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धोखेबाज

पढ़ने का समय : 5 मिनट

“धोखेबाज़…”

 

यह एक ऐसा शब्द था जिसे सुनते-सुनते मयंक के कान जैसे सुन्न पड़ चुके थे। गांव में शायद ही कोई ऐसा इंसान बचा था जो उसे उसके नाम से बुलाता हो। हर किसी की ज़ुबान पर बस एक ही नाम था—धोखेबाज़।

 

लेकिन सबसे बड़ा दुख इस बात का नहीं था कि लोग उसे ताने मारते थे। असली दर्द इस बात का था कि जिस गुनाह की सज़ा वह सालों से भुगत रहा था, वह गुनाह उसने कभी किया ही नहीं था।

 

करीब दस साल पहले की बात थी।

 

मयंक और कबीर बचपन के दोस्त थे। दोनों एक-दूसरे पर अपनी जान तक लुटाने को तैयार रहते थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मिलकर गांव में दूध का कारोबार शुरू किया। दोनों की मेहनत और ईमानदारी ने कुछ ही सालों में उन्हें पूरे इलाके में पहचान दिला दी।

 

एक दिन गांव वालों ने अपनी जमा-पूंजी उन दोनों के भरोसे रख दी। शहर से नई मशीनें खरीदनी थीं ताकि कारोबार और आगे बढ़ सके। धीरे-धीरे करीब पचास लाख रुपये इकट्ठे हो गए।

 

लेकिन अगले ही दिन सब कुछ बदल गया।

 

पैसे गायब थे…

 

और कबीर भी।

 

पूरा गांव गुस्से से आग-बबूला हो गया। किसी ने सच जानने की कोशिश तक नहीं की। सबकी उंगली सीधे मयंक पर उठ गई।

 

“दोनों ने मिलकर हमें लूटा है।”

 

“देखने में सीधा बनता था, निकला बहुत बड़ा धोखेबाज़।”

 

“इसे गांव से निकाल दो।”

 

मयंक हाथ जोड़कर बार-बार कहता रहा कि उसे कुछ नहीं पता, लेकिन किसी ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी।

 

गांव वालों ने उसके घर पर पत्थर फेंके। उसकी बूढ़ी मां को रोज ताने सुनने पड़े।

 

“तुम्हारा बेटा चोर है… धोखेबाज़ है…”

 

अपनों के ताने और बेटे की बदनामी का दुख उसकी मां सह नहीं सकी। कुछ ही दिनों बाद उसने दुनिया छोड़ दी।

 

मां की चिता के सामने खड़ा मयंक फूट-फूटकर रो रहा था।

 

“मां… मैंने किसी को धोखा नहीं दिया। तुम मुझ पर भरोसा करती थीं ना…?”

 

लेकिन उस दिन उसकी आवाज़ का जवाब देने वाला कोई नहीं था।

 

उसकी मां चली गई और उसके साथ मयंक की हंसी भी हमेशा के लिए खो गई।

 

उस दिन के बाद उसने गांव छोड़ने का नहीं, बल्कि वहीं रहकर सच का इंतज़ार करने का फैसला किया।

 

लोग उसे देखते ही रास्ता बदल लेते। बच्चे भी उसका मज़ाक उड़ाते।

 

“देखो… धोखेबाज़ आ गया।”

 

मयंक कुछ नहीं कहता। बस चुपचाप अपनी मजदूरी करता और शाम को अपनी मां की तस्वीर के सामने बैठ जाता।

 

समय बीतता गया।

 

एक… दो… पांच… और देखते ही देखते पूरे दस साल गुजर गए।

 

एक सुबह गांव में पुलिस की गाड़ी आकर रुकी।

 

पूरा गांव चौपाल पर जमा हो गया।

 

पुलिस के साथ एक आदमी हथकड़ी में खड़ा था।

 

वह कबीर था।

 

उसे देखते ही हर कोई हैरान रह गया।

 

पुलिस अधिकारी ने कहा,

 

“इसे दूसरे राज्य से गिरफ्तार किया गया है। पूछताछ में इसने दस साल पहले गांव के पचास लाख रुपये चोरी करने की बात कबूल की है। इस चोरी में मयंक का कोई हाथ नहीं था।”

 

पूरा गांव जैसे पत्थर का हो गया।

 

कबीर रोते हुए मयंक के सामने आ गया।

 

“मयंक… मुझे माफ़ कर दे। लालच ने मेरी आंखों पर पर्दा डाल दिया था। पैसे मैंने अकेले चुराए थे। तू पूरी तरह बेगुनाह था।”

 

मयंक ने उसकी ओर देखा।

 

उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन गुस्सा नहीं।

 

बस एक गहरा दर्द था।

 

सरपंच कांपते हुए उसके सामने आया।

 

“बेटा… हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। हमें माफ़ कर दे।”

 

मयंक ने धीमी आवाज़ में कहा,

 

“माफी मांगने से क्या मेरी मां वापस आ जाएगी?”

 

यह सुनते ही पूरे गांव की आंखें झुक गईं।

 

कुछ लोग वहीं रोने लगे।

 

मयंक ने आगे कहा,

 

“तुम लोगों ने मुझे नहीं, मेरी मां के भरोसे को मार दिया था। वह आखिरी सांस तक यही सोचती रही कि दुनिया उसके बेटे को चोर समझती है। अब बताओ… उसका दर्द कौन मिटाएगा?”

 

किसी के पास कोई जवाब नहीं था।

 

कबीर उसके पैरों में गिर पड़ा।

 

“जो सज़ा देनी हो दे दे… लेकिन मुझे माफ़ कर दे।”

 

मयंक ने उसे उठाया।

 

“तेरी सज़ा अब कानून तय करेगा। मेरे दिल में तेरे लिए न दोस्ती बची है और न ही नफरत… बस एक खालीपन है।”

 

कुछ महीनों बाद अदालत ने कबीर को कई वर्षों की सज़ा सुनाई।

 

सरकार ने आधिकारिक रूप से मयंक को बेगुनाह घोषित किया।

 

गांव वालों ने उसका सम्मान करने के लिए एक बड़ा कार्यक्रम रखा।

 

लेकिन मयंक वहां नहीं गया।

 

वह सीधे श्मशान पहुंचा।

 

अपनी मां की समाधि के सामने बैठकर उसने एक सफेद फूल रखा और भर्राई आवाज़ में बोला,

 

“मां… आज सबको सच पता चल गया। आज पूरा गांव कह रहा है कि तुम्हारा बेटा बेगुनाह था।”

 

उसकी आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

 

“काश… ये सच दस साल पहले सामने आ जाता। शायद आज तुम मेरे साथ होती।”

 

हवा का एक हल्का झोंका आया।

 

मयंक को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी मां हमेशा की तरह उसके सिर पर हाथ फेर रही हो।

 

उस दिन के बाद उसने अपनी ज़िंदगी दूसरों के लिए जीने का फैसला किया।

 

उसने गांव में गरीब बच्चों के लिए एक मुफ्त पुस्तकालय और पढ़ाई का केंद्र शुरू किया।

दरवाज़े पर एक तख्ती लगवाई, जिस पर लिखा था

“किसी भी इंसान को बिना सच जाने कभी दोषी मत ठहराना, क्योंकि झूठा इल्ज़ाम इंसान को जीते-जी मार देता है।”

 

एक दिन एक छोटा बच्चा वहां आया और मासूमियत से बोला,

 

“चाचा… क्या आप वही हैं जिन्हें पहले सब धोखेबाज़ कहते थे?”

 

मयंक मुस्कुरा दिया।

 

“हाँ बेटा… लोग मुझे यही कहते थे।”

 

“लेकिन आप तो अच्छे इंसान हो।”

 

मयंक ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

 

“इस दुनिया में कई बार लोग सच जाने बिना ही फैसला सुना देते हैं। इसलिए हमेशा किसी के बारे में राय बनाने से पहले उसकी सच्चाई जानने की कोशिश करना।”

 

बच्चा मुस्कुराते हुए वहां से चला गया।

 

मयंक आसमान की ओर देखने लगा।

 

आज उसकी मां उसके साथ नहीं थी, लेकिन उसे यकीन था कि जहां भी होगी, अपने बेटे पर गर्व ज़रूर कर रही होगी।

 

समय ने उससे बहुत कुछ छीन लिया था, लेकिन आखिरकार एक चीज़ उसे वापस मिल गई थी—

 

उसकी सच्चाई… और उसका सम्मान।

 

तो कैसी लगी ये वाली स्टोरी कॉमेट ओर लाइक तो कर दिया करो दोस्तो प्लीज 

 

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