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😱राजगीर की आखिरी हवेली 😱 भाग 3 — आखिरी रात😱

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

कमरे में अंधेरा गहराता जा रहा था।

 

राघव, अमन और छोटू दीवार से सटे खड़े थे।

 

सामने उसके पिता के रूप में खड़ा वह साया धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहा था।

 

उसकी आवाज़ बिल्कुल सुरेश जैसी थी।

 

“राघव… मेरे पास आओ।”

 

राघव के कदम पीछे हट गए।

 

“तुम मेरे पिता नहीं हो।”

 

साया मुस्कुराया।

 

“तुम्हें कैसे पता?”

 

राघव ने कहा—

 

“क्योंकि मेरे पिता मुझे कभी इस तरह नहीं बुलाते थे।”

 

साया कुछ पल चुप रहा।

 

फिर उसका चेहरा विकृत होने लगा।

 

अनामिका ने कहा—

 

“इसे मत देखना।”

 

राघव ने पूछा—

 

“इसे कैसे खत्म करें?”

 

अनामिका बोली—

 

“हवेली के डर को खत्म करना होगा।”

 

“कैसे?”

 

“जिस याद से यह पैदा हुआ है, उसे स्वीकार करके।”

 

राघव को डायरी याद आई।

 

उसने अपने पिता की आखिरी डायरी का फटा हुआ हिस्सा ढूँढना शुरू किया।

 

कुछ देर बाद उसे मेज के नीचे एक पुराना कागज़ मिला।

 

उस पर लिखा था—

 

“मैंने उस बच्ची को बचाने की कोशिश नहीं की। मैं डर गया था। लेकिन मैंने उसके डर को हमेशा के लिए अपने बेटे से दूर रखने की कोशिश की।”

 

राघव की आँखें भर आईं।

 

“मेरे पिता…”

 

अनामिका ने कहा—

 

“तुम्हारे पिता बुरे नहीं थे। लेकिन उन्होंने गलती की थी।”

 

“उन्होंने तुम्हें क्यों छोड़ा?”

 

“क्योंकि उस रात उन्हें चुनना था। मुझे बचाना या खुद बचना।”

 

राघव ने पूछा—

 

“और उन्होंने खुद को चुना?”

 

अनामिका ने सिर झुका लिया।

 

“हाँ।”

 

कमरे में अचानक एक जोरदार चीख गूँजी।

 

साया दीवार से टकराया।

 

“झूठ!”

 

उसकी आवाज़ पूरे कमरे में फैल गई।

 

“उसने मुझे नहीं छोड़ा था। मैंने उसे छोड़ा था।”

 

राघव चौंका।

 

“क्या?”

 

अनामिका ने उसकी ओर देखा।

 

“तुम्हारे पिता ने आखिरी समय पर मुझे बाहर निकाल दिया था।”

 

राघव ने पूछा—

 

“फिर?”

 

“लेकिन जब वह मुझे लेकर भाग रहे थे, हवेली के मालिक ने उन्हें पकड़ लिया।”

 

“फिर क्या हुआ?”

 

“उसने तुम्हारे पिता को धमकी दी कि अगर वह मुझे बाहर ले गए तो वह तुम्हारे परिवार को नुकसान पहुँचाएगा।”

 

राघव की साँस रुक गई।

 

“मेरे परिवार को?”

 

अनामिका ने कहा—

 

“तुम तब छोटे बच्चे थे।”

 

“इसलिए मेरे पिता ने…”

 

“हाँ। उन्होंने मुझे वापस कमरे में बंद कर दिया।”

 

राघव की आँखों से आँसू निकल आए।

 

“और तुम मर गईं।”

 

अनामिका ने सिर हिलाया।

 

“लेकिन मरते समय मैंने उसे माफ कर दिया था।”

 

साया अचानक चीखने लगा।

 

“नहीं!”

 

अनामिका ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हारी शक्ति मेरी नफरत से थी।”

 

“और अब मेरे अंदर नफरत नहीं है।”

 

साया पीछे हटने लगा।

 

राघव को अचानक समझ आया।

 

यह साया अनामिका की आत्मा नहीं था।

 

यह उसके डर, गुस्से और अधूरे दर्द से पैदा हुई एक अलग शक्ति थी।

 

राघव ने कहा—

 

“तो हमें इसे नष्ट नहीं करना।”

 

अमन ने पूछा—

 

“फिर?”

 

“इसे सच बताना होगा।”

 

राघव साए के सामने खड़ा हो गया।

 

“तुम अनामिका नहीं हो।”

 

साया चीखा—

 

“मैं वही हूँ!”

 

“नहीं।”

 

राघव ने कहा—

 

“तुम उसके डर हो।”

 

साया पीछे हट गया।

 

“तुम उसके दर्द हो।”

 

साया का शरीर काँपने लगा।

 

“तुम उसकी मौत नहीं हो।”

 

राघव की आवाज़ और मजबूत हो गई।

 

“और अब कोई तुमसे नहीं डरेगा।”

 

साया ने जोर से चीख मारी।

 

पूरी हवेली काँपने लगी।

 

छत से पत्थर गिरने लगे।

 

दरवाज़े अपने आप खुलने लगे।

 

दीवारों पर लगी सारी तस्वीरें नीचे गिर गईं।

 

छोटू रोने लगा।

 

अमन ने उसे पकड़ लिया।

 

तभी कमरे के बीच अनामिका दिखाई दी।

 

उसने राघव की ओर हाथ बढ़ाया।

 

“मुझे बाहर ले चलो।”

 

राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

 

दोनों कमरे से बाहर निकले।

 

अमन और छोटू उनके पीछे थे।

 

साया लगातार उनका पीछा कर रहा था।

 

वे सीढ़ियों से नीचे भागे।

 

मुख्य दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

 

लेकिन दरवाज़े के सामने वही काला साया खड़ा था।

 

उसने कहा—

 

“तुम बाहर नहीं जा सकते।”

 

राघव रुका।

 

अनामिका उसके पीछे खड़ी थी।

 

उसने कहा—

 

“राघव…”

 

“तुम्हें मेरी एक मदद करनी होगी।”

 

“क्या?”

 

“मेरी आखिरी चीज़ बाहर ले जाओ।”

 

उसने अपनी गर्दन से लॉकेट उतारकर राघव को दे दिया।

 

“इसे उस जगह ले जाना जहाँ मेरे पिता ने मुझे पहली बार बंद किया था।”

 

राघव ने पूछा—

 

“वहीं क्यों?”

 

“क्योंकि मेरी कहानी वहीं खत्म हुई थी।”

 

“और अब?”

 

“वहीं से मेरी कहानी आजाद होगी।”

 

राघव ने लॉकेट कसकर पकड़ लिया।

 

वह दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

 

साया उसके पीछे आया।

 

अचानक अनामिका साए के सामने खड़ी हो गई।

 

“इसे जाने दो।”

 

साया गरजा—

 

“तुम मुझे रोक नहीं सकती!”

 

अनामिका मुस्कुराई।

 

“मैं अकेली नहीं हूँ।”

 

तभी हवेली की दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरों से एक-एक करके रोशनी निकलने लगी।

 

उन तस्वीरों में दिखाई देने वाले सभी लोग धीरे-धीरे अनामिका के पीछे खड़े हो गए।

 

जैसे वे वर्षों से इसी क्षण का इंतजार कर रहे हों।

 

साया पीछे हट गया।

 

राघव, अमन और छोटू हवेली से बाहर निकल गए।

 

जैसे ही राघव ने लॉकेट जमीन पर रखा…

 

पूरी हवेली के अंदर से एक जोरदार चीख सुनाई दी।

 

फिर…

 

सन्नाटा।

 

कई सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई।

 

हवेली की खिड़कियों में जलती हुई रोशनी एक-एक करके बुझ गई।

 

और फिर मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

 

राघव ने हवेली की ओर देखा।

 

पहली मंजिल की खिड़की में अनामिका खड़ी थी।

 

उसने मुस्कुराकर हाथ हिलाया।

 

फिर वह धीरे-धीरे गायब हो गई।

 

सुबह होने तक हवेली बिल्कुल शांत हो चुकी थी।

 

गाँव के लोग वहाँ पहुँचे।

 

रामजी ने हवेली को देखा और कई वर्षों बाद पहली बार उसके अंदर कदम रखा।

 

“अब कुछ नहीं है,” उन्होंने कहा।

 

राघव ने पूछा—

 

“आपको कैसे पता?”

 

रामजी मुस्कुराए।

 

“क्योंकि इतने सालों में पहली बार मुझे यहाँ डर नहीं लग रहा।”

 

कुछ दिनों बाद राघव पटना लौट गया।

 

उसने इस घटना पर एक किताब लिखने का फैसला किया।

 

लेकिन उसने कहानी का अंत बदल दिया।

 

उसने लिखा—

 

“हर भूत बदला लेने नहीं लौटता। कुछ आत्माएँ सिर्फ इसलिए लौटती हैं ताकि उनकी अधूरी कहानी पूरी हो सके।”

 

कई महीनों बाद राघव को गाँव से एक पत्र मिला।

 

पत्र में सिर्फ एक फोटो थी।

 

वह सिंह हवेली की थी।

 

लेकिन फोटो देखकर राघव के हाथ काँपने लगे।

 

फोटो में हवेली बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

 

सारी खिड़कियाँ बंद थीं।

 

लेकिन पहली मंजिल की खिड़की पर…

 

एक छोटी लड़की खड़ी थी।

 

उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

 

फोटो के पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“अब मुझे डर नहीं लगता।”

 

राघव समझ गया।

 

अनामिका आखिरकार आज़ाद हो चुकी थी।

 

और सिंह हवेली का वह डर…

 

जिसने वर्षों तक पूरे गाँव को अपने कब्जे में रखा था…

 

हमेशा के लिए खत्म हो गया था।

 

लेकिन उस दिन के बाद गाँव वालों ने एक बात जरूर देखी।

 

हवेली के बंद कमरे नंबर 13 के बाहर हर अमावस्या की रात…

 

एक छोटी-सी लाल गुड़िया रखी मिलती थी।

 

कोई नहीं जानता था कि उसे वहाँ कौन रखता था।

 

लेकिन उसके साथ हमेशा एक छोटा-सा कागज़ होता था।

 

उस पर लिखा रहता—

 

“जिससे डरते हो, उसका सामना करो। क्योंकि कई बार अंधेरे में छिपा राक्षस नहीं… सिर्फ एक अधूरी कहानी होती है।”

 

और इस तरह…

 

राजगीर की उस आखिरी हवेली का रहस्य हमेशा के लिए खत्म हो गया।

 

समाप्त।

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