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  • 😱 जिस पेड़ को काटना मना था 😱(A COMPLETE Horror Story)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 1: जंगल की मनाही)

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव बरवा के किनारे एक घना जंगल था। गाँव के लोग उस जंगल से लकड़ी, फल और सूखी टहनियाँ लाकर अपना गुजारा करते थे। लेकिन जंगल के बीचों-बीच एक ऐसा पेड़ था, जिसके पास जाने से भी लोग डरते थे।

     

    वह पेड़ बाकी पेड़ों से बिल्कुल अलग था।

     

    उसका तना इतना मोटा था कि उसे चार आदमी मिलकर भी घेर नहीं सकते थे। उसकी शाखाएँ ऊपर जाकर पूरे आसमान को ढक लेती थीं। दिन में भी उसके नीचे अजीब-सा अँधेरा रहता था। पेड़ की छाल काली थी और उस पर लाल रंग की नसों जैसी धारियाँ दिखाई देती थीं।

     

    गाँव के बुजुर्ग उसे “काला बरगद” कहते थे।

     

    कहा जाता था कि लगभग पचास साल पहले एक लकड़हारा उस पेड़ को काटने गया था। वह वापस तो आया, लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की। कुछ दिनों बाद उसने अपना घर छोड़ दिया और जंगल में गायब हो गया।

     

    तब से गाँव में एक नियम था—

     

    “काले बरगद को कोई हाथ नहीं लगाएगा।”

     

    लेकिन गरीबी इंसान से कई बार वह काम करवा देती है, जिससे वह डरता है।

     

    गाँव में रहने वाला रघु एक गरीब लकड़हारा था। उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। कई दिनों से उसे जंगल में सूखी लकड़ी कम मिल रही थी। घर में अनाज खत्म होने वाला था और उसकी पत्नी सीता बार-बार बच्चों की तरफ देखकर चिंतित हो जाती थी।

     

    एक शाम सीता ने धीरे से कहा,

    “रघु, कल बच्चों के लिए कुछ आटा ले आना। घर में बस आज रात का खाना बचा है।”

     

    रघु ने चुपचाप सिर हिला दिया।

     

    अगली सुबह वह अपनी पुरानी कुल्हाड़ी लेकर जंगल चला गया।

     

    काफी देर तक घूमने के बाद उसे एक भी अच्छी लकड़ी नहीं मिली। अचानक उसकी नजर काले बरगद पर पड़ी।

     

    वह कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    उसके मन में विचार आया—

    “अगर इसकी एक बड़ी शाखा काट लूँ तो कई दिनों की लकड़ी मिल जाएगी।”

     

    उसे गाँव की मनाही याद थी।

     

    फिर बच्चों के भूखे चेहरे उसकी आँखों के सामने आ गए।

     

    रघु ने खुद से कहा,

    “मैं पूरा पेड़ थोड़े ही काट रहा हूँ। बस एक शाखा।”

     

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

     

    जैसे ही उसने पहला कदम उसकी छाया में रखा, जंगल की सारी आवाजें बंद हो गईं।

     

    न पक्षियों की आवाज।

     

    न हवा की सरसराहट।

     

    न पत्तों की आवाज।

     

    पूरा जंगल जैसे अचानक मर गया था।

     

    रघु के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसने ऊपर देखा।

     

    काले बरगद की एक मोटी शाखा उसके ठीक ऊपर थी।

     

    उसने कुल्हाड़ी उठाई।

     

    ठक!

     

    पहला वार हुआ।

     

    पेड़ से कोई आवाज नहीं आई।

     

    दूसरा वार—

     

    ठक!

     

    तीसरा वार—

     

    ठाऽऽक!

     

    अचानक पेड़ के अंदर से ऐसी आवाज आई जैसे किसी ने बहुत दूर से कराहते हुए कहा हो—

     

    “मत काटो…”

     

    रघु के हाथ से कुल्हाड़ी छूटते-छूटते बची।

     

    वह पीछे हट गया।

     

    उसने चारों तरफ देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    “शायद मेरा भ्रम है,” उसने खुद को समझाया।

     

    उसने कुल्हाड़ी फिर उठाई।

     

    तभी उसके पीछे सूखे पत्तों पर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    रघु ने पीछे देखा।

     

    कुछ नहीं।

     

    आवाज बंद।

     

    वह फिर पेड़ की तरफ मुड़ा।

     

    अब उसकी शाखा पर कुछ लाल दिखाई दे रहा था।

     

    पहले रघु को लगा कि वह पेड़ का रस है।

     

    लेकिन जब वह पास गया तो उसकी साँस अटक गई।

     

    वह लाल तरल खून जैसा था।

     

    और वह तने से धीरे-धीरे नीचे बह रहा था।

     

    रघु डर गया।

     

    उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंकी और भागने लगा।

     

    लेकिन कुछ दूर जाकर उसे अपने पीछे वही आवाज सुनाई दी—

     

    “कुल्हाड़ी… छोड़कर कहाँ जा रहे हो?”

     

    रघु के पैरों की रफ्तार बढ़ गई।

     

    वह पीछे देखने की हिम्मत नहीं कर पाया।

     

    जंगल से बाहर निकलते ही उसे लगा कि अब वह सुरक्षित है।

     

    लेकिन घर पहुँचकर उसने देखा कि उसकी कुल्हाड़ी उसके हाथ में थी।

     

    वह घबरा गया।

     

    उसे याद था कि उसने कुल्हाड़ी पेड़ के पास ही छोड़ दी थी।

     

    उसने कुल्हाड़ी जमीन पर फेंक दी।

     

    रात को जब पूरा परिवार सो गया, रघु की आँख अचानक खुली।

     

    कमरे में अँधेरा था।

     

    उसे लगा जैसे कोई खिड़की के बाहर खड़ा है।

     

    उसने ध्यान से सुना।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही आवाज।

     

    जैसे कोई कुल्हाड़ी से पेड़ काट रहा हो।

     

    रघु ने खिड़की खोली।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन मिट्टी पर गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान दरवाजे से शुरू होकर सीधे उसके घर के अंदर जा रहे थे।

     

    रघु का गला सूख गया।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे के कोने में उसकी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

     

    उसकी धार पर ताजा लाल खून लगा था।

     

    और तभी अँधेरे में एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “एक वार तुमने किया था… अब एक वार मेरी बारी है…”

     

    रघु चीखना चाहता था।

     

    लेकिन उसकी आवाज गले में ही अटक गई।

     

    उस रात के बाद बरवा गाँव में कुछ ऐसा होने वाला था, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

     

    क्योंकि रघु ने सिर्फ एक पेड़ को नहीं छेड़ा था।

     

    उसने जंगल के अंदर सोई हुई किसी चीज़ को जगा दिया था।

  • मदहोश भिखारी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    मदहोश भिखारी

     

    शहर के पुराने हिस्से में एक चौराहा था, जहां हर सुबह भीड़ जमा होती थी। उसी चौराहे के किनारे एक बूढ़ा भिखारी बैठा रहता था। लोग उसे मदहोश बाबा कहते थे।

     

    उसके कपड़े पुराने थे, बाल बिखरे रहते और हाथ में हमेशा मिट्टी का एक छोटा-सा प्याला रहता। वह दिनभर कभी मुस्कुराता, कभी खुद से बातें करता और कभी आने-जाने वालों को ऐसी बातें कह देता जिनका मतलब किसी को समझ नहीं आता।

     

    लोग उसका मजाक उड़ाते।

     

    “देखो, फिर मदहोश हो गया।”

     

    “इससे दूर रहना, पता नहीं क्या बड़बड़ाता रहता है।”

     

    लेकिन कोई नहीं जानता था कि उस बूढ़े के पीछे एक ऐसा राज छिपा था, जिसे जानकर पूरा शहर हैरान होने वाला था।

     

    एक सुबह शहर का बड़ा व्यापारी रतनलाल अपनी कार से उसी चौराहे से गुजर रहा था।

     

    भिखारी ने अचानक कार के सामने हाथ उठा दिया।

     

    ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिया।

     

    रतनलाल गुस्से में बाहर आया।

     

    “अरे पागल! रास्ता क्यों रोक रहा है?”

     

    भिखारी मुस्कुराया।

     

    “रास्ता मैंने नहीं रोका सेठ… रास्ता तो तुम्हारे कर्मों ने रोका है।”

     

    रतनलाल चौंक गया।

     

    “क्या बकवास कर रहे हो?”

     

    भिखारी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “जिस जमीन पर तुम अपना नया महल बना रहे हो, उसके नीचे किसी गरीब की बद्दुआ दबी है।”

     

    रतनलाल का चेहरा बदल गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    भिखारी हंसने लगा।

     

    “जिस शहर में लोग आंखें बंद करके चलते हैं, वहां सच देखने के लिए आंखों की नहीं, यादों की जरूरत होती है।”

     

    रतनलाल वहां से चला गया, लेकिन भिखारी की बात उसके मन में अटक गई।

     

    कुछ दिन बाद शहर में खबर फैली कि रतनलाल के निर्माण स्थल की जमीन का पुराना मालिक एक गरीब किसान था, जिसकी जमीन धोखे से हड़पी गई थी।

     

    लोगों को पहली बार मदहोश बाबा की बात याद आई।

     

    इसी बीच शहर में रहने वाली मीरा नाम की एक छोटी लड़की रोज उस भिखारी को खाना देने लगी।

     

    एक दिन उसने पूछा—

     

    “बाबा, लोग आपको मदहोश क्यों कहते हैं?”

     

    भिखारी मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं उस चीज में मदहोश हूं जो उन्हें दिखाई नहीं देती।”

     

    “क्या?”

     

    “सच में।”

     

    मीरा हंस पड़ी।

     

    “सच भी कोई नशा है?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “दुनिया के सारे नशे उतर जाते हैं बेटी, लेकिन सच का नशा इंसान को अंदर से जगा देता है।”

     

    मीरा को उसकी बातें अच्छी लगती थीं।

     

    एक शाम अचानक शहर के पुराने मंदिर में चोरी हो गई। मंदिर की दानपेटी गायब थी।

     

    पुलिस ने कई लोगों से पूछताछ की, लेकिन चोर का पता नहीं चला।

     

    अगली सुबह मदहोश बाबा ने चौराहे पर बैठे-बैठे कहा—

     

    “जिसने मंदिर से लिया है, वह उसे वापस करेगा।”

     

    लोग हंसने लगे।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    बाबा ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि जिसने भगवान के घर से चोरी की है, उसके घर में चैन नहीं रहेगा।”

     

    उस रात मंदिर की दानपेटी वापस मंदिर के पीछे रखी मिली।

     

    सभी हैरान रह गए।

     

    अब लोगों ने बाबा की बातों को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया।

     

    लेकिन शहर का नया पुलिस अधिकारी विजय उस पर विश्वास नहीं करता था।

     

    उसने कहा—

     

    “यह आदमी कोई चाल चल रहा है। इसकी जांच होनी चाहिए।”

     

    विजय ने बाबा के पुराने सामान की तलाशी ली।

     

    उसे एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “रघुवीर सिंह, पुलिस विभाग।”

     

    विजय के हाथ रुक गए।

     

    रघुवीर सिंह नाम उसके पिता की पुरानी फाइलों में था।

     

    बीस साल पहले एक ईमानदार पुलिस अधिकारी रघुवीर अचानक गायब हो गए थे।

     

    विजय ने तुरंत बाबा से पूछा—

     

    “तुम्हारा असली नाम क्या है?”

     

    बूढ़ा चुप रहा।

     

    विजय ने फिर पूछा—

     

    “क्या तुम रघुवीर सिंह हो?”

     

    बूढ़े ने धीरे से सिर उठा लिया।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    “हां।”

     

    विजय के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “लेकिन आप बीस साल से कहां थे?”

     

    रघुवीर ने लंबी सांस ली।

     

    “मैंने शहर के सबसे बड़े अपराधियों का सच पकड़ लिया था। लेकिन जिन लोगों के खिलाफ सबूत थे, वे बहुत ताकतवर थे। उन्होंने मुझे खत्म करने की कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं बच गया, लेकिन दुनिया से गायब हो गया।”

     

    विजय ने पूछा—

     

    “फिर भिखारी बनकर क्यों रहे?”

     

    रघुवीर मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि जब मैं वर्दी में था, लोग मेरी बात सुनते थे। लेकिन जब मैं भिखारी बना, लोगों ने मुझे पागल समझ लिया। तब मैंने शहर के सबसे बड़े राज अपनी आंखों से देखे।”

     

    विजय ने डायरी खोली।

     

    उसमें शहर के कई बड़े अपराधियों के नाम थे।

     

    रतनलाल का नाम भी था।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “बीस साल पहले जो लोग गरीबों की जमीन हड़पते थे, आज वही शहर के मालिक बने बैठे हैं।”

     

    विजय ने तुरंत जांच शुरू कर दी।

     

    कुछ ही दिनों में पुराने दस्तावेज, गवाह और सबूत सामने आने लगे।

     

    रतनलाल समेत कई बड़े लोगों के पुराने अपराध सामने आ गए।

     

    शहर में हड़कंप मच गया।

     

    लोग उसी चौराहे पर जमा हुए जहां कभी वे मदहोश बाबा का मजाक उड़ाते थे।

     

    रघुवीर वहीं बैठा था।

     

    मीरा उसके पास आकर बोली—

     

    “बाबा, अब लोग आपको पागल नहीं कहेंगे।”

     

    रघुवीर मुस्कुराया।

     

    “लोग क्या कहते हैं, उससे क्या फर्क पड़ता है?”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “फिर फर्क किससे पड़ता है?”

     

    रघुवीर ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा—

     

    “इससे कि जब पूरी दुनिया गलत रास्ते पर जा रही हो, तब भी तुम सही रास्ते पर चलो।”

     

    कुछ दिनों बाद रघुवीर को उसकी पुरानी पहचान और सम्मान वापस मिला।

     

    लेकिन उसने फिर से वर्दी पहनने से इनकार कर दिया।

     

    वह उसी चौराहे पर बैठा रहा।

     

    बस अब लोग उसे भीख नहीं देते थे।

     

    लोग उसके पास अपनी परेशानियां लेकर आते थे।

     

    और वह हर किसी से बस एक ही बात कहता—

     

    “मुझे मदहोश मत समझना… मैं दुनिया के झूठ को देखकर सच के नशे में हूं।”

     

    समय बीतता गया।

     

    चौराहे पर अब भी वह बूढ़ा बैठता था।

     

    लेकिन अब कोई उसे पागल नहीं कहता था।

     

    क्योंकि शहर को समझ आ चुका था—

     

    कभी-कभी जिस इंसान को दुनिया सबसे ज्यादा बेवकूफ समझती है…

     

    वही इंसान सबसे ज्यादा सच देख रहा होता है।

  • कोयल की मीठी आवाज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कोयल की मधुर आवाज और सुबह का रहस्य

     

    हरे-भरे पेड़ों और छोटे-छोटे खेतों के बीच बसा था सुरमई गांव। गांव छोटा था, लेकिन वहां के लोग बहुत खुश रहते थे। शाम होते ही बच्चे खेलकर घर लौट आते और बुजुर्ग चौपाल पर बैठकर बातें करने लगते।

     

    लेकिन एक दिन गांव में एक अजीब-सी कोयल आ गई।

     

    वह कोयल बाकी कोयलों जैसी नहीं थी। उसकी आवाज इतनी मीठी थी कि जो भी उसे सुनता, कुछ ही देर में उसे नींद आने लगती।

     

    पहली बार उसकी आवाज गांव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ से सुनाई दी।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    पास खेल रहे बच्चों ने अचानक खेलना बंद कर दिया।

     

    एक बच्चा बोला, “मुझे बहुत नींद आ रही है।”

     

    कुछ ही मिनटों में बच्चे घर चले गए और सो गए।

     

    उस शाम गांव के लोगों ने भी वही आवाज सुनी।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    एक किसान अपनी पत्नी से बात कर रहा था।

     

    “आज खेत में पानी—”

    उसकी बात पूरी होने से पहले ही उसकी आंखें बंद होने लगीं।

    पत्नी ने पूछा, “क्या हुआ?”

    किसान ने जम्हाई लेते हुए कहा, “पता नहीं… बहुत नींद आ रही है।”

     

    कुछ ही देर में पूरा गांव सो गया।

     

    अगली सुबह जब लोगों की आंखें खुलीं तो सभी हैरान रह गए।

     

    किसी के घर का दरवाजा खुला था।

     

    किसी के आंगन में रखा अनाज गायब था।

     

    किसी के घर से चांदी के बर्तन नहीं थे।

     

    और सबसे हैरानी की बात…

     

    गांव के मुखिया के घर से उसकी पुरानी संदूकची गायब थी।

     

    मुखिया चिल्लाया, “रात को गांव में चोरी हुई है!”

     

    सभी लोग एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “लेकिन चोर आया कैसे?”

     

    “किसी ने आवाज तक नहीं सुनी।”

     

    “सबको इतनी गहरी नींद कैसे आ गई?”

     

    तभी एक बुजुर्ग बोले—

     

    “वह कोयल…”

     

    सबकी नजर उनकी तरफ गई।

     

    “कौन-सी कोयल?”

     

    “कल बरगद पर बैठी थी। उसकी आवाज सुनते ही सब सो गए थे।”

     

    गांव वालों को बात समझ आ गई।

     

    उस दिन से सभी ने तय किया कि रात होते ही कोई बरगद के पास नहीं जाएगा।

     

    लेकिन अगले दिन फिर वही हुआ।

     

    शाम होते ही कोयल ने गाना शुरू किया।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    एक-एक करके गांव वाले सोते चले गए।

     

    सुबह फिर कई घरों से सामान गायब था।

     

    अब गांव में डर फैल गया।

     

    गांव की बारह साल की लड़की गौरी इन सब बातों को ध्यान से देख रही थी।

     

    उसे विश्वास नहीं था कि एक छोटी-सी कोयल चोरी कर सकती है।

     

    उसने अपनी दादी से पूछा—

     

    “दादी, अगर कोयल चोरी नहीं करती तो उसकी आवाज सुनते ही सब क्यों सो जाते हैं?”

     

    दादी ने कहा, “शायद कोई उसकी आवाज का फायदा उठा रहा है।”

     

    गौरी की आंखें चमक उठीं।

     

    “मतलब चोर कोई इंसान है?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    उस रात गौरी ने सोने का नाटक किया।

     

    उसने अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखा।

     

    कुछ देर बाद बरगद के पेड़ से वही आवाज आई।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    गौरी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ देर बाद उसे बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    वह धीरे से खिड़की के पास पहुंची।

     

    एक आदमी गांव की गली में दबे पांव चल रहा था।

     

    उसके हाथ में कपड़े की बड़ी थैली थी।

     

    गौरी ने पहचानने की कोशिश की।

     

    अंधेरा होने के कारण चेहरा साफ नहीं दिखाई दे रहा था।

     

    वह आदमी सीधे मुखिया के घर की तरफ गया।

     

    गौरी तुरंत अपनी दादी को जगाने दौड़ी।

     

    लेकिन दादी भी गहरी नींद में थीं।

     

    गौरी ने अकेले ही उसका पीछा करने का फैसला किया।

     

    वह थोड़ी दूरी बनाकर उस आदमी के पीछे चलती रही।

     

    आदमी गांव से बाहर गया और पुराने खंडहर के पास पहुंच गया।

     

    वहां पहले से दो और आदमी मौजूद थे।

     

    एक ने पूछा—

     

    “आज क्या मिला?”

     

    चोर ने थैली जमीन पर रखी।

     

    “बहुत कुछ।”

     

    गौरी यह देखकर घबरा गई।

     

    अब उसे पूरा यकीन हो गया था कि गांव में चोरी कोयल नहीं, बल्कि ये लोग कर रहे हैं।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर एक अजीब चीज पर पड़ी।

     

    उनके पास एक छोटा-सा पिंजरा रखा था।

     

    पिंजरे के अंदर वही कोयल बैठी थी।

     

    गौरी समझ गई कि असली रहस्य क्या है।

     

    चोरों ने उस कोयल को पकड़ रखा था और उसकी मधुर आवाज का इस्तेमाल पूरे गांव को सुलाने के लिए कर रहे थे।

     

    गौरी चुपचाप वापस गांव की तरफ भागी।

     

    लेकिन रास्ते में उसका पैर पत्थर से टकरा गया।

     

    आवाज सुनकर चोरों ने पीछे देखा।

     

    “कौन है?”

     

    गौरी डरकर भागी।

     

    चोर उसके पीछे दौड़े।

     

    गौरी सीधे गांव के चौकीदार के घर पहुंची और जोर-जोर से दरवाजा पीटने लगी।

     

    “काका! जल्दी उठो!”

     

    चौकीदार ने दरवाजा खोला।

     

    गौरी ने सारी बात बता दी।

     

    कुछ ही देर में गांव के कई लोग इकट्ठे हो गए।

     

    सबने मिलकर खंडहर को घेर लिया।

     

    चोरों को भागने का मौका नहीं मिला।

     

    उनके पास गांव से चोरी किया हुआ सारा सामान भी बरामद हो गया।

     

    मुखिया ने पूछा—

     

    “इस कोयल को कहां से पकड़ा?”

     

    चोरों के सरदार ने सिर झुका लिया।

     

    “हमें जंगल में मिली थी। इसकी आवाज सुनकर हमें समझ आया कि इसके गाने से लोग तुरंत सो जाते हैं। फिर हमने इसे पकड़ लिया और गांव में चोरी करने लगे।”

     

    गांव वालों ने कोयल को आजाद कर दिया।

     

    वह उड़कर बरगद की सबसे ऊंची डाल पर जाकर बैठ गई।

     

    गौरी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब ये किसी को नहीं सुलाएगी।”

     

    लेकिन उसी समय कोयल ने गाना शुरू कर दिया।

     

    “कुहू… कुहू…”

     

    गांव वाले एक-दूसरे को देखकर हंसने लगे।

     

    इस बार किसी को नींद नहीं आई।

     

    क्योंकि अब उन्हें पता था कि उसकी आवाज में कोई जादू नहीं था।

     

    असल में चोरों ने गांव में ऐसी चीज मिला दी थी जिसकी खुशबू से लोगों को बहुत गहरी नींद आती थी।

     

    कोयल सिर्फ उनकी योजना का एक हिस्सा बन गई थी।

     

    उस दिन के बाद गांव वालों ने उस कोयल को अपने गांव की रक्षा करने वाली मान लिया।

     

    हर शाम वह बरगद पर बैठकर गाती।

     

    • बच्चे उसकी आवाज सुनकर खुश होते और बुजुर्ग कहते

    “देखो, हमारी मीठी आवाज वाली मेहमान आ गई।”

     

    गौरी रोज उसे दाना डालती।

     

    और कोयल भी जैसे गौरी को पहचानने लगी थी।

    लेकिन कई साल बाद भी सुरमई गांव में एक बात मशहूर रही

    “जिस रात कोयल ने पहली बार गाया था, पूरा गांव सो गया था… और जिस सुबह आंखें खुलीं, तब गांव वालों को समझ आया कि सबसे मीठी आवाज के पीछे छिपा सच कितना बड़ा हो सकता है।”

  • देश में मिला सच्चा प्यार

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जापानी लड़का जिसे भारत में सच्चा प्यार मिला

     

    हिरोतो जापान के टोक्यो शहर में रहता था। उम्र करीब तेईस साल थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे एक भारतीय कंपनी में छह महीने के प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका मिला। उसके परिवार ने उसे भारत जाने की खबर सुनकर बहुत सारी हिदायतें दीं।

     

    “खाने का ध्यान रखना।”

     

    “भीड़ में संभलकर रहना।”

     

    “और सबसे जरूरी… अपना काम पूरा करके जल्दी वापस आ जाना।”

     

    हिरोतो बस मुस्कुरा देता।

     

    उसे भारत के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। उसने फिल्मों और इंटरनेट पर भारत की कुछ तस्वीरें जरूर देखी थीं, लेकिन असली भारत कैसा है, यह उसे नहीं पता था।

     

    भारत पहुंचते ही उसे हर चीज नई लगी। अलग भाषा, अलग खाना, सड़क की भीड़, रंग-बिरंगे कपड़े और लोगों का एक-दूसरे से बेझिझक बात करना।

     

    शुरुआत में वह थोड़ा परेशान रहा।

     

    एक दिन ऑफिस जाते समय अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। हिरोतो सड़क किनारे खड़ा बारिश रुकने का इंतजार करने लगा।

     

    तभी उसके पास एक लड़की छाता लेकर आई।

     

    “आप जापान से हैं ना?”

     

    हिरोतो ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “हां… लेकिन आपको कैसे पता?”

     

    लड़की हंस पड़ी।

     

    “आपके ऑफिस का कार्ड उल्टा लगा हुआ है।”

     

    हिरोतो ने अपना कार्ड देखा और झेंप गया।

     

    “ओह… धन्यवाद।”

     

    लड़की का नाम अनाया था।

     

    वह पास के कॉलेज में पढ़ती थी और उसी रास्ते से रोज आती-जाती थी।

     

    अनाया ने अपना छाता थोड़ा उसकी तरफ करते हुए कहा, “बारिश में ऐसे खड़े रहेंगे तो पूरी तरह भीग जाएंगे।”

     

    हिरोतो ने कहा, “लेकिन आपका छाता छोटा है।”

     

    “तो क्या हुआ? थोड़ा आप भीगिए, थोड़ा मैं।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    वह उनकी पहली मुलाकात थी।

     

    इसके बाद वे अक्सर रास्ते में मिल जाते।

     

    कभी अनाया उससे हिंदी के शब्द सिखाती तो कभी हिरोतो उसे जापानी शब्द बताता।

     

    एक दिन अनाया ने पूछा, “तुम्हें भारत कैसा लग रहा है?”

     

    हिरोतो ने थोड़ी देर सोचकर कहा, “भारत… बहुत शोर वाला है।”

     

    अनाया ने आंखें बड़ी कर लीं।

     

    “बस?”

    हिरोतो मुस्कुराया।

    “और बहुत दिल वाला भी।”

    अनाया चुप हो गई।

    धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती गहरी होने लगी।

     

    हिरोतो को पहली बार महसूस हुआ कि वह भारत में अकेला नहीं है।

     

    जब उसे भारतीय खाना समझ नहीं आता, अनाया उसे बताती कि क्या खाना है। जब वह हिंदी बोलते हुए गलती करता, अनाया हंसती जरूर, लेकिन फिर सही शब्द भी सिखाती।

     

    एक दिन हिरोतो ने अनाया से कहा

    “मेरे जापान में बहुत दोस्त थे, लेकिन उनसे बात करते समय मुझे हमेशा लगता था कि मुझे खुद को सही साबित करना है।”

     

    अनाया ने पूछा, “और मेरे साथ?”

     

    “तुम्हारे साथ मुझे कुछ साबित नहीं करना पड़ता।”

     

    अनाया के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    कुछ महीनों में हिरोतो को एहसास हो गया कि अनाया उसके लिए सिर्फ दोस्त नहीं रही।

    लेकिन वह अपनी भावनाएं कहने से डरता था।

    उसे पता था कि उसका प्रोजेक्ट खत्म होने वाला है।

    आखिर वह दिन भी आ गया।

     

    हिरोतो को जापान लौटना था।

    उसने अपना सामान पैक कर लिया।

     

    आखिरी शाम वह उसी जगह गया जहां उसकी और अनाया की पहली मुलाकात हुई थी।

     

    बारिश फिर हो रही थी।

    कुछ देर बाद अनाया वहां आई।

    उसने हिरोतो को देखकर पूछा“तो… कल जा रहे हो?”

    हिरोतो ने सिर हिला दिया।

    “हां।”

    दोनों कुछ देर चुप रहे।

    फिर अनाया ने पूछा

    “तुम वापस आओगे?”

    हिरोतो ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर मैं कहूं कि तुम्हारी वजह से आना चाहता हूं?”

     

    अनाया की आंखों में नमी आ गई।

    “तो मैं कहूंगी… देर मत करना।”

    हिरोतो जापान चला गया

    लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी भारत उसके मन से नहीं निकला।

     

    वह अपने काम में व्यस्त रहता, लेकिन हर शाम अनाया से बात करता।

     

    दोनों के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी थी, मगर बातचीत में वह दूरी कभी महसूस नहीं होती थी।

     

    एक दिन हिरोतो के पिता ने पूछा

    “तुम भारत को इतना याद क्यों करते हो?”

    हिरोतो ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा

    “क्योंकि वहां मुझे एक ऐसा इंसान मिला, जिसके सामने मैं खुद को छिपाना नहीं चाहता।”

    पिता ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा

    “क्या तुम उससे प्यार करते हो?”

    हिरोतो ने पहली बार बिना झिझक जवाब दिया

    “हां।”

    कुछ महीनों बाद हिरोतो वापस भारत आया।

    इस बार छह महीने के प्रोजेक्ट के लिए नहीं।

    वह हमेशा के लिए यहां काम करने आया था।

    अनाया को इस बारे में कुछ पता नहीं था।

     

    एक शाम वह उसी पुराने रास्ते पर जा रही थी, जहां पहली बार दोनों मिले थे।

    अचानक पीछे से आवाज आई

    “बारिश में ऐसे अकेले चलोगी तो पूरी तरह भीग जाओगी।”

    अनाया ने पलटकर देखा।सामने हिरोतो खड़ा था।

    उसके हाथ में वही छोटा-सा छाता था।

    अनाया कुछ बोल नहीं पाई।

    “तुम… वापस आ गए?”

    हिरोतो मुस्कुराया।

    “मैंने कहा था ना… अगर भारत में मेरा कोई इंतजार कर रहा होगा, तो मैं जरूर लौटूंगा।”

     

    अनाया की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

    “और अगर मैं इंतजार नहीं करती?”

    हिरोतो ने मुस्कुराकर कहा“तो मैं तुम्हें ढूंढता।”

    अनाया हंस पड़ी।

    बारिश तेज हो गई।

    हिरोतो ने छाता उसकी तरफ बढ़ाया।

    “अबकी बार पूरा छाता तुम्हारा।”

    अनाया ने कहा“नहीं, आधा-आधा।”

    दोनों एक ही छाते के नीचे आगे बढ़ने लगे।

     

    हिरोतो को उस दिन समझ आया कि सच्चा प्यार हमेशा एक जैसी भाषा बोलने वालों के बीच नहीं मिलता।

     

    कभी-कभी दो लोग अलग देश, अलग संस्कृति और अलग भाषा से होते हैं…

     

    फिर भी उनके दिल एक-दूसरे को बिना किसी अनुवाद के समझ लेते हैं।

    और हिरोतो के लिए भारत अब सिर्फ एक देश नहीं था।

     

    यह वही जगह थी जहां उसे अपना घर नहीं मिला था…

     

    बल्कि अपना इंसान मिल गया था।

  • अंधेरी नगरी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    अंधेरी नगरी और कातिल निगाहें

     

    शहर का नाम था काली नगरी।

     

    दिन में यह शहर बाकी शहरों जैसा ही दिखाई देता था। बाजारों में भीड़ रहती, दुकानें खुलतीं और लोग अपने काम में व्यस्त रहते। लेकिन जैसे ही सूरज डूबता, पूरा शहर बदल जाता।

     

    सड़कें सुनसान हो जातीं। घरों के दरवाजे बंद हो जाते और लोग खिड़कियों पर भी पर्दे डाल देते।

     

    क्योंकि इस शहर में एक अजीब डर था।

     

    लोग कहते थे कि रात में गलियों में एक जोड़ी कातिल निगाहें घूमती हैं।

     

    जिसकी नजर उन आंखों से मिल जाती, उसके बाद वह इंसान हमेशा के लिए गायब हो जाता।

     

    पुलिस ने कई बार तलाश की, लेकिन हर बार कोई सुराग नहीं मिला।

     

    इसी शहर में आरव नाम का एक लड़का रहता था। वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक रात उसका दोस्त निखिल उसके घर आया।

     

    “आरव, आज मेरे घर चलना मत। देर हो गई है।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “तुम भी इन अफवाहों पर विश्वास करने लगे?”

     

    निखिल ने गंभीर होकर कहा, “अफवाह होती तो अब तक इतने लोग गायब क्यों होते?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी रात उसे अपनी दादी की दवा लेने बाजार जाना पड़ा।

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे।

     

    जैसे ही आरव पुरानी गली में पहुंचा, उसे लगा कोई उसके पीछे चल रहा है।

     

    वह रुका।

     

    पीछे देखा।

     

    गली खाली थी।

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    कुछ कदम बाद उसे एक खिड़की में दो चमकती आंखें दिखाई दीं।

     

    आरव ठिठक गया।

     

    आंखें बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    वह कुछ समझ पाता, उससे पहले खिड़की बंद हो गई।

     

    आरव तेजी से आगे बढ़ा।

     

    तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज आई—

     

    “रुको!”

     

    आरव पलटा।

     

    एक लड़की काले दुपट्टे में उसके सामने खड़ी थी।

     

    “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

     

    आरव ने कहा, “दवा लेने जा रहा हूं।”

     

    लड़की ने घबराकर उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी बात ध्यान से सुनो। आगे मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहां से कोई वापस नहीं आता।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की कुछ पल चुप रही।

     

    “मेरा नाम तारा है।”

     

    तभी दूर से किसी दरवाजे के बंद होने की आवाज आई।

     

    तारा घबरा गई।

     

    “चलो!”

     

    दोनों पास की एक पुरानी हवेली में छिप गए।

     

    आरव ने पूछा, “तुम्हें उन आंखों के बारे में क्या पता है?”

     

    तारा ने धीमी आवाज में कहा, “बहुत कुछ।”

     

    “तो बताओ।”

     

    “ये आंखें किसी भूत की नहीं हैं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    तारा ने कहा, “इस शहर में पिछले पांच सालों से लोग गायब हो रहे हैं। सबको लगता है कि कोई अदृश्य ताकत उन्हें उठा ले जाती है। लेकिन असली सच इंसानों से भी ज्यादा डरावना है।”

     

    “कौन है इसके पीछे?”

     

    तारा ने हवेली की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    वहां पुराने शहर का नक्शा बना था।

     

    “इन सभी गायब हुए लोगों के घर एक ही रास्ते के आसपास थे।”

     

    आरव ने नक्शा देखा।

     

    “तो?”

     

    “ये रास्ता सीधे शहर के पुराने महल तक जाता है।”

     

    आरव ने पूछा, “पुराना महल तो बीस साल से बंद है।”

     

    “हां।”

     

    “फिर वहां कौन रहता है?”

     

    तारा ने कहा, “यही पता लगाने मैं यहां आई हूं।”

     

    दोनों उसी रात महल की ओर निकल पड़े।

     

    महल का बड़ा दरवाजा आधा खुला था।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    तारा ने आरव का हाथ पकड़कर कहा, “सावधान रहना।”

     

    वे धीरे-धीरे अंदर बढ़े।

     

    अचानक सामने दीवार पर दो चमकती आंखें दिखाई दीं।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तारा ने फुसफुसाकर कहा, “यही हैं… कातिल निगाहें।”

     

    लेकिन तभी उन आंखों के नीचे एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    वह एक बूढ़ा आदमी था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम दोनों यहां क्यों आए हो?”

     

    आरव ने पूछा, “लोग कहां गायब हो रहे हैं?”

     

    बूढ़ा कुछ देर उन्हें देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “क्योंकि इस शहर का असली मालिक कोई इंसान नहीं… उसका लालच है।”

     

    बूढ़े ने उन्हें एक तहखाने में ले जाकर दिखाया कि वहां पुराने कागज और जमीन के दस्तावेज रखे थे।

     

    असल में शहर के कुछ बड़े लोग गरीब लोगों की जमीन हड़पना चाहते थे। जो भी उनके खिलाफ आवाज उठाता, उसे डराकर शहर से गायब कर दिया जाता।

     

    और कातिल निगाहें कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं थीं।

     

    वे एक गुप्त सुरंग में लगाए गए चमकीले शीशों और रोशनी का हिस्सा थीं, जिनसे लोगों को दूर से ऐसा लगता था जैसे अंधेरे में कोई डरावनी आंखें उन्हें देख रही हों।

     

    लेकिन एक सवाल बाकी था।

     

    “लोगों को गायब कौन करता है?” आरव ने पूछा।

     

    बूढ़े ने जवाब दिया—

     

    “शहर का सबसे बड़ा व्यापारी… रुद्रसेन।”

     

    तारा ने तुरंत कहा, “लेकिन वह तो लोगों की मदद करने के लिए मशहूर है।”

     

    बूढ़ा हंस पड़ा।

     

    “सबसे खतरनाक चेहरा वही होता है जो हमेशा नेक दिखाई दे।”

     

    अचानक पीछे से आवाज आई—

     

    “बहुत बातें हो गईं।”

     

    तीनों पलटे।

     

    दरवाजे पर रुद्रसेन खड़ा था।

     

    उसके साथ कई आदमी थे।

     

    रुद्रसेन ने कहा, “तुम दोनों को यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा, “लोगों को क्यों गायब किया?”

     

    रुद्रसेन ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि डर सबसे सस्ता हथियार है।”

     

    लेकिन उसे पता नहीं था कि तारा पहले ही सारे दस्तावेजों की तस्वीरें अपने फोन में ले चुकी थी।

     

    उसने मौका मिलते ही वे तस्वीरें पुलिस को भेज दीं।

     

    कुछ ही देर में महल को पुलिस ने घेर लिया।

     

    रुद्रसेन पकड़ा गया।

     

    उसके साथ कई और लोगों के नाम सामने आए।

     

    अगली सुबह पहली बार काली नगरी के लोगों ने बिना डर के अपने घरों के दरवाजे खोले।

    रात हुई।

    लेकिन इस बार किसी खिड़की में चमकती आंखें नहीं थीं।

    आरव उसी पुरानी गली से गुजर रहा था।तारा उसके साथ थी।

    आरव ने मुस्कुराकर कहा

    “तो खत्म हुआ कातिल निगाहों का डर।”

     

    तारा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा

    “डर कभी खत्म नहीं होता आरव… बस उसका सच सामने आ जाता है।”

     

    दोनों आगे बढ़ गए।

     

    लेकिन शहर के सबसे पुराने मकान की बंद खिड़की के पीछे…

     

    अचानक दो चमकती आंखें फिर दिखाई दीं।

     

    कुछ सेकंड बाद खिड़की अपने आप बंद हो गई।

     

    और अंधेरे में किसी की धीमी आवाज सुनाई दी

    “कहानी खत्म नहीं हुई…”

  • श्मशान की राख

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    श्मशान की राख

     

    रात के करीब बारह बजे थे। आसमान पर बादल छाए हुए थे और पूरे गांव में अजीब-सी खामोशी पसरी थी। गांव से थोड़ा दूर नदी के किनारे एक पुराना श्मशान घाट था, जहां रात में जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था।

     

    लोग कहते थे कि वहां जलती चिताओं की राख में कुछ ऐसा था, जो मुर्दों की अधूरी इच्छाओं को अपने अंदर समेट लेता था। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि अमावस्या की रात उस राख से किसी का नाम पुकारा जाता था।

     

    गांव का बीस साल का लड़का मोहन इन बातों को सिर्फ अंधविश्वास मानता था।

     

    उस रात उसके पिता अचानक बहुत बीमार पड़ गए। गांव में दवा नहीं मिली, इसलिए वैद्य के घर से जरूरी जड़ी-बूटी लेने मोहन को नदी के उस पार जाना पड़ा।

     

    वापसी में उसे श्मशान के पास से होकर गुजरना था।

     

    जैसे ही वह श्मशान के सामने पहुंचा, उसे पीछे से किसी बूढ़े आदमी की आवाज सुनाई दी।

     

    “मोहन…”

     

    मोहन के कदम वहीं रुक गए।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    उसने खुद को समझाया, “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    वह आगे बढ़ने लगा।

     

    फिर आवाज आई।

     

    “मोहन… वापस मत जाना…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    मोहन ने डरते हुए श्मशान की तरफ देखा। वहां एक पुरानी चिता की राख हल्की-हल्की उड़ रही थी, जबकि हवा बिल्कुल बंद थी।

     

    फिर राख के बीच उसे कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया।

     

    मोहन धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    वह एक छोटी-सी चांदी की अंगूठी थी।

     

    जैसे ही उसने अंगूठी उठाई, अचानक श्मशान की सारी बुझी चिताओं से राख हवा में उठने लगी।

     

    मोहन घबराकर पीछे हट गया।

     

    राख हवा में घूमते-घूमते एक इंसान जैसी आकृति बनाने लगी।

     

    आकृति ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “मेरी बात गांव तक पहुंचा दो…”

     

    मोहन का शरीर डर से कांपने लगा।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    आकृति ने जवाब दिया—

     

    “जिसे इस श्मशान ने बीस साल से अपने अंदर छिपा रखा है।”

     

    अचानक राख जमीन पर गिर गई और सब कुछ शांत हो गया।

     

    मोहन अंगूठी लेकर भागता हुआ घर पहुंचा।

     

    अगली सुबह उसने गांव के सबसे बूढ़े आदमी हरिदास से सारी बात बताई।

     

    हरिदास का चेहरा सुनते ही सफेद पड़ गया।

     

    “तुमने अंगूठी कहां से पाई?”

     

    मोहन ने अंगूठी दिखा दी।

     

    हरिदास की आंखों में डर उतर आया।

     

    “ये अंगूठी रघुवीर की है।”

     

    “कौन रघुवीर?”

     

    हरिदास कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “बीस साल पहले गांव में एक आदमी रहता था। उसका नाम रघुवीर था। वह बहुत ईमानदार था। एक रात अचानक उसकी मौत हो गई और उसका अंतिम संस्कार इसी श्मशान में किया गया।”

     

    “तो इसमें डरने वाली क्या बात है?”

     

    हरिदास ने धीमे से कहा, “उसकी मौत स्वाभाविक नहीं थी।”

     

    मोहन चौंक गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    हरिदास ने चारों तरफ देखा और धीरे से कहा—

     

    “रघुवीर ने मरने से कुछ दिन पहले गांव के मुखिया के खिलाफ आवाज उठाई थी। उसे पता चला था कि गांव की जमीनों के कागजों में धोखा किया जा रहा है। उसने सबूत इकट्ठे कर लिए थे।”

     

    “फिर?”

     

    “उसके मरने के बाद सारे सबूत गायब हो गए।”

     

    मोहन को पिछली रात की आवाज याद आ गई।

     

    “क्या रघुवीर की आत्मा अभी भी यहीं है?”

     

    हरिदास ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी रात मोहन फिर श्मशान पहुंचा।

     

    इस बार उसके हाथ में वही चांदी की अंगूठी थी।

     

    जैसे ही उसने अंगूठी राख के पास रखी, अचानक जमीन के नीचे से हल्की आवाज आई।

     

    “पीपल के पेड़ के नीचे…”

     

    मोहन ने सामने पुराने पीपल के पेड़ को देखा।

     

    वहां जमीन थोड़ी उभरी हुई थी।

     

    मोहन ने हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की। कुछ देर बाद उसकी उंगलियां एक लोहे के डिब्बे से टकराईं।

     

    डिब्बे के अंदर पुराने कागज थे।

     

    लेकिन उनमें एक कागज ऐसा था जिसने मोहन के होश उड़ा दिए।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर मेरे साथ कुछ होता है, तो समझ लेना मेरी मौत के पीछे गांव का मुखिया देवकरण है।”

     

    मोहन अगले दिन यह कागज लेकर गांव के लोगों के सामने पहुंचा।

     

    देवकरण ने कागज देखते ही उसे छीनने की कोशिश की।

     

    लेकिन तभी हरिदास आगे आ गए।

     

    “अब बहुत हो चुका।”

     

    देवकरण घबरा गया।

     

    हरिदास ने सबके सामने बताया कि बीस साल पहले रघुवीर ने उसकी जमीन की चोरी का सच पकड़ लिया था। देवकरण ने अपने लोगों की मदद से उसे रास्ते से हटाया और उसकी मौत को हादसा बताया था।

     

    गांव में हड़कंप मच गया।

     

    देवकरण से सवाल होने लगे।

     

    आखिरकार पुराने डर के कारण चुप रहे कुछ लोग भी सच बोलने लगे।

     

    देवकरण का राज खुल गया।

     

    उस रात मोहन फिर श्मशान गया।

     

    आसमान साफ था।

     

    उसने रघुवीर की अंगूठी चिता की राख के पास रख दी।

     

    कुछ पल तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर हल्की हवा चली।

     

    राख धीरे-धीरे उठी और उसके सामने वही धुंधली आकृति दिखाई दी।

     

    इस बार उसकी आवाज में डर नहीं था।

     

    “सच सामने आ गया… अब मुझे जाने दो।”

     

    मोहन ने सिर झुका दिया।

     

    “तुम्हारा सच गांव तक पहुंच गया है।”

     

    आकृति कुछ पल शांत रही।

     

    फिर हवा में बिखरने लगी।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने मोहन से कहा—

     

    “याद रखना… राख कभी झूठ नहीं बोलती। उसमें आग से ज्यादा यादें रहती हैं।”

     

    अगली सुबह श्मशान की सारी राख नदी में बहा दी गई।

     

    उस दिन के बाद गांव में कभी किसी ने रघुवीर की आवाज नहीं सुनी।

     

    लेकिन श्मशान के पास वह पुराना पीपल का पेड़ आज भी खड़ा है।

     

    लोग कहते हैं, अमावस्या की रात अगर कोई वहां से गुजरता है, तो हवा में राख उड़ती हुई दिखाई देती है।

     

    डरने की जरूरत नहीं।

     

    क्योंकि अब उस राख में कोई अधूरी आत्मा नहीं रहती।

     

    बस एक पुरानी कहानी रहती है—

     

    एक ऐसे इंसान की, जिसकी मौत को छिपाया जा सकता था, लेकिन उसकी राख में दबा सच कभी नहीं।

  • पागल जादूगर

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    पागल जादूगर

     

    घने जंगल के बीच एक पुराना महल था। उस महल के बारे में आसपास के गांवों में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं। कोई कहता था कि वहां रात में दीवारें बातें करती हैं, कोई कहता था कि महल के अंदर जाने वाला कभी वापस नहीं आता।

     

    लेकिन सबसे ज्यादा डर लोगों को वहां रहने वाले एक जादूगर से लगता था।

     

    उसका नाम था विराज।

     

    लोग उसे पागल जादूगर कहते थे।

     

    कहते थे कि वह इंसानों से नफरत करता था और अपनी जादुई किताबों के साथ घंटों अकेले बातें करता रहता था। कभी आधी रात को महल की खिड़कियों से नीली रोशनी निकलती, तो कभी जंगल में किसी अनजान जानवर की आवाज सुनाई देती।

     

    एक दिन गांव की एक लड़की तारा जंगल में अपनी छोटी बहन को ढूंढते-ढूंढते उस महल तक पहुंच गई।

     

    महल का बड़ा दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    तारा डरते हुए अंदर गई।

     

    “कोई है?” उसने धीमी आवाज में पूछा।

     

    अचानक पीछे से आवाज आई।

     

    “यहां इंसानों का आना मना है।”

     

    तारा पलटी।

     

    सामने एक लंबा आदमी खड़ा था। उसके बाल बिखरे हुए थे, कपड़े पुराने थे और हाथ में एक चमकती हुई छड़ी थी।

     

    “तुम… जादूगर हो?” तारा ने पूछा।

     

    विराज ने अजीब सी हंसी हंसते हुए कहा, “लोग मुझे पागल जादूगर कहते हैं।”

     

    “मेरी बहन खो गई है। मैंने उसे पूरे जंगल में ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिली।”

     

    विराज की हंसी अचानक रुक गई।

     

    “तुम्हारी बहन कैसी दिखती है?”

     

    “उसकी उम्र दस साल है। उसने लाल रंग की पोशाक पहनी है। उसके हाथ में एक लकड़ी की गुड़िया है।”

     

    विराज ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल बाद उसने छड़ी जमीन पर रखी।

     

    महल की फर्श पर एक चमकता हुआ गोल निशान बन गया।

     

    उसमें जंगल का दृश्य दिखाई देने लगा।

     

    तारा हैरान रह गई।

     

    “ये… ये क्या है?”

     

    “जादू,” विराज ने कहा।

     

    दृश्य में तारा की बहन एक पेड़ के नीचे बैठी दिखाई दी।

     

    “वो वहां है!”

     

    तारा तुरंत बाहर भागने लगी।

     

    विराज ने उसका हाथ रोक लिया।

     

    “रुको।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो पेड़ साधारण पेड़ नहीं है।”

     

    तारा ने उसकी तरफ देखा।

     

    विराज ने कहा, “तुम्हारी बहन अकेली वहां नहीं है।”

     

    दोनों जंगल की ओर चल पड़े।

     

    कुछ दूर पहुंचने के बाद उन्हें बच्ची दिखाई दी।

     

    “दीदी!”

     

    तारा दौड़कर अपनी बहन के पास पहुंची और उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन तभी जमीन हिलने लगी।

     

    पेड़ की जड़ें जमीन से बाहर निकल आईं और चारों तरफ फैलने लगीं।

     

    तारा डर गई।

     

    “विराज!”

     

    जादूगर ने अपनी छड़ी उठाई।

     

    “पीछे हटो!”

     

    उसने मंत्र पढ़ा और छड़ी से रोशनी निकली। जड़ें पीछे हट गईं।

     

    बच्ची रोते हुए तारा से चिपक गई।

     

    तारा ने पहली बार गौर किया कि विराज के हाथ पर गहरा निशान था।

     

    “आपने हमें बचाया… फिर लोग आपको पागल क्यों कहते हैं?”

     

    विराज कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला, “क्योंकि लोग सच से ज्यादा डरावनी कहानी पर विश्वास करते हैं।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं हमेशा से ऐसा नहीं था।”

     

    उसने उन्हें महल में वापस लाकर एक पुराना कमरा खोला।

     

    कमरे में सैकड़ों किताबें थीं।

     

    बीच में एक बड़ी तस्वीर लगी थी।

     

    तारा ने तस्वीर देखते ही पूछा, “ये कौन हैं?”

     

    विराज ने धीरे से कहा, “मेरा परिवार।”

     

    तस्वीर में विराज अपनी पत्नी और छोटी बेटी के साथ खड़ा था।

     

    “मैं कभी इस राज्य का राज जादूगर था। लोग मुझ पर भरोसा करते थे। लेकिन एक रात कुछ लालची जादूगरों ने मेरी सबसे शक्तिशाली किताब चुराने की कोशिश की। उस किताब में ऐसा जादू था जो पूरे राज्य को बचा सकता था।”

     

    “फिर?”

     

    “मैंने किताब बचा ली, लेकिन उसी रात मेरी बेटी गायब हो गई।”

     

    तारा चौंक गई।

     

    “क्या वो मर गई?”

     

    विराज की आंखें भर आईं।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कमरे में अचानक एक किताब अपने आप खुल गई।

     

    उसके पन्नों पर चमकते अक्षर दिखाई दिए।

     

    “जिसे तुम खोया समझ रहे हो, वह अभी भी जीवित है।”

     

    विराज का चेहरा बदल गया।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    किताब के पन्ने तेजी से पलटने लगे।

     

    अचानक एक नक्शा सामने आया।

     

    उस पर जंगल के बीच एक लाल निशान चमक रहा था।

     

    तारा ने कहा, “शायद आपकी बेटी वहीं है।”

     

    विराज ने सिर हिलाया।

     

    “वह जगह… निषिद्ध जंगल है। वहां कोई जिंदा वापस नहीं आता।”

     

    तारा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपने मेरी बहन को बचाया। अब मैं आपकी बेटी को ढूंढने में आपकी मदद करूंगी।”

     

    विराज ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

     

    “तुम जानती भी हो कि तुम किस मुसीबत में पड़ रही हो?”

     

    “नहीं। लेकिन किसी को अपने परिवार से दूर रहने का दर्द मैं समझ सकती हूं।”

     

    अगली सुबह दोनों निषिद्ध जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    जंगल के बीच उन्हें एक टूटा हुआ मंदिर मिला।

     

    मंदिर के अंदर एक काला दरवाजा था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था जो विराज की किताब में था।

     

    विराज ने छड़ी उठाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    अचानक किसी बच्ची की आवाज आई—

     

    “पापा…”

     

    विराज के हाथ से छड़ी गिर गई।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “नहीं… ये आवाज…”

     

    तारा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “वो आपकी बेटी है।”

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    लेकिन जैसे ही वे आखिरी कमरे में पहुंचे, वहां एक बूढ़ा जादूगर खड़ा था।

     

    उसने हंसकर कहा—

     

    “आखिर तुम यहां आ ही गए, विराज।”

     

    विराज का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “तुम!”

     

    बूढ़ा जादूगर बोला, “जिसे तुमने सालों से मृत समझा, उसे मैंने जिंदा रखा। अब तुम्हारी सबसे शक्तिशाली जादुई किताब मुझे दे दो।”

     

    तभी पीछे से वही बच्ची दौड़ती हुई आई।

     

    “पापा!”

     

    विराज घुटनों पर बैठ गया।

     

    बाप-बेटी एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    तारा की आंखों में भी आंसू आ गए।

     

    लेकिन बूढ़े जादूगर ने अपनी छड़ी उठा ली।

     

    “अब असली खेल शुरू होगा।”

     

    विराज धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

     

    उसकी आंखों में इस बार पागलपन नहीं था।

     

    सिर्फ अपनी बेटी को बचाने का फैसला था।

     

    उसने छड़ी उठाई और कहा—

     

    “आज दुनिया देखेगी कि जिसे तुम पागल कहते रहे… वह असल में कितना शक्तिशाली जादूगर है।”

     

    और अगले ही पल पूरा जंगल तेज रोशनी से भर गया।

  • एक कमरा दो अजनबी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक कमरा, दो अजनबी और एक अनकहा एहसास

     

    विदेश के एक बड़े कॉलेज में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए हॉस्टल की व्यवस्था थोड़ी अलग थी। वहाँ लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग हॉस्टल तो थे, लेकिन कुछ खास कमरों में अलग-अलग देशों के छात्रों को साथ रहने की अनुमति थी। कॉलेज का मानना था कि इससे छात्रों को अलग-अलग संस्कृतियों और लोगों को समझने का मौका मिलता है।

     

    ऐसे ही एक कमरे में पहले से तीन लड़कियाँ रहती थीं —सोम्या, एलिना और कैथरीन।

     

    सोम्या भारत से आई थी। वह बेहद शांत, मासूम और प्यारी लड़की थी। बात करते समय उसकी आवाज में एक अजीब-सी नरमी रहती थी। वह हर किसी से जल्दी घुलती-मिलती नहीं थी, लेकिन जिसे अपना मान लेती, उसके लिए पूरी तरह खड़ी रहती।

     

    एक शाम कमरे का दरवाजा खुला और कॉलेज का वार्डन एक लड़के के साथ अंदर आया।

     

    “यह तुम्हारा नया रूममेट है। नाम है सुशांत।”

     

    तीनों लड़कियाँ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।

     

    सुशांत ने बस हल्का-सा सिर हिलाया।

     

    “हैलो।”

     

    “बस इतना?” एलिना हँसते हुए बोली, “हमने सोचा था नए रूममेट का कम से कम परिचय तो होगा।”

     

    सुशांत ने अपना बैग नीचे रखा।

     

    “सुशांत। इंडिया से हूँ। बाकी… बाद में।”

     

    कैथरीन ने धीरे से एलिना के कान में कहा, “ये तो बहुत सीरियस है।”

     

    एलिना हँस पड़ी।

     

    सोम्या चुपचाप उसे देख रही थी।

     

    सुशांत ने कमरे में नजर दौड़ाई और फिर अपना सामान एक खाली कोने में रखने लगा। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कमरे में तीन लड़कियाँ हैं।

     

    एलिना ने पूछा, “तुम्हें अजीब नहीं लग रहा?”

     

    “क्या?”

     

    “हम तीन लड़कियाँ हैं और तुम अकेले लड़के।”

     

    सुशांत ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “मुझे पढ़ाई करनी है। कमरे में कौन है, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

     

    कैथरीन ने मजाक में कहा, “वाह! इतना सीरियस इंसान हमने पहली बार देखा है।”

     

    सोम्या के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उस रात सुशांत देर तक पढ़ता रहा। बाकी तीनों आपस में बातें करती रहीं। एलिना और कैथरीन लगातार उससे बात करने की कोशिश करतीं, लेकिन सुशांत के जवाब छोटे होते।

     

    “तुम्हारी गर्लफ्रेंड है?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “दिलचस्पी नहीं।”

     

    “कभी प्यार हुआ?”

     

    “नहीं।”

     

    “होगा भी नहीं लगता।”

     

    “शायद।”

     

    एलिना ने हँसते हुए कहा, “तुम इंसान हो या किताब?”

     

    सुशांत ने पहली बार मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा।

     

    “किताब शायद ज्यादा अच्छी होती।”

     

    सब हँस पड़ीं।

     

    बस सोम्या उसे चुपचाप देखती रही।

     

    अगले कुछ दिनों में कमरे का माहौल थोड़ा बदलने लगा। एलिना और कैथरीन सुशांत को परेशान करने के नए-नए तरीके ढूँढतीं। कभी उसका पेन छिपा देतीं, कभी उसकी किताब के ऊपर मजाकिया पर्ची रख देतीं।

     

    लेकिन सोम्या कभी उसे परेशान नहीं करती थी।

     

    एक दिन सुशांत लाइब्रेरी से वापस आया तो उसने देखा कि उसकी मेज पर खाना रखा था।

     

    वह हैरान हुआ।

     

    “ये किसने रखा?”

     

    सोम्या ने किताब से नजर उठाई।

     

    “मैंने।”

     

    “क्यों?”

     

    “सुबह से तुमने कुछ नहीं खाया था।”

     

    सुशांत कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    सोम्या मुस्कुराई।

     

    “जब कोई रोज एक ही समय पर खाना खाता हो और आज नहीं खाए, तो पता चल जाता है।”

     

    सुशांत ने पहली बार महसूस किया कि कमरे में कोई ऐसा भी था जो उसकी चुप्पी को समझने की कोशिश करता था।

     

    “थैंक यू।”

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    बस इतना ही।

     

    लेकिन उस छोटे-से पल के बाद सुशांत के अंदर कुछ बदलने लगा।

     

    अब कमरे में आते ही उसकी नजर सबसे पहले सोम्या को ढूँढती।

     

    वह खुद इस बदलाव को समझ नहीं पा रहा था।

     

    एक शाम बारिश हो रही थी। बिजली चली गई और कमरे में अंधेरा छा गया।

     

    एलिना और कैथरीन मोमबत्ती लेने बाहर चली गईं।

     

    कमरे में सिर्फ सुशांत और सोम्या रह गए।

     

    सोम्या खिड़की के पास बैठी बारिश देख रही थी।

     

    “तुम्हें बारिश पसंद है?” सुशांत ने अचानक पूछा।

     

    सोम्या ने पलटकर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “पता नहीं। बारिश में सब कुछ थोड़ा सच्चा लगता है।”

     

    सुशांत चुप हो गया।

     

    सोम्या ने पूछा, “तुम हमेशा इतने चुप क्यों रहते हो?”

     

    “शायद आदत है।”

     

    “किसी से बात करने का मन नहीं करता?”

     

    सुशांत ने कुछ पल सोचा।

     

    “पहले नहीं करता था।”

     

    सोम्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और अब?”

     

    सुशांत ने नजरें झुका लीं।

     

    “अब… कभी-कभी करता है।”

     

    सोम्या समझ नहीं पाई कि वह किसके बारे में कह रहा है।

     

    तभी एलिना और कैथरीन वापस आ गईं और कमरे का माहौल फिर सामान्य हो गया।

     

    लेकिन उस रात सुशांत देर तक सो नहीं पाया।

     

    उसे बार-बार सोम्या की मुस्कान याद आ रही थी।

     

    कुछ दिनों बाद कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। सभी छात्र तैयारी में व्यस्त थे। सोम्या भी एक प्रस्तुति की तैयारी कर रही थी। वह मंच के पीछे घबराई हुई खड़ी थी।

     

    सुशांत ने उसे देखा।

     

    “डर लग रहा है?”

     

    सोम्या ने धीरे से कहा, “थोड़ा।”

     

    “तुम कर लोगी।”

     

    “तुम्हें इतना भरोसा कैसे है?”

     

    “क्योंकि तुम जब किसी चीज को दिल से करती हो, तो उसे अच्छा ही करती हो।”

     

    सोम्या कुछ पल उसे देखती रही।

     

    “तुम आजकल बहुत बातें करने लगे हो।”

     

    सुशांत मुस्कुरा दिया।

     

    “शायद किसी की वजह से।”

     

    सोम्या के चेहरे पर हल्की-सी लाली आ गई।

     

    उस दिन सोम्या ने मंच पर शानदार प्रस्तुति दी।

     

    सबसे ज्यादा खुशी सुशांत के चेहरे पर थी।

     

    एलिना ने यह देख लिया।

     

    वह कैथरीन के पास जाकर धीरे से बोली, “मुझे लगता है हमारे सीरियस साहब बदल रहे हैं।”

     

    कैथरीन हँसते हुए बोली, “और वजह भी साफ है।”

     

    दोनों ने सोम्या और सुशांत की तरफ देखा।

     

    सुशांत को अब खुद से एक सवाल पूछना पड़ रहा था।

     

    जिस लड़के को कभी रिश्तों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वह अब हर दिन किसी एक लड़की के कमरे में आने का इंतजार क्यों करता था?

     

    उसे सोम्या की आवाज अच्छी क्यों लगती थी?

     

    उसकी मुस्कान देखकर मन हल्का क्यों हो जाता था?

     

    और सबसे बड़ी बात…

     

    अगर सोम्या एक दिन कमरे में न हो, तो पूरा कमरा खाली-खाली क्यों लगता था?

     

    सुशांत को जवाब पता था।

     

    बस वह उसे स्वीकार करने से डर रहा था।

     

    क्योंकि यह सिर्फ पसंद नहीं थी।

    उसके दिल में सोम्या के लिए एक ऐसा एहसास जन्म ले चुका था, जिसकी उसे खुद कभी उम्मीद नहीं थी।

     

    और सोम्या?

    वह भी शायद उस एहसास को महसूस करने लगी थी…

     

    लेकिन दोनों में से किसी ने अभी तक उसे शब्द नहीं दिए थे।

  • परछाई (भाग 3 — आख़िरी परछाई)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    कुएँ के सामने खड़ा विवेक काँप रहा था।

     

    उसके सामने सफेद चेहरे वाली औरत खड़ी थी।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसके बाल हवा में नहीं, बल्कि पानी के अंदर की तरह धीरे-धीरे तैर रहे थे।

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    औरत ने जवाब दिया—

     

    “मेरा कोई नाम नहीं।”

     

    “फिर लोग तुम्हें क्या कहते हैं?”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “परछाई।”

     

    कुएँ के अंदर से अचानक कई आवाज़ें आने लगीं।

     

    किसी बच्चे की रोने की आवाज़।

     

    किसी बूढ़े के कराहने की आवाज़।

     

    किसी औरत की चीख।

     

    विवेक पीछे हट गया।

     

    औरत ने कहा—

     

    “तीस साल पहले तुम्हारे दादा और गाँव के कुछ लोगों ने मुझे बुलाया था।”

     

    “क्यों?”

     

    “उन्हें लगा कि अगर वे अपनी परछाइयों को अलग कर लें, तो वे मौत से बच सकते हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने गलती की।”

     

    औरत की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “परछाई शरीर से अलग होने के बाद आज़ाद हो सकती है। लेकिन उसे जीवित रहने के लिए किसी इंसान की आत्मा चाहिए।”

     

    विवेक को समझ आ गया।

     

    “इसलिए तुम लोगों की परछाइयाँ चुराती हो।”

     

    “हाँ।”

     

    तभी पीछे से शंकर चाचा की आवाज़ आई—

     

    “विवेक!”

     

    वह मुड़ा।

     

    शंकर चाचा हाथ में एक पुराना दीपक लिए खड़े थे।

     

    उनके साथ विवेक की दादा की परछाई भी थी।

     

    वह परछाई धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    सफेद चेहरे वाली औरत ने उसे देखते ही गुस्से में कहा—

     

    “तुम अब भी जीवित हो?”

     

    परछाई ने जवाब दिया—

     

    “शरीर नहीं… लेकिन वादा अभी बाकी है।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “कौन सा वादा?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “तुम्हारे दादा ने मरने से पहले अपनी परछाई को आदेश दिया था कि जब तक इस शक्ति को खत्म न कर दे, वह आज़ाद नहीं होगी।”

     

    अचानक काली हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ टूटने लगीं।

     

    कुएँ के अंदर से काली परछाइयाँ बाहर निकलने लगीं।

     

    एक।

     

    दो।

     

    दस।

     

    फिर दर्जनों।

     

    हर परछाई किसी इंसान का रूप ले रही थी।

     

    विवेक ने डरकर पूछा—

     

    “ये कौन हैं?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “जिनकी परछाइयाँ उसने चुराई थीं।”

     

    काली परछाइयाँ धीरे-धीरे गाँव की तरफ बढ़ने लगीं।

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “इन्हें कैसे रोकेंगे?”

     

    शंकर चाचा ने दीपक उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    “यह दीपक तुम्हारी दादी ने बनाया था।”

     

    “इससे क्या होगा?”

     

    “जिस इंसान की परछाई उसके शरीर से अलग हो चुकी है, उसके सामने यह दीपक जलाओ। अगर वह परछाई सच में उसकी है, तो वापस शरीर में चली जाएगी।”

     

    विवेक ने दीपक लिया।

     

    सबसे पहली परछाई उसके सामने आई।

     

    उसने दीपक जलाया।

     

    परछाई काँपने लगी।

     

    फिर वह जमीन पर गिरकर धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    अगले ही पल गाँव के एक घर से किसी आदमी के जागने की आवाज़ आई।

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “एक वापस आ गई।”

     

    विवेक ने दीपक लेकर दूसरी परछाई की तरफ बढ़ा।

     

    एक-एक करके परछाइयाँ अपने असली शरीरों में लौटने लगीं।

     

    लेकिन सफेद चेहरे वाली औरत अब भी कुएँ के पास खड़ी थी।

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    अचानक दीपक बुझ गया।

     

    “बस!”

     

    उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरा गाँव काँप गया।

     

    “तुम मेरी बनाई दुनिया को खत्म नहीं कर सकते।”

     

    वह अचानक हवा में उठी।

     

    उसका शरीर फैलने लगा।

     

    उसके बाल पूरे कुएँ को ढकने लगे।

     

    अब वह इंसान नहीं थी।

     

    एक विशाल काली आकृति बन चुकी थी।

     

    विवेक पीछे गिर पड़ा।

     

    उसने देखा कि उसकी अपनी परछाई भी अब वापस जमीन पर आ गई थी।

     

    लेकिन वह विवेक की तरह नहीं दिख रही थी।

     

    उसके पीछे दो सिर थे।

     

    एक उसके दादा का।

     

    दूसरा…

     

    विवेक का।

     

    विवेक समझ गया कि अगर वह डर गया तो वह शक्ति उसके शरीर पर कब्ज़ा कर लेगी।

     

    उसने आँखें बंद कीं।

     

    और पहली बार उसने अपनी परछाई से कहा—

     

    “तुम मेरी दुश्मन नहीं हो।”

     

    परछाई शांत हो गई।

     

    “तुम मेरे अंदर का डर हो।”

     

    अंधेरा काँपने लगा।

     

    “और मैं अपने डर से भागूँगा नहीं।”

     

    विवेक ने दीपक फिर जलाया।

     

    इस बार लौ बुझी नहीं।

     

    बल्कि तेज़ होती गई।

     

    सफेद चेहरे वाली औरत चीखी।

     

    “नहीं!”

     

    विवेक ने दीपक कुएँ के अंदर फेंक दिया।

     

    एक तेज़ सफेद रोशनी पूरे गाँव में फैल गई।

     

    सभी परछाइयाँ एक साथ चीखने लगीं।

     

    फिर एक-एक करके वे कुएँ में खिंचने लगीं।

     

    सफेद चेहरे वाली औरत भी पीछे खिंचने लगी।

     

    उसने आखिरी बार विवेक की ओर देखा।

     

    “तुमने मुझे खत्म नहीं किया।”

     

    विवेक चुप रहा।

     

    वह हँसी।

     

    “क्योंकि परछाई को खत्म नहीं किया जा सकता।”

     

    और फिर वह कुएँ में गायब हो गई।

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    सुबह हुई।

     

    गाँव वालों ने देखा कि पुराने कुएँ के चारों तरफ की जमीन काली पड़ चुकी थी।

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “अब यह कुआँ हमेशा के लिए बंद करना होगा।”

     

    गाँव वालों ने उसे पत्थरों से भर दिया।

     

    विवेक ने अपनी दादा-दादी की तस्वीर घर से निकालकर मंदिर में रख दी।

     

    वह गाँव छोड़ने ही वाला था कि उसकी नजर दीवार पर पड़ी।

     

    सुबह की तेज़ धूप में उसकी परछाई जमीन पर साफ दिखाई दे रही थी।

     

    विवेक मुस्कुराया।

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    परछाई ने भी हाथ उठाया।

     

    सब सामान्य था।

     

    वह जाने लगा।

     

    लेकिन तभी…

     

    उसकी परछाई ने हाथ नीचे नहीं किया।

     

    विवेक रुक गया।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    परछाई अब भी हाथ उठाए खड़ी थी।

     

    विवेक ने अपना हाथ नीचे किया।

     

    परछाई ने नहीं किया।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    फिर परछाई ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया।

     

    वह विवेक की ओर नहीं…

     

    कुएँ की ओर देख रही थी।

     

    कुएँ के नीचे से हल्की लाल रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    और उसी समय विवेक के कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “एक परछाई अभी बाकी है…”

     

    विवेक ने झटके से पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने फिर जमीन की तरफ देखा।

     

    अब वहाँ उसकी परछाई अकेली नहीं थी।

     

    उसके बिल्कुल पीछे…

     

    एक दूसरी छोटी-सी परछाई खड़ी थी।

     

    विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    छोटी परछाई ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

     

    और उसके हाथ में…

     

    एक पुरानी लाल चूड़ी थी।

     

    विवेक समझ गया—

     

    जिस शक्ति को उन्होंने कुएँ में बंद किया था…

     

    वह खत्म नहीं हुई थी।

     

    वह सिर्फ…

     

    एक नई परछाई की तलाश में थी।

     

    और इस बार…

     

    उसकी नजर विवेक पर नहीं थी।

     

    उसकी नजर थी—

     

    विवेक के आने वाले बच्चे पर।

     

    समाप्त।

  • परछाई (भाग 2 — तहखाने का रहस्य)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    विवेक घंटों तक अपनी परछाई को देखता रहा।

     

    सूरज ऊपर था।

     

    उसकी परछाई जमीन पर होनी चाहिए थी।

     

    लेकिन वह पाँच कदम दूर खड़ी थी।

     

    विवेक एक कदम आगे बढ़ा।

     

    परछाई वहीं रही।

     

    वह पीछे हटा।

     

    परछाई फिर भी नहीं हिली।

     

    विवेक का गला सूख गया।

     

    उसे शंकर चाचा की बात याद आई—

     

    “तुम्हारे दादा ने कहा था कि उनकी परछाई उनसे पहले घर पहुँच गई है।”

     

    विवेक ने तय किया कि अब वह घर में नहीं रहेगा।

     

    उसने अपना बैग उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने बाहर कदम रखा, उसकी परछाई अचानक उसके सामने आ गई।

     

    वह रास्ता रोककर खड़ी थी।

     

    विवेक पीछे हट गया।

     

    परछाई ने अपना हाथ उठाया और घर के तहखाने की तरफ इशारा किया।

     

    फिर जमीन पर एक शब्द उभरा—

     

    “सच।”

     

    विवेक समझ गया कि उसे तहखाने में जाना होगा।

     

    घर के पीछे पुराने स्टोर रूम में उसे एक लोहे का दरवाज़ा मिला।

     

    दरवाज़े पर मोटा ताला लगा था।

     

    उसे अपनी दादी की पुरानी चाबी याद आई।

     

    कुछ देर खोजने के बाद उसे एक लकड़ी के संदूक में चाबी मिल गई।

     

    ताला खुल गया।

     

    दरवाज़ा खोलते ही सड़ी हुई मिट्टी की गंध आई।

     

    सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।

     

    विवेक मोबाइल की रोशनी जलाकर नीचे उतरने लगा।

     

    हर सीढ़ी के साथ ठंड बढ़ती जा रही थी।

     

    नीचे पहुँचकर उसे एक छोटा कमरा मिला।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    विवेक ने पहली तस्वीर देखी।

     

    उसमें उसके दादा थे।

     

    दूसरी में उसकी दादी।

     

    तीसरी में…

     

    एक अजनबी आदमी।

     

    लेकिन हर तस्वीर में एक चीज़ समान थी।

     

    सबकी परछाई अलग थी।

     

    किसी की परछाई पीछे नहीं थी।

     

    किसी की बगल में थी।

     

    और एक तस्वीर में आदमी खड़ा था…

     

    लेकिन उसकी परछाई दीवार पर बैठी हुई थी।

     

    विवेक के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी उसे एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी उसके दादा की थी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “परछाई शरीर की नहीं, आत्मा की होती है।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “हर इंसान की परछाई उसके साथ जन्म लेती है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपनी परछाई से डरने लगे, तो वह परछाई धीरे-धीरे स्वतंत्र हो सकती है।”

     

    विवेक ने पन्ना पलटा।

     

    “मैंने उसे पहली बार कुएँ के पास देखा था।”

     

    अगले पन्ने पर—

     

    “वह मेरी नकल करती थी।”

     

    फिर—

     

    “कल रात उसने मुझसे पहले घर में प्रवेश किया।”

     

    विवेक की साँस रुक गई।

     

    फिर एक वाक्य था—

     

    “अगर मेरी परछाई अलग हो जाए तो मुझे मार देना, क्योंकि फिर मैं मैं नहीं रहूँगा।”

     

    डायरी उसके हाथ से गिर गई।

     

    अचानक तहखाने की लाइट जल गई।

     

    विवेक चौंक गया।

     

    सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    “कौन?”

     

    आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

     

    वह शंकर चाचा थे।

     

    विवेक ने राहत की साँस ली।

     

    “चाचा, आप यहाँ कैसे?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “क्योंकि अब समय आ गया है कि तुम्हें सब पता चले।”

     

    उन्होंने एक पुरानी तस्वीर दी।

     

    तस्वीर में पाँच लोग थे।

     

    विवेक के दादा, शंकर चाचा, गाँव का पुराना प्रधान और दो अजनबी लोग।

     

    पीछे एक पुराना कुआँ दिखाई दे रहा था।

     

    “ये कौन लोग हैं?”

     

    शंकर चाचा बोले—

     

    “तीस साल पहले गाँव में एक साधु आया था। उसने दावा किया था कि वह इंसान की परछाई को अलग करके उसे हमेशा के लिए नियंत्रित कर सकता है।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “धन और ताकत के लिए।”

     

    “क्या मेरे दादा ने उसकी मदद की?”

     

    “हाँ।”

     

    विवेक का चेहरा कठोर हो गया।

     

    “फिर?”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “प्रयोग के दौरान कुछ गलत हो गया।”

     

    “क्या?”

     

    “साधु की अपनी परछाई उसके शरीर से अलग हो गई।”

     

    विवेक ने धीरे से पूछा—

     

    “और फिर?”

     

    “उसने बाकी लोगों की परछाइयाँ निगलना शुरू कर दिया।”

     

    तभी तहखाने में तेज़ हवा चली।

     

    दीवार पर लगी सभी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    विवेक की अपनी परछाई दीवार पर दिखाई दी।

     

    लेकिन अब उसके पीछे एक दूसरी बड़ी परछाई खड़ी थी।

     

    शंकर चाचा ने घबराकर कहा—

     

    “वह आ गया।”

     

    अंधेरे में एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे धोखा दिया था।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    दीवार पर एक विशाल काली आकृति बनी।

     

    “मैं वह हूँ जिसे तुम्हारे दादा ने जगाया था।”

     

    “तुमने उन्हें मारा?”

     

    “नहीं।”

     

    आवाज़ हँसी।

     

    “उन्होंने खुद अपनी परछाई मुझे दे दी थी।”

     

    विवेक पीछे हट गया।

     

    “मेरी परछाई तुमसे क्यों जुड़ी है?”

     

    “क्योंकि तुम उसी खून से हो।”

     

    अचानक विवेक की परछाई जमीन से उठकर दीवार पर चढ़ गई।

     

    वह धीरे-धीरे इंसान का आकार लेने लगी।

     

    फिर उसकी आवाज़ आई—

     

    “मुझे आज़ाद करो।”

     

    विवेक ने चौंककर कहा—

     

    “तुम बोल सकती हो?”

     

    परछाई ने सिर हिलाया।

     

    “मैं तुम्हारी परछाई नहीं हूँ।”

     

    “तो कौन हो?”

     

    उसने जवाब दिया—

     

    “मैं तुम्हारे दादा की परछाई हूँ।”

     

    विवेक स्तब्ध रह गया।

     

    “मेरे दादा की?”

     

    “उन्होंने अपनी आत्मा का एक हिस्सा मुझे देकर उस काली शक्ति को कैद किया था।”

     

    शंकर चाचा ने कहा—

     

    “लेकिन अब वह कैद टूट रही है।”

     

    तभी तहखाने का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    काली शक्ति की आवाज़ गूँजी—

     

    “आज तुम्हारे शरीर की बारी है।”

     

    अचानक विवेक की परछाई उसके शरीर से अलग होकर सामने आ गई।

     

    कमरे में दो परछाइयाँ थीं।

     

    एक विवेक की।

     

    दूसरी काली शक्ति की।

     

    दोनों एक-दूसरे पर टूट पड़ीं।

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    शंकर चाचा चिल्लाए—

     

    “विवेक! कुएँ तक जाओ!”

     

    “क्यों?”

     

    “वहीं से इसे वापस भेजा जा सकता है!”

     

    विवेक दौड़कर सीढ़ियों की ओर गया।

     

    पीछे से काली परछाई उसका पीछा करने लगी।

     

    वह लगभग उसके पैरों तक पहुँच चुकी थी।

     

    विवेक बाहर निकला और पुराने कुएँ की तरफ भागा।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसने देखा—

     

    कुएँ के अंदर कोई खड़ा था।

     

    एक औरत।

     

    सफेद चेहरा।

     

    काले बाल।

     

    और उसकी परछाई…

     

    कुएँ की दीवार पर नहीं थी।

     

    वह सीधे विवेक की तरफ आ रही थी।

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे यहाँ बंद किया था।”

     

    विवेक ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    औरत ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं वह परछाई हूँ… जिससे बाकी सारी परछाइयाँ पैदा हुई थीं।”

     

    कुएँ के अंदर से अचानक हजारों लोगों की फुसफुसाहट सुनाई देने लगी।

     

    और विवेक ने महसूस किया—

     

    उसकी अपनी परछाई अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी।