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  • नाराज़गी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नाराजगी इतनी बढ़ गई कि रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच गया

     

    माही और काव्या की शादी को पांच साल हो चुके थे। दोनों की शादी परिवार की पसंद से हुई थी, लेकिन इन पांच सालों में उन्होंने एक-दूसरे को इतना समझ लिया था कि अब उनके बीच पति-पत्नी से ज्यादा अच्छे दोस्त जैसा रिश्ता था।

     

    उनका एक छोटा-सा बेटा भी था—अंश।

     

    घर में हंसी-मजाक रहता था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से सब कुछ बदलने लगा था।

     

    माही का काम बहुत बढ़ गया था। वह सुबह जल्दी घर से निकलता और देर रात लौटता। काव्या दिनभर घर, बच्चे और अपनी जिम्मेदारियों में लगी रहती।

     

    शुरुआत में वह माही की मजबूरी समझती थी।

     

    लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में शिकायतें जमा होने लगीं।

     

    एक रात माही करीब ग्यारह बजे घर आया।

     

    काव्या सोफे पर बैठी उसका इंतजार कर रही थी।

     

    माही ने जूते उतारते हुए पूछा, “अंश सो गया?”

     

    “हां।”

     

    “तुम अभी तक सोई नहीं?”

     

    काव्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपका इंतजार कर रही थी।”

     

    माही थका हुआ था।

     

    “काव्या, आज बहुत काम था। तुम सो जाया करो। मेरा इंतजार मत किया करो।”

     

    बस यही बात काव्या को चुभ गई।

     

    “आपके लिए तो आसान है कहना कि इंतजार मत करो।”

     

    माही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “तो फिर बात खत्म करो।”

     

    काव्या चुप हो गई।

     

    लेकिन उस रात उसके मन में एक बात बैठ गई—

     

    माही को अब उसकी परवाह नहीं रही।

     

    अगले दिन भी दोनों के बीच ठीक से बात नहीं हुई।

     

    फिर छोटी-छोटी बातें बड़ी बनने लगीं।

     

    माही अगर फोन करना भूल जाता तो काव्या नाराज हो जाती।

     

    काव्या अगर घर की कोई बात नहीं बताती तो माही को लगता कि वह जानबूझकर उसे दूर कर रही है।

     

    दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे, लेकिन एक-दूसरे की बात समझने के बजाय अपने मन की बात को सच मानने लगे थे।

     

    एक दिन काव्या की तबीयत ठीक नहीं थी।

     

    उसने माही को फोन किया।

     

    “आज जल्दी आ सकते हो?”

     

    माही एक जरूरी मीटिंग में था।

     

    “आज मुश्किल है। तुम डॉक्टर को दिखा लो।”

     

    काव्या ने फोन रख दिया।

     

    शाम को माही घर आया तो उसने देखा कि काव्या चुपचाप बैठी है।

     

    “अब कैसी तबीयत है?”

     

    “ठीक हूं।”

     

    “डॉक्टर को दिखाया?”

     

    “नहीं।”

     

    माही परेशान हो गया।

     

    “क्यों?”

     

    काव्या ने कहा, “क्योंकि मुझे लगा, जब आपको समय ही नहीं है तो मैं अकेली ही ठीक हो जाऊंगी।”

     

    माही को गुस्सा आ गया।

     

    “हर बात को मेरे खिलाफ क्यों कर देती हो?”

     

    “क्योंकि हर बार मैं ही समझौता करती हूं।”

     

    “तो मत करो!”

     

    माही के मुंह से ये शब्द निकलते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    “ठीक है। अब नहीं करूंगी।”

     

    वह कमरे में चली गई।

     

    माही वहीं खड़ा रह गया।

     

    उसे एहसास था कि उसने गुस्से में बहुत बड़ी बात कह दी है।

     

    लेकिन अहंकार ने उसे रोक दिया।

     

    उसने माफी नहीं मांगी।

     

    अगले कुछ दिनों तक दोनों एक ही घर में रहते हुए भी अजनबियों की तरह रहने लगे।

     

    अंश बीच में फंस गया।

     

    वह कभी मां के पास जाता तो मां चुप रहती। पिता के पास जाता तो पिता फोन में व्यस्त होने का बहाना कर लेते।

     

    एक शाम अंश ने मासूमियत से पूछा—

     

    “पापा, आप मम्मी से बात क्यों नहीं करते?”

     

    माही के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    उधर काव्या ने यह बात सुन ली।

     

    उस रात उसने माही से कहा—

     

    “हमारी लड़ाई का असर अंश पर पड़ रहा है।”

     

    माही ने धीरे से कहा, “मुझे पता है।”

     

    “तो फिर इसे खत्म क्यों नहीं करते?”

     

    माही कुछ कहने वाला था, तभी उसका फोन बजा।

     

    काम का फोन था।

     

    वह उठकर दूसरे कमरे में चला गया।

     

    काव्या ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे लगा, शायद उनका रिश्ता अब माही की जिंदगी में आखिरी प्राथमिकता बन चुका है।

     

    कुछ दिनों बाद काव्या ने अपने मायके जाने का फैसला कर लिया।

     

    उसने अपना सामान बांधा।

     

    माही कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

     

    “तुम सच में जा रही हो?”

     

    “हां।”

     

    “कितने दिन के लिए?”

     

    काव्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पता नहीं।”

     

    माही का दिल बैठ गया।

     

    “काव्या… बात इतनी बड़ी नहीं है।”

     

    वह हल्की-सी हंसी।

     

    “बात बड़ी नहीं थी माही। हमने उसे बड़ा बना दिया।”

     

    “तो मत जाओ।”

     

    “क्यों?”

     

    माही चुप हो गया।

     

    काव्या ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर मैं आज नहीं गई तो शायद हम दोनों कभी समझ नहीं पाएंगे कि हम एक-दूसरे को खो रहे हैं।”

     

    वह चली गई।

     

    घर अचानक खाली हो गया।

     

    अंश भी कुछ दिनों के लिए नानी के घर चला गया।

     

    अब उस घर में सिर्फ माही था।

     

    वही घर, जहां कभी हंसी गूंजती थी, अब बिल्कुल शांत था।

     

    एक रात माही को अलमारी में काव्या की पुरानी डायरी मिली।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया।

     

    उसमें कोई शिकायत नहीं थी।

     

    बस छोटी-छोटी बातें थीं।

     

    “आज माही बहुत थका था, इसलिए मैंने उससे ज्यादा बात नहीं की।”

     

    “आज उसका प्रेजेंटेशन था। उसने नहीं बताया, लेकिन मुझे पता है कि वह तनाव में है।”

     

    “आज उसने मुझे चाय बनाकर दी। बहुत छोटी बात थी, लेकिन मेरा दिन अच्छा हो गया।”

     

    माही की आंखें नम हो गईं।

     

    उसे पहली बार समझ आया कि काव्या हर दिन उसके लिए छोटी-छोटी खुशियां जमा करती रही थी और वह उन्हीं खुशियों को सामान्य समझता रहा।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैं माही से नाराज हूं, लेकिन उससे प्यार करना बंद नहीं कर सकती। बस चाहती हूं कि कभी वह मेरी चुप्पी भी समझे।”

     

    माही ने डायरी बंद कर दी।

     

    उस रात उसे नींद नहीं आई।

     

    अगली सुबह वह सीधे काव्या के मायके पहुंच गया।

     

    काव्या उसे देखकर चौंक गई।

     

    “आप यहां?”

     

    माही ने कहा—

     

    “तुम्हें लेने नहीं आया हूं।”

     

    काव्या चुप रही।

     

    “मैं माफी मांगने आया हूं।”

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    माही ने कहा—

     

    “मैं समझता रहा कि मैं परिवार के लिए मेहनत कर रहा हूं। लेकिन मैं भूल गया कि परिवार सिर्फ पैसे और जिम्मेदारियों से नहीं चलता। उसमें वक्त भी देना पड़ता है।”

     

    काव्या कुछ नहीं बोली।

     

    माही ने आगे कहा—

     

    “तुम्हारी नाराजगी मुझे परेशान करती थी, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा कि उस नाराजगी के पीछे तुम्हारा अकेलापन था।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “और मैंने भी गलतियां कीं,” उसने धीरे से कहा। “मैंने अपनी बात समझाने के बजाय चुप रहना शुरू कर दिया। मुझे लगा आप खुद समझ जाएंगे।”

     

    माही ने सिर झुका लिया।

     

    “शायद हम दोनों यही गलती करते रहे।”

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    फिर माही ने कहा—

     

    “अगर तुम चाहो तो हम वापस शुरुआत कर सकते हैं।”

     

    काव्या ने पूछा—

     

    “और अगर फिर वही हुआ?”

     

    माही ने उसकी तरफ देखकर कहा—

     

    “तो इस बार हम चुप नहीं रहेंगे। बात करेंगे। गुस्सा होगा तो भी बात करेंगे। नाराज होंगे तो भी बात करेंगे। लेकिन एक-दूसरे से दूर नहीं जाएंगे।”

     

    काव्या की आंखों में हल्की मुस्कान आई।

     

    “पक्का?”

     

    “पक्का।”

     

    तभी अंश दौड़ता हुआ आया।

     

    “मम्मी! पापा!”

     

    दोनों ने उसे अपने बीच पकड़ लिया।

     

    अंश खुशी से बोला—

     

    “अब आप दोनों लड़ोगे नहीं?”

     

    काव्या और माही एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।

     

    माही ने कहा—

     

    “लड़ाई होगी तो भी जल्दी खत्म कर देंगे।”

     

    अंश बोला—

     

    “क्यों?”

     

    काव्या ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “क्योंकि हमें एक-दूसरे से ज्यादा अपनी नाराजगी प्यारी नहीं है।”

     

    उस दिन दोनों घर लौट आए।

     

    उनकी जिंदगी एक ही दिन में परफेक्ट नहीं हुई।

     

    कभी फिर बहस होती, कभी कोई बात बुरी लगती।

     

    लेकिन अब एक फर्क था।

     

    वे चुप नहीं रहते थे।

     

    क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि रिश्ते हमेशा किसी बड़े धोखे से नहीं टूटते।

     

    कई बार रिश्ते छोटी-छोटी अनकही बातों, जमा होती नाराजगी और लंबे समय की चुप्पी से टूटने लगते हैं।

     

    और कभी-कभी रिश्ते को बचाने के लिए किसी बड़े चमत्कार की जरूरत नहीं होती।

     

    बस एक इंसान को अहंकार छोड़कर कहना पड़ता है—

     

    “चलो, फिर से बात करते हैं।”

  • बारिश में मिला प्यार

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश में मिला प्यार

     

    पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा-सा गांव था—देवगढ़। चारों तरफ ऊंचे पहाड़, घने पेड़ और उनके बीच कुछ छोटे-छोटे घर। गांव से कुछ दूर सेना की एक चौकी थी, जहां तैनात जवान अक्सर कठिन मौसम में भी अपनी ड्यूटी निभाते थे।

     

    उन्हीं जवानों में से एक था कैप्टन आदित्य, जिसकी उम्र अट्ठाईस साल थी। वह शांत स्वभाव का था और अपने काम को लेकर बहुत गंभीर रहता था।

     

    एक रात आदित्य को एक जरूरी मिशन के लिए पहाड़ी रास्ते से आगे जाना था। मौसम अचानक बिगड़ गया। तेज बारिश, घना कोहरा और रास्ते पर गिरते पत्थरों के कारण आगे बढ़ना मुश्किल हो गया।

     

    उसके साथ दो जवान और थे।

     

    आदित्य ने आसपास देखा।

     

    “आगे जाना अभी ठीक नहीं होगा। मौसम थोड़ा संभलने तक हमें कहीं रुकना पड़ेगा।”

     

    पास ही उसे एक छोटा-सा घर दिखाई दिया।

     

    उसने दरवाजा खटखटाया।

     

    कुछ देर बाद एक बुजुर्ग आदमी ने दरवाजा खोला।

     

    “कौन?”

     

    आदित्य ने अपना परिचय दिया।

     

    “हम सेना से हैं। मौसम बहुत खराब हो गया है। अगर कुछ देर यहां रुकने की इजाजत मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी।”

     

    बुजुर्ग ने तुरंत दरवाजा खोल दिया।

     

    “बेटा, इसमें पूछने की क्या बात है? अंदर आओ।”

     

    घर में आदित्य और उसके साथियों के लिए चाय बनाई गई। बाहर बारिश लगातार तेज होती जा रही थी।

     

    तभी कमरे की दीवार पर लगी एक तस्वीर पर आदित्य की नजर पड़ी।

     

    तस्वीर में एक लड़की मुस्कुराती हुई खड़ी थी। उसकी आंखों में एक अजीब-सी सादगी थी।

     

    आदित्य कुछ पल तस्वीर को देखता रहा।

     

    बुजुर्ग ने उसकी नजर देख ली।

     

    “मेरी बेटी है—नंदिनी।”

     

    आदित्य ने तुरंत नजरें हटा लीं।

     

    “बहुत अच्छी तस्वीर है।”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “वह अभी शहर में पढ़ाती है। छुट्टियों में ही घर आती है।”

     

    आदित्य ने सिर हिलाया।

     

    उसे खुद समझ नहीं आया कि उस तस्वीर ने उसका ध्यान इतना क्यों खींच लिया था।

     

    रात बढ़ती गई।

     

    कुछ घंटों बाद मौसम थोड़ा शांत हुआ और आदित्य अपने साथियों के साथ वहां से निकल गया।

     

    जाते समय उसने बुजुर्ग से कहा—

     

    “आपने हमारी मदद की, इसे मैं कभी नहीं भूलूंगा।”

     

    बुजुर्ग ने कहा, “बेटा, तुम लोग हमारी रक्षा करते हो। आज अगर हम तुम्हें थोड़ी देर छत दे पाए तो इसे अपना सौभाग्य समझेंगे।”

     

    आदित्य मुस्कुराया और वहां से चला गया।

     

    लेकिन वह घर और दीवार पर लगी वह तस्वीर उसके मन में कहीं रह गई।

     

    अगले कुछ दिनों तक मिशन बेहद कठिन रहा। आदित्य अपने काम में व्यस्त हो गया। फिर भी कभी-कभी उसे उस घर की याद आ जाती।

     

    एक महीने बाद उसकी ड्यूटी उसी इलाके में लगी।

     

    आदित्य को पता चला कि उस गांव के आसपास सेना का एक छोटा अभियान चलना है। काम खत्म होने के बाद वह उसी घर के पास से गुजर रहा था।

     

    दरवाजे के बाहर वही बुजुर्ग बैठे थे।

     

    उन्होंने आदित्य को पहचान लिया।

     

    “अरे बेटा! तुम?”

     

    “जी अंकल।”

     

    “अंदर आओ।”

     

    आदित्य अंदर गया तो इस बार दीवार के पास वही लड़की खड़ी थी, जिसकी तस्वीर उसने उस रात देखी थी।

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “ये मेरी बेटी नंदिनी।”

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर नमस्ते किया।

     

    “नमस्ते।”

     

    आदित्य ने भी सिर झुकाया।

     

    “नमस्ते।”

     

    दोनों की पहली मुलाकात बस इतनी ही थी।

     

    लेकिन उस छोटी-सी मुलाकात में आदित्य को महसूस हुआ कि तस्वीर में दिखने वाली मुस्कान असल में उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत थी।

     

    नंदिनी ने चाय रखते हुए पूछा—

     

    “आप उस रात भी यहां रुके थे ना?”

     

    आदित्य थोड़ा हैरान हुआ।

     

    “आपको पता है?”

     

    नंदिनी हंस दी।

     

    “पापा ने बताया था।”

     

    फिर उसने कहा—

     

    “उस रात मौसम बहुत खराब था। आपको डर नहीं लगा?”

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “डर तो लगा था। लेकिन मिशन पर निकले जवान डर से ज्यादा अपने काम के बारे में सोचते हैं।”

     

    नंदिनी ने गंभीर होकर कहा—

     

    “शायद इसी वजह से लोग आप लोगों पर भरोसा करते हैं।”

     

    उसकी बात आदित्य के दिल में उतर गई।

     

    इसके बाद जब भी आदित्य को समय मिलता, वह उस घर के पास चला जाता। कभी नंदिनी से गांव के बारे में बात होती, कभी किताबों के बारे में।

     

    नंदिनी गांव के बच्चों को पढ़ाती थी। उसे लगता था कि पहाड़ों में रहने वाले बच्चों को भी अच्छे अवसर मिलने चाहिए।

     

    आदित्य को उसकी यह सोच बहुत पसंद थी।

     

    एक दिन नंदिनी ने पूछा—

     

    “आप हमेशा ऐसे ही मिशन पर रहते हैं?”

     

    “अक्सर।”

     

    “और घर?”

     

    आदित्य कुछ पल चुप रहा।

     

    “घर बहुत दूर है। मां-पापा हैं। उनसे मिलने का समय कम मिलता है।”

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा—

     

    “आपको उनकी बहुत याद आती होगी।”

     

    “हां।”

     

    फिर आदित्य ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “आपको?”

     

    “मुझे भी। लेकिन मेरा घर तो यही है।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होने लगी।

     

    आदित्य को एहसास हो चुका था कि वह नंदिनी को पसंद करने लगा है। लेकिन वह जानता था कि उसकी जिंदगी सामान्य नहीं थी।

     

    उसने कभी नंदिनी से कोई वादा नहीं किया।

     

    एक शाम उसे अचानक आदेश मिला।

     

    उसे अगले दिन एक लंबे मिशन पर जाना था।

     

    आदित्य नंदिनी के घर पहुंचा।

     

    नंदिनी ने उसे देखते ही पूछा—

     

    “सब ठीक है?”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    “कहां?”

     

    “ये नहीं बता सकता।”

     

    नंदिनी कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “आप लौटेंगे?”

     

    आदित्य ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “कोशिश पूरी रहेगी।”

     

    नंदिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

     

    “तो मैं इंतजार करूंगी।”

     

    आदित्य ने पहली बार महसूस किया कि उसके लिए लौटना अब सिर्फ ड्यूटी नहीं रहा था।

     

    उसके पीछे कोई इंतजार करने वाला भी था।

     

    कई सप्ताह गुजर गए।

     

    नंदिनी को आदित्य की कोई खबर नहीं मिली। वह रोज शाम गांव के रास्ते की तरफ देखती।

     

    उसके पिता ने कहा—

     

    “बेटी, फौज की जिंदगी ऐसी ही होती है। खबर न मिले तो इसका मतलब हमेशा बुरा नहीं होता।”

     

    नंदिनी चुप रहती।

     

    फिर एक दिन दूर से सेना की गाड़ी दिखाई दी।

     

    गाड़ी से आदित्य उतरा।

     

    नंदिनी उसे देखते ही दरवाजे तक आ गई।

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “कहा था ना… कोशिश पूरी रहेगी।”

     

    नंदिनी की आंखें नम थीं।

     

    “बहुत देर कर दी।”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “माफ करना।”

     

    “मैं नाराज नहीं हूं।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर आदित्य ने उसके पिता के सामने कहा—

     

    “अंकल, मैं नंदिनी को पसंद करता हूं। मेरी जिंदगी आसान नहीं है। कभी मुझे महीनों दूर रहना पड़ सकता है। कभी मेरी ड्यूटी मुझे कहीं भी ले जा सकती है। मैं नंदिनी से कोई झूठा वादा नहीं करना चाहता। लेकिन अगर आप दोनों की सहमति हो तो मैं उसके साथ अपनी जिंदगी बिताने की इच्छा रखता हूं।”

     

    नंदिनी के पिता कुछ देर उसे देखते रहे।

     

    फिर मुस्कुराकर बोले—

     

    “बेटा, तुमने मेरी बेटी से प्यार करने से पहले उसकी जिंदगी की सच्चाई समझी है। इससे बड़ी बात मेरे लिए कुछ नहीं।”

     

    नंदिनी की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

     

    कुछ महीनों बाद दोनों ने परिवार की सहमति से शादी कर ली।

     

    शादी के बाद भी आदित्य की ड्यूटी चलती रही। वह अक्सर दूर रहता, लेकिन जब भी छुट्टी मिलती, उसी पहाड़ी घर में लौटता।

     

    एक दिन वह उसी कमरे में बैठा था, जहां पहली बार उसने नंदिनी की तस्वीर देखी थी।

     

    अब उसी दीवार पर उनकी शादी की तस्वीर लगी थी।

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “उस रात मेरी तस्वीर देखकर आपको क्या लगा था?”

     

    आदित्य हंस पड़ा।

     

    “सच बताऊं?”

     

    “हां।”

     

    “मुझे लगा था कि मौसम खराब होने की वजह से मैं बस कुछ घंटों के लिए इस घर में रुका हूं।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    आदित्य ने उसकी ओर देखकर कहा—

     

    “फिर पता चला कि वो बारिश मुझे जिंदगी का सबसे खूबसूरत रास्ता दिखाने आई थी।”

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    आदित्य ने खिड़की से बाहर देखा और मुस्कुराया।

     

    जिस तूफान ने उसे उस रात रास्ते में रोक दिया था, उसी तूफान ने उसे उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत रिश्ता दे दिया था।

     

    और नंदिनी के लिए भी वह सिर्फ एक फौजी नहीं था।

     

    वह उस रात की बारिश से मिला वह इंसान था, जिसने उसे सिखाया था कि कभी-कभी जिंदगी की सबसे खूबसूरत मुलाकातें बिल्कुल अनजाने में होती हैं।

  • वफादार कुत्ता

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    वफादार पालतू कुत्ता

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटे से गांव में अर्जुन अपनी पत्नी सीमा और दस साल के बेटे रोहन के साथ रहता था। उनका घर छोटा था, लेकिन परिवार बहुत खुश था। घर के बाहर एक बड़ा-सा आंगन था और आंगन के एक कोने में लकड़ी का छोटा-सा शेड बना था।

     

    एक दिन अर्जुन बाजार से लौट रहा था। रास्ते में उसे सड़क किनारे एक छोटा-सा घायल पिल्ला दिखाई दिया। पिल्ला लगातार कराह रहा था और डर के मारे एक पेड़ के पीछे छिपा था।

     

    अर्जुन ने उसे धीरे से उठाया।

     

    “अरे बेचारे… तुझे किसने इतना चोट पहुंचा दी?”

     

    पिल्ले ने डरते हुए अर्जुन की तरफ देखा।

     

    अर्जुन उसे घर ले आया।

     

    रोहन पिल्ले को देखते ही खुश हो गया।

     

    “पापा! ये हमारे साथ रहेगा?”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “अगर इसकी तबीयत ठीक हो गई तो क्यों नहीं?”

     

    सीमा ने उसके घाव साफ किए और उसे दूध दिया।

     

    कुछ ही दिनों में पिल्ला ठीक होने लगा। रोहन ने उसका नाम रखा—शेरू।

     

    शेरू बहुत समझदार था। वह पूरे दिन रोहन के आसपास रहता। रोहन स्कूल जाता तो दरवाजे तक छोड़ने जाता और जब तक वह लौटकर नहीं आता, दरवाजे के पास बैठा रहता।

     

    एक दिन रोहन स्कूल से लौटकर आया तो उसके हाथ में एक छोटा-सा बिस्कुट का पैकेट था।

     

    उसने शेरू को देखकर कहा, “देख, तेरे लिए क्या लाया हूं!”

     

    शेरू खुशी से पूंछ हिलाने लगा।

     

    रोहन ने उसे बिस्कुट दिया और बोला, “तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त है।”

     

    शेरू ने जैसे उसकी बात समझ ली। वह उसके पैरों के पास बैठ गया।

     

    समय बीतता गया और छोटा-सा पिल्ला बड़ा होकर मजबूत कुत्ता बन गया। उसका रंग भूरा था और गले में लाल पट्टा बंधा रहता था।

     

    अर्जुन ने घर की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी शेरू को दे दी।

     

    लेकिन शेरू सिर्फ घर की रखवाली नहीं करता था। वह परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखता था।

     

    सुबह अर्जुन खेत पर जाता तो शेरू कुछ दूर तक उसके साथ जाता।

     

    सीमा कुएं से पानी भरने जाती तो शेरू उसके पीछे चलता।

     

    और रोहन स्कूल जाता तो शेरू हमेशा गेट तक उसे छोड़ने जाता।

     

    एक दिन रोहन ने हंसते हुए कहा, “शेरू, तू मुझे स्कूल छोड़ने क्यों आता है? मैं बच्चा नहीं हूं।”

     

    शेरू ने उसकी तरफ देखा और पूंछ हिलाई।

     

    रोहन हंस पड़ा।

     

    “अच्छा बाबा, चल।”

     

    एक शाम अचानक गांव में तेज बारिश शुरू हो गई। बिजली चमक रही थी और हवा बहुत तेज चल रही थी।

     

    अर्जुन घर लौटने में देर कर रहा था।

     

    सीमा बार-बार दरवाजे की तरफ देख रही थी।

     

    “पता नहीं आज इतनी देर क्यों हो गई।”

     

    शेरू भी बेचैन था।

     

    वह बार-बार दरवाजे तक जाता और बाहर देखने लगता।

     

    रात काफी हो गई, लेकिन अर्जुन नहीं आया।

     

    सीमा ने पड़ोसियों को खबर की।

     

    कुछ लोग टॉर्च लेकर अर्जुन को खोजने निकल पड़े।

     

    शेरू भी उनके साथ दौड़ पड़ा।

     

    करीब एक किलोमीटर दूर खेत के पास उन्हें अर्जुन की साइकिल मिली।

     

    लेकिन अर्जुन वहां नहीं था।

     

    शेरू जमीन सूंघते हुए आगे बढ़ने लगा।

     

    एक आदमी बोला, “लगता है कुत्ता किसी तरफ जा रहा है।”

     

    सब लोग उसके पीछे चल दिए।

     

    थोड़ी दूर जाकर शेरू एक गड्ढे के पास रुक गया और जोर-जोर से भौंकने लगा।

     

    नीचे अर्जुन गिरा हुआ था।

     

    वह घायल था और उठ नहीं पा रहा था।

     

    लोगों ने तुरंत उसे बाहर निकाला और अस्पताल ले गए।

     

    डॉक्टर ने कहा, “अगर थोड़ी और देर हो जाती तो मुश्किल हो सकती थी।”

     

    सीमा ने शेरू को गले लगा लिया।

     

    “तूने आज मेरे पति की जान बचा ली।”

     

    शेरू चुपचाप उसके पैरों के पास बैठ गया।

     

    उस दिन के बाद पूरे गांव में शेरू की चर्चा होने लगी।

     

    लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    कुछ महीनों बाद अर्जुन को काम के सिलसिले में शहर जाना पड़ा। सीमा और रोहन भी उसके साथ गए। घर की देखभाल के लिए शेरू को पड़ोसी चाचा के पास छोड़ दिया गया।

     

    रोहन जाते समय शेरू को गले लगाकर बोला, “हम जल्दी वापस आएंगे।”

     

    शेरू ने रोहन को जाते हुए बहुत देर तक देखा।

     

    तीन दिन बाद परिवार वापस लौट आया।

     

    गाड़ी घर के पास रुकी।

     

    दरवाजा खुलते ही शेरू दौड़ता हुआ आया।

     

    वह कभी अर्जुन के पास जाता, कभी सीमा के और फिर रोहन के पास जाकर उछलने लगा।

     

    रोहन ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मुझे पता था तू हमें बहुत याद कर रहा होगा।”

     

    शेरू खुशी से पूंछ हिलाता रहा।

     

    कुछ दिन बाद एक रात घर में अजीब आवाज हुई।

     

    शेरू अचानक उठ गया।

     

    वह दरवाजे की तरफ देखने लगा।

     

    अर्जुन ने नींद में पूछा, “क्या हुआ?”

     

    शेरू धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया और जोर से भौंकने लगा।

     

    अर्जुन उठकर बाहर आया।

     

    आंगन में सब कुछ शांत था।

     

    “कुछ नहीं है शेरू। सो जा।”

     

    लेकिन शेरू शांत नहीं हुआ।

     

    वह घर के पीछे की तरफ भागा।

     

    अर्जुन भी उसके पीछे गया।

     

    वहां दीवार के पास एक आदमी छिपा हुआ था। अर्जुन को देखते ही वह भागने लगा।

     

    शेरू उसके पीछे दौड़ा और जोर-जोर से भौंकने लगा।

     

    आवाज सुनकर पड़ोसी भी बाहर आ गए।

     

    वह आदमी पकड़ा गया।

     

    पता चला कि वह कई दिनों से गांव के घरों की रेकी कर रहा था।

     

    अर्जुन ने शेरू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “तू सच में हमारे घर का रखवाला है।”

     

    शेरू ने जैसे जवाब में उसकी हथेली चाट ली।

     

    समय बीतता गया।

     

    रोहन बड़ा होने लगा।

     

    अब वह स्कूल के बाद पढ़ाई करने बैठता तो शेरू उसके पास ही लेट जाता।

     

    परीक्षा के दिनों में रोहन देर रात तक पढ़ता।

     

    सीमा कहती, “रोहन, अब सो जाओ।”

     

    रोहन कहता, “बस थोड़ा और।”

     

    शेरू उसके पैरों के पास बैठा रहता।

     

    एक रात रोहन किताब पढ़ते-पढ़ते वहीं सो गया।

     

    सुबह सीमा ने देखा कि शेरू पूरी रात उसके पास बैठा रहा था।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “तू भी ना… इसे अकेला नहीं छोड़ता।”

     

    शेरू ने आंखें झपकाईं।

     

    कुछ साल बाद शेरू बूढ़ा हो गया।

     

    अब वह पहले की तरह तेज नहीं दौड़ पाता था। ज्यादा समय आंगन में बैठकर बिताता।

     

    रोहन अब कॉलेज जाने लगा था।

     

    एक दिन वह शहर जाने के लिए बस में बैठ रहा था।

     

    शेरू गेट तक आया।

     

    रोहन ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “मैं जल्दी वापस आऊंगा दोस्त।”

     

    शेरू बस को तब तक देखता रहा, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गई।

     

    उस दिन शाम को शेरू खाना भी नहीं खा रहा था।

     

    सीमा ने कहा, “रोहन को याद कर रहा है।”

     

    अर्जुन बोला, “वो जल्दी आएगा।”

     

    दो दिन बाद रोहन अचानक घर लौट आया।

     

    शेरू ने जैसे ही उसकी आवाज सुनी, वह अपनी पूरी ताकत से उठकर दरवाजे तक पहुंचा।

     

    रोहन ने उसे गले लगा लिया।

     

    “शेरू!”

     

    दोनों कुछ देर वैसे ही बैठे रहे।

     

    रोहन की आंखों में आंसू थे।

     

    “तूने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।”

     

    शेरू ने धीरे से अपना सिर उसकी गोद में रख दिया।

     

    कुछ महीने बाद शेरू बहुत कमजोर हो गया।

     

    एक शाम पूरा परिवार उसके पास बैठा था।

     

    रोहन उसका सिर सहला रहा था।

     

    “तूने हमारे लिए बहुत कुछ किया है शेरू।”

     

    अर्जुन ने कहा, “ये सिर्फ हमारा पालतू कुत्ता नहीं था… ये हमारे परिवार का हिस्सा था।”

     

    सीमा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    शेरू ने एक-एक करके तीनों की तरफ देखा।

     

    फिर उसने धीरे से अपनी पूंछ हिलाई।

     

    उस रात परिवार उसके पास ही बैठा रहा।

     

    अगली सुबह शेरू शांत था।

     

    उसने अपनी जिंदगी प्यार और वफादारी से जी थी।

     

    रोहन ने उसकी पुरानी लाल पट्टी हाथ में लेकर कहा—

     

    “लोग कहते हैं कुत्ता इंसान का सबसे वफादार दोस्त होता है… लेकिन मेरे लिए शेरू सिर्फ दोस्त नहीं था। वह मेरा परिवार था।”

     

    अर्जुन ने शेरू की याद में आंगन के उसी नीम के पेड़ के नीचे एक छोटा-सा पत्थर रखा।

    उस पर लिखा“शेरू — जिसने घर की रखवाली नहीं, हमारे दिलों की रखवाली की।”

     

    और आज भी जब रोहन गांव आता, वह उस जगह बैठकर कुछ देर शेरू को याद करता।

     

    क्योंकि कुछ रिश्ते बोलकर नहीं निभाए जाते।

     

    वे बस दिल से निभाए जाते हैं।

     

    और शेरू ने अपने पूरे जीवन में यही साबित किया था कि सच्ची वफादारी शब्दों की मोहताज नहीं होती।

  • बूढ़ी अम्मा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बूढ़ी अम्मा अकेली रहती थी

     

    गांव के आखिरी छोर पर एक छोटी-सी मिट्टी की झोपड़ी थी। झोपड़ी के बाहर नीम का पुराना पेड़ और उसके नीचे लकड़ी की एक टूटी हुई चौकी पड़ी रहती थी। उसी झोपड़ी में करीब सत्तर साल की एक बूढ़ी अम्मा अकेली रहती थी।

     

    गांव वाले उसे प्यार से जमुना अम्मा कहते थे।

     

    अम्मा की जिंदगी बहुत साधारण थी। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना, आंगन में झाड़ू लगाना, चूल्हे पर चाय बनाना और फिर नीम के पेड़ के नीचे बैठकर भगवान का नाम लेना।

     

    लेकिन उसकी जिंदगी में एक चीज बहुत बड़ी थी—अकेलापन।

     

    उसका पति कई साल पहले गुजर चुका था। उनका एक बेटा था, मोहन। मोहन नौकरी की तलाश में शहर गया और वहीं शादी करके बस गया। शुरुआत में वह हर महीने अम्मा को पैसे भेजता था और फोन भी करता था।

     

    फिर धीरे-धीरे फोन कम हो गए।

     

    एक दिन अम्मा ने फोन किया।

     

    “बेटा, बहुत दिन हो गए तेरी आवाज नहीं सुनी।”

     

    उधर से मोहन ने जल्दी में कहा, “अम्मा, काम बहुत है। बाद में बात करता हूं।”

     

    “बेटा… घर कब आएगा?”

     

    “जल्दी आऊंगा।”

     

    फोन कट गया।

     

    अम्मा कुछ देर तक मोबाइल को देखती रही। फिर मुस्कुराकर बोली, “मेरा बेटा बहुत काम करता है… बेचारा।”

     

    वह हमेशा अपने बेटे के लिए कोई न कोई बहाना बना लेती थी।

     

    गांव के कुछ लोग कहते थे, “अम्मा को मोहन के पास चले जाना चाहिए।”

     

    अम्मा बस इतना कहती, “बेटे का अपना घर है। मैं यहां ठीक हूं।”

     

    असल में वह ठीक नहीं थी।

     

    रात को जब चारों तरफ सन्नाटा छा जाता, तब उसे अपने पति की याद आती। कभी बेटे के बचपन की आवाजें सुनाई देतीं, कभी लगता जैसे मोहन आंगन में दौड़ रहा हो।

     

    लेकिन आंखें खोलती तो सामने खाली आंगन होता।

     

    एक बरसात की रात बहुत तेज बारिश हो रही थी। अम्मा ने दरवाजा बंद किया और चूल्हे के पास बैठ गई। तभी बाहर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    अम्मा चौंक गई।

     

    “इतनी रात को कौन बच्चा रो रहा है?”

     

    वह छड़ी लेकर बाहर निकली।

     

    दरवाजे के पास एक छोटा-सा लड़का बारिश में भीगा हुआ बैठा था।

     

    अम्मा ने उसे तुरंत अंदर खींच लिया।

     

    “अरे बेटा! कौन हो तुम? यहां कैसे आए?”

     

    लड़का कांपते हुए बोला, “मेरा नाम सोनू है… मैं रास्ता भूल गया हूं।”

     

    अम्मा ने उसे सूखा कपड़ा दिया और चूल्हे के पास बैठाया।

     

    “डर मत। आज रात तू यहीं रहेगा।”

     

    उसने गर्म दूध बनाया और बच्चे को पिला दिया।

     

    कुछ देर बाद सोनू सो गया।

     

    अम्मा उसे देखते हुए देर तक बैठी रही।

     

    कई साल बाद उसके घर में किसी बच्चे की सांसों की आवाज गूंज रही थी।

     

    उस रात अम्मा को पहली बार अपना घर खाली नहीं लगा।

     

    सुबह होते ही सोनू को गांव के लोग पहचान गए। वह पड़ोस के गांव का बच्चा था, जो अपनी मां के साथ मेले में आया था और भीड़ में बिछड़ गया था।

     

    उसकी मां रोती हुई अम्मा के घर पहुंची।

     

    “अम्मा, आपने मेरे बेटे को बचा लिया। मैं आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी।”

     

    अम्मा मुस्कुराई।

     

    “अरे इसमें एहसान की क्या बात है? बच्चा था, उसे घर दे दिया।”

     

    सोनू जाते-जाते अम्मा के गले लग गया।

     

    “अम्मा, मैं फिर आऊंगा।”

     

    अम्मा की आंखें भर आईं।

     

    “जरूर आना बेटा।”

     

    उस दिन के बाद सोनू सच में हर कुछ दिनों में अम्मा से मिलने आने लगा।

     

    कभी उसके लिए फल लाता, कभी आंगन में झाड़ू लगा देता।

     

    धीरे-धीरे गांव के दूसरे बच्चे भी अम्मा के घर आने लगे।

     

    कोई कहानी सुनने आता, कोई गुड़ खाने।

     

    अम्मा का सूना आंगन बच्चों की हंसी से भरने लगा।

     

    लेकिन गांव में एक आदमी ऐसा भी था जिसे यह सब पसंद नहीं था। उसका नाम रघु था। वह अम्मा की जमीन पर नजर रखता था।

     

    एक दिन उसने अम्मा से कहा, “अम्मा, तुम्हारी उम्र हो गई है। ये जमीन मुझे दे दो। मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगा।”

     

    अम्मा ने साफ मना कर दिया।

     

    “मेरी जमीन मेरे पति की आखिरी निशानी है।”

     

    रघु नाराज हो गया।

     

    “अकेली औरत कब तक संभाल पाएगी इसे?”

     

    अम्मा ने उसकी आंखों में देखकर कहा, “जब तक सांस है, अपने घर की रखवाली खुद करूंगी।”

     

    कुछ दिनों बाद अम्मा अचानक बीमार पड़ गई।

     

    गांव वालों ने डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने कहा कि अम्मा को आराम की जरूरत है।

     

    उस रात अम्मा ने अपने पुराने संदूक से बेटे की बचपन की तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर को सीने से लगाकर बोली, “मोहन… तू जहां भी है, खुश रहना।”

     

    उसी समय बाहर से आवाज आई।

     

    “अम्मा!”

     

    सोनू दरवाजे पर खड़ा था।

     

    उसके साथ उसकी मां भी थी।

     

    “अम्मा, आप बीमार हैं और आपने हमें बताया भी नहीं?”

     

    अम्मा ने कमजोर आवाज में कहा, “मैं ठीक हूं बेटा।”

     

    सोनू की मां बोली, “अब आप अकेली नहीं रहेंगी। हम रोज आपके पास आएंगे।”

     

    अम्मा की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “मैंने तो सोचा था, बुढ़ापे में किसी को मेरी जरूरत नहीं होगी।”

     

    सोनू ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे आपकी जरूरत है अम्मा।”

     

    यह सुनकर अम्मा मुस्कुरा दी।

     

    कुछ दिनों बाद मोहन अचानक गांव आया।

     

    अम्मा उसे देखते ही दरवाजे तक दौड़ी।

     

    “मोहन!”

     

    मोहन ने मां को गले लगा लिया।

     

    काफी देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर मोहन की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “अम्मा, मुझे माफ कर दो।”

     

    अम्मा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटा, मां अपने बच्चे से नाराज नहीं रहती।”

     

    मोहन बोला, “मैंने सोचा था आप गांव में खुश होंगी। लेकिन मुझे पता नहीं था कि आप इतनी अकेली हो गई हैं।”

     

    अम्मा ने मुस्कुराकर कहा, “अब अकेली कहां हूं?”

     

    तभी बाहर से सोनू की आवाज आई—

     

    “अम्मा! मैं आ गया!”

     

    फिर कई बच्चे दौड़ते हुए अंदर आए।

     

    मोहन उन्हें देखकर मुस्कुराया।

     

    उसने मां की ओर देखा और कहा, “अम्मा, लगता है आपने अपना पूरा परिवार बना लिया।”

     

    अम्मा हंस पड़ी।

     

    “परिवार खून से नहीं, बेटा… अपनापन से बनता है।”

     

    उस दिन मोहन ने फैसला किया कि वह हर महीने गांव आएगा और मां को अपने साथ ले जाने की जिद नहीं करेगा। क्योंकि अब वह समझ चुका था कि अम्मा को सिर्फ छत नहीं चाहिए थी।

     

    उसे अपनों की जरूरत थी।

     

    उसके बाद अम्मा का घर गांव का सबसे प्यारा घर बन गया।

     

    सुबह बच्चे वहां आते, दोपहर में पड़ोस की औरतें बैठतीं और शाम को मोहन फोन करता।

     

    नीम के पेड़ के नीचे बैठी अम्मा अक्सर आसमान की ओर देखकर कहती—

     

    “भगवान, मैंने सोचा था बुढ़ापे में मेरा घर सूना हो जाएगा… लेकिन आपने तो इसे लोगों के प्यार से भर दिया।”

     

    और सच ही तो था।

     

    अम्मा पहले अकेली रहती थी।

     

    लेकिन अब उसके घर में रहने वाला कोई एक इंसान नहीं था।

     

    उसका घर पूरे गांव का घर बन चुका था।

  • दोस्ती जो हादसे से नहीं बदली

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दोस्ती जो हादसे के बाद भी नहीं बदली

     

    राघव और समीर बचपन से दोस्त थे। दोनों एक ही छोटे से गांव में पले-बढ़े थे। घर की हालत साधारण थी, लेकिन दोनों के सपने बड़े थे।

     

    राघव हमेशा कहता था, “मैं पुलिस वाला बनूंगा।”

     

    समीर हंसकर कहता, “और मैं बड़ा बिजनेसमैन बनूंगा।”

     

    दोनों घंटों अपने भविष्य की बातें करते।

     

    समय बीता तो राघव ने मेहनत करके पुलिस की नौकरी हासिल कर ली। गांव में उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। समीर ने भी शहर जाकर काम शुरू कर दिया।

     

    नौकरी लगने के बाद राघव ने एक दिन समीर से कहा—

     

    “अब तेरी बारी है। तू भी अपना सपना पूरा कर।”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “मेरा सपना थोड़ा बड़ा है दोस्त, वक्त लगेगा।”

     

    राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “वक्त चाहे जितना लगे, मैं तेरे साथ हूं।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया कि जिंदगी चाहे जहां ले जाए, उनकी दोस्ती कभी नहीं बदलेगी।

     

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

     

    एक रात समीर अपनी बाइक से शहर से गांव लौट रहा था। रास्ते में एक तेज रफ्तार वाहन से उसकी बाइक की टक्कर हो गई।

     

    हादसा इतना गंभीर था कि समीर कई दिनों तक अस्पताल में रहा।

     

    जब उसे होश आया, तो वह अपने आसपास किसी को पहचान नहीं पा रहा था।

     

    उसकी याददाश्त बुरी तरह प्रभावित हुई थी। इलाज के बाद भी वह पहले जैसा नहीं हो पाया।

     

    परिवार की आर्थिक हालत खराब थी। कुछ समय बाद उसके घरवालों ने उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन समीर अक्सर घर से निकल जाता।

     

    वह शहर की सड़कों पर भटकने लगा।

     

    धीरे-धीरे लोग उसे पागल समझने लगे।

     

    कोई उसे देखकर हंसता, कोई चिढ़ाता और कोई उसे सड़क से हटाने के लिए डांट देता।

     

    समीर को कुछ बातें याद थीं, मगर सब कुछ धुंधला था।

     

    उसे सिर्फ एक नाम याद था—

     

    “राघव…”

     

    एक दिन वह पुलिस थाने के सामने बैठा था।

     

    उसी समय राघव की नजर उस पर पड़ी।

     

    राघव कुछ पल के लिए वहीं खड़ा रह गया।

     

    “समीर?”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में पहचान नहीं थी।

    राघव उसके पास बैठ गया।

     

    “मुझे पहचानता है?”

    समीर चुप रहा।

     

    राघव ने धीरे से कहा

    “हमने बचपन में नदी के किनारे पतंग उड़ाई थी। तू पतंग उड़ाता था और मैं धागा पकड़ता था।”

     

    समीर के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    लेकिन अगले ही पल वह फिर चुप हो गया।

     

    राघव की आंखें भर आईं।

     

    उस दिन उसने तय कर लिया कि वह अपने दोस्त को अकेला नहीं छोड़ेगा।

     

    उसने समीर के लिए खाना लाना शुरू किया।

     

    हर दिन ड्यूटी खत्म होने के बाद वह उसे ढूंढने निकलता।

     

    कभी समीर मंदिर के पास मिलता, कभी बस स्टैंड पर और कभी किसी दुकान के बाहर बैठा हुआ।

     

    राघव उसके पास बैठकर घंटों बातें करता।

     

    “आज पता है क्या हुआ?”

    समीर उसकी तरफ देखता।

    “क्या?”

    “आज थाने में एक आदमी अपनी पत्नी से झगड़कर आया था।”

     

    समीर हंसने लगता।

    राघव भी हंस देता।

    कई लोग राघव से कहते

    “साहब, आप इतना समय इस आदमी पर क्यों लगाते हैं?”

     

    राघव जवाब देता

    “क्योंकि ये कोई सड़क पर रहने वाला पागल नहीं है। ये मेरा दोस्त है।”

     

    एक दिन राघव ने समीर के लिए नए कपड़े खरीदे।

    “ले, पहनकर देख।”

    समीर ने कपड़े हाथ में लिए और बोला

    “मेरे पास पैसे नहीं हैं।”राघव मुस्कुराया।

     

    “तूने कब से अपने दोस्त से पैसे देने शुरू कर दिए?”

     

    समीर कुछ देर उसे देखता रहा।

    फिर अचानक बोला

    “दोस्त…”

    राघव के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

    “हां, दोस्त।”

    उस दिन समीर ने पहली बार राघव को पुराने दिनों की तरह देखा था।

     

    लेकिन उसकी याद पूरी तरह वापस नहीं आई।

     

    कुछ महीने बाद शहर में एक बड़ा अपराध हुआ। पुलिस अपराधी की तलाश कर रही थी।

    राघव जांच में लगा हुआ था।

    एक दिन समीर अचानक थाने के बाहर आया।

     

    उसने राघव से कहा

    “मुझे एक जगह याद आ रही है।”

    राघव ने पूछा “कहां?”

    समीर ने शहर के पुराने गोदाम का नाम लिया।

    “वहां… कोई मुझे ले गया था।”

    राघव चौंक गया।

    हादसे से पहले समीर ने उसी इलाके में कुछ संदिग्ध लोगों को देखा था। वह शायद किसी महत्वपूर्ण घटना का गवाह था।

     

    राघव ने उसकी बात गंभीरता से ली।

    जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि समीर ने सच में कुछ महत्वपूर्ण देखा था।

     

    उसकी जानकारी से पुलिस को अपराधियों तक पहुंचने में मदद मिली।

    मामला सुलझ गया।

    लेकिन राघव के लिए सबसे बड़ी खुशी यह नहीं थी।

     

    उसके लिए खुशी की बात यह थी कि उसका दोस्त धीरे-धीरे अपनी पुरानी यादें वापस पा रहा था।

     

    एक शाम दोनों उसी नदी के किनारे बैठे थे जहां बचपन में पतंग उड़ाते थे।

     

    समीर ने पानी की तरफ देखते हुए कहा

    “राघव… मुझे सब याद नहीं है।”

    राघव ने कहा“कोई बात नहीं।”

    “मुझे डर लगता है कि मैं कभी पहले जैसा नहीं बन पाऊंगा।”

     

    राघव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

    “तुझे पहले जैसा बनने की जरूरत नहीं है।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

    राघव मुस्कुराया।

    “तू आज भी मेरा वही दोस्त है। बस तेरी जिंदगी ने रास्ता थोड़ा मुश्किल कर दिया है।”

    समीर की आंखों में आंसू आ गए।

    “तूने मेरा साथ क्यों नहीं छोड़ा?”

    राघव ने हंसते हुए कहा

    “क्योंकि दोस्ती नौकरी नहीं है कि मन हुआ तो छोड़ दी।”दोनों हंस पड़े।

    कुछ समय बाद समीर का इलाज बेहतर अस्पताल में शुरू हुआ। उसकी हालत धीरे-धीरे सुधरने लगी।

     

    वह अब सड़क पर नहीं भटकता था। राघव ने उसके परिवार से भी संपर्क किया और उसकी देखभाल का इंतजाम कराया।

     

    समीर की जिंदगी पूरी तरह पहले जैसी नहीं हुई, लेकिन अब उसके पास एक सुरक्षित जगह थी, इलाज था और सबसे बढ़कर उसका दोस्त था।

     

    एक दिन समीर ने राघव से कहा

    “मेरा बिजनेस वाला सपना तो पूरा नहीं हुआ।”

    राघव ने कहा“तो नया सपना बना।”

    समीर ने पूछा“क्या?”

    राघव मुस्कुराया।

    “ऐसे लोगों के लिए कुछ करना जो हादसे के बाद अकेले रह जाते हैं।”

    समीर ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बोला“शायद यही मेरा असली सपना हो।”

    दोनों ने हाथ मिलाया।

     

    कुछ साल बाद समीर ने सड़क पर रहने वाले जरूरतमंद लोगों के लिए एक छोटा-सा सहायता केंद्र शुरू किया।

     

    राघव जब भी ड्यूटी से छुट्टी पाता, वहां जरूर जाता।

     

    लोग अक्सर पूछते“आप दोनों की दोस्ती इतनी मजबूत कैसे है?”

    राघव मुस्कुराकर कहता

    “क्योंकि असली दोस्त वही होता है जो तब भी साथ खड़ा रहे, जब पूरी दुनिया तुम्हें पहचानना बंद कर दे।”

    और समीर हर बार उसकी बात पूरी करता

    “किस्मत ने मुझे सड़क पर ला दिया था… लेकिन मेरे दोस्त ने मुझे फिर से जिंदगी की राह पर खड़ा कर दिया।”

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(Last part-3)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

     

    राघव ने तुरंत मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    “माँ!”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    नंदिनी उसके पीछे खड़ी कांप रही थी।

     

    सीढ़ियों के नीचे माँ नहीं थीं।

     

    वहाँ सिर्फ उनकी चप्पलें पड़ी थीं।

     

    राघव ने चारों तरफ देखा।

     

    “माँ कहाँ गईं?”

     

    तभी ऊपर से आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही कदमों की आवाज।

     

    राघव ने धीरे से सिर उठाया।

     

    छत की सीढ़ियों पर कोई खड़ा था।

     

    लंबे बाल।

     

    सफेद कपड़े।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “भैया… वो कौन है?”

     

    राघव ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह आकृति धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी।

     

    एक सीढ़ी।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    हर कदम के साथ उसकी गर्दन थोड़ी ऊपर उठ रही थी।

     

    राघव ने नंदिनी का हाथ पकड़ा।

     

    “भागो!”

     

    दोनों नीचे की तरफ दौड़े।

     

    पीछे से तेज कदमों की आवाज आने लगी।

     

    ठक-ठक-ठक-ठक!

     

    वे नीचे कमरे में घुसे और दरवाज़ा बंद कर लिया।

     

    राघव ने कुर्सी लगाकर दरवाज़ा रोक दिया।

     

    कुछ सेकंड तक बाहर सन्नाटा रहा।

     

    फिर दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।

     

    टक… टक…

     

    राघव और नंदिनी ने एक-दूसरे को देखा।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “राघव…”

     

    यह उनकी माँ की आवाज थी।

     

    राघव दरवाज़ा खोलने ही वाला था कि नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं!”

     

    “माँ हैं!”

     

    “नहीं भैया।”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा—

     

    “माँ मुझे हमेशा नंदू कहती हैं। उसने आपका नाम लिया है।”

     

    राघव को पिता की डायरी याद आई।

     

    “जो चीज़ उस रात आई थी, उसने रिया का चेहरा पहन लिया।”

     

    दरवाज़े के बाहर आवाज फिर आई।

     

    इस बार वह नंदिनी की आवाज थी।

     

    “भैया, दरवाज़ा खोलो।”

     

    फिर राघव की अपनी आवाज—

     

    “दरवाज़ा खोलो।”

     

    फिर पिता की आवाज—

     

    “राघव…”

     

    फिर रिया की आवाज—

     

    “भैया…”

     

    राघव के शरीर में कंपकंपी होने लगी।

     

    बाहर खड़ी चीज़ उनके घर के हर सदस्य की आवाज निकाल सकती थी।

     

    लेकिन वह थी कौन?

     

    राघव ने डायरी के आखिरी पन्ने याद किए।

     

    वह दौड़कर स्टोर से लाई डायरी उठाने लगा।

     

    एक पन्ने के कोने में कुछ और लिखा था।

     

    “यह घर बनने से पहले यहाँ एक कुआँ था। उस कुएँ में एक लड़की ने आत्महत्या की थी। गाँव वाले कहते थे कि मरने के बाद उसकी आत्मा पानी में नहीं, बल्कि आईने में रहने लगी।”

     

    अगली लाइन थी—

     

    “रिया ने उस रात छत पर एक पुराना आईना देखा था।”

     

    राघव को अचानक कुछ याद आया।

     

    स्टोर रूम में एक टूटा हुआ आईना था।

     

    वह आईना…

     

    जिसे उसने कमरे के कोने में देखा था।

     

    राघव समझ गया।

     

    “नंदिनी, हमें स्टोर रूम वापस जाना होगा।”

     

    “क्या?”

     

    “उस आईने को तोड़ना होगा।”

     

    दोनों पीछे के रास्ते से छत पर पहुँचे।

     

    आश्चर्य की बात थी कि वहाँ अब कोई नहीं था।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

     

    राघव स्टोर रूम में गया।

     

    आईना दीवार के सामने रखा था।

     

    उसके शीशे पर धुंध जमी हुई थी।

     

    राघव ने हाथ से धुंध हटाई।

     

    उसमें उसका चेहरा दिखाई दिया।

     

    फिर नंदिनी का।

     

    फिर…

     

    रिया का।

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    आईने में रिया मुस्कुरा रही थी।

     

    “भैया…”

     

    उसकी आँखों से काला पानी बह रहा था।

     

    राघव ने पास पड़ी लोहे की रॉड उठाई।

     

    रिया ने आईने के अंदर से हाथ बाहर निकाल दिया।

     

    नंदिनी चीख पड़ी।

     

    राघव ने पूरी ताकत से आईने पर वार किया।

     

    छन्न्न्न्न!

     

    आईना टूट गया।

     

    एक साथ पूरे घर में चीख गूँज उठी।

     

    इतनी तेज कि खिड़कियाँ कांपने लगीं।

     

    आईने के टुकड़ों से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    वह धुआँ छत पर घूमता हुआ एक आकृति में बदल गया।

     

    लंबे बाल।

     

    सफेद चेहरा।

     

    आँखों की जगह सिर्फ काले गड्ढे।

     

    वह आकृति राघव की तरफ बढ़ी।

     

    तभी पीछे से माँ की आवाज आई—

     

    “राघव!”

     

    माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।

     

    राघव उनकी तरफ दौड़ा।

     

    “माँ!”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन उसी क्षण नंदिनी चिल्लाई—

     

    “भैया, पीछे देखो!”

     

    राघव ने पीछे देखा।

     

    वह काली आकृति गायब हो चुकी थी।

     

    सिर्फ आईने का एक टुकड़ा फर्श पर पड़ा था।

     

    राघव ने राहत की सांस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे।

     

    “नहीं बेटा…”

     

    “क्या?”

     

    माँ ने धीरे से कहा—

     

    “वह आईने में नहीं थी।”

     

    राघव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तो कहाँ थी?”

     

    माँ ने छत की तरफ देखा।

     

    “वह हमेशा छत पर थी।”

     

    अचानक नंदिनी ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    नंदिनी की आँखें फैल गईं।

     

    “छत पर कोई खड़ा है।”

     

    राघव ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    छत की दीवार के पास रिया खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ था।

     

    वह रो रही थी।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “रिया?”

     

    रिया ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे उसने नहीं मारा था।”

     

    राघव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “फिर किसने?”

     

    रिया ने पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ…

     

    उनके पिता खड़े थे।

     

    लेकिन वह उनके पिता की आत्मा नहीं थी।

     

    उसके चेहरे पर वही काली मुस्कान थी।

     

    रिया ने कहा—

     

    “पापा ने उसे घर में बुलाया था।”

     

    माँ अचानक घुटनों के बल बैठ गईं।

     

    “नहीं…”

     

    राघव ने पिता की डायरी को देखा।

     

    आखिरी पन्ना अचानक अपने आप खुल गया।

     

    उस पर एक नई लाइन लिखी हुई थी—

     

    “मैंने उसे बुलाया नहीं था। मैंने सिर्फ उसे बाहर जाने से रोका था।”

     

    राघव ने सिर उठाया।

     

    काली आकृति अब उसके बिल्कुल सामने थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “दस साल पहले मैंने रिया का चेहरा पहना था…”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “…आज मुझे तुम्हारा चेहरा चाहिए।”

     

    राघव पीछे हटने लगा।

     

    लेकिन तभी रिया उसके सामने आ गई।

     

    उसने उस काली आकृति का हाथ पकड़ लिया।

     

    आसमान में अचानक बिजली चमकी।

     

    एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    और अगले ही पल…

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    सुबह पड़ोसियों ने शर्मा परिवार के घर का दरवाज़ा खुला पाया।

     

    घर के अंदर राघव, नंदिनी और उनकी माँ बेहोश मिले।

     

    छत पर सिर्फ टूटा हुआ आईना पड़ा था।

     

    और उसके पास…

     

    एक पुरानी चाँदी की पायल।

     

    रिया की।

     

    उस दिन के बाद उस घर की छत पर कभी कोई आवाज नहीं आई।

     

    कहानी यहीं खत्म हो जाती…

     

    अगर छह महीने बाद उस घर को खरीदने वाला नया परिवार वहाँ रहने न आया होता।

     

    पहली ही रात…

     

    नए घर का दस साल का बेटा आधी रात को अपनी माँ के कमरे में दौड़ता हुआ आया।

     

    वह कांप रहा था।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    बच्चे ने छत की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “मम्मी…”

     

    “हाँ?”

     

    “छत पर कोई है।”

     

    माँ ने हँसकर कहा—

     

    “बेटा, छत पर तो कोई नहीं है।”

     

    बच्चे ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “नहीं मम्मी…”

     

    फिर उसने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वहाँ एक आदमी खड़ा है। वो बिल्कुल मेरे जैसा दिखता है।”

     

     

    END

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    राघव कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।

     

    ऊपर से फिर वही आवाज आई।

     

    “राघव…”

     

    उसके पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।

     

    यह आवाज वह कैसे भूल सकता था?

     

    यह उसकी छोटी बहन रिया की आवाज थी।

     

    रिया…

     

    जो दस साल पहले मर चुकी थी।

     

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, ऊपर मत जाना।”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर छत की तरफ थी।

     

    कुछ देर बाद आवाज बंद हो गई।

     

    पूरा घर फिर शांत हो गया।

     

    राघव ने माँ को जगाया।

     

    माँ कमरे से बाहर आईं और जैसे ही राघव ने उन्हें सारी बात बताई, उनके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “रिया का नाम मत लेना,” माँ ने कहा।

     

    “क्यों?”

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि वह मरकर भी इस घर से गई नहीं थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    राघव ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब सच बताइए।”

     

    माँ बहुत देर तक चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहना शुरू किया।

     

    दस साल पहले रिया सिर्फ तेरह साल की थी।

     

    उसे रात में छत पर जाकर आसमान देखना बहुत पसंद था।

     

    एक रात वह अचानक छत से गायब हो गई थी।

     

    घर में सबने सोचा कि वह शायद सीढ़ियों से नीचे गई होगी।

     

    लेकिन वह कहीं नहीं मिली।

     

    सुबह उसकी लाश…

     

    माँ आगे नहीं बोल पाईं।

     

    राघव ने पूछा, “कहाँ मिली थी?”

     

    माँ ने कांपते हुए छत के स्टोर रूम की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    राघव के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    “लेकिन वह कमरा तो हमेशा बंद रहा है।”

     

    माँ बोलीं, “उस रात से।”

     

    राघव ने पूछा, “दरवाज़ा बंद किसने किया था?”

     

    माँ ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    अचानक राघव को अपने पिता की आखिरी बात याद आई।

     

    मृत्यु से कुछ दिन पहले उन्होंने उसे चेतावनी दी थी—

     

    “अगर कभी रात में छत से किसी के चलने की आवाज आए… तो दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    तब राघव ने इसे बीमारी के कारण कही गई बात समझा था।

     

    लेकिन अब…

     

    सब कुछ जुड़ रहा था।

     

    अगली सुबह राघव ने स्टोर रूम का ताला देखने का फैसला किया।

     

    वह छत पर गया।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    दिन की रोशनी में रात का डर थोड़ा कम लग रहा था।

     

    लेकिन स्टोर रूम के सामने पहुँचते ही उसकी सांस रुक गई।

     

    दरवाज़े पर खरोंच के निशान थे।

     

    बहुत सारे।

     

    ऐसे निशान जैसे किसी ने अंदर से बाहर निकलने के लिए लकड़ी को नाखूनों से खुरचा हो।

     

    राघव ने हाथ बढ़ाकर दरवाज़े को छुआ।

     

    दरवाज़ा बर्फ जैसा ठंडा था।

     

    उसने ताला देखा।

     

    ताला बाहर से बंद था।

     

    तभी उसकी नजर फर्श पर गई।

     

    वहाँ गीली मिट्टी के छोटे-छोटे पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान स्टोर रूम से निकलकर…

     

    पानी की टंकी तक जा रहे थे।

     

    राघव ने टंकी की तरफ देखा।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह टंकी के पास गया।

     

    ऊपर ढक्कन लगा था।

     

    उसने धीरे से ढक्कन उठाया।

     

    अंदर पानी बिल्कुल काला दिखाई दे रहा था।

     

    और पानी की सतह पर…

     

    एक लंबे बालों का गुच्छा तैर रहा था।

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    उसी समय पीछे से आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    राघव पलटा।

     

    नंदिनी खड़ी थी।

     

    “आप यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    राघव ने तुरंत टंकी का ढक्कन बंद कर दिया।

     

    “कुछ नहीं। नीचे चलो।”

     

    लेकिन नंदिनी की नजर स्टोर रूम पर पड़ी।

     

    “भैया, ये दरवाज़ा तो खुला है।”

     

    राघव ने देखा।

     

    दरवाज़ा सचमुच थोड़ा खुला हुआ था।

     

    उसने तो उसे बंद देखा था।

     

    दोनों कुछ क्षण वहीं खड़े रहे।

     

    फिर अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    नंदिनी के होंठ कांपने लगे।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।

     

    अंदर पूरा अंधेरा था।

     

    टॉर्च जलाकर उसने अंदर देखा।

     

    धूल से भरा कमरा।

     

    पुराना सामान।

     

    टूटी कुर्सी।

     

    एक लकड़ी की पेटी।

     

    और दीवार पर एक पुरानी तस्वीर।

     

    राघव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें पूरा परिवार था।

     

    माँ।

     

    पिता।

     

    राघव।

     

    नंदिनी।

     

    और रिया।

     

    लेकिन तस्वीर में एक अजीब बात थी।

     

    रिया के चेहरे पर किसी ने काले रंग से गोल घेरा बना दिया था।

     

    राघव ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे कुछ लिखा था।

     

    “यह रिया नहीं है।”

     

    राघव की उंगलियाँ कांपने लगीं।

     

    तभी पेटी के अंदर से आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    नंदिनी पीछे हट गई।

     

    राघव ने पेटी खोली।

     

    अंदर पुराने कपड़े, कुछ खिलौने और एक डायरी थी।

     

    डायरी उसके पिता की थी।

     

    राघव ने जल्दी-जल्दी पन्ने पलटे।

     

    एक पन्ने पर लिखा था—

     

    “रिया की मौत दुर्घटना नहीं थी।”

     

    अगली लाइन पढ़ते ही राघव के हाथ से डायरी गिर गई।

     

    “उस रात छत पर रिया के साथ कोई और भी था।”

     

    राघव ने डायरी फिर उठाई।

     

    अगला पन्ना खाली था।

     

    उसके बाद एक वाक्य था—

     

    “जो चीज़ उस रात आई थी, उसने रिया का चेहरा पहन लिया।”

     

    राघव की सांस रुक गई।

     

    उसी समय कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    नंदिनी चीख उठी।

     

    अंदर अंधेरा छा गया।

     

    राघव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    कुंडी हिल नहीं रही थी।

     

    फिर…

     

    अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “भैया…”

     

    राघव जम गया।

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी तरफ मत देखना,” नंदिनी ने कांपते हुए कहा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि…”

     

    नंदिनी की आवाज टूट गई।

     

    “मेरे पीछे कोई खड़ा है।”

     

    राघव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    पीछे से ठंडी सांस उसकी गर्दन पर महसूस हुई।

     

    फिर किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया—

     

    “तुमने मुझे दस साल इंतजार कराया।”

     

    अचानक दरवाज़ा खुल गया।

     

    दोनों भागकर बाहर आए।

     

    राघव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    स्टोर रूम खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान कमरे से बाहर निकलकर सीढ़ियों की तरफ जा रहे थे।

     

    और फिर…

     

    सीढ़ियों पर रुक गए।

     

    राघव ने नीचे देखा।

     

    घर के अंदर उसकी माँ खड़ी थीं।

     

    लेकिन उनकी आँखें बंद थीं।

     

    और उनके पीछे…

     

    एक लंबी काली परछाईं खड़ी थी।

     

    राघव चिल्लाया—

     

    “माँ!”

     

    माँ ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    लेकिन वह उनकी मुस्कान नहीं थी।

     

    उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “अब वह नीचे आ गई है।”

     

    और उसी पल पूरे घर की सारी लाइटें बंद हो गईं।

  • 😱 छत पर कोई था..!!😱(part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब बारह बज रहे थे।लखनऊ की उस पुरानी कॉलोनी में दिन के समय सब कुछ सामान्य लगता था। बच्चे गलियों में खेलते, चाय की दुकानों पर लोग बातें करते और शाम होते ही हर घर की बालकनी में पीली रोशनी जल उठती। लेकिन रात के बाद वही कॉलोनी बिल्कुल बदल जाती थी।

     

    खासकर शर्मा परिवार का घर।

     

    तीन मंज़िला पुराना मकान था। सबसे ऊपर एक खुली छत, जिसके चारों तरफ करीब चार फीट ऊँची दीवार थी। छत के एक कोने में पानी की बड़ी काली टंकी थी और दूसरे कोने में एक पुराना स्टोर रूम, जिसका दरवाज़ा पिछले कई सालों से बंद पड़ा था।

     

    घर में उस समय सिर्फ तीन लोग थे—राघव, उसकी छोटी बहन नंदिनी और उनकी माँ।

     

    पिता की मृत्यु को दो साल हो चुके थे। पिता के जाने के बाद राघव ने ही घर की जिम्मेदारी संभाल ली थी।

     

    उस रात राघव अपने कमरे में बैठकर लैपटॉप पर काम कर रहा था।

     

    तभी…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने स्क्रीन से नजर उठाई।

     

    आवाज़ ऊपर से आई थी।

     

    छत से।

     

    राघव कुछ सेकंड तक चुप बैठा रहा।

     

    फिर दोबारा आवाज आई।

     

    ठक… ठक…

     

    इस बार जैसे कोई छत की फर्श पर धीरे-धीरे चल रहा हो।

     

    राघव ने घड़ी देखी।

     

    12:07 AM.

     

    उसने खुद को समझाया, “शायद बिल्ली होगी।”

     

    वह वापस काम करने लगा।

     

    लेकिन तभी उसके कमरे की खिड़की पर हल्की-सी परछाईं दिखाई दी।

     

    राघव ने चौंककर खिड़की की तरफ देखा।

     

    कुछ नहीं था।

     

    उसने पर्दा हटाया।

     

    नीचे पूरी गली खाली थी।

     

    सड़क की लाइट के नीचे एक आवारा कुत्ता बैठा था, लेकिन वह भी ऊपर आसमान की तरफ देख रहा था।

     

    राघव के शरीर में हल्की सिहरन दौड़ गई।

     

    “अजीब है…”

     

    उसी समय पीछे से नंदिनी की आवाज आई।

     

    “भैया?”

     

    राघव पलटा।

     

    नंदिनी दरवाज़े पर खड़ी थी।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आपने भी आवाज सुनी?”

     

    “कौन-सी आवाज?”

     

    नंदिनी ने छत की तरफ इशारा किया।

     

    “ऊपर कोई चल रहा है।”

     

    राघव कुछ बोलता, उससे पहले फिर आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    जैसे किसी के नंगे पैर सीमेंट की फर्श पर पड़ रहे हों।

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा, “क्या ऊपर कोई है?”

     

    राघव ने कहा, “नहीं। माँ नीचे हैं और पड़ोसी अपने घर में। शायद बिल्ली होगी।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया, लेकिन उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “भैया… मुझे बिल्ली के कदम इतने भारी नहीं लगते।”

     

    राघव ने टॉर्च उठाई।

     

    “चलो देखते हैं।”

     

    दोनों सीढ़ियों से ऊपर जाने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे छत के करीब पहुँच रहे थे, आवाज बंद हो गई।

     

    राघव ने दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

     

    एक पल के लिए उसने सोचा कि वापस चला जाए।

     

    फिर उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    छत खाली थी।

     

    ठंडी हवा चल रही थी।

     

    पानी की टंकी के पास कुछ सूखे पत्ते पड़े थे।

     

    स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद था।

     

    राघव ने टॉर्च चारों तरफ घुमाई।

     

    “देखा? कोई नहीं है।”

     

    नंदिनी ने राहत की सांस ली।

     

    तभी…

     

    टंकी के पीछे से एक छोटी-सी आवाज आई।

     

    छन्न…

     

    जैसे किसी ने कांच की चीज़ गिरा दी हो।

     

    दोनों वहीं रुक गए।

     

    राघव धीरे-धीरे टंकी की तरफ बढ़ा।

     

    पीछे जाकर देखा तो वहाँ कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ फर्श पर एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

     

    नंदिनी ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    राघव ने तुरंत उसका हाथ रोक दिया।

     

    “मत छूना।”

     

    “क्यों?”

     

    राघव खुद नहीं जानता था।

     

    उसने पायल को टॉर्च की रोशनी में देखा।

     

    उस पर काले रंग की मिट्टी लगी हुई थी।

     

    और सबसे अजीब बात…

     

    पायल बिल्कुल गीली थी।

     

    जबकि छत पूरी तरह सूखी थी।

     

    “चलो नीचे,” राघव ने कहा।

     

    दोनों वापस कमरे में आ गए।

     

    लेकिन उस रात किसी को नींद नहीं आई।

     

    सुबह राघव ने पायल माँ को दिखाई।

     

    पायल देखते ही माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उन्होंने उसे हाथ में लेने से इनकार कर दिया।

     

    “इसे घर से बाहर फेंक दो।”

     

    राघव ने पूछा, “आप इसे पहचानती हैं?”

     

    माँ कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “नहीं।”

     

    “माँ, आप झूठ बोल रही हैं।”

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आँखों में डर था।

     

    “कुछ चीज़ों के बारे में जितना कम जानो, उतना अच्छा है।”

     

    उस रात राघव ने पायल घर से बाहर फेंक दी।

     

    लेकिन अगले दिन सुबह वही पायल फिर छत पर पड़ी मिली।

     

    इस बार वह पानी की टंकी के ठीक सामने थी।

     

    राघव ने उसे उठाया और गुस्से में नाली के बाहर फेंक दिया।

     

    नंदिनी ने कहा, “भैया, इसे किसी नदी में फेंक दो।”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रात आई।

     

    11:45 बजे तक सब सो चुके थे।

     

    राघव भी बिस्तर पर लेट गया।

     

    अचानक…

     

    ठक…

     

    उसकी आँख खुल गई।

     

    ठक… ठक…

     

    वही आवाज।

     

    लेकिन इस बार आवाज छत से नहीं आ रही थी।

     

    वह उसके कमरे की छत से आ रही थी।

     

    राघव बिस्तर पर बैठ गया।

     

    कुछ सेकंड बाद उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके कमरे की छत पर चल रहा हो।

     

    धीरे…

     

    बहुत धीरे…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने मोबाइल उठाया और समय देखा।

     

    12:13 AM.

     

    तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

     

    मैसेज में सिर्फ चार शब्द थे—

     

    “ऊपर मत आना। वो जाग गई है।”

     

    राघव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने तुरंत नंबर पर कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    तभी नंदिनी चीखती हुई उसके कमरे में आई।

     

    “भैया!”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “छत पर कोई है!”

     

    राघव ने पूछा, “तुमने देखा?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कौन था?”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    “एक औरत…”

     

    “कैसी औरत?”

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा—

     

    “उसका चेहरा नहीं था।”

     

    उसी क्षण ऊपर से किसी चीज़ के घिसटने की आवाज आई।

     

    घ्र्र्र्र…

     

    फिर…

     

    छत का दरवाज़ा अपने आप बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    राघव और नंदिनी एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    और तभी…

     

    ऊपर से किसी औरत की बहुत धीमी आवाज आई—

     

    “राघव…”

     

    राघव का खून जम गया।

     

    क्योंकि वह आवाज…

     

    उसके पिता की मृत्यु के बाद से उसकी माँ की नहीं, बल्कि उसकी मरी हुई बहन की आवाज़ जैसी थी।

     

    उसकी बहन की मृत्यु दस साल पहले हो चुकी थी।

     

    और उस रात पहली बार राघव को समझ आया—

     

    छत पर कोई था।

     

    और शायद…

     

    वह कई सालों से वहीं था।

  • 😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 3: आखिरी फैसला और सीख)

     

    रघु का पूरा घर डर से काँप रहा था।

     

    दीवार से निकलती काली शाखाएँ धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थीं। बच्चों की चीखें सुनकर सीता उन्हें लेकर दूसरे कमरे में चली गई।

     

    रघु को हरिया की बात याद आई—

     

    “वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

     

    उसे समझ आ गया कि अगर इस श्राप को खत्म करना है, तो उसे वापस उसी जंगल में जाना होगा।

     

    लेकिन इस बार अकेले नहीं।

     

    सुबह होते ही रघु हरिया के पास गया।

     

    हरिया ने उसकी बात सुनी और बोला,

    “इस श्राप को खत्म करने का एक ही रास्ता है।”

     

    “क्या?”

     

    “जिस कुल्हाड़ी से तुमने पेड़ पर पहला वार किया था, उसी से आखिरी वार करना होगा।”

     

    रघु ने पूछा,

    “लेकिन मैं उस पेड़ को काटूँगा तो श्राप खत्म कैसे होगा?”

     

    हरिया बोला,

    “पेड़ को काटना नहीं है। उसके तने में जहाँ से खून निकला था, वहाँ जमीन के अंदर एक पुराना पत्थर दबा है। वही इस श्राप की जड़ है।”

     

    “उसे कैसे निकालेंगे?”

     

    हरिया ने कहा,

    “जिसने लालच में पहला वार किया था, वही अपनी गलती स्वीकार करके उस पत्थर को वापस जमीन में दबाएगा। तभी दरवाजा बंद होगा।”

     

    रघु ने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और हरिया के साथ जंगल की ओर चल पड़ा।

     

    जैसे ही दोनों काले बरगद के पास पहुँचे, हवा तेज हो गई।

     

    पेड़ की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    लेकिन आसपास हवा नहीं चल रही थी।

     

    अचानक पेड़ के तने से आवाज आई—

     

    “रघु…”

     

    रघु रुक गया।

     

    आवाज फिर आई—

     

    “तुम्हारे बच्चों को बचाना है?”

     

    रघु ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    पेड़ बोला—

     

    “तो अपनी कुल्हाड़ी यहाँ छोड़ दो और चले जाओ।”

     

    रघु कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मैं तुम्हारे सामने अपनी गलती मानता हूँ। मैंने लालच में आकर तुम्हें काटा। लेकिन अब मैं किसी और को नुकसान नहीं होने दूँगा।”

     

    अचानक पेड़ जोर से हिलने लगा।

     

    उसकी शाखाओं से काले धुएँ जैसी चीज निकलने लगी।

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “जल्दी! तने के नीचे!”

     

    रघु ने जमीन खोदनी शुरू की।

     

    कुछ ही देर में उसकी कुल्हाड़ी किसी कठोर चीज से टकराई।

     

    टन!

     

    मिट्टी हटाने पर एक काला पत्थर दिखाई दिया।

     

    उस पत्थर पर कई पुराने नाम खुदे हुए थे।

     

    हरिया ने उन नामों को देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “ये वही लोग हैं… जो इस जंगल में गायब हुए थे।”

     

    रघु ने पत्थर उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन पत्थर बहुत भारी था।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “रघु…”

     

    उसने पीछे देखा।

     

    वहाँ उसकी बेटी गुड़िया खड़ी थी।

     

    रघु घबरा गया।

     

    “तुम यहाँ कैसे आई?”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “बाबा, मेरे साथ घर चलो।”

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “उसके पास मत जाना!”

     

    रघु ने ध्यान से देखा।

     

    वह गुड़िया जैसी दिख रही थी, लेकिन उसके पैरों के नीचे परछाई नहीं थी।

     

    रघु पीछे हट गया।

     

    वह आकृति अचानक डरावनी आवाज में हँसने लगी।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    आँखें काली हो गईं और शरीर धुएँ में बदलने लगा।

     

    पेड़ की शाखाएँ रघु की तरफ झपटने लगीं।

     

    हरिया ने कुल्हाड़ी से एक शाखा काट दी।

     

    उसी क्षण पेड़ से भयानक चीख निकली।

     

    रघु ने पूरी ताकत लगाकर काला पत्थर बाहर खींच लिया।

     

    जैसे ही पत्थर बाहर आया, जमीन के नीचे से तेज हवा निकलने लगी।

     

    हरिया चिल्लाया—

     

    “इसे वापस रख!”

     

    रघु ने पत्थर को उसी गड्ढे में वापस रख दिया।

     

    लेकिन इस बार उसने उसे मिट्टी से पूरी तरह ढक दिया।

     

    अचानक सब शांत हो गया।

     

    पेड़ की शाखाएँ रुक गईं।

     

    हवा बंद हो गई।

     

    और फिर काले बरगद की छाल पर बनी लाल धारियाँ धीरे-धीरे गायब होने लगीं।

     

    रघु ने देखा कि पेड़ की एक शाखा टूटकर जमीन पर गिर गई।

     

    उस शाखा के नीचे वही पुरानी कुल्हाड़ी पड़ी थी।

     

    रघु ने उसे उठाया और पेड़ से कहा—

     

    “मुझे माफ करना।”

     

    कुछ पल तक कोई आवाज नहीं आई।

     

    फिर पेड़ के अंदर से बहुत धीमी आवाज आई—

     

    “लालच से लिया था… समझदारी से लौटाया।”

     

    इसके बाद पेड़ बिल्कुल शांत हो गया।

     

    रघु और हरिया गाँव वापस लौट आए।

     

    घर पहुँचकर रघु ने देखा कि दीवार की सारी काली दरारें गायब हो चुकी थीं।

     

    उसके बच्चे सुरक्षित थे।

     

    गाँव वालों ने जब पूरी घटना सुनी तो उन्होंने जंगल के उस हिस्से के चारों ओर पत्थरों की सीमा बना दी।

     

    काले बरगद को किसी ने फिर कभी नहीं छुआ।

     

    कई साल बीत गए।

     

    रघु ने भी लकड़ी काटने का काम छोड़ दिया और गाँव में छोटी-सी दुकान खोल ली।

     

    उसने अपने बच्चों को हमेशा एक बात सिखाई—

     

    “जरूरत इंसान को मेहनत करने के लिए मजबूर कर सकती है, लेकिन लालच उसे गलत रास्ते पर ले जाता है।”

     

    कभी-कभी गाँव के लोग कहते थे कि अमावस्या की रात काले बरगद के पास से गुजरते समय अब भी किसी के कुल्हाड़ी रखने की आवाज सुनाई देती है।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    लेकिन कोई वहाँ जाने की हिम्मत नहीं करता।

     

    और बरवा गाँव में आज भी बुजुर्ग बच्चों को एक बात बताते हैं—

     

    सीख

     

    प्रकृति हमारे जीवन का हिस्सा है। अपनी जरूरत पूरी करने और लालच में फर्क समझना जरूरी है। हमें पेड़-पौधों और जंगलों का सम्मान करना चाहिए। किसी चेतावनी को सिर्फ अंधविश्वास समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब उसके पीछे पुराने अनुभव और किसी की सुरक्षा जुड़ी हो।

     

    क्योंकि कभी-कभी इंसान जिस चीज़ को अपना अधिकार समझकर छीन लेता है, वही चीज़ उसके लिए मुसीबत बन जाती है।

     

    और अगर आप कभी किसी पुराने जंगल में जाएँ…

     

    जहाँ सब लोग आपको किसी एक पेड़ से दूर रहने को कहें…

     

    तो याद रखना—

     

    हर पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होता। कुछ पेड़ अपने अंदर पूरी कहानी छिपाए बैठे होते हैं। 🌳👻

     

     

    End

  • 😱जिस पेड़ को काटना मना था..!!😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    (भाग 2: जंगल की वापसी)

     

    सुबह जब रघु की आँख खुली तो उसकी हालत देखकर सीता घबरा गई।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था और आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे।

     

    सीता ने पूछा,

    “क्या हुआ तुम्हें?”

     

    रघु ने रात की पूरी घटना बता दी।

     

    सीता कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने कहा,

    “आज जंगल मत जाना।”

     

    रघु ने हामी भर दी।

     

    लेकिन उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    रघु ने दरवाजा खोला तो सामने गाँव का बूढ़ा हरिया खड़ा था।

     

    हरिया ने रघु को देखते ही पूछा,

    “तू कल जंगल गया था?”

     

    रघु चौंक गया।

     

    “हाँ… लेकिन आपको कैसे पता?”

     

    हरिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

    “तू काले बरगद के पास गया था।”

     

    रघु के शरीर में ठंड दौड़ गई।

     

    हरिया ने अंदर आकर दरवाजा बंद किया।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा,

    “मैंने तुझे मना नहीं किया था, क्योंकि मुझे लगा था तू गाँव की बात मानेगा। लेकिन अब देर हो चुकी है।”

     

    रघु ने पूछा,

    “उस पेड़ में क्या है?”

     

    हरिया ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा,

    “वह पेड़ नहीं है… वह एक दरवाजा है।”

     

    रघु ने घबराकर पूछा,

    “किसका दरवाजा?”

     

    हरिया बोला,

    “जिस चीज़ का नाम लेना भी गाँव में मना है।”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    उस दिन के बाद अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।

     

    गाँव की गायें रात में अचानक जंगल की ओर देखकर रंभाने लगीं। कुएँ का पानी लाल रंग का दिखाई देने लगा। कई घरों के बाहर सुबह गीली मिट्टी में पैरों के निशान मिलते।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    हर रात ठीक बारह बजे, पूरे गाँव में कुल्हाड़ी चलने की आवाज आती।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    लेकिन कोई लकड़ी नहीं काट रहा था।

     

    तीसरी रात रघु की बेटी गुड़िया अचानक नींद में उठकर दरवाजे की ओर चलने लगी।

     

    सीता ने उसे पकड़ लिया।

     

    गुड़िया की आँखें बंद थीं।

     

    वह नींद में बोल रही थी—

     

    “माँ… जंगल में दादी बुला रही हैं।”

     

    सीता का दिल बैठ गया।

     

    उनकी बेटी की दादी को मरे हुए छह साल हो चुके थे।

     

    सीता ने उसे जोर से हिलाया।

     

    गुड़िया की आँखें खुलीं।

     

    वह रोते हुए बोली,

    “माँ, बाहर कोई मुझे बुला रहा था।”

     

    रघु ने उसी समय तय कर लिया कि उसे हरिया से सच जानना होगा।

     

    अगली सुबह वह हरिया के घर पहुँचा।

     

    बहुत पूछने पर हरिया ने पुरानी लकड़ी की एक संदूकची निकाली।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में करीब पचास साल पहले का वही काला बरगद दिखाई दे रहा था।

     

    पेड़ के सामने तीन लकड़हारे खड़े थे।

     

    हरिया ने तस्वीर में बीच वाले आदमी की तरफ इशारा किया।

     

    “यह मेरा बड़ा भाई था।”

     

    रघु चुप रहा।

     

    हरिया बोला,

    “उस समय गाँव में अकाल पड़ा था। मेरे भाई और दो दूसरे लकड़हारे उस पेड़ को काटने गए थे। उन्होंने पहला वार किया तो पेड़ से खून निकला। दूसरा वार किया तो मेरे भाई ने अपनी ही आवाज में किसी को चीखते सुना।”

     

    “फिर?”

     

    “उस रात तीनों घर लौट आए। लेकिन अगले दिन मेरे भाई की परछाई गायब थी।”

     

    रघु की आँखें फैल गईं।

     

    “परछाई?”

     

    हरिया ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। धूप में भी उसकी परछाई जमीन पर नहीं पड़ती थी।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    हरिया की आवाज काँपने लगी।

     

    “सात दिन बाद वह जंगल में चला गया। जाते-जाते उसने कहा था—‘पेड़ भूखा है।’”

     

    रघु ने पूछा,

    “उसे रोक क्यों नहीं लिया?”

     

    हरिया बोला,

    “क्योंकि उस समय तक गाँव के चार लोग गायब हो चुके थे।”

     

    अचानक बाहर से किसी बच्चे के चीखने की आवाज आई।

     

    दोनों दौड़कर बाहर निकले।

     

    रघु का बेटा मोहन सड़क के किनारे खड़ा था।

     

    उसके सामने जंगल की दिशा में एक काली परछाई थी।

     

    हरिया ने चिल्लाकर कहा,

    “मोहन को पीछे खींच!”

     

    रघु दौड़ा।

     

    जैसे ही उसने मोहन का हाथ पकड़ा, वह काली परछाई गायब हो गई।

     

    मोहन रोते हुए बोला,

    “बाबा, वह आदमी मुझे जंगल ले जाने आया था।”

     

    “कैसा आदमी?”

     

    मोहन ने जवाब दिया—

     

    “उसके चेहरे पर चेहरा नहीं था।”

     

    रघु के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उस रात रघु ने घर के सभी दरवाजे बंद कर दिए।

     

    लेकिन ठीक बारह बजे खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सीता बच्चों को लेकर अंदर चली गई।

     

    रघु ने खिड़की नहीं खोली।

     

    तभी बाहर से उसकी अपनी आवाज आई—

     

    “रघु… दरवाजा खोल।”

     

    रघु जम गया।

     

    वह आवाज बिल्कुल उसकी थी।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “मैं जंगल से वापस आ गया हूँ।”

     

    रघु ने काँपते हुए सीता का हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    कुछ देर शांति रही।

     

    फिर बाहर से किसी के हँसने की आवाज आई।

     

    धीरे-धीरे वह हँसी तेज होती गई।

     

    और अचानक दरवाजे पर कुल्हाड़ी का वार हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    लकड़ी में गहरा निशान पड़ गया।

     

    दूसरा वार।

     

    धड़ाम!

     

    तीसरा वार।

     

    धड़ाम!

     

    बच्चे चीखने लगे।

     

    रघु ने खिड़की से बाहर देखने की कोशिश की।

     

    दरवाजे के सामने कोई खड़ा था।

     

    उसका शरीर इंसान जैसा था।

     

    हाथ में कुल्हाड़ी थी।

     

    लेकिन उसके चेहरे की जगह सिर्फ काली खाली जगह थी।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    उसकी जमीन पर कोई परछाई नहीं थी।

     

    अचानक वह आकृति खिड़की की तरफ मुड़ी।

     

    रघु पीछे हट गया।

     

    उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “पेड़ की एक शाखा काटी थी… अब पूरा घर देना होगा।”

     

    रघु ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर एक काली दरार बन चुकी थी।

     

    वह दरार धीरे-धीरे फैल रही थी।

     

    और उसके अंदर से जंगल के पेड़ों जैसी शाखाएँ बाहर निकल रही थीं।

     

    रघु समझ गया—

     

    अब खतरा सिर्फ जंगल में नहीं था।

     

    जंगल उसके घर तक आ चुका था।