसे इतना ध्यान से क्यों सुन रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि इसकी आवाज से पता चलता है कि गाय कहाँ है।”

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “हम भी ऐसा खेल खेलेंगे।”

     

    दोस्तों ने पूछा—

     

    “कैसा?”

     

    “एक बच्चा आँखें बंद करेगा और बाकी घंटी बजाकर अलग-अलग जगह छिपेंगे। उसे आवाज सुनकर सबको ढूँढ़ना होगा।”

     

    सभी बच्चों को खेल पसंद आ गया।

     

    उन्होंने एक छोटी घंटी ली जो घर के पुराने सामान में पड़ी थी।

     

    पहली बारी कान्हा की थी।

     

    उन्होंने आँखों पर कपड़ा बाँध लिया।

     

    दोस्त घंटी बजाते हुए इधर-उधर भागने लगे।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा आवाज सुनकर एक तरफ दौड़ते।

     

    लेकिन दोस्त दूसरी तरफ चले जाते।

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम लोग मुझे परेशान कर रहे हो!”

     

    सब हँसने लगे।

     

    आखिरकार कान्हा ने आवाज का पीछा किया और एक दोस्त को पकड़ लिया।

     

    “पकड़ लिया!”

     

    दोस्त बोला—

     

    “कैसे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम्हारी हँसी से।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कुछ देर तक खेल चलता रहा।

     

    तभी नंद बाबा की गाय वहाँ से निकलकर दूसरी तरफ चली गई।

     

    उसकी घंटी बज रही थी।

     

    कान्हा अचानक चुप हो गए।

     

    “रुको।”

     

    सबने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “गाय कहाँ जा रही है?”

     

    उन्होंने देखा कि गाय रास्ते से हटकर झाड़ियों की तरफ चली गई थी।

     

    कान्हा उसके पीछे गए।

     

    वहाँ एक छोटा बछड़ा खड़ा था, जो अपनी माँ के पीछे जाना चाहता था लेकिन रस्सी के कारण रुक गया था।

     

    कान्हा ने उसे देखकर कहा—

     

    “अरे, तुम यहाँ हो!”

     

    बछड़ा बेचैनी से आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने नंद बाबा को बुलाया।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा तुरंत आए।

     

    उन्होंने बछड़े को देखा।

     

    “ये अपनी माँ के पास जाना चाहता है।”

     

    उन्होंने उसे खोल दिया।

     

    बछड़ा दौड़कर अपनी माँ के पास चला गया।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “घंटी ने हमें इसका रास्ता बता दिया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “देखा? छोटी सी चीज भी कितने काम आती है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    उस दिन से कान्हा को घंटी की आवाज और भी अच्छी लगने लगी।

     

    शाम को वह गाय के पास बैठे रहे।

     

    वह उसे प्यार से सहलाते और घंटी की आवाज सुनते।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें देखा।

     

    “कान्हा, आज तुम्हें घंटी से इतनी दोस्ती कैसे हो गई?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, इसकी आवाज से पता चलता है कि गाय कहाँ है।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें गायों की बहुत चिंता रहती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “ये हमारे घर का हिस्सा हैं।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    तभी कान्हा ने अचानक कहा—

     

    “मैया, मुझे भी एक घंटी चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “जब मैं बाहर जाऊँ तो आपको पता रहे कि मैं कहाँ हूँ।”

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “तुम्हें घंटी पहनाने की जरूरत नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारी आवाज से ही पहचान लूँगी।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अगर मैं चुप रहा तो?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तब तुम्हारे दोस्त तुम्हें ढूँढ़ते हुए जरूर शोर मचाएँगे।”

     

    कान्हा और उनके दोस्त हँसने लगे।

     

    अगले दिन कान्हा ने एक नई शरारत की योजना बनाई।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “आज हम सब अपनी-अपनी छोटी घंटियाँ पहनेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “हम देखेंगे कि कौन सबसे ज्यादा देर तक बिना आवाज किए चल सकता है।”

     

    सभी ने घंटियाँ बाँध लीं।

     

    लेकिन जैसे ही वे चलने लगे—

     

    टन… टन… टन… टन…

     

    सबकी घंटियाँ एक साथ बजने लगीं।

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “कोई भी चुप नहीं चल सकता!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुम्हारी वजह से ये खेल भी खराब हो गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “खराब नहीं, मजेदार हो गया।”

     

    सभी बच्चे दौड़ने लगे।

     

    घंटियों की आवाज पूरे रास्ते में गूँजने लगी।

     

    गाँव की गोपियाँ बाहर आ गईं।

     

    एक गोपी ने पूछा—

     

    “ये कैसी बारात निकल रही है?”

     

    दूसरी बोली—

     

    “लगता है कान्हा ने बच्चों को गाय बना दिया है।”

     

    कान्हा जोर से हँसे।

     

    “हम गाय नहीं हैं!”

     

    गोपियाँ भी हँसने लगीं।

     

    तभी यशोदा वहाँ पहुँच गईं।

     

    उन्होंने बच्चों की घंटियाँ देखीं।

     

    “ये सब क्या है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, हम घंटी वाला खेल खेल रहे हैं।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा, लेकिन किसी की गाय की घंटी मत खोलना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं खोलेंगे।”

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “कान्हा, तुमने तो सोचा था गाय की घंटी खुद पहनोगे।”

     

    यशोदा ने सुन लिया।

     

    “क्या कहा?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    दोस्त भाग गया।

     

    यशोदा ने कान्हा को पकड़ लिया।

     

    “तुम गाय की घंटी पहनने वाले थे?”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “बस सोच रहा था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मेरे कान्हा को हर चीज खुद करके देखनी होती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि मुझे सब जानना है।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “जानना अच्छी बात है, लेकिन हर चीज करने से पहले पूछना भी जरूरी है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    रात को नंद बाबा घर लौटे।

     

    कान्हा उनके पास बैठकर बोले—

     

    “बाबा, आपकी गाय की घंटी बहुत अच्छी है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तुम्हें पसंद है?”

     

    “बहुत।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो कल तुम मेरे साथ गायों को चराने चलना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “और मैं उनकी घंटियाँ भी सुनूँगा?”

     

    “जितनी चाहो।”

     

    कान्हा ने नंद बाबा को गले लगा लिया।

     

    उस रात कान्हा बहुत खुश थे।

     

    उन्होंने सोने से पहले यशोदा से कहा—

     

    “मैया, कल मैं बाबा के साथ गायों के पास जाऊँगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “किस बात का?”

     

    “गायों से दूर मत जाना।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।”

     

    • यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    अगली सुबह कान्हा पहली बार नंद बाबा के साथ गायों को लेकर वृंदावन के खुले मैदानों की ओर जाने वाले थे।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही कान्हा को एक ऐसी चीज दिखाई देने वाली थी जिसने उन्हें चौंका दिया—

     

    एक बहुत छोटा बछड़ा अपनी माँ से अलग होकर अकेला खड़ा था।

     

    कान्हा तुरंत उसकी ओर दौड़ पड़े।

     

    और इस बार उनकी शरारत नहीं, उनकी ममता और समझदारी सबको देखने को मिलने वाली थी।

     

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कान्हा और मिस्री की चोरी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    अध्याय  — कान्हा और मिश्री की मीठी चोरी

     

    वृंदावन में उस सुबह हवा में कुछ अलग ही मिठास थी। नंद भवन की रसोई से मीठी खुशबू पूरे आँगन में फैल रही थी। यशोदा मैया सुबह से ही एक बड़े बर्तन में दूध उबाल रही थीं। पास में मिश्री के छोटे-छोटे टुकड़े रखे थे।

     

    कान्हा बाहर अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे, लेकिन जैसे ही मीठी खुशबू उनके पास पहुँची, उन्होंने खेलना बंद कर दिया।

     

    कान्हा ने हवा में साँस लेते हुए कहा—

     

    “कुछ मीठा बन रहा है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मेरी नाक बता रही है।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “चलो पता लगाते हैं।”

     

    सभी बच्चे धीरे-धीरे नंद भवन की रसोई के पास पहुँच गए।

     

    खिड़की से झाँककर कान्हा ने देखा कि यशोदा मैया एक बड़ी थाली में मिश्री के टुकड़े रख रही थीं।

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “मिश्री!”

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “बहुत सारी है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    दूसरे दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम्हारा कुछ नहीं मतलब हमेशा कुछ होता है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उसी समय यशोदा मैया ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    खिड़की के पास कोई नहीं था।

     

    लेकिन उन्हें पता था कि कोई न कोई जरूर वहाँ था।

     

    उन्होंने मिश्री की थाली उठाई और उसे ऊँची जगह पर रख दिया।

     

    फिर मन ही मन बोलीं—

     

    “आज देखते हैं कान्हा इसे कैसे लेते हैं।”

     

    यशोदा बाहर चली गईं।

     

    कुछ पल बाद कान्हा धीरे-धीरे अंदर आए।

     

    उन्होंने ऊपर देखा।

     

    मिश्री बहुत ऊँचाई पर रखी थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब कैसे लोगे?”

     

    कान्हा ने पास पड़ी लकड़ी उठाई।

     

    “इससे।”

     

    उन्होंने लकड़ी ऊपर की तरफ बढ़ाई।

     

    लेकिन थाली दूर थी।

     

    उन्होंने फिर कोशिश की।

     

    थाली हिली जरूर, लेकिन मिश्री नीचे नहीं आई।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ये काम नहीं करेगा।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “चलो छोड़ देते हैं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उन्होंने आसपास देखा।

     

    वहाँ एक छोटी चौकी पड़ी थी।

     

    कान्हा ने उसे खींचकर दीवार के पास रखा।

     

    फिर उसके ऊपर एक और लकड़ी का पटरा रख दिया।

     

    दोस्त घबरा गया।

     

    “कान्हा, गिर जाओगे!”

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम पकड़कर रखना।”

     

    एक बच्चा चौकी पकड़कर खड़ा हो गया।

     

    कान्हा धीरे-धीरे ऊपर चढ़े।

     

    अब उनका हाथ थाली तक पहुँचने वाला था।

     

    उन्होंने मिश्री का एक टुकड़ा उठाया।

     

    “मिल गई!”

     

    नीचे खड़े बच्चों ने खुशी से हाथ उठाए।

     

    लेकिन तभी बाहर से यशोदा की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा वहीं रुक गए।

     

    उनके हाथ में मिश्री थी।

     

    दोस्तों ने चौकी छोड़ दी और भागने लगे।

     

    कान्हा जल्दी से नीचे उतरने लगे।

     

    लेकिन उनका पैर चौकी से फिसल गया।

     

    सौभाग्य से वह नीचे रखी नरम चटाई पर गिर गए।

     

    यशोदा अंदर आईं।

     

    उन्होंने देखा कि कान्हा जमीन पर बैठे हैं और उनके हाथ में मिश्री है।

     

    यशोदा ने कमर पर हाथ रखा।

     

    “तो यही हो रहा था?”

     

    कान्हा ने मिश्री पीछे छिपा ली।

     

    “क्या?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाथ पीछे क्यों कर रखा है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “दिखाओ।”

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    मिश्री का टुकड़ा देखकर यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    “तुम्हें इतनी मिश्री चाहिए थी?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे नहीं।”

     

    “तो किसे?”

     

    कान्हा ने पीछे खड़े दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “सबको।”

     

    दोस्तों ने सिर हिलाया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “अगर तुम्हें चाहिए थी तो मुझसे माँग लेते।”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “आप मना कर देतीं।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आप कहतीं कि ज्यादा मीठा मत खाओ।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तो तुमने चोरी करना ठीक समझा?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “गलती हो गई।”

     

    यशोदा ने उन्हें पास बुलाया।

     

    “देखो कान्हा, बिना पूछे किसी की चीज लेना अच्छी बात नहीं है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “अगर मैं माँगता तो देतीं?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा की आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ, लेकिन सबको बराबर देती।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो अब दे दो।”

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “पहले वादा करो कि आगे से बिना पूछे नहीं लोगे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “वादा।”

     

    यशोदा ने मिश्री की थाली नीचे रख दी।

     

    सभी बच्चों की आँखें चमक उठीं।

     

    उन्होंने एक-एक करके सबको मिश्री दी।

     

    कान्हा को थोड़ा ज्यादा देने लगीं तो कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया। सबको जितनी दी है, मुझे भी उतनी ही दो।”

     

    यशोदा ने प्यार से उनकी तरफ देखा।

     

    “आज तो तुमने बहुत बड़ी बात कह दी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    सब बच्चे मिश्री खाने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, चोरी करने से अच्छा माँग लेना था।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब समझ आ गया।”

     

    दूसरा बच्चा बोला—

     

    “लेकिन चोरी में मजा आता है।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मिश्री मिलने की खुशी ज्यादा अच्छी है, चोरी की नहीं।”

     

    यशोदा यह सुनकर मुस्कुराईं।

     

    दोपहर को नंद बाबा घर लौटे।

     

    उन्होंने देखा कि आँगन में बच्चे बैठे मिश्री खा रहे हैं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज किस खुशी में मिश्री बाँटी जा रही है?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आपके बेटे ने आज फिर एक नया कारनामा किया।”

     

    नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “क्या किया?”

     

    कान्हा ने खुद ही सारी बात बता दी।

     

    “मैंने मिश्री लेने की कोशिश की।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “और पकड़े गए?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया ने सबको बराबर मिश्री दी।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो आज तुम्हारी चोरी भी काम की रही।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आप भी उसे बढ़ावा मत दीजिए।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ बाहर बैठे थे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “आज तो बहुत मजा आया।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “कल क्या मिलेगा?”

     

    कान्हा ने सोचा।

     

    “पता नहीं।”

     

    तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—

     

    “अरे यशोदा! तुम्हारे कान्हा ने मेरी मटकी में फूल डाल दिए!”

     

    कान्हा ने आवाज सुनी।

     

    उन्होंने तुरंत दोस्तों की तरफ देखा।

     

    दोस्तों ने भी उन्हें देखा।

     

    सब चुप हो गए।

     

    कान्हा धीरे से बोले—

     

    “मैंने तो कुछ नहीं किया।”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    “अब तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ कौन मानेगा?”

     

    कान्हा भी हँस पड़े और भागने लगे।

     

    गोपी पीछे से आवाज लगाती रही—

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी गूँजने लगी।

     

    कान्हा दौड़ते-दौड़ते एक पेड़ के पीछे छिप गए।

     

    उनके दोस्त भी वहीं आ गए।

     

    एक ने पूछा—

     

    “तुमने सच में मटकी में फूल डाले थे?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो गोपी हमेशा अपनी मटकी को बहुत सुंदर बनाती हैं। मैंने सोचा मटकी के अंदर भी फूल होने चाहिए।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    तभी यशोदा वहाँ पहुँच गईं।

     

    उन्होंने कान्हा को पकड़ लिया।

     

    “तो ये थी आज की दूसरी शरारत!”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “मैया, मैंने फूल ही तो डाले थे।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन बिना पूछे!”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    फिर बोले—

     

    “अब नहीं करूँगा।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा, अब उस गोपी से माफी माँगो।”

     

    कान्हा उनके साथ गए।

     

    गोपी अभी भी नाराज थी।

     

    कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    गोपी ने उन्हें देखा।

     

    “अच्छा, अब नहीं करोगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं।”

     

    गोपी मुस्कुरा दी।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो क्या मैं बाहर से फूल लगाऊँ?”

     

    गोपी हँस पड़ी।

     

    “हाँ, वो कर सकते हो।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “ठीक है!”

     

    उस दिन कान्हा ने पहली बार समझा कि अपनी खुशी के लिए किसी की चीज से छेड़छाड़ करने से अच्छा है कि उसकी खुशी में शामिल हुआ जाए।

     

    रात को यशोदा ने कान्हा को सुलाते हुए पूछा—

     

    “आज क्या सीखा?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बिना पूछे किसी की चीज नहीं लेनी चाहिए।”

     

    “और?”

     

    “अगर किसी को खुश करना हो तो उसकी अनुमति लेकर करना चाहिए।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर उनके माथे को चूमा।

     

    “मेरा कान्हा सच में समझदार हो रहा है।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कीं।

     

    कुछ पल बाद धीरे से बोले—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “कल फिर मिश्री मिलेगी?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “हाँ, लेकिन चोरी नहीं।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “पक्का।”

     

    बाहर वृंदावन में चाँदनी फैल चुकी थी।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा के सामने मिश्री से भी बड़ी चुनौती आने वाली थी।

     

    नंद बाबा ने अपनी गायों के लिए एक नया घंटी वाला पट्टा बनवाया था।

     

    और कान्हा को देखते ही उसमें कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देखकर उनके मन में फिर एक नई शरारत जन्म ले चुकी थी।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कान्हा और नन्हीं चिड़िया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    अध्याय  कान्हा और नन्ही चिड़िया

     

    सुबह होते ही कान्हा अपने दोस्तों के साथ यमुना किनारे पहुँच गए। कल उन्होंने तय किया था कि आज वहाँ खूब खेलेंगे, लेकिन जैसे ही वे नदी के पास पहुँचे, कान्हा की नजर घास के बीच किसी छोटी सी चीज पर पड़ी।

     

    उन्होंने कदम रोक दिए।

     

    “रुको!”

     

    सभी बच्चे रुक गए।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उस जगह पहुँचे। वहाँ एक छोटी सी चिड़िया बैठी थी। वह उड़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बार-बार अपने पंख समेटकर नीचे बैठ जाती।

     

    कान्हा उसके पास घुटनों के बल बैठ गए।

     

    “क्या हुआ तुम्हें?”

     

    चिड़िया ने गर्दन हिलाई।

     

    कान्हा ने उसे हाथ लगाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बस ध्यान से देखा।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “शायद इसे चोट लगी है।”

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “हमें इसे डराना नहीं चाहिए।”

     

    दूसरे दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करें?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    “इसे पानी चाहिए होगा।”

     

    उन्होंने अपनी छोटी कटोरी में थोड़ा पानी भरा और चिड़िया के पास रख दिया।

     

    चिड़िया पहले तो पीछे हट गई, लेकिन कुछ देर बाद धीरे-धीरे पानी पीने लगी।

     

    कान्हा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “देखा? इसे प्यास लगी थी।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, इसे घर ले चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर इसकी माँ इसे ढूँढ़ रही होगी तो?”

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    “पहले इसकी माँ को ढूँढ़ेंगे।”

     

    वे पेड़ों की तरफ देखने लगे।

     

    कान्हा ने चिड़िया की आवाज की नकल की।

     

    “चीं… चीं…”

     

    एक दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम चिड़िया की आवाज निकाल रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अगर इससे इसकी माँ आ गई तो?”

     

    उन्होंने फिर आवाज निकाली।

     

    कुछ देर बाद ऊपर पेड़ से एक चिड़िया की आवाज सुनाई दी।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “शायद इसकी माँ है।”

     

    उन्होंने नीचे बैठी चिड़िया को देखा।

     

    वह भी ऊपर की ओर देखने लगी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, यही है।”

     

    लेकिन समस्या यह थी कि छोटी चिड़िया उड़ नहीं पा रही थी।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे पेड़ के नीचे ले चलते हैं।”

     

    सब बच्चे सावधानी से उसके पास बैठ गए।

     

    कान्हा ने पत्तों की मदद से उसके लिए छोटी सी जगह बनाई।

     

    फिर बोले—

     

    “अब इसकी माँ नीचे आएगी।”

     

    कुछ देर बाद ऊपर वाली चिड़िया नीचे की डाल पर आकर बैठ गई।

     

    वह लगातार आवाज कर रही थी।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “देखो, इसकी माँ इसे बुला रही है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन ये ऊपर कैसे जाएगी?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जब इसके पंख ठीक होंगे, तब उड़ जाएगी। अभी इसे आराम चाहिए।”

     

    कान्हा ने पास की झाड़ियों से कुछ नरम पत्ते लाकर उसके आसपास रख दिए।

     

    फिर वह वहीं बैठ गए।

     

    दोस्तों ने पूछा—

     

    “तुम यहीं बैठे रहोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इसे डर लग रहा है।”

     

    कुछ देर बाद चिड़िया शांत हो गई।

     

    कान्हा ने धीरे से बांसुरी निकाली।

     

    उन्होंने बहुत धीमी धुन बजानी शुरू की।

     

    आसपास का वातावरण शांत हो गया।

     

    ऊपर बैठी चिड़िया भी कुछ देर चुप रही।

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “लगता है इसे तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “शायद।”

     

    कुछ समय बाद छोटी चिड़िया ने अपने पंख हिलाए।

     

    कान्हा तुरंत खुश हो गए।

     

    “देखो! ये कोशिश कर रही है।”

     

    उसने फिर पंख फैलाए, लेकिन इस बार भी उड़ नहीं पाई।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कोई बात नहीं। जल्दी नहीं करनी चाहिए।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हर किसी को ठीक होने में अपना समय लगता है।”

     

    बच्चे चुप हो गए।

     

    दोपहर होने लगी।

     

    यशोदा मैया को चिंता होने लगी कि कान्हा अभी तक घर क्यों नहीं आया।

     

    उन्होंने नंद बाबा से कहा—

     

    “आज फिर बहुत देर हो गई।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा कान्हा कहीं न कहीं कोई नई कहानी बना रहा होगा।”

     

    उधर कान्हा अभी भी चिड़िया के पास बैठे थे।

     

    तभी एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, अब घर चलें?”

     

    कान्हा ने चिड़िया की तरफ देखा।

     

    “थोड़ी देर और।”

     

    अचानक छोटी चिड़िया ने अपने पंख फैलाए।

     

    वह पहले एक छोटी सी छलांग लगाकर पास की डाल तक पहुँची।

     

    कान्हा खुशी से खड़े हो गए।

     

    “उड़ गई!”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    चिड़िया थोड़ी देर डाल पर बैठी रही।

     

    फिर उसने अपने पंख फैलाए और ऊपर अपनी माँ की तरफ उड़ गई।

     

    ऊपर बैठी बड़ी चिड़िया भी उसके साथ उड़ गई।

     

    कान्हा उन्हें देखते रहे।

     

    उनके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुमने इसे बचा लिया।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। इसकी माँ ने इसे बचाया। हमने बस थोड़ा इंतजार किया।”

     

    सभी बच्चे वापस घर की तरफ चल पड़े।

     

    रास्ते में कान्हा अचानक रुक गए।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हम इसके लिए कुछ लेकर नहीं गए।”

     

    “क्या?”

     

    “इसके लिए दाना।”

     

    एक दोस्त हँस पड़ा।

     

    “अब तो वो उड़ गई।”

     

    कान्हा भी हँसने लगे।

     

    घर पहुँचते ही यशोदा मैया ने कान्हा को देखते ही पूछा—

     

    “इतनी देर कहाँ थे?”

     

    कान्हा उनके पास बैठ गए।

     

    “मैया, आज हमें एक छोटी चिड़िया मिली थी।”

     

    यशोदा का चेहरा नरम हो गया।

     

    “क्या हुआ था उसे?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बताई।

     

    यशोदा ध्यान से सुनती रहीं।

     

    जब कान्हा ने बताया कि वह चिड़िया अपनी माँ के पास उड़ गई, तो यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “मेरे कान्हा ने आज अच्छा काम किया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, वो बहुत छोटी थी। उसे अकेला देखकर अच्छा नहीं लगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हें हर छोटे जीव की चिंता होती है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि वो बोल नहीं सकते।”

     

    यशोदा कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “जो बोल नहीं सकता, उसके दर्द को समझना बहुत बड़ी बात है।”

     

    कान्हा माँ की तरफ देखने लगे।

     

    “मैया, अगर किसी को हमारी जरूरत हो और हम मदद न करें तो?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “जहाँ तक हो सके, मदद करनी चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं हमेशा करूँगा।”

     

    शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ फिर बाहर बैठे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “आज तुमने कोई शरारत नहीं की।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम पूरा दिन चिड़िया के साथ बैठे रहे।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “हर दिन शरारत करना जरूरी है क्या?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “तुम्हारे लिए तो है।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने अचानक मिट्टी से एक छोटी सी चिड़िया बनाई।

     

    उन्होंने उसे अपने सामने रखा।

     

    “देखो, ये हमारी दोस्त है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये तो मिट्टी की है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन याद तो असली वाली की दिलाएगी।”

     

    शाम की हवा चल रही थी।

     

    दूर आसमान में कई पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।

     

    कान्हा उन्हें देखते हुए मुस्कुराते रहे।

     

    तभी ऊपर से एक छोटी चिड़िया उनके पास से उड़ती हुई गुजरी।

     

    कान्हा ने उसे पहचान लिया।

     

    “देखो!”

     

    दोस्तों ने ऊपर देखा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “यही है!”

     

    चिड़िया एक पल के लिए पास की डाल पर बैठी और फिर उड़ गई।

     

    कान्हा ने हाथ हिलाकर कहा—

     

    “फिर मिलना!”

     

    उस दिन कान्हा ने अपने दोस्तों को एक छोटी सी बात समझाई—

     

    “किसी की मदद करने के लिए बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं। कभी-कभी थोड़ा पानी, थोड़ा इंतजार और थोड़ा प्यार भी किसी के लिए बहुत होता है।”

     

    सभी बच्चे चुपचाप उनकी बात सुनते रहे।

     

    लेकिन अगले ही पल कान्हा ने मिट्टी की चिड़िया उठाई और दोस्त के सिर पर रख दी।

     

    “अब तुम चिड़िया बनो!”

     

    दोस्त चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    कान्हा हँसते हुए भागने लगे।

     

    “पकड़ो मुझे!”

     

    सारे बच्चे उनके पीछे दौड़ पड़े।

     

    यशोदा ने दूर से यह देखा और मुस्कुराईं।

     

    “मेरा कान्हा फिर अपनी शरारत पर लौट आया।”

     

    लेकिन उस दिन की शरारत में भी एक मिठास थी।

     

    क्योंकि कान्हा ने अपने दोस्तों को सिखाया था कि खेल और हँसी के साथ-साथ किसी छोटे और कमजोर जीव के लिए दया रखना भी जरूरी है।

     

    और वृंदावन की उस शाम को कान्हा की बांसुरी की आवाज के साथ पेड़ों पर बैठे पक्षी भी जैसे खुशी से चहक रहे थे।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा को एक नई परेशानी मिलने वाली थी—यशोदा मैया ने घर में बहुत सारी मिश्री बनाई थी, और कान्हा के दोस्तों को इसकी खबर लग चुकी थी।

     

    अब शुरू होने वाली थी मिश्री की सबसे मीठी चोरी!

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कान्हा और जामुन के पेड़

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और जामुन के पेड़ की शरारत

     

    वृंदावन की सुबह आज कुछ अलग ही थी। रात में हल्की बारिश हुई थी, इसलिए पेड़ों की पत्तियों पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं। गलियों में मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी और गायें अपने बछड़ों के साथ धीरे-धीरे चरने निकल रही थीं।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ नंद भवन के बाहर बैठे थे। उनके हाथ में छोटी सी लकड़ी थी, जिससे वह मिट्टी पर तरह-तरह की आकृतियाँ बना रहे थे।

     

    तभी एक दोस्त दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! मैंने कुछ देखा है!”

     

    कान्हा ने लकड़ी छोड़ दी।

     

    “क्या?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “गाँव के बाहर वाले बड़े जामुन के पेड़ पर बहुत सारे जामुन लगे हैं।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। इतने सारे कि पूरा पेड़ काला दिखाई दे रहा है।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “लेकिन पेड़ बहुत ऊँचा है। हम जामुन तोड़ नहीं पाएँगे।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “पेड़ कितना भी ऊँचा हो, जामुन नीचे तो आने ही पड़ेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “चलो, पेड़ के पास।”

     

    सभी बच्चे उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ ही देर में वे उस बड़े जामुन के पेड़ के पास पहुँच गए।

     

    सचमुच पेड़ पर इतने जामुन लगे थे कि उसकी डालियाँ झुकी हुई थीं।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “वाह!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब बताओ, इन्हें तोड़ेंगे कैसे?”

     

    कान्हा ने पेड़ के तने को देखा।

     

    “पहले मैं चढ़ूँगा।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “तुम गिर गए तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “मैं गिरूँगा नहीं।”

     

    वह पेड़ पर चढ़ने लगे।

     

    पहली डाल तक पहुँचे।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    दोस्त नीचे खड़े होकर उन्हें देखते रहे।

     

    कान्हा एक मजबूत डाल पर बैठ गए।

     

    उन्होंने जामुन तोड़े और नीचे फेंकने लगे।

     

    “पकड़ो!”

     

    नीचे खड़े बच्चे खुशी से जामुन पकड़ने लगे।

     

    किसी ने अपनी धोती में जामुन बाँध लिए।

     

    किसी ने पत्तों से छोटी टोकरी बना ली।

     

    कान्हा ऊपर से जामुन तोड़ते रहे।

     

    लेकिन तभी एक शरारती दोस्त ने नीचे से कहा—

     

    “कान्हा! सबसे बड़े जामुन तो अपने लिए रख लेना।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं! सब बराबर मिलेंगे।”

     

    उन्होंने एक बड़ा जामुन तोड़ा और नीचे फेंक दिया।

     

    एक बच्चा उसे पकड़ने के लिए दौड़ा।

     

    लेकिन जामुन उसके हाथ से छूटकर मिट्टी में गिर गया।

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    वह बच्चा बोला—

     

    “मेरा जामुन!”

     

    कान्हा ऊपर से बोले—

     

    “कोई बात नहीं। दूसरा दूँगा।”

     

    उन्होंने उसके लिए एक और जामुन तोड़कर नीचे फेंका।

     

    इस बार बच्चे ने दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “मिल गया!”

     

    सब हँसने लगे।

     

    तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—

     

    “अरे! तुम लोग वहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    बच्चे अचानक शांत हो गए।

     

    कान्हा ने नीचे देखा।

     

    एक गोपी हाथ में टोकरी लिए उनकी तरफ आ रही थी।

     

    वह बोली—

     

    “ये जामुन का पेड़ किसने तोड़ना शुरू कर दिया?”

     

    कान्हा नीचे उतरते हुए बोले—

     

    “हम तो बस कुछ जामुन ले रहे थे।”

     

    गोपी ने कहा—

     

    “कुछ? तुम्हारे पास तो पूरी टोकरी है!”

     

    कान्हा ने अपनी टोकरी देखी।

     

    वह सच में भर चुकी थी।

     

    उन्होंने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “हम अकेले नहीं खाएँगे।”

     

    गोपी ने पूछा—

     

    “तो किसके लिए?”

     

    कान्हा ने आसपास के बच्चों की तरफ इशारा किया।

     

    “सबके लिए।”

     

    गोपी का गुस्सा थोड़ा कम हो गया।

     

    उसने कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन पेड़ की डालियाँ मत तोड़ना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं तोड़ेंगे।”

     

    तभी ऊपर बैठे एक बच्चे का पैर फिसला।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    बच्चा डर गया था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “डरो मत। धीरे-धीरे नीचे आओ।”

     

    उन्होंने उसे सुरक्षित नीचे उतारा।

     

    गोपी ने यह देखा तो बोली—

     

    “कान्हा, शरारत करते हो लेकिन अपने दोस्तों का ध्यान भी रखते हो।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “दोस्त हैं तो ध्यान रखना पड़ेगा।”

     

    सभी बच्चे जामुन लेकर बैठ गए।

     

    कान्हा ने एक जामुन उठाया और खाने लगे।

     

    उनके होंठ और जीभ बैंगनी हो गए।

     

    एक दोस्त उन्हें देखकर हँस पड़ा।

     

    “कान्हा! तुम्हारी जीभ देखो!”

     

    कान्हा ने अपनी जीभ बाहर निकाली।

     

    “तुम्हारी भी तो ऐसी ही है।”

     

    सभी बच्चे अपनी-अपनी जीभ देखने लगे और जोर-जोर से हँसने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे जामुन लेकर घर की ओर लौटे।

     

    कान्हा ने सोचा कि आज यशोदा मैया को भी जामुन खिलाएँगे।

     

    घर पहुँचते ही उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “मैया!”

     

    यशोदा रसोई से बाहर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा का चेहरा देखा और हैरान रह गईं।

     

    “ये क्या हाल बना रखा है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जामुन खाए हैं।”

     

    यशोदा ने उनके गाल देखे।

     

    “तुम्हारा पूरा मुँह बैंगनी हो गया।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “मैया, आपको भी दूँ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “पहले ये बताओ कि जामुन कहाँ से लाए?”

     

    कान्हा ने टोकरी आगे कर दी।

     

    “पेड़ से।”

     

    “किसकी अनुमति से?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    यशोदा ने समझ लिया।

     

    “फिर से बिना पूछे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, हम बहुत सारे नहीं तोड़े।”

     

    यशोदा ने टोकरी देखी।

     

    “ये तुम्हारे हिसाब से थोड़े हैं?”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    “हमने सबमें बाँट दिए।”

     

    तभी पीछे से नंद बाबा आ गए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या बाँटा?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “आपका बेटा आज जामुन का पूरा पेड़ बाँट आया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    उन्होंने कान्हा से पूछा—

     

    “किसी को नुकसान तो नहीं हुआ?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं बाबा। हमने डालियाँ नहीं तोड़ीं।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो ठीक है। लेकिन अगली बार पेड़ से फल लेने से पहले उसके मालिक से पूछ लेना।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “ठीक है बाबा।”

     

    फिर उन्होंने टोकरी से सबसे बड़ा जामुन उठाया और नंद बाबा को दे दिया।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    नंद बाबा ने जामुन लिया।

     

    “मेरे लिए?”

     

    “हाँ।”

     

    फिर कान्हा ने दूसरा जामुन यशोदा को दिया।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “मेरे लिए इतना बड़ा?”

     

    “आपको सबसे बड़ा मिलना चाहिए।”

     

    यशोदा ने जामुन खाया और बोलीं—

     

    “बहुत मीठा है।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “मैंने कहा था ना!”

     

    उस शाम कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में बैठे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, कल क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कल?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने ऊपर आसमान की तरफ देखा।

     

    कुछ देर सोचकर बोले—

     

    “कल हम नदी किनारे खेलेंगे।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “वहाँ क्या करेंगे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अभी नहीं बताऊँगा।”

     

    सभी बच्चे बोले—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि फिर तुम सब आज ही सोचना शुरू कर दोगे।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    यशोदा दूर से बच्चों की बातें सुन रही थीं।

     

    उन्होंने कान्हा को आवाज लगाई—

     

    “अब घर आ जाओ।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आ रहा हूँ मैया।”

     

    वह दोस्तों के साथ अंदर जाने लगे।

     

    लेकिन जाते-जाते उन्होंने पीछे मुड़कर उस जामुन के पेड़ की तरफ देखा।

     

    हवा से उसकी डालियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उन्हें लगा जैसे पेड़ भी उनसे कह रहा हो—

     

    “कल फिर आना।”

     

    अगले दिन कान्हा सचमुच यमुना किनारे गए।

     

    लेकिन वहाँ उन्हें एक ऐसी चीज दिखाई देने वाली थी, जिसे देखकर उनकी सारी शरारतें कुछ देर के लिए भूल जानी थीं।

     

    यमुना किनारे एक छोटा घायल पक्षी पड़ा था।

     

    कान्हा ने उसे देखा तो तुरंत अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे घर ले चलो।”

     

    और यहीं से शुरू हुई कान्हा की एक ऐसी बाल लीला, जिसमें पहली बार उनके दोस्तों ने देखा कि उनका नटखट कान्हा किसी छोटे से जीव का दर्द देखकर कितना परेशान हो जाता है।

     

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  • कान्हा नंद बाबा की पगड़ी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और नंद बाबा की पगड़ी

     

    सुबह का समय था। नंद भवन के आँगन में हल्की धूप फैल रही थी। गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और यशोदा मैया रसोई में नाश्ता बना रही थीं।

     

    नंद बाबा आज गाँव के कुछ लोगों के साथ बाहर जाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपनी सबसे सुंदर पीली पगड़ी निकाली और उसे बड़े ध्यान से सिर पर बाँधा।

     

    कान्हा दूर खड़े उन्हें देख रहे थे।

     

    उन्होंने अपने दोस्त से धीरे से पूछा—

     

    “मेरे बाबा आज इतने सुंदर क्यों लग रहे हैं?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “आज उन्हें गाँव की सभा में जाना है।”

     

    कान्हा कुछ देर पगड़ी को देखते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “पगड़ी बहुत सुंदर है।”

     

    दोस्त ने तुरंत कहा—

     

    “कान्हा, इसे हाथ मत लगाना।”

     

    कान्हा ने मासूमियत से पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने कुछ किया तो बाबा नाराज होंगे।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं कुछ नहीं करूँगा।”

     

    दोस्त ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन वह कान्हा को नहीं जानता था।

     

    कान्हा ने मन ही मन एक योजना बना ली थी।

     

    नंद बाबा तैयार होकर बाहर जाने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें देखा और कहा—

     

    “आज तो आप बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “अच्छा लगना जरूरी है। आज गाँव के बड़े लोग भी आएँगे।”

     

    कान्हा तुरंत उनके पास पहुँचे।

     

    “बाबा!”

     

    “क्या हुआ बेटा?”

     

    “आपकी पगड़ी मुझे भी पहननी है।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “अभी नहीं। ये तुम्हारे लिए बहुत बड़ी है।”

     

    कान्हा ने पगड़ी को देखा।

     

    “मैं छोटी कर लूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “जब तुम बड़े हो जाओगे, तब अपनी पगड़ी पहनना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    नंद बाबा बाहर चले गए।

     

    कान्हा कुछ देर उन्हें जाते देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “चलो।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “पगड़ी पहनने।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कान्हा दौड़ते हुए बाहर गए।

     

    नंद बाबा कुछ दूर ही गए थे।

     

    कान्हा उनके पीछे भागे।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा हाँफते हुए उनके पास पहुँचे।

     

    “आपकी पगड़ी ठीक नहीं है।”

     

    नंद बाबा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्या खराब है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “इसमें मोरपंख नहीं है।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    “पगड़ी में मोरपंख क्यों लगाऊँ?”

     

    कान्हा ने अपने सिर की तरफ इशारा किया।

     

    “मेरे सिर पर तो है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “वो तुम्हारे लिए है।”

     

    कान्हा कुछ पल सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो एक मेरे बाबा के लिए भी होना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने प्यार से उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम्हारा मन बहुत बड़ा है।”

     

    कान्हा ने तुरंत अपना मोरपंख निकाल लिया।

     

    “ये आप लगा लो।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “नहीं बेटा, ये तुम्हें ही अच्छा लगता है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे अच्छा लगता है कि मेरे बाबा भी सुंदर लगें।”

     

    नंद बाबा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने मोरपंख लिया और अपनी पगड़ी में लगा लिया।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “अब आप बिल्कुल मेरे जैसे लग रहे हो!”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी गाँव के दो आदमी वहाँ आ गए।

     

    उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी में मोरपंख देखा।

     

    एक ने मजाक में कहा—

     

    “अरे नंद जी, आज तो आप कान्हा जैसे बन गए।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लगता है कान्हा ने आपको भी अपनी टोली में शामिल कर लिया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    कान्हा गर्व से बोले—

     

    “ये मेरे बाबा हैं।”

     

    सब मुस्कुराने लगे।

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गाँव की सभा में चले गए।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ वापस घर आ गए।

     

    लेकिन उनकी नजर अब भी पगड़ी पर थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुमने बाबा की पगड़ी में मोरपंख तो लगा दिया, लेकिन अब आगे क्या करोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “फिर वही कुछ नहीं!”

     

    कान्हा भी हँसने लगे।

     

    उधर यशोदा मैया ने कान्हा को देखा।

     

    “तुम अपने बाबा के पीछे क्यों गए थे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    “सच बताओ।”

     

    “मैंने बाबा की पगड़ी में मोरपंख लगाया।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “अच्छा किया।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “आप नाराज नहीं हुईं?”

     

    “नहीं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा बहुत सुंदर लग रहे थे।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हें अपने बाबा बहुत प्यारे हैं ना?”

     

    कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “बहुत।”

     

    दोपहर तक नंद बाबा वापस लौट आए।

     

    कान्हा दौड़कर उनके पास गए।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आपकी पगड़ी में मोरपंख अच्छा लगा?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “सबने देखा?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्या सबने कहा कि आप सुंदर लग रहे हो?”

     

    नंद बाबा हँसते हुए बोले—

     

    “सबने कहा कि मैं आज कान्हा जैसा लग रहा हूँ।”

     

    कान्हा खुशी से हँसने लगे।

     

    “तो फिर रोज लगाना।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “रोज नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि फिर लोग कहेंगे कि नंद बाबा ने कान्हा की नकल करनी शुरू कर दी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो कहने दो।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    शाम को नंद बाबा गायों को देखने जा रहे थे।

     

    कान्हा उनके साथ चल दिए।

     

    रास्ते में नंद बाबा ने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम मुझे मोरपंख क्यों देना चाहते थे?”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि मुझे अच्छा लगता है जब मेरे बाबा खुश होते हैं।”

     

    नंद बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “और मुझे खुशी तब होती है जब तुम मेरे साथ होते हो।”

     

    कान्हा ने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    दोनों धीरे-धीरे गायों की तरफ बढ़ने लगे।

     

    तभी एक गाय कान्हा के पास आ गई।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “बाबा, ये आज उदास लग रही है।”

     

    नंद बाबा ने गाय को देखा।

     

    “शायद इसका बछड़ा दूसरी तरफ चला गया है।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “तो उसे बुला लेते हैं।”

     

    उन्होंने आवाज लगाई।

     

    कुछ ही देर में बछड़ा दौड़ता हुआ आया।

     

    गाय उसे देखते ही शांत हो गई।

     

    नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “तुम्हें सच में सबकी चिंता रहती है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “सब हमारे अपने हैं।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “ये बात हमेशा याद रखना।”

     

    सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।

     

    कान्हा और नंद बाबा वापस घर लौट रहे थे।

     

    दरवाजे पर यशोदा उनका इंतजार कर रही थीं।

     

    उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी देखी और मुस्कुराईं।

     

    “मोरपंख अभी तक लगा हुआ है?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “इसे निकालने का मन ही नहीं हुआ।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “मैंने कहा था ना, अच्छा लगता है।”

     

    यशोदा ने दोनों को पास बुलाया।

     

    “मेरे दोनों नंदलाल आज बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

     

    नंद बाबा हँसे।

     

    “एक ही काफी है।”

     

    कान्हा बोला—

     

    “नहीं बाबा, दो होने चाहिए।”

     

    यशोदा ने दोनों को प्यार से देखा।

     

    रात को कान्हा सोने के लिए अपनी माँ के पास गए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज मैंने बाबा को सुंदर बनाया।”

     

    “कैसे?”

     

    “उनकी पगड़ी में मोरपंख लगाया।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और कल?”

     

    कान्हा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “कल?”

     

    “हाँ, कल क्या शरारत करोगे?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हारा ये ‘कुछ नहीं’ सुनकर ही मुझे डर लगता है।”

     

    कान्हा माँ की गोद में सिर रखकर मुस्कुराने लगे।

     

    लेकिन अगले दिन उनके मन में एक नया विचार जन्म ले चुका था।

     

    नंद बाबा की पगड़ी के बाद अब उनकी नजर वृंदावन की सबसे ऊँची पेड़ की डाल पर लगे मीठे जामुनों पर थी।

     

    और कान्हा ने तय कर लिया था कि वह अकेले जामुन नहीं खाएँगे…

     

    पूरे ग्वाल-बालों को खिलाएँगे।

     

    लेकिन जामुन तोड़ते समय जो होने वाला था, उसका अंदाजा किसी को नहीं था।

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  • कान्हा और दूध मटकी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     कान्हा और नंद बाबा की दूध वाली मटकी

     

    अगली सुबह नंद भवन में बहुत हलचल थी। नंद बाबा ने गाँव की गायों से खूब सारा ताजा दूध इकट्ठा करवाया था। आज उन्होंने खुद दूध से दही और माखन बनाने का फैसला किया था।

     

    यशोदा मैया रसोई में थीं और नंद बाबा आँगन में बड़ी-बड़ी मटकियों को एक जगह रखवा रहे थे।

     

    उन्होंने एक बहुत बड़ी मटकी उठाई और यशोदा से कहा—

     

    “यशोदा, इसे संभालकर रखना। इसमें आज का सबसे अच्छा दूध है।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आप चिंता मत कीजिए।”

     

    दरवाजे के पीछे खड़ा कान्हा सब सुन रहा था।

     

    उसकी नजर तुरंत उस बड़ी मटकी पर गई।

     

    कान्हा ने अपने दोस्त से धीरे से कहा—

     

    “देख रहे हो?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “वो बड़ी वाली मटकी।”

     

    “हाँ।”

     

    “बाबा ने कहा है इसमें सबसे अच्छा दूध है।”

     

    दोस्त ने तुरंत समझ लिया।

     

    “तुम फिर कुछ करने वाले हो?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैंने अभी कुछ कहा थोड़ी है।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “लेकिन तुम्हारे चेहरे से सब पता चल रहा है।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गायों को देखने बाहर चले गए।

     

    यशोदा भी रसोई के दूसरे काम में लग गईं।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उस मटकी के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी को देखा।

     

    फिर अपने दोस्तों को देखा।

     

    “बहुत बड़ी है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसे उठाना मुश्किल होगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “उठानी ही क्यों है? बस थोड़ा दूध निकालेंगे।”

     

    उन्होंने एक छोटी कटोरी उठाई।

     

    मटकी का ढक्कन हटाया।

     

    दूध देखकर कान्हा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    उन्होंने कटोरी में दूध भरा।

     

    पहला घूँट लिया।

     

    “वाह!”

     

    दोस्तों ने भी दूध माँगा।

     

    कान्हा ने सबको थोड़ा-थोड़ा दूध दिया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, बहुत स्वादिष्ट है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैंने कहा था ना, बाबा ने सबसे अच्छा दूध रखा है।”

     

    तभी बाहर से गाय की आवाज आई।

     

    कान्हा तुरंत रुक गए।

     

    “बाबा आ गए?”

     

    सभी बच्चे डर गए।

     

    लेकिन आवाज बाहर की गायों की थी।

     

    कान्हा ने राहत की साँस ली।

     

    “अभी समय है।”

     

    उन्होंने फिर कटोरी भरनी शुरू कर दी।

     

    लेकिन तभी मटकी थोड़ी हिल गई।

     

    “अरे!”

     

    एक दोस्त ने मटकी पकड़ ली।

     

    “संभालो!”

     

    कान्हा ने जल्दी से उसे सीधा किया।

     

    “अगर ये गिर गई तो मैया हमें छोड़ेंगी नहीं।”

     

    सब बच्चे चुप हो गए।

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने कहा—

     

    “बस, अब बहुत हुआ।”

     

    उन्होंने ढक्कन वापस रख दिया।

     

    बच्चे वहाँ से निकलने लगे।

     

    लेकिन कान्हा ने जाते-जाते मटकी की तरफ देखा।

     

    “कल फिर आएँगे।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “कल क्यों?”

     

    सभी बच्चे जम गए।

     

    नंद बाबा दरवाजे पर खड़े थे।

     

    कान्हा धीरे-धीरे पीछे मुड़े।

     

    “बाबा…”

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या कर रहे थे?”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    एक दोस्त पीछे हटने लगा।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “सब यहीं खड़े रहो।”

     

    कान्हा ने अपनी कटोरी छिपा ली।

     

    नंद बाबा ने देखा और मुस्कुराने लगे।

     

    “कान्हा, हाथ आगे करो।”

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    कटोरी में दूध था।

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो तुमने दूध चुराया?”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं बाबा।”

     

    “तो ये क्या है?”

     

    “मैं चख रहा था।”

     

    “किससे पूछकर?”

     

    कान्हा ने कुछ सोचकर कहा—

     

    “गाय से।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “गाय ने अनुमति दी?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने जानबूझकर गंभीर चेहरा बनाया।

     

    “अच्छा, तो अब गाय से ही पूछना पड़ेगा।”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    लेकिन तभी यशोदा वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तुम्हारा कान्हा मेरी दूध वाली मटकी तक पहुँच गया।”

     

    यशोदा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मैया, हमने बहुत थोड़ा सा लिया है।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “थोड़ा?”

     

    उन्होंने मटकी देखी।

     

    “अरे, आधी कटोरी भी कम नहीं है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इतने सारे बच्चे थे ना।”

     

    यशोदा ने बाकी बच्चों को देखा।

     

    सबने सिर झुका लिया।

     

    नंद बाबा हँसते हुए बोले—

     

    “यशोदा, इन्हें डाँटो मत। बच्चों ने दूध ही तो पिया है।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन बिना पूछे?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “अगर दूध अच्छा है तो बच्चों को मिलना भी चाहिए।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “सुना मैया?”

     

    यशोदा ने उन्हें घूरकर देखा।

     

    “तुम्हारे बाबा ने तुम्हें बचा लिया, लेकिन अगली बार पहले पूछना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    नंद बाबा ने बच्चों को पास बुलाया।

     

    “चलो, अब सबको मैं खुद दूध पिलाता हूँ।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “बाबा, सच?”

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने दूध के गिलास भर दिए।

     

    सभी बच्चों ने दूध पिया।

     

    कान्हा ने अपना गिलास खत्म करके कहा—

     

    “बाबा, आज वाला दूध बहुत अच्छा था।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “क्योंकि गायों को आज सुबह बहुत अच्छी घास मिली थी।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो क्या गायें भी खुश थीं?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “हाँ। जानवर खुश रहें तो उनका दूध भी अच्छा होता है।”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो हमें गायों को भी अच्छा खाना देना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बिल्कुल।”

     

    उस दिन से कान्हा ने गायों को चारा देने की जिम्मेदारी भी ले ली।

     

    सुबह होते ही वह गायों के पास जाते।

     

    “आओ, तुम्हारे लिए घास लाया हूँ।”

     

    गायें उनके आसपास इकट्ठी हो जातीं।

     

    एक दिन कान्हा ने एक गाय को चारा देते हुए देखा कि वह कुछ खा नहीं रही।

     

    उन्होंने नंद बाबा को बुलाया।

     

    “बाबा, इसे क्या हुआ?”

     

    नंद बाबा ने गाय को देखा।

     

    “शायद इसे भूख नहीं है।”

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “इसे आराम करने दो।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम अब गायों की भाषा भी समझने लगे हो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “ये मेरी दोस्त हैं।”

     

    दोपहर को यशोदा ने देखा कि कान्हा बाहर गायों के बीच बैठे हैं।

     

    उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “कान्हा, खाना खा लो!”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, पहले इन्हें खिला दूँ।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें खुद भी तो खाना है।”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “सबके बाद मैं।”

     

    यशोदा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    शाम को नंद बाबा ने कान्हा को पास बुलाया।

     

    “आज से तुम्हें एक काम दूँगा।”

     

    कान्हा ने उत्सुक होकर पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “हर दिन गायों को चारा खिलाना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “मैं जरूर करूँगा।”

     

    यशोदा ने दूर से यह देखा तो उन्हें अपने बेटे पर गर्व हुआ।

     

    रात को कान्हा माँ की गोद में लेटे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज तुम्हें सबसे ज्यादा खुशी किस बात की हुई?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा ने मुझे गायों की देखभाल का काम दिया।”

     

    “और दूध?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “वो भी अच्छा था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें हर चीज में खुशी मिल जाती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि मेरे पास आप हो, बाबा हैं, मेरे दोस्त हैं और मेरी गायें भी।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    “भगवान तुम्हें हमेशा ऐसा ही रखे।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन अगले ही पल उन्होंने धीरे से पूछा—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “कल माखन मिलेगा?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम सुधरोगे नहीं।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “माखन से दोस्ती थोड़ी छोड़ी जाती है।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    उन्हें पता था कि उनका नन्हा कान्हा चाहे कितनी भी शरारतें करे, उसके मन में प्रेम और अपनापन हमेशा सबसे ऊपर रहेगा।

     

    और अगले दिन कान्हा की नजर इस बार दूध की मटकी पर नहीं, बल्कि नंद बाबा की पगड़ी पर पड़ने वाली थी।

     

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कान्हा और यमुना किनारे शरारत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और यमुना किनारे की शरारत

     

    अगली सुबह वृंदावन में सूरज निकलने से पहले ही कान्हा की आँख खुल गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। आकाश हल्का-हल्का नीला हो रहा था। दूर से गायों की घंटियों की आवाज आ रही थी।

     

    कान्हा धीरे से बिस्तर से उठे और बाहर जाने लगे।

     

    तभी पीछे से यशोदा मैया की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा वहीं रुक गए।

     

    “जी मैया?”

     

    यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—

     

    “इतनी सुबह कहाँ जा रहे हो?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “मैं तो बस बाहर देखने जा रहा था।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बाहर देखने के लिए इतनी जल्दी उठने की क्या जरूरत है?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    यशोदा समझ गईं।

     

    “फिर से कोई शरारत करने का मन है?”

     

    कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “पक्का?”

     

    “बिल्कुल पक्का।”

     

    यशोदा ने उन्हें पास बुलाया और उनके बाल ठीक करते हुए कहा—

     

    “यमुना के बहुत पास मत जाना। और अपने दोस्तों से अलग मत होना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ घर से निकल पड़े।

     

    आज उनका मन यमुना किनारे जाने का था।

     

    रास्ते में बच्चे बातें करते हुए चल रहे थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, आज क्या खेलेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज हम यमुना किनारे दौड़ लगाएंगे।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “और अगर तुम हार गए तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “मैं कभी नहीं हारता।”

     

    तीसरा बच्चा बोला—

     

    “कल तो तुम पेड़ पर चढ़ते समय गिर गए थे।”

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वो गिरना नहीं था। मैं नीचे उतरने की कोशिश कर रहा था।”

     

    सभी बच्चे जोर से हँस पड़े।

     

    कुछ ही देर में वे यमुना किनारे पहुँच गए।

     

    यमुना का पानी शांत था। किनारे पर हरी घास थी और पास के पेड़ों पर पक्षी चहचहा रहे थे।

     

    कान्हा ने अपनी बांसुरी निकाली और एक पत्थर पर बैठ गए।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे बांसुरी बजानी शुरू की।

     

    सभी बच्चे शांत होकर सुनने लगे।

     

    कुछ देर बाद एक मोर भी पास आ गया।

     

    कान्हा ने बांसुरी बजाना बंद किया तो मोर भी रुक गया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, इसे भी तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “ये मेरा दोस्त है।”

     

    तभी एक बच्चे ने यमुना में तैरती हुई कमल की पत्तियाँ देखीं।

     

    वह बोला—

     

    “कान्हा, देखो कितनी सुंदर पत्तियाँ हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो उन्हें देखते हैं।”

     

    सब बच्चे पानी के किनारे पहुँच गए।

     

    कान्हा ने एक छोटी लकड़ी उठाई और पानी में पड़ी पत्ती को अपनी ओर खींचने लगे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “बहुत अंदर मत जाना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं किनारे पर ही हूँ।”

     

    तभी उन्हें पानी में एक छोटी सी नाव दिखाई दी।

     

    नाव किनारे से थोड़ी दूर थी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो नाव में बैठते हैं।”

     

    एक दोस्त घबरा गया।

     

    “नहीं, हमें बाबा ने पानी में जाने से मना किया है।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “ठीक है, नाव में नहीं जाएँगे।”

     

    उन्होंने पास पड़ी एक लंबी लकड़ी उठाई और नाव को किनारे की ओर खींचने लगे।

     

    बच्चे उनकी मदद करने लगे।

     

    कुछ कोशिश के बाद नाव किनारे आ गई।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “देखा! बिना पानी में उतरे भी नाव आ गई।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    तभी अचानक एक तेज हवा चली।

     

    कान्हा की बांसुरी उनके हाथ से छूटकर घास में गिर गई।

     

    “मेरी बांसुरी!”

     

    कान्हा उसे ढूँढ़ने लगे।

     

    सभी बच्चे अलग-अलग तरफ खोजने लगे।

     

    लेकिन बांसुरी कहीं दिखाई नहीं दी।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “शायद हवा से आगे चली गई।”

     

    कान्हा चिंतित हो गए।

     

    “मेरी बांसुरी मुझे बहुत प्यारी है।”

     

    वे घास में झुककर खोजने लगे।

     

    तभी उन्हें दूर एक छोटी सी लड़की दिखाई दी।

     

    वह किनारे पर बैठी थी और हाथ में वही बांसुरी थी।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “ये मेरी बांसुरी है।”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मुझे ये घास में मिली थी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, ये मेरी है।”

     

    लड़की ने बांसुरी वापस कर दी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “तुम यहाँ अकेली क्यों बैठी हो?”

     

    लड़की बोली—

     

    “मैं अपनी माँ के साथ आई थी। वो थोड़ी दूर गई हैं।”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी माँ कहाँ हैं?”

     

    लड़की ने नदी की दूसरी तरफ इशारा किया।

     

    कान्हा समझ गए कि वह अपनी माँ से अलग हो गई थी।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “हमें इसे इसकी माँ के पास पहुँचाना चाहिए।”

     

    सभी बच्चे लड़की के साथ चल पड़े।

     

    थोड़ी दूर जाकर उन्हें एक महिला परेशान होकर इधर-उधर देखते हुए दिखाई दी।

     

    लड़की अपनी माँ को देखते ही दौड़ पड़ी।

     

    “माँ!”

     

    महिला ने उसे गले लगा लिया।

     

    उसने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी बेटी को यहाँ तक पहुँचाया?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    महिला ने हाथ जोड़ते हुए कहा—

     

    “बेटा, भगवान तुम्हें खुश रखे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “आप बस इसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “अब नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कान्हा वापस अपने दोस्तों के पास लौट आए।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही उन्हें याद आया कि उन्हें घर भी लौटना था।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, अब मैया डाँटेंगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हमने कोई गलत काम तो किया नहीं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लेकिन हम काफी देर से यहाँ हैं।”

     

    कान्हा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    सूरज काफी ऊपर आ चुका था।

     

    “अरे! सच में बहुत देर हो गई।”

     

    सभी बच्चे तेजी से घर की तरफ भागने लगे।

     

    उधर नंद भवन में यशोदा मैया बार-बार बाहर देख रही थीं।

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “कान्हा अभी तक नहीं आया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बच्चों के साथ गया है। आता होगा।”

     

    लेकिन कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ दौड़ते हुए आ गए।

     

    यशोदा ने उन्हें देखते ही पकड़ लिया।

     

    “कहाँ थे इतनी देर?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “यमुना किनारे।”

     

    “मैंने कहा था ज्यादा दूर मत जाना।”

     

    “हम दूर नहीं गए थे।”

     

    “फिर इतनी देर क्यों?”

     

    कान्हा ने सारी बात बता दी।

     

    यशोदा ने ध्यान से सुना।

     

    जब उन्हें पता चला कि कान्हा ने एक बच्ची को उसकी माँ तक पहुँचाया, तो उनका गुस्सा थोड़ा कम हो गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “तुमने अच्छा काम किया, लेकिन बिना बताए इतनी देर तक बाहर रहना ठीक नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “माफ कर दो मैया।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस अगली बार मुझे बता देना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पक्का।”

     

    तभी उनके एक दोस्त ने पीछे से कहा—

     

    “मैया, कान्हा ने आज नाव भी किनारे खींची थी!”

     

    यशोदा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “नाव?”

     

    कान्हा चुप।

     

    “तुमने नाव में जाने की कोशिश तो नहीं की?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया। हमने नाव को खुद ही किनारे बुला लिया।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हारी बातें भी ना!”

     

    उन्होंने कान्हा को अपने पास बैठाया और उन्हें खाना खिलाने लगीं।

     

    कान्हा खाते-खाते बोले—

     

    “मैया, आज मैंने एक बात सीखी।”

     

    “क्या?”

     

    “जिसे रास्ता न मिले, उसका रास्ता दिखाना चाहिए।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “ये किसने सिखाया?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मुझे खुद समझ आया।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    “मेरे नन्हे कान्हा की शरारतों के बीच इतनी समझदारी भी छिपी है, ये तो मुझे आज पता चला।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    शाम को वह आँगन में बैठे अपनी बांसुरी बजाने लगे।

     

    वही मोर दूर पेड़ के पास आकर बैठ गया।

     

    गायें भी शांत होकर उन्हें देखने लगीं।

     

    यशोदा दरवाजे पर खड़ी अपने बेटे को देख रही थीं।

     

    उन्हें लगा कि कान्हा चाहे कितनी भी शरारतें करें, उनके मन में दूसरों के लिए हमेशा प्यार रहता है।

     

    लेकिन उसी समय कान्हा ने बांसुरी बजाते-बजाते अपने दोस्तों की तरफ देखा और आँखों से इशारा किया।

     

    दोस्त समझ गए।

     

    कान्हा की अगली शरारत की योजना फिर शुरू हो चुकी थी।

     

    और इस बार निशाना था—

     

    नंद बाबा की नई बनाई हुई दूध की बड़ी मटकी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • इकलौता वारिस

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अगस्त्या—इकलौता वारिस

     

    अगस्त्या कपूर नाम ही काफी था। देश की सबसे बड़ी कंपनियों में गिनी जाने वाली कपूर एंड संस का इकलौता वारिस था वह। करोड़ों की संपत्ति, आलीशान बंगला, महंगी गाड़ियां और हर कदम पर लोगों की भीड़—उसकी जिंदगी में ऐसी कोई चीज नहीं थी जो वह खरीद नहीं सकता था।

     

    लेकिन एक चीज थी जिसे वह बिल्कुल नहीं चाहता था—शादी।

     

    अगस्त्या की उम्र तीस साल थी। देखने में शांत, गंभीर और हमेशा अपने काम में डूबा रहने वाला लड़का। सुबह से रात तक कंपनी के काम में लगा रहता। मीटिंग, बिजनेस डील और विदेशों के दौरे उसकी जिंदगी का हिस्सा थे।

     

    उसके पिता, राजीव कपूर, कई बार उससे कह चुके थे—

     

    “बेटा, अब कंपनी की जिम्मेदारियां संभालने के साथ अपनी जिंदगी के बारे में भी सोचो।”

     

    अगस्त्या बिना सिर उठाए फाइल देखता और कहता—

     

    “पापा, मेरी जिंदगी बिल्कुल ठीक चल रही है।”

     

    “लेकिन शादी?”

     

    “नहीं करनी।”

     

    राजीव कपूर हर बार चुप हो जाते।

     

    मां सुमन कपूर भी कई रिश्ते लेकर आईं।

     

    “अगस्त्या, लड़की बहुत अच्छी है। पढ़ी-लिखी है, समझदार है।”

     

    “मां, मुझे शादी नहीं करनी।”

     

    “कम से कम एक बार मिल तो लो।”

     

    “मिलने के बाद भी मेरा जवाब यही रहेगा।”

     

    सुमन परेशान होकर पति से कहतीं—

     

    “समझ नहीं आता इसे शादी से इतनी परेशानी क्यों है।”

     

    राजीव धीरे से कहते—

     

    “किसी पुराने जख्म की वजह होगी।”

     

    दरअसल अगस्त्या के मन में शादी को लेकर एक डर था।

     

    बचपन में उसने अपने माता-पिता के बीच कई बार झगड़े देखे थे। उसके पिता काम में इतने व्यस्त रहते कि मां अक्सर अकेली पड़ जातीं। घर में पैसा बहुत था, लेकिन साथ बैठकर बात करने का समय बहुत कम।

     

    अगस्त्या ने मन ही मन तय कर लिया था—

     

    अगर रिश्ते में प्यार से ज्यादा जिम्मेदारियां और उम्मीदें होती हैं, तो वह ऐसा रिश्ता कभी नहीं बनाएगा।

     

    उसका मानना था कि शादी के बाद इंसान अपनी आजादी खो देता है।

     

    एक दिन कंपनी की बड़ी मीटिंग के बाद राजीव कपूर ने उसे अपने कमरे में बुलाया।

     

    “अगस्त्या, मैं तुम पर शादी का दबाव नहीं डालना चाहता। लेकिन एक बात जरूर कहना चाहता हूं।”

     

    “क्या?”

     

    “हर रिश्ता तुम्हारे बचपन जैसा नहीं होता।”

     

    अगस्त्या चुप रहा।

     

    “तुमने हमारे बीच जो देखा, वह हमारी कहानी थी। जरूरी नहीं कि तुम्हारी कहानी भी वैसी ही हो।”

     

    अगस्त्या ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ दिनों बाद कपूर एंड संस ने राजस्थान के एक छोटे शहर में नई शाखा खोलने का फैसला किया। कंपनी की एक सामाजिक परियोजना भी वहां चल रही थी, जिसके लिए अगस्त्या को खुद जाना पड़ा।

     

    वहां उसकी मुलाकात मायरा से हुई।

     

    मायरा कंपनी के प्रोजेक्ट से जुड़े एक छोटे स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी।

     

    पहली मुलाकात बिल्कुल साधारण थी।

     

    अगस्त्या ने स्कूल का निरीक्षण करते हुए पूछा—

     

    “यहां बच्चों की संख्या कितनी है?”

     

    मायरा ने रजिस्टर बंद किया।

     

    “लगभग दो सौ।”

     

    “और शिक्षक?”

     

    “सिर्फ पांच।”

     

    अगस्त्या ने हैरानी से कहा—

     

    “इतने कम?”

     

    मायरा मुस्कुराई।

     

    “कम हैं, लेकिन कोशिश ज्यादा है।”

     

    अगस्त्या पहली बार उसकी बात पर मुस्कुराया।

     

    “आप हमेशा इतनी सकारात्मक रहती हैं?”

     

    “नहीं। कभी-कभी मैं भी परेशान होती हूं।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर किसी बच्चे की मुस्कान देख लेती हूं।”

     

    अगस्त्या उसे कुछ पल देखता रहा।

     

    मायरा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    लेकिन उस दिन के बाद वह मायरा को याद करने लगा।

     

    मायरा को अगस्त्या की दौलत से कोई फर्क नहीं पड़ता था। उसे यह भी नहीं पता था कि वह कपूर एंड संस का वारिस है।

     

    एक दिन उसने अगस्त्या से कहा—

     

    “आप हर वक्त इतने गंभीर क्यों रहते हैं?”

     

    “काम की वजह से।”

     

    “काम के अलावा जिंदगी में कुछ नहीं?”

     

    अगस्त्या ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    मायरा हंस पड़ी।

     

    “तो आप बहुत गरीब हैं।”

     

    अगस्त्या चौंका।

     

    “गरीब?”

     

    “हां। जिसके पास पैसा बहुत हो लेकिन खुश रहने का समय न हो, वह मेरे हिसाब से गरीब ही है।”

     

    उस दिन अगस्त्या काफी देर तक उसकी बात सोचता रहा।

     

    धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती बढ़ने लगी।

     

    अगस्त्या को पहली बार महसूस हुआ कि किसी के साथ बैठकर बिना किसी काम के बात करना भी अच्छा लग सकता है।

     

    एक शाम मायरा ने पूछा—

     

    “आप शादी क्यों नहीं करना चाहते?”

     

    अगस्त्या कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने अपने बचपन की बातें बता दीं।

     

    मायरा ने ध्यान से सुना।

     

    उसने कोई सलाह नहीं दी।

     

    बस इतना कहा—

     

    “आपको शादी से नहीं, अपने पुराने डर से परेशानी है।”

     

    अगस्त्या ने उसकी ओर देखा।

     

    “शायद।”

     

    “तो फैसला डर के आधार पर मत कीजिए।”

     

    उसके शब्द अगस्त्या के दिल में उतर गए।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा आसान नहीं होती।

     

    अगस्त्या को अचानक मुंबई वापस बुला लिया गया। कंपनी में एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई थी।

     

    जाने से पहले वह मायरा से मिलने गया।

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    मायरा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तो जाइए। काम जरूरी है।”

     

    “मैं वापस आऊंगा।”

     

    मायरा ने मजाक में कहा—

     

    “क्यों? यहां कोई काम रह गया है?”

     

    अगस्त्या पहली बार खुलकर मुस्कुराया।

     

    “शायद।”

     

    वह मुंबई लौट आया।

     

    कुछ हफ्तों तक दोनों फोन पर बात करते रहे।

     

    लेकिन अगस्त्या की मां को जब उसके और मायरा के बारे में पता चला तो उन्होंने तुरंत पूछा—

     

    “क्या तुम उसे पसंद करते हो?”

     

    अगस्त्या चुप रहा।

     

    “अगस्त्या?”

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    सुमन के चेहरे पर खुशी आ गई।

     

    लेकिन फिर अगस्त्या ने कहा—

     

    “लेकिन मैं अभी भी शादी के लिए तैयार नहीं हूं।”

     

    मां ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “बेटा, शादी तभी करना जब तुम्हें लगे कि तुम तैयार हो। सिर्फ इसलिए मत करना कि हम चाहते हैं।”

     

    उसी रात अगस्त्या ने मायरा को फोन किया।

     

    “मायरा, अगर मैं तुमसे कहूं कि मैं तुम्हें पसंद करता हूं, लेकिन शादी से डरता हूं तो?”

     

    मायरा कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “तो मैं तुम्हें शादी के लिए मजबूर नहीं करूंगी।”

     

    अगस्त्या ने राहत की सांस ली।

     

    “सच?”

     

    “हां। रिश्ता दो लोगों का होता है। फैसला भी दोनों का होना चाहिए।”

     

    “और अगर मुझे बहुत समय लग गया तो?”

     

    “मैं इंतजार करने का वादा नहीं कर रही।”

     

    अगस्त्या चुप हो गया।

     

    मायरा हंसकर बोली—

     

    “लेकिन अगर तुम सच में मेरे साथ रहना चाहते हो तो मुझे तुम्हारे डर से लड़ने में कोई परेशानी नहीं।”

     

    उस रात अगस्त्या ने पहली बार समझा कि शादी का मतलब अपनी आजादी खोना नहीं होता।

     

    सही इंसान के साथ शादी का मतलब शायद ऐसा साथी पाना होता है, जिसके सामने अपने डर भी रखे जा सकें।

     

    कुछ महीनों बाद अगस्त्या फिर उस छोटे शहर में गया।

     

    वह सीधे उसी स्कूल पहुंचा।

     

    मायरा बच्चों को पढ़ा रही थी।

     

    कक्षा खत्म होने के बाद अगस्त्या उसके सामने खड़ा था।

     

    मायरा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “अब किस काम से आए हैं कपूर साहब?”

     

    अगस्त्या ने कहा—

     

    “एक जरूरी बात कहनी है।”

     

    “कहिए।”

     

    “मैं अभी भी शादी से थोड़ा डरता हूं।”

     

    मायरा चुप रही।

     

    अगस्त्या ने आगे कहा—

     

    “लेकिन अब मुझे तुमसे दूर रहने से ज्यादा डर लगता है।”

     

    मायरा की आंखों में मुस्कान आ गई।

     

    “तो?”

     

    अगस्त्या ने कहा—

     

    “तो मैं शादी करना चाहता हूं। लेकिन तुम्हारे साथ। और इस बार किसी डर की वजह से नहीं, अपनी इच्छा से।”

     

    मायरा ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस मुस्कुराकर बोली—

     

    “अब आप थोड़े कम गरीब लग रहे हैं।”

     

    अगस्त्या हंस पड़ा।

     

    उसने समझ लिया था कि जिंदगी सिर्फ कंपनी, पैसा और विरासत का नाम नहीं है।

     

    कपूर एंड संस का वारिस होना उसकी पहचान थी, लेकिन मायरा के साथ उसे जो अपनापन मिला, वही उसकी असली दौलत बन गया।

     

    और जिस लड़के ने कभी कहा था कि वह जिंदगी में कभी शादी नहीं करेगा, वही एक दिन अपने पिता के सामने खड़ा होकर बोला—

     

    “पापा, अब शादी की तैयारी शुरू कर दीजिए।”

     

    राजीव कपूर मुस्कुराए।

     

    “लड़की कौन है?”

     

    अगस्त्या ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “वही, जिसने मुझे समझाया कि शादी बंधन नहीं… सही इंसान के साथ एक खूबसूरत साथ हो सकती है।”

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    Auther preeti Sharma

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  • वो आ गया…

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    वो आ गया…

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। शहर के आखिरी छोर पर बने छोटे-से मोहल्ले में लगभग हर घर की बत्तियां बुझ चुकी थीं। सड़क बिल्कुल शांत थी। कभी-कभी किसी दूर जाती गाड़ी की आवाज आती और फिर सब कुछ पहले जैसा खामोश हो जाता।

     

    उसी मोहल्ले में आरव अपने माता-पिता और छोटी बहन रिया के साथ रहता था।

     

    उस रात उसके माता-पिता एक रिश्तेदार के घर गए हुए थे और रिया अपनी सहेली के घर रुक गई थी। घर में सिर्फ आरव था।

     

    आरव पढ़ाई कर रहा था कि अचानक बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने घड़ी देखी।

     

    “इस वक्त कौन आया?”

     

    वह कुर्सी से उठा और दरवाजे के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    आरव ने फिर पूछा—

     

    “कौन?”

     

    कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांति रही।

     

    फिर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज पहले से थोड़ी तेज थी।

     

    आरव ने दरवाजे की छोटी खिड़की से बाहर देखा।

     

    सामने का बरामदा खाली था।

     

    “शायद कोई शरारत कर रहा है।”

     

    वह वापस कमरे में चला गया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने किताब खोली, उसका फोन बज उठा।

     

    स्क्रीन पर रिया का नाम था।

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    “हां, बोल।”

     

    रिया की आवाज बहुत धीमी थी—

     

    “भैया… दरवाजा मत खोलना।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “क्यों?”

     

    “मेरी सहेली के घर के बाहर कोई बहुत देर से खड़ा है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    “पता नहीं। वो बस सड़क की तरफ देख रहा है।”

     

    आरव खिड़की के पास गया।

     

    बाहर फिर वही सुनसान सड़क थी।

     

    “तुम घबराओ मत। अपनी सहेली के घर में ही रहना।”

     

    “भैया…”

     

    “हां?”

     

    रिया कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन अचानक फोन कट गया।

     

    आरव ने दोबारा फोन किया।

     

    फोन बंद था।

     

    उसने बेचैनी में मोबाइल मेज पर रखा।

     

    तभी उसके घर के बाहर से आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    उसके हाथ से फोन लगभग गिर गया।

     

    आवाज बहुत धीमी थी।

     

    लेकिन वह साफ सुन सकता था।

     

    किसी ने उसका नाम लिया था।

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    इस बार आवाज घर के पीछे से आई थी।

     

    आरव तुरंत पीछे मुड़ा।

     

    घर के पीछे वाला कमरा कई महीनों से बंद पड़ा था। वहां पुराने सामान के अलावा कुछ नहीं था।

     

    उस कमरे का दरवाजा अचानक अपने आप थोड़ा खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने हिम्मत करके दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “बस बहुत हो गया।”

     

    वह अपने कमरे में लौट आया।

     

    तभी ऊपर की मंजिल से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “ऊपर तो कोई नहीं है…”

     

    वह सीढ़ियों के पास पहुंचा।

     

    ऊपर पूरा अंधेरा था।

     

    उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    सीढ़ियों पर एक-एक कदम रखते हुए ऊपर जाने लगा।

     

    पहली मंजिल पर पहुंचकर उसने देखा कि गलियारे के आखिरी कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    यह कमरा उसके दादा का था।

     

    दादा की मृत्यु को कई साल हो चुके थे और तब से कमरा लगभग बंद ही रहता था।

     

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    कमरे में रखी पुरानी अलमारी खुली हुई थी।

     

    फर्श पर कुछ पुराने कागज बिखरे थे।

     

    एक कागज पर उसकी नजर पड़ी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जब वह आए, तो उसका नाम मत लेना।”

     

    आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

     

    “वह कौन?”

     

    तभी पीछे से धीमी आवाज आई—

     

    “मैं…”

     

    आरव ने झटके से पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने तुरंत कमरे से बाहर निकलने की कोशिश की।

     

    लेकिन दरवाजा बंद था।

     

    उसने हैंडल घुमाया।

     

    “खुलो!”

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    फिर कमरे की खिड़की पर किसी की परछाईं दिखाई दी।

     

    आरव कुछ कदम पीछे हट गया।

     

    परछाईं धीरे-धीरे खिड़की से हट गई।

     

    फिर कमरे के बाहर से कदमों की आवाज आने लगी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने सांस रोक ली।

     

    कदमों की आवाज दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गई।

     

    कुछ सेकंड बाद किसी ने दरवाजे पर हाथ रखा।

     

    आरव ने दरवाजा खोलने की कोशिश नहीं की।

     

    तभी बाहर से एक आवाज आई—

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे यहां आने से रोका था।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “लेकिन अब वो नहीं हैं।”

     

    अचानक दरवाजा खुल गया।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    गलियारा खाली था।

     

    वह भागकर सीढ़ियों की तरफ आया।

     

    तभी नीचे से मुख्य दरवाजा खुलने की आवाज आई।

     

    चर्ररर…

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    दरवाजे के पास एक लंबी परछाईं दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर आ रही थी।

     

    आरव ने तुरंत अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और बिस्तर के पास बैठ गया।

     

    उसका फोन फिर बजा।

     

    इस बार रिया का फोन था।

     

    “भैया!”

     

    “रिया! तुम ठीक हो?”

     

    “हां, लेकिन आप घर में अकेले हो?”

     

    “हां।”

     

    रिया कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “भैया… अभी मैं घर के बाहर खड़ी हूं।”

     

    आरव का दिल जैसे रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैं अभी घर पहुंची हूं।”

     

    आरव ने घबराकर पूछा—

     

    “लेकिन तुमने तो कहा था कि तुम अपनी सहेली के घर हो!”

     

    रिया बोली—

     

    “मैं थी। लेकिन मुझे लगा कोई मुझे घर तक छोड़ने आया है।”

     

    “कौन?”

     

    रिया ने धीरे से कहा—

     

    “वही आदमी जो हमारे घर के बाहर खड़ा है।”

     

    आरव ने कमरे की खिड़की से बाहर देखा।

     

    सड़क पर रिया खड़ी थी।

     

    उसके पीछे एक लंबी परछाईं थी।

     

    आरव ने घबराकर दरवाजा खोला और बाहर जाने लगा।

     

    तभी उसके दादा के कमरे से फिर वही आवाज आई—

     

    “उसे अंदर मत आने देना।”

     

    आरव रुक गया।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    कमरे के अंदर रखी पुरानी मेज पर एक डायरी खुली हुई थी।

     

    वह दौड़कर उसके पास गया।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “वो इंसान नहीं है। वह उन लोगों के घर आता है, जहां पुराने घर का एक राज छिपा हो। उसे रोकने का एक ही तरीका है—उस राज को स्वीकार करना।”

     

    आरव ने तेजी से पुराने कागज देखे।

     

    उसे पता चला कि वर्षों पहले उनके घर की जमीन को लेकर एक बड़ा विवाद हुआ था। उसके दादा ने किसी निर्दोष परिवार को उनका हक दिलाने की कोशिश की थी, लेकिन वह परिवार गांव छोड़कर चला गया था।

     

    शायद उसी अधूरे अन्याय की वजह से यह रहस्य इतने वर्षों से घर से जुड़ा था।

     

    आरव ने डायरी हाथ में ली और बाहर आ गया।

     

    सामने वह परछाईं खड़ी थी।

     

    आरव ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “मैं सच जानता हूं।”

     

    परछाईं रुक गई।

     

    “मेरे दादा ने जो गलती की थी, मैं उसे छिपाऊंगा नहीं।”

     

    कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर वह परछाईं धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    रिया दौड़कर आरव के पास आ गई।

     

    “भैया!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    परछाईं सड़क के आखिरी छोर तक गई और अचानक गायब हो गई।

     

    सुबह मोहल्ले के बुजुर्गों को सारी बात बताई गई।

     

    पुराने कागजों की जांच हुई और सच सामने आया कि कई साल पहले जमीन का अधिकार वास्तव में दूसरे परिवार का था।

     

    आरव के परिवार ने वह जमीन उन्हें वापस कर दी।

     

    उस दिन के बाद घर में कभी कोई अजीब आवाज नहीं आई।

     

    कई महीनों बाद आरव उसी कमरे में बैठा दादा की डायरी पढ़ रहा था।

     

    अचानक खिड़की से ठंडी हवा आई।

     

    डायरी का आखिरी पन्ना अपने आप पलटा।

     

    उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

     

    “अब मैं जा रहा हूं।”

     

    आरव ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    बस दूर सड़क पर एक परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

     

    और उस रात के बाद मोहल्ले में किसी ने उसे दोबारा नहीं देखा।

     

    लेकिन आज भी जब कभी उस पुराने घर के पास रात में हवा अचानक ठंडी हो जाती है, लोग कहते हैं—

     

    “डरना मत… वो आ गया था, अपना सच लेने… और सच मिलते ही चला गया।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • डरावनी आत्मा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    डरावनी आत्मा का बंद कमरा

     

    शहर से थोड़ा दूर एक पुरानी हवेली थी। हवेली कई सालों से बंद पड़ी थी। उसकी दीवारों पर बेलें चढ़ चुकी थीं और खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे। गांव के लोग शाम होते ही उस रास्ते से गुजरना बंद कर देते थे।

     

    कहा जाता था कि हवेली में एक डरावनी आत्मा रहती है।

     

    लोगों का कहना था कि आधी रात के बाद हवेली की ऊपरी मंजिल से किसी लड़की के रोने की आवाज आती थी।

     

    किसी ने उसे देखा नहीं था, लेकिन कई लोगों ने उसके कदमों की आवाज जरूर सुनी थी।

     

    उसी गांव में एलेक्स नाम का बीस साल का लड़का रहता था। वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक शाम उसके दोस्त नोलन ने उसे चुनौती दी।

     

    “अगर तुम्हें इतना ही भरोसा है कि वहां कोई आत्मा नहीं है, तो आज रात हवेली में जाकर दिखाओ।”

     

    एलेक्स ने हंसकर कहा—

     

    “मुझे किसी को कुछ साबित नहीं करना।”

     

    नोलन बोला—

     

    “डर गए?”

     

    एलेक्स तुरंत बोला—

     

    “ठीक है। आज रात चला जाऊंगा।”

     

    रात करीब दस बजे एलेक्स टॉर्च लेकर हवेली की तरफ निकल पड़ा।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा आधा खुला था।

     

    उसने उसे धक्का दिया।

     

    चर्ररर…

     

    दरवाजा खुलते ही अंदर से ठंडी हवा का झोंका आया।

     

    एलेक्स ने खुद को संभाला।

     

    “पुरानी हवेली है, हवा तो चलेगी।”

     

    वह अंदर चला गया।

     

    फर्श पर धूल जमी थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    जैसे ही उसने टॉर्च एक चित्र पर डाली, उसे लगा कि चित्र में बनी लड़की की आंखें उसकी तरफ देख रही हैं।

     

    एलेक्स कुछ पल रुका।

     

    फिर हंस पड़ा।

     

    “डराने की कोशिश कर रही हो?”

     

    वह आगे बढ़ गया।

     

    अचानक पीछे से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    एलेक्स पलटा।

     

    “हवा होगी।”

     

    उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    अब उसे थोड़ी चिंता हुई।

     

    उसने फोन निकाला।

     

    नेटवर्क नहीं था।

     

    “कमाल है।”

     

    तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    एलेक्स ने सिर उठाकर देखा।

     

    ऊपरी मंजिल की सीढ़ियां अंधेरे में गायब हो रही थीं।

     

    आवाज फिर आई।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    जैसे ही उसने पहला कदम रखा, ऊपर से एक धीमी आवाज आई—

     

    “मत आओ…”

     

    एलेक्स वहीं रुक गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं मिला।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “वापस चले जाओ…”

     

    एलेक्स का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    लेकिन उसने हिम्मत करके ऊपर जाना जारी रखा।

     

    ऊपरी मंजिल पर एक लंबा गलियारा था।

     

    गलियारे के अंत में एक बंद कमरा था।

     

    दरवाजे पर पुराने ताले के निशान थे।

     

    एलेक्स ने टॉर्च उस दरवाजे पर डाली।

     

    अचानक दरवाजे के अंदर से किसी ने धीरे से तीन बार दस्तक दी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    एलेक्स पीछे हट गया।

     

    “अंदर कौन है?”

     

    कुछ देर बाद आवाज आई—

     

    “मैं…”

     

    एलेक्स ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    “जिसका इंतजार कोई नहीं कर रहा।”

     

    एलेक्स का डर बढ़ गया।

     

    फिर भी उसने पूछा—

     

    “तुम यहां कब से हो?”

     

    अंदर से आवाज आई—

     

    “बहुत सालों से।”

     

    एलेक्स ने दरवाजे के नीचे से देखा।

     

    अंदर से हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    “तुम इंसान हो?”

     

    कुछ देर चुप्पी रही।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “अब नहीं।”

     

    एलेक्स समझ गया।

     

    वह वही आत्मा थी, जिसकी बातें गांव वाले करते थे।

     

    वह भागने के लिए मुड़ा।

     

    लेकिन गलियारे का रास्ता अचानक गायब था।

     

    वह जहां सीढ़ियां थीं, वहां अब सिर्फ दीवार थी।

     

    एलेक्स घबरा गया।

     

    “मुझे जाने दो!”

     

    आत्मा की आवाज आई—

     

    “मैंने तुम्हें नहीं रोका।”

     

    “तो रास्ता कहां है?”

     

    “जिस कमरे में तुमने कभी आने की हिम्मत नहीं की, वही रास्ता दिखाएगा।”

     

    एलेक्स ने बंद कमरे की तरफ देखा।

     

    दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    अंदर एक पुरानी मेज, एक टूटी कुर्सी और दीवार पर कई तस्वीरें थीं।

     

    एक तस्वीर देखकर एलेक्स के कदम रुक गए।

     

    उस तस्वीर में एक युवा लड़की थी।

     

    उसके साथ एक छोटा लड़का खड़ा था।

     

    लड़का बिल्कुल एलेक्स जैसा दिखता था।

     

    उसके हाथ कांपने लगे।

     

    “ये… कौन है?”

     

    आत्मा उसके पीछे खड़ी थी।

     

    अब उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    वह एक शांत चेहरे वाली लड़की थी। उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि बहुत गहरा दुख था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम्हारे दादा के छोटे भाई की बेटी।”

     

    एलेक्स हैरान रह गया।

     

    “मेरा परिवार?”

     

    आत्मा ने सिर हिलाया।

     

    “मेरा नाम एलिसा था।”

     

    उसने बताया कि कई साल पहले हवेली में रहने वाले परिवार में जमीन को लेकर विवाद हुआ था। एलिसा ने एक पुराने दस्तावेज के बारे में सच जान लिया था, जिससे परिवार के एक लालची सदस्य का झूठ सामने आ सकता था।

     

    लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    उसे इसी कमरे में बंद कर दिया गया था।

     

    “मैंने बहुत देर तक मदद के लिए पुकारा,” एलिसा ने कहा।

     

    “लेकिन कोई नहीं आया।”

     

    एलेक्स की आंखें नम हो गईं।

     

    “फिर?”

     

    “कुछ दिनों बाद मुझे इसी कमरे में मेरी डायरी मिली। उसमें मैंने सब सच लिख दिया था।”

     

    एलिसा ने मेज की तरफ इशारा किया।

     

    वहां एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    एलेक्स ने उसे उठाया।

     

    उसमें पूरे परिवार का सच लिखा था।

     

    आखिरी पन्ने पर एक नाम था।

     

    एलेक्स के परदादा का।

     

    लेकिन उसके आगे लिखा था—

     

    “उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी, मगर देर हो चुकी थी।”

     

    एलेक्स स्तब्ध रह गया।

     

    उसे समझ आया कि उसके परिवार ने एलिसा को नुकसान नहीं पहुंचाया था। बल्कि उसके परदादा ने उसे बचाने की कोशिश की थी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

     

    एलेक्स ने पूछा—

     

    “तुम अब तक यहां क्यों हो?”

     

    एलिसा ने धीमे से कहा—

     

    “क्योंकि मेरा सच किसी ने दुनिया तक नहीं पहुंचाया।”

     

    एलेक्स ने डायरी अपने बैग में रख ली।

     

    “मैं तुम्हारा सच सबको बताऊंगा।”

     

    एलिसा की आंखों में पहली बार शांति दिखाई दी।

     

    तभी हवेली में तेज हवा चलने लगी।

     

    खिड़कियां खुल गईं।

     

    दीवारों पर टंगी तस्वीरें हिलने लगीं।

     

    एलिसा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    एलेक्स ने कहा—

     

    “तुम जा रही हो?”

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मुझे जाने का रास्ता मिल गया है।”

     

    कमरे में अचानक तेज सफेद रोशनी फैल गई।

     

    एलेक्स ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ सेकंड बाद जब उसने आंखें खोलीं तो कमरा खाली था।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    गलियारा भी वापस आ चुका था।

     

    वह तेजी से नीचे आया।

     

    मुख्य दरवाजा इस बार आसानी से खुल गया।

     

    बाहर नोलन और गांव के कुछ लोग खड़े थे।

     

    नोलन घबराकर बोला—

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    एलेक्स ने कहा—

     

    “हां। लेकिन मुझे तुम सबको कुछ बताना है।”

     

    अगले दिन एलेक्स ने पूरी डायरी गांव के बुजुर्गों के सामने रखी।

     

    जैसे-जैसे पन्ने पढ़े गए, एलिसा की पुरानी कहानी सामने आती गई।

     

    गांव के बुजुर्गों ने उस हवेली के बारे में पहली बार सच जाना।

     

    उन्होंने एलिसा के नाम से हवेली के पास एक छोटा-सा स्मारक बनवाया।

     

    उस दिन के बाद हवेली से कभी रोने की आवाज नहीं आई।

     

    लेकिन एलेक्स जब भी उस रास्ते से गुजरता, उसे हवेली की ऊपरी खिड़की में एक हल्की रोशनी दिखाई देती।

     

    एक बार उसने ऊपर देखा।

     

    खिड़की पर एलिसा खड़ी थी।

     

    उसने दूर से हाथ हिलाया।

     

    एलेक्स ने भी हाथ हिला दिया।

     

    अगले ही पल रोशनी गायब हो गई।

     

    उस दिन एलेक्स समझ गया कि हर डरावनी आत्मा बदला लेने नहीं आती।

     

    कुछ आत्माएं सिर्फ इसलिए भटकती हैं क्योंकि उनकी अधूरी कहानी कोई सुनने वाला नहीं होता।

     

    और जब सच आखिरकार सामने आ जाता है…

     

    तो सबसे डरावनी आत्मा भी शांति पा सकती है।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं