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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

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जुलाई 2026
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  • बंद कमरे का सच

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 2: बंद कमरे का सच

     

    कमरे में अचानक दीपक जलते ही चांदनी और गौरी कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गईं।

     

    अंधेरे में जो आवाज गूंजी थी, वह अभी भी उनके कानों में गूंज रही थी।

     

    “तुम्हें अपने घर का सच नहीं पता…”

     

    चांदनी ने कांपती आवाज में पूछा, “कौन हो तुम?”

     

    कमरे में कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    गौरी ने चांदनी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चांदनी, चलो यहां से। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।”

     

    चांदनी ने सिर हिलाया।

     

    “पहले पता करते हैं कि ये आवाज किसकी है।”

     

    “तुम्हें हर चीज की सच्चाई जाननी जरूरी है क्या?”

     

    “हां।”

     

    गौरी ने परेशान होकर कहा, “तुम्हारी यही आदत एक दिन हमें बड़ी मुसीबत में डाल देगी।”

     

    चांदनी कुछ बोलती, उससे पहले दीपक की लौ अचानक तेज हुई।

     

    दीवार पर एक परछाईं बनी।

     

    वही लड़की जैसी परछाईं।

     

    चांदनी ने डरते हुए उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    इस बार कोई जवाब नहीं आया।

     

    बस परछाईं धीरे-धीरे दीवार पर आगे बढ़ी और एक पुराने चित्र के पास जाकर रुक गई।

     

    चांदनी उस चित्र के पास गई।

     

    चित्र में एक परिवार खड़ा था।

     

    एक आदमी, एक औरत और उनके बीच एक छोटी लड़की।

     

    चांदनी ने चित्र को ध्यान से देखा।

     

    उस लड़की का चेहरा देखकर वह चौंक गई।

     

    “ये तो वही लड़की है।”

     

    गौरी ने पूछा, “जिसे हमने नीचे देखा था?”

     

    चांदनी ने सिर हिलाया।

     

    चित्र के नीचे नाम लिखा था—

     

    “रघुवीर सिंह का परिवार।”

     

    चांदनी ने धीरे से कहा, “तो इस हवेली के मालिक का नाम रघुवीर सिंह था।”

     

    तभी मेज पर रखी तस्वीर हवा से हिलने लगी।

     

    तस्वीर के पीछे से एक छोटा कागज नीचे गिरा।

     

    चांदनी ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रही हो, उसका जवाब इस घर में नहीं, तुम्हारे अपने घर में छिपा है।”

     

    चांदनी की सांस रुक गई।

     

    “मेरे घर में?”

     

    गौरी बोली, “ये क्या मतलब हुआ?”

     

    चांदनी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसके दिमाग में अपनी मां की बातें घूमने लगीं।

     

    मां हमेशा इस हवेली का नाम सुनते ही चुप क्यों हो जाती थीं?

     

    दादी ने भी उसे आधा सच ही क्यों बताया?

     

    और सबसे बड़ी बात—हवेली की लड़की का नाम भी चांदनी क्यों था?

     

    तभी नीचे से किसी दरवाजे के बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    गौरी घबरा गई।

     

    “कोई अंदर आया है!”

     

    चांदनी ने दीपक उठा लिया।

     

    दोनों कमरे से बाहर निकलीं।

     

    सीढ़ियों के नीचे कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

     

    गौरी ने फुसफुसाकर कहा, “जब हम आए थे तब दरवाजा बंद था।”

     

    चांदनी ने कहा, “हमें यहां से निकलना चाहिए।”

     

    दोनों तेजी से नीचे आईं और हवेली से बाहर निकल गईं।

     

    घर लौटते समय चांदनी बिल्कुल चुप थी।

     

    गौरी ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    “मुझे लगता है मेरी मां कुछ जानती हैं।”

     

    अगली सुबह चांदनी ने मां से सीधे सवाल किया।

     

    “मां, क्या आपका इस हवेली से कोई संबंध है?”

     

    मां के हाथ रुक गए।

     

    “तुम ये क्यों पूछ रही हो?”

     

    “क्योंकि मैं कल रात वहां गई थी।”

     

    मां के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “तुम हवेली गई थीं?”

     

    “हां।”

     

    मां ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए था!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहां जो हुआ था, उसे दोबारा छेड़ना ठीक नहीं है।”

     

    चांदनी की आंखें भर आईं।

     

    “मां, मुझे सच जानने का हक है।”

     

    मां कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “तुम्हारे जन्म से पहले की बात है।”

     

    चांदनी ध्यान से सुनने लगी।

     

    “जब मैं छोटी थी, तब उस हवेली में रघुवीर सिंह का परिवार रहता था। उनकी एक बेटी थी। उसका नाम चांदनी था।”

     

    “फिर?”

     

    “एक रात वह लड़की गायब हो गई।”

     

    “और?”

     

    मां ने नजरें झुका लीं।

     

    “उस रात तुम्हारे नाना वहां गए थे।”

     

    चांदनी चौंक गई।

     

    “नाना?”

     

    “हां। उन्होंने कुछ देखा था। लेकिन उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया।”

     

    “क्या देखा था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    चांदनी को यकीन नहीं हुआ।

     

    “मां, आप कुछ छिपा रही हैं।”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैं तुम्हें बचाना चाहती हूं।”

     

    “किससे?”

     

    मां ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    दोनों चुप हो गईं।

     

    बाहर दादी खड़ी थीं।

     

    दादी अंदर आईं और चांदनी को देखते ही समझ गईं कि अब बात छिपाना मुश्किल है।

     

    उन्होंने कहा, “अब इसे सच बता देना चाहिए।”

     

    मां ने कहा, “लेकिन मां…”

     

    दादी बोलीं, “अगर इसे सच नहीं बताया तो ये खुद उसे ढूंढने जाएगी।”

     

    चांदनी ने दादी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आपको सब पता है?”

     

    दादी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    फिर उन्होंने अपनी पुरानी संदूकची खोली।

     

    उसमें से एक कपड़े में लिपटी हुई छोटी-सी चीज निकाली।

     

    वह एक चांदी की पायल थी।

     

    चांदनी ने पायल देखते ही कहा, “ये तो…”

     

    दादी बोलीं, “ये उसी लड़की की थी।”

     

    चांदनी ने पायल हाथ में ले ली।

     

    उसी पल उसे रात का दृश्य याद आया।

     

    वह लड़की सीढ़ियों पर खड़ी थी।

     

    उसके पैर में एक पायल थी।

     

    चांदनी के हाथ कांपने लगे।

     

    “लेकिन ये पायल आपके पास कैसे आई?”

     

    दादी ने कहा, “तुम्हारे नाना इसे हवेली से लेकर आए थे।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उन्हें लगा था कि लड़की शायद किसी मुसीबत में थी।”

     

    चांदनी ने पूछा, “क्या वह जिंदा थी?”

     

    दादी कुछ पल चुप रहीं।

     

    “हमें कभी पता नहीं चला।”

     

    चांदनी की आंखों में डर और सवाल दोनों थे।

     

    “तो फिर हर पूर्णिमा की रात जो दिखाई देती है… वो कौन है?”

     

    दादी ने जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात चांदनी ने पायल अपने पास रख ली।

     

    उसे नींद नहीं आई।

     

    आधी रात को अचानक पायल से हल्की-सी आवाज आई।

     

    छन…

     

    चांदनी उठकर बैठ गई।

     

    पायल खुद-ब-खुद हिल रही थी।

     

    वह डरते हुए उसके पास गई।

     

    पायल के नीचे एक छोटा कागज रखा था।

     

    उसने कागज खोला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “पुराने कुएं के पास आओ।”

     

    चांदनी ने तुरंत खिड़की से बाहर देखा।

     

    दूर वही लड़की खड़ी थी।

     

    वह कुछ पल चांदनी को देखती रही।

     

    फिर मुड़कर गांव के पुराने कुएं की तरफ चल दी।

     

    चांदनी ने बिना किसी को जगाए घर से निकलने का फैसला किया।

     

    लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी।

     

    गौरी पहले से बाहर उसका इंतजार कर रही थी।

     

    “मुझे पता था तू जाएगी।”

     

    चांदनी मुस्कुराई।

     

    “चल।”

     

    दोनों पुराने कुएं तक पहुंचीं।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर मिट्टी थोड़ी उखड़ी हुई थी।

     

    चांदनी नीचे बैठी और हाथों से मिट्टी हटाने लगी।

     

    कुछ देर बाद उसे लकड़ी का एक छोटा संदूक मिला।

     

    उसने संदूक खोला।

     

    अंदर पुराने कागज, एक तस्वीर और एक पत्र था।

     

    तस्वीर में रघुवीर सिंह की बेटी थी।

     

    उसके साथ एक छोटी लड़की भी खड़ी थी।

     

    चांदनी ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “मेरी बेटी के बाद उसकी छोटी बहन की जिम्मेदारी मेरी दोस्त की बेटी संभालेगी।”

     

    चांदनी का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “दोस्त की बेटी?”

     

    गौरी ने पूछा, “कौन?”

     

    चांदनी ने पत्र खोला।

     

    पहली ही पंक्ति पढ़ते ही उसके हाथ कांपने लगे।

     

    पत्र में लिखा था—

     

    “अगर कभी मेरी बेटी चांदनी वापस न आए, तो उसकी छोटी बहन को मेरी सबसे भरोसेमंद दोस्त के पास भेज देना।”

     

    चांदनी ने धीरे से कहा—

     

    “लेकिन रघुवीर सिंह की तो सिर्फ एक बेटी थी…”

     

    तभी पीछे से वही धीमी आवाज आई—

     

    “नहीं… दो बेटियां थीं।”

     

    चांदनी और गौरी ने एक साथ पीछे देखा।

     

    वही लड़की उनके सामने खड़ी थी।

     

    चांदनी की सांस अटक गई।

     

    लड़की ने धीरे से कहा—

     

    “और दूसरी बेटी… तुम्हारी मां है।”

     

    चांदनी के हाथ से पत्र जमीन पर गिर गया।

     

    उसके सामने अब सिर्फ हवेली का नहीं…

     

    बल्कि उसके अपने परिवार का सबसे बड़ा राज खुलने वाला था।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • चांदनी रात का अंधियारा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 1

     

    गांव से थोड़ी दूर एक पुरानी हवेली थी। दिन में वह हवेली जितनी शांत और साधारण दिखाई देती, रात होते ही उतनी ही रहस्यमयी लगने लगती थी। गांव के लोग शाम ढलने के बाद उस रास्ते पर जाना पसंद नहीं करते थे।

     

    कहते थे कि हर पूर्णिमा की रात हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में एक दीपक अपने आप जल उठता था।

     

    किसी ने उस दीपक को जलाते हुए कभी नहीं देखा था।

     

    गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते थे, “उस हवेली से दूर रहना ही अच्छा है।”

     

    लेकिन गांव की अठारह साल की चांदनी इन बातों को सिर्फ पुरानी कहानियां मानती थी।

     

    चांदनी का असली नाम चांदनी ही था। उसके पिता बचपन से उसे इसी नाम से पुकारते थे, क्योंकि उसके जन्म की रात आसमान में बहुत बड़ा चांद निकला था।

     

    वह हंसमुख और थोड़ी जिद्दी लड़की थी।

     

    एक शाम उसकी मां ने उससे कहा, “चांदनी, सूरज ढलने वाला है। जल्दी घर आ जाना।”

     

    चांदनी ने हंसकर कहा, “मां, मैं बस कुएं तक जा रही हूं।”

     

    “कुएं तक ठीक है, लेकिन हवेली की तरफ मत जाना।”

     

    चांदनी रुक गई।

     

    “आपको अभी भी उस हवेली से डर लगता है?”

     

    मां ने गंभीर होकर कहा, “डर की बात नहीं है। बस वहां जाना ठीक नहीं है।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    मां ने जवाब नहीं दिया।

     

    चांदनी ने फिर पूछा, “मां, आखिर वहां हुआ क्या था?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    “तुम्हें जितना पता है, उतना ही रहने दो।”

     

    चांदनी को यह जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।

     

    वह कुएं की तरफ चली गई, लेकिन उसके दिमाग में हवेली की बात घूमती रही।

     

    रास्ते में उसकी मुलाकात उसकी सहेली गौरी से हुई।

     

    गौरी ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    चांदनी बोली, “तुम्हें हवेली के बारे में कुछ पता है?”

     

    गौरी का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “उसका नाम मत लो।”

     

    “क्यों?”

     

    “मेरी दादी कहती हैं कि पूर्णिमा की रात वहां कोई खिड़की से बाहर देखता है।”

     

    चांदनी हंस पड़ी।

     

    “कोई इंसान?”

     

    गौरी ने धीरे से कहा, “पता नहीं।”

     

    चांदनी ने मजाक किया, “तो आज रात चलकर देख लेते हैं।”

     

    गौरी ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पागल हो गई हो क्या?”

     

    चांदनी हंसती हुई बोली, “मैं मजाक कर रही हूं।”

     

    लेकिन उसके मन में अब वही बात बैठ गई थी।

     

    उस रात पूर्णिमा थी।

     

    आसमान बिल्कुल साफ था और चांद की रोशनी पूरे गांव में फैली हुई थी।

     

    चांदनी अपनी छत पर बैठी थी।

     

    अचानक उसकी नजर दूर हवेली की तरफ गई।

     

    वहां ऊपरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    चांदनी खड़ी हो गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    उसने ध्यान से देखा।

     

    रोशनी सच में थी।

     

    उसे अपनी मां की बात याद आई।

     

    फिर उसे गौरी की दादी की कहानी याद आई।

     

    चांदनी ने खुद को समझाया।

     

    “कोई दीपक जलाकर गया होगा।”

     

    वह वापस बैठ गई।

     

    लेकिन कुछ मिनट बाद रोशनी गायब हो गई।

     

    चांदनी फिर खड़ी हुई।

     

    “अजीब है।”

     

    अगली सुबह उसने अपनी मां से पूछा, “मां, क्या हवेली में कोई रहता है?”

     

    मां ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम ये क्यों पूछ रही हो?”

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    मां ने कहा, “नहीं। वहां कोई नहीं रहता।”

     

    चांदनी ने पूछा, “फिर रात को वहां रोशनी क्यों थी?”

     

    मां के हाथ से गिलास लगभग छूट गया।

     

    “तुमने क्या देखा?”

     

    “ऊपर की खिड़की में दीपक जल रहा था।”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “आज के बाद उस हवेली की तरफ मत देखना।”

     

    चांदनी को अब यकीन हो गया था कि उसकी मां कुछ छिपा रही हैं।

     

    उसी दिन दोपहर में वह अपनी दादी के पास गई।

     

    दादी आंगन में बैठी थीं।

     

    चांदनी उनके पास बैठ गई।

     

    “दादी, आप मुझे हवेली के बारे में सच-सच बताइए।”

     

    दादी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “किसने कहा तुम्हें उसके बारे में पूछने को?”

     

    “किसी ने नहीं। मैंने खुद देखा।”

     

    दादी की आंखों में चिंता आ गई।

     

    “क्या देखा?”

     

    “पूर्णिमा की रात खिड़की में दीपक।”

     

    दादी ने लंबी सांस ली।

     

    “बहुत साल पहले उस हवेली में एक परिवार रहता था। घर के मालिक की एक बेटी थी। उसका नाम भी चांदनी था।”

     

    चांदनी हैरान रह गई।

     

    “मेरे जैसा?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हां। वह लड़की बहुत शांत थी। उसे रात में छत पर बैठकर चांद देखना पसंद था।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    दादी ने धीरे से कहा, “एक पूर्णिमा की रात वह अचानक गायब हो गई।”

     

    “कहां गई?”

     

    “किसी को नहीं पता।”

     

    “उसके परिवार ने उसे ढूंढा?”

     

    “बहुत ढूंढा। लेकिन उसका कोई पता नहीं चला।”

     

    चांदनी ने पूछा, “फिर हवेली बंद क्यों हो गई?”

     

    दादी बोलीं, “उसके बाद हवेली में अजीब घटनाएं होने लगीं। कभी दरवाजे अपने आप खुल जाते, कभी ऊपर की खिड़की में दीपक जलता दिखाई देता।”

     

    चांदनी कुछ देर चुप रही।

     

    “लेकिन दादी, इसका मतलब यह नहीं कि वहां कुछ डरावना है।”

     

    दादी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “बेटी, हर रहस्य को जानना जरूरी नहीं होता।”

     

    चांदनी ने कुछ जवाब नहीं दिया।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल लगातार घूमता रहा—

     

    अगर वह लड़की सालों पहले गायब हो गई थी, तो हर पूर्णिमा की रात दीपक कौन जलाता था?

     

    उस रात चांदनी देर तक सो नहीं सकी।

     

    आधी रात के करीब उसे बाहर से हल्की-सी आवाज सुनाई दी।

     

    “चांदनी…”

     

    वह तुरंत उठकर बैठ गई।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने सोचा शायद उसका भ्रम होगा।

     

    फिर आवाज आई।

     

    “चांदनी…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    वह खिड़की के पास गई।

     

    बाहर पूरा आंगन चांदनी से भरा हुआ था।

     

    उसने दूर हवेली की तरफ देखा।

     

    ऊपर वही खिड़की दिखाई दे रही थी।

     

    और इस बार वहां दीपक जल रहा था।

     

    चांदनी के दिल की धड़कन तेज हो गई।

     

    तभी खिड़की के पास एक परछाईं दिखाई दी।

     

    एक लड़की जैसी परछाईं।

     

    चांदनी ने आंखें मलीं।

     

    परछाईं गायब हो चुकी थी।

     

    अगली सुबह उसने गौरी को सब बताया।

     

    गौरी ने कहा, “तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए।”

     

    चांदनी बोली, “मुझे लगता है वहां कोई रहस्य है।”

     

    “तो क्या करोगी?”

     

    चांदनी ने दृढ़ होकर कहा, “आज रात हवेली जाऊंगी।”

     

    गौरी ने डरते हुए पूछा, “अकेली?”

     

    चांदनी ने कहा, “तुम साथ चलोगी।”

     

    “बिल्कुल नहीं!”

     

    चांदनी हंस पड़ी।

     

    “ठीक है, मैं अकेली चली जाऊंगी।”

     

    गौरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं! मैं भी चलूंगी।”

     

    रात होते ही दोनों चुपचाप गांव से बाहर निकल पड़ीं।

     

    चांदनी के हाथ में एक छोटी टॉर्च थी।

     

    हवेली का रास्ता चांद की रोशनी में साफ दिखाई दे रहा था।

     

    जैसे-जैसे वे हवेली के करीब पहुंचीं, हवा ठंडी होती गई।

     

    गौरी ने धीमे से कहा, “मुझे अच्छा नहीं लग रहा।”

     

    चांदनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “डर मत। मैं हूं।”

     

    दोनों हवेली के बड़े दरवाजे के सामने पहुंचीं।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    चांदनी ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

     

    किर्रर्र…

     

    दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    गौरी पीछे हट गई।

     

    “चांदनी… हमने इसे खोला नहीं।”

     

    चांदनी ने धीरे से अंदर देखा।

     

    अंदर पूरा अंधेरा था।

     

    लेकिन सीढ़ियों के ऊपर से हल्की चांदनी आ रही थी।

     

    तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    चांदनी ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आखिरी छोर पर एक लड़की खड़ी थी।

     

    उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

     

    चेहरा चांदनी को साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लड़की ने धीरे से अपना हाथ उठाया और ऊपर की खिड़की की तरफ इशारा किया।

     

    फिर अचानक गायब हो गई।

     

    गौरी ने कांपते हुए कहा, “चलो यहां से!”

     

    लेकिन चांदनी ने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    चांदनी ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि मुझे लगता है… वो हमें डराने नहीं, कुछ बताने आई थी।”

     

    दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगीं।

     

    ऊपर पहुंचकर उन्हें एक पुराना कमरा दिखाई दिया।

     

    दरवाजा आधा खुला था।

     

    चांदनी ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे के बीच एक पुरानी मेज थी।

     

    मेज पर एक तस्वीर रखी थी।

     

    चांदनी ने टॉर्च की रोशनी तस्वीर पर डाली।

     

    तस्वीर देखते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    तस्वीर में वही लड़की थी जिसे उन्होंने सीढ़ियों पर देखा था।

     

    और तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “चांदनी — इस घर की आखिरी बेटी।”

     

    चांदनी कुछ समझ पाती, उससे पहले कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    गौरी चीख पड़ी।

     

    और उसी पल कमरे के अंधेरे में किसी लड़की की धीमी आवाज गूंजी—

     

    “तुम… आखिर आ ही गईं।”

     

    चांदनी ने कांपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    अंधेरे से जवाब आया—

     

    “तुम्हें अपने घर का सच नहीं पता…”

     

    और कमरे में रखा पुराना दीपक अचानक जल उठा।

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  • अनुसूइया और भंवरा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अनुसूइया और एक भंवरा

     

    एक छोटे से गांव के किनारे एक सुंदर-सा बगीचा था। उस बगीचे में तरह-तरह के फूल खिले रहते थे। सुबह होते ही वहां तितलियां मंडराने लगतीं और भंवरे फूलों के आसपास गुनगुनाते रहते। उसी गांव में अनुसूइया नाम की एक सरल और दयालु लड़की रहती थी। उसे पेड़-पौधों और फूलों से बहुत प्यार था।

     

    अनुसूइया रोज सुबह उठकर अपने छोटे से बगीचे में पानी डालती और पौधों से बातें करती।

     

    एक दिन उसने देखा कि एक काला-सा भंवरा बार-बार एक ही फूल के आसपास मंडरा रहा है।

     

    अनुसूइया मुस्कुराकर बोली, “तुम रोज इसी फूल के पास क्यों आते हो?”

     

    भंवरा कुछ देर फूल पर बैठा, फिर उड़कर उसके सिर के ऊपर चक्कर लगाने लगा।

     

    अनुसूइया हंस पड़ी।

     

    “अच्छा! तो तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते हो?”

     

    भंवरा फिर उसके पास आकर मंडराने लगा।

     

    उस दिन के बाद वह भंवरा रोज अनुसूइया के बगीचे में आने लगा। अनुसूइया ने उसका नाम रख दिया—भौंरा।

     

    वह जब भी बगीचे में आती, भौंरा उसके आसपास गुनगुनाता रहता।

     

    एक दिन अनुसूइया ने कहा, “भौंरा, तुम सिर्फ मेरे बगीचे में ही क्यों आते हो? पूरे गांव में इतने फूल हैं।”

     

    जैसे ही उसने यह कहा, भौंरा उड़कर एक सूखे पौधे के पास चला गया।

     

    अनुसूइया उसके पीछे गई।

     

    वहां उसने देखा कि उस पौधे पर एक भी फूल नहीं था।

     

    अनुसूइया बोली, “इस पौधे पर तो कुछ भी नहीं है।”

     

    भौंरा उसी पौधे के पास मंडराता रहा।

     

    अनुसूइया को कुछ समझ नहीं आया।

     

    उसने उस पौधे को ध्यान से देखा। मिट्टी बहुत सूखी थी।

     

    “ओह! तुम मुझे बता रहे हो कि इसे पानी चाहिए?”

     

    उसने तुरंत पौधे में पानी डाल दिया।

     

    कुछ दिनों तक वह रोज उस पौधे की देखभाल करने लगी।

     

    एक सप्ताह बाद उस पर छोटी-सी कली निकल आई।

     

    अनुसूइया बहुत खुश हुई।

     

    “भौंरा! देखो, तुम्हारा पौधा फिर से खिलने वाला है।”

     

    भौंरा उसके चारों तरफ खुशी से उड़ने लगा।

     

    धीरे-धीरे वह पौधा फूलों से भर गया।

     

    अनुसूइया को अब यकीन हो गया था कि भौंरा सिर्फ फूलों का रस लेने नहीं आता था। जैसे उसे भी इस बगीचे की चिंता थी।

     

    लेकिन एक दिन गांव में तेज आंधी आई।

     

    आसमान अचानक काला हो गया।

     

    अनुसूइया ने जल्दी-जल्दी बगीचे के छोटे पौधों को बचाने की कोशिश की।

     

    “हे भगवान! मेरे सारे फूल खराब न हो जाएं।”

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएं हिलने लगीं।

     

    अनुसूइया एक पौधे को सहारा दे ही रही थी कि उसे भौंरे की आवाज सुनाई दी।

     

    वह चारों तरफ देखने लगी।

     

    “भौंरा? तुम कहां हो?”

     

    भौंरा एक पेड़ के नीचे फंसा हुआ था।

     

    अनुसूइया दौड़कर वहां पहुंची।

     

    हवा बहुत तेज थी, लेकिन उसने सावधानी से एक सूखी टहनी हटाई।

     

    भौंरा बाहर निकल आया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    भौंरा कुछ देर उसके हाथ के पास मंडराता रहा।

     

    अनुसूइया मुस्कुराई।

     

    “डर गए थे ना?”

     

    बारिश शुरू हो गई।

     

    अनुसूइया भौंरे को एक पत्ते के नीचे सुरक्षित जगह पर ले गई।

     

    उस रात उसने बगीचे में ही काफी देर तक पौधों को संभाला।

     

    सुबह जब बारिश रुकी, तो बगीचे की हालत खराब थी।

     

    कई फूल टूट गए थे।

     

    कुछ पौधे जमीन पर गिर गए थे।

     

    अनुसूइया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “इतनी मेहनत की थी… सब खराब हो गया।”

     

    तभी भौंरा उसके पास आया।

     

    वह एक फूल के ऊपर बैठा और फिर उड़कर दूसरे पौधे पर गया।

     

    अनुसूइया उसे देखते हुए बोली, “तुम कह रहे हो कि मुझे हार नहीं माननी चाहिए?”

     

    भौंरा उसके आसपास घूमने लगा।

     

    अनुसूइया ने आंसू पोंछे।

     

    “ठीक है। मैं फिर से शुरू करूंगी।”

     

    उसने अगले दिन से बगीचे को दोबारा ठीक करना शुरू किया।

     

    गांव के कुछ बच्चे भी उसकी मदद करने लगे।

     

    किसी ने पौधे लगाए, किसी ने मिट्टी ठीक की और किसी ने पानी दिया।

     

    कुछ ही दिनों में बगीचा फिर से हरा होने लगा।

     

    लेकिन उसी दौरान गांव में एक समस्या खड़ी हो गई।

     

    गांव के लोगों ने देखा कि इस साल फूलों और फलों की संख्या बहुत कम हो रही है।

     

    गांव के बुजुर्ग बोले, “लगता है मौसम ठीक नहीं है।”

     

    अनुसूइया ने अपने बगीचे में देखा।

     

    उसे याद आया कि जब भौंरे और तितलियां फूलों के पास आती हैं, तो कुछ समय बाद पौधों पर फल और बीज बनने लगते हैं।

     

    उसने गांव वालों से कहा, “हमें अपने बगीचों में ऐसे पौधे लगाने चाहिए जिन पर भंवरे और तितलियां आ सकें।”

     

    कुछ लोग उसकी बात पर हंसने लगे।

     

    “एक भंवरे से गांव की खेती चलेगी क्या?”

     

    अनुसूइया चुप रही।

     

    उसने किसी से बहस नहीं की।

     

    उसने अपने बगीचे में अलग-अलग फूल लगाने शुरू कर दिए।

     

    गेंदा, सूरजमुखी, चमेली और कई दूसरे फूल।

     

    कुछ समय बाद उसके बगीचे में फिर से भंवरे और तितलियां आने लगीं।

     

    धीरे-धीरे उसके पौधों पर फल और बीज भी आने लगे।

     

    गांव के लोगों ने यह देखा तो उन्हें अपनी गलती समझ आई।

     

    एक बुजुर्ग किसान अनुसूइया के पास आए।

     

    “बेटी, तुम सही कह रही थी।”

     

    अनुसूइया मुस्कुराई।

     

    “मैं नहीं, भौंरा सही था।”

     

    किसान हंस पड़े।

     

    “भौंरा?”

     

    अनुसूइया ने सिर हिलाया।

     

    “हां। उसी ने मुझे सिखाया कि छोटी-सी चीज भी बड़ी मदद कर सकती है।”

     

    उस दिन से गांव के लोगों ने अपने घरों के आसपास फूलों के पौधे लगाने शुरू कर दिए।

     

    कुछ महीनों बाद पूरा गांव फूलों से भर गया।

     

    भंवरे और तितलियां हर तरफ दिखाई देने लगे।

     

    अनुसूइया का छोटा-सा बगीचा अब गांव के लिए मिसाल बन चुका था।

     

    लेकिन एक सुबह भौंरा दिखाई नहीं दिया।

     

    अनुसूइया ने पूरा बगीचा देख लिया।

     

    “भौंरा… कहां हो तुम?”

     

    वह पेड़ों के पास गई, फूलों के पास गई, लेकिन भौंरा कहीं नहीं था।

     

    दो दिन बीत गए।

     

    अनुसूइया उदास रहने लगी।

     

    तीसरे दिन सुबह वह उसी पुराने पौधे के पास गई, जिसे उसने कभी भौंरे के कहने पर पानी दिया था।

     

    वह पौधा अब बहुत बड़ा हो चुका था।

     

    उस पर अनगिनत फूल खिले थे।

     

    अचानक उसे वही परिचित गुनगुनाहट सुनाई दी।

     

    “गुं… गुं…”

     

    अनुसूइया ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    भौंरा उसके सामने मंडरा रहा था।

     

    उसकी आंखों में खुशी आ गई।

     

    “तुम आ गए!”

     

    भौंरा एक फूल पर बैठा और फिर उड़कर उसके कंधे के पास आ गया।

     

    अनुसूइया हंसते हुए बोली, “तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा सकते।”

     

    भौंरा जैसे उसकी बात समझ रहा हो, फिर उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगा।

     

    अनुसूइया ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “कभी-कभी भगवान हमारी जिंदगी में किसी इंसान के रूप में नहीं, बल्कि एक छोटी-सी निशानी के रूप में खुशी भेजते हैं।”

     

    उसके लिए वह भंवरा सिर्फ एक कीड़ा नहीं था।

     

    वह उसका छोटा-सा दोस्त था, जिसने उसे सिखाया था कि किसी चीज को छोटा समझकर उसकी अहमियत नहीं भूलनी चाहिए।

     

    उस दिन से अनुसूइया जब भी अपने बगीचे में आती, सबसे पहले उसकी नजर फूलों पर जाती और फिर वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “भौंरा, आज फिर कुछ नया सिखाने आए हो क्या?”

     

    और बगीचे में गूंजती उसकी प्यारी-सी गुनगुनाहट जैसे जवाब देती—

     

    “गुं… गुं…”

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  • सच की जीत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 3: सच की जीत

     

    अगली सुबह शौर्य बहुत जल्दी उठ गया। रातभर उसके दिमाग में वही संदेश घूमता रहा था—

     

    “अगर अपने पिता का सच जानना चाहते हो, तो कल सुबह पुराने पुल पर अकेले आना।”

     

    वह तैयार होकर चुपचाप घर से निकलने लगा।

     

    तभी पीछे से कबीर की आवाज आई, “इतनी सुबह कहां जा रहा है?”

     

    शौर्य पलटा।

     

    “तू यहां?”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था तू अकेला जाने की कोशिश करेगा।”

     

    शौर्य ने कहा, “मैसेज में साफ लिखा था कि अकेले आना है।”

     

    कबीर बोला, “और मैंने तय किया था कि इस बार तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    शौर्य ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन कबीर नहीं माना।

     

    दोनों पुराने पुल की तरफ चल पड़े।

     

    पुल के पास पहुंचकर शौर्य ने चारों तरफ देखा। वहां कोई नहीं था।

     

    “शायद जिसने मैसेज किया था, वो आया नहीं।”

     

    कबीर बोला, “या फिर हमें देख रहा है।”

     

    शौर्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डराने की जरूरत नहीं है।”

     

    “मैं डर नहीं रहा। बस तेरी नादानियों का अनुभव है।”

     

    दोनों कुछ देर इंतजार करते रहे।

     

    तभी पीछे से किसी ने आवाज लगाई।

     

    “शौर्य!”

     

    शौर्य पलटा।

     

    रघुवीर वहां खड़ा था।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी फाइल थी।

     

    शौर्य तुरंत उसके पास गया।

     

    “आपने मुझे यहां बुलाया था?”

     

    रघुवीर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    शौर्य ने पूछा, “कल आपने उस घर में मुझे वो चाबी क्यों दी थी?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि अब समय आ गया है कि तुम्हें पूरा सच पता चले।”

     

    कबीर ने पूछा, “आप इतने सालों से चुप क्यों थे?”

     

    रघुवीर कुछ पल शांत रहा।

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    शौर्य ने हैरानी से पूछा, “आप?”

     

    “हां। मैं भी उस समय तुम्हारे पिता के साथ था। लेकिन जब मुश्किल आई, तो मैंने उनका साथ छोड़ दिया।”

     

    रघुवीर ने फाइल शौर्य की तरफ बढ़ा दी।

     

    “इसमें सबूत हैं।”

     

    शौर्य ने फाइल खोली।

     

    अंदर कई पुराने कागज, रसीदें और कुछ तस्वीरें थीं।

     

    एक दस्तावेज पर उसके पिता के हस्ताक्षर थे।

     

    उसके पिता के नाम पर जिस रकम की हेराफेरी का आरोप लगाया गया था, वह रकम असल में किसी दूसरे खाते में भेजी गई थी।

     

    शौर्य की आंखें फैल गईं।

     

    “तो पापा ने पैसे नहीं चुराए थे?”

     

    “नहीं।”

     

    अनाया भी वहां पहुंच गई।

     

    “मेरे पिता भी निर्दोष थे?”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां। तुम्हारे पिता ने जब सच्चाई पता करने की कोशिश की, तो उन्हें धमकाया गया।”

     

    अनाया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “उन्होंने हमें कुछ क्यों नहीं बताया?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि उन्हें डर था कि सच की कीमत तुम्हारे परिवार को चुकानी पड़ेगी।”

     

    शौर्य ने फाइल के आखिरी पन्ने पर एक नाम देखा।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “ये… विक्रम?”

     

    रघुवीर ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    शौर्य को सब याद आने लगा।

     

    विक्रम उसके पिता का पुराना बिजनेस पार्टनर था। बचपन में वह कई बार उनके घर आता था। शौर्य उसे हमेशा अपने पिता का बहुत अच्छा दोस्त समझता था।

     

    “लेकिन वो तो हमारे परिवार के साथ हमेशा अच्छा रहा।”

     

    रघुवीर ने कहा, “यही तो उसकी सबसे बड़ी चाल थी।”

     

    उसी समय पीछे से ताली बजने की आवाज आई।

     

    ताली…

     

    ताली…

     

    तीनों ने पीछे देखा।

     

    विक्रम वहां खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    “बहुत अच्छा। आखिरकार तुम लोगों ने सच ढूंढ ही लिया।”

     

    शौर्य उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “आपने मेरे पापा को फंसाया।”

     

    विक्रम ने कहा, “तुम्हारे पिता बहुत भरोसा करते थे। और भरोसा करने वाले लोग अक्सर सबसे आसानी से धोखा खा जाते हैं।”

     

    शौर्य गुस्से में था, लेकिन उसने खुद को संभाला।

     

    “आपने अनाया के पिता की जिंदगी भी बर्बाद कर दी।”

     

    “मुझे अपना फायदा देखना था।”

     

    कबीर ने गुस्से से कहा, “आपको शर्म नहीं आती?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “शर्म से पैसा नहीं मिलता।”

     

    शौर्य ने फाइल उठाकर कहा, “लेकिन अब आपका सच सबके सामने आएगा।”

     

    विक्रम ने कहा, “तुम्हारे पास सबूत हैं, लेकिन क्या तुम साबित कर पाओगे?”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “इस बार मैंने नादानी नहीं की।”

     

    रघुवीर ने अपने फोन में रिकॉर्डिंग दिखाई।

     

    उसने विक्रम की पूरी बात रिकॉर्ड कर ली थी।

     

    विक्रम का चेहरा उतर गया।

     

    “तुमने ये सब रिकॉर्ड किया?”

     

    रघुवीर बोला, “हां। इतने साल डरने के बाद अब सच बोलने की हिम्मत आ गई है।”

     

    विक्रम पीछे हटने लगा।

     

    लेकिन शौर्य ने कहा, “अब भागने का कोई रास्ता नहीं है।”

     

    कुछ ही समय बाद पूरा मामला जांच के सामने पहुंचा।

     

    पुराने दस्तावेज और रिकॉर्डिंग ने सारी सच्चाई सामने ला दी।

     

    विक्रम के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई।

     

    शौर्य के पिता पर लगे सारे पुराने आरोप भी झूठे साबित हुए।

     

    जब शौर्य घर पहुंचा और अपनी मां को पूरी बात बताई, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम्हारे पापा आज होते तो तुम पर गर्व करते।”

     

    शौर्य ने मां को गले लगा लिया।

     

    “मां, मैंने बस उनका नाम साफ किया है।”

     

    मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू बदल गया है शौर्य।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “इतना भी नहीं।”

     

    तभी रिया बाहर से चिल्लाई—

     

    “मां! भैया ने फिर से रसोई में दूध गिरा दिया!”

     

    शौर्य ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कबीर जोर से हंसने लगा।

     

    “देखा? मैंने कहा था, नादानियां खत्म नहीं हुईं।”

     

    शौर्य ने कहा, “वो गलती से हुआ था।”

     

    रिया बोली, “भैया की हर गलती गलती से ही होती है।”

     

    पूरा घर हंसी से भर गया।

     

    कुछ दिनों बाद अनाया ने पुराने घर को दोबारा ठीक करवाने का फैसला किया।

     

    वह घर अब डरावना नहीं लगता था।

     

    वहीं एक छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू की गई, जहां आसपास के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाया जाने लगा।

     

    शौर्य भी रोज वहां मदद करने जाता।

     

    एक दिन अनाया ने उससे कहा, “अगर तुम उस दिन मेरी मदद करने नहीं आते, तो शायद मुझे अपने पिता का सच कभी नहीं पता चलता।”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो बस रास्ता दिखाने आया था।”

     

    अनाया बोली, “तुम हमेशा ऐसे ही कहते हो। पहले फूलदान तोड़ते हो, फिर साइकिल ठीक करते हो और आखिर में लोगों की जिंदगी का राज खोज निकालते हो।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “क्या करूं? मेरी नादानियां ही ऐसी हैं।”

     

    कबीर पास खड़ा सुन रहा था।

     

    उसने कहा, “एक बात माननी पड़ेगी। तेरी नादानियों ने इस बार बहुत अच्छा काम किया।”

     

    शौर्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अब मैं पहले जैसा नहीं रहूंगा।”

     

    कबीर ने पूछा, “मतलब?”

     

    “अब कोई भी काम करने से पहले दो बार सोचूंगा।”

     

    उसी वक्त रिया वहां पहुंची।

     

    “भैया, मां ने कहा है कि घर जाते समय सब्जियां लेते आना।”

     

    शौर्य बोला, “ठीक है।”

     

    रिया ने कहा, “और इस बार पैसे मत खो देना।”

     

    कबीर हंसने लगा।

     

    शौर्य ने झुंझलाकर कहा, “एक बार पैसे गिरे थे बस!”

     

    रिया बोली, “तीन बार।”

     

    शौर्य चुप हो गया।

     

    अनाया और कबीर दोनों हंस पड़े।

     

    शौर्य ने आसमान की तरफ देखा।

     

    उसकी जिंदगी में बहुत कुछ बदल चुका था।

     

    पहले वह अपनी नादानियों को सिर्फ अपनी कमजोरी समझता था। लेकिन अब उसे पता था कि गलती करना बुरा नहीं, गलती से सीखना जरूरी है।

     

    उसकी जल्दबाजी ने उसे कई बार मुसीबत में डाला था, लेकिन उसी ने उसे अनाया से मिलाया, पुराने राज तक पहुंचाया और उसके पिता का नाम साफ करने का मौका दिया।

     

    अब शौर्य पहले जैसा लापरवाह नहीं था।

     

    वह जिम्मेदारी समझने लगा था।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान और उसकी मासूम नादानियां अब भी उसके साथ थीं।

     

    शाम को घर लौटते समय उसने रास्ते में एक छोटे बच्चे को गिरा हुआ देखा।

     

    वह तुरंत उसकी मदद करने दौड़ा।

     

    कबीर ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    • “शौर्य! पहले देख लेना कि इस बार किसी मुसीबत में तो नहीं कूद रहा!”

     

    शौर्य हंसते हुए बोला—

     

    “मुसीबत हो या मदद… अगर किसी को मेरी जरूरत होगी, तो मैं जरूर जाऊंगा।”

     

    और वह बच्चे को उठाकर उसके घर की तरफ चल पड़ा।

     

    शौर्य की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई थी।

     

    क्योंकि उसकी नादानियां अभी बाकी थीं…

     

    समाप्त।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बंद कमरे का राज

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 2: बंद कमरे का राज

     

    अंदर से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनकर शौर्य कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर कहा, “भाई… अंदर कोई है।”

     

    शौर्य ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “मुझे भी यही लग रहा है।”

     

    अनाया ने उसका हाथ रोकते हुए कहा, “दरवाजा मत खोलो।”

     

    शौर्य बोला, “लेकिन अगर अंदर कोई फंसा हुआ है तो?”

     

    कबीर ने माथा पीट लिया।

     

    “तू सुधरने वाला नहीं है।”

     

    शौर्य ने धीरे से दरवाजा खोल दिया।

     

    दरवाजा खुलते ही तीनों की नजर कमरे के अंदर गई।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    अंदर पुरानी अलमारी, एक मेज और कुछ लकड़ी के बक्से रखे थे। खिड़की आधी खुली हुई थी और हवा के कारण पर्दा हिल रहा था।

     

    कबीर ने तुरंत कहा, “मैंने कहा था ना, यहां कुछ गड़बड़ है।”

     

    शौर्य खिड़की के पास गया।

     

    “शायद हवा से कोई चीज हिली होगी।”

     

    कबीर बोला, “और दरवाजा किसने खटखटाया?”

     

    शौर्य ने मजाक करते हुए कहा, “शायद इस घर का चौकीदार भूत होगा।”

     

    “भाई!”

     

    अनाया ने दोनों को चुप कराया।

     

    “मजाक बंद करो। हमें यहां कुछ ढूंढना है।”

     

    वह धीरे-धीरे कमरे में आगे बढ़ी। तभी उसकी नजर मेज पर रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी।

     

    डायरी के ऊपर उसके पिता का नाम लिखा था।

     

    अनाया ने डायरी उठा ली।

     

    उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    शौर्य उसके पास आकर बोला, “खोलो।”

     

    अनाया ने पहला पन्ना खोला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर यह डायरी मेरी बेटी के हाथ लगे, तो उसे सच जरूर बताना।”

     

    अनाया की आंखें भर आईं।

     

    “ये मेरे पापा की लिखावट है।”

     

    शौर्य चुपचाप उसके पास खड़ा रहा।

     

    डायरी के अगले पन्नों में कई साल पुरानी बातें लिखी थीं। उसके पिता और शौर्य के पिता बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों ने मिलकर एक छोटा कारोबार शुरू किया था। शुरुआत में सब ठीक चल रहा था, लेकिन कुछ साल बाद अचानक कारोबार में बड़ा नुकसान हो गया।

     

    सारा दोष दोनों दोस्तों पर लगाया गया।

     

    अनाया के पिता ने खुद को दोषी समझ लिया और परिवार से दूर चले गए।

     

    लेकिन डायरी में आगे लिखा था कि उन्हें बाद में पता चला था कि कारोबार में असली गड़बड़ी किसी तीसरे आदमी ने की थी।

     

    अनाया ने पन्ना पलटा।

     

    एक जगह लिखा था—

     

    “गलती मेरी नहीं थी। असली धोखा उस आदमी ने दिया था जिस पर हमने सबसे ज्यादा भरोसा किया।”

     

    शौर्य ने पूछा, “कौन आदमी?”

     

    डायरी में नाम नहीं था।

     

    अनाया ने अगले पन्ने पलटे, लेकिन कई पन्ने फाड़े हुए थे।

     

    शौर्य बोला, “किसी ने जानबूझकर ये पन्ने निकाले हैं।”

     

    तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीनों चुप हो गए।

     

    कबीर ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “कोई बाहर है।”

     

    शौर्य ने इशारे से उसे शांत रहने को कहा।

     

    वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया और बाहर झांका।

     

    गलियारा खाली था।

     

    शौर्य वापस कमरे में आया।

     

    “कोई नहीं है।”

     

    कबीर बोला, “अभी मैंने साफ कदमों की आवाज सुनी थी।”

     

    अनाया ने डायरी बंद करते हुए कहा, “हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

     

    शौर्य ने कहा, “पहले देखते हैं कि इस कमरे में और क्या है।”

     

    वह पुराने बक्से खोलने लगा।

     

    पहले बक्से में पुराने कपड़े थे।

     

    दूसरे में कुछ तस्वीरें।

     

    तीसरे बक्से में एक लिफाफा था।

     

    शौर्य ने लिफाफा उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “शौर्य के पिता के लिए।”

     

    शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पुराना कागज था।

     

    उसमें लिखा था कि अगर कभी सच्चाई सामने लानी पड़े तो कुछ खास दस्तावेज एक पुराने पुल के पास छिपाए गए हैं।

     

    कबीर ने पूछा, “पुराना पुल?”

     

    शौर्य ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    तभी नीचे से अचानक किसी ने आवाज लगाई।

     

    “शौर्य!”

     

    शौर्य चौंक गया।

     

    “ये मां की आवाज है।”

     

    वह जल्दी से नीचे भागा।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर उसकी मां नहीं थीं।

     

    बल्कि एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।

     

    उसने शौर्य को देखते ही कहा, “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

     

    शौर्य ने पूछा, “आप कौन हैं?”

     

    आदमी ने अपना नाम रघुवीर बताया।

     

    “मैं तुम्हारे पिता का पुराना दोस्त हूं।”

     

    शौर्य ने तुरंत पूछा, “आप मेरे पापा को जानते थे?”

     

    रघुवीर ने नजरें झुका लीं।

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    अनाया भी नीचे आ गई।

     

    रघुवीर उसे देखते ही चौंक गया।

     

    “तुम…?”

     

    अनाया ने कहा, “मैं अपने पिता का सच जानने आई हूं।”

     

    रघुवीर कुछ देर तक चुप रहा।

     

    उसके चेहरे से लग रहा था कि वह कुछ ऐसा जानता है जो इतने सालों से किसी से छिपा रहा था।

     

    आखिर उसने धीमी आवाज में कहा, “तुम्हारे पिता बुरे आदमी नहीं थे।”

     

    “फिर उन्होंने घर क्यों छोड़ा?”

     

    रघुवीर ने लंबी सांस ली।

     

    “क्योंकि उन्हें फंसाया गया था।”

     

    शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “किसने?”

     

    रघुवीर ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

     

    उसने पहले कमरे की तरफ देखा, फिर खिड़की के बाहर।

     

    “यह बात यहां नहीं होनी चाहिए।”

     

    शौर्य ने पूछा, “क्यों?”

     

    रघुवीर बोला, “क्योंकि जिस आदमी ने तुम्हारे परिवार को तोड़ा था, उसे पता चल चुका है कि तुम इस घर में आए हो।”

     

    कबीर घबरा गया।

     

    “लेकिन उसे कैसे पता चला?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि इस घर पर इतने सालों से नजर रखी जा रही है।”

     

    शौर्य ने हैरानी से पूछा, “किसकी?”

     

    रघुवीर कुछ बोलता, उससे पहले बाहर एक गाड़ी आकर रुकी।

     

    रघुवीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसका चेहरा अचानक घबरा गया।

     

    “तुम दोनों को यहां से जाना होगा।”

     

    शौर्य ने मना कर दिया।

     

    “नहीं। इस बार मैं भागूंगा नहीं।”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता भी यही कहते थे।”

     

    शौर्य चुप हो गया।

     

    रघुवीर ने जेब से एक छोटी सी चाबी निकाली और शौर्य को देते हुए कहा, “इसे संभालकर रखना। इसमें तुम्हारे पिता के सच तक पहुंचने का रास्ता है।”

     

    शौर्य ने चाबी को देखा।

     

    “ये किसकी है?”

     

    रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

     

    ठक… ठक…

     

    रघुवीर फुसफुसाया, “पीछे के रास्ते से निकलो।”

     

    शौर्य ने पूछा, “और आप?”

     

    “मैं संभाल लूंगा।”

     

    शौर्य जाना नहीं चाहता था, लेकिन रघुवीर ने उसे धक्का देकर पीछे वाले रास्ते की तरफ भेज दिया।

     

    तीनों किसी तरह घर से बाहर निकल गए।

     

    कुछ दूर जाकर शौर्य ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    पुराना घर बिल्कुल शांत खड़ा था।

     

    लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि कोई खिड़की से उन्हें देख रहा है।

     

    रात को शौर्य घर लौटा तो उसकी मां दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    “कहां था?”

     

    शौर्य ने पहली बार अपनी मां से सब कुछ पूछने की ठानी।

     

    “मां, पापा और अनाया के पिता के बीच क्या हुआ था?”

     

    मां का चेहरा उतर गया।

     

    कुछ देर तक वह चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “तुम्हारे पापा ने हमेशा कहा था कि उस मामले को दोबारा मत छेड़ना।”

     

    “क्यों?”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा को डर था कि अगर सच बाहर आया, तो तुम्हारी जान खतरे में पड़ सकती है।”

     

    शौर्य सन्न रह गया।

     

    “मां, क्या आपको पता है कि असली गुनहगार कौन था?”

     

    मां ने कुछ पल उसे देखा।

     

    फिर बोलीं, “नाम तो नहीं बता सकती… लेकिन एक आदमी था जिस पर तुम्हारे पापा आंख बंद करके भरोसा करते थे।”

     

    शौर्य को तुरंत रघुवीर की बात याद आई।

     

    उसने पूछा, “क्या वो आदमी अब भी हमारे आसपास है?”

     

    मां ने जवाब देने के बजाय कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “शौर्य, अब इस मामले से दूर रहो।”

     

    शौर्य ने कहा, “मां, मैं अब पीछे नहीं हट सकता।”

     

    उसी रात उसके फोन पर एक संदेश आया।

     

    “अगर अपने पिता का सच जानना चाहते हो, तो कल सुबह पुराने पुल पर अकेले आना।”

     

    शौर्य ने संदेश पढ़ा।

     

    कबीर ने पूछा, “किसका मैसेज है?”

     

    शौर्य ने फोन बंद कर दिया।

     

    “पता नहीं।”

     

    लेकिन उसके चेहरे से साफ था कि वह जानता था—ये उसी राज से जुड़ा था।

     

    उसने खिड़की से बाहर देखा और मन ही मन कहा—

     

    “अब चाहे कुछ भी हो जाए, मैं पापा का नाम साफ करके रहूंगा।”

     

    उसे नहीं पता था कि अगले दिन पुराने पुल पर उसका सामना उस इंसान से होने वाला था, जिसका नाम उसकी पूरी जिंदगी बदल देने वाला था।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • महादेव का रूद्र अवतार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जब कैलाश पर गूंजा रुद्र का डमरू

     

    हिमालय की ऊंची चोटियों पर उस दिन सब कुछ शांत था। कैलाश पर बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी। भगवान शिव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती उनके पास बैठी थीं। नंदी कुछ दूर शांत भाव से पहरा दे रहे थे।

     

    लेकिन अचानक…

     

    डम… डम… डम…

     

    महादेव का डमरू अपने आप बज उठा।

     

    माता पार्वती ने चौंककर महादेव की ओर देखा।

     

    “स्वामी… आपने डमरू बजाया?”

     

    महादेव ने धीरे से आंखें खोलीं।

     

    “नहीं देवी।”

     

    पार्वती जी के चेहरे पर चिंता आ गई।

     

    “फिर यह अपने आप कैसे बज रहा है?”

     

    महादेव कुछ पल शांत रहे। उनकी आंखों में अचानक गंभीरता उतर आई।

     

    “कहीं न कहीं धरती पर अधर्म अपनी सीमा पार कर चुका है।”

     

    नंदी ने भी सिर उठाकर कैलाश की ओर देखा।

     

    उसी समय आकाश में काले बादल घिरने लगे। बर्फीली हवा अचानक तेज हो गई। कैलाश के आसपास घूमने वाले पक्षी घबराकर दूर उड़ गए।

     

    महादेव ने अपनी आंखें बंद कीं और ध्यान लगाया।

     

    उन्हें एक छोटा-सा गांव दिखाई दिया।

     

    गांव का नाम था देवगिरि।

     

    वहां लोग बहुत परेशान थे। गांव के पास रहने वाला एक शक्तिशाली राजा, वज्रसेन, आसपास के गांवों पर जबरन कर लगाता था। जो गरीब किसान कर नहीं दे पाते, उनसे उनकी जमीन छीन ली जाती।

     

    लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि वज्रसेन को भगवान शिव के मंदिर से नफरत थी।

     

    गांव के बीचोंबीच एक बहुत पुराना शिव मंदिर था। वहां रहने वाले बूढ़े पुजारी हरिदास रोज सुबह शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे।

     

    वज्रसेन कई बार उन्हें मंदिर बंद करने की धमकी दे चुका था।

     

    एक दिन वह अपने सैनिकों के साथ मंदिर पहुंचा।

     

    “पुजारी!” उसने गुस्से में कहा, “मैंने कहा था यह मंदिर बंद कर दो।”

     

    हरिदास ने शांत स्वर में कहा, “राजन, मंदिर किसी राजा का नहीं होता। यह भोलेनाथ का घर है।”

     

    वज्रसेन हंस पड़ा।

     

    “भोलेनाथ? अगर तुम्हारा शिव सच में है, तो उसे बुलाओ।”

     

    हरिदास ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “महादेव को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती राजन। सच्ची पुकार उन तक खुद पहुंच जाती है।”

     

    वज्रसेन ने गुस्से में मंदिर का दीपक बुझा दिया।

     

    “आज से यहां पूजा बंद!”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    उस रात पूरा गांव डरा हुआ था।

     

    लेकिन हरिदास मंदिर में अकेले बैठे रहे। उन्होंने शिवलिंग के सामने दीपक जलाया और आंखों में आंसू लेकर बोले,

     

    “भोलेनाथ… मैं आपसे अपने लिए कुछ नहीं मांगता। बस इस गांव के लोगों की रक्षा कर लेना।”

     

    पास ही एक छोटा बच्चा बैठा था। उसका नाम था गोपाल।

     

    गोपाल ने पूछा, “बाबा, क्या महादेव हमारी मदद करेंगे?”

     

    हरिदास मुस्कुराए।

     

    “बेटा, जब भक्त सच्चे मन से पुकारता है, तो महादेव देर कर सकते हैं… लेकिन अंधेर नहीं करते।”

     

    उधर कैलाश पर अचानक फिर डमरू बजा।

     

    डम… डम… डम…

     

    इस बार उसकी आवाज पहले से ज्यादा तेज थी।

     

    माता पार्वती ने महादेव को देखा।

     

    “स्वामी, क्या समय आ गया है?”

     

    महादेव ने धीरे से कहा,

     

    “अभी नहीं देवी… लेकिन बहुत जल्द।”

     

    अगली सुबह वज्रसेन ने गांव वालों को अपने महल में बुलाया।

     

    उसने घोषणा की,

     

    “आज से इस गांव की सारी जमीन मेरी होगी। जो मेरा आदेश नहीं मानेगा, उसे गांव छोड़ना पड़ेगा।”

     

    लोग डर गए।

     

    गोपाल आगे बढ़ा।

     

    “राजा जी, ये जमीन हमारे खेत हैं। इन्हें हमसे मत छीनिए।”

     

    वज्रसेन ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तू मुझे सिखाएगा?”

     

    हरिदास तुरंत गोपाल के आगे आ गए।

     

    “राजन, बच्चा है। इसे छोड़ दीजिए।”

     

    वज्रसेन ने सैनिकों को आदेश दिया,

     

    “कल सुबह मंदिर भी गिरा देना।”

     

    यह सुनते ही गांव में सन्नाटा छा गया।

     

    हरिदास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    रात होते ही पूरा गांव मंदिर में इकट्ठा हुआ।

     

    हरिदास ने शिवलिंग के सामने बैठकर कहा,

     

    “हे महादेव, आज आपकी परीक्षा नहीं है। आज हमारी भक्ति की परीक्षा है। अगर हमने कभी सच्चे मन से आपका नाम लिया है, तो आज अपने भक्तों की लाज रख लेना।”

     

    सबने एक साथ आवाज लगाई—

     

    “हर हर महादेव!”

     

    तभी मंदिर के अंदर रखा दीपक अचानक बहुत तेज जलने लगा।

     

    शिवलिंग पर चढ़ा जल अपने आप कांपने लगा।

     

    और उसी क्षण…

     

    दूर कैलाश पर महादेव खड़े हो गए।

     

    उनके चेहरे पर अब वह शांत मुस्कान नहीं थी।

     

    उनकी आंखों में अग्नि जैसी चमक थी।

     

    माता पार्वती ने उन्हें देखा।

     

    “स्वामी…”

     

    महादेव ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने अपना डमरू उठाया।

     

    डम!

     

    एक ही आवाज से कैलाश की चोटियां गूंज उठीं।

     

    डम! डम! डम!

     

    आकाश में बिजली चमकने लगी।

     

    महादेव के शरीर से एक दिव्य तेज निकलने लगा। उनकी जटाएं खुल गईं। उनके मस्तक पर तीसरा नेत्र चमक उठा।

     

    यह भोलेनाथ का शांत रूप नहीं था।

     

    यह था—

     

    रुद्र।

     

    देवगिरि गांव में अचानक तेज हवा चलने लगी।

     

    वज्रसेन अपने महल में बैठा था। तभी उसके सामने रखा दीपक अपने आप बुझ गया।

     

    उसने सैनिकों को बुलाया।

     

    “कौन है बाहर?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर उसे दूर से डमरू की आवाज सुनाई दी।

     

    डम… डम… डम…

     

    वज्रसेन घबरा गया।

     

    “यह आवाज… यहां कैसे?”

     

    अचानक महल के दरवाजे खुल गए।

     

    सामने एक विशाल तेजस्वी साधु खड़ा था।

     

    शरीर पर भस्म, जटाएं खुली हुईं और आंखों में ऐसा तेज कि वज्रसेन की आवाज तक कांपने लगी।

     

    साधु ने कहा,

     

    “वज्रसेन।”

     

    राजा पीछे हट गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    साधु ने शांत लेकिन भारी आवाज में कहा,

     

    “जिसे तूने बार-बार पुकारा था।”

     

    वज्रसेन को मंदिर की अपनी बात याद आ गई।

     

    “नहीं… यह नहीं हो सकता।”

     

    साधु आगे बढ़े।

     

    “तूने शक्ति को अपना अधिकार समझ लिया। तूने गरीबों से उनकी जमीन छीनी। भक्तों को डराया। मंदिर का दीपक बुझाया।”

     

    वज्रसेन कांपने लगा।

     

    “मुझे क्षमा कर दो!”

     

    साधु की आंखों में अग्नि और तेज हो गया।

     

    “क्षमा मांगने से पहले अपने कर्मों का भार समझ।”

     

    तभी आकाश में जोरदार गर्जना हुई।

     

    साधु का स्वर गूंजा—

     

    “मैं रुद्र हूं!”

     

    पूरा महल कांप उठा।

     

    वज्रसेन घुटनों के बल गिर गया।

     

    रुद्र ने अपनी दृष्टि उठाई।

     

    “शक्ति का अर्थ दूसरों को डराना नहीं होता। शक्ति का अर्थ कमजोर की रक्षा करना होता है।”

     

    वज्रसेन ने सिर झुका दिया।

     

    “मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है।”

     

    “तो उसका प्रायश्चित भी बड़ा होगा।”

     

    रुद्र ने आदेश दिया कि जिन लोगों की जमीन छीनी गई है, वह उन्हें वापस की जाए। मंदिर को पहले से भी बड़ा बनाया जाए और गरीबों से लिया गया धन लौटा दिया जाए।

     

    वज्रसेन ने सब कुछ स्वीकार कर लिया।

     

    सुबह गांव वालों ने देखा कि मंदिर के सामने वही साधु खड़े हैं।

     

    गोपाल दौड़कर उनके पास गया।

     

    “बाबा, आप कौन हैं?”

     

    साधु मुस्कुराए।

     

    “जिसे तुम रातभर बुला रहे थे।”

     

    गोपाल ने उनके पैरों को छूना चाहा।

     

    लेकिन अगले ही पल वहां कोई नहीं था।

     

    सिर्फ मंदिर के सामने एक छोटा-सा डमरू पड़ा था।

     

    हरिदास ने उसे उठाया और उनकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उन्होंने आकाश की ओर देखकर कहा,

     

    “भोलेनाथ… आपने फिर अपने भक्तों की लाज रख ली।”

     

    उसी समय दूर कैलाश पर महादेव फिर अपने शांत स्वरूप में बैठे थे।

     

    माता पार्वती मुस्कुराईं।

     

    “स्वामी, आपका क्रोध भी अंत में किसी की रक्षा ही करता है।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “देवी, रुद्र का क्रोध विनाश के लिए नहीं… अधर्म के अंत के लिए होता है।”

     

    नंदी ने प्रसन्न होकर सिर झुका दिया।

     

    और उसी क्षण कैलाश की चोटियों पर एक बार फिर डमरू की मधुर आवाज गूंजी—

     

    डम… डम… डम…

     

    जैसे स्वयं कैलाश कह रहा हो—

     

    जहां सच्ची भक्ति होगी, वहां महादेव की कृपा जरूर होगी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • शौर्य की नादानियां

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 1: एक नादान लड़का

     

    शहर के किनारे बने एक बड़े से पुराने बंगले में शौर्य अपनी मां और छोटी बहन के साथ रहता था। उम्र उसकी करीब बाईस साल थी, लेकिन हरकतें ऐसी कि घर में कोई उसे गंभीरता से लेता ही नहीं था।

     

    शौर्य दिल का बहुत अच्छा था, बस उसकी एक आदत खराब थी—वह बिना सोचे कोई भी काम कर देता था।

     

    कभी किसी की मदद करने के चक्कर में खुद मुसीबत में फंस जाता, तो कभी दोस्तों के साथ मजाक करते-करते घर में हंगामा खड़ा कर देता।

     

    उस सुबह भी उसकी मां रसोई में नाश्ता बना रही थीं।

     

    “शौर्य! उठ गया क्या?” मां ने आवाज लगाई।

     

    अंदर से आवाज आई, “हां मां!”

     

    मां ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल ऊपर से जोरदार आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    “शौर्य!”

     

    मां दौड़कर सीढ़ियों के पास पहुंचीं। शौर्य नीचे खड़ा था और उसके हाथ में टूटा हुआ फूलदान था।

     

    “ये कैसे टूटा?”

     

    शौर्य ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा, “मां, मैंने नहीं तोड़ा।”

     

    “तो फिर?”

     

    “वो खुद गिर गया।”

     

    तभी उसकी छोटी बहन रिया पीछे से बोली, “मां, भैया ने गेंद से निशाना लगाया था।”

     

    शौर्य ने रिया को घूरकर देखा।

     

    “तुम मेरी बहन हो या पड़ोसियों की गवाह?”

     

    रिया हंसने लगी।

     

    मां ने माथा पकड़ लिया।

     

    “तुम दोनों मुझे एक दिन पागल कर दोगे।”

     

    नाश्ते के बाद शौर्य अपने दोस्त कबीर से मिलने निकल गया। रास्ते में उसे एक बुजुर्ग आदमी सड़क किनारे परेशान खड़ा दिखाई दिया।

     

    “बाबा, क्या हुआ?”

     

    बुजुर्ग बोले, “बेटा, मेरी साइकिल की चेन उतर गई है।”

     

    शौर्य तुरंत नीचे बैठ गया।

     

    “अरे इसमें क्या है? मैं ठीक कर देता हूं।”

     

    कबीर बोला, “तू रहने दे। पिछली बार तूने मेरी साइकिल ठीक की थी और उसके बाद वो उल्टी दिशा में चलने लगी थी।”

     

    “चुप कर।”

     

    शौर्य ने बड़ी मेहनत से चेन ठीक की।

     

    बुजुर्ग ने साइकिल चलाई और मुस्कुराते हुए बोले, “बिल्कुल ठीक हो गई।”

     

    शौर्य गर्व से मुस्कुराया।

     

    कबीर ने धीरे से कहा, “आज तो बच गया।”

     

    शौर्य ने उसे कोहनी मारी।

     

    दोनों आगे बढ़े ही थे कि शौर्य की नजर सड़क के दूसरी तरफ खड़ी एक लड़की पर पड़ी। लड़की अपने हाथ में कुछ कागज लिए परेशान दिखाई दे रही थी।

     

    “वो शायद किसी को ढूंढ रही है।”

     

    कबीर बोला, “तुझे हर जगह किसी की मदद करने की पड़ी रहती है।”

     

    “तो?”

     

    “तो एक दिन किसी मुसीबत में फंस जाएगा।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “मेरी जिंदगी में मुसीबत खुद चलकर आती है।”

     

    वह लड़की के पास पहुंचा।

     

    “आपको किसी मदद की जरूरत है?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जी… मेरा नाम अनाया है। मुझे इस इलाके में एक घर ढूंढना है, लेकिन पता समझ नहीं आ रहा।”

     

    शौर्य ने कागज देखा।

     

    “ये तो मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं है।”

     

    “सच?”

     

    “हां। चलिए, मैं रास्ता बता देता हूं।”

     

    कबीर पीछे से बोला, “अब तू गाइड भी बनेगा?”

     

    शौर्य ने अनदेखा कर दिया।

     

    रास्ते में अनाया ने बताया कि वह अपने पिता के पुराने दोस्त से मिलने आई थी। उसके पिता कुछ साल पहले गुजर चुके थे और उनके जाने के बाद अनाया को एक पुरानी चिट्ठी मिली थी।

     

    उस चिट्ठी में इसी इलाके के एक पुराने घर का जिक्र था।

     

    शौर्य अचानक गंभीर हो गया।

     

    “कौन सा घर?”

     

    अनाया ने पता दिखाया।

     

    शौर्य का चेहरा बदल गया।

     

    “ये घर…?”

     

    “हां। जानते हो?”

     

    शौर्य कुछ पल चुप रहा।

     

    “वो घर कई सालों से बंद है।”

     

    अनाया ने हैरानी से पूछा, “क्यों?”

     

    “पता नहीं। बचपन से उसे बंद ही देखा है।”

     

    कबीर बोला, “चल वापस चलते हैं।”

     

    लेकिन अनाया की आंखों में सवाल थे।

     

    शौर्य ने कहा, “मैं तुम्हें वहां तक छोड़ देता हूं।”

     

    पुराने घर के सामने पहुंचकर तीनों रुक गए।

     

    बड़ा लोहे का दरवाजा जंग लगा हुआ था। अंदर पेड़ों की सूखी डालियां दिखाई दे रही थीं।

     

    अनाया ने अपनी जेब से वही पुरानी चिट्ठी निकाली।

     

    “यही जगह है।”

     

    शौर्य ने दरवाजा धकेला।

     

    किर्रर्र…

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    कबीर ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “भाई, नादानी मत कर।”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “डर गया?”

     

    “हां।”

     

    “मैं हूं ना।”

     

    तीनों अंदर चले गए।

     

    घर के अंदर धूल जमी थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। अचानक अनाया की नजर एक तस्वीर पर पड़ी।

     

    वह वहीं रुक गई।

     

    “ये… मेरे पिता हैं।”

     

    शौर्य और कबीर दोनों उसकी तरफ देखने लगे।

     

    तस्वीर में अनाया के पिता एक आदमी के साथ खड़े थे।

     

    शौर्य ने तस्वीर में दूसरे आदमी को देखा और चौंक गया।

     

    “इन्हें मैं जानता हूं।”

     

    “कौन हैं?”

     

    शौर्य ने धीरे से कहा, “मेरे पापा।”

     

    अनाया के चेहरे पर हैरानी फैल गई।

     

    “क्या?”

     

    शौर्य भी समझ नहीं पा रहा था कि उसके पिता और अनाया के पिता का इस घर से क्या रिश्ता था।

     

    तभी ऊपर के कमरे से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर बोला, “अब मैं सच में जा रहा हूं।”

     

    शौर्य ने कहा, “रुक।”

     

    तीनों सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    ऊपर एक कमरा बंद था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था जो अनाया की चिट्ठी के पीछे बना हुआ था।

     

    अनाया ने कांपते हाथों से चिट्ठी पलटी।

     

    उसके पीछे लिखा था—

     

    “सच जानना हो तो उस कमरे का दरवाजा खोलना।”

     

    शौर्य ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    उसकी नादानियां उसे यहां तक तो ले आई थीं।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि यह नादानी उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा राज खोलने वाली थी।

     

    और जैसे ही शौर्य ने दरवाजे की कुंडी पकड़ी…

     

    अंदर से किसी ने धीरे से दरवाजा खटखटाया।

     

    तीनों के चेहरे पर डर छा गया।

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    Auther preeti Sharma

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  • शरारती सफेद बछड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और शरारती सफेद बछड़ा

     

    अगली सुबह नंद भवन में सूरज की पहली किरण पड़ते ही कान्हा उठ गए। उन्हें रात से ही उस नन्हे सफेद बछड़े की चिंता थी, जो कल पहली बार उनके पास आया था।

     

    कान्हा आँगन में दौड़ते हुए पहुँचे।

     

    “छोटू!”

     

    छोटू ने तुरंत घंटी बजाई।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    फिर उनकी नजर सफेद बछड़े पर गई।

     

    वह थोड़ी दूर खड़ा था और बड़ी-बड़ी आँखों से कान्हा को देख रहा था।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “तुम्हारा नाम क्या रखें?”

     

    बछड़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम बहुत सफेद हो।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसका नाम गोरा रख दो।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “नहीं, चाँद रखो।”

     

    कान्हा ने कुछ देर सोचा।

     

    फिर बोले—

     

    “इसका नाम चंदू होगा।”

     

    सभी दोस्तों को नाम पसंद आ गया।

     

    कान्हा ने चंदू को पुकारा—

     

    “चंदू!”

     

    बछड़ा कान खड़े करके उनकी तरफ देखने लगा।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “इसे अपना नाम पसंद आ गया!”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    सुबह का समय था। नंद भवन में यशोदा मैया रसोई में काम कर रही थीं। उन्होंने बड़े बर्तन में आटा रखा और रोटियाँ बनाने लगीं।

     

    कान्हा कुछ देर तक चंदू और छोटू के साथ खेलते रहे।

     

    लेकिन चंदू बाकी बछड़ों से अलग था।

     

    वह हर चीज को सूँघता, फिर उसे छूने की कोशिश करता।

     

    कभी वह लकड़ी के दरवाजे को नाक से धक्का देता, कभी रस्सी खींचता।

     

    कान्हा उसे देखकर हँसते रहे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, ये तो तुमसे भी ज्यादा शरारती है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं, ये तो बहुत सीधा है।”

     

    उसी समय चंदू एक रस्सी के पास गया और उसे खींचने लगा।

     

    रस्सी से बंधी छोटी टोकरी नीचे गिर गई।

     

    धड़ाम!

     

    कान्हा चौंक गए।

     

    फिर हँस पड़े।

     

    “चंदू!”

     

    चंदू पीछे हट गया।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “ऐसा नहीं करते।”

     

    चंदू ने कान हिलाए।

     

    कान्हा बोले—

     

    “समझ गए?”

     

    चंदू फिर रस्सी सूँघने लगा।

     

    कान्हा ने सिर पकड़ लिया।

     

    “तुम तो मेरी बात सुनते ही नहीं।”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    उधर यशोदा मैया रसोई में आटा गूँध रही थीं।

     

    उन्होंने बच्चों की हँसी सुनी तो बाहर देखा।

     

    “कान्हा, अंदर मत आना। मैं काम कर रही हूँ।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं अंदर नहीं आऊँगा।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “और चंदू को भी अंदर मत आने देना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    लेकिन जैसे ही यशोदा अंदर गईं, चंदू उनकी ओर देखने लगा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चंदू, उधर नहीं जाना।”

     

    चंदू ने दो कदम पीछे किए।

     

    फिर अचानक मुड़ा और रसोई की तरफ चल पड़ा।

     

    कान्हा उसके पीछे भागे।

     

    “अरे! रुको!”

     

    चंदू रसोई के दरवाजे तक पहुँच गया।

     

    कान्हा ने उसे रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन चंदू बहुत तेज था।

     

    वह सीधे अंदर चला गया।

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “अरे!”

     

    चंदू आटे के पास पहुँच चुका था।

     

    उसने अपना मुँह आटे वाले बर्तन के पास किया।

     

    कान्हा चिल्लाए—

     

    “चंदू! नहीं!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    चंदू ने बर्तन को हल्का सा धक्का दिया।

     

    बर्तन हिल गया और थोड़ा आटा नीचे गिर गया।

     

    यशोदा ने जल्दी से बर्तन पकड़ लिया।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “मैया, मैंने इसे रोका था।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन ये अंदर आया कैसे?”

     

    कान्हा चुप।

     

    तभी चंदू ने अपनी पूँछ हिलाई और पीछे हटते हुए आटे पर पैर रख दिया।

     

    उसके पैरों के निशान पूरे फर्श पर बन गए।

     

    कान्हा उन्हें देखकर हँस पड़े।

     

    यशोदा ने उन्हें देखा।

     

    “तुम्हें हँसी आ रही है?”

     

    कान्हा ने हँसी रोकने की कोशिश की।

     

    “थोड़ी।”

     

    यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।

     

    “अब इसे बाहर ले जाओ।”

     

    कान्हा चंदू को बाहर ले गए।

     

    लेकिन चंदू की शरारत अभी खत्म नहीं हुई थी।

     

    आँगन में रखी एक टोकरी में सूखी घास थी।

     

    चंदू उसमें मुँह डालकर घास खींचने लगा।

     

    कुछ ही पल में पूरी घास बाहर बिखर गई।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, ये तो बिल्कुल तुम्हारी तरह है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मेरी तरह क्यों?”

     

    “जहाँ देखो वहाँ शरारत।”

     

    कान्हा ने चंदू को देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “लेकिन इसकी शरारतें बहुत मजेदार हैं।”

     

    तभी चंदू ने फिर दौड़ लगा दी।

     

    इस बार वह सीधे आँगन में रखे पानी के बड़े बर्तन की तरफ गया।

     

    कान्हा उसके पीछे भागे।

     

    “चंदू! वहाँ मत जाना!”

     

    चंदू ने बर्तन को सूँघा।

     

    फिर पीछे हट गया।

     

    कान्हा ने राहत की साँस ली।

     

    “चलो, इस बार बच गए।”

     

    लेकिन अचानक चंदू ने अपना सिर बर्तन से टकरा दिया।

     

    बर्तन थोड़ा हिला और पानी बाहर छलक गया।

     

    कान्हा के पैर भीग गए।

     

    दोस्त जोर-जोर से हँसने लगे।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अब तो तुमने हद कर दी!”

     

    चंदू मासूम बनकर उन्हें देखने लगा।

     

    कान्हा उसका चेहरा देखकर खुद भी हँस पड़े।

     

    दोपहर में नंद बाबा घर लौटे।

     

    उन्होंने आँगन में बिखरी घास, पानी और आटे के निशान देखे।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज यहाँ क्या हुआ?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “आपके नए बछड़े ने पूरा घर उलट-पुलट कर दिया।”

     

    नंद बाबा ने चंदू को देखा।

     

    “इतना शरारती?”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “बाबा, ये बहुत अच्छा है। बस इसे सब चीजों को छूने की आदत है।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें तो अच्छा दोस्त मिल गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने चंदू के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “लेकिन इसे धीरे-धीरे समझाना होगा कि क्या करना है और क्या नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सिखाऊँगा।”

     

    शाम को कान्हा ने एक खेल बनाया।

     

    उन्होंने चंदू के सामने तीन चीजें रखीं—घास, लकड़ी और एक फूल।

     

    फिर बोले—

     

    “चंदू, घास खानी है।”

     

    चंदू ने घास खा ली।

     

    कान्हा खुश हुए।

     

    “बहुत अच्छे!”

     

    फिर उन्होंने लकड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे नहीं खाना।”

     

    चंदू ने लकड़ी सूँघी और आगे बढ़ गया।

     

    कान्हा ने ताली बजाई।

     

    “शाबाश!”

     

    दोस्तों ने कहा—

     

    “देखो, कान्हा इसे पढ़ा रहे हैं।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। इसे भी तो सीखना है।”

     

    कुछ देर बाद चंदू फूल की तरफ बढ़ा।

     

    कान्हा ने उसे रोक दिया।

     

    “ये नहीं। ये खेलने के लिए है।”

     

    चंदू पीछे हट गया।

     

    कान्हा ने खुशी से उसकी गर्दन सहलाई।

     

    “तुम सीख रहे हो!”

     

    यशोदा दूर से यह सब देख रही थीं।

     

    उन्होंने नंद बाबा से कहा—

     

    “देखिए, हमारा कान्हा खुद कितना शरारती है, लेकिन चंदू को समझा रहा है।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “शायद दूसरों को समझाते-समझाते खुद भी बहुत कुछ सीख रहा है।”

     

    रात को कान्हा चंदू के पास बैठे।

     

    उन्होंने उसके गले की छोटी सी घंटी को हाथ से छुआ।

     

    टन…

     

    छोटू भी पास खड़ा था।

     

    उसकी घंटी भी बजने लगी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “अब तो मेरे पास दो घंटियों वाले दोस्त हैं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “और दोनों तुमसे कम शरारती हैं।”

     

    कान्हा ने उसे देखा।

     

    “तुम मुझे शरारती कह रहे हो?”

     

    दोस्त भागने लगा।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़ पड़े।

     

    आँगन में फिर बच्चों की हँसी गूँजने लगी।

     

    कुछ देर बाद यशोदा ने सबको घर बुलाया।

     

    कान्हा जाने से पहले चंदू के पास गए।

     

    “कल फिर मिलेंगे।”

     

    चंदू ने अपनी छोटी घंटी बजाई।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तुमने हाँ कह दिया!”

     

    उस रात कान्हा जल्दी सो गए।

     

    लेकिन अगले दिन एक नई परेशानी उनका इंतजार कर रही थी।

     

    • सुबह जब वे गायों के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू और चंदू दोनों गायों के झुंड से गायब थे।

     

    कान्हा की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    “छोटू?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “चंदू?”

     

    दूर कहीं से एक बहुत हल्की घंटी सुनाई दी—

     

    टन…

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “दोनों शायद जंगल की तरफ चले गए हैं।”

     

    और बिना देर किए कान्हा अपने दोस्तों के साथ उनकी तलाश में निकल पड़े।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बारिश में खोया छोटू

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    — कान्हा और बारिश में खोया छोटू

     

    अगली सुबह वृंदावन में आसमान पर बादल छाए हुए थे। हवा ठंडी थी और दूर-दूर तक काले बादल दिखाई दे रहे थे।

     

    कान्हा सुबह उठते ही आँगन में आए। उनकी नजर सबसे पहले गायों के पास गई।

     

    वहाँ छोटू भी खड़ा था।

     

    उसके गले में नंद बाबा की दी हुई नई छोटी घंटी थी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा उसके पास दौड़कर गए।

     

    “छोटू!”

     

    बछड़े ने कान्हा की तरफ देखा और धीरे से आवाज की।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “देखो मैया! ये मुझे पहचान गया।”

     

    यशोदा मैया दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थीं।

     

    “अब तो तुम दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई है।”

     

    कान्हा ने छोटू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “हाँ।”

     

    तभी नंद बाबा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “आज बारिश हो सकती है। गायों को बहुत दूर मत ले जाना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है बाबा।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ गायों के पीछे-पीछे चल पड़े।

     

    छोटू भी उनके आसपास ही घूम रहा था।

     

    आसमान में बादल और घने होते जा रहे थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, आज बारिश होगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो क्या हुआ? थोड़ी बारिश में खेलेंगे।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “अगर बाबा ने सुन लिया तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “हम दूर नहीं जाएँगे।”

     

    वे एक खुले मैदान में पहुँचे।

     

    गायें घास खाने लगीं और बच्चे पेड़ के नीचे बैठ गए।

     

    कान्हा ने बांसुरी निकाली।

     

    धीरे-धीरे बांसुरी की धुन हवा में फैलने लगी।

     

    छोटू कान्हा के पास आकर बैठ गया।

     

    कान्हा ने उसके गले की घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    “अच्छी है ना?”

     

    छोटू ने पूँछ हिलाई।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    तभी पहली बूंद उनके हाथ पर गिरी।

     

    फिर दूसरी।

     

    एक दोस्त ने ऊपर देखा।

     

    “बारिश!”

     

    कुछ ही पल में बारिश तेज हो गई।

     

    सभी बच्चे पेड़ के नीचे भागकर खड़े हो गए।

     

    गायें भी एक जगह इकट्ठी होने लगीं।

     

    नंद बाबा ने दूर से आवाज लगाई—

     

    “सब बच्चे पास रहो!”

     

    कान्हा ने जवाब दिया—

     

    “जी बाबा!”

     

    तेज बारिश में कुछ दिखाई देना मुश्किल हो गया।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों को गिनना शुरू किया।

     

    “एक… दो… तीन… चार…”

     

    सभी बच्चे थे।

     

    फिर उन्होंने गायों की तरफ देखा।

     

    कई गायें पास थीं।

     

    लेकिन छोटू दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    कान्हा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “छोटू कहाँ है?”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद गायों के बीच होगा।”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “नहीं है।”

     

    उन्होंने ध्यान से सुना।

     

    बारिश की आवाज के बीच कोई घंटी सुनाई नहीं दे रही थी।

     

    कान्हा घबरा गए।

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    उन्होंने फिर आवाज लगाई—

     

    “छोटू!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, बारिश बहुत तेज है। अभी बाहर मत जाओ।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन छोटू अकेला है।”

     

    नंद बाबा भी गायों को एक जगह इकट्ठा कर रहे थे।

     

    कान्हा उनके पास दौड़कर पहुँचे।

     

    “बाबा, छोटू नहीं मिल रहा।”

     

    नंद बाबा ने तुरंत आसपास देखा।

     

    “कहाँ था आखिरी बार?”

     

    “मेरे पास। फिर बारिश शुरू हुई और वो गायों के बीच चला गया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तुम यहाँ रहो। मैं देखता हूँ।”

     

    लेकिन कान्हा बोले—

     

    “मैं भी चलूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बारिश बहुत तेज है।”

     

    कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “बाबा, वो डर गया होगा।”

     

    नंद बाबा ने कान्हा को अपने पास रखा।

     

    “ठीक है। लेकिन अकेले नहीं जाना।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “तुम सब भी चलोगे?”

     

    सबने सिर हिलाया।

     

    नंद बाबा आगे और बच्चे पीछे चलने लगे।

     

    उन्होंने रास्ते में घंटी की आवाज सुनने की कोशिश की।

     

    लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि कुछ साफ नहीं सुनाई दे रहा था।

     

    कान्हा बार-बार आवाज लगाते—

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं आता।

     

    तभी कान्हा ने हाथ उठाया।

     

    “रुको!”

     

    सब रुक गए।

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल तक वह चुप रहे।

     

    फिर बहुत हल्की आवाज आई—

     

    टन…

     

    कान्हा की आँखें खुल गईं।

     

    “सुना?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “घंटी!”

     

    उन्होंने आवाज की दिशा में दौड़ना शुरू किया।

     

    नंद बाबा भी उनके पीछे गए।

     

    थोड़ी दूर एक झाड़ी के पीछे छोटू खड़ा था।

     

    उसका एक पैर कीचड़ में फँस गया था।

     

    कान्हा उसे देखकर तुरंत उसके पास बैठ गए।

     

    “छोटू!”

     

    बछड़ा घबराकर आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “डरो मत। मैं आ गया।”

     

    नंद बाबा ने सावधानी से उसका पैर कीचड़ से बाहर निकाला।

     

    छोटू आजाद होते ही कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसे गले से लगा लिया।

     

    “तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गए थे?”

     

    छोटू ने धीरे से आवाज की।

     

    एक दोस्त हँसते हुए बोला—

     

    “लगता है ये भी तुम्हें जवाब दे रहा है।”

     

    कान्हा मुस्कुरा दिए।

     

    उन्होंने छोटू की घंटी को देखा।

     

    वह कीचड़ से भर गई थी।

     

    कान्हा ने अपने कपड़े के एक साफ हिस्से से घंटी साफ की।

     

    टन…

     

    आवाज फिर सुनाई दी।

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “अब मैं तुम्हें फिर कभी खोने नहीं दूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “कान्हा, किसी की जिम्मेदारी लेना आसान नहीं होता। उसके लिए ध्यान रखना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं रखूँगा।”

     

    बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी।

     

    सब लोग गायों के साथ वापस चल पड़े।

     

    छोटू इस बार कान्हा के बिल्कुल पास चल रहा था।

     

    हर कुछ कदम बाद उसकी घंटी बजती।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हर बार पीछे मुड़कर उसे देखते।

     

    नंद बाबा यह देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    घर पहुँचते ही यशोदा मैया दौड़कर बाहर आईं।

     

    “कान्हा! तुम इतने भीग क्यों गए?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, छोटू खो गया था।”

     

    यशोदा ने पहले कान्हा को देखा, फिर छोटू को।

     

    “मिल गया?”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “हाँ!”

     

    यशोदा ने राहत की साँस ली।

     

    “मैं तो डर गई थी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, इसकी घंटी सुनाई दी थी।”

     

    उन्होंने घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    “अच्छा हुआ इसे घंटी मिल गई।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। अब ये खोएगा नहीं।”

     

    यशोदा ने कान्हा के गीले बाल पोंछे।

     

    “लेकिन तुम भी तोगए थे बारिश में।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “छोटू अकेला था।”

     

    यशोदा कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “दूसरों की चिंता करना अच्छी बात है, लेकिन अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “अगली बार बाबा के साथ ही जाऊँगा।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “यही समझदारी है।”

     

    उस शाम बारिश रुक चुकी थी।

     

    आसमान में हल्की धूप निकल आई थी।

     

    कान्हा छोटू के पास बैठकर उसकी घंटी सुन रहे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, अब तुम्हें बारिश से डर नहीं लगता?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बारिश से नहीं। बस छोटू खो जाए तो डर लगता है।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम्हें सच में इसकी बहुत चिंता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “दोस्त की चिंता तो करनी ही चाहिए।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने अपनी बांसुरी उठाई और धीरे-धीरे बजाने लगे।

     

    छोटू उनके पास बैठा रहा।

     

    गायें भी शांत थीं।

     

    वृंदावन की गीली मिट्टी से खुशबू आ रही थी।

     

    यशोदा दूर खड़ी यह सब देख रही थीं।

     

    उनके मन में एक ही बात आई—

     

    उनका नन्हा कान्हा भले ही शरारती हो, लेकिन उसके दिल में अपने हर दोस्त के लिए बहुत गहरा प्यार था।

     

    रात को कान्हा सोने से पहले फिर छोटू की बात करने लगे।

     

    “मैया, कल मैं उसके लिए कुछ अच्छा करूँगा।”

     

    “क्या?”

     

    “उसके लिए फूलों की माला बनाऊँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कीं।

     

    फिर अचानक बोले—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “क्या छोटू भी मुझे अपना दोस्त मानता होगा?”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “जिसके लिए तुम बारिश में उसे ढूँढ़ने निकल पड़े, वो तुम्हें दोस्त क्यों नहीं मानेगा?”

     

    कान्हा मुस्कुराए और सो गए।

     

    अगली सुबह उन्होंने सच में छोटू के लिए फूलों की एक छोटी माला बनाई।

     

    लेकिन जब वह माला लेकर छोटू के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू अकेला नहीं था।

     

    उसके पास एक नन्हा सफेद बछड़ा खड़ा था।

     

    और वह बछड़ा कान्हा को देखते ही उनके पास दौड़ पड़ा।

     

    कान्हा हैरान होकर बोले—

     

    “ये कौन है?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराकर बोले—

     

    “छोटू का नया दोस्त।”

     

    कान्हा ने दोनों बछड़ों को देखा और खुशी से बोले—

     

    “अब हमारे पास दो दोस्त हैं!”

     

    लेकिन कान्हा को क्या पता था कि नया बछड़ा इतना शरारती था कि अगले ही दिन वह नंद भवन की रसोई में घुसकर सारा आटा बिखेरने वाला था।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कान्हा और बिछड़ा बछड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और बिछड़ा हुआ बछड़ा

     

    अगली सुबह कान्हा सूरज निकलने से पहले ही उठ गए। आज उनके लिए खास दिन था, क्योंकि नंद बाबा ने उन्हें पहली बार गायों के साथ खुले मैदान तक चलने की अनुमति दी थी।

     

    कान्हा उठते ही यशोदा मैया के पास पहुँचे।

     

    “मैया! उठो ना!”

     

    यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—

     

    “क्या हुआ कान्हा?”

     

    “आज मैं बाबा के साथ गायों को चराने जाऊँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “मुझे याद है। लेकिन इतनी सुबह से इतनी खुशी?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं गायों की घंटियाँ सुनूँगा, उनके साथ चलूँगा और उनकी देखभाल भी करूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके बाल सँवारे और कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन बाबा की बात मानना। बहुत दूर मत जाना।”

     

    “पक्का!”

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गायों को लेकर घर से निकले। कान्हा उनके साथ थे। उनके पीछे उनके कई दोस्त भी चल पड़े।

     

    रास्ते भर गायों की घंटियाँ बजती रहीं।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा कभी किसी गाय के पास जाते, कभी किसी बछड़े के सिर पर हाथ फेरते।

     

    नंद बाबा उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, आज तो तुम बिल्कुल बड़े ग्वाले जैसे लग रहे हो।”

     

    कान्हा ने गर्व से कहा—

     

    “मैं बड़ा होकर भी गायों की देखभाल करूँगा।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “और माखन?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “माखन भी खाऊँगा।”

     

    सब बच्चे हँसने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे एक बड़े हरे मैदान में पहुँचे। वहाँ घास बहुत अच्छी थी। गायें अलग-अलग जगह फैलकर घास खाने लगीं।

     

    नंद बाबा ने बच्चों से कहा—

     

    “तुम सब यहीं रहना। गायों को बहुत दूर मत जाने देना।”

     

    सभी ने कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी निकालने लगे।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे धुन बजानी शुरू की।

     

    गायों की घंटियाँ और बांसुरी की आवाज मिलकर बहुत प्यारी लग रही थी।

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने बांसुरी रोक दी।

     

    उन्हें लगा जैसे कोई आवाज कर रहा है।

     

    “माँ… माँ…”

     

    कान्हा ने ध्यान से सुना।

     

    आवाज बहुत हल्की थी।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से पूछा—

     

    “तुमने कुछ सुना?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “नहीं।”

     

    कान्हा फिर चुप हो गए।

     

    कुछ पल बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    “माँ…”

     

    कान्हा तुरंत खड़े हो गए।

     

    “कोई बछड़ा अपनी माँ को बुला रहा है।”

     

    वह आवाज की दिशा में चल पड़े।

     

    दो दोस्त उनके साथ हो लिए।

     

    थोड़ी दूर झाड़ियों के पीछे उन्हें एक छोटा सा बछड़ा दिखाई दिया।

     

    वह अकेला खड़ा था और बार-बार अपनी माँ की तरफ देखने की कोशिश कर रहा था।

     

    कान्हा उसके पास बैठ गए।

     

    “तुम यहाँ अकेले कैसे रह गए?”

     

    बछड़ा धीरे से आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “डरो मत। हम तुम्हारी माँ को ढूँढ़ेंगे।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद इसकी माँ दूसरी तरफ चली गई होगी।”

     

    कान्हा ने मैदान की तरफ देखा।

     

    बहुत सारी गायें थीं।

     

    “हमें पहचानना होगा कि इसकी माँ कौन है।”

     

    उन्होंने बछड़े को ध्यान से देखा।

     

    उसके गले में कोई घंटी नहीं थी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “चलो, इसे धीरे-धीरे गायों के पास ले चलते हैं।”

     

    वे बछड़े को लेकर मैदान की ओर लौटे।

     

    जैसे ही बछड़ा गायों के पास पहुँचा, वह एक दिशा में तेजी से बढ़ने लगा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “रुको! इसे पता है इसकी माँ कहाँ है।”

     

    बछड़ा एक सफेद गाय के पास पहुँचा।

     

    लेकिन गाय ने उसे देखकर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी।

     

    बछड़ा फिर दूसरी तरफ गया।

     

    कान्हा उसके पीछे चलते रहे।

     

    अचानक वह एक भूरे रंग की गाय के पास जाकर रुक गया।

     

    गाय ने जैसे ही बछड़े को देखा, वह उसकी तरफ बढ़ी।

     

    बछड़ा खुशी से अपनी माँ के पास चला गया।

     

    कान्हा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    “मिल गई!”

     

    दोस्त खुशी से बोले—

     

    “सच में इसकी माँ मिल गई!”

     

    कान्हा ने गाय के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम इसे छोड़कर इतनी दूर क्यों चली गई थीं?”

     

    नंद बाबा भी वहाँ पहुँच गए थे।

     

    उन्होंने पूरा दृश्य देखा।

     

    उन्होंने कान्हा से पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता चला कि ये अपनी माँ से बिछड़ गया है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसकी आवाज सुनाई दी थी। ये अपनी माँ को बुला रहा था।”

     

    नंद बाबा ने प्यार से कहा—

     

    “तुमने बहुत अच्छा किया।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “बाबा, अगर कोई छोटा अपने घरवालों से बिछड़ जाए तो उसे ढूँढ़ना चाहिए ना?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “बिल्कुल।”

     

    कान्हा कुछ देर उस बछड़े को देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “अब इसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “आज से तुम इसकी भी देखभाल करना।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने बछड़े को गले लगाने की कोशिश की।

     

    बछड़ा थोड़ा पीछे हट गया।

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अरे, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।”

     

    कुछ देर बाद बछड़ा खुद कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “अब डरना नहीं।”

     

    दोपहर को बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाने लगे।

     

    कान्हा ने अपनी पोटली खोली।

     

    उसमें यशोदा मैया ने रोटी और थोड़ा मक्खन रखा था।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “मुझे भी थोड़ा दो।”

     

    कान्हा ने रोटी का टुकड़ा उसे दे दिया।

     

    फिर दूसरे दोस्त को भी दिया।

     

    थोड़ी देर में कान्हा के पास बहुत कम खाना बचा।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम खुद क्या खाओगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मेरे पास अभी भी है।”

     

    उन्होंने आखिरी टुकड़ा उठाया।

     

    तभी वही छोटा बछड़ा उनके पास आ गया।

     

    वह कान्हा को देखने लगा।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें भी चाहिए?”

     

    उन्होंने रोटी का टुकड़ा तोड़कर उसे नहीं दिया, बल्कि पास की घास की ओर इशारा किया।

     

    “तुम ये खाओ। ये तुम्हारे लिए है।”

     

    बछड़ा घास खाने लगा।

     

    कान्हा उसे देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    शाम होने लगी।

     

    नंद बाबा ने गायों को वापस इकट्ठा करना शुरू किया।

     

    सभी बच्चे अपने-अपने दोस्तों के साथ चल पड़े।

     

    लेकिन अचानक कान्हा ने पीछे देखा।

     

    वही छोटा बछड़ा फिर से पीछे रह गया था।

     

    कान्हा दौड़कर उसके पास गए।

     

    “चलो, घर चलते हैं।”

     

    बछड़ा धीरे-धीरे उनके पीछे चलने लगा।

     

    रास्ते में उसकी घंटी नहीं बज रही थी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा, इसके लिए भी घंटी लगवा दो।”

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “ताकि अगर ये फिर पीछे रह जाए तो हमें इसकी आवाज सुनाई दे।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है। कल इसके लिए एक छोटी घंटी ले आएँगे।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “फिर मैं इसकी घंटी सबसे पहले सुनूँगा।”

     

    शाम को नंद भवन पहुँचते ही यशोदा मैया बाहर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा को देखा।

     

    “आज दिन कैसा रहा?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बहुत अच्छा!”

     

    “क्या किया?”

     

    कान्हा ने बछड़े की पूरी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने ध्यान से सुना।

     

    फिर उन्होंने कान्हा को अपने पास बुलाकर कहा—

     

    “तुमने आज बहुत अच्छा काम किया।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, वो बहुत डर गया था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “किसी को डर में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    फिर अचानक बोले—

     

    “मैया, कल उसके लिए घंटी आएगी।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “तो अब तुम्हारा एक नया दोस्त भी बन गया।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “हाँ। इसका नाम भी रखेंगे।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या नाम रखोगे?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “छोटू!”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “इतना छोटा नाम?”

     

    “हाँ। क्योंकि वो छोटा है।”

     

    रात को कान्हा सोने गए तो उनकी बातें सिर्फ उसी बछड़े के बारे में थीं।

     

    “मैया, कल मैं छोटू को घास खिलाऊँगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसकी घंटी बजाऊँगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसके साथ दौड़ूँगा।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “और फिर कोई शरारत करोगे?”

     

    कान्हा ने तुरंत मासूम चेहरा बनाया।

     

    “नहीं।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हारे इस ‘नहीं’ पर मुझे भरोसा नहीं।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    कुछ ही देर में उनकी आँखें बंद हो गईं।

     

    लेकिन अगले दिन जब छोटू के गले में नई घंटी बाँधी गई, तो कान्हा ने देखा कि घंटी की आवाज बाकी सभी घंटियों से अलग थी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मैं तुम्हें भीड़ में भी पहचान लूँगा।”

     

    छोटू ने अपनी छोटी सी पूँछ हिलाई।

     

    और शायद वह भी समझ गया था कि वृंदावन में उसे एक ऐसा दोस्त मिल गया है जो उसकी छोटी-सी आवाज भी सुन लेता है।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा और छोटू के सामने एक नई मुसीबत आने वाली थी—वृंदावन की तेज बारिश में छोटू अचानक गायों के झुंड से अलग हो जाएगा।

     

    और उसे ढूँढ़ने के लिए कान्हा अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे दोस्तों के साथ निकल पड़ेंगे।

     

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं