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बेपरवाह लड़का

पढ़ने का समय : 7 मिनट

एक समय की बात है। एक छोटे से शहर में कबीर नाम का लड़का रहता था। पूरे मोहल्ले में उसकी पहचान एक नादान, बेपरवाह और मस्तमौला लड़के के रूप में थी। उसे न किसी से प्यार था, न किसी रिश्ते की परवाह। दोस्त कहते, “कबीर, कभी तो किसी लड़की को देखकर दिल धड़केगा।”

 

वह हंसकर जवाब देता, “मुझे इन सब चक्करों में नहीं पड़ना। जिंदगी बस खुलकर जीने के लिए मिली है।”

 

दिन बीतते रहे। एक दिन कबीर पार्क में अपने दोस्त का इंतजार कर रहा था। तभी उसकी नजर कुछ दूर बच्चों के साथ खेल रही एक लड़की पर पड़ी। वह बच्चों के साथ कभी झूला झूलती, कभी उन्हें पकड़म-पकड़ाई खिलाती, कभी उनकी छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हंस पड़ती।

 

उसकी हंसी में ऐसा अपनापन था कि कबीर पहली बार किसी को देखकर चुप हो गया।

 

वह खुद से बोला, “यार… कोई इतना मुस्कुरा कैसे सकता है?”

 

उस दिन वह बिना दोस्त से मिले ही घर लौट आया, लेकिन उसका मन बार-बार उसी मुस्कुराती लड़की के पास चला जाता।

 

अगले दिन वह फिर उसी समय पार्क पहुंच गया।

 

लड़की फिर वहीं थी।

 

कबीर अब रोज पार्क आने लगा। कभी दूर बैठकर उसे देखता, कभी बच्चों के साथ खेलते हुए उसकी हंसी सुनता। धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि जिसे वह प्यार जैसी बेकार चीज समझता था, वही उसके दिल में घर बना चुकी है।

 

एक दिन उसने हिम्मत जुटाई।

 

“हाय… मैं कबीर।”

 

लड़की मुस्कुराई।

 

“मैं अन्वी।”

 

“तुम रोज यहां आती हो?”

 

“हां… बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है।”

 

“और मुझे…”

 

वह रुक गया।

 

अन्वी हंस पड़ी।

 

“क्या?”

 

“मुझे तुम्हें देखना अच्छा लगता है।”

 

अन्वी हल्का सा शर्माकर दूसरी तरफ देखने लगी।

 

उस दिन दोनों देर तक बातें करते रहे।

 

अब उनकी मुलाकातें रोज होने लगीं। कबीर की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। जो लड़का पहले किसी की परवाह नहीं करता था, अब अन्वी के लिए फूल खरीदता, उसकी पसंद का खाना लाता और उसकी छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखता।

 

एक दिन कबीर ने कहा,

 

“अन्वी… मुझे तुमसे प्यार हो गया है।”

 

अन्वी कुछ पल चुप रही।

 

उसकी आंखों में आंसू आ गए।

 

“कबीर… ऐसा मत कहो।”

 

“क्यों?”

 

“बस… मत कहो।”

 

लेकिन कबीर कहां मानने वाला था।

 

उसने कई दिनों तक उसे मनाया, समझाया और आखिर एक शाम पार्क के उसी पुराने पेड़ के नीचे घुटनों पर बैठकर बोला,

 

“अगर तुम हां नहीं कहोगी तो मैं जिंदगी भर इंतजार करूंगा।”

 

अन्वी की आंखों से आंसू बह निकले।

 

उसने कांपते हुए हाथ से कबीर का हाथ पकड़ लिया।

 

“हां… मैं भी तुमसे प्यार करती हूं।”

 

कबीर खुशी से झूम उठा।

 

उसे लगा जैसे पूरी दुनिया उसकी हो गई।

 

दोनों ने साथ घूमना शुरू किया। बारिश में भीगना, सड़क किनारे चाय पीना, बच्चों के साथ खेलना, छोटी-छोटी लड़ाइयां करना… हर दिन एक नई याद बन जाता।

 

लेकिन कबीर ने एक बात नोटिस की।

 

अन्वी बहुत जल्दी थक जाती थी।

 

कभी अचानक पेट पकड़कर बैठ जाती।

 

कभी दर्द में भी मुस्कुराने की कोशिश करती।

 

एक दिन कबीर ने पूछा,

 

“सच बताओ… तुम ठीक तो हो?”

 

“हां… बस थोड़ी कमजोरी है।”

 

वह बात टाल गई।

 

कुछ दिन बाद अन्वी अचानक पार्क आना बंद हो गई।

 

कबीर परेशान हो गया।

 

उसने उसके घर का पता ढूंढ लिया और वहां पहुंच गया।

 

दरवाजा उसकी मां ने खोला।

 

कबीर ने पूछा,

 

“आंटी… अन्वी कहां है?”

 

उनकी आंखें भर आईं।

 

“बेटा… अस्पताल में है।”

 

कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

वह दौड़ता हुआ अस्पताल पहुंचा।

 

कमरे में अन्वी बिस्तर पर लेटी थी।

 

चेहरा पहले जैसा मुस्कुराता जरूर था, लेकिन बहुत कमजोर हो चुका था।

 

कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“क्या हुआ है तुम्हें?”

 

अन्वी चुप रही।

 

तभी डॉक्टर अंदर आए।

 

उन्होंने धीरे से कहा,

 

“उन्हें स्टमक कैंसर है… और बीमारी आखिरी स्टेज पर है।”

 

यह सुनते ही कबीर जैसे पत्थर का हो गया।

 

उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

 

वह डॉक्टर से बोला,

 

“कुछ तो होगा… इलाज… ऑपरेशन… कुछ भी।”

 

डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

 

“हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब समय बहुत कम है।”

 

कबीर वहीं फूट-फूटकर रो पड़ा।

 

उस रात उसने पहली बार भगवान से प्रार्थना की।

 

“मेरी सारी खुशियां ले लो… बस उसे ठीक कर दो।”

 

लेकिन जिंदगी हर दुआ नहीं सुनती।

 

अगले दिन कबीर अस्पताल पहुंचा तो देखा अन्वी खिड़की से बाहर बच्चों को खेलते हुए देख रही थी।

 

वह मुस्कुराई।

 

“देखो… कितने खुश हैं ना?”

 

कबीर ने आंसू छिपाते हुए कहा,

 

“तुम भी ठीक होकर इनके साथ खेलोगी।”

 

अन्वी ने धीरे से सिर हिला दिया।

 

“शायद नहीं।”

 

“ऐसा मत बोलो।”

 

“कबीर… सच से भागने से सच बदल नहीं जाता।”

 

कुछ देर बाद उसने अपने बैग से एक छोटी डायरी निकाली।

 

“ये तुम्हारे लिए है।”

 

कबीर ने खोला।

 

पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“जिस दिन तुमने पहली बार कहा था कि तुम्हें मुझे देखना अच्छा लगता है, उसी दिन मुझे तुमसे प्यार हो गया था। लेकिन मैं तुम्हें अपने दर्द में बांधना नहीं चाहती थी। इसलिए बार-बार तुम्हें दूर करती रही।”

 

कबीर रो पड़ा।

 

“तुमने मुझसे छिपाया क्यों?”

 

अन्वी बोली,

 

“क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी रुक जाए।”

 

कबीर ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

 

“अगर जिंदगी तुम्हारे बिना है… तो वह जिंदगी नहीं है।”

 

अन्वी मुस्कुराई।

 

“नहीं… तुम जीओगे। मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

 

उस दिन दोनों ने घंटों बातें कीं।

 

उन्होंने अपनी अधूरी इच्छाओं की एक सूची बनाई।

 

एक साथ आइसक्रीम खाना।

 

बारिश में भीगना।

 

बच्चों को खिलौने बांटना।

 

सूर्योदय देखना।

 

अनाथालय जाकर बच्चों के साथ पूरा दिन बिताना।

 

डॉक्टर की अनुमति से कबीर उसे व्हीलचेयर पर बाहर ले गया।

 

दोनों ने हर छोटी इच्छा पूरी की।

 

अन्वी दर्द में होती थी, लेकिन हर तस्वीर में मुस्कुरा रही थी।

 

कुछ दिनों बाद उसकी तबीयत और बिगड़ गई।

 

अब वह ठीक से बोल भी नहीं पाती थी।

 

एक रात कबीर उसके पास बैठा था।

 

अन्वी ने बहुत मुश्किल से कहा,

 

“कबीर…”

 

“हां… मैं यहीं हूं।”

 

“एक वादा करोगे?”

 

“हजार करूँगा।”

 

“मेरे जाने के बाद… फिर से पहले वाले कबीर मत बन जाना। लोगों से प्यार करना, बच्चों के साथ खेलना, मुस्कुराना… और अगर कभी कोई लड़की तुम्हारी जिंदगी में आए, तो उसे ये मत कहना कि प्यार बेकार होता है।”

 

कबीर की रुलाई छूट गई।

 

उसने सिर हिलाकर कहा,

 

“वादा है।”

 

अन्वी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा।

 

उसके होंठों पर वही पहली मुलाकात वाली मासूम मुस्कान थी।

 

धीरे-धीरे उसकी आंखें बंद हो गईं।

 

कमरे में मशीन की सीधी आवाज गूंज उठी।

 

कबीर का संसार उसी पल जैसे थम गया।

 

कई महीने तक वह हर शाम उसी पार्क में जाता रहा, जहां पहली बार उसने अन्वी को बच्चों के साथ खिलखिलाते देखा था।

 

एक दिन उसने देखा कि कुछ गरीब बच्चे पुराने झूले के पास उदास बैठे हैं।

 

उसे अन्वी की बात याद आई—”मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

 

उसने बच्चों के लिए खिलौने खरीदे, किताबें लाया और हर रविवार उनके साथ खेलना शुरू कर दिया।

 

धीरे-धीरे शहर के लोग भी उससे जुड़ते गए। उसने अन्वी के नाम से एक छोटी संस्था बनाई, जहां कैंसर से जूझ रहे बच्चों और जरूरतमंद परिवारों की मदद की जाने लगी।

अब जब भी कोई उससे पूछता, “क्या तुम्हें कभी सच्चा प्यार मिला था?”

 

वह आसमान की ओर देखकर मुस्कुरा देता और कहता,

 

“हां… मुझे प्यार मिला था। वह बहुत कम समय के लिए मेरी जिंदगी में आई, लेकिन उसने मुझे पूरी जिंदगी के लिए इंसान बना दिया। कुछ लोग सालों साथ रहकर भी याद नहीं बनते, और कुछ लोग कुछ महीनों में पूरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद बन जाते हैं। अन्वी चली गई, लेकिन उसकी मुस्कान आज भी हर उस बच्चे की हंसी में जिंदा है, जिसे देखकर कभी एक बेपरवाह लड़के को पहली बार प्यार का मतलब समझ आया।”

 

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