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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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जुलाई 2026
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  • निर्जीव भी अपने से

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    निर्जीव से भी करती थी वो बात

     

    गाँव के किनारे एक छोटा-सा कच्चा घर था। उस घर में चौदह साल की एक लड़की रहती थी, जिसका नाम मीरा था। लोग कहते थे कि वह बहुत अजीब है। कोई उसे हँसता नहीं देखता था, फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा एक हल्की-सी मुस्कान रहती थी।

     

    मीरा की सबसे अनोखी आदत थी कि वह निर्जीव चीज़ों से भी बातें करती थी। सुबह उठते ही वह अपने आँगन के पुराने नीम के पेड़ से कहती, “कैसे हो मेरे दोस्त? आज हवा थोड़ी तेज़ है, अपना ध्यान रखना।”

     

    फिर वह अपने मिट्टी के घड़े से बोलती, “तू हर रोज़ सबकी प्यास बुझाता है, कभी थकता नहीं क्या?”

     

    टूटी हुई चारपाई से कहती, “तू बूढ़ी हो गई है, लेकिन आज भी मेरा सहारा बनी हुई है।”

     

    जो भी उसे देखता, बस यही कहता, “लड़की का दिमाग़ ठीक नहीं है।”

     

    लेकिन कोई यह नहीं जानता था कि मीरा ऐसा क्यों करती है।

     

    जब वह बहुत छोटी थी, तभी उसके पिता का देहांत हो गया था। उसकी माँ कई महीनों से बीमार रहती थी। घर में गरीबी थी और रिश्तेदारों ने भी धीरे-धीरे साथ छोड़ दिया था। माँ अक्सर कहती, “बेटी, अगर कभी मैं न रहूँ तो हिम्मत मत हारना।”

     

    मीरा हर बार माँ का हाथ पकड़कर कहती, “आप कहीं नहीं जाएँगी।”

     

    लेकिन किस्मत ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    एक बरसाती रात उसकी माँ ने भी दुनिया छोड़ दी।

     

    उस दिन के बाद मीरा सचमुच अनाथ होने वाली थी। गाँव वालों ने कुछ दिन तक उसकी मदद की, फिर सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए।

     

    अब उस छोटे-से घर में सिर्फ़ मीरा और उसकी यादें रहती थीं।

     

    शायद इसी अकेलेपन ने उसे निर्जीव चीज़ों से बातें करना सिखा दिया था। उसे लगता था कि अगर इंसान साथ छोड़ दें, तो भी दीवारें, पेड़, हवा और पुरानी चीज़ें इंसान का साथ नहीं छोड़तीं।

     

    वह जब रोती, तो घर की दीवार से टिककर कहती, “तूने मेरी माँ को देखा था न? मुझे लगता है वो अभी भी यहीं कहीं है।”

     

    जब तेज़ बारिश होती, तो वह छत से टपकती बूंदों से कहती, “इतना मत रोओ… मैं भी रो पड़ूँगी।”

     

    गाँव के बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे।

     

    “देखो… पगली फिर से पेड़ से बातें कर रही है।”

     

    मीरा बस मुस्कुरा देती। उसे किसी से शिकायत नहीं थी।

     

    धीरे-धीरे उसका यही स्वभाव उसकी ताकत बन गया। वह हर चीज़ में जीवन ढूँढने लगी—टूटी खिड़की की आवाज़ में भी, हवा की सरसराहट में भी। उसे लगता था कि दुनिया में हर चीज़ कुछ कहना चाहती है, बस सुनने वाला चाहिए।

     

    एक दिन स्कूल से लौटते समय उसने देखा कि रास्ते में एक बूढ़े बाबा गिर गए हैं। लोग पास से निकलते रहे, लेकिन किसी ने उन्हें उठाने की कोशिश नहीं की।

     

    मीरा दौड़कर पहुँची। उसने बाबा को सहारा दिया, पानी पिलाया और उन्हें उनके घर तक छोड़ आई।

     

    बाबा ने जाते-जाते पूछा, “बेटी, तू हर किसी का दर्द कैसे समझ लेती है?”

     

    मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “जिसने अपना सब कुछ खोया हो, उसे दूसरों का दर्द जल्दी समझ आ जाता है।”

     

    बाबा की आँखें भर आईं।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव की एक बुज़ुर्ग अम्मा बीमार पड़ गईं। उनके बेटे शहर में रहते थे और कई महीनों से मिलने नहीं आए थे।

     

    मीरा रोज़ उनके लिए खाना बनाकर ले जाती। दवा का समय याद दिलाती। रात को उनके पास बैठती और कहानियाँ सुनाती।

     

    अम्मा कहतीं, “बेटी, तू तो मेरी अपनी बेटी से भी बढ़कर निकली।”

     

    मीरा हँसकर कहती, “रिश्ते हमेशा खून से नहीं, दिल से बनते हैं।”

     

    धीरे-धीरे गाँव के लोगों ने नोटिस किया कि जिस लड़की को वे पागल समझते थे, वही सबसे ज़्यादा संवेदनशील है।

     

    एक दिन गाँव के स्कूल में बच्चों से पूछा गया, “सबसे दयालु इंसान किसे मानते हो?”

     

    पहले तो सब चुप रहे। फिर एक बच्चे ने कहा, “मीरा दीदी।

    यह सुनकर शिक्षक भी हैरान रह गए।

    उन्होंने मीरा को बुलाया और पूछा, “तुम इतनी छोटी उम्र में सबकी मदद क्यों करती हो?”

     

    मीरा ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि मैं जानती हूँ कि अकेलापन कितना दर्द देता है। मैं नहीं चाहती कि कोई और वह दर्द महसूस करे।”

     

    उसकी यह बात सुनकर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    कुछ समय बाद शहर से एक समाजसेवी संस्था गाँव आई। उन्हें मीरा के बारे में पता चला। उन्होंने उसकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का फैसला किया।

     

    पहली बार मीरा को लगा कि शायद भगवान देर से ही सही, लेकिन किसी न किसी रूप में मदद ज़रूर भेजते हैं।

     

    शहर जाने से पहले वह अपने पुराने घर के आँगन में गई।

     

    उसने नीम के पेड़ को गले लगाया और बोली, “मैं जा रही हूँ, लेकिन तुम्हें कभी नहीं भूलूँगी।”

     

    फिर उसने मिट्टी के घड़े पर हाथ फेरा और मुस्कुराकर कहा, “तूने मेरा अकेलापन बाँटा था।”

     

    दीवार को छूकर बोली, “तूने मेरी हर ख़ामोशी सुनी है।”

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    आज पहली बार गाँव वालों ने भी उन निर्जीव चीज़ों को अलग नज़र से देखा। उन्हें एहसास हुआ कि जिनसे मीरा बातें करती थी, वे चीज़ें नहीं, उसके जीवन के साथी थे।

     

    कई साल बाद मीरा पढ़-लिखकर एक सामाजिक कार्यकर्ता बनी। उसने अनाथ बच्चों के लिए एक छोटा-सा आश्रय गृह खोला।

     

    वहाँ आने वाले हर बच्चे से वह एक ही बात कहती थी, “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो, तो याद रखना… दुनिया में कोई न कोई तुम्हारी बात सुनने वाला ज़रूर होता है। और जब तक वह नहीं मिलता, तब तक अपने हौसले से बातें करना।”

     

    एक दिन एक छोटी बच्ची ने उससे पूछा, “दीदी, क्या आप आज भी पेड़ों और दीवारों से बातें करती हैं?”

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली, “हाँ… क्योंकि उन्होंने उस समय मेरा साथ दिया था, जब पूरी दुनिया मुझे अकेला छोड़ चुकी थी।”

     

    उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वे दुख के नहीं, कृतज्ञता के आँसू थे।

     

    और अब उसका आश्रय गृह सिर्फ बच्चों का घर नहीं था, बल्कि उम्मीदों का एक छोटा-सा संसार बन चुका था, जहाँ हर बच्चा यह सीखता था कि दर्द चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, अगर दिल में अपनापन हो तो दुनिया फिर से जीने लायक बन जाती है।

     

    कभी-कभी सबसे ज़्यादा दर्द सहने वाले लोग ही दूसरों के आँसू

    सबसे पहले पहचान लेते हैं। और जिनके पास अपना कोई नहीं होता, वही पूरी दुनिया को अपना बना लेते हैं।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • दोस्ती बेमिसाल

    दोस्ती बेमिसाल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दोस्ती का सबसे बड़ा तोहफ़ा

     

    एक छोटे से शहर में दो दोस्त रहते थे आरव और मोहन।

     

    दोनों की दोस्ती पूरे शहर में मिसाल थी। लेकिन उनकी ज़िंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी।

     

    आरव शहर के सबसे बड़े उद्योगपति का इकलौता बेटा था। उसके पास बड़ा बंगला, महंगी गाड़ियाँ, नौकर-चाकर और हर सुख-सुविधा थी। दूसरी ओर मोहन एक बेहद गरीब परिवार से था। उसके पिता दिहाड़ी मजदूर थे और माँ लोगों के घरों में काम करती थीं। कई बार तो उनके घर में दो वक्त का खाना भी मुश्किल से बन पाता था।

     

    लेकिन इन दोनों दोस्तों के बीच अमीरी और गरीबी की दीवार कभी नहीं आई।

     

    बचपन से दोनों साथ स्कूल जाते, साथ खेलते और साथ ही सपने देखते थे। अगर आरव के टिफिन में पनीर की सब्ज़ी होती और मोहन के पास सिर्फ सूखी रोटी, तो दोनों आधा-आधा बाँटकर खाते।

     

    स्कूल के बच्चे अक्सर मोहन का मज़ाक उड़ाते।

     

    “देखो, करोड़पति का दोस्त फटे कपड़ों में आया है।”

     

    लेकिन हर बार आरव उनके सामने खड़ा हो जाता।

     

    “अगर मेरे दोस्त का मज़ाक उड़ाया, तो समझ लेना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”

     

    मोहन हमेशा मुस्कुराकर कहता,

    “यार, तू इतना क्यों लड़ता है?”

     

    आरव हँसकर जवाब देता,

    “दोस्ती निभाने के लिए लड़ना भी पड़ता है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    स्कूल खत्म हुआ। आरव अपने पिता का कारोबार संभालने लगा, जबकि मोहन पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने लगा ताकि अपने बूढ़े माँ-बाप का सहारा बन सके।

     

    अब उनकी मुलाकातें कम होने लगीं, लेकिन दिलों की दूरी कभी नहीं बढ़ी।

     

    हर रविवार दोनों किसी चाय की दुकान पर बैठकर घंटों बातें करते।

     

    एक दिन अचानक सब कुछ बदल गया।

     

    आरव कई दिनों से थकान महसूस कर रहा था। उसका शरीर सूजने लगा था। परिवार उसे बड़े अस्पताल ले गया।

     

    जाँच हुई।

     

    रिपोर्ट देखकर डॉक्टर गंभीर हो गए।

     

    “हमें अफसोस है… आपकी दोनों किडनियाँ लगभग काम करना बंद कर चुकी हैं। इन्हें तुरंत किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होगी।”

     

    यह सुनते ही पूरे परिवार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    आरव की माँ रोने लगीं।

     

    पिता ने तुरंत रिश्तेदारों से संपर्क किया।

     

    एक-एक करके सभी की जाँच हुई।

     

    लेकिन किसी का ब्लड ग्रुप नहीं मिला, कोई डर गया, किसी ने साफ़ मना कर दिया।

     

    जिन लोगों के लिए आरव के पिता ने लाखों रुपये खर्च किए थे, वही लोग अब बहाने बनाकर दूर हो गए।

     

    दिन बीतते जा रहे थे।

     

    आरव की हालत बिगड़ती जा रही थी।

     

    उसे हफ्ते में कई बार डायलिसिस करवाना पड़ता था।

     

    एक रात उसकी माँ अस्पताल के बाहर बैठकर रो रही थीं।

     

    उन्हें अचानक मोहन का ख्याल आया।

     

    उन्होंने किसी को बताए बिना अगले दिन मोहन के छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया।

     

    मोहन ने दरवाज़ा खोला तो सामने आरव की माँ को देखकर घबरा गया।

     

    “आंटी… आप यहाँ?”

     

    उन्होंने अंदर आकर चारों तरफ देखा। टूटी चारपाई, मिट्टी का चूल्हा और साधारण-सा घर।

     

    उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    मोहन ने पानी दिया।

     

    “सब ठीक है ना?”

     

    कुछ पल चुप रहने के बाद उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,

     

    “बेटा… मैं आज एक माँ बनकर नहीं, अपने बेटे की दोस्ती का वास्ता लेकर आई हूँ।”

     

    मोहन समझ नहीं पाया।

     

    उन्होंने रोते हुए सारी बात बता दी।

     

    “आरव की दोनों किडनियाँ जवाब दे चुकी हैं… कोई भी उसे किडनी देने को तैयार नहीं है। डॉक्टर ने कहा है कि अगर जल्दी ट्रांसप्लांट नहीं हुआ तो…”

     

    उनकी आवाज़ भर्रा गई।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने काँपते हाथ जोड़ दिए।

     

    “बेटा… अगर तुम्हारा ब्लड ग्रुप मिल जाए… तो क्या… क्या तुम अपने दोस्त के लिए एक किडनी दे दोगे?”

     

    यह सुनकर मोहन कुछ पल बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

     

    उसने बिना एक पल सोचे कहा,

     

    “आंटी… आपने माँगने में देर कर दी। अगर मेरे दोस्त की जान बच सकती है, तो मेरी एक नहीं, दोनों किडनियाँ भी उसकी हैं।”

     

    आंटी रो पड़ीं।

     

    “नहीं बेटा… मुझे सिर्फ एक चाहिए।”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “दोस्ती में हिसाब नहीं होता।”

     

    अगले ही दिन चुपचाप उसकी जाँच हुई।

     

    रिपोर्ट आई।

     

    ब्लड ग्रुप भी मिला और सभी मेडिकल परीक्षण भी सफल रहे।

     

    डॉक्टर खुश हो गए।

     

    लेकिन मोहन ने एक शर्त रखी।

     

    “आरव को पता नहीं चलना चाहिए कि किडनी किसने दी है। अगर उसे पता चला तो वह कभी नहीं मानेगा।”

     

    परिवार ने उसकी बात मान ली।

     

    कुछ दिनों बाद ऑपरेशन हुआ।

     

    घंटों तक चले इस ऑपरेशन के बाद डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराकर बोले,

     

    “ऑपरेशन सफल रहा। अब दोनों खतरे से बाहर हैं।”

     

    पूरा परिवार खुशी से रो पड़ा।

     

    कुछ हफ्तों बाद आरव धीरे-धीरे ठीक होने लगा।

     

    लेकिन उसके मन में हमेशा एक सवाल रहता।

     

    “आख़िर वह कौन था जिसने मुझे नई ज़िंदगी दी?”

     

    हर बार डॉक्टर यही कहते,

     

    “जिसने दान किया, उसने अपना नाम गुप्त रखने की इच्छा जताई है।”

     

    एक दिन अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद आरव अपने दोस्त मोहन से मिलने उसके घर पहुँचा।

     

    मोहन पहले की तरह मुस्कुराकर मिला, लेकिन अब वह पहले से थोड़ा कमजोर लग रहा था।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तू इतना कमजोर क्यों हो गया?”

     

    मोहन हँस पड़ा।

     

    “अरे, बस काम ज्यादा कर लिया।”

     

    तभी मोहन की माँ से यह राज छिप न सका।

     

    उन्होंने भावुक होकर सब सच बता दिया।

     

    “बेटा… जिसने तुझे नई ज़िंदगी दी है… वो कोई और नहीं, मोहन है।”

     

    यह सुनते ही आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    वह दौड़कर मोहन के गले लग गया।

     

    “पागल… तूने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “अगर बता देता तो तू कभी मानता ही नहीं।”

     

    आरव फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    “मैं तेरे इस एहसान का कर्ज़ कभी नहीं चुका सकता।”

     

    मोहन ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “दोस्ती में एहसान नहीं होते। अगर आज मेरी जगह तू होता, तो क्या तू मना कर देता?”

     

    आरव ने बिना सोचे सिर हिला दिया।

     

    “कभी नहीं।”

     

    दोनों दोस्त गले लगकर देर तक रोते रहे।

     

    कुछ महीनों बाद जब आरव पूरी तरह स्वस्थ हो गया, तब उसने पूरे परिवार को बुलाया।

     

    वहाँ मोहन और उसके माता-पिता भी मौजूद थे।

     

    सबके सामने आरव ने एक फाइल मोहन के हाथ में रखी।

     

    मोहन ने खोला तो उसके हाथ काँप गए।

     

    वह संपत्ति के कागज़ थे।

     

    आरव मुस्कुराकर बोला,

     

    “जिस दोस्त ने मुझे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा दिया, उसके बिना मेरी दौलत भी अधूरी है।”

     

    मोहन ने तुरंत मना किया।

     

    “मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यह कोई कीमत नहीं है… यह उस रिश्ते की इज़्ज़त है जिसने मुझे दूसरी ज़िंदगी दी है।”

    मोहन की आँखें भर आईं।

    उसने फाइल सीने से लगा ली, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी दौलत आज भी वही दोस्ती थी जो बचपन में आधी रोटी बाँटने से शुरू हुई थी।

     

    उस दिन आरव ने अपनी आधी जायदाद अपने गरीब दोस्त मोहन के नाम कर दी।

     

    कहते हैं, पैसा इंसान को अमीर बना सकता है, लेकिन सच्ची दोस्ती इंसान को सबसे बड़ा ख़ज़ाना दे देती है। जिस दोस्ती में न अमीरी दिखाई दे, न गरीबी, बल्कि सिर्फ़ अपनापन और त्याग हो वही दोस्ती दुनिया की सबसे अनमोल दौलत होती है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • श्रापित तितली

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    श्रापित तितली

     

    बहुत समय पहले, पहाड़ों के बीच एक जादुई जंगल था। उस जंगल में रंग-बिरंगी परियां रहती थीं। उन्हीं में एक नन्ही और चंचल परी थी, जिसका नाम तारा था। तारा का दिल बहुत साफ था, लेकिन वह बहुत शरारती भी थी। उसे हर नई चीज़ जानने की उत्सुकता रहती थी।

     

    परियों के गुरु, गुरु वायुनाथ, पूरे जंगल के सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली गुरु थे। उन्होंने सभी परियों को एक नियम दिया था।

     

    “कभी भी उत्तर दिशा की पहाड़ी पर लगे सुनहरे फूल को मत छूना। वह फूल जादुई है और उसके पीछे बहुत बड़ा रहस्य छिपा है।”

     

    सभी परियां गुरु की बात मानती थीं, लेकिन तारा के मन में बार-बार यही सवाल उठता, “आख़िर उस फूल में ऐसा क्या है जिसे देखने तक की मनाही है?”

     

    एक सुबह, जब सारी परियां अपने काम में लगी थीं, तारा चुपके से उड़ती हुई उत्तर दिशा की पहाड़ी पर पहुंच गई। वहां सचमुच एक सुनहरा फूल चमक रहा था। उसकी खुशबू इतनी मीठी थी कि तारा खुद को रोक नहीं सकी।

     

    जैसे ही उसने फूल को हाथ लगाया, पूरे जंगल में तेज़ रोशनी फैल गई। आसमान काला पड़ गया और बिजली चमकने लगी। पेड़ तेज़ हवा में झूमने लगे और पूरा जंगल जैसे कांप उठा।

     

    अगले ही पल गुरु वायुनाथ वहां प्रकट हुए। उनकी आंखों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “तारा! मैंने तुम्हें चेतावनी दी थी। फिर भी तुमने मेरी आज्ञा तोड़ दी।”

     

    तारा डर गई। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “गुरुदेव… मुझसे गलती हो गई। मुझे माफ़ कर दीजिए।”

     

    गुरु बोले, “हर गलती की एक कीमत होती है। यदि आज तुम्हें बिना दंड के छोड़ दूं, तो बाकी परियां भी नियमों का सम्मान करना छोड़ देंगी।”

     

    उन्होंने अपना जादुई दंड उठाया और बोले,

     

    “आज से तुम्हारे पंख छिन जाएंगे। तुम एक नन्ही तितली बनकर धरती पर जीवन बिताओगी। जब तक तुम किसी ऐसे इंसान के दिल में बिना जादू के सच्ची दया और प्रेम नहीं जगा दोगी, तब तक यह श्राप नहीं टूटेगा।”

     

    इतना कहते ही तारा के चमकीले परी वाले पंख गायब हो गए। उसका शरीर छोटा होने लगा और कुछ ही पलों में वह एक सुंदर, रंग-बिरंगी तितली बन गई।

     

    तारा जोर-जोर से रोने लगी।

     

    “गुरुदेव… मैं फिर से परी बनना चाहती हूं।”

     

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    तितली बनी तारा जंगलों, खेतों और बागों में उड़ती रहती। लोग उसकी सुंदरता की तारीफ करते, लेकिन कोई उसके दिल का दर्द नहीं समझता था।

     

    तितली बनने के बाद उसने पहली बार दुनिया को बहुत करीब से देखा। पहले वह एक परी थी, इसलिए उसे कभी भूख, डर या अकेलेपन का एहसास नहीं हुआ था। लेकिन अब हर दिन उसके लिए एक नई परीक्षा लेकर आता था। कभी तेज़ बारिश उसके नाज़ुक पंखों को भिगो देती, तो कभी आंधी उसे बहुत दूर जंगलों तक उड़ा ले जाती। कई बार पक्षी उसे अपना शिकार बनाने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़ते। वह किसी पत्ते या फूल के पीछे छिपकर अपनी जान बचाती।

     

    धीरे-धीरे तारा को समझ आने लगा कि छोटा होना कमजोरी नहीं, बल्कि धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा है। उसने देखा कि छोटी-सी चींटी अपने से कई गुना बड़ा दाना उठाकर चलती है, मधुमक्खियां बिना थके शहद इकट्ठा करती हैं और छोटे-छोटे जीव भी कभी हार नहीं मानते। यह सब देखकर उसका स्वभाव बदलने लगा। अब वह पहले जैसी जिद्दी नहीं रही थी। उसने मन ही मन प्रण किया कि अगर उसे दोबारा कभी परी बनने का मौका मिला तो वह गुरु की हर बात का सम्मान करेगी।

     

    दिन बीतते गए… महीने गुजर गए… फिर साल भी बीत गए।

     

    एक दिन वह एक छोटे से गांव में पहुंची। वहां उसे आठ साल का एक लड़का मिला, जिसका नाम मोहन था।

     

    मोहन बहुत गरीब था। उसके पास खिलौने नहीं थे, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था।

     

    एक दिन कुछ बच्चे खेलते-खेलते तितली को पकड़ने लगे। कोई उसके पंख तोड़ना चाहता था, तो कोई उसे डिब्बे में बंद करना चाहता था।

     

    तारा डरकर इधर-उधर उड़ने लगी।

     

    तभी मोहन दौड़ता हुआ आया।

     

    उसने बच्चों से कहा,

     

    “उसे मत पकड़ो। अगर कोई तुम्हें पकड़कर बंद कर दे तो कैसा लगेगा?”

     

    बच्चे हंसने लगे।

     

    “अरे, ये तो सिर्फ एक तितली है।”

     

    मोहन बोला,

     

    “इसके भी प्राण हैं। इसे भी दर्द होता होगा।”

     

    उसने अपने दोनों हाथों से तितली को बचाया और धीरे से खुले आसमान की ओर उड़ा दिया।

     

    तारा पहली बार किसी इंसान की आंखों में इतनी सच्ची दया देख रही थी।

     

    उसकी आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े।

     

    लेकिन श्राप अभी भी नहीं टूटा।

     

    वह सोचने लगी, “शायद अभी मेरी परीक्षा पूरी नहीं हुई।”

     

    कुछ दिनों बाद गांव में भीषण सूखा पड़ गया। खेत सूख गए। कुएं खाली होने लगे। लोग परेशान हो गए।

     

    मोहन रोज़ अपने पीने के पानी में से थोड़ा-सा पानी बचाकर गांव के बाहर लगे छोटे-छोटे पौधों को सींचता था।

     

    लोग उसका मजाक उड़ाते।

     

    “जब इंसानों के लिए पानी नहीं है, तब पेड़ों को क्यों बचा रहा है?”

     

    मोहन मुस्कुराकर कहता,

     

    “अगर पेड़ नहीं बचेंगे, तो हम भी नहीं बचेंगे।”

     

    तारा रोज़ यह सब देखती और मन ही मन मोहन की अच्छाई पर गर्व महसूस करती।

     

    एक शाम मोहन ने देखा कि एक घायल चिड़िया ज़मीन पर पड़ी है। उसने उसे घर ले जाकर दाना-पानी दिया। कई दिनों तक उसकी सेवा की। जब चिड़िया पूरी तरह ठीक हो गई तो उसने उसे खुले आसमान में उड़ा दिया।

     

    उसी रात गांव में तेज़ बारिश हुई। सूखे खेतों में फिर से हरियाली लौटने लगी। लोग खुशियां मनाने लगे। मोहन ने आसमान की ओर देखकर भगवान का धन्यवाद किया।

     

    उसी समय तारा के चारों ओर सुनहरी रोशनी फैलने लगी।

     

    आसमान से गुरु वायुनाथ प्रकट हुए।

     

    उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तारा, तुम्हारा श्राप समाप्त हो गया।”

     

    तारा हैरानी से बोली,

     

    “लेकिन गुरुदेव, मैंने तो कोई जादू नहीं किया।”

     

    गुरु मुस्कुराए।

     

    “यही तुम्हारी सबसे बड़ी परीक्षा थी। तुमने किसी के मन को जादू से नहीं बदला। तुमने धैर्य रखा, जीवन की कठिनाइयों को सहा और सच्ची करुणा को अपने सामने खिलते हुए देखा। तुम्हारे बदलते स्वभाव और मोहन की निस्वार्थ दया ने इस श्राप को तोड़ दिया।”

     

    अगले ही पल तितली फिर से एक सुंदर परी बन गई। उसके पंख पहले से भी अधिक चमक रहे थे।

     

    तारा की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। उसने गुरु के चरण छू लिए।

     

    “गुरुदेव, आज मुझे समझ आया कि शक्ति से बड़ा अनुशासन होता है, और जादू से बड़ी दया।”

     

    गुरु ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ रखा और बोले,

     

    “जो अपनी गलती से सीख लेता है, वही सच्चा शिष्य कहलाता है।”

     

    उस दिन के बाद तारा फिर कभी अहंकार या जिद में नहीं आई। वह नई परियों को अपनी कहानी सुनाती और कहती,

     

    “जिज्ञासा अच्छी बात है, लेकिन गुरु की आज्ञा और अनुशासन उससे भी अधिक जरूरी है। दया, प्रेम और धैर्य में इतनी शक्ति होती है कि वे सबसे कठिन श्राप को भी समाप्त कर सकते हैं।”

     

    कहा जाता है कि आज भी जब किसी बगीचे में कोई रंग-बिरंगी तितली बच्चों के आसपास बिना डरे उड़ती है, तो लोग मुस्कुराकर कहते हैं”शायद यह वही श्रापित तितली है, जो अब हर किसी को प्रेम, दया और आज्ञा का सम्मान करना सिखाने आती है।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मायावी

    मायावी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मायावी का भेष 

     

    शहर में पिछले कई महीनों से एक अजीब घटना लगातार हो रही थी। शहर के बड़े-बड़े अमीर परिवार अचानक अपनी मेहनत की कमाई और जमा-पूंजी खो रहे थे। किसी के बैंक खाते से करोड़ों रुपये गायब हो जाते, तो किसी की तिजोरी रातों-रात खाली मिलती। सबसे हैरानी की बात यह थी कि न कहीं चोरी के निशान मिलते थे और न ही किसी को यह याद रहता था कि आखिर उनके साथ हुआ क्या था।

     

    पुलिस ने हर तरफ जांच शुरू कर दी, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ एक सवाल मिलता—”यह सब करता कौन है?”

     

    एक दिन शहर के मशहूर उद्योगपति राघव मल्होत्रा अपने बेटे साहिल के सामने बैठे थे। उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    “साहिल, तुम्हारे खाते से पच्चीस लाख रुपये निकल गए। बैंक कह रहा है कि सारे लेन-देन तुम्हारी मंजूरी से हुए हैं। आखिर यह कैसे हुआ?”

     

    साहिल ने सिर पकड़ लिया।

     

    “पापा, मुझे तो कुछ भी याद नहीं। मैं ऑफिस से निकला था, रास्ते में एक कैफे पर रुका था… उसके बाद जैसे सब धुंधला हो गया।”

     

    यह सुनकर पूरा परिवार सन्न रह गया।

     

    ऐसी ही घटनाएं शहर के कई और अमीर परिवारों के साथ भी हो चुकी थीं। किसी के बेटे के साथ, किसी की बेटी के साथ, तो किसी के बिजनेस पार्टनर के साथ। हर कोई एक ही बात कहता—”हमें कुछ याद नहीं।”

     

    असल में इन सबके पीछे एक मायावी था।

     

    वह कोई साधारण इंसान नहीं था। उसके पास ऐसा मायाजाल था कि वह पलभर में अपना रूप बदल सकता था। कभी वह ड्राइवर बन जाता, कभी सिक्योरिटी गार्ड, कभी ऑफिस का कर्मचारी, कभी डॉक्टर और कभी किसी होटल का वेटर। उसका असली चेहरा किसी ने कभी नहीं देखा था।

     

    लेकिन वह जल्दबाजी नहीं करता था। पहले कई दिनों तक अपने शिकार पर नज़र रखता। वह देखता कि अमीर परिवार का बेटा या बेटी किस समय घर से निकलते हैं, कहाँ काम करते हैं, किस रास्ते से आते-जाते हैं और कहाँ रुकते हैं।

     

    जब उसे पूरा यकीन हो जाता कि अब मौका सही है, तब वह उसी जगह किसी नए भेष में पहुंच जाता।

     

    जिस दिन साहिल कैफे में कॉफी पीने रुका, उस दिन मायावी उसी कैफे का नया कर्मचारी बन चुका था।

     

    वह मुस्कुराते हुए साहिल के पास आया।

     

    “सर, आपकी कॉफी।”

     

    साहिल ने जैसे ही उसकी तरफ देखा, मायावी की आंखों में एक अजीब चमक दिखाई दी। वह धीमी आवाज़ में कुछ रहस्यमयी शब्द बोलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में साहिल की आंखें बोझिल हो गईं। वह जैसे किसी गहरे नशे में चला गया।

    “मोबाइल का पासवर्ड बताओ।”

    साहिल ने बिना सोचे बता दिया।

    “बैंक का ओटीपी?”

    वह भी बता दिया।

    कुछ ही मिनटों में लाखों रुपये अलग-अलग खातों में पहुंच चुके थे। मायावी ने साहिल का मोबाइल वापस उसकी जेब में रखा और बाहर निकल गया।

     

    कैफे से बाहर आते ही उसका चेहरा बदलने लगा। अब वह एक बूढ़ा आदमी बन चुका था। सड़क पर चलते लोग उसे देखकर आगे निकल गए। किसी को जरा भी शक नहीं हुआ।

     

    उधर साहिल कुछ देर बाद सामान्य हुआ, लेकिन उसे सिर्फ इतना याद था कि उसने कॉफी पी थी। बाकी सब कुछ उसकी याददाश्त से गायब था।

     

    जब पुलिस ने कैफे के सीसीटीवी कैमरे देखे, तो उसमें सिर्फ एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। लेकिन बाहर लगे दूसरे कैमरे में वही आदमी अचानक गायब हो गया था।

     

    पुलिस जितनी जांच करती, मामला उतना ही उलझता जा रहा था।

     

    उसी समय शहर में एक नए पुलिस अधिकारी की नियुक्ति हुई। उनका नाम था अजय राणा।

     

    उन्होंने सभी फाइलें पढ़ीं और धीरे से कहा,

     

    “यह कोई साधारण चोर नहीं… बल्कि बहुत चालाक खिलाड़ी है। लेकिन हर खिलाड़ी एक न एक गलती जरूर करता है।”

     

    अजय ने उसी पल फैसला कर लिया कि अब इस रहस्यमयी मायावी का खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलने देगा।

     

    अजय राणा ने पिछले छह महीनों की सभी घटनाओं का बारीकी से अध्ययन किया। उसने हर पीड़ित से अलग-अलग बात की। सभी की यादें धुंधली थीं, लेकिन एक बात हर कहानी में समान थी हर वारदात से पहले किसी अनजान व्यक्ति से उनकी मुलाकात हुई थी।

     

    अजय ने समझ लिया कि अपराधी लोगों का भरोसा जीतकर उन्हें अपने जाल में फँसाता है।

     

    उसे पकड़ने के लिए उसने एक योजना बनाई।

     

    अगले ही दिन पूरे शहर में खबर फैला दी गई कि एक बड़े उद्योगपति का बेटा विदेश से लौट रहा है। उसके पास करोड़ों रुपये की दुर्लभ हीरे-जवाहरात और नकदी है। यह खबर जानबूझकर फैलाई गई थी ताकि मायावी लालच में आ जाए।

     

    लेकिन सच यह था कि वह युवक कोई उद्योगपति का बेटा नहीं, बल्कि पुलिस का एक जवान था। उसके आसपास सादे कपड़ों में पुलिस के कई अधिकारी हर समय मौजूद थे।

     

    तीन दिन तक कुछ नहीं हुआ।

    चौथे दिन वह जवान रोज़ की तरह एक होटल में खाना खाने पहुँचा। तभी एक नया वेटर उसके पास आया।

     

    अजय, जो दूर बैठा सब देख रहा था, अचानक चौकन्ना हो गया।

    वेटर की चाल बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी सीसीटीवी फुटेज में अलग-अलग लोगों की दिखाई देती थी।

     

    वेटर मुस्कुराया और बोला, “सर, आपका ऑर्डर।”

    जैसे ही उसने जवान की आँखों में देखा, उसकी आँखों से वही रहस्यमयी चमक निकली।

     

    लेकिन इस बार जवान पहले से तैयार था। उसने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं और मेज के नीचे लगा अलार्म दबा दिया।

     

    कुछ ही सेकंड में चारों तरफ से पुलिस ने होटल को घेर लिया।

    मायावी मुस्कुराया।

    “तुम लोग मुझे पकड़ नहीं सकते।”

    इतना कहकर उसने अपना चेहरा बदलना शुरू कर दिया। देखते ही देखते वह वेटर से बूढ़ा बन गया, फिर बूढ़े से साधु और अगले ही पल एक महिला का रूप धारण कर लिया।

    पुलिस के कई जवान पलभर के लिए भ्रमित हो गए।

     

    लेकिन अजय पहले से तैयार था।

    उसने होटल के चारों ओर विशेष दर्पण लगवाए थे। उन दर्पणों में मायावी का असली रूप साफ दिखाई दे रहा था। पहली बार सबने देखा कि उसका चेहरा न बूढ़े जैसा था, न जवान जैसा और न ही किसी साधु जैसा। उसका असली चेहरा डरावना और रहस्यमयी था।

     

    अजय ने बिना देर किए उस पर जाल फेंका। जाल पर विशेष मंत्र लिखे हुए थे, जिनकी वजह से मायावी अपना रूप बदल नहीं सका।

     

    वह गुस्से से चिल्लाने लगा।

    “मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

     

    लेकिन इस बार उसकी सारी शक्तियाँ बेकार हो चुकी थीं।

     

    पुलिस उसे गिरफ्तार करके उसके गुप्त ठिकाने पर पहुँची। वहाँ से करोड़ों रुपये, सोना, हीरे और कई परिवारों का लूटा हुआ सामान बरामद हुआ।

    सभी चीज़ें उनके असली मालिकों को वापस लौटा दी गईं।

     

    साहिल और बाकी परिवारों ने राहत की साँस ली। पूरे शहर में अजय राणा की बहादुरी की चर्चा होने लगी।

     

    अदालत ने मायावी को उसके अपराधों के लिए उम्रकैद की सज़ा सुनाई।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

    एक रात जेल का एक पहरेदार अचानक बेहोश मिला। जब दूसरे पहरेदार उसकी मदद के लिए पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि मायावी अपनी कोठरी में तो बैठा है… लेकिन उसके चेहरे पर वही रहस्यमयी मुस्कान है।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मेरे जैसे मायावी कभी खत्म नहीं होते… हम सिर्फ अपना भेष बदलते हैं।”

     

    इतना सुनते ही जेल की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।

     

    कुछ पल बाद जब रोशनी वापस आई, तो मायावी अपनी कोठरी में बैठा

    था… या शायद कोई और उसके भेष में था।

    आज तक कोई यह पता नहीं लगा पाया कि उस रात सच में क्या हुआ था।

     

    समाप्त।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बचपन जो लौट कर नहीं आया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बचपन जो लौटकर कभी नहीं आया 

     

    “मम्मी… मुझे भी स्कूल जाना है…”

     

    तेरह साल की राधा अपने आठ महीने के बेटे को गोद में लेकर घर के बाहर बने छोटे से आँगन में बैठी थी। सामने वाली सड़क से स्कूल की वर्दी पहने बच्चे हँसते-मुस्कुराते जा रहे थे। किसी के हाथ में किताबें थीं, किसी के कंधे पर भारी बस्ता था, तो कोई अपने दोस्तों के साथ शरारत करते हुए आगे बढ़ रहा था।

     

    राधा की नज़रें उन बच्चों पर ही टिक गईं। उसकी आँखों में आँसू आ गए। कभी वह भी उन्हीं बच्चों की तरह स्कूल जाया करती थी। उसे हिंदी की कहानियाँ पढ़ना और चित्र बनाना बहुत पसंद था। वह अक्सर अपनी माँ से कहती थी, “मैं बड़ी होकर टीचर बनूँगी।”

     

    लेकिन किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही लिख रखा था।

     

    राधा सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसी स्कूल में रोहित नाम का एक लड़का भी पढ़ता था। उसकी उम्र तेईस साल थी। कई बार फेल होने के कारण वह अब भी स्कूल आता था। शुरुआत में वह राधा से सामान्य बातें करता, उसकी कॉपी उठाकर दे देता और कभी-कभी टॉफी या चॉकलेट भी दे देता।

     

    राधा मासूम थी। उसे समझ नहीं था कि एक बड़े लड़के का इस तरह उसके करीब आना ठीक नहीं है।

     

    धीरे-धीरे रोहित ने उसे यह विश्वास दिला दिया कि वही उससे सबसे ज़्यादा प्यार करता है। वह कहता, “मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूँगा। कोई तुम्हें डाँटेगा नहीं। बस एक बार मेरे साथ चलो।”

     

    राधा ने बिना कुछ समझे उसकी बातों पर भरोसा कर लिया।

     

    एक दिन वह घर से उसके साथ चली गई। दोनों ने कुछ लोगों की मौजूदगी में शादी जैसा एक दिखावा कर लिया। किसी ने यह नहीं सोचा कि राधा अभी सिर्फ तेरह साल की बच्ची है। उसके हाथों में अभी किताबें होनी चाहिए थीं, घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ नहीं।

     

    कुछ महीनों बाद राधा को पता चला कि वह गर्भवती है।

     

    यह खबर सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है। उसका शरीर अभी पूरी तरह विकसित भी नहीं हुआ था। गर्भावस्था उसके लिए बेहद कठिन रही। उसे बार-बार कमजोरी, चक्कर और तेज़ बुखार आने लगा। कई बार डॉक्टरों के पास ले जाना पड़ा।

     

    आख़िरकार उसने एक बेटे को जन्म दिया।

     

    सब लोग बच्चे को देखकर खुश थे, लेकिन किसी ने उस छोटी बच्ची के चेहरे की थकान नहीं देखी, जिसने अपना बचपन खो दिया था।

     

    आज उसका बेटा आठ महीने का हो चुका था।

     

    रात में जब बच्चा रोता, तो राधा भी उसके साथ रो पड़ती। कई बार उसे खुद तेज़ बुखार होता, फिर भी वह बेटे को सीने से लगाए रखती। उसे समझ नहीं आता कि पहले बच्चे को संभाले या खुद को।

     

    रोहित भी अब पहले जैसा नहीं रहा था। शादी से पहले जो हर वक्त प्यार और साथ निभाने की बातें करता था, वही अब छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगा था। काम ठीक से नहीं चलता था, पैसों की तंगी रहती थी और घर में रोज़ झगड़े होने लगे थे।

     

    एक दिन राधा ने हिम्मत करके कहा, “क्या मैं फिर से स्कूल जा सकती हूँ?”

     

    रोहित ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया, “अब स्कूल जाकर क्या करोगी? अब तुम एक बच्चे की माँ हो।”

     

    ये शब्द सुनकर राधा का दिल टूट गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने बहुत छोटी उम्र में ऐसा फैसला लिया था, जिसकी कीमत उसे पूरी जिंदगी चुकानी पड़ सकती है।

     

    उस रात वह देर तक जागती रही। बेटा उसकी गोद में सो रहा था और उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उसे अपनी पुरानी किताबें, अपनी सहेलियाँ, स्कूल का मैदान और अपने अधूरे सपने याद आने लगे।अगले भाग में कहानी आगे बढ़ेगी, जहाँ राधा की ज़िंदगी में एक नया मोड़ आएगा और वह अपने बेटे के भविष्य के लिए एक बड़ा फैसला लेगी।

     

    अगली सुबह राधा अपने बेटे को गोद में लेकर चुपचाप बैठी थी। तभी उसके गाँव में रहने वाली उसकी पुरानी स्कूल टीचर, सीमा मैडम, किसी काम से वहाँ आईं। उनकी नज़र जैसे ही राधा पर पड़ी, वे उसे पहचान ही नहीं पाईं।

    “राधा… तुम?”

    राधा ने सिर झुका लिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। सीमा मैडम ने जब उसकी गोद में छोटा-सा बच्चा देखा तो वे सब समझ गईं। उन्होंने राधा का हाथ पकड़ लिया और पास बैठ गईं।

     

    “बेटी, तुम्हारे साथ जो हुआ, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन तुम्हारा भविष्य अभी भी खत्म नहीं हुआ है।”

     

    राधा फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    “मैडम… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे लगा था कि प्यार ही सब कुछ होता है। मुझे नहीं पता था कि मेरी पूरी जिंदगी बदल जाएगी।”

     

    सीमा मैडम ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा, “गलती से सीखना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है। तुम अभी भी पढ़ सकती हो।”

     

    उनकी बातें राधा के दिल में उतर गईं।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में बच्चों की शिक्षा और बाल विवाह के प्रति जागरूकता का एक शिविर लगा। राधा भी अपने बेटे को लेकर वहाँ पहुँची। मंच पर एक अधिकारी कह रहे थे, “हर बच्चे को बचपन, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य का अधिकार है। कम उम्र में शादी और गर्भावस्था बच्चों के जीवन पर गहरा असर डाल सकती है।”

     

    ये शब्द सुनकर राधा की आँखें भर आईं। उसे अपनी पुरानी कक्षा, ब्लैकबोर्ड, सहेलियाँ और स्कूल की घंटी याद आने लगी। उसने महसूस किया कि उसने जिस उम्र में सपने देखने थे, उस उम्र में जिम्मेदारियों का बोझ उठा लिया।

     

    शिविर के बाद सीमा मैडम फिर उससे मिलीं। उन्होंने कहा, “राधा, अगर तुम चाहो तो घर से पढ़ाई शुरू कर सकती हो। मैं तुम्हारी मदद करूँगी।”

     

    उस दिन राधा ने पहली बार उम्मीद की एक किरण महसूस की।

     

    उसने अपनी पुरानी किताबें निकालीं। जब उसका बेटा सो जाता, वह पढ़ने बैठ जाती। कभी-कभी थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, लेकिन फिर वह अपने सपने याद करके दोबारा किताब खोल लेती।

     

    धीरे-धीरे उसके माता-पिता का भी दिल पिघलने लगा। उन्होंने महसूस किया कि उनकी बेटी अभी खुद भी बच्ची है। वे समय-समय पर उसके बेटे को संभाल लेते ताकि राधा कुछ घंटे पढ़ सके।

     

    एक दिन राधा अपने बेटे को गोद में लेकर आईने के सामने खड़ी थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “मैंने अपना बचपन खो दिया, लेकिन तुम्हारा कभी नहीं खोने दूँगी।”

     

    उसने तय कर लिया कि उसका बेटा सही उम्र में स्कूल जाएगा, खूब पढ़ेगा और अपने जीवन के फैसले समझदारी से लेगा।

     

    समय बीतता गया। राधा ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर दी। रास्ता आसान नहीं था। घर के काम, बच्चे की देखभाल और पढ़ाई—सब कुछ साथ संभालना पड़ता था। कई बार लोग ताने भी मारते, “अब पढ़कर क्या करेगी?”

     

    लेकिन इस बार राधा चुप नहीं रहती। वह मुस्कुराकर कहती, “पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती।”

     

    उसकी यही बात धीरे-धीरे दूसरी लड़कियों के लिए भी हिम्मत बन गई। गाँव की कई बच्चियाँ, जो पढ़ाई छोड़ने वाली थीं, उन्होंने अपने माता-पिता से पढ़ने की जिद की।

     

    कुछ साल बाद वही राधा एक कार्यक्रम में बच्चों और अभिभावकों के सामने खड़ी थी। उसने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा,

     

    “एक गलत फैसला मेरा बचपन छीन ले गया। लेकिन मैंने ठान लिया कि मेरी गलती किसी और बच्ची की किस्मत नहीं बनेगी। हर बेटी को पढ़ने का अधिकार है और हर बच्चे को अपना बचपन जीने का हक है।”

     

    तालियों की गूँज पूरे हॉल में फैल गई।

     

    राधा ने अपने बेटे की ओर देखा। वह मुस्कुराते हुए अपनी किताब हाथ में पकड़े बैठा था।

     

    राधा की आँखें नम थीं, लेकिन इस बार उन आँसुओं में दर्द नहीं, बल्कि सुकून था। उसे विश्वास था कि भले ही उसका बचपन लौटकर कभी नहीं आया, लेकिन उसने अपने बेटे और कई दूसरी बच्चियों का भविष्य ज़रूर बदल दिया।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • काश मैं अब भी तुम्हारे करीब होती

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “कुछ गलतियाँ इंसान की ज़िंदगी बदल देती हैं… और कुछ गलतियाँ पूरी ज़िंदगी पछतावा बनकर साथ चलती हैं।”

     

    रिया और आरव एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दोनों की मुलाकात कॉलेज में हुई थी। धीरे-धीरे दोस्ती हुई और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई। आरव रिया का बहुत ख्याल रखता था। वह हर छोटी-बड़ी खुशी में उसके साथ खड़ा रहता। रिया की तबीयत खराब हो जाए तो पूरी रात जागकर उसकी चिंता करता। उसके जन्मदिन पर अपने हाथों से छोटा-सा गिफ्ट बनाता, क्योंकि उसके पास ज़्यादा पैसे नहीं थे।

     

    रिया भी उससे बहुत प्यार करती थी, लेकिन उसके दिल में एक कमी थी। उसे हमेशा लगता था कि आरव बहुत सीधा-सादा है। उसके पास न महंगी बाइक थी, न स्टाइलिश कपड़े और न ही बड़ा बैंक बैलेंस। धीरे-धीरे उसने दूसरों की बातों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। उसकी कुछ सहेलियाँ भी उसे समझातीं कि प्यार से ज़िंदगी नहीं चलती, पैसे भी ज़रूरी होते हैं। यही बातें धीरे-धीरे उसके मन में घर करने लगीं और उसने आरव के सच्चे प्यार से ज़्यादा बाहरी चमक-दमक को महत्व देना शुरू कर दिया।

     

    एक दिन कॉलेज में कबीर नाम का लड़का आया। अमीर परिवार से था, महंगी कार में आता था, हर समय दोस्तों से घिरा रहता था। उसकी बातें सुनकर रिया धीरे-धीरे उसकी तरफ आकर्षित होने लगी।

     

    आरव को यह बदलाव महसूस होने लगा।

     

    “रिया, सब ठीक है ना? तुम पहले जैसी नहीं रहीं।”

     

    रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “कुछ नहीं… बस पढ़ाई का प्रेशर है।”

     

    लेकिन सच कुछ और था।

     

    अब वह आरव के मैसेज देर से पढ़ती, कॉल उठाने से बचती और हर समय कबीर के साथ दिखाई देती। आरव हर दिन खुद को समझाता कि शायद रिया किसी परेशानी में होगी, लेकिन उसके दिल को हर पल यही डर सताता था कि कहीं वह उसे खो न दे।

     

    एक शाम आरव ने उसे पार्क में बुलाया।

     

    “रिया… अगर मुझसे कोई गलती हुई है तो बता दो। मैं खुद को बदल लूंगा, लेकिन यूँ दूर मत जाओ।”

     

    रिया ने बिना उसकी आँखों में देखे कहा,

     

    “आरव… हमें यहीं सब खत्म कर देना चाहिए।”

     

    यह सुनते ही आरव जैसे अंदर से टूट गया।

     

    “क्या… इतना आसान था तुम्हारे लिए?”

     

    रिया बोली,

     

    “हम दोनों एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं।”

     

    असल वजह उसने नहीं बताई कि वह कबीर के साथ रहना चाहती है।

     

    आरव की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा,

     

    “अगर यही तुम्हारी खुशी है… तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं। बस खुश रहना।”

     

    उस दिन के बाद दोनों की राहें अलग हो गईं।

     

    कुछ ही दिनों में रिया और कबीर साथ घूमने लगे। महंगे रेस्टोरेंट, लंबी ड्राइव, बड़े-बड़े गिफ्ट… रिया को लगा कि उसने सही फैसला लिया है। उसे लगता था कि अब उसकी हर ख्वाहिश पूरी होगी और यही उसकी नई दुनिया है।

     

    लेकिन कहते हैं, जो रिश्ता दिखावे पर शुरू होता है, वह ज़्यादा दिन नहीं चलता।

     

    धीरे-धीरे कबीर का व्यवहार बदलने लगा। वह घंटों तक रिया के मैसेज का जवाब नहीं देता। मिलने के बहाने टाल देता। पहले जो हर समय उसके साथ रहने की बातें करता था, अब वही उससे दूरी बनाने लगा।

     

    एक दिन रिया ने देखा कि कबीर किसी दूसरी लड़की के साथ हाथ पकड़कर घूम रहा है।

     

    रिया उसके सामने जाकर खड़ी हो गई।

     

    “कबीर… ये सब क्या है?”

     

    कबीर ने बेपरवाही से कहा,

     

    “रिया, प्लीज़ ड्रामा मत करो। मुझे अब तुम्हारे साथ नहीं रहना।”

     

    रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    “लेकिन… तुमने तो कहा था कि तुम मुझसे प्यार करते हो।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “मैंने ऐसा कई लड़कियों से कहा है। तुम भी उनमें से एक थीं।”

     

    इतना कहकर वह दूसरी लड़की का हाथ पकड़कर चला गया।

     

    रिया वहीं सड़क किनारे बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने किस इंसान को खो दिया।

     

    उस रात उसने मोबाइल खोला।

     

    आरव की पुरानी तस्वीरें…

     

    पुराने मैसेज…

     

    उसकी भेजी हुई शुभ रात्रि की बातें…

     

    जन्मदिन की शुभकामनाएँ…

     

    सब कुछ पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भर आईं।

     

    एक मैसेज पर उसकी नज़र रुक गई।

     

    “अगर कभी पूरी दुनिया भी तुम्हारा साथ छोड़ दे… तब भी मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”

     

    रिया ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

     

    “मैंने ही तो उस इंसान का साथ छोड़ दिया था…”

     

    अब उसे समझ आया कि सच्चा प्यार महंगे गिफ्ट या बड़ी कार से नहीं, बल्कि परवाह और भरोसे से बनता है।

     

    अगले दिन वह हिम्मत करके आरव के घर पहुँची।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    सामने आरव था।

     

    वह पहले जैसा ही शांत था, लेकिन उसकी आँखों की चमक कहीं खो चुकी थी।

     

    रिया रोते हुए बोली,

     

    “आरव… मुझे माफ़ कर दो। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मैंने तुम्हारे प्यार की कद्र नहीं की। अगर हो सके तो मुझे एक मौका और दे दो।”

     

    कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने धीमी आवाज़ में कहा,

     

    “रिया… मैंने तुम्हें दिल से चाहा था। जब तुम गई थीं, उस दिन सिर्फ रिश्ता नहीं टूटा था… मैं भी टूट गया था। कई रातें बिना सोए गुज़ारी हैं मैंने। हर त्योहार, हर खुशी अधूरी लगती थी। लेकिन समय ने मुझे जीना सिखा दिया।”

     

    रिया की सिसकियाँ और तेज़ हो गईं।

     

    “मुझे हर दिन पछतावा होता है। काश… मैं तुम्हें कभी छोड़कर न जाती।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ़ कर दिया था… क्योंकि प्यार में नफरत करना मैंने सीखा ही नहीं। लेकिन कुछ टूटे हुए रिश्ते फिर जुड़ तो जाते हैं, मगर उनमें पहले जैसा भरोसा कभी वापस नहीं आता।”

     

    रिया समझ गई कि अब बहुत देर हो चुकी है।

     

    उसने आखिरी बार आरव को देखा और भारी कदमों से वहाँ से चली गई।

     

    कई साल बीत गए।

     

    एक दिन बारिश हो रही थी।

     

    रिया बस स्टॉप पर अकेली खड़ी थी। सामने सड़क के उस पार आरव अपनी पत्नी और छोटी-सी बेटी के साथ हँसते हुए चल रहा था।

     

    उसकी बेटी ने दौड़कर आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव मुस्कुराकर उसे गोद में उठा लिया।

     

    वह दृश्य देखकर रिया की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उसने आसमान की तरफ देखा और खुद से कहा,

     

    “जिस इंसान ने मुझे सबसे ज़्यादा प्यार किया… मैंने उसी का दिल तोड़ दिया। आज उसके पास उसकी खुशियाँ हैं, और मेरे पास सिर्फ मेरी गलती की यादें।”

     

    बारिश की बूँदें उसके आँसुओं में मिल गईं।

     

    वह धीरे से मुस्कुराई, लेकिन उस मुस्कान में दर्द छिपा था।

     

    उसके होंठों से बस एक ही बात निकली—

     

    “काश… मैं अब भी तुम्हारे करीब होती।

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  • नन्ही कोमल की अधूरी विदाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नन्ही कोमल की अधूरी विदाई

     

    राजस्थान के एक छोटे से गांव में वर्षों से एक ऐसी परंपरा चली आ रही थी, जिसे वहां के लोग अपनी शान और संस्कृति का हिस्सा मानते थे। सिर्फ वही गांव नहीं, बल्कि उसके आसपास के सभी गांवों में भी बचपन में ही बच्चों की शादी कर दी जाती थी। चार-पाँच साल के बच्चों का रिश्ता तय कर दिया जाता और आठ-दस साल की उम्र तक उनकी शादी भी कर दी जाती। गांव वालों का मानना था कि जल्दी शादी करने से परिवार की इज्जत बनी रहती है और बड़े होकर बच्चे कोई गलती नहीं करते।

    इसी बीच सरकार की ओर से गांव के प्राथमिक विद्यालय में नए शिक्षक राघव का तबादला हो गया। राघव अपनी पत्नी सीमा और अपनी पाँच साल की प्यारी बेटी कोमल के साथ उस गांव में रहने आ गए।

    कोमल बहुत ही मासूम और चंचल बच्ची थी। कभी गुड़ियों से खेलती, कभी तितलियों के पीछे भागती और कभी अपने पापा के स्कूल में जाकर बच्चों के साथ बैठ जाती। उसे दुनिया की किसी भी परंपरा या रीति-रिवाज की कोई समझ नहीं थी।

    गांव में उनके आने की खबर फैलते ही कई लोग उनसे मिलने पहुंचे।

    एक बुजुर्ग मुस्कुराते हुए बोले, “मास्टर जी, सुना है आपकी एक बेटी भी है?”

     

    राघव ने हँसते हुए कहा, “हाँ, पाँच साल की है।”

    दूसरे बुजुर्ग ने कहा, “तो फिर उसकी शादी की बात भी शुरू कर दीजिए। हमारे यहां लड़कियों की शादी बचपन में ही कर दी जाती है। बड़े होकर बच्चे अपने मन की करने लगते हैं।”

     

    राघव ने विनम्रता से जवाब दिया, “अभी तो उसे ठीक से लिखना-पढ़ना भी नहीं आता। उसकी शादी की बात करना तो बहुत दूर की बात है।”

     

    बुजुर्गों ने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, “मास्टर जी, यहां का यही रिवाज है।”

     

    राघव मुस्कुरा तो दिए, लेकिन उनके मन में चिंता घर कर गई।

     

    अगले दिन जब वे स्कूल पहुंचे तो उन्हें एक अजीब बात दिखाई दी। स्कूल में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी। कई बच्चियों के नाम रजिस्टर में दर्ज थे, लेकिन वे महीनों से स्कूल नहीं आई थीं।

     

    उन्होंने एक बच्चे से पूछा, “रीना स्कूल क्यों नहीं आती?”

     

    बच्चे ने सहजता से कहा, “सर, उसकी शादी हो गई। अब ससुराल वाले पढ़ने नहीं भेजते।”

     

    यह सुनकर राघव का दिल बैठ गया।

     

    शाम को कोमल घर के बाहर मिट्टी में खेल रही थी। तभी लगभग दस साल की एक लड़की वहां आई। उसकी मांग में सिंदूर था और गले में मंगलसूत्र।

     

    कोमल ने मासूमियत से पूछा, “दीदी, आपने ये लाल-लाल क्या लगाया है?”

     

    लड़की ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “मेरी शादी हो गई है।”

     

    कोमल खुश होकर बोली, “शादी में तो बहुत सारी मिठाइयाँ मिलती होंगी ना?”

     

    लड़की की आंखें भर आईं। उसने बस सिर हिला दिया और वहां से चली गई।

     

    राघव दूर खड़े यह सब देख रहे थे। उन्हें उस बच्ची की आंखों में छिपा दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

     

    कुछ दिनों बाद गांव की पंचायत बुलाई गई।

     

    सरपंच ने कहा, “मास्टर जी, गांव वाले चाहते हैं कि आपकी बेटी का रिश्ता भी तय कर दिया जाए। इससे गांव की परंपरा बनी रहेगी।”

     

    राघव अपनी जगह से उठे और पूरे आत्मविश्वास के साथ बोले,

     

    “मेरी बेटी कोई बोझ नहीं है जिसे जल्दी विदा कर दूँ। वह पढ़ेगी, अपने सपने पूरे करेगी और जब समझदार होगी, तभी अपनी जिंदगी का फैसला खुद करेगी।”

     

    यह सुनकर पंचायत में सन्नाटा छा गया।

     

    कुछ लोगों को उनकी बात पसंद नहीं आई। धीरे-धीरे गांव वालों ने उनके परिवार का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। कोई दूध नहीं देता, कोई सब्जी नहीं बेचता और कई लोग उनसे बात तक नहीं करते।

     

    सीमा परेशान हो गईं। उन्होंने एक दिन कहा, “इतनी परेशानी हो रही है। अगर हम झुक जाएँ तो शायद सब ठीक हो जाए।”

     

    राघव ने शांत स्वर में कहा, “अगर आज हम डर गए, तो कल हमारी बेटी का बचपन भी छिन जाएगा।”

     

    कुछ ही दिनों बाद गांव में एक दुखद घटना हुई। बारह साल की पूजा, जिसकी शादी बचपन में हो गई थी, अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। उसे शहर के अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने गांव वालों से कहा, “बच्चों पर समय से पहले जिम्मेदारियाँ डालना उनके शरीर और मन दोनों के लिए नुकसानदायक है। इन्हें खेलने, पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार है।”

     

    डॉक्टर की बातें कई लोगों के दिल को छू गईं।

     

    राघव ने उसी समय स्कूल में एक जागरूकता कार्यक्रम रखा। डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और बाल विकास विभाग के कर्मचारी भी आए। उन्होंने गांव वालों को बताया कि बाल विवाह सिर्फ एक पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि कानूनन अपराध भी है। इससे बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, उनका भविष्य अंधकार में चला जाता है और उनका बचपन उनसे छिन जाता है।

     

    गांव वाले अब भी चुपचाप बैठे थे।

     

    तभी छोटी-सी कोमल अपनी कॉपी हाथ में लेकर मंच पर पहुंची।

     

    उसने मासूम आवाज में कहा,

     

    “मेरे पापा कहते हैं कि मैं बड़ी होकर डॉक्टर बन सकती हूँ… टीचर बन सकती हूँ… पुलिस बन सकती हूँ… या फिर जो चाहूँ, वो बन सकती हूँ। लेकिन अगर मेरी अभी शादी कर दी गई… तो क्या मैं अपने सपने पूरे कर पाऊँगी?”

     

    पूरा मैदान बिल्कुल शांत हो गया।

     

    किसी के पास उस पाँच साल की बच्ची के सवाल का जवाब नहीं था।

     

    उसी समय वह दस साल की शादीशुदा लड़की रोते हुए उठी और बोली,

     

    “काश… मुझे भी पढ़ने दिया होता। आज मैं भी अपने सपने पूरे कर रही होती।”

     

    उसकी बात सुनकर कई महिलाओं की आँखें भर आईं।

     

    सरपंच धीरे-धीरे खड़े हुए। उन्होंने गांव वालों की ओर देखा और कहा,

     

    “हमने हमेशा यही समझा कि हम सही कर रहे हैं, लेकिन आज एहसास हुआ कि हम अपने ही बच्चों से उनका बचपन छीन रहे थे।”

     

    उन्होंने ऊँची आवाज में घोषणा की,

     

    “आज से इस गांव और आसपास के किसी भी गांव में कोई भी बाल विवाह नहीं होगा। जो भी ऐसा करेगा, पंचायत उसका साथ नहीं देगी, बल्कि कानून का साथ देगी।”

     

    पूरा गांव तालियों की गूंज से भर उठा।

     

    कुछ महीनों बाद गांव पूरी तरह बदल चुका था। जहां पहले छोटी-छोटी बच्चियों के रिश्ते तय होते थे, वहां अब उनके स्कूल में दाखिले करवाए जाने लगे। माता-पिता अपनी बेटियों को गर्व से पढ़ने भेजने लगे।

     

    वही दस साल की लड़की भी दोबारा स्कूल आने लगी। उसके चेहरे पर अब उदासी नहीं, बल्कि नई उम्मीद दिखाई देती थी।

     

    कोमल भी हर सुबह अपने बैग के साथ खुशी-खुशी स्कूल जाती। उसकी मुस्कान देखकर राघव और सीमा की आँखों में सुकून झलकने लगता।

     

    एक दिन स्कूल से लौटते समय कोमल ने अपने पापा का हाथ पकड़कर पूछा,

     

    “पापा… मेरी शादी कब होगी?”

     

    राघव मुस्कुराए, उसे गोद में उठाया और प्यार से बोले,

     

    “जब मेरी बेटी अपने सारे सपने पूरे कर लेगी, अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी और अपनी जिंदगी का फैसला खुद करने लायक बन जाएगी… तभी उसकी शादी होगी।”

     

    कोमल खिलखिलाकर हँस पड़ी।

     

    उसकी वह हँसी सिर्फ एक बच्ची की हँसी नहीं थी, बल्कि उस गांव में लौट आए बचपन, शिक्षा और नई सोच की सबसे प्यारी आवाज बन चुकी थी।

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  • एक गांव का राक्षस

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बहुत समय पहले घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ों के बीच शिवपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव बसा हुआ था। गाँव के लोग बहुत ही सीधे-सादे, मेहनती और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाले थे। गाँव के ठीक बीचोंबीच मां भवानी का एक प्राचीन मंदिर था। हर सुबह और हर शाम पूरा गाँव वहीं इकट्ठा होकर आरती करता और अपनी खुशियों की प्रार्थना करता था। लेकिन कई वर्षों से उस गाँव पर एक भयानक संकट मंडरा रहा था। जंगल की सबसे ऊँची पहाड़ी पर कालमुख नाम का एक राक्षस रहता था। उसका शरीर पहाड़ जैसा विशाल, आँखें जलते अंगारों जैसी लाल और उसकी दहाड़ सुनकर पेड़ों के पत्ते तक काँप उठते थे। जब भी उसे तेज भूख लगती, वह गाँव में आ धमकता और किसी एक छोटे बच्चे को उठाकर ले जाता। उसके जाने के बाद पूरे गाँव में सिर्फ मातम और चीख-पुकार रह जाती। हर माँ अपने बच्चे को सीने से लगाए रहती। कोई भी बच्चा अकेले घर से बाहर नहीं निकलता था। शाम ढलते ही पूरा गाँव अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेता। एक दिन फिर वही मनहूस घड़ी आ गई। जंगल की ओर से कालमुख की भयानक दहाड़ गूँजी। “वो आ गया… राक्षस आ गया…!” किसी ने घबराकर चिल्लाया। लोग अपने बच्चों को लेकर इधर-उधर भागने लगे। लेकिन कालमुख ने एक सात साल के मासूम बच्चे को पकड़ लिया। उसकी माँ रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़ी। “मेरे बच्चे को छोड़ दे… मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ… उसे मत ले जा…” कालमुख ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। “हा… हा… हा… तुम्हारे आँसू देखकर ही मेरी भूख और बढ़ जाती है।” इतना कहकर वह बच्चे को लेकर जंगल की ओर चला गया। पूरा गाँव सन्न रह गया। किसी घर में उस दिन चूल्हा नहीं जला। अगली सुबह गाँव के सभी लोग मां भवानी के मंदिर पहुँचे। सबकी आँखों में आँसू थे। गाँव के बुज़ुर्ग ने हाथ जोड़कर कहा, “हे मां… अब हमसे अपने बच्चों का दुख नहीं देखा जाता। हमारी रक्षा करो।” पूरा मंदिर “जय मां भवानी” के जयकारों से गूँज उठा। तभी मंदिर के बाहर जोरदार ठहाका सुनाई दिया। सबने बाहर देखा। कालमुख मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ा था। वह हँसते हुए बोला, “हर बार इसी मूर्ति से मदद माँगते हो? अगर तुम्हारी देवी में शक्ति है तो मुझे रोककर दिखाए।” उसने मंदिर की ओर देखकर उपहास किया और बोला, “अगली पूर्णिमा को मैं फिर आऊँगा… और इस बारपहले से भी छोटे बच्चे को लेकर जाऊँगा।” इतना कहकर वह हँसता हुआ जंगल की ओर लौट गया। पूरा गाँव डर से काँप उठा। उसी गाँव में हरिराम और सीता नाम का एक गरीब दंपति रहता था। दोनों की शादी को कई साल हो चुके थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। फिर भी उन्होंने कभी भगवान से शिकायत नहीं की। वे रोज़ मंदिर की सफाई करते, दीपक जलाते और मां भवानी की सेवा करते। एक रात सीता मंदिर में बैठी रो रही थी। “हे मां… अगर मेरी गोद भरनी है, तो ऐसी संतान देना जो सिर्फ मेरी नहीं, पूरे गाँव की रक्षा करे।” उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। अचानक मंदिर में रखा दीपक अपने आप तेज़ जलने लगा। बिना हवा के मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं। पूरा मंदिर दिव्य प्रकाश से भर गया। सीता ने काँपते हुए सिर उठाया। उसे लगा जैसे मां भवानी की मूर्ति मुस्कुरा रही हो। तभी एक मधुर आवाज़ गूँजी— “डर मत पुत्री। तुम्हारी भक्ति व्यर्थ नहीं जाएगी। समय आने पर मेरी शक्ति तुम्हारे घर जन्म लेगी। वह दिव्य कन्या इस गाँव को राक्षस के आतंक से मुक्त करेगी।” इतना कहकर प्रकाश धीरे-धीरे गायब हो गया। सीता ने यह बात हरिराम को बताई, लेकिन दोनों ने इसे किसी और से नहीं कहा। कुछ दिनों बाद एक चमत्कार हुआ। सालों से निसंतान रही सीता गर्भवती हो गई। जब यह खबर पूरे गाँव में फैली तो लोगों की आँखों में बरसों बाद उम्मीद की चमक दिखाई दी। सबने इसे मां भवानी का आशीर्वाद माना। लेकिन जब यह बात कालमुख तक पहुँची तो वह ज़ोर से हँस पड़ा। “एक बच्ची मेरा अंत करेगी? हा… हा… हा… इंसानों की उम्मीद भी कितनी मज़ेदार होती है।” उसने गुस्से में पहाड़ की एक विशाल चट्टान पर मुक्का मारा और वह चट्टान टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई। “जिस दिन वह बच्ची पैदा होगी, उसी दिन मैं उसे खा जाऊँगा। फिर देखूँगा तुम्हारी मां भवानी क्या कर लेती हैं।” यह सुनकर गाँव वाले और भी डर गए, लेकिन उन्होंने मां भवानी पर विश्वास नहीं छोड़ा। हर दिन पूरा गाँव मंदिर में दीप जलाकर सीता और उसके होने वाले बच्चे की सलामती की प्रार्थना करने लगा। आखिर वह रात आ ही गई। नौ महीने पूरे हो चुके थे।आसमान में काले बादल छा गए। बिजलियाँ चमकने लगीं।तेज़ हवाएँ चलने लगीं। मां भवानी के मंदिर की घंटियाँ बिना किसी के छुए अपने आप बजने लगीं। पूरा गाँव उस दिव्य प्रकाश से नहा उठा जो मंदिर से निकल रहा था। उसी समय सीता ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। जैसे ही उस बच्ची ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं, उसके माथे पर लाल रंग का एक छोटा-सा त्रिशूल चमक उठा। उसी क्षण मंदिर की अखंड ज्योति पहले से कई गुना अधिक तेज़ हो गई। गाँव के बुज़ुर्ग भावुक होकर बोले, “यह कोई साधारण कन्या नहीं… यह मां भवानी के आशीर्वाद से जन्मी दिव्य शक्ति है।” लेकिन तभी दूर पहाड़ी से कालमुख की भयानक दहाड़ सुनाई दी। “मैं आ रहा हूँ… आज कोई देवी मुझे नहीं रोक पाएगी। सबसे पहले मैं इसी बच्ची को अपना शिकार बनाऊँगा!” उसकी दहाड़ सुनकर पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया। लेकिन उसी समय मां भवानी के मंदिर से तेज़ दिव्य प्रकाश निकला। ऐसा लगा जैसे स्वयं मां भवानी मुस्कुराकर कह रही हों “अब अधर्म का अंत निश्चित है… मेरी पुत्री इस धरती पर अपना पहला कदम रख चुकी है।” और इसी के साथ उस राक्षस के अंत की शुरुआत हो गई… राक्षस कालमुख को जैसे ही दिव्य कन्या के जन्म की खबर मिली, वह गुस्से से पागल हो उठा। उसकी भयानक दहाड़ से पूरा जंगल काँपने लगा। हाथ में विशाल गदा लिए वह तेज़ी से शिवपुर की ओर बढ़ा। गाँव वालों ने उसे आते देखा तो सभी अपने घरों से निकलकर मां भवानी के मंदिर में पहुँच गए। हरिराम और सीता अपनी नवजात बेटी को गोद में लिए मां भवानी के चरणों में बैठ गए। सभी लोग हाथ जोड़कर एक ही प्रार्थना कर रहे थे, “हे मां, हमारी रक्षा कीजिए।” कुछ ही देर में कालमुख मंदिर के सामने आ खड़ा हुआ। वह ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए बोला, “यही है वह बच्ची जो मेरा अंत करेगी? आज सबसे पहले मैं इसी को खाऊँगा, फिर पूरे गाँव को खत्म कर दूँगा।” इतना कहकर वह मंदिर की ओर बढ़ा। लेकिन जैसे ही उसने मंदिर की पहली सीढ़ी पर कदम रखा, उसके पैर वहीं रुक गए। उसे लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे आगे बढ़ने नहीं दे रही हो। गुस्से में उसने अपनी पूरी ताकत से गदा मंदिर पर फेंकी, लेकिन गदा मंदिर से टकराने से पहले ही राख बनकर हवा में उड़ गई। उसी क्षण मंदिर के गर्भगृह से तेज़ प्रकाश निकला। वह प्रकाश सीधा उस नवजात कन्या पर पड़ा। बच्ची मुस्कुराई और उसके माथे पर बना त्रिशूल चमकने लगा। देखते ही देखते वह दिव्य आभा से घिर गई। आसमान में बिजली चमकी और मां भवानी का दिव्य स्वर गूँजा, “कालमुख! तेरे पापों का अंत आज निश्चित है।” यह सुनते ही कन्या के सामने एक दिव्य त्रिशूल प्रकट हुआ। बिना किसी के छुए वह त्रिशूल तेज़ी से उड़ता हुआ कालमुख की ओर बढ़ा। राक्षस ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की। उसने बड़े-बड़े पत्थर उठाकर फेंके, ज़ोरदार दहाड़ लगाई, लेकिन दिव्य त्रिशूल को कोई नहीं रोक सका। अगले ही पल त्रिशूल कालमुख के सीने में जा धँसा। “नहीं… यह नहीं हो सकता!” राक्षस दर्द से चीख उठा। उसका विशाल शरीर काँपने लगा। धीरे-धीरे वह धुएँ में बदलने लगा और कुछ ही क्षणों में राख बनकर धरती पर बिखर गया। राक्षस के मरते ही आसमान साफ़ हो गया। मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं और पूरे गाँव में फूलों की वर्षा होने लगी। गाँव वाले खुशी से झूम उठे। हर तरफ़ “जय मां भवानी!” के जयकारे गूँजने लगे। हरिराम और सीता की आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया और मां भवानी का धन्यवाद किया। उस दिन के बाद शिवपुर में कभी किसी बच्चे पर कोई संकट नहीं आया। गाँव फिर से हँसी, खुशियों और बच्चों की किलकारियों से गूँज उठा। आज भी लोग उस मंदिर में जाकर यही कहते हैं “जहाँ सच्ची श्रद्धा और मां भवानी का आशीर्वाद हो, वहाँ अधर्म और बुराई का अंत निश्चित होता है।”

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  • 20 साल का इंतजार

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    “अरे, शादी को पूरे बीस साल हो गए… लेकिन आज तक इनके घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी।”

     

    गांव की चौपाल हो, किसी की शादी हो या कोई त्योहार, रवि और मीरा जहां भी जाते, लोगों की बातें उनका पीछा नहीं छोड़ती थीं।

     

    “इतने साल हो गए, अब तो उम्मीद ही छोड़ देनी चाहिए।”

     

    “पता नहीं पिछले जन्म का कौन-सा पाप है।”

     

    ऐसी बातें सुन-सुनकर मीरा का दिल हर बार टूट जाता था। लेकिन वह किसी से कुछ नहीं कहती। बस चुपचाप अपने आंसू पोंछ लेती।

     

    रवि हमेशा उसका हौसला बनकर खड़ा रहता।

     

    वह मुस्कुराकर कहता,

    “दुनिया का काम बोलना है मीरा… और हमारा काम महादेव पर भरोसा रखना।”

     

    उनका छोटा-सा घर बहुत साधारण था, लेकिन उसमें प्यार की कोई कमी नहीं थी। दोनों एक-दूसरे का इतना ख्याल रखते कि देखने वाले कहते, “भगवान ने इन्हें संतान भले न दी हो, लेकिन इनके रिश्ते में कभी कमी नहीं आने दी।”

     

    हर सोमवार दोनों सुबह-सुबह उठकर महादेव के मंदिर जाते। मीरा अपने हाथों से शिवलिंग पर जल चढ़ाती और आंखें बंद करके बस एक ही प्रार्थना करती,

     

    “महादेव… अगर हमारी किस्मत में संतान है तो जरूर देना, और अगर नहीं है तो इतना धैर्य देना कि कभी आपसे शिकायत न करूं।”

     

    रवि भी हाथ जोड़कर कहता,

     

    “भोलेनाथ, हमें आपकी हर मर्जी मंजूर है।”

     

    समय अपनी रफ्तार से चलता रहा।

     

    एक दिन रवि के छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था। पूरा परिवार खुशियां मना रहा था।

     

    मीरा भी अपने हाथों से बच्चे के लिए केक और मिठाइयां लेकर गई।

     

    तभी एक रिश्तेदार ने ताना मारते हुए कहा,

     

    “दूसरों के बच्चों पर इतना प्यार लुटाने से क्या होगा? अपना बच्चा होता तो बात ही अलग थी।”

     

    दूसरी औरत भी हंसते हुए बोली,

     

    “भगवान हर किसी की झोली नहीं भरता।”

     

    ये सुनते ही मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसके हाथ से मिठाई की प्लेट लगभग गिर ही गई।

     

    रवि ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया और बिना किसी से कुछ कहे वहां से निकल आया।

     

    घर लौटते समय पूरे रास्ते दोनों चुप रहे।

     

    कुछ देर बाद मीरा रोते हुए बोली,

     

    “क्या सच में मेरी ही कमी है? क्या मैं कभी मां नहीं बन पाऊंगी?”

     

    रवि ने गाड़ी रोक दी।

     

    उसने मीरा का चेहरा अपने हाथों में लिया और कहा,

     

    “मेरी नजर में तुम दुनिया की सबसे अच्छी पत्नी हो। अगर पूरी जिंदगी भी हम दोनों अकेले रहे, तब भी मुझे कोई दुख नहीं होगा। मुझे सिर्फ तुम्हारी मुस्कान चाहिए।”

     

    मीरा और भी ज्यादा रो पड़ी।

     

    उस रात दोनों ने खाना भी नहीं खाया।

     

    वे सीधे घर के मंदिर में जाकर महादेव की मूर्ति के सामने बैठ गए।

     

    न कोई शिकायत…

     

    न कोई सवाल…

     

    बस आंखों में आंसू और दिल में भरोसा था।

     

    दिन महीने बने…

     

    महीने साल बने…

     

    और देखते ही देखते शादी के पूरे बीस साल बीत गए।

     

    अब गांव वालों ने ताने देना भी कम कर दिया था, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि अब इनके घर कभी बच्चा नहीं आएगा।

     

    लेकिन रवि और मीरा का विश्वास आज भी पहले जैसा अटल था।

     

    सावन का महीना शुरू हुआ।

     

    रवि ने कहा,

     

    “मीरा, इस बार हम पैदल चलकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करेंगे।”

     

    मीरा मुस्कुराकर बोली,

     

    “जहां महादेव बुलाएंगे, वहां तक जरूर चलेंगे।”

     

    दोनों ने यात्रा शुरू की।

     

    रास्ता आसान नहीं था।

     

    कभी तेज धूप पड़ती…

     

    कभी मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती…

     

    कभी पथरीले रास्तों पर पैर छिल जाते…

     

    लेकिन दोनों के होंठों पर सिर्फ एक ही जयकारा था—

     

    “हर हर महादेव!”

     

    यात्रा के आखिरी दिन जब दोनों मंदिर पहुंचे तो मीरा शिवलिंग के सामने बैठते ही फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “महादेव… आज मैं आपसे कुछ मांगने नहीं आई हूं। बस अपना सारा दुख आपके चरणों में छोड़ने आई हूं। अब जो आपकी इच्छा, वही हमारी किस्मत।”

     

    पास ही बैठे एक वृद्ध साधु काफी देर से दोनों को देख रहे थे।

     

    उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “बेटी, याद रखना… भोलेनाथ के घर देर हो सकती है, लेकिन अंधेर कभी नहीं होता। तुम्हारा विश्वास खाली नहीं जाएगा।”

     

    रवि और मीरा ने उनके चरण छुए और मन में नई उम्मीद लेकर घर लौट आए।

     

    करीब दो महीने बाद मीरा की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उसे बार-बार चक्कर आने लगे और कमजोरी महसूस होने लगी।

     

    रवि घबरा गया और तुरंत उसे शहर के अस्पताल लेकर पहुंचा।

     

    डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखीं और दोनों को बाहर इंतजार करने के लिए कहा।

     

    रिपोर्ट आने तक दोनों की धड़कनें तेज थीं।

     

    मीरा बार-बार महादेव का नाम जप रही थी, जबकि रवि उसकी हथेली थामे चुपचाप बैठा था।

     

    थोड़ी देर बाद डॉक्टर मुस्कुराते हुए बाहर आए…

     

    और बोले,

     

    “बधाई हो… आप दोनों माता-पिता बनने वाले हैं।”

     

    यह सुनते ही दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बीस साल का इंतजार आखिरकार खत्म होने वाला है।

     

    डॉक्टर के कमरे से बाहर निकलते ही मीरा ने कांपते हाथों से अपनी रिपोर्ट सीने से लगा ली। उसकी आंखों से खुशी के आंसू लगातार बह रहे थे। वह बार-बार आसमान की ओर देखकर बस एक ही बात कह रही थी,

     

    “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”

     

    रवि की आंखें भी नम थीं। वह अस्पताल के छोटे-से मंदिर में गया और घुटनों के बल बैठ गया। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ… बीस साल तक आपने हमारी परीक्षा ली, लेकिन आज आपने हमारी झोली खुशियों से भर दी। आपका लाख-लाख धन्यवाद।”

     

    इतने वर्षों तक उसने हर ताना मुस्कुराकर सहा था। उसने कभी अपनी पत्नी को अकेला महसूस नहीं होने दिया। आज उसे लग रहा था कि उसका हर आंसू, हर प्रार्थना और हर सोमवार का व्रत सफल हो गया।

     

    दोनों सबसे पहले घर पहुंचे। उन्होंने महादेव की तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाया। पूरे घर में अगरबत्ती की सुगंध फैल गई। दोनों ने मिलकर शिव चालीसा का पाठ किया।

     

    मीरा ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ, आपने हमें दुनिया की सबसे बड़ी खुशी दी है। अब बस इतनी कृपा करना कि हम इस बच्चे को अच्छे संस्कार दें और हमेशा आपके बताए रास्ते पर चलना सिखाएं।”

     

    उस दिन के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जहां कभी सन्नाटा रहता था, वहां अब आने वाले नन्हे मेहमान की बातें होने लगीं। रवि रोज़ छोटे-छोटे कपड़े, खिलौने और झूले देखकर मुस्कुरा देता।

     

    नौ महीने जैसे-तैसे बीत गए।

     

    आखिर वह दिन भी आ गया जिसका दोनों ने बीस साल तक इंतजार किया था।

     

    अस्पताल के बाहर रवि बेचैनी से टहल रहा था। उसके होंठों पर लगातार “ॐ नमः शिवाय” का जाप चल रहा था।

     

    कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराते हुए बोले,

     

    “बधाई हो… लक्ष्मी आई है। आपके घर बेटी ने जन्म लिया है।”

     

    यह सुनते ही रवि की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने तुरंत हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा और कहा,

     

    “महादेव… आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”

     

    जब उसने पहली बार अपनी नन्ही-सी बेटी को गोद में लिया, तो उसकी आंखों से आंसू बच्ची के माथे पर गिर पड़े। उसने प्यार से उसके माथे को चूमते हुए कहा,

     

    “तुम हमारी बीस साल की तपस्या का फल हो।”

     

    मीरा अपनी बेटी को सीने से लगाकर रोए जा रही थी। यह दुख के नहीं, बल्कि बरसों की अधूरी इच्छा पूरी होने की खुशी के आंसू थे।

     

    कुछ दिनों बाद रवि अपनी बेटी को गोद में लेकर सबसे पहले महादेव के मंदिर पहुंचा।

     

    उसने बच्ची को शिवलिंग के सामने झुकाकर कहा,

     

    “भोलेनाथ, यह हमारी नहीं… आपकी अमानत है। आपने इसे हमें संभालने के लिए भेजा है।”

     

    मंदिर में मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गईं।

     

    धीरे-धीरे पूरे गांव में यह खबर फैल गई।

     

    जो लोग कभी ताने मारते थे, वही आज मिठाई लेकर उनके घर आने लगे।

     

    उन्हीं रिश्तेदारों में से एक महिला, जिसने कभी मीरा का मजाक उड़ाया था, बेटी को गोद में लेकर रो पड़ी।

     

    वह बोली,”बहू… मुझे माफ कर देना। मैंने तुम्हें बहुत दुख पहुंचाया।”

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली,

    “जब महादेव ने सब माफ कर दिया, तो मैं कौन होती हूं किसी से नाराज़ रहने वाली?”

     

    उसकी बात सुनकर वहां खड़े सभी लोगों का सिर शर्म से झुक गया।

     

    उस दिन गांव के हर इंसान ने एक बात सीखी—

     

    किसी के दुख का मजाक कभी नहीं उड़ाना चाहिए। क्योंकि इंसान सिर्फ आज देखता है, लेकिन भगवान सही समय देखकर देते हैं।

     

    आज भी हर सोमवार रवि, मीरा और उनकी नन्ही बेटी हाथों में पूजा की थाली लेकर महादेव के मंदिर जाते हैं।

     

    पहले वे दो लोग महादेव से एक संतान मांगने जाते थे…

     

    और आज वही तीनों हर बार सिर्फ धन्यवाद कहने जाते हैं।

     

    मंदिर की घंटियां बजती हैं, उनकी बेटी भोलेनाथ को देखकर मुस्कुरा देती है, और रवि-मीरा की आंखें फिर से नम हो जाती हैं।

     

    वे समझ चुके थे कि सच्ची श्रद्धा कभी व्यर्थ नहीं जाती। भगवान हर प्रार्थना सुनते हैं, बस उसका उत्तर अपने सही समय पर देते हैं।

     

    हर हर महादेव!

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बुढ़ापे की तन्हाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “बेटा, खाना खा लिया?”

     

    फ़ोन पर हर रोज़ यही पहला सवाल होता था। दूसरी तरफ़ से हमेशा वही छोटा-सा जवाब आता—

     

    “हाँ माँ… अभी मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।”

     

    और कॉल कट जाती।

     

    शांति देवी कुछ पल तक मोबाइल की बुझी हुई स्क्रीन देखती रहतीं। फिर मुस्कुराने की कोशिश करतीं और धीरे से कहतीं, “चलो… कम से कम आवाज़ तो सुन ली।”

     

    पास ही चारपाई पर बैठे उनके पति रामस्वरूप सब समझ जाते, लेकिन कुछ कहते नहीं।

     

    —

     

    कई साल पहले यही घर हँसी से गूंजा करता था।

     

    शादी के बाद जब शांति इस घर में आई थीं, तब घर में कुछ भी नहीं था। मिट्टी का छोटा-सा मकान, टपकती छत और दो वक्त की रोटी का भी भरोसा नहीं।

     

    रामस्वरूप सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में चले जाते और रात को थके हुए लौटते। शांति पूरे दिन घर संभालतीं, गाय का दूध निकालतीं, चूल्हा जलातीं और हर मुश्किल में अपने पति का साथ देतीं।

     

    धीरे-धीरे दिन बदले।

     

    भगवान ने उन्हें दो बेटे और एक बेटी का सुख दिया।

     

    उनकी दुनिया अब बच्चों में बस गई।

     

    खुद फटे कपड़े पहन लेते, लेकिन बच्चों के लिए नए कपड़े ज़रूर लाते।

     

    खुद भूखे सो जाते, लेकिन बच्चों की थाली कभी खाली नहीं रहने देते।

     

    बरसात की रातों में जब छत टपकती थी, तो दोनों पति-पत्नी पूरी रात जागकर बच्चों के बिस्तर इधर-उधर करते रहते, ताकि उनके ऊपर पानी की एक बूंद भी न गिरे।

     

    उन्हें लगता था…

     

    “हमारी ज़िंदगी चाहे जैसी रही हो, लेकिन हमारे बच्चों की ज़िंदगी हमसे बेहतर होगी।”

     

    बस इसी उम्मीद में दोनों ने पूरी जवानी खपा दी।

     

    —

     

    समय बीतता गया।

     

    बच्चे पढ़-लिखकर बड़े हो गए।

     

    बेटी की शादी बड़े प्यार से कर दी।

     

    दोनों बेटों को शहर में पढ़ाया। इसके लिए शांति ने अपने शादी के समय मिले सारे गहने बेच दिए।

     

    रामस्वरूप ने पुश्तैनी खेत का एक हिस्सा तक बेच दिया।

     

    जब लोगों ने पूछा, “बुढ़ापे का सहारा भी बेच दिया?”

     

    तो रामस्वरूप मुस्कुराकर बोले—

     

    “हमारा असली सहारा खेत नहीं… हमारे बच्चे हैं।”

     

    उन्हें क्या पता था कि यही बात एक दिन उनकी सबसे बड़ी भूल बन जाएगी।

     

    दोनों बेटों को अच्छी नौकरी मिल गई।

    एक दिल्ली चला गया।

     

    दूसरा मुंबई।

     

    शुरुआत में हर हफ्ते फ़ोन आता था।

    फिर महीने में।

    फिर त्योहारों पर।

     

    और धीरे-धीरे… वह भी बंद होने लगा।

    शांति हर सुबह दरवाज़े की ओर देखतीं।

    शायद आज कोई आ जाए…

     

    रामस्वरूप रोज़ शाम को घर के बाहर वाली टूटी कुर्सी पर बैठ जाते।

     

    हर बार सड़क पर आती गाड़ी देखकर उनकी आँखें चमक उठतीं।

    लेकिन गाड़ी किसी और के घर चली जाती।

     

    फिर वे चुपचाप अंदर लौट आते।

     

    एक दिन शांति बोलीं—”सुनिए… इस बार दिवाली पर बच्चे ज़रूर आएँगे ना?”

     

    रामस्वरूप ने मुस्कुराकर कहा—

    “हाँ… क्यों नहीं आएँगे? आखिर अपना घर है।”

     

    दोनों ने पूरे घर की सफाई की।

    बेटों की पसंद की मिठाइयाँ बनाईं।

     

    उनके पुराने कमरे सजाए।

     

    दिवाली आ गई…

    रात हो गई…

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    बस एक संदेश आया “इस बार छुट्टी नहीं मिली… अगली बार ज़रूर आएँगे।”

     

    शांति ने मोबाइल सीने से लगा लिया।

    आँखों से आँसू बह निकले।

     

    लेकिन फिर भी बोलीं—

    “कोई बात नहीं… काम भी तो ज़रूरी है।”

     

    रामस्वरूप ने पहली बार अपना चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया, ताकि पत्नी उनके आँसू न देख सके।

     

    अब दोनों की उम्र ढल चुकी थी।

     

    चलना भी मुश्किल हो गया था।

     

    रामस्वरूप की आँखों से कम दिखाई देता था।

     

    शांति के घुटने जवाब दे चुके थे।

     

    फिर भी दोनों एक-दूसरे का सहारा बने हुए थे।

     

    अगर शांति गिर जातीं, तो रामस्वरूप काँपते हाथों से उन्हें उठाते।

     

    अगर रामस्वरूप की तबीयत खराब होती, तो शांति पूरी रात उनके सिरहाने बैठी रहतीं।

    दोनों जानते थे…

    अब उनके पास एक-दूसरे के अलावा कोई नहीं बचा।

    एक रात बिजली चली गई।

     

    घर में घुप्प अँधेरा था।

    शांति ने धीमे से पूछा—

    “अगर मैं तुमसे पहले चली गई… तो तुम अकेले कैसे रहोगे?”

    रामस्वरूप की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने काँपते हाथों से पत्नी का हाथ पकड़ लिया और बोले—

    “मैं तो आज भी तुम्हारे बिना एक पल नहीं रह सकता… अकेले कैसे जिऊँगा?”

     

    दोनों देर तक चुप रहे।

     

    उस रात दोनों की आँखों से नींद नहीं… आँसू बहते रहे।

    कुछ महीनों बाद रामस्वरूप की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

    शांति ने बार-बार बेटों को फ़ोन किया।

     

    एक ने कहा “माँ, अभी ऑफिस में हूँ।”

    दूसरे ने कहा “दो दिन बाद आता हूँ।”

     

    लेकिन उन दो दिनों का इंतज़ार रामस्वरूप नहीं कर सके।

     

    उन्होंने शांति का हाथ कसकर पकड़ा…

     

    एक आख़िरी बार घर की ओर देखा…

     

    और हमेशा के लिए आँखें बंद कर लीं।

     

    शांति फूट-फूटकर रोती रहीं।

     

    जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बिताई, वही उन्हें बीच रास्ते में अकेला छोड़ गया।

    बेटे अगले दिन पहुँचे।

    पिता की चिता जल चुकी थी।

     

    उन्होंने माँ से कहा—

    “चलो माँ, हमारे साथ शहर चलो।”

     

    शांति ने पूरे घर को देखा।

    वही आँगन…

    वही नीम का पेड़…

    वही चारपाई…

     

    जहाँ उन्होंने पूरी ज़िंदगी अपने पति के साथ बिताई थी।

     

    उन्होंने धीमे से कहा—

    “जिस घर में तुम्हारे पिता की यादें साँस लेती हों… उसे छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?”

     

    बेटे दो दिन बाद वापस लौट गए।

     

    माँ फिर अकेली रह गई।

    अब हर सुबह शांति दो कप चाय बनातीं।

    एक खुद पीतीं…

     

    दूसरा कप रामस्वरूप की तस्वीर के सामने रख देतीं।

    हर शाम दरवाज़े की ओर देखतीं।

     

    शायद आज बच्चे आ जाएँ…

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुलता।

    एक दिन पड़ोस की औरत उन्हें बुलाने आई।

    बहुत आवाज़ दी…

    कोई जवाब नहीं मिला।

    जब अंदर गई तो देखा शांति अपने पति की तस्वीर को सीने से लगाए मुस्कुरा रही थीं।

    लेकिन इस बार उनकी साँसें रुक चुकी थीं।

    शायद…

    उन्हें आखिरकार अपने जीवनसाथी का साथ मिल गया था।

    उस दिन दोनों बेटे बहुत रोए।

    लेकिन अब पछताने से क्या होता?

    जिन माँ-बाप ने अपनी पूरी जवानी बच्चों के भविष्य पर लुटा दी…

    उनके बुढ़ापे में बच्चों के पास उनके लिए दो पल भी नहीं थे।

    याद रखिए…

    बचपन में माँ-बाप हमारी उँगली पकड़कर चलना सिखाते हैं।

    बुढ़ापे में उन्हें सिर्फ़ हमारी उँगली का सहारा चाहिए होता है।

    जिस दिन हम यह सहारा छीन लेते हैं, उसी दिन उनका घर नहीं… उनका दिल सूना हो जाता है।

    क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी गरीबी पैसे की नहीं होती…

    सबसे बड़ी गरीबी बुढ़ापे की तन्हाई होती है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं