खोए हुए पंख
परी लोक में एक बहुत ही सुंदर और दयालु परी रहती थी, जिसका नाम आयरा था। उसके चमकदार सफेद पंख चांदनी की तरह दमकते थे। जब भी वह आसमान में उड़ती, ऐसा लगता जैसे सितारों की बारिश हो रही हो।
परी लोक का एक नियम था—कोई भी परी पृथ्वी पर सिर्फ कुछ घंटों के लिए ही जा सकती थी। सूर्यास्त से पहले उसे हर हाल में वापस लौटना पड़ता था। अगर कोई परी अपने पंख खो दे या समय पर वापस न लौटे, तो परी लोक का द्वार उसके लिए हमेशा के लिए बंद हो जाता था।
एक दिन आयरा ने नीचे पृथ्वी की तरफ देखा। वहां एक छोटा-सा गांव था, जहां बच्चे बारिश में भीगते हुए हंस रहे थे। उनकी खुशियां देखकर उसका मन भी पृथ्वी देखने का हो गया।
उसने रानी परी से अनुमति मांगी।
रानी ने कहा, “जा सकती हो, लेकिन याद रखना… अपने पंखों का बहुत ध्यान रखना। अगर वे खो गए, तो तुम कभी वापस नहीं आ पाओगी।”
आयरा ने मुस्कुराकर सिर हिलाया और पल भर में पृथ्वी पर उतर आई।
धरती उसके लिए किसी जादू से कम नहीं थी। रंग-बिरंगे फूल, ठंडी हवा, बहती नदी, पक्षियों की आवाज… सब कुछ उसे बहुत अच्छा लग रहा था।
ताकि कोई उसे पहचान न सके, उसने अपने पंख एक पुराने बरगद के पेड़ के पीछे छिपा दिए और इंसानों जैसी एक साधारण लड़की का रूप ले लिया।
वह गांव की गलियों में घूमती रही। बच्चों के साथ खेली, बूढ़ी दादी की पानी भरने में मदद की और एक घायल चिड़िया का इलाज भी किया।
समय कैसे बीत गया, उसे पता ही नहीं चला।
अचानक उसे आसमान में ढलता सूरज दिखाई दिया।
“अरे! मुझे तुरंत लौटना होगा!”
वह भागती हुई उस बरगद के पेड़ के पास पहुंची…
लेकिन वहां उसके पंख नहीं थे।
उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
“नहीं… मेरे पंख… कहां गए?”
उसने पूरे आसपास तलाश शुरू कर दी। हर झाड़ी, हर पत्थर, हर पेड़ के पीछे देखा।
लेकिन पंख कहीं नहीं मिले।
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
उधर आसमान में परी लोक का सुनहरा द्वार धीरे-धीरे बंद होने लगा।
आयरा ने आखिरी बार आसमान की ओर देखा। उसे अपनी मां, अपनी सहेलियां और अपना घर याद आने लगा।
वह पूरी ताकत से दौड़ी, लेकिन बिना पंखों के वह उड़ ही नहीं सकती थी।
कुछ ही पलों में सुनहरा द्वार बंद हो गया।
आसमान फिर बिल्कुल सामान्य हो गया।
आयरा वहीं घुटनों के बल बैठ गई।
“अब… मैं कभी वापस नहीं जा पाऊंगी…”
उस रात उसने पहली बार खुले आसमान के नीचे रोते-रोते रात बिताई।
अगले दिन उसने फिर अपने पंख ढूंढने शुरू किए।
दिन बीत गया।
फिर एक हफ्ता।
फिर एक महीना।
लेकिन उसके पंख नहीं मिले।
धीरे-धीरे उसके जादू की ताकत भी कम होने लगी।
अब वह सिर्फ एक साधारण इंसान जैसी दिखने लगी थी।
एक दिन उसकी मुलाकात एक युवक से हुई, जिसका नाम आरव था।
उसने आयरा को अकेले बैठे देखा।
“तुम रोज यहां आकर क्या ढूंढती रहती हो?”
आयरा मुस्कुरा दी।
“अपनी सबसे कीमती चीज।”
“क्या खो गया?”
आयरा कुछ पल चुप रही।
अगर वह सच बता देती, तो शायद कोई यकीन नहीं करता।
उसने बस इतना कहा, “मेरा घर…”
आरव उसकी बात समझ नहीं पाया, लेकिन उसने उसकी मदद करने का फैसला किया।
दोनों रोज जंगलों, पहाड़ियों और नदियों के किनारे पंख ढूंढते।
कई बार उन्हें सफेद पंख मिलते भी, लेकिन वे किसी पक्षी के होते।
हर बार आयरा की उम्मीद टूट जाती।
समय गुजरता गया।
मौसम बदल गए।
गांव वाले आयरा को अपनी बेटी मानने लगे।
वह सबकी मदद करती।
बीमारों की सेवा करती।
अनाथ बच्चों को पढ़ाती।
जिसके घर खाना नहीं होता, वहां चुपके से खाना पहुंचा देती।
लोग कहते,
“इस लड़की के अंदर जरूर कोई फरिश्ता रहता है।”
आयरा बस मुस्कुरा देती।
उसे नहीं पता था कि उसके अपने लोग भी आज तक उसे याद करते होंगे या नहीं।
एक रात पूर्णिमा थी।
अचानक आसमान में वही सुनहरी रोशनी दिखाई दी।
आयरा खुशी से खड़ी हो गई।
“क्या परी लोक का द्वार फिर खुल गया?”
लेकिन कुछ ही क्षण बाद रोशनी गायब हो गई।
शायद वह सिर्फ एक संकेत था।
उस दिन आयरा बहुत रोई।
उसे पहली बार लगा कि अब शायद वह कभी वापस नहीं जा पाएगी।
उधर परी लोक में भी सब उसे याद करते थे।
रानी परी ने कई परियों को पृथ्वी पर भेजा।
लेकिन समय बीत जाने के कारण आयरा की जादुई पहचान मिट चुकी थी।
कोई भी उसे खोज नहीं पाया।
साल गुजरते गए।
आयरा अब पूरी तरह पृथ्वी की हो चुकी थी।
लेकिन हर रात वह आसमान के सबसे चमकीले तारे को देखकर मुस्कुराती और धीरे से कहती,
“मैं आज भी तुम्हें नहीं भूली…”
एक दिन गांव के बाहर एक बूढ़ा साधु आया।
उसने आयरा को देखते ही कहा,
“तुम इंसान नहीं हो।”
आयरा चौंक गई।
“आप… जानते हैं मैं कौन हूं?”
साधु मुस्कुराया।
“तुम्हारी आंखों में आसमान बसा है। ऐसे नयन धरती वालों के नहीं होते।”
आयरा की आंखें भर आईं।
उसने पहली बार किसी को अपनी पूरी कहानी सुनाई।
साधु कुछ देर तक शांत बैठा रहा।
फिर बोला,
“जिस चीज को तुम ढूंढ रही हो, शायद वह अब कभी न मिले। लेकिन कभी-कभी भगवान किसी का रास्ता इसलिए बदलते हैं, क्योंकि उसकी मंजिल बदल चुकी होती है।”
“मतलब?”
“अगर तुम्हारे पंख मिल भी जाते, तो क्या तुम उन लोगों को छोड़ पाती जिनकी जिंदगी तुमने बदल दी?”
आयरा ने गांव की तरफ देखा।
वहां बच्चे उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे।
बूढ़ी दादी उसे बेटी कहकर बुला रही थीं।
आरव दूर खड़ा उसकी चिंता कर रहा था।
उसे एहसास हुआ कि उसने अपना पुराना घर खोया जरूर है… लेकिन बदले में एक नया परिवार पा लिया है।
उसने आसमान की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा,
“शायद यही मेरी नई दुनिया है।”
उसी पल हवा का एक तेज झोंका आया।
उसके सामने दो सफेद पंख उड़ते हुए आए…
आयरा ने उन्हें हाथ में लिया।
लेकिन वे उसके असली पंख नहीं थे।
वह हल्के से मुस्कुराई।
“अब मुझे इनकी जरूरत भी नहीं है।”
उसने वे पंख नदी में बहा दिए।
आसमान में कहीं दूर एक हल्की-सी सुनहरी रोशनी चमकी, मानो परी लोक भी उसकी खुशी को स्वीकार कर रहा हो।
उस दिन के बाद आयरा ने कभी अपने खोए हुए पंखों का दुख नहीं मनाया।
क्योंकि उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी जिंदगी
हमसे कुछ छीनकर हमें उससे भी ज्यादा कीमती चीज दे देती है।
और गांव के लोग आज भी कहते हैं…
“कई साल पहले हमारे गांव में एक ऐसी लड़की आई थी, जिसके पास पंख तो नहीं थे… लेकिन उसका दिल किसी परी से कम नहीं था।”

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं


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