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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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  • तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    गाँव रामपुर में तीन दोस्तों की जोड़ी इतनी मशहूर थी कि लोग उन्हें नाम से कम और “तीन तिगाड़ा” कहकर ज़्यादा बुलाते थे।

    पहला था भोला। नाम की तरह ही भोला नहीं, बल्कि थोड़ा सनकी भी था। उसे हर काम अपने ही अजीब तरीके से करना पसंद था। कोई कहे दाएँ जाओ, तो वह कहे, “सब दाएँ जाते हैं, मैं बाएँ जाऊँगा।”

    दूसरा था गोलू। हर समय हँसता रहता। चाहे कैसी भी मुसीबत हो, उसके चेहरे पर मुस्कान कभी नहीं जाती थी। उसकी एक ही आदत थी—हर बात में मज़ाक करना।

    तीसरा था पप्पू। वह इतना नादान और बेपरवाह था कि लोग कहते, “इसका दिमाग छुट्टी पर रहता है।” कोई भी कुछ कह दे, वह बिना सोचे वही कर देता।

    तीनों का हाल ऐसा था कि जहाँ जाते, वहाँ कोई न कोई गड़बड़ ज़रूर हो जाती।

    एक दिन तीनों ने सोचा कि अब गाँव में अपनी इज़्ज़त बनानी चाहिए।

    भोला बोला, “चलो आज किसी की मदद करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हाँ, लोग कहेंगे कि ये तीनों सुधर गए।”

    पप्पू बोला, “और अगर नहीं सुधरे तो?”

    दोनों ने उसे घूरकर देखा।

    सबसे पहले उन्हें एक बूढ़ी अम्मा मिलीं जो सिर पर लकड़ियों का गट्ठर उठाए जा रही थीं।

    तीनों दौड़ पड़े।

    “अम्मा, हम उठा देते हैं।”

    अम्मा खुश हो गईं।

    लेकिन जैसे ही भोला ने गट्ठर उठाया, उसने कहा, “इसे ऐसे नहीं, उल्टा पकड़ना चाहिए।”

    उसने गट्ठर उल्टा कर दिया।

    सारी लकड़ियाँ सड़क पर बिखर गईं।

    उधर गोलू इतनी ज़ोर से हँसा कि संतुलन बिगड़ गया और वह भी लकड़ियों पर गिर पड़ा।

    पप्पू उन्हें उठाने लगा, लेकिन उसने सूखी लकड़ियों की जगह पास रखे किसी के कपड़े उठा लिए।

    अम्मा सिर पकड़कर बैठ गईं।

    तीनों चुपचाप वहाँ से खिसक लिए।

    चलते-चलते उन्हें लगा कि खेती में मदद करनी चाहिए।

    एक किसान खेत में पानी लगा रहा था।

    भोला बोला, “चाचा, हम कर देते हैं।”

    किसान ने खुशी-खुशी हाँ कर दी।

    जैसे ही किसान घर गया, भोला ने नहर का रास्ता बदल दिया।

    बोला, “सीधा पानी जाएगा तो मज़ा क्या?”

    नतीजा…

    पूरा पानी खेत छोड़कर सड़क पर बहने लगा।

    गोलू हँस-हँसकर लोटपोट हो गया।

    पप्पू बोला, “लगता है सड़क पर धान उगेंगे।”

    इतने में किसान वापस आया।

    उसने देखा कि खेत सूखा है और सड़क नदी बनी हुई है।

    तीनों फिर भाग खड़े हुए।

    अब उन्होंने फैसला किया कि किसी की दुकान पर मदद करेंगे।

    हलवाई ने कहा, “इन लड्डुओं पर चाँदी का वर्क लगा दो।”

    भोला बोला, “वर्क से क्या होगा? चमक तो तेल से आएगी।”

    उसने लड्डुओं पर तेल लगा दिया।

    गोलू हँसते-हँसते चीनी का डिब्बा गिरा बैठा।

    पप्पू ने समझा कि सब खराब हो गया है।

    उसने पूरा बेसन पानी में डाल दिया।

    थोड़ी ही देर में लड्डुओं की जगह बेसन का हलवा बन गया।

    हलवाई चिल्लाया, “तुम तीनों दुकान से बाहर निकलो!”

    अब तो पूरे गाँव में चर्चा होने लगी।

    “जहाँ ये तीन पहुँच जाएँ, वहाँ भगवान ही मालिक है।”

    तीनों उदास होकर तालाब किनारे बैठ गए।

    गोलू पहली बार चुप था।

    तभी गाँव के सरपंच आए।

    उन्होंने कहा, “तुम लोग इतने परेशान क्यों हो?”

    भोला बोला, “हम अच्छा करना चाहते हैं, लेकिन सब बिगड़ जाता है।”

    सरपंच मुस्कुराए।

    उन्होंने कहा, “अगर सच में मदद करनी है तो पहले सीखो, फिर काम करो।”

    तीनों को बात समझ आ गई।

    अगले दिन गाँव में सफाई अभियान रखा गया।

    इस बार उन्होंने बिना अपनी अक्ल लगाए वही किया जो लोगों ने बताया।

    भोला सिर्फ झाड़ू लगाता रहा।

    गोलू कूड़ा उठाता रहा और बीच-बीच में सबका मन भी हँसाकर हल्का करता रहा।

    पप्पू बस बोरी पकड़कर चलता रहा।

    पहली बार कोई गड़बड़ नहीं हुई।

    गाँव वाले खुश हो गए।

    लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

    काम खत्म होने के बाद पप्पू बोला, “अब कूड़ा कहाँ डालना है?”

    किसी ने कहा, “पीछे वाले गड्ढे में।”

    पप्पू बिना देखे बोरी उठाकर फेंक आया।

    कुछ देर बाद पता चला कि वह कूड़ा नहीं, सरपंच का नया खाद का बोरा था।

    असली कूड़ा वहीं पड़ा रह गया।

    पूरा गाँव पहले कुछ पल चुप रहा…

    फिर इतनी ज़ोर से हँसा कि तालाब तक आवाज़ पहुँच गई।

    सरपंच भी हँस पड़े।

    उन्होंने कहा, “लगता है तुम तीनों की किस्मत में थोड़ा-बहुत काम बिगाड़ना लिखा है।”

    भोला बोला, “हम कोशिश तो पूरी करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हमारा इरादा अच्छा होता है, बस नतीजा थोड़ा अलग निकल जाता है।”

    पप्पू मासूमियत से बोला, “अगली बार शायद सही हो जाए…”

    यह सुनकर फिर सब हँस पड़े।

    उस दिन के बाद गाँव में जब भी कोई काम बिगड़ जाता, लोग मुस्कुराकर बस एक ही बात कहते—

    “लगता है यहाँ तीन तिगाड़ा होकर गए हैं!”

    और तीनों दोस्त भी अब इस बात का बुरा नहीं मानते थे। वे हर गलती से कुछ नया सीखते, फिर अगले काम में जुट जाते। हालाँकि उनके साथ कोई न कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी फिर भी हो जाती थी, लेकिन उनकी सच्ची दोस्ती, साफ़ दिल और लोगों को हँसा देने वाली आदत ने पूरे गाँव का दिल जीत लिया था।

    सीख: अच्छा इरादा ज़रूरी है, लेकिन किसी भी काम को सही तरीके से सीखकर करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी होता है। और सच्चे दोस्त हर मुसीबत को भी हँसी में बदल

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • एक अनाथ

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    “बेटी, अब से यही तुम्हारा घर है… सबको अपना समझकर रहना।”

     

    विदाई के समय मामा की आँखों में आँसू थे। सामने खड़ी पायल भी रो रही थी। माँ-बाप का साया तो उसने बचपन में ही खो दिया था। वह सिर्फ पाँच साल की थी, जब एक सड़क हादसे ने उसके माता-पिता को उससे हमेशा के लिए छीन लिया। उस दिन के बाद उसकी दुनिया उजड़ गई थी।

     

    लेकिन भगवान ने उसके लिए एक सहारा पहले से ही चुन रखा था। उसके मामा और मामी ने उसे अपनी बेटी बनाकर अपने घर ले आए। उन्होंने कभी उसे यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अनाथ है। जितना प्यार उन्होंने अपने बेटे रोहन को दिया, उतना ही प्यार पायल को भी मिला। मामी हर रात उसे अपने हाथों से खाना खिलातीं और मामा उसे कंधों पर बैठाकर मेले घुमाने ले जाते।

     

    पायल बड़ी होती गई। पढ़ाई में होशियार, संस्कारों में सबसे आगे और दिल से बेहद नरम। पूरे मोहल्ले में उसकी मिसाल दी जाती थी। उसे हमेशा यही भरोसा था कि जिस घर में उसकी शादी होगी, वहाँ भी उसे इतना ही अपनापन मिलेगा।

     

    समय आया तो उसके लिए अमन का रिश्ता आया। परिवार देखने में अच्छा था। बातों में मिठास थी और सब लोग बहुत संस्कारी होने का दिखावा कर रहे थे। मामा-मामी ने अपनी हैसियत से बढ़कर शादी की। जो बन पड़ा, सब कुछ दिया। विदाई के समय मामी ने उसे गले लगाकर कहा, “बेटी, अगर कभी ज़रा-सी भी परेशानी हो, तो अपने इस घर का दरवाज़ा हमेशा खुला मिलेगा।”

     

    पायल मुस्कुराई और आँसू पोंछते हुए ससुराल चली गई।

     

    लेकिन जिस घर को उसने अपना नया संसार समझा था, वही उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुःख बन गया।

     

    शादी के दूसरे ही दिन उसकी सास ने दहेज का सामान देखते हुए ताना मारा, “बस इतना ही सामान भेजा है? लगता है तुम्हारे मामा-मामी ने अपनी जिम्मेदारी जल्दी खत्म करनी थी।”

     

    पायल चुप रही। उसने सोचा, शायद पहली बार की नाराज़गी होगी।

     

    लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी।

     

    हर सुबह कोई न कोई ताना उसका इंतज़ार करता।

     

    “इतनी देर से क्यों उठी?”

     

    “खाना बनाना भी नहीं आता?”

     

    “अनाथ लड़की से इससे ज़्यादा उम्मीद भी क्या करें?”

     

    ये शब्द रोज़ उसके दिल को तोड़ देते थे।

     

    उसका पति अमन भी धीरे-धीरे अपनी माँ की बातों में आने लगा। पहले जो उससे प्यार से बात करता था, अब छोटी-छोटी बातों पर उसे डाँटने लगा।

     

    एक दिन पायल ने हिम्मत करके कहा, “अगर मुझसे कोई गलती हुई है, तो मुझे समझाइए… लेकिन बार-बार अनाथ कहकर मत बुलाइए। बहुत दर्द होता है।”

     

    अमन ने बेरुखी से जवाब दिया, “माँ जो कहती हैं, सुन लिया करो। बेकार की बहस मत किया करो।”

     

    उस दिन पायल को समझ आ गया कि अब उसे इस घर में अकेले ही सब सहना होगा।

     

    धीरे-धीरे उससे पूरे घर का काम करवाया जाने लगा। सुबह चार बजे उठना, रात देर तक काम करना। अगर ज़रा-सी भी गलती हो जाती तो खाना तक नसीब नहीं होता।

     

    एक दिन उसे तेज़ बुखार था। शरीर काँप रहा था, लेकिन सास बोली, “बीमार होने का नाटक मत करो। रसोई में जाओ और खाना बनाओ।”

     

    पायल काँपते हाथों से रोटियाँ बना रही थी कि अचानक उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया और वह रसोई में ही बेहोश होकर गिर पड़ी।

     

    जब होश आया तो वह अपने कमरे में थी। उसे लगा कि शायद किसी ने उसकी चिंता की होगी।

     

    लेकिन तभी बाहर से सास की आवाज़ आई, “नाटक करने में तो बड़ी होशियार है। काम से बचने का नया तरीका ढूँढ़ लिया।”

     

    यह सुनकर पायल की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उस रात उसने अपने मामा को फोन किया। जैसे ही उधर से आवाज़ आई, “कैसी है मेरी बेटी?”

     

    पायल का गला भर आया। लेकिन वह उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थी।

     

    वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली, “मैं ठीक हूँ मामा… बस आपकी याद आ रही थी।”

     

    फोन कटते ही वह फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उधर मामा समझ गए कि उनकी बेटी कुछ छिपा रही है।

     

    दो दिन बाद मामा और मामी बिना बताए उसके ससुराल पहुँच गए।

     

    दरवाज़ा पायल ने खोला। उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी। आँखों के नीचे काले घेरे थे और हाथों पर जलने के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे।

     

    मामी ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और धीरे से पूछा, “बेटी… सच बता, तू खुश तो है ना?”

     

    बस इतना सुनना था कि पायल खुद को रोक नहीं पाई। वह मामी के गले लगकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

     

    उसकी सिसकियाँ सुनकर घर में सन्नाटा छा गया।

     

    उस दिन पहली बार मामा ने अपनी बेटी की आँखों में वह दर्द देखा, जिसे वह महीनों से मुस्कान के पीछे छिपा रही थी।

     

    उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अपनी फूल जैसी बेटी को जिस घर में विदा किया था, वहाँ उसे प्यार नहीं, बल्कि अपमान और तकलीफ़ मिली थी।

     

    उस पल मामा ने मन ही मन एक फैसला कर लिया अब उनकी बेटी कभी अकेली नहीं लड़ेगी।

     

    पायल मामी के गले लगकर लगातार रोए जा रही थी। बरसों का दर्द जैसे आज उसकी आँखों से बाहर निकल रहा था।

     

    मामी बार-बार उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कह रही थीं, “बस बेटी… अब और मत रो। हम आ गए हैं ना।”

     

    मामा ने पूरे घर की तरफ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।

     

    इतने में पायल की सास बोली, “अरे, हमने ऐसा क्या कर दिया? बहुएँ अगर थोड़ा-बहुत काम करें तो क्या गलत है?”

     

    मामा ने शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा, “काम करवाना गलत नहीं है… लेकिन किसी की बेटी का सम्मान छीन लेना सबसे बड़ा गलत काम है।”

     

    सास हँसते हुए बोली, “ये आपकी बेटी नहीं, अनाथ लड़की है। हमने तो इस पर एहसान किया है।”

     

    ये सुनते ही मामा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कहा, “जिस दिन इसकी माँ-बाप की मौत हुई थी, उसी दिन मैंने इसे अपनी बेटी मान लिया था। अगर इसे जन्म देने वाले नहीं रहे, तो इसका मतलब ये नहीं कि इसका कोई अपना नहीं है।”

     

    पूरे घर में सन्नाटा छा गया।

     

    अमन भी वहीं खड़ा सब सुन रहा था, लेकिन उसने एक शब्द तक नहीं कहा।

     

    मामा ने पायल से पूछा, “बेटी, सच-सच बता… क्या तू इस घर में खुश है?”

     

    पायल कुछ पल चुप रही। फिर धीमी आवाज़ में बोली, “मैंने बहुत कोशिश की मामा… सबको अपना माना… हर ताना सहा… हर अपमान सहा… लेकिन अब मुझसे नहीं होता।”

     

    उसकी बात सुनकर मामी की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    मामा ने बिना एक पल गंवाए कहा, “चल बेटी… अपने घर चल।”

     

    सास तुरंत बोली, “अगर आज ये इस घर से गई, तो दोबारा इस घर में कदम नहीं रखेगी।”

     

    मामा ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया, “जिस घर में बेटी की इज़्ज़त नहीं होती, उस घर में लौटने की ज़रूरत भी नहीं होती।”

     

    पायल अपने मामा-मामी के साथ चली गई।

     

    कई दिनों बाद उसने खुलकर साँस ली। पहली बार उसे ऐसा लगा कि वह फिर से ज़िंदा है।

     

    मामी ने उसे संभाला। मामा ने कहा, “बेटी, अब किसी के सामने रोना नहीं… अब खुद को इतना मज़बूत बनाना कि लोग तुझे कमजोर समझने की गलती कभी न करें।”

     

    पायल ने उसी दिन फैसला कर लिया कि अब वह अपनी पहचान खुद बनाएगी।

     

    उसने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की। साथ ही सिलाई और कंप्यूटर का कोर्स भी किया। धीरे-धीरे उसने घर से ही अपना छोटा-सा काम शुरू कर दिया।

     

    शुरुआत में कम कमाई हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    कुछ महीनों बाद उसके बनाए कपड़ों की माँग बढ़ने लगी। फिर उसने दो और महिलाओं को अपने साथ काम पर रखा।

     

    एक साल के अंदर उसका छोटा-सा काम एक अच्छी दुकान में बदल गया।

     

    आज वही पायल, जिसे कभी ताने सुनने पड़ते थे, कई ज़रूरतमंद महिलाओं को रोज़गार दे रही थी।

     

    उधर अमन का घर पहले जैसा नहीं रहा। सास की तबीयत खराब रहने लगी। घर के काम करने वाला कोई नहीं था। तब उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि पायल नौकरानी नहीं, उस घर की बहू थी।

     

    एक दिन अमन पायल से मिलने उसके घर पहुँचा।

     

    उसने धीरे से कहा, “पायल… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर दो और वापस चलो।”

     

    पायल ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे, बल्कि आत्मविश्वास था।

     

    वह बोली, “माफ़ मैंने तुम्हें उसी दिन कर दिया था… लेकिन जिस घर में मेरे आत्मसम्मान की कोई कीमत नहीं थी, वहाँ अब लौटना मेरे बस की बात नहीं।”

     

    अमन शर्म से सिर झुका कर खड़ा रह गया।

     

    पायल ने मुस्कुराकर कहा, “रिश्ते प्यार से चलते हैं… तानों से नहीं। और सम्मान खोकर कोई रिश्ता नहीं निभाया जा सकता।”

     

    अमन बिना कुछ कहे वापस लौट गया।

     

    कुछ समय बाद पायल की मेहनत और हिम्मत की कहानी पूरे शहर में मिसाल बन गई। लोग उसे एक सफल महिला के रूप में पहचानने लगे।

     

    एक कार्यक्रम में जब उसे सम्मानित किया गया तो मंच से उसने सिर्फ एक बात कही—

     

    “मैं अनाथ ज़रूर थी, लेकिन कभी अकेली नहीं थी। मेरे मामा-मामी ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं हर मुश्किल से लड़ सकी। और आज मैं हर उस लड़की से कहना चाहती हूँ… अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता मत करना। क्योंकि जो खुद की इज़्ज़त करना सीख लेता है, दुनिया भी एक दिन उसकी इज़्ज़त करना सीख जाती है

    ।”

     

    पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

     

    मामा और मामी की आँखों में गर्व के आँसू थे। उनकी बेटी हारकर नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाकर जीती थी।

     

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अधूरा रिश्ता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “यार, तेरी सगाई पक्की हो गई!”

     

    दोस्त की बात सुनकर आदित्य के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। घर में भी कई दिनों से खुशियों का माहौल था। रिश्ता कोई अनजान परिवार में नहीं, बल्कि अपने ही रिश्तेदारों में तय हुआ था। लड़की का नाम जानवी था। दोनों बचपन से एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए आदित्य को लगा कि इससे अच्छा रिश्ता शायद ही कहीं मिलेगा।

     

    सगाई में जब पहली बार उसने जानवी की उंगली में अंगूठी पहनाई, तो उसकी आँखों में ढेर सारे सपने थे। लेकिन जानवी की आँखों में वह चमक नहीं थी। आदित्य ने सोचा, “शायद शर्माती होगी।”

     

    सगाई के बाद आदित्य रोज़ उसे मैसेज करता।

    “कैसी हो?”

    “ठीक हूँ।”

     

    बस इतना ही जवाब आता।

     

    आदित्य कई बार सोचता कि शायद जानवी नई ज़िंदगी की जिम्मेदारियों को लेकर घबराई हुई है। इसलिए उसने कभी उस पर सवालों की बारिश नहीं की। वह हर छोटे-छोटे मौके पर उसे खुश करने की कोशिश करता। कभी उसकी पसंद की किताब भेज देता, तो कभी बिना किसी वजह के फूल। लेकिन हर बार जानवी सिर्फ “थैंक यू” लिखकर बात खत्म कर देती। आदित्य रात-रात भर उनकी आने वाली ज़िंदगी के सपने देखता, जबकि जानवी उन्हीं रातों में अपने फैसले को लेकर बेचैन होकर रोती रहती। दोनों एक ही रिश्ते में बंधे थे, लेकिन उनके दिल दो बिल्कुल अलग रास्तों पर चल रहे थे। एक तरफ सच्चा प्यार था, तो दूसरी तरफ मजबूरी और छिपा हुआ सच।

     

    वह घंटों उसके रिप्लाई का इंतज़ार करता, लेकिन जानवी कभी खुद से बात शुरू नहीं करती थी। आदित्य फिर भी यही सोचकर खुश रहता कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।

     

     

     

    धीरे-धीरे उसने शादी के सपने बुनने शुरू कर दिए। उसने अपने कमरे की दीवार पर उनकी सगाई की तस्वीर लगा दी। मोबाइल के वॉलपेपर पर भी जानवी की मुस्कुराती तस्वीर थी। वह अपनी हर छोटी-बड़ी खुशी उसी से जोड़ चुका था।

     

    एक दिन आदित्य ने जानवी से कहा,

    “अगर तुम्हें कहीं घूमने का मन हो तो बताना, शादी से पहले परिवार के साथ चलेंगे।”

     

    जानवी ने सिर्फ इतना कहा,”देखते हैं।”

     

    उसका हर जवाब ऐसा ही होता। आदित्य को कभी-कभी अजीब लगता, लेकिन उसने कभी ज़बरदस्ती नहीं की।

     

    उधर जानवी एक ऐसे सच के साथ जी रही थी, जिसे बताने की हिम्मत उसमें नहीं थी।

     

    वह कॉलेज के दिनों से रोहन नाम के लड़के से प्यार करती थी। दोनों कई सालों से साथ थे। लेकिन जब घरवालों ने रिश्तेदारों में उसका रिश्ता तय किया, तो वह अपने परिवार के सामने कुछ बोल नहीं पाई। उसने सोचा, शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा।

     

    लेकिन वक्त के साथ उसकी बेचैनी और बढ़ती गई।

    शादी की तारीख अब सिर्फ एक महीने दूर थी।

     

    एक शाम आदित्य बड़े प्यार से जानवी के लिए उसकी पसंद का सूट लेकर उसके घर पहुँचा। वह उसे सरप्राइज़ देना चाहता था।

     

    कमरे के बाहर पहुँचते ही उसे अंदर से किसी की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “जानवी… आखिर कब तक ये सब चलेगा?”

     

    आदित्य रुक गया।

     

    जानवी रोते हुए कह रही थी,

    “रोहन, मैं मजबूर हूँ। मैं घरवालों को मना नहीं कर पाई।”

     

    रोहन बोला,

    “लेकिन तुम किसी और से शादी कैसे कर सकती हो? तुमने तो मुझसे साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं।”

     

    ये सुनते ही आदित्य के हाथ से गिफ्ट का बैग नीचे गिर गया।

     

    अंदर दोनों चौंक गए।

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आदित्य की आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ बिल्कुल शांत थी।

     

    “एक बात पूछूँ, जानवी?”

     

    वह सिर झुकाकर खड़ी रही।”क्या तुम उससे प्यार करती हो?”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद जानवी ने धीरे से कहा,

    “…हाँ।”

     

    बस एक शब्द…

    और आदित्य के सारे सपने उसी पल टूट गए।

     

    उसने काँपती आवाज़ में पूछा,”तो फिर मुझसे सगाई क्यों की? एक बार सच बता देती… मैं खुद पीछे हट जाता।”

     

    जानवी फूट-फूटकर रोने लगी।

    “मैं डर गई थी… मुझे लगा घरवाले कभी नहीं मानेंगे।”

     

    आदित्य ने गहरी साँस ली।

     

    “घरवालों से डर गई… लेकिन मेरी ज़िंदगी के बारे में एक बार भी नहीं सोचा?”

     

    उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    आदित्य चुपचाप वहाँ से चला गया।

     

    उस रात उसने अपने कमरे की दीवार से सगाई की तस्वीर उतार दी। मोबाइल का वॉलपेपर बदल दिया। लेकिन यादें… उन्हें कहाँ हटाया जा सकता था।

     

    अगले दिन दोनों परिवार आमने-सामने बैठे।

     

    सबको सच्चाई पता चली।

     

    घर में गुस्सा, रोना और आरोपों का दौर शुरू हो गया।

     

    तभी आदित्य ने सबको रोकते हुए कहा,

     

    “किसी को दोष मत दीजिए। गलती सिर्फ इतनी हुई है कि सच समय पर नहीं बोला गया।”

     

    फिर उसने जानवी की ओर देखकर कहा,

     

    “अगर आज भी तुम्हारा दिल रोहन के लिए धड़कता है, तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं। रिश्ता भरोसे से चलता है, मजबूरी से नहीं।”

     

    इतना कहकर उसने अपनी सगाई की अंगूठी उतारी और मेज़ पर रख दी।

     

    उस पल कमरे में बैठे हर इंसान की आँखें नम थीं।

     

    कुछ दिनों बाद जानवी की शादी रोहन से हो गई।

     

    उधर आदित्य ने खुद को पूरी तरह काम में डुबो दिया। उसने किसी से शिकायत नहीं की, लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं रहा।

     

    जो लड़का हर समय हँसता था, अब मुस्कुराने से पहले भी सोचता था।

     

    महीनों बाद एक दिन उसकी मुलाकात अपने पुराने स्कूल के शिक्षक से हुई।

     

    उन्होंने पूछा,

    “कैसे हो बेटा?”

     

    आदित्य मुस्कुराया और बोला,

    “ठीक हूँ।”

     

    शिक्षक ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा,

     

    “बेटा, ज़िंदगी में हर इंसान तुम्हारी किस्मत नहीं होता। कुछ लोग सिर्फ तुम्हें मज़बूत बनाने आते हैं।”

     

    ये बात उसके दिल में उतर गई।

     

    उसने धीरे-धीरे खुद को सँभालना शुरू किया। परिवार के साथ समय बिताने लगा। अपने अधूरे सपनों को पूरा करने में लग गया।

     

    कई साल बाद एक शादी में उसकी मुलाकात फिर से जानवी से हुई।

     

    दोनों की नज़रें मिलीं।

     

    जानवी की आँखों में पछतावा था।

     

    वह धीरे से बोली,

    “मुझे माफ़ कर दोगे?”

     

    आदित्य हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ़ कर दिया था… क्योंकि नफ़रत लेकर जीने से ज़्यादा मुश्किल कुछ नहीं होता।”

     

    इतना कहकर वह आगे बढ़ गया।

     

    उस दिन जानवी की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उसे पहली बार समझ आया कि धोखा सिर्फ रिश्ता नहीं तोड़ता, किसी के भरोसे और मासूमियत को भी हमेशा के लिए बदल देता है।

     

    और आदित्य…

     

    उसने उस दर्द को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। क्योंकि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में साथ निभाने नहीं, बल्कि हमें ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाने आते हैं।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • रहस्यमयी गांव

    पढ़ने का समय : 5 मिनट
    1.  गाँव जहाँ कभी किसी बच्चे का जन्म नहीं होता था

    राजस्थान की ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था अंधेरपुर। देखने में यह गाँव बिल्कुल साधारण था। चारों तरफ हरियाली, मिट्टी के घर, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और खेतों में मेहनत करते लोग। लेकिन इस गाँव का एक ऐसा नियम था, जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह जाता था।

     

    उस गाँव की ज़मीन पर कभी किसी बच्चे का जन्म नहीं होता था।

     

    अगर किसी औरत को गर्भ ठहर जाता, तो जैसे ही सातवाँ या आठवाँ महीना शुरू होता, पूरे परिवार वाले उसे शहर ले जाते। वहीं अस्पताल में बच्चे का जन्म कराया जाता और कुछ दिनों बाद माँ और बच्चा वापस गाँव लौट आते।

     

    गाँव के बाहर वालों को यही बताया जाता कि गाँव में अस्पताल नहीं है, इसलिए ऐसा किया जाता है। लेकिन गाँव के लोग जानते थे कि इसके पीछे एक ऐसा राज़ छिपा है, जिसके बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता।

     

    इसी गाँव में नई-नई शादी होकर आई थी जानवी। वह पढ़ी-लिखी, समझदार और बहुत ही सरल स्वभाव की लड़की थी। शादी के कुछ महीनों बाद जब उसे पता चला कि वह माँ बनने वाली है, तो पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। लेकिन उसी खुशी के साथ सबके चेहरों पर एक अजीब-सा डर भी उतर आया।

     

    एक रात जानवी ने अपनी सास से पूछा,

    “माँ जी… मैं कई दिनों से देख रही हूँ कि सब लोग किसी बात को लेकर परेशान हैं। आखिर बात क्या है?”

     

    सास ने गहरी साँस ली और बोली,

    “बेटी… समय आने पर तुम्हें शहर ले जाया जाएगा। बस इतना याद रखना कि इस गाँव में कोई बच्चा पैदा नहीं होता।”

     

    जानवी ने हैरानी से पूछा,”लेकिन क्यों?”

    सास ने उसकी तरफ देखा और बोली,

    “इस सवाल का जवाब हमारे पास भी नहीं है… बस यही परंपरा है।”

    अब जानवी की बेचैनी और बढ़ गई। उसे लगा कि ज़रूर कोई बहुत बड़ा राज़ छिपाया जा रहा है।

    एक दिन वह गाँव की सबसे बुज़ुर्ग महिला दादी कमला के पास पहुँची।

    “दादी, मुझे सच जानना है। आखिर ऐसा क्यों होता है?”

    दादी कमला ने चारों तरफ देखा, फिर धीमी आवाज़ में बोलीं,

    “अगर सच सुनना चाहती हो, तो आज रात पुराने बरगद के पेड़ के पास आ जाना।”

     

    रात गहरा चुकी थी। पूरा गाँव सो चुका था। जानवी धीरे-धीरे बरगद के पास पहुँची। वहाँ दादी पहले से उसका इंतज़ार कर रही थीं।

     

    दादी ने कहना शुरू किया,”आज से करीब सौ साल पहले इस गाँव में धरा नाम की एक दाई रहती थी। पूरे इलाके में उससे अच्छा प्रसव कोई नहीं कराता था।”

     

    “एक दिन गाँव के ज़मींदार की बहू को प्रसव पीड़ा हुई। धरा ने पूरी कोशिश की, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। माँ और बच्चा दोनों नहीं बच सके।”

     

    “ज़मींदार गुस्से से पागल हो गया। उसने अपनी गलती छिपाने के लिए पूरे गाँव के सामने धरा को दोषी ठहरा दिया।”

     

    “बिना कोई सबूत, बिना कोई सुनवाई… लोगों ने धरा को ज़िंदा जला दिया।”

     

    जानवी की आँखों से आँसू निकल आए।

    दादी की आवाज़ भर्रा गई।

    “मरते समय धरा ने बस इतना कहा था…”

    ‘जिस मिट्टी ने मेरे साथ अन्याय देखा है, अब इस मिट्टी पर किसी बच्चे की पहली साँस कभी नहीं गूँजेगी।’

     

    “उस दिन के बाद जो भी बच्चा इस गाँव में पैदा हुआ… वह कुछ ही मिनटों में मर गया।”

    “पहले किसी ने यकीन नहीं किया, लेकिन जब कई नवजात बच्चों की मौत हो गई, तब पूरे गाँव ने फैसला किया कि अब कोई भी बच्चा इस गाँव में पैदा नहीं होगा।”

    जानवी सारी रात सो नहीं पाई।

    समय बीतता गया। उसका नौवाँ महीना शुरू होने वाला था। परिवार वाले शहर जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि अचानक लगातार कई दिनों तक इतनी तेज़ बारिश हुई कि गाँव की सभी सड़कें टूट गईं।

    नदियाँ उफान पर थीं।

    शहर जाने का कोई रास्ता नहीं बचा था।पूरा गाँव डर से काँप उठा।

    लोग कहने लगे,

    “अगर इस बार बच्चा यहीं पैदा हुआ… तो फिर वही होगा जो हमेशा होता आया है।”

    इसी बीच जानवी को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।

    घर में अफरा-तफरी मच गई।

    कोई भगवान से प्रार्थना कर रहा था, कोई रो रहा था।

     

    दादी कमला ने जानवी का हाथ पकड़कर कहा,

    “डरना मत बेटी… जो होगा, देखा जाएगा।”

    कुछ घंटों बाद पूरे घर में एक मासूम बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

     

    सभी लोग साँस रोककर खड़े थे।

    एक मिनट…

    दो मिनट…

    पाँच मिनट…

    दस मिनट…

    लेकिन बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था।

    किसी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

    तभी अचानक ज़मीन ज़ोर से काँपी।

     

    पुराना बरगद बीच से टूटकर गिर पड़ा।

    उसकी जड़ों के नीचे से एक पुराना लोहे का संदूक दिखाई दिया।

    गाँव वालों ने उसे बाहर निकाला।

     

    उसके अंदर कुछ सोने के गहने और एक पुरानी डायरी रखी थी।डायरी ज़मींदार की थी।

     

    गाँव के मास्टर जी ने उसे पढ़ना शुरू किया।

    उसमें लिखा था “धरा निर्दोष थी। मेरी बहू की मौत मेरी लापरवाही से हुई थी। मैंने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए पूरे गाँव के सामने धरा को दोषी बना दिया। अगर कभी यह डायरी किसी को मिले… तो धरा से माफ़ी माँग लेना।”

     

    यह सुनते ही पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया।

     

    जिस औरत को सौ साल तक लोग दोषी मानते रहे…

    वह तो बिल्कुल बेगुनाह थी।

     

    हर किसी की आँखों से आँसू बहने लगे।

    अगले दिन पूरे गाँव ने उसी जगह धरा की याद में एक छोटी-सी समाधि बनाई।

     

    सबने हाथ जोड़कर उससे माफ़ी माँगी।

    उस रात गाँव के कई लोगों ने एक जैसा सपना देखा।

    सफेद कपड़ों में एक औरत मुस्कुराते हुए गाँव से दूर जा रही थी।

    जाते-जाते उसने कहा—

    “अब किसी माँ की गोद सूनी नहीं रहेगी।”

    कुछ महीनों बाद गाँव की दूसरी बहू भी गर्भवती हुई।

     

    इस बार किसी ने उसे शहर नहीं भेजा।

    सबके दिलों में डर तो था, लेकिन उम्मीद उससे कहीं ज़्यादा थी।

    समय आया…

    और पूरे गाँव की मौजूदगी में एक और बच्चे का जन्म हुआ।

    इस बार भी बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था।

    उस दिन पूरे गाँव में ढोल बजे।

    हर घर में मिठाइयाँ बाँटी गईं।मंदिर में दीप जलाए गए।

    लोगों की आँखों में खुशी के आँसू थे।

     

    जिस गाँव में कभी बच्चों की किलकारी सुनना एक सपना था…

    आज वही गाँव मासूम हँसी से गूँज रहा था।

     

    तब से अंधेरपुर की पहचान डर से नहीं, बल्कि एक सीख से होने लगी

    किसी बेगुनाह के साथ किया गया अन्याय कभी खत्म नहीं होता, जब तक सच सामने आकर न्याय न दिला दे।

     

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  • संत धन्ना जी महाराज लोकगाथा

    संत धन्ना जी महाराज लोकगाथा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    संत धन्ना जी की लोकगाथा

     

    राजस्थान के टोंक जिले के पास एक छोटा-सा गांव था। गांव की गलियां कच्ची थीं, घर मिट्टी के बने थे और लोगों का जीवन खेती-बाड़ी पर निर्भर था। उसी गांव में एक किसान परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया—धन्ना।

     

    धन्ना बचपन से ही दूसरे बच्चों से थोड़ा अलग था। जहां गांव के बच्चे खेलते-कूदते, वहीं धन्ना अक्सर खेतों की मेड़ पर बैठकर आसमान को निहारता रहता। कभी वह पेड़ों से बातें करता तो कभी गाय-बछड़ों के पास बैठकर उन्हें प्यार से सहलाता।

     

    उसकी मां अक्सर कहती, “धन्ना, तू इतना चुपचाप क्यों रहता है बेटा?”

     

    धन्ना मुस्कुराकर कहता, “मां, मैं भगवान से बात करता हूं।”

     

    मां हंस देती, “अरे पगले, भगवान से भी कोई बात करता है?”

     

    धन्ना बड़े विश्वास से कहता, “क्यों नहीं मां? अगर भगवान सबके हैं, तो मेरे भी तो हैं।”

     

    धीरे-धीरे धन्ना बड़ा होने लगा। उसके पिता खेती करते थे और धन्ना भी उनके साथ खेतों में काम करने लगा। सुबह सूरज निकलने से पहले वह उठ जाता और खेतों की ओर चला जाता। मिट्टी में काम करते हुए भी उसके मन में हमेशा भगवान का नाम रहता।

     

    एक दिन गांव में एक साधु आए। उनके साथ कुछ भक्त भी थे। वे भगवान की भक्ति और संतों की महिमा के बारे में बातें कर रहे थे। धन्ना भी चुपचाप उनके पास जाकर बैठ गया।

     

    साधु ने कहा, “भगवान को पाने के लिए बड़े-बड़े यज्ञ, धन-दौलत या महल जरूरी नहीं हैं। भगवान तो सच्चे मन से पुकारने पर मिल जाते हैं।”

     

    धन्ना ने तुरंत पूछा, “बाबा, अगर कोई सच्चे मन से भगवान को पुकारे, तो क्या भगवान सच में उसके पास आते हैं?”

     

    साधु मुस्कुराए, “हां बेटा, अगर पुकार सच्ची हो तो भगवान को आना ही पड़ता है।”

     

    धन्ना के मन में यह बात बस गई।

     

    उसने साधु से कहा, “बाबा, मुझे भी भगवान चाहिए।”

     

    साधु ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोले, “भक्ति कर बेटा। भगवान को अपना समझकर भज। वह जरूर मिलेंगे।”

     

    उस दिन के बाद धन्ना की भक्ति और गहरी हो गई। वह भगवान को अपने परिवार का हिस्सा मानने लगा। सुबह उठकर उनसे बातें करता, खेत में काम करते समय उन्हें याद करता और रात को सोने से पहले उन्हें अपनी दिनभर की सारी बातें बताता।

     

    एक दिन धन्ना ने साधु से पूछा, “बाबा, भगवान दिखाई क्यों नहीं देते?”

     

    साधु ने कहा, “जब तेरी भक्ति पूरी तरह सच्ची हो जाएगी, तब भगवान खुद तुझे दिखाई देंगे।”

     

    धन्ना ने उसी दिन मन में ठान लिया कि वह भगवान को जरूर बुलाएगा।

     

    वह रोज भगवान के सामने बैठकर कहता, “हे प्रभु, मैं आपको देखना चाहता हूं। आप मेरे पास आ जाइए। मैं आपके लिए खाना बनाऊंगा, आप मेरे साथ बैठकर खाइएगा।”

     

    गांव के लोग उसकी बातें सुनकर हंसते थे।

     

    कोई कहता, “देखो, धन्ना भगवान को अपने घर बुला रहा है।”

    कोई कहता, “अरे भगवान कोई इंसान हैं क्या, जो बुलाने पर घर आ जाएंगे?”

    लेकिन धन्ना को किसी की बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था।

    एक दिन उसने भगवान के लिए खाना बनाया। उसने थाली सजाई और सामने रखकर बोला, “प्रभु, आज आप मेरे साथ खाना खाइए।”

    वह इंतजार करता रहा।

    घंटों बीत गए।

    धन्ना ने फिर कहा, “प्रभु, शायद आप कहीं काम में होंगे। कोई बात नहीं, मैं इंतजार कर लूंगा।”

     

    शाम हो गई, लेकिन कोई नहीं आया।

    धन्ना ने खाना नहीं खाया। वह थाली के सामने बैठा रहा।

    उसकी मां ने कहा, “बेटा, खाना खा ले।”

    धन्ना बोला, “मां, पहले भगवान खाएंगे।”

    मां ने समझाया, “बेटा, भगवान तो दिखाई नहीं देते।”

    धन्ना ने मासूमियत से कहा, “मां, वे दिखाई नहीं देते तो क्या हुआ, वे सुनते तो हैं ना?”

    मां के पास कोई जवाब नहीं था।

    रात गहरी हो गई। धन्ना की आंखों से आंसू बहने लगे।

    वह हाथ जोड़कर बोला, “प्रभु, मैंने आपको सच्चे मन से बुलाया है। अगर आप नहीं आए तो लोग कहेंगे कि मेरा विश्वास झूठा था। मैं आपसे कुछ मांगता नहीं हूं। बस एक बार मेरे पास आ जाइए।”

    उसकी आवाज कांप रही थी।

    कहते हैं, उस रात उसकी सच्ची पुकार ने भगवान का हृदय भी पिघला दिया।

    धन्ना ने आंखें बंद कीं।

    कुछ देर बाद उसे लगा जैसे उसके सामने कोई खड़ा है।

    जब उसने आंखें खोलीं, तो उसके सामने भगवान का दिव्य स्वरूप था।

    धन्ना कुछ पल तक उन्हें देखता ही रह गया।

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

    वह बोला, “प्रभु… आप सच में आ गए?”

    भगवान मुस्कुराए।

    धन्ना ने तुरंत थाली उनकी ओर बढ़ा दी और बोला, “पहले आप खाना खाइए। मैंने आपके लिए बनाया है।”

    कहते हैं, भगवान ने उसके हाथों से भोजन स्वीकार किया।

    धन्ना की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसके लिए भगवान कोई दूर बैठे देवता नहीं थे। वे उसके अपने थे। उसके दुख में साथ देने वाले, उसकी खुशी में मुस्कुराने वाले और उसकी पुकार पर आने वाले।

    धीरे-धीरे धन्ना की भक्ति की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी। लोग उसे देखने आने लगे। बड़े-बड़े विद्वान उससे शास्त्रों की बातें पूछते, लेकिन धन्ना सरलता से कहता—

    “मुझे बड़े-बड़े मंत्र नहीं आते। मैं तो बस अपने भगवान को सच्चे मन से पुकारता हूं।”

    एक विद्वान ने उससे पूछा, “तुमने भगवान को कैसे पा लिया?”

    धन्ना ने कहा, “मैंने उन्हें कभी भगवान समझकर दूर नहीं रखा। मैंने उन्हें अपना समझकर पुकारा। शायद इसी कारण वे मेरे पास आ गए।”

    उसकी यही सरल भक्ति लोगों के हृदय को छू जाती।

    धन्ना जी ने लोगों को सिखाया कि भगवान को पाने के लिए जाति, धन, ऊंच-नीच या बड़े-बड़े दिखावे की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है तो केवल सच्चे मन की।

    उनका संदेश था

    “जिसके मन में सच्ची श्रद्धा हो, जिसके हृदय में छल न हो, और जो भगवान को अपना मानकर पुकारे, उसके लिए भगवान दूर नहीं रहते।”

    आज भी राजस्थान की लोकधुनों में संत धन्ना जी का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। टोंक की धरती उनकी भक्ति की गवाही देती है। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति किसी बड़े मंदिर, महल या धन की मोहताज नहीं होती।

    कभी-कभी एक भोले किसान का सच्चा विश्वास भी भगवान को उसके दरवाजे तक ले आता है।

    और यही संत धन्ना जी की लोकगाथा का सबसे बड़ा संदेश है

    भगवान को पाने के लिए विद्वान होना जरूरी नहीं, बस दिल से सच्चा होना जरूरी है।

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    Auther preeti Sharma

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  • जिसे सबने डायन कहा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गांव के आखिरी छोर पर एक पुराना-सा घर था। उस घर की सबसे ऊपरी मंजिल पर एक कमरा था, जिसकी खिड़की हमेशा बंद रहती थी। उस कमरे में पिछले सात सालों से एक औरत कैद थी।

     

    उसका नाम था गौरी।

     

    गांव वाले उसे डायन कहते थे।

     

    उसके अपने घरवाले उसे मनहूस कहते थे।

     

    और उसके ससुराल वाले उसे अपने बेटे और पोते की कातिल कहते थे।

     

    लेकिन सच क्या था… यह सिर्फ गौरी जानती थी।

     

    और शायद उसका भगवान।

     

    सात साल पहले गौरी की शादी राघव से हुई थी। राघव गांव के सबसे बड़े जमींदार का इकलौता बेटा था। गौरी गरीब घर की लड़की थी, मगर उसके चेहरे पर ऐसी मासूमियत थी कि राघव पहली नजर में ही उसे अपना दिल दे बैठा था।

     

    शादी के बाद गौरी ने उस घर को अपना सब कुछ मान लिया।

     

    राघव उसे बहुत प्यार करता था।

     

    “गौरी, अगर कभी मेरे और तुम्हारे बीच कोई आए ना… तो तुम मेरा हाथ मत छोड़ना,” राघव अक्सर उससे कहता।

     

    गौरी हंसकर कहती, “आप कैसी बातें करते हैं? मैं तो आपके साथ सात जन्मों तक चलने वाली हूं।”

     

    उनकी जिंदगी में एक साल बाद एक बेटा आया।

     

    छोटा-सा मन्नु।

     

    राघव तो जैसे पागल हो गया था अपने बेटे के प्यार में।

     

    “देखना गौरी, हमारा मन्नु बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”

     

    गौरी मुस्कुराकर कहती, “नहीं… पहले ये बड़ा होकर अच्छा इंसान बनेगा।”

     

    उनकी जिंदगी में खुशियां थीं।

     

    लेकिन कुछ लोग उनकी खुशी से खुश नहीं थे।

     

    राघव का छोटा भाई विक्रम हमेशा चाहता था कि जायदाद उसके हाथ आए। मगर राघव के रहते यह कभी संभव नहीं था।

     

    एक रात राघव शहर से लौट रहा था।

     

    अगली सुबह उसकी लाश सड़क के किनारे मिली।

     

    उसकी हत्या हो चुकी थी।

     

    गांव में मातम छा गया।

     

    गौरी का तो जैसे संसार ही खत्म हो गया।

     

    वह राघव की लाश से लिपटकर चीखती रही।

     

    “उठिए ना… आपने कहा था मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ेंगे… फिर मुझे अकेला छोड़कर क्यों चले गए?”

     

    लेकिन राघव कभी नहीं उठा।

     

    उस दिन के बाद गौरी के लिए हर सांस सजा बन गई।

     

    और फिर एक महीने बाद उसका बेटा मन्नु भी अचानक बीमार पड़ गया।

     

    गौरी रात-दिन उसके सिरहाने बैठी रही।

     

    “बेटा… आंखें खोलो ना… मां यहीं है।”

     

    लेकिन गांव में अफवाह फैलने लगी।

     

    “पहले पति मरा… अब बेटा भी मर रहा है।”

     

    “ये औरत मनहूस है।”

     

    “इसके घर में कदम रखते ही मौत आती है।”

     

    फिर एक दिन मन्नु भी दुनिया छोड़ गया।

     

    गौरी ने अपने बेटे को अपनी गोद में उठाया और पागलों की तरह चीखती रही।

     

    “मेरा बच्चा मरा नहीं है… ये झूठ है… मेरा मन्नु मुझे छोड़कर नहीं जा सकता!”

     

    उसके ससुर ने उसे धक्का देकर कहा,

     

    “तू डायन है!”

     

    गौरी जमीन पर गिर पड़ी।

     

    “बाबा… मैं मां हूं… अपने बच्चे को कैसे मार सकती हूं?”

     

    “तूने ही मेरे बेटे को खाया… तूने ही मेरे पोते को मारा!”

     

    गौरी चीखती रही।

     

    “नहीं!”

     

    लेकिन उस घर में किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    राघव की मौत का इल्जाम भी उसके सिर डाल दिया गया।

     

    लोगों ने कहा कि गौरी ने अपने पति की संपत्ति के लिए उसे मरवा दिया।

     

    और बेटे की मौत के बाद तो पूरा गांव उसके खिलाफ हो गया।

     

    उसे घर के एक कमरे में बंद कर दिया गया।

     

    वह कमरा किसी जेल से भी बदतर था।

     

    न खिड़की खुलती थी।

     

    न धूप आती थी।

     

    न किसी को उससे बात करने की इजाजत थी।

     

    दिन में एक बार उसके सामने खाना फेंक दिया जाता।

     

    कभी-कभी उसकी सास दरवाजे के बाहर खड़ी होकर कहती,

     

    “तेरी वजह से मेरा बेटा गया… मेरा पोता गया… तू मर क्यों नहीं जाती?”

     

    गौरी चुपचाप दीवार से टिककर बैठी रहती।

     

    वह रोती नहीं थी।

     

    क्योंकि रोते-रोते उसकी आंखों के आंसू खत्म हो चुके थे।

     

    उसके पास बस एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    राघव और मन्नु की।

     

    वह रोज उस तस्वीर को अपने सीने से लगाकर कहती,

     

    “मैंने नहीं मारा तुम्हें… भगवान की कसम, मैंने नहीं मारा।”

     

    सात साल गुजर गए।

     

    गौरी के बाल सफेद हो गए।

     

    चेहरा सूख गया।

     

    लेकिन उसकी आंखों में आज भी वही दर्द था।

     

    एक रात तेज बारिश हो रही थी।

     

    गौरी अपने कमरे में बैठी तस्वीर को देख रही थी।

     

    तभी बाहर से कुछ आवाजें आईं।

     

    विक्रम किसी आदमी से बात कर रहा था।

     

    “अब सात साल हो गए हैं। उस कमरे में पड़ी औरत को कौन याद रखता है?”

     

    दूसरे आदमी ने कहा,

     

    “लेकिन अगर उसे सच पता चल गया तो?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “वो सच जानकर भी क्या कर लेगी? सब उसे डायन मानते हैं।”

     

    गौरी का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    वह दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो गई।

     

    विक्रम की आवाज फिर आई।

     

    “राघव को मैंने मारा था। अगर वो जिंदा रहता तो सारी जायदाद मेरे हाथ से चली जाती।”

     

    गौरी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    फिर वह बोला,

     

    “और मन्नु… उसे भी उसी दवा से मारा था। डॉक्टर ने कहा था कि बच्चा बच सकता है, लेकिन मैंने पैसे देकर उसे इलाज नहीं करने दिया।”

     

    गौरी का शरीर कांपने लगा।

     

    उसका बच्चा बीमारी से नहीं मरा था।

     

    उसे मारा गया था।

     

    और सात साल तक उसकी मां को कातिल कहा गया।

     

    गौरी ने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया।

     

    “दरवाजा खोलो!”

     

    विक्रम चौंक गया।

     

    “कौन है?”

     

    “दरवाजा खोलो! मैंने सब सुन लिया है!”

     

    विक्रम कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने नौकरों को आवाज दी।

     

    लेकिन तभी बाहर पुलिस की गाड़ी रुकने की आवाज आई।

     

    गौरी के कमरे के सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    वह राघव का पुराना दोस्त था।

     

    सात साल पहले वह शहर चला गया था। कुछ दिन पहले ही लौटकर उसे सारी सच्चाई पता चली थी।

     

    उसने पुलिस को सब बता दिया था।

     

    विक्रम पकड़ा गया।

     

    सच सामने आ गया।

     

    राघव की हत्या।

     

    मन्नु की हत्या।

     

    और गौरी पर लगाए गए सारे झूठे इल्जाम।

     

    गौरी के ससुर उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े थे।

     

    “बहू… हमें माफ कर दे।”

     

    गौरी उन्हें देखती रही।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    “आपने मुझे सात साल तक इस कमरे में बंद रखा।”

     

    ससुर रो पड़े।

     

    “हमसे गलती हो गई।”

     

    गौरी ने तस्वीर को सीने से लगाते हुए कहा,

     

    “गलती?”

     

    उसकी आवाज टूट गई।

     

    “गलती तो एक दिन की होती है बाबा… आपने मेरी पूरी जिंदगी ही छीन ली।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    गौरी ने तस्वीर में राघव और मन्नु को देखा।

     

    “देखो… आज सबको पता चल गया कि तुम्हारी मां बेगुनाह थी।”

     

    फिर वह धीरे से मुस्कुराई।

     

    “लेकिन तुम दोनों होते ना… तो मुझे कभी खुद को साबित करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।”

     

    वह कमरे से बाहर निकली।

     

    सात साल बाद पहली बार उसके पैरों पर धूप पड़ी।

     

    गौरी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

     

    लेकिन उसके भीतर का अंधेरा अब भी वहीं था।

     

    क्योंकि सच सामने आ गया था…

    मगर उसका पति वापस नहीं आया।

    उसका बेटा वापस नहीं आया।और उसके जीवन के वो सात साल भी कभी वापस नहीं आने वाले थे।

    गांव वालों ने उसे डायन कहा था।

    घरवालों ने उसे कातिल कहा था।

    लेकिन वह सिर्फ एक पत्नी थी…

    एक मां थी…

    जो अपने पति और बेटे को खोने के बाद भी सात साल तक जिंदा रही।

     

    सिर्फ इसलिए…

     

    ताकि एक दिन दुनिया को बता सके कि वह बेगुनाह थी।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अधूरी मुहब्बत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शहर के एक किनारे पर एक बहुत बड़ी पुरानी हवेली थी, जिसे लोग राठौर हवेली कहते थे। उसी शहर के दूसरे छोर पर एक छोटा-सा घर था, जहां आलिया अपने परिवार के साथ रहती थी।

     

    दोनों परिवार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे।

     

    राठौर परिवार अपने खानदान, अपनी परंपराओं और अपनी ऊंची सोच के लिए जाना जाता था। उनके लिए परिवार की इज्जत सबसे ऊपर थी।

     

    वहीं आलिया का परिवार अपने अलग विचारों और संस्कारों को सबसे ज्यादा मानता था।

     

    दोनों परिवारों के बीच कोई बड़ी दुश्मनी नहीं थी, लेकिन उनके बीच एक ऐसी दूरी थी, जिसे पार करना किसी के लिए भी आसान नहीं था।

     

    और फिर एक दिन…

     

    आलिया की मुलाकात तपिश से हुई।

     

    पहली मुलाकात बिल्कुल आम थी।

     

    आलिया कॉलेज के बाहर बारिश में खड़ी थी। उसके पास छाता नहीं था और बारिश लगातार तेज होती जा रही थी।

     

    तभी एक लड़का उसके सामने छाता लेकर आकर खड़ा हो गया।

     

    “आप भीग जाएंगी,” उसने कहा।

     

    आलिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और आप?”

     

    तपिश हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैं तो पहले से भीग चुका हूं।”

     

    आलिया हंस पड़ी।

     

    उसे क्या पता था कि बारिश में मिला यह अजनबी उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाला था।

     

    धीरे-धीरे दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं।

     

    कभी कॉलेज के बाहर…

     

    कभी सड़क किनारे चाय की दुकान पर…

     

    कभी किसी बहाने से फोन पर घंटों बातें।

     

    तपिश को आलिया की बातें अच्छी लगती थीं और आलिया को तपिश का खामोश रहकर भी उसकी हर बात समझ जाना।

     

    एक दिन आलिया ने उससे पूछा,

     

    “तुम्हें पता है ना… हम दोनों का साथ होना आसान नहीं है?”

     

    तपिश कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “हां।”

     

    “बहुत मुश्किल है।”

     

    “हां।”

     

    “शायद नामुमकिन भी।”

     

    तपिश ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “लेकिन तुमसे मोहब्बत करना तो मेरे हाथ में भी नहीं था।”

     

    आलिया की आंखें भर आईं।

     

    “तुम जानते हो ना कि हमारे परिवार कभी हमें स्वीकार नहीं करेंगे?”

     

    “जानता हूं।”

     

    “फिर भी?”

     

    तपिश ने धीरे से कहा,

     

    “फिर भी।”

     

    उस दिन दोनों ने पहली बार एक-दूसरे का हाथ पकड़ा था।

     

    दोनों जानते थे कि उनका मिलना शायद इस जन्म में संभव नहीं था।

     

    फिर भी दोनों ने मोहब्बत कर ली।

     

    क्योंकि कुछ मोहब्बतें सोच-समझकर नहीं होतीं।

     

    वो बस हो जाती हैं।

     

    और फिर इंसान चाहे पूरी दुनिया से लड़ ले… अपने दिल से नहीं लड़ पाता।

     

    कुछ महीनों बाद उनके रिश्ते की खबर दोनों परिवारों तक पहुंच गई।

     

    आलिया के घर में तूफान आ गया।

     

    उसके पिता ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम उस लड़के से दोबारा नहीं मिलोगी।”

     

    आलिया चुप रही।

     

    “मैं तुमसे बात कर रहा हूं!”

     

    आलिया की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “पापा… मैं उससे प्यार करती हूं।”

     

    कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

     

    फिर उसके पिता ने कहा,

     

    “प्यार? ये प्यार नहीं है। ये हमारे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिलाने की जिद है।”

     

    उधर तपिश के घर में भी वही हाल था।

     

    उसके पिता ने उसे साफ शब्दों में कह दिया,

     

    “उस लड़की को भूल जाओ।”

     

    तपिश ने पहली बार अपने पिता के सामने सिर उठाकर कहा,

     

    “मैं उसे भूल नहीं सकता।”

     

    “तो फिर इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं।”

     

    तपिश कुछ देर तक अपने पिता को देखता रहा।

     

    फिर उसने सिर्फ इतना कहा,

     

    “अगर मेरी मोहब्बत इतनी बड़ी गलती है… तो मैं ये गलती जिंदगी भर करूंगा।”

     

    उस रात दोनों ने फोन पर बात की।

     

    आलिया बहुत रो रही थी।

     

    “तपिश… शायद हमें अलग होना पड़ेगा।”

     

    तपिश चुप था।

     

    “कुछ बोलो ना…”

     

    तपिश ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”

     

    “मैं भी नहीं।”

     

    “तो फिर मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    आलिया रोते हुए बोली,

     

    “मैं जाना नहीं चाहती तपिश… लेकिन शायद हमारी किस्मत हमें साथ नहीं देखना चाहती।”

     

    तपिश ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    “अगर इस जन्म में हम नहीं मिल सके…”

     

    आलिया ने रोते हुए पूछा,

     

    “तो?”

     

    तपिश ने कहा,

     

    “तो अगले जन्म में मैं तुम्हें पहले ढूंढूंगा।”

     

    आलिया ने धीमे से पूछा,

     

    “और अगर मैं तुम्हें पहचान न पाई तो?”

     

    तपिश मुस्कुराया, लेकिन उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “तो मैं फिर से तुमसे प्यार कर लूंगा।”

     

    दोनों ने तय किया कि वे आखिरी बार मिलेंगे।

     

    उस रात आलिया अपने घर से चुपचाप निकली और शहर के बाहर उसी सुनसान सड़क पर पहुंची, जहां तपिश उसका इंतजार कर रहा था।

     

    दोनों आमने-सामने खड़े थे।

     

    काफी देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

     

    फिर आलिया ने कहा,

     

    “तपिश… क्या हम सच में इतने गलत थे?”

     

    तपिश ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर हमें सजा क्यों मिल रही है?”

     

    तपिश के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

     

    आलिया उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “काश हम किसी ऐसी दुनिया में मिले होते जहां हमारे नाम से पहले हमारा परिवार न पूछा जाता।”

     

    तपिश की आंखें भर आईं।

     

    “काश…”

     

    “काश हम बस आलिया और तपिश होते।”

     

    दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे का हाथ पकड़े खड़े रहे।

     

    फिर अचानक दूर से तेज रोशनी उनकी ओर बढ़ी।

     

    एक तेज रफ्तार गाड़ी सड़क पर बेकाबू होकर उनकी तरफ आ रही थी।

     

    तपिश ने आलिया को धक्का देकर सड़क से दूर कर दिया।

     

    आलिया गिर गई।

     

    और अगले ही पल…

     

    तपिश उस गाड़ी की चपेट में आ गया।

     

    “तपिश!”

     

    आलिया चीखते हुए उसके पास भागी।

     

    तपिश सड़क पर पड़ा था।

     

    आलिया ने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया।

     

    “तपिश… आंखें खोलो… प्लीज आंखें खोलो…”

     

    तपिश ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    उसने आलिया की तरफ देखा।

     

    “तुम… ठीक हो?”

     

    आलिया जोर-जोर से रोने लगी।

     

    “तुम मुझे बचाकर खुद क्यों चले गए?”

     

    तपिश ने बहुत मुश्किल से मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “क्योंकि… तुमसे ज्यादा जरूरी… मेरे लिए कुछ नहीं था।”

     

    आलिया उसके हाथ को कसकर पकड़कर बोली,

     

    “मुझे छोड़कर मत जाओ… मैंने तुम्हें अगले जन्म में ढूंढना है।”

     

    तपिश की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं… इंतजार करूंगा।”

     

    “तपिश…”

     

    “आलिया…”

     

    “हां?”

     

    “अगर… अगले जन्म में भी हमारे परिवार अलग हुए…”

     

    आलिया रोते हुए बोली,

     

    “तो?”

     

    तपिश ने बहुत धीमी आवाज में कहा,

     

    “तो इस बार… तुम मेरा हाथ मत छोड़ना।”

     

    आलिया ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “नहीं छोड़ूंगी।”

     

    तपिश की आंखें धीरे-धीरे बंद हो गईं।

     

    आलिया चीखती रही।

     

    “तपिश… उठो ना…”

     

    लेकिन तपिश नहीं उठा।

     

    उस रात दो परिवारों की नफरत ने अपने बच्चों से उनकी मोहब्बत छीन ली थी।

     

    तपिश चला गया।

     

    और आलिया…

     

    वो जिंदा तो रही, लेकिन उसके अंदर कुछ हमेशा के लिए मर गया।

     

    कई साल बाद भी आलिया उसी सड़क के किनारे हर साल उसी दिन जाकर बैठती थी।

     

    उसके हाथ में वही पुराना छाता होता था, जो तपिश ने उसे पहली बारिश में दिया था।

     

    लोग पूछते,

     

    “तुम अब तक उसका इंतजार क्यों करती हो?”

     

    आलिया मुस्कुराकर कहती,

     

    “क्योंकि उसने कहा था… वो इंतजार करेगा।”

     

    और फिर वो आसमान की तरफ देखकर धीरे से कहती,

     

    “तपिश… अगर सच में कोई अगला जन्म होता है ना…”

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगते।

    “तो इस बार मुझे ढूंढने में देर मत करना।”

    कहते हैं, कुछ प्रेम कहानियां शादी तक पहुंचकर पूरी नहीं होतीं।

    कुछ प्रेम कहानियां साथ जीकर पूरी नहीं होतीं।

    कुछ मोहब्बतें तो मौत के बाद भी अधूरी रह जाती हैं…

     

    क्योंकि दो लोग एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं,

    लेकिन उनकी किस्मत…

    उन्हें एक-दूसरे का होकर भी…

    एक-दूसरे के साथ जीने नहीं देती।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • एक सफर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अमन को ट्रैवल करना बहुत पसंद था। उसे किसी एक जगह टिककर रहना बिल्कुल पसंद नहीं था। जैसे ही उसे कुछ दिनों की छुट्टी मिलती, वह अपना बैग उठाता और किसी नई जगह निकल जाता।

     

    कभी पहाड़ों पर, कभी समुद्र के किनारे, कभी किसी छोटे से गाँव में।

     

    लेकिन उसकी जिंदगी में एक अजीब सी परेशानी थी।

     

    एक लड़की।

     

    वो लड़की बार-बार उसके सामने आ जाती थी।

     

    पहली बार अमन ने उसे जयपुर की एक सड़क पर देखा था। वह अपने कैमरे से एक पुरानी हवेली की तस्वीर ले रहा था कि अचानक वही लड़की उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

     

    अमन ने उसे देखकर भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “तुम?”

     

    लड़की ने उसे देखा और बोली, “क्या हुआ?”

     

    “तुम यहाँ कैसे?”

     

    “मैं यहाँ घूमने आई हूँ।”

     

    “लेकिन मैं भी यहाँ घूमने आया हूँ।”

     

    लड़की ने उसे अजीब नजरों से देखा। “तो?”

     

    अमन ने सिर हिलाया और आगे बढ़ गया।

     

    उसने सोचा, बस एक बार मिली है। दुनिया इतनी बड़ी है, दोबारा कहाँ मिलेगी।

     

    लेकिन उसी शाम जब वह एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठा था, वही लड़की उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठी चाय पी रही थी।

     

    अमन ने चाय का कप नीचे रखा।

     

    “तुम मेरा पीछा कर रही हो?”

     

    लड़की ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

     

    “मैं? तुम्हारा पीछा क्यों करूंगी?”

     

    “तो फिर तुम यहाँ भी कैसे?”

     

    “मैं पहले से यहाँ बैठी हूँ।”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    लड़की मुस्कुराकर बोली, “तुम्हें शायद लगता है कि पूरी दुनिया सिर्फ तुम्हारे लिए बनी है।”

     

    “मुझे ऐसा नहीं लगता।”

     

    “तो फिर परेशान क्यों हो रहे हो?”

     

    अमन ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस लड़की का नाम मीरा था।

     

    अमन ने सोचा कि जयपुर के बाद वह उससे कभी नहीं मिलेगा।

     

    लेकिन कुछ दिनों बाद वह ऋषिकेश चला गया।

     

    सुबह-सुबह वह गंगा किनारे बैठा था। चारों तरफ शांति थी। अमन ने राहत की सांस ली।

     

    “आखिरकार… अकेला।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई।

     

    “किससे अकेले?”

     

    अमन ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    अमन के चेहरे का रंग ही बदल गया।

     

    “तुम यहाँ भी?”

     

    मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ। तुम यहाँ भी?”

     

    “मैं पहले आया था।”

     

    “तो मैंने कब कहा कि तुम मेरे पीछे आए हो?”

     

    अमन ने अपना माथा पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें पता है, ये बहुत अजीब है।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं जहाँ जाता हूँ, तुम वहाँ मिल जाती हो।”

     

    मीरा कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “शायद तुम्हारी किस्मत खराब है।”

     

    अमन ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम्हें ये मजाक बहुत अच्छा लगता है, है ना?”

     

    “बहुत।”

     

    उस दिन के बाद दोनों की मुलाकातें और भी अजीब होती चली गईं।

     

    अमन किसी पहाड़ी रास्ते पर जाता, मीरा वहाँ मिल जाती।

     

    वह बस में बैठता, मीरा उसी बस में होती।

     

    वह किसी छोटे से गाँव की चाय की दुकान पर रुकता, मीरा वहाँ पहले से चाय पी रही होती।

     

    एक बार तो अमन ने जानबूझकर किसी को बताए बिना एक छोटी सी पहाड़ी जगह जाने का फैसला किया।

     

    उसने सोचा, “इस बार तो मीरा बिल्कुल नहीं मिलेगी।”

     

    लेकिन जैसे ही वह पहाड़ी सड़क के एक मोड़ पर पहुँचा, सामने मीरा खड़ी थी।

     

    अमन ने बाइक रोक दी।

     

    “तुम यहाँ कैसे?”

     

    मीरा ने कंधे उचकाए।

     

    “मैं भी घूमने आई हूँ।”

     

    “तुम्हें हर बार वही जगह क्यों पसंद आती है, जहाँ मैं जाता हूँ?”

     

    “शायद हमारी पसंद मिलती है।”

     

    अमन ने तुरंत कहा, “हमारी पसंद बिल्कुल नहीं मिलती।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो फिर तुम हर बार मुझे देखकर रुक क्यों जाते हो?”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं था।

     

    धीरे-धीरे मीरा उसकी परेशानी से उसकी आदत बनने लगी।

     

    पहले अमन उसे देखकर परेशान होता था।

     

    फिर उसे देखकर चिढ़ता था।

     

    फिर उसे देखकर मुस्कुराने लगा।

     

    और कुछ समय बाद…

     

    जब वह कहीं जाता और मीरा दिखाई नहीं देती, तो उसे खुद अजीब लगने लगता।

     

    एक बार अमन अकेला मनाली चला गया।

     

    पहला दिन उसे बहुत अच्छा लगा।

     

    दूसरे दिन भी।

     

    लेकिन तीसरे दिन वह एक खूबसूरत पहाड़ी रास्ते पर बैठा था और अचानक उसे महसूस हुआ कि कुछ कमी है।

     

    कोई उससे बहस नहीं कर रहा था।

     

    कोई उसकी चाय नहीं छीन रहा था।

     

    कोई उसके कैमरे के सामने आकर उसकी तस्वीर खराब नहीं कर रहा था।

     

    अमन ने धीरे से कहा, “मीरा होती तो अब तक परेशान कर चुकी होती।”

     

    “अच्छा?”

     

    अमन उछल पड़ा।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    अमन कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    “तुम यहाँ भी?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “हाँ।”

     

    “तुम सच में मेरा पीछा करती हो।”

     

    “मैंने कहा ना, मैं बस घूमने आती हूँ।”

     

    अमन उसके पास जाकर बैठ गया।

     

    “तुम्हें पता है, पहले मुझे तुमसे बहुत परेशानी होती थी।”

     

    “पहले?”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    मीरा ने उसे देखा।

     

    “अब नहीं होती?”

     

    अमन ने सामने पहाड़ों की ओर देखते हुए कहा, “अब… जब तुम नहीं होती, तब होती है।”

     

    मीरा पहली बार चुप हो गई।

     

    दोनों के बीच कुछ देर तक कोई बात नहीं हुई।

     

    बस पहाड़ों से आती ठंडी हवा चलती रही।

     

    फिर मीरा ने धीरे से पूछा, “तो अब मैं तुम्हारा पीछा करूँ तो तुम्हें बुरा नहीं लगेगा?”

     

    अमन ने उसकी ओर देखा।

     

    “अगर तुम मेरे पीछे नहीं आओगी…”

     

    मीरा ने मुस्कुराकर पूछा, “तो?”

     

    अमन ने नजरें चुरा लीं।

     

    “तो शायद मैं खुद तुम्हारे पीछे आ जाऊँगा।”

     

    मीरा हँसने लगी।

     

    अमन भी मुस्कुरा दिया।

     

    लेकिन उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    क्योंकि कुछ दिनों बाद अमन अपने घर वापस आ गया।

     

    वह सुबह-सुबह नींद में अपने बाथरूम की ओर गया और जैसे ही उसने दरवाजा खोला…

     

    अंदर मीरा खड़ी थी।

     

    अमन कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

     

    फिर जोर से चिल्लाया।

     

    “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

     

    मीरा भी डर गई।

     

    “ये तुम्हारा घर है?”

     

    “हाँ!”

     

    “मुझे लगा ये मेरा कमरा है!”

     

    अमन ने बाहर जाकर देखा।

     

    वह सच में गलत कमरे में आ गया था।

     

    मीरा कुछ पल उसे देखती रही और फिर जोर-जोर से हँसने लगी।

     

    अमन ने शर्मिंदा होकर कहा, “किसी को बताना मत।”

     

    मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “अब तो मैं जिंदगी भर बताऊँगी।”

     

    अमन ने सिर पकड़ लिया।

     

    “तुमसे पीछा छुड़ाना असंभव है।”

     

    मीरा उसके पास आई और बोली,

     

    “किसने कहा कि तुम्हें मेरा पीछा छुड़ाना है?”

     

    अमन ने उसकी ओर देखा।

     

    इस बार उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था।

     

    बस एक हल्की सी मुस्कान थी।

     

    उसे समझ आ गया था कि मीरा सच में उसका पीछा नहीं कर रही थी।

     

    बस हर सफर में उसके रास्ते उससे मिल जाते थे।

     

    कभी किसी सड़क पर…

     

    कभी किसी पहाड़ पर…

     

    कभी किसी अनजान शहर में…

     

    और कभी-कभी उसके अपने घर के

    बाथरूम में भी।

     

    पहले अमन को लगता था कि मीरा उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी परेशानी है।

     

    लेकिन अब वह जान चुका था…

     

    कुछ लोग हमारी जिंदगी में अचानक नहीं आते।

     

    वो बार-बार हमारे सामने आते हैं।

     

    जब तक हम ये समझ न जाएँ कि शायद…

     

    वो रास्ते का हिस्सा नहीं,

     

    बल्कि हमारी मंजिल का हिस्सा हैं।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • जिसे हम लड़ाई समझते रहे

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    जिसे हम लड़ाई समझते रहे

     

    “तुमने फिर मेरी किताब छुपाई?”

     

    सिया ने गुस्से में आरव के कमरे का दरवाज़ा खोलते हुए पूछा।

     

    आरव बिल्कुल आराम से कुर्सी पर बैठा था और उसके हाथ में वही किताब थी, जिसे सिया पिछले दस मिनट से पूरे घर में ढूंढ रही थी।

     

    “मैंने नहीं छुपाई,” आरव ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा, “बस तुम्हारी किताब को थोड़ी देर के लिए मुझसे मिलने का मौका दिया था।”

     

    सिया ने उसे घूरकर देखा।

     

    “आरव!”

     

    “क्या?”

    “तुम कभी बड़े नहीं हो सकते?”

     

    आरव हंस पड़ा।

    “और तुम कभी गुस्सा करना बंद नहीं कर सकती?”

     

    सिया ने उसके हाथ से किताब छीनी और पैर पटकती हुई बाहर जाने लगी।

     

    “वैसे गणित का होमवर्क कर लिया?” आरव ने पीछे से पूछा।

     

    सिया अचानक रुक गई।

     

    “तुम्हें कैसे पता कि नहीं किया?”

     

    “तुम्हारी शक्ल देखकर।”

     

    “तुम बहुत परेशान करते हो!”

     

    “पता है।”

     

    “फिर भी नहीं सुधरते?”

     

    आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हारे साथ रहने की आदत है।”

     

    सिया कुछ पल उसे देखती रही। फिर बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

     

    लेकिन उस दिन आरव की वह बात उसके मन में बहुत देर तक घूमती रही।

     

    आरव और सिया बचपन से एक-दूसरे को जानते थे। उनके घर आमने-सामने थे और दोनों की जिंदगी में एक-दूसरे की मौजूदगी हमेशा से थी। बचपन में उनकी लड़ाई किसी भी बात पर शुरू हो जाती थी।

     

    कभी आरव सिया की चोटी खींच देता।

     

    कभी सिया उसकी कॉपी पर पेन से मूंछें बना देती।

     

    कभी आरव उसका टिफिन खा जाता और मासूम बनकर कहता, “मुझे लगा ये मेरा है।”

     

    सिया गुस्से में कहती, “तुम्हें हर चीज़ अपना ही क्यों लगती है?”

     

    आरव हंसते हुए जवाब देता, “क्योंकि तुम मेरी पड़ोसन हो।”

     

    “तो?”

     

    “तो पड़ोसी की चीज़ें आधी अपनी होती हैं।”

     

    “मैं कोई चीज़ नहीं हूं!”

     

    “हां, तुम तो पूरी आफत हो।”

     

    और फिर दोनों लड़ते-लड़ते खुद ही हंसने लगते।

     

    समय बीतता गया। बचपन पीछे छूट गया। स्कूल खत्म हुआ और कॉलेज शुरू हो गया। उनकी लड़ाइयां अब भी खत्म नहीं हुई थीं, बस उनका तरीका बदल गया था।

     

    पहले आरव सिया की चोटी खींचता था, अब उसके हाथ से फोन छीनकर भाग जाता था।

     

    पहले सिया उसकी कॉपी फाड़ देती थी, अब उसके सोशल मीडिया पर अजीब-अजीब तस्वीरें लगा देती थी।

     

    लेकिन इन सबके बीच कुछ धीरे-धीरे बदल रहा था।

     

    अब अगर आरव एक दिन सिया से बात न करे, तो सिया को अजीब-सा लगने लगता।

     

    वह खुद से पूछती, “आज ये चुप क्यों है?”

     

    फिर खुद ही जवाब देती, “मुझे क्या फर्क पड़ता है?”

     

    लेकिन फर्क पड़ता था।

     

    बहुत ज्यादा।

     

    एक दिन कॉलेज से लौटते समय सिया का पैर सड़क पर फिसल गया। वह गिरते-गिरते बची। आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “देखकर नहीं चल सकती?”

     

    सिया ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, “मैं ठीक हूं।”

     

    “हां, दिख रहा है। गिरते-गिरते भी तुम्हें अपनी अकड़ की चिंता है।”

     

    “तुम मदद कर रहे हो या ताना मार रहे हो?”

     

    “दोनों।”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    आरव अब भी उसका हाथ पकड़े हुए था।

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर सिया ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया।

     

    “छोड़ो।”

     

    आरव ने तुरंत हाथ छोड़ दिया।

     

    लेकिन उस दिन दोनों के बीच कुछ बदल गया था।

     

    सिया ने पहली बार महसूस किया कि आरव का हाथ पकड़ना उसे बुरा नहीं लगा था।

     

    बल्कि अच्छा लगा था।

     

    बहुत अच्छा।

     

    लेकिन उसने इस एहसास को समझने की कोशिश नहीं की।

     

    क्योंकि आरव और सिया के बीच प्यार जैसी कोई चीज़ हो सकती है, यह सोच भी उन्हें अजीब लगती थी।

     

    वे तो बचपन से लड़ते आए थे।

     

    कुछ दिनों बाद आरव की तबीयत खराब हो गई। सिया को पता चला तो वह शाम को उसके घर पहुंच गई।

     

    आरव बिस्तर पर लेटा था।

     

    सिया दरवाज़े पर खड़ी होकर बोली, “क्या हुआ?”

     

    आरव ने आंखें खोलकर उसे देखा।

     

    “तुम?”

     

    “हां, मैं। तुम्हें देखने आई हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम बीमार हो।”

     

    “तो?”

     

    “तो क्या?”

     

    “तुम्हें मेरी चिंता हो रही है?”

     

    सिया ने तुरंत मुंह बनाया।

     

    “बिल्कुल नहीं। मैं तो बस देखने आई हूं कि तुम सच में बीमार हो या नाटक कर रहे हो।”

     

    आरव हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें मेरी चिंता होती है।”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    “होती है।”

     

    “नहीं होती।”

     

    “बहुत होती है।”

     

    “चुप रहो!”

     

    आरव हंसने लगा, लेकिन हंसते-हंसते खांस पड़ा।

     

    सिया का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “आरव!”

     

    वह उसके पास बैठ गई।

     

    “पानी चाहिए?”

     

    आरव ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    सिया ने उसे पानी दिया और फिर उसका माथा छूकर बोली, “तुम्हें बुखार है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा, “तुम मेरे लिए इतनी परेशान क्यों हो रही हो?”

     

    सिया कुछ पल चुप रही।

     

    उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    वह बस धीरे से बोली, “पता नहीं।”

     

    और शायद यही सच था।

     

    उसे सच में नहीं पता था।

     

    आरव ठीक हो गया, लेकिन उसके बाद उनके बीच कुछ बदल गया।

     

    अब वे पहले की तरह लड़ते तो थे, लेकिन लड़ाई के बाद दोनों एक-दूसरे को देखने लगते।

     

    आरव कभी-कभी बिना किसी वजह के सिया के घर के बाहर खड़ा रहता।

     

    सिया खिड़की से उसे देखकर पूछती, “क्या चाहिए?”

     

    आरव कहता, “कुछ नहीं।”

     

    “फिर यहां क्यों खड़े हो?”

     

    “पता नहीं।”

     

    और दोनों कुछ देर चुप रहते।

     

    कभी-कभी उन्हें खुद समझ नहीं आता था कि वे एक-दूसरे के पास क्यों रहना चाहते हैं।

     

    जब आरव कहीं बाहर जाता, तो सिया बार-बार अपना फोन देखती।

     

    जब सिया किसी दोस्त के साथ ज्यादा देर बात करती, तो आरव का मूड खराब हो जाता।

     

    “क्या हुआ?” सिया पूछती।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर मुंह क्यों बना रखा है?”

     

    “मैंने कब मुंह बनाया?”

     

    “अभी बना रखा है।”

     

    “तुम्हें बहुत ध्यान रहता है मेरे चेहरे का।”

     

    “क्योंकि तुम हर समय अजीब शक्ल बनाते रहते हो।”

     

    “तुम जल रही हो क्या?”

     

    “तुमसे? बिल्कुल नहीं।”

     

    “मैंने तो पूछा भी नहीं था।”

     

    सिया चुप हो जाती और आरव मुस्कुराने लगता।

     

    लेकिन दोनों के दिल में कुछ ऐसा था, जिसका नाम वे नहीं जानते थे।

     

    एक शाम दोनों छत पर बैठे थे। सिया चुपचाप सामने देख रही थी।

     

    आरव ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ हमेशा बहुत कुछ होता है।”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “तुम मुझे इतना जानते कब से हो?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पता नहीं।”

     

    “तुम्हें कुछ पता भी है?”

     

    आरव हल्का-सा हंसा।

     

    “हां।”

     

    “क्या?”

     

    “जब तुम परेशान होती हो तो ज्यादा चुप हो जाती हो। जब तुम्हें डर लगता है तो गुस्सा करने लगती हो। और जब तुम खुश होती हो तो बिना वजह बहुत बोलती हो।”

     

    सिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं हमेशा बोलती हूं।”

     

    “हां, वो भी सही है।”

     

    सिया हंस दी।

     

    आरव भी मुस्कुराया।

     

    कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे।

     

    वह चुप्पी अजीब नहीं थी।

     

    अच्छी थी।

     

    सुकून देने वाली।

     

    सिया ने धीरे से पूछा, “आरव?”

     

    “हां?”

     

    “अगर मैं कभी बहुत दूर चली गई तो?”

     

    आरव ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कहां?”

     

    “कहीं भी।”

     

    “तो वापस आ जाना।”

     

    “अगर नहीं आ पाई तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर धीमे से बोला, “तो मैं लेने आ जाऊंगा।”

     

    सिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने जवाब देने के लिए मुंह खोला, लेकिन कुछ कह नहीं पाया।

     

    क्यों?

     

    वह खुद नहीं जानता था।

     

    बस इतना जानता था कि सिया अगर उससे दूर चली गई, तो उसकी जिंदगी में कुछ बहुत जरूरी चीज़ कम हो जाएगी।

     

    शायद उसकी सबसे बड़ी लड़ाई।

     

    शायद उसकी सबसे अच्छी दोस्त।

     

    या शायद कुछ और।

     

    समय आगे बढ़ता गया।

     

    आरव और सिया की जिंदगी में बहुत कुछ बदला, लेकिन उनका रिश्ता नहीं बदला।

     

    वे आज भी लड़ते थे।

     

    छोटी-छोटी बातों पर बहस करते थे।

     

    एक-दूसरे को चिढ़ाते थे।

     

    लेकिन अब दोनों को एक-दूसरे की आदत हो चुकी थी।

     

    ऐसी आदत, जिसके बिना दिन अधूरा लगता था।

     

    एक दिन आरव ने सिया से पूछा, “तुम्हें कभी लगता है कि हम दोनों कुछ ज्यादा ही साथ रहते हैं?”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    “तुम्हें कोई परेशानी है?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    आरव ने धीरे से कहा, “बस पूछ रहा था।”

     

    सिया कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली, “तुम्हारे बिना रहना मुश्किल होगा।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    सिया तुरंत संभल गई।

     

    “मतलब… लड़ने के लिए कोई और मिलेगा नहीं न।”

     

    आरव मुस्कुरा दिया।

     

    “हां, मैं भी यही सोच रहा था।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन उस हंसी के पीछे एक सच्चाई थी।

     

    वे दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगे थे।

     

    बस उन्हें इसका एहसास नहीं था।

     

    उन्हें लगता था कि यह दोस्ती है।

     

    आदत है।

     

    रोज़ की लड़ाई है।

     

    एक-दूसरे की चिंता करने की आदत है।

     

    लेकिन शायद प्यार हमेशा अचानक नहीं होता।

     

    कभी-कभी प्यार धीरे-धीरे आता है।

     

    बचपन की छोटी-छोटी लड़ाइयों के साथ।

     

    किसी की किताब छुपाने से।

     

    किसी का टिफिन चुराने से।

     

    किसी के बीमार होने पर बिना बुलाए उसके घर पहुंच जाने से।

     

    और फिर एक दिन अचानक पता चलता है कि जिस इंसान से हम सबसे ज्यादा लड़ते हैं, वही हमारे लिए सबसे ज्यादा जरूरी बन चुका है।

     

    कुछ साल बाद आरव और सिया की शादी तय हो गई।

     

    दोनों परिवारों में खुशी का माहौल था।

     

    लेकिन सिया उस दिन सुबह से ही बहुत चुप थी।

     

    आरव ने उसे देखा तो पूछा, “क्या हुआ?”

     

    सिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ आज भी बहुत कुछ है।”

     

    सिया ने उसे घूरकर देखा।

     

    “आज भी परेशान करोगे?”

     

    “आदत है।”

     

    सिया की आंखें भर आईं।

     

    आरव का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “अरे… रो क्यों रही हो?”

     

    सिया ने अपनी आंखें पोंछते हुए कहा, “पता नहीं।”

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “आज तो तुम्हें खुश होना चाहिए।”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    “हां… खुश हूं।”

     

    “फिर रो क्यों रही हो?”

     

    सिया कुछ बोल नहीं पाई।

     

    शायद उसे अपने बचपन की सारी बातें याद आ रही थीं।

     

    वह लड़का, जो उसकी चोटी खींचकर भाग जाता था।

     

    जो उसका टिफिन खा जाता था।

     

    जो उसे हर बात पर परेशान करता था।

     

    जो उसके दुखी होने पर खुद परेशान हो जाता था।

     

    जिसके साथ उसने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत साल बिताए थे।

     

    आज वही आरव उसका जीवनसाथी बनने वाला था।

     

    शादी के दिन जब सिया दुल्हन बनकर मंडप में आई, तो आरव उसे देखकर कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गया।

     

    सिया ने भी उसकी तरफ देखा।

     

    वही आरव।

     

    वही आंखें।

     

    वही मुस्कान।

     

    बस आज उसके चेहरे पर बचपन वाली शरारत थोड़ी कम थी।

     

    पंडित जी ने मंत्र पढ़ने शुरू किए।

     

    दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा।

     

    सिया की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    आरव ने धीरे से पूछा, “तुम रो क्यों रही हो?”

     

    सिया ने आंसुओं के बीच हल्की-सी मुस्कान दी।

     

    “पता नहीं।”

     

    आरव धीरे से बोला, “आज भी तुम्हें कुछ पता नहीं?”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    फिर धीरे से बोली, “शायद आज पता चल गया।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “क्या?”

     

    सिया की आंखों से आंसू फिर बह निकले।

     

    “कि मैं तुमसे बचपन से ही प्यार करती थी।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर हल्के से मुस्कुराया।

     

    “मुझे भी आज ही पता चला।”

     

    “झूठे।”

     

    “सच में।”

     

    “तुम तो हमेशा कहते थे कि मैं आफत हूं।”

     

    “हां, हो।”

     

    सिया ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए कहा, “फिर शादी क्यों कर रहे हो?”

     

    आरव ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “क्योंकि पूरी जिंदगी इस आफत के साथ लड़ना है।”

     

    सिया हंसते-हंसते रो पड़ी।

     

    फेरे शुरू हुए।

     

    हर फेरे के साथ सिया आरव की ओर देखती रही।

     

    उसकी आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे।

     

    आरव कभी उसे देखता, कभी मुस्कुराता, कभी चुपचाप उसकी आंखों से आंसू पोंछ देता।

     

    सिया उसे देखती रही।

     

    उसे याद आ रहा था—

     

    वह छोटा-सा लड़का, जो उसकी चोटी खींचकर भाग जाता था।

     

    वह लड़का, जिससे वह हर छोटी बात पर लड़ती थी।

     

    वह लड़का, जिसके बिना एक दिन भी अब अधूरा लगता था।

     

    आज वही उसके सामने बैठा था।

     

    उसका हाथ थामे।

     

    उसके साथ सात फेरे ले रहा था।

     

    सिया की आंखों से आंसू बहते रहे।

     

    आरव ने धीरे से उसका हाथ दबाया।

     

    सिया ने उसकी ओर देखा।

     

    आरव ने बिना कुछ कहे मुस्कुराकर उसे भरोसा दिया।

     

    और उस पल सिया समझ गई—

     

    कुछ रिश्ते अचानक प्यार नहीं बनते।

     

    वे बचपन से धीरे-धीरे हमारे साथ बड़े होते हैं।

     

    पहले लड़ाई बनकर।

     

    फिर दोस्ती बनकर।

     

    फिर आदत बनकर।

     

    और एक दिन…

     

    चुपचाप प्यार बन जाते हैं।

     

    आरव और सिया ने कभी नहीं जाना कि उन्हें एक-दूसरे से प्यार कब हुआ था।

     

    शायद उस दिन…

     

    जब आरव ने पहली बार सिया की चोटी खींची थी।

     

    या उस दिन…

     

    जब सिया उसके बीमार होने पर बिना बुलाए उसके घर पहुंची थी।

     

    या फिर उन हजारों छोटी-छोटी लड़ाइयों के बीच…

     

    जिन्हें वे हमेशा लड़ाई समझते रहे।

     

    लेकिन सच तो यह था—

     

    उनकी हर लड़ाई में थोड़ा-सा प्यार छुपा था।

     

    और आखिरकार उसी प्यार ने उन्हें एक-दूसरे का बना दिया।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं