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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • भूतिया गुड़िया (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    सब कुछ अचानक बदल चुका था।

     

    पुरानी काली हवेली अब नई दिखाई दे रही थी।

     

    दीवारों पर दीपक जल रहे थे।

     

    आँगन में एक बच्ची खेल रही थी।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके पास लाल फ्रॉक वाली गुड़िया थी।

     

    लेकिन कुछ ही दूरी पर एक और बच्ची खड़ी थी।

     

    वह तारा थी।

     

    तारा की आँखों में डर था।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    एक कमरे से किसी आदमी की आवाज़ आ रही थी।

     

    “तुम दोनों में से एक ही इस घर की वारिस होगी।”

     

    यह रुद्र प्रताप की आवाज़ थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़ा।

     

    दरवाज़े के पीछे रुद्र प्रताप खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी काली किताब थी।

     

    वह कुछ मंत्र पढ़ रहा था।

     

    आरव समझ गया कि यह सिर्फ किसी बच्ची की हत्या की कहानी नहीं थी।

     

    इसके पीछे कोई भयानक रहस्य था।

     

    तभी सावित्री कमरे में आई।

     

    “आप ये क्या कर रहे हैं?”

     

    रुद्र ने किताब बंद कर दी।

     

    “जिसे मैंने शुरू किया है, उसे पूरा करना होगा।”

     

    “लेकिन ये हमारी बेटियाँ हैं!”

     

    रुद्र ने ठंडी आवाज़ में कहा, “बेटियाँ नहीं… रास्ता हैं।”

     

    आरव ने किताब के पन्नों पर नजर डाली।

     

    उसमें लिखा था कि हवेली के नीचे एक प्राचीन शक्ति बंद थी। उसे जगाने के लिए एक मासूम बच्चे की आत्मा चाहिए थी।

     

    रुद्र ने मीरा को चुना था।

     

    लेकिन तारा ने उसे देख लिया था।

     

    इसीलिए उसने तारा को कुएँ में धकेल दिया।

     

    लेकिन योजना असफल हो गई।

     

    तारा मरने के बाद भी मीरा के पास लौट आई।

     

    रुद्र ने मीरा को उसी कमरे में बंद कर दिया।

     

    और फिर…

     

    वह रात आई।

     

    मीरा ने अपनी गुड़िया को सीने से लगाया और रोते हुए कहा—

     

    “तारा मुझे लेने आएगी।”

     

    कमरे के अंदर अचानक ठंडी हवा चली।

     

    गुड़िया की आँखें चमक उठीं।

     

    तारा की आत्मा वहाँ प्रकट हुई।

     

    उसने मीरा का हाथ पकड़ा।

     

    दोनों बच्चियाँ एक-दूसरे से लिपट गईं।

     

    रुद्र कमरे में पहुँचा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उन्हें छुआ, वह चीख पड़ा।

     

    उसकी त्वचा काली पड़ने लगी।

     

    कमरे की दीवारों से काली परछाइयाँ निकलने लगीं।

     

    रुद्र भागने लगा।

     

    लेकिन दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    फिर दोनों बच्चियों की आवाज़ गूँजी—

     

    “अब तुम्हारी बारी है।”

     

    कुछ ही सेकंड में कमरा शांत हो गया।

     

    रुद्र गायब था।

     

    सिर्फ उसकी काली किताब जमीन पर पड़ी थी।

     

    आरव यह सब देख रहा था।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “अब तुम समझ गए।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    मीरा और तारा उसके सामने खड़ी थीं।

     

    लेकिन अब वे डरावनी नहीं लग रही थीं।

     

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

     

    “हमें आज़ाद करो।”

     

    आरव ने पूछा, “कैसे?”

     

    तारा ने अपनी गुड़िया की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे तोड़ना होगा।”

     

    आरव ने गुड़िया उठाई।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उसे जमीन पर पटकने की कोशिश की, उसका हाथ रुक गया।

     

    उसकी उँगलियाँ सुन्न हो गईं।

     

    गुड़िया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    फिर एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “उसे मत छूना।”

     

    कमरे में अचानक अंधेरा छा गया।

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    एक विशाल काली परछाई आरव के सामने खड़ी हो गई।

     

    वह रुद्र की आत्मा थी।

     

    “यह गुड़िया मेरी है।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    रुद्र की आत्मा ने कहा, “मैंने इसे बनाया है। इसमें मीरा की आत्मा कैद है। और तारा उसकी रखवाली करती है।”

     

    आरव ने कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    परछाई हँसी।

     

    “तुम्हें लगता है ये दोनों तुम्हें आज़ाद करना चाहती हैं?”

     

    तभी मीरा चीखी—

     

    “आरव! गुड़िया तोड़ दो!”

     

    आरव ने पूरी ताकत से गुड़िया को जमीन पर दे मारा।

     

    धड़ाम!

     

    गुड़िया का सिर टूट गया।

     

    एक तेज चीख पूरे घर में गूँज गई।

     

    रुद्र की परछाई पीछे हट गई।

     

    लेकिन अगले ही पल गुड़िया के टूटे हुए शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    धुआँ पूरे कमरे में फैल गया।

     

    आरव को लगा कि कोई उसके गले को दबा रहा है।

     

    तभी तारा ने मीरा का हाथ पकड़ा।

     

    दोनों ने एक साथ कहा—

     

    “आज हमारा खेल खत्म होगा।”

     

    अचानक कमरे में तेज सफेद रोशनी फैल गई।

     

    रुद्र की आत्मा चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    एक पल बाद सब शांत हो गया।

     

    आरव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    जब उसकी आँखें खुलीं, वह हवेली के उसी पुराने कमरे में था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    उसके हाथ में गुड़िया का टूटा हुआ सिर था।

     

    लेकिन अब उसके चेहरे पर कोई डरावनी मुस्कान नहीं थी।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    आरव ने राहत की साँस ली।

     

    वह घर लौट आया।

     

    गाँव वालों को पूरी कहानी बताई।

     

    बूढ़े ने उसकी बात सुनकर कहा—

     

    “अब शायद दोनों बच्चियों को मुक्ति मिल गई है।”

     

    काली हवेली को बाद में पूरी तरह बंद कर दिया गया।

     

    उस कमरे को ईंटों से चुनवा दिया गया।

     

    कुछ दिनों बाद आरव शहर लौट गया।

     

    उसने उस घटना के बारे में किसी से बात नहीं की।

     

    लेकिन एक रात…

     

    लगभग तीन महीने बाद…

     

    आरव अपने कमरे में बैठा था।

     

    अचानक उसे एक आवाज़ सुनाई दी।

     

    टक… टक… टक…

     

    उसने दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फर्श पर एक छोटी-सी लाल गुड़िया पड़ी थी।

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उसने गुड़िया उठाई।

     

    उसके गले में एक नया लॉकेट था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “तारा।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी उसके पीछे से एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    उसने धीरे-धीरे पलटकर देखा।

     

    कमरे के कोने में मीरा खड़ी थी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    और उसके पीछे…

     

    तारा खड़ी थी।

     

    दोनों ने एक साथ कहा—

     

    “हमने कहा था ना… खेल अभी खत्म नहीं हुआ।”

     

    अचानक कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ दो जोड़ी काली आँखें चमक रही थीं।

     

    फिर एक गुड़िया की हँसी सुनाई दी—

     

    “ही… ही… ही…”

     

    और उसी रात से आरव के घर के सामने रहने वाले लोगों ने एक अजीब चीज़ देखनी शुरू कर दी।

     

    हर रात ठीक तीन बजे आरव की खिड़की में दो छोटी बच्चियाँ दिखाई देती थीं।

     

    एक लाल फ्रॉक पहने हुए।

     

    दूसरी सफेद कपड़ों में।

     

    और उनके बीच में…

     

    एक गुड़िया।

     

    कहते हैं, अगर कोई उस खिड़की की तरफ लगातार देखता रहे…

     

    तो कुछ देर बाद उन दोनों बच्चियों में से एक धीरे-धीरे अपना हाथ उठाती है…

     

    और खिड़की के शीशे पर उँगली से सिर्फ एक शब्द लिखती है—

     

    “खेलोगे?”

     

    उसके बाद वह घर कभी खाली नहीं रहता।

     

    क्योंकि जहाँ वह गुड़िया पहुँचती है…

     

    वहाँ से उसकी कहानी कभी खत्म नहीं होती।

     

    समाप्त… या शायद नहीं।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • महादेव भक्त से मिलने पहुंचे

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    महादेव अपने भक्त से मिलने आए

     

    रतीराम और मतिराम दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे। दोनों की हालत पिछले कई सालों से खराब चल रही थी। घर में खाने तक के लाले पड़े रहते थे। कभी मजदूरी मिल जाती तो चूल्हा जल जाता, वरना दोनों परिवारों को खाली पेट ही सोना पड़ता।

     

    लेकिन गरीबी से ज्यादा उन्हें एक और चीज ने तोड़ दिया था—शराब।

     

    शाम होते ही दोनों गांव के बाहर बनी छोटी-सी शराब की दुकान पर पहुंच जाते और अपनी सारी कमाई वहीं उड़ा देते।

     

    उस दिन भी दोनों ने दिनभर मजदूरी की थी। शाम को हाथ में आए कुछ पैसे लेकर शराब की दुकान पर पहुंचे और खूब शराब पी ली।

     

    रतीराम लड़खड़ाते हुए बोला, “मतिराम… हमारी किस्मत ही खराब है रे। देख, दिनभर हड्डियां तोड़ो और रात को भी पेट खाली।”

     

    मतिराम ने हंसते हुए कहा, “किस्मत खराब नहीं है रतीराम… भगवान ही हमारे खिलाफ हैं।”

     

    रतीराम ने बोतल का आखिरी घूंट पीते हुए कहा, “हां… भगवान अगर होते तो हमारी ये हालत क्यों होती?”

     

    दोनों सड़क पर हिलते-डुलते आगे बढ़ने लगे।

     

    रात काफी हो चुकी थी। गांव की सड़क लगभग सुनसान थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।

     

    अचानक सामने से उन्हें एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    उसके हाथ में लकड़ी की एक पुरानी छड़ी थी। कपड़े बेहद साधारण थे और वह इतना धीरे-धीरे चल रहा था कि हर कदम पर ऐसा लगता जैसे अभी गिर जाएगा।

     

    मतिराम ने उसे देखकर कहा, “अरे हटो बाबा… सड़क के बीच में क्यों चल रहे हो?”

     

    बूढ़ा कुछ बोल पाता, उससे पहले दोनों उससे टकरा गए।

     

    धड़ाम!

     

    बूढ़ा सड़क पर गिर पड़ा।

     

    रतीराम और मतिराम भी लड़खड़ाकर कुछ कदम पीछे हो गए।

     

    मतिराम झल्लाकर बोला, “अरे बाबा! देखकर नहीं चल सकते?”

     

    बूढ़े ने धीरे से सिर उठाया।

     

    उसके चेहरे पर अजीब सी शांति थी।

     

    उसने कहा, “गलती तुम्हारी थी बेटा… फिर भी तुम मुझे ही दोष दे रहे हो?”

     

    रतीराम कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    उस बूढ़े की आंखों में उसे कुछ ऐसा दिखाई दे रहा था, जिसे वह समझ नहीं पा रहा था।

     

    उसने मतिराम से कहा, “चल, इसे उठा देते हैं।”

     

    दोनों ने बूढ़े को उठाया।

     

    बूढ़ा खड़ा हुआ और अपनी छड़ी के सहारे कुछ कदम आगे बढ़ा। फिर अचानक रुक गया।

     

    “रतीराम…”

     

    रतीराम के पैर वहीं जम गए।

     

    उसने घबराकर पूछा, “आप… मेरा नाम कैसे जानते हो?”

     

    बूढ़ा पलटा।

     

    “मतिराम… तुम भी यही सोच रहे हो न कि मैंने तुम्हारा नाम कैसे जाना?”

     

    मतिराम का नशा जैसे एक पल में उतरने लगा।

     

    वह बोला, “आप कौन हैं?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “जिसे तुमने आज शाम दोष दिया था… उसी को तुम सालों से पुकारते भी आए हो।”

     

    रतीराम और मतिराम एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    रतीराम बोला, “हमने तो भगवान को कभी देखा ही नहीं।”

     

    बूढ़े ने कहा, “लेकिन तुम्हारे घर के कोने में शिव की एक छोटी-सी मूर्ति आज भी रखी है।”

     

    रतीराम की आंखें फैल गईं।

     

    वह मूर्ति उसकी मां ने उसे बचपन में दी थी।

     

    मां के गुजरने के बाद भी उसने वह मूर्ति संभालकर रखी थी।

     

    बूढ़ा बोला, “तुम भूल गए रतीराम, लेकिन तुम्हारी मां नहीं भूली थी।”

     

    रतीराम के चेहरे पर डर और हैरानी साफ दिखाई देने लगी।

     

    बूढ़ा धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम बचपन में रोज मेरे सामने बैठकर प्रार्थना करते थे। कहते थे—’महादेव, जब मैं बड़ा होऊंगा तो गरीबों की मदद करूंगा। किसी भूखे को खाली हाथ नहीं लौटाऊंगा।’”

     

    रतीराम की आंखों में बचपन की तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    उसे अपनी मां याद आ गई।

     

    मंदिर की घंटियां याद आ गईं।

     

    और वह छोटी सी शिव प्रतिमा भी याद आ गई।

     

    वह कांपती आवाज में बोला, “लेकिन… मैं बदल गया।”

     

    बूढ़े ने कहा, “गरीबी ने तुम्हें नहीं बदला बेटा… तुम्हारे फैसलों ने बदला।”

     

    मतिराम चुपचाप खड़ा था।

     

    तभी बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और तुम मतिराम… तुम्हें याद है वह बरसात का दिन?”

     

    मतिराम ने सिर झुका लिया।

     

    “कौन सा दिन?”

     

    “जब तुम्हारे पास सिर्फ दो रोटियां थीं और तुमने उनमें से एक रोटी रास्ते में बैठे बूढ़े को दे दी थी?”

     

    मतिराम के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    वह घटना उसे धुंधली-सी याद थी।

     

    बूढ़े ने कहा, “उस दिन तुमने कहा था ‘बाबा, मेरे पास ज्यादा नहीं है, लेकिन आधा आपका है।’”

     

    मतिराम की आंखें भर आईं।

     

    “वो तो बहुत साल पहले की बात है।”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “भगवान के लिए साल पुराने नहीं होते। कर्म पुराने नहीं होते। इंसान भूल जाता है, लेकिन कर्म अपना रास्ता नहीं भूलते।”

     

    अचानक हवा तेज चलने लगी।

     

    बूढ़े की छड़ी जमीन पर गिर गई।

     

    रतीराम उसे उठाने के लिए झुका।

     

    लेकिन जैसे ही उसने सिर उठाया…

     

    वह बूढ़ा वहां नहीं था।

     

    सड़क के बीच सिर्फ उसकी लकड़ी की छड़ी पड़ी थी।

    दोनों घबरा गए।

     

    अचानक दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।

    टन… टन… टन…

    रतीराम की नजर आसमान की तरफ उठी।

     

    बादलों के बीच से चांद की रोशनी निकली और उसी रोशनी में उसे एक विशाल त्रिशूल की परछाईं दिखाई दी।

     

    मतिराम कांपते हुए बोला, “रतीराम… वो बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था।”

     

    रतीराम की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उसने हाथ जोड़ लिए।

     

    “महादेव…”

     

    तभी उनके कानों में एक शांत आवाज आई

     

    “मैं तुम्हें सजा देने नहीं आया था। मैं तुम्हें तुम्हारा रास्ता याद दिलाने आया था।”

     

    दोनों सड़क पर बैठ गए।

     

    रतीराम रोते हुए बोला, “महादेव… हमने आपको दोष दिया। अपनी गलतियों का दोष भी आपके सिर डाल दिया। हमें माफ कर दीजिए।”

     

    आवाज फिर आई”माफी शब्दों से नहीं, कर्मों से मांगो।”

     

    अगली सुबह गांव वालों ने देखा कि रतीराम और मतिराम शराब की दुकान पर नहीं गए।

     

    दोनों मजदूरी करने निकले।

     

    शाम को जब मजदूरी मिली तो रतीराम ने पैसे घर ले जाकर अपनी पत्नी के हाथ में रख दिए।

     

    पत्नी ने हैरानी से पूछा, “आज शराब नहीं पी?”

     

    रतीराम मुस्कुराया।

     

    “आज समझ आया है कि गरीबी हमारी दुश्मन नहीं थी… हमारी गलत आदतें थीं।”

     

    उधर मतिराम ने रास्ते में एक भूखे बच्चे को देखा।

     

    उसने अपनी मजदूरी से खाना खरीदा और बच्चे को दे दिया।

    बच्चे ने मुस्कुराकर कहा, “भगवान आपको खुश रखे।”

     

    मतिराम कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

    उसे वही बूढ़ा याद आ गया।

     

    कुछ दिनों बाद दोनों ने गांव के पुराने शिव मंदिर की सफाई शुरू कर दी।

     

    जिस मंदिर में कभी रतीराम बचपन में बैठकर महादेव से प्रार्थना करता था, वहां अब फिर दीपक जलने लगा।

     

    एक शाम रतीराम ने मंदिर में सिर झुकाकर कहा

     

    “महादेव, उस रात आपने बूढ़े का रूप लेकर हमें नहीं बचाया था… आपने हमें हमारे ही पुराने रूप से मिलाया था।”

     

    मतिराम ने कहा, “और हमारे कर्मों की याद दिलाकर हमें दूसरा मौका दिया।”

    मंदिर की घंटी अचानक अपने आप बज उठी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

    रतीराम मुस्कुराया।

     

    “चल मतिराम… लगता है महादेव ने हमारी बात सुन ली।”

     

    मतिराम ने हाथ जोड़कर कहा”महादेव को सुनाने के लिए शब्द नहीं चाहिए होते… सच्चा मन चाहिए।”

     

    उस दिन के बाद दोनों ने शराब छोड़ दी।

    गरीबी तुरंत खत्म नहीं हुई।

     

    मुश्किलें भी खत्म नहीं हुईं।

    लेकिन अब उनके पास मुश्किलों से लड़ने की हिम्मत थी।

    और गांव वाले अक्सर कहते थे

    “जिस रात दो नशे में डूबे आदमी एक बूढ़े से टकराए थे, उसी रात उनकी जिंदगी बदल गई थी। क्योंकि वह बूढ़ा कोई इंसान नहीं… स्वयं महादेव थे, जो अपने भूले हुए भक्तों को उनका रास्ता याद दिलाने आए थे।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • ताक़तवर पेड़

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जादुई जंगल का ताकतवर पेड़

     

    बहुत दूर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच एक ऐसा जंगल था, जिसका नाम था मायावी वन।

     

    कहा जाता था कि यह कोई साधारण जंगल नहीं था। वहाँ पेड़ चलते थे, नदियाँ अपना रास्ता बदल लेती थीं और रात के समय आसमान में ऐसे सितारे दिखाई देते थे जो आम दुनिया में कभी नहीं दिखते थे।

     

    लेकिन उस जंगल की सबसे बड़ी पहचान एक पेड़ था।

     

    उसका नाम था अमरवृक्ष।

     

    लोग कहते थे कि अगर कोई इंसान उस पेड़ तक पहुँचकर उसे अपने हाथों से छू ले, तो उसके अंदर ऐसी शक्ति आ जाती थी कि वह दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान बन सकता था।

     

    वह हवा को अपने इशारे पर मोड़ सकता था, पानी को रोक सकता था और अपनी ताकत से बड़े-बड़े पत्थर तक उठा सकता था।

     

    लेकिन समस्या यह थी कि आज तक कोई उस पेड़ तक पहुँच ही नहीं पाया था।

     

    कई राजा, सैनिक और जादूगर उसे खोजने जंगल में गए थे।

     

    कुछ वापस लौट आए, लेकिन वे पेड़ तक नहीं पहुँच सके।

     

    और कुछ तो कभी वापस ही नहीं आए।

     

    धीरे-धीरे लोगों ने मान लिया कि अमरवृक्ष सिर्फ एक कहानी है।

     

    लेकिन पहाड़ों के पास रहने वाला एक सत्रह साल का लड़का सोहन इन बातों पर विश्वास करता था।

     

    उसके पिता बचपन से उसे उस पेड़ की कहानी सुनाते आए थे।

     

    एक दिन सोहन ने पूछा, “पिताजी, अगर वह पेड़ सच में इतना ताकतवर है तो किसी ने उसे देखा क्यों नहीं?”

     

    उसके पिता ने कहा, “क्योंकि वह पेड़ ताकत हर किसी को नहीं देता।”

     

    “तो किसे देता है?”

     

    पिता कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “जिसके दिल में ताकत पाने की लालच नहीं होती।”

     

    सोहन को यह बात समझ नहीं आई।

     

    “लेकिन कोई उस पेड़ को ढूंढेगा ही क्यों अगर उसे ताकत नहीं चाहिए?”

     

    पिता मुस्कुराए।

    “यही तो अमरवृक्ष की सबसे बड़ी पहेली है।”

     

    कुछ साल बाद सोहन के पिता अचानक गायब हो गए।

     

    उनके कमरे में सिर्फ एक पुराना नक्शा मिला।

     

    नक्शे पर मायावी वन बना था और उसके बीच लाल स्याही से एक निशान लगाया गया था।

     

    सोहन समझ गया कि उसके पिता अमरवृक्ष की तलाश में गए थे।

    उसने उसी दिन जंगल जाने का फैसला कर लिया।

     

    अगली सुबह वह अपना छोटा सा बैग लेकर मायावी वन की तरफ निकल पड़ा।

    जंगल के अंदर जाते ही उसे महसूस हुआ कि यहाँ कुछ अलग था।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

    फिर अचानक एक पेड़ की शाखा उसके सामने आकर रास्ता रोकने लगी।

    सोहन पीछे हट गया।

     

    शाखा धीरे-धीरे वापस ऊपर चली गई।

    “तो कहानी सच है,” सोहन ने खुद से कहा।

    वह आगे बढ़ता गया।

    कुछ दूर जाने के बाद उसे तीन रास्ते दिखाई दिए।

    नक्शे पर भी तीन रास्ते बने थे।

     

    पहले रास्ते के ऊपर लिखा था जो सबसे आसान दिखे, वही सबसे खतरनाक है।”

     

    दूसरे रास्ते के ऊपर लिखा था“जो डराए, जरूरी नहीं कि वह दुश्मन हो।”

     

    और तीसरे रास्ते पर लिखा था“जिसे चुनोगे, वही तुम्हें बदलेगा।”

     

    सोहन काफी देर तक तीनों रास्तों को देखता रहा।

     

    आखिर उसने दूसरा रास्ता चुना।

     

    जैसे ही वह आगे बढ़ा, जंगल अचानक अंधेरा हो गया।

     

    उसके सामने एक विशाल काला भेड़िया आकर खड़ा हो गया।

     

    सोहन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    भेड़िया गुर्राया।

     

    सोहन ने हाथ में पकड़ी लकड़ी कसकर पकड़ ली।

     

    लेकिन भेड़िया अचानक मुड़ा और आगे चलने लगा।

     

    सोहन को अपने पिता की बात याद आई—

     

    “जो डराए, जरूरी नहीं कि वह दुश्मन हो।”

     

    वह भेड़िए के पीछे चल पड़ा।

     

    कुछ दूर जाकर भेड़िया एक चट्टान के पास रुका और गायब हो गया।

     

    वहाँ पत्थर पर एक छोटा सा चिन्ह बना था।

     

    सोहन ने नक्शे को उससे मिलाया।

     

    “ये रास्ता सही है!”

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    लेकिन तभी जमीन हिलने लगी।

     

    पेड़ों के बीच से आवाज आई—

     

    “वापस चले जाओ…”

     

    सोहन रुक गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “तुम्हें ताकत चाहिए… इसलिए तुम यहाँ तक आए हो।”

     

    सोहन ने कहा, “नहीं!”

     

    जंगल में हँसी गूँज उठी।

     

    “हर इंसान ताकत चाहता है।”

     

    सोहन कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा, “मुझे ताकत चाहिए… लेकिन खुद के लिए नहीं।”

     

    जंगल अचानक शांत हो गया।

     

    सोहन ने आगे कहा

    “मेरे पिता को इस जंगल ने मुझसे छीन लिया है। मैं उन्हें ढूंढने आया हूँ। अगर अमरवृक्ष सच में उन्हें जानता है, तो मैं उसके पास जाऊँगा।”

     

    अचानक उसके सामने रास्ता खुल गया।

     

    पेड़ों के बीच से सुनहरी रोशनी आने लगी।

    सोहन की आँखें उस रोशनी से चौंधिया गईं।

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

    और फिर जो उसने देखा, उसे देखकर उसकी सांस रुक गई।

    एक विशाल पेड़ उसके सामने खड़ा था।

     

    उसका तना चाँदी जैसा चमक रहा था।

     

    उसकी शाखाएँ आसमान तक फैली थीं और उन पर हजारों सुनहरे पत्ते लगे थे।

     

    हर पत्ता हवा के बिना भी हिल रहा था।

    सोहन समझ गय यही अमरवृक्ष था।

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास गया।

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

    लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियाँ पेड़ को छूने वाली थीं, सामने अचानक उसके पिता दिखाई दिए।

     

    “सोहन!”

    वह खुशी से चिल्लाया।

    “पिताजी!”

    सोहन उनकी तरफ दौड़ा।

    लेकिन पिता धुंध की तरह गायब हो गए।

    सोहन समझ गया कि यह पेड़ की परीक्षा थी।

    तभी अमरवृक्ष से आवाज आई

    “अगर तुम्हें शक्ति मिल जाए, तो तुम सबसे पहले क्या करोगे?”

    सोहन ने कहा, “मैं अपने पिता को ढूंढूँगा।”

    “और उसके बाद?”

    “मैं उन लोगों की मदद करूँगा जिन्हें अपनी रक्षा करने के लिए किसी ताकतवर इंसान की जरूरत है।”

    “और अगर तुम्हारे पास दुनिया की सबसे बड़ी ताकत आ जाए?”

    सोहन ने कुछ पल सोचा।

    फिर बोला

    “तो मैं कोशिश करूँगा कि उस ताकत का इस्तेमाल किसी को डराने के लिए न हो।”

    पेड़ की शाखाएँ चमकने लगीं।

    सुनहरी रोशनी पूरे जंगल में फैल गई।

     

    सोहन ने धीरे से पेड़ को छू लिया।

    अचानक उसके शरीर के चारों तरफ तेज हवा घूमने लगी।

    जमीन हिलने लगी।

    उसके हाथों में चमकती रोशनी दिखाई दी।

    उसके अंदर एक ऐसी शक्ति जाग चुकी थी जिसकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी।

    लेकिन तभी पेड़ ने कहा“तुमने मेरी शक्ति पा ली है।”

    सोहन ने आश्चर्य से पूछा, “तो अब मैं दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान हूँ?”

    पेड़ ने उत्तर दिया नहीं।”

    सोहन चौंक गया।

    “क्यों?”

    “क्योंकि असली ताकत शरीर में नहीं होती।”

     

    पेड़ की जड़ें अचानक चमकने लगीं।

     

    और जमीन के नीचे से एक रास्ता खुल गया।

    सोहन ने नीचे देखा।

     

    वहाँ एक छोटी सी गुफा थी।

    गुफा की दीवार पर उसके पिता का नाम लिखा था।

     

    सोहन की आँखें भर आईं।

    वह समझ गया कि उसके पिता अभी जीवित हो सकते हैं।

     

    लेकिन तभी पेड़ की आवाज फिर गूँजी“अगर तुम उन्हें बचाना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी नई शक्ति की पहली परीक्षा देनी होगी।”

    सोहन ने पूछा “कैसी परीक्षा?”

    अचानक जंगल के दूसरे छोर से एक भयानक गर्जना सुनाई दी।

    पेड़ों के पत्ते कांपने लगे।

    सोहन ने पीछे मुड़कर देखा।

    अंधेरे के बीच दो विशाल चमकती आँखें दिखाई दे रही थीं।

     

    पेड़ ने कहा“वह इस जंगल का रक्षक है।”

     

    सोहन ने अपनी मुट्ठी बांधी।

    अब उसे समझ आ गया था कि अमरवृक्ष तक पहुँचना ही असली मंजिल नहीं थी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • जंगल के बीच फंसे कियान नैन तारा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    पहाड़ों के जंगल में नैन तारा और कियान

     

    नैन तारा को बचपन से ही पहाड़ बहुत पसंद थे। जब भी टीवी पर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, झरने और घने जंगल दिखाई देते, वह घंटों उन्हें देखती रहती।

     

    एक दिन उसने अपने माता-पिता से कहा, “मुझे इस बार पहाड़ों की सैर पर अकेले जाना है।”

     

    उसकी माँ ने तुरंत मना कर दिया।

     

    “अकेले? बिल्कुल नहीं। तुम अभी इतनी बड़ी नहीं हुई हो कि अनजान जगह पर अकेली घूम सको।”

     

    नैन तारा ने मुँह बनाते हुए कहा, “माँ, मैं बच्ची नहीं हूँ। मैं अपना ध्यान रख सकती हूँ।”

     

    पिता ने भी समझाया, “बात तुम्हारे बच्ची होने की नहीं है। पहाड़ों पर रास्ते कभी भी बदल जाते हैं और जंगल में जाना तो बिल्कुल सुरक्षित नहीं।”

     

    लेकिन नैन तारा अपनी जिद पर अड़ी रही।

     

    कई दिनों तक वह माता-पिता से इसी बात को लेकर बहस करती रही। आखिरकार एक सुबह वह बिना किसी को बताए पास के पहाड़ी इलाके की तरफ निकल गई। उसके पास थोड़ा पानी, कुछ खाने का सामान, एक जैकेट और छोटा सा बैग था।

     

    शुरुआत में सब कुछ उसकी उम्मीद से भी अच्छा था।

     

    चारों तरफ ऊँचे पहाड़ थे। दूर कहीं झरने की आवाज आ रही थी और ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी।

     

    नैन तारा मुस्कुराई।

     

    “देखा! मैं बेकार में ही डर रही थी।”

     

    वह एक पतली पगडंडी पर आगे बढ़ती चली गई।

     

    उसे लगा कि यह रास्ता शायद किसी छोटे से गाँव तक जाता होगा।

     

    लेकिन लगभग एक घंटे बाद रास्ता अचानक दो हिस्सों में बंट गया।

     

    नैन तारा रुक गई।

     

    “अब किधर जाऊँ?”

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    जिस रास्ते से वह आई थी, वह भी पेड़ों के बीच कहीं गायब-सा हो चुका था।

     

    वह थोड़ी घबराई, लेकिन खुद को संभालते हुए बोली, “ठीक है… वापस चलते हैं।”

     

    वह वापस मुड़ी, मगर कुछ कदम चलने के बाद उसे एहसास हुआ कि वह रास्ता पहचान नहीं पा रही थी।

     

    धीरे-धीरे जंगल घना होता जा रहा था।

     

    पेड़ों की शाखाएँ ऊपर इतनी फैल चुकी थीं कि सूरज की रोशनी भी जमीन तक मुश्किल से पहुँच रही थी।

     

    नैन तारा के कदम रुक गए।

     

    “ओह नहीं… मैं सच में खो गई।”

     

    उसने अपना फोन निकाला, लेकिन नेटवर्क नहीं था।

     

    उसने माँ को फोन करने की कोशिश की।

     

    कॉल नहीं लगी।

     

    उसकी आँखों में डर साफ दिखाई देने लगा।

     

    तभी दूर झाड़ियों में कुछ हिला।

     

    नैन तारा ने ध्यान से देखा।

     

    दो चमकती हुई आँखें उसे घूर रही थीं।

     

    उसका शरीर डर से बिल्कुल स्थिर हो गया।

     

    झाड़ियों से एक भेड़िया धीरे-धीरे बाहर आया।

     

    नैन तारा पीछे हटने लगी।

     

    भेड़िया भी उसकी ओर बढ़ने लगा।

     

    उसके मुँह से हल्की गुर्राहट निकल रही थी।

     

    नैन तारा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने भागने की कोशिश नहीं की। उसे समझ आ गया था कि भागना स्थिति को और खतरनाक बना सकता है।

     

    वह धीरे-धीरे पीछे हटते हुए एक पेड़ के पास पहुँच गई।

     

    तभी ऊपर से पत्तों के हिलने की आवाज आई।

     

    नैन तारा ने डरकर ऊपर देखा।

     

    एक लड़का पेड़ की मोटी शाखा पर बैठा था।

     

    लगभग इक्कीस साल का वह लड़का शांत नजर आ रहा था। उसके कंधे पर एक छोटा बैग था और हाथ में लकड़ी की मजबूत छड़ी।

     

    अगले ही पल वह पेड़ से नीचे कूद गया और नैन तारा के सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “पीछे हटो!” उसने नैन तारा से कहा।

     

    लड़के की आवाज सख्त थी।

     

    नैन तारा तुरंत कुछ कदम पीछे हो गई।

     

    लड़के ने भेड़िए की तरफ देखा और ऊँची आवाज में उसे दूर जाने के लिए डराया।

     

    भेड़िया कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

     

    फिर लड़के की तरफ देखकर पीछे हटने लगा और थोड़ी देर बाद झाड़ियों के बीच गायब हो गया।

     

    नैन तारा ने राहत की सांस ली।

     

    “तुम… कौन हो?”

     

    लड़के ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरा नाम कियान है।”

     

    “तुम यहाँ अकेले क्या कर रहे हो?”

     

    कियान ने हल्की नाराजगी से पूछा, “पहले ये बताओ कि तुम यहाँ अकेली क्या कर रही हो?”

     

    नैन तारा चुप हो गई।

     

    “मैं… घूमने आई थी।”

     

    “घूमने?”

     

    “हाँ।”

     

    “और रास्ता भूल गई?”

     

    नैन तारा ने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    कियान ने लंबी सांस ली।

     

    “तुम्हें पता भी है कि तुम कितनी दूर जंगल के अंदर आ चुकी हो?”

     

    नैन तारा ने घबराकर पूछा, “कितनी?”

     

    “इतनी कि अकेले वापस जाना ठीक नहीं होगा।”

     

    यह सुनकर नैन तारा के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “तो अब क्या होगा?”

     

    कियान ने कहा, “पहले घबराना बंद करो। जब तक हम शांत रहेंगे, रास्ता ढूँढना आसान होगा।”

     

    नैन तारा उसके पीछे चलने लगी।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसने पूछा, “तुम्हें ये जंगल इतना अच्छी तरह कैसे पता है?”

     

    कियान ने जवाब दिया, “मैं यहीं आसपास रहता हूँ। बचपन से इन पहाड़ों और जंगलों में घूमता आया हूँ।”

     

    वह चलते-चलते पेड़ों पर बने छोटे निशान देख रहा था।

     

    नैन तारा ने पूछा, “तुम ये निशान क्यों देख रहे हो?”

     

    “ये पुराने रास्ते के संकेत हैं। बारिश और भूस्खलन की वजह से कई रास्ते बदल गए हैं, इसलिए ध्यान से चलना पड़ता है।”

     

    कुछ देर बाद दोनों को एक छोटी सी पहाड़ी धारा दिखाई दी।

     

    कियान ने कहा, “यहाँ थोड़ी देर आराम कर लेते हैं।”

     

    नैन तारा पत्थर पर बैठ गई।

     

    उसने अपना फोन फिर देखा।

     

    अब भी नेटवर्क नहीं था।

     

    उसकी आँखें भर आईं।

     

    “मेरे माँ-पापा बहुत परेशान हो रहे होंगे।”

     

    कियान कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “जब हम सुरक्षित बाहर निकलेंगे, सबसे पहले उन्हें फोन करना।”

     

    नैन तारा ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे उनसे झूठ बोलकर यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    कियान ने कहा, “गलती हो गई है तो अब उसे दोहराना मत। अभी हमारा ध्यान बाहर निकलने पर होना चाहिए।”

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    लेकिन शाम होते-होते मौसम अचानक बदल गया।

     

    आसमान पर काले बादल छा गए।

     

    ठंडी हवा तेज होने लगी।

     

    कियान ने चारों तरफ देखा।

     

    “हमें जल्दी कोई सुरक्षित जगह ढूँढनी होगी।”

    नैन तारा ने पूछा, “क्यों?”

    “पहाड़ों में मौसम का भरोसा नहीं होता।”

    कुछ ही मिनट बाद बारिश शुरू हो गई।

    दोनों एक बड़ी चट्टान के नीचे बने प्राकृतिक छज्जे में जाकर खड़े हो गए।

    बारिश तेज होती जा रही थी।

    नैन तारा चुपचाप बाहर देख रही थी।

    अचानक उसे दूर पहाड़ के दूसरी तरफ एक हल्की-सी रोशनी दिखाई दी।

    “कियान! वहाँ देखो!”

    कियान ने रोशनी की तरफ देखा।

    उसके चेहरे पर पहली बार राहत की झलक आई।

     

    “वो शायद पहाड़ी रास्ते पर बने पुराने वन-चौकी की रोशनी है।”

    “तो हम वहाँ जा सकते हैं?”

    “बारिश थोड़ी कम होने दो।”

    नैन तारा ने धीरे से पूछा, “कियान… अगर तुम आज यहाँ नहीं होते तो?”

    कियान ने उसकी बात बीच में रोक दी।

    “उस बारे में मत सोचो। अब तुम सुरक्षित हो।”

    बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी।

    कियान ने अपना बैग उठाया।“चलो।”

    दोनों सावधानी से उस रोशनी की दिशा में बढ़ने लगे।

    लेकिन जैसे ही वे चट्टान के पीछे से निकले, कियान अचानक रुक गया।

    उसने जमीन पर कुछ देखा।

    कीचड़ में बने ताजे पैरों के निशान।

    वे किसी इंसान के थे।

    नैन तारा ने पूछा, “क्या हुआ?”

    कियान ने जवाब नहीं दिया।

    उसने कुछ दूर जंगल की ओर देखा।

    फिर धीमी आवाज में बोला“हम इस जंगल में अकेले नहीं हैं।”

    नैन तारा का चेहरा डर से बदल गया।

    “मतलब?”

    कियान ने उसकी ओर देखा।

    “मुझे नहीं पता… लेकिन ये निशान अभी-अभी किसी ने छोड़े हैं।”

    दोनों कुछ पल वहीं खड़े रहे।

     

    दूर अंधेरे जंगल में अचानक किसी सूखी टहनी के टूटने की आवाज आई।

    कियान ने नैन तारा को पीछे रहने का इशारा किया।

    और उसी पल पेड़ों के बीच एक परछाईं तेजी से हिली…

    नैन तारा ने डरकर कियान की तरफ देखा।

     

    अब सवाल सिर्फ जंगल से बाहर निकलने का नहीं था।

     

    सवाल यह था कि उस सुनसान जंगल में उनके अलावा तीसरा कौन था?

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • राम जैसा पति या रावण जैसा राक्षस

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    सांझ के धुंधलके में जब रसोई की खिड़की से छनकर पीली धूप स्लैब पर रखी मसालदानी पर पड़ती, तो सुमित्रा जी अक्सर एक लंबी सांस लेकर रुक जातीं। उनके हाथ में सब्जी काटने वाला हसिया रुक जाता और वे तन्मयता से सोचने लगतीं आखिर एक औरत के जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता किसमें है? क्या वह आदर्श की उस मूरत में है जिसे युगों से ‘राम’ कहा गया है, या फिर उस शक्तिशाली, प्रतापी और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व में जिसे दुनिया ‘रावण’ के रूप में जानती है?

    यह सवाल सुमित्रा जी ने अपनी बेटी शालिनी की शादी तय होने से ठीक पहले उठाया था। शालिनी आज के दौर की पढ़ी-लिखी, स्वतंत्र सोच वाली और एक सॉफ्टवेयर कंपनी में सीनियर लीड पद पर काम करने वाली लड़की थी। उसने जीवनसाथी चुनने के मामले में अपनी माँ के सामने एक अजीब सी उलझन रख दी थी।

     

    शालिनी के सामने जब दो रिश्ते आए, तो उसकी उलझन बढ़ गई। पहला रिश्ता था आदर्श कुमार का। नाम की तरह ही आदर्श एक शांत, संभले हुए और हर नियम-कायदे को मानने वाले इंसान थे। वे बैंक में मैनेजर थे। उनका जीवन एक घड़ी के पेंडुलम की तरह अनुशासित था सुबह समय पर उठना, दफ्तर जाना, शाम को घर लौटना, बुजुर्गों का आदर करना और परिवार की हर छोटी-बड़ी इच्छा का खयाल रखना।

    शालिनी की सहेलियों ने आदर्श को देखते ही कह दिया था, “अरे शालिनी, तुझे तो आधुनिक युग का राम मिल गया है! कितना संस्कारी, शांत और आज्ञाकारी पति है। इसके साथ तेरी जिंदगी स्वर्ग जैसी हो जाएगी।”

     

    शादी के शुरुआती महीने बड़े सुकून से बीते। आदर्श वाकई एक आदर्श पति साबित हो रहे थे। वे घर के कामों में हाथ बंटाते, शालिनी की प्रोफेशनल महत्वाकांक्षाओं का सम्मान करते और कभी भी ऊंची आवाज में बात नहीं करते थे। लेकिन धीरे-धीरे, उस आदर्शवादिता के आवरण के पीछे छिपी एक अजीब सी घुटन शालिनी को महसूस होने लगी।

    एक दिन, शालिनी दफ्तर से थकी-हारी लौटी। किसी प्रोजेक्ट की असफलता के कारण उसका मूड बेहद खराब था। वह चाहती थी कि कोई उसे सुने, उसके गुस्से को समझे, या कम से कम उसे थोड़ी देर के लिए अपने हाल पर छोड़ दे। लेकिन आदर्श अपनी चिर-परिचित शांत और न्यायप्रिय मुद्रा में बैठ गए।

     

    उन्होंने बड़े ही संयमित और ठंडे स्वर में कहा, “शालिनी, जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। तुम्हें इतना विचलित नहीं होना चाहिए। संयम रखो, क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। कल सुबह जल्दी उठना, पूजा करना, सब ठीक हो जाएगा।”

     

    उस रात शालिनी को नींद नहीं आई। उसने छत की तरफ़ देखते हुए सोचा—क्या एक सही पति वही है जो हमेशा ‘सही’ होने का ढोंग करे? राम का चरित्र मर्यादाओं में बंधा हुआ था। उन्होंने समाज के नियमों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए अपनी रानी सीता तक का त्याग कर दिया था। क्या आधुनिक जीवन में एक ‘राम’ जैसा पति वह गर्माहट, वह बेबाक अपनापन और वह पागलपन दे सकता है जो एक औरत को यह महसूस करा सके कि वह इस दुनिया में सबसे खास है?

     

    आदर्श के साथ रहते हुए शालिनी को ऐसा लगने लगा जैसे वह किसी मंदिर की मूर्ति के साथ रह रही हो—जो सुंदर है, पूजनीय है, लेकिन जिसके भीतर दिल की धड़कनें महसूस नहीं होतीं। वहाँ कोई गलती करने की गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि राम की तरह आदर्श कभी कोई गलती नहीं कर सकते थे। और जो कभी गलती नहीं करता, वह शायद इंसान भी पूरी तरह नहीं हो पाता।

     

    इस उधेड़बुन के बीच, शालिनी की जिंदगी में राजीव का प्रवेश हुआ। राजीव उस कंपनी का क्लाइंट था जिसके साथ शालिनी डील कर रही थी। राजीव को पहली नजर में देखने पर कोई भी सहम सकता था। वह बेहद महत्त्वाकांक्षी, अपने फैसलों पर अडिग, जरा-जरा सी बात पर गुस्सा हो जाने वाला और अपनी शर्तों पर दुनिया चलाने वाला इंसान था।

    उसके भीतर एक अजीब सा अहंकार और अपार आकर्षण था। लोग उसकी पीठ पीछे उसे ‘रावण’ कहते थे—जो ज्ञानी तो बहुत था, संगीत और वेदों का प्रकांड पंडित था, लेकिन जिसकी इच्छाओं और अहंकार की कोई सीमा नहीं थी, जो हर कीमती चीज पर अपना अधिकार जमाना चाहता था।

    एक दिन जब शालिनी ऑफिस के एक तनावपूर्ण प्रोजेक्ट को लेकर परेशान थी और आदर्श का फोन आया जिसमें वे सिर्फ ‘धैर्य रखने’ की सलाह दे रहे थे, तभी राजीव ने शालिनी केबिन में आकर सीधे कहा, “यह प्रोजेक्ट फेल होने की कगार पर है क्योंकि तुम्हारी टीम के उस मैनेजर में रीढ़ की हड्डी नहीं है। उसे अभी निकालो बाहर। मैं तुम्हें इस पोजीशन पर देखना चाहता हूँ और तुम इसके काबिल हो।”

    शालिनी ने चौंककर कहा, “लेकिन राजीव, नियमों के मुताबिक…”

     

    राजीव ने बीच में ही रोकते हुए हँसकर कहा, “नियम कमजोर लोग बनाते हैं ताकि वे अपनी कमियों को छुपा सकें। दुनिया ताकतवर की सुनती है, नियमों की नहीं।”

    उस दिन शालिनी के मन में उथल-पुथल मच गई। क्या राजीव एक ‘राक्षस’ था? हाँ, उसके भीतर वह क्रूरता, वह स्वामित्व की भावना (possessiveness) और वह अहंकार था जो पौराणिक रावण में था। वह हर चीज को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता था। लेकिन दूसरी तरफ, उस ‘राक्षस’ में एक ऐसी जीवंतता थी, एक ऐसा जुनून था जो राम जैसे शांत और तटस्थ चरित्र में कभी नहीं मिल सकता था।

    राजीव अपनी पसंद को लेकर जुनूनी था। वह शालिनी की तारीफ करने से कतराता नहीं था, उसकी आंखों में आँखें डालकर बात करता था और उसके सपनों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता था—भले ही वह तरीका अनैतिक क्यों न हो।

    समाज का तराजू और स्त्री का आंतरिक द्वंद्व

    जब सुमित्रा जी को अपनी बेटी के इस मानसिक संघर्ष का पता चला, तो उन्होंने एक रात शालिनी को अपने पास बिठाया। उन्होंने प्यार से शालिनी के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, सदियों से हमें यही सिखाया गया है कि पुरुष में ‘राम’ की तलाश करो। एक ऐसा पुरुष जो आज्ञाकारी हो, मर्यादा पुरुषोत्तम हो, जो समाज की नजरों में कभी दागदार न हो। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि उस राम के साथ रहने वाली सीता ने भीतर से कितनी अकेलेपन की आग झेली है?”

    शालिनी ने अपनी माँ की आँखों में देखा। सुमित्रा जी आगे बोलीं, “राम ने राज्य के लिए, कुल की मर्यादा के लिए अपनी पत्नी को अग्निपरीक्षा देने को कहा और फिर जंगल में अकेले छोड़ दिया। वह पति के रूप में आदर्श थे, लेकिन क्या वे एक स्त्री के मन को पूरी तरह समझ पाए? इसके विपरीत, रावण भले ही एक राक्षस था, अपनी वासना और अहंकार के कारण नष्ट हुआ, लेकिन उसने अपनी रानी मंदोदरी को वह सम्मान और अधिकार दिया, उसकी बुद्धि का लोहा माना। हालांकि, रावण का अहंकार उसके विनाश का कारण बना क्योंकि वह किसी और की वस्तु को जबरन छीनना चाहता था।”

    यह बात शालिनी के दिल को चीर गई। उसने महसूस किया कि आज की आधुनिक नारी के सामने यह सवाल बहुत गहरा है: क्या उसे एक ऐसा पति चाहिए जो समाज की नजरों में ‘संत’ हो लेकिन घर की चारदीवारी में बर्फ की तरह ठंडा और भावनाओं से विहीन हो? या फिर एक ऐसा पुरुष चाहिए जो अपनी ऊर्जा और जुनून से उसे जलाकर खाक कर दे, जो अहंकारी हो, जो नियंत्रण करना चाहता हो?

     

    शालिनी ने कुछ दिनों का एकांत लिया। उसने न तो आदर्श के पास लौटना उचित समझा और न ही राजीव के उस खतरनाक सम्मोहन में पूरी तरह डूबने का फैसला किया। उसने महसूस किया कि मनुष्य का मन पौराणिक कथाओं के सांचे में पूरी तरह फिट नहीं बैठ सकता।

    आदर्श में जहां शांति और स्थिरता थी, वहीं एक प्रकार की जड़ता भी थी जो इंसान को मशीन बना देती है। दूसरी ओर, राजीव में जो आग और महत्वाकांक्षा थी, वह रचनात्मक कम और विनाशकारी ज्यादा थी वह प्यार कम और अधिकार ज्यादा जताना चाहता था।

     

    एक शाम, बालकनी में खड़े होकर शालिनी ने खुद से एक कड़ा सवाल पूछा। क्या प्रेम का कोई तीसरा विकल्प नहीं हो सकता? क्या एक पुरुष को या तो अपनी भावनाओं का गला घोंटकर ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनना होगा, या फिर अपनी वासना और अहंकार के रथ पर सवार होकर ‘राक्षस’ बनना होगा?

     

    शालिनी को अहसास हुआ कि असल जिंदगी में न तो कोई पूर्ण राम होता है और न ही कोई पूर्ण रावण। हर इंसान के भीतर थोड़ा राम और थोड़ा रावण साथ-साथ वास करता है। जरूरत इस बात की है कि आप किसके किस पहलू को स्वीकार करते हैं।

    यदि आप एक ऐसा जीवन चाहते हैं जहाँ सुरक्षा हो, शांति हो, कोई विवाद न हो, तो आपको राम जैसे शांत और रूखे व्यक्तित्व के साथ समझौता करना होगा। लेकिन यदि आप एक ऐसा रोमांचक, चुनौतीभरा और तीव्र जीवन चाहते हैं जहाँ हर पल एक युद्ध हो, जहाँ तीव्रता हो, तो आपको रावण जैसी ऊर्जा और उसके साथ आने वाले विनाश का जोखिम उठाना पड़ेगा।

     

     

    रात गहरी हो चुकी थी। नीचे सड़क पर गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनी दीवारों पर आ-जा रही थी। शालिनी ने अपनी चाय का कप उठाया और एक लंबी सांस ली।

    उसकी उलझन अब थोड़ी सुलझ रही थी। उसे समझ आ गया था कि उसे न तो किसी ऐसे पति की तलाश है जो भगवान बनकर उस पर शासन करे और उसकी हर गलती को न्याय की तराजू में तौले, और न ही ऐसे किसी राक्षस की जो उसके वजूद को अपनी महात्वाकांक्षा के पाँव तले कुचल दे। उसे एक ऐसा इंसान चाहिए था जो गलती करे तो माफी मांग सके, जो ताकतवर हो लेकिन संवेदनशील भी हो, जो मर्यादाओं का गुलाम न हो बल्कि अपने विवेक से प्यार करना जानता हो।

     

    शालिनी ने फोन उठाया और दोनों को अंतिम संदेश टाइप करने लगी। उसे पता था कि यह फैसला आसान नहीं होगा, क्योंकि समाज आज भी या तो राम को पूजता है या रावण को जलाता है

    लेकिन इंसानी रिश्तों की असली खूबसूरती इन दोनों अतिियों के बीच की उस धुंधली सी रेखा में छिपी होती है, जहाँ एक आम इंसान अपनी तमाम कमजोरियों के साथ सिर्फ ‘इंसान’ बने रहने की कोशिश करता है।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • घर से भागी बेटी का बाप

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    सांझ ढलते ही रामनाथ बाबू का दिल किसी अनजाने भय से बैठने लगता था। उनके घर के दालान में जलने वाला पीला बल्ब अब सिर्फ दीवारों पर पसरे सन्नाटे को ही रोशन करता था। उस सूनेपन में एक ही आवाज़ गूंजती रहती थी कमरे की खाली अलमारी और पलंग पर बिखरे हुए कुछ पुराने कागज़।

    घर से भागी हुई बेटी रिया का बाप होना दुनिया की सबसे अजीब सजा है। न तो वह खुलकर रो सकते हैं, न ही किसी से अपना दर्द कह सकते हैं। समाज की नज़रों में उनकी इज़्ज़त उनकी बेटी के पैरों तले रौंदी जा चुकी थी, लेकिन एक बाप के दिल से पूछिए—क्या इज़्ज़त उस खून के रिश्ते से बड़ी हो सकती है, जिसे उसने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था?

     

    वह सुबह आम दिनों जैसी बिल्कुल नहीं थी। २२ मार्च का वह दिन रामनाथ बाबू की ज़िंदगी को हमेशा के लिए दो हिस्सों में बांट गया। रोज़ की तरह सुबह पांच बजे उनकी आंख खुली। उन्होंने चाय की केतली गैस पर रखी और नेहमी की आदत के मुताबिक रिया के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।

    “रिया… ओ रिया, उठ जा बेटा। कॉलेज के लिए देर हो रही है।”

    कोई जवाब नहीं आया। आमतौर पर रिया अलार्म बजते ही उठ जाती थी। रामनाथ बाबू ने थोड़ा और ज़ोर से दरवाज़ा धक्का दिया। कुंडी अंदर से बंद नहीं थी, वह हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गई।

    कमरे का नज़ारा देखकर रामनाथ बाबू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पलंग की चादर करीने से तह की हुई थी, लेकिन रिया का तकिया गायब था। मेज़ पर एक लिफाफा रखा था, जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा था “पापा, मुझे माफ़ कर देना।”

    उस एक पल में रामनाथ बाबू के सिर के बाल और सफेद हो गए। उनके हाथ से चाय का कप छूटकर फर्श पर बिखर गया। गर्म चाय उनके पैरों के पास फैल गई, लेकिन उन्हें उसका अहसास तक नहीं हुआ। उन्होंने कांपते हाथों से वह चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था:

     

     “पापा, मैं जानती हूं कि आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं और मेरे भविष्य के लिए आपके पास बहुत बड़े सपने हैं। लेकिन मैं उस घुटन भरी ज़िंदगी में घुट रही हूं जहाँ मेरी आज़ादी और मेरी पसंद का कोई मोल नहीं है। मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी जीने जा रही हूँ। राहुल के साथ मैंने नई दुनिया बसाने का फैसला किया है। कृपया मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना। आपकी बेटी—रिया।”

     

    उस दिन के बाद से रामनाथ बाबू की दुनिया पूरी तरह बदल गई। जिस मोहल्ले में वे सिर उठाकर चलते थे, अब वहां से निकलते वक्त लोग खिड़कियों के परदे गिरा लेते थे या कानाफूसी करने लगते थे।

    मोहल्ले के चौधरी साहब ने तो यहाँ तक कह दिया था, “अरे रामनाथ जी, आधुनिकता के चक्कर में बेटी को ज़्यादा आज़ादी दे दी, नतीजा सामने है। हमारी बेटियों को देखिए, घर की चारदीवारी में संस्कारी हैं।”

    रामनाथ बाबू ने उन ताने मारने वालों को कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप सिर झुकाकर आगे बढ़ जाते। लेकिन उनके भीतर एक तूफान उठ रहा था। वे रात-रात भर जागकर छत पर टहलते रहते। उनकी आँखों के सामने रिया का बचपन नाचने लगता—जब वह घुटनों के बल चलती थी, जब उसने पहली बार ‘पापा’ कहा था, जब स्कूल में पहला पुरस्कार मिलने पर उसने गर्व से उनका हाथ पकड़ा था।

    वे खुद से बार-बार सवाल पूछते—”कहाँ कमी रह गई थी मेरी परवरिश में?” क्या उन्होंने उसे पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर छोड़ी थी? क्या उसकी हर ज़रूरत को पूरा करना गुनाह था? या फिर उन्होंने उसे अपनी उम्मीदों के बोझ तले इतना दबा दिया था कि उसे घर से भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा?

     

    रिया के जाने के एक महीने बाद पुलिस थाने से एक सिपाही रामनाथ बाबू के घर आया। उसने औपचारिकता निभाते हुए कहा, “बाबूजी, बालिग है लड़की। उसने कोर्ट मैरिज कर ली है और थाने में बयान दर्ज करा दिया है कि वह अपनी मर्जी से गई है। अब हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।”

    रामनाथ बाबू ने सिपाही को धन्यवाद कहा और दरवाज़ा बंद कर दिया। उस कानूनी कागज़ ने रिया को तो आज़ाद कर दिया था, लेकिन रामनाथ बाबू को अपने ही घर में कैद कर दिया था।

    समय बीतता गया। लोग भूलने लगे कि रामनाथ बाबू के घर में कोई आंधी आई थी। लेकिन एक बाप की यादें कभी नहीं मिटतीं। रिया की मां तो इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाईं और रिया के जाने के छह महीने बाद ही दिल का दौरा पड़ने से चल बसीं। जाने से पहले उनके आखिरी शब्द थे—”रामनाथ… रिया को माफ कर देना… वह हमारी ही तो खून है।”

    पत्नी की मौत ने रामनाथ बाबू को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया। अब वे इस घर में बिल्कुल अकेले थे। उनका अकेलापन चीख-चीखकर उन्हें डराता था।

    वह एक फोन कॉल

    एक सर्द शाम थी। रामनाथ बाबू अपने बरामदे में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे, तभी उनकी जेब में रखा पुराना फोन बज उठा। स्क्रीन पर एक अनजाना मोबाइल नंबर चमक रहा था।

    उन्होंने फोन उठाया और कांपती आवाज़ में कहा, “हैलो…”

    दूसरी तरफ से कुछ सेकंड तक सिर्फ सिसकियों की आवाज़ आती रही। फिर एक जानी-पहचानी, डरी हुई लेकिन प्यारी सी आवाज़ गूंजी—”पापा…”

    वह एक शब्द रामनाथ बाबू के सीने को चीरकर निकल गया। उनके हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। गले में कुछ अटक गया था, आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी।

    “पापा… मैं रिया बोल रही हूँ,” उधर से फिर आवाज़ आई, इस बार रुलाई फूट पड़ी थी। “पापा… मुझे बहुत पछतावा है। राहुल… वह जैसा दिखता था, वैसा नहीं है। वह मुझे मारता है, रोज़ शराब पीकर परेशान करता है। मेरा सब कुछ लुट गया पापा… अब मेरे पास आपके सिवा इस दुनिया में कोई नहीं है। क्या… क्या आप मुझे अपने पास वापस आने देंगे?”

    बाप का दिल और समाज की दीवारें

    उस एक पल में रामनाथ बाबू के सामने पूरी फिल्म की तरह पिछले दो साल का संघर्ष घूम गया। समाज का ताना, पत्नी की मौत, उनका अपना अकेलापन और रिया की वह रुलाई।

    एक तरफ उनका वह स्वाभिमान था, जिसे मोहल्ले वालों ने रौंद डाला था; दूसरी तरफ उस बाप का दिल था जो अपनी औलाद को तड़पता हुआ नहीं देख सकता था। समाज कहता था कि जो बेटी बाप की इज़्ज़त नीलाम कर दे, उसे कभी मुड़कर नहीं देखना चाहिए। लेकिन बाप का दिल कह रहा था—”इज़्ज़त और प्रतिष्ठा से बड़ी मेरी औलाद की जान और उसकी मुस्कान है।”

    रामनाथ बाबू की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उन्होंने अपने आंसुओं को पोछा, गहरी सांस ली और फोन पर दृढ़ता से कहा “बेटा… तू अपना बैग उठा और तुरंत स्टेशन पहुँच। तेरा बाप अभी तुझे लेने आ रहा है। समाज क्या कहता है, मुझे परवाह नहीं। तू मेरी बेटी थी, बेटी है और हमेशा मेरी ही रहोगी। जल्दी आ जा, घर सूना पड़ा है।”

    फोन कट गया। रामनाथ बाबू ने अपनी पुरानी शॉल उठाई, दरवाज़े की कुंडी लगाई और तेज़ी से बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए। उनके चेहरे पर अब कोई शिकन नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी शांति और उम्मीद थी।

    घर से भागी हुई बेटी का बाप आखिरकार जीत चुका था—उसने समाज के नियमों को नहीं, बल्कि अपने बाप होने के धर्म को चुन लिया था।

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    Lakshmi Kumari

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  • तलाक सुधा बहु

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    सुधा ने आईने में अपना चेहरा देखा। आँखें सूजी हुई थीं। बाल बिखरे हुए। होठों पर कोई रंग नहीं था। उसने साड़ी के पल्लू को ठीक किया और धीरे से बोली, “आज तलाक हो जाएगा।”

     

    शब्दों ने कमरे की हवा को भारी बना दिया। बाहर आँगन में सास की आवाज आ रही थी बरतनों की खनक और शिकायतों का सिलसिला। ससुर अखबार पढ़ रहे थे। जेठ-जेठानी अपने कमरे में थे। और देवर… देवर तो शादी के बाद से ही सुधा को देखकर मुँह फेर लेता था।

     

    सुधा की शादी हुए छह साल हो चुके थे। नाम था सुधा शर्मा। अब सुधा गुप्ता। पति का नाम था राहुल। ऊँची नौकरी, अच्छा घर, गाँव से शहर में बसा परिवार। शादी में खूब धूमधाम हुई थी। लाल जोड़े में सुधा इतनी खूबसूरत लग रही थी कि लोग कह रहे थे “राजकुमारी लग रही है।” लेकिन राजकुमारी की कहानी में राजकुमार धीरे-धीरे गायब होता गया।

     

    पहला साल ठीक था। राहुल प्यार करता था। रात को देर से आता तो भी सुधा के लिए फल लाता। सास थोड़ी कड़वी थीं, लेकिन सहनीय। फिर शुरू हुआ वह सिलसिला जो हर भारतीय बहु की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है तुलना।  

     

    “पड़ोस वाली बहु कितनी अच्छी रसोई बनाती है।”  

    “तुम्हारी सहेली ने कितना महँगा गहना पहनाया पति को।”  

    “बेटा, तुम्हारी बीवी को कुछ आता नहीं। न व्यवहार, न समझ।”  

     

    सुधा चुप रहती। राहुल पहले तो उसकी तरफ लेता। फिर धीरे-धीरे उसकी चुप्पी में शामिल होने लगा।  

     

    दूसरे साल जब सुधा माँ बनी नहीं, तो घर में जैसे कोई तूफान आ गया।  

    सास ने सीधे कहा, “बाँझ औरत का क्या काम इस घर में?”  

    राहुल ने विरोध नहीं किया। बस इतना बोला, “डॉक्टर को दिखा लो।”  

     

    डॉक्टर ने कहा सब ठीक है। फिर भी इल्जाम सुधा पर ही रहा।  

     

    तीसरे साल राहुल का तबादला दूसरे शहर हो गया। सुधा अकेली ससुराल में रह गई। दिनभर काम, रातभर अकेलापन। राहुल के फोन कम होने लगे। कभी-कभी तो हफ्तों बात नहीं होती। जब होती तो ठंडी आवाज में “मैं व्यस्त हूँ। तुम सँभाल लो घर।”  

     

    चौथे साल सुधा ने नौकरी करने की इच्छा जताई। सास ने मना कर दिया। “हमारे घर की बहु बाहर नौकरी नहीं करती।” राहुल ने भी समर्थन नहीं किया। “घर सँभालो, यही बहुत है।”  

     

    पाँचवें साल एक दिन सुधा को राहुल के फोन में एक अजनबी औरत की आवाज सुनाई दी। हँसी थी। प्यार भरी। सुधा ने पूछा तो राहुल ने गुस्से में फोन काट दिया। फिर तीन दिन बाद आया और बोला, “तुम्हें हर बात में शक रहता है। इसीलिए घर में तनाव रहता है।”  

     

    सुधा ने रोते हुए कहा, “मैं सिर्फ पूछ रही हूँ।”  

    राहुल ने जवाब दिया, “पूछने की जरूरत नहीं। मैं जो कर रहा हूँ सही कर रहा हूँ।”  

     

    उस रात सुधा ने पहली बार सोचा क्या यही प्यार है? क्या यही शादी है?  

     

    छठे साल सब कुछ टूट गया।  

     

    राहुल घर आया। चेहरा गंभीर। सास-ससुर भी बैठे थे। राहुल ने सीधा कहा, “सुधा, हमें अलग हो जाना चाहिए। तलाक।”  

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।  

    सुधा की साँसें तेज हो गईं। “क्यों?”  

     

    “अब नहीं बन रहा। तुम खुश नहीं, मैं खुश नहीं। बेहतर है अलग हो जाएँ।”  

     

    सास ने तुरंत कहा, “बेटा सही कह रहा है। बहु, तुम कभी इस घर में घुल नहीं पाई। अब जाओ अपने मायके। वहाँ बेहतर रहेगा।”  

     

    सुधा ने राहुल की ओर देखा। आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने गिराए नहीं। “तुमने कभी कोशिश की? कभी पूछा कि मैं क्यों उदास रहती हूँ? कभी मेरी तरफ से सोचा?”  

     

    राहुल चुप रहा।  

     

    फिर अदालत के चक्कर शुरू हुए। कागजात, वकील, तारीखें। सुधा के मायके वाले आए। भाई गुस्से में था। “हम तुम्हें वापस नहीं ले जा रहे बिना हिसाब लिए।” लेकिन सुधा ने मना कर दिया। “नहीं। मैं लड़ाई नहीं चाहती। बस छुटकारा चाहती हूँ।”  

     

    तलाक की सुनवाई के दिन सुधा अदालत पहुँची। साधारण सालवार कमीज में। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। राहुल सामने बैठा था। नई शर्ट, घड़ी चमक रही थी। उसके साथ एक औरत भी थी शायद वही, जिसकी हँसी सुधा ने फोन पर सुनी थी।  

     

    जज ने पूछा, “क्या आप दोनों सहमत हैं?”  

     

    राहुल ने सिर हिलाया।  

    सुधा ने भी।  

     

    कागजात पर दस्तखत हुए।  

    जज ने कहा, “तलाक मंजूर। अब आप दोनों आजाद हैं।”  

     

    आजाद।  

    शब्द कानों में गूँजा। सुधा ने उठाकर राहुल को देखा। वह मुस्कुरा रहा था। जैसे कोई बोझ उतर गया हो।  

     

    सुधा बाहर निकली। धूप तेज थी। आँखें चौंधिया गईं। भाई ने कहा, “चलो घर।”  

    सुधा ने सिर हिलाया। “थोड़ी देर अकेली रहना चाहती हूँ।”  

     

    वह पास के पार्क में जाकर बैठ गई। बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही थीं। एक छोटी लड़की अपनी माँ के पास दौड़कर गई और गले लग गई। सुधा की आँखें भर आईं।  

     

    उसने अपने फोन में पुरानी तस्वीरें देखीं। शादी की। हँसती हुई सुधा। राहुल का हाथ थामे हुए। तब लगता था कि जिंदगी भर साथ रहेंगे। अब सब खत्म।  

     

    शाम को मायके पहुँची। माँ ने गले लगाया और खूब रोई। “मेरी बेटी… तुम्हारा क्या कसूर था?”  

    पिताजी ने सिर्फ इतना कहा, “अब आगे देखो। पीछे मुड़कर मत देखना।”  

     

    रात को सुधा अपने पुराने कमरे में लेटी। दीवारों पर बचपन के पोस्टर अभी भी थे। उसने सोचा छह साल। इतने लंबे समय में उसने क्या खोया? अपनी हँसी, अपने सपने, अपना आत्मविश्वास। और क्या पाया? सिर्फ एक शब्द तलाक।  

     

    अगले दिन से जिंदगी फिर शुरू हुई।  

    सुधा ने नौकरी ढूँढ़ी। एक स्कूल में अध्यापिका बन गई। बच्चे उसे “सुधा मैम” कहकर बुलाते। उनकी मुस्कान में सुधा को नई ताकत मिलती।  

     

    सास ने फोन किया एक दिन। “बहु, तुमने घर का सामान ले लिया? कुछ बच गया हो तो भेज दो।”  

    सुधा ने शांत स्वर में कहा, “जो आपका था आपके पास है। जो मेरा था मैं ले आई। अब कोई लेन-देन नहीं।”  

     

    राहुल ने भी मैसेज किया। “सुधा, कोई खुशी-गम हो तो बताना। दोस्त बने रह सकते हैं।”  

    सुधा ने जवाब नहीं दिया। दोस्त वही होते हैं जो मुश्किल में साथ दें। राहुल मुश्किल में साथ नहीं था।  

     

    महीने बीतते गए। सुधा बदलने लगी। बाल कटवाए। हल्के रंग के कपड़े पहनने लगी। दोस्त बनाएं। एक दिन सहेली ने कहा, “तुम पहले से ज्यादा खूबसूरत लग रही हो।”  

    सुधा हँसी। “तलाक के बाद खूबसूरती आती है क्या?”  

    सहेली बोली, “नहीं। आजादी के बाद आती है।”  

     

    एक शाम सुधा नदी किनारे बैठी थी। पानी बह रहा था। उसने सोचा—शादी भी नदी जैसी होती है। कभी शांत, कभी उथली, कभी बाढ़। लेकिन अगर किनारे टूट जाएँ तो पानी अपना रास्ता बदल लेता है।  

     

    तभी पीछे से आवाज आई। “सुधा?”  

     

    वह मुड़ी। राहुल खड़ा था। अकेला।  

     

    “क्या काम है?” सुधा ने पूछा।  

     

    “मैं… मैं माफी माँगने आया हूँ। मैंने गलती की। वह औरत भी अब नहीं रही। मैं अकेला हूँ। क्या हम… फिर से कोशिश कर सकते हैं?”  

     

    सुधा ने उसकी ओर देखा। वही चेहरा। वही आँखें। लेकिन अब उनमें वह चमक नहीं थी जो कभी थी। या शायद चमक कभी थी ही नहीं।  

     

    उसने शांत स्वर में कहा, “राहुल, तलाक हो चुका है। कागजात पर दस्तखत हो चुके हैं। तुमने जब चाहा तब मुझे छोड़ा। अब जब तुम्हें अकेलापन चुभ रहा है तो वापस चाह रहे हो। मैं वह सुधा नहीं रही जो तुम्हारे इंतजार में रातें गिनती थी। मैं वह सुधा हूँ जिसने खुद को वापस पा लिया है।”  

     

    राहुल कुछ कहना चाहता था लेकिन सुधा ने हाथ उठाकर रोक दिया। “जाओ। अपनी जिंदगी जियो। मैं अपनी जी लूँगी।”  

     

    वह उठी और चल दी। पीछे मुड़कर नहीं देखा।  

     

    साल बीत गए।  

    सुधा अब स्कूल की हेडमिस्ट्रेस बन चुकी थी। घर छोटा था लेकिन अपना था। दीवारों पर उसकी पसंद के चित्र थे। रसोई में उसकी पसंद का सामान। कोई शिकायत नहीं, कोई तुलना नहीं, कोई तलाक का डर नहीं।  

     

    एक दिन उसकी पुरानी सास का फोन आया। आवाज कमजोर थी। “बहु… मैं बीमार हूँ। एक बार मिल लो।”  

     

    सुधा गई। बुजुर्ग औरत बिस्तर पर लेटी थी। आँखों में आँसू थे। “मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। बेटा भी गलत था। अब पछतावा हो रहा है।”  

     

    सुधा ने उसका हाथ पकड़ा। “अब पछतावे का समय नहीं। आप आराम करो। मैं दुआ करती हूँ।”  

     

    वापस लौटते हुए सुधा ने सोचा तलाक सिर्फ दो लोगों का अलग होना नहीं होता। वह एक औरत का खुद से मिलना भी होता है। जो टूटती है, वही फिर से जुड़ती है। और जब जुड़ती है तो पहले से मजबूत होती है।  

     

    आज सुधा की उम्र चालीस के पार है। अकेली है। लेकिन अकेली नहीं लगती। उसके पास खुद है। उसके पास अपनी पहचान है। उसके पास वह जिंदगी है जो उसने खुद चुनी।  

     

    कभी-कभी रात को जब अकेली बैठती है तो पुरानी यादें आती हैं। शादी का दिन, राहुल की मुस्कान, सास की डांट, तलाक का कागज। आँसू नहीं आते अब। बस एक शांति रहती है।  

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • मेरी दीदी माँ

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    मेरा नाम कबीर है।  

    आज मैं छब्बीस साल का हूँ। लोग पूछते हैं “तुम्हारी माँ कैसी हैं?”  

    मैं मुस्कुराकर जवाब देता हूँ “मेरी माँ… मेरी दीदी हैं।”  

     

    यह सुनकर ज्यादातर लोग हैरान रह जाते हैं। फिर मैं पूरी बात बताता हूँ।  

     

    मेरी असली माँ को गए हुए बीस साल हो चुके हैं। मैं तब बस छह साल का था। दीदी बारह की। पिताजी एक छोटी सी फैक्ट्री में मजदूर थे। घर किराये का। दो कमरे। एक रसोई। और बहुत सारी जिम्मेदारियाँ।  

     

    माँ बीमार रहीं। बहुत दिनों तक। टीबी था। दवाइयाँ चलती रहीं, लेकिन शरीर जवाब देता गया। आखिरी रात दीदी ने ही माँ का सिर अपनी गोद में रखा था। मैं सो रहा था। सुबह जब उठा तो घर में सन्नाटा था। माँ नहीं थीं।  

     

    पिताजी टूट गए। शराब पीने लगे। कभी-कभी रात भर नहीं लौटते। घर का सारा बोझ अचानक दीदी के सिर पर आ गिरा।  

     

    बारह साल की दीदी।  

    स्कूल जाना छूट गया। सुबह चार बजे उठना। मेरे लिए नाश्ता बनाना। मुझे स्कूल छोड़ना। फिर घर आकर बर्तन, कपड़े, सफाई। शाम को पिताजी के लिए खाना। रात को मेरे साथ बैठकर होमवर्क कराना।  

     

    मैं रोता तो दीदी कहती “रो मत कब्बू। दीदी है ना।”  

    बुखार आता तो दीदी रातभर जागकर गीला कपड़ा रखती।  

    त्योहार आते तो दीदी छोटी-छोटी खुशियाँ गढ़ लेती। कभी आटे से मीठी रोटी बनाती, कभी पुराने कपड़ों से मेरे लिए खिलौना सिलती।  

     

    एक दिन स्कूल में शिक्षक ने पूछा “तुम्हारी माँ पैरेंट्स-मीटिंग में क्यों नहीं आईं?”  

    मैंने बिना सोचे कहा “मेरी माँ तो आ गईं। वो मेरी दीदी हैं।”  

    क्लास में हँसी फूट पड़ी। शिक्षक ने डांटा। लेकिन उस दिन पहली बार मुझे अहसास हुआ कि मेरी दीदी सच में माँ बन चुकी हैं।  

     

    पिताजी की हालत बिगड़ती गई। एक रात बहुत नशे में घर आए और दीदी पर हाथ उठाया। मैं बीच में कूद गया। मार मेरे भी पड़ी। दीदी ने मुझे पीछे धकेल दिया और खुद सह लिया।  

     

    रात को जब पिताजी सो गए तो दीदी ने मुझे गोद में लेकर कहा “कब्बू, हम दोनों हैं। बस हम दोनों। तुम डरो मत।”  

     

    उन्हीं दिनों दीदी ने घर के पीछे एक छोटी सी सिलाई मशीन किराये पर ली। रात-रात भर कपड़े सिलती। आँखें लाल हो जातीं। हाथ सुन्न पड़ जाते। लेकिन मेरे स्कूल की फीस समय पर जमा हो जाती। मेरे जूते फटते तो नए आ जाते।  

     

    मैं कभी-कभी जिद करता “दीदी, तुम भी स्कूल जाओ ना।”  

    वह हँसकर टाल देती “मैं पढ़ चुकी। अब तुम्हें पढ़ाना है।”  

     

    सोलह साल की उम्र में दीदी की शादी की बातें आने लगीं। रिश्तेदार कहने लगे “लड़की बड़ी हो गई। ब्याह दो।”  

    पिताजी राजी हो गए। एक मामूली परिवार था। दीदी ने साफ कह दिया “मैं अभी नहीं जाऊँगी। कबीर बारहवीं तक नहीं पहुँचता, तब तक मैं घर नहीं छोड़ूँगी।”  

     

    झगड़ा हुआ। बहुत हुआ। लेकिन दीदी अड़ी रहीं।  

     

    मैंने गवाह की तरह सब देखा।  

    दीदी की जवानी कैसे जिम्मेदारियों में दबती गई।  

    उसके बाल कैसे जल्दी सफेद होने लगे।  

    उसकी हँसी कैसे कम होती गई।  

     

    जब मैं अठारह साल का हुआ और कॉलेज जाने लगा, तब जाकर दीदी तैयार हुईं शादी के लिए।  

    विदाई के दिन मैं रोया। खूब रोया।  

    दीदी ने मेरा चेहरा पकड़कर कहा—“अब तुम बड़े हो गए हो। अपनी जिम्मेदारी खुद संभालना। और हाँ… कभी किसी से कहना मत कि तुम्हारी माँ नहीं है। कहना कि मेरी माँ मेरे साथ रहती है—मेरे दिल में।”  

     

    दीदी ससुराल चली गईं।  

    दूसरा शहर। नया घर। नई जिम्मेदारियाँ।  

     

    लेकिन वह कभी पूरी तरह गई नहीं।  

    हर महीने पैसे भेजतीं।  

    हर हफ्ते फोन करतीं।  

    मेरी परीक्षा का रिजल्ट पूछतीं।  

    मेरे कपड़ों का साइज याद रखतीं।  

    जब मैं बीमार पड़ता तो दो सौ किलोमीटर दूर से दौड़ी चली आतीं।  

     

    एक बार मैंने नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना चाहा। दीदी बोलीं “जाओ। लेकिन हफ्ते में एक बार आवाज देना। नहीं तो मैं खुद आकर तुम्हें उठा लाऊँगी।”  

     

    पिताजी का देहांत हो गया जब मैं बाईस का था।  

    दीदी आईं। सारा सामान सँभाला। कर्मकांड करवाया। फिर मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोलीं “अब घर हम दोनों का है। तुम अकेले नहीं हो।”  

     

    आज मैं छब्बीस का हूँ। अच्छी नौकरी है। अपना छोटा सा घर है।  

    दीदी की बेटी पाँच साल की हो गई है। मैं जब भी जाता हूँ तो बच्ची मुझे “मामा” कहकर लिपटती है।  

    दीदी अब भी वैसे ही व्यवहार करती हैं जैसे बचपन में।  

    मेरे लिए खाना बनाती हैं। मेरी शिकायतें सुनती हैं। मेरी खामोशी समझ जाती हैं।  

     

    एक दिन मैंने उनसे पूछा “दीदी, तुम्हें कभी गुस्सा नहीं आया? कि तुम्हारी जिंदगी माँ बनने में निकल गई?”  

     

    दीदी लंबी साँस लेकर बोलीं “गुस्सा आया था। बहुत आया था। कभी-कभी रात को रोती थी कि मेरी भी माँ होती तो मुझे भी कोई गोद में लेता। लेकिन फिर तुम्हारा चेहरा याद आता। तुम सो रहे होते। और गुस्सा शांत हो जाता। कबीर, माँ होना कोई खून का रिश्ता नहीं होता। माँ होना एक फैसला होता है। मैंने फैसला किया था कि मैं तुम्हारी माँ बनूँगी। और मैं बनी।”  

     

    उनकी आँखें गीली थीं। लेकिन मुस्कान मजबूत।  

     

    आज जब लोग कहते हैं “तुमने अपनी दीदी को बहुत कुछ दिया होगा,”  

    तो मैं सिर हिला देता हूँ।  

    “नहीं। दीदी ने मुझे सब कुछ दिया।  

    उन्होंने मुझे जिंदगी दी।  

    उन्होंने मुझे हौसला दिया।  

    उन्होंने मुझे सिखाया कि परिवार सिर्फ माँ-बाप से नहीं बनता।  

    परिवार उन लोगों से बनता है जो तुम्हें छोड़कर नहीं जाते।”  

     

    कभी-कभी रात को जब अकेला बैठता हूँ तो सोचता हूँ  

    अगर दीदी न होतीं तो मैं कहाँ होता?  

    फुटपाथ पर?  

    किसी अपराध में?  

    या फिर सिर्फ एक टूटा हुआ इंसान?  

     

    दीदी ने मुझे बचाया।  

    सिर्फ पेट नहीं भरा।  

    उन्होंने मेरी आत्मा को भी थाम रखा।  

     

    आज मैं जहाँ भी हूँ, जो भी हूँ  

    सब कुछ मेरी दीदी माँ की वजह से हूँ।  

     

    लोग माँ को भगवान कहते हैं।  

    मैं कहता हूँ  

    मेरी माँ तो मेरी दीदी हैं।  

    और मेरी दीदी…  

    मेरी माँ से भी बड़ी हैं।  

     

    क्योंकि उन्होंने माँ होना चुना।  

    जब उनके पास खुद के लिए कुछ नहीं बचा था।  

    फिर भी उन्होंने मुझे सब कुछ दिया।  

     

    मेरी दीदी माँ।

    यह सिर्फ एक रिश्ता नहीं।  

    यह मेरी पूरी जिंदगी है।  

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    Lakshmi Kumari

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  • क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? मेरा नाम आरव है।

    क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? मेरा नाम आरव है।

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    आज मैं तीस साल का हो गया हूँ। लोगों को जब बताता हूँ कि मैं अनाथ हूँ तो उनकी आँखों में सहानुभूति आ जाती है। कुछ कह देते हैं—“हाय राम, बेचारा।” कुछ चुपचाप सिर हिला देते हैं। लेकिन कोई नहीं पूछता कि अनाथ होने का मतलब सिर्फ माँ-बाप का न होना नहीं होता। उसका मतलब होता है—हर साँस के साथ एक सवाल लेकर जीना।

     

    क्या अनाथ होना मेरी गलती थी?

     

    यह सवाल मेरे बचपन से लेकर आज तक मेरे साथ है।

     

    मेरी यादों की शुरुआत एक ठंडी रात से होती है। उम्र शायद चार साल की होगी। एक छोटी सी झोपड़ी। माँ बीमार पड़ी थी। बुखार से काँप रही थी। पिताजी कहीं मजदूरी करने गए थे। माँ ने मुझे अपनी छाती से लगाया और धीरे से कहा—“बेटा, तुम मजबूत रहना। दुनिया बड़ी कठिन है।”

    सुबह होते-होते माँ नहीं रहीं।

    पिताजी लौटे तो रोए। खूब रोए। फिर कुछ महीनों बाद वे भी चले गए—बीमारी से। रिश्तेदार आए। बातें हुईं। फिर मैं एक अनाथालय पहुँच गया।

     

    अनाथालय में मेरा पहला दिन याद है। बड़ी-बड़ी चारपाईयाँ। बहुत सारे बच्चे। सबके चेहरे पर एक जैसी थकान। सुपरवाइजर मैडम ने कहा—“अब से यह तुम्हारा घर है। यहाँ सब बराबर हैं।”

    लेकिन बराबर नहीं थे।

    जो बच्चे कभी-कभी किसी रिश्तेदार से मिलने जाते, वे खुश लौटते। मैं किसी से नहीं मिलता था। त्योहारों पर जब कुछ बच्चों के घर से मिठाई आती तो मुझे भी बाँट दी जाती। लेकिन मिठाई में भी अकेलापन घुला होता था।

     

    स्कूल में सबसे ज्यादा चुभता था।

    शिक्षक जब अभिभावक-मीटिंग बुलाते तो मैं चुपचाप बैठता। बच्चे कहते—“तेरे माँ-बाप कहाँ हैं?”

    मैं जवाब देता—“नहीं हैं।”

    फिर हँसी होती। “अनाथ है। माँ-बाप ने छोड़ दिया होगा। जरूर नालायक होगा।”

     

    रात को रोते हुए सोचता—**क्या मेरी कोई गलती थी?**

    क्या मैं रोया था ज्यादा? क्या मैं बीमार पड़ा था? क्या मैंने माँ-बाप को परेशान किया था कि वे दोनों चले गए?

     

    आठ साल की उम्र में पहली बार किसी ने सीधे कहा—“तू बोझ है। तेरी वजह से तेरे माँ-बाप परेशान होकर मर गए होंगे।”

    वह एक बड़ा लड़का था। अनाथालय का ही। मैंने जवाब नहीं दिया। बस अंदर ही अंदर टूट गया।

     

    साल बीतते गए।

    मैं पढ़ने में अच्छा था। मेहनत करता। सोचता था कि अगर मैं बहुत अच्छा बन गया तो शायद कोई गोद ले लेगा। कई दंपति आते। बच्चों को देखते। मुझसे बात करते। फिर किसी छोटे, प्यारे बच्चे को चुनकर चले जाते।

    हर बार वही सवाल—मेरी क्या गलती है?

     

    पंद्रह साल का हुआ तो अनाथालय छोड़ना पड़ा। नियमों के अनुसार। थोड़ी सी मदद मिली—कुछ कपड़े, थोड़े पैसे। बाकी सब अपने दम पर।

    रात को फुटपाथ पर सोया। भूखा रहा। ठंड में काँपा। लोगों ने शक की नजर से देखा—“यह लड़का इधर-उधर क्यों घूम रहा है? चोर तो नहीं?”

    मैंने नौकरी की। पहले होटल में बर्तन धोए। फिर एक दुकान पर सामान उठाया। रात को पढ़ाई की।

     

    एक दिन दुकान के मालिक ने पूछा—“तेरे घर वाले कहाँ हैं?”

    मैंने सच बता दिया।

    उसने तुरंत चेहरा बदल लिया। “अनाथ है? फिर तो तेरी आदतें खराब होंगी। चोरी वगेरह तो नहीं करता?”

    मैंने नौकरी छोड़ दी।

     

    उस रात बहुत रोया।

    आकाश की तरफ देखकर पूछा—“भगवान, क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? तुमने माँ-बाप क्यों छीन लिए? मैंने क्या बुरा किया था?”

     

    जवाब नहीं आया।

    सिर्फ सन्नाटा मिला।

     

    बीस साल का हुआ तो एक ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई। अच्छी थी। लेकिन फॉर्म में “अभिभावक का नाम” लिखने की जगह देखकर हर बार हाथ काँप जाता। मैं लिखता—“नहीं हैं।”

    लोग पूछते तो मैं झूठ बोलने लगा—“दूर रहते हैं।”

    झूठ बोलते-बोलते खुद से शर्म आने लगी।

     

    फिर एक दिन दिल ने कहा—बस।

    अब और नहीं।

     

    मैंने फैसला किया कि सच से भागना बंद करूँगा।

    जब कोई पूछता—“माँ-बाप?”

    तो साफ कहता—“मैं अनाथ हूँ।”

     

    पहले तो लोग सहानुभूति देते। फिर धीरे-धीरे कुछ लोग दूर हो जाते। कुछ कहते—“अनाथों का स्वभाव अलग होता है। भरोसा नहीं किया जा सकता।”

    मैं चुप रहता। अंदर-अंदर वही पुराना सवाल दोहराता—क्या मेरी गलती थी?

     

    एक दिन ऑफिस में मेरी सहकर्मी नेया ने पूछा। वह सीधी थी।

    “आरव, तुम हमेशा अकेले रहते हो। कोई परिवार नहीं?”

    मैंने बताया। पूरी बात। बिना छुपाए।

     

    नेया चुप रही। फिर बोली, “अनाथ होना तुम्हारी गलती नहीं। यह तो एक हादसा था। हादसे को अपनी पहचान मत बनाओ।”

     

    उसकी बात ने कुछ हिला दिया अंदर।

    मैंने पहली बार गहराई से सोचा।

    माँ बीमार हुईं। पिता मजदूरी करते-करते टूट गए। मैं चार साल का था। मैंने क्या किया होता? क्या मैं दवा ला सकता था? क्या मैं पैसे कमा सकता था?

     

    नहीं।

    मैं सिर्फ एक बच्चा था।

     

    फिर गलती किसकी थी?

    किस्मत की? समाज की? गरीबी की?

    या फिर मेरी ही—कि मैं पैदा हो गया?

     

    सालों तक मैंने खुद को दोषी माना।

    हर असफलता पर सोचा—“क्योंकि मैं अनाथ हूँ, इसलिए ऐसा हुआ।”

    हर अकेलेपन पर सोचा—“क्योंकि मैं अनाथ हूँ, इसलिए कोई नहीं चाहता।”

     

    लेकिन धीरे-धीरे समझ आया।

    अनाथ होना एक स्थिति है। गलती नहीं।

    गलती तो वह सोच है जो समाज हमें देता है—कि बिना माँ-बाप के इंसान अधूरा है, अविश्वसनीय है, बोझ है।

     

    आज मैं तीस साल का हूँ।

    मेरी अपनी एक छोटी सी दुनिया है। एक किराये का कमरा। एक कुत्ता। कुछ अच्छे दोस्त। नेया अब मेरी पत्नी है। उसने कहा था—“मैं तुम्हारे अतीत से नहीं, तुम्हारे वर्तमान से शादी कर रही हूँ।”

     

    कभी-कभी रात को जब अकेला बैठता हूँ तो पुराना सवाल वापस आता है।

    क्या अनाथ होना मेरी गलती थी?

     

    अब जवाब बदल चुका है।

    नहीं।

    मेरी गलती नहीं थी।

    मेरी गलती थी कि मैंने इतने साल खुद को दोषी माना।

    मेरी गलती थी कि मैंने समाज के तानों को अपनी सच्चाई मान लिया।

    मेरी गलती थी कि मैंने माँ-बाप के न होने को अपनी पहचान बना लिया।

     

    अब मैं जानता हूँ—

    अनाथ होना मेरी मजबूरी थी।

    लेकिन मजबूत होना मेरी जिद थी।

    अकेला पड़ना मेरी कहानी थी।

    लेकिन खुद को संभालना मेरी जीत थी।

     

    आज अगर कोई बच्चा मुझसे पूछे कि अनाथ होना क्या होता है, तो मैं कहूँगा—

    “बेटा, अनाथ होना माँ-बाप का न होना भर नहीं है।

    अनाथ होना तब होता है जब दुनिया तुम्हें बार-बार याद दिलाती है कि तुम अधूरे हो।

    लेकिन याद रखना—तुम अधूरे नहीं हो।

    तुम उन लोगों से कहीं ज्यादा पूरे हो जो सिर्फ इसलिए खुद को भाग्यशाली समझते हैं क्योंकि उनके पास माँ-बाप हैं।

    तुम्हारी गलती कुछ नहीं है।

    गलती उन लोगों की है जो तुम्हारे घावों पर नमक छिड़कते हैं।”

     

    मैं अब खुद से नहीं लड़ता।

    मैंने माँ-बाप को खोया। यह सच है।

     

     

    लेकिन मैंने खुद को नहीं खोया। यह उससे बड़ा सच है।

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    Lakshmi Kumari

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  • कहीं देर न हो जाए साजन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    रात के बारह बज रहे थे।

    कमरे में सिर्फ एक दीया जल रहा था। उसकी काँपती लौ दीवार पर मेरी परछाईं बना रही थी। खिड़की के बाहर हवा चल रही थी। नीम के पेड़ की पत्तियाँ सरसरा रही थीं। मैं चारपाई पर बैठी थी। गोद में एक पुरानी चिट्ठी थी—उसकी लिखी हुई। किनारे मुड़े हुए, स्याही फीकी पड़ चुकी थी।

     

    मैं बार-बार वही पंक्ति पढ़ रही थी “जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए साजन।”

     

    साजन।

    वह मुझे यही कहकर बुलाता था।

     

    मेरा नाम सुमित्रा है। इस गाँव में मेरा जन्म हुआ, यहीं मेरी शादी तय हुई, और यहीं मैं पिछले सात साल से उसका इंतजार कर रही हूँ। लोग कहते हैं कि इंतजार भी एक उम्र होती है। मेरी उम्र इंतजार में ही कट गई।

     

    वह था किशन। गाँव का ही लड़का। गेहूँ के खेतों में काम करने वाला, लेकिन सपनों में शहर बसाने वाला। पहली बार मैंने उसे मेले में देखा था। वह लाल पगड़ी बाँधे हुए था। आँखें इतनी तेज कि लग रहा था जैसे सूरज उनमें उतर आया हो। उसने मुझे देखा और मुस्कुरा दिया। बस। उसी मुस्कान ने मेरी जिंदगी बदल दी।

     

    फिर शुरू हुई वह खट्टी-मीठी बातें। नदी किनारे मिलना, खेत की मेड़ पर बैठकर सपने देखना, और रात को चुपके से खिड़की के नीचे आकर गाना—

    “सुमित्रा… कहीं देर न हो जाए साजन…”

     

    मैं हँसती—“क्या देर हो जाएगी? मैं तो यहीं हूँ।”

    वह गंभीर हो जाता—“पता नहीं। जिंदगी बड़ी चंचल है। कभी-कभी खुशियाँ भी देर कर देती हैं।”

     

    शादी तय हो गई। दोनों घर राजी। तारीख भी तय हो गई—अगले साल फागुन की एक तारीख। लेकिन उससे पहले किशन को शहर जाना पड़ा। मजदूरी के लिए। पिता बीमार थे, कर्ज चढ़ा हुआ था। उसने कहा—“एक साल। सिर्फ एक साल। पैसे जमा करके लौटूँगा। फिर कभी नहीं जाऊँगा।”

     

    मैंने उसकी उँगली पकड़ी थी। “जल्दी आना। कहीं देर न हो जाए साजन।”

    वह हँसा था। “देर कैसे होगी? तुम इंतजार करोगी तो मैं हवा से भी तेज दौड़कर आऊँगा।”

     

    वह चला गया।

    पहले महीने चिट्ठियाँ आईं। हर चिट्ठी में वही बात—“जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए।”

    फिर चिट्ठियाँ कम होने लगीं। कभी-कभी दो-दो महीने बाद आतीं। पैसे भेजता था। घर का कर्ज उतरने लगा। पिताजी की दवाइयाँ चलने लगीं।

     

    तीसरे साल एक चिट्ठी आई जिसमें लिखा था—“यहाँ काम बढ़ गया है। थोड़ा और समय लगेगा। तुम घबराना मत। मैं आ रहा हूँ।”

     

    मैंने जवाब में लिखा—“आ जाना। कहीं देर न हो जाए साजन। मैं थकने लगी हूँ इंतजार करते-करते।”

     

    जवाब नहीं आया।

     

    पाँचवें साल गाँव में अफवाह उड़ी कि किशन ने शहर में किसी और से शादी कर ली है। लोग मेरे घर आने लगे। सहानुभूति दिखाने वाले, ताने देने वाले, और रिश्ते लेकर आने वाले। पिताजी ने कहा—“कब तक बैठेगी? उम्र निकल रही है।”

    माँ रोती रहीं।

    मैंने सिर्फ इतना कहा—“वह आएगा। उसने वादा किया है।”

     

    सात साल हो गए।

    अब घर में सिर्फ मैं और माँ बची हूँ। पिताजी चल बसے۔ भाई शहर में बस गए। गाँव वाले मुझे ‘वह औरत’ कहकर बुलाते हैं जो बावली हो गई है इंतजार में।

     

    हर शाम मैं उसी खिड़की के पास बैठती हूँ जहाँ कभी किशन खड़ा होता था। दीया जलाती हूँ। और वही चिट्ठी पढ़ती हूँ।

     

    आज भी वही कर रही थी कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई।

    रात के बारह बज रहे थे। कौन आ सकता है?

     

    मैंने दीया उठाया और दरवाजा खोला।

    बाहर एक आदमी खड़ा था। चेहरा दुबला, बाल सफेद मिश्रित, कंधे झुके हुए। हाथ में एक छोटी सी गठरी।

     

    मैंने पहचाना नहीं।

    फिर उसने सिर उठाया। आँखें वही थीं—सूरज वाली।

     

    “सुमित्रा…” उसकी आवाज काँप रही थी। “कहीं देर तो नहीं हो गई ना?”

     

    मेरे हाथ से दीया गिर गया। अंधेरा हो गया। लेकिन मैंने उसे देख लिया था।

    “किशन…?”

     

    वह अंदर आया। दरवाजा बंद किया। फिर बस खड़ा रहा। जैसे हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हो।

     

    “बोल… कहाँ रहा इतने साल?” मेरी आवाज में गुस्सा था, दर्द था, और एक अजीब सी राहत भी।

     

    वह बैठ गया फर्श पर। “जेल में।”

     

    सन्नाटा।

    “जेल?”

     

    “हाँ। शहर में एक मिल में काम करता था। मालिक ने मजदूरों की मजदूरी मार ली। हमने विरोध किया। झड़प हो गई। एक आदमी मर गया। पुलिस ने हमें पकड़ लिया। मुझे सात साल की सजा हुई। मैंने तुम्हें चिट्ठी लिखी… लेकिन जेल से चिट्ठी नहीं जाने दी उन्होंने। फिर जब छूटा तो सोचा था कि सीधे गाँव आऊँगा। लेकिन शरीर ने साथ नहीं दिया। तपेदिक हो गया था। अस्पताल में छह महीने पड़ा रहा। आज ठीक होकर आया हूँ।”

     

    उसने गठरी खोली। अंदर कुछ पुरानी चिट्ठियाँ थीं—मेरी लिखी हुई। और एक छोटी सी डिब्बी।

     

    “यह तुम्हारे लिए। हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर मैंने एक चूड़ी रखी। सात चूड़ियाँ हैं। सोचता था कि जब आऊँगा तो खुद पहनाऊँगा।”

     

    मैं रो पड़ी।

    “तुमने कहा था कहीं देर न हो जाए… और देर हो गई किशन। मेरे पिताजी नहीं रहे। मेरी जवानी चली गई। गाँव वाले मुझे बावली कहते हैं।”

     

    वह मेरे पास घुटनों के बल आया। “माफ कर देना। मैंने वादा तोड़ा। लेकिन हर रात जेल में वही दोहराता रहा—‘कहीं देर न हो जाए साजन’। तुम्हारा नाम लेकर सोता था। तुम्हारा नाम लेकर उठता था।”

     

    मैंने उसका चेहरा देखा। वह पहले जैसा नहीं था। लेकिन आँखें वैसी ही थीं।

     

    “अब क्या होगा?” मैंने पूछा।

     

    “जो तुम कहोगी। अगर तुम कहो तो मैं लौट जाऊँ। अगर तुम कहो तो यहीं रहूँ। मेरे पास कुछ नहीं बचा—न जवानी, न पैसा, न इज्जत। बस एक अधूरा वादा बचा है।”

     

    मैं उठी। दीया फिर से जलाया। फिर उसकी डिब्बी से एक-एक चूड़ी निकाली। सात चूड़ियाँ। लाल, हरी, पीली… जैसे सात साल के इंतजार के रंग हों।

     

    “पहनाओ,” मैंने कहा।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे। उसने मेरी कलाई पर चूड़ियाँ पहनाईं। एक-एक करके। जब आखिरी चूड़ी पहनाई तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “अब देर नहीं हुई,” मैंने कहा। “तुम आ गए। बस इतना काफी है।”

     

    उस रात हमने बातें कीं। सालों की बातें। जेल की बातें, इंतजार की बातें, डर की बातें। सुबह होते-होते वह मेरे कंधे पर सर रखकर सो गया। मैं जागती रही। उसकी साँसें गिनती रही।

     

    गाँव में सुबह होते ही हलचल मच गई। “किशन लौट आया!”

    कुछ लोग खुश हुए, कुछ ने नाक-भौं सिकोड़ी। “अब क्या करेगा? जेल का पाला हुआ।”

    माँ ने उसे गले लगा लिया। रोती रहीं।

     

    फिर दिन बीतने लगे।

    किशन ने फिर से खेत संभाले। शरीर कमजोर था, लेकिन हिम्मत मजबूत। मैं उसके साथ काम करने लग गई। लोग देखते रहे। बातें बनाते रहे। लेकिन हमें फर्क नहीं पड़ा।

     

    एक दिन नदी किनारे हम दोनों बैठे थे। वही जगह जहाँ कभी सपने देखते थे।

     

    किशन ने कहा, “सुमित्रा, अब शादी कर लें?”

     

    मैं मुस्कुराई। “सात साल बाद? लोग हँसेंगे।”

     

    “हँसने दो। हमने काफी रो लिया।”

     

    शादी हुई। छोटी सी। सिर्फ माँ, दो-चार रिश्तेदार और पुराने दोस्त। कोई धूमधाम नहीं। बस एक मंडप, एक पुरोहित और दो लोग जो सालों बाद एक-दूसरे के हुए।

     

    रात को जब सब चले गए तो किशन ने मेरा हाथ पकड़ा। “अब कोई देर नहीं रहेगी। न आने में, न जाने में। मैं जहाँ भी रहूँगा, तुम्हारे साथ रहूँगा।”

     

    मैंने सिर उसके सीने पर रख दिया। “कहीं देर न हो जाए साजन… यह वाक्य अब डराता नहीं। अब तो लगता है कि देर होकर भी सब कुछ समय पर हुआ।”

     

    साल बीतते गए।

    हमारे घर में एक बेटी हुई। नाम रखा हमने—आस।

    आस बड़ी हुई। खेतों में दौड़ती, नदी में खेलती। किशन उसे बाँहों में लेकर गाता—“मेरी आस… कहीं देर न हो जाए।”

     

    एक शाम किशन बहुत थका हुआ घर लौटा। बुखार था। मैंने सिर पर कपड़ा रखा। दवा दी। रात भर जागती रही।

     

    सुबह उसने मेरा हाथ पकड़ा। “सुमित्रा… लग रहा है इस बार देर हो जाएगी।”

     

    मेरा दिल धड़कने लगा। “मत बोलो ऐसा। तुम ठीक हो जाओगे।”

     

    वह मुस्कुराया। “ठीक हो या न हो… तुमसे मिल लिया। इंतजार खत्म हो गया। अब कोई देर नहीं।”

     

    दो दिन बाद वह चल बसा।

    आराम से। जैसे कोई लंबी यात्रा पूरी करके सो गया हो।

     

    गाँव वाले आए। फिर वही सहानुभूति, वही बातें।

    मैंने रोया। खूब रोया। लेकिन अंदर कोई खालीपन नहीं था।

     

    अब सालों बीत गए। आस बड़ी हो गई। उसकी शादी हो गई। मैं अकेली रहती हूँ उसी घर में। हर रात दीया जलाती हूँ। खिड़की के पास बैठती हूँ।

     

    और कभी-कभी हवा के साथ वही आवाज आती है “कहीं देर न हो जाए साजन…”

     

    मैं मुस्कुरा देती हूँ।

    “नहीं साजन। अब कोई देर नहीं।

    तुम आ गए थे।

    समय पर आ गए थे।

    और मेरा इंतजार… कभी व्यर्थ नहीं गया।”

     

    क्योंकि कुछ मुलाकातें देर से होती हैं।

    लेकिन जब होती हैं तो जिंदगी भर के इंतजार को अर्थ दे देती हैं।

    और कुछ वाक्य… बस वाक्य नहीं होते।

    वे एक पूरा जीवन बन जाते हैं।

     

    “कहीं देर न हो जाए साजन।”

    यह वाक्य अब डर नहीं।

    यह मेरी साँस है।

    यह मेरी याद है।

     

     

    1. यह मेरा किशन है।
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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇