सूरज की पहली किरण आसमान पर दिखाई दे चुकी थी।
लेकिन गोपाल का कोई पता नहीं था।
आदित्य खाई के किनारे खड़ा था।
“गोपाल!”
उसकी आवाज़ पहाड़ियों से टकराकर वापस आई।
कोई जवाब नहीं।
मीरा रोते हुए बोली—
“वह गिर गया होगा।”
कबीर ने नीचे देखने की कोशिश की।
लेकिन खाई इतनी गहरी थी कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
तभी पीछे से एक धीमी हँसी सुनाई दी।
तीनों ने पलटकर देखा।
काली परछाईं अब पहले से छोटी हो चुकी थी।
उसकी आवाज़ कमजोर थी।
“सूरज…”
“मुझे रोक नहीं सकता।”
आदित्य समझ गया कि पायल अभी तक नष्ट नहीं हुई थी।
“गोपाल पायल लेकर कहाँ गया?”
परछाईं मुस्कुराई।
“जहाँ से सब शुरू हुआ था।”
“कहाँ?”
“किले के नीचे।”
अचानक जमीन काँपी।
किले की दीवार का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा।
उसके पीछे एक सीढ़ी दिखाई दी।
सीढ़ियाँ जमीन के अंदर जा रही थीं।
आदित्य ने कहा—
“हमें नीचे जाना होगा।”
मीरा ने डरते हुए पूछा—
“लेकिन सूरज निकल चुका है।”
आदित्य ने कहा—
“तभी तो।”
तीनों सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।
जितना नीचे जाते, हवा उतनी ठंडी होती जाती।
कुछ देर बाद वे एक विशाल भूमिगत कमरे में पहुँचे।
कमरे के बीच में एक पत्थर का चबूतरा था।
उस पर गोपाल बैठा था।
उसके हाथ में पायल थी।
लेकिन उसकी आँखें बंद थीं।
आदित्य दौड़कर उसके पास गया।
“गोपाल!”
गोपाल ने आँखें खोलीं।
“तुम यहाँ क्यों आए?”
आदित्य ने कहा—
“तुम्हें लेने।”
गोपाल ने सिर हिलाया।
“मैं नहीं जा सकता।”
“क्यों?”
गोपाल ने अपनी हथेली दिखाई।
उसकी नसें काली पड़ चुकी थीं।
“पायल ने मुझे पकड़ लिया है।”
मीरा ने पायल की ओर देखा।
उसमें से काला धुआँ निकल रहा था।
गोपाल ने कहा—
“रूहानी ने हमें आधा सच बताया था।”
“क्या मतलब?”
“पायल तोड़ने से श्राप खत्म नहीं होगा।”
आदित्य चौंका।
“फिर?”
“पायल को उस जगह रखना होगा जहाँ रूहानी ने पहली बार तांत्रिक का सामना किया था।”
कबीर ने पूछा—
“वह जगह कहाँ है?”
गोपाल ने सामने की दीवार की ओर इशारा किया।
वहाँ एक पत्थर का दरवाज़ा था।
दरवाज़े पर वही निशान बना था।
आदित्य उसके पास गया।
जैसे ही उसने हाथ लगाया, दरवाज़ा खुल गया।
अंदर एक छोटा कमरा था।
कमरे में सिर्फ एक पुरानी मूर्ति थी।
उसके सामने राख से बना गोल घेरा था।
और उस घेरे के बीच एक पत्थर पर लिखा था—
“डर को खत्म करने के लिए उसे पहचानना पड़ता है।”
अचानक कमरे में रूहानी दिखाई दी।
इस बार उसका चेहरा शांत था।
उसने कहा—
“मैंने तांत्रिक को नहीं मारा था।”
आदित्य ने कहा—
“लेकिन हमने देखा था।”
रूहानी ने सिर हिलाया।
“वह दृश्य झूठ था।”
तीनों चौंक गए।
“झूठ?”
रूहानी बोली—
“तांत्रिक ने अपनी मौत का भ्रम पैदा किया था। उसने मेरे डर का इस्तेमाल किया। उसने मुझे विश्वास दिलाया कि मैंने उसे मार दिया है।”
“फिर असली घटना क्या थी?”
रूहानी ने कहा—
“उस रात उसने मुझे पायल पहनाई। वह पायल कोई साधारण चीज़ नहीं थी। उसमें उसकी आत्मा का एक हिस्सा बंद था।”
“और तुम?”
“मैंने पायल उतारने की कोशिश की। लेकिन उसने मुझे रोक लिया।”
रूहानी की आँखों में आँसू आ गए।
“उसने कहा था कि जब तक कोई उसके डर को स्वीकार नहीं करेगा, वह इस किले में रहेगा।”
आदित्य ने पूछा—
“तो इतने वर्षों से जो लोग डरते रहे…”
“उनका डर उसे शक्ति देता रहा।”
कबीर ने कहा—
“लेकिन अगर हम उससे नहीं डरें तो?”
रूहानी मुस्कुराई।
“तभी उसका अंत होगा।”
अचानक पूरा कमरा अंधेरे से भर गया।
काली परछाईं फिर सामने आ गई।
इस बार वह बहुत विशाल थी।
उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी—
“तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते!”
आदित्य पीछे हट गया।
लेकिन फिर उसे दीवार पर लिखा वाक्य याद आया।
डर को खत्म करने के लिए उसे पहचानना पड़ता है।
उसने परछाईं की ओर देखा।
“तू तांत्रिक नहीं है।”
परछाईं रुक गई।
“तू सिर्फ हमारा डर है।”
वह चीखी।
“मैं इस किले का मालिक हूँ!”
आदित्य ने कहा—
“नहीं। तू तभी शक्तिशाली है जब हम तुझसे डरते हैं।”
मीरा आगे बढ़ी।
“और अब हम नहीं डरेंगे।”
कबीर भी उनके साथ खड़ा हो गया।
गोपाल ने पायल उठाई।
काली परछाईं अचानक उसकी तरफ झपटी।
गोपाल ने आँखें बंद कर लीं।
“आज नहीं।”
उसने पायल पत्थर के घेरे में फेंक दी।
जैसे ही पायल जमीन पर गिरी…
एक जोरदार विस्फोट जैसी आवाज़ हुई।
काले धुएँ ने पूरे कमरे को भर दिया।
परछाईं चीखने लगी।
दीवारें काँपने लगीं।
किले के ऊपर पत्थर गिरने लगे।
रूहानी ने चिल्लाकर कहा—
“भागो!”
आदित्य ने गोपाल को उठाया।
चारों सुरंग की ओर भागे।
पीछे से परछाईं की अंतिम चीख सुनाई दी—
“तुम मुझे रोक नहीं सकते!”
रूहानी की आवाज़ आई—
“आज से कोई तुम्हें याद भी नहीं करेगा।”
एक तेज़ सफेद रोशनी कमरे में फैल गई।
फिर…
सब शांत हो गया।
चारों किसी तरह सीढ़ियों से ऊपर पहुँचे।
बाहर सुबह पूरी तरह हो चुकी थी।
भानगढ़ का किला पहली बार उन्हें डरावना नहीं लग रहा था।
हवा शांत थी।
पक्षियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
गोपाल जमीन पर बैठ गया।
उसके हाथ की काली नसें गायब हो चुकी थीं।
उसने हैरानी से अपनी हथेली देखी।
“मैं बच गया।”
मीरा की आँखों में आँसू थे।
“रूहानी?”
कोई जवाब नहीं आया।
आदित्य ने पीछे मुड़कर महल की ओर देखा।
ऊपर की टूटी हुई खिड़की में एक महिला खड़ी थी।
रूहानी।
उसने हल्की मुस्कान के साथ हाथ हिलाया।
फिर धीरे-धीरे धूप में विलीन हो गई।
कुछ दिनों बाद आदित्य ने अपनी डॉक्यूमेंट्री पूरी की।
लेकिन उसने उसमें रूहानी और उस रात की सारी घटना शामिल नहीं की।
लोग शायद विश्वास नहीं करते।
या शायद…
बहुत ज्यादा विश्वास कर लेते।
उसने सिर्फ इतना बताया कि भानगढ़ की असली कहानी डर की नहीं…
बल्कि उन लोगों की है जो डर को सच मान लेते हैं।
कबीर ने पूछा—
“तू सच में मानता है कि सब खत्म हो गया?”
आदित्य ने कहा—
“हाँ।”
गोपाल चुपचाप बैठा रहा।
फिर उसने अपनी जेब से कुछ निकाला।
वह वही चाँदी की पायल थी।
आदित्य का चेहरा बदल गया।
“ये तुम्हारे पास कैसे आई?”
गोपाल ने कहा—
“जब हम बाहर निकले थे, ये मेरी जेब में थी।”
मीरा ने डरते हुए पूछा—
“तो क्या श्राप अभी भी…”
गोपाल ने पायल को ध्यान से देखा।
पायल अब काली नहीं थी।
वह बिल्कुल साफ और चमकदार थी।
गोपाल ने कहा—
“नहीं।”
उसी समय पायल से एक बहुत हल्की आवाज़ आई।
छन…
चारों चुप हो गए।
फिर दूसरी आवाज़ आई।
छन…
और उसके बाद जैसे किसी महिला ने बहुत धीमे से कहा—
“धन्यवाद।”
आदित्य मुस्कुरा दिया।
उसने पायल को एक कपड़े में लपेटकर सुरक्षित रख दिया।
उस दिन के बाद भानगढ़ के किले में उन्हें फिर कभी कोई अजीब आवाज़ सुनाई नहीं दी।
न कोई पायल।
न किसी के रोने की आवाज़।
न किसी के कदम।
और न ही वह काली परछाईं।
रूहानी आखिरकार आज़ाद हो चुकी थी।
लेकिन जाते-जाते उसने एक बात सच साबित कर दी—
हर भूत बुरा नहीं होता।
कभी-कभी जिसे हम भूत समझते हैं…
वह खुद किसी पुराने डर का कैदी होता है।
और जब डर खत्म हो जाता है…
तो श्राप भी खत्म हो जाता है।
समाप्त।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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