राघव कुछ सेकंड तक हवेली के बंद दरवाज़े को देखता रहा।
अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“राघव, हमें पुलिस के पास जाना चाहिए।”
राघव ने सिर हिलाया।
“छोटू अंदर है।”
“लेकिन हम अंदर गए तो हम भी फँस सकते हैं।”
राघव ने कहा—
“वह बच्चा है। मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”
दोनों फिर हवेली के अंदर चले गए।
इस बार अंदर पहले से ज्यादा अंधेरा था।
मुख्य दरवाज़ा उनके पीछे अपने आप बंद हो गया।
अमन ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
“छोटू!”
कोई जवाब नहीं।
फिर ऊपर से आवाज़ आई—
“भैया…”
दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
पहली मंजिल पर पहुँचकर राघव रुक गया।
गलियारे के दोनों तरफ कई कमरे थे।
लेकिन सभी दरवाज़े खुले थे।
सिर्फ कमरा नंबर 13 बंद था।
राघव ने पूछा—
“छोटू कहाँ गया होगा?”
अमन ने कहा—
“शायद उसी कमरे में।”
दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी आ रही थी।
राघव ने धीरे से दरवाज़ा खोला।
कमरा खाली था।
लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे पैरों के निशान बने थे।
वे निशान कमरे की पिछली दीवार तक जा रहे थे।
राघव ने दीवार पर हाथ रखा।
उसे अंदर से आवाज़ सुनाई दी।
ठक… ठक… ठक…
अमन ने पूछा—
“दीवार के पीछे कोई है?”
राघव ने जोर से दीवार थपथपाई।
अंदर से जवाब आया।
ठक… ठक…
फिर छोटू की आवाज़—
“भैया…”
राघव चिल्लाया—
“छोटू! डरो मत। हम तुम्हें निकालेंगे।”
अंदर से छोटू रोते हुए बोला—
“जल्दी करो…”
“यहाँ कोई और भी है।”
राघव और अमन ने दीवार के पास की पुरानी अलमारी हटाई।
उसके पीछे लकड़ी का एक छोटा दरवाज़ा था।
दरवाज़ा खोलते ही संकरी सुरंग दिखाई दी।
अंदर से सड़ी हुई मिट्टी की गंध आ रही थी।
अमन ने कहा—
“ये हवेली के नीचे जाती है।”
दोनों सुरंग में उतर गए।
कुछ दूर जाने के बाद उन्हें छोटू दिखाई दिया।
वह एक कोने में बैठा काँप रहा था।
राघव उसके पास पहुँचा।
“छोटू!”
छोटू ने उसे पकड़ लिया।
“भैया, मुझे यहाँ एक लड़की लाई थी।”
“कौन लड़की?”
“वही… काली आँखों वाली।”
राघव ने पूछा—
“उसने तुम्हारे साथ क्या किया?”
छोटू ने सामने की तरफ इशारा किया।
“वो वहाँ गई है।”
सुरंग के आखिरी हिस्से में एक बड़ा कमरा था।
कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।
कुछ बहुत पुरानी।
कुछ नई।
राघव ने एक तस्वीर उठाई।
उसमें गाँव के लोग थे।
एक तस्वीर में रामजी चायवाला भी था।
दूसरी में राघव के पिता।
राघव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“मेरे पिता यहाँ क्यों हैं?”
अमन ने दूसरी तस्वीर उठाई।
“देख…”
तस्वीर में राघव के पिता के साथ एक छोटी लड़की खड़ी थी।
वही लड़की।
काली आँखों वाली।
पीछे तारीख लिखी थी—
1999।
राघव को याद आया कि उसके पिता कई वर्षों तक इसी इलाके में काम करते थे।
लेकिन उन्होंने कभी इस हवेली का जिक्र नहीं किया था।
कमरे के बीच में एक पुरानी मेज थी।
उस पर एक डायरी रखी थी।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“यह कहानी उस रात से शुरू हुई जब मैंने अपनी बेटी को खो दिया।”
राघव ने डायरी पढ़ना शुरू किया।
डायरी उसके पिता की थी।
उसमें लिखा था—
“मेरा नाम सुरेश है। वर्ष 1999 में मुझे इस हवेली में एक रात रुकना पड़ा। उस रात मैंने एक छोटी लड़की को देखा। उसका नाम था अनामिका।”
राघव का हाथ काँपने लगा।
आगे लिखा था—
“अनामिका इस हवेली में रहने वाले परिवार की बेटी थी। लेकिन उसके माता-पिता कहते थे कि वह पैदा होने के बाद ही मर गई थी।”
अमन ने पूछा—
“तो यह लड़की कौन थी?”
राघव पढ़ता गया।
“मैंने उसे रात में गलियारे में खेलते देखा। उसने मुझसे कहा कि उसके माता-पिता ने उसे कमरे नंबर 13 में बंद कर दिया है।”
अगला पन्ना फटा हुआ था।
फिर लिखा था—
“मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर एक बच्ची थी। लेकिन जैसे ही मैंने उसका हाथ पकड़ा, उसने मेरी तरफ देखकर कहा—’आप मेरे पापा नहीं हैं।’”
राघव ने पढ़ना बंद कर दिया।
“फिर?”
अगले पन्ने पर लिखा था—
“मैंने पीछे देखा। कमरे में एक आदमी खड़ा था। उसका चेहरा बिल्कुल मेरे जैसा था।”
अमन ने कहा—
“ये तो…”
राघव ने अगला पन्ना पलटा।
“उसने कहा—’जिस दिन तुमने उसे देखा, उसी दिन से वह तुम्हारे पीछे आएगी।’”
इसके बाद कई पन्नों पर सिर्फ एक ही वाक्य लिखा था—
“उसे घर मत ले जाना।”
राघव ने डायरी बंद कर दी।
तभी कमरे की लाइट अपने आप जल गई।
सामने अनामिका खड़ी थी।
उसने कहा—
“तुम्हारे पिता ने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”
राघव ने पूछा—
“फिर उन्होंने मुझे क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए सब कुछ भूलने का फैसला किया।”
“तुम कौन हो?”
लड़की ने कहा—
“मैं इस हवेली की बेटी नहीं हूँ।”
“फिर?”
उसने धीरे से कहा—
“मैं वह हूँ जिसे इस हवेली ने बनाया है।”
कमरे की दीवारें हिलने लगीं।
अनामिका बोली—
“बहुत साल पहले यहाँ एक आदमी ने अपने परिवार को धोखा दिया। उसने अपनी संपत्ति बचाने के लिए अपनी ही बेटी को कमरे में बंद कर दिया।”
“वह लड़की मर गई?”
“हाँ।”
“और फिर?”
“उसका डर हवेली में रह गया।”
राघव ने पूछा—
“लेकिन तुम?”
अनामिका ने कहा—
“मैं उसी डर का चेहरा हूँ।”
अचानक उसके चेहरे की त्वचा काली पड़ने लगी।
उसकी आँखें और बड़ी हो गईं।
वह चीखने लगी—
“हर वह व्यक्ति जो इस कमरे का दरवाज़ा खोलता है… उसका डर मेरा हिस्सा बन जाता है!”
अमन ने छोटू को पीछे किया।
“राघव, भाग!”
लेकिन राघव वहीं खड़ा रहा।
“तुम मुझे यहाँ क्यों लाई?”
अनामिका शांत हो गई।
उसने कहा—
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे खत्म करने की कोशिश की थी।”
राघव चौंक गया।
“उन्होंने क्या किया?”
“उन्होंने कमरे नंबर 13 की दीवार में मेरी आखिरी याद बंद कर दी।”
“कौन सी याद?”
अनामिका ने सामने की दीवार की ओर देखा।
वहाँ एक छोटी लकड़ी की पेटी दिखाई दी।
राघव ने पेटी खोली।
अंदर एक पुराना लॉकेट था।
लॉकेट खोलते ही एक तस्वीर दिखाई दी।
तस्वीर में एक आदमी था।
राघव का पिता।
और उसके साथ…
अनामिका।
पीछे लिखा था—
“सच जानने के बाद भी मैंने उसे बचाया नहीं।”
राघव की आँखों में आँसू आ गए।
“मेरे पिता ने उसे मरने दिया?”
अनामिका ने कहा—
“हाँ।”
अचानक सुरंग के बाहर से कदमों की आवाज़ आई।
ठक… ठक… ठक…
कोई उनकी तरफ आ रहा था।
अमन ने पूछा—
“कौन है?”
जवाब आया—
“मैं सुरेश हूँ।”
राघव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
उसके पिता का नाम सुरेश था।
लेकिन उसके पिता की मृत्यु पाँच साल पहले हो चुकी थी।
कदमों की आवाज़ और करीब आई।
अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।
चेहरा…
राघव के पिता जैसा।
वह मुस्कुराया।
“तुमने मुझे बुलाया था, बेटा?”
राघव पीछे हट गया।
अनामिका चीख पड़ी—
“ये तुम्हारे पिता नहीं हैं!”
आदमी का चेहरा अचानक बदलने लगा।
उसकी आँखें काली हो गईं।
मुँह असामान्य रूप से फैल गया।
और उसने कहा—
“लेकिन अब तुम्हें मेरे साथ रहना होगा।”
सुरंग का रास्ता अचानक बंद हो गया।
कमरे की दीवारों पर लाल अक्षरों में एक वाक्य उभर आया—
“एक जाएगा, बाकी तीन बचेंगे।”
राघव ने छोटू, अमन और अनामिका की तरफ देखा।
उसे समझ आ गया था कि हवेली अब एक बलि चाहती थी।
लेकिन वह यह नहीं जानता था कि इस हवेली का असली रहस्य…
उसके अपने परिवार से जुड़ा हुआ था।
और उस रात…
उसे अपने पिता की सबसे बड़ी गलती का सामना करना था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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