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कबीरदास ने गुरु को भगवान से भी बड़ा क्यों कहा?

पढ़ने का समय : 7 मिनट

संत कबीरदास भारतीय भक्ति परंपरा के उन महान संतों में से एक हैं, जिनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पाँच सौ वर्ष पहले थी। उन्होंने जाति, धर्म, पंथ और बाहरी आडंबरों से ऊपर उठकर प्रेम, सत्य और सहज ज्ञान का संदेश दिया। उनकी कविताएँ और दोहे आम आदमी की भाषा में हैं, फिर भी उनमें गहरी दार्शनिक गहराई छिपी हुई है। कबीरदास के हजारों दोहों में से एक दोहा ऐसा है जो गुरु की महिमा को भगवान से भी ऊँचा स्थान देता है

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”

इस दोहे का सीधा अर्थ है यदि गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ खड़े हों, तो मैं किसके चरणों में पहले प्रणाम करूँ? मैं तो अपने गुरु के बलिहारी जाता हूँ, क्योंकि उन्होंने ही मुझे गोविंद का मार्ग दिखाया।

यह दोहा केवल श्रद्धा का भाव नहीं है, बल्कि कबीरदास के पूरे जीवन-दर्शन का सार है। वे गुरु को भगवान से बड़ा इसलिए मानते थे क्योंकि उनके अनुसार भगवान तो सर्वव्यापी हैं, लेकिन उस सर्वव्यापी सत्ता तक पहुँचने का मार्ग दिखाने वाला गुरु ही है। बिना गुरु के मनुष्य अज्ञान के अंधकार में भटकता रहता है। गुरु वह प्रकाश है जो अंधेरे को चीरकर सत्य तक ले जाता है।

कबीरदास का जन्म अनुमानतः सन् 1398 के आसपास काशी में हुआ था। उनके जीवन के बारे में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि वे एक जुलाहा परिवार में पले-बढ़े। बचपन से ही उनमें आध्यात्मिक जिज्ञासा थी। वे मस्जिद और मंदिर दोनों में जाते, लेकिन वहाँ के आडंबर उन्हें नहीं भाते थे। वे सत्य की खोज में थे उस सत्य की जो बाहरी पूजा-पाठ से परे हो।

कबीरदास ने स्वयं गुरु की खोज की। प्रसिद्ध कथा है कि वे स्वामी रामानंद के शिष्य बने। रामानंद उस समय के बड़े वैष्णव संत थे। कबीरदास को डर था कि जाति के कारण रामानंद उन्हें शिष्य नहीं बनाएँगे। इसलिए उन्होंने एक दिन प्रातःकाल गंगा घाट की सीढ़ियों पर लेटकर इंतजार किया। जब रामानंद जी स्नान करने उतरे तो उनका पैर कबीर पर पड़ गया और मुख से “राम” निकल गया। कबीरदास ने उसी “राम” को गुरु-मंत्र मान लिया और स्वयं को रामानंद का शिष्य घोषित कर दिया। बाद में रामानंद जी ने उन्हें स्वीकार भी कर लिया।

यह घटना कबीरदास के गुरु-महिमा के भाव को स्पष्ट करती है। उनके लिए गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं था, बल्कि वह माध्यम था जिसके द्वारा परमात्मा तक पहुँचा जा सकता था। कबीरदास ने कहा है।

“गुरु की सोई परतिष्ठा, जो गुरुदेव बतावै।

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न राम॥”

अर्थात् गुरु की वही प्रतिष्ठा है जो गुरुदेव बताएँ। गुरु के बिना ज्ञान उत्पन्न नहीं होता और गुरु के बिना राम नहीं मिलते।

कबीरदास के अनुसार भगवान तो नित्य हैं, सर्वव्यापी हैं, लेकिन मनुष्य अपने अहंकार, अज्ञान और माया के कारण उन्हें देख नहीं पाता। गुरु वह होता है जो शिष्य के अंदर छिपे हुए परमात्मा को जगा देता है। जैसे अंधेरे कमरे में दीया जला देने से सब कुछ दिखाई देने लगता है, वैसे ही गुरु ज्ञान का दीया जलाकर शिष्य के जीवन को प्रकाशित कर देता है।

भगवान को कोई देख नहीं सकता, छू नहीं सकता, उनसे सीधे बात नहीं कर सकता। लेकिन गुरु साक्षात् रूप में मौजूद होता है। वह शिष्य की गलतियों को सुधारता है, उसे डांटता है, प्यार करता है, और सही मार्ग पर ले जाता है। कबीरदास कहते हैं कि गुरु की कृपा के बिना भगवान भी नहीं मिलते,

“गुरु बिन कौन बतावै बाट, गुरु बिन कौन उतारे पार।

गुरु बिन कौन दिखावै राम, गुरु बिन कौन करे निस्तार॥”

गुरु के बिना रास्ता कौन बताएगा? गुरु के बिना पार कौन उतारेगा? गुरु के बिना राम कौन दिखाएगा और गुरु के बिना निस्तार कौन करेगा?

कबीरदास ने गुरु को इसलिए ऊँचा स्थान दिया क्योंकि वे व्यावहारिक संत थे। वे केवल सिद्धांत नहीं बताते थे, बल्कि जीवन जीने का तरीका सिखाते थे। उनके दोहों में बार-बार यह बात आती है कि बाहरी पूजा, तीर्थ, व्रत, जप-तप व्यर्थ हैं यदि भीतर का ज्ञान जागृत न हो। और भीतर का ज्ञान जगाने वाला गुरु ही होता है।

कबीरदास ने गुरु-शिष्य संबंध को अत्यंत पवित्र और गहरी जिम्मेदारी वाला माना। उन्होंने कहा कि गुरु को चुनते समय सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि गलत गुरु शिष्य को और अधिक अंधकार में धकेल सकता है। सही गुरु वह है जो स्वार्थ से मुक्त हो, जो शिष्य को अपना बनाकर नहीं, बल्कि स्वतंत्र बनाकर ज्ञान दे।

कबीरदास स्वयं ऐसे गुरु थे। उन्होंने अपने शिष्यों को कभी अंधभक्ति के लिए नहीं कहा। वे कहते थे कि गुरु की बात को भी विवेक से परखना चाहिए। लेकिन एक बार गुरु स्वीकार कर लेने के बाद उनकी आज्ञा का पालन पूर्ण श्रद्धा से करना चाहिए।

उनके दोहे में गुरु की महिमा इस प्रकार है।

“गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।

अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥”

गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा। गुरु शिष्य के अंदर के दोषों को गढ़-गढ़कर निकालता है। अंदर से हाथ का सहारा देता है और बाहर से चोट करता है ताकि शिष्य का जीवन सुंदर घड़े की तरह आकार ले सके।

यह रूपक बहुत गहरा है। भगवान तो बस मौजूद हैं, लेकिन गुरु सक्रिय रूप से शिष्य को गढ़ता है। इसलिए कबीरदास गुरु को भगवान से बड़ा मानते हैं।

कबीरदास अकेले नहीं थे जिन्होंने गुरु को इतना ऊँचा स्थान दिया। भारतीय भक्ति और संत परंपरा में गुरु को सदैव विशेष महत्व दिया गया है। नानक देव, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई—सभी ने गुरु की महिमा गाई है। लेकिन कबीरदास ने इसे सबसे स्पष्ट और निर्भीक भाषा में कहा। उन्होंने समाज के सामने चुनौती रखते हुए कहा कि यदि गुरु और भगवान दोनों मौजूद हों तो पहले गुरु को प्रणाम करो।

यह बात उस समय और भी क्रांतिकारी थी जब लोग मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में उलझे हुए थे। कबीरदास ने कहा कि भगवान तो एक है, लेकिन उस तक पहुँचने का रास्ता गुरु दिखाता है। इसलिए गुरु की शरण में जाना सबसे पहला कदम है।

आज के युग में जब ज्ञान इंटरनेट पर उपलब्ध है, किताबें सहज सुलभ हैं, तब भी गुरु की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। कबीरदास का दोहा आज भी उतना ही सत्य है। कोई भी कला, विज्ञान, संगीत, खेल या आध्यात्मिक साधना गुरु के बिना पूरी नहीं होती। शिक्षक, मेंटर, माता-पिता, बड़े भाई-बहत ये सभी किसी न किसी रूप में गुरु का कार्य करते हैं।

आज मनुष्य सूचनाओं से घिरा हुआ है, लेकिन विवेक और दिशा की कमी है। गुरु वही है जो सूचना को ज्ञान में और ज्ञान को जीवन में बदलने का मार्ग दिखाए। कबीरदास की दृष्टि में गुरु केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला है।

गुरु पूर्णिमा का पर्व इसी भाव को जीवित रखता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी सफलता, हमारी समझ और हमारी प्रगति के पीछे किसी न किसी गुरु का योगदान है। कबीरदास हमें सिखाते हैं कि सफलता मिलने के बाद गुरु को भूल जाना सबसे बड़ी कृतघ्नता है। गुरु-दक्षिणा केवल धन या वस्तु नहीं, बल्कि जीवन में गुरु के बताए मार्ग पर चलना और उनके प्रति कृतज्ञ बने रहना है।

कबीरदास ने गुरु को भगवान से बड़ा इसलिए कहा क्योंकि वे जानते थे कि भगवान तक पहुँचने का एकमात्र सच्चा माध्यम गुरु है। भगवान तो हमेशा मौजूद हैं, लेकिन मनुष्य के अज्ञान ने उनके और अपने बीच दीवार खड़ी कर रखी है। गुरु उस दीवार को गिराता है। गुरु अंधेरे में दीप जलाता है, भटके हुए को रास्ता दिखाता है और अधूरे जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है।

उनका दोहा हमें याद दिलाता है कि श्रद्धा का पहला अधिकार गुरु का है। यदि गुरु न होते तो हम गोविंद को कैसे पहचानते? इसलिए कबीरदास बलिहारी जाते हैं अपने गुरु की क्योंकि उन्होंने गोविंद का पता बता दिया।

आज जब हम गुरु पूर्णिमा मनाते हैं, तो कबीरदास की इस वाणी को हृदय में धारण करें। अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें चाहे वे स्कूल के शिक्षक हों, जीवन के मार्गदर्शक हों या माता-पिता। क्योंकि ज्ञान का मार्ग गुरु के बिना अधूरा है, और अधूरे मार्ग पर चलकर कोई भी मंजिल तक नहीं पहुँच सकता।

कबीरदास की वाणी अमर है। वे कहते हैं

“कबीर गुरु की भक्ति का, सुख फल आगम अपार।

जाके मन में भक्ति नहीं, ताका जीवन बेकार॥”

गुरु की भक्ति में अपार सुख छिपा है। जिसके मन में गुरु के प्रति भक्ति नहीं, उसका जीवन व्यर्थ है। यही कबीरदास का संदेश है गुरु को भगवान से भी बड़ा मानो, क्योंकि गुरु ही वह सेतु है जो मनुष्य को परमात्मा तक पहुँचाता है।

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