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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

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जुलाई 2026
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  • बेवफ़ा

    बेवफ़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    “तुम जैसी बेवफा लड़की मैंने आज तक नहीं देखी!”

     

    रोहन की आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूंज रही थी। उसके हाथ में एक शादी का कार्ड था और सामने खड़ी थी नंदिनी, जिसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

     

    “आज के बाद कभी अपनी शक्ल मत दिखाना मुझे। तुमने सिर्फ मेरा दिल नहीं तोड़ा, मेरे भरोसे को भी मार दिया।”

     

    इतना कहकर रोहन वहां से चला गया।

     

    नंदिनी चाहकर भी उसे रोक नहीं पाई। उसके होंठ कांप रहे थे, लेकिन शब्द जैसे गले में ही अटक गए थे।

     

    उस दिन उसने सिर्फ एक बात धीरे से कही थी…

     

    “हकीकत क्या थी, ये कभी तुमने जाना ही नहीं… और मुझे दे दिया एक नया नाम—बेवफा।”

     

    लेकिन उस आवाज़ को सुनने वाला वहां कोई नहीं था।

     

     

    रोहन और नंदिनी एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। दोस्ती हुई, फिर दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों को खुद भी पता नहीं चला।

     

    चार साल तक दोनों ने हर सपना साथ देखा था।

     

    रोहन हमेशा कहता था, “अगर मेरी जिंदगी में कोई सबसे जरूरी है, तो वो सिर्फ तुम हो।”

     

    नंदिनी मुस्कुराकर जवाब देती, “और मेरी दुनिया भी तुमसे ही शुरू होकर तुम पर ही खत्म होती है।”

     

    दोनों ने शादी करने का फैसला भी कर लिया था।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा इंसान की सोच के हिसाब से नहीं चलती।

     

    एक दिन नंदिनी के पिता को अचानक हार्ट अटैक आ गया।

     

    घर में पहले से ही बहुत कर्ज था। इलाज के लिए पैसे नहीं थे।

     

    उसी समय एक अमीर परिवार ने रिश्ता भेजा।

     

    लड़के का नाम आदित्य था। उसने साफ कहा था, “अगर नंदिनी शादी के लिए हां कह दे, तो मैं उसके पिता का पूरा इलाज करवाऊंगा और उनका सारा कर्ज भी चुका दूंगा।”

     

    नंदिनी के सामने एक तरफ उसका प्यार था…

    और दूसरी तरफ उसके पिता की सांसें।

    उसने पूरी रात रो-रोकर बिताई।

     

    सुबह जब अस्पताल में डॉक्टर ने कहा, “अगर जल्दी ऑपरेशन नहीं हुआ तो मरीज को बचाना मुश्किल होगा।”

     

    तब उसने अपने दिल को मार दिया।

    उसने आदित्य से शादी के लिए हां कह दी।

    लेकिन रोहन को कुछ भी नहीं बताया।क्योंकि उसे पता था…

    अगर वह सच बताएगी, तो रोहन अपनी जान तक लगा देगा।

     

    वह कर्ज लेगा…

    घर बेच देगा…

    अपना भविष्य खत्म कर देगा और नंदिनी कभी नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से रोहन बर्बाद हो।

     

    इसलिए उसने खुद को ही गलत बना लिया।

     

    जब रोहन को नंदिनी की शादी की खबर मिली, तो उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई।

     

    उसने नंदिनी को फोन किया। लेकिन नंदिनी ने फोन नहीं उठाया।

    उसने मैसेज किया।

    “बस एक बार मिल लो। लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

     

    असल में नंदिनी हर मैसेज पढ़ती थी…और रोते-रोते फोन बंद कर देती थी।

     

    उसे डर था कि अगर उसने एक बार भी रोहन की आवाज़ सुन ली, तो वह अपने फैसले से पीछे हट जाएगी।

     

    शादी हो गई। रोहन टूट गया।

     

    उसने अपने दोस्तों से सिर्फ एक बात कही—

    “जिस लड़की के लिए मैं सब कुछ छोड़ सकता था… उसने मुझे पैसों के लिए छोड़ दिया।”

     

    धीरे-धीरे यही बात सबकी जुबान पर आ गई।

     

    हर कोई नंदिनी को एक ही नाम से बुलाने लगा…

     

    “बेवफा।”

    शादी के बाद नंदिनी की जिंदगी बिल्कुल वैसी नहीं थी जैसी लोगों ने सोची थी।

     

    आदित्य बुरा इंसान नहीं था।

    उसे शादी से पहले ही सब सच पता चल गया था।

     

    उसने एक दिन नंदिनी से कहा,

    “मैं जानता हूं कि तुम्हारे दिल में किसी और का नाम है। मैंने सिर्फ एक इंसान की जान बचाने के लिए तुमसे शादी की है। मैं कभी तुम पर किसी रिश्ते का दबाव नहीं डालूंगा।”

     

    ये सुनकर नंदिनी और भी ज्यादा रो पड़ी।

     

    वह हर रात अपने कमरे में बैठकर रोहन की पुरानी तस्वीरें देखती।

     

    लेकिन कभी उसे फोन नहीं करती।

     

    क्योंकि अब उसके पास कोई हक नहीं बचा था।

     

    उधर रोहन ने खुद को काम में डुबो दिया।

     

    उसने कभी शादी नहीं की।

    जब भी कोई उससे शादी की बात करता, वह सिर्फ मुस्कुरा देता।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द साफ दिखाई देता था।

     

    पांच साल बीत गए।

     

    एक दिन रोहन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    उन्हें उसी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां कभी नंदिनी के पिता का इलाज हुआ था।

     

    वहीं अस्पताल में रोहन की मुलाकात पुराने डॉक्टर से हुई।

     

    डॉक्टर ने उसे पहचान लिया।

     

    बातों-बातों में उन्होंने कहा,

     

    “तुम वही रोहन हो ना? नंदिनी वाला लड़का?”

    रोहन चुप रहा।

    डॉक्टर बोले,बहुत बड़ी लड़की थी वो। अपने पिता को बचाने के लिए उसने अपना प्यार कुर्बान कर दिया।

     

    रोहन ने चौंककर पूछा,”क्या मतलब?”

     

    फिर डॉक्टर ने उसे पूरी कहानी बता दी।कर्ज…

    ऑपरेशन…

    समझौता…और नंदिनी की खामोश कुर्बानी।

     

    रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसकी आंखों से आंसू अपने आप बहने लगे।

    उसे पहली बार एहसास हुआ…

     

    जिसे वह पांच साल से बेवफा कहता रहा…

     

    असल में वह सबसे ज्यादा वफादार थी।

    रोहन उसी शाम नंदिनी के घर पहुंच गया।

     

    दरवाजा आदित्य ने खोला।

     

    रोहन ने कांपती आवाज़ में पूछा,”क्या मैं नंदिनी से मिल सकता हूं?”

     

    आदित्य ने कुछ पल उसे देखा…

     

    फिर बिना कुछ कहे अंदर जाने का इशारा कर दिया।

     

    नंदिनी बरामदे में बैठी थी।

     

    वह पहले से बहुत कमजोर लग रही थी।

     

    रोहन को देखकर उसकी आंखें भर आईं।

     

    कुछ देर दोनों सिर्फ एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रोहन उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।

     

    “मुझे माफ कर दो…”

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    रोहन रो पड़ा।

     

    “मैंने तुम्हें समझने की कोशिश ही नहीं की। तुम्हारी आंखों के पीछे छिपे दर्द को पढ़ा ही नहीं। बस लोगों की बातों पर यकीन कर लिया और तुम्हें बेवफा कह दिया।”

     

    नंदिनी की आंखों से भी आंसू बह निकले।

     

    वह बोली,

     

    “मैं चाहती तो सच बता सकती थी… लेकिन फिर तुम्हारी जिंदगी बिखर जाती। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे प्यार की कीमत तुम अपनी पूरी जिंदगी देकर चुकाओ।”

    दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

    लेकिन अब वक्त उनके हाथ से निकल चुका था।

    कुछ महीनों बाद नंदिनी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई।

    लगातार तनाव और दुख ने उसके शरीर को कमजोर कर दिया था।

    अस्पताल के कमरे में उसकी आखिरी सांसें चल रही थीं।

    रोहन उसके पास बैठा था।

    नंदिनी ने कांपते हुए उसका हाथ पकड़ा और मुस्कुराकर बोली,

    “देखो… इस बार रोना मत। मैं जा रही हूं, लेकिन एक बात याद रखना… किसी भी रिश्ते का फैसला सिर्फ सुनी-सुनाई बातों से मत करना। कभी-कभी जो इंसान सबसे ज्यादा गलत दिखाई देता है, वही सबसे ज्यादा टूटकर प्यार करता है।”

     

    रोहन की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे।

    नंदिनी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

    “हकीकत क्या थी… ये तुमने आखिर जान ही लिया… बस अफसोस इतना है कि थोड़ा देर से।”

    इतना कहकर उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।

    नंदिनी के जाने के बाद रोहन अक्सर उसकी कब्र पर बैठा करता था।

    एक दिन उसने वहां एक छोटा-सा पत्थर लगवाया, जिस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी

    “जिसे दुनिया ने बेवफा कहा… वह अपने प्यार की सबसे सच्ची मिसाल थी।”

    उस दिन रोहन ने आसमान की ओर देखते हुए कहा,

    “काश… मैंने लोगों की बातें सुनने से पहले तुम्हारी खामोशी सुन ली होती। शायद आज मेरी जिंदगी इतनी खाली न होती।”

     

    हवा का एक हल्का झोंका आया, जैसे किसी ने उसके आंसू चुपचाप पोंछ दिए हों।

    और उस दिन रोहन को समझ आया कि हर अधूरी प्रेम कहानी में कोई बेवफा नहीं होता…

    कभी-कभी सिर्फ हालात ही इतने बेरहम होते हैं कि सच्चे प्यार को भी दुनिया बेवफाई का नाम दे देती है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • 30 साल पुराने प्रेम पत्र

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    30 साल पुराने प्रेम पत्र

    सुबह के पाँच बजे थे। पूरे गाँव में अभी सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन एक बूढ़ा आदमी अपनी पुरानी साइकिल पर चमड़े का घिसा हुआ डाक का बैग टाँगे धीरे-धीरे कच्चे रास्ते पर चला जा रहा था। सफेद बाल, झुकी हुई कमर और काँपते हुए हाथ… फिर भी उसकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी।

    उस बूढ़े डाकिए का नाम रामनाथ था।

    सरकारी नौकरी से उसे रिटायर हुए पूरे तीस साल हो चुके थे। गाँव में अब नया डाकघर बन चुका था और नए डाकिए भी आ गए थे। लेकिन रामनाथ आज भी हर सुबह अपने बैग में कुछ पुराने खत रखकर निकल पड़ता था।

    गाँव वाले उसे देखकर कहते, “बाबा की उम्र हो गई है… अब इनका दिमाग पहले जैसा नहीं रहा।”

    कोई हँसता, कोई तरस खाता।

    लेकिन रामनाथ किसी की बात का जवाब नहीं देता। वह बस मुस्कुराकर आगे बढ़ जाता।

    एक दिन शहर से आई युवा पत्रकार रिया की नज़र उस पर पड़ी। उसे यह बात बहुत अजीब लगी कि एक रिटायर डाकिया रोज़ किसे चिट्ठियाँ बाँटता है।

    अगले दिन वह चुपचाप रामनाथ के पीछे चल पड़ी।

    रामनाथ पूरे गाँव में कई घरों के सामने रुकता, दरवाज़े को देखता, जेब से एक पुराना खत निकालता, उसे हाथ में लेकर कुछ पल खड़ा रहता और फिर वापस बैग में रखकर आगे बढ़ जाता।

    रिया से रहा नहीं गया।

     

    उसने पूछा, “बाबा, आप ये खत देते क्यों नहीं?”

    रामनाथ ने धीमी मुस्कान के साथ कहा, “जिसके नाम हैं… वही लेने नहीं आया।”

    रिया और भी उलझ गई।

    “किसके नाम हैं?”

    रामनाथ ने बैग को सीने से लगा लिया और बोले, “ये प्रेम पत्र हैं… पूरे तीस साल पुराने।”

    रिया हैरान रह गई।

    रामनाथ उसे अपने छोटे-से घर ले गए।

    घर के एक कोने में लकड़ी का पुराना संदूक रखा था। उसे खोलते ही उसमें सैकड़ों पुराने लिफाफे दिखाई दिए। हर खत पर एक ही नाम लिखा था—

    ‘सावित्री के नाम।’

    भेजने वाले का नाम था—

    ‘मोहन।’

    रिया ने पूछा, “ये इतने सालों से क्यों पड़े हैं?”

    रामनाथ की आँखें भर आईं

    उन्होंने कहना शुरू किया—

    “आज से तीस साल पहले मोहन और सावित्री एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। लेकिन दोनों अलग-अलग जाति के थे। उस समय गाँव में ऐसी शादी की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।”

    “दोनों ने भागने का फैसला किया था। लेकिन भागने से एक दिन पहले मोहन शहर काम करने चला गया। उसने सावित्री को हर हफ्ते एक प्रेम पत्र भेजा।”

    “लेकिन…”

    रामनाथ की आवाज़ भर्रा गई।

    “वे पत्र कभी सावित्री तक पहुँचे ही नहीं।”

    रिया ने पूछा, “क्यों?”

    रामनाथ ने सिर झुका लिया।

    “क्योंकि गलती मेरी थी।”

    उन्होंने बताया कि उन्हीं दिनों उनके घर में उनकी पत्नी बहुत बीमार थी। अस्पताल, दवाइयों और भागदौड़ में वे कई चिट्ठियाँ डाकघर के एक पुराने बक्से में रखना भूल गए।

    जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

    सावित्री की शादी कहीं और कर दी गई थी।

     

    और मोहन…

    उसे लगा कि सावित्री ने उसके किसी भी खत का जवाब नहीं दिया, इसलिए उसने भी समझ लिया कि वह उसे भूल चुकी है।

    दोनों हमेशा के लिए अलग हो गए।

     

    रामनाथ की आँखों से आँसू बहने लगे।

    “अगर मैंने उस समय अपना काम ईमानदारी से किया होता… तो शायद दो ज़िंदगियाँ बर्बाद न होतीं।”

    रिया ने धीरे से पूछा, “फिर अब?”

     

    रामनाथ बोले, “अब मैं रोज़ निकलता हूँ… शायद किसी दिन वे दोनों मिल जाएँ और मैं अपने हाथों से ये खत उन्हें दे सकूँ।”

    रिया पूरी रात सो नहीं सकी।

    अगले दिन उसने इस कहानी की तलाश शुरू कर दी।

    कई दिनों की खोज के बाद उसे पता चला कि सावित्री अभी ज़िंदा थी। वह अपने बेटे के साथ दूसरे जिले के एक छोटे-से कस्बे में रहती थी।

    रिया तुरंत रामनाथ को वहाँ ले गई।दरवाज़ा खुला।

    सामने लगभग सत्तर साल की एक बूढ़ी महिला खड़ी थी।

    रामनाथ ने काँपते हाथों से पहला खत आगे ढ़ाया।

    “बेटी… ये तुम्हारे लिए तीस साल पहले आया था।”

    सावित्री ने लिफाफे को देखा।

    उसके हाथ काँपने लगे।

    उसने जैसे ही मोहन का नाम पढ़ा, उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

    वह वहीं चौखट पर बैठ गई।

    धीरे-धीरे उसने पहला खत खोला।

    उसमें लिखा था”सावित्री, मैं अगले महीने लौट आऊँगा। बस मेरा इंतज़ार करना। अगर तुम्हारा जवाब नहीं आया तो भी मैं यकीन करूँगा कि तुम मजबूर होगी, बेवफा नहीं…”

    सावित्री फूट-फूटकर रोने लगी।

    उसने कहा, “मैंने तो हर दिन डाकिए का इंतज़ार किया था… लेकिन कोई खत ही नहीं आया।”

    रामनाथ हाथ जोड़कर रो पड़े।

    “मुझे माफ़ कर दो बेटी।”सावित्री ने आँसू पोंछे और कहा,

    “गलती से बिछड़े लोग नफ़रत नहीं रखते बाबा। बस किस्मत से हार जाते हैं।”लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी।

    रिया ने मोहन की तलाश भी शुरू कर दी।

    करीब एक हफ्ते बाद पता चला कि मोहन भी ज़िंदा था। वह शहर में एक पुराने पुस्तकालय में काम करता था और उसने कभी शादी नहीं की।

    जब उसे सावित्री के बारे में बताया गया, तो उसकी आँखें नम हो गईं।

    कुछ दिनों बाद दोनों की मुलाकात तय हुई।

    गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे…

    जहाँ वे कभी मिला करते थे।

    मोहन धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।सावित्री पहले से बैठी थी।

    तीस साल बाद दोनों एक-दूसरे के सामने थे।

    कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

    फिर मोहन ने काँपती आवाज़ में पूछा,

    “अगर तुम्हें मेरे खत मिल जाते… तो क्या तुम मेरा इंतज़ार करती?”

    सावित्री मुस्कुराई।

    “मैंने तो बिना खत के भी कई साल तुम्हारा इंतज़ार किया था।”

    दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।

    रामनाथ थोड़ी दूर खड़े यह सब देख रहे थे।

    उन्होंने अपने बैग से बाकी सारे प्रेम पत्र निकाले और मोहन के हाथों में रख दिए।

    “आज मेरा तीस साल पुराना कर्ज उतर गया।”

    मोहन ने एक-एक करके सभी खत सावित्री को पढ़कर सुनाए।

     

    हर खत में प्यार था, भरोसा था और एक साथ ज़िंदगी बिताने का सपना था।

    दोनों जानते थे कि बीता हुआ समय वापस नहीं आ सकता।

    लेकिन उन्हें यह सुकून मिल गया कि उनमें से किसी ने भी कभी दूसरे से बेवफाई नहीं की थी।

    कुछ महीनों बाद रामनाथ बहुत बीमार पड़ गए।

    मोहन और सावित्री रोज़ उनसे मिलने आते।

    एक शाम रामनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “अब मुझे किसी और पते पर भी एक चिट्ठी पहुँचानी है… ऊपर वाले के नाम।”

    तीनों हँस पड़े।

    उसी रात रामनाथ हमेशा के लिए इस दुनिया से चले गए।

    उनकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ।

    उनकी पुरानी साइकिल, चमड़े का बैग और खाली डाक का थैला भी उनके साथ रखा गया।

    गाँव के लोगों ने पहली बार समझा कि डाकिया सिर्फ़ चिट्ठियाँ नहीं पहुँचाता…

    वह लोगों की उम्मीदें, रिश्ते और अधूरी मोहब्बतें भी अपने कंधों पर ढोता है।

    रामनाथ की याद में गाँव के डाकघर के बाहर एक छोटी-सी पट्टिका लगाई गई, जिस पर लिखा था

    कुछ चिट्ठियाँ देर से पहुँचीं, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चा प्यार समय से नहीं, भरोसे से ज़िंदा रहता है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • श्रापित आईना

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    श्रापित आईना

     

    शहर से दूर, घने जंगलों के बीच एक विशाल लेकिन उजड़ा हुआ महल खड़ा था। लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे। कहते थे कि उस हवेली में लगा एक पुराना आईना इंसान का चेहरा नहीं, बल्कि उसकी मौत दिखाता था।

     

    जो भी उस आईने में अपनी आखिरी झलक देख लेता, वह सात दिनों के भीतर रहस्यमयी तरीके से मर जाता।

     

    इसी वजह से कई सालों से उस हवेली के आसपास कोई नहीं जाता था।

     

    लेकिन अदिति इन बातों पर विश्वास नहीं करती थी। वह इतिहास की शोधकर्ता थी और पुरानी हवेलियों के रहस्यों पर काम करती थी। उसे भूत-प्रेत की कहानियाँ नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी सच्चाई खोजने का शौक था।

     

    एक दिन उसे काली हवेली के बारे में पता चला।

     

    लोगों ने उसे बहुत समझाया।

     

    “बेटी, वहाँ मत जाना। जिसने भी उस आईने को देखा है, वह कभी नहीं बचा।”

     

    अदिति मुस्कुराई।

     

    “अगर हर अफवाह सच होती, तो दुनिया में कोई ज़िंदा नहीं बचता।”

     

    अगली सुबह वह कैमरा, डायरी और टॉर्च लेकर हवेली पहुँच गई।

     

    हवेली का विशाल दरवाज़ा आधा टूटा हुआ था। अंदर हर तरफ धूल, मकड़ी के जाले और टूटी हुई मूर्तियाँ पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे सदियों से वहाँ कोई आया ही न हो।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर बढ़ती गई।

     

    अचानक उसकी नज़र एक बड़े से कमरे पर पड़ी।

     

    कमरे के बीचोंबीच सोने की नक्काशी वाला एक विशाल आईना रखा था।

     

    उस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।

     

    अदिति ने रूमाल से धूल साफ की।

     

    जैसे ही उसने आईने में देखा, उसका दिल धड़कना बंद होने जैसा हो गया।

     

    आईने में उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ उसने खुद को एक गहरी खाई के किनारे खड़ा देखा।

     

    अचानक पीछे से किसी ने उसे ज़ोर से धक्का दिया।

     

    आईने में दिख रही अदिति चीखती हुई खाई में गिर गई।

     

    और उसी पल आईना फिर सामान्य हो गया।

     

    अदिति के माथे पर पसीना आ गया।

     

    “यह… यह क्या था?”

     

    उसने खुद को समझाया कि शायद यह कोई भ्रम था।

     

    वह जल्दी से हवेली से बाहर निकल आई।

     

    लेकिन उसी रात उसे वही सपना आया।

     

    वही खाई…

     

    वही धक्का…

     

    वही चीख…

     

    अगले दिन उसने गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति से मुलाकात की।

     

    बुज़ुर्ग ने उसकी बात सुनकर गहरी साँस ली।

     

    “तुमने उस आईने में देख लिया?”

     

    अदिति ने सिर हिलाया।

     

    बुज़ुर्ग बोले, “अब तुम्हारे पास सिर्फ़ सात दिन हैं।”

     

    “लेकिन यह सब होता क्यों है?”

     

    बुज़ुर्ग ने बताया कि बहुत साल पहले उस हवेली में राजा वीरेंद्र रहता था। उसे अपनी सुंदरता और शक्ति पर बहुत घमंड था।

     

    एक दिन एक साधु महल में आए और पानी माँगा।

     

    राजा ने उनका अपमान कर दिया।

     

    साधु ने क्रोधित होकर कहा,

     

    “जिस चेहरे पर तुझे इतना घमंड है, अब यही चेहरा हर उस इंसान की मौत का कारण बनेगा जो इस आईने में झाँकेगा।”

     

    उसी दिन से वह आईना श्रापित हो गया।

     

    अदिति अब भी पूरी तरह विश्वास नहीं कर रही थी।

     

    उसने तय किया कि वह इस रहस्य का वैज्ञानिक कारण ढूँढेगी।

     

    उसने हवेली के पुराने दस्तावेज़ खोजने शुरू किए।

     

    तीसरे दिन उसे तहखाने में एक गुप्त कमरा मिला।

     

    वहाँ सैकड़ों पुरानी डायरियाँ रखी थीं।

     

    एक डायरी राजा की बेटी राजकुमारी वैदेही की थी।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “यह आईना मौत नहीं दिखाता… यह उस व्यक्ति को दिखाता है जो तुम्हारी मौत का कारण बनेगा। अगर उसे समय रहते पहचान लिया जाए, तो श्राप टूट सकता है।”

     

    अदिति चौंक गई।

     

    यानी उसकी मौत तय नहीं थी।

     

    लेकिन उसे धक्का देने वाला कौन था?

     

    उसने आईने में दिखे चेहरे को याद करने की कोशिश की।

     

    चेहरा साफ नहीं दिखा था।

     

    सिर्फ़ हाथ दिखाई दिया था।

     

    उस हाथ में एक चाँदी की अंगूठी थी, जिस पर साँप बना हुआ था।

     

    अचानक अदिति को याद आया।

     

    ऐसी अंगूठी तो उसके साथ काम करने वाले उसके सहयोगी करण के हाथ में थी।

     

    लेकिन करण तो उसका सबसे अच्छा दोस्त था।

     

    क्या वह सचमुच उसे मार सकता था?

     

    अदिति को विश्वास नहीं हुआ।

     

    उसने करण से इस बारे में कुछ नहीं कहा।

     

    छठे दिन करण अचानक उसके घर आया।

     

    “तुम फिर उस हवेली में चलोगी? मुझे भी देखना है।”

     

    अदिति ने हामी भर दी।

     

    दोनों शाम को हवेली पहुँचे।

     

    करण बार-बार उसी आईने के सामने जाने की ज़िद कर रहा था।

     

    अदिति अब सतर्क थी।

     

    जैसे ही वह खाई वाले कमरे के पास पहुँची, अचानक करण ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    उसकी आँखों में अजीब लालच था।

     

    “मुझे माफ़ कर देना अदिति।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    करण बोला,

     

    “मुझे हवेली का खज़ाना चाहिए। मैंने पुरानी किताबों में पढ़ा है कि यह खज़ाना तभी मिलेगा जब कोई उस आईने का श्राप अपने साथ ले जाएगा।”

     

    यह सुनकर अदिति के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    “तो तुम मुझे मारना चाहते थे?”

     

    करण हँसने लगा।

     

    “हाँ… क्योंकि आईने ने मुझे भी यही रास्ता बताया था।”

     

    इतना कहकर उसने अदिति को धक्का देने की कोशिश की।

     

    लेकिन अदिति पहले से तैयार थी।

     

    वह एक कदम पीछे हट गई।

     

    करण का संतुलन बिगड़ गया।

     

    वह खुद पुराने लकड़ी के फर्श पर गिर पड़ा।

     

    फर्श टूट गया और वह सीधे नीचे बने गहरे गड्ढे में जा गिरा।

     

    उसकी चीख पूरी हवेली में गूँज उठी।

     

    कुछ ही सेकंड में सब शांत हो गया।

     

    अदिति काँपते हुए नीचे पहुँची।

     

    लेकिन करण की साँसें थम चुकी थीं।

     

    उसी समय हवेली ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगी।

     

    वह भागकर फिर उसी आईने वाले कमरे में पहुँची।

     

    आईने में अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    पहली बार उसमें मौत की कोई तस्वीर नहीं थी।

     

    तभी आईने के अंदर से एक हल्की रोशनी निकली।

     

    उस रोशनी में राजकुमारी वैदेही की आकृति दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुराकर बोली,

     

    “श्राप खत्म हो चुका है। यह आईना कभी मौत नहीं दिखाता था। यह सिर्फ़ इंसान के सबसे बड़े दुश्मन की पहचान कराता था। लेकिन लालच में अंधे लोगों ने इसे मौत का आईना समझ लिया।”

     

    इतना कहते ही आईने में दरार पड़ने लगी।

     

    कुछ ही पलों में वह हज़ारों टुकड़ों में बिखर गया।

     

    सदियों पुराना श्राप हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

     

    अदिति हवेली से बाहर निकल आई।

     

    उसने पूरी घटना किसी को नहीं बताई।

     

    लोगों को सिर्फ़ इतना पता चला कि काली हवेली अब श्रापमुक्त हो चुकी है।

     

    कुछ महीनों बाद उस हवेली को एक ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर दिया गया।

    दूर-दूर से लोग उसे देखने आने लगे।

     

    लेकिन अदिति ने कभी किसी को उस टूटे हुए आईने के बारे में नहीं बताया।

     

    क्योंकि वह जान चुकी थी कि दुनिया में सबसे खतरनाक श्राप किसी आईने में नहीं होता…

     

    वह इंसान के लालच और विश्वासघात में छिपा होता है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • घटती उम्र वाली लड़की

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शीर्षक: हर जन्मदिन पर उम्र घटने वाली लड़की

     

    बारिश की हल्की बूंदें आसमान से गिर रही थीं। शहर के एक छोटे से घर में रहने वाली नायरा आज अपना अठारहवाँ जन्मदिन मना रही थी। घर में केक, मोमबत्तियाँ और खुशियों का माहौल था, लेकिन उसकी माँ मीरा के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। उनकी आँखों में एक ऐसा डर था, जिसे वे हर साल छिपाने की कोशिश करती थीं।

     

    केक काटने के बाद जैसे ही घड़ी ने रात के बारह बजाए, अचानक नायरा को तेज़ चक्कर आने लगे। वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गई। कुछ देर बाद जब उसे होश आया तो उसे अजीब महसूस हुआ। अगले दिन जब वह कॉलेज पहुँची, तो उसके दोस्तों ने हैरानी से कहा, नायरा, तू आज पहले से छोटी लग रही है।

     

    शुरुआत में सबने इसे मज़ाक समझा, लेकिन कुछ ही दिनों में सच सामने आ गया। उसका चेहरा सचमुच सोलह साल की लड़की जैसा दिखने लगा था। डॉक्टरों ने हर तरह की जाँच की, लेकिन सब रिपोर्ट बिल्कुल सामान्य थीं।

    एक साल बीता।

     

    उन्नीसवें जन्मदिन की रात वही घटना दोबारा हुई। इस बार सुबह उठकर उसने आईने में देखा तो वह लगभग चौदह साल की बच्ची जैसी दिखाई दे रही थी।

    अब माँ मीरा का डर और बढ़ गया। उन्होंने नायरा को स्कूल या कॉलेज भेजना बंद कर दिया। लोगों से मिलना-जुलना भी कम कर दिया। पड़ोसी तरह-तरह की बातें बनाने लगे।

     

    इस लड़की पर कोई साया है।ज़रूर किसी ने टोना किया है।

     

    लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था।

    एक दिन नायरा ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, मुझसे क्या छिपा रही हो? हर जन्मदिन पर मेरे साथ ऐसा क्यों होता है?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी निकाली।

    “अब समय आ गया है कि तुझे सब सच बता दूँ।”

     

    डायरी नायरा के जन्म से भी पहले की थी। उसमें लिखा था कि मीरा और उनके पति कई साल तक संतान के लिए तरसते रहे। एक दिन वे पहाड़ों में रहने वाली एक रहस्यमयी साध्वी के पास पहुँचे।

     

    साध्वी ने कहा था, “तुम्हें बेटी मिलेगी, लेकिन उसकी ज़िंदगी साधारण नहीं होगी। अगर उसके जन्म का रहस्य कभी किसी लालची इंसान तक पहुँचा, तो उसकी उम्र हर जन्मदिन पर एक साल बढ़ने के बजाय दो साल घटती जाएगी।”

    मीरा ने उस समय इन बातों पर ध्यान नहीं दिया था।

     

    लेकिन नायरा के दसवें जन्मदिन से ही यह अजीब बदलाव शुरू हो गया।

    नायरा ने काँपती आवाज़ में पूछा, “क्या इसका कोई इलाज है?”

     

    मीरा बोलीं, “डायरी में लिखा है कि पहाड़ों के उसी मंदिर में जवाब मिलेगा।”

     

    अगले ही दिन दोनों माँ-बेटी उस पुराने पहाड़ी मंदिर के लिए निकल पड़ीं।

    घने जंगल, ऊँचे पहाड़ और सुनसान रास्ते पार करने के बाद वे मंदिर पहुँचीं। वहाँ वही साध्वी अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं।

     

    उन्होंने नायरा को देखते ही कहा, “मुझे पता था, तुम एक दिन ज़रूर आओगी।”

    नायरा ने उनसे सारी बात पूछी।

     

    साध्वी ने कहा, “तुम्हारी उम्र किसी बीमारी से नहीं घट रही। तुम्हारी जीवन-शक्ति कोई और चुरा रहा है।”

    “कौन?”

    “तुम्हारे पिता का अपना बड़ा भाई।”

    यह सुनकर मीरा दंग रह गईं।

     

    साध्वी ने बताया कि नायरा के चाचा ने वर्षों पहले तांत्रिक विद्या सीख ली थी। उसे पता चल गया था कि नायरा के जन्म के साथ एक दुर्लभ वरदान जुड़ा है। वह अपनी बढ़ती उम्र रोकने के लिए हर साल नायरा की एक-एक साल की जीवन-शक्ति चुरा रहा था।

    नायरा को विश्वास नहीं हुआ।

     

    “लेकिन चाचा तो हमेशा हमारे साथ अच्छे रहे हैं।”

    साध्वी बोलीं, “बुराई हमेशा मुस्कुराकर सामने आती है।”

     

    उन्होंने नायरा को एक ताबीज़ दिया और कहा, “अगले जन्मदिन की रात सच अपने आप सामने आ जाएगा।”

    एक साल बाद…

     

    नायरा का बीसवाँ जन्मदिन था, लेकिन उसका शरीर अब बारह साल की बच्ची जैसा दिखता था।

    रात के बारह बजते ही पूरे घर की बिजली चली गई। हवा तेज़ चलने लगी। तभी आँगन में काले कपड़ों में एक आदमी दिखाई दिया।

     

    वह कोई और नहीं, उसका चाचा था।

    वह हाथ में एक पुरानी माला लिए कुछ मंत्र पढ़ रहा था। जैसे ही उसने माला उठाई, नायरा के शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

    उसी समय नायरा ने साध्वी का दिया हुआ ताबीज़ कसकर पकड़ लिया।

     

    ताबीज़ तेज़ चमकने लगा।

    अचानक रोशनी वापस पलटी और सीधे उसके चाचा के ऊपर गिर गई।

     

    वह दर्द से चीख उठा।

    उसका असली चेहरा सामने आने लगा। कुछ ही सेकंड में वह बूढ़ा, कमजोर और झुर्रियों से भरा इंसान बन गया।वह ज़मीन पर गिर पड़ा।

     

    रोते हुए बोला, “मैं मरना नहीं चाहता था… इसलिए हर साल इसकी उम्र चुराता रहा।”

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

     

    उन्होंने कहा, “तुमने अपने ही भाई की बेटी के साथ ऐसा किया?”

    चाचा ने सिर झुका लिया।

    उसी समय तेज़ हवा चली और मंदिर की साध्वी वहाँ प्रकट हुईं।

     

    उन्होंने कहा, “जिसने किसी और की ज़िंदगी चुराई, उसकी अपनी उम्र भी अब उसी पाप का हिसाब देगी।”

     

    अगले ही पल चाचा राख बनकर हवा में बिखर गया।

    घर में फिर से शांति लौट आई।

    धीरे-धीरे नायरा के शरीर में बदलाव आने लगे। पहली बार उसकी उम्र बढ़ने लगी। कुछ महीनों बाद वह फिर अपनी असली उम्र जैसी दिखने लगी।

    माँ ने राहत की साँस ली।

     

    नायरा ने अपनी पढ़ाई पूरी की और डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया। उसने ठान लिया कि वह लोगों के शरीर ही नहीं, उनके टूटे हुए हौसलों का भी इलाज करेगी।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

    एक दिन अस्पताल में काम करते हुए उसके पास एक सात साल की बच्ची लाई गई। उसकी माँ रोते हुए बोली, “डॉक्टर साहिबा… मेरी बेटी का हर जन्मदिन आने पर उसकी उम्र बढ़ने की बजाय कम होने लगती है…”

    नायरा के हाथ से फ़ाइल गिर गई।

    उसे अचानक वही पुराना ताबीज़ याद आया।

    उसने उसे वर्षों से संभालकर रखा था।

     

    उसकी नज़र खिड़की के बाहर गई। दूर पहाड़ों की दिशा में उसे ऐसा लगा जैसे वही बूढ़ी साध्वी मुस्कुरा रही हों।

     

    नायरा समझ गई कि उसका संघर्ष सिर्फ़ उसकी अपनी कहानी नहीं था। शायद अब उसकी ज़िम्मेदारी थी कि वह उस रहस्य का हमेशा के लिए अंत करे, ताकि फिर कभी किसी मासूम की ज़िंदगी उसकी उम्र से न छीनी जाए।

     

    उसने बच्ची का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा,

    “डरो मत… इस बार तुम्हें अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा।”

     

    यहीं से एक नई कहानी की शुरुआत हुई।

     

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    Auther preeti Sharma

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  • जुड़वां बहने

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     जुड़वां बहनें

     

    बरसों पहले एक छोटे से शहर में एक ही दिन, एक ही समय पर जुड़वां बेटियों का जन्म हुआ। पूरे घर में खुशियाँ थीं। पिता ने दोनों का नाम रखा—नेहा और नैना।

     

    दोनों का चेहरा बिल्कुल एक जैसा था, लेकिन किस्मत बिल्कुल अलग।

     

    माँ सविता जाने क्यों बचपन से ही नेहा पर जान छिड़कती थी। वह उसे गोद में खिलाती, नए कपड़े पहनाती, उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर मुस्कुराती। लेकिन नैना को हमेशा अपने से दूर रखती। अगर नैना गोद में आने की कोशिश करती तो वह कह देती, “जा, अपनी दादी के पास जा।”

     

    नैना तब बहुत छोटी थी। उसे समझ नहीं आता था कि माँ उसे प्यार क्यों नहीं करती।

     

    समय बीतता गया।

     

    दोनों बहनें स्कूल जाने लगीं। हर सुबह सविता नेहा के बाल बड़े प्यार से बनाती, उसके टिफिन में उसकी पसंद का खाना रखती। वहीं नैना को खुद ही अपने बाल बनाने पड़ते। कई बार उसका टिफिन भी खाली रह जाता।

     

    एक दिन स्कूल में टीचर ने पूछा, “तुम दोनों जुड़वां हो?”

     

    नेहा मुस्कुराकर बोली, “जी मैडम।”

     

    टीचर ने नैना से कहा, “तुम इतनी उदास क्यों रहती हो?”

     

    नैना बस हल्का-सा मुस्कुरा दी। वह किसी से अपने दिल की बात नहीं कह पाती थी।

     

    घर लौटते ही सविता ने नेहा को गले लगा लिया।

     

    “आ गई मेरी राजकुमारी?”

     

    फिर उसने नैना की तरफ देखा और बोली, “इतनी देर क्यों लगा दी? कोई काम समय पर नहीं होता तुमसे।”

     

    नैना चुपचाप अपना बैग रखकर कमरे में चली गई।

     

    उस रात वह तकिए में मुँह छिपाकर बहुत रोई।

     

    धीरे-धीरे दोनों बड़ी होने लगीं।

     

    नेहा को जो चाहिए होता, माँ तुरंत दिला देती। नया मोबाइल, नए कपड़े, महँगे जूते…

     

    लेकिन जब नैना कुछ माँगती तो जवाब मिलता, “इतने पैसे नहीं हैं।”

     

    एक दिन पिता ने यह सब देखा।

     

    उन्होंने सविता से कहा, “दोनों हमारी बेटियाँ हैं। इतना फर्क क्यों करती हो?”

     

    सविता गुस्से में बोली, “मुझे मत सिखाइए कि बच्चों को कैसे पालते हैं।”

     

    पिता चुप हो गए, लेकिन उनका दिल टूट गया।

     

    नैना पढ़ाई में बहुत तेज थी। उसने हर परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया।

     

    जब रिजल्ट आया तो पूरे स्कूल ने उसकी तारीफ की।

     

    प्रिंसिपल ने सविता को बुलाया और कहा, “आपको अपनी बेटी पर गर्व होना चाहिए।”

     

    सविता ने बस इतना कहा, “ठीक है।”

     

    घर लौटकर उसने नैना से सिर्फ एक बात कही, “इससे कोई बड़ा काम नहीं हो गया।”

     

    वहीं अगर नेहा छोटी-सी प्रतियोगिता भी जीत जाती तो पूरा घर मिठाई से भर जाता।

     

    नैना हर बार यही सोचती…

     

    “क्या मैं सच में इतनी बुरी हूँ?”

     

    समय के साथ नेहा भी समझने लगी कि माँ दोनों के साथ बराबरी नहीं करती।

     

    एक दिन उसने माँ से पूछा, “आप नैना दीदी को प्यार क्यों नहीं करती?”

     

    सविता ने बात टाल दी।

     

    लेकिन नेहा के मन में सवाल रह गया।

     

    कॉलेज का समय आया।

     

    नैना ने छात्रवृत्ति हासिल कर ली।

     

    उसने अपनी मेहनत से पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली।

     

    पहली तनख्वाह मिलने पर वह सबसे पहले घर आई।

     

    उसने माँ के लिए सुंदर-सी साड़ी खरीदी।

     

    मुस्कुराकर बोली, “माँ… ये आपके लिए।”

     

    सविता ने बिना देखे कहा, “रख दो।”

     

    उसके चेहरे पर खुशी की जगह कोई भाव ही नहीं था।

     

    नैना मुस्कुराने की कोशिश करती रही, लेकिन उसकी आँखें नम हो गईं।

     

    कुछ महीनों बाद नेहा की नौकरी नहीं लग पा रही थी।

     

    वह बहुत परेशान रहने लगी।

     

    तब नैना ने अपने ऑफिस में उसकी सिफारिश की।

     

    कुछ समय बाद नेहा को भी नौकरी मिल गई।

     

    उसने खुशी से नैना को गले लगा लिया।

     

    “दीदी… अगर तुम नहीं होती तो मैं कभी सफल नहीं हो पाती।”

     

    नैना मुस्कुरा दी।

     

    “हम बहनें हैं… एक-दूसरे का साथ देना ही हमारा रिश्ता है।”

     

    नेहा की आँखें भर आईं।

     

    उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिसे माँ ने हमेशा कम समझा, वही सबसे बड़ी इंसान निकली।

     

    एक दिन अचानक सविता की तबीयत बहुत खराब हो गई।

     

    उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।

     

    डॉक्टर ने कहा, “कुछ दिन इन्हें पूरी देखभाल की ज़रूरत होगी।”

     

    नेहा नौकरी के कारण ज्यादा समय नहीं दे पाती थी।

     

    लेकिन नैना ने छुट्टी ले ली।

     

    वह दिन-रात अस्पताल में माँ के पास बैठी रहती।

     

    समय पर दवाइयाँ देना, खाना खिलाना, डॉक्टर से बात करना…

     

    वह सब कुछ अकेले संभाल रही थी।

     

    एक रात सविता की आँख खुली।

     

    उन्होंने देखा कि नैना कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गई थी। उसके हाथ में अभी भी माँ की दवा थी।

     

    सविता की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उन्होंने पहली बार महसूस किया कि जिसे उन्होंने हमेशा ठुकराया, वही सबसे ज्यादा उनका साथ निभा रही है।

     

    अस्पताल से घर लौटने के बाद भी नैना ने उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी।

     

    एक शाम सविता ने नैना को अपने पास बुलाया।

    काँपती आवाज़ में बोलीं,

    “बेटा… क्या तुम मुझे माफ़ कर दोगी?”

     

    नैना चौंक गई।

    “माफ़? किस बात के लिए, माँ?”

    सविता रो पड़ीं।

     

    “मैंने तुम्हें कभी बेटी का प्यार नहीं दिया। हर बार तुम्हें गलत ठहराया। तुम्हारी हर खुशी को नजरअंदाज किया। मुझे नहीं पता मैंने ऐसा क्यों किया… लेकिन मैंने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया।”

    नैना की आँखें भी भर आईं।

     

    वह धीरे से माँ के पास बैठ गई।

    “माँ… मुझे हमेशा आपके प्यार की कमी महसूस हुई। हर रात यही सोचकर रोती थी कि शायद मुझसे कोई गलती हो गई है। लेकिन आज आपने मुझे अपनी बेटी कहकर बुलाया… मेरे लिए यही सबसे बड़ा तोहफा है।”

     

    सविता ने उसे कसकर गले लगा लिया।

     

    सालों का जमा हुआ दर्द आँसुओं के साथ बह गया।

    नेहा भी पास आ गई।

     

    उसने दोनों को गले लगा लिया।तीनों देर तक रोती रहीं।

     

    उस दिन पहली बार उस घर में किसी के साथ भेदभाव नहीं था।

    कुछ दिनों बाद परिवार एक साथ बैठा था।

     

    सविता ने दोनों बेटियों का हाथ अपने हाथों में लिया और बोलीं,

    “आज से मेरे लिए तुम दोनों बराबर हो। मैंने बहुत देर कर दी, लेकिन अब कभी किसी के साथ फर्क नहीं करूँगी।”

    नैना मुस्कुराई।

     

    “माँ, देर से मिला प्यार भी बहुत कीमती होता है।”

    घर में फिर से हँसी लौट आई।

     

    हम सब जानते हैं कि माँ का प्यार सबसे बड़ा होता है, लेकिन अगर वही प्यार किसी एक बच्चे से छिन जाए तो उसका दर्द पूरी जिंदगी साथ रहता है। फिर भी सच्चा दिल कभी नफरत नहीं सीखता। नैना ने अपने व्यवहार से साबित कर दिया कि प्रेम और क्षमा, दोनों मिलकर सबसे गहरे रिश्तों के घाव भी भर सकते हैं।

     

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  • श्रापित राजकुमारी

    श्रापित राजकुमारी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    हजारों सालों से कैद एक नींद में सोई शापित राजकुमारी

     

    बहुत समय पहले जहाँ आज चारों तरफ घना जंगल फैला हुआ है, वहाँ एक विशाल और समृद्ध साम्राज्य हुआ करता था। दूर-दूर तक उसकी समृद्धि के चर्चे थे। चौड़ी पत्थर की सड़कें, ऊँचे किले, सोने से सजे महल और खुशहाल प्रजा उस साम्राज्य की पहचान थे। लेकिन एक भयानक रात के बाद सब कुछ बदल गया। पूरा साम्राज्य समय के साथ उजड़ गया। धीरे-धीरे महल खंडहर बन गए, सड़कें पेड़ों और बेलों के नीचे दब गईं और कुछ ही सदियों में वह महान साम्राज्य एक रहस्यमयी जंगल में बदल गया।

     

    उस उजड़े साम्राज्य के बीचों-बीच आज भी एक विशाल महल खड़ा था। लोग कहते थे कि उस महल में हजारों सालों से एक शापित राजकुमारी गहरी नींद में सो रही है। न जाने कितने राजा, योद्धा और वीर उसे जगाने पहुँचे, लेकिन कोई भी कभी वापस नहीं लौटा। इसलिए उस महल का नाम सुनते ही लोगों के चेहरे का रंग उड़ जाता था।

     

    गाँव के बुज़ुर्ग अपने बच्चों से कहते थे, “उस महल के पास कभी मत जाना। वहाँ मौत नहीं… हजारों साल पुराना श्राप रहता है।”

     

    लेकिन सच इससे भी ज्यादा दर्दनाक था।

     

    उस महल में सो रही राजकुमारी किसी श्राप की नहीं, बल्कि अधूरी मोहब्बत की कैदी थी।

     

    हजारों साल पहले उस साम्राज्य पर राजा वीरेंद्र का शासन था। उनकी इकलौती बेटी थी—राजकुमारी वैदेही। वह जितनी सुंदर थी, उतनी ही दयालु भी थी। प्रजा उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करती थी। महल की शानो-शौकत से ज्यादा उसे लोगों की खुशियाँ प्यारी थीं।

     

    महल के सेनापति का बेटा आदित्य बचपन से ही वैदेही का सबसे अच्छा मित्र था। दोनों साथ खेलते, साथ पढ़ते और धीरे-धीरे उनका साथ प्रेम में बदल गया। दोनों ने एक-दूसरे से जीवनभर साथ निभाने का वादा किया था।

     

    एक शाम महल के बगीचे में आदित्य ने वैदेही का हाथ थामते हुए कहा,

     

    “वैदेही, अगर पूरी दुनिया भी हमारे खिलाफ हो जाए, तब भी मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूँगा।”

     

    वैदेही मुस्कुराई और बोली,

     

    “और मैं जन्म-जन्म तक सिर्फ तुम्हारी रहूँगी।”

     

    लेकिन उनकी खुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकी।

     

    राजा वीरेंद्र को जब दोनों के प्रेम का पता चला तो वे क्रोधित हो उठे।

     

    “एक राजकुमारी किसी साधारण युवक से विवाह नहीं कर सकती।”

     

    उन्होंने उसी दिन आदित्य को कारागार में डालने का आदेश दे दिया।

     

    वैदेही रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, लेकिन राजा का निर्णय नहीं बदला।

     

    इसी बीच राज्य में रहने वाली एक शक्तिशाली तांत्रिक मायरा महल पहुँची। वर्षों पहले राजा ने उसके परिवार को राज्य से निकाल दिया था और तभी से वह बदले की आग में जल रही थी।

     

    उसने राजा से कहा,

     

    “अगर राजकुमारी का विवाह उस युवक से हुआ तो पूरा साम्राज्य खत्म हो जाएगा।”

     

    राजा उसकी बातों में आ गए।

     

    लेकिन मायरा का असली इरादा पूरे राजवंश का अंत करना था।

     

    आधी रात होते ही उसने महल के बीचों-बीच एक भयानक तांत्रिक अनुष्ठान शुरू किया। काले बादलों ने आसमान को ढक लिया। बिजली की तेज़ गड़गड़ाहट से पूरा महल काँपने लगा। अचानक मायरा की डरावनी हँसी पूरे महल में गूँज उठी।

     

    “आज से राजकुमारी वैदेही हजारों सालों तक गहरी नींद में सोएगी। जब तक उसका सच्चा प्रेम अपने वचन को निभाकर उसके पास नहीं आएगा, तब तक यह कभी नहीं जागेगी।”

     

    इतना कहते ही काली रोशनी ने पूरे महल को घेर लिया।

     

    वैदेही बेहोश होकर गिर पड़ी।

     

    एक ही पल में पूरा महल श्राप की कैद में चला गया।

     

    धीरे-धीरे पूरा साम्राज्य वीरान हो गया। समय बीतता गया। राजा, सैनिक, महल के सेवक… सब इतिहास बन गए। महल के चारों ओर जंगल उग आया और सदियों बाद किसी को यह भी याद नहीं रहा कि वहाँ कभी एक महान साम्राज्य हुआ करता था।

     

    उधर कारागार में कैद आदित्य को जब वैदेही के श्राप की खबर मिली तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    मरने से पहले उसने आसमान की ओर देखकर कहा,

     

    “वैदेही… अगर इस जन्म में तुम्हें नहीं बचा पाया, तो अगले हर जन्म में तुम्हें ढूँढ़ने ज़रूर आऊँगा।”

     

    हजारों साल बीत गए।

     

    दुनिया बदल गई।

     

    लेकिन महल के भीतर राजकुमारी वैदेही आज भी वैसी ही सो रही थी।

     

    रात के समय कभी-कभी महल से एक धीमी आवाज सुनाई देती थी—

     

    “आदित्य… क्या तुम अपना वादा भूल गए…?”

     

    हजारों साल बाद एक छोटे से गाँव में आरव नाम का युवक रहता था। बचपन से उसे हर रात एक ही सपना आता था। वह एक पुराने महल को देखता और उसमें सफेद वस्त्र पहने एक राजकुमारी उसे पुकारती—

     

    “मुझे इस नींद से मुक्त कर दो…”

     

    समय के साथ वह सपना और भी सच्चा लगने लगा।

     

    एक दिन गाँव में आए एक वृद्ध साधु ने आरव को देखते ही कहा,

     

    “जिस आत्मा का हजारों सालों से इंतज़ार था… वह आज मेरे सामने खड़ी है।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    साधु उसे उस उजड़े साम्राज्य तक ले गया और सारी कहानी सुना दी।

     

    “अगर तुम्हारा प्रेम सच्चा है, तो श्राप टूट जाएगा।”

     

    अगली सुबह आरव अकेला उस रहस्यमयी महल की ओर निकल पड़ा।

     

    जंगल का हर रास्ता उसे रोकना चाहता था। कभी जंगली जानवर सामने आ जाते, कभी अजीब परछाइयाँ उसका पीछा करतीं। लेकिन उसके कदम नहीं रुके।

     

    घंटों की यात्रा के बाद वह आखिरकार उस विशाल महल के सामने खड़ा था।

     

    जैसे ही उसने महल के मुख्य द्वार को छुआ, वह अपने आप खुल गया।

     

    अंदर चारों तरफ सन्नाटा था।

     

    महल के बीचों-बीच एक सुनहरे पलंग पर राजकुमारी वैदेही शांत होकर सो रही थी।

     

    उसे देखते ही आरव की आँखों से अपने आप आँसू बह निकले।

     

    ऐसा लगा जैसे उसका दिल इस चेहरे को सदियों से पहचानता हो।

     

    अचानक मायरा की गूँजती हुई आवाज पूरे महल में फैल गई।

     

    “अगर इसे जगाना चाहते हो… तो पहले मेरे श्राप से लड़ना होगा।”

     

    उसी पल महल काँपने लगा।

     

    विशाल राक्षस और काली परछाइयाँ आरव पर टूट पड़ीं।

     

    आरव ने पूरी बहादुरी से उनका सामना किया।

     

    वह बुरी तरह घायल हो गया, लेकिन पीछे नहीं हटा।

     

    लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार उसने आखिरी राक्षस को भी हरा दिया।

     

    थका हुआ आरव लड़खड़ाते हुए वैदेही के पास पहुँचा।

     

    उसने धीरे से उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

     

    उसकी आँखों से एक आँसू गिरा और उसने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता मैं कौन हूँ… लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि तुम्हारा दर्द मेरा अपना है। अगर मेरा प्रेम सच्चा है, तो जाग जाओ।”

     

    जैसे ही आँसू वैदेही के हाथ पर गिरा, पूरा महल सुनहरी रोशनी से जगमगा उठा।

     

    श्राप की जंजीरें टूटने लगीं।

     

    सदियों से बंद खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    सूखे पेड़ों पर हरियाली लौट आई।

     

    धीरे-धीरे राजकुमारी वैदेही ने अपनी आँखें खोलीं।

     

    उसने सामने खड़े आरव को देखा।

     

    कुछ पल तक वह उसे देखती रही, फिर उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।

     

    वह काँपती आवाज़ में बोली,

     

    “तुम लौट आए… आदित्य। मुझे पता था… तुम अपना वादा ज़रूर निभाओगे।”

     

    उसी क्षण आरव को अपने पिछले जन्म की सारी यादें लौट आईं।

     

    उसे याद आ गया कि वह कोई और नहीं, आदित्य का ही पुनर्जन्म है।

     

    वह मुस्कुराया और बोला,

     

    “मैंने कहा था ना… चाहे हजारों साल क्यों न बीत जाएँ, मैं तुम्हें ढूँढ़ ही लूँगा।”

     

    वैदेही दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    उसी पल मायरा का श्राप हमेशा के लिए समाप्त हो गया। उजड़ा हुआ साम्राज्य फिर से जीवंत होने लगा। महल की दीवारों में चमक लौट आई, सूखे बाग़ फिर से फूलों से भर गए और वर्षों से कैद आत्माओं को भी मुक्ति मिल गई।

     

    कहते हैं कि आज भी उस प्राचीन साम्राज्य के खंडहरों में जाने वाले लोगों को डर नहीं, बल्कि दो सच्चे प्रेमियों की अमर मोहब्बत महसूस होती है। क्योंकि सच्चा प्रेम समय, मृत्यु और हजारों साल पुराने श्राप को भी हरा सकता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • डायन का महल

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    डायन का महल

     

    राजस्थान के एक छोटे से गाँव के पास घने बसी झाड़ियों के बीच एक विशाल और खंडहर जैसा महल था। गाँव वाले उसे “डायन का महल” कहते थे। कहते थे कि वहाँ सौ सालों से एक भयानक डायन रहती है। रात होते ही महल की टूटी खिड़कियों से लाल रोशनी निकलती थी, और कभी-कभी किसी औरत के रोने की आवाज़ पूरे जंगल में गूंज जाती थी।

     

    गाँव का कोई भी इंसान उस महल की तरफ जाने की हिम्मत नहीं करता था। बच्चों को भी बचपन से यही सिखाया जाता था कि अगर कभी गलती से भी उस जंगल में चले गए, तो डायन उन्हें हमेशा के लिए अपने महल में कैद कर लेगी।

     

    उसी गाँव में सत्रह साल का एक लड़का रहता था, जिसका नाम वीर था। वह बाकी लोगों से अलग था। उसे हर बात का सच जानने की आदत थी। उसे हमेशा लगता था कि हर डर के पीछे कोई न कोई राज ज़रूर छिपा होता है।

     

    एक दिन उसकी छोटी बहन गुड़िया जंगल में लकड़ियाँ बीनने गई, लेकिन शाम तक वापस नहीं लौटी। पूरे गाँव में हड़कंप मच गया। लोगों ने बिना खोजे ही कह दिया, “उसे डायन उठा ले गई। अब वह कभी वापस नहीं आएगी।”

     

    लेकिन वीर ने हार नहीं मानी। उसने अकेले ही अपनी बहन को ढूँढ़ने का फैसला किया। गाँव वालों ने बहुत रोका, मगर उसने किसी की बात नहीं सुनी।

     

    रात होते ही वह एक मशाल और अपनी दादी का दिया हुआ ताबीज लेकर जंगल की ओर निकल पड़ा। जंगल में अजीब सी खामोशी थी। पेड़ों के बीच से ठंडी हवा गुजर रही थी, मानो कोई उसका पीछा कर रहा हो।

     

    कुछ देर बाद उसे दूर एक विशाल महल दिखाई दिया। उसकी टूटी हुई दीवारों पर बेलें उगी हुई थीं। लोहे का बड़ा दरवाज़ा अपने आप चरमराता हुआ खुल गया।

     

    वीर ने हिम्मत करके अंदर कदम रखा।

     

    महल के अंदर हर तरफ धूल जमी थी, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि बीच का रास्ता बिल्कुल साफ था, जैसे कोई रोज़ वहाँ से गुजरता हो। अचानक ऊपर की मंज़िल से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    वीर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। तभी उसके सामने सफेद कपड़ों में एक बूढ़ी औरत दिखाई दी। उसके लंबे सफेद बाल थे और आँखें हल्की नीली चमक रही थीं।

     

    औरत ने धीमी आवाज़ में कहा,

    “तुम यहाँ क्यों आए हो?”

     

    वीर ने डरते हुए कहा,

    “मैं अपनी बहन को लेने आया हूँ।”

     

    औरत मुस्कुराई।

    “लोग मुझे डायन कहते हैं, लेकिन किसी ने कभी मेरा सच जानने की कोशिश नहीं की।”

     

    इतना कहकर वह अचानक हवा में गायब हो गई।

     

    वीर घबरा गया, लेकिन उसने आगे बढ़ना जारी रखा। एक कमरे में उसे कई पुराने चित्र दिखाई दिए। उनमें एक सुंदर रानी की तस्वीर थी। तस्वीर के नीचे लिखा था—’रानी मृणालिनी’।

     

    तभी पीछे से वही आवाज़ आई,

    “वही मेरा असली नाम है।”

     

    वीर ने पलटकर देखा। इस बार वह बूढ़ी औरत नहीं, बल्कि एक बेहद सुंदर रानी उसके सामने खड़ी थी।

     

    रानी ने कहा,

    “सैकड़ों साल पहले मैं इसी राज्य की रानी थी। मैं लोगों की सेवा करती थी। लेकिन राज्य का लालची मंत्री सिंहासन चाहता था। उसने पूरे राज्य में यह अफवाह फैला दी कि मैं डायन हूँ। लोगों ने बिना सच जाने मुझे जिंदा महल में कैद कर दिया। मरते समय मैंने बस एक श्राप दिया कि जब तक कोई निडर इंसान मेरे सच पर विश्वास नहीं करेगा, तब तक मेरी आत्मा इस महल से मुक्त नहीं होगी।”

     

    वीर सब कुछ समझ चुका था।

     

    उसी समय महल ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा। चारों तरफ काली परछाइयाँ दिखाई देने लगीं। वे असली बुरी आत्माएँ थीं, जो वर्षों से इस महल में कैद थीं।

     

    उनका सरदार गरजा,

    “अगर रानी आज़ाद हो गई, तो हमारा अंत हो जाएगा!”

     

    सैकड़ों काली परछाइयाँ वीर की ओर बढ़ने लगीं।

     

    वीर ने अपनी दादी का दिया हुआ ताबीज़ कसकर पकड़ लिया। अचानक ताबीज़ से तेज़ सुनहरी रोशनी निकली। वह रोशनी पूरे महल में फैल गई। एक-एक करके सारी काली परछाइयाँ राख बनकर गायब होने लगीं।

     

    लेकिन तभी सबसे बड़ी परछाईं ने गुड़िया को पकड़ लिया।

     

    वीर पूरी ताकत से दौड़ा और अपनी बहन का हाथ पकड़ लिया। दोनों ज़मीन पर गिर पड़े।

     

    रानी ने अपनी आखिरी शक्ति इकट्ठी की और आसमान की ओर हाथ उठाया। महल के ऊपर तेज़ सफेद प्रकाश फैल गया। देखते ही देखते सारी बुरी शक्तियाँ हमेशा के लिए खत्म हो गईं।

     

    महल पूरी तरह शांत हो गया।

     

    रानी मुस्कुराई।

     

    “आज तुमने केवल अपनी बहन को नहीं बचाया, बल्कि मुझे भी सदियों के श्राप से मुक्त कर दिया।”

     

    इतना कहते ही उनका शरीर चमकने लगा और कुछ ही पलों में वह प्रकाश बनकर आकाश में विलीन हो गईं।

     

    वीर और गुड़िया महल से बाहर निकल आए।

     

    सुबह जब दोनों गाँव पहुँचे, तो सब लोग उन्हें देखकर हैरान रह गए।

     

    वीर ने गाँव वालों को पूरी सच्चाई बताई। पहले तो किसी ने विश्वास नहीं किया, लेकिन जब सभी लोग महल तक पहुँचे, तो वहाँ अब कोई डरावनी जगह नहीं थी। टूटी दीवारों के बीच सुंदर फूल खिल चुके थे। महल के ऊपर उड़ते सफेद कबूतर मानो बता रहे थे कि अब वहाँ कोई श्राप नहीं बचा।

     

    गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उन्होंने कहा,

    “हमारे पूर्वजों ने बिना सच जाने एक निर्दोष रानी को डायन कह दिया। सबसे बड़ा पाप अंधविश्वास होता है।”

     

    उस दिन के बाद किसी ने उस जगह को डायन का महल नहीं कहा।

     

    अब लोग उसे “रानी मृणालिनी का महल” कहने लगे।

     

    हर साल गाँव वाले वहाँ दीप जलाते, फूल चढ़ाते और बच्चों को एक ही बात सिखाते

     

    “किसी इंसान का फैसला अफवाहों से नहीं, बल्कि सच जानकर करना चाहिए। कई बार जिसे दुनिया राक्षस समझती है, वह सबसे बड़ा पीड़ित होता है।”

     

    समय बीतता गया। वीर बड़ा होकर गाँव का सबसे सम्मानित युवक बना। उसने उस महल को फिर से बनवाया और उसे एक ऐसी जगह बना दिया जहाँ दूर-दूर से लोग इतिहास और सच्चाई जानने आते थे। महल के मुख्य द्वार पर पत्थर की एक पट्टिका लगाई गई, जिस पर लिखा था—

     

    “डर से बड़ा सच होता है, और सच से बड़ी कोई शक्ति नहीं।”

     

    कहते हैं, आज भी पूर्णिमा की रात उस महल की सबसे ऊँची खिड़की पर सफेद रोशनी दिखाई देती है। लेकिन अब लोग उससे डरते नहीं। वे मानते हैं कि वह रानी मृणालिनी की पवित्र आत्मा है, जो इस बात की

    गवाही देती है कि झूठ चाहे कितने भी वर्षों तक राज करे, अंत में जीत हमेशा सच की ही होती है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अधूरी मुहब्बत की डायन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अधूरी मोहब्बत की डायन

     

    पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गांव के किनारे एक पुरानी हवेली थी। गांव वाले कहते थे कि वहां एक शातिर डायन रहती है। उसका नाम मायरा था। लोग कहते थे कि जिसने भी उसकी आंखों में देख लिया, वह कभी वापस नहीं लौटा। बच्चे शाम ढलते ही घरों में बंद हो जाते और बड़े भी उस रास्ते से गुजरने की हिम्मत नहीं करते।

     

    लेकिन कोई नहीं जानता था कि मायरा हमेशा से डायन नहीं थी।

     

    सालों पहले वह एक बेहद खूबसूरत लड़की थी। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी कि हर कोई उसे देखकर खुश हो जाता। वह जंगल से जड़ी-बूटियां लाकर गांव वालों का इलाज करती थी। मगर गांव के कुछ लालची लोगों को उसका हुनर पसंद नहीं था। उन्होंने उस पर काला जादू करने का झूठा इल्जाम लगा दिया।

     

    उसी गांव में आरव नाम का एक युवक रहता था। वह मायरा से दिल ही दिल में प्यार करता था और मायरा भी उसे अपनी पूरी दुनिया मानती थी।

     

    एक शाम आरव ने कहा, “मायरा, मैं जल्दी ही तुम्हें अपने घर की बहू बनाऊंगा। चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो जाए।”

     

    मायरा मुस्कुरा दी। “बस इतना वादा है कि कभी मेरा साथ मत छोड़ना।”

     

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

     

    गांव वालों ने मायरा को पकड़कर जंगल के बीच बने पुराने मंदिर में जिंदा जलाने का फैसला कर लिया। आरव ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन कुछ लोगों ने उसे बांध दिया।

     

    आग की लपटों में घिरी मायरा की आखिरी चीख पूरे जंगल में गूंज उठी।

     

    “अगर मेरा प्यार अधूरा रहा… तो मेरी आत्मा कभी शांति नहीं पाएगी…”

     

    उस रात तेज तूफान आया। बिजली कड़की और मंदिर के पास खड़ा बरगद का पेड़ दो हिस्सों में टूट गया।

     

    अगली सुबह मायरा की राख तो मिली, लेकिन उसका शरीर नहीं।

     

    उस दिन के बाद गांव में अजीब घटनाएं होने लगीं।

     

    रात होते ही लोगों को सफेद साड़ी पहने एक औरत दिखाई देती। जो भी उसका पीछा करता, वह हमेशा के लिए गायब हो जाता।

     

    धीरे-धीरे लोगों ने उसे शातिर डायन कहना शुरू कर दिया।

     

    मायरा अब इंसानों से नफरत करती थी। उसने कसम खा ली थी कि कोई भी प्रेम कहानी पूरी नहीं होने देगी।

     

    जिस गांव में शादी होती, वहां कोई न कोई अनहोनी हो जाती।

     

    कभी दूल्हा गायब हो जाता, कभी दुल्हन।

     

    लोग डर के मारे रात में शादी करना छोड़ चुके थे।

     

    लेकिन सच यह था कि मायरा हर प्रेमी जोड़े में खुद और आरव को ढूंढती थी।

     

    जब भी वह किसी को खुश देखती, उसका अपना टूटा हुआ दिल फिर से रो पड़ता।

     

    एक दिन गांव में विवान नाम का युवक अपनी मां के साथ रहने आया।

     

    वह पढ़ा-लिखा और निडर था।

     

    गांव वालों ने उसे चेतावनी दी, “हवेली के पास मत जाना। वहां मौत रहती है।”

     

    विवान हंसकर बोला, “अगर वहां कोई है, तो उसकी भी कोई कहानी होगी।”

     

    एक रात वह सच जानने के लिए हवेली पहुंच गया।

     

    अंदर चारों तरफ धूल जमी थी।

     

    अचानक ठंडी हवा चली।

     

    दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    पीछे से एक आवाज आई, “यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?”

     

    विवान ने पलटकर देखा।

     

    सामने लाल आंखों वाली एक औरत खड़ी थी।

     

    लंबे खुले बाल, सफेद साड़ी और चेहरे पर दर्द से भरी मुस्कान।

     

    वह मायरा थी।

     

    उसने अपने लंबे नाखून विवान की गर्दन पर रख दिए।

     

    “डर नहीं लगता?”

     

    विवान बोला, “डर उस इंसान से लगता है जिसके अंदर बुराई हो। तुम्हारी आंखों में तो सिर्फ दर्द दिखाई दे रहा है।”

     

    यह सुनकर मायरा कुछ पल के लिए चुप हो गई।

     

    सदियों बाद किसी ने उसे राक्षस नहीं, इंसान समझा था।

     

    मगर अगले ही पल वह फिर कठोर बन गई।

     

    “मेरे पास दया मांगने मत आना।”

     

    विवान बोला, “मैं दया नहीं… तुम्हारी कहानी सुनने आया हूं।”

     

    मायरा ने पहली बार किसी इंसान को जिंदा छोड़ दिया।

     

    उस रात दोनों घंटों तक बात करते रहे।

     

    मायरा ने अपनी अधूरी मोहब्बत का हर दर्द उसे बताया।

     

    विवान सब सुनता रहा।

     

    अगले कई दिनों तक वह रोज हवेली जाने लगा।

     

    गांव वालों ने उसे बहुत रोका।

     

    लेकिन वह नहीं माना।

     

    धीरे-धीरे मायरा के चेहरे पर फिर मुस्कान लौटने लगी।

     

    उसे लगने लगा कि शायद इस बार किस्मत उस पर मेहरबान हो जाएगी।

     

    लेकिन उसके दिल में एक डर भी था।

     

    वह जानती थी कि वह अब इंसान नहीं रही।

     

    एक रात उसने विवान से पूछा, “अगर मैं पहले जैसी होती… तो क्या तुम मुझे अपनाते?”

     

    विवान ने बिना सोचे कहा, “दिल से चाहने वालों का चेहरा नहीं देखा जाता।”

     

    मायरा की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    सैकड़ों साल बाद उसने फिर किसी पर भरोसा किया।

     

    लेकिन किस्मत ने एक बार फिर उसके साथ खेल खेला।

     

    गांव वालों को पता चल गया कि विवान रोज हवेली जाता है।

     

    उन्होंने फैसला किया कि इस बार डायन का हमेशा के लिए अंत कर देंगे।

     

    हथियारों और मशालों के साथ पूरा गांव हवेली पहुंच गया।

     

    विवान उनके सामने खड़ा हो गया।

     

    “कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा।”

     

    लोग चिल्लाए, “यह डायन है। इसने हमारे लोगों की जान ली है।”

     

    मायरा धीरे-धीरे बाहर आई।

     

    उसने गांव वालों को देखा।

     

    फिर विवान की तरफ मुस्कुराकर बोली, “आज फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है।”

     

    विवान उसका हाथ पकड़ना चाहता था।

     

    लेकिन मायरा पीछे हट गई।

     

    “नहीं… इस बार मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।”

     

    उसने अपनी सारी जादुई शक्ति इकट्ठी की।

     

    पूरा आसमान काले बादलों से भर गया।

     

    हवा इतनी तेज चलने लगी कि लोगों के हाथों की मशालें बुझ गईं।

     

    मगर मायरा ने किसी पर हमला नहीं किया।

     

    उसने सिर्फ विवान की तरफ देखा।

     

    “मैंने एक बार किसी इंसान से दिल से प्यार किया था… लेकिन उसे कभी पा नहीं सकी। आज फिर वही मोड़ सामने है। अगर इस बार भी तुम्हें अपने पास रखूंगी, तो पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन बन जाएगी।”

     

    विवान की आंखें भर आईं।

     

    “मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

     

    मायरा हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “कुछ प्यार साथ रहने के लिए नहीं… याद बन जाने के लिए होते हैं।”

     

    इतना कहकर उसने अपना सारा जादू खुद पर ही चला दिया।

     

    तेज रोशनी हुई।

     

    जब रोशनी खत्म हुई, तो हवेली, काला जादू और मायरा… सब गायब हो चुके थे।

     

    वह हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गई।

     

    विवान वहीं घुटनों के बल बैठकर रोता रहा।

     

    उसके हाथ में केवल मायरा की चांदी की एक पुरानी पायल बची थी।

     

    उस दिन के बाद उस गांव में फिर कभी किसी ने डायन नहीं देखी।

     

    लेकिन हर साल उसी रात हवेली वाली जगह पर रातरानी के फूल अपने आप खिल जाते।

     

    लोग कहते हैं कि वह मायरा की

    आखिरी निशानी है।

     

    वह शातिर जरूर थी, उसने कई लोगों से बदला भी लिया था, लेकिन जब उसने पहली और आखिरी बार किसी इंसान को सच्चे दिल से चाहा, तब भी किस्मत ने उसे उसका प्यार नहीं दिया।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • पागल राजा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    पागल राजा

     

    घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से गांव का नाम था रामपुरा। गांव के बीचों-बीच एक टूटी-फूटी झोपड़ी थी, जिसमें लगभग पचपन साल का एक आदमी रहता था। उसके कपड़े फटे हुए थे, बाल बिखरे रहते थे और चेहरे पर लंबी सफेद दाढ़ी थी।

     

    लेकिन उसकी सबसे अजीब बात यह थी कि वह हर मिलने वाले से एक ही बात कहता था—

     

    “मैं इस राज्य का असली राजा हूं… मेरा सिंहासन मुझसे छल से छीना गया है।”

     

    गांव वाले उसकी बात सुनते और ठहाका लगाकर हंस पड़ते।

     

    “लो, फिर शुरू हो गया पागल राजा!”

     

    बच्चे उसके पीछे-पीछे दौड़ते और चिढ़ाते, “महाराज की जय हो… महाराज की जय हो!”

     

    वह कभी गुस्सा नहीं होता। बस मुस्कुरा देता और धीरे से कहता,

     

    “एक दिन सच सबके सामने आएगा।”

     

    उसका नाम था वीरेंद्र।

     

    गांव में कोई नहीं जानता था कि उसकी आंखों में इतना दर्द क्यों है। लोग उसे पागल समझते थे, लेकिन उसकी आंखों में कभी-कभी ऐसा तेज दिखाई देता था कि अच्छे-अच्छे लोग पल भर के लिए चुप हो जाते।

     

    एक दिन गांव में एक बूढ़ी औरत आई। उसने वीरेंद्र को देखा तो उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    वह उसके पैरों में बैठ गई।

     

    “महाराज… क्या आपने मुझे पहचाना?”

    वीरेंद्र ने ध्यान से उसे देखा।

    “तुम… दाई मां?”बूढ़ी औरत रो पड़ी।

    “मैंने सोचा था आप अब इस दुनिया में नहीं होंगे।”

    यह देखकर गांव वाले हैरान रह गए।

    वीरेंद्र ने उसे उठाया और झोपड़ी के अंदर ले गया।

    उस रात दाई मां ने गांव वालों को एक ऐसी कहानी सुनाई जिसने सबकी नींद उड़ा दी।

     

    करीब तीस साल पहले इस राज्य के राजा वीरेंद्र सिंह थे। जनता उनसे बहुत प्रेम करती थी। वे न्यायप्रिय और दयालु राजा थे।

     

    लेकिन उनके सबसे भरोसेमंद सेनापति भानु प्रताप की नज़र सिंहासन पर थी।

     

    एक रात उसने महल के कुछ लालची मंत्रियों के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा।

     

    राजा के खाने में बेहोशी की दवा मिला दी गई।

     

    जब राजा बेहोश हुए तो उन्हें रातों-रात जंगल में फेंक दिया गया।

     

    पूरे राज्य में यह खबर फैला दी गई कि राजा की हत्या डाकुओं ने कर दी।

     

    फिर भानु प्रताप ने एक ऐसे आदमी को, जो राजा की तरह दिखता था, राजा बनाकर सिंहासन पर बैठा दिया।

     

    वह बहरूपिया था।

     

    क्योंकि असली राजा की शक्ल बहुत कम लोगों ने करीब से देखी थी, इसलिए किसी को शक नहीं हुआ।

     

    दाई मां ने उस रात सब कुछ अपनी आंखों से देखा था।

    वह राजा को बचाना चाहती थी, लेकिन उसे भी मारने की कोशिश हुई।

    वह किसी तरह बचकर भाग गई।

    उधर जंगल में घायल राजा को कुछ साधुओं ने बचा लिया।

    लेकिन राजा की याददाश्त कई सालों तक कमजोर रही।

    जब सब कुछ याद आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

    वे अकेले थे न सेना…न महल…न कोई पहचानने वाला।

    वे गांव-गांव भटकते रहे और लोगों को अपना सच बताते रहे।

    लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया।

    लोग उन्हें पागल कहते रहे।

    दाई मां की बातें सुनकर पूरे गांव में सन्नाटा छा गया।

    पहली बार सबको लगा कि शायद यह आदमी सच बोल रहा है।

    अगले दिन गांव के मुखिया ने कहा,

    “अगर आप सच में राजा हैं, तो कोई सबूत होना चाहिए।”

    वीरेंद्र कुछ पल चुप रहे।

    फिर उन्होंने अपनी कमर से बंधी एक पुरानी कपड़े की थैली निकाली।

    उसमें एक सोने की अंगूठी थी।

    अंगूठी पर राजघराने का विशेष चिन्ह बना हुआ था।

    साथ ही एक आधा फटा हुआ राजकीय फरमान भी था, जिस पर राजा की मुहर लगी थी।

     

    मुखिया ने वह अंगूठी पहले कभी नहीं देखी थी।

    लेकिन दाई मां ने तुरंत पहचान लिया।

    “यही राजमुद्रा है… यही असली निशान है।”

    अब गांव वालों को यकीन होने लगा।

    उन्होंने तय किया कि वे राजा को लेकर राजधानी जाएंगे।

    कई दिनों की यात्रा के बाद वे राजधानी पहुंचे।

    वहां पूरे राज्य में उत्सव का माहौल था।

    बहरूपिया राजा अपनी ताजपोशी की तीसवीं वर्षगांठ मना रहा था।

    वीरेंद्र महल के सामने पहुंचकर जोर से बोले,

    “सिंहासन पर बैठा आदमी नकली है… मैं इस राज्य का असली राजा हूं।”

    सैनिक हंसने लगे।

    “एक और पागल आ गया!”

    लेकिन तभी महल के सबसे बूढ़े राजगुरु की नजर वीरेंद्र पर पड़ी।

    उनके हाथ कांपने लगे।

    वे दौड़ते हुए नीचे आए।

    उन्होंने वीरेंद्र के माथे पर बचपन का वह छोटा-सा निशान देखा, जो सिर्फ असली राजा के पास था।

    राजगुरु की आंखें भर आईं।

    वे झुक गए।

    “महाराज… आप जीवित हैं!”

    पूरा दरबार सन्न रह गया।

    बहरूपिया राजा का चेहरा पीला पड़ गया।

    उसने भागने की कोशिश की, लेकिन सैनिकों ने उसे पकड़ लिया।

    पूछताछ हुई।

    सारे राज खुल गए।

     

    उसने कबूल कर लिया कि वह असली राजा नहीं है।

    उसे सेनापति भानु प्रताप ने धन का लालच देकर सिंहासन पर बैठाया था।

    भानु प्रताप तो कई साल पहले मर चुका था, लेकिन उसका झूठ इतने वर्षों तक पूरे राज्य पर राज करता रहा।

    पूरे राज्य में खबर आग की तरह फैल गई।लोग रोने लगे।

    उन्हें पछतावा था कि उनका असली राजा इतने वर्षों तक दर-दर भटकता रहा और वे पहचान भी नहीं पाए।

    राजा वीरेंद्र को दोबारा राजगद्दी पर बैठाया गया।राजा वीरेंद्र ने अगले ही दिन पूरे राज्य में एक विशेष सभा बुलाई। दूर-दूर के गांवों से लोग उन्हें देखने आए। जैसे ही वे राजसिंहासन पर बैठे, पूरा राजदरबार उनकी जय करने लगा 

     

    लेकिन उन्होंने सिंहासन पर बैठते ही सबसे पहला आदेश दिया,

     

    “आज से किसी इंसान को उसके कपड़ों, उसकी गरीबी या उसकी हालत देखकर पागल मत कहना। कभी-कभी सबसे बड़ा सच उसी इंसान के पास होता है, जिसे दुनिया सबसे कम समझती है।”

     

    इसके बाद उन्होंने उन सभी गांव वालों को भी राजधानी बुलाया जिन्होंने कठिन समय में उन्हें दो वक्त की रोटी दी थी।

     

    उन्होंने हर गरीब परिवार की मदद की और राज्य में न्याय का ऐसा शासन स्थापित किया कि वर्षों तक लोग उन्हें याद करते रहे।

    रामपुरा गांव के लोग जब भी अपने बच्चों को उस पुराने बरगद के नीचे ले जाते, तो एक बात जरूर कहते

    “बेटा, किसी की बात का मजाक उड़ाने से

    पहले उसका दर्द समझने की कोशिश करना। क्योंकि कभी-कभी जिसे दुनिया पागल समझती है, वही सच में इतिहास का सबसे बड़ा राजा होता है

     

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कैद की दुल्हन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कैद की दुल्हन

     

    विराज सिंघानिया शहर के सबसे बड़े उद्योगपतियों में गिना जाता था। उसके पास आलीशान बंगले, महंगी गाड़ियाँ, दौलत और रसूख की कोई कमी नहीं थी। लोग उसके नाम से ही डरते थे। लेकिन उसके स्वभाव में एक ऐसी कमी थी जिसने उसे कभी किसी का अपना नहीं बनने दिया। उसे बचपन से आदत थी कि जो चीज़ उसे पसंद आ जाए, वह किसी भी कीमत पर उसकी होनी चाहिए।

     

    दूसरी तरफ थी सोनल। एक छोटे से घर में रहने वाली, बेहद मासूम और सादगी पसंद लड़की। उसके पिता एक सरकारी स्कूल में चपरासी थे और माँ सिलाई करके घर चलाने में उनका हाथ बँटाती थीं। सोनल कॉलेज में पढ़ती थी। उसका सपना था कि पढ़-लिखकर अपने माता-पिता का जीवन आसान बनाए। वह रोज़ बस से कॉलेज जाती और लौटते समय मंदिर में माथा टेकना कभी नहीं भूलती थी।

     

    एक दिन विराज अपनी लग्ज़री कार में किसी मीटिंग के लिए जा रहा था। तभी ट्रैफिक सिग्नल पर उसकी नज़र बस स्टॉप पर खड़ी सोनल पर पड़ी। साधारण सूट, कंधे पर बैग और चेहरे पर मासूम मुस्कान। पहली बार किसी लड़की ने उसके मन को इस तरह बेचैन कर दिया।

     

    उस दिन के बाद विराज रोज़ उसी रास्ते से गुजरने लगा। उसने अपने लोगों से सोनल की पूरी जानकारी निकलवा ली—वह कहाँ रहती है, किस कॉलेज में पढ़ती है, कब घर से निकलती है और कब लौटती है।

     

    उसका दोस्त कबीर बोला, “अगर सच में पसंद है तो उसके घर रिश्ता भेज दे।”

     

    विराज हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैं इंतज़ार नहीं करता। जो मुझे पसंद आ जाए, उसे हासिल कर लेता हूँ।”

     

    कबीर ने समझाया, “किसी इंसान को चीज़ मत समझ।”

     

    लेकिन विराज ने उसकी बात अनसुनी कर दी।

     

    उधर सोनल को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि कोई उसकी हर हरकत पर नज़र रख रहा है।

     

    एक शाम कॉलेज से लौटते समय सड़क सुनसान थी। तभी एक काली एसयूवी उसके सामने आकर रुकी। चार आदमी बाहर निकले।

     

    “कौन हो तुम लोग?” सोनल घबराकर बोली।

     

    उसके जवाब देने से पहले ही उन्होंने उसे जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया। सोनल चीखती रही, लेकिन सुनसान सड़क पर उसकी आवाज़ किसी तक नहीं पहुँची।

     

    जब उसकी आँखों से पट्टी हटाई गई तो उसने खुद को एक विशाल और आलीशान बंगले के कमरे में पाया। कमरा किसी महल से कम नहीं था, लेकिन उसके लिए वह एक सुनहरा पिंजरा था।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर विराज आया।

     

    “डरो मत, यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं होगी।”

     

    सोनल काँपती हुई बोली, “मुझे यहाँ क्यों लाए हो? मेरे माँ-पापा मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।”

     

    विराज ने शांत आवाज़ में कहा, “क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

     

    सोनल की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “जिस प्यार में मेरी मर्ज़ी ही नहीं, वह प्यार नहीं हो सकता। मुझे घर जाने दो।”

     

    विराज ने सिर्फ इतना कहा, “अब यही तुम्हारा घर है।”

     

    उधर सोनल के घर में मातम जैसा माहौल था। उसके माता-पिता ने पूरी रात उसे ढूँढा। पुलिस में शिकायत दर्ज हुई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। माँ रो-रोकर बेहोश हो जातीं और पिता हर आने-जाने वाले से बेटी के बारे में पूछते।

     

    बंगले में सोनल कई बार भागने की कोशिश करती, लेकिन हर बार सुरक्षा कर्मी उसे पकड़ लेते। उसके मोबाइल से लेकर हर सामान तक उससे ले लिया गया था। बाहर की दुनिया से उसका हर रिश्ता तोड़ दिया गया।

     

    कुछ दिनों बाद विराज ने पूरे परिवार के सामने घोषणा कर दी कि वह सोनल से शादी करेगा।

     

    उसकी माँ ने कहा, “बेटा, जबरदस्ती से कोई रिश्ता नहीं बनता।”

     

    लेकिन विराज के सिर पर जुनून सवार था।

     

    उसने पंडित बुला लिया। सोनल लाख मिन्नतें करती रही।

     

    “मुझे जाने दो… मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ।”

     

    लेकिन उसकी एक न सुनी गई।

     

    कुछ समय बाद दोनों की शादी करवा दी गई। शादी के मंडप में सोनल की आँखों में आँसू थे। उसके चेहरे पर दुल्हन की खुशी नहीं, बल्कि कैद का दर्द था।

     

    शादी के बाद भी कुछ नहीं बदला। बंगले के हर दरवाज़े पर पहरा था। सोनल बाहर नहीं जा सकती थी। उसके कमरे की खिड़की से दूर दिखाई देता खुला आसमान उसे हर दिन अपनी आज़ादी की याद दिलाता।

     

    विराज रोज़ उसके लिए महंगे कपड़े, गहने और तोहफ़े लाता।

     

    एक दिन उसने हीरे का हार बढ़ाते हुए कहा, “ये तुम्हारे लिए।”

     

    सोनल ने हार की तरफ देखे बिना जवाब दिया,

     

    “जिस इंसान के पास आज़ादी नहीं होती, उसके लिए हीरे भी बेड़ियाँ लगते हैं।”

     

    विराज पहली बार निरुत्तर हो गया।

     

    दिन बीतते गए। सोनल पहले जैसी हँसमुख लड़की नहीं रही। उसने ठीक से खाना छोड़ दिया। वह चुपचाप घंटों खिड़की के पास बैठी रहती।

     

    एक दिन उसकी तबीयत बहुत बिगड़ गई। डॉक्टर ने जाँच के बाद कहा,

     

    “इन्हें बीमारी से ज़्यादा मानसिक तनाव है। अगर ये ऐसे ही रहीं तो इनकी हालत और खराब हो सकती है।”

     

    उस रात विराज सो नहीं पाया। उसे पहली बार अपने किए पर पछतावा होने लगा। उसने सोचा, “क्या सच में मैं इससे प्यार करता हूँ? अगर करता हूँ, तो यह मेरे साथ खुश क्यों नहीं है?”

     

    अगली सुबह वह सोनल के कमरे में गया।

     

    “अगर मैं तुम्हें आज़ाद कर दूँ… क्या तुम मुझे माफ़ कर पाओगी?”

     

    सोनल ने उसकी ओर देखा।

     

    “माफ़ करना मुश्किल नहीं होता, लेकिन जो भरोसा कभी बना ही नहीं, उसे लौटाना नामुमकिन होता है।”

     

    विराज की आँखें झुक गईं।

     

    वह धीरे से उठा, कमरे का दरवाज़ा खोला और अपनी जेब से बंगले के मुख्य गेट की चाबी निकालकर सोनल के हाथ में रख दी।

     

    “आज से तुम आज़ाद हो। तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।”

     

    सोनल कुछ पल तक उसे देखती रही। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यह सच है।

     

    वह धीरे-धीरे बंगले से बाहर निकली। कई दिनों बाद उसने खुली हवा में साँस ली। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों की अदृश्य ज़ंजीरें खोल दी हों।

     

    वह अपने घर पहुँची।

     

    दरवाज़ा खुलते ही उसकी माँ ने उसे देखा और दौड़कर गले लगा लिया। पिता की आँखों से भी आँसू बहने लगे। वह पल पूरे परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।

     

    कुछ दिनों बाद पुलिस ने विराज को पूछताछ के लिए बुलाया। उसने अपने अपराध को छिपाने की कोशिश नहीं की। उसने माना कि उसने सोनल को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा था। कानून ने अपना काम किया और उसे अपने किए की सज़ा मिली।

     

    सोनल ने धीरे-धीरे अपने जीवन को फिर से सँभाला। उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, नौकरी की और अपने माता-पिता का सहारा बनी। उस दर्द ने उसे कमजोर नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत बना दिया।

     

    विराज ने जेल में रहते हुए कई बार अपने फैसलों पर पछतावा किया। उसे समझ में आ गया कि प्यार किसी को अपनी मर्ज़ी से बाँध लेने का नाम नहीं है। अगर किसी रिश्ते में सम्मान, भरोसा और दोनों की सहमति न हो, तो वह रिश्ता नहीं, केवल कैद बनकर रह जाता है।

     

    सालों बाद जब विराज जेल से बाहर निकला, उसने दूर से एक कार्यक्रम में सोनल को देखा। वह आत्मविश्वास से मंच पर खड़ी थी और महिलाओं की सुरक्षा तथा आत्मसम्मान पर भाषण दे रही थी। विराज बिना उससे मिले वापस लौट गया। उसे महसूस हुआ कि कुछ गलतियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें जीवन भर का पछतावा भी पूरी तरह मिटा नहीं सकता।

     

    उस दिन के बाद दोनों की राहें फिर कभी नहीं मिलीं। लेकिन उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए एक सीख बन गई कि सच्चा प्यार किसी पर अधिकार जमाने में नहीं, बल्कि उसकी इच्छा, सम्मान और आज़ादी की कद्र करने में होता है।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं