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संपादकीय पसंदीदा रचनाएं, संपादक द्वारा पसंद की गई कहानी कविताएं शायरी।।

  • हक़ीक़त…

    हक़ीक़त…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    हकीकत की कहानी कहूं या अपने दिल की जुबानी 

    परेशान हूं मैं अपने ही हाथों मजबूर होकर 

    ना चैन आता है दिल को,ना करार है रातों में 

    ये क्या हाल बना लिया है मैंने

    तुमसे बेहद इश्क फरमा के 

    तुम सामने होकर अपने से लगते हो 

    मुझ से दूर जाते ही ना जाने क्यों बेगाने बन जाते हो,

    कहो ये कैसा इश्क है तुम्हारा ,

    इश्क है भी मुझसे या जरिया बन

    कर रह गई हूं सब खेलने का,

    सच कहूं तो अब तकलीफ़ देता है

    मुझे इश्क तुम्हारा , मैं टूट गई हूं बेहद इश्क में,

    ना जाने ये क्या हश्र करेगा आगे,

    हक़ीक़त सामने है फिर भी धोखे में पड़ी हुई हूं ,

    लगता है ये दर्दनाक मौत पसंद आने लगा है मुझे…।।

     

     

     

     

     

     

     

     

     

  • Online dosti

    Online dosti

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    हेल्लो दोस्तों…

     

    आज मैंने एक ऑनलाइन प्यार वाली कहानी पढ़ी। कहानी खत्म हुई तो पता नहीं क्यों, मुझे भी किसी की याद आ गई।

     

    प्यार क्या होता है, ये तो आज तक मुझे नहीं पता। शायद मैंने कभी किसी से प्यार किया भी नहीं। लेकिन हाँ… एक दोस्त ज़रूर ऐसा मिला, जिसकी याद आज भी मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। इसलिए आज मैं अपनी ही एक ऑनलाइन दोस्त की कहानी लिख रही हूँ।

     

    ये कहानी शुरू होती है लगभग तीन साल पहले… 21 – सावन 2023 से उस समय मैंने पहली बार कहानियाँ लिखना शुरू किया था। लिखने का बहुत शौक था, लेकिन लिखना उतना अच्छा नहीं आता था। शब्दों में ढेर सारी गलतियाँ होती थीं। कई बार तो खुद अपनी कहानी दोबारा पढ़ती, तो लगता कि पता नहीं लोग इसे पढ़ते भी कैसे होंगे।

     

    लगभग तीन महीने बाद मुझे एक इंस्टाग्राम ग्रुप में पता चला कि प्रतिलिपि जैसा भी एक ऐप है। उस समय लफ्ज़ो की कहानी ऐप नहीं आई थी और मैं पॉकेट नोबेल पर लिखना शुरू किया था। उसके बाद में प्रतिलिप पर लिखना शुरू किया।

     

    जो लोग मुझे शुरू से जानते होंगे, उन्हें ये तो पता होगा कि मेरी स्टोरी में गलती कितनी होती थी। लेकिन शायद किस्मत को यही मंज़ूर था कि मेरी वही गलतियाँ मुझे मेरी ज़िंदगी के सबसे खास ऑनलाइन दोस्त से मिलवा दें।

     

    एक दिन मैं प्रतिलिपि पर अपनी कहानी लिख रही थी। तभी अचानक मेरे inbox में एक मैसेज आया।

     

    मुझे थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि उस समय कोई भी सीधे inbox में मैसेज नहीं करता था। मैंने मैसेज खोला।

     

    उसने सबसे पहले लिखा था,

    “sorry में आपको inbox में मैसेज कर रहा हु”

     

    मैं कुछ देर तक बस स्क्रीन को देखती रही। फिर मैंने जवाब दिया, “कोई बात नहीं” और inbox बंद करने लगी। तभी उसका दूसरा मैसेज आया।

     

    “आप की स्टोरी बहुत अलग है और अच्छी है पर कुछ जगह गलती है आप डालने से पहले चेक कर लीजिए गा। मैं ये बात कमेंट में भी बोल देता पर वह बोलता तो लोग आपकी स्टोरी को गलत कहने लगते पर आपकी स्टोरी बहुत अच्छी है।”

     

    उसका मैसेज पढ़कर मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा। क्योंकि उसने मेरी कमी बताई थी, लेकिन मेरा आत्मविश्वास नहीं तोड़ा था। उसने मेरी गलती सबके सामने नहीं, बल्कि अकेले में बताई थी।

     

    मैंने बस “थैंक यू” कहा और “सॉरी” भी बोलकर निकल गई।

    असल में उस समय मेरे घर में शादी होने वाली थी। पूरे घर में मेहमान थे। हर तरफ भागदौड़ थी। इसलिए मैं किसी से ज़्यादा बात नहीं करती थी।

     

    लेकिन उसके बाद एक चीज़ रोज़ होने लगी। जब भी मैं प्रतिलिपि खोलती, उसका एक मैसेज ज़रूर होता। “आज का एपिसोड अच्छा था” और मैं हर बार बस “thank you” बोल देती।

     

    एक दिन उसने कहा, “मेरी स्टोरी भी पढ़ना में राइटर नहीं हु बस कभी लिखने का मन होता है तो लिख लेतीहु”

     

    मैंने उसकी कहानी पढ़ी। फिर कभी मेरी कहानी की बातें होतीं… कभी उसकी कहानी की… और धीरे-धीरे हमारी बातें बढ़ने लगीं।

     

    मुझे पता चला कि वो गुजरात से था और मैं बिहार से। दो अलग-अलग राज्यों के दो बिल्कुल अनजान लोग… जिन्हें शायद कभी मिलना भी नहीं था।

     

    लेकिन दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी। एक दिन उसने कहा,

    “लिपि पर ऑनलाइन का पता नहीं चलता है क्या आपका इंस्ट्राग्राम id है”

     

    मैंने बिना ज़्यादा सोचे अपना इंस्टाग्राम आईडी दे दिया। बस… शायद वहीं से हमारी असली दोस्ती शुरू हुई। अब हमारी सुबह गुड मॉर्निंग से होती और रात गुड नाइट पर खत्म होती।

     

    या यूँ कहूँ… खत्म ही नहीं होती थी। क्योंकि रात के दो-दो, तीन-तीन बजे तक बातें चलती रहती थीं। कभी कहानी…

    कभी सपने… कभी बचपन… कभी भविष्य… तो कभी बिल्कुल बेकार की बातें।

     

    लेकिन मज़े की बात ये थी कि हमें उन बेकार की बातों में भी बहुत मज़ा आता था। उसी दौरान मेरे घर में भाई की शादी थी।

     

    हर समय कोई ना कोई मेहमान घर में रहता था। मेरे हाथ में फोन देखकर कभी पापा डाँट देते कभी भैया कुछ बोल देते।

     

    मैं भी गुस्से में इंस्टाग्राम पर नोट डाल दिया, “मुझे कोई मैसेज नहीं करेगा में इंट्रा छोड़ कर जा रही हु” असल में वो मैसेज मैंने इंस्टाग्राम ग्रुप के लिए डाला था।

     

    लेकिन जैसे ही उसने वो नोट पढ़ा वो परेशान हो गया। उसे लगा कि शायद उसकी वजह से मैं इंस्टाग्राम छोड़ रही हूँ।

     

    उसने लगातार मैसेज करने शुरू कर दिए। कॉल भी किए।

    जब रात में पापा सो गए, तब मैंने मम्मी से फोन लिया।

    कम से कम कहानी तो लिखनी थी। मैंने जैसे ही इंस्टाग्राम खोला इतने सारे मैसेज इतनी सारी मिस्ड कॉल…

     

    कि आज भी गिन नहीं सकती। मैंने उसे पूरी बात बताई कि आखिर हुआ क्या था। तब जाकर वो शांत हुआ।

     

    उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मेरी दोस्ती किसी के लिए इतनी मायने रखती है।

     

    फिर आया वो दिन जिस दिन मेरे भैया की हल्दी थी। और उसी दिन उसका जन्मदिन भी था। उसने मुझे पहले ही बता दिया था। लेकिन घर में इतने मेहमान इतनी भागदौड़ थी कि मैं भूल गई।

     

    रात के लगभग ग्यारह बजे जब मैं ऑनलाइन आई तब मुझे याद आया। मैंने तुरंत उसे “sorry” बोला। लेकिन मुझे पता था ग्यारह से बारह के बीच उसका डिनर करने का समय होता था।

     

    उसने मेरे सॉरी का कोई जवाब नहीं दिया। मैं परेशान हो गई।

    लगभग तीस मिनट तक लगातार “सॉरी” बोलती रही। साथ में एक अच्छा सा happy birthday wishes भी लिखा।

     

    और 11:30 बजे भेज दिया। लेकिन उसने 11:57 पर जाकर देखा। और आखिरकार मान गया। उस दिन मेरी जान में जान आई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती और गहरी होती चली गई।

     

    कभी स्टोरी की बातें कभी इधर-उधर की बातें तो कभी हम truth or dare खेलते। कभी घंटों हँसते तो कभी बिना वजह एक-दूसरे को चिढ़ात और झगड़ा वो तो पूछो ही मत ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता था जब में झगड़ती नहीं थी।

     

    देखते ही देखते दो साल कब बीत गए पता ही नहीं चला।

    हाँ एक बार मैं उसका जन्मदिन भूल गई थी। वो बहुत नाराज़ हो गया था। लेकिन मज़ेदार की बात ये है कि तीन साल में उसे मेरा जन्मदिन एक बार भी याद नहीं रहा।

     

    दो बार तो मेरा इंस्टाग्राम नोट और स्टोरी देखकर उसे याद आया। जब मैं नाराज़ होती तो वो बस इतना बोल देता, “मुझे याद तो आया पर तुम तो भूल ही गई थी।”

     

    अब क्या ही जवाब दूँ मैं जनाब को। और इस साल उसने विश भी नहीं किया। शायद अब बातें पहले जैसी नहीं रहीं।

    लगभग एक साल पहले मैं बीमार थी।

     

    और उसी समय उसकी नई जॉब भी शुरू हो गई। वो अपने काम में व्यस्त रहने लगा। हमारी बातें कम होने लगीं। पहले जहाँ हर छोटी बात शेयर होती थी…

     

    अब पूरे-पूरे दिन निकल जाते थे। धीरे-धीरे ये दूरी इतनी बढ़ गई कि जो दोस्त कभी बिना Good Morning के दिन शुरू नहीं करते थे और बिना रात के दो या तीन बजे Good Night बोले सोते नहीं थे…

     

    आज वही दोस्त सिर्फ एक-दूसरे की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं। पहले ऐसा होता था रात के बारह बजे Good Night बोलते। फिर कोई नई बात याद आ जाती और फिर बातें शुरू हो जातीं।

     

    फिर दोबारा Good Night। फिर हँसी, फिर कोई नया किस्सा। और पता ही नहीं चलता था कि कब रात के तीन बज गए।

     

    लेकिन अब बस एक रील भेज देते हैं। सामने वाला देख ले तो ठीक न देखे तो भी ठीक। कभी किसी रील पर हँसने वाली इमोजी भेज दी…

     

    बस वहीं बात खत्म। जब वो अपनी नई नौकरी में बिज़ी हुआ तब उसने मुझसे सिर्फ इतना कहा था, “तुम्हे जब भी बात करने का मन हो बात कर लेना”

     

    आज तक मुझे समझ नहीं आया वो कहना क्या चाहता था?

    क्या उसे सच में मेरी दोस्ती चाहिए थी? या फिर वो सिर्फ औपचारिकता निभा रहा था? मैं तो दोस्त से बात करना चाहती थी।

     

    लेकिन क्या सिर्फ मैं ही बात करना चाहती थी? क्या उसका मन नहीं करता था मुझसे बात करने का? शायद इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे।

     

    उस दिन के बाद मैंने खुद से मैसेज करना लगभग बंद कर दिया। कभी-कभी कर देती थी लेकिन अब नहीं। हाँ रील्स आज भी भेज देती हूँ।

     

    शायद इसलिए कि कहीं न कहीं दोस्ती अभी भी बाकी है।

    कुछ दिन पहले मैंने उसे एक रील भेजी। कई दिनों बाद उसका टेक्स्ट आया।

     

    इतने दिनों बाद उसका मैसेज देखकर मैं सच में बहुत खुश हो गई। इतनी खुश कि समझ ही नहीं आया क्या जवाब दूँ।

     

    दिल बहुत कुछ लिखना चाहता था। पूछना चाहता था कि कैसे हो? इतने दिन कहाँ थे? याद आती है क्या हमारी पुरानी बातें?

     

    लेकिन उँगलियाँ कुछ भी नहीं लिख पाईं। और मैंने बस 🤣🤣 ये वाली इमोजी भेज दी।

     

    शायद इसलिए क्योंकि कभी-कभी इमोजी वो बातें कह देते हैं, जिन्हें शब्द नहीं कह पाते।

     

    आज भी जब पुरानी चैट पढ़ती हूँ तो लगता है जैसे वो दिन किसी और दुनिया के थे। जहाँ वक्त बहुत था बातें बहुत थीं हँसी बहुत थी और उम्मीदें भी एक दूसरे का ऑनलाइन आने का इंतजार बहुत थी 

     

    अब न शिकायत है न कोई गिला। बस एक खूबसूरत याद है।

    तो अब आप ही बताइए इसे ऑनलाइन प्यार कहेंगे या दोस्ती या फिर कुछ भी नहीं?

     

    मुझे आज भी नहीं पता। लेकिन मेरे लिए वो हमेशा मेरा एक बहुत अच्छा ऑनलाइन दोस्त रहेगा।

     

    कुछ रिश्तों को नाम देने की ज़रूरत नहीं होती है। वो बस यादों में रह जाते हैं और जब भी याद आते हैं चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान छोड़ जाते हैं।

  • “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    यह कहानी उस समय की है जब मिथिला भूमि पर धर्म, नीति और न्याय का दीप जलाने वाले राजा जनक का शासन था। वह केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक ऋषि, एक तत्वज्ञानी और एक संवेदनशील पिता भी थे। यह कथा उस महान क्षण की है जब उन्होंने न केवल एक पुत्री को अपनाया, बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति की गरिमा को भी एक नई ऊँचाई दी

    मिथिला राज्य में लम्बे समय से अकाल पड़ा हुआ था। वर्षा नहीं हो रही थी, फसलें सूख रही थीं और प्रजा में निराशा फैल गई थी। राजा जनक, जो तप और ज्ञान में भी रुचि रखते थे, चिंतित थे कि यह अकाल क्यों पड़ा है। ज्योतिषियों और ऋषियों से परामर्श के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि भूमि को हल चलाकर यज्ञभूमि तैयार करनी होगी, जिससे देवताओं को संतोष मिले और वर्षा हो।

    राजा जनक स्वयं हल लेकर खेत में उतरे। जब वह हल चला रहे थे, तभी भूमि की कोख से एक सुंदर, तेजस्वी कन्या बाहर आई। कन्या की त्वचा कमल के फूल-सी कोमल थी, आँखें चंद्रमा-सी शीतल और स्वर वीणा के समान मधुर। यह कोई सामान्य बालिका नहीं थी।

    जनक ठिठक गए। कुछ क्षण के लिए समय थम-सा गया। उन्होंने कन्या को अपनी गोद में उठाया और जैसे ही उस कन्या ने उन्हें अपनी नन्ही बाहों से छुआ, जनक के हृदय में एक अलौकिक प्रेम जाग उठा। यह कन्या उन्हें केवल एक बालिका नहीं लगी, बल्कि देवी स्वरूप प्रतीत हुई।

    ऋषियों ने घोषणा की — “यह कन्या स्वयं धरती की पुत्री है। इसका नाम सीता होगा, क्योंकि यह हल (सीत) की नोक से प्रकट हुई है।”

    राजा जनक ने सीता को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। यद्यपि वह गोद ली हुई कन्या थी, किंतु जनक और रानी सुनयना ने उसमें अपनी आत्मा बसा दी। मिथिला में उस समय भी समाज की रूढ़ियों ने जड़ें जमा रखी थीं — कोई कन्या गोद ली जाए और राजकुमारी बनकर महल में रहे, यह सबके लिए अस्वाभाविक था।

    लेकिन जनक ने समाज की परवाह नहीं की। उन्होंने घोषणा की, “सीता केवल मेरी पुत्री नहीं, बल्कि मिथिला की भविष्य है। जो उसे छोटा समझेगा, वह मेरे न्याय और प्रेम को नहीं समझा।”

    सीता को उन्होंने शास्त्रों का ज्ञान, अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया। वह स्वयं विद्वान थे और विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम जैसे ऋषियों के सान्निध्य में सीता की परवरिश कराई। सीता धीरे-धीरे केवल सुंदर नहीं, बल्कि तेजस्वी, बुद्धिमती और धर्मनिष्ठ भी बन गईं।

    राजा जनक का यह विचार क्रांतिकारी था — जहाँ उस युग में स्त्रियों को केवल गृहकार्य और विवाह तक सीमित किया जाता था, जनक ने सीता को स्वतंत्रता, विचार और शिक्षा का अधिकार दिया।

    समय बीता। सीता युवा हुईं। अब राजसभा में यह विषय उठा कि उनके लिए योग्य वर की खोज की जाए। अनेक राजाओं और राजकुमारों के नाम आए, किंतु जनक का मानना था कि केवल कुल, वैभव और शक्ति से नहीं, बल्कि चरित्र, संयम और धर्म से ही कोई व्यक्ति सीता के योग्य हो सकता है।

    एक दिन जनक ने घोषणा की, “जो शिवधनुष को उठा सकेगा, वही सीता का पति होगा।” यह घोषणा पूरे आर्यावर्त में गूँज उठी। जनक जानते थे कि जो वास्तव में शक्तिशाली होगा, वही इस दिव्य धनुष को उठा सकेगा।

    कई राजा आए, धनुष देख कर लौट गए। कोई उसका भार नहीं सह पाया। तब अयोध्या से राम आए, विश्वामित्र के साथ। जब राम ने धनुष उठाया और तोड़ा, जनक की आँखों में अश्रु भर आए — यह खुशी के आँसू थे।

    उन्होंने सीता का हाथ राम के हाथ में देते हुए कहा, “आज मुझे विश्वास हुआ कि यह कन्या जिसे मैंने भूमि से पाया था, उस पुरुष को मिल गई है जो धर्म और मर्यादा का प्रतीक है।”

    शादी के बाद जब सीता अयोध्या चली गईं, तो जनक प्रसन्न भी थे और व्यथित भी। वह जानते थे कि राजपरिवारों में केवल प्रेम नहीं, राजनीति भी चलती है। एक पिता होने के नाते वह चिंतित रहते थे कि सीता पर कोई अन्याय न हो

    जब उन्हें यह समाचार मिला कि राम को वनवास हुआ है और सीता भी उनके साथ वन गई हैं, जनक का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने सीता को संदेश भेजा कि वह चाहे तो मिथिला लौट सकती है, किंतु सीता ने मना कर दिया।

    उसने उत्तर भिजवाया — “पिताजी, आपने मुझे आत्मबल और धर्म का पाठ पढ़ाया है। यदि आज मैं उस पर न चलूँ, तो यह शिक्षा व्यर्थ होगी।”

    जनक को गर्व हुआ, किंतु मन व्यथित रहा।

    पाँचवाँ भाग: अग्नि परीक्षा और जनक का हस्तक्षेप

    जब लंका विजय के बाद राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली, तो जनक तक यह समाचार पहुँचा। उनका हृदय टूट गया। उन्होंने अयोध्या में दूत भेजा और स्पष्ट कहा — “यदि सीता पर कोई लांछन है, तो वह मुझ पर है। क्योंकि वह केवल मेरी पुत्री ही नहीं, मेरी मर्यादा भी है। एक पिता को चुनौती मत दो, क्योंकि जब धर्म अधर्म के हाथों अपमानित होता है, तब वह जनक जैसे राजा को भी युद्ध के लिए विवश कर सकता है।”

    राम ने जनक के संदेश को समझा। उन्होंने सीता को पुनः सम्मानपूर्वक स्वीकार किया। जनक ने स्पष्ट किया, “राजा बनना आसान है, किंतु नारी के सम्मान की रक्षा करना कठिन है। और जो इसे न निभा पाए, वह राजा कहलाने योग्य नहीं।

    जब सीता ने अंत में धरती में समा जाने का निर्णय लिया, तब उन्होंने अंतिम बार जनक को स्वप्न में देखा। जनक ने मुस्कराते हुए कहा — “बेटी, तुम वापस अपनी माँ की गोद में जा रही हो। मैंने तुम्हें जिस धरती से पाया, उसी में समा जाना तुम्हारी महिमा है। तुम जनक की पुत्री थीं, अब तुम जननी बनकर समस्त स्त्री जाति के लिए प्रेरणा बन गई हो।”

    राजा जनक केवल एक राजा नहीं थे। वह एक विचार थे — नारी के सम्मान का, शिक्षा का, स्वतंत्रता का और पिता के रूप में सच्चे प्रेम का। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा ‘मसीहा’ वही होता है जो बिना समाज की परवाह किए, सत्य और न्याय का साथ दे।

    सीता ने धरती को अपनी माँ कहा, लेकिन जनक ने उसे एक नया जीवन, पहचान और सम्मान दिया। उन्होंने यह साबित किया कि किसी स्त्री का मसीहा वही होता है जो उसे उसके अस्तित्व और आत्मबल के साथ स्वीकार करे।

  • ब्लाइंड डेट से मिला प्यार

    ब्लाइंड डेट से मिला प्यार

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    एपिसोड 1 

    राज होटल में आज मुंबई शहर का सबसे चर्चित ब्लाइंड डेट इवेंट था। शाम के ठीक पाँच बजे होटल का मुख्य हॉल हल्की नीली रोशनी और गहरे साए में डूबा हुआ था। वेटर्स ने अपने चेहरों पर काले मास्क पहन रखे थे और एंट्रेंस पर लंबी लाइन लगी थी। हर गेस्ट का कार्ड चेक किया जा रहा था, फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें अलग-अलग कमरों की ओर ले जाया जा रहा था। माहौल में हल्का म्यूज़िक और अनजाना सा रोमांच घुला हुआ था।

    उसी लाइन में खड़ी थी आरोही। हाथ में डायमंड वीआईपी पास और दिमाग में अनगिनत सवाल। वह यहां अपनी दोस्त रोशनी की जगह आई थी, बस थोड़ी देर के लिए। वह बार-बार अपने फोन की स्क्रीन देख रही थी, जैसे खुद से ही पूछ रही हो — क्या सच में अंदर जाना चाहिए?

    तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर रोशनी का नाम चमक रहा था। आरोही ने तुरंत कॉल उठाई और धीमी आवाज में बोली, “कहां है तू? तेरी बारी आने वाली है।” उधर से दर्द भरी आवाज आई, “सॉरी यार, मैं घर से निकलने ही वाली थी कि मेरा पैर मुड़ गया। अभी हॉस्पिटल में हूं। प्लीज तू मेरी जगह चली जा।”

    आरोही ने झुंझलाते हुए कहा, “मुझे इन सब में कोई इंटरेस्ट नहीं है, और वैसे भी मेरे पास बॉयफ्रेंड बनाने का टाइम नहीं है।”

    रोशनी ने लगभग विनती करते हुए कहा, “प्लीज… आखिरी बार। तुझे मेरी कसम।”

    बस यही वो शब्द थे जिन पर आरोही हमेशा हार जाती थी। उसने गहरी सांस ली और कहा, “ठीक है, पर ये आखिरी बार है। तू मुझे हर बार ऐसे ही फंसा लेती है। बता यहां मुझे करना क्या है?”

    रोशनी चहकते हुए बोली,

    “कुछ खास नहीं, बस जैसी तू है वैसे ही रहना। और हां… लड़का मुझे ना कह दे, आगे मैं अपनी मॉम को संभाल लूंगी।”

    कुछ ही देर बाद उसकी बारी आ गई। उसने हल्की सी मुस्कान के साथ अपना पास दिखाया। दो स्टाफ मेंबर्स उसके पास आए, उसकी आंखों पर काली पट्टी बांधी और उसे धीरे-धीरे एक शांत, अंधेरे कमरे तक ले गए। कुर्सी पर बैठाकर पट्टी हटा दी गई। कमरे में हल्की सी पीली रोशनी थी, इतनी कि सामने बैठे शख्स की परछाईं दिखे, चेहरा नहीं।

    कुछ क्षणों तक खामोशी रही। फिर सामने से एक गहरी और संतुलित आवाज आई, “हेलो।”

    आरोही ने भी जवाब दिया, “हाय।”

    शुरुआती बातचीत औपचारिक थी, लेकिन धीरे-धीरे माहौल सहज होने लगा। आरोही का रुखापन भी थोड़ा कम होने लगा। जब उसने पूछा, “आप क्या करते हैं?” तो सामने वाले ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “बस… बिज़नेस।”

    “अच्छा है,” आरोही ने हंसते हुए कहा, “कम से कम आप अपने बॉस को रोज़ नहीं झेलते होंगे। मेरा बॉस तो… क्या बताऊं, चलता-फिरता टेंशन है। अगर पैसों की जरूरत ना होती तो उसकी कंपनी में एक दिन भी काम ना करती।”

    सामने बैठा शख्स हल्का सा हंसा, “इतना बुरा है?”

    आरोही बातों में इतनी खो गई कि उसने अपनी कंपनी का नाम भी बोल दिया — “AK Industries में काम करना कोई आसान बात नहीं है।”

    जैसे ही ये शब्द उसके मुंह से निकले, सामने बैठे शख्स की उंगलियां कुर्सी के हैंडल पर हल्के से थम गईं। उसकी मुस्कान थोड़ी गहरी हुई, पर उसने अपनी प्रतिक्रिया छुपा ली।

    बातचीत आगे बढ़ती रही। दोनो यहां वहा की बाते कर रहे थे ।

    इवेंट खत्म होने का संकेत मिला तो सामने वाले ने शांत स्वर में पूछा, “क्या हम फिर मिल सकते हैं?”

     लेकिन आरोही ने शांत स्वर में मना करते हुए कहा,

    “मेरा पहले से एक बॉयफ्रेंड है। मैं यहां बस अपनी मॉम की वजह से आई थी… इसलिए शायद हमें आगे नहीं मिलना चाहिए। यही हमारे लिए बेहतर है।”

    वह उठी, दरवाज़ा खोला और बिना पीछे देखे बाहर चली गई।

    कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर उसी अंधेरे में बैठा वह शख्स हल्के से मुस्कुराया और बहुत धीमी आवाज में बोला, “AK Industries… दिलचस्प।”

     

    उसकी आंखों में अब हल्की सी चमक थी।

  • 😱 वीरान हवेली 😱

    😱 वीरान हवेली 😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गाँव के बाहर, सूखे पेड़ों और घने कोहरे के बीच एक हवेली खड़ी थी—टूटी हुई, जर्जर, लेकिन अजीब तरह से ज़िंदा। लोग उसे “वीरान हवेली” कहते थे। कहते हैं, वहाँ सिर्फ खामोशी नहीं रहती… वहाँ कुछ और भी है—जो साँस लेता है, देखता है, और इंतज़ार करता है।

    गाँव में एक नियम था—सूरज ढलने के बाद उस हवेली की ओर कोई नहीं जाएगा।

    लेकिन हर नियम की तरह, इसे भी तोड़ने वाला कोई न कोई होता है।

    अर्जुन, शहर से आया एक युवा ब्लॉगर, अंधविश्वासों को झूठ साबित करने के लिए मशहूर था। उसने गाँव की इस हवेली के बारे में सुना और तुरंत फैसला किया—वह रात वहीं बिताएगा।

    “वहाँ मत जाओ बेटा… वो जगह ठीक नहीं है,” एक बुज़ुर्ग महिला ने कांपती आवाज़ में कहा।

    अर्जुन मुस्कुराया, “डर सिर्फ दिमाग में होता है, हकीकत में नहीं।”

    उस रात, कैमरा और टॉर्च लेकर वह हवेली के भीतर चला गया।

    दरवाज़ा चरमराहट के साथ खुला—जैसे किसी ने उसे भीतर आने का निमंत्रण दिया हो।

    अंदर कदम रखते ही उसे सड़ांध की गंध महसूस हुई। हवा ठंडी थी, असामान्य रूप से ठंडी। जैसे वहाँ कोई अदृश्य चीज़ उसकी साँसों के साथ खेल रही हो।

    अर्जुन ने कैमरा चालू किया, “तो दोस्तों, आज हम इस कथित भूतिया हवेली में रात बिताने वाले हैं…”

    उसकी आवाज़ हवेली में गूँजने लगी—और फिर अचानक… एक और आवाज़ उसी गूँज में शामिल हो गई।

    “…रात बिताने वाले हैं…”

    अर्जुन रुक गया।

    “कोई है?” उसने पूछा।

    कोई जवाब नहीं।

    उसने खुद को संभाला, “इको है… बस इको।”

    लेकिन यह इको नहीं था।

    रात के बारह बजते ही हवेली का माहौल बदल गया।

    ऊपर की मंज़िल से कदमों की आवाज़ आने लगी—धीमी, घसीटती हुई।

    ठक… ठक… ठक…

    अर्जुन ने टॉर्च उठाई और सीढ़ियों की ओर बढ़ा।

    जैसे ही वह ऊपर पहुँचा, एक कमरा खुद-ब-खुद खुल गया।

    दरवाज़ा धीरे-धीरे चरमराया… और अंदर घुप अंधेरा।

    “कोई है तो बाहर आओ!” अर्जुन ने ज़ोर से कहा।

    अचानक टॉर्च झिलमिलाई… और बुझ गई।

    अब सिर्फ अंधेरा था।

    और उस अंधेरे में… किसी की साँसें।

    अर्जुन का दिल तेज़ धड़कने लगा।

    फिर… उसके बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—

    “तुम आ गए…”

    अर्जुन चीख पड़ा और पीछे हट गया।

    कमरा खाली था।

    लेकिन दीवार पर… खून से लिखा था—

    “यहाँ से कोई नहीं जाता।”

    अर्जुन अब घबराने लगा था, लेकिन उसका अहंकार उसे रोक रहा था।

    “ये सब कोई ट्रिक है… कोई मुझे डराने की कोशिश कर रहा है,” उसने खुद से कहा।

    तभी उसकी नज़र कमरे के कोने में पड़ी—एक पुराना आईना।

    आईने में उसका प्रतिबिंब दिख रहा था… लेकिन कुछ अजीब था।

    उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।

    जबकि अर्जुन नहीं।

    उसने धीरे-धीरे हाथ उठाया…

    लेकिन आईने में खड़ा “वह” पहले ही हाथ उठा चुका था।

    अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

    “तुम… कौन हो?” उसने काँपते हुए पूछा।

    आईने में खड़ा “वह” धीरे-धीरे बोला—

    “मैं… वही हूँ… जो तुम बनोगे।”

    अचानक आईना चटक गया। काँच के टुकड़े ज़मीन पर गिर गए।

    और हर टुकड़े में… अलग-अलग चेहरे दिखाई देने लगे—रोते हुए, चिल्लाते हुए, मदद माँगते हुए।

    अचानक अर्जुन को अजीब दृश्य दिखने लगे—जैसे वह अतीत में पहुँच गया हो।

    वही हवेली… लेकिन नई।

    अंदर एक अमीर परिवार रहता था।

    लेकिन वह परिवार खुश नहीं था।

    घर का मालिक, रघुवीर सिंह, बेहद निर्दयी इंसान था। वह अपने नौकरों और गरीबों पर अत्याचार करता था।

    एक दिन, एक नौकरानी ने उसके खिलाफ आवाज़ उठाई।

    “बस बहुत हो गया साहब! हम इंसान हैं, जानवर नहीं!”

    रघुवीर की आँखों में क्रोध भर गया।

    “इस हवेली में सिर्फ मेरी आवाज़ चलती है,” उसने गरजते हुए कहा।

    उस रात… उस नौकरानी की चीखें पूरे घर में गूँजीं।

    लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की।

    क्योंकि सब डरते थे।

    और अगली सुबह… वह गायब थी।

    रवि—नहीं, अर्जुन—ने देखा, उसकी लाश को हवेली के अंदर ही कहीं छुपा दिया गया।

    एक नहीं… कई लोग।

    हर वो इंसान जिसने अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई—गायब कर दिया गया।

    अचानक अर्जुन वर्तमान में लौट आया।

    हवेली अब पहले से भी ज़्यादा डरावनी लग रही थी।

    दीवारों से खून रिस रहा था।

    फर्श पर पैरों के निशान बन रहे थे—अपने आप।

    और फिर…

    सामने अंधेरे से एक आकृति बाहर आई।

    वह इंसान नहीं था।

    उसका चेहरा आधा सड़ा हुआ था, आँखें काली… और शरीर से खून टपक रहा था।

    “तुमने देखा… हमारा दर्द…” उसने भारी आवाज़ में कहा।

    अर्जुन पीछे हटने लगा।

    “मुझे जाने दो…”

    “जाना?” वह हँसा—एक भयानक, गूँजती हुई हँसी।

    “जो यहाँ आता है… वो सच जानता है…”

    “और सच जानने की कीमत होती है…”

    अचानक पीछे से दर्जनों हाथ निकलकर अर्जुन को पकड़ने लगे—दीवारों से, फर्श से, हर जगह से।

    “नहीं! मुझे छोड़ दो!” वह चीखा।

    “तुम भी वैसे ही हो…” आवाज़ें गूँजीं।

    “तुम भी चुप रहते… अगर तुम्हारे सामने यह सब होता…”

    अर्जुन सन्न रह गया।

    उसे एहसास हुआ—वह भी शायद कुछ नहीं करता।

    वह भी डर जाता।

    वह भी चुप रहता।

    और यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी।

    “मुझे माफ़ कर दो…” उसने रोते हुए कहा।

    “मैं… मैं सबको सच बताऊँगा… मैं आवाज़ उठाऊँगा…”

    कुछ पल के लिए सब शांत हो गया।

    फिर धीरे-धीरे वे हाथ गायब हो गए।

    अंधेरा छंटने लगा।

    दरवाज़ा खुल गया।

    सुबह, गाँव वालों ने देखा—अर्जुन हवेली के बाहर पड़ा था, बेहोश।

    जब उसे होश आया, उसकी आँखों में डर नहीं… बल्कि एक सच्चाई थी।

    उसने सब कुछ बताया।

    पहले किसी ने विश्वास नहीं किया।

    लेकिन जब हवेली की खुदाई हुई…

    तो सच्चाई सामने आ गई।

    कई कंकाल, पुराने सबूत… और एक खौफनाक इतिहास।

    गाँव वालों को अपनी चुप्पी पर शर्म आई।

    उन्होंने सालों तक डर के कारण अन्याय को सहा… और उसी ने उस हवेली को शापित बना दिया।

    कुछ महीनों बाद, हवेली को गिरा दिया गया।

    उस जगह एक स्मारक बना—उन सभी के लिए, जिनकी आवाज़ कभी सुनी नहीं गई।

    अर्जुन फिर वहाँ आया।

    अब वहाँ शांति थी।

    लेकिन हवा में एक हल्की फुसफुसाहट अभी भी थी—

    “अब हम आज़ाद हैं…”

    अर्जुन ने आँखें बंद कीं।

    और इस बार… उसे डर नहीं लगा।

     

    (शिक्षा)

    यह कहानी हमें सिखाती है कि अत्याचार सिर्फ करने वाला ही दोषी नहीं होता, बल्कि उसे चुपचाप सहने और देखने वाले भी उतने ही जिम्मेदार होते हैं।

    जब समाज अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना बंद कर देता है, तो वही अन्याय एक दिन अभिशाप बनकर लौटता है।

    डर से बड़ी कोई बुराई नहीं, और सच से बड़ी कोई ताकत नहीं।