“बेटी, अब से यही तुम्हारा घर है… सबको अपना समझकर रहना।”
विदाई के समय मामा की आँखों में आँसू थे। सामने खड़ी पायल भी रो रही थी। माँ-बाप का साया तो उसने बचपन में ही खो दिया था। वह सिर्फ पाँच साल की थी, जब एक सड़क हादसे ने उसके माता-पिता को उससे हमेशा के लिए छीन लिया। उस दिन के बाद उसकी दुनिया उजड़ गई थी।
लेकिन भगवान ने उसके लिए एक सहारा पहले से ही चुन रखा था। उसके मामा और मामी ने उसे अपनी बेटी बनाकर अपने घर ले आए। उन्होंने कभी उसे यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अनाथ है। जितना प्यार उन्होंने अपने बेटे रोहन को दिया, उतना ही प्यार पायल को भी मिला। मामी हर रात उसे अपने हाथों से खाना खिलातीं और मामा उसे कंधों पर बैठाकर मेले घुमाने ले जाते।
पायल बड़ी होती गई। पढ़ाई में होशियार, संस्कारों में सबसे आगे और दिल से बेहद नरम। पूरे मोहल्ले में उसकी मिसाल दी जाती थी। उसे हमेशा यही भरोसा था कि जिस घर में उसकी शादी होगी, वहाँ भी उसे इतना ही अपनापन मिलेगा।
समय आया तो उसके लिए अमन का रिश्ता आया। परिवार देखने में अच्छा था। बातों में मिठास थी और सब लोग बहुत संस्कारी होने का दिखावा कर रहे थे। मामा-मामी ने अपनी हैसियत से बढ़कर शादी की। जो बन पड़ा, सब कुछ दिया। विदाई के समय मामी ने उसे गले लगाकर कहा, “बेटी, अगर कभी ज़रा-सी भी परेशानी हो, तो अपने इस घर का दरवाज़ा हमेशा खुला मिलेगा।”
पायल मुस्कुराई और आँसू पोंछते हुए ससुराल चली गई।
लेकिन जिस घर को उसने अपना नया संसार समझा था, वही उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुःख बन गया।
शादी के दूसरे ही दिन उसकी सास ने दहेज का सामान देखते हुए ताना मारा, “बस इतना ही सामान भेजा है? लगता है तुम्हारे मामा-मामी ने अपनी जिम्मेदारी जल्दी खत्म करनी थी।”
पायल चुप रही। उसने सोचा, शायद पहली बार की नाराज़गी होगी।
लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी।
हर सुबह कोई न कोई ताना उसका इंतज़ार करता।
“इतनी देर से क्यों उठी?”
“खाना बनाना भी नहीं आता?”
“अनाथ लड़की से इससे ज़्यादा उम्मीद भी क्या करें?”
ये शब्द रोज़ उसके दिल को तोड़ देते थे।
उसका पति अमन भी धीरे-धीरे अपनी माँ की बातों में आने लगा। पहले जो उससे प्यार से बात करता था, अब छोटी-छोटी बातों पर उसे डाँटने लगा।
एक दिन पायल ने हिम्मत करके कहा, “अगर मुझसे कोई गलती हुई है, तो मुझे समझाइए… लेकिन बार-बार अनाथ कहकर मत बुलाइए। बहुत दर्द होता है।”
अमन ने बेरुखी से जवाब दिया, “माँ जो कहती हैं, सुन लिया करो। बेकार की बहस मत किया करो।”
उस दिन पायल को समझ आ गया कि अब उसे इस घर में अकेले ही सब सहना होगा।
धीरे-धीरे उससे पूरे घर का काम करवाया जाने लगा। सुबह चार बजे उठना, रात देर तक काम करना। अगर ज़रा-सी भी गलती हो जाती तो खाना तक नसीब नहीं होता।
एक दिन उसे तेज़ बुखार था। शरीर काँप रहा था, लेकिन सास बोली, “बीमार होने का नाटक मत करो। रसोई में जाओ और खाना बनाओ।”
पायल काँपते हाथों से रोटियाँ बना रही थी कि अचानक उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया और वह रसोई में ही बेहोश होकर गिर पड़ी।
जब होश आया तो वह अपने कमरे में थी। उसे लगा कि शायद किसी ने उसकी चिंता की होगी।
लेकिन तभी बाहर से सास की आवाज़ आई, “नाटक करने में तो बड़ी होशियार है। काम से बचने का नया तरीका ढूँढ़ लिया।”
यह सुनकर पायल की आँखों से आँसू बह निकले।
उस रात उसने अपने मामा को फोन किया। जैसे ही उधर से आवाज़ आई, “कैसी है मेरी बेटी?”
पायल का गला भर आया। लेकिन वह उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थी।
वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली, “मैं ठीक हूँ मामा… बस आपकी याद आ रही थी।”
फोन कटते ही वह फूट-फूटकर रोने लगी।
उधर मामा समझ गए कि उनकी बेटी कुछ छिपा रही है।
दो दिन बाद मामा और मामी बिना बताए उसके ससुराल पहुँच गए।
दरवाज़ा पायल ने खोला। उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी। आँखों के नीचे काले घेरे थे और हाथों पर जलने के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे।
मामी ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और धीरे से पूछा, “बेटी… सच बता, तू खुश तो है ना?”
बस इतना सुनना था कि पायल खुद को रोक नहीं पाई। वह मामी के गले लगकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
उसकी सिसकियाँ सुनकर घर में सन्नाटा छा गया।
उस दिन पहली बार मामा ने अपनी बेटी की आँखों में वह दर्द देखा, जिसे वह महीनों से मुस्कान के पीछे छिपा रही थी।
उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अपनी फूल जैसी बेटी को जिस घर में विदा किया था, वहाँ उसे प्यार नहीं, बल्कि अपमान और तकलीफ़ मिली थी।
उस पल मामा ने मन ही मन एक फैसला कर लिया अब उनकी बेटी कभी अकेली नहीं लड़ेगी।
पायल मामी के गले लगकर लगातार रोए जा रही थी। बरसों का दर्द जैसे आज उसकी आँखों से बाहर निकल रहा था।
मामी बार-बार उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कह रही थीं, “बस बेटी… अब और मत रो। हम आ गए हैं ना।”
मामा ने पूरे घर की तरफ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।
इतने में पायल की सास बोली, “अरे, हमने ऐसा क्या कर दिया? बहुएँ अगर थोड़ा-बहुत काम करें तो क्या गलत है?”
मामा ने शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा, “काम करवाना गलत नहीं है… लेकिन किसी की बेटी का सम्मान छीन लेना सबसे बड़ा गलत काम है।”
सास हँसते हुए बोली, “ये आपकी बेटी नहीं, अनाथ लड़की है। हमने तो इस पर एहसान किया है।”
ये सुनते ही मामा की आँखें भर आईं।
उन्होंने कहा, “जिस दिन इसकी माँ-बाप की मौत हुई थी, उसी दिन मैंने इसे अपनी बेटी मान लिया था। अगर इसे जन्म देने वाले नहीं रहे, तो इसका मतलब ये नहीं कि इसका कोई अपना नहीं है।”
पूरे घर में सन्नाटा छा गया।
अमन भी वहीं खड़ा सब सुन रहा था, लेकिन उसने एक शब्द तक नहीं कहा।
मामा ने पायल से पूछा, “बेटी, सच-सच बता… क्या तू इस घर में खुश है?”
पायल कुछ पल चुप रही। फिर धीमी आवाज़ में बोली, “मैंने बहुत कोशिश की मामा… सबको अपना माना… हर ताना सहा… हर अपमान सहा… लेकिन अब मुझसे नहीं होता।”
उसकी बात सुनकर मामी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
मामा ने बिना एक पल गंवाए कहा, “चल बेटी… अपने घर चल।”
सास तुरंत बोली, “अगर आज ये इस घर से गई, तो दोबारा इस घर में कदम नहीं रखेगी।”
मामा ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया, “जिस घर में बेटी की इज़्ज़त नहीं होती, उस घर में लौटने की ज़रूरत भी नहीं होती।”
पायल अपने मामा-मामी के साथ चली गई।
कई दिनों बाद उसने खुलकर साँस ली। पहली बार उसे ऐसा लगा कि वह फिर से ज़िंदा है।
मामी ने उसे संभाला। मामा ने कहा, “बेटी, अब किसी के सामने रोना नहीं… अब खुद को इतना मज़बूत बनाना कि लोग तुझे कमजोर समझने की गलती कभी न करें।”
पायल ने उसी दिन फैसला कर लिया कि अब वह अपनी पहचान खुद बनाएगी।
उसने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की। साथ ही सिलाई और कंप्यूटर का कोर्स भी किया। धीरे-धीरे उसने घर से ही अपना छोटा-सा काम शुरू कर दिया।
शुरुआत में कम कमाई हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
कुछ महीनों बाद उसके बनाए कपड़ों की माँग बढ़ने लगी। फिर उसने दो और महिलाओं को अपने साथ काम पर रखा।
एक साल के अंदर उसका छोटा-सा काम एक अच्छी दुकान में बदल गया।
आज वही पायल, जिसे कभी ताने सुनने पड़ते थे, कई ज़रूरतमंद महिलाओं को रोज़गार दे रही थी।
उधर अमन का घर पहले जैसा नहीं रहा। सास की तबीयत खराब रहने लगी। घर के काम करने वाला कोई नहीं था। तब उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि पायल नौकरानी नहीं, उस घर की बहू थी।
एक दिन अमन पायल से मिलने उसके घर पहुँचा।
उसने धीरे से कहा, “पायल… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर दो और वापस चलो।”
पायल ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे, बल्कि आत्मविश्वास था।
वह बोली, “माफ़ मैंने तुम्हें उसी दिन कर दिया था… लेकिन जिस घर में मेरे आत्मसम्मान की कोई कीमत नहीं थी, वहाँ अब लौटना मेरे बस की बात नहीं।”
अमन शर्म से सिर झुका कर खड़ा रह गया।
पायल ने मुस्कुराकर कहा, “रिश्ते प्यार से चलते हैं… तानों से नहीं। और सम्मान खोकर कोई रिश्ता नहीं निभाया जा सकता।”
अमन बिना कुछ कहे वापस लौट गया।
कुछ समय बाद पायल की मेहनत और हिम्मत की कहानी पूरे शहर में मिसाल बन गई। लोग उसे एक सफल महिला के रूप में पहचानने लगे।
एक कार्यक्रम में जब उसे सम्मानित किया गया तो मंच से उसने सिर्फ एक बात कही—
“मैं अनाथ ज़रूर थी, लेकिन कभी अकेली नहीं थी। मेरे मामा-मामी ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं हर मुश्किल से लड़ सकी। और आज मैं हर उस लड़की से कहना चाहती हूँ… अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता मत करना। क्योंकि जो खुद की इज़्ज़त करना सीख लेता है, दुनिया भी एक दिन उसकी इज़्ज़त करना सीख जाती है
।”
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
मामा और मामी की आँखों में गर्व के आँसू थे। उनकी बेटी हारकर नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाकर जीती थी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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