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संपादकीय पसंदीदा रचनाएं, संपादक द्वारा पसंद की गई कहानी कविताएं शायरी।।

  • जय जीमूतवाहन भगवान! 🙏🌺

    जय जीमूतवाहन भगवान! 🙏🌺

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    क्या आप जानते हैं, एक मां अपने बच्चे की लंबी उम्र के लिए ऐसा कठिन व्रत क्यों रखती है?

    यह कहानी है एक ऐसी मां की, जिसके लिए उसका बेटा ही उसकी पूरी दुनिया था।

    एक छोटे से गांव में कमला नाम की एक गरीब औरत रहती थी। उसका एक छोटा बेटा था, जिससे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती थी। पति के गुजर जाने के बाद कमला ने अकेले ही अपने बेटे को पाल-पोसकर बड़ा किया था।

    एक दिन गांव में जितिया व्रत की चर्चा हो रही थी। सभी माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र और सुखी जीवन के लिए व्रत रखने की तैयारी कर रही थीं। कमला ने भी अपने बेटे की सलामती के लिए जितिया व्रत रखने का संकल्प लिया।

    उस दिन कमला ने निर्जला व्रत रखा और भगवान जीमूतवाहन से प्रार्थना की, “हे प्रभु! मेरे जीवन में चाहे कितने भी दुख आ जाएं, लेकिन मेरे बच्चे पर कभी कोई संकट मत आने देना।”

    रात होते-होते कमला का बेटा अचानक बीमार पड़ गया। उसकी हालत बिगड़ती देखकर कमला घबरा गई। वह अपने बेटे को गोद में लेकर रोते हुए भगवान से प्रार्थना करने लगी।

    कमला के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे। फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। वह मदद मांगने के लिए पड़ोसियों के घर पहुंची। उसकी पुकार सुनकर गांव के लोग आगे आए और बच्चे को वैद्य के पास ले गए।

    कुछ समय बाद बच्चे की तबीयत सुधरने लगी। कमला की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। उसने हाथ जोड़कर भगवान जीमूतवाहन को धन्यवाद दिया।

    कहा जाता है कि जितिया व्रत माताओं के अटूट प्रेम, त्याग और संतान की लंबी उम्र की कामना का प्रतीक है।

    मां का प्यार दुनिया का सबसे अनमोल आशीर्वाद है।

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • वक्त का फ़ैसला

    वक्त का फ़ैसला

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    सेआस

    वक्त जब कोई फैसला सुनाता है,

    शुरुआत में वो समझ कहाँ आता है।

    जिसे हम अपनी हार मान बैठते हैं,

    वो अक्सर किसी बड़े दर्द से बचाता है।

    ​टूटे हुए सपनों पर जब आँखें रोती हैं,

    तब किस्मत नई राहों के बीज बोती है।

    हर बंद रास्ते के पीछे एक नई सहर होती है,

    वक्त की चाल थोड़ी धीमी पर बेअसर नहीं होती है।

    ​आज जो फैसला एक बोझ लगता है,

    कल वही हमारी सबसे बड़ी ताकत बनता है।

    इंतज़ार करो, थोड़ा भरोसा रखो उस पर,

    वक्त हर सवाल का सही जवाब गढ़ता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • भक्ति में शक्ति

    भक्ति में शक्ति

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शीर्षक: सावन का महीना 🌿🕉️❤️

     

    सावन की पहली फुहार जैसे ही धरती पर गिरी, पूरे गाँव का रंग ही बदल गया। सूखी पगडंडियाँ भीगकर महक उठीं, आम और नीम के पेड़ों की पत्तियाँ धुलकर चमकने लगीं और दूर शिव मंदिर की घंटियों की आवाज़ वातावरण को भक्ति से भर रही थी।

     

    सुबह का समय था।

     

    हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। गाँव की औरतें सिर पर पल्ला किए और हाथ में पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर जा रही थीं। कोई “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर रहा था तो कोई भोलेनाथ के भजन गुनगुना रहा था।

     

    उसी गाँव में रहती थी गौरी।

     

    बाईस साल की गौरी… बड़ी-बड़ी काली आँखें, चेहरे पर सादगी और दिल में भगवान शिव के लिए अटूट श्रद्धा।

    गौरी बचपन से ही हर सावन सोमवार का व्रत रखती थी। लेकिन इस बार उसका व्रत किसी इच्छा के लिए नहीं था।

     

    इस बार उसने सिर्फ एक प्रार्थना की थी, 

     

    “हे महादेव… मेरे हिस्से की सारी खुशियाँ किसी और को दे देना… बस मेरे बाबा को ठीक कर देना।”

     

    उसके पिता पिछले छह महीनों से बीमार थे। इलाज में उनके खेत बिक चुके थे, घर गिरवी रखा जा चुका था और दवाइयों के लिए भी पैसे नहीं बचे थे।

     

    फिर भी हर सोमवार गौरी बिना कुछ खाए-पिए शिव मंदिर जाती, गंगाजल चढ़ाती और मुस्कुराकर लौट आती। उसके मासूम मन में जरा भी छल कपट नहीं था।

     

    गाँव वाले अक्सर कहते,  

    “इतनी पूजा से क्या होगा? इलाज के लिए पैसे चाहिए, भगवान नहीं।”

     

    गौरी बस मुस्कुरा देती और कहती, “भगवान कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते।”

     

    दूसरा सावन सोमवार… इस बार बारिश पहले से ज़्यादा तेज़ थी, जैसे भोलेनाथ उसके सब्र की परीक्षा ले रहे हों।

     

    गौरी मंदिर जा रही थी कि रास्ते में उसे लगभग सत्तर साल का एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    वह पूरी तरह भीग चुका था। हाथ काँप रहे थे। लाठी भी कीचड़ में फँस गई थी।

    लोग उसके पास से निकल रहे थे लेकिन किसी ने भी रूककर मदद करने की हिम्मत नहीं की।

     

    लेकिन उन्हें देखते ही गौरी तुरंत दौड़ी। “बाबा… आइए, मैं सहारा देती हूँ।”

     

    उसने उन्हें उठाया, अपनी ओढ़नी से उनका चेहरा पोंछा और मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँचाया।

     

    बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “अरे बेटी… तुम खुद भी भीग रही हो।”

     

    गौरी हँस पड़ी। “सावन की बारिश में भीगने से तो भोलेनाथ भी खुश होते हैं, बाबा। आप मेरी चिंता मत कीजिए”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ गहरी नज़र से देखा। “अगर भगवान आज तुम्हारे सामने आ जाएँ तो क्या माँगोगी?”

     

    गौरी कुछ पल चुप रही।

    फिर बोली,  “अपने लिए कुछ नहीं चाहिए मुझे।

    बस मेरे बाबा ठीक हो जाएँ। और कोई भी बेटी कभी भी अपने पिता को इस हालत में न देखे।”

     

    गौरी की बातें सुनकर उस बूढ़े की आँखें भर आईं।

    उन्होंने आशीर्वाद दिया, “तुम्हारी हर मनोकामना पूरी होगी।”

     

    गौरी मुस्कुराकर मंदिर के अंदर चली गई। जब पूजा करके बाहर आई… तो वह बूढ़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।

     

    उसने आसपास बहुत खोजा… लेकिन जैसे वह कभी था ही नहीं।

     

    तीसरा सोमवार…

     

    गौरी ने देखा कि मंदिर के बाहर एक छोटा बच्चा रो रहा था। उसकी माँ बेहोश पड़ी थी। लोग तमाशा देख रहे थे।

     

    गौरी तुरंत दौड़ी। अपने पूजा के लिए रखे पैसे निकालकर उसने ऑटो बुलाया और माँ-बेटे को अस्पताल पहुँचा दिया।

     

    उस दिन वह शिवलिंग पर दूध भी नहीं चढ़ा सकी।

    घर लौटी तो माँ ने देखा कि आज उसके हाथ में कुछ भी नहीं है इसलिए उन्होंने पूछ लिया,”पूजा नहीं की?”

     

    गौरी मुस्कुराई। “आज शायद महादेव मंदिर में नहीं…

    अस्पताल में मिल गए थे।”

    समय धीरे-धीरे बीतता गया। गौरी का भोलेनाथ पर विश्वास अटूट बना रहा।

     

    सावन का आखिरी सोमवार आ गया। उस दिन मंदिर में बहुत भीड़ थी। हर कोई बड़ी-बड़ी थालियाँ लेकर आया था। किसी के पास पाँच लीटर दूध था। किसी के पास चाँदी का नाग। किसी ने सोने का मुकुट चढ़ाया।

     

    गौरी के पास… सिर्फ एक लोटा पानी और बेलपत्र थे।

    वह धीरे-धीरे लाइन में लगी रही।

     

    तभी मंदिर के पुजारी ने घोषणा की,  “आज मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए जो सबसे बड़ा दान देगा, उसका विशेष अभिषेक होगा।”

     

    लोगों ने हजारों रुपए चढ़ाने शुरू कर दिए। गौरी चुपचाप पीछे हट गई।

     

    उसे लगा… उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं।

    तभी मंदिर के बाहर वही बूढ़ा फिर दिखाई दिया। इस बार उनके पैरों में चोट लगी थी। गौरी बिना सोचे दौड़ी।

    अपनी पूजा की थाली नीचे रख दी।

     

    अपने दुपट्टे का किनारा फाड़कर उनके पैर पर पट्टी बाँध दी। बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “बेटा, तुम्हारी पूजा?”

     

    गौरी ने हाथ जोड़ लिए। “बाबा… जहाँ इंसान की सेवा हो…

    वहीं भगवान की पूजा होती है।”

     

    इतना सुनते ही अचानक मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं। तेज़ हवा चलने लगी। बारिश की बूँदें जैसे रुक गईं।

     

    गौरी ने पलटकर देखा… वहाँ कोई बूढ़ा नहीं था। सिर्फ एक सफेद बेलपत्र पड़ा था… जिस पर तीन धारियाँ बनी थीं।

     

    उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसी शाम गाँव में एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक उद्योगपति उतरे।

     

    उन्होंने पूरे गाँव को इकट्ठा किया। और कहने लगे, “बीस साल पहले… मैं इसी गाँव का रहने वाला था।

    जब मेरा सब कुछ खत्म हो गया था… तब एक किसान ने मेरी मदद की थी।

    आज मैं उसी किसान का कर्ज़ चुकाने आया हूँ।”

     

    उन्होंने नाम लिया, “रामस्वरूप।”

     

    वह गौरी के पिता थे। गौरी भी भीड़ में खड़ी थी जैसे ही उसने नाम सुना वो हैरान रह गई।

     

    उद्योगपति बोले, “उनकी ईमानदारी की वजह से आज मैं इस मुकाम पर हूँ। आज मैं उनको कर्ज चुकाने आया हूँ। मुझे पता चला है कि वो बहुत समय से बीमार है, इसलिए अब उनके इलाज का पूरा खर्च मैं उठाऊँगा।

    साथ ही उनका खेत भी वापस दिलाऊँगा।”

     

    इतना सुनते ही पूरा गाँव तालियाँ बजाने लगा।

     

    गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने मन ही मन कहा, “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”

     

    कुछ महीनों बाद… गौरी के पिता पूरी तरह स्वस्थ हो चुके थे। खेत फिर से हरे-भरे हो गए थे। घर की खुशियाँ लौट आई थीं।

     

    एक शाम गौरी मंदिर में दीपक जलाने गई। वहीं मंदिर के पुजारी मुस्कुराकर बोले,  “बेटी…

    क्या तुम्हें पता है? जिस बूढ़े की तुमने दो बार मदद की… उसे इस गाँव में किसी और ने कभी नहीं देखा।”

     

    गौरी चौंक गई। “क्या मतलब?”

     

    पुजारी धीरे से बोले, “उस दिन मैं भी पूरे समय मंदिर में था। तुम अकेली ही किसी से बातें कर रही थीं।”

     

    गौरी के हाथ काँपने लगे। उसने शिवलिंग की ओर देखा। उसे ऐसा लगा जैसे शिवलिंग पर जल की धार के बीच एक क्षण के लिए मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई दिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह वहीं बैठ गई।

    उसने समझ लिया, 

     

    महादेव कभी चमत्कार दिखाकर नहीं आते।

    वे किसी भूखे की भूख बनकर आते हैं…

    किसी घायल का दर्द बनकर आते हैं…

    किसी बूढ़े की लाठी बनकर आते हैं…

     

    और किसी बेटी की उम्मीद बनकर उसके आँसू पोंछ जाते हैं।

     

    उस दिन गौरी ने पहली बार अपने लिए कुछ माँगा।

    उसने हाथ जोड़कर कहा,  “भोलेनाथ…

    मुझे इतना समर्थ बना देना कि मैं हर सावन किसी ज़रूरतमंद की मदद कर सकूँ।

    यही मेरी सबसे बड़ी पूजा होगी।”

     

    मंदिर की घंटी एक बार फिर गूँज उठी।

     

    बारिश की ठंडी बूँदें उसके चेहरे पर आकर ठहर गईं।

    गौरी मुस्कुरा दी। अब उसे किसी चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं थी।

     

    क्योंकि वह समझ चुकी थी कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर में जल चढ़ाने से नहीं, बल्कि किसी के जीवन में आशा का दीप जलाने से पूरी होती है।

     

    उसके बाद हर सावन में गाँव की एक नई परंपरा शुरू हुई। लोग पहले किसी गरीब, बीमार या असहाय व्यक्ति की मदद करते, फिर शिव मंदिर में जल चढ़ाने जाते। 

     

    धीरे-धीरे यह परंपरा आसपास के गाँवों तक फैल गई। लोग कहते थे कि इस गाँव में सावन सिर्फ़ बरसात नहीं लाता, बल्कि इंसानियत की खुशबू भी साथ लाता है।

     

    और जब भी सावन की पहली बारिश होती, गौरी मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी होकर मुस्कुरा देती। उसे ऐसा महसूस होता जैसे हवा के साथ कोई धीमी-सी आवाज़ उसके कानों में फुसफुसा रही हो, 

    “जहाँ करुणा है, वहीं मैं हूँ। जहाँ प्रेम है, वहीं मेरा वास है।”

     

    उसने आसमान की ओर देखा। बादलों के पीछे छिपा चाँद दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसे विश्वास था कि जैसे बादलों के पीछे चाँद हमेशा मौजूद रहता है, वैसे ही हर सच्चे मन के पीछे महादेव की कृपा भी हमेशा रहती है।

    समाप्त। 🕉️🌿

     

    अगरआपकोमेरी कहानीपसंद आईतो एक लाइककरना ना भूलिएगा।

    धन्यवाद 🙏🏻

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

    दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

                          दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

     

     वो जो दूर रहकर भी मेरे पास सदा रहता है,

    हर लम्हा मेरे हिस्से में खुशियां ही आएं

    ऐसी दुआ करता है, ऐसा ही एक अनमोल

    रिश्ता दोस्ती के रूप में मैंने संजो रखा है ,

    रोज छोटी छोटी बातों में मुझसे लड़ पड़ता है, मेरे साथ बिना बोले जिसका दिन नहीं कटता है,

    हां! ऐसे ही एक शख्स को अपना

    दोस्त मैंने बना रखा है , मेरी जिंदगी में

    शामिल हुआ है वह ऐसे जैसे धड़कन

    बनकर बस गया है मुझमें,

    ना जाने कितने आए और साथ निभाने

    का वादा करके निकल गये,

    बस ये एक बिना किसी कारण और

    वादों के मेरे साथ ठहरा है ,

    “दोस्ती ” ये उससे मैंने जानी है 

    सब रिश्ते में सबसे खूबसूरत रिश्ता 

    दोस्ती का है, जो उसने मुझे समझा दिया है ….

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    shalini rawat

    NSW उभरते लेखक – 🥈 लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।

  • तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    गाँव रामपुर में तीन दोस्तों की जोड़ी इतनी मशहूर थी कि लोग उन्हें नाम से कम और “तीन तिगाड़ा” कहकर ज़्यादा बुलाते थे।

    पहला था भोला। नाम की तरह ही भोला नहीं, बल्कि थोड़ा सनकी भी था। उसे हर काम अपने ही अजीब तरीके से करना पसंद था। कोई कहे दाएँ जाओ, तो वह कहे, “सब दाएँ जाते हैं, मैं बाएँ जाऊँगा।”

    दूसरा था गोलू। हर समय हँसता रहता। चाहे कैसी भी मुसीबत हो, उसके चेहरे पर मुस्कान कभी नहीं जाती थी। उसकी एक ही आदत थी—हर बात में मज़ाक करना।

    तीसरा था पप्पू। वह इतना नादान और बेपरवाह था कि लोग कहते, “इसका दिमाग छुट्टी पर रहता है।” कोई भी कुछ कह दे, वह बिना सोचे वही कर देता।

    तीनों का हाल ऐसा था कि जहाँ जाते, वहाँ कोई न कोई गड़बड़ ज़रूर हो जाती।

    एक दिन तीनों ने सोचा कि अब गाँव में अपनी इज़्ज़त बनानी चाहिए।

    भोला बोला, “चलो आज किसी की मदद करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हाँ, लोग कहेंगे कि ये तीनों सुधर गए।”

    पप्पू बोला, “और अगर नहीं सुधरे तो?”

    दोनों ने उसे घूरकर देखा।

    सबसे पहले उन्हें एक बूढ़ी अम्मा मिलीं जो सिर पर लकड़ियों का गट्ठर उठाए जा रही थीं।

    तीनों दौड़ पड़े।

    “अम्मा, हम उठा देते हैं।”

    अम्मा खुश हो गईं।

    लेकिन जैसे ही भोला ने गट्ठर उठाया, उसने कहा, “इसे ऐसे नहीं, उल्टा पकड़ना चाहिए।”

    उसने गट्ठर उल्टा कर दिया।

    सारी लकड़ियाँ सड़क पर बिखर गईं।

    उधर गोलू इतनी ज़ोर से हँसा कि संतुलन बिगड़ गया और वह भी लकड़ियों पर गिर पड़ा।

    पप्पू उन्हें उठाने लगा, लेकिन उसने सूखी लकड़ियों की जगह पास रखे किसी के कपड़े उठा लिए।

    अम्मा सिर पकड़कर बैठ गईं।

    तीनों चुपचाप वहाँ से खिसक लिए।

    चलते-चलते उन्हें लगा कि खेती में मदद करनी चाहिए।

    एक किसान खेत में पानी लगा रहा था।

    भोला बोला, “चाचा, हम कर देते हैं।”

    किसान ने खुशी-खुशी हाँ कर दी।

    जैसे ही किसान घर गया, भोला ने नहर का रास्ता बदल दिया।

    बोला, “सीधा पानी जाएगा तो मज़ा क्या?”

    नतीजा…

    पूरा पानी खेत छोड़कर सड़क पर बहने लगा।

    गोलू हँस-हँसकर लोटपोट हो गया।

    पप्पू बोला, “लगता है सड़क पर धान उगेंगे।”

    इतने में किसान वापस आया।

    उसने देखा कि खेत सूखा है और सड़क नदी बनी हुई है।

    तीनों फिर भाग खड़े हुए।

    अब उन्होंने फैसला किया कि किसी की दुकान पर मदद करेंगे।

    हलवाई ने कहा, “इन लड्डुओं पर चाँदी का वर्क लगा दो।”

    भोला बोला, “वर्क से क्या होगा? चमक तो तेल से आएगी।”

    उसने लड्डुओं पर तेल लगा दिया।

    गोलू हँसते-हँसते चीनी का डिब्बा गिरा बैठा।

    पप्पू ने समझा कि सब खराब हो गया है।

    उसने पूरा बेसन पानी में डाल दिया।

    थोड़ी ही देर में लड्डुओं की जगह बेसन का हलवा बन गया।

    हलवाई चिल्लाया, “तुम तीनों दुकान से बाहर निकलो!”

    अब तो पूरे गाँव में चर्चा होने लगी।

    “जहाँ ये तीन पहुँच जाएँ, वहाँ भगवान ही मालिक है।”

    तीनों उदास होकर तालाब किनारे बैठ गए।

    गोलू पहली बार चुप था।

    तभी गाँव के सरपंच आए।

    उन्होंने कहा, “तुम लोग इतने परेशान क्यों हो?”

    भोला बोला, “हम अच्छा करना चाहते हैं, लेकिन सब बिगड़ जाता है।”

    सरपंच मुस्कुराए।

    उन्होंने कहा, “अगर सच में मदद करनी है तो पहले सीखो, फिर काम करो।”

    तीनों को बात समझ आ गई।

    अगले दिन गाँव में सफाई अभियान रखा गया।

    इस बार उन्होंने बिना अपनी अक्ल लगाए वही किया जो लोगों ने बताया।

    भोला सिर्फ झाड़ू लगाता रहा।

    गोलू कूड़ा उठाता रहा और बीच-बीच में सबका मन भी हँसाकर हल्का करता रहा।

    पप्पू बस बोरी पकड़कर चलता रहा।

    पहली बार कोई गड़बड़ नहीं हुई।

    गाँव वाले खुश हो गए।

    लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

    काम खत्म होने के बाद पप्पू बोला, “अब कूड़ा कहाँ डालना है?”

    किसी ने कहा, “पीछे वाले गड्ढे में।”

    पप्पू बिना देखे बोरी उठाकर फेंक आया।

    कुछ देर बाद पता चला कि वह कूड़ा नहीं, सरपंच का नया खाद का बोरा था।

    असली कूड़ा वहीं पड़ा रह गया।

    पूरा गाँव पहले कुछ पल चुप रहा…

    फिर इतनी ज़ोर से हँसा कि तालाब तक आवाज़ पहुँच गई।

    सरपंच भी हँस पड़े।

    उन्होंने कहा, “लगता है तुम तीनों की किस्मत में थोड़ा-बहुत काम बिगाड़ना लिखा है।”

    भोला बोला, “हम कोशिश तो पूरी करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हमारा इरादा अच्छा होता है, बस नतीजा थोड़ा अलग निकल जाता है।”

    पप्पू मासूमियत से बोला, “अगली बार शायद सही हो जाए…”

    यह सुनकर फिर सब हँस पड़े।

    उस दिन के बाद गाँव में जब भी कोई काम बिगड़ जाता, लोग मुस्कुराकर बस एक ही बात कहते—

    “लगता है यहाँ तीन तिगाड़ा होकर गए हैं!”

    और तीनों दोस्त भी अब इस बात का बुरा नहीं मानते थे। वे हर गलती से कुछ नया सीखते, फिर अगले काम में जुट जाते। हालाँकि उनके साथ कोई न कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी फिर भी हो जाती थी, लेकिन उनकी सच्ची दोस्ती, साफ़ दिल और लोगों को हँसा देने वाली आदत ने पूरे गाँव का दिल जीत लिया था।

    सीख: अच्छा इरादा ज़रूरी है, लेकिन किसी भी काम को सही तरीके से सीखकर करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी होता है। और सच्चे दोस्त हर मुसीबत को भी हँसी में बदल

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कबीरदास ने गुरु को भगवान से भी बड़ा क्यों कहा?

    कबीरदास ने गुरु को भगवान से भी बड़ा क्यों कहा?

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    संत कबीरदास भारतीय भक्ति परंपरा के उन महान संतों में से एक हैं, जिनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पाँच सौ वर्ष पहले थी। उन्होंने जाति, धर्म, पंथ और बाहरी आडंबरों से ऊपर उठकर प्रेम, सत्य और सहज ज्ञान का संदेश दिया। उनकी कविताएँ और दोहे आम आदमी की भाषा में हैं, फिर भी उनमें गहरी दार्शनिक गहराई छिपी हुई है। कबीरदास के हजारों दोहों में से एक दोहा ऐसा है जो गुरु की महिमा को भगवान से भी ऊँचा स्थान देता है

    “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।

    बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”

    इस दोहे का सीधा अर्थ है यदि गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ खड़े हों, तो मैं किसके चरणों में पहले प्रणाम करूँ? मैं तो अपने गुरु के बलिहारी जाता हूँ, क्योंकि उन्होंने ही मुझे गोविंद का मार्ग दिखाया।

    यह दोहा केवल श्रद्धा का भाव नहीं है, बल्कि कबीरदास के पूरे जीवन-दर्शन का सार है। वे गुरु को भगवान से बड़ा इसलिए मानते थे क्योंकि उनके अनुसार भगवान तो सर्वव्यापी हैं, लेकिन उस सर्वव्यापी सत्ता तक पहुँचने का मार्ग दिखाने वाला गुरु ही है। बिना गुरु के मनुष्य अज्ञान के अंधकार में भटकता रहता है। गुरु वह प्रकाश है जो अंधेरे को चीरकर सत्य तक ले जाता है।

    कबीरदास का जन्म अनुमानतः सन् 1398 के आसपास काशी में हुआ था। उनके जीवन के बारे में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि वे एक जुलाहा परिवार में पले-बढ़े। बचपन से ही उनमें आध्यात्मिक जिज्ञासा थी। वे मस्जिद और मंदिर दोनों में जाते, लेकिन वहाँ के आडंबर उन्हें नहीं भाते थे। वे सत्य की खोज में थे उस सत्य की जो बाहरी पूजा-पाठ से परे हो।

    कबीरदास ने स्वयं गुरु की खोज की। प्रसिद्ध कथा है कि वे स्वामी रामानंद के शिष्य बने। रामानंद उस समय के बड़े वैष्णव संत थे। कबीरदास को डर था कि जाति के कारण रामानंद उन्हें शिष्य नहीं बनाएँगे। इसलिए उन्होंने एक दिन प्रातःकाल गंगा घाट की सीढ़ियों पर लेटकर इंतजार किया। जब रामानंद जी स्नान करने उतरे तो उनका पैर कबीर पर पड़ गया और मुख से “राम” निकल गया। कबीरदास ने उसी “राम” को गुरु-मंत्र मान लिया और स्वयं को रामानंद का शिष्य घोषित कर दिया। बाद में रामानंद जी ने उन्हें स्वीकार भी कर लिया।

    यह घटना कबीरदास के गुरु-महिमा के भाव को स्पष्ट करती है। उनके लिए गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं था, बल्कि वह माध्यम था जिसके द्वारा परमात्मा तक पहुँचा जा सकता था। कबीरदास ने कहा है।

    “गुरु की सोई परतिष्ठा, जो गुरुदेव बतावै।

    गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न राम॥”

    अर्थात् गुरु की वही प्रतिष्ठा है जो गुरुदेव बताएँ। गुरु के बिना ज्ञान उत्पन्न नहीं होता और गुरु के बिना राम नहीं मिलते।

    कबीरदास के अनुसार भगवान तो नित्य हैं, सर्वव्यापी हैं, लेकिन मनुष्य अपने अहंकार, अज्ञान और माया के कारण उन्हें देख नहीं पाता। गुरु वह होता है जो शिष्य के अंदर छिपे हुए परमात्मा को जगा देता है। जैसे अंधेरे कमरे में दीया जला देने से सब कुछ दिखाई देने लगता है, वैसे ही गुरु ज्ञान का दीया जलाकर शिष्य के जीवन को प्रकाशित कर देता है।

    भगवान को कोई देख नहीं सकता, छू नहीं सकता, उनसे सीधे बात नहीं कर सकता। लेकिन गुरु साक्षात् रूप में मौजूद होता है। वह शिष्य की गलतियों को सुधारता है, उसे डांटता है, प्यार करता है, और सही मार्ग पर ले जाता है। कबीरदास कहते हैं कि गुरु की कृपा के बिना भगवान भी नहीं मिलते,

    “गुरु बिन कौन बतावै बाट, गुरु बिन कौन उतारे पार।

    गुरु बिन कौन दिखावै राम, गुरु बिन कौन करे निस्तार॥”

    गुरु के बिना रास्ता कौन बताएगा? गुरु के बिना पार कौन उतारेगा? गुरु के बिना राम कौन दिखाएगा और गुरु के बिना निस्तार कौन करेगा?

    कबीरदास ने गुरु को इसलिए ऊँचा स्थान दिया क्योंकि वे व्यावहारिक संत थे। वे केवल सिद्धांत नहीं बताते थे, बल्कि जीवन जीने का तरीका सिखाते थे। उनके दोहों में बार-बार यह बात आती है कि बाहरी पूजा, तीर्थ, व्रत, जप-तप व्यर्थ हैं यदि भीतर का ज्ञान जागृत न हो। और भीतर का ज्ञान जगाने वाला गुरु ही होता है।

    कबीरदास ने गुरु-शिष्य संबंध को अत्यंत पवित्र और गहरी जिम्मेदारी वाला माना। उन्होंने कहा कि गुरु को चुनते समय सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि गलत गुरु शिष्य को और अधिक अंधकार में धकेल सकता है। सही गुरु वह है जो स्वार्थ से मुक्त हो, जो शिष्य को अपना बनाकर नहीं, बल्कि स्वतंत्र बनाकर ज्ञान दे।

    कबीरदास स्वयं ऐसे गुरु थे। उन्होंने अपने शिष्यों को कभी अंधभक्ति के लिए नहीं कहा। वे कहते थे कि गुरु की बात को भी विवेक से परखना चाहिए। लेकिन एक बार गुरु स्वीकार कर लेने के बाद उनकी आज्ञा का पालन पूर्ण श्रद्धा से करना चाहिए।

    उनके दोहे में गुरु की महिमा इस प्रकार है।

    “गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।

    अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥”

    गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा। गुरु शिष्य के अंदर के दोषों को गढ़-गढ़कर निकालता है। अंदर से हाथ का सहारा देता है और बाहर से चोट करता है ताकि शिष्य का जीवन सुंदर घड़े की तरह आकार ले सके।

    यह रूपक बहुत गहरा है। भगवान तो बस मौजूद हैं, लेकिन गुरु सक्रिय रूप से शिष्य को गढ़ता है। इसलिए कबीरदास गुरु को भगवान से बड़ा मानते हैं।

    कबीरदास अकेले नहीं थे जिन्होंने गुरु को इतना ऊँचा स्थान दिया। भारतीय भक्ति और संत परंपरा में गुरु को सदैव विशेष महत्व दिया गया है। नानक देव, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई—सभी ने गुरु की महिमा गाई है। लेकिन कबीरदास ने इसे सबसे स्पष्ट और निर्भीक भाषा में कहा। उन्होंने समाज के सामने चुनौती रखते हुए कहा कि यदि गुरु और भगवान दोनों मौजूद हों तो पहले गुरु को प्रणाम करो।

    यह बात उस समय और भी क्रांतिकारी थी जब लोग मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में उलझे हुए थे। कबीरदास ने कहा कि भगवान तो एक है, लेकिन उस तक पहुँचने का रास्ता गुरु दिखाता है। इसलिए गुरु की शरण में जाना सबसे पहला कदम है।

    आज के युग में जब ज्ञान इंटरनेट पर उपलब्ध है, किताबें सहज सुलभ हैं, तब भी गुरु की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। कबीरदास का दोहा आज भी उतना ही सत्य है। कोई भी कला, विज्ञान, संगीत, खेल या आध्यात्मिक साधना गुरु के बिना पूरी नहीं होती। शिक्षक, मेंटर, माता-पिता, बड़े भाई-बहत ये सभी किसी न किसी रूप में गुरु का कार्य करते हैं।

    आज मनुष्य सूचनाओं से घिरा हुआ है, लेकिन विवेक और दिशा की कमी है। गुरु वही है जो सूचना को ज्ञान में और ज्ञान को जीवन में बदलने का मार्ग दिखाए। कबीरदास की दृष्टि में गुरु केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला है।

    गुरु पूर्णिमा का पर्व इसी भाव को जीवित रखता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी सफलता, हमारी समझ और हमारी प्रगति के पीछे किसी न किसी गुरु का योगदान है। कबीरदास हमें सिखाते हैं कि सफलता मिलने के बाद गुरु को भूल जाना सबसे बड़ी कृतघ्नता है। गुरु-दक्षिणा केवल धन या वस्तु नहीं, बल्कि जीवन में गुरु के बताए मार्ग पर चलना और उनके प्रति कृतज्ञ बने रहना है।

    कबीरदास ने गुरु को भगवान से बड़ा इसलिए कहा क्योंकि वे जानते थे कि भगवान तक पहुँचने का एकमात्र सच्चा माध्यम गुरु है। भगवान तो हमेशा मौजूद हैं, लेकिन मनुष्य के अज्ञान ने उनके और अपने बीच दीवार खड़ी कर रखी है। गुरु उस दीवार को गिराता है। गुरु अंधेरे में दीप जलाता है, भटके हुए को रास्ता दिखाता है और अधूरे जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है।

    उनका दोहा हमें याद दिलाता है कि श्रद्धा का पहला अधिकार गुरु का है। यदि गुरु न होते तो हम गोविंद को कैसे पहचानते? इसलिए कबीरदास बलिहारी जाते हैं अपने गुरु की क्योंकि उन्होंने गोविंद का पता बता दिया।

    आज जब हम गुरु पूर्णिमा मनाते हैं, तो कबीरदास की इस वाणी को हृदय में धारण करें। अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें चाहे वे स्कूल के शिक्षक हों, जीवन के मार्गदर्शक हों या माता-पिता। क्योंकि ज्ञान का मार्ग गुरु के बिना अधूरा है, और अधूरे मार्ग पर चलकर कोई भी मंजिल तक नहीं पहुँच सकता।

    कबीरदास की वाणी अमर है। वे कहते हैं

    “कबीर गुरु की भक्ति का, सुख फल आगम अपार।

    जाके मन में भक्ति नहीं, ताका जीवन बेकार॥”

    गुरु की भक्ति में अपार सुख छिपा है। जिसके मन में गुरु के प्रति भक्ति नहीं, उसका जीवन व्यर्थ है। यही कबीरदास का संदेश है गुरु को भगवान से भी बड़ा मानो, क्योंकि गुरु ही वह सेतु है जो मनुष्य को परमात्मा तक पहुँचाता है।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • हक़ीक़त…

    हक़ीक़त…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    हकीकत की कहानी कहूं या अपने दिल की जुबानी 

    परेशान हूं मैं अपने ही हाथों मजबूर होकर 

    ना चैन आता है दिल को,ना करार है रातों में 

    ये क्या हाल बना लिया है मैंने

    तुमसे बेहद इश्क फरमा के 

    तुम सामने होकर अपने से लगते हो 

    मुझ से दूर जाते ही ना जाने क्यों बेगाने बन जाते हो,

    कहो ये कैसा इश्क है तुम्हारा ,

    इश्क है भी मुझसे या जरिया बन

    कर रह गई हूं सब खेलने का,

    सच कहूं तो अब तकलीफ़ देता है

    मुझे इश्क तुम्हारा , मैं टूट गई हूं बेहद इश्क में,

    ना जाने ये क्या हश्र करेगा आगे,

    हक़ीक़त सामने है फिर भी धोखे में पड़ी हुई हूं ,

    लगता है ये दर्दनाक मौत पसंद आने लगा है मुझे…।।

     

     

     

     

     

     

     

     

     

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    shalini rawat

    NSW उभरते लेखक – 🥈

    लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।

  • Online dosti

    Online dosti

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    हेल्लो दोस्तों…

     

    आज मैंने एक ऑनलाइन प्यार वाली कहानी पढ़ी। कहानी खत्म हुई तो पता नहीं क्यों, मुझे भी किसी की याद आ गई।

     

    प्यार क्या होता है, ये तो आज तक मुझे नहीं पता। शायद मैंने कभी किसी से प्यार किया भी नहीं। लेकिन हाँ… एक दोस्त ज़रूर ऐसा मिला, जिसकी याद आज भी मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। इसलिए आज मैं अपनी ही एक ऑनलाइन दोस्त की कहानी लिख रही हूँ।

     

    ये कहानी शुरू होती है लगभग तीन साल पहले… 21 – सावन 2023 से उस समय मैंने पहली बार कहानियाँ लिखना शुरू किया था। लिखने का बहुत शौक था, लेकिन लिखना उतना अच्छा नहीं आता था। शब्दों में ढेर सारी गलतियाँ होती थीं। कई बार तो खुद अपनी कहानी दोबारा पढ़ती, तो लगता कि पता नहीं लोग इसे पढ़ते भी कैसे होंगे।

     

    लगभग तीन महीने बाद मुझे एक इंस्टाग्राम ग्रुप में पता चला कि प्रतिलिपि जैसा भी एक ऐप है। उस समय लफ्ज़ो की कहानी ऐप नहीं आई थी और मैं पॉकेट नोबेल पर लिखना शुरू किया था। उसके बाद में प्रतिलिप पर लिखना शुरू किया।

     

    जो लोग मुझे शुरू से जानते होंगे, उन्हें ये तो पता होगा कि मेरी स्टोरी में गलती कितनी होती थी। लेकिन शायद किस्मत को यही मंज़ूर था कि मेरी वही गलतियाँ मुझे मेरी ज़िंदगी के सबसे खास ऑनलाइन दोस्त से मिलवा दें।

     

    एक दिन मैं प्रतिलिपि पर अपनी कहानी लिख रही थी। तभी अचानक मेरे inbox में एक मैसेज आया।

     

    मुझे थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि उस समय कोई भी सीधे inbox में मैसेज नहीं करता था। मैंने मैसेज खोला।

     

    उसने सबसे पहले लिखा था,

    “sorry में आपको inbox में मैसेज कर रहा हु”

     

    मैं कुछ देर तक बस स्क्रीन को देखती रही। फिर मैंने जवाब दिया, “कोई बात नहीं” और inbox बंद करने लगी। तभी उसका दूसरा मैसेज आया।

     

    “आप की स्टोरी बहुत अलग है और अच्छी है पर कुछ जगह गलती है आप डालने से पहले चेक कर लीजिए गा। मैं ये बात कमेंट में भी बोल देता पर वह बोलता तो लोग आपकी स्टोरी को गलत कहने लगते पर आपकी स्टोरी बहुत अच्छी है।”

     

    उसका मैसेज पढ़कर मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा। क्योंकि उसने मेरी कमी बताई थी, लेकिन मेरा आत्मविश्वास नहीं तोड़ा था। उसने मेरी गलती सबके सामने नहीं, बल्कि अकेले में बताई थी।

     

    मैंने बस “थैंक यू” कहा और “सॉरी” भी बोलकर निकल गई।

    असल में उस समय मेरे घर में शादी होने वाली थी। पूरे घर में मेहमान थे। हर तरफ भागदौड़ थी। इसलिए मैं किसी से ज़्यादा बात नहीं करती थी।

     

    लेकिन उसके बाद एक चीज़ रोज़ होने लगी। जब भी मैं प्रतिलिपि खोलती, उसका एक मैसेज ज़रूर होता। “आज का एपिसोड अच्छा था” और मैं हर बार बस “thank you” बोल देती।

     

    एक दिन उसने कहा, “मेरी स्टोरी भी पढ़ना में राइटर नहीं हु बस कभी लिखने का मन होता है तो लिख लेतीहु”

     

    मैंने उसकी कहानी पढ़ी। फिर कभी मेरी कहानी की बातें होतीं… कभी उसकी कहानी की… और धीरे-धीरे हमारी बातें बढ़ने लगीं।

     

    मुझे पता चला कि वो गुजरात से था और मैं बिहार से। दो अलग-अलग राज्यों के दो बिल्कुल अनजान लोग… जिन्हें शायद कभी मिलना भी नहीं था।

     

    लेकिन दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी। एक दिन उसने कहा,

    “लिपि पर ऑनलाइन का पता नहीं चलता है क्या आपका इंस्ट्राग्राम id है”

     

    मैंने बिना ज़्यादा सोचे अपना इंस्टाग्राम आईडी दे दिया। बस… शायद वहीं से हमारी असली दोस्ती शुरू हुई। अब हमारी सुबह गुड मॉर्निंग से होती और रात गुड नाइट पर खत्म होती।

     

    या यूँ कहूँ… खत्म ही नहीं होती थी। क्योंकि रात के दो-दो, तीन-तीन बजे तक बातें चलती रहती थीं। कभी कहानी…

    कभी सपने… कभी बचपन… कभी भविष्य… तो कभी बिल्कुल बेकार की बातें।

     

    लेकिन मज़े की बात ये थी कि हमें उन बेकार की बातों में भी बहुत मज़ा आता था। उसी दौरान मेरे घर में भाई की शादी थी।

     

    हर समय कोई ना कोई मेहमान घर में रहता था। मेरे हाथ में फोन देखकर कभी पापा डाँट देते कभी भैया कुछ बोल देते।

     

    मैं भी गुस्से में इंस्टाग्राम पर नोट डाल दिया, “मुझे कोई मैसेज नहीं करेगा में इंट्रा छोड़ कर जा रही हु” असल में वो मैसेज मैंने इंस्टाग्राम ग्रुप के लिए डाला था।

     

    लेकिन जैसे ही उसने वो नोट पढ़ा वो परेशान हो गया। उसे लगा कि शायद उसकी वजह से मैं इंस्टाग्राम छोड़ रही हूँ।

     

    उसने लगातार मैसेज करने शुरू कर दिए। कॉल भी किए।

    जब रात में पापा सो गए, तब मैंने मम्मी से फोन लिया।

    कम से कम कहानी तो लिखनी थी। मैंने जैसे ही इंस्टाग्राम खोला इतने सारे मैसेज इतनी सारी मिस्ड कॉल…

     

    कि आज भी गिन नहीं सकती। मैंने उसे पूरी बात बताई कि आखिर हुआ क्या था। तब जाकर वो शांत हुआ।

     

    उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मेरी दोस्ती किसी के लिए इतनी मायने रखती है।

     

    फिर आया वो दिन जिस दिन मेरे भैया की हल्दी थी। और उसी दिन उसका जन्मदिन भी था। उसने मुझे पहले ही बता दिया था। लेकिन घर में इतने मेहमान इतनी भागदौड़ थी कि मैं भूल गई।

     

    रात के लगभग ग्यारह बजे जब मैं ऑनलाइन आई तब मुझे याद आया। मैंने तुरंत उसे “sorry” बोला। लेकिन मुझे पता था ग्यारह से बारह के बीच उसका डिनर करने का समय होता था।

     

    उसने मेरे सॉरी का कोई जवाब नहीं दिया। मैं परेशान हो गई।

    लगभग तीस मिनट तक लगातार “सॉरी” बोलती रही। साथ में एक अच्छा सा happy birthday wishes भी लिखा।

     

    और 11:30 बजे भेज दिया। लेकिन उसने 11:57 पर जाकर देखा। और आखिरकार मान गया। उस दिन मेरी जान में जान आई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती और गहरी होती चली गई।

     

    कभी स्टोरी की बातें कभी इधर-उधर की बातें तो कभी हम truth or dare खेलते। कभी घंटों हँसते तो कभी बिना वजह एक-दूसरे को चिढ़ात और झगड़ा वो तो पूछो ही मत ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता था जब में झगड़ती नहीं थी।

     

    देखते ही देखते दो साल कब बीत गए पता ही नहीं चला।

    हाँ एक बार मैं उसका जन्मदिन भूल गई थी। वो बहुत नाराज़ हो गया था। लेकिन मज़ेदार की बात ये है कि तीन साल में उसे मेरा जन्मदिन एक बार भी याद नहीं रहा।

     

    दो बार तो मेरा इंस्टाग्राम नोट और स्टोरी देखकर उसे याद आया। जब मैं नाराज़ होती तो वो बस इतना बोल देता, “मुझे याद तो आया पर तुम तो भूल ही गई थी।”

     

    अब क्या ही जवाब दूँ मैं जनाब को। और इस साल उसने विश भी नहीं किया। शायद अब बातें पहले जैसी नहीं रहीं।

    लगभग एक साल पहले मैं बीमार थी।

     

    और उसी समय उसकी नई जॉब भी शुरू हो गई। वो अपने काम में व्यस्त रहने लगा। हमारी बातें कम होने लगीं। पहले जहाँ हर छोटी बात शेयर होती थी…

     

    अब पूरे-पूरे दिन निकल जाते थे। धीरे-धीरे ये दूरी इतनी बढ़ गई कि जो दोस्त कभी बिना Good Morning के दिन शुरू नहीं करते थे और बिना रात के दो या तीन बजे Good Night बोले सोते नहीं थे…

     

    आज वही दोस्त सिर्फ एक-दूसरे की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं। पहले ऐसा होता था रात के बारह बजे Good Night बोलते। फिर कोई नई बात याद आ जाती और फिर बातें शुरू हो जातीं।

     

    फिर दोबारा Good Night। फिर हँसी, फिर कोई नया किस्सा। और पता ही नहीं चलता था कि कब रात के तीन बज गए।

     

    लेकिन अब बस एक रील भेज देते हैं। सामने वाला देख ले तो ठीक न देखे तो भी ठीक। कभी किसी रील पर हँसने वाली इमोजी भेज दी…

     

    बस वहीं बात खत्म। जब वो अपनी नई नौकरी में बिज़ी हुआ तब उसने मुझसे सिर्फ इतना कहा था, “तुम्हे जब भी बात करने का मन हो बात कर लेना”

     

    आज तक मुझे समझ नहीं आया वो कहना क्या चाहता था?

    क्या उसे सच में मेरी दोस्ती चाहिए थी? या फिर वो सिर्फ औपचारिकता निभा रहा था? मैं तो दोस्त से बात करना चाहती थी।

     

    लेकिन क्या सिर्फ मैं ही बात करना चाहती थी? क्या उसका मन नहीं करता था मुझसे बात करने का? शायद इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे।

     

    उस दिन के बाद मैंने खुद से मैसेज करना लगभग बंद कर दिया। कभी-कभी कर देती थी लेकिन अब नहीं। हाँ रील्स आज भी भेज देती हूँ।

     

    शायद इसलिए कि कहीं न कहीं दोस्ती अभी भी बाकी है।

    कुछ दिन पहले मैंने उसे एक रील भेजी। कई दिनों बाद उसका टेक्स्ट आया।

     

    इतने दिनों बाद उसका मैसेज देखकर मैं सच में बहुत खुश हो गई। इतनी खुश कि समझ ही नहीं आया क्या जवाब दूँ।

     

    दिल बहुत कुछ लिखना चाहता था। पूछना चाहता था कि कैसे हो? इतने दिन कहाँ थे? याद आती है क्या हमारी पुरानी बातें?

     

    लेकिन उँगलियाँ कुछ भी नहीं लिख पाईं। और मैंने बस 🤣🤣 ये वाली इमोजी भेज दी।

     

    शायद इसलिए क्योंकि कभी-कभी इमोजी वो बातें कह देते हैं, जिन्हें शब्द नहीं कह पाते।

     

    आज भी जब पुरानी चैट पढ़ती हूँ तो लगता है जैसे वो दिन किसी और दुनिया के थे। जहाँ वक्त बहुत था बातें बहुत थीं हँसी बहुत थी और उम्मीदें भी एक दूसरे का ऑनलाइन आने का इंतजार बहुत थी 

     

    अब न शिकायत है न कोई गिला। बस एक खूबसूरत याद है।

    तो अब आप ही बताइए इसे ऑनलाइन प्यार कहेंगे या दोस्ती या फिर कुछ भी नहीं?

     

    मुझे आज भी नहीं पता। लेकिन मेरे लिए वो हमेशा मेरा एक बहुत अच्छा ऑनलाइन दोस्त रहेगा।

     

    कुछ रिश्तों को नाम देने की ज़रूरत नहीं होती है। वो बस यादों में रह जाते हैं और जब भी याद आते हैं चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान छोड़ जाते हैं।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    यह कहानी उस समय की है जब मिथिला भूमि पर धर्म, नीति और न्याय का दीप जलाने वाले राजा जनक का शासन था। वह केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक ऋषि, एक तत्वज्ञानी और एक संवेदनशील पिता भी थे। यह कथा उस महान क्षण की है जब उन्होंने न केवल एक पुत्री को अपनाया, बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति की गरिमा को भी एक नई ऊँचाई दी

    मिथिला राज्य में लम्बे समय से अकाल पड़ा हुआ था। वर्षा नहीं हो रही थी, फसलें सूख रही थीं और प्रजा में निराशा फैल गई थी। राजा जनक, जो तप और ज्ञान में भी रुचि रखते थे, चिंतित थे कि यह अकाल क्यों पड़ा है। ज्योतिषियों और ऋषियों से परामर्श के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि भूमि को हल चलाकर यज्ञभूमि तैयार करनी होगी, जिससे देवताओं को संतोष मिले और वर्षा हो।

    राजा जनक स्वयं हल लेकर खेत में उतरे। जब वह हल चला रहे थे, तभी भूमि की कोख से एक सुंदर, तेजस्वी कन्या बाहर आई। कन्या की त्वचा कमल के फूल-सी कोमल थी, आँखें चंद्रमा-सी शीतल और स्वर वीणा के समान मधुर। यह कोई सामान्य बालिका नहीं थी।

    जनक ठिठक गए। कुछ क्षण के लिए समय थम-सा गया। उन्होंने कन्या को अपनी गोद में उठाया और जैसे ही उस कन्या ने उन्हें अपनी नन्ही बाहों से छुआ, जनक के हृदय में एक अलौकिक प्रेम जाग उठा। यह कन्या उन्हें केवल एक बालिका नहीं लगी, बल्कि देवी स्वरूप प्रतीत हुई।

    ऋषियों ने घोषणा की — “यह कन्या स्वयं धरती की पुत्री है। इसका नाम सीता होगा, क्योंकि यह हल (सीत) की नोक से प्रकट हुई है।”

    राजा जनक ने सीता को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। यद्यपि वह गोद ली हुई कन्या थी, किंतु जनक और रानी सुनयना ने उसमें अपनी आत्मा बसा दी। मिथिला में उस समय भी समाज की रूढ़ियों ने जड़ें जमा रखी थीं — कोई कन्या गोद ली जाए और राजकुमारी बनकर महल में रहे, यह सबके लिए अस्वाभाविक था।

    लेकिन जनक ने समाज की परवाह नहीं की। उन्होंने घोषणा की, “सीता केवल मेरी पुत्री नहीं, बल्कि मिथिला की भविष्य है। जो उसे छोटा समझेगा, वह मेरे न्याय और प्रेम को नहीं समझा।”

    सीता को उन्होंने शास्त्रों का ज्ञान, अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया। वह स्वयं विद्वान थे और विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम जैसे ऋषियों के सान्निध्य में सीता की परवरिश कराई। सीता धीरे-धीरे केवल सुंदर नहीं, बल्कि तेजस्वी, बुद्धिमती और धर्मनिष्ठ भी बन गईं।

    राजा जनक का यह विचार क्रांतिकारी था — जहाँ उस युग में स्त्रियों को केवल गृहकार्य और विवाह तक सीमित किया जाता था, जनक ने सीता को स्वतंत्रता, विचार और शिक्षा का अधिकार दिया।

    समय बीता। सीता युवा हुईं। अब राजसभा में यह विषय उठा कि उनके लिए योग्य वर की खोज की जाए। अनेक राजाओं और राजकुमारों के नाम आए, किंतु जनक का मानना था कि केवल कुल, वैभव और शक्ति से नहीं, बल्कि चरित्र, संयम और धर्म से ही कोई व्यक्ति सीता के योग्य हो सकता है।

    एक दिन जनक ने घोषणा की, “जो शिवधनुष को उठा सकेगा, वही सीता का पति होगा।” यह घोषणा पूरे आर्यावर्त में गूँज उठी। जनक जानते थे कि जो वास्तव में शक्तिशाली होगा, वही इस दिव्य धनुष को उठा सकेगा।

    कई राजा आए, धनुष देख कर लौट गए। कोई उसका भार नहीं सह पाया। तब अयोध्या से राम आए, विश्वामित्र के साथ। जब राम ने धनुष उठाया और तोड़ा, जनक की आँखों में अश्रु भर आए — यह खुशी के आँसू थे।

    उन्होंने सीता का हाथ राम के हाथ में देते हुए कहा, “आज मुझे विश्वास हुआ कि यह कन्या जिसे मैंने भूमि से पाया था, उस पुरुष को मिल गई है जो धर्म और मर्यादा का प्रतीक है।”

    शादी के बाद जब सीता अयोध्या चली गईं, तो जनक प्रसन्न भी थे और व्यथित भी। वह जानते थे कि राजपरिवारों में केवल प्रेम नहीं, राजनीति भी चलती है। एक पिता होने के नाते वह चिंतित रहते थे कि सीता पर कोई अन्याय न हो

    जब उन्हें यह समाचार मिला कि राम को वनवास हुआ है और सीता भी उनके साथ वन गई हैं, जनक का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने सीता को संदेश भेजा कि वह चाहे तो मिथिला लौट सकती है, किंतु सीता ने मना कर दिया।

    उसने उत्तर भिजवाया — “पिताजी, आपने मुझे आत्मबल और धर्म का पाठ पढ़ाया है। यदि आज मैं उस पर न चलूँ, तो यह शिक्षा व्यर्थ होगी।”

    जनक को गर्व हुआ, किंतु मन व्यथित रहा।

    पाँचवाँ भाग: अग्नि परीक्षा और जनक का हस्तक्षेप

    जब लंका विजय के बाद राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली, तो जनक तक यह समाचार पहुँचा। उनका हृदय टूट गया। उन्होंने अयोध्या में दूत भेजा और स्पष्ट कहा — “यदि सीता पर कोई लांछन है, तो वह मुझ पर है। क्योंकि वह केवल मेरी पुत्री ही नहीं, मेरी मर्यादा भी है। एक पिता को चुनौती मत दो, क्योंकि जब धर्म अधर्म के हाथों अपमानित होता है, तब वह जनक जैसे राजा को भी युद्ध के लिए विवश कर सकता है।”

    राम ने जनक के संदेश को समझा। उन्होंने सीता को पुनः सम्मानपूर्वक स्वीकार किया। जनक ने स्पष्ट किया, “राजा बनना आसान है, किंतु नारी के सम्मान की रक्षा करना कठिन है। और जो इसे न निभा पाए, वह राजा कहलाने योग्य नहीं।

    जब सीता ने अंत में धरती में समा जाने का निर्णय लिया, तब उन्होंने अंतिम बार जनक को स्वप्न में देखा। जनक ने मुस्कराते हुए कहा — “बेटी, तुम वापस अपनी माँ की गोद में जा रही हो। मैंने तुम्हें जिस धरती से पाया, उसी में समा जाना तुम्हारी महिमा है। तुम जनक की पुत्री थीं, अब तुम जननी बनकर समस्त स्त्री जाति के लिए प्रेरणा बन गई हो।”

    राजा जनक केवल एक राजा नहीं थे। वह एक विचार थे — नारी के सम्मान का, शिक्षा का, स्वतंत्रता का और पिता के रूप में सच्चे प्रेम का। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा ‘मसीहा’ वही होता है जो बिना समाज की परवाह किए, सत्य और न्याय का साथ दे।

    सीता ने धरती को अपनी माँ कहा, लेकिन जनक ने उसे एक नया जीवन, पहचान और सम्मान दिया। उन्होंने यह साबित किया कि किसी स्त्री का मसीहा वही होता है जो उसे उसके अस्तित्व और आत्मबल के साथ स्वीकार करे।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • सांझ की रोशनी में सौन्दर्य

    सांझ की रोशनी में सौन्दर्य

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    सुनो! तुम श्रृंगार ना किया करो,

    अपनी आंखों को यूं ना मुझे देख कर नीचे किया करो ,

    मैं पागल हूं तुम्हारी झील सी आंखों का

    मुझे और ना तुम्हारे लिए पागल किया करो ,

    कजरारी आंखें तुम्हारी देख कर दिल में बेताबी सी छाती है,

    सांझ की रोशनी में चमक तुम्हारे चेहरे की बढ़ जाती है,

    मैं कायल हूं तुम्हारी झील सी आंखों का,

    क्या इरादा रखती हो तुम मुझे डूब कर पार जाने का,

    ये काली घटाओं सी जुल्फ तुम्हारी,

    हार बनने को बेताब है गले का हमारी ,

    यूं जो माथे पर छोटी सी बिंदी जो

    तुम लगाती हो सच कहता हूं कि ,

    तुम जान मेरी लेकर जाती हो , 

    हल्की सी लाली लिए चेहरा तुम्हारा दमकता है,

    निकला ना करो तुम अकेले कहीं दिल मेरा डरता है ,

    ये जो हंसती हो औरों से मिलकर  ,

    नहीं जानती तुम कितना दिल मेरा जलता है ,

    मैं बंदिशों में तुम्हें नहीं बांध रहा हूं ,

    तुम इसे बंदिशें मत समझना ,

    ये दुनिया तुम्हारे लायक नहीं है,

    इसलिए मैं थोड़ा  सा ही सही तुम्हें

    लेकर सम्भल रहा हूं …!!

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    shalini rawat

    NSW उभरते लेखक – 🥈

    लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।