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एक सफर

पढ़ने का समय : 6 मिनट

अमन को ट्रैवल करना बहुत पसंद था। उसे किसी एक जगह टिककर रहना बिल्कुल पसंद नहीं था। जैसे ही उसे कुछ दिनों की छुट्टी मिलती, वह अपना बैग उठाता और किसी नई जगह निकल जाता।

 

कभी पहाड़ों पर, कभी समुद्र के किनारे, कभी किसी छोटे से गाँव में।

 

लेकिन उसकी जिंदगी में एक अजीब सी परेशानी थी।

 

एक लड़की।

 

वो लड़की बार-बार उसके सामने आ जाती थी।

 

पहली बार अमन ने उसे जयपुर की एक सड़क पर देखा था। वह अपने कैमरे से एक पुरानी हवेली की तस्वीर ले रहा था कि अचानक वही लड़की उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

 

अमन ने उसे देखकर भौंहें सिकोड़ लीं।

 

“तुम?”

 

लड़की ने उसे देखा और बोली, “क्या हुआ?”

 

“तुम यहाँ कैसे?”

 

“मैं यहाँ घूमने आई हूँ।”

 

“लेकिन मैं भी यहाँ घूमने आया हूँ।”

 

लड़की ने उसे अजीब नजरों से देखा। “तो?”

 

अमन ने सिर हिलाया और आगे बढ़ गया।

 

उसने सोचा, बस एक बार मिली है। दुनिया इतनी बड़ी है, दोबारा कहाँ मिलेगी।

 

लेकिन उसी शाम जब वह एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठा था, वही लड़की उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठी चाय पी रही थी।

 

अमन ने चाय का कप नीचे रखा।

 

“तुम मेरा पीछा कर रही हो?”

 

लड़की ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

 

“मैं? तुम्हारा पीछा क्यों करूंगी?”

 

“तो फिर तुम यहाँ भी कैसे?”

 

“मैं पहले से यहाँ बैठी हूँ।”

 

अमन चुप हो गया।

 

लड़की मुस्कुराकर बोली, “तुम्हें शायद लगता है कि पूरी दुनिया सिर्फ तुम्हारे लिए बनी है।”

 

“मुझे ऐसा नहीं लगता।”

 

“तो फिर परेशान क्यों हो रहे हो?”

 

अमन ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उस लड़की का नाम मीरा था।

 

अमन ने सोचा कि जयपुर के बाद वह उससे कभी नहीं मिलेगा।

 

लेकिन कुछ दिनों बाद वह ऋषिकेश चला गया।

 

सुबह-सुबह वह गंगा किनारे बैठा था। चारों तरफ शांति थी। अमन ने राहत की सांस ली।

 

“आखिरकार… अकेला।”

 

तभी पीछे से आवाज आई।

 

“किससे अकेले?”

 

अमन ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

 

मीरा खड़ी थी।

 

अमन के चेहरे का रंग ही बदल गया।

 

“तुम यहाँ भी?”

 

मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ। तुम यहाँ भी?”

 

“मैं पहले आया था।”

 

“तो मैंने कब कहा कि तुम मेरे पीछे आए हो?”

 

अमन ने अपना माथा पकड़ लिया।

 

“तुम्हें पता है, ये बहुत अजीब है।”

 

“क्या?”

 

“मैं जहाँ जाता हूँ, तुम वहाँ मिल जाती हो।”

 

मीरा कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “शायद तुम्हारी किस्मत खराब है।”

 

अमन ने उसे घूरकर देखा।

 

“तुम्हें ये मजाक बहुत अच्छा लगता है, है ना?”

 

“बहुत।”

 

उस दिन के बाद दोनों की मुलाकातें और भी अजीब होती चली गईं।

 

अमन किसी पहाड़ी रास्ते पर जाता, मीरा वहाँ मिल जाती।

 

वह बस में बैठता, मीरा उसी बस में होती।

 

वह किसी छोटे से गाँव की चाय की दुकान पर रुकता, मीरा वहाँ पहले से चाय पी रही होती।

 

एक बार तो अमन ने जानबूझकर किसी को बताए बिना एक छोटी सी पहाड़ी जगह जाने का फैसला किया।

 

उसने सोचा, “इस बार तो मीरा बिल्कुल नहीं मिलेगी।”

 

लेकिन जैसे ही वह पहाड़ी सड़क के एक मोड़ पर पहुँचा, सामने मीरा खड़ी थी।

 

अमन ने बाइक रोक दी।

 

“तुम यहाँ कैसे?”

 

मीरा ने कंधे उचकाए।

 

“मैं भी घूमने आई हूँ।”

 

“तुम्हें हर बार वही जगह क्यों पसंद आती है, जहाँ मैं जाता हूँ?”

 

“शायद हमारी पसंद मिलती है।”

 

अमन ने तुरंत कहा, “हमारी पसंद बिल्कुल नहीं मिलती।”

 

“अच्छा?”

 

“हाँ।”

 

“तो फिर तुम हर बार मुझे देखकर रुक क्यों जाते हो?”

 

अमन चुप हो गया।

 

इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं था।

 

धीरे-धीरे मीरा उसकी परेशानी से उसकी आदत बनने लगी।

 

पहले अमन उसे देखकर परेशान होता था।

 

फिर उसे देखकर चिढ़ता था।

 

फिर उसे देखकर मुस्कुराने लगा।

 

और कुछ समय बाद…

 

जब वह कहीं जाता और मीरा दिखाई नहीं देती, तो उसे खुद अजीब लगने लगता।

 

एक बार अमन अकेला मनाली चला गया।

 

पहला दिन उसे बहुत अच्छा लगा।

 

दूसरे दिन भी।

 

लेकिन तीसरे दिन वह एक खूबसूरत पहाड़ी रास्ते पर बैठा था और अचानक उसे महसूस हुआ कि कुछ कमी है।

 

कोई उससे बहस नहीं कर रहा था।

 

कोई उसकी चाय नहीं छीन रहा था।

 

कोई उसके कैमरे के सामने आकर उसकी तस्वीर खराब नहीं कर रहा था।

 

अमन ने धीरे से कहा, “मीरा होती तो अब तक परेशान कर चुकी होती।”

 

“अच्छा?”

 

अमन उछल पड़ा।

 

उसने पीछे मुड़कर देखा।

 

मीरा खड़ी थी।

 

अमन कुछ पल उसे देखता रहा।

 

“तुम यहाँ भी?”

 

मीरा मुस्कुराई।

 

“हाँ।”

 

“तुम सच में मेरा पीछा करती हो।”

 

“मैंने कहा ना, मैं बस घूमने आती हूँ।”

 

अमन उसके पास जाकर बैठ गया।

 

“तुम्हें पता है, पहले मुझे तुमसे बहुत परेशानी होती थी।”

 

“पहले?”

 

अमन चुप हो गया।

 

मीरा ने उसे देखा।

 

“अब नहीं होती?”

 

अमन ने सामने पहाड़ों की ओर देखते हुए कहा, “अब… जब तुम नहीं होती, तब होती है।”

 

मीरा पहली बार चुप हो गई।

 

दोनों के बीच कुछ देर तक कोई बात नहीं हुई।

 

बस पहाड़ों से आती ठंडी हवा चलती रही।

 

फिर मीरा ने धीरे से पूछा, “तो अब मैं तुम्हारा पीछा करूँ तो तुम्हें बुरा नहीं लगेगा?”

 

अमन ने उसकी ओर देखा।

 

“अगर तुम मेरे पीछे नहीं आओगी…”

 

मीरा ने मुस्कुराकर पूछा, “तो?”

 

अमन ने नजरें चुरा लीं।

 

“तो शायद मैं खुद तुम्हारे पीछे आ जाऊँगा।”

 

मीरा हँसने लगी।

 

अमन भी मुस्कुरा दिया।

 

लेकिन उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

 

क्योंकि कुछ दिनों बाद अमन अपने घर वापस आ गया।

 

वह सुबह-सुबह नींद में अपने बाथरूम की ओर गया और जैसे ही उसने दरवाजा खोला…

 

अंदर मीरा खड़ी थी।

 

अमन कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

 

फिर जोर से चिल्लाया।

 

“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

 

मीरा भी डर गई।

 

“ये तुम्हारा घर है?”

 

“हाँ!”

 

“मुझे लगा ये मेरा कमरा है!”

 

अमन ने बाहर जाकर देखा।

 

वह सच में गलत कमरे में आ गया था।

 

मीरा कुछ पल उसे देखती रही और फिर जोर-जोर से हँसने लगी।

 

अमन ने शर्मिंदा होकर कहा, “किसी को बताना मत।”

 

मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “अब तो मैं जिंदगी भर बताऊँगी।”

 

अमन ने सिर पकड़ लिया।

 

“तुमसे पीछा छुड़ाना असंभव है।”

 

मीरा उसके पास आई और बोली,

 

“किसने कहा कि तुम्हें मेरा पीछा छुड़ाना है?”

 

अमन ने उसकी ओर देखा।

 

इस बार उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था।

 

बस एक हल्की सी मुस्कान थी।

 

उसे समझ आ गया था कि मीरा सच में उसका पीछा नहीं कर रही थी।

 

बस हर सफर में उसके रास्ते उससे मिल जाते थे।

 

कभी किसी सड़क पर…

 

कभी किसी पहाड़ पर…

 

कभी किसी अनजान शहर में…

 

और कभी-कभी उसके अपने घर के

बाथरूम में भी।

 

पहले अमन को लगता था कि मीरा उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी परेशानी है।

 

लेकिन अब वह जान चुका था…

 

कुछ लोग हमारी जिंदगी में अचानक नहीं आते।

 

वो बार-बार हमारे सामने आते हैं।

 

जब तक हम ये समझ न जाएँ कि शायद…

 

वो रास्ते का हिस्सा नहीं,

 

बल्कि हमारी मंजिल का हिस्सा हैं।

 

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