मेरा नाम कबीर है।
आज मैं छब्बीस साल का हूँ। लोग पूछते हैं “तुम्हारी माँ कैसी हैं?”
मैं मुस्कुराकर जवाब देता हूँ “मेरी माँ… मेरी दीदी हैं।”
यह सुनकर ज्यादातर लोग हैरान रह जाते हैं। फिर मैं पूरी बात बताता हूँ।
मेरी असली माँ को गए हुए बीस साल हो चुके हैं। मैं तब बस छह साल का था। दीदी बारह की। पिताजी एक छोटी सी फैक्ट्री में मजदूर थे। घर किराये का। दो कमरे। एक रसोई। और बहुत सारी जिम्मेदारियाँ।
माँ बीमार रहीं। बहुत दिनों तक। टीबी था। दवाइयाँ चलती रहीं, लेकिन शरीर जवाब देता गया। आखिरी रात दीदी ने ही माँ का सिर अपनी गोद में रखा था। मैं सो रहा था। सुबह जब उठा तो घर में सन्नाटा था। माँ नहीं थीं।
पिताजी टूट गए। शराब पीने लगे। कभी-कभी रात भर नहीं लौटते। घर का सारा बोझ अचानक दीदी के सिर पर आ गिरा।
बारह साल की दीदी।
स्कूल जाना छूट गया। सुबह चार बजे उठना। मेरे लिए नाश्ता बनाना। मुझे स्कूल छोड़ना। फिर घर आकर बर्तन, कपड़े, सफाई। शाम को पिताजी के लिए खाना। रात को मेरे साथ बैठकर होमवर्क कराना।
मैं रोता तो दीदी कहती “रो मत कब्बू। दीदी है ना।”
बुखार आता तो दीदी रातभर जागकर गीला कपड़ा रखती।
त्योहार आते तो दीदी छोटी-छोटी खुशियाँ गढ़ लेती। कभी आटे से मीठी रोटी बनाती, कभी पुराने कपड़ों से मेरे लिए खिलौना सिलती।
एक दिन स्कूल में शिक्षक ने पूछा “तुम्हारी माँ पैरेंट्स-मीटिंग में क्यों नहीं आईं?”
मैंने बिना सोचे कहा “मेरी माँ तो आ गईं। वो मेरी दीदी हैं।”
क्लास में हँसी फूट पड़ी। शिक्षक ने डांटा। लेकिन उस दिन पहली बार मुझे अहसास हुआ कि मेरी दीदी सच में माँ बन चुकी हैं।
पिताजी की हालत बिगड़ती गई। एक रात बहुत नशे में घर आए और दीदी पर हाथ उठाया। मैं बीच में कूद गया। मार मेरे भी पड़ी। दीदी ने मुझे पीछे धकेल दिया और खुद सह लिया।
रात को जब पिताजी सो गए तो दीदी ने मुझे गोद में लेकर कहा “कब्बू, हम दोनों हैं। बस हम दोनों। तुम डरो मत।”
उन्हीं दिनों दीदी ने घर के पीछे एक छोटी सी सिलाई मशीन किराये पर ली। रात-रात भर कपड़े सिलती। आँखें लाल हो जातीं। हाथ सुन्न पड़ जाते। लेकिन मेरे स्कूल की फीस समय पर जमा हो जाती। मेरे जूते फटते तो नए आ जाते।
मैं कभी-कभी जिद करता “दीदी, तुम भी स्कूल जाओ ना।”
वह हँसकर टाल देती “मैं पढ़ चुकी। अब तुम्हें पढ़ाना है।”
सोलह साल की उम्र में दीदी की शादी की बातें आने लगीं। रिश्तेदार कहने लगे “लड़की बड़ी हो गई। ब्याह दो।”
पिताजी राजी हो गए। एक मामूली परिवार था। दीदी ने साफ कह दिया “मैं अभी नहीं जाऊँगी। कबीर बारहवीं तक नहीं पहुँचता, तब तक मैं घर नहीं छोड़ूँगी।”
झगड़ा हुआ। बहुत हुआ। लेकिन दीदी अड़ी रहीं।
मैंने गवाह की तरह सब देखा।
दीदी की जवानी कैसे जिम्मेदारियों में दबती गई।
उसके बाल कैसे जल्दी सफेद होने लगे।
उसकी हँसी कैसे कम होती गई।
जब मैं अठारह साल का हुआ और कॉलेज जाने लगा, तब जाकर दीदी तैयार हुईं शादी के लिए।
विदाई के दिन मैं रोया। खूब रोया।
दीदी ने मेरा चेहरा पकड़कर कहा—“अब तुम बड़े हो गए हो। अपनी जिम्मेदारी खुद संभालना। और हाँ… कभी किसी से कहना मत कि तुम्हारी माँ नहीं है। कहना कि मेरी माँ मेरे साथ रहती है—मेरे दिल में।”
दीदी ससुराल चली गईं।
दूसरा शहर। नया घर। नई जिम्मेदारियाँ।
लेकिन वह कभी पूरी तरह गई नहीं।
हर महीने पैसे भेजतीं।
हर हफ्ते फोन करतीं।
मेरी परीक्षा का रिजल्ट पूछतीं।
मेरे कपड़ों का साइज याद रखतीं।
जब मैं बीमार पड़ता तो दो सौ किलोमीटर दूर से दौड़ी चली आतीं।
एक बार मैंने नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना चाहा। दीदी बोलीं “जाओ। लेकिन हफ्ते में एक बार आवाज देना। नहीं तो मैं खुद आकर तुम्हें उठा लाऊँगी।”
पिताजी का देहांत हो गया जब मैं बाईस का था।
दीदी आईं। सारा सामान सँभाला। कर्मकांड करवाया। फिर मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोलीं “अब घर हम दोनों का है। तुम अकेले नहीं हो।”
आज मैं छब्बीस का हूँ। अच्छी नौकरी है। अपना छोटा सा घर है।
दीदी की बेटी पाँच साल की हो गई है। मैं जब भी जाता हूँ तो बच्ची मुझे “मामा” कहकर लिपटती है।
दीदी अब भी वैसे ही व्यवहार करती हैं जैसे बचपन में।
मेरे लिए खाना बनाती हैं। मेरी शिकायतें सुनती हैं। मेरी खामोशी समझ जाती हैं।
एक दिन मैंने उनसे पूछा “दीदी, तुम्हें कभी गुस्सा नहीं आया? कि तुम्हारी जिंदगी माँ बनने में निकल गई?”
दीदी लंबी साँस लेकर बोलीं “गुस्सा आया था। बहुत आया था। कभी-कभी रात को रोती थी कि मेरी भी माँ होती तो मुझे भी कोई गोद में लेता। लेकिन फिर तुम्हारा चेहरा याद आता। तुम सो रहे होते। और गुस्सा शांत हो जाता। कबीर, माँ होना कोई खून का रिश्ता नहीं होता। माँ होना एक फैसला होता है। मैंने फैसला किया था कि मैं तुम्हारी माँ बनूँगी। और मैं बनी।”
उनकी आँखें गीली थीं। लेकिन मुस्कान मजबूत।
आज जब लोग कहते हैं “तुमने अपनी दीदी को बहुत कुछ दिया होगा,”
तो मैं सिर हिला देता हूँ।
“नहीं। दीदी ने मुझे सब कुछ दिया।
उन्होंने मुझे जिंदगी दी।
उन्होंने मुझे हौसला दिया।
उन्होंने मुझे सिखाया कि परिवार सिर्फ माँ-बाप से नहीं बनता।
परिवार उन लोगों से बनता है जो तुम्हें छोड़कर नहीं जाते।”
कभी-कभी रात को जब अकेला बैठता हूँ तो सोचता हूँ
अगर दीदी न होतीं तो मैं कहाँ होता?
फुटपाथ पर?
किसी अपराध में?
या फिर सिर्फ एक टूटा हुआ इंसान?
दीदी ने मुझे बचाया।
सिर्फ पेट नहीं भरा।
उन्होंने मेरी आत्मा को भी थाम रखा।
आज मैं जहाँ भी हूँ, जो भी हूँ
सब कुछ मेरी दीदी माँ की वजह से हूँ।
लोग माँ को भगवान कहते हैं।
मैं कहता हूँ
मेरी माँ तो मेरी दीदी हैं।
और मेरी दीदी…
मेरी माँ से भी बड़ी हैं।
क्योंकि उन्होंने माँ होना चुना।
जब उनके पास खुद के लिए कुछ नहीं बचा था।
फिर भी उन्होंने मुझे सब कुछ दिया।
मेरी दीदी माँ।
यह सिर्फ एक रिश्ता नहीं।
यह मेरी पूरी जिंदगी है।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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