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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • 😱भूतिया पार्लर 👻💄(Last part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शीशा टूटते ही पूरे पार्लर में भयानक सन्नाटा छा गया।

     

    अमन, सोनू, दीपक और राकेश कुछ समझ नहीं पा रहे थे।

     

    जमुना दादी लगातार रो रही थीं।

     

    उन्होंने काँपते हुए कहा—

     

    “हमें पुलिस को सब बताना होगा।”

     

    लेकिन तभी टूटे हुए शीशे के एक टुकड़े में कुसुम का चेहरा दिखाई दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “सच सामने आएगा… लेकिन एक आखिरी काम बाकी है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    शीशे में दिखाई दे रही कुसुम ने पार्लर के एक कोने की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का संदूक पड़ा था।

     

    अमन ने संदूक खोला।

     

    उसमें सजनी की डायरी थी।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मेरे साथ कुछ हो जाए तो मेरी मौत को हादसा मत समझना। मुझे पता है कि गाँव में कौन लड़कियों को डराता और उनके साथ धोखा करता है। अगर मैं नहीं रही तो मेरी डायरी सच बताएगी।”

     

    डायरी में उन लोगों के नाम लिखे थे।

     

    गाँव के तीन प्रभावशाली आदमी।

     

    उनमें से एक का नाम था बलदेव सिंह।

     

    बलदेव गाँव का बहुत रसूखदार आदमी था।

     

    लोग उससे डरते थे।

     

    अमन ने डायरी लेकर गाँव की पंचायत में सबके सामने सच बता दिया।

     

    पहले तो बलदेव ने सब कुछ झूठ कहा।

     

    लेकिन डायरी में लिखे पुराने सबूत और सजनी की हड्डियाँ देखकर गाँव वालों को सच्चाई समझ आ गई।

     

    पुलिस को बुलाया गया।

     

    जाँच शुरू हुई।

     

    कई साल पुराने राज खुलने लगे।

     

    बलदेव और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    उस रात गाँव के लोगों ने सजनी और कुसुम के लिए प्रार्थना की।

     

    लेकिन अमन के मन में एक सवाल था—

     

    अगर अपराधियों को पकड़ लिया गया है, तो क्या भूतिया पार्लर का रहस्य खत्म हो गया?

     

    रात करीब बारह बजे वह अकेला पार्लर के सामने खड़ा था।

     

    अचानक अंदर से आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    सामने टूटा हुआ शीशा था।

     

    लेकिन इस बार शीशे में उसका प्रतिबिंब नहीं था।

     

    उसकी जगह सजनी खड़ी थी।

     

    सजनी ने लाल साड़ी पहन रखी थी।

     

    चेहरे पर शांति थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मेरा आखिरी काम बाकी है।”

     

    अमन ने डरते हुए पूछा—

     

    “क्या?”

     

    सजनी ने एक पुरानी कुर्सी की ओर इशारा किया।

     

    वहाँ कुसुम बैठी थी।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    सजनी बोली—

     

    “उस रात मैं कुसुम को बचाना चाहती थी। लेकिन मैं उसे बचा नहीं सकी। अब उसकी आत्मा तब तक नहीं जाएगी, जब तक उसका अधूरा श्रृंगार पूरा नहीं होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन उसका श्रृंगार कौन करेगा?”

     

    सजनी मुस्कुराई।

     

    “तुम नहीं।”

     

    अचानक पार्लर के दरवाजे पर गाँव की कुछ महिलाएँ दिखाई दीं।

     

    उनमें कुसुम की माँ भी थी।

     

    वह रोते हुए आगे बढ़ी।

     

    कुसुम की आत्मा ने अपनी माँ को देखा।

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटी… अब घर चल।”

     

    इतना सुनते ही कुसुम की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर नहीं था।

     

    सजनी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब यह दुल्हन पूरी हो गई।”

     

    धीरे-धीरे कुसुम की आत्मा धुएँ में बदलने लगी।

     

    फिर सजनी भी उसके साथ धुंधली होने लगी।

     

    अमन ने आखिरी बार पूछा—

     

    “क्या तुम दोनों अब मुक्त हो जाओगी?”

     

    सजनी ने कहा—

     

    “हाँ… क्योंकि अब सच छिपा नहीं है।”

     

    दोनों आकृतियाँ धीरे-धीरे गायब हो गईं।

     

    उसी क्षण पार्लर के अंदर रखा पुराना हेयर ड्रायर अपने आप बंद हो गया।

     

    घड़ी की सुई बारह बजकर एक मिनट पर रुक गई।

     

    और फिर…

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    अगली सुबह गाँव वालों ने पार्लर को हमेशा के लिए बंद करने के बजाय उसे एक नई जगह में बदलने का फैसला किया।

     

    उस जगह पर गाँव की लड़कियों के लिए सिलाई और ब्यूटी का प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया।

     

    दरवाजे पर एक बोर्ड लगाया गया—

     

    “सजनी महिला प्रशिक्षण केंद्र”

     

    नीचे एक छोटी-सी पंक्ति लिखी गई—

     

    “डर को छिपाने से वह बढ़ता है, लेकिन सच का सामना करने से डर खत्म हो जाता है।”

     

    कई साल बाद भी गाँव के बुजुर्ग उस घटना को याद करते हैं।

     

    लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात कभी-कभी उस पुराने पार्लर की खिड़की में हल्की-सी रोशनी दिखाई देती है।

     

    कभी-कभी शीशे में लाल साड़ी पहने एक औरत भी दिखाई देती है।

     

    लेकिन अब वह किसी को डराती नहीं।

     

    वह सिर्फ कुछ पल के लिए दिखाई देती है…

     

    और फिर गायब हो जाती है।

     

    गाँव की बूढ़ी जमुना दादी कहती हैं—

     

    “वो भूत नहीं है… वो हमें याद दिलाने आती है कि किसी के साथ गलत होते देखकर चुप मत रहना।”

     

    कहानी की सीख

     

    इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि हर डर के पीछे भूत नहीं होता और हर अफवाह सच नहीं होती। कई बार असली डर इंसानों के गलत कामों से पैदा होता है।

     

    अगर किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, तो डरकर चुप नहीं रहना चाहिए। सच बोलने वाला इंसान अकेला जरूर पड़ सकता है, लेकिन उसका साहस किसी दूसरे की जिंदगी बचा सकता है।

     

    और सबसे जरूरी बात—

     

    अंधविश्वास से डरने के बजाय सच्चाई को समझना चाहिए, क्योंकि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी रोशनी उसे खत्म कर सकती है।

     

     

    Story pasand aai ho to comment jarur  kare.

     

    End

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱भूतिया पार्लर 👻💄(part-2)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जमुना दादी की बात सुनकर अमन और उसके दोस्त चुप हो गए।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “दादी, आखिरी दुल्हन कौन थी?”

     

    दादी ने चारों तरफ देखा और धीमी आवाज में बोलीं—

     

    “कुसुम।”

     

    “वही लड़की जो दस साल पहले पार्लर में बेहोश मिली थी?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    फिर उन्होंने एक पुरानी कहानी सुनाई।

     

    कुसुम की शादी शहर में रहने वाले एक आदमी से होने वाली थी। शादी के दिन उसे सजने के लिए सजनी के पार्लर में भेजा गया था।

     

    लेकिन सजनी उस दिन बहुत परेशान थी।

     

    कहा जाता है कि कुछ दिन पहले उसने किसी पुराने ग्राहक की तस्वीर में एक अजीब औरत देखी थी।

     

    वह औरत हर तस्वीर में दिखाई देती थी।

     

    लेकिन जब सजनी तस्वीर खींचती तो आसपास कोई नहीं होता।

     

    धीरे-धीरे सजनी को उस औरत के सपने आने लगे।

     

    सपने में वह औरत कहती—

     

    “मुझे भी दुल्हन बनाओ।”

     

    सजनी ने इसे अपना वहम समझा।

     

    लेकिन जिस दिन कुसुम पार्लर आई, वही औरत पहली बार शीशे में दिखाई दी।

     

    सजनी डर गई।

     

    उसने कुसुम से कहा—

     

    “आज श्रृंगार मत करवाओ। घर चली जाओ।”

     

    लेकिन तभी पार्लर का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    शीशे पर धुंध छा गई।

     

    और उसमें एक शब्द लिखा दिखाई दिया—

     

    “दुल्हन…”

     

    इसके बाद क्या हुआ, किसी को पता नहीं चला।

     

    कुसुम बेहोश मिली।

     

    सजनी गायब थी।

     

    और शीशे पर वह डरावना संदेश लिखा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन सजनी की आत्मा हमें क्यों परेशान कर रही है?”

     

    दादी ने कहा—

     

    “शायद वह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती। शायद वह किसी को अपना सच बताना चाहती है।”

     

    उसी शाम अमन ने अपने दोस्तों के साथ पार्लर जाने का फैसला किया।

     

    इस बार वे अकेले नहीं गए।

     

    जमुना दादी भी उनके साथ थीं।

     

    पार्लर का ताला अब भी लगा था।

     

    दादी ने अपनी चाबी निकाली।

     

    अमन हैरान रह गया।

     

    “आपके पास इसकी चाबी?”

     

    दादी बोलीं—

     

    “सजनी ने मरने से पहले नहीं… गायब होने से पहले मुझे दी थी।”

     

    दरवाजा खुला।

     

    अंदर धूल और मकड़ी के जाले थे।

     

    पुरानी कॉस्मेटिक की बोतलें अब भी मेज पर रखी थीं।

     

    एक कोने में टूटा हुआ हेयर ड्रायर पड़ा था।

     

    और सामने वही बड़ा शीशा।

     

    अमन ने शीशे को देखा।

     

    उसमें कमरा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन अचानक…

     

    शीशे में कमरे का दरवाजा बंद दिखाई दिया।

     

    जबकि असली दरवाजा खुला था।

     

    अमन ने पीछे देखा।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    फिर शीशे में देखा।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    और उसके सामने…

     

    एक दुल्हन खड़ी थी।

     

    लाल जोड़ा।

     

    भारी घूँघट।

     

    हाथों में लाल चूड़ियाँ।

     

    अमन ने घबराकर पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    दुल्हन ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने धीरे-धीरे अपना घूँघट उठाया।

     

    चेहरा कुसुम का था।

     

    लेकिन उसकी आँखें बिल्कुल सफेद थीं।

     

    अचानक पार्लर की सारी लाइटें अपने आप जल गईं।

     

    हेयर ड्रायर चलने लगा।

     

    कंघियाँ अपने आप घूमने लगीं।

     

    और शीशे पर एक के बाद एक शब्द उभरने लगे—

     

    “सजनी ने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर सजनी कहाँ है?”

     

    शीशे पर अगला संदेश आया—

     

    “वह यहाँ है।”

     

    अचानक कमरे के पीछे से किसी के रोने की आवाज आई।

     

    सभी पलटे।

     

    एक पुराने पर्दे के पीछे किसी की परछाईं थी।

     

    अमन ने पर्दा हटाया।

     

    वहाँ एक छोटा कमरा था।

     

    दीवार पर बहुत सारी तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में गाँव की अलग-अलग दुल्हनें थीं।

     

    लेकिन हर तस्वीर के पीछे वही काली औरत दिखाई दे रही थी।

     

    जमुना दादी ने काँपते हुए कहा—

     

    “हे भगवान…”

     

    दीवार के आखिरी हिस्से में एक तस्वीर थी।

     

    उसमें सजनी खड़ी थी।

     

    उसके पीछे वही काली औरत।

     

    और तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “अगली दुल्हन कौन?”

     

    तभी पार्लर का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    चारों तरफ अंधेरा छा गया।

     

    कुसुम की आवाज आई—

     

    “सच बताओ… नहीं तो अगली दुल्हन तुम्हारे गाँव से होगी।”

     

    अमन चिल्लाया—

     

    “क्या सच?”

     

    आवाज आई—

     

    “सजनी को किसने मारा?”

     

    जमुना दादी अचानक जमीन पर बैठ गईं।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “मैं जानती हूँ।”

     

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

     

    दादी ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “सजनी को किसी भूत ने नहीं मारा था।”

     

    “फिर?”

     

    “उसे इंसानों ने मारा था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    दादी ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर में गाँव के चार आदमी खड़े थे।

     

    उनमें से एक था…

     

    जमुना दादी का बेटा।

     

    दादी रोते हुए बोलीं—

     

    “सजनी ने देख लिया था कि गाँव का एक आदमी लड़कियों के साथ धोखा करता था। उसने सबको बताने की धमकी दी थी। उन लोगों ने उसे डराने की कोशिश की। झगड़ा हुआ… और सजनी की मौत हो गई।”

     

    “फिर उसकी लाश?”

     

    “उसे इसी पार्लर के पीछे पुराने कुएँ में फेंक दिया गया।”

     

    अचानक जमीन के नीचे से जोरदार आवाज आई।

     

    धम्म!

     

    पार्लर की फर्श में दरार पड़ गई।

     

    और उस दरार के अंदर से…

     

    एक पुराना लाल दुपट्टा दिखाई दिया।

     

    अमन ने दुपट्टा खींचा।

     

    उसके नीचे हड्डियाँ थीं।

     

    जमुना दादी चीख पड़ीं।

     

    तभी शीशे में सजनी दिखाई दी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मेरा सच सामने आएगा…”

     

    और अगले ही पल शीशा पूरी तरह टूट गया।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱भूतिया पार्लर 👻💄(part-1)

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव रामपुरवा में शाम होते ही लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। गाँव बहुत बड़ा नहीं था। चारों तरफ खेत, आम के पेड़, मिट्टी की सड़कें और दूर तक फैले सरसों के खेत थे।

     

    लेकिन गाँव की सबसे अजीब जगह थी—पुरानी हवेली के सामने बना एक छोटा-सा पार्लर।

     

    उसका नाम था “सजनी ब्यूटी पार्लर”।

     

    करीब दस साल पहले तक वहाँ खूब चहल-पहल रहती थी। गाँव की लड़कियाँ शादी-ब्याह और त्योहारों पर सजने के लिए वहीं जाती थीं।

     

    पार्लर की मालकिन थी सजनी।

     

    सजनी बहुत खूबसूरत और हँसमुख महिला थी। वह गाँव की लड़कियों को मेहंदी लगाती, बाल बनाती और दुल्हनों का श्रृंगार करती थी।

     

    लेकिन एक रात अचानक सजनी गायब हो गई।

     

    पार्लर खुला था।

     

    अंदर कुर्सी पर एक दुल्हन बैठी थी।

     

    लेकिन सजनी कहीं नहीं थी।

     

    दुल्हन का नाम था कुसुम।

     

    जब लोगों ने उसे देखा तो वह बेहोश थी।

     

    उसके सामने शीशे पर लाल रंग से सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “दुल्हन अभी अधूरी है…”

     

    उस दिन के बाद पार्लर हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि रात के समय बंद पार्लर के अंदर से कभी-कभी हेयर ड्रायर चलने की आवाज आती है।

     

    कभी चूड़ियों की खनखनाहट।

     

    और कभी किसी औरत के धीरे-धीरे गुनगुनाने की आवाज।

     

    लेकिन गाँव का 18 साल का लड़का अमन इन बातों को बकवास समझता था।

     

    अमन शहर में पढ़ाई करता था और छुट्टियों में गाँव आया हुआ था।

     

    उसके दोस्त थे—सोनू, दीपक और राकेश।

     

    एक शाम चारों चाय की दुकान पर बैठे थे।

     

    सोनू ने कहा—

     

    “कल रात मैंने पुराने पार्लर की खिड़की में किसी को देखा था।”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “बिल्ली होगी।”

     

    दीपक बोला—

     

    “बिल्ली चूड़ी पहनकर गाना गाती है क्या?”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    राकेश ने कहा—

     

    “मेरे दादा कहते हैं, सजनी की आत्मा अभी भी उस पार्लर में है।”

     

    अमन ने हँसते हुए कहा—

     

    “आज रात चलते हैं। देखते हैं कौन है अंदर।”

     

    तीनों दोस्त पहले तो डर गए, लेकिन अमन के पीछे चल पड़े।

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे चारों गाँव से बाहर निकले।

     

    आसमान में बादल थे।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

     

    पुरानी हवेली के पास पहुँचते ही अमन की टॉर्च अचानक झपकने लगी।

     

    “बैटरी खत्म हो रही है,” उसने कहा।

     

    पार्लर सामने था।

     

    दरवाजे पर मोटा ताला लगा हुआ था।

     

    खिड़कियों पर धूल जमी थी।

     

    अमन ने टॉर्च खिड़की के अंदर डाली।

     

    अंदर एक पुरानी कुर्सी थी।

     

    उसके सामने बड़ा-सा शीशा लगा था।

     

    अचानक…

     

    टक!

     

    शीशे पर अंदर से किसी ने हाथ मारा।

     

    चारों पीछे हट गए।

     

    “चलो यहाँ से,” राकेश ने कहा।

     

    लेकिन अमन ने खिड़की के पास जाकर फिर टॉर्च डाली।

     

    इस बार शीशे में चारों लड़कों का प्रतिबिंब दिखाई दिया।

     

    लेकिन उनके पीछे…

     

    एक पाँचवीं औरत खड़ी थी।

     

    लंबे काले बाल।

     

    लाल साड़ी।

     

    और हाथ में कंघी।

     

    अमन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने फिर शीशे की तरफ देखा।

     

    औरत अब भी वहाँ थी।

     

    वह धीरे-धीरे अपने बालों में कंघी कर रही थी।

     

    फिर उसने शीशे के अंदर से अमन की तरफ देखकर मुस्कुराया।

     

    अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।

     

    चारों भागकर गाँव की तरफ दौड़े।

     

    घर पहुँचकर अमन ने सोचा कि शायद डर की वजह से उसे भ्रम हुआ होगा।

     

    लेकिन अगली सुबह उसके कमरे में एक चीज पड़ी थी।

     

    एक पुरानी कंघी।

     

    उस कंघी में लंबे काले बाल उलझे हुए थे।

     

    और उसके नीचे एक छोटी-सी चिट्ठी थी—

     

    “कल दुल्हन बनकर आना।”

     

    अमन ने चिट्ठी पढ़ी तो उसके हाथ काँपने लगे।

     

    तभी बाहर से सोनू की आवाज आई—

     

    “अमन! जल्दी बाहर आ!”

     

    अमन बाहर आया।

     

    सोनू की हालत खराब थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मेरे घर में भी यही कंघी मिली है।”

     

    दीपक और राकेश भी वहाँ पहुँच गए।

     

    तीनों के हाथ में भी वैसी ही कंघियाँ थीं।

     

    और चारों कंघियों में…

     

    एक जैसे लंबे काले बाल उलझे हुए थे।

     

    तभी गाँव की सबसे बुजुर्ग महिला जमुना दादी उनके पास आईं।

     

    उन्होंने कंघी देखते ही अपना चेहरा गंभीर कर लिया।

     

    “तुम लोगों ने पार्लर खोल दिया है क्या?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “नहीं दादी।”

     

    जमुना दादी ने धीरे से कहा—

     

    “तो फिर सजनी ने तुम्हें चुन लिया है।”

     

    चारों लड़कों के चेहरों का रंग उड़ गया।

     

    “किसलिए?”

     

    दादी ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि उस पार्लर की आखिरी दुल्हन आज तक घर नहीं पहुँची थी…”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    रामसेवक की बात सुनकर पूरा गाँव सन्न रह गया।

     

    उस रात पंचायत बुलाई गई।

     

    रामसेवक ने सबके सामने अपनी कहानी बताई।

     

    पचास साल पहले वह जवान था। उसके साथ गाँव के दो और आदमी—लालमन और जग्गा—भैरव के दोस्त थे।

     

    भैरव ने गौरी को मारने की योजना बनाई थी।

     

    लेकिन जब गौरी ने विरोध किया तो मामला बिगड़ गया।

     

    रामसेवक ने बताया—

     

    “हमने गौरी को डराने के लिए श्मशान तक ले गए थे। हमारा इरादा उसे मारने का नहीं था। लेकिन भैरव ने गुस्से में उसका गला दबा दिया।”

     

    गाँव के लोग स्तब्ध रह गए।

     

    “फिर क्या हुआ?” रघु ने पूछा।

     

    रामसेवक रोते हुए बोला—

     

    “गौरी मर चुकी थी। हम तीनों डर गए। हमने उसे बरगद के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। भैरव ने हमसे कहा कि अगर किसी को बताया तो वह हम सबको बर्बाद कर देगा।”

     

    “फिर भैरव कहाँ गया?”

     

    “वह रातों-रात गाँव छोड़कर चला गया।”

     

    उसके बाद लालमन और जग्गा भी धीरे-धीरे गाँव छोड़ गए।

     

    रामसेवक अकेला रह गया।

     

    उसने इतने वर्षों तक किसी को सच नहीं बताया।

     

    पंडित हरिदास ने कहा—

     

    “शायद गौरी की आत्मा इसी वजह से भटक रही है। उसे न्याय नहीं मिला।”

     

    अगले दिन गाँव वालों ने गौरी की हड्डियों को विधि-विधान से निकाला।

     

    श्मशान घाट की सफाई की गई।

     

    गौरी के नाम से पूजा रखी गई।

     

    लेकिन रात होते ही फिर वही डरावनी घटना शुरू हो गई।

     

    आसमान में अचानक बादल घिर आए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    बरगद का पेड़ बुरी तरह हिलने लगा।

     

    गाँव के लोगों ने देखा कि पेड़ की शाखाओं पर सफेद कपड़े लटक रहे हैं।

     

    और फिर…

     

    एक-एक करके श्मशान की सारी चिताओं की राख हवा में उड़ने लगी।

     

    लोग डरकर पीछे हट गए।

     

    पेड़ के नीचे सफेद साड़ी वाली गौरी दिखाई दी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था।

     

    वह बहुत उदास लग रही थी।

     

    उसने रामसेवक की तरफ देखा।

     

    रामसेवक हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

     

    “गौरी… मुझे माफ कर दो।”

     

    गौरी धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाया।

     

    रामसेवक की आँखों के सामने अचानक पचास साल पुराना दृश्य दिखाई देने लगा।

     

    गौरी रो रही थी।

     

    वह मदद के लिए पुकार रही थी।

     

    और रामसेवक खड़ा होकर सब देख रहा था।

     

    रामसेवक जमीन पर गिर पड़ा।

     

    “मुझे माफ कर दो!”

     

    गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    फिर उसने पीछे मुड़कर बरगद के पेड़ को देखा।

     

    अचानक पेड़ की एक बड़ी शाखा टूटकर जमीन पर गिर गई।

     

    शाखा के नीचे से एक पुरानी लोहे की पेटी दिखाई दी।

     

    रघु ने पेटी खोली।

     

    उसमें भैरव की एक चिट्ठी थी।

     

    चिट्ठी में लिखा था—

     

    “गौरी की मौत का जिम्मेदार मैं हूँ। अगर कभी यह चिट्ठी किसी को मिले तो समझ लेना कि रामसेवक, लालमन और जग्गा ने सिर्फ मेरी मदद की थी। असली अपराधी मैं हूँ।”

     

    यह चिट्ठी सबूत बन गई।

     

    गाँव के लोगों ने गौरी के लिए न्याय की प्रार्थना की।

     

    उसी रात पहली बार श्मशान में अजीब शांति थी।

     

    हवा बंद हो गई।

     

    कुत्तों का भौंकना बंद हो गया।

     

    पेड़ की शाखाएँ बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    गौरी की आत्मा आखिरी बार दिखाई दी।

     

    उसने रघु की तरफ देखा।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “अब… मुझे जाने दो।”

     

    रघु ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “तुम्हें न्याय मिलेगा।”

     

    गौरी की आकृति धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    कुछ ही क्षणों में वह धुएँ की तरह हवा में घुल गई।

     

    उस रात के बाद किसी ने श्मशान से रोने की आवाज नहीं सुनी।

     

    लेकिन बरगद का पेड़ फिर भी वहीं खड़ा रहा।

     

    गाँव वालों ने उसे काटने का फैसला किया।

     

    पंडित हरिदास ने मना कर दिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “इसे मत काटो। यह पेड़ अब डर की निशानी नहीं, बल्कि हमें हमारे कर्मों की याद दिलाने वाली निशानी है।”

     

    तब से गाँव वालों ने उस जगह पर एक छोटा-सा पत्थर लगाया।

     

    उस पर लिखा—

     

    “अन्याय को देखकर चुप रहना भी अपराध है।”

     

    कई साल बीत गए।

     

    रघु बड़ा होकर शहर चला गया।

     

    मुन्ना और छोटू भी अपने-अपने काम में लग गए।

     

    लेकिन श्मशान का पेड़ आज भी बरवा गाँव में खड़ा है।

     

    गाँव के बच्चे आज भी उसकी कहानी सुनते हैं।

     

    लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात कभी-कभी पेड़ की शाखाओं के बीच सफेद रोशनी दिखाई देती है।

     

    लेकिन अब किसी को डर नहीं लगता।

     

    क्योंकि गाँव वाले जानते हैं कि वह गौरी की आत्मा नहीं…

     

    बल्कि उस पुराने इतिहास की याद है।

     

    इस कहानी की सीख यह है कि अंधविश्वास और डर के पीछे भागने के बजाय सच को समझना जरूरी है। उससे भी बड़ी बात—अगर हमारे सामने किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, तो चुप रहना उस अन्याय को बढ़ावा देना है। गलत काम कितना भी पुराना क्यों न हो, एक दिन उसका सच सामने आता ही है। इसलिए डर से नहीं, बल्कि सच्चाई, इंसानियत और साहस से काम लेना चाहिए।

     

    और बरवा गाँव के लोग आज भी बच्चों से कहते हैं—

     

    “श्मशान के पेड़ से मत डरो… उस गलती से डरो, जो इंसान को इंसान के खिलाफ खड़ा कर दे।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अगली सुबह रघु ने दीवार पर बना निशान देखा तो उसके होश उड़ गए।

     

    उसने रात की बात किसी को नहीं बताई।

     

    उसे डर था कि अगर घरवालों को पता चला तो उसकी खूब पिटाई होगी।

     

    लेकिन उसी दिन एक अजीब घटना हुई।

     

    मुन्ना के घर के बाहर भी वही निशान बना था।

     

    फिर छोटू के दरवाजे पर भी।

     

    और कालू के घर की पिछली दीवार पर भी।

     

    चारों दोस्त दोपहर में गाँव के पुराने पीपल के पेड़ के नीचे मिले।

     

    मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

     

    “ये हमारे घरों तक कैसे आया?”

     

    रघु चुप था।

     

    छोटू बोला—

     

    “हमें गाँव के पंडित जी के पास जाना चाहिए।”

     

    चारों पंडित हरिदास के घर पहुँचे।

     

    पंडित जी गाँव के सबसे बुजुर्ग लोगों में से एक थे। उन्होंने चारों की बात ध्यान से सुनी और फिर कुछ देर चुप रहे।

     

    “तुम लोग श्मशान के पेड़ के पास गए थे?”

     

    रघु ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    पंडित जी ने गहरी साँस ली।

     

    “मैंने तुम्हारे दादा-दादियों को भी इस पेड़ की कहानी बताते सुना था। लेकिन उस पेड़ का रहस्य आज तक किसी ने नहीं जाना।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “कौन थी वो औरत?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “उसका नाम गौरी था।”

     

    फिर उन्होंने एक पुरानी कहानी सुनानी शुरू की।

     

    करीब पचास साल पहले गौरी इसी गाँव में रहती थी। वह बहुत गरीब परिवार की लड़की थी। उसकी शादी गाँव के ही एक आदमी से हुई थी, जिसका नाम भैरव था।

     

    भैरव बहुत लालची और क्रूर आदमी था।

     

    गौरी के पिता ने शादी में अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया था, लेकिन भैरव की लालच खत्म नहीं हुई।

     

    एक दिन उसने गौरी के पिता से और पैसे माँगे।

     

    पैसे नहीं मिले।

     

    कुछ दिनों बाद गौरी अचानक गायब हो गई।

     

    गाँव में खबर फैली कि वह अपने मायके चली गई है।

     

    लेकिन उसके पिता को विश्वास नहीं हुआ।

     

    उन्होंने कई दिनों तक उसे खोजा।

     

    एक रात उन्हें श्मशान के पास गौरी की चप्पल मिली।

     

    अगले दिन भैरव भी गाँव से गायब हो गया।

     

    किसी को कुछ समझ नहीं आया।

     

    कई साल बाद श्मशान के पास खुदाई के दौरान कुछ हड्डियाँ मिलीं।

     

    लेकिन यह साबित नहीं हो पाया कि वे गौरी की थीं।

     

    पंडित जी बोले—

     

    “लोगों का मानना है कि गौरी को उसी बरगद के नीचे मार दिया गया था।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “लेकिन वह हमें क्यों डरा रही है?”

     

    पंडित जी ने उसकी ओर गंभीर नजरों से देखा।

     

    “शायद इसलिए क्योंकि उसके साथ जो हुआ, उसका सच अभी भी दबा हुआ है।”

     

    चारों लड़के एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    उस रात रघु के घर फिर अजीब घटना हुई।

     

    रात करीब दो बजे उसकी खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    ठंडी हवा कमरे में भर गई।

     

    रघु की आँख खुली।

     

    उसे लगा कि कमरे के कोने में कोई खड़ा है।

     

    वही सफेद साड़ी।

     

    लंबे बाल।

     

    रघु ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    वह आकृति धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    फिर उसके कान में आवाज आई—

     

    “सच… पेड़ के नीचे…”

     

    और वह गायब हो गई।

     

    सुबह रघु ने यह बात मुन्ना को बताई।

     

    दोनों ने तय किया कि उन्हें श्मशान जाकर देखना होगा।

     

    इस बार वे दिन में गए।

     

    पेड़ के पास उन्हें जमीन पर एक पुरानी लोहे की अंगूठी मिली।

     

    अंगूठी पर एक नाम खुदा था—

     

    “भैरव”

     

    रघु के हाथ काँपने लगे।

     

    उन्होंने पेड़ के आसपास जमीन को ध्यान से देखा।

     

    एक जगह मिट्टी बाकी जमीन से अलग थी।

     

    उन्होंने वहाँ खुदाई शुरू की।

     

    कुछ ही देर में फावड़ा किसी लोहे की चीज से टकराया।

     

    खनन!

     

    मिट्टी हटाई गई।

     

    नीचे एक पुराना लकड़ी का संदूक था।

     

    संदूक पर जंग लगा ताला लगा था।

     

    रघु ने ताला तोड़ा।

     

    अंदर एक पुरानी साड़ी, कुछ चूड़ियाँ और एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी थी।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “गौरी की आखिरी बातें।”

     

    रघु ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी में लिखा था कि भैरव गौरी को मारने की धमकी देता था।

     

    गौरी ने अपनी एक सहेली को बताया था कि भैरव ने गाँव के साहूकार से कर्ज लिया था और उस कर्ज को चुकाने के लिए वह गौरी के पिता से पैसे मांग रहा था।

     

    आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मुझे कुछ हो जाए तो समझ लेना, मुझे श्मशान वाले बरगद के पास ले जाया गया है।”

     

    चारों लड़के डर गए।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    वे पलटे।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर पेड़ की शाखा से एक लाल कपड़ा नीचे गिरा।

     

    रघु ने कपड़ा उठाया।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में गौरी खड़ी थी।

     

    और उसके पीछे भैरव था।

     

    लेकिन तस्वीर का सबसे डरावना हिस्सा यह था कि गौरी के चेहरे पर लाल स्याही से एक बड़ा निशान बना था।

     

    उसी हाथ के निशान जैसा…

     

    जो उनके घरों पर बना था।

     

    अचानक मुन्ना चिल्लाया—

     

    “रघु! पीछे देख!”

     

    पेड़ के पीछे सफेद साड़ी वाली वही औरत खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    उसकी आँखों से खून बह रहा था।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ पेड़ की तरफ उठाया।

     

    और फिर जमीन की ओर इशारा किया।

     

    रघु समझ गया।

     

    “उसे कुछ और दिखाना है।”

     

    चारों ने उस जगह खुदाई शुरू कर दी।

     

    कुछ गहराई पर उन्हें इंसानी हड्डियाँ मिलीं।

     

    साथ में एक टूटी हुई चूड़ी थी।

     

    पंडित जी को बुलाया गया।

     

    उन्होंने हड्डियों को देखकर कहा—

     

    “ये शायद गौरी की हैं।”

     

    लेकिन तभी गाँव का एक बूढ़ा आदमी आगे आया।

     

    उसका नाम था रामसेवक।

     

    उसने हड्डियों को देखते ही अपना चेहरा छिपा लिया।

     

    रघु ने पूछा—

     

    “काका, आप कुछ जानते हैं?”

     

    रामसेवक की आँखों में डर था।

     

    वह बोला—

     

    “हाँ… मैं जानता हूँ।”

     

    सब उसकी ओर देखने लगे।

     

    रामसेवक ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “गौरी को भैरव ने नहीं मारा था…”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “तो किसने?”

     

    रामसेवक ने चारों तरफ देखा।

     

    फिर धीमे से बोला—

     

    “उसे गाँव के तीन लोगों ने मिलकर मारा था।”

     

    “कौन लोग?”

     

    रामसेवक कुछ बोल पाता, उससे पहले श्मशान के पेड़ से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    हवा तेज हो गई।

     

    पेड़ की सारी शाखाएँ एक साथ हिलने लगीं।

     

    और जमीन पर मिट्टी से अपने आप तीन शब्द लिखे गए—

     

    “नाम बताओ…”

     

    रामसेवक डर के मारे जमीन पर बैठ गया।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं सब बताऊँगा… लेकिन पहले मुझे अपने पाप का प्रायश्चित करना होगा।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “आप उन लोगों में से एक थे?”

     

    रामसेवक की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उसने सिर झुका दिया।

     

    “हाँ।”

     

    उसी क्षण पेड़ के पीछे से गौरी की आवाज आई—

     

    “सच… सबको सच बताओ…”

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव बरवा में चारों तरफ खेत, आम के बाग और कच्ची पगडंडियाँ थीं। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना श्मशान घाट था। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची घास उगी रहती थी और पास में एक सूखी नदी बहती थी, जिसमें साल के ज्यादातर दिनों में सिर्फ थोड़ा-सा पानी रहता था।

     

    लेकिन उस श्मशान घाट की सबसे डरावनी चीज थी—वहाँ खड़ा एक विशाल बरगद का पेड़।

     

    गाँव के लोग उसे “श्मशान का पेड़” कहते थे।

     

    पेड़ इतना पुराना था कि उसकी जड़ें जमीन से बाहर निकलकर साँपों की तरह दूर-दूर तक फैली थीं। उसकी मोटी शाखाएँ पूरे श्मशान घाट पर इस तरह फैली थीं, जैसे कोई विशालकाय हाथ आसमान को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।

     

    गाँव में उस पेड़ को लेकर तरह-तरह की कहानियाँ मशहूर थीं।

     

    बुजुर्ग कहते थे कि करीब पचास साल पहले एक औरत की उसी पेड़ के नीचे मौत हुई थी। किसी ने कहा कि उसने आत्महत्या की थी, तो किसी का कहना था कि उसकी हत्या हुई थी। लेकिन उसकी मौत का सच कभी सामने नहीं आया।

     

    उसके बाद से रात में पेड़ के पास से गुजरने वाले लोगों को किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई देती थी।

     

    “हाय… मुझे बचा लो…”

     

    गाँव के बुजुर्ग हमेशा बच्चों को समझाते थे—

     

    “सूरज डूबने के बाद श्मशान की तरफ मत जाना।”

     

    लेकिन गाँव का एक लड़का था—रघु।

     

    रघु की उम्र लगभग सत्रह साल थी। वह बहुत निडर था और गाँव के लड़कों में सबसे ज्यादा शरारती भी। उसे भूत-प्रेत की कहानियों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।

     

    उसके तीन दोस्त थे—मुन्ना, छोटू और कालू।

     

    एक दिन शाम को चारों लड़के गाँव के बाहर क्रिकेट खेल रहे थे। तभी मुन्ना ने कहा—

     

    “रघु, आज रात तू हमारे साथ श्मशान वाले पेड़ तक चलकर दिखा।”

     

    रघु हँस पड़ा।

     

    “इसमें कौन-सी बड़ी बात है?”

     

    छोटू बोला, “सुना है, जो उस पेड़ को आधी रात में छू ले, उसके पीछे कोई आत्मा घर तक आती है।”

     

    रघु ने मजाक उड़ाते हुए कहा—

     

    “अरे, तुम लोगों ने भूत देखा भी है कभी?”

     

    कालू ने धीरे से कहा—

     

    “मेरे चाचा ने देखा था।”

     

    “क्या देखा था?”

     

    “एक औरत… सफेद साड़ी में। उसका चेहरा नहीं था।”

     

    तीनों लड़के कुछ पल के लिए चुप हो गए।

     

    रघु ने हँसते हुए कहा—

     

    “आज रात मैं उस पेड़ को छूकर वापस आऊँगा। अगर भूत मिला तो उसे भी क्रिकेट खिलाऊँगा।”

     

    चारों ने तय कर लिया कि रात को करीब ग्यारह बजे वे श्मशान जाएँगे।

     

    रात हुई।

     

    गाँव में धीरे-धीरे सन्नाटा फैलने लगा। घरों के दरवाजे बंद हो गए। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। आसमान में बादल थे और चाँद कभी दिखाई देता, कभी बादलों के पीछे छिप जाता।

     

    रघु अपने घर से चुपचाप निकला।

     

    उसके हाथ में एक टॉर्च थी।

     

    मुन्ना, छोटू और कालू पहले से ही गाँव के बाहर उसका इंतजार कर रहे थे।

     

    चारों धीरे-धीरे श्मशान की ओर चल पड़े।

     

    जैसे-जैसे वे श्मशान के पास पहुँचे, हवा ठंडी होती गई।

     

    पेड़ों के पत्ते बिना हवा के ही हिलने लगे।

     

    छोटू ने डरते हुए पूछा—

     

    “रघु… वापस चलें?”

     

    रघु ने कहा—

     

    “डरपोक मत बन।”

     

    कुछ दूर जाने के बाद श्मशान का विशाल बरगद दिखाई देने लगा।

     

    टॉर्च की रोशनी उसकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाओं पर पड़ी तो ऐसा लगा जैसे पेड़ की शाखाएँ किसी बूढ़े आदमी की उंगलियाँ हों।

     

    अचानक…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीन बार किसी चीज के जमीन पर गिरने की आवाज आई।

     

    चारों रुक गए।

     

    “ये आवाज कहाँ से आई?” मुन्ना ने फुसफुसाकर पूछा।

     

    रघु ने टॉर्च घुमाई।

     

    कुछ दिखाई नहीं दिया।

     

    फिर अचानक दूर से किसी औरत के रोने की आवाज आई।

     

    “हूँ… हूँ… मुझे बचा लो…”

     

    छोटू का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “रघु… चल यहाँ से।”

     

    रघु ने खुद को संभालते हुए कहा—

     

    “किसी जानवर की आवाज होगी।”

     

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

     

    पेड़ के तने पर एक अजीब निशान बना था। वह निशान किसी हाथ जैसा था।

     

    रघु ने टॉर्च पास की।

     

    तभी उसे लगा कि पेड़ के पीछे कोई खड़ा है।

     

    सफेद कपड़े में एक औरत।

     

    रघु ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    कुछ नहीं था।

     

    वह पीछे हटा।

     

    तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “रघु…”

     

    रघु का शरीर जम गया।

     

    उसने तुरंत पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    “तुम लोगों ने मेरा नाम लिया?”

     

    मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

     

    “नहीं…”

     

    “मैंने भी नहीं,” छोटू बोला।

     

    कालू तो बोल ही नहीं पा रहा था।

     

    तभी पेड़ की सबसे ऊँची शाखा से एक सूखी टहनी टूटकर जमीन पर गिरी।

     

    रघु ने हिम्मत करके पेड़ के तने को छू लिया।

     

    उसी क्षण टॉर्च बंद हो गई।

     

    चारों तरफ घना अंधेरा छा गया।

     

    और फिर…

     

    किसी औरत की जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    “भागोऽऽऽ!”

     

    चारों लड़के चीखते हुए गाँव की ओर भागे।

     

    रघु सबसे आगे था।

     

    लेकिन दौड़ते समय उसे ऐसा महसूस हुआ कि कोई उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा है।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    अंधेरे में एक सफेद साड़ी पहने औरत खड़ी थी।

     

    उसके लंबे बाल जमीन तक लटक रहे थे।

     

    रघु की सांस रुक गई।

     

    वह औरत धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगी।

     

    लेकिन उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    सिर्फ दो चमकती हुई आँखें थीं।

     

    रघु ने आँखें बंद कीं और पूरी ताकत से गाँव की तरफ भागा।

     

    घर पहुँचने के बाद उसने दरवाजा बंद किया और चारपाई पर गिर पड़ा।

     

    उस रात उसे नींद नहीं आई।

     

    सुबह जब वह उठा तो उसके कमरे की दीवार पर मिट्टी से एक निशान बना था।

     

    वही निशान…

     

    जो श्मशान के पेड़ पर बना था।

     

    और उसके नीचे लिखा था—

     

    “तुमने मुझे देखा है… अब मैं तुम्हें देखती रहूँगी।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • राजा जनक की अनदेखी कहानी

    राजा जनक की अनदेखी कहानी

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

    मिथिला की अग्नि परीक्षा: जब राजमहल जल रहा था

    यह उन दिनों की बात है जब मिथिलापुरी ज्ञान, कला और समृद्धि के शिखर पर थी। राजा जनक, जिन्हें ‘विदेह’ कहा जाता था, वे राज्य के सिंहासन पर तो बैठते थे, राजकाज भी पूरी कुशलता से करते थे, लेकिन भीतर से वे संसार के सभी मोह-माया से पूरी तरह मुक्त थे। उनका मानना था कि वे केवल एक निमित्त मात्र हैं, सब कुछ परमात्मा का है।

     

    एक दिन, राजा जनक अपनी विशाल राजसभा में बैठे थे। विद्वान शास्त्रों पर चर्चा कर रहे थे और संगीत का वातावरण था। तभी, राजद्वार पर एक सैनिक हाँफता हुआ आया। उसने घबराते हुए सूचना दी, “महाराज! क्षमा करें… नगर के दूसरे छोर पर भीषण आग लग गई है। तेज़ हवा के कारण आग तेज़ी से राजमहल की ओर बढ़ रही है।”

     

    पूरी सभा में हड़कंप मच गया। मंत्री और दरबारी चिंता में पड़ गए। स्वयं महारानी सुनयना भी घबराकर राजा जनक की ओर देखने लगीं। राजमहल में शाही खज़ाना, कीमती रत्न, महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और अनगिनत कलाकृतियाँ थीं।

    लेकिन, राजा जनक के चेहरे पर रत्ती भर भी शिकन नहीं आई। वे शांत बैठे रहे और उन्होंने संगीत रुकवाने से भी मना कर दिया।

     

    कुछ देर बाद, एक मंत्री ने अधीर होकर कहा, “महाराज! आग राजमहल के बहुत निकट आ चुकी है। कृपया आदेश दें, सेवक खज़ाने और राजसी वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना शुरू करें। यदि विलंब हुआ, तो सब कुछ भस्म हो जाएगा।”

    राजा जनक ने बहुत मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया, “मंत्रीवर, आप लोग व्यर्थ ही चिंता कर रहे हैं। मेरी मिथिलापुरी में जो कुछ भी है, वह सब प्रजा का है और ईश्वर की कृपा से है।”

     

    उन्होंने आगे कहा, “मैं ‘विदेह’ हूँ। मेरा अपना कुछ भी नहीं है, जो जलने का भय हो। यदि यह राजमहल प्रारब्ध वश जल रहा है, तो इसे जलने दो। मैं अपनी मानसिक शांति को इस भौतिक संपत्ति के नष्ट होने के डर से अशांत नहीं होने दूँगा।”

    दरबारी अवाक रह गए। वे राजा की इस विरक्ति को देखकर हैरान थे। आग की लपटें अब राजमहल की खिड़कियों से दिखने लगी थीं। धुएँ से पूरा दरबार भर गया था। लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे।

     

    उसी क्षण, एक और चमत्कार हुआ। जैसे ही आग की लपटें उस कक्ष के दरवाज़े तक पहुँचीं जहाँ राजा जनक बैठे थे, हवा की दिशा अचानक बदल गई। देखते ही देखते, राजमहल के चारों ओर की आग बुझने लगी और धीरे-धीरे शांत हो गई।

     

    राजमहल का वह हिस्सा, जहाँ राजा जनक अपनी सभा के साथ पूर्ण स्थिरता और शांति से बैठे थे, पूरी तरह सुरक्षित बच गया। बाकी नगर में भी जहाँ-जहाँ भक्तों ने ईश्वर का नाम लिया, वहाँ आग ने कम क्षति पहुँचाई।

    जब धुआँ छँटा, तो सबने देखा कि राजा जनक उसी भाव-विभोर अवस्था में बैठे हैं। उन्हें आग के ताप का तनिक भी अनुभव नहीं हुआ था।

     

    यह घटना पूरे राज्य में फैल गई। प्रजा ने इसे कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि राजा जनक के सत्य और आत्म-ज्ञान की शक्ति का परिणाम माना।

     

    इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि राजा जनक सचमुच ‘विदेह’ थे—वे शरीर में रहते हुए भी शरीर के प्रति आसक्त नहीं थे, और राजमहल के स्वामी होते हुए भी उसके मोह में नहीं फँसे थे। उनका यही निस्वार्थ और अनासक्त भाव उनकी

    सबसे बड़ी शक्ति थी।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • मीरा बाई विवाह की एक अनकही कहानी

    मीरा बाई विवाह की एक अनकही कहानी

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

     

     

    इतिहास के पन्नों में जब भी प्रेम और समर्पण की बात आती है, तो राधा के बाद सबसे पहला और प्रखर नाम मीराबाई का आता है। मीरा केवल एक रानी नहीं थीं, वे एक ऐसी विद्रोहिणी थीं जिन्होंने समाज की रूढ़ियों को तोड़कर अपने आराध्य को ही अपना सब कुछ मान लिया था। उनका जीवन एक राजसी महल से शुरू होकर वृंदावन की गलियों और द्वारका के रणछोड़ मंदिर तक की एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा है।

     

    इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वह विवाह था, जिसने एक ओर उन्हें मेवाड़ के राजघराने की बहू बनाया, और दूसरी ओर उनके और उनके गिरधर गोपाल के बीच की दूरी को और कम कर दिया। यह कहानी सिर्फ दो लोगों के मिलने की नहीं, बल्कि एक आत्मा के परमात्मा से विवाह की प्रस्तावना है।

     

     

    कहानी शुरू होती है राजस्थान के पाली जिले में स्थित छोटे से गाँव कुड़की से, जहाँ वि.सं. 1555 (लगभग 1498 ई.) में मीरा का जन्म हुआ। उनके पिता राव रतन सिंह थे, जो मेड़ता के शासक राव दूदा के पुत्र थे। मीरा अभी बहुत छोटी थीं जब उनकी माँ का देहांत हो गया। इसलिए, उनका लालन-पालन उनके दादा राव दूदा के संरक्षण में मेड़ता के किले में हुआ।

    राव दूदा एक अत्यंत धार्मिक और वीर पुरुष थे। मेड़ता का माहौल भक्तिमय था। घर में संतों का आना-जाना था, भजन-कीर्तन होते थे। बचपन से ही मीरा ने इन सब को अपनी आँखों में और अपने हृदय में उतारा।

     

    एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब मीरा बहुत छोटी थीं, एक बार उनके घर में कोई साधु आए। उनके पास एक बहुत सुंदर कृष्ण की मूर्ति थी। मीरा उस मूर्ति पर मोहित हो गईं। उन्होंने हठ पकड़ लिया कि वे उसी मूर्ति के साथ खेलेंगी और उसे ही अपना पति मानेंगी। साधु ने पहले तो बच्ची की नासमझी समझकर मना किया, लेकिन मीरा के दृढ़ प्रेम को देखकर वे पिघल गए और उन्होंने वह मूर्ति मीरा को दे दी।

     

    उस दिन से, वह छोटी सी कृष्ण की मूर्ति मीरा की सगी साथी बन गई। वे उसके साथ खेलतीं, उसे लाड़ लड़ातीं, उसे ही अपना सब कुछ मानतीं। यह बचपन का भोलापन कब एक गहरे, अटूट प्रेम में बदल गया, किसी को पता ही नहीं चला।

     

    समय बीतता गया और मीरा यौवन की देहरी पर कदम रखने लगीं। वे न केवल अत्यंत रूपवती थीं, बल्कि उनके सुसंस्कार और मधुर व्यवहार की चर्चा भी दूर-दूर तक थी। उस समय उत्तर भारत में राजपूतों की शक्ति को संगठित करने की आवश्यकता थी।

     

    मेवाड़ का सिसोदिया राजवंश उस समय राजपूताना में सबसे शक्तिशाली माना जाता था। मेवाड़ के महाराणा सांगा, जो एक पराक्रमी योद्धा थे, अपने बड़े पुत्र कुँवर भोजराज के लिए एक योग्य वधू की तलाश में थे। राव दूदा और महाराणा सांगा के बीच अच्छे संबंध थे। जब सांगा ने मीरा के रूप, गुण और कुल की ख्याति सुनी, तो उन्होंने मेड़ता में विवाह का प्रस्ताव भेजा।

     

    राजनीतिक दृष्टि से यह एक बहुत मजबूत गठबंधन था। मेड़ता के राठौड़ और चित्तौड़ के सिसोदिया—दोनों मिलकर दिल्ली के सुल्तानों और अन्य आक्रांताओं का बेहतर सामना कर सकते थे। राव दूदा ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

     

     

    जब मीरा को इस विवाह के बारे में पता चला, तो उनके कोमल हृदय पर जैसे वज्र गिर गया। वे तो पहले ही अपना मन, अपना तन, अपना सर्वस्व गिरधर गोपाल को समर्पित कर चुकी थीं। उनके लिए किसी अन्य पुरुष के बारे में सोचना भी पाप था।

     

    लेकिन, उस समय की राजपूती परंपराओं में लड़कियों के पास अपने विवाह के निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं था। वे अपने पिता और कुल की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकती थीं। मीरा एक गहरे अंतर्द्वंद्व (Dilemma) में फँस गईं। एक ओर कर्तव्य की बेड़ियाँ थीं, और दूसरी ओर प्रेम की पुकार।

     

    कहा जाता है कि मीरा ने अपनी कुलदेवी की पूजा की और अपने इष्टदेव कृष्ण से प्रार्थना की। उन्होंने इस रिश्ते को स्वीकार तो किया, लेकिन एक शर्त के साथ—कि वे अपनी कृष्ण मूर्ति को हमेशा अपने साथ रखेंगी और उनकी पूजा-अर्चना में कोई बाधा नहीं डाली जाएगी।

     

     

    मेड़ता में विवाह की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हो गईं। वि.सं. 1573 (लगभग 1516 ई.) में मीरा का विवाह मेवाड़ के युवराज कुँवर भोजराज के साथ अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ। यह विवाह पूरे राजपूताना में चर्चा का विषय था।

    बारात चित्तौड़गढ़ से आई थी, जो अपनी वीरता और भव्यता के लिए प्रसिद्ध था। मीरा को राजसी आभूषणों से सजाया गया। वे एक अप्सरा जैसी लग रही थीं, लेकिन उनके चेहरे पर वह स्वाभाविक खुशी नहीं थी जो एक दुल्हन के चेहरे पर होनी चाहिए। उनकी आँखों में अपने आराध्य से बिछड़ने का डर और एक अज्ञात भविष्य के प्रति चिंता थी।

    विदाई का समय आया। मीरा की डोली जब मेड़ता के किले से निकली, तो पूरा मेड़ता भावुक हो गया। राव दूदा ने अपनी लाड़ली पोती को वह कृष्ण मूर्ति उपहार में दी, जिसे वह बचपन से पूजती आ रही थीं। यह मूर्ति ही अब मीरा का एकमात्र संबल थी।

     

     

    मीराबाई अब मेवाड़ की वधू बनकर चित्तौड़गढ़ पहुँचीं, जो अरावली की पहाड़ियों पर बना एक अभेद्य दुर्ग है। यह दुर्ग वीरता की कहानियों और जौहर की ज्वालाओं का साक्षी रहा है। मीरा का यहाँ भव्य स्वागत किया गया।

    कुँवर भोजराज एक वीर योद्धा थे और वे मीरा के प्रति बहुत संवेदनशील और उदार थे। उन्होंने मीरा की भावनाओं को समझा। इतिहासकार बताते हैं कि भोजराज ने मीरा की पूजा के लिए महल में एक अलग मंदिर बनवाया, जिसे आज भी मीरा मंदिर के नाम से जाना जाता है (जो कुंभ श्याम मंदिर के परिसर में है)।

     

    शुरुआत में, मीरा ने एक आदर्श बहू और पत्नी की भूमिका निभाने की पूरी कोशिश की। उन्होंने राजघराने की सभी रीतियों का पालन किया। लेकिन उनका मन राजकाज या सांसारिक सुखों में नहीं लगता था। जैसे ही उन्हें समय मिलता, वे अपने मंदिर में चली जातीं और घंटों कृष्ण की भक्ति में लीन रहतीं।

     

    मीरा का जीवन जितना बाहर से शांत और भव्य था, अंदर से उतना ही अशांत और चुनौतियों भरा था। राजघराने की परंपराएँ कठोर थीं और पर्दा प्रथा का कड़ाई से पालन होता था। एक महारानी का मंदिरों में जाना, साधु-संतों के साथ बैठना और भजन गाना—यह सब राज परिवार की मर्यादा के विरुद्ध माना जाता था।

     

    मीरा की सास, महाराणा सांगा की पत्नी (कुँवर भोजराज की माता), इस बात से बहुत खफा थीं। उन्हें लगता था कि मीरा का यह व्यवहार उनके कुल की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रहा है। वे मीरा को ताने देतीं और उन्हें रोकने का प्रयास करतीं।

    मीरा की ननद, उदयसिंह की बहन (कुछ स्रोतों के अनुसार कुँवरबाई), भी अक्सर मीरा की आलोचना करती थीं। वे मीरा पर व्यंग्य कसतीं कि उन्होंने लोक-लाज त्याग दी है। मीरा के लिए इन तानों को सहना बहुत कठिन था, लेकिन वे सब कुछ सहती रहीं। उनका उत्तर केवल उनके प्रेमपूर्ण भजन थे।

     

    इन्हीं कठिन परिस्थितियों में मीरा की कविताओं और भजनों का जन्म हुआ। उनके शब्द उनके हृदय की गहराई से निकलते थे। उन्होंने राजस्थानी, ब्रज और गुजराती मिश्रित भाषा में हजारों पद रचे, जिन्हें ‘मीरा पदावली’ के नाम से जाना जाता है।

     

    उनके भजनों में दो धाराएँ थीं—एक तरफ गहरी विरह वेदना (Separation Pain) थी, जिसमें वे अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने के लिए तड़पती थीं। वे खुद को एक ‘बिरहिन’ मानती थीं। दूसरी तरफ, उस मिलन की खुशी और उस अद्वैत प्रेम का वर्णन था, जहाँ आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं।

     

    “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो…”

    “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई…”

    ये भजन आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। उस समय इन भजनों ने पूरे समाज में एक नई चेतना जगा दी। वे राजमहल की चारदीवारी से बाहर निकलकर आम लोगों के दिलों पर छाने लगीं।

     

    मीरा के विवाह के कुछ ही वर्ष बीते थे (लगभग 1521 ई. में), जब मेवाड़ पर एक और विपत्ति आ गई। दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ हुए खातोली के युद्ध में कुँवर भोजराज घायल हो गए और बाद में उनका देहांत हो गया।

    मीरा अभी बहुत युवा थीं और इस घटना ने उन्हें पूरी तरह तोड़कर रख दिया। सांसारिक दृष्टि से, उनका पति, उनका सहारा और उनका रक्षक अब इस दुनिया में नहीं था। राजपूती परंपरा के अनुसार, उस समय सती प्रथा का प्रचलन था, लेकिन मीरा ने सती होने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे तो पहले ही गिरधर गोपाल को अपना पति मान चुकी हैं और वे उन्हीं की ‘सती’ हैं।

     

    भोजराज के निधन के बाद, मीरा का जीवन और भी कठिन हो गया। ससुराल में अब उनके पास कोई ऐसा नहीं था जो उनकी समझ रखता हो। उनका देवर, महाराणा विक्रमादित्य, जो अब गद्दी पर बैठा था, वह और भी रूढ़िवादी और क्रूर था।

     

    महाराणा विक्रमादित्य को मीरा का साधु-संतों के साथ उठना-बैठना और राजघराने की मर्यादा का उल्लंघन करना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने कई बार मीरा को मारने का प्रयास किया।

     

    सबसे प्रसिद्ध कथा विष के प्याले की है। महाराणा ने एक विष का प्याला मीरा के पास भेजा और कहलाया कि यह अमृत है, जिसे पीकर आपको प्रभु का आशीर्वाद मिलेगा। मीरा जानती थीं कि इसमें विष है, लेकिन उन्होंने बिना किसी डर या संकोच के, “कृष्णार्पण” कहकर उस विष को पी लिया।

     

    जनश्रुति है कि प्रभु की कृपा से वह विष मीरा के लिए अमृत बन गया और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा।

    दूसरी कथा में, महाराणा ने मीरा के कमरे में एक फूलों की टोकरी में एक जहरीला काला नाग (कोबरा) रखवाया और उनसे कहा कि इसमें शालिग्राम (विष्णु का प्रतीक पत्थर) हैं। जब मीरा ने टोकरी खोली, तो सचमुच वह नाग एक सुंदर शालिग्राम में बदल गया।

     

    इन चमत्कारों ने लोगों के मन में मीरा के प्रति श्रद्धा और बढ़ा दी। वे अब केवल एक विधवा राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि एक साक्षात् संत और देवी मानी जाने लगीं।

     

    दिन-प्रतिदिन के अत्याचारों और राजघराने की घुटन भरी ज़िंदगी से तंग आकर, मीरा ने चित्तौड़ छोड़ने का निर्णय लिया। वे अब समझ चुकी थीं कि उनकी असली दुनिया चित्तौड़ का राजमहल नहीं, बल्कि उनके गिरधर गोपाल की सेवा है।

     

    उन्होंने एक अंतिम पद गाया, जिसमें उन्होंने अपनी विवशता और अपने निर्णय को स्पष्ट किया:

    “राणा जी, म्हाँने या बदनामी लागे प्यारी।

    सूली ऊपर सेज हमारी, सोवन किस विधि होय?

    गगन ऊपर मंदिर हमारा, तहाँ बसै प्रभु मोय।”

    (अर्थात्: हे राणा, मुझे यह सांसारिक बदनामी अब प्यारी लगने लगी है क्योंकि यह मुझे मेरे प्रभु के करीब लाती है। काँटों की सेज पर मैं कैसे सोऊँ? मेरा मंदिर तो गगन के ऊपर है, जहाँ मेरे प्रभु निवास करते हैं।)

    कहा जाता है कि मीरा चित्तौड़ से निकलकर पहले मेड़ता गई, और फिर वहाँ से वृंदावन की पवित्र भूमि की ओर प्रस्थान कर गईं। वे अब एक साधारण जोगन थीं, जिनके हाथों में एकतारा था और मुँह पर कृष्ण का नाम।

     

    वृंदावन, जो कृष्ण की बाल लीलाओं का साक्षी है, वहाँ पहुँचकर मीरा को परम शांति मिली। उन्होंने खुद को पूरी तरह भक्ति में लीन कर दिया।

    यहाँ एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना का उल्लेख मिलता है। उस समय वृंदावन में गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का बहुत प्रभाव था, जिसके प्रमुख संत रूप गोस्वामी थे। रूप गोस्वामी ने नियम बना रखा था कि वे किसी भी स्त्री से नहीं मिलेंगे।

    जब उन्हें पता चला कि मेवाड़ की महारानी मीराबाई उनसे मिलने आई हैं, तो उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया। इस पर मीरा ने एक बहुत ही मार्मिक संदेश भेजा:

    “मैं जानती थी कि वृंदावन में केवल एक ही पुरुष (कृष्ण) है, और बाकी सब गोपियाँ हैं। आज मुझे पता चला कि यहाँ रूप गोस्वामी भी एक पुरुष हैं।”

     

    इस संदेश ने रूप गोस्वामी को हिला दिया। वे अपनी गलती समझ गए और तुरंत मीरा से मिलने दौड़े। उन्होंने मीरा के चरणों में गिरकर उनसे क्षमा माँगी और उन्हें अपना शिष्य बना लिया।

     

    वृंदावन में कुछ समय बिताने के बाद, मीरा को लगा कि अभी भी उनकी यात्रा पूरी नहीं हुई है। वे वहाँ से द्वारका (गुजरात) के लिए चल पड़ीं, जो कृष्ण की कर्मभूमि और अंतिम विश्राम स्थल है।

     

    द्वारका में, वे रणछोड़ दास (कृष्ण) के मंदिर में रहने लगीं। उन्होंने अपना पूरा समय भजन-कीर्तन और पूजा में बिताया। उनका स्वास्थ्य अब गिरने लगा था, क्योंकि उन्होंने शरीर की बहुत उपेक्षा की थी। वे अत्यंत कमजोर हो गई थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक दिव्य चमक थी।

     

    मीराबाई के जीवन का अंतिम क्षण इतिहास और आस्था का एक अद्भुत संगम है। कहा जाता है कि वि.सं. 1603 (लगभग 1546 ई.) में एक दिन, मीरा मंदिर में गर्भगृह के सामने खड़ी होकर भावविभोर होकर गा रही थीं।

    “म्हाँने चाकर राखो जी, गिरधर लाला चाकर राखो जी…”

    गाते-गाते वे इतनी तल्लीन हो गईं कि ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वे मूर्ति की ओर खिंची चली जा रही हैं। मंदिर के कपाट बंद थे। जब पुजारियों ने कपाट खोले, तो देखा कि मीराबाई अपनी देह में नहीं थीं, बल्कि उनकी साड़ी का एक हिस्सा उस कृष्ण मूर्ति के चरणों से लिपटा हुआ था।

     

    मीराबाई अपने प्रियतम गिरधर गोपाल में समा चुकी थीं। आत्मा परमात्मा से पूर्णतया एक हो गई थी।

    उपसंहार: विवाह जो विच्छेद नहीं, मिलन बना

    मीराबाई का विवाह कुँवर भोजराज के साथ हुआ था, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। लेकिन उनका असली विवाह उस दिन हो गया था, जिस दिन उन्होंने बचपन में वह कृष्ण मूर्ति अपने हाथों में ली थी।

     

    भोजराज के साथ उनका विवाह एक सामाजिक समझौता था, जिसे उन्होंने एक कर्तव्य के रूप में निभाया। लेकिन उनका हृदय, उनकी आत्मा और उनका समर्पण केवल कृष्ण के लिए था।

     

    ससुराल की प्रताड़ना, विष के प्याले और राजसी सुखों का त्याग—इन सबने मिलकर एक साधारण राजकुमारी को एक अमर संत बना दिया। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं, समर्पण है। मीराबाई आज भी हमारे बीच मौजूद हैं—उनके भजनों में, उनकी कविताओं में और उन लाखों लोगों की आस्था में जो प्रेम और भक्ति की शक्ति में विश्वास करते हैं।

     

     

    उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा विवाह दो शरीरों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन होता है, जिसे मृत्यु भी अलग नहीं कर सकती।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • नीले समंदर का रहस्य

    नीले समंदर का रहस्य

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     

    धरती का दो-तिहाई हिस्सा नीले पानी से घिरा हुआ है। इस अनंत, गहरे और रहस्यमयी समंदर के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसके बारे में इंसानों ने केवल कहानियों और कल्पनाओं में ही सुना है। यह जल-परियों (Mermaids) और जलीय जीवों का साम्राज्य था, जिसे ‘अटलांटिस का उपवन’ या स्थानीय भाषा में ‘जल-लोक’ कहा जाता था।

    इस जल-लोक के पानी के भीतर सूरज की किरणें जब छनकर पहुँचती थीं, तो चारों तरफ मोतियों और हीरों जैसी चमक फैल जाती थी। यहाँ पानी के बड़े-बड़े महल थे जो मूँगों (Coral reefs) और रंग-बिरंगे पत्थरों से बने थे। इस जादुई दुनिया की सबसे खास बात यह थी कि यहाँ के जीव-जंतु इंसान की तरह बातें कर सकते थे, और जल-परियाँ अपने खूबसूरत संगीत से पूरे समंदर को महका देती थीं।

    इसी जल-लोक में एक बहुत ही प्यारी, नटखट और जिज्ञासु जल-परी रहती थी, जिसका नाम था मरीना। मरीना की उम्र लगभग पंद्रह वर्ष थी। उसके बाल सुनहरे और समुद्र की लहरों की तरह लंबे और लहराते हुए थे। उसकी पूँछ नीले और हरे रंग के चमकीले छिलकों से ढकी थी, जो पानी के भीतर इंद्रधनुषीय रंग बिखेरती थी।

     

    मरीना को बाकी परियों की तरह सिर्फ तैरना या सुंदर मोतियों से खेलना पसंद नहीं था। उसे हमेशा समंदर की सतह के ऊपर की दुनिया यानी ‘धरती’ के बारे में जानने की तीव्र उत्सुकता रहती थी। वह अक्सर चुपके से समंदर की सतह पर जाती और इंसानों के जहाजों, उड़ते हुए पक्षियों और आसमान में चमकते चाँद को निहारती रहती थी।

    जल-लोक के राजा, जो मरीना के पिता थे, ने हमेशा अपनी बेटियों को चेतावनी दी थी कि इंसानों की दुनिया बहुत खतरनाक और स्वार्थी है। वे मछलियाँ पकड़ते हैं, समंदर के पानी को गंदा करते हैं और अगर उन्होंने किसी जल-परी को देख लिया, तो वे उन्हें कैद कर सकते हैं। लेकिन मरीना का मासूम दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि जो लोग इतने सुंदर गीत गाते हैं और चमकीले शहर बसाते हैं, वे बुरे हो सकते हैं।

     

    एक शाम, जब समंदर शांत था और क्षितिज पर सूरज डूब रहा था, मरीना तैरती हुई बहुत ऊपर, पानी की सतह के करीब आ गई। उसने देखा कि कुछ दूरी पर एक बड़ी लकड़ी की नाव पर कुछ इंसान मजे से मछली पकड़ रहे थे और गिटार बजाकर गा रहे थे। मरीना उनके गीतों की धुन पर मंत्रमुग्ध होकर चट्टान के पीछे छिपकर उन्हें देखने लगी।

    तभी, अचानक मौसम का मिजाज बदल गया। आसमान में काले-काले बादल घिर आए, तेज ठंडी हवाएँ चलने लगीं और समंदर में भयानक लहरें उठने लगीं। वह कोई सामान्य हवा नहीं थी, बल्कि एक चक्रवात (Storm) था, जिसने कुछ ही पलों में विकराल रूप ले लिया।

     

    नाव पर सवार लोग चीखने-चिल्लाने लगे। एक बहुत बड़ी लहर आई और उसने उस छोटी सी नाव को पूरी तरह पलट दिया। नाव पर सवार सभी लोग पानी में डूबने लगे। उनमें से एक युवा लड़का, जिसकी उम्र लगभग सत्रह-अठारह वर्ष रही होगी, पानी में संघर्ष कर रहा था। उसका नाम आर्यन था। आर्यन तैरना जानता था, लेकिन सिर पर चोट लगने के कारण वह बेहोश होने लगा और धीरे-धीरे पानी की गहराई में डूबने लगा।

     

    मरीना का दिल यह सब देखकर पसीज गया। उसने अपने पिता की वह चेतावनी भुला दी कि “इंसानों से दूर रहना।” उसने बिना एक पल गंवाए अपनी ताकतवर पूँछ को फड़फड़ाया और सीधे उस डूबते हुए लड़के की तरफ तेजी से तैरी।

     

    मरीना ने पानी के भीतर ही आर्यन को अपनी बाहों में थामा। उसका शरीर भारी था, लेकिन मरीना की जल-परी वाली जादुई ताकतों ने उसे असीम ऊर्जा दी। उसने आर्यन को अपनी पीठ पर लादा और अपनी पूरी ताकत से समंदर के एक सुरक्षित और सुनसान किनारे (रेत के एक छोटे से टापू) की तरफ तैरने लगी।

     

    कुछ ही देर में, मरीना आर्यन को खींचते हुए एक शांत और सुरक्षित समुद्र तट पर ले आई। उसने आर्यन को धीरे से रेत पर लिटा दिया। आर्यन बेहोश था और उसके मुँह से पानी निकल रहा था। मरीना ने अपनी हथेलियों से उसके सीने को सहलाया और समंदर के जादुई पानी की कुछ बूंदें उसके होठों पर डालीं।

     

    कुछ ही पलों में आर्यन ने खाँसी के साथ अपनी आँखें खोलीं। उसने धुंधली आँखों से देखा कि उसके सामने एक बेहद खूबसूरत युवती बैठी है, जिसके बाल पानी में भीगे हुए थे और पैरों की जगह एक चमकदार नीली और हरी पूँछ थी। आर्यन को लगा कि शायद वह सपना देख रहा है या फिर उसे कोई भ्रम हो रहा है।

     

    आर्यन ने काँपते हुए स्वर में पूछा, “तुम… तुम कौन हो? क्या तुम कोई परी हो?”

    मरीना मुस्कुराई, लेकिन वह बोल नहीं सकती थी जब वह पानी से बाहर होती थी, क्योंकि जल-परियों की जुबान केवल पानी के भीतर ही काम करती है, या फिर जब वे अपनी जादुई शक्ति से इंसानी रूप लें। लेकिन उस वक्त मरीना के पास इतनी शक्ति नहीं थी। उसने अपने हाथों से इशारों में उसे सुरक्षित होने का भरोसा दिलाया।

     

    तभी दूर से कुछ लोगों के चिल्लाने की आवाज आई—”आर्यन! आर्यन! तुम कहाँ हो?” आर्यन के दोस्त और परिवार के लोग उसे ढूँढते हुए उसी तट की तरफ आ रहे थे।

    आर्यन ने मुड़कर देखा और जब वह वापस पलटा, तो चट्टान के पीछे केवल पानी में लहरों की हलचल दिखाई दे रही थी। मरीना पानी के अंदर वापस जा चुकी थी। उसके दिल में आर्यन के लिए एक अजीब सा अपनापन और कसक पैदा हो गई थी। वह समझ गई थी कि इंसानों की दुनिया से उसका यह पहला परिचय उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाला है।

     

    जब मरीना वापस जल-लोक पहुँची, तो उसका दिल बहुत बेचैन था। वह हर वक्त बस आर्यन के बारे में सोचती रहती थी। उसने अपनी इस बात का जिक्र अपनी सबसे करीबी सहेली जारा से किया। जारा ने उसे समझाया, “मरीना, यह बहुत खतरनाक है। इंसान और जल-परियों की दुनिया कभी एक नहीं हो सकती। अगर राजा को पता चला, तो वह बहुत क्रोधित होंगे।”

     

    लेकिन प्रेम और जिज्ञासा की भावना नियमों से बहुत बड़ी होती है। मरीना ने जल-लोक के सबसे पुराने और बुद्धिमान जीव—एक विशाल नीली व्हेल और प्राचीन कछुए ‘ओल्ड सेज’ से मदद माँगने का फैसला किया। वह उस प्राचीन गुफा में गई जहाँ समंदर का जादू निवास करता था।

     

    वहाँ उसने समंदर की देवी के सामने प्रार्थना की। उसकी सच्ची और निश्छल भावना को देखकर समंदर की देवी ने उसे एक विशेष वरदान दिया। देवी ने उसे एक जादुई मोती दिया और कहा, “मरीना, यह मोती तुम्हें केवल एक बार इंसान का रूप दे सकता है। जब तुम इस मोती को अपने दिल के पास रखोगी, तो तुम्हारी पूँछ पैरों में बदल जाएगी और तुम इंसानों की भाषा बोल सकोगी। लेकिन याद रखना, यह जादू केवल तीन दिनों के लिए रहेगा। अगर तीसरे दिन सूर्यास्त तक तुमने समुद्र का पानी नहीं छुआ, तो तुम हमेशा के लिए इंसान बन जाओगी और कभी वापस जल-लोक नहीं लौट पाओगी।”

     

    मरीना ने बिना किसी डर के उस जादुई मोती को स्वीकार कर लिया। उसे आर्यन से दोबारा मिलने और उसकी दुनिया को करीब से देखने का अवसर मिल गया था।

     

    अगली सुबह, जब सूरज की किरणें समंदर के तट पर पड़ीं, मरीना पानी के किनारे उथले हिस्से में आई। उसने उस जादुई मोती को अपने सीने से लगाया। एक तेज़ नीली रोशनी ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। जब रोशनी कम हुई, तो उसकी नीली पूँछ गायब हो चुकी थी और उसकी जगह इंसानों जैसे दो कोमल पैर आ गए थे। उसने एक खूबसूरत सूती गाउन पहन रखा था, जो समंदर के झाग जैसा सफेद था।

     

    मरीना ने पहली बार रेत पर अपने पैरों से कदम रखा। उसे चलना थोड़ा अजीब लग रहा था, लेकिन उसकी आँखों में चमक थी। वह सीधे उसी शहर की तरफ बढ़ी जिसके पास आर्यन रहता था। वह शहर समुद्र के किनारे बसा एक सुंदर और छोटा सा मछुआरों का गाँव था, जहाँ रंग-बिरंगे घर बने हुए थे।

     

    मरीना ने रास्ते में एक घर के बाहर बैठे एक बूढ़े आदमी से पूछा, “क्या आप आर्यन को जानते हैं?”

    बूढ़े आदमी ने अचरज से उसे देखा और कहा, “हाँ बेटा, आर्यन तो वही लड़का है जो कल समंदर के तूफान में डूबते-डूबते बचा था। वह सामने वाले नीले घर में रहता है।”

    मरीना तेजी से उस नीले घर की तरफ बढ़ी और दरवाजा खटखटाया। जब दरवाजा खुला, तो सामने खुद आर्यन खड़ा था। आर्यन ने जब उसे देखा, तो वह हैरान रह गया। उसे कल रात वाली घटना और वह जल-परी याद आ गई। उसने तुरंत पहचान लिया कि यह वही लड़की है जिसने उसकी जान बचाई थी, भले ही इस बार उसके पैर थे।

     

    आर्यन ने खुशी से कहा, “तुम! तुम वही हो ना? कल रात… समंदर किनारे… तुमने मेरी जान बचाई थी!”

    मरीना ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ आर्यन, मैं ही हूँ। मेरा नाम मरीना है।”

     

    अगले दो दिनों तक आर्यन ने मरीना को अपनी पूरी दुनिया दिखाई। उन्होंने गाँव के बाजारों का दौरा किया, फूलों के बागों में घूमे, और एक-दूसरे के साथ अपने जीवन की बातें साझा कीं। आर्यन को मरीना की हर बात में एक अनोखा सम्मोहन महसूस होता था। मरीना जब भी समंदर या हवाओं के बारे में बात करती, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ जाती थी। आर्यन को कब मरीना से प्यार हो गया, उसे खुद पता नहीं चला। मरीना का दिल भी आर्यन के प्यार में पूरी तरह डूब चुका था।

     

    लेकिन, इस प्रेम कहानी में खलल डालने के लिए एक शख्स तैयार बैठा था—गगन। गगन उस गाँव का सबसे चालाक और लालची मछुआरा था। कुछ दिन पहले जब समंदर में तूफान आया था, तो गगन ने दूर से देखा था कि एक अजीब सी परछाई (जल-परी) आर्यन को बचाकर बाहर ला रही है। गगन ने ठान लिया था कि वह उस रहस्यमयी जीव को पकड़कर राजा या बड़े वैज्ञानिकों को बेचेगा ताकि वह रातों-रात अमीर बन सके।

     

    गगन ने आर्यन पर नजर रखनी शुरू कर दी। उसने देखा कि आर्यन एक अजनबी लड़की के साथ घूम रहा है जिसके बारे में गाँव में किसी को कुछ नहीं पता। गगन को शक हुआ कि यह वही रहस्यमयी जल-परी है जिसने मानव रूप धारण कर लिया है।

     

    तीसरे दिन की शाम आ चुकी थी। सूर्यास्त होने में अब बस कुछ ही घंटे बाकी थे। मरीना को याद आया कि अगर वह समय पर समंदर में वापस नहीं गई, तो वह हमेशा के लिए इंसानी दुनिया में कैद हो जाएगी और कभी अपने परिवार से नहीं मिल पाएगी। उसके मन में एक तरफ आर्यन का प्यार था, तो दूसरी तरफ अपने जल-लोक का परिवार।

    मरीना ने भारी मन से आर्यन से कहा, “आर्यन, मुझे अब जाना होगा। मेरा समय पूरा होने वाला है।”

     

    आर्यन ने उसका हाथ थामते हुए कहा, “नहीं मरीना, तुम कहीं नहीं जाओगी। मैं तुमसे प्यार करता हूँ। तुम यहीं मेरे साथ इस दुनिया में रहो।”

    मरीना की आँखों में आँसू आ गए। वह भी आर्यन से दूर नहीं जाना चाहती थी, लेकिन तभी वहाँ अचानक गगन अपने कुछ साथियों के साथ आ गया। गगन के हाथ में एक मोटा जाल और एक भारी जंजीर थी।

     

    गगन ने चीखते हुए कहा, “पकड़ो इस लड़की को! यह कोई साधारण इंसान नहीं है, यह वही समंदर की परी है, जो हमारे जाल की मछलियों को भगाती है और हमारे रहस्यों को चुराती है!”

     

    आर्यन बीच में आ गया और उसने गुस्से से कहा, “दूर रहो इससे गगन! यह मेरी दोस्त है!”

    गगन ने धक्का देकर आर्यन को जमीन पर गिरा दिया और अपने आदमियों को आदेश दिया कि वे मरीना को पकड़ लें। गगन के हाथ में एक विशेष धातु का कांटा था जो जल-परियों की शक्तियों को कमजोर कर सकता था।

     

    गगन ने मरीना को पकड़ने की कोशिश की। मरीना घबरा गई। उसे पता था कि अगर उसे किसी ने नुकसान पहुँचाया या समय निकल गया, तो सब कुछ खत्म हो जाएगा। उसके पास अपनी जल-परी वाली शक्तियाँ वापस पाने का केवल एक ही तरीका था—तुरंत समंदर के पानी को छूना।

    मरीना ने अपनी पूरी ताकत इकट्ठा की और गगन को धक्का देकर गाँव के उस रास्ते की तरफ भागी जो सीधे समुद्र तट की ओर जाता था। पीछे से गगन और उसके आदमी उसका पीछा कर रहे थे। आर्यन भी उठकर उनके पीछे भागा ताकि वह मरीना की रक्षा कर सके।

     

    दौड़ते-दौड़ते मरीना समंदर की रेतीली ढलान पर आ गई। सामने नीला समंदर अपनी लहरों के साथ उसका इंतजार कर रहा था। लेकिन तभी गगन ने एक भारी पत्थर उसकी तरफ फेंका, जो मरीना के पैरों पर लगा। मरीना दर्द से कराहती हुई रेत पर गिर पड़ी। सूर्यास्त होने ही वाला था—आसमान में लालिमा छा चुकी थी।

     

    गगन उसके करीब आ गया और उसने जादुई मोती को देखने की कोशिश की जो मरीना के गले में चमक रहा था। गगन ने कहा, “लाओ इधर, यह जादुई चीज मुझे दे दो!”

    ठीक उसी समय, आर्यन वहाँ पहुँच गया। आर्यन ने पीछे से आकर गगन को कसकर दबोच लिया और दोनों के बीच हाथापाई शुरू हो गई। आर्यन ने चिल्लाकर कहा, “मरीना! जल्दी करो! समंदर बस कुछ कदम दूर है!”

     

    मरीना ने अपनी बची-कुची ताकत का इस्तेमाल किया। वह घसीटते हुए रेत पर आगे बढ़ी और जैसे ही उसने अपना हाथ पानी के अंदर डुबोया, एक तेज़ जादुई विस्फोट हुआ। समंदर की लहरें उफ़्फ़ान पर आ गईं और एक बहुत बड़ी पानी की चादर ने मरीना को घेर लिया।

     

    रोशनी इतनी तेज़ थी कि गगन और उसके साथी अपनी आँखें बंद करने पर मजबूर हो गए। जब रोशनी शांत हुई, तो वहाँ कोई लड़की नहीं थी। वहाँ पानी के भीतर एक खूबसूरत नीली पूँछ वाली जल-परी तैर रही थी, जिसकी आँखों में आँसू थे लेकिन चेहरे पर एक सुकून का भाव था।

    अध्याय 8: दो दुनियाओं का मिलन और अमर प्रेम

    मरीना पानी के अंदर तैरते हुए समंदर की सतह पर आई। उसने देखा कि आर्यन सुरक्षित खड़ा है और गगन अपनी नाकामी पर गुस्से से काँप रहा है।

     

    मरीना ने पानी के भीतर से अपनी जादुई आवाज में गाना शुरू किया। वह कोई साधारण गीत नहीं था, बल्कि समंदर का वह प्राचीन संगीत था जो दिलों के बंधन को जोड़ता है। उस संगीत के प्रभाव से गगन और उसके आदमियों को एक गहरी नींद आने लगी और वे वहीं रेत पर बैठ गए।

    आर्यन ने पानी के करीब आकर नम आँखों से कहा, “मरीना… क्या तुम जा रही हो?”

     

    मरीना ने पानी से बाहर अपना हाथ निकाला और आर्यन के हाथ को छुआ। उसने जल-लोक की भाषा और इंसानी भाषा के बीच के सेतु को पार करते हुए कहा, “आर्यन, मेरा दिल हमेशा तुम्हारे पास रहेगा। जल-लोक मेरा घर है, लेकिन मेरा प्यार इस समंदर के किनारे तुम्हारे साथ बंधा हुआ है। जब भी तुम्हें मेरी याद आए, इस समंदर की लहरों को सुनना, तुम्हें मेरा गीत सुनाई देगा।”

     

    आर्यन ने उसका हाथ थामे हुए कहा, “मैं हर शाम इस समंदर के किनारे तुम्हारा इंतजार करूंगा, मरीना। जब तक सांस चलेगी, मेरा प्यार कम नहीं होगा।”

    सूर्यास्त पूरा हो चुका था। मरीना ने एक प्यारी सी मुस्कान दी और अपनी चमकदार पूँछ को हवा में लहराते हुए नीले समंदर की अगाध गहराइयों में वापस उतर गई। पानी के बुलबुले धीरे-धीरे शांत हो गए।

     

    वर्षों बीत गए। वह गाँव आज भी समंदर के किनारे बसा है। लोग कहते हैं कि आज भी जब पूर्णिमा की रात होती है और समंदर में शांत लहरें उठती हैं, तो एक जल-परी का मधुर संगीत सुनाई देता है। और उस तट पर एक बूढ़ा व्यक्ति (जो कभी युवा आर्यन था) अपनी आँखों में प्यार और इंतज़ार की चमक लिए समंदर को निहारता रहता है।

    यह कहानी इस बात की गवाही देती है कि प्यार की कोई सीमा

    नहीं होती चाहे वह जमीन की दुनिया हो या समंदर की गहराई, सच्चा प्रेम हमेशा अमर रहता है।

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    Lakshmi Kumari

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  • यहाँ ‘इच्छाधारी नागिन के प्यार’

    यहाँ ‘इच्छाधारी नागिन के प्यार’

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

     

    नागिन की अमर प्रेम कहानी: प्रतिशोध से मिलन तक

    प्राचीन काल से ही इच्छाधारी नागिनों की कहानियाँ भारतीय लोककथाओं का हिस्सा रही हैं। ये कहानियाँ अक्सर बदले, रहस्य और अलौकिक शक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। लेकिन इन सबके बीच, एक ऐसी कहानी भी है जो नफरत से शुरू होकर निस्वार्थ प्रेम और बलिदान की मिसाल बन गई। यह कहानी है इच्छाधारी नागिन ‘चंद्रमुखी’ और राजकुमार ‘आदित्य’ की।

     

    चंद्रमुखी नागलोक की राजकुमारी थी। वह अपूर्व सुंदरी थी और उसके पास इच्छाधारी होने की अद्भुत शक्तियाँ थीं। अपनी इच्छा के अनुसार वह कोई भी रूप धारण कर सकती थी। एक पूर्णिमा की रात, वह मानव रूप धारण कर धरती पर एक शिव मंदिर में दर्शन करने आई।

     

    उसी समय, पास के राज्य का राजकुमार आदित्य भी उसी मंदिर में आया। जब आदित्य की नज़र चंद्रमुखी पर पड़ी, तो वह जैसे मोहित हो गया। चंद्रमुखी ने भी पहली बार किसी मानव के प्रति अपने हृदय में एक अजीब सी धड़कन महसूस की। वह साधारण आकर्षण नहीं था, बल्कि आत्माओं का मिलन था।

     

    दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ। चंद्रमुखी ने अपनी पहचान छिपाई, लेकिन आदित्य को उससे गहरा प्रेम हो गया। चंद्रमुखी भी आदित्य की सादगी और निश्छल प्रेम पर अपना दिल हार बैठी। वे दोनों अपने प्रेम के स्वप्नलोक में खोए हुए थे।

     

    लेकिन, नियति को कुछ और ही मंजूर था। नागलोक के नियमों के अनुसार, एक इच्छाधारी नागिन का मानव से विवाह वर्जित था। जब नागलोक के राजा (चंद्रमुखी के पिता) को इस प्रेम के बारे में पता चला, तो वे क्रोधित हो गए। उन्होंने चंद्रमुखी को वापस बुला लिया और उसे सख्त हिदायत दी कि वह आदित्य को भूल जाए।

    चंद्रमुखी के लिए यह असहनीय था। उसने अपने पिता के सामने गिड़गिड़ाया, लेकिन वे नहीं माने। तब चंद्रमुखी ने एक कठोर निर्णय लिया। उसने अपनी अलौकिक शक्तियों का त्याग कर दिया और एक साधारण मानव के रूप में धरती पर रहने का संकल्प लिया।

     

    जब आदित्य को इस बात का पता चला, तो वह भी राजमहल छोड़कर चंद्रमुखी के पास आ गया। दोनों ने एक छोटे से गाँव में अपना जीवन शुरू किया। उनका प्रेम परीक्षा की इस घड़ी में और भी मजबूत हो गया।

     

    लेकिन, उनकी खुशियाँ ज्यादा दिन नहीं टिकीं। नागलोक का सेनापति, जो चंद्रमुखी से एकतरफा प्रेम करता था, इस अपमान को सहन नहीं कर सका। उसने आदित्य को मारने की योजना बनाई।

    एक दिन, जब आदित्य जंगल से गुजर रहा था, सेनापति ने उस पर जानलेवा हमला किया। आदित्य गंभीर रूप से घायल हो गया। जब चंद्रमुखी को यह पता चला, तो वह भागकर जंगल में पहुँची। उसने देखा कि आदित्य मरणासन्न अवस्था में पड़ा है।

     

    उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसे पता था कि अब सिर्फ एक ही रास्ता है—उसे अपनी ‘नागमणि’ का एक अंश आदित्य के शरीर में डालना होगा ताकि उसकी जान बच सके। लेकिन ऐसा करने से चंद्रमुखी की सारी शक्तियाँ हमेशा के लिए समाप्त हो जाएँगी और वह साधारण मानव से भी कमजोर हो जाएगी।

     

    बिना एक पल सोचे, चंद्रमुखी ने अपनी नागमणि का अंश आदित्य के शरीर में प्रवाहित कर दिया। तेज़ रोशनी हुई और चंद्रमुखी बेहोश होकर गिर पड़ी। आदित्य धीरे-धीरे होश में आने लगा, लेकिन चंद्रमुखी की जान खतरे में थी।

     

    जब चंद्रमुखी की आँख खुली, तो उसने देखा कि आदित्य जीवित है। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर संतोष का भाव था। आदित्य को जब पूरी सच्चाई पता चली, तो उसने चंद्रमुखी को गले लगा लिया।

    उस दिन से, चंद्रमुखी ने अपनी सारी शक्तियाँ खो दीं। वह एक साधारण मानव बन गई थी, लेकिन आदित्य के लिए वह अब भी एक देवी थी। उनका प्रेम किसी जादू से कम नहीं था।

     

    उनकी कहानी दूर-दूर तक फैल गई। लोग उन्हें प्रेम की अमरता का प्रतीक मानने लगे। चंद्रमुखी और आदित्य का प्रेम इस बात का प्रमाण था कि सच्चा प्यार अलौकिक शक्तियों, नियमों और बाधाओं से परे होता है।

    यह कहानी हमें सिखाती है कि जब हम किसी से निस्वार्थ प्रेम करते हैं, तो हम अपने सुख और स्वार्थ का त्याग करने से भी नहीं हिचकिचाते। इच्छाधारी नागिन चंद्रमुखी का प्रेम न केवल उसके बदले को भूलने में सक्षम था, बल्कि अपने प्रेमी के जीवन को बचाने के लिए खुद को मिटाने में भी समर्थ था। उनका मिलन एक अंतहीन प्रेम कहानी का प्रतीक बन गया।

     

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    Lakshmi Kumari

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