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लेखक: Alka Singh

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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मार्च 2026
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  • तेरी मेरी प्रेम कहानी ❤️❤️

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    शुरुआत कुछ यूँ हुई थी,

    जैसे सुबह में पहली किरण उतरती है,

    सूखे मन के आँगन में

    धीरे-धीरे कोई बारिश बिखरती है।

    तेरी हँसी ने छू लिया था

    मेरे खामोश लफ़्ज़ों का जहान,

    और फिर हर धड़कन कहने लगी —

    “तू ही मेरी मंज़िल, तू ही मेरी पहचान।”

    तेरी आँखों में मैंने

    अपने हर ख़्वाब का घर देखा,

    तेरे साथ हर मौसम में

    प्यार का खिलता असर देखा।

    कभी रूठना, कभी मनाना,

    कभी बातों में रात गुज़र जाना,

    तेरी मेरी प्रेम कहानी में

    हर पल था जैसे कोई अफ़साना।

    जब दुनिया ने सवाल किए,

    हमने मुस्कुराकर साथ निभाया,

    हर मुश्किल की धूप में भी

    एक-दूजे को छाँव बनाया।

    और अब जब वक़्त की किताब में

    कई यादों के फूल सजे हैं,

    तेरी मेरी प्रेम कहानी के

    हर लम्हे आज भी ताज़ा खड़े हैं।

    अंत भी ऐसा हो हमारा,

    कि साँसें थम जाएँ मगर प्यार न रुके,

    तेरा हाथ मेरे हाथ में हो

    और दिल आख़िरी धड़कन तक तुझी को पुकारे।

    क्योंकि तेरी मेरी प्रेम कहानी

    सिर्फ़ शब्दों की बात नहीं,

    ये वो एहसास है

    1. जो कभी खत्म होने वाली रात नहीं।
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    Alka Singh

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  • साजन साजन तेरी दुल्हन_तुझको पुकारे_आजा_❤️❤️

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तेरी राहों में बिछे हैं मेरे अरमान सारे,

    • तेरे बिना अधूरे हैं ये ख्वाब हमारे।

    साजन, तेरी दुल्हन हर पल तुझे ही पुकारे,

    आ जा कि थम जाएँ ये इंतज़ार के किनारे।

    सिंदूर की लकीरों में बस तेरा ही नाम है,

    मेरी हर धड़कन पे लिखा तेरा पैगाम है।

    साजन, तेरी दुल्हन सजी बैठी है चौखट पे,

    आ जा कि तेरे बिना सब कुछ वीरान है।

    भीगी सी पलकों में तेरी तस्वीर बसाई है,

    तेरे ख्यालों से ही ये दुनिया सजाई है।

    साजन, तेरी दुल्हन अब और ना तरसाए खुद को,

    आ जा कि तेरे बिना हर खुशी पर परछाई है।

    रूठी हुई रातें भी तुझसे ही मानेंगी,

    सूनी ये बाहें बस तुझको ही जानेंगी।

    साजन, तेरी दुल्हन तेरे कदमों की आहट सुने,

    आ जा कि ये साँसें अब तुझसे ही चलेंगी।

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  • सपनों का पुल

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    एक छोटे से गाँव में आरव नाम का एक प्यारा बच्चा रहता था। आरव को सपने देखना बहुत पसंद था। हर रात वह आँखें बंद करता और एक नई दुनिया में चला जाता—जहाँ रंग-बिरंगे पेड़ होते, उड़ते हुए फूल होते और हँसती हुई नदियाँ होतीं।

    एक दिन उसने अपने सपने में एक अनोखा पुल देखा। वह पुल साधारण नहीं था—वह “सपनों का पुल” था। यह पुल इंद्रधनुष के रंगों से बना था और बादलों के ऊपर तैरता था। पुल के एक छोर पर “डर” खड़ा था और दूसरे छोर पर “हिम्मत और खुशी”।

    आरव पहले तो डर गया। उसने सोचा, “अगर मैं गिर गया तो?” तभी एक छोटी सी चिड़िया आई और मुस्कुराते हुए बोली,

    “डर को पार करना है तो पहला कदम बढ़ाना होगा।”

    आरव ने गहरी साँस ली और पुल पर कदम रखा। जैसे ही उसने पहला कदम रखा, पुल थोड़ा और चमकने लगा। हर कदम के साथ उसका डर कम होता गया और उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया।

    चलते-चलते उसे रास्ते में कई बच्चे मिले। कोई कह रहा था, “मुझे चित्र बनाना है, पर मैं अच्छा नहीं हूँ।” कोई कह रहा था, “मुझे गाना गाना है, पर लोग हँसेंगे।”

    आरव मुस्कुराया और बोला, “चलो, हम सब साथ चलेंगे। यह पुल हमें सिखाता है कि कोशिश करने से ही सपने पूरे होते हैं।”

    सब बच्चों ने मिलकर एक-दूसरे का हाथ थाम लिया और आगे बढ़ते गए। जैसे ही वे पुल के अंत तक पहुँचे, वहाँ एक सुंदर बगीचा था—जहाँ हर बच्चे का सपना सच हो रहा था।

    आरव ने देखा, जो बच्चा डर रहा था, वही अब खूबसूरत चित्र बना रहा था। जो गाने से डरता था, वह खुशी-खुशी गा रहा था। सबके चेहरे पर मुस्कान थी।

    तभी वही चिड़िया फिर आई और बोली,

    “यह पुल हर बच्चे के अंदर होता है। जब तुम अपने डर से आगे बढ़ते हो, तो तुम्हारा ‘सपनों का पुल’ तुम्हें तुम्हारी खुशी तक ले जाता है।”

    अगली सुबह जब आरव जागा, तो वह बहुत खुश था। उसने तय किया कि वह अपने सपनों से कभी नहीं डरेगा और हमेशा पहला कदम बढ़ाएगा।

    सीख:

    डर हमें रोकता है, लेकिन हिम्मत हमें आगे बढ़ाती है। जब हम अपने सपनों की ओर पहला कदम उठाते हैं, तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं।

    1. और तब से, हर रात आरव अपने सपनों के पुल पर चलता… और हर दिन अपनी असली जिंदगी में एक कदम आगे बढ़ाता। 🌈
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  • प्यार करते हो तो तड़पाते क्यों हो

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    प्यार करते हो तो तड़पाते क्यों हो,

    दिल में बसाकर यूँ रुलाते क्यों हो।

    कहते हो जान हो मेरी हर घड़ी,

    फिर दूर रहकर ये सताते क्यों हो।

    वादा किया था साथ निभाने का,

    हर मोड़ पे हाथ थाम जाने का,

    फिर खामोशी की चादर ओढ़कर,

    मुझसे ही नज़रें चुराते क्यों हो।

    मेरे ख्वाबों में तुम ही तुम रहते हो,

    फिर हकीकत में बदल जाते क्यों हो।

    प्यार करते हो अगर सच्चे दिल से,

    तो हर बात पे यूँ आज़माते क्यों हो।

    दिल की हर धड़कन तेरे नाम कर दी,

    हर खुशी तेरे अरमान कर दी,

    फिर मेरी मोहब्बत को यूँ सवाल बना कर,

    मुझको ही गलत ठहराते क्यों हो।

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  • निगाहें👀उनकी भी चेहरे से हटती नही..❤️

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    वो आँखों से यूँ शरारत करती है….💖अपनी अदा से भी कयामत करती है,,,निगाहें👀 उनकी भी चेहरे से हटती नही….💖और वो हमारी नजरों से शिकायत करती है।।❤️🔵🔵🔴🔴❤️❤️❤️🔴❤️🔵🔴🔵❤️

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  • तुझ बिन मैं कहाँ 💘💘

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    जैसे खुशबू बिना कोई फूल अधूरा हो,

    जैसे चाँद भी हो मगर उसकी चाँदनी कहीं खोया हो।

     

    तेरी बाहों में ही मेरी हर शाम सिमटती है,

    तेरे नाम से ही मेरी हर सुबह सँवरती है।

    तू पास हो तो धड़कनों को सुकून सा मिलता है,

    तेरी हँसी से ही मेरी दुनिया निखरती है।

     

    तेरे लबों की मिठास में मेरा हर ख्वाब घुल जाए,

    तेरी आँखों की गहराई में मेरा जहाँ डूब जाए।

    तू छू ले जो हल्के से, तो रूह तक महक उठे,

    तेरे इश्क में ये दिल हर हद से गुजर जाए।

     

    मैं तुझमें खो जाऊँ, तू मुझमें कहीं ठहर जाए,

    जैसे दो धड़कनें मिलकर एक कहानी कह जाएँ।

    ना कोई फासला रहे, ना कोई खामोशी दरमियां,

    बस तेरे मेरे प्यार का सिलसिला यूँ ही बह जाए।

     

    तुझ बिन मैं कहाँ — अब ये कहना भी जरूरी नहीं,

    तू ही मेरा सुकून है, तू ही मेरी हर खुशी।

    अगर तू साथ है, तो हर लम्हा जन्नत सा लगे,

    • वरना ये दिल तेरे बिना कहीं भी लगे नहीं।
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  • “VIP सिलेंडर की महान गाथा”

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    सुबह की चाय में आज कुछ कमी सी है,

    चूल्हे की आँच भी जैसे थमी सी है।

    रसोई में खामोशी का राज हुआ,

    गैस का सिलेंडर अब कुछ नाराज़ हुआ।

    कहते हैं दूर कहीं युद्ध की आग है,

    दो देशों के बीच जलती हुई भाग-दौड़ है,

    पर असर यहाँ हर घर की थाली पर है,

    महंगाई की मार अब खाली जेब पर है।

    Narendra Modi जी ने भी सोचा होगा कुछ तो उपाय,

    पर जनता पूछे—”सर, ये महंगाई क्यों भाई?”

    सिलेंडर की कीमत जैसे चाँद को छू गई,

    और आम आदमी की सांसें भी रुक सी गई।

    अब रोटी बनती है हिसाब लगाकर,

    सब्ज़ी पकती है थोड़ा बचाकर,

    हंसी में भी अब हल्की सी आह है,

    “गैस जले तो ही घर में चाय है!”

    पर फिर भी उम्मीद का दीप जलता है,

    हर मुश्किल में भारत संभलता है।

    हँसते-हँसते हम ये दौर भी काटेंगे,

    थोड़ा कम पकाएँगे… पर दिल से खाएँगे।

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  • आईना जो कभी टूटता नही…।।

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    • गांव की सुबह हमेशा की तरह धूप से नहीं, बल्कि उम्मीदों से जागती थी। मिट्टी की खुशबू, कच्चे रास्तों पर चलते लोग, और दूर मंदिर की घंटी—सब कुछ एक सुकून देता था। इसी गांव में रहती थी सावित्री, एक साधारण सी औरत, जिसकी आंखों में असाधारण हिम्मत थी। उसका जीवन आसान नहीं था, लेकिन उसके सपने बहुत बड़े थे—अपने बेटे अमन को पढ़ा-लिखाकर एक अच्छा इंसान बनाना।
    • सावित्री का पति कई साल पहले शहर कमाने गया था और फिर कभी लौटा नहीं। गांव वालों ने तरह-तरह की बातें बनाई—किसी ने कहा वो दूसरी शादी कर चुका है, तो किसी ने कहा वो अब इस दुनिया में नहीं। लेकिन सावित्री ने कभी हार नहीं मानी। उसने दूसरों के घरों में काम करके, खेतों में मजदूरी करके अपने बेटे को पाला।
    • अमन पढ़ाई में बहुत तेज था। स्कूल में हमेशा अव्वल आता था। गांव के मास्टर जी भी उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे। लेकिन गांव के कुछ लोग उसकी तरक्की से खुश नहीं थे। उन्हें लगता था कि एक गरीब औरत का बेटा इतना आगे कैसे बढ़ सकता है।
    • एक दिन, गांव में एक बड़ा कार्यक्रम रखा गया—“सामाजिक विकास सम्मेलन।” इसमें शहर से बड़े-बड़े लोग आने वाले थे। गांव के प्रधान ने घोषणा की कि इस कार्यक्रम में गांव के होनहार बच्चों को सम्मानित किया जाएगा। अमन का नाम भी उस सूची में था।
    • सावित्री बहुत खुश थी। उसने अपने बेटे के लिए नया कुर्ता खरीदा, जो उसने अपनी महीनों की बचत से लिया था। अमन भी बहुत उत्साहित था। उसे लग रहा था कि उसकी मेहनत रंग ला रही है।
    • कार्यक्रम का दिन आया। मंच सजा हुआ था, बड़े-बड़े नेता और अधिकारी आए हुए थे। भाषणों का दौर शुरू हुआ। सब लोग समाज की तरक्की, समानता और शिक्षा की बात कर रहे थे। शब्द बड़े-बड़े थे, लेकिन उनमें सच्चाई कितनी थी, यह कोई नहीं जानता था।
    • जब अमन का नाम पुकारा गया, तो सावित्री की आंखों में आंसू आ गए। वह गर्व से भर गई। अमन मंच की ओर बढ़ा। लेकिन तभी एक अप्रत्याशित घटना हुई।
    • गांव के एक प्रभावशाली आदमी, ठाकुर साहब, ने अचानक विरोध जताया। उन्होंने कहा, “यह लड़का इस सम्मान के लायक नहीं है। इसका बाप कौन है, किसी को नहीं पता। ऐसे बच्चों को मंच पर लाना समाज के लिए सही नहीं है।”
    • पूरे कार्यक्रम में सन्नाटा छा गया। लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। किसी ने कुछ नहीं कहा। मंच पर बैठे अधिकारी भी चुप थे। जो लोग अभी तक समानता की बातें कर रहे थे, वे अब खामोश थे।
    • अमन वहीं रुक गया। उसके कदम थम गए। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन उसने खुद को संभालने की कोशिश की। सावित्री भीड़ में खड़ी थी, उसका दिल टूट चुका था। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।
    • वह आगे बढ़ी और सीधे मंच पर चढ़ गई। सब लोग हैरान रह गए। उसने माइक उठाया और बोली—
    • “आज आप सब समाज की बात कर रहे हैं। लेकिन यह कैसा समाज है, जहां एक बच्चे की मेहनत से ज्यादा उसके बाप का नाम मायने रखता है? मेरा बेटा मेहनती है, ईमानदार है। क्या यह काफी नहीं है?”
    • उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन उसके शब्दों में ताकत थी। उसने आगे कहा—
    • “अगर बाप का नाम ही सब कुछ है, तो फिर उन बच्चों का क्या, जिनके बाप उन्हें छोड़कर चले गए? क्या उन्हें जीने का हक नहीं? क्या उनके सपनों की कोई कीमत नहीं?”
    • भीड़ में कुछ लोग सिर झुकाने लगे। लेकिन ठाकुर साहब अब भी अड़े हुए थे। उन्होंने कहा, “समाज नियमों से चलता है, भावनाओं से नहीं।”
    • सावित्री ने जवाब दिया, “समाज इंसानों से बनता है, नियमों से नहीं। और अगर नियम इंसानियत को कुचल दें, तो उन्हें बदलना ही चाहिए।”
    • यह सुनकर कुछ लोग तालियां बजाने लगे। धीरे-धीरे पूरा माहौल बदलने लगा। जो लोग चुप थे, वे अब बोलने लगे। मास्टर जी आगे आए और बोले—
    • “अमन इस गांव का सबसे होनहार बच्चा है। अगर उसे सम्मान नहीं मिलेगा, तो यह हम सबकी हार होगी।”
    • अधिकारियों को भी अब समझ आ गया कि चुप रहना सही नहीं है। उन्होंने अमन को मंच पर बुलाया और उसे सम्मानित किया। तालियों की गूंज पूरे गांव में फैल गई।
    • लेकिन यह जीत सिर्फ अमन की नहीं थी। यह जीत उस सोच की थी, जो समाज को बदलना चाहती है।
    • कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी लोग इस घटना की चर्चा करते रहे। कुछ लोग अब भी ठाकुर साहब के साथ थे, लेकिन बहुत से लोग अब बदल चुके थे। उन्हें एहसास हो गया था कि समाज का असली चेहरा वही है, जो हम अपने कर्मों से दिखाते हैं, न कि अपने शब्दों से।
    • अमन ने उस दिन सिर्फ एक पुरस्कार नहीं जीता, बल्कि उसने समाज को एक आईना दिखाया—एक ऐसा आईना, जो टूटता नहीं, बल्कि सच्चाई को साफ-साफ दिखाता है।
    • सालों बाद, अमन एक बड़ा अधिकारी बना। उसने अपने गांव में एक स्कूल खोला, जहां हर बच्चे को बिना भेदभाव के शिक्षा मिलती थी। सावित्री अब बूढ़ी हो चुकी थी, लेकिन उसकी आंखों में वही चमक थी।
    • एक दिन, गांव में फिर एक कार्यक्रम हुआ। इस बार मंच पर अमन था, और सामने वही लोग बैठे थे। उसने अपने भाषण में कहा—
    • “समाज बदलता है, जब हम बदलते हैं। उस दिन मेरी मां ने जो कहा था, वह सिर्फ मेरे लिए नहीं था, बल्कि हम सबके लिए था। हमें यह तय करना है कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं—वह जो लोगों को तोड़ता है, या वह जो उन्हें जोड़ता है।”
    • भीड़ में बैठे लोग चुपचाप सुन रहे थे। इस बार उनकी खामोशी में शर्म नहीं, बल्कि समझ थी।
    • कहानी यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि समाज की कहानी कभी खत्म नहीं होती। हर दिन, हर जगह, यह कहानी दोहराई जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कहीं कोई सावित्री बोलने की हिम्मत करती है, और कहीं कोई चुप रह जाता है।
    • अंत में, यह कहानी हमें एक सवाल छोड़ जाती है—
    • क्या हम उस समाज का हिस्सा बनना चाहते हैं, जो दूसरों को उनके हालात से आंकता है, या उस समाज का, जो उन्हें उनके प्रयासों से पहचानता है?
    • क्योंकि असली चेहरा वही है, जो हम रोज आईने में देखते हैं… और वह आईना कभी झूठ नहीं बोलता।
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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇

    चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं

    शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • अबके बरस..💘💘

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    वाराणसी की गलियों में बारिश का अपना ही संगीत होता है—भीगी हुई मिट्टी की खुशबू, मंदिरों की घंटियों में घुलती बूंदों की लय, और गंगा के किनारे बहती ठंडी हवा। उसी शहर में, उसी बारिश के मौसम में, एक अधूरी प्रेम कहानी हर साल जन्म लेती थी… और हर साल अधूरी ही रह जाती थी।

     

    आरव को बारिश से प्यार था, लेकिन उससे भी ज़्यादा उस लड़की से, जो हर बरसात में अचानक उसकी जिंदगी में आ जाती थी—नैना।

     

    पहली बार वह उसे पाँच साल पहले सावन की पहली बारिश में मिला था। आरव अस्सी घाट पर भीगता हुआ खड़ा था, तभी उसने देखा—सफेद सलवार में एक लड़की, हाथों में चूड़ियाँ, बालों से टपकती बूंदें, और चेहरे पर अजीब सी मुस्कान। वह जैसे बारिश को महसूस नहीं कर रही थी, बल्कि बारिश उसके अंदर उतर रही थी।

     

    “तुम भीग क्यों रहे हो?” नैना ने पूछा था।

     

    आरव ने हंसते हुए जवाब दिया था, “क्योंकि बारिश रुकने का इंतजार करना मुझे पसंद नहीं।”

     

    “और मुझे बारिश में खो जाना पसंद है,” उसने कहा था।

     

    उस दिन दोनों घंटों साथ बैठे रहे। बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं। जैसे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों। लेकिन शाम ढलते-ढलते, जब आरव ने उसका नंबर माँगा, नैना मुस्कुरा कर चली गई। बस इतना कहा—“अगर किस्मत हुई, तो अगले बरस मिलेंगे।”

     

    आरव को लगा था यह बस एक अजीब सी मुलाकात थी, जो खत्म हो गई। लेकिन अगले साल, ठीक उसी दिन, उसी जगह… नैना फिर मिल गई।

     

    “तुम आ गए,” उसने कहा।

     

    “तुम भी,” आरव ने जवाब दिया।

     

    उस दिन भी वही हुआ—लंबी बातें, हंसी, चाय, और फिर विदाई। कोई नंबर नहीं, कोई वादा नहीं। बस एक उम्मीद—“अबके बरस फिर मिलेंगे।”

     

    इस तरह चार साल बीत गए। हर साल सावन में वे मिलते, प्यार थोड़ा और गहरा होता, लेकिन कभी किसी ने इज़हार नहीं किया। जैसे दोनों को डर हो कि इज़हार करते ही यह जादू खत्म हो जाएगा।

     

    लेकिन पाँचवें साल कुछ बदल गया था।

     

    इस बार आरव ने तय कर लिया था—वह नैना को जाने नहीं देगा। वह उसे बताएगा कि वह उससे प्यार करता है, कि वह हर साल सिर्फ उसी के लिए जीता है, कि उसकी जिंदगी अब इन बरसाती मुलाकातों से कहीं ज़्यादा चाहती है।

     

    सावन की पहली बारिश हुई, और आरव अस्सी घाट पर पहले से खड़ा था। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। हर आती-जाती लड़की में उसे नैना दिख रही थी। लेकिन वह नहीं आई।

     

    घंटे बीत गए। बारिश तेज़ हो गई। घाट खाली होने लगा। आरव का दिल टूटने लगा।

     

    “शायद इस बार किस्मत नहीं थी…” उसने खुद से कहा।

     

    वह जाने ही वाला था कि पीछे से वही आवाज़ आई—“इतनी जल्दी हार मान गए?”

     

    आरव पलटा। नैना थी। भीगी हुई, मुस्कुराती हुई… लेकिन इस बार उसकी आँखों में कुछ अलग था—जैसे कोई दर्द, कोई झिझक।

     

    “तुम आई क्यों नहीं?” आरव ने शिकायत की।

     

    “आई तो हूँ,” उसने धीरे से कहा, “बस थोड़ी देर हो गई।”

     

    दोनों फिर साथ बैठे। लेकिन इस बार बातचीत में वो पुरानी हल्कापन नहीं था। कुछ अनकहा, कुछ अधूरा सा हवा में तैर रहा था।

     

    आखिरकार, आरव ने हिम्मत जुटाई—“नैना, मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

     

    “मत कहो,” उसने तुरंत कहा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने कह दिया, तो शायद हम फिर कभी नहीं मिल पाएंगे।”

     

    आरव चुप हो गया। “क्या मतलब?”

     

    नैना ने गहरी सांस ली। “हर साल मैं यहाँ इसलिए आती थी क्योंकि मुझे लगता था कि कुछ चीजें अधूरी ही खूबसूरत होती हैं। अगर हम इन्हें पूरा करने की कोशिश करेंगे, तो ये टूट जाएंगी।”

     

    “लेकिन मैं अधूरा नहीं रहना चाहता,” आरव ने कहा। “मैं तुम्हारे साथ पूरा होना चाहता हूँ।”

     

    नैना की आँखों में आँसू आ गए। “तुम समझ नहीं रहे…”

     

    “तो समझाओ,” आरव ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा। “इस बार मैं तुम्हें ऐसे नहीं जाने दूंगा।”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद, नैना ने कहा—“मैं हर साल इसलिए आती थी क्योंकि मैं खुद से भाग रही थी। मेरी शादी तय हो चुकी थी… पाँच साल पहले ही।”

     

    आरव का दिल जैसे थम गया। “क्या?”

     

    “हाँ,” नैना ने सिर झुका लिया। “मैं हर साल यहाँ आती थी, क्योंकि तुम्हारे साथ वो जिंदगी जी पाती थी, जो मेरी नहीं थी।”

     

    “और अब?” आरव ने कांपती आवाज़ में पूछा।

     

    “अब मेरी शादी अगले महीने है,” उसने कहा।

     

    बारिश और तेज़ हो गई। जैसे आसमान भी इस कहानी का दर्द महसूस कर रहा हो।

     

    आरव ने कुछ देर तक कुछ नहीं कहा। फिर धीरे से बोला—“क्या तुम खुश हो?”

     

    नैना चुप रही।

     

    “सच-सच बताओ,” आरव ने ज़ोर दिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले। “नहीं।”

     

    “तो फिर ये शादी क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    “क्योंकि मैंने कभी हिम्मत नहीं की,” उसने कहा। “मैंने कभी अपने दिल की नहीं सुनी।”

     

    आरव ने उसका हाथ कसकर पकड़ा। “तो अब सुनो। अबके बरस, हम इस कहानी को अधूरा नहीं छोड़ेंगे।”

     

    “लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं है,” नैना ने कहा।

     

    “कुछ भी आसान नहीं होता,” आरव मुस्कुराया, “लेकिन प्यार अगर सच्चा हो, तो रास्ते खुद बन जाते हैं।”

     

    उस रात, दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं। डर, उम्मीदें, सपने—सब कुछ सामने रख दिया। और पहली बार, उन्होंने अपने प्यार को नाम दिया।

     

    अगले कुछ दिन कठिन थे। नैना ने अपने परिवार से बात की। आँसू, गुस्सा, सवाल—सब कुछ हुआ। लेकिन इस बार, वह पीछे नहीं हटी।

     

    “मैं अपनी जिंदगी खुद चुनना चाहती हूँ,” उसने दृढ़ता से कहा।

     

    आरव भी उसके साथ खड़ा रहा। हर मुश्किल में, हर डर में।

     

    और फिर, एक दिन… सब बदल गया।

     

    नैना के परिवार ने आखिरकार उसकी बात मान ली। शायद उन्होंने उसकी आँखों में सच्चाई देख ली थी, या शायद उन्होंने समझ लिया था कि प्यार को रोका नहीं जा सकता।

     

    सावन की आखिरी बारिश थी। अस्सी घाट फिर भीग रहा था। लेकिन इस बार, कहानी अलग थी।

     

    नैना लाल साड़ी में थी, और आरव उसके सामने खड़ा था—हाथों में वरमाला।

     

    “तो अबके बरस…?” आरव ने मुस्कुराते हुए पूछा।

     

    “अबके बरस,” नैना ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “हमेशा के लिए।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई। बारिश उनके चारों ओर नाच रही थी, जैसे आशीर्वाद दे रही हो।

     

    “तुम्हें पता है,” आरव ने धीरे से कहा, “मुझे हमेशा लगता था कि बारिश हमें मिलाने के लिए आती है।”

     

    “और अब?” नैना ने पूछा।

     

    “अब लगता है,” उसने उसका हाथ थामते हुए कहा, “बारिश हमारी कहानी का हिस्सा बन गई है।”

     

    नैना मुस्कुरा दी। “शायद इसलिए, क्योंकि हमने इस बार उसे अधूरा नहीं छोड़ा।”

     

    गंगा के किनारे, बारिश की बूंदों के बीच, दो दिल आखिरकार एक हो गए।

     

    और उस दिन के बाद, हर सावन सिर्फ एक मौसम नहीं रहा—वह उनकी प्रेम कहानी का उत्सव बन गया।

     

    अबके बरस, उन्होंने सिर्फ एक-दूसरे को नहीं पाया… बल्कि अपनी पूरी जिंदगी पा ली।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇

    चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं

    शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • “👉 संगिनी “💖

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    बरसात की हल्की-हल्की फुहारें शहर की सड़कों को जैसे कोई पुराना गीत सुना रही थीं। हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू घुली हुई थी, और उसी खुशबू के बीच खड़ा था आरव—अपनी छतरी को थामे, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।

    वो इंतज़ार किसी साधारण व्यक्ति का नहीं था, बल्कि उसकी “संगिनी” का था—मीरा।

    मीरा… एक नाम, जो उसके दिल में धड़कनों की तरह बस गया था।

    आरव और मीरा की मुलाकात कोई फिल्मी अंदाज़ में नहीं हुई थी। न कोई टकराना, न कोई किताब गिरना। उनकी कहानी शुरू हुई थी एक साधारण-सी लाइब्रेरी में, जहाँ दोनों किताबों के बीच अपने-अपने ख्वाब ढूंढने आते थे।

    पहली बार जब आरव ने मीरा को देखा था, वो खिड़की के पास बैठी थी। बारिश की बूंदें कांच पर गिर रही थीं, और वो अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वो इस दुनिया में होते हुए भी कहीं और हो।

    आरव ने कई बार चाहा कि वो उससे बात करे, लेकिन हर बार कुछ न कुछ उसे रोक देता। शायद झिझक, या शायद डर कि कहीं वो उस खूबसूरत खामोशी को तोड़ न दे।

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

    एक दिन, मीरा की डायरी अचानक उसके हाथ से गिर गई। आरव पास ही खड़ा था, उसने तुरंत डायरी उठाकर उसे दी।

    “थैंक यू,” मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा।

    उस मुस्कान में कुछ ऐसा था, जिसने आरव के दिल को छू लिया।

    “तुम… रोज़ यहां आती हो?” आरव ने हिम्मत जुटाकर पूछा।

    मीरा ने हल्का-सा सिर हिलाया, “हाँ, ये जगह मुझे सुकून देती है।”

    उस दिन से शुरू हुई उनकी बातचीत धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई।

    दोनों घंटों साथ बैठते, किताबों पर चर्चा करते, और कभी-कभी बस चुपचाप खिड़की से बाहर गिरती बारिश को देखते रहते।

    मीरा को कविताएं लिखना पसंद था, और आरव को उन कविताओं को पढ़ना।

    “तुम्हारी कविताओं में इतनी गहराई क्यों होती है?” एक दिन आरव ने पूछा।

    मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “क्योंकि हर शब्द में एक अधूरी कहानी छुपी होती है।”

    आरव को ये जवाब हमेशा सोच में डाल देता।

    धीरे-धीरे, उसे एहसास होने लगा कि मीरा सिर्फ उसकी दोस्त नहीं रही। वो उसकी आदत बन गई थी। उसकी हर सुबह, हर शाम, हर ख्वाब में बस मीरा ही थी।

    लेकिन मीरा… वो हमेशा थोड़ी रहस्यमयी रहती।

    कभी बहुत करीब, तो कभी अचानक दूर।

    एक दिन, जब बारिश हो रही थी, दोनों लाइब्रेरी से बाहर निकले।

    “चलो, आज बिना छतरी के भीगते हैं,” मीरा ने अचानक कहा।

    आरव हैरान था, “तुम्हें बारिश पसंद है?”

    “बहुत… क्योंकि ये हर दर्द को धो देती है,” मीरा ने आसमान की ओर देखते हुए कहा।

    दोनों भीगते हुए सड़क पर चलते रहे। उस दिन, पहली बार आरव ने मीरा का हाथ पकड़ा।

    मीरा ने उसे नहीं रोका।

    उस पल में, जैसे समय ठहर गया था।

    लेकिन हर खूबसूरत कहानी में एक मोड़ जरूर आता है।

    कुछ दिनों बाद, मीरा अचानक लाइब्रेरी आना बंद कर दी।

    आरव हर दिन उसका इंतज़ार करता, लेकिन वो नहीं आई।

    उसने फोन किया, मैसेज किए—लेकिन कोई जवाब नहीं।

    उसकी दुनिया जैसे थम गई थी।

    एक दिन, आखिरकार उसे मीरा का एक मैसेज मिला—

    “मुझसे मिलने मत आना… ये हमारी आखिरी बात है।”

    आरव के हाथ कांप गए।

    “क्यों?” उसने तुरंत जवाब दिया।

    लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

    दिन बीतते गए, और आरव अंदर से टूटता गया।

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि मीरा ने ऐसा क्यों किया।

    आखिरकार, उसने तय किया कि वो सच्चाई जानकर ही रहेगा।

    वो मीरा के घर पहुंचा।

    दरवाजा उसकी माँ ने खोला।

    “तुम आरव हो?” उन्होंने पूछा।

    “जी…”

    उनकी आंखों में आंसू थे।

    “मीरा… अब इस शहर में नहीं है,” उन्होंने धीमे से कहा।

    आरव का दिल जैसे रुक गया।

    “क्या मतलब?”

    उन्होंने उसे अंदर बुलाया और एक डायरी उसके हाथ में दी।

    “ये उसने तुम्हारे लिए छोड़ी है।”

    आरव ने कांपते हाथों से डायरी खोली।

    उसमें लिखा था—

    “आरव,

    अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी हूं।

    मैंने तुम्हें सच नहीं बताया… क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी।

    मुझे एक गंभीर बीमारी है, और मेरे पास ज्यादा समय नहीं है।

    मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझे इस हालत में देखो।

    तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ खुशियां होनी चाहिए, दर्द नहीं।

    तुम मेरी सबसे खूबसूरत याद हो… और हमेशा रहोगे।

    तुम्हारी संगिनी,

    मीरा।”

    हर शब्द के साथ आरव की आंखों से आंसू गिरते गए।

    अब उसे समझ आया कि मीरा क्यों दूर हो गई थी।

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

    कुछ महीनों बाद…

    वही लाइब्रेरी, वही खिड़की, वही बारिश।

    आरव अकेला बैठा था, हाथ में मीरा की डायरी लिए।

    वो हर दिन वहां आता, जैसे मीरा अब भी वहीं बैठी हो।

    उसने धीरे से डायरी खोली और एक नई कविता लिखी—

    “तुम गई नहीं हो,

    तुम यहीं कहीं हो…

    हर बारिश की बूंद में,

    हर खामोशी के सुकून में।

    तुम मेरी संगिनी थी,

    हो… और हमेशा रहोगी।”

    उसने खिड़की से बाहर देखा।

    बारिश अब भी हो रही थी।

    और उस बारिश में, उसे ऐसा लगा जैसे मीरा मुस्कुरा रही हो।

    क्योंकि कुछ प्यार कहानियां खत्म नहीं होतीं…

    वो बस यादों में बदल जाती हैं—हमेशा के लिए।

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