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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    राघव कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।

     

    ऊपर से फिर वही आवाज आई।

     

    “राघव…”

     

    उसके पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।

     

    यह आवाज वह कैसे भूल सकता था?

     

    यह उसकी छोटी बहन रिया की आवाज थी।

     

    रिया…

     

    जो दस साल पहले मर चुकी थी।

     

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, ऊपर मत जाना।”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर छत की तरफ थी।

     

    कुछ देर बाद आवाज बंद हो गई।

     

    पूरा घर फिर शांत हो गया।

     

    राघव ने माँ को जगाया।

     

    माँ कमरे से बाहर आईं और जैसे ही राघव ने उन्हें सारी बात बताई, उनके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “रिया का नाम मत लेना,” माँ ने कहा।

     

    “क्यों?”

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि वह मरकर भी इस घर से गई नहीं थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    राघव ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब सच बताइए।”

     

    माँ बहुत देर तक चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहना शुरू किया।

     

    दस साल पहले रिया सिर्फ तेरह साल की थी।

     

    उसे रात में छत पर जाकर आसमान देखना बहुत पसंद था।

     

    एक रात वह अचानक छत से गायब हो गई थी।

     

    घर में सबने सोचा कि वह शायद सीढ़ियों से नीचे गई होगी।

     

    लेकिन वह कहीं नहीं मिली।

     

    सुबह उसकी लाश…

     

    माँ आगे नहीं बोल पाईं।

     

    राघव ने पूछा, “कहाँ मिली थी?”

     

    माँ ने कांपते हुए छत के स्टोर रूम की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    राघव के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    “लेकिन वह कमरा तो हमेशा बंद रहा है।”

     

    माँ बोलीं, “उस रात से।”

     

    राघव ने पूछा, “दरवाज़ा बंद किसने किया था?”

     

    माँ ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    अचानक राघव को अपने पिता की आखिरी बात याद आई।

     

    मृत्यु से कुछ दिन पहले उन्होंने उसे चेतावनी दी थी—

     

    “अगर कभी रात में छत से किसी के चलने की आवाज आए… तो दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    तब राघव ने इसे बीमारी के कारण कही गई बात समझा था।

     

    लेकिन अब…

     

    सब कुछ जुड़ रहा था।

     

    अगली सुबह राघव ने स्टोर रूम का ताला देखने का फैसला किया।

     

    वह छत पर गया।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    दिन की रोशनी में रात का डर थोड़ा कम लग रहा था।

     

    लेकिन स्टोर रूम के सामने पहुँचते ही उसकी सांस रुक गई।

     

    दरवाज़े पर खरोंच के निशान थे।

     

    बहुत सारे।

     

    ऐसे निशान जैसे किसी ने अंदर से बाहर निकलने के लिए लकड़ी को नाखूनों से खुरचा हो।

     

    राघव ने हाथ बढ़ाकर दरवाज़े को छुआ।

     

    दरवाज़ा बर्फ जैसा ठंडा था।

     

    उसने ताला देखा।

     

    ताला बाहर से बंद था।

     

    तभी उसकी नजर फर्श पर गई।

     

    वहाँ गीली मिट्टी के छोटे-छोटे पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान स्टोर रूम से निकलकर…

     

    पानी की टंकी तक जा रहे थे।

     

    राघव ने टंकी की तरफ देखा।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह टंकी के पास गया।

     

    ऊपर ढक्कन लगा था।

     

    उसने धीरे से ढक्कन उठाया।

     

    अंदर पानी बिल्कुल काला दिखाई दे रहा था।

     

    और पानी की सतह पर…

     

    एक लंबे बालों का गुच्छा तैर रहा था।

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    उसी समय पीछे से आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    राघव पलटा।

     

    नंदिनी खड़ी थी।

     

    “आप यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    राघव ने तुरंत टंकी का ढक्कन बंद कर दिया।

     

    “कुछ नहीं। नीचे चलो।”

     

    लेकिन नंदिनी की नजर स्टोर रूम पर पड़ी।

     

    “भैया, ये दरवाज़ा तो खुला है।”

     

    राघव ने देखा।

     

    दरवाज़ा सचमुच थोड़ा खुला हुआ था।

     

    उसने तो उसे बंद देखा था।

     

    दोनों कुछ क्षण वहीं खड़े रहे।

     

    फिर अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    नंदिनी के होंठ कांपने लगे।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।

     

    अंदर पूरा अंधेरा था।

     

    टॉर्च जलाकर उसने अंदर देखा।

     

    धूल से भरा कमरा।

     

    पुराना सामान।

     

    टूटी कुर्सी।

     

    एक लकड़ी की पेटी।

     

    और दीवार पर एक पुरानी तस्वीर।

     

    राघव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें पूरा परिवार था।

     

    माँ।

     

    पिता।

     

    राघव।

     

    नंदिनी।

     

    और रिया।

     

    लेकिन तस्वीर में एक अजीब बात थी।

     

    रिया के चेहरे पर किसी ने काले रंग से गोल घेरा बना दिया था।

     

    राघव ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे कुछ लिखा था।

     

    “यह रिया नहीं है।”

     

    राघव की उंगलियाँ कांपने लगीं।

     

    तभी पेटी के अंदर से आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    नंदिनी पीछे हट गई।

     

    राघव ने पेटी खोली।

     

    अंदर पुराने कपड़े, कुछ खिलौने और एक डायरी थी।

     

    डायरी उसके पिता की थी।

     

    राघव ने जल्दी-जल्दी पन्ने पलटे।

     

    एक पन्ने पर लिखा था—

     

    “रिया की मौत दुर्घटना नहीं थी।”

     

    अगली लाइन पढ़ते ही राघव के हाथ से डायरी गिर गई।

     

    “उस रात छत पर रिया के साथ कोई और भी था।”

     

    राघव ने डायरी फिर उठाई।

     

    अगला पन्ना खाली था।

     

    उसके बाद एक वाक्य था—

     

    “जो चीज़ उस रात आई थी, उसने रिया का चेहरा पहन लिया।”

     

    राघव की सांस रुक गई।

     

    उसी समय कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    नंदिनी चीख उठी।

     

    अंदर अंधेरा छा गया।

     

    राघव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    कुंडी हिल नहीं रही थी।

     

    फिर…

     

    अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “भैया…”

     

    राघव जम गया।

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी तरफ मत देखना,” नंदिनी ने कांपते हुए कहा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि…”

     

    नंदिनी की आवाज टूट गई।

     

    “मेरे पीछे कोई खड़ा है।”

     

    राघव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    पीछे से ठंडी सांस उसकी गर्दन पर महसूस हुई।

     

    फिर किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया—

     

    “तुमने मुझे दस साल इंतजार कराया।”

     

    अचानक दरवाज़ा खुल गया।

     

    दोनों भागकर बाहर आए।

     

    राघव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    स्टोर रूम खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान कमरे से बाहर निकलकर सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।

     

    और फिर…

     

    सीढ़ियों पर रुक गए।

     

    राघव ने नीचे देखा।

     

    घर के अंदर उसकी माँ खड़ी थीं।

     

    लेकिन उनकी आँखें बंद थीं।

     

    और उनके पीछे…

     

    एक लंबी काली परछाईं खड़ी थी।

     

    राघव चिल्लाया—

     

    “माँ!”

     

    माँ ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    लेकिन वह उनकी मुस्कान नहीं थी।

     

    उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “अब वह नीचे आ गई है।”

     

    और उसी पल पूरे घर की सारी लाइटें बंद हो गईं।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब बारह बज रहे थे।लखनऊ की उस पुरानी कॉलोनी में दिन के समय सब कुछ सामान्य लगता था। बच्चे गलियों में खेलते, चाय की दुकानों पर लोग बातें करते और शाम होते ही हर घर की बालकनी में पीली रोशनी जल उठती। लेकिन रात के बाद वही कॉलोनी बिल्कुल बदल जाती थी।

     

    खासकर शर्मा परिवार का घर।

     

    तीन मंज़िला पुराना मकान था। सबसे ऊपर एक खुली छत, जिसके चारों तरफ करीब चार फीट ऊँची दीवार थी। छत के एक कोने में पानी की बड़ी काली टंकी थी और दूसरे कोने में एक पुराना स्टोर रूम, जिसका दरवाज़ा पिछले कई सालों से बंद पड़ा था।

     

    घर में उस समय सिर्फ तीन लोग थे—राघव, उसकी छोटी बहन नंदिनी और उनकी माँ।

     

    पिता की मृत्यु को दो साल हो चुके थे। पिता के जाने के बाद राघव ने ही घर की जिम्मेदारी संभाल ली थी।

     

    उस रात राघव अपने कमरे में बैठकर लैपटॉप पर काम कर रहा था।

     

    तभी…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने स्क्रीन से नजर उठाई।

     

    आवाज़ ऊपर से आई थी।

     

    छत से।

     

    राघव कुछ सेकंड तक चुप बैठा रहा।

     

    फिर दोबारा आवाज आई।

     

    ठक… ठक…

     

    इस बार जैसे कोई छत की फर्श पर धीरे-धीरे चल रहा हो।

     

    राघव ने घड़ी देखी।

     

    12:07 AM.

     

    उसने खुद को समझाया, “शायद बिल्ली होगी।”

     

    वह वापस काम करने लगा।

     

    लेकिन तभी उसके कमरे की खिड़की पर हल्की-सी परछाईं दिखाई दी।

     

    राघव ने चौंककर खिड़की की तरफ देखा।

     

    कुछ नहीं था।

     

    उसने पर्दा हटाया।

     

    नीचे पूरी गली खाली थी।

     

    सड़क की लाइट के नीचे एक आवारा कुत्ता बैठा था, लेकिन वह भी ऊपर आसमान की तरफ देख रहा था।

     

    राघव के शरीर में हल्की सिहरन दौड़ गई।

     

    “अजीब है…”

     

    उसी समय पीछे से नंदिनी की आवाज आई।

     

    “भैया?”

     

    राघव पलटा।

     

    नंदिनी दरवाज़े पर खड़ी थी।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आपने भी आवाज सुनी?”

     

    “कौन-सी आवाज?”

     

    नंदिनी ने छत की तरफ इशारा किया।

     

    “ऊपर कोई चल रहा है।”

     

    राघव कुछ बोलता, उससे पहले फिर आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    जैसे किसी के नंगे पैर सीमेंट की फर्श पर पड़ रहे हों।

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा, “क्या ऊपर कोई है?”

     

    राघव ने कहा, “नहीं। माँ नीचे हैं और पड़ोसी अपने घर में। शायद बिल्ली होगी।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया, लेकिन उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “भैया… मुझे बिल्ली के कदम इतने भारी नहीं लगते।”

     

    राघव ने टॉर्च उठाई।

     

    “चलो देखते हैं।”

     

    दोनों सीढ़ियों से ऊपर जाने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे छत के करीब पहुँच रहे थे, आवाज बंद हो गई।

     

    राघव ने दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

     

    एक पल के लिए उसने सोचा कि वापस चला जाए।

     

    फिर उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    छत खाली थी।

     

    ठंडी हवा चल रही थी।

     

    पानी की टंकी के पास कुछ सूखे पत्ते पड़े थे।

     

    स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद था।

     

    राघव ने टॉर्च चारों तरफ घुमाई।

     

    “देखा? कोई नहीं है।”

     

    नंदिनी ने राहत की सांस ली।

     

    तभी…

     

    टंकी के पीछे से एक छोटी-सी आवाज आई।

     

    छन्न…

     

    जैसे किसी ने कांच की चीज़ गिरा दी हो।

     

    दोनों वहीं रुक गए।

     

    राघव धीरे-धीरे टंकी की तरफ बढ़ा।

     

    पीछे जाकर देखा तो वहाँ कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ फर्श पर एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

     

    नंदिनी ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    राघव ने तुरंत उसका हाथ रोक दिया।

     

    “मत छूना।”

     

    “क्यों?”

     

    राघव खुद नहीं जानता था।

     

    उसने पायल को टॉर्च की रोशनी में देखा।

     

    उस पर काले रंग की मिट्टी लगी हुई थी।

     

    और सबसे अजीब बात…

     

    पायल बिल्कुल गीली थी।

     

    जबकि छत पूरी तरह सूखी थी।

     

    “चलो नीचे,” राघव ने कहा।

     

    दोनों वापस कमरे में आ गए।

     

    लेकिन उस रात किसी को नींद नहीं आई।

     

    सुबह राघव ने पायल माँ को दिखाई।

     

    पायल देखते ही माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उन्होंने उसे हाथ में लेने से इनकार कर दिया।

     

    “इसे घर से बाहर फेंक दो।”

     

    राघव ने पूछा, “आप इसे पहचानती हैं?”

     

    माँ कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “नहीं।”

     

    “माँ, आप झूठ बोल रही हैं।”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आँखों में डर था।

     

    “कुछ चीज़ों के बारे में जितना कम जानो, उतना अच्छा है।”

     

    उस रात राघव ने पायल घर से बाहर फेंक दी।

     

    लेकिन अगले दिन सुबह वही पायल फिर छत पर पड़ी मिली।

     

    इस बार वह पानी की टंकी के ठीक सामने थी।

     

    राघव ने उसे उठाया और गुस्से में नाली के बाहर फेंक दिया।

     

    नंदिनी ने कहा, “भैया, इसे किसी नदी में फेंक दो।”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रात आई।

     

    11:45 बजे तक सब सो चुके थे।

     

    राघव भी बिस्तर पर लेट गया।

     

    अचानक…

     

    ठक…

     

    उसकी आँख खुल गई।

     

    ठक… ठक…

     

    वही आवाज।

     

    लेकिन इस बार आवाज छत से नहीं आ रही थी।

     

    वह उसके कमरे की छत से आ रही थी।

     

    राघव बिस्तर पर बैठ गया।

     

    कुछ सेकंड बाद उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके कमरे की छत पर चल रहा हो।

     

    धीरे…

     

    बहुत धीरे…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने मोबाइल उठाया और समय देखा।

     

    12:13 AM.

     

    तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

     

    मैसेज में सिर्फ चार शब्द थे—

     

    “ऊपर मत आना। वो जाग गई है।”

     

    राघव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने तुरंत नंबर पर कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    तभी नंदिनी चीखती हुई उसके कमरे में आई।

     

    “भैया!”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “छत पर कोई है!”

     

    राघव ने पूछा, “तुमने देखा?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कौन था?”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    “एक औरत…”

     

    “कैसी औरत?”

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा—

     

    “उसका चेहरा नहीं था।”

     

    उसी क्षण ऊपर से किसी चीज़ के घिसटने की आवाज आई।

     

    घ्र्र्र्र…

     

    फिर…

     

    छत का दरवाज़ा अपने आप बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    राघव और नंदिनी एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    और तभी…

     

    ऊपर से किसी औरत की बहुत धीमी आवाज आई—

     

    “राघव…”

     

    राघव का खून जम गया।

     

    क्योंकि वह आवाज…

     

    उसके पिता की मृत्यु के बाद से उसकी माँ की नहीं, बल्कि उसकी मरी हुई बहन की आवाज़ जैसी थी।

     

    उसकी बहन की मृत्यु दस साल पहले हो चुकी थी।

     

    और उस रात पहली बार राघव को समझ आया—

     

    छत पर कोई था।

     

    और शायद…

     

    वह कई सालों से वहीं था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 3: आखिरी फैसला और सीख)

     

    रघु का पूरा घर डर से काँप रहा था।

     

    दीवार से निकलती काली शाखाएँ धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थीं। बच्चों की चीखें सुनकर सीता उन्हें लेकर दूसरे कमरे में चली गई।

     

    रघु को हरिया की बात याद आई—

     

    “वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

     

    उसे समझ आ गया कि अगर इस श्राप को खत्म करना है, तो उसे वापस उसी जंगल में जाना होगा।

     

    लेकिन इस बार अकेले नहीं।

     

    सुबह होते ही रघु हरिया के पास गया।

     

    हरिया ने उसकी बात सुनी और बोला,

    “इस श्राप को खत्म करने का एक ही रास्ता है।”

     

    “क्या?”

     

    “जिस कुल्हाड़ी से तुमने पेड़ पर पहला वार किया था, उसी से आखिरी वार करना होगा।”

     

    रघु ने पूछा,

    “लेकिन मैं उस पेड़ को काटूँगा तो श्राप खत्म कैसे होगा?”

     

    हरिया बोला,

    “पेड़ को काटना नहीं है। उसके तने में जहाँ से खून निकला था, वहाँ जमीन के अंदर एक पुराना पत्थर दबा है। वही इस श्राप की जड़ है।”

     

    “उसे कैसे निकालेंगे?”

     

    हरिया ने कहा,

    “जिसने लालच में पहला वार किया था, वही अपनी गलती स्वीकार करके उस पत्थर को वापस जमीन में दबाएगा। तभी दरवाजा बंद होगा।”

     

    रघु ने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और हरिया के साथ जंगल की ओर चल पड़ा।

     

    जैसे ही दोनों काले बरगद के पास पहुँचे, हवा तेज हो गई।

     

    पेड़ की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    लेकिन आसपास हवा नहीं चल रही थी।

     

    अचानक पेड़ के तने से आवाज आई—

     

    “रघु…”

     

    रघु रुक गया।

     

    आवाज फिर आई—

     

    “तुम्हारे बच्चों को बचाना है?”

     

    रघु ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    पेड़ बोला—

     

    “तो अपनी कुल्हाड़ी यहाँ छोड़ दो और चले जाओ।”

     

    रघु कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मैं तुम्हारे सामने अपनी गलती मानता हूँ। मैंने लालच में आकर तुम्हें काटा। लेकिन अब मैं किसी और को नुकसान नहीं होने दूँगा।”

     

    अचानक पेड़ जोर से हिलने लगा।

     

    उसकी शाखाओं से काले धुएँ जैसी चीज निकलने लगी।

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “जल्दी! तने के नीचे!”

     

    रघु ने जमीन खोदनी शुरू की।

     

    कुछ ही देर में उसकी कुल्हाड़ी किसी कठोर चीज से टकराई।

     

    टन!

     

    मिट्टी हटाने पर एक काला पत्थर दिखाई दिया।

     

    उस पत्थर पर कई पुराने नाम खुदे हुए थे।

     

    हरिया ने उन नामों को देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “ये वही लोग हैं… जो इस जंगल में गायब हुए थे।”

     

    रघु ने पत्थर उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन पत्थर बहुत भारी था।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “रघु…”

     

    उसने पीछे देखा।

     

    वहाँ उसकी बेटी गुड़िया खड़ी थी।

     

    रघु घबरा गया।

     

    “तुम यहाँ कैसे आई?”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “बाबा, मेरे साथ घर चलो।”

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “उसके पास मत जाना!”

     

    रघु ने ध्यान से देखा।

     

    वह गुड़िया जैसी दिख रही थी, लेकिन उसके पैरों के नीचे परछाई नहीं थी।

     

    रघु पीछे हट गया।

     

    वह आकृति अचानक डरावनी आवाज में हँसने लगी।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    आँखें काली हो गईं और शरीर धुएँ में बदलने लगा।

     

    पेड़ की शाखाएँ रघु की तरफ झपटने लगीं।

     

    हरिया ने कुल्हाड़ी से एक शाखा काट दी।

     

    उसी क्षण पेड़ से भयानक चीख निकली।

     

    रघु ने पूरी ताकत लगाकर काला पत्थर बाहर खींच लिया।

     

    जैसे ही पत्थर बाहर आया, जमीन के नीचे से तेज हवा निकलने लगी।

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “इसे वापस रख!”

     

    रघु ने पत्थर को उसी गड्ढे में वापस रख दिया।

     

    लेकिन इस बार उसने उसे मिट्टी से पूरी तरह ढक दिया।

     

    अचानक सब शांत हो गया।

     

    पेड़ की शाखाएँ रुक गईं।

     

    हवा बंद हो गई।

     

    और फिर काले बरगद की छाल पर बनी लाल धारियाँ धीरे-धीरे गायब होने लगीं।

     

    रघु ने देखा कि पेड़ की एक शाखा टूटकर जमीन पर गिर गई।

     

    उस शाखा के नीचे वही पुरानी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

     

    रघु ने उसे उठाया और पेड़ से कहा—

     

    “मुझे माफ करना।”

     

    कुछ पल तक कोई आवाज नहीं आई।

     

    फिर पेड़ के अंदर से बहुत धीमी आवाज आई—

     

    “लालच से लिया था… समझदारी से लौटाया।”

     

    इसके बाद पेड़ बिल्कुल शांत हो गया।

     

    रघु और हरिया गाँव वापस लौट आए।

     

    घर पहुँचकर रघु ने देखा कि दीवार की सारी काली दरारें गायब हो चुकी थीं।

     

    उसके बच्चे सुरक्षित थे।

     

    गाँव वालों ने जब पूरी घटना सुनी तो उन्होंने जंगल के उस हिस्से के चारों ओर पत्थरों की सीमा बना दी।

     

    काले बरगद को किसी ने फिर कभी नहीं छुआ।

     

    कई साल बीत गए।

     

    रघु ने भी लकड़ी काटने का काम छोड़ दिया और गाँव में छोटी-सी दुकान खोल ली।

     

    उसने अपने बच्चों को हमेशा एक बात सिखाई—

     

    “जरूरत इंसान को मेहनत करने के लिए मजबूर कर सकती है, लेकिन लालच उसे गलत रास्ते पर ले जाता है।”

     

    कभी-कभी गाँव के लोग कहते थे कि अमावस्या की रात काले बरगद के पास से गुजरते समय अब भी किसी के कुल्हाड़ी रखने की आवाज सुनाई देती है।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    लेकिन कोई वहाँ जाने की हिम्मत नहीं करता।

     

    और बरवा गाँव में आज भी बुजुर्ग बच्चों को एक बात बताते हैं—

     

    सीख

     

    प्रकृति हमारे जीवन का हिस्सा है। अपनी जरूरत पूरी करने और लालच में फर्क समझना जरूरी है। हमें पेड़-पौधों और जंगलों का सम्मान करना चाहिए। किसी चेतावनी को सिर्फ अंधविश्वास समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब उसके पीछे पुराने अनुभव और किसी की सुरक्षा जुड़ी हो।

     

    क्योंकि कभी-कभी इंसान जिस चीज़ को अपना अधिकार समझकर छीन लेता है, वही चीज़ उसके लिए मुसीबत बन जाती है।

     

    और अगर आप कभी किसी पुराने जंगल में जाएँ…

     

    जहाँ सब लोग आपको किसी एक पेड़ से दूर रहने को कहें…

     

    तो याद रखना—

     

    हर पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होता। कुछ पेड़ अपने अंदर पूरी कहानी छिपाए बैठे होते हैं। 🌳👻

     

     

    End

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 2: जंगल की वापसी)

     

    सुबह जब रघु की आँख खुली तो उसकी हालत देखकर सीता घबरा गई।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था और आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे।

     

    सीता ने पूछा,

    “क्या हुआ तुम्हें?”

     

    रघु ने रात की पूरी घटना बता दी।

     

    सीता कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने कहा,

    “आज जंगल मत जाना।”

     

    रघु ने हामी भर दी।

     

    लेकिन उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    रघु ने दरवाजा खोला तो सामने गाँव का बूढ़ा हरिया खड़ा था।

     

    हरिया ने रघु को देखते ही पूछा,

    “तू कल जंगल गया था?”

     

    रघु चौंक गया।

     

    “हाँ… लेकिन आपको कैसे पता?”

     

    हरिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

    “तू काले बरगद के पास गया था।”

     

    रघु के शरीर में ठंड दौड़ गई।

     

    हरिया ने अंदर आकर दरवाजा बंद किया।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा,

    “मैंने तुझे मना नहीं किया था, क्योंकि मुझे लगा था तू गाँव की बात मानेगा। लेकिन अब देर हो चुकी है।”

     

    रघु ने पूछा,

    “उस पेड़ में क्या है?”

     

    हरिया ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा,

    “वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

     

    रघु ने घबराकर पूछा,

    “किसका दरवाजा?”

     

    हरिया बोला,

    “जिस चीज़ का नाम लेना भी गाँव में मना है।”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    उस दिन के बाद अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।

     

    गाँव की गायें रात में अचानक जंगल की ओर देखकर रंभाने लगीं। कुएँ का पानी लाल रंग का दिखाई देने लगा। कई घरों के बाहर सुबह गीली मिट्टी में पैरों के निशान मिलते।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    हर रात ठीक बारह बजे, पूरे गाँव में कुल्हाड़ी चलने की आवाज आती।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    लेकिन कोई लकड़ी नहीं काट रहा था।

     

    तीसरी रात रघु की बेटी गुड़िया अचानक नींद में उठकर दरवाजे की ओर चलने लगी।

     

    सीता ने उसे पकड़ लिया।

     

    गुड़िया की आँखें बंद थीं।

     

    वह नींद में बोल रही थी—

     

    “माँ… जंगल में दादी बुला रही हैं।”

     

    सीता का दिल बैठ गया।

     

    उनकी बेटी की दादी को मरे हुए छह साल हो चुके थे।

     

    सीता ने उसे जोर से हिलाया।

     

    गुड़िया की आँखें खुलीं।

     

    वह रोते हुए बोली,

    “माँ, बाहर कोई मुझे बुला रहा था।”

     

    रघु ने उसी समय तय कर लिया कि उसे हरिया से सच जानना होगा।

     

    अगली सुबह वह हरिया के घर पहुँचा।

     

    बहुत पूछने पर हरिया ने पुरानी लकड़ी की एक संदूकची निकाली।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में करीब पचास साल पहले का वही काला बरगद दिखाई दे रहा था।

     

    पेड़ के सामने तीन लकड़हारे खड़े थे।

     

    हरिया ने तस्वीर में बीच वाले आदमी की तरफ इशारा किया।

     

    “यह मेरा बड़ा भाई था।”

     

    रघु चुप रहा।

     

    हरिया बोला,

    “उस समय गाँव में अकाल पड़ा था। मेरे भाई और दो दूसरे लकड़हारे उस पेड़ को काटने गए थे। उन्होंने पहला वार किया तो पेड़ से खून निकला। दूसरा वार किया तो मेरे भाई ने अपनी ही आवाज में किसी को चीखते सुना।”

     

    “फिर?”

     

    “उस रात तीनों घर लौट आए। लेकिन अगले दिन मेरे भाई की परछाई गायब थी।”

     

    रघु की आँखें फैल गईं।

     

    “परछाई?”

     

    हरिया ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। धूप में भी उसकी परछाई जमीन पर नहीं पड़ती थी।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    हरिया की आवाज काँपने लगी।

     

    “सात दिन बाद वह जंगल में चला गया। जाते-जाते उसने कहा था—‘पेड़ भूखा है।’”

     

    रघु ने पूछा,

    “उसे रोक क्यों नहीं लिया?”

     

    हरिया बोला,

    “क्योंकि उस समय तक गाँव के चार लोग गायब हो चुके थे।”

     

    अचानक बाहर से किसी बच्चे के चीखने की आवाज आई।

     

    दोनों दौड़कर बाहर निकले।

     

    रघु का बेटा मोहन सड़क के किनारे खड़ा था।

     

    उसके सामने जंगल की दिशा में एक काली परछाई थी।

     

    हरिया ने चिल्लाकर कहा,

    “मोहन को पीछे खींच!”

     

    रघु दौड़ा।

     

    जैसे ही उसने मोहन का हाथ पकड़ा, वह काली परछाई गायब हो गई।

     

    मोहन रोते हुए बोला,

    “बाबा, वह आदमी मुझे जंगल ले जाने आया था।”

     

    “कैसा आदमी?”

     

    मोहन ने जवाब दिया—

     

    “उसके चेहरे पर चेहरा नहीं था।”

     

    रघु के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उस रात रघु ने घर के सभी दरवाजे बंद कर दिए।

     

    लेकिन ठीक बारह बजे खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सीता बच्चों को लेकर अंदर चली गई।

     

    रघु ने खिड़की नहीं खोली।

     

    तभी बाहर से उसकी अपनी आवाज आई—

     

    “रघु… दरवाजा खोल।”

     

    रघु जम गया।

     

    वह आवाज बिल्कुल उसकी थी।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “मैं जंगल से वापस आ गया हूँ।”

     

    रघु ने काँपते हुए सीता का हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    कुछ देर शांति रही।

     

    फिर बाहर से किसी के हँसने की आवाज आई।

     

    धीरे-धीरे वह हँसी तेज होती गई।

     

    और अचानक दरवाजे पर कुल्हाड़ी का वार हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    लकड़ी में गहरा निशान पड़ गया।

     

    दूसरा वार।

     

    धड़ाम!

     

    तीसरा वार।

     

    धड़ाम!

     

    बच्चे चीखने लगे।

     

    रघु ने खिड़की से बाहर देखने की कोशिश की।

     

    दरवाजे के सामने कोई खड़ा था।

     

    उसका शरीर इंसान जैसा था।

     

    हाथ में कुल्हाड़ी थी।

     

    लेकिन उसके चेहरे की जगह सिर्फ काली खाली जगह थी।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    उसकी जमीन पर कोई परछाई नहीं थी।

     

    अचानक वह आकृति खिड़की की तरफ मुड़ी।

     

    रघु पीछे हट गया।

     

    उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “पेड़ की एक शाखा काटी थी… अब पूरा घर देना होगा।”

     

    रघु ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर एक काली दरार बन चुकी थी।

     

    वह दरार धीरे-धीरे फैल रही थी।

     

    और उसके अंदर से जंगल के पेड़ों जैसी शाखाएँ बाहर निकल रही थीं।

     

    रघु समझ गया—

     

    अब खतरा सिर्फ जंगल में नहीं था।

     

    जंगल उसके घर तक आ चुका था।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 जिस पेड़ को काटना मना था 😱(A COMPLETE Horror Story)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 1: जंगल की मनाही)

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव बरवा के किनारे एक घना जंगल था। गाँव के लोग उस जंगल से लकड़ी, फल और सूखी टहनियाँ लाकर अपना गुजारा करते थे। लेकिन जंगल के बीचों-बीच एक ऐसा पेड़ था, जिसके पास जाने से भी लोग डरते थे।

     

    वह पेड़ बाकी पेड़ों से बिल्कुल अलग था।

     

    उसका तना इतना मोटा था कि उसे चार आदमी मिलकर भी घेर नहीं सकते थे। उसकी शाखाएँ ऊपर जाकर पूरे आसमान को ढक लेती थीं। दिन में भी उसके नीचे अजीब-सा अँधेरा रहता था। पेड़ की छाल काली थी और उस पर लाल रंग की नसों जैसी धारियाँ दिखाई देती थीं।

     

    गाँव के बुजुर्ग उसे “काला बरगद” कहते थे।

     

    कहा जाता था कि लगभग पचास साल पहले एक लकड़हारा उस पेड़ को काटने गया था। वह वापस तो आया, लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की। कुछ दिनों बाद उसने अपना घर छोड़ दिया और जंगल में गायब हो गया।

     

    तब से गाँव में एक नियम था—

     

    “काले बरगद को कोई हाथ नहीं लगाएगा।”

     

    लेकिन गरीबी इंसान से कई बार वह काम करवा देती है, जिससे वह डरता है।

     

    गाँव में रहने वाला रघु एक गरीब लकड़हारा था। उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। कई दिनों से उसे जंगल में सूखी लकड़ी कम मिल रही थी। घर में अनाज खत्म होने वाला था और उसकी पत्नी सीता बार-बार बच्चों की तरफ देखकर चिंतित हो जाती थी।

     

    एक शाम सीता ने धीरे से कहा,

    “रघु, कल बच्चों के लिए कुछ आटा ले आना। घर में बस आज रात का खाना बचा है।”

     

    रघु ने चुपचाप सिर हिला दिया।

     

    अगली सुबह वह अपनी पुरानी कुल्हाड़ी लेकर जंगल चला गया।

     

    काफी देर तक घूमने के बाद उसे एक भी अच्छी लकड़ी नहीं मिली। अचानक उसकी नजर काले बरगद पर पड़ी।

     

    वह कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    उसके मन में विचार आया—

    “अगर इसकी एक बड़ी शाखा काट लूँ तो कई दिनों की लकड़ी मिल जाएगी।”

     

    उसे गाँव की मनाही याद थी।

     

    फिर बच्चों के भूखे चेहरे उसकी आँखों के सामने आ गए।

     

    रघु ने खुद से कहा,

    “मैं पूरा पेड़ थोड़े ही काट रहा हूँ। बस एक शाखा।”

     

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

     

    जैसे ही उसने पहला कदम उसकी छाया में रखा, जंगल की सारी आवाजें बंद हो गईं।

     

    न पक्षियों की आवाज।

     

    न हवा की सरसराहट।

     

    न पत्तों की आवाज।

     

    पूरा जंगल जैसे अचानक मर गया था।

     

    रघु के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसने ऊपर देखा।

     

    काले बरगद की एक मोटी शाखा उसके ठीक ऊपर थी।

     

    उसने कुल्हाड़ी उठाई।

     

    ठक!

     

    पहला वार हुआ।

     

    पेड़ से कोई आवाज नहीं आई।

     

    दूसरा वार—

     

    ठक!

     

    तीसरा वार—

     

    ठाऽऽक!

     

    अचानक पेड़ के अंदर से ऐसी आवाज आई जैसे किसी ने बहुत दूर से कराहते हुए कहा हो—

     

    “मत काटो…”

     

    रघु के हाथ से कुल्हाड़ी छूटते-छूटते बची।

     

    वह पीछे हट गया।

     

    उसने चारों तरफ देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    “शायद मेरा भ्रम है,” उसने खुद को समझाया।

     

    उसने कुल्हाड़ी फिर उठाई।

     

    तभी उसके पीछे सूखे पत्तों पर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    रघु ने पीछे देखा।

     

    कुछ नहीं।

     

    आवाज बंद।

     

    वह फिर पेड़ की तरफ मुड़ा।

     

    अब उसकी शाखा पर कुछ लाल दिखाई दे रहा था।

     

    पहले रघु को लगा कि वह पेड़ का रस है।

     

    लेकिन जब वह पास गया तो उसकी साँस अटक गई।

     

    वह लाल तरल खून जैसा था।

     

    और वह तने से धीरे-धीरे नीचे बह रहा था।

     

    रघु डर गया।

     

    उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंकी और भागने लगा।

     

    लेकिन कुछ दूर जाकर उसे अपने पीछे वही आवाज सुनाई दी—

     

    “कुल्हाड़ी… छोड़कर कहाँ जा रहे हो?”

     

    रघु के पैरों की रफ्तार बढ़ गई।

     

    वह पीछे देखने की हिम्मत नहीं कर पाया।

     

    जंगल से बाहर निकलते ही उसे लगा कि अब वह सुरक्षित है।

     

    लेकिन घर पहुँचकर उसने देखा कि उसकी कुल्हाड़ी उसके हाथ में थी।

     

    वह घबरा गया।

     

    उसे याद था कि उसने कुल्हाड़ी पेड़ के पास ही छोड़ दी थी।

     

    उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंक दी।

     

    रात को जब पूरा परिवार सो गया, रघु की आँख अचानक खुली।

     

    कमरे में अँधेरा था।

     

    उसे लगा जैसे कोई खिड़की के बाहर खड़ा है।

     

    उसने ध्यान से सुना।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही आवाज।

     

    जैसे कोई कुल्हाड़ी से पेड़ काट रहा हो।

     

    रघु ने खिड़की खोली।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन मिट्टी पर गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान दरवाजे से शुरू होकर सीधे उसके घर के अंदर जा रहे थे।

     

    रघु का गला सूख गया।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे के कोने में उसकी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

     

    उसकी धार पर ताजा लाल खून लगा था।

     

    और तभी अँधेरे में एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “एक वार तुमने किया था… अब एक वार मेरी बारी है…”

     

    रघु चीखना चाहता था।

     

    लेकिन उसकी आवाज गले में ही अटक गई।

     

    उस रात के बाद बरवा गाँव में कुछ ऐसा होने वाला था, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

     

    क्योंकि रघु ने सिर्फ एक पेड़ को नहीं छेड़ा था।

     

    उसने जंगल के अंदर सोई हुई किसी चीज़ को जगा दिया था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • मदहोश भिखारी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    मदहोश भिखारी

     

    शहर के पुराने हिस्से में एक चौराहा था, जहां हर सुबह भीड़ जमा होती थी। उसी चौराहे के किनारे एक बूढ़ा भिखारी बैठा रहता था। लोग उसे मदहोश बाबा कहते थे।

     

    उसके कपड़े पुराने थे, बाल बिखरे रहते और हाथ में हमेशा मिट्टी का एक छोटा-सा प्याला रहता। वह दिनभर कभी मुस्कुराता, कभी खुद से बातें करता और कभी आने-जाने वालों को ऐसी बातें कह देता जिनका मतलब किसी को समझ नहीं आता।

     

    लोग उसका मजाक उड़ाते।

     

    “देखो, फिर मदहोश हो गया।”

     

    “इससे दूर रहना, पता नहीं क्या बड़बड़ाता रहता है।”

     

    लेकिन कोई नहीं जानता था कि उस बूढ़े के पीछे एक ऐसा राज छिपा था, जिसे जानकर पूरा शहर हैरान होने वाला था।

     

    एक सुबह शहर का बड़ा व्यापारी रतनलाल अपनी कार से उसी चौराहे से गुजर रहा था।

     

    भिखारी ने अचानक कार के सामने हाथ उठा दिया।

     

    ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिया।

     

    रतनलाल गुस्से में बाहर आया।

     

    “अरे पागल! रास्ता क्यों रोक रहा है?”

     

    भिखारी मुस्कुराया।

     

    “रास्ता मैंने नहीं रोका सेठ… रास्ता तो तुम्हारे कर्मों ने रोका है।”

     

    रतनलाल चौंक गया।

     

    “क्या बकवास कर रहे हो?”

     

    भिखारी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “जिस जमीन पर तुम अपना नया महल बना रहे हो, उसके नीचे किसी गरीब की बद्दुआ दबी है।”

     

    रतनलाल का चेहरा बदल गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    भिखारी हंसने लगा।

     

    “जिस शहर में लोग आंखें बंद करके चलते हैं, वहां सच देखने के लिए आंखों की नहीं, यादों की जरूरत होती है।”

     

    रतनलाल वहां से चला गया, लेकिन भिखारी की बात उसके मन में अटक गई।

     

    कुछ दिन बाद शहर में खबर फैली कि रतनलाल के निर्माण स्थल की जमीन का पुराना मालिक एक गरीब किसान था, जिसकी जमीन धोखे से हड़पी गई थी।

     

    लोगों को पहली बार मदहोश बाबा की बात याद आई।

     

    इसी बीच शहर में रहने वाली मीरा नाम की एक छोटी लड़की रोज उस भिखारी को खाना देने लगी।

     

    एक दिन उसने पूछा—

     

    “बाबा, लोग आपको मदहोश क्यों कहते हैं?”

     

    भिखारी मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं उस चीज में मदहोश हूं जो उन्हें दिखाई नहीं देती।”

     

    “क्या?”

     

    “सच में।”

     

    मीरा हंस पड़ी।

     

    “सच भी कोई नशा है?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “दुनिया के सारे नशे उतर जाते हैं बेटी, लेकिन सच का नशा इंसान को अंदर से जगा देता है।”

     

    मीरा को उसकी बातें अच्छी लगती थीं।

     

    एक शाम अचानक शहर के पुराने मंदिर में चोरी हो गई। मंदिर की दानपेटी गायब थी।

     

    पुलिस ने कई लोगों से पूछताछ की, लेकिन चोर का पता नहीं चला।

     

    अगली सुबह मदहोश बाबा ने चौराहे पर बैठे-बैठे कहा—

     

    “जिसने मंदिर से लिया है, वह उसे वापस करेगा।”

     

    लोग हंसने लगे।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    बाबा ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि जिसने भगवान के घर से चोरी की है, उसके घर में चैन नहीं रहेगा।”

     

    उस रात मंदिर की दानपेटी वापस मंदिर के पीछे रखी मिली।

     

    सभी हैरान रह गए।

     

    अब लोगों ने बाबा की बातों को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया।

     

    लेकिन शहर का नया पुलिस अधिकारी विजय उस पर विश्वास नहीं करता था।

     

    उसने कहा—

     

    “यह आदमी कोई चाल चल रहा है। इसकी जांच होनी चाहिए।”

     

    विजय ने बाबा के पुराने सामान की तलाशी ली।

     

    उसे एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “रघुवीर सिंह, पुलिस विभाग।”

     

    विजय के हाथ रुक गए।

     

    रघुवीर सिंह नाम उसके पिता की पुरानी फाइलों में था।

     

    बीस साल पहले एक ईमानदार पुलिस अधिकारी रघुवीर अचानक गायब हो गए थे।

     

    विजय ने तुरंत बाबा से पूछा—

     

    “तुम्हारा असली नाम क्या है?”

     

    बूढ़ा चुप रहा।

     

    विजय ने फिर पूछा—

     

    “क्या तुम रघुवीर सिंह हो?”

     

    बूढ़े ने धीरे से सिर उठा लिया।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    “हां।”

     

    विजय के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “लेकिन आप बीस साल से कहां थे?”

     

    रघुवीर ने लंबी सांस ली।

     

    “मैंने शहर के सबसे बड़े अपराधियों का सच पकड़ लिया था। लेकिन जिन लोगों के खिलाफ सबूत थे, वे बहुत ताकतवर थे। उन्होंने मुझे खत्म करने की कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं बच गया, लेकिन दुनिया से गायब हो गया।”

     

    विजय ने पूछा—

     

    “फिर भिखारी बनकर क्यों रहे?”

     

    रघुवीर मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि जब मैं वर्दी में था, लोग मेरी बात सुनते थे। लेकिन जब मैं भिखारी बना, लोगों ने मुझे पागल समझ लिया। तब मैंने शहर के सबसे बड़े राज अपनी आंखों से देखे।”

     

    विजय ने डायरी खोली।

     

    उसमें शहर के कई बड़े अपराधियों के नाम थे।

     

    रतनलाल का नाम भी था।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “बीस साल पहले जो लोग गरीबों की जमीन हड़पते थे, आज वही शहर के मालिक बने बैठे हैं।”

     

    विजय ने तुरंत जांच शुरू कर दी।

     

    कुछ ही दिनों में पुराने दस्तावेज, गवाह और सबूत सामने आने लगे।

     

    रतनलाल समेत कई बड़े लोगों के पुराने अपराध सामने आ गए।

     

    शहर में हड़कंप मच गया।

     

    लोग उसी चौराहे पर जमा हुए जहां कभी वे मदहोश बाबा का मजाक उड़ाते थे।

     

    रघुवीर वहीं बैठा था।

     

    मीरा उसके पास आकर बोली—

     

    “बाबा, अब लोग आपको पागल नहीं कहेंगे।”

     

    रघुवीर मुस्कुराया।

     

    “लोग क्या कहते हैं, उससे क्या फर्क पड़ता है?”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “फिर फर्क किससे पड़ता है?”

     

    रघुवीर ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा—

     

    “इससे कि जब पूरी दुनिया गलत रास्ते पर जा रही हो, तब भी तुम सही रास्ते पर चलो।”

     

    कुछ दिनों बाद रघुवीर को उसकी पुरानी पहचान और सम्मान वापस मिला।

     

    लेकिन उसने फिर से वर्दी पहनने से इनकार कर दिया।

     

    वह उसी चौराहे पर बैठा रहा।

     

    बस अब लोग उसे भीख नहीं देते थे।

     

    लोग उसके पास अपनी परेशानियां लेकर आते थे।

     

    और वह हर किसी से बस एक ही बात कहता—

     

    “मुझे मदहोश मत समझना… मैं दुनिया के झूठ को देखकर सच के नशे में हूं।”

     

    समय बीतता गया।

     

    चौराहे पर अब भी वह बूढ़ा बैठता था।

     

    लेकिन अब कोई उसे पागल नहीं कहता था।

     

    क्योंकि शहर को समझ आ चुका था—

     

    कभी-कभी जिस इंसान को दुनिया सबसे ज्यादा बेवकूफ समझती है…

     

    वही इंसान सबसे ज्यादा सच देख रहा होता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कोयल की मीठी आवाज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कोयल की मधुर आवाज और सुबह का रहस्य

     

    हरे-भरे पेड़ों और छोटे-छोटे खेतों के बीच बसा था सुरमई गांव। गांव छोटा था, लेकिन वहां के लोग बहुत खुश रहते थे। शाम होते ही बच्चे खेलकर घर लौट आते और बुजुर्ग चौपाल पर बैठकर बातें करने लगते।

     

    लेकिन एक दिन गांव में एक अजीब-सी कोयल आ गई।

     

    वह कोयल बाकी कोयलों जैसी नहीं थी। उसकी आवाज इतनी मीठी थी कि जो भी उसे सुनता, कुछ ही देर में उसे नींद आने लगती।

     

    पहली बार उसकी आवाज गांव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ से सुनाई दी।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    पास खेल रहे बच्चों ने अचानक खेलना बंद कर दिया।

     

    एक बच्चा बोला, “मुझे बहुत नींद आ रही है।”

     

    कुछ ही मिनटों में बच्चे घर चले गए और सो गए।

     

    उस शाम गांव के लोगों ने भी वही आवाज सुनी।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    एक किसान अपनी पत्नी से बात कर रहा था।

     

    “आज खेत में पानी—”

    उसकी बात पूरी होने से पहले ही उसकी आंखें बंद होने लगीं।

    पत्नी ने पूछा, “क्या हुआ?”

    किसान ने जम्हाई लेते हुए कहा, “पता नहीं… बहुत नींद आ रही है।”

     

    कुछ ही देर में पूरा गांव सो गया।

     

    अगली सुबह जब लोगों की आंखें खुलीं तो सभी हैरान रह गए।

     

    किसी के घर का दरवाजा खुला था।

     

    किसी के आंगन में रखा अनाज गायब था।

     

    किसी के घर से चांदी के बर्तन नहीं थे।

     

    और सबसे हैरानी की बात…

     

    गांव के मुखिया के घर से उसकी पुरानी संदूकची गायब थी।

     

    मुखिया चिल्लाया, “रात को गांव में चोरी हुई है!”

     

    सभी लोग एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “लेकिन चोर आया कैसे?”

     

    “किसी ने आवाज तक नहीं सुनी।”

     

    “सबको इतनी गहरी नींद कैसे आ गई?”

     

    तभी एक बुजुर्ग बोले—

     

    “वह कोयल…”

     

    सबकी नजर उनकी तरफ गई।

     

    “कौन-सी कोयल?”

     

    “कल बरगद पर बैठी थी। उसकी आवाज सुनते ही सब सो गए थे।”

     

    गांव वालों को बात समझ आ गई।

     

    उस दिन से सभी ने तय किया कि रात होते ही कोई बरगद के पास नहीं जाएगा।

     

    लेकिन अगले दिन फिर वही हुआ।

     

    शाम होते ही कोयल ने गाना शुरू किया।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    एक-एक करके गांव वाले सोते चले गए।

     

    सुबह फिर कई घरों से सामान गायब था।

     

    अब गांव में डर फैल गया।

     

    गांव की बारह साल की लड़की गौरी इन सब बातों को ध्यान से देख रही थी।

     

    उसे विश्वास नहीं था कि एक छोटी-सी कोयल चोरी कर सकती है।

     

    उसने अपनी दादी से पूछा—

     

    “दादी, अगर कोयल चोरी नहीं करती तो उसकी आवाज सुनते ही सब क्यों सो जाते हैं?”

     

    दादी ने कहा, “शायद कोई उसकी आवाज का फायदा उठा रहा है।”

     

    गौरी की आंखें चमक उठीं।

     

    “मतलब चोर कोई इंसान है?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    उस रात गौरी ने सोने का नाटक किया।

     

    उसने अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखा।

     

    कुछ देर बाद बरगद के पेड़ से वही आवाज आई।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    गौरी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ देर बाद उसे बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    वह धीरे से खिड़की के पास पहुंची।

     

    एक आदमी गांव की गली में दबे पांव चल रहा था।

     

    उसके हाथ में कपड़े की बड़ी थैली थी।

     

    गौरी ने पहचानने की कोशिश की।

     

    अंधेरा होने के कारण चेहरा साफ नहीं दिखाई दे रहा था।

     

    वह आदमी सीधे मुखिया के घर की तरफ गया।

     

    गौरी तुरंत अपनी दादी को जगाने दौड़ी।

     

    लेकिन दादी भी गहरी नींद में थीं।

     

    गौरी ने अकेले ही उसका पीछा करने का फैसला किया।

     

    वह थोड़ी दूरी बनाकर उस आदमी के पीछे चलती रही।

     

    आदमी गांव से बाहर गया और पुराने खंडहर के पास पहुंच गया।

     

    वहां पहले से दो और आदमी मौजूद थे।

     

    एक ने पूछा—

     

    “आज क्या मिला?”

     

    चोर ने थैली जमीन पर रखी।

     

    “बहुत कुछ।”

     

    गौरी यह देखकर घबरा गई।

     

    अब उसे पूरा यकीन हो गया था कि गांव में चोरी कोयल नहीं, बल्कि ये लोग कर रहे हैं।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर एक अजीब चीज पर पड़ी।

     

    उनके पास एक छोटा-सा पिंजरा रखा था।

     

    पिंजरे के अंदर वही कोयल बैठी थी।

     

    गौरी समझ गई कि असली रहस्य क्या है।

     

    चोरों ने उस कोयल को पकड़ रखा था और उसकी मधुर आवाज का इस्तेमाल पूरे गांव को सुलाने के लिए कर रहे थे।

     

    गौरी चुपचाप वापस गांव की तरफ भागी।

     

    लेकिन रास्ते में उसका पैर पत्थर से टकरा गया।

     

    आवाज सुनकर चोरों ने पीछे देखा।

     

    “कौन है?”

     

    गौरी डरकर भागी।

     

    चोर उसके पीछे दौड़े।

     

    गौरी सीधे गांव के चौकीदार के घर पहुंची और जोर-जोर से दरवाजा पीटने लगी।

     

    “काका! जल्दी उठो!”

     

    चौकीदार ने दरवाजा खोला।

     

    गौरी ने सारी बात बता दी।

     

    कुछ ही देर में गांव के कई लोग इकट्ठे हो गए।

     

    सबने मिलकर खंडहर को घेर लिया।

     

    चोरों को भागने का मौका नहीं मिला।

     

    उनके पास गांव से चोरी किया हुआ सारा सामान भी बरामद हो गया।

     

    मुखिया ने पूछा—

     

    “इस कोयल को कहां से पकड़ा?”

     

    चोरों के सरदार ने सिर झुका लिया।

     

    “हमें जंगल में मिली थी। इसकी आवाज सुनकर हमें समझ आया कि इसके गाने से लोग तुरंत सो जाते हैं। फिर हमने इसे पकड़ लिया और गांव में चोरी करने लगे।”

     

    गांव वालों ने कोयल को आजाद कर दिया।

     

    वह उड़कर बरगद की सबसे ऊंची डाल पर जाकर बैठ गई।

     

    गौरी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब ये किसी को नहीं सुलाएगी।”

     

    लेकिन उसी समय कोयल ने गाना शुरू कर दिया।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    गांव वाले एक-दूसरे को देखकर हंसने लगे।

     

    इस बार किसी को नींद नहीं आई।

     

    क्योंकि अब उन्हें पता था कि उसकी आवाज में कोई जादू नहीं था।

     

    असल में चोरों ने गांव में ऐसी चीज मिला दी थी जिसकी खुशबू से लोगों को बहुत गहरी नींद आती थी।

     

    कोयल सिर्फ उनकी योजना का एक हिस्सा बन गई थी।

     

    उस दिन के बाद गांव वालों ने उस कोयल को अपने गांव की रक्षा करने वाली मान लिया।

     

    हर शाम वह बरगद पर बैठकर गाती।

     

    • बच्चे उसकी आवाज सुनकर खुश होते और बुजुर्ग कहते

    “देखो, हमारी मीठी आवाज वाली मेहमान आ गई।”

     

    गौरी रोज उसे दाना डालती।

     

    और कोयल भी जैसे गौरी को पहचानने लगी थी।

    लेकिन कई साल बाद भी सुरमई गांव में एक बात मशहूर रही

    “जिस रात कोयल ने पहली बार गाया था, पूरा गांव सो गया था… और जिस सुबह आंखें खुलीं, तब गांव वालों को समझ आया कि सबसे मीठी आवाज के पीछे छिपा सच कितना बड़ा हो सकता है।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • देश में मिला सच्चा प्यार

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जापानी लड़का जिसे भारत में सच्चा प्यार मिला

     

    हिरोतो जापान के टोक्यो शहर में रहता था। उम्र करीब तेईस साल थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे एक भारतीय कंपनी में छह महीने के प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका मिला। उसके परिवार ने उसे भारत जाने की खबर सुनकर बहुत सारी हिदायतें दीं।

     

    “खाने का ध्यान रखना।”

     

    “भीड़ में संभलकर रहना।”

     

    “और सबसे जरूरी… अपना काम पूरा करके जल्दी वापस आ जाना।”

     

    हिरोतो बस मुस्कुरा देता।

     

    उसे भारत के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। उसने फिल्मों और इंटरनेट पर भारत की कुछ तस्वीरें जरूर देखी थीं, लेकिन असली भारत कैसा है, यह उसे नहीं पता था।

     

    भारत पहुंचते ही उसे हर चीज नई लगी। अलग भाषा, अलग खाना, सड़क की भीड़, रंग-बिरंगे कपड़े और लोगों का एक-दूसरे से बेझिझक बात करना।

     

    शुरुआत में वह थोड़ा परेशान रहा।

     

    एक दिन ऑफिस जाते समय अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। हिरोतो सड़क किनारे खड़ा बारिश रुकने का इंतजार करने लगा।

     

    तभी उसके पास एक लड़की छाता लेकर आई।

     

    “आप जापान से हैं ना?”

     

    हिरोतो ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “हां… लेकिन आपको कैसे पता?”

     

    लड़की हंस पड़ी।

     

    “आपके ऑफिस का कार्ड उल्टा लगा हुआ है।”

     

    हिरोतो ने अपना कार्ड देखा और झेंप गया।

     

    “ओह… धन्यवाद।”

     

    लड़की का नाम अनाया था।

     

    वह पास के कॉलेज में पढ़ती थी और उसी रास्ते से रोज आती-जाती थी।

     

    अनाया ने अपना छाता थोड़ा उसकी तरफ करते हुए कहा, “बारिश में ऐसे खड़े रहेंगे तो पूरी तरह भीग जाएंगे।”

     

    हिरोतो ने कहा, “लेकिन आपका छाता छोटा है।”

     

    “तो क्या हुआ? थोड़ा आप भीगिए, थोड़ा मैं।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    वह उनकी पहली मुलाकात थी।

     

    इसके बाद वे अक्सर रास्ते में मिल जाते।

     

    कभी अनाया उससे हिंदी के शब्द सिखाती तो कभी हिरोतो उसे जापानी शब्द बताता।

     

    एक दिन अनाया ने पूछा, “तुम्हें भारत कैसा लग रहा है?”

     

    हिरोतो ने थोड़ी देर सोचकर कहा, “भारत… बहुत शोर वाला है।”

     

    अनाया ने आंखें बड़ी कर लीं।

     

    “बस?”

    हिरोतो मुस्कुराया।

    “और बहुत दिल वाला भी।”

    अनाया चुप हो गई।

    धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती गहरी होने लगी।

     

    हिरोतो को पहली बार महसूस हुआ कि वह भारत में अकेला नहीं है।

     

    जब उसे भारतीय खाना समझ नहीं आता, अनाया उसे बताती कि क्या खाना है। जब वह हिंदी बोलते हुए गलती करता, अनाया हंसती जरूर, लेकिन फिर सही शब्द भी सिखाती।

     

    एक दिन हिरोतो ने अनाया से कहा

    “मेरे जापान में बहुत दोस्त थे, लेकिन उनसे बात करते समय मुझे हमेशा लगता था कि मुझे खुद को सही साबित करना है।”

     

    अनाया ने पूछा, “और मेरे साथ?”

     

    “तुम्हारे साथ मुझे कुछ साबित नहीं करना पड़ता।”

     

    अनाया के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    कुछ महीनों में हिरोतो को एहसास हो गया कि अनाया उसके लिए सिर्फ दोस्त नहीं रही।

    लेकिन वह अपनी भावनाएं कहने से डरता था।

    उसे पता था कि उसका प्रोजेक्ट खत्म होने वाला है।

    आखिर वह दिन भी आ गया।

     

    हिरोतो को जापान लौटना था।

    उसने अपना सामान पैक कर लिया।

     

    आखिरी शाम वह उसी जगह गया जहां उसकी और अनाया की पहली मुलाकात हुई थी।

     

    बारिश फिर हो रही थी।

    कुछ देर बाद अनाया वहां आई।

    उसने हिरोतो को देखकर पूछा“तो… कल जा रहे हो?”

    हिरोतो ने सिर हिला दिया।

    “हां।”

    दोनों कुछ देर चुप रहे।

    फिर अनाया ने पूछा

    “तुम वापस आओगे?”

    हिरोतो ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर मैं कहूं कि तुम्हारी वजह से आना चाहता हूं?”

     

    अनाया की आंखों में नमी आ गई।

    “तो मैं कहूंगी… देर मत करना।”

    हिरोतो जापान चला गया

    लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी भारत उसके मन से नहीं निकला।

     

    वह अपने काम में व्यस्त रहता, लेकिन हर शाम अनाया से बात करता।

     

    दोनों के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी थी, मगर बातचीत में वह दूरी कभी महसूस नहीं होती थी।

     

    एक दिन हिरोतो के पिता ने पूछा

    “तुम भारत को इतना याद क्यों करते हो?”

    हिरोतो ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा

    “क्योंकि वहां मुझे एक ऐसा इंसान मिला, जिसके सामने मैं खुद को छिपाना नहीं चाहता।”

    पिता ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा

    “क्या तुम उससे प्यार करते हो?”

    हिरोतो ने पहली बार बिना झिझक जवाब दिया

    “हां।”

    कुछ महीनों बाद हिरोतो वापस भारत आया।

    इस बार छह महीने के प्रोजेक्ट के लिए नहीं।

    वह हमेशा के लिए यहां काम करने आया था।

    अनाया को इस बारे में कुछ पता नहीं था।

     

    एक शाम वह उसी पुराने रास्ते पर जा रही थी, जहां पहली बार दोनों मिले थे।

    अचानक पीछे से आवाज आई

    “बारिश में ऐसे अकेले चलोगी तो पूरी तरह भीग जाओगी।”

    अनाया ने पलटकर देखा।सामने हिरोतो खड़ा था।

    उसके हाथ में वही छोटा-सा छाता था।

    अनाया कुछ बोल नहीं पाई।

    “तुम… वापस आ गए?”

    हिरोतो मुस्कुराया।

    “मैंने कहा था ना… अगर भारत में मेरा कोई इंतजार कर रहा होगा, तो मैं जरूर लौटूंगा।”

     

    अनाया की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

    “और अगर मैं इंतजार नहीं करती?”

    हिरोतो ने मुस्कुराकर कहा“तो मैं तुम्हें ढूंढता।”

    अनाया हंस पड़ी।

    बारिश तेज हो गई।

    हिरोतो ने छाता उसकी तरफ बढ़ाया।

    “अबकी बार पूरा छाता तुम्हारा।”

    अनाया ने कहा“नहीं, आधा-आधा।”

    दोनों एक ही छाते के नीचे आगे बढ़ने लगे।

     

    हिरोतो को उस दिन समझ आया कि सच्चा प्यार हमेशा एक जैसी भाषा बोलने वालों के बीच नहीं मिलता।

     

    कभी-कभी दो लोग अलग देश, अलग संस्कृति और अलग भाषा से होते हैं…

     

    फिर भी उनके दिल एक-दूसरे को बिना किसी अनुवाद के समझ लेते हैं।

    और हिरोतो के लिए भारत अब सिर्फ एक देश नहीं था।

     

    यह वही जगह थी जहां उसे अपना घर नहीं मिला था…

     

    बल्कि अपना इंसान मिल गया था।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अंधेरी नगरी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    अंधेरी नगरी और कातिल निगाहें

     

    शहर का नाम था काली नगरी।

     

    दिन में यह शहर बाकी शहरों जैसा ही दिखाई देता था। बाजारों में भीड़ रहती, दुकानें खुलतीं और लोग अपने काम में व्यस्त रहते। लेकिन जैसे ही सूरज डूबता, पूरा शहर बदल जाता।

     

    सड़कें सुनसान हो जातीं। घरों के दरवाजे बंद हो जाते और लोग खिड़कियों पर भी पर्दे डाल देते।

     

    क्योंकि इस शहर में एक अजीब डर था।

     

    लोग कहते थे कि रात में गलियों में एक जोड़ी कातिल निगाहें घूमती हैं।

     

    जिसकी नजर उन आंखों से मिल जाती, उसके बाद वह इंसान हमेशा के लिए गायब हो जाता।

     

    पुलिस ने कई बार तलाश की, लेकिन हर बार कोई सुराग नहीं मिला।

     

    इसी शहर में आरव नाम का एक लड़का रहता था। वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक रात उसका दोस्त निखिल उसके घर आया।

     

    “आरव, आज मेरे घर चलना मत। देर हो गई है।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “तुम भी इन अफवाहों पर विश्वास करने लगे?”

     

    निखिल ने गंभीर होकर कहा, “अफवाह होती तो अब तक इतने लोग गायब क्यों होते?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी रात उसे अपनी दादी की दवा लेने बाजार जाना पड़ा।

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे।

     

    जैसे ही आरव पुरानी गली में पहुंचा, उसे लगा कोई उसके पीछे चल रहा है।

     

    वह रुका।

     

    पीछे देखा।

     

    गली खाली थी।

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    कुछ कदम बाद उसे एक खिड़की में दो चमकती आंखें दिखाई दीं।

     

    आरव ठिठक गया।

     

    आंखें बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    वह कुछ समझ पाता, उससे पहले खिड़की बंद हो गई।

     

    आरव तेजी से आगे बढ़ा।

     

    तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज आई—

     

    “रुको!”

     

    आरव पलटा।

     

    एक लड़की काले दुपट्टे में उसके सामने खड़ी थी।

     

    “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

     

    आरव ने कहा, “दवा लेने जा रहा हूं।”

     

    लड़की ने घबराकर उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी बात ध्यान से सुनो। आगे मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहां से कोई वापस नहीं आता।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की कुछ पल चुप रही।

     

    “मेरा नाम तारा है।”

     

    तभी दूर से किसी दरवाजे के बंद होने की आवाज आई।

     

    तारा घबरा गई।

     

    “चलो!”

     

    दोनों पास की एक पुरानी हवेली में छिप गए।

     

    आरव ने पूछा, “तुम्हें उन आंखों के बारे में क्या पता है?”

     

    तारा ने धीमी आवाज में कहा, “बहुत कुछ।”

     

    “तो बताओ।”

     

    “ये आंखें किसी भूत की नहीं हैं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    तारा ने कहा, “इस शहर में पिछले पांच सालों से लोग गायब हो रहे हैं। सबको लगता है कि कोई अदृश्य ताकत उन्हें उठा ले जाती है। लेकिन असली सच इंसानों से भी ज्यादा डरावना है।”

     

    “कौन है इसके पीछे?”

     

    तारा ने हवेली की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    वहां पुराने शहर का नक्शा बना था।

     

    “इन सभी गायब हुए लोगों के घर एक ही रास्ते के आसपास थे।”

     

    आरव ने नक्शा देखा।

     

    “तो?”

     

    “ये रास्ता सीधे शहर के पुराने महल तक जाता है।”

     

    आरव ने पूछा, “पुराना महल तो बीस साल से बंद है।”

     

    “हां।”

     

    “फिर वहां कौन रहता है?”

     

    तारा ने कहा, “यही पता लगाने मैं यहां आई हूं।”

     

    दोनों उसी रात महल की ओर निकल पड़े।

     

    महल का बड़ा दरवाजा आधा खुला था।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    तारा ने आरव का हाथ पकड़कर कहा, “सावधान रहना।”

     

    वे धीरे-धीरे अंदर बढ़े।

     

    अचानक सामने दीवार पर दो चमकती आंखें दिखाई दीं।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तारा ने फुसफुसाकर कहा, “यही हैं… कातिल निगाहें।”

     

    लेकिन तभी उन आंखों के नीचे एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    वह एक बूढ़ा आदमी था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम दोनों यहां क्यों आए हो?”

     

    आरव ने पूछा, “लोग कहां गायब हो रहे हैं?”

     

    बूढ़ा कुछ देर उन्हें देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “क्योंकि इस शहर का असली मालिक कोई इंसान नहीं… उसका लालच है।”

     

    बूढ़े ने उन्हें एक तहखाने में ले जाकर दिखाया कि वहां पुराने कागज और जमीन के दस्तावेज रखे थे।

     

    असल में शहर के कुछ बड़े लोग गरीब लोगों की जमीन हड़पना चाहते थे। जो भी उनके खिलाफ आवाज उठाता, उसे डराकर शहर से गायब कर दिया जाता।

     

    और कातिल निगाहें कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं थीं।

     

    वे एक गुप्त सुरंग में लगाए गए चमकीले शीशों और रोशनी का हिस्सा थीं, जिनसे लोगों को दूर से ऐसा लगता था जैसे अंधेरे में कोई डरावनी आंखें उन्हें देख रही हों।

     

    लेकिन एक सवाल बाकी था।

     

    “लोगों को गायब कौन करता है?” आरव ने पूछा।

     

    बूढ़े ने जवाब दिया—

     

    “शहर का सबसे बड़ा व्यापारी… रुद्रसेन।”

     

    तारा ने तुरंत कहा, “लेकिन वह तो लोगों की मदद करने के लिए मशहूर है।”

     

    बूढ़ा हंस पड़ा।

     

    “सबसे खतरनाक चेहरा वही होता है जो हमेशा नेक दिखाई दे।”

     

    अचानक पीछे से आवाज आई—

     

    “बहुत बातें हो गईं।”

     

    तीनों पलटे।

     

    दरवाजे पर रुद्रसेन खड़ा था।

     

    उसके साथ कई आदमी थे।

     

    रुद्रसेन ने कहा, “तुम दोनों को यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा, “लोगों को क्यों गायब किया?”

     

    रुद्रसेन ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि डर सबसे सस्ता हथियार है।”

     

    लेकिन उसे पता नहीं था कि तारा पहले ही सारे दस्तावेजों की तस्वीरें अपने फोन में ले चुकी थी।

     

    उसने मौका मिलते ही वे तस्वीरें पुलिस को भेज दीं।

     

    कुछ ही देर में महल को पुलिस ने घेर लिया।

     

    रुद्रसेन पकड़ा गया।

     

    उसके साथ कई और लोगों के नाम सामने आए।

     

    अगली सुबह पहली बार काली नगरी के लोगों ने बिना डर के अपने घरों के दरवाजे खोले।

    रात हुई।

    लेकिन इस बार किसी खिड़की में चमकती आंखें नहीं थीं।

    आरव उसी पुरानी गली से गुजर रहा था।तारा उसके साथ थी।

    आरव ने मुस्कुराकर कहा

    “तो खत्म हुआ कातिल निगाहों का डर।”

     

    तारा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा

    “डर कभी खत्म नहीं होता आरव… बस उसका सच सामने आ जाता है।”

     

    दोनों आगे बढ़ गए।

     

    लेकिन शहर के सबसे पुराने मकान की बंद खिड़की के पीछे…

     

    अचानक दो चमकती आंखें फिर दिखाई दीं।

     

    कुछ सेकंड बाद खिड़की अपने आप बंद हो गई।

     

    और अंधेरे में किसी की धीमी आवाज सुनाई दी

    “कहानी खत्म नहीं हुई…”

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    Auther preeti Sharma

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  • श्मशान की राख

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    श्मशान की राख

     

    रात के करीब बारह बजे थे। आसमान पर बादल छाए हुए थे और पूरे गांव में अजीब-सी खामोशी पसरी थी। गांव से थोड़ा दूर नदी के किनारे एक पुराना श्मशान घाट था, जहां रात में जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था।

     

    लोग कहते थे कि वहां जलती चिताओं की राख में कुछ ऐसा था, जो मुर्दों की अधूरी इच्छाओं को अपने अंदर समेट लेता था। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि अमावस्या की रात उस राख से किसी का नाम पुकारा जाता था।

     

    गांव का बीस साल का लड़का मोहन इन बातों को सिर्फ अंधविश्वास मानता था।

     

    उस रात उसके पिता अचानक बहुत बीमार पड़ गए। गांव में दवा नहीं मिली, इसलिए वैद्य के घर से जरूरी जड़ी-बूटी लेने मोहन को नदी के उस पार जाना पड़ा।

     

    वापसी में उसे श्मशान के पास से होकर गुजरना था।

     

    जैसे ही वह श्मशान के सामने पहुंचा, उसे पीछे से किसी बूढ़े आदमी की आवाज सुनाई दी।

     

    “मोहन…”

     

    मोहन के कदम वहीं रुक गए।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    उसने खुद को समझाया, “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    वह आगे बढ़ने लगा।

     

    फिर आवाज आई।

     

    “मोहन… वापस मत जाना…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    मोहन ने डरते हुए श्मशान की तरफ देखा। वहां एक पुरानी चिता की राख हल्की-हल्की उड़ रही थी, जबकि हवा बिल्कुल बंद थी।

     

    फिर राख के बीच उसे कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया।

     

    मोहन धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    वह एक छोटी-सी चांदी की अंगूठी थी।

     

    जैसे ही उसने अंगूठी उठाई, अचानक श्मशान की सारी बुझी चिताओं से राख हवा में उठने लगी।

     

    मोहन घबराकर पीछे हट गया।

     

    राख हवा में घूमते-घूमते एक इंसान जैसी आकृति बनाने लगी।

     

    आकृति ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “मेरी बात गांव तक पहुंचा दो…”

     

    मोहन का शरीर डर से कांपने लगा।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    आकृति ने जवाब दिया—

     

    “जिसे इस श्मशान ने बीस साल से अपने अंदर छिपा रखा है।”

     

    अचानक राख जमीन पर गिर गई और सब कुछ शांत हो गया।

     

    मोहन अंगूठी लेकर भागता हुआ घर पहुंचा।

     

    अगली सुबह उसने गांव के सबसे बूढ़े आदमी हरिदास से सारी बात बताई।

     

    हरिदास का चेहरा सुनते ही सफेद पड़ गया।

     

    “तुमने अंगूठी कहां से पाई?”

     

    मोहन ने अंगूठी दिखा दी।

     

    हरिदास की आंखों में डर उतर आया।

     

    “ये अंगूठी रघुवीर की है।”

     

    “कौन रघुवीर?”

     

    हरिदास कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “बीस साल पहले गांव में एक आदमी रहता था। उसका नाम रघुवीर था। वह बहुत ईमानदार था। एक रात अचानक उसकी मौत हो गई और उसका अंतिम संस्कार इसी श्मशान में किया गया।”

     

    “तो इसमें डरने वाली क्या बात है?”

     

    हरिदास ने धीमे से कहा, “उसकी मौत स्वाभाविक नहीं थी।”

     

    मोहन चौंक गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    हरिदास ने चारों तरफ देखा और धीरे से कहा—

     

    “रघुवीर ने मरने से कुछ दिन पहले गांव के मुखिया के खिलाफ आवाज उठाई थी। उसे पता चला था कि गांव की जमीनों के कागजों में धोखा किया जा रहा है। उसने सबूत इकट्ठे कर लिए थे।”

     

    “फिर?”

     

    “उसके मरने के बाद सारे सबूत गायब हो गए।”

     

    मोहन को पिछली रात की आवाज याद आ गई।

     

    “क्या रघुवीर की आत्मा अभी भी यहीं है?”

     

    हरिदास ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी रात मोहन फिर श्मशान पहुंचा।

     

    इस बार उसके हाथ में वही चांदी की अंगूठी थी।

     

    जैसे ही उसने अंगूठी राख के पास रखी, अचानक जमीन के नीचे से हल्की आवाज आई।

     

    “पीपल के पेड़ के नीचे…”

     

    मोहन ने सामने पुराने पीपल के पेड़ को देखा।

     

    वहां जमीन थोड़ी उभरी हुई थी।

     

    मोहन ने हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की। कुछ देर बाद उसकी उंगलियां एक लोहे के डिब्बे से टकराईं।

     

    डिब्बे के अंदर पुराने कागज थे।

     

    लेकिन उनमें एक कागज ऐसा था जिसने मोहन के होश उड़ा दिए।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर मेरे साथ कुछ होता है, तो समझ लेना मेरी मौत के पीछे गांव का मुखिया देवकरण है।”

     

    मोहन अगले दिन यह कागज लेकर गांव के लोगों के सामने पहुंचा।

     

    देवकरण ने कागज देखते ही उसे छीनने की कोशिश की।

     

    लेकिन तभी हरिदास आगे आ गए।

     

    “अब बहुत हो चुका।”

     

    देवकरण घबरा गया।

     

    हरिदास ने सबके सामने बताया कि बीस साल पहले रघुवीर ने उसकी जमीन की चोरी का सच पकड़ लिया था। देवकरण ने अपने लोगों की मदद से उसे रास्ते से हटाया और उसकी मौत को हादसा बताया था।

     

    गांव में हड़कंप मच गया।

     

    देवकरण से सवाल होने लगे।

     

    आखिरकार पुराने डर के कारण चुप रहे कुछ लोग भी सच बोलने लगे।

     

    देवकरण का राज खुल गया।

     

    उस रात मोहन फिर श्मशान गया।

     

    आसमान साफ था।

     

    उसने रघुवीर की अंगूठी चिता की राख के पास रख दी।

     

    कुछ पल तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर हल्की हवा चली।

     

    राख धीरे-धीरे उठी और उसके सामने वही धुंधली आकृति दिखाई दी।

     

    इस बार उसकी आवाज में डर नहीं था।

     

    “सच सामने आ गया… अब मुझे जाने दो।”

     

    मोहन ने सिर झुका दिया।

     

    “तुम्हारा सच गांव तक पहुंच गया है।”

     

    आकृति कुछ पल शांत रही।

     

    फिर हवा में बिखरने लगी।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने मोहन से कहा—

     

    “याद रखना… राख कभी झूठ नहीं बोलती। उसमें आग से ज्यादा यादें रहती हैं।”

     

    अगली सुबह श्मशान की सारी राख नदी में बहा दी गई।

     

    उस दिन के बाद गांव में कभी किसी ने रघुवीर की आवाज नहीं सुनी।

     

    लेकिन श्मशान के पास वह पुराना पीपल का पेड़ आज भी खड़ा है।

     

    लोग कहते हैं, अमावस्या की रात अगर कोई वहां से गुजरता है, तो हवा में राख उड़ती हुई दिखाई देती है।

     

    डरने की जरूरत नहीं।

     

    क्योंकि अब उस राख में कोई अधूरी आत्मा नहीं रहती।

     

    बस एक पुरानी कहानी रहती है—

     

    एक ऐसे इंसान की, जिसकी मौत को छिपाया जा सकता था, लेकिन उसकी राख में दबा सच कभी नहीं।

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