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  • आत्मग्लानि भाग 3

    आत्मग्लानि भाग 3

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

                   आत्मग्लानि …

    अब तक आपने पढ़ा :–

    संजय जी ने उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ना ही कोई कभी उस विषय पर बहस की , क्योंकि वह उनके लिए एक बच्ची मात्र थी जिसे उन्हें पढ़ाना था । बस ! इससे ज्यादा वो कुछ नहीं उसके बारे में सोचते थे । ऐसे ही अनदेखी में सर जी के दिन गुजर रहे थे और उनकी नजरंदाजी रीया को बहुत खल रही थी, जिससे वो अंदर ही अंदर खल रही थी और उसका ध्यान अपनी पढ़ाई पर से हटता जा रहा था । जिसके परिणामस्वरूप उसकी तबीयत बिगड़ती गई और उसके परिवार वालों को उसकी चिंता होने लगी , अब उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि रीया को क्या हुआ है? जो लड़की घर की जान थी वो गुमसुम सी क्यों रहती है ऐसा क्या दुःख हुआ जो वो बता भी नहीं रही है? 

    उसके माता-पिता उसे शहर के एक जाने माने डाक्टर के पास ले गए, डाक्टर ने रीया की अच्छी तरह जांच पड़ताल की और प्रेम से बोले – बेटा तुम्हे कुछ नहीं हुआ है, तुम बिल्कुल ठीक हो, तुम बाहर बैठो, मुझे तुम्हारी मां से कुछ बातें करनी हैं और मुस्कुरा दिए, रीया ने नजरें उठाकर उन्हें देखा और चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई, मां और पिताजी ने डर से डाक्टर को देखा तो डाक्टर उनकी मंशा भांप कर कहने लगे ” चिंता की कोई बात नहीं है ऐसा वैसा कुछ नहीं हुआ है, बस कोई बात है जो उसने अपने मन में दबा रखी है, आप उसकी मां हैं प्रेम से उसके मन को टटोलने की कोशिश कीजिए, इस उम्र में बच्चे अपनी इच्छाओं को अपने अंदर दबा दिया करते हैं कभी अपने माता-पिता के डर से कभी समाज के डर से। मां – डाक्टर चिंता की तो कोई बात नहीं है ना, हमारी बेटी ही हमारे जी़ीने का सहारा है और वो हाथ जोड़कर रोने लगी । डाक्टर ने कहा” देखिए ऐसे ना कीजिए वो ठीक है बस उसके मन को टटोलने की कोशिश कीजिए और जानिए उसके मन में क्या है जो वो दबा कर बैठी है किसी को बता नहीं रही, मैं एक डाक्टर हूं नींद आने के लिए दवाईयां लिख देता हूं वो दीजिए लेकिन विश्वास भी रखिए अपनी बेटी पर और दवाओं से ज्यादा प्यार से ठीक होगी इसका विचार अपने दिल में रखकर बात कीजिए वो आपको नहीं बताएगी तो किसे बताएगी ? इसलिए उसका ध्यान और प्रेम ज्यादा दीजिए। डाक्टर की बातों से आश्वस्त होकर वह दोनों रीया को लेकर घर आ गए और आराम करने को कहकर रीया को उसके कमरे में भेज दिया। मां ने सारी बात घर वालों को बताई तो एक बार सब चिंता में पड़ गए लेकिन पिता जी के कहने पर कि हमें उसका ध्यान प्रेम और विश्वास सबको बनाए रखना है जिससे वो हमसे अपने मन की बात कह सके, उनकी बातें सुनकर सबने सहमति जताई और रीया पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया। कुछ दिनों के लिए स्कूल से छुट्टी ले ली रीया ने, मन तो वैसे भी संजय व्यास जी की अनदेखी से खिन्न हो गया था, तो सोचा कुछ दिन घर में ही रहेगी।

     

     

     

  • काला साया — भाग 5

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    सुबह होते ही आरव और कबीर गाँव की चौपाल में पहुँचे।

     

    गाँव के लोग रोज़ की तरह अपने काम में लगे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आज उनके सामने बीस साल पुराना एक ऐसा सच आने वाला है, जिसे सुनकर पूरे गाँव की नींव हिल जाएगी।

     

    आरव ने सबको बुलाया।

     

    धीरे-धीरे गाँव के बुज़ुर्ग, महिलाएँ और नौजवान वहाँ इकट्ठा हो गए।

     

    ठाकुर दीनदयाल भी आए।

     

    आरव ने उनके सामने पुरानी डायरी रख दी।

     

    “यह सावित्री की डायरी है।”

     

    चौपाल में सन्नाटा छा गया।

     

    एक बूढ़ी महिला ने काँपती आवाज़ में पूछा—

     

    “सावित्री?”

     

    “हाँ,” आरव ने कहा। “जिसे हम सब साया के नाम से जानते रहे।”

     

    फिर आरव ने डायरी में लिखी पूरी कहानी सबको सुनाई।

     

    उसने बताया कि सावित्री भागी नहीं थी।

     

    उसकी हत्या हुई थी।

     

    उसे पुराने मकान के नीचे बने कमरे में बंद किया गया था।

     

    उसके पति ने लोगों से झूठ बोला था।

     

    और वर्षों तक उसका सच दबा रहा।

     

    कुछ लोगों की आँखों में आँसू आ गए।

     

    सावित्री की छोटी बहन, जो अब बूढ़ी हो चुकी थी, भीड़ से आगे आई।

     

    उसने डायरी को छुआ और रोते हुए कहा—

     

    “मुझे पता था… मेरी बहन झूठ नहीं बोल सकती थी।”

     

    ठाकुर दीनदयाल ने सिर झुका लिया।

     

    उन्होंने कहा, “हमने उस समय सच जानने की कोशिश नहीं की। हमें लगा वह भाग गई होगी। शायद हमारी चुप्पी भी उसकी आत्मा को बाँधे रही।”

     

    आरव ने कहा, “अब हमें उसका नाम हमेशा के लिए साया नहीं, सावित्री कहना होगा।”

     

    सबने एक साथ सिर झुका दिया।

     

    उसी समय आसमान में बादल घिरने लगे।

     

    हवा तेज़ हो गई।

     

    दूर पुराने मकान की तरफ़ से घंटी बजने की आवाज़ आई।

     

    टन…

     

    टन…

     

    टन…

     

    गाँव के लोग डरकर उस दिशा में देखने लगे।

     

    आरव समझ गया।

     

    “वह हमें बुला रही है।”

     

    कुछ लोग उसके साथ पुराने मकान की ओर चल पड़े।

     

    मकान के अंदर पहुँचते ही उन्हें पहले से कहीं अधिक शांति महसूस हुई।

     

    वह घर अब डरावना नहीं लग रहा था।

     

    दीवारों पर जमी काली परत जैसे हल्की हो गई थी।

     

    नीचे वाले कमरे में पहुँचकर आरव ने दीपक जलाया।

     

    सावित्री की डायरी उसके सामने रखी थी।

     

    उसने आखिरी बार कहा—

     

    “सावित्री, तुम्हारे साथ जो हुआ उसका सच अब सब जानते हैं। तुम्हारा नाम अब किसी डर की पहचान नहीं, बल्कि तुम्हारे अस्तित्व की पहचान है।”

     

    कमरे में हल्की हवा चली।

     

    दीपक की लौ एक पल के लिए बहुत ऊँची हो गई।

     

    फिर सामने धुंध बनने लगी।

     

    धुंध के बीच सावित्री दिखाई दी।

     

    लेकिन इस बार वह वैसी नहीं थी जैसी आरव ने पहली रात देखी थी।

     

    उसके लंबे बाल व्यवस्थित थे।

     

    चेहरा शांत था।

     

    आँखों में डर नहीं था।

     

    उसने अपनी बहन की तरफ़ देखा।

     

    दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    सावित्री ने कुछ नहीं कहा।

     

    सिर्फ़ मुस्कुराई।

     

    उसकी बहन ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “जा बहन… अब तू आज़ाद है।”

     

    सावित्री ने धीरे से सिर झुका दिया।

     

    उसी क्षण कमरे में एक मधुर हवा चली।

     

    दीपक की लौ सुनहरी हो गई।

     

    सावित्री की आत्मा धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।

     

    उसके आसपास की अँधेरी परछाइयाँ गायब होने लगीं।

     

    आरव ने अपनी कलाई देखी।

     

    काला निशान पूरी तरह मिट चुका था।

     

    टूटा हुआ आईना भी अपने आप राख में बदल गया।

     

    और उस राख के साथ काला साया भी हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

     

    सावित्री की आत्मा प्रकाश की ओर उठने लगी।

     

    जाने से पहले उसने आरव और कबीर की तरफ़ देखा।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    आवाज़ बहुत धीमी थी—

     

    “धन्यवाद।”

     

    फिर वह प्रकाश में विलीन हो गई।

     

    कमरे में एक पल के लिए पूर्ण शांति छा गई।

     

    बाहर अचानक बारिश शुरू हो गई।

     

    लेकिन यह बारिश पिछली रात जैसी डरावनी नहीं थी।

     

    बूँदें धीरे-धीरे गिर रही थीं।

     

    आसमान साफ़ होने लगा।

     

    सूरज की किरणें बादलों के बीच से निकल आईं।

     

    गाँव वालों ने उसी दिन पुराने मकान के सामने सावित्री के नाम का एक छोटा-सा दीपक जला दिया।

     

    अब वहाँ कोई डर नहीं था।

     

    रात होने पर भी उस मकान से चीखें नहीं आती थीं।

     

    न पायल की आवाज़।

     

    न काली परछाईं।

     

    न बंद कमरे की दस्तक।

     

    सिर्फ़ हवा चलती और पेड़ों के पत्ते धीरे-धीरे हिलते।

     

    कुछ महीनों बाद उस पुराने मकान को गिराकर वहाँ एक छोटा-सा मंदिर और स्मृति-स्थान बनाया गया।

     

    दीवार पर एक पत्थर लगाया गया, जिस पर लिखा था—

     

    “सावित्री — जिसे दुनिया ने साया समझा, लेकिन जो अंत में सच की रोशनी बन गई।”

     

    आरव जब भी उस रास्ते से गुजरता, कुछ पल वहाँ रुकता।

     

    उसे आज भी पहली बारिश वाली रात याद आती।

     

    वही पुराना मकान।

     

    वही काली परछाईं।

     

    वही डर।

     

    लेकिन अब उसे डर नहीं लगता था।

     

    क्योंकि वह जान चुका था कि हर भटकती आत्मा बदला लेने नहीं आती।

     

    कुछ आत्माएँ सिर्फ़ अपना सच सुनाए जाने का इंतज़ार करती हैं।

     

    उस शाम आरव ने आसमान की ओर देखा।

     

    हल्की बारिश हो रही थी।

     

    एक पल के लिए बादलों के बीच उसे एक शांत चेहरा दिखाई दिया।

     

    सावित्री मुस्कुरा रही थी।

     

    फिर वह दृश्य धीरे-धीरे आसमान में घुल गया।

     

    बारिश थम गई।

     

    हवा शांत हो गई।

     

    और उस रात, बीस साल बाद, सावित्री की आत्मा को आखिरकार मुक्ति मिल गई।

     

    समाप्त।

  • काला साया — भाग 4

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    रात धीरे-धीरे बीत रही थी।

     

    पुराने मकान के नीचे बने उस कमरे में आरव और कबीर अब भी खड़े थे। टूटे हुए आईने के टुकड़े फर्श पर बिखरे पड़े थे। हर टुकड़े में अलग-अलग परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    एक टुकड़े में आरव था।

     

    दूसरे में कबीर।

     

    लेकिन तीसरे टुकड़े में वही काला साया था।

     

    लंबा, बिना चेहरे का और इंसानी शरीर से कहीं अधिक डरावना।

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने दरवाज़ा खींचा, लेकिन वह नहीं खुला।

     

    “आरव… लगता है वह हमें जाने नहीं देगा।”

     

    आरव ने दीपक को कसकर पकड़ लिया।

     

    “हमें सुबह तक इंतज़ार करना होगा।”

     

    तभी कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    फिर किसी बूढ़े के कराहने की।

     

    फिर एक आदमी की चीख।

     

    जैसे इस घर में वर्षों से दबे हुए सारे दर्द एक साथ बाहर निकल आए हों।

     

    दीवारों पर काली परछाइयाँ दौड़ने लगीं।

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    तभी उसके कान के पास आवाज़ आई—

     

    “सच बोलोगे?”

     

    आरव ने आँखें खोलीं।

     

    साया उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    सिर्फ़ थकान थी।

     

    “तुम्हें डर लग रहा है?” उसने पूछा।

     

    आरव ने कहा, “हाँ।”

     

    साया बोली, “डरना गलत नहीं है। डर के कारण सच छिपाना गलत है।”

     

    अचानक साया के पीछे काला धुआँ जमा होने लगा।

     

    धुआँ धीरे-धीरे इंसानी आकार लेने लगा।

     

    वह काला साया था।

     

    उसने लंबा हाथ आरव की तरफ़ बढ़ाया।

     

    दीपक की लौ काँपने लगी।

     

    कबीर चिल्लाया, “आरव, दीपक बुझने मत देना!”

     

    आरव ने दोनों हाथों से दीपक ढक लिया।

     

    काला साया गुर्राया।

     

    “तुम इंसान हो। तुम्हारे भीतर भी डर है… लालच है… झूठ है…”

     

    आरव ने काँपते हुए कहा, “हाँ, मेरे अंदर भी डर है। लेकिन मैं तुम्हें अपना डर नहीं दूँगा।”

     

    काला साया अचानक उसके ऊपर झपटा।

     

    कमरा अँधेरे में डूब गया।

     

    आरव को लगा जैसे किसी ने उसका गला पकड़ लिया हो।

     

    उसे साँस लेने में परेशानी होने लगी।

     

    कबीर ने उसे खींचने की कोशिश की, लेकिन अदृश्य ताकत ने दोनों को दीवार से पटक दिया।

     

    दीपक उनके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया।

     

    लौ बुझने ही वाली थी।

     

    तभी साया ने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथ दीपक के ऊपर कर दिए।

     

    दीपक फिर जल उठा।

     

    काला साया पीछे हट गया।

     

    साया की आवाज़ गूँजी—

     

    “यह घर डर से नहीं… सच से मुक्त होगा।”

     

    आरव ने डायरी उठा ली।

     

    उसने उसमें लिखी साया की पूरी कहानी जोर से पढ़नी शुरू की।

     

    उसका पति उसे इस कमरे में बंद करके गया था।

     

    उसने साया को मारने की कोशिश की थी।

     

    और बाद में गाँव वालों से झूठ कहा था कि साया भाग गई।

     

    साया की हत्या का सच कभी सामने नहीं आया।

     

    जैसे-जैसे आरव पढ़ता गया, कमरे की दीवारों पर बनी काली परछाइयाँ कमजोर होने लगीं।

     

    काला साया चीखने लगा।

     

    “चुप हो जाओ!”

     

    आरव पढ़ता रहा।

     

    “साया निर्दोष थी।”

     

    काला साया पीछे हटने लगा।

     

    “उसकी मृत्यु हत्या थी।”

     

    कमरे में तेज़ हवा चलने लगी।

     

    “और उसकी आत्मा को वर्षों तक झूठ के कारण भटकना पड़ा।”

     

    अचानक ऊपर से बहुत तेज़ आवाज़ आई।

     

    जैसे पूरा मकान हिल गया हो।

     

    फर्श में दरार पड़ गई।

     

    दरार के अंदर से काली राख निकलने लगी।

     

    कबीर ने कहा, “आरव! शायद यही वह चीज़ है जिसे खत्म करना होगा।”

     

    आरव ने दीपक उठाया।

     

    वह राख के पास गया।

     

    साया उसके सामने आ खड़ी हुई।

     

    “मेरा असली नाम लो।”

     

    आरव ने डायरी की तरफ़ देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “साया नहीं… मेरा नाम सावित्री है।”

     

    आरव ने ऊँची आवाज़ में कहा—

     

    “सावित्री!”

     

    कमरा अचानक शांत हो गया।

     

    उसने फिर कहा—

     

    “सावित्री निर्दोष थी!”

     

    तीसरी बार उसने कहा—

     

    “सावित्री अब आज़ाद है!”

     

    काले साये ने भयानक चीख मारी।

     

    उसका शरीर धुएँ की तरह बिखरने लगा।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

     

    उस हाथ की उँगलियाँ आरव की कलाई तक पहुँचीं।

     

    उसका काला निशान अचानक जलने लगा।

     

    आरव दर्द से चिल्लाया।

     

    साया ने उसे देखा।

     

    “डरो मत।”

     

    उसने आरव की कलाई पर हाथ रखा।

     

    काला निशान धीरे-धीरे मिटने लगा।

     

    उसी क्षण सुबह की पहली किरण टूटी हुई खिड़की से कमरे में आई।

     

    काला धुआँ गायब हो गया।

     

    साया वहीं खड़ी थी।

     

    अब उसके चेहरे पर शांति थी।

     

    लेकिन उसने अभी तक पूरी तरह आँखें बंद नहीं की थीं।

     

    “अभी एक काम बाकी है,” उसने कहा।

     

    “क्या?”

     

    “सच… गाँव तक पहुँचना चाहिए।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    दरवाज़ा खुल चुका था।

     

    आरव और कबीर बाहर आए।

     

    बारिश रुक चुकी थी।

     

    आसमान में हल्की लालिमा दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन पुराने मकान की सबसे ऊपरी खिड़की में उन्हें एक आखिरी बार साया दिखाई दी।

     

    उसने हाथ जोड़कर धन्यवाद किया।

     

    फिर अँधेरे में विलीन हो गई।

     

    आरव ने समझ लिया कि असली मुक्ति अभी बाकी थी।

     

    उसे पूरे गाँव के सामने सावित्री का सच बताना था।

     

    और अगली सुबह गाँव की चौपाल में वर्षों पुराना राज़ खुलने वाला था।

  • काला साया — भाग 3

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    अगली रात दोनों दोस्त टॉर्च लेकर पुराने मकान के सामने खड़े थे।

     

    आसमान में बादल थे। हवा ठंडी थी और पेड़ों की शाखाएँ लगातार खिड़कियों से टकरा रही थीं।

     

    कबीर ने कहा, “अगर कुछ भी अजीब लगे तो हम तुरंत वापस चले जाएँगे।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    दरवाज़ा पहले से खुला था।

     

    दोनों अंदर गए।

     

    अंदर वही सन्नाटा था।

     

    लेकिन इस बार दीवारों पर लगी तस्वीरें अलग लग रही थीं।

     

    कबीर ने टॉर्च एक तस्वीर पर डाली।

     

    वह साया की तस्वीर थी।

     

    फिर उसने दूसरी तस्वीर देखी।

     

    उसमें साया अपने पति के साथ खड़ी थी।

     

    लेकिन तस्वीर में पति का चेहरा काले धब्बे से ढका हुआ था।

     

    “ये किसने किया होगा?” कबीर ने पूछा।

     

    आरव ने डायरी का नक्शा निकाला।

     

    “नीचे जाना है।”

     

    दोनों फर्श के एक पुराने हिस्से तक पहुँचे। नक्शे में बने निशान से जगह मिलती थी।

     

    कबीर ने लकड़ी हटाई।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    जैसे ही वे नीचे उतरे, हवा अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई।

     

    कमरे के अंदर पुरानी वस्तुएँ पड़ी थीं।

     

    बीच में एक लोहे का संदूक था।

     

    आरव ने उसे खोला।

     

    अंदर कई पुराने कागज़, कुछ तस्वीरें और एक लाल कपड़े में बंधी डायरी थी।

     

    कबीर ने डायरी खोली।

     

    उसमें साया की लिखावट थी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस रात मैं यह लिख रही हूँ, मुझे पता है कि शायद मैं सुबह तक जीवित न रहूँ।”

     

    दोनों ध्यान से पढ़ने लगे।

     

    साया ने लिखा था कि उसका पति उसे उस पुराने कमरे में ले गया था। उसने बताया था कि वर्षों पहले उनके परिवार ने धन और शक्ति पाने के लिए एक तांत्रिक से अनुष्ठान करवाया था।

     

    लेकिन अनुष्ठान के दौरान एक आत्मा को बुलाया गया और फिर उसे वापस भेजने का तरीका पूरा नहीं किया गया।

     

    उस आत्मा को “काला साया” कहा जाता था।

     

    वह आत्मा किसी एक व्यक्ति की नहीं थी।

     

    वह उन लोगों के डर, लालच और हिंसा से बनी एक भयावह शक्ति थी, जो वर्षों से उस मकान में मरते रहे थे।

     

    साया के पति ने उस आत्मा का इस्तेमाल लोगों को डराने और जमीन हड़पने के लिए किया था।

     

    लेकिन साया को सब पता चल गया।

     

    उसने विरोध किया।

     

    उस रात उसके पति ने उसे इसी कमरे में बंद कर दिया।

     

    डायरी के अगले पन्ने पर शब्द काँपती हुई लिखावट में थे—

     

    “मैंने दरवाज़े के पीछे उसे देखा। वह इंसान नहीं था। सिर्फ़ काली परछाईं थी। उसने मुझसे कहा कि अगर मैं उसका नाम भूल गई तो वह मुझे हमेशा के लिए अपने साथ बाँध लेगी।”

     

    फिर लिखा था—

     

    “मैंने आखिरी कोशिश की। मैंने उसकी परछाईं को शीशे में बंद कर दिया। लेकिन मुझे अपनी जान देनी पड़ी।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा, “तो साया मर गई थी?”

     

    कबीर ने अगला पन्ना पढ़ा।

     

    “हाँ।”

     

    कमरे में अचानक किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    दरवाज़े पर साया खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था।

     

    वह डरावनी कम और दुखी ज़्यादा लग रही थी।

     

    उसकी आँखों से काले आँसू बह रहे थे।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैंने तुम्हें इसलिए बुलाया क्योंकि मेरा सच किसी ने नहीं सुना।”

     

    आरव ने पूछा, “तुम्हें मुक्ति क्यों नहीं मिली?”

     

    साया ने कमरे के एक कोने की तरफ़ देखा।

     

    वहाँ एक टूटा हुआ आईना रखा था।

     

    “काला साया अभी भी उस आईने में कैद है।”

     

    कबीर ने आईना उठाया।

     

    उसमें दोनों की परछाईं दिखाई दी।

     

    लेकिन उनके बीच एक तीसरी परछाईं भी थी।

     

    लंबी।

     

    टेढ़ी।

     

    और बिना चेहरे की।

     

    अचानक आईना काँपने लगा।

     

    कमरे की सारी बत्तियाँ, जो बंद थीं, एक साथ जल उठीं।

     

    तीसरी परछाईं आईने से बाहर निकलने लगी।

     

    कबीर ने आईना छोड़ दिया।

     

    शीशा टूट गया।

     

    और कमरे में काला धुआँ फैल गया।

     

    धुएँ के बीच एक आवाज़ गूँजी—

     

    “तुमने मुझे फिर जगा दिया…”

     

    आरव ने डायरी के आखिरी पन्ने को देखा।

     

    वहाँ एक तरीका लिखा था।

     

    काले साये को मुक्त करने के लिए उस कमरे में रखे पुराने दीपक को जलाना था, साया का असली नाम लेना था और उसके साथ हुए अपराध का सच गाँव के सामने बताना था।

     

    लेकिन एक शर्त थी।

     

    जिस व्यक्ति ने सच पढ़ा है, उसे उस आत्मा का डर स्वीकार करना होगा।

     

    आरव ने दीपक उठाया।

     

    उसने माचिस जलाई।

     

    दीपक जलते ही काला धुआँ पीछे हट गया।

     

    साया की आत्मा कुछ पल के लिए शांत हो गई।

     

    उसने आरव से कहा—

     

    “सच बाहर लाओ… तभी मैं जा पाऊँगी।”

     

    फिर वह गायब हो गई।

     

    कमरे में सिर्फ़ टूटा हुआ आईना पड़ा था।

     

    लेकिन आईने के टुकड़े में अब भी वह काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

     

    और उसकी आँखें आरव को घूर रही थीं।

     

    अब आखिरी काम बाकी था।

     

    उन्हें सुबह होते ही पूरे गाँव के सामने साया की कहानी बतानी थी।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि काला साया उन्हें इतनी आसानी से जाने देगा या नहीं।

  • काला साया — भाग 2

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    अगली सुबह बारिश रुक चुकी थी, लेकिन आरव के मन में रात का डर अब भी जिंदा था।

     

    उसने कलाई पर बने काले निशान को कई बार साबुन से धोया, मगर वह निशान ज़रा भी हल्का नहीं हुआ। उसकी माँ ने पूछा तो उसने कह दिया कि बाइक से गिरने के कारण चोट लग गई है।

     

    लेकिन आरव जानता था कि वह झूठ बोल रहा है।

     

    दोपहर में उसका बचपन का दोस्त कबीर घर आया। आरव ने उसे पिछली रात की पूरी घटना बताई।

     

    कबीर कुछ देर चुप रहा।

     

    “तुमने उस घर में साया की तस्वीर देखी थी?”

     

    “हाँ।”

     

    कबीर का चेहरा बदल गया।

     

    “आरव, वह घर बीस साल से बंद है।”

     

    “लेकिन वहाँ कोई रहता था?”

     

    “रहता नहीं था… रहती थी।”

     

    “कौन?”

     

    कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा, “साया।”

     

    साया गाँव की रहने वाली एक लड़की थी। लगभग बीस साल पहले उसकी शादी शहर में हुई थी। लेकिन शादी के कुछ महीनों बाद वह अचानक गायब हो गई।

     

    गाँव वालों ने कहा था कि वह अपने पति के साथ भाग गई।

     

    लेकिन कहानी इतनी आसान नहीं थी।

     

    साया की छोटी बहन ने बताया था कि शादी के बाद साया कई बार अपने घर लौटना चाहती थी। वह कहती थी कि उसके ससुराल के पास एक पुराना मकान है, जहाँ रात को कोई उसे बुलाता है।

     

    एक दिन उसने अपनी बहन से कहा था—

     

    “वहाँ मेरा साया नहीं है… किसी और का साया है।”

     

    इसके बाद साया गायब हो गई।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव के लोगों ने उसी पुराने मकान के पास उसकी चूड़ियाँ और पायल पाई थीं।

     

    फिर मकान बंद कर दिया गया।

     

    कबीर ने कहा, “लोग कहते हैं कि साया की आत्मा वहीं भटकती है।”

     

    आरव ने अपनी कलाई का निशान दिखाया।

     

    कबीर का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “यह निशान… मैंने पहले भी देखा है।”

     

    “कहाँ?”

     

    “पुरानी हवेली के चौकीदार के हाथ पर।”

     

    दोनों उसी शाम गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति ठाकुर दीनदयाल के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने साया का नाम सुनते ही दरवाज़ा बंद कर दिया।

     

    “तुम दोनों वहाँ गए थे?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    बुज़ुर्ग ने लंबी साँस ली।

     

    “तो अब वह तुम्हें जाने नहीं देगी।”

     

    “क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    दीनदयाल ने बताया कि साया की मौत साधारण नहीं थी।

     

    शादी के बाद उसके पति ने गाँव के बाहर बने उस मकान को अपने कारोबार के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया था। लेकिन वहाँ पहले से ही एक पुराना कमरा था, जिसे हमेशा बंद रखा जाता था।

     

    साया ने एक रात वह कमरा खोल दिया था।

     

    अंदर उसे एक पुरानी डायरी मिली थी।

     

    डायरी में लिखा था कि कई साल पहले एक तांत्रिक ने उस घर में किसी आत्मा को बाँधने की कोशिश की थी। लेकिन अनुष्ठान अधूरा रह गया था। आत्मा पूरी तरह बंधी भी नहीं और मुक्त भी नहीं हुई।

     

    उस आत्मा को लोग काला साया कहते थे।

     

    वह किसी इंसान के शरीर पर अपना प्रभाव डाल सकती थी।

     

    दीनदयाल ने कहा, “साया ने उस कमरे का राज़ जान लिया था। उसके बाद वह बदलने लगी।”

     

    “क्या उसके पति ने उसे मार दिया?” आरव ने पूछा।

     

    बुज़ुर्ग ने उत्तर नहीं दिया।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “अगर सच जानना है तो उस घर में वापस जाना होगा।”

     

    आरव डर गया।

     

    उसी रात उसके कमरे की खिड़की पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने पर्दा हटाया।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फिर उसने नीचे देखा।

     

    कीचड़ में दो पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान खिड़की के नीचे से शुरू होकर घर के अंदर जाने वाले दरवाज़े तक जा रहे थे।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    उसकी माँ सो रही थी।

     

    तभी उसके कमरे के कोने से किसी लड़की के रोने की आवाज़ आई।

     

    “मुझे… बाहर निकालो…”

     

    आरव ने कमरे की बत्ती जलाई।

     

    कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके बिस्तर पर वही पुरानी डायरी पड़ी थी।

     

    जिसे उसने कभी देखा तक नहीं था।

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर यह डायरी तुम्हारे हाथ में है, तो साया ने तुम्हें चुन लिया है।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    अगले पन्ने पर एक नक्शा बना था।

     

    उसमें उसी पुराने मकान का चित्र था और नीचे एक निशान।

     

    निशान के पास लिखा था—

     

    “नीचे का कमरा।”

     

    अचानक डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे।

     

    आखिरी पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—

     

    “मेरी आत्मा को नहीं, मेरे सच को मुक्त करो।”

     

    उसी क्षण कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    बारिश की बूंदों के बीच आरव ने दूर पुराने मकान की छत पर एक औरत को खड़े देखा।

     

    काले कपड़े।

     

    खुले बाल।

     

    सफ़ेद आँखें।

     

    साया उसे देख रही थी।

     

    और फिर उसने अपनी उँगली से नीचे की तरफ़ इशारा किया।

     

    उस पुराने मकान के नीचे।

     

    उस बंद कमरे की तरफ़।

     

    आरव समझ गया कि अगली रात उसे वहाँ वापस जाना होगा।

     

    लेकिन इस बार वह अकेला नहीं जाएगा।

     

    कबीर उसके साथ होगा।

     

    और उन्हें उस कमरे में छिपा सच ढूँढना होगा।

     

    क्योंकि अब सवाल सिर्फ़ साया की आत्मा का नहीं था।

     

    सवाल यह था कि काला साया आखिर किसका था।

  • काला साया — भाग 1

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

    उस रात बारिश कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी।आसमान लगातार गरज रहा था और बिजली की सफ़ेद चमक हर कुछ सेकंड में पूरे गाँव को ऐसे रोशन कर देती, जैसे अँधेरे में किसी ने अचानक दिन जला दिया हो। कच्ची गलियों में पानी भर चुका था। पेड़ों की डालियाँ हवा के तेज़ झोंकों से बुरी तरह हिल रही थीं और दूर पुराने पीपल के पेड़ से आती पत्तों की सरसराहट किसी धीमी फुसफुसाहट जैसी लग रही थी।

     

    बारिश से बचने के लिए आरव अपनी मोटरसाइकिल तेज़ चला रहा था।

     

    शहर से गाँव लौटते समय उसने सोचा था कि आधे घंटे में घर पहुँच जाएगा, लेकिन रास्ते में उसकी बाइक अचानक बंद हो गई। उसने कई बार किक मारी, मगर इंजन ने जवाब नहीं दिया।

     

    “इस वक्त ही खराब होना था?” आरव ने झुँझलाकर कहा।

     

    उसने मोबाइल निकाला। नेटवर्क गायब था।

     

    चारों तरफ़ सिर्फ़ बारिश थी।

     

    तभी बिजली चमकी और उसकी रोशनी में सड़क के किनारे एक पुराना, जर्जर मकान दिखाई दिया।

     

    आरव ने उस घर को पहले कभी नहीं देखा था।

     

    घर की दीवारें काली पड़ चुकी थीं। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था। सबसे अजीब बात यह थी कि इतनी तेज़ हवा और बारिश के बावजूद दरवाज़ा बिल्कुल स्थिर था।

     

    आरव ने बाइक सड़क के किनारे खड़ी की और घर की तरफ़ बढ़ गया।

     

    जैसे ही उसने दरवाज़े को धक्का दिया, वह अपने आप खुल गया।

     

    अंदर घुप्प अँधेरा था।

     

    “कोई है?” आरव ने आवाज़ लगाई।

     

    कोई जवाब नहीं मिला।

     

    वह मोबाइल की टॉर्च जलाकर अंदर गया। कमरे में पुराने फर्नीचर पर धूल जमी थी। दीवारों पर कुछ धुँधली तस्वीरें टंगी थीं। एक तस्वीर के सामने पहुँचकर आरव रुक गया।

     

    तस्वीर में एक युवती थी।

     

    काले कपड़े पहने हुए, लंबे बाल चेहरे पर आधे बिखरे हुए और आँखें बिल्कुल सीधी कैमरे की तरफ़।

     

    तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—साया।

     

    आरव ने अजीब-सी बेचैनी महसूस की।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव घबरा गया।

     

    “कोई है ऊपर?”

     

    वह सीढ़ियों की ओर बढ़ा। हर सीढ़ी पर उसके कदमों की आवाज़ गूँज रही थी। ऊपर पहुँचकर उसने देखा कि एक पुराना कमरा खुला हुआ था।

     

    कमरे के बीचोंबीच लकड़ी की एक कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर काले बालों का एक गुच्छा पड़ा था।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “तुम… इतनी देर से क्यों आए?”

     

    आरव का शरीर जम गया।

     

    उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने घबराकर नीचे भागना चाहा, लेकिन तभी नीचे का मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव सीढ़ियों पर ही रुक गया।

     

    बारिश की आवाज़ अचानक और तेज़ लगने लगी।

     

    फिर उसे नीचे से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    आवाज़ धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ रही थी।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी नीचे डाली।

     

    सीढ़ियों के अंतिम पायदान पर एक औरत खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लंबे काले बाल पूरे चेहरे को ढँके हुए थे।

     

    उसने धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर उठाया।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    बालों के बीच से दो बिल्कुल सफ़ेद आँखें दिखाई दीं।

     

    “साया…” आरव के मुँह से अनजाने में निकला।

     

    औरत ने सिर थोड़ा टेढ़ा किया।

     

    “मेरा नाम… तुम्हें किसने बताया?”

     

    आरव पीछे हटते हुए दीवार से जा लगा।

     

    तभी बिजली चमकी।

     

    एक पल के लिए पूरा कमरा रोशनी से भर गया।

     

    और अगले ही पल वह औरत गायब थी।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    फ़र्श पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    लेकिन वे निशान दरवाज़े से अंदर नहीं आए थे।

     

    वे सीधे दीवार से निकलकर कमरे तक पहुँचे थे।

     

    आरव ने काँपते हाथों से दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। इस बार दरवाज़ा आसानी से खुल गया।

     

    वह दौड़ता हुआ बाहर आया।

     

    बारिश अब भी हो रही थी।

     

    उसने बाइक स्टार्ट की।

     

    इस बार बाइक तुरंत चालू हो गई।

     

    आरव बिना पीछे देखे गाँव की तरफ़ भागा।

     

    लेकिन कुछ दूर जाने के बाद उसे महसूस हुआ कि पीछे कोई बैठा है।

     

    सीट पर किसी के बैठने का भार साफ़ महसूस हो रहा था।

     

    उसने शीशे में देखा।

     

    पीछे कोई नहीं था।

     

    फिर उसके कान के पास वही फुसफुसाहट आई—

     

    “तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते…”

     

    आरव ने डरकर बाइक रोक दी।

     

    पीछे मुड़ा।

     

    सीट खाली थी।

     

    लेकिन सीट पर पानी से एक शब्द लिखा था—

     

    “वापस आना।”

     

    उस रात आरव घर तो पहुँच गया, मगर सुबह होते ही उसने देखा कि उसकी दाहिनी कलाई पर काले रंग का एक निशान बना हुआ था।

     

    वह निशान बिल्कुल किसी हाथ की उँगलियों जैसा था।

     

    और उसके कमरे की खिड़की के बाहर बारिश से भीगी दीवार पर किसी ने उँगली से लिखा था—

     

    “साया अभी जागी है।”

  • 😱 आहट 😱 (Last part-5)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव अपने पिता को सामने देखकर पत्थर की तरह खड़ा रह गया।

     

    उसका चेहरा वही था जिसे उसने बचपन से तस्वीरों में देखा था।

     

    वही आँखें…

     

    वही चेहरा…

     

    लेकिन उसके शरीर के चारों तरफ धुंध की एक परत थी।

     

    आरव की आवाज़ काँप गई।

     

    “पापा…?”

     

    उस आकृति ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ, बेटा।”

     

    दीनानाथ पीछे हट गया।

     

    “राघव…”

     

    आरव ने अपने पिता से पूछा—

     

    “आपने मुझे इतने सालों तक सच क्यों नहीं बताया?”

     

    राघव ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम सामान्य जिंदगी जियो।”

     

    “लेकिन मैं सामान्य जिंदगी जी ही नहीं पाया!”

     

    आरव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मुझे हमेशा लगता रहा कि मेरे अंदर कुछ अधूरा है। अब पता चल रहा है कि मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “झूठ नहीं था, बेटा। वह मेरी मजबूरी थी।”

     

    आरव ने चिट्ठी उठाई।

     

    “इसमें लिखा है कि देवेंद्र से मेरा रिश्ता मेरी सोच से ज्यादा गहरा है। इसका क्या मतलब है?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “देवेंद्र तुम्हारा चाचा नहीं था।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तो कौन था?”

     

    राघव की आवाज़ भारी हो गई।

     

    “वह तुम्हारा पिता था।”

     

    आरव की साँस जैसे रुक गई।

     

    “नहीं…”

     

    “मीरा से तुम्हारा जन्म हुआ था। देवेंद्र तुम्हारा जैविक पिता था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तो आपने मुझे क्यों पाला?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “क्योंकि देवेंद्र तुम्हें अपने लालच के लिए इस्तेमाल करना चाहता था। तुम्हारे दादा ने पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी थी। देवेंद्र तुम्हें खत्म करना चाहता था।”

     

    “और मीरा?”

     

    “मीरा ने तुम्हें बचाने के लिए अपनी जान दे दी।”

     

    आरव की आँखों के सामने सारी घटनाएँ घूमने लगीं।

     

    वह हवेली…

     

    बंद कमरा…

     

    आईना…

     

    मीरा की आत्मा…

     

    और वह आहट।

     

    तभी राघव ने कहा—

     

    “लेकिन देवेंद्र को पूरी तरह खत्म करना जरूरी था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आपने उसे कैसे रोका?”

     

    “मैंने उसे उसी रात तहखाने में बंद कर दिया। लेकिन वह मरने से पहले एक श्राप छोड़ गया।”

     

    दीनानाथ ने काँपते हुए कहा—

     

    “उसने कहा था कि जब तक उसका खून इस हवेली में वापस नहीं आएगा, उसकी आत्मा मुक्त नहीं होगी।”

     

    आरव ने समझते हुए पूछा—

     

    “इसलिए उसने मुझे बुलाया?”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    अचानक जमीन काँपने लगी।

     

    कब्रिस्तान की मिट्टी फटने लगी।

     

    हवा में तेज़ ठंड फैल गई।

     

    दीनानाथ चिल्लाया—

     

    “हमें यहाँ से जाना होगा!”

     

    लेकिन तभी सामने की जमीन से एक काला धुआँ उठने लगा।

     

    उस धुएँ के बीच देवेंद्र की आकृति दिखाई दी।

     

    “भागोगे कहाँ?”

     

    उसकी आवाज़ पूरे कब्रिस्तान में गूँज उठी।

     

    आरव ने अपने पिता की ओर देखा।

     

    “अब क्या होगा?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “तुम्हें हवेली वापस जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस कहानी का अंत वहीं होगा जहाँ इसकी शुरुआत हुई थी।”

     

    कुछ ही देर बाद आरव और दीनानाथ वापस हवेली पहुँचे।

     

    हवेली पहले से बिल्कुल अलग लग रही थी।

     

    खिड़कियाँ खुली थीं।

     

    दरवाज़े अपने आप हिल रहे थे।

     

    और अंदर से लगातार एक ही आवाज़ आ रही थी—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    दीवार पर लगी घड़ी फिर बारह बजे पर रुक गई।

     

    तभी मीरा उसके सामने दिखाई दी।

     

    इस बार उसका चेहरा शांत था।

     

    उसने आरव की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “डरो मत।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “माँ… अब क्या करना है?”

     

    मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें उस कमरे में जाना होगा जहाँ मेरा अंत हुआ था।”

     

    आरव तीसरी मंज़िल पर पहुँचा।

     

    बंद कमरा अब खुला था।

     

    कमरे के बीच में एक पुरानी कुर्सी रखी थी।

     

    उसके सामने देवेंद्र खड़ा था।

     

    “आ गए मेरे बेटे?”

     

    आरव ने दृढ़ आवाज़ में कहा—

     

    “मैं तुम्हारा बेटा हूँ, लेकिन तुम्हारी तरह नहीं बनूँगा।”

     

    देवेंद्र हँसा।

     

    “तुम्हारे खून में मेरा खून है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “खून इंसान को नहीं बनाता। उसके कर्म बनाते हैं।”

     

    देवेंद्र का चेहरा बदल गया।

     

    उसकी आँखें लाल हो गईं।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें मेरे खिलाफ कर दिया।”

     

    “नहीं,” आरव ने कहा, “तुम्हारे कर्मों ने किया।”

     

    देवेंद्र ने हाथ उठाया।

     

    कमरे की सारी चीज़ें हवा में उठने लगीं।

     

    कुर्सी दीवार से जा टकराई।

     

    खिड़कियों के शीशे टूटने लगे।

     

    दीनानाथ बाहर से चिल्लाया—

     

    “आरव! मीरा का लॉकेट!”

     

    आरव ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।

     

    जैसे ही उसने उसे हाथ में पकड़ा, कमरे में तेज़ सफेद रोशनी फैल गई।

     

    मीरा सामने आ गई।

     

    देवेंद्र पीछे हटने लगा।

     

    “नहीं!”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “यह लॉकेट उस रात मेरे पास था। इसमें तुम्हारी सारी ताकत नहीं, तुम्हारा सच बंद है।”

     

    आरव ने लॉकेट जमीन पर रख दिया।

     

    अचानक कमरे में मीरा, राघव और देवेंद्र तीनों दिखाई देने लगे।

     

    तीनों की आत्माएँ जैसे एक-दूसरे से जुड़ गईं।

     

    राघव ने आरव से कहा—

     

    “बेटा, हमें जाने दो।”

     

    आरव समझ गया।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं और कहा—

     

    “मैं तुम्हें माफ करता हूँ।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    राघव ने भी मुस्कुराकर सिर झुका दिया।

     

    लेकिन देवेंद्र चीख रहा था।

     

    “नहीं! मैं नहीं जाऊँगा!”

     

    उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।

     

    मीरा ने उसकी ओर देखा।

     

    “अब इस घर पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं।”

     

    अचानक कमरे में जोरदार रोशनी हुई।

     

    देवेंद्र की परछाईं चीखते हुए दीवार में समा गई।

     

    और उसी क्षण…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आखिरी बार आवाज़ आई।

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    सुबह होने तक हवेली पूरी तरह शांत थी।

     

    आरव बाहर आकर सीढ़ियों पर बैठ गया।

     

    पहली बार उसे ऐसा लगा जैसे उसके सीने से कोई भारी बोझ उतर गया हो।

     

    दीनानाथ उसके पास आया।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    आरव ने हवेली की ओर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    लेकिन तभी ऊपर तीसरी मंज़िल की खिड़की में उसे एक सफेद आकृति दिखाई दी।

     

    मीरा।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    आरव ने हाथ जोड़ दिए।

     

    अगले ही पल वह आकृति गायब हो गई।

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने हवेली को गिराने का फैसला किया।

     

    मजदूरों ने काम शुरू किया।

     

    जब तीसरी मंज़िल की दीवार तोड़ी गई, तो उसके अंदर एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला।

     

    संदूक के अंदर सिर्फ एक कागज़ था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “हर आहट डर की निशानी नहीं होती। कभी-कभी कोई अपना यह बताने आता है कि वह अब भी तुम्हारे साथ है।”

     

    आरव ने वह कागज़ संभालकर रख लिया।

     

    उसने हवेली को हमेशा के लिए बंद कर दिया।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    ठीक एक साल बाद…

     

    आरव अपने नए घर में रात को अकेला बैठा था।

     

    घड़ी में बारह बज रहे थे।

     

    अचानक उसके कमरे के बाहर से आवाज़ आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव की आँखें खुल गईं।

     

    वह धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फर्श पर सिर्फ एक छोटा सा लॉकेट पड़ा था।

     

    वही लॉकेट…

     

    जो उसने हवेली में छोड़ दिया था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    पीछे एक नया वाक्य खुदा हुआ था—

     

    “आरव, कहानी खत्म नहीं हुई…”

     

    उसी क्षण उसके पीछे से एक बच्चे की हँसी सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही…”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे के कोने में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

     

    उसके गले में वही लॉकेट था।

     

    और उसकी आँखें बिल्कुल मीरा जैसी थीं।

     

    बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “माँ मुझे लेने आएगी।”

     

    कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    और अंधेरे में आखिरी बार वही आवाज़ गूँजी—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    समाप्त।

  • आहट — उस बंद कमरे का राज़ (part-4)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    दीनानाथ की बात सुनकर आरव कुछ पल तक उसे देखता रहा।

     

    “देवेंद्र वापस आ गया है… इसका मतलब क्या है?”

     

    दीनानाथ ने दरवाज़ा बंद किया और धीरे से कहा—

     

    “जिसे तुमने तहखाने में देखा, वह देवेंद्र की आत्मा थी।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। मैंने उसे देखा था। वह इंसान की तरह था।”

     

    “यही तो उसकी ताकत है।”

     

    दीनानाथ ने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

     

    “लेकिन अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

     

    “कहाँ जाना है?”

     

    “तुम्हारे पिता के कमरे में।”

     

    दोनों हवेली के दूसरी मंज़िल पर पहुँचे।

     

    दीनानाथ ने एक पुराने कमरे का ताला खोला।

     

    कमरे में एक बड़ी मेज़, पुरानी किताबें और लकड़ी की अलमारी थी।

     

    आरव ने दीवार पर अपने पिता की तस्वीर देखी।

     

    उसके नीचे एक तारीख लिखी थी—

     

    18 जुलाई 1998।

     

    दीनानाथ ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने मीरा को मारने की कोशिश नहीं की थी। वह उसे बचाना चाहते थे।”

     

    “तो फिर मीरा मरी कैसे?”

     

    दीनानाथ कुछ देर चुप रहा।

     

    “उस रात देवेंद्र को पता चल गया था कि मीरा माँ बनने वाली है।”

     

    आरव ध्यान से सुनने लगा।

     

    “देवेंद्र तुम्हारे पिता का बड़ा भाई था। उसे लगता था कि परिवार की सारी संपत्ति उसी की होगी। लेकिन तुम्हारे दादा ने अपनी वसीयत बदल दी थी। उन्होंने तय किया था कि पूरी संपत्ति उस बच्चे के नाम होगी जो मीरा से पैदा होने वाला था।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    “इसलिए उसने बच्चे को मारने की कोशिश की?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर?”

     

    दीनानाथ ने एक पुरानी डायरी मेज़ पर रख दी।

     

    “यह तुम्हारे पिता की डायरी है।”

     

    आरव ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “17 जुलाई की रात।”

     

    “आज मीरा को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। डॉक्टर को हवेली तक आने में देर हो रही है। देवेंद्र लगातार घर के आसपास घूम रहा है। मुझे डर है कि वह कुछ कर सकता है।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “रात 11:40 बजे।”

     

    “बच्चा पैदा हो चुका है। मीरा और बच्चा सुरक्षित हैं। लेकिन देवेंद्र ने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है।”

     

    फिर एक पन्ना खाली था।

     

    उसके बाद लिखा था—

     

    “रात 12:05 बजे।”

     

    “देवेंद्र अंदर आ गया। उसने बच्चे को छीनने की कोशिश की। मीरा ने बच्चे को बचाने के लिए खुद को उसके सामने खड़ा कर दिया।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    अगले शब्द पढ़ते हुए उसके हाथ काँपने लगे।

     

    “देवेंद्र ने मीरा को धक्का दिया। उसका सिर पत्थर की मेज़ से टकराया। वह वहीं गिर गई।”

     

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

     

    “और मेरे पिता?”

     

    दीनानाथ ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता देवेंद्र से लड़ने लगे। लेकिन तब तक मीरा की साँसें बंद हो चुकी थीं।”

     

    आरव की आँखों के सामने मीरा का चेहरा घूमने लगा।

     

    “फिर मुझे किसने बचाया?”

     

    दीनानाथ ने उत्तर दिया—

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    “लेकिन मेरी परवरिश तो मेरी माँ ने की थी।”

     

    दीनानाथ ने धीरे से कहा—

     

    “जिसे तुम माँ समझते रहे… वह मीरा की बड़ी बहन थी।”

     

    आरव के पैरों के नीचे से जैसे जमीन निकल गई।

     

    “क्या?”

     

    “मीरा की बहन ने तुम्हें अपना बच्चा बनाकर पाला। तुम्हारे पिता ने तुम्हारी पहचान छिपा दी ताकि देवेंद्र तुम्हें कभी ढूँढ़ न सके।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    तभी कमरे की खिड़की अपने आप बंद हो गई।

     

    धड़ाम!

     

    दीनानाथ ने तुरंत पीछे देखा।

     

    कमरे के कोने में किसी की परछाईं खड़ी थी।

     

    “वह आ गया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    वही आदमी।

     

    देवेंद्र।

     

    उसका चेहरा अब पहले से भी ज्यादा डरावना था।

     

    “तुम्हें सच नहीं जानना चाहिए था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    दीनानाथ ने बंदूक उठाई और गोली चला दी।

     

    धाँय!

     

    गोली देवेंद्र के शरीर से आर-पार निकल गई।

     

    लेकिन वह वहीं खड़ा रहा।

     

    उसने दीनानाथ की ओर देखा।

     

    “तुमने उस रात भी मुझे रोकने की कोशिश की थी।”

     

    दीनानाथ काँपने लगा।

     

    “मैंने गलती की थी।”

     

    देवेंद्र हँसा।

     

    “गलती?”

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    दीनानाथ हवा में उठ गया और दीवार से जा टकराया।

     

    आरव ने चिल्लाकर कहा—

     

    “उसे छोड़ दो!”

     

    देवेंद्र उसकी ओर मुड़ा।

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे हराने की कोशिश की थी। उन्होंने मुझे इस हवेली के तहखाने में बंद कर दिया था। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि मैं मरने के बाद भी वापस आ सकता हूँ।”

     

    “तुम मुझसे क्या चाहते हो?”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा खून।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि संपत्ति का अधिकार तुम्हारे पास है। तुम्हारे मरते ही वह अधिकार खत्म हो जाएगा।”

     

    देवेंद्र ने हाथ उठाया।

     

    आरव अचानक जमीन से उठने लगा।

     

    उसकी साँस रुकने लगी।

     

    तभी कमरे में मीरा की आवाज़ गूँजी—

     

    “उसे मत छूना!”

     

    देवेंद्र रुक गया।

     

    कमरे में ठंडी हवा फैल गई।

     

    मीरा की आत्मा आरव और देवेंद्र के बीच खड़ी थी।

     

    “तुमने मेरा बच्चा मुझसे छीना था।”

     

    देवेंद्र हँसा।

     

    “और अब मैं उसे भी छीन लूँगा।”

     

    मीरा की आँखें लाल हो गईं।

     

    अचानक दीवारों से कई हाथ निकलने लगे।

     

    देवेंद्र पीछे हट गया।

     

    “नहीं!”

     

    मीरा ने आरव से कहा—

     

    “भागो!”

     

    आरव ने दीनानाथ को उठाया और दोनों दरवाज़े की ओर दौड़े।

     

    लेकिन दरवाज़ा खुलने से पहले ही मीरा ने चीखकर कहा—

     

    “आरव, अपने पिता की कब्र के नीचे देखना!”

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    आरव और दीनानाथ बाहर निकल गए।

     

    कुछ देर बाद पीछे से जोरदार धमाका हुआ।

     

    पूरी हवेली काँप उठी।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    तीसरी मंज़िल की खिड़की में मीरा खड़ी थी।

     

    उसने हाथ उठाकर आरव को इशारा किया।

     

    फिर खिड़की के पीछे अंधेरा छा गया।

     

    दीनानाथ ने कहा—

     

    “अब तुम्हें अपने पिता की कब्र पर जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस पूरी कहानी का आखिरी सच वहीं छिपा है।”

     

    अगली सुबह दोनों कब्रिस्तान पहुँचे।

     

    आरव अपने पिता की कब्र के सामने खड़ा था।

     

    उसने मिट्टी हटानी शुरू की।

     

    कुछ देर बाद फावड़ा किसी लोहे की चीज़ से टकराया।

     

    ठन!

     

    आरव ने मिट्टी हटाई।

     

    वहाँ एक लोहे का छोटा संदूक था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “आरव के लिए — जब वह सच जानने के योग्य हो जाए।”

     

    आरव ने संदूक खोला।

     

    अंदर एक वीडियो कैमरा, कुछ कागज़ और एक छोटी सी चाबी थी।

     

    लेकिन सबसे ऊपर एक चिट्ठी रखी थी।

     

    आरव ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी साँस रुक गई—

     

    “आरव, अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझ लो कि मीरा अब तुम्हें बचाने के लिए वापस आ चुकी है।”

     

    लेकिन चिट्ठी की आखिरी लाइन ने आरव को अंदर तक हिला दिया—

     

    “देवेंद्र से तुम्हारा रिश्ता जितना तुम सोचते हो, उससे कहीं ज्यादा गहरा है।”

     

    आरव ने सिर उठाकर दीनानाथ की ओर देखा।

     

    दीनानाथ के चेहरे पर डर था।

     

    “इसका मतलब क्या है?”

     

    दीनानाथ ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “इसका मतलब… देवेंद्र सिर्फ तुम्हारे चाचा नहीं थे।”

     

    अचानक पीछे से वही आहट सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कब्रिस्तान में कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके पिता की कब्र के पीछे एक नई कब्र दिखाई दे रही थी।

     

    उस पर नाम लिखा था—

     

    “देवेंद्र राघव सिंह।”

     

    और नीचे तारीख थी—

     

    17 जुलाई 1998।

     

    आरव के हाथ से चिट्ठी गिर गई।

     

    क्योंकि उसी क्षण उसके पीछे किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “बेटा…”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    और वहाँ…

     

    उसका अपना पिता खड़ा था।

  • आहट — उस बंद कमरे का राज़ (part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

     

    आरव कुछ क्षणों तक उस अंधेरी सीढ़ी के सामने खड़ा रहा। नीचे से आती कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे और साफ होती जा रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने टॉर्च नीचे की ओर की।

     

    सीढ़ियाँ पुरानी थीं। उन पर मोटी धूल जमी हुई थी, लेकिन कुछ जगहों पर ताज़ा गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    आरव ने खुद को संभाला और नीचे उतरना शुरू किया।

     

    पहली सीढ़ी…

     

    दूसरी…

     

    तीसरी…

     

    जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।

     

    तहखाने में पहुँचते ही उसकी नाक में मिट्टी और सड़न की तेज़ गंध आई।

     

    सामने एक लंबा कमरा था।

     

    दीवारों पर पुराने लालटेन लगे थे। कुछ टूटी कुर्सियाँ और लकड़ी के बक्से इधर-उधर पड़े थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब चीज़ कमरे के बीच में रखी एक पुरानी मेज़ थी।

     

    उस मेज़ पर एक लाल कपड़ा बिछा था।

     

    और उसके ऊपर एक छोटा सा टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    टेप रिकॉर्डर अपने आप चलने लगा।

     

    पहले सिर्फ खरखराहट सुनाई दी।

     

    फिर एक आवाज़ आई।

     

    आरव ने तुरंत पहचान लिया।

     

    वह उसके पिता की आवाज़ थी।

     

    “अगर तुम यह रिकॉर्डिंग सुन रहे हो, आरव… तो इसका मतलब है कि तुम हवेली तक पहुँच चुके हो।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    रिकॉर्डिंग में उसके पिता बोल रहे थे—

     

    “मुझे पता था कि एक दिन तुम्हें सच बताना पड़ेगा। लेकिन मैं चाहता था कि वह दिन जितना देर से आए, उतना अच्छा हो।”

     

    कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर आवाज़ आई—

     

    “मीरा की मौत के पीछे देवेंद्र था। लेकिन देवेंद्र अकेला नहीं था।”

     

    आरव ने टेप रिकॉर्डर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “उस रात मीरा ने एक बच्चे को जन्म दिया था। वह बच्चा…”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    आरव ने टेप को थपथपाया।

     

    “नहीं… नहीं… आगे बोलो!”

     

    टेप फिर चला।

     

    “वह बच्चा ही इस पूरे राज़ की वजह था।”

     

    आरव के माथे पर पसीना आ गया।

     

    “देवेंद्र उस बच्चे को खत्म करना चाहता था। मैंने बच्चे को बचाने की कोशिश की, लेकिन मीरा को नहीं बचा पाया।”

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    “अगर तुम यह सुन रहे हो तो याद रखना… तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म नहीं दिया था।”

     

    टेप अचानक बंद हो गया।

     

    आरव के हाथ सुन्न पड़ गए।

     

    “तो… मैं कौन हूँ?”

     

    तभी तहखाने के दूसरे कोने से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    आरव धीरे-धीरे आवाज़ की ओर बढ़ा।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का पालना रखा था।

     

    पालना अपने आप हिल रहा था।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    आरव ने काँपते हाथ से पालने के अंदर टॉर्च की रोशनी डाली।

     

    अंदर कोई बच्चा नहीं था।

     

    सिर्फ एक पुराना काला लॉकेट पड़ा था।

     

    आरव ने लॉकेट उठाया।

     

    उसके पीछे एक तारीख खुदी थी—

     

    17 जुलाई 1998।

     

    अचानक उसके पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कमरे में अब वह अकेला नहीं था।

     

    एक आदमी दीवार के पास खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।

     

    “तुम कौन हो?” आरव ने पूछा।

     

    आदमी धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    उसका चेहरा देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।

     

    “पापा?”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे पिता नहीं।”

     

    उसकी आवाज़ भारी थी।

     

    “मैं देवेंद्र हूँ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “लेकिन… देवेंद्र तो मर चुका है।”

     

    आदमी ने कहा—

     

    “कुछ लोग मरकर भी खत्म नहीं होते।”

     

    तभी कमरे की सारी लालटेन एक साथ बुझ गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ देवेंद्र की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए झूठ बोला था। लेकिन वह एक बात छिपाना भूल गए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    देवेंद्र की हँसी गूँज उठी।

     

    “तुम इस हवेली के वारिस नहीं हो… तुम इसके कैदी हो।”

     

    अचानक आरव के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई।

     

    वह एक गड्ढे में गिर पड़ा।

     

    उसके सिर पर जोर से चोट लगी और उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    जब उसे होश आया तो वह उसी बंद कमरे में था, जहाँ मीरा का आईना था।

     

    उसके सामने मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसकी आँखों में डर नहीं…

     

    गुस्सा था।

     

    उसने दीवार की ओर इशारा किया।

     

    दीवार पर एक-एक करके कई तस्वीरें दिखाई देने लगीं।

     

    पहली तस्वीर में उसके पिता थे।

     

    दूसरी में मीरा।

     

    तीसरी में देवेंद्र।

     

    और चौथी तस्वीर में…

     

    एक छोटा बच्चा।

     

    आरव उस तस्वीर को देखते ही समझ गया।

     

    बच्चे के गले में वही लॉकेट था जो अभी उसके हाथ में था।

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हें अपने जन्म का सच जानना होगा।”

     

    अचानक आईना टूट गया।

     

    छन्न्न!

     

    काँच के टुकड़ों के बीच एक आखिरी शब्द उभरा—

     

    “माँ तुम्हारी हत्या करने नहीं, तुम्हें बचाने आई है।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “लेकिन मेरी माँ कौन है?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने आरव की ओर देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “मैं।”

     

    उसी क्षण कमरे की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    बाहर बिजली चमकी।

     

    और आरव ने पहली बार उस चेहरे को साफ देखा।

     

    वह वही महिला थी जो उसके पिता की तस्वीर में खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    लेकिन इससे भी बड़ा सवाल अभी बाकी था—

     

    अगर मीरा उसकी माँ थी…

     

    तो फिर उसकी असली मौत कब हुई थी?

     

    और उसकी परवरिश किसने की थी?

     

    जवाब मिलने से पहले ही हवेली के नीचे से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    “आरव!”

     

    आवाज़ उसके पिता की थी।

     

    मीरा अचानक गायब हो गई।

     

    आरव दरवाज़े की ओर भागा।

     

    लेकिन दरवाज़े के बाहर अब वही बूढ़ा दीनानाथ खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी बंदूक थी।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा—

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किस लिए?”

     

    दीनानाथ की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “क्योंकि आज रात देवेंद्र वापस आ गया है।”

     

    और उसी पल हवेली की घड़ी ने बारह बजाए।

     

    टन… टन… टन…

     

    लेकिन घड़ी की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ आई—

     

    एक बच्चे की हँसी।

     

    आरव समझ गया…

     

    असली डर अब शुरू हुआ था।

  • 😱आहट😱 — उस बंद कमरे का राज़(part-2)

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    आरव पूरी रात सो नहीं पाया।

     

    हवेली के बाहर बारिश लगातार बरसती रही और अंदर पुरानी दीवारों से आती अजीब-अजीब आवाज़ें उसके डर को और बढ़ाती रहीं। कभी ऊपर की मंज़िल से किसी के चलने की आहट आती, कभी ऐसा लगता जैसे कोई उसके कमरे के बाहर आकर रुक गया हो।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि हर बार जब वह दरवाज़ा खोलकर देखता, वहाँ कोई नहीं होता।

     

    सुबह होते ही बारिश कुछ कम हुई।

     

    आरव ने रात वाली डायरी फिर से खोली।

     

    उसके पिता की लिखावट में कई पन्ने भरे हुए थे, लेकिन ज्यादातर जगहों पर शब्द काट दिए गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कुछ लिखने के बाद जानबूझकर उसे मिटा दिया हो।

     

    एक पन्ने पर सिर्फ इतना लिखा था—

     

    “17 जुलाई 1998 को जो हुआ, वह दुर्घटना नहीं थी।”

     

    आरव ने तारीख पढ़कर अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    वही तारीख जो उसे पिछली रात तस्वीर के पीछे लिखी मिली थी।

     

    उसने डायरी का अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “मीरा को मैंने नहीं मारा।”

     

    आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    मीरा कौन थी?

     

    क्या तस्वीर में उसके पिता के साथ खड़ी महिला का नाम मीरा था?

     

    उसने तुरंत अपना मोबाइल उठाया और गाँव में रहने वाले उस बूढ़े आदमी को फोन किया, जिसने उसे हवेली में रात न बिताने की चेतावनी दी थी।

     

    कुछ देर बाद बूढ़ा हवेली के बाहर आ गया।

     

    उसका नाम दीनानाथ था।

     

    आरव ने तस्वीर उसके सामने रख दी।

     

    “क्या आप इन्हें जानते हैं?”

     

    दीनानाथ ने तस्वीर देखते ही अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    “मैं कुछ नहीं जानता।”

     

    “झूठ मत बोलिए।”

     

    आरव की आवाज़ में गुस्सा था।

     

    “यह मेरे पिता हैं। और यह महिला कौन है?”

     

    दीनानाथ कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

     

    “उसका नाम मीरा था।”

     

    “मेरे पिता उसे जानते थे?”

     

    “सिर्फ जानते नहीं थे…”

     

    दीनानाथ अचानक रुक गया।

     

    आरव ने पूछा, “क्या रिश्ता था उनका?”

     

    बूढ़े ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हारे पिता मीरा से शादी करना चाहते थे।”

     

    आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “लेकिन मेरे पिता की शादी तो मेरी माँ से हुई थी।”

     

    दीनानाथ ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि मीरा शादी के दिन मर गई थी।”

     

    कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

     

    आरव ने पूछा, “कैसे?”

     

    दीनानाथ ने हवेली की तीसरी मंज़िल की ओर देखा।

     

    “उसी कमरे में।”

     

    आरव की निगाहें तुरंत सीढ़ियों की ओर चली गईं।

     

    वही कमरा…

     

    जिसके बाहर लिखा था—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    “क्या हुआ था उस रात?”

     

    दीनानाथ ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह वापस जाने लगा।

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    “रुकिए! मुझे सब जानना है।”

     

    दीनानाथ ने बिना पीछे देखे कहा—

     

    “अगर सच जानना है, तो आज रात बारह बजे से पहले हवेली छोड़ देना।”

     

    “और अगर मैं नहीं गया?”

     

    बूढ़ा वहीं रुक गया।

     

    उसने पलटकर आरव की आँखों में देखा।

     

    “तो फिर वह तुम्हें भी अपने साथ ले जाएगी।”

     

    यह कहकर वह चला गया।

     

    आरव देर तक वहीं खड़ा रहा।

     

    उसके मन में डर था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा सवाल थे।

     

    आखिर उसके पिता ने इतने वर्षों तक मीरा का सच उससे क्यों छिपाया?

     

    और वह हर रात हवेली में क्यों आती थी?

     

    शाम होते-होते आरव ने फैसला कर लिया।

     

    वह आज रात उस कमरे का दरवाज़ा खोलेगा।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे उसने टॉर्च, कैमरा और डायरी अपने बैग में रखी और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    पहली मंज़िल पार करने के बाद दूसरी मंज़िल आई।

     

    यहाँ हवा अचानक बहुत ठंडी थी।

     

    उसने हाथों से साँस की गर्मी महसूस की।

     

    तीसरी मंज़िल की सीढ़ियाँ चढ़ते समय उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    आरव रुक गया।

     

    उसने नीचे देखा।

     

    सीढ़ियों पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    लेकिन इस बार वे निशान नीचे से ऊपर नहीं आ रहे थे।

     

    वे उसके पीछे थे।

     

    जैसे कोई उसके ठीक पीछे खड़ा होकर चल रहा हो।

     

    आरव ने अचानक पीछे मुड़कर टॉर्च जलाई।

     

    कुछ नहीं था।

     

    उसने लंबी साँस ली और आगे बढ़ गया।

     

    बंद कमरा सामने था।

     

    लोहे की जंजीर अब भी दरवाज़े पर बंधी थी।

     

    आरव ने उसे खोलने की कोशिश की।

     

    जंजीर अपने आप नीचे गिर गई।

     

    खनन!

     

    आरव का दिल धड़क उठा।

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    कमरे की दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक तरफ लकड़ी की अलमारी थी।

     

    दूसरी तरफ टूटा हुआ आईना।

     

    और कमरे के बीचोंबीच एक पुराना पलंग।

     

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    अचानक दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    वह तुरंत पलटा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    तभी आईने में उसे कुछ दिखाई दिया।

     

    उसके पीछे एक महिला खड़ी थी।

     

    सफेद साड़ी…

     

    लंबे बाल…

     

    झुका हुआ सिर…

     

    आरव ने डरते हुए पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने दोबारा आईने की तरफ देखा।

     

    महिला अब भी वहाँ थी।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके माथे से खून बह रहा था।

     

    और उसकी आँखें सीधे आरव को देख रही थीं।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तभी आईने पर अपने आप उंगली से शब्द लिखने लगे—

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे नहीं मारा…”

     

    आरव की साँस अटक गई।

     

    फिर दूसरा वाक्य उभरा—

     

    “लेकिन उन्होंने मुझे बचाया भी नहीं।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “किसने मारा तुम्हें?”

     

    आईने पर कुछ देर तक कोई हलचल नहीं हुई।

     

    फिर धीरे-धीरे एक नाम लिखा गया—

     

    “देवेंद्र।”

     

    आरव ने नाम पढ़ा।

     

    देवेंद्र?

     

    उसे यह नाम जाना-पहचाना लगा।

     

    तभी अलमारी के अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    आरव ने अलमारी खोली।

     

    अंदर पुराने कपड़ों के नीचे एक लकड़ी का डिब्बा रखा था।

     

    डिब्बे पर उसके पिता के नाम का पहला अक्षर खुदा था।

     

    आरव ने डिब्बा खोला।

     

    उसमें एक पुरानी चिट्ठी थी।

     

    चिट्ठी पर लिखा था—

     

    “राघव के लिए — मीरा।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    उसने चिट्ठी पढ़नी शुरू की।

     

    “राघव, अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे हो तो समझ लेना कि मैं खतरे में हूँ। देवेंद्र को सब पता चल गया है। वह हमें अलग करना चाहता है। अगर आज रात मेरे साथ कुछ हो जाए तो आरव को कभी इस हवेली में मत लाना…”

     

    आरव आगे पढ़ ही रहा था कि अचानक कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

     

    “माँ…”

     

    आरव जम गया।

     

    उसने धीरे से पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    फिर वही आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    आवाज़ पलंग के नीचे से आ रही थी।

     

    आरव ने टॉर्च नीचे की।

     

    वहाँ एक छोटा सा लकड़ी का बक्सा था।

     

    उसने बक्सा बाहर खींचा।

     

    जैसे ही उसने ढक्कन खोला, अंदर एक पुरानी तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर में मीरा थी।

     

    उसकी गोद में एक नवजात बच्चा था।

     

    और बच्चे के गले में वही लॉकेट था…

     

    जो आरव बचपन से अपनी माँ के पास देखा करता था।

     

    आरव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    एक ठंडी फुसफुसाहट उसके कान में आई—

     

    “अब तुम्हें समझ आया कि तुम यहाँ क्यों बुलाए गए हो?”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    मीरा उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा भयानक नहीं था।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    उसने अपना हाथ उठाकर दीवार की ओर इशारा किया।

     

    दीवार पर धीरे-धीरे एक छिपा हुआ दरवाज़ा दिखाई देने लगा।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर अंधेरी सीढ़ियाँ थीं जो नीचे की ओर जा रही थीं।

     

    और सीढ़ियों के नीचे से किसी आदमी की भारी आवाज़ सुनाई दी—

     

    “आरव… बहुत देर कर दी तुमने।”

     

    मीरा अचानक गायब हो गई।

     

    आरव अकेला खड़ा रह गया।

     

    उसके सामने अंधेरी सीढ़ियाँ थीं।

     

    और नीचे…

     

    किसी के कदम उसकी ओर बढ़ रहे थे।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने टॉर्च कसकर पकड़ी।

     

    उसे अब समझ आ चुका था—

     

    इस हवेली का सबसे बड़ा राज़ अभी बाकी था।