सुधा ने आईने में अपना चेहरा देखा। आँखें सूजी हुई थीं। बाल बिखरे हुए। होठों पर कोई रंग नहीं था। उसने साड़ी के पल्लू को ठीक किया और धीरे से बोली, “आज तलाक हो जाएगा।”
शब्दों ने कमरे की हवा को भारी बना दिया। बाहर आँगन में सास की आवाज आ रही थी बरतनों की खनक और शिकायतों का सिलसिला। ससुर अखबार पढ़ रहे थे। जेठ-जेठानी अपने कमरे में थे। और देवर… देवर तो शादी के बाद से ही सुधा को देखकर मुँह फेर लेता था।
सुधा की शादी हुए छह साल हो चुके थे। नाम था सुधा शर्मा। अब सुधा गुप्ता। पति का नाम था राहुल। ऊँची नौकरी, अच्छा घर, गाँव से शहर में बसा परिवार। शादी में खूब धूमधाम हुई थी। लाल जोड़े में सुधा इतनी खूबसूरत लग रही थी कि लोग कह रहे थे “राजकुमारी लग रही है।” लेकिन राजकुमारी की कहानी में राजकुमार धीरे-धीरे गायब होता गया।
पहला साल ठीक था। राहुल प्यार करता था। रात को देर से आता तो भी सुधा के लिए फल लाता। सास थोड़ी कड़वी थीं, लेकिन सहनीय। फिर शुरू हुआ वह सिलसिला जो हर भारतीय बहु की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है तुलना।
“पड़ोस वाली बहु कितनी अच्छी रसोई बनाती है।”
“तुम्हारी सहेली ने कितना महँगा गहना पहनाया पति को।”
“बेटा, तुम्हारी बीवी को कुछ आता नहीं। न व्यवहार, न समझ।”
सुधा चुप रहती। राहुल पहले तो उसकी तरफ लेता। फिर धीरे-धीरे उसकी चुप्पी में शामिल होने लगा।
दूसरे साल जब सुधा माँ बनी नहीं, तो घर में जैसे कोई तूफान आ गया।
सास ने सीधे कहा, “बाँझ औरत का क्या काम इस घर में?”
राहुल ने विरोध नहीं किया। बस इतना बोला, “डॉक्टर को दिखा लो।”
डॉक्टर ने कहा सब ठीक है। फिर भी इल्जाम सुधा पर ही रहा।
तीसरे साल राहुल का तबादला दूसरे शहर हो गया। सुधा अकेली ससुराल में रह गई। दिनभर काम, रातभर अकेलापन। राहुल के फोन कम होने लगे। कभी-कभी तो हफ्तों बात नहीं होती। जब होती तो ठंडी आवाज में “मैं व्यस्त हूँ। तुम सँभाल लो घर।”
चौथे साल सुधा ने नौकरी करने की इच्छा जताई। सास ने मना कर दिया। “हमारे घर की बहु बाहर नौकरी नहीं करती।” राहुल ने भी समर्थन नहीं किया। “घर सँभालो, यही बहुत है।”
पाँचवें साल एक दिन सुधा को राहुल के फोन में एक अजनबी औरत की आवाज सुनाई दी। हँसी थी। प्यार भरी। सुधा ने पूछा तो राहुल ने गुस्से में फोन काट दिया। फिर तीन दिन बाद आया और बोला, “तुम्हें हर बात में शक रहता है। इसीलिए घर में तनाव रहता है।”
सुधा ने रोते हुए कहा, “मैं सिर्फ पूछ रही हूँ।”
राहुल ने जवाब दिया, “पूछने की जरूरत नहीं। मैं जो कर रहा हूँ सही कर रहा हूँ।”
उस रात सुधा ने पहली बार सोचा क्या यही प्यार है? क्या यही शादी है?
छठे साल सब कुछ टूट गया।
राहुल घर आया। चेहरा गंभीर। सास-ससुर भी बैठे थे। राहुल ने सीधा कहा, “सुधा, हमें अलग हो जाना चाहिए। तलाक।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सुधा की साँसें तेज हो गईं। “क्यों?”
“अब नहीं बन रहा। तुम खुश नहीं, मैं खुश नहीं। बेहतर है अलग हो जाएँ।”
सास ने तुरंत कहा, “बेटा सही कह रहा है। बहु, तुम कभी इस घर में घुल नहीं पाई। अब जाओ अपने मायके। वहाँ बेहतर रहेगा।”
सुधा ने राहुल की ओर देखा। आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने गिराए नहीं। “तुमने कभी कोशिश की? कभी पूछा कि मैं क्यों उदास रहती हूँ? कभी मेरी तरफ से सोचा?”
राहुल चुप रहा।
फिर अदालत के चक्कर शुरू हुए। कागजात, वकील, तारीखें। सुधा के मायके वाले आए। भाई गुस्से में था। “हम तुम्हें वापस नहीं ले जा रहे बिना हिसाब लिए।” लेकिन सुधा ने मना कर दिया। “नहीं। मैं लड़ाई नहीं चाहती। बस छुटकारा चाहती हूँ।”
तलाक की सुनवाई के दिन सुधा अदालत पहुँची। साधारण सालवार कमीज में। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। राहुल सामने बैठा था। नई शर्ट, घड़ी चमक रही थी। उसके साथ एक औरत भी थी शायद वही, जिसकी हँसी सुधा ने फोन पर सुनी थी।
जज ने पूछा, “क्या आप दोनों सहमत हैं?”
राहुल ने सिर हिलाया।
सुधा ने भी।
कागजात पर दस्तखत हुए।
जज ने कहा, “तलाक मंजूर। अब आप दोनों आजाद हैं।”
आजाद।
शब्द कानों में गूँजा। सुधा ने उठाकर राहुल को देखा। वह मुस्कुरा रहा था। जैसे कोई बोझ उतर गया हो।
सुधा बाहर निकली। धूप तेज थी। आँखें चौंधिया गईं। भाई ने कहा, “चलो घर।”
सुधा ने सिर हिलाया। “थोड़ी देर अकेली रहना चाहती हूँ।”
वह पास के पार्क में जाकर बैठ गई। बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही थीं। एक छोटी लड़की अपनी माँ के पास दौड़कर गई और गले लग गई। सुधा की आँखें भर आईं।
उसने अपने फोन में पुरानी तस्वीरें देखीं। शादी की। हँसती हुई सुधा। राहुल का हाथ थामे हुए। तब लगता था कि जिंदगी भर साथ रहेंगे। अब सब खत्म।
शाम को मायके पहुँची। माँ ने गले लगाया और खूब रोई। “मेरी बेटी… तुम्हारा क्या कसूर था?”
पिताजी ने सिर्फ इतना कहा, “अब आगे देखो। पीछे मुड़कर मत देखना।”
रात को सुधा अपने पुराने कमरे में लेटी। दीवारों पर बचपन के पोस्टर अभी भी थे। उसने सोचा छह साल। इतने लंबे समय में उसने क्या खोया? अपनी हँसी, अपने सपने, अपना आत्मविश्वास। और क्या पाया? सिर्फ एक शब्द तलाक।
अगले दिन से जिंदगी फिर शुरू हुई।
सुधा ने नौकरी ढूँढ़ी। एक स्कूल में अध्यापिका बन गई। बच्चे उसे “सुधा मैम” कहकर बुलाते। उनकी मुस्कान में सुधा को नई ताकत मिलती।
सास ने फोन किया एक दिन। “बहु, तुमने घर का सामान ले लिया? कुछ बच गया हो तो भेज दो।”
सुधा ने शांत स्वर में कहा, “जो आपका था आपके पास है। जो मेरा था मैं ले आई। अब कोई लेन-देन नहीं।”
राहुल ने भी मैसेज किया। “सुधा, कोई खुशी-गम हो तो बताना। दोस्त बने रह सकते हैं।”
सुधा ने जवाब नहीं दिया। दोस्त वही होते हैं जो मुश्किल में साथ दें। राहुल मुश्किल में साथ नहीं था।
महीने बीतते गए। सुधा बदलने लगी। बाल कटवाए। हल्के रंग के कपड़े पहनने लगी। दोस्त बनाएं। एक दिन सहेली ने कहा, “तुम पहले से ज्यादा खूबसूरत लग रही हो।”
सुधा हँसी। “तलाक के बाद खूबसूरती आती है क्या?”
सहेली बोली, “नहीं। आजादी के बाद आती है।”
एक शाम सुधा नदी किनारे बैठी थी। पानी बह रहा था। उसने सोचा—शादी भी नदी जैसी होती है। कभी शांत, कभी उथली, कभी बाढ़। लेकिन अगर किनारे टूट जाएँ तो पानी अपना रास्ता बदल लेता है।
तभी पीछे से आवाज आई। “सुधा?”
वह मुड़ी। राहुल खड़ा था। अकेला।
“क्या काम है?” सुधा ने पूछा।
“मैं… मैं माफी माँगने आया हूँ। मैंने गलती की। वह औरत भी अब नहीं रही। मैं अकेला हूँ। क्या हम… फिर से कोशिश कर सकते हैं?”
सुधा ने उसकी ओर देखा। वही चेहरा। वही आँखें। लेकिन अब उनमें वह चमक नहीं थी जो कभी थी। या शायद चमक कभी थी ही नहीं।
उसने शांत स्वर में कहा, “राहुल, तलाक हो चुका है। कागजात पर दस्तखत हो चुके हैं। तुमने जब चाहा तब मुझे छोड़ा। अब जब तुम्हें अकेलापन चुभ रहा है तो वापस चाह रहे हो। मैं वह सुधा नहीं रही जो तुम्हारे इंतजार में रातें गिनती थी। मैं वह सुधा हूँ जिसने खुद को वापस पा लिया है।”
राहुल कुछ कहना चाहता था लेकिन सुधा ने हाथ उठाकर रोक दिया। “जाओ। अपनी जिंदगी जियो। मैं अपनी जी लूँगी।”
वह उठी और चल दी। पीछे मुड़कर नहीं देखा।
साल बीत गए।
सुधा अब स्कूल की हेडमिस्ट्रेस बन चुकी थी। घर छोटा था लेकिन अपना था। दीवारों पर उसकी पसंद के चित्र थे। रसोई में उसकी पसंद का सामान। कोई शिकायत नहीं, कोई तुलना नहीं, कोई तलाक का डर नहीं।
एक दिन उसकी पुरानी सास का फोन आया। आवाज कमजोर थी। “बहु… मैं बीमार हूँ। एक बार मिल लो।”
सुधा गई। बुजुर्ग औरत बिस्तर पर लेटी थी। आँखों में आँसू थे। “मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। बेटा भी गलत था। अब पछतावा हो रहा है।”
सुधा ने उसका हाथ पकड़ा। “अब पछतावे का समय नहीं। आप आराम करो। मैं दुआ करती हूँ।”
वापस लौटते हुए सुधा ने सोचा तलाक सिर्फ दो लोगों का अलग होना नहीं होता। वह एक औरत का खुद से मिलना भी होता है। जो टूटती है, वही फिर से जुड़ती है। और जब जुड़ती है तो पहले से मजबूत होती है।
आज सुधा की उम्र चालीस के पार है। अकेली है। लेकिन अकेली नहीं लगती। उसके पास खुद है। उसके पास अपनी पहचान है। उसके पास वह जिंदगी है जो उसने खुद चुनी।
कभी-कभी रात को जब अकेली बैठती है तो पुरानी यादें आती हैं। शादी का दिन, राहुल की मुस्कान, सास की डांट, तलाक का कागज। आँसू नहीं आते अब। बस एक शांति रहती है।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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