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टैग: दर्द रोमांस

  • घर से भागी बेटी का बाप

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    सांझ ढलते ही रामनाथ बाबू का दिल किसी अनजाने भय से बैठने लगता था। उनके घर के दालान में जलने वाला पीला बल्ब अब सिर्फ दीवारों पर पसरे सन्नाटे को ही रोशन करता था। उस सूनेपन में एक ही आवाज़ गूंजती रहती थी कमरे की खाली अलमारी और पलंग पर बिखरे हुए कुछ पुराने कागज़।

    घर से भागी हुई बेटी रिया का बाप होना दुनिया की सबसे अजीब सजा है। न तो वह खुलकर रो सकते हैं, न ही किसी से अपना दर्द कह सकते हैं। समाज की नज़रों में उनकी इज़्ज़त उनकी बेटी के पैरों तले रौंदी जा चुकी थी, लेकिन एक बाप के दिल से पूछिए—क्या इज़्ज़त उस खून के रिश्ते से बड़ी हो सकती है, जिसे उसने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था?

     

    वह सुबह आम दिनों जैसी बिल्कुल नहीं थी। २२ मार्च का वह दिन रामनाथ बाबू की ज़िंदगी को हमेशा के लिए दो हिस्सों में बांट गया। रोज़ की तरह सुबह पांच बजे उनकी आंख खुली। उन्होंने चाय की केतली गैस पर रखी और नेहमी की आदत के मुताबिक रिया के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।

    “रिया… ओ रिया, उठ जा बेटा। कॉलेज के लिए देर हो रही है।”

    कोई जवाब नहीं आया। आमतौर पर रिया अलार्म बजते ही उठ जाती थी। रामनाथ बाबू ने थोड़ा और ज़ोर से दरवाज़ा धक्का दिया। कुंडी अंदर से बंद नहीं थी, वह हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गई।

    कमरे का नज़ारा देखकर रामनाथ बाबू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पलंग की चादर करीने से तह की हुई थी, लेकिन रिया का तकिया गायब था। मेज़ पर एक लिफाफा रखा था, जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा था “पापा, मुझे माफ़ कर देना।”

    उस एक पल में रामनाथ बाबू के सिर के बाल और सफेद हो गए। उनके हाथ से चाय का कप छूटकर फर्श पर बिखर गया। गर्म चाय उनके पैरों के पास फैल गई, लेकिन उन्हें उसका अहसास तक नहीं हुआ। उन्होंने कांपते हाथों से वह चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था:

     

     “पापा, मैं जानती हूं कि आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं और मेरे भविष्य के लिए आपके पास बहुत बड़े सपने हैं। लेकिन मैं उस घुटन भरी ज़िंदगी में घुट रही हूं जहाँ मेरी आज़ादी और मेरी पसंद का कोई मोल नहीं है। मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी जीने जा रही हूँ। राहुल के साथ मैंने नई दुनिया बसाने का फैसला किया है। कृपया मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना। आपकी बेटी—रिया।”

     

    उस दिन के बाद से रामनाथ बाबू की दुनिया पूरी तरह बदल गई। जिस मोहल्ले में वे सिर उठाकर चलते थे, अब वहां से निकलते वक्त लोग खिड़कियों के परदे गिरा लेते थे या कानाफूसी करने लगते थे।

    मोहल्ले के चौधरी साहब ने तो यहाँ तक कह दिया था, “अरे रामनाथ जी, आधुनिकता के चक्कर में बेटी को ज़्यादा आज़ादी दे दी, नतीजा सामने है। हमारी बेटियों को देखिए, घर की चारदीवारी में संस्कारी हैं।”

    रामनाथ बाबू ने उन ताने मारने वालों को कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप सिर झुकाकर आगे बढ़ जाते। लेकिन उनके भीतर एक तूफान उठ रहा था। वे रात-रात भर जागकर छत पर टहलते रहते। उनकी आँखों के सामने रिया का बचपन नाचने लगता—जब वह घुटनों के बल चलती थी, जब उसने पहली बार ‘पापा’ कहा था, जब स्कूल में पहला पुरस्कार मिलने पर उसने गर्व से उनका हाथ पकड़ा था।

    वे खुद से बार-बार सवाल पूछते—”कहाँ कमी रह गई थी मेरी परवरिश में?” क्या उन्होंने उसे पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर छोड़ी थी? क्या उसकी हर ज़रूरत को पूरा करना गुनाह था? या फिर उन्होंने उसे अपनी उम्मीदों के बोझ तले इतना दबा दिया था कि उसे घर से भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा?

     

    रिया के जाने के एक महीने बाद पुलिस थाने से एक सिपाही रामनाथ बाबू के घर आया। उसने औपचारिकता निभाते हुए कहा, “बाबूजी, बालिग है लड़की। उसने कोर्ट मैरिज कर ली है और थाने में बयान दर्ज करा दिया है कि वह अपनी मर्जी से गई है। अब हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।”

    रामनाथ बाबू ने सिपाही को धन्यवाद कहा और दरवाज़ा बंद कर दिया। उस कानूनी कागज़ ने रिया को तो आज़ाद कर दिया था, लेकिन रामनाथ बाबू को अपने ही घर में कैद कर दिया था।

    समय बीतता गया। लोग भूलने लगे कि रामनाथ बाबू के घर में कोई आंधी आई थी। लेकिन एक बाप की यादें कभी नहीं मिटतीं। रिया की मां तो इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाईं और रिया के जाने के छह महीने बाद ही दिल का दौरा पड़ने से चल बसीं। जाने से पहले उनके आखिरी शब्द थे—”रामनाथ… रिया को माफ कर देना… वह हमारी ही तो खून है।”

    पत्नी की मौत ने रामनाथ बाबू को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया। अब वे इस घर में बिल्कुल अकेले थे। उनका अकेलापन चीख-चीखकर उन्हें डराता था।

    वह एक फोन कॉल

    एक सर्द शाम थी। रामनाथ बाबू अपने बरामदे में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे, तभी उनकी जेब में रखा पुराना फोन बज उठा। स्क्रीन पर एक अनजाना मोबाइल नंबर चमक रहा था।

    उन्होंने फोन उठाया और कांपती आवाज़ में कहा, “हैलो…”

    दूसरी तरफ से कुछ सेकंड तक सिर्फ सिसकियों की आवाज़ आती रही। फिर एक जानी-पहचानी, डरी हुई लेकिन प्यारी सी आवाज़ गूंजी—”पापा…”

    वह एक शब्द रामनाथ बाबू के सीने को चीरकर निकल गया। उनके हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। गले में कुछ अटक गया था, आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी।

    “पापा… मैं रिया बोल रही हूँ,” उधर से फिर आवाज़ आई, इस बार रुलाई फूट पड़ी थी। “पापा… मुझे बहुत पछतावा है। राहुल… वह जैसा दिखता था, वैसा नहीं है। वह मुझे मारता है, रोज़ शराब पीकर परेशान करता है। मेरा सब कुछ लुट गया पापा… अब मेरे पास आपके सिवा इस दुनिया में कोई नहीं है। क्या… क्या आप मुझे अपने पास वापस आने देंगे?”

    बाप का दिल और समाज की दीवारें

    उस एक पल में रामनाथ बाबू के सामने पूरी फिल्म की तरह पिछले दो साल का संघर्ष घूम गया। समाज का ताना, पत्नी की मौत, उनका अपना अकेलापन और रिया की वह रुलाई।

    एक तरफ उनका वह स्वाभिमान था, जिसे मोहल्ले वालों ने रौंद डाला था; दूसरी तरफ उस बाप का दिल था जो अपनी औलाद को तड़पता हुआ नहीं देख सकता था। समाज कहता था कि जो बेटी बाप की इज़्ज़त नीलाम कर दे, उसे कभी मुड़कर नहीं देखना चाहिए। लेकिन बाप का दिल कह रहा था—”इज़्ज़त और प्रतिष्ठा से बड़ी मेरी औलाद की जान और उसकी मुस्कान है।”

    रामनाथ बाबू की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उन्होंने अपने आंसुओं को पोछा, गहरी सांस ली और फोन पर दृढ़ता से कहा “बेटा… तू अपना बैग उठा और तुरंत स्टेशन पहुँच। तेरा बाप अभी तुझे लेने आ रहा है। समाज क्या कहता है, मुझे परवाह नहीं। तू मेरी बेटी थी, बेटी है और हमेशा मेरी ही रहोगी। जल्दी आ जा, घर सूना पड़ा है।”

    फोन कट गया। रामनाथ बाबू ने अपनी पुरानी शॉल उठाई, दरवाज़े की कुंडी लगाई और तेज़ी से बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए। उनके चेहरे पर अब कोई शिकन नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी शांति और उम्मीद थी।

    घर से भागी हुई बेटी का बाप आखिरकार जीत चुका था—उसने समाज के नियमों को नहीं, बल्कि अपने बाप होने के धर्म को चुन लिया था।

  • तलाक सुधा बहु

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    सुधा ने आईने में अपना चेहरा देखा। आँखें सूजी हुई थीं। बाल बिखरे हुए। होठों पर कोई रंग नहीं था। उसने साड़ी के पल्लू को ठीक किया और धीरे से बोली, “आज तलाक हो जाएगा।”

     

    शब्दों ने कमरे की हवा को भारी बना दिया। बाहर आँगन में सास की आवाज आ रही थी बरतनों की खनक और शिकायतों का सिलसिला। ससुर अखबार पढ़ रहे थे। जेठ-जेठानी अपने कमरे में थे। और देवर… देवर तो शादी के बाद से ही सुधा को देखकर मुँह फेर लेता था।

     

    सुधा की शादी हुए छह साल हो चुके थे। नाम था सुधा शर्मा। अब सुधा गुप्ता। पति का नाम था राहुल। ऊँची नौकरी, अच्छा घर, गाँव से शहर में बसा परिवार। शादी में खूब धूमधाम हुई थी। लाल जोड़े में सुधा इतनी खूबसूरत लग रही थी कि लोग कह रहे थे “राजकुमारी लग रही है।” लेकिन राजकुमारी की कहानी में राजकुमार धीरे-धीरे गायब होता गया।

     

    पहला साल ठीक था। राहुल प्यार करता था। रात को देर से आता तो भी सुधा के लिए फल लाता। सास थोड़ी कड़वी थीं, लेकिन सहनीय। फिर शुरू हुआ वह सिलसिला जो हर भारतीय बहु की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है तुलना।  

     

    “पड़ोस वाली बहु कितनी अच्छी रसोई बनाती है।”  

    “तुम्हारी सहेली ने कितना महँगा गहना पहनाया पति को।”  

    “बेटा, तुम्हारी बीवी को कुछ आता नहीं। न व्यवहार, न समझ।”  

     

    सुधा चुप रहती। राहुल पहले तो उसकी तरफ लेता। फिर धीरे-धीरे उसकी चुप्पी में शामिल होने लगा।  

     

    दूसरे साल जब सुधा माँ बनी नहीं, तो घर में जैसे कोई तूफान आ गया।  

    सास ने सीधे कहा, “बाँझ औरत का क्या काम इस घर में?”  

    राहुल ने विरोध नहीं किया। बस इतना बोला, “डॉक्टर को दिखा लो।”  

     

    डॉक्टर ने कहा सब ठीक है। फिर भी इल्जाम सुधा पर ही रहा।  

     

    तीसरे साल राहुल का तबादला दूसरे शहर हो गया। सुधा अकेली ससुराल में रह गई। दिनभर काम, रातभर अकेलापन। राहुल के फोन कम होने लगे। कभी-कभी तो हफ्तों बात नहीं होती। जब होती तो ठंडी आवाज में “मैं व्यस्त हूँ। तुम सँभाल लो घर।”  

     

    चौथे साल सुधा ने नौकरी करने की इच्छा जताई। सास ने मना कर दिया। “हमारे घर की बहु बाहर नौकरी नहीं करती।” राहुल ने भी समर्थन नहीं किया। “घर सँभालो, यही बहुत है।”  

     

    पाँचवें साल एक दिन सुधा को राहुल के फोन में एक अजनबी औरत की आवाज सुनाई दी। हँसी थी। प्यार भरी। सुधा ने पूछा तो राहुल ने गुस्से में फोन काट दिया। फिर तीन दिन बाद आया और बोला, “तुम्हें हर बात में शक रहता है। इसीलिए घर में तनाव रहता है।”  

     

    सुधा ने रोते हुए कहा, “मैं सिर्फ पूछ रही हूँ।”  

    राहुल ने जवाब दिया, “पूछने की जरूरत नहीं। मैं जो कर रहा हूँ सही कर रहा हूँ।”  

     

    उस रात सुधा ने पहली बार सोचा क्या यही प्यार है? क्या यही शादी है?  

     

    छठे साल सब कुछ टूट गया।  

     

    राहुल घर आया। चेहरा गंभीर। सास-ससुर भी बैठे थे। राहुल ने सीधा कहा, “सुधा, हमें अलग हो जाना चाहिए। तलाक।”  

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।  

    सुधा की साँसें तेज हो गईं। “क्यों?”  

     

    “अब नहीं बन रहा। तुम खुश नहीं, मैं खुश नहीं। बेहतर है अलग हो जाएँ।”  

     

    सास ने तुरंत कहा, “बेटा सही कह रहा है। बहु, तुम कभी इस घर में घुल नहीं पाई। अब जाओ अपने मायके। वहाँ बेहतर रहेगा।”  

     

    सुधा ने राहुल की ओर देखा। आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने गिराए नहीं। “तुमने कभी कोशिश की? कभी पूछा कि मैं क्यों उदास रहती हूँ? कभी मेरी तरफ से सोचा?”  

     

    राहुल चुप रहा।  

     

    फिर अदालत के चक्कर शुरू हुए। कागजात, वकील, तारीखें। सुधा के मायके वाले आए। भाई गुस्से में था। “हम तुम्हें वापस नहीं ले जा रहे बिना हिसाब लिए।” लेकिन सुधा ने मना कर दिया। “नहीं। मैं लड़ाई नहीं चाहती। बस छुटकारा चाहती हूँ।”  

     

    तलाक की सुनवाई के दिन सुधा अदालत पहुँची। साधारण सालवार कमीज में। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। राहुल सामने बैठा था। नई शर्ट, घड़ी चमक रही थी। उसके साथ एक औरत भी थी शायद वही, जिसकी हँसी सुधा ने फोन पर सुनी थी।  

     

    जज ने पूछा, “क्या आप दोनों सहमत हैं?”  

     

    राहुल ने सिर हिलाया।  

    सुधा ने भी।  

     

    कागजात पर दस्तखत हुए।  

    जज ने कहा, “तलाक मंजूर। अब आप दोनों आजाद हैं।”  

     

    आजाद।  

    शब्द कानों में गूँजा। सुधा ने उठाकर राहुल को देखा। वह मुस्कुरा रहा था। जैसे कोई बोझ उतर गया हो।  

     

    सुधा बाहर निकली। धूप तेज थी। आँखें चौंधिया गईं। भाई ने कहा, “चलो घर।”  

    सुधा ने सिर हिलाया। “थोड़ी देर अकेली रहना चाहती हूँ।”  

     

    वह पास के पार्क में जाकर बैठ गई। बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही थीं। एक छोटी लड़की अपनी माँ के पास दौड़कर गई और गले लग गई। सुधा की आँखें भर आईं।  

     

    उसने अपने फोन में पुरानी तस्वीरें देखीं। शादी की। हँसती हुई सुधा। राहुल का हाथ थामे हुए। तब लगता था कि जिंदगी भर साथ रहेंगे। अब सब खत्म।  

     

    शाम को मायके पहुँची। माँ ने गले लगाया और खूब रोई। “मेरी बेटी… तुम्हारा क्या कसूर था?”  

    पिताजी ने सिर्फ इतना कहा, “अब आगे देखो। पीछे मुड़कर मत देखना।”  

     

    रात को सुधा अपने पुराने कमरे में लेटी। दीवारों पर बचपन के पोस्टर अभी भी थे। उसने सोचा छह साल। इतने लंबे समय में उसने क्या खोया? अपनी हँसी, अपने सपने, अपना आत्मविश्वास। और क्या पाया? सिर्फ एक शब्द तलाक।  

     

    अगले दिन से जिंदगी फिर शुरू हुई।  

    सुधा ने नौकरी ढूँढ़ी। एक स्कूल में अध्यापिका बन गई। बच्चे उसे “सुधा मैम” कहकर बुलाते। उनकी मुस्कान में सुधा को नई ताकत मिलती।  

     

    सास ने फोन किया एक दिन। “बहु, तुमने घर का सामान ले लिया? कुछ बच गया हो तो भेज दो।”  

    सुधा ने शांत स्वर में कहा, “जो आपका था आपके पास है। जो मेरा था मैं ले आई। अब कोई लेन-देन नहीं।”  

     

    राहुल ने भी मैसेज किया। “सुधा, कोई खुशी-गम हो तो बताना। दोस्त बने रह सकते हैं।”  

    सुधा ने जवाब नहीं दिया। दोस्त वही होते हैं जो मुश्किल में साथ दें। राहुल मुश्किल में साथ नहीं था।  

     

    महीने बीतते गए। सुधा बदलने लगी। बाल कटवाए। हल्के रंग के कपड़े पहनने लगी। दोस्त बनाएं। एक दिन सहेली ने कहा, “तुम पहले से ज्यादा खूबसूरत लग रही हो।”  

    सुधा हँसी। “तलाक के बाद खूबसूरती आती है क्या?”  

    सहेली बोली, “नहीं। आजादी के बाद आती है।”  

     

    एक शाम सुधा नदी किनारे बैठी थी। पानी बह रहा था। उसने सोचा—शादी भी नदी जैसी होती है। कभी शांत, कभी उथली, कभी बाढ़। लेकिन अगर किनारे टूट जाएँ तो पानी अपना रास्ता बदल लेता है।  

     

    तभी पीछे से आवाज आई। “सुधा?”  

     

    वह मुड़ी। राहुल खड़ा था। अकेला।  

     

    “क्या काम है?” सुधा ने पूछा।  

     

    “मैं… मैं माफी माँगने आया हूँ। मैंने गलती की। वह औरत भी अब नहीं रही। मैं अकेला हूँ। क्या हम… फिर से कोशिश कर सकते हैं?”  

     

    सुधा ने उसकी ओर देखा। वही चेहरा। वही आँखें। लेकिन अब उनमें वह चमक नहीं थी जो कभी थी। या शायद चमक कभी थी ही नहीं।  

     

    उसने शांत स्वर में कहा, “राहुल, तलाक हो चुका है। कागजात पर दस्तखत हो चुके हैं। तुमने जब चाहा तब मुझे छोड़ा। अब जब तुम्हें अकेलापन चुभ रहा है तो वापस चाह रहे हो। मैं वह सुधा नहीं रही जो तुम्हारे इंतजार में रातें गिनती थी। मैं वह सुधा हूँ जिसने खुद को वापस पा लिया है।”  

     

    राहुल कुछ कहना चाहता था लेकिन सुधा ने हाथ उठाकर रोक दिया। “जाओ। अपनी जिंदगी जियो। मैं अपनी जी लूँगी।”  

     

    वह उठी और चल दी। पीछे मुड़कर नहीं देखा।  

     

    साल बीत गए।  

    सुधा अब स्कूल की हेडमिस्ट्रेस बन चुकी थी। घर छोटा था लेकिन अपना था। दीवारों पर उसकी पसंद के चित्र थे। रसोई में उसकी पसंद का सामान। कोई शिकायत नहीं, कोई तुलना नहीं, कोई तलाक का डर नहीं।  

     

    एक दिन उसकी पुरानी सास का फोन आया। आवाज कमजोर थी। “बहु… मैं बीमार हूँ। एक बार मिल लो।”  

     

    सुधा गई। बुजुर्ग औरत बिस्तर पर लेटी थी। आँखों में आँसू थे। “मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। बेटा भी गलत था। अब पछतावा हो रहा है।”  

     

    सुधा ने उसका हाथ पकड़ा। “अब पछतावे का समय नहीं। आप आराम करो। मैं दुआ करती हूँ।”  

     

    वापस लौटते हुए सुधा ने सोचा तलाक सिर्फ दो लोगों का अलग होना नहीं होता। वह एक औरत का खुद से मिलना भी होता है। जो टूटती है, वही फिर से जुड़ती है। और जब जुड़ती है तो पहले से मजबूत होती है।  

     

    आज सुधा की उम्र चालीस के पार है। अकेली है। लेकिन अकेली नहीं लगती। उसके पास खुद है। उसके पास अपनी पहचान है। उसके पास वह जिंदगी है जो उसने खुद चुनी।  

     

    कभी-कभी रात को जब अकेली बैठती है तो पुरानी यादें आती हैं। शादी का दिन, राहुल की मुस्कान, सास की डांट, तलाक का कागज। आँसू नहीं आते अब। बस एक शांति रहती है।  

     

  • हम भी जाएंगे देवघर

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    वैद्यनाथ, जिसे देवघर, बाबा धाम भी कहा जाता है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह झारखंड में स्थित है।

     

    यह शिव जी की पूजा का प्रमुख धाम है। सावन के महीने में लाखों लोग यहाँ आते हैं। कहा जाता है कि यहाँ माता सती का हृदय गिरा था। जब माता सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में गईं और वहाँ शिव जी का अपमान सहन नहीं कर सकीं, तब उन्होंने उसी अग्निकुंड में आत्मदाह कर लिया। जब भगवान शिव माता सती के शरीर को कंधे पर रखकर तांडव करने लगे, तब उनका हृदय यहाँ आकर गिरा। इसलिए यह 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

     

    कहा जाता है कि जब रावण ने कठोर तपस्या कर अपने एक-एक सिर भगवान शिव को अर्पित किए और अंतिम सिर भी चढ़ाने वाले थे, तब भगवान शिव प्रकट हुए। रावण ने उनसे प्रार्थना की कि वे उसके साथ लंका चलें। शिव जी शिवलिंग के रूप में उसके साथ चलने को तैयार हो गए, लेकिन एक शर्त रखी कि जहाँ भी वह शिवलिंग को धरती पर रख देगा, वहीं वह स्थापित हो जाएगा।

     

    देवताओं ने शिव जी को लंका जाने से रोकने के लिए झारखंड में रावण से छल कराया और शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। उसी स्थान पर माता सती का हृदय भी गिरा था। तभी से इस स्थान का नाम वैद्यनाथ धाम पड़ा।

     

    इसी वैद्यनाथ मंदिर में सावन के महीने में लाखों भक्त बाबा के दर्शन करने और गंगाजल चढ़ाने के लिए आते हैं।

     

    उन्हीं भक्तों में एक दंपति था—अमर और पूजा। वे पिछले 12 वर्षों से हर साल लगभग 200 किलोमीटर पैदल चलकर बाबा के दर्शन करने आते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने प्रण लिया था कि या तो बाबा उन्हें संतान देंगे, या फिर वे जीवन भर हर साल इसी तरह बाबा के दर्शन करने आते रहेंगे।

     

    दोनों के पैरों में छाले पड़ जाते थे, फिर भी वे कभी नहीं रुकते थे। पूरे रास्ते वे कुछ खाते-पीते नहीं थे। बस एक ही नारा लगाते हुए चलते रहते—

     

    “बोलबम का नारा है, बाबा एक सहारा है।”

     

    घर से निकलने से लेकर घर लौटने तक उनके होंठों पर बस यही जयकारा रहता था।

     

    लोग कहते थे, “अगर कोई दे सकता है, तो केवल भोले बाबा ही दे सकते हैं। उनसे बड़ा दयालु कोई नहीं।”

     

    समय बीतता गया। एक दिन पूजा की गोद भर गई। अमर और पूजा इसे भोले बाबा का आशीर्वाद मानने लगे। आखिर बाबा ने उनकी पुकार सुन ली थी।

     

    इस वर्ष भी सावन का महीना आया, लेकिन इस बार पूजा आठ महीने की गर्भवती थी। डॉक्टर ने उसे कहीं भी यात्रा करने से मना किया था। घर के सभी लोग भी यही चाहते थे कि इस बार पूजा देवघर न जाए और अमर अकेले ही बाबा के दर्शन कर आए।

     

    अमर ने भी प्यार से कहा,

     

    “पूजा, इस बार तुम मत चलो। तुम्हारी और हमारे बच्चे की सुरक्षा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।”

     

    लेकिन पूजा मुस्कुराकर बोली,

     

    “जब मेरे पास कुछ नहीं था, तब भी मैं बाबा के दर्शन के लिए जाती थी। आज जब भोले बाबा ने हमें यह अनमोल खुशी दी है, तो मैं उनके दर्शन किए बिना कैसे रह सकती हूँ? बारह साल तक उन्होंने हमारा साथ नहीं छोड़ा, तो अब मैं भी उनका साथ नहीं छोड़ूँगी। हम दोनों साथ चलेंगे।”

     

    आखिरकार अमर उसकी जिद के आगे हार गया।

     

    सावन के पहले सोमवार के दर्शन के लिए दोनों शुक्रवार को ही घर से निकल पड़े। रास्ते भर “बोलबम का नारा है, बाबा एक सहारा है” का जयघोष करते हुए वे पैदल चलते रहे।

     

    पूजा अपने पेट पर हाथ रखकर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रही थी और अमर हर पल उसका सहारा बना हुआ था। जब भी पूजा थक जाती, अमर उसे कुछ देर बैठाकर आराम कराता, लेकिन खुद कभी नहीं बैठता। उसकी बस एक ही चिंता थी कि पूजा सुरक्षित बाबा धाम पहुँच जाए।

     

    आधे रास्ते तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन अचानक पूजा के पेट में तेज दर्द होने लगा। दर्द इतना बढ़ गया कि वह सड़क किनारे बैठ गई। अमर घबरा गया। आसपास चल रही कुछ महिला कांवरियों ने तुरंत दौड़कर पूजा को संभाला।

     

    एक महिला ने पूजा की हालत देखकर कहा,

     

    “लगता है बच्चे का जन्म होने वाला है। इसे तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।”

     

    लेकिन पूजा दर्द से कराहते हुए बोली,

     

    “नहीं… मैं बाबा के दर्शन किए बिना कहीं नहीं जाऊँगी। चाहे कुछ भी हो जाए।”

     

    सबने उसे बहुत समझाया, पर वह नहीं मानी। आखिर सभी महिलाओं ने वहीं उसकी मदद करने का फैसला किया।

     

    अमर बाहर बेचैन होकर इधर-उधर टहल रहा था। उसके हाथ जुड़े हुए थे और आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    वह बार-बार बाबा से प्रार्थना कर रहा था,

     

    “भोलेनाथ! आज तक कभी खाली हाथ नहीं लौटाया। मेरी पूजा और मेरे बच्चे की रक्षा करना।”

     

    कुछ ही देर बाद बच्चे की किलकारी गूँज उठी।

     

    महिलाएँ मुस्कुराते हुए बाहर आईं और बोलीं,

     

    “बधाई हो… बेटा हुआ है।”

     

    यह सुनते ही अमर की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उसने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा और बोला,

     

    “हर-हर महादेव! बाबा, आपने हमारी लाज रख ली।”

     

    थोड़ी देर आराम करने के बाद पूजा ने अपने नवजात बेटे को गोद में उठाया और दोनों फिर बाबा धाम की ओर चल पड़े।

     

    सोमवार की सुबह वे वैद्यनाथ धाम पहुँच गए। बाबा के दर्शन किए, गंगाजल अर्पित किया और अपने बेटे को भगवान शिव के चरणों में लिटा दिया।

     

    दोनों ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोले बाबा! यह आपका दिया हुआ प्रसाद है। इसकी रक्षा करना।”

     

    उन्होंने अपने बेटे का नाम शिवशंकर रखा।

     

    जिस बाबा से उन्होंने बारह वर्षों तक संतान माँगी थी, उसी बाबा ने उनकी झोली भर दी थी। उनकी श्रद्धा और विश्वास सफल हो गया।

     

    लक्ष्मी कुमारी

  • अबकी बार मौसम देख कर मिलेंगे…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अबकी बार तुझसे अच्छा मौसम देख के मिलेंगे.. 

    वक़्त जल्दी बीतता है घड़ियां फेक के मिलेंगे।।

     

    पिछली बार तो हम दोनों हुए बहुत बदनाम।। 

    अबकी बार दांए-बांए देख के गले मिलेंगे..

     

    वो जिस रास्ते से गुजरी है वहां जाकर देख… 

    मुरझाए हुए फूल भी तुमको खिले मिलेंगे।।

     

    मुहब्बत बड़ी गहरी हो गई है तुमसे ।। 

    इसका मतलब जख्म भी बड़े गहरे मिलेंगे..

  • 💞💞 प्यार का नशा 💞💞

    💞💞 प्यार का नशा 💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    ## जुहू बिच ( मुंबई ) ##

    समुद्र के किनारे जुहू बीच पर, मुंबई की एक सुबह , सूरज की पहली किरणें समुद्र से निकलती हुई लग रही थीं।

          “” रिशाल अग्निहोत्री, जो एक अमीर बिजनेसमैन है, की कार आकर उस जुहू बिच के किनारे लगती है और फिर रिशाल अग्निहोत्री , अपनी कार से उतरते हुए, जुहू बीच की ओर चल देता है । वो यहाँ एक इम्पोर्टेन्ट मीटिंग के लिए आया हूआ था, जो उसके बिजनेस के फ्यूचर को बदल सकती थी।

    जैसे ही वह बीच पर एंट्री लेता है सबही उसकी तरफ देखने लगते है, आखिर रिशाल अग्निहोत्री था ही इतना डेसिंग और चार्म बिलकुल किसी हीरो के तरह उसकी चेहरे पर पैसे का रोव जो होता है, वो साफ नजर आ रहा था, थोड़ा खड़ूस ओर थोड़ा अड़ियल सा रिशाल अग्निहोत्री ,

    वही दूसरी और एक मासूम सी भोली भाली लड़की अमानत , जो अपने भाई के साथ समुद्र के किनारे घूमने आई हुई थी, छोटी छोटी खुशियों को इक्क्ठा करने वाली हमारी अमानत, जो अपने भाई के साथ अपने जन्मदिन की शाम मनाने आई थी, अपने भाई के चेहरे पर खुशियाँ लाने आई थी, आखिर था ही कौन उसका इस जहा मे उसकी छोटे भाई व्योम के अलावे ।

    एक तरफ RA अपनी मीटिंग की तैयारी में था, की तभी उसकी कान मे एक आवाज़ आई और उसने अपनी नजर उठा कर उस आवाज़ के तरफ देखा, वह उसकी मासूमियत और सुंदरता से आकर्षित हो गया। लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाता, अमानत उसके साथ आकर गलती से टकरा गई।

    अमानत के हाथ से उसका फोन और पर्स गिर गए, और रिशाल ने जल्दी से अमानत को पकड़ लिया पर इन सब मे रिशाल आमनात को ले उस बिच के किनारे गिर जाता है जहा अंदर रिशाल और ऊपर अमानत दोनों उस बिच की मिट्टी मे लोट पोत हो जाते है,दोनों एक दूसरे के आँखों मे कुछ पल देखते है, रिशाल के आँखों मे जहा एक जूनून और गुस्सा था वही अमानत के आँखों मे डर साफ नजर आ रहा था, तभी जल्दी से अमानत खरी हो जाती है और रिशाल से माफ़ी मांगती है, रिशाल का चेहरा जो काफ़ी गुस्से से भर चूका था |” 

     रिशाल को नहीं पता था कि यह छोटी सी मुलाकात उसकी जिंदगी को कैसे बदल देगी…

    रिशाल से टकराते ही, अमानत को लगा कि वह गुस्से में आ जाएगा। लेकिन उसने नहीं सोचा था कि रिशाल का गुस्सा इतना ज्यादा होगा।

    रिशाल ने अमानत को देखा और उसकी आँखें गुस्से से भर गईं। “तुम्हारी इतनी हिम्मत ?

    तुम्हें देखकर नहीं चलना आता है क्या?” रिशाल ने अमानत से कहा।

    अमानत ने माफी मांगी और कहा, “मुझे माफ कर दीजिए, मैं अनजाने में आपके साथ टकरा गई।”वो में अपने भाई के साथ खेल रही थी तो अनजाने में ये सब हो गया… सॉरी मे आपकी ड्रेस अभी साफ कर देती हु ये कहते हुए अमानत अपने दुपट्टे से रिशाल का ड्रेस साफ करने लगती है जहा वो साफ होने के बजाय और गन्दा ही हो जाता है, अब तो अमानत की सांस हलक मे थी उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था |” 

    इधर रिशाल का गुस्सा कम नहीं हुआ। “तुम्हें पता नहीं है कि मैं कौन हूँ?

     मैं रिशाल अग्निहोत्री हूँ, और मेरे पास बहुत इम्पोर्टेन्ट काम है। तुम्हारी इस लापरवाही से मेरा कितना समय बर्बाद हो गया पता भी है तुम्हे?”और ये क्या किया तुमने?” 

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    … to be continue…