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  • सुनियना कि मुस्कान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनैना की मुस्कान

     

    सुनैना को बचपन से ही एक बात बार-बार समझाई जाती थ उसे मुस्कुराना नहीं है।

     

    जब भी उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आती, उसकी दादी तुरंत उसे घूरकर कहतीं,

    “सुनैना! दांत मत दिखाया कर। तेरी मुस्कान इस घर के लिए अच्छी नहीं है।”

     

    सुनैना छोटी थी, इसलिए उसे समझ नहीं आता था कि उसकी मुस्कान से घर को क्या नुकसान हो सकता है।

     

    एक दिन वह आंगन में अपनी सहेली के साथ खेल रही थी। सहेली ने कोई मजेदार बात कही तो सुनैना जोर से हंस पड़ी।

     

    तभी दादी की आवाज आई,

    “कितनी बार कहा है तुझे, हंसना बंद कर!”

     

    सुनैना की हंसी अचानक रुक गई।

     

    वह चुपचाप नीचे देखने लगी।

     

    दादी उसके पास आईं और बोलीं,

    “जब भी तू हंसती है, घर में कोई न कोई परेशानी आ जाती है। याद नहीं पिछले साल तू ऐसे ही हंसी थी और उसी रात तेरे पिताजी का कारोबार बंद हो गया था?”

     

    सुनैना ने मासूमियत से पूछा,

    “लेकिन दादी, मेरी हंसी से पापा का कारोबार कैसे बंद हो सकता है?”

     

    दादी ने तुरंत कहा,

    “बहस मत कर। बड़ों की बात मानना सीख।”

     

    सुनैना चुप हो गई।

     

    उस दिन के बाद उसने अपने चेहरे से मुस्कान जैसे छीन ही ली।

     

    स्कूल में उसकी सहेलियां उसे हंसाने की कोशिश करतीं, लेकिन वह बस हल्का सा मुस्कुराकर रह जाती।

     

    एक दिन उसकी दोस्त रिया ने पूछा,

    “तू इतनी उदास क्यों रहती है? पहले तो तू सबसे ज्यादा हंसती थी।”

     

    सुनैना ने धीरे से कहा,

    “मुझे हंसने से मना किया गया है।”

     

    रिया हैरान होकर बोली,

    “किसने?”

     

    “घरवालों ने।”

     

    “क्यों?”

     

    सुनैना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,

    “उन्हें लगता है कि मेरी मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है।”

     

    रिया कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर उसने कहा,

    “सुनैना, अगर मुस्कुराने से गरीबी आती तो दुनिया का हर खुश इंसान गरीब होता।”

     

    सुनैना के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

     

    घर में वैसे भी हालात अच्छे नहीं थे। उसके पिता रमेश की छोटी सी कपड़ों की दुकान थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से बिक्री कम हो गई थी। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था।

     

    दादी हर परेशानी का कारण सुनैना को ही मानतीं।

     

    कभी घर में दूध कम पड़ जाता तो कहतीं,

    “सुबह-सुबह इसे हंसते देखा था, तभी से दिन खराब जा रहा है।”

     

    कभी बिजली का बिल ज्यादा आ जाता तो कहतीं,

    “इस लड़की की हंसी घर का सुख खा रही है।”

     

    सुनैना हर बार अपना चेहरा छिपा लेती।

     

    उसकी मां कमला सब सुनतीं, लेकिन कुछ नहीं कहतीं। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने सुनैना का साथ दिया तो घर में झगड़ा हो जाएगा।

     

    एक दिन सुनैना की छोटी बहन बीमार पड़ गई।

     

    दादी ने फिर सुनैना को दोष देते हुए कहा,

    “कल शाम तू आंगन में खिलखिला रही थी न? देख लिया उसका नतीजा!”

     

    इस बार सुनैना की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह अपने कमरे में गई और पहली बार अपनी मां से बोली,

    “मां, क्या सच में मेरी मुस्कान इतनी बुरी है?”

     

    कमला का दिल भर आया।

     

    उन्होंने सुनैना को गले लगा लिया।

     

    “नहीं बेटा। तेरी मुस्कान बुरी नहीं है।”

     

    “तो फिर सब मुझे हंसने से क्यों रोकते हैं?”

     

    मां के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    उन्होंने बस उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

    “कभी-कभी लोग डर के कारण ऐसी बातें मान लेते हैं, जिनका कोई सच नहीं होता।”

     

    सुनैना ने मां की तरफ देखा।

     

    “तो क्या मैं हंस सकती हूं?”

     

    कमला ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

    “जब दिल करे, हंस लेना।”

     

    उस रात बहुत दिनों बाद सुनैना अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी हुई।

     

    उसने खुद को देखा और धीरे से मुस्कुराई।

     

    आईने में उसे कोई अशुभ लड़की नहीं दिखाई दी।

     

    उसे बस एक मासूम लड़की दिखाई दी, जो बहुत दिनों से अपनी खुशी छिपाकर जी रही थी।

     

    अगले दिन स्कूल में उसकी अध्यापिका ने घोषणा की कि स्कूल में बच्चों के लिए एक कहानी प्रतियोगिता होने वाली है।

     

    सुनैना ने भी अपना नाम लिखवा दिया।

     

    उसने ऐसी कहानी लिखी जिसमें एक चिड़िया को उड़ने से रोक दिया जाता था क्योंकि गांव वालों को लगता था कि उसके उड़ने से तूफान आ जाएगा।

     

    प्रतियोगिता के दिन सुनैना ने पूरी कहानी सबके सामने सुनाई।

     

    कहानी खत्म होते ही पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा।

     

    सुनैना के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    उसे उस पल पहली बार लगा कि उसकी मुस्कान किसी मुसीबत का कारण नहीं, बल्कि उसकी ताकत है।

     

    उसे प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला।

     

    लेकिन घर लौटते समय उसे डर लग रहा था।

     

    वह सोच रही थी कि दादी को पता चला तो क्या होगा?

     

    जब वह घर पहुंची तो देखा कि पिता दुकान से लौटे हुए थे।

     

    उनके हाथ में एक बड़ा डिब्बा था।

     

    पिता ने मुस्कुराकर कहा,

    “सुनैना, पता है आज क्या हुआ?”

     

    सुनैना चुप रही।

     

    “दुकान पर एक बड़े व्यापारी का ऑर्डर मिला है। इतना बड़ा कि अगले कई महीनों तक घर की चिंता नहीं रहेगी।”

     

    सुनैना की आंखें चमक उठीं।

     

    वह खुशी से मुस्कुराने लगी।

     

    दादी वहीं बैठी थीं।

     

    उन्होंने सुनैना को मुस्कुराते देखा तो तुरंत बोलीं,

    “बस! अब इसे मत हंसने देना। कहीं फिर—”

     

    इस बार रमेश ने पहली बार अपनी मां की बात रोक दी।

     

    “बस मां।”

     

    दादी चुप हो गईं।

     

    रमेश ने कहा,

    “मेरी दुकान कई दिनों से इसलिए खराब चल रही थी क्योंकि मैं गलत जगह माल खरीद रहा था। आज मुझे सही ग्राहक मिला है। इसका सुनैना की मुस्कान से कोई लेना-देना नहीं है।”

     

    दादी कुछ नहीं बोलीं।

     

    रमेश ने सुनैना की तरफ देखा।

     

    “और अगर मेरी बेटी की मुस्कान से घर में दरिद्रता आती है, तो आज पहली बार उसकी मुस्कान के साथ मेरे घर में खुशहाली क्यों आई?”

     

    कमला की आंखों में आंसू आ गए।

     

    सुनैना ने पिता को देखा और धीरे से पूछा,

    “पापा, क्या मैं अब खुलकर हंस सकती हूं?”

     

    रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “बिल्कुल। और आज से कोई तुम्हें हंसने से नहीं रोकेगा।”

     

    सुनैना ने पहली बार पूरे मन से हंसा।

     

    उसकी हंसी पूरे आंगन में गूंज उठी।

     

    दादी उसे देखती रहीं।

     

    कुछ दिनों बाद दादी खुद सुनैना के पास आईं।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

    “बेटा… शायद मैं गलत थी।”

     

    सुनैना ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।

     

    दादी बोलीं,

    “मेरी मां भी मुझे बचपन में यही कहा करती थी। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि ये बात सच है या नहीं। बस डरती रही और वही डर तुझ पर डाल दिया।”

     

    सुनैना की आंखें भर आईं।

     

    उसने दादी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “दादी, अब मुझे हंसने दोगी?”

     

    दादी की आंखों में भी मुस्कान आ गई।

     

    “हां बेटा… खूब हंस।”

     

    सुनैना खिलखिलाकर हंस पड़ी।

     

    उस दिन उस छोटे से घर में पहली बार किसी को डर नहीं लगा कि मुस्कान के साथ दरिद्रता आएगी।

     

    क्योंकि सब समझ चुके थे

     

    घर की खुशियां किसी की मुस्कान से नहीं जातीं।

    खुशियां तब चली जाती हैं, जब इंसान अंधविश्वास के डर से अपने ही घर की हंसी छीन लेता है।

     

    और सुनैना ने उसी दिन तय कर लिया कि अब वह अपनी मुस्कान कभी किसी डर के हवाले नहीं करेगी।

  • एकतरफा मुहब्बत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एकतरफा मोहब्बत 

     

    लविश की उम्र चालीस साल थी। शहर में उसका नाम एक बड़े बिजनेसमैन के तौर पर जाना जाता था। कई कंपनियां, आलीशान घर, महंगी गाड़ियां और हर सुविधा उसके पास थी। लेकिन इन सबके बावजूद उसकी जिंदगी में एक खालीपन था, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पाता था।

     

    फिर एक दिन उसकी मुलाकात लावण्या से हुई।

     

    लावण्या इक्कीस साल की कॉलेज स्टूडेंट थी। हंसमुख, आत्मविश्वासी और अपनी पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर। उसे दिखावे वाली जिंदगी बिल्कुल पसंद नहीं थी। वह अपने दम पर कुछ बनना चाहती थी।

     

    लविश की मुलाकात उससे पहली बार एक कॉलेज के कार्यक्रम में हुई, जहां उसकी कंपनी ने विद्यार्थियों के लिए एक स्कॉलरशिप कार्यक्रम रखा था।

     

    लावण्या मंच पर खड़ी होकर अपने प्रोजेक्ट के बारे में बता रही थी।

     

    लविश की नजर अचानक उसी पर जाकर रुक गई।

     

    उसने बहुत सी खूबसूरत लड़कियां देखी थीं, लेकिन लावण्या में उसे कुछ अलग लगा। शायद उसका आत्मविश्वास, शायद उसकी बात करने का तरीका या शायद उसकी आंखों में अपने सपनों को पूरा करने की चमक।

     

    कार्यक्रम खत्म हुआ तो लावण्या अपने दोस्तों के साथ बाहर निकलने लगी।

     

    तभी लविश ने उसे आवाज दी।

     

    “लावण्या?”

     

    वह पलटकर बोली, “जी?”

     

    “तुम्हारा प्रोजेक्ट काफी अच्छा था।”

     

    लावण्या मुस्कुराई।

     

    “थैंक यू।”

     

    “तुम आगे क्या करना चाहती हो?”

     

    “अपना खुद का बिजनेस शुरू करना चाहती हूं।”

     

    लविश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “अच्छा सपना है।”

     

    लावण्या ने हंसते हुए कहा, “सपना नहीं सर, प्लान है। सपना होता तो शायद मैं इतनी मेहनत नहीं करती।”

     

    उसकी बात सुनकर लविश कुछ पल चुप रहा।

     

    उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि वह लड़की सिर्फ खूबसूरत नहीं थी, बल्कि उसके अंदर कुछ बनने की जिद भी थी।

     

    समय बीतता गया।

     

    लविश किसी न किसी बहाने कॉलेज के कार्यक्रमों में आने लगा। कभी स्कॉलरशिप की मीटिंग, कभी विद्यार्थियों के प्रोजेक्ट की समीक्षा।

     

    और लगभग हर बार उसकी नजर लावण्या को ही ढूंढती।

     

    लावण्या के लिए लविश सिर्फ एक सम्मानित बिजनेसमैन था।

     

    लेकिन लविश के लिए बात धीरे-धीरे बदल चुकी थी।

     

    उसे लावण्या की छोटी-छोटी बातें याद रहने लगीं।

     

    उसे याद था कि लावण्या चाय में ज्यादा चीनी पसंद नहीं करती।

     

    उसे याद था कि वह बारिश में भीगने के बजाय छतरी लेकर चलती है।

     

    उसे याद था कि परीक्षा के दिनों में वह देर रात तक पढ़ती थी।

     

    लावण्या को इन बातों का अंदाजा तक नहीं था।

     

    एक शाम कॉलेज से निकलते समय लावण्या की मुलाकात लविश से हुई।

     

    “आप यहां?”

     

    लविश ने सहजता से कहा, “बस एक मीटिंग थी।”

     

    लावण्या ने सिर हिलाया।

     

    “अच्छा।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर लविश ने पूछा, “तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?”

     

    “बहुत अच्छी। अगले महीने मेरे फाइनल प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन है।”

     

    “ऑल द बेस्ट।”

     

    “थैंक यू।”

     

    लावण्या अपने रास्ते चली गई।

     

    लविश उसे जाते हुए देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन दिल में एक अजीब-सी बेचैनी।

     

    वह जानता था कि दोनों की उम्र में बहुत अंतर है।

     

    वह यह भी जानता था कि लावण्या की जिंदगी अभी शुरू ही हुई थी।

     

    उसके अपने सपने थे, अपनी दुनिया थी।

     

    और शायद सबसे बड़ी बात यह थी कि लावण्या ने कभी उसे उस नजर से देखा ही नहीं था।

     

    फिर भी लविश के दिल में उसके लिए भावनाएं बढ़ती चली गईं।

     

    एक दिन उसके दोस्त समीर ने उससे कहा,

     

    “तू पिछले कुछ महीनों से बदला-बदला सा है। बात क्या है?”

     

    लविश चुप रहा।

     

    समीर ने हंसते हुए कहा, “कहीं प्यार-व्यार तो नहीं हो गया?”

     

    लविश ने कुछ नहीं कहा।

     

    समीर समझ गया।

     

    “कौन है?”

     

    लविश ने धीमे से कहा, “लावण्या।”

     

    समीर कुछ पल चुप रहा।

     

    “वही कॉलेज वाली लड़की?”

     

    “हां।”

     

    “लविश, तू चालीस का है और वो इक्कीस की।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “और क्या उसे भी पता है कि तू उसके बारे में ऐसा सोचता है?”

     

    लविश ने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    समीर ने गंभीर होकर कहा,

     

    “तो फिर पहले खुद से पूछ कि तुझे उसका साथ चाहिए या सिर्फ उसकी जिंदगी में अपनी जगह चाहिए। दोनों चीजों में फर्क होता है।”

     

    लविश को उसकी बात दिल पर लगी।

     

    उस रात वह देर तक सो नहीं पाया।

     

    अगले दिन उसने फैसला किया कि वह लावण्या पर अपनी भावनाएं नहीं थोपेगा।

     

    वह उससे प्यार करता था, लेकिन उसके प्यार का मतलब यह नहीं था कि लावण्या भी उसे पसंद करे।

     

    कुछ दिन बाद लावण्या अपनी प्रेजेंटेशन के लिए परेशान थी।

     

    उसका प्रोजेक्ट बार-बार फेल हो रहा था।

     

    लविश को जब पता चला तो उसने सिर्फ इतना कहा,

     

    “अगर तुम्हें किसी सलाह की जरूरत हो तो बता देना। फैसला तुम्हारा होगा।”

     

    लावण्या ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

     

    “आप सच में मेरी मदद करेंगे?”

     

    “अगर मेरी सलाह तुम्हारे काम आए तो जरूर।”

     

    लावण्या ने उसकी मदद ली।

     

    लविश ने उसे रास्ता दिखाया, लेकिन प्रोजेक्ट खुद नहीं बनाया। उसने हमेशा उसकी मेहनत का सम्मान किया।

     

    कुछ हफ्तों बाद लावण्या का प्रोजेक्ट कॉलेज में सबसे अच्छा चुना गया।

     

    वह खुशी से लविश के पास आई।

     

    “सर! मेरा प्रोजेक्ट सिलेक्ट हो गया।”

     

    लविश मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था तुम कर लोगी।”

     

    लावण्या ने उत्साह में कहा,

     

    “आपकी वजह से हुआ।”

     

    “नहीं,” लविश ने कहा, “मेरी वजह से नहीं। तुमने मेहनत की थी।”

     

    लावण्या के मन में उस दिन लविश के लिए सम्मान और बढ़ गया।

     

    लेकिन प्यार?

     

    वह भावना अभी भी उसके दिल में नहीं थी।

     

    कुछ समय बाद लावण्या को एक बड़ी कंपनी में इंटर्नशिप मिल गई। वह अपने सपनों की तरफ बढ़ने लगी।

     

    लविश दूर से उसकी सफलता देखता रहा।

     

    एक दिन समीर ने फिर पूछा,

     

    “अब भी उससे प्यार करता है?”

     

    लविश मुस्कुराया।

     

    “हां। शायद हमेशा करूंगा।”

     

    “फिर उसे बता क्यों नहीं देता?”

     

    लविश ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,

     

    “क्योंकि प्यार सिर्फ अपनी बात कह देना नहीं होता। कभी-कभी सामने वाले की आजादी को समझना भी प्यार होता है।”

     

    समीर चुप हो गया।

     

    कुछ दिनों बाद लावण्या लविश से मिलने आई।

     

    उसने कहा,

    “सर, मुझे एक बात बतानी है। मुझे दूसरी कंपनी से ऑफर मिला है। मैं शायद दूसरे शहर चली जाऊंगी।”

     

    लविश के दिल को जैसे एक पल के लिए झटका लगा।

    लेकिन उसने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तो फिर जाना चाहिए।”

     

    “आपको बुरा नहीं लगेगा?”

    “क्यों लगेगा?”

     

    “आपने हमेशा मेरी मदद की है।”

     

    लविश ने कहा,”मैं चाहता हूं कि तुम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियो। अगर मेरी वजह से तुम्हारे कदम रुक गए तो मेरी सारी मदद बेकार हो जाएगी।”

     

    लावण्या की आंखें नम हो गईं।”आप बहुत अच्छे इंसान हैं।”

     

    लविश हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “बस इतना ही काफी है।”

    लावण्या चली गई।

    दरवाजा बंद होते ही लविश कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

     

    उसकी आंखों में दर्द था, लेकिन चेहरे पर सुकून।

     

    उसने अपनी मोहब्बत को पाने की कोशिश नहीं की थी।

    उसने उसे आजाद छोड़ दिया था।

    क्योंकि लविश समझ चुका था कि सच्ची मोहब्बत हमेशा साथ रहने का नाम नहीं होती।

     

    कभी-कभी किसी की खुशी के लिए पीछे हट जाना भी मोहब्बत होती है।

    और लावण्या?

    वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ती रही।

    शायद उसे कभी पता नहीं चला कि एक चालीस साल का बिजनेसमैन उसे कितनी गहराई से चाहता था।

     

    लेकिन अगर कभी उसे यह बात पता भी चलती, तो शायद वह यही कहती

    “लविश ने मुझे पाया नहीं था, लेकिन उसने मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचने से कभी रोका भी नहीं।”

    और शायद यही उसकी एकतरफा मोहब्बत की सबसे खूबसूरत बात थी।

  • सावन

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    🌧️ सावन 🌿

    सावन आया, बदली छाई,

    मिट्टी ने फिर खुशबू पाई।

    बूंदों ने जब गीत सुनाया,

    मन ने भी कुछ याद किया।

    पेड़ों पर झूले, होंठों पर गान,

    हर ओर बिखरा प्रेम का अरमान।

    ठंडी हवा जब छूकर जाए,

    सावन दिल को फिर महकाए। ❤️

  • दोस्ती….

    दोस्ती….

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

     

    “तू सच में जा रही है?”

     

    नैना ने सामने खड़ी रिया को देखते हुए पूछा।

     

    रिया ने मुस्कुराकर अपना बैग कंधे पर डाला। “हाँ यार… जाना तो पड़ेगा।”

     

    “लेकिन तूने कहा था कि तू कहीं नहीं जाएगी।”

     

    “कहा था… पर जिंदगी में सब कुछ हमारे हिसाब से थोड़ी होता है।”

     

    नैना कुछ नहीं बोली। दोनों कुछ देर चुपचाप एक-दूसरे को देखती रहीं।

     

    पिछले आठ सालों से दोनों साथ थीं। स्कूल में एक ही बेंच पर बैठना, कॉलेज में साथ जाना, एक-दूसरे के घर बिना बताए जब दिल चाहे पहुँच जाना… सब कुछ जैसे रोज़ की बात थी।

     

    लेकिन आज पहली बार उन्हें लग रहा था कि शायद उनकी दोस्ती में दूरी आने वाली है। रिया के पापा का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया था। पूरा परिवार अगले हफ्ते दिल्ली छोड़कर जयपुर जाने वाला था।

     

    “तू मुझे भूल तो नहीं जाएगी?” नैना ने अचानक पूछा।

     

    रिया हँस पड़ी। “पागल है क्या? दोस्ती कोई जगह बदलने से खत्म होती है?”

     

    “पता नहीं… लोग बदल जाते हैं।”

     

    रिया ने नैना का हाथ पकड़ लिया। “लोग बदल सकते हैं, लेकिन हमारी दोस्ती नहीं बदलेगी।”

     

    नैना ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें भर आईं। “पक्का?”

     

    “एकदम पक्का।”

     

    दोनों ने हाथ मिलाया। “बेस्ट फ्रेंड्स?”

     

    “forever।”

     

     

    अगले हफ्ते रिया चली गई, लेकिन रिया के जाने के बाद नैना का मन बिल्कुल नहीं लगा। पहले हर शाम रिया का फोन आ जाता था।

    “चल बाहर चलते हैं।”

     

    “चाय पीने चल।”

     

    “आज गोलगप्पे खाने हैं।”

     

    “चल मेरे घर, मम्मी ने पकौड़े बनाए हैं।”

     

    अब शाम को फोन नहीं आता था। नैना कई बार अपना फोन उठाकर रिया को कॉल करने का सोचती, फिर खुद ही रख देती। उसे लगता, शायद रिया नए शहर में व्यस्त होगी। एक दिन उसने रिया को फोन किया।

     

    “हेलो?” दूसरी तरफ से रिया की आवाज़ आई। “नैना!”

     

    आवाज़ सुनते ही नैना के चेहरे पर मुस्कान आ गई। “कैसी है?”

     

    “ठीक हूँ। तू बता?”

     

    “मैं भी ठीक हूँ।”

     

    “झूठ बोल रही है।”

     

    नैना चौंक गई। “तुझे कैसे पता?”

     

    “तेरी आवाज़ से।”

     

    नैना हँस दी। “तू अभी भी मुझे पहचान लेती है?”

     

    “पागल, तू मेरी दोस्त है। तेरी आवाज़ भी पहचानूँगी और तेरी चुप्पी भी।”

     

    कुछ देर दोनों बातें करती रहीं। उस दिन नैना को समझ आया कि दोस्ती सिर्फ साथ बैठने का नाम नहीं है। दोस्ती वो है जहाँ दूर रहकर भी सामने वाले की आवाज़ से पता चल जाए कि उसके दिल में क्या चल रहा है।

     

     

    समय बीतता गया ,दोनों की पढ़ाई खत्म हुई। रिया ने नौकरी शुरू कर दी और नैना ने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। अब दोनों की बातें पहले से कम हो गई थीं। कभी दो दिन बाद फोन होता, कभी हफ्ते भर बाद। लेकिन जब भी बात होती, ऐसा लगता जैसे कल ही तो मिले थे।

     

    एक रात नैना का फोन बजा। रिया का कॉल था। 

    “हेलो?”

     

    दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई।

     

    “रिया?” 

     

    फिर धीमी आवाज़ सुनाई दी। “नैना… मुझे तुझसे बात करनी है।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मेरी नौकरी चली गई।”

     

    नैना कुछ सेकंड चुप रही। “तो?”

     

    “तो क्या?”

     

    “तो नौकरी चली गई। तू थोड़ी चली गई है।”

     

    रिया चुप रही।

     

    नैना ने कहा, “तू परेशान मत हो। दूसरी नौकरी मिल जाएगी।”

     

    “लेकिन यहाँ किराया, घर का खर्च… सब है। समझ नहीं आ रहा क्या करूँ।” परेशान सी रिया ने कहा। 

     

    नैना, “तू मेरे पास आ जा।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    “हाँ। कुछ दिन मेरे साथ रह। नौकरी ढूँढ। जब तक काम नहीं मिलता, हम दोनों मिलकर संभाल लेंगे।”

     

    रिया की आवाज़ भर्रा गई। “तू सच बोल रही है?”

     

    “नहीं, मज़ाक कर रही हूँ। इतनी रात को तुझे बुलाकर चाय पिलाऊँगी।” नैना ने कहा। 

     

    दोनों हँस पड़ीं। लेकिन नैना जानती थी कि रिया सच में बहुत परेशान है। अगले ही दिन उसने अपने स्कूल की प्रिंसिपल से बात की। स्कूल में एक खाली पोस्ट थी।

     

    नैना ने रिया का रिज़्यूमे दिया। कुछ दिनों बाद रिया को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।

    और फिर… उसे नौकरी मिल गई। रिया ने सबसे पहले नैना को फोन किया। “नैना!”

     

    नैना, “क्या हुआ?”

     

    रिया, “मेरी नौकरी लग गई!”

     

    नैना खुशी से चिल्ला पड़ी। “सच?”

     

    रिया, “हाँ!”

     

    नैना, “मैंने कहा था ना, सब ठीक हो जाएगा।”

     

    रिया, “लेकिन ये तेरी वजह से हुआ है।”

     

    नैना, “नहीं। तेरी मेहनत की वजह से हुआ है।”

     

    रिया, “फिर भी… अगर तू नहीं होती ना, तो शायद मैं हार जाती।”

     

    नैना कुछ नहीं बोली। बस मुस्कुरा दी।

     

     

    करीब दो साल बाद नैना की शादी तय हो गई।

     

    शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। घर में हर तरफ खुशी का माहौल था। लेकिन नैना के मन में एक चिंता थी। “रिया आ पाएगी ना?”

     

    उसने माँ से पूछा। उन्होंने कहा, “क्यों नहीं आएगी?”

     

    नैना उदास होते हुए बोली, “उसकी नौकरी है।”

     

    उसकी मां बोली, “तू उसे बुला लेना।”

     

    “बुलाऊँगी नहीं… लेकर आऊँगी।”

     

    शादी से तीन दिन पहले रिया सच में दिल्ली पहुँच गई। हाथ में बड़ा सा बैग और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान। नैना उसे देखते ही दौड़कर उससे गले लग गई। “तू आ गई!”

     

    “हाँ मैडम, तेरी शादी है। कैसे नहीं आती?”

     

    “मुझे लगा था तू नहीं आ पाएगी।”

     

    “पागल है? तेरी शादी है। मेरी छुट्टी नहीं मिली तो नौकरी छोड़ देती।”

     

    नैना ने उसकी तरफ देखा। “ऐसा मत बोलना।”

     

    रिया हँसते हुए बोली, “चल अब रोना बंद कर। बहुत काम पड़ा है।”

     

    और फिर दोनों उसी तरह शादी की तैयारियों में लग गईं जैसे पिछले कई सालों की दूरी के बीच कुछ हुआ ही न हो।

     

    मेहंदी की रात दोनों छत पर बैठी थीं। नैना ने धीरे से पूछा,

    “रिया?”

     

    रिया, “हम्म?”

     

    नैना, “तुझे कभी लगा कि हमारी दोस्ती खत्म हो जाएगी?”

     

    रिया ने कुछ पल सोचा। “शुरू में लगा था।”

     

    नैना उसकी तरफ देखते हुए बोली, “फिर?”

     

    “फिर समझ आया कि सच्ची दोस्ती में रोज़ बात करना जरूरी नहीं होता।”

     

    नैना उसकी तरफ देखने लगी।

     

    रिया बोली, “कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें दूरी आ सकती है, लेकिन दिलों के बीच दूरी नहीं आती।”

     

    नैना की आँखों में आँसू आ गए। “तू बहुत अच्छी बातें करने लगी है।”

     

    “हाँ, क्योंकि अब मैं बड़ी हो गई हूँ।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    दोनों हँस पड़ीं।

     

     

    शादी के बाद नैना अपनी नई जिंदगी में व्यस्त हो गई।

     

    रिया भी अपनी नौकरी में। लेकिन उनकी दोस्ती वैसी ही रही, कभी फोन पर लड़ाई, कभी बिना वजह हँसी, कभी एक-दूसरे से शिकायत और कभी बस चुपचाप फोन पर बने रहना।

     

    एक दिन नैना बहुत परेशान थी। उसने रिया को फोन नहीं किया। लेकिन कुछ देर बाद रिया का फोन आ गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर झूठ क्यों बोल रही है?”

     

    नैना चुप रही।

     

    रिया ने कहा, “देख, अगर बात नहीं करनी तो मत कर। लेकिन अकेले मत रहना, मैं फोन पर हूँ।”

     

    नैना की आँखों से आँसू निकल आए। उसे उस पल समझ आया कि जिंदगी में कितने भी लोग क्यों न आएँ, कुछ दोस्त ऐसे होते हैं जो सिर्फ दोस्त नहीं रहते।

     

    वे परिवार बन जाते हैं। उनके साथ खून का रिश्ता नहीं होता, फिर भी वे अपने लगते हैं। उनसे रोज़ मिलना जरूरी नहीं होता हर दिन बात करना जरूरी नहीं होता।

     

    बस इतना पता होना काफी होता है कि अगर दुनिया तुम्हारे खिलाफ खड़ी हो जाए, तो एक इंसान ऐसा है जो तुम्हारे साथ खड़ा रहेगा।

     

    नैना ने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, “रिया?”

     

    “हाँ?”

     

    “थैंक यू।”

     

    “किसलिए?”

     

    “मेरी दोस्त होने के लिए।”

     

    रिया कुछ सेकंड चुप रही, फिर बोली, “पागल… दोस्ती में थैंक यू नहीं बोलते।”

     

    नैना हँस पड़ी। “तो क्या बोलते हैं?”

     

    “बस इतना कहते हैं…”

     

    “क्या?”

     

    “चल, चाय पीने चलते हैं।”

     

    नैना खिलखिलाकर हँस दी।

     

    दो शहरों में रहने वाली दो सहेलियाँ फिर से फोन पर चाय पीने का प्लान बनाने लगीं। क्योंकि कुछ दोस्तियाँ दूरी से नहीं टूटतीं।

     

    बल्कि दूरी उन्हें और मजबूत कर देती है। क्योंकि सच्ची दोस्ती साथ रहने का नाम नहीं… साथ निभाने का नाम है।

  • 😱शिनिगामी 😱 (मौत का संदेशवाहक)😱

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    मंदिर की दीवार पर लिखे शब्दों को देखकर हारुतो की साँस रुक गई।

     

    “हारुतो — मृत्यु: आज रात।”

     

    उसके सामने खड़ा शिनिगामी बिल्कुल स्थिर था।

     

    उसका चेहरा इंसान जैसा था, लेकिन उस चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।

     

    फिर भी हारुतो को महसूस हो रहा था कि वह उसे देख रहा है।

     

    बहुत देर तक मंदिर में कोई आवाज़ नहीं हुई।

     

    अचानक शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली सीधे हारुतो की तरफ थी।

     

    “तुम्हारे पूर्वजों ने मुझे जन्म दिया था।”

     

    उसकी आवाज़ इंसान की आवाज़ नहीं थी।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कई बूढ़े लोग एक साथ बोल रहे हों।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    “मैंने क्या किया है?”

     

    शिनिगामी ने उत्तर दिया,

     

    “तुमने कुछ नहीं किया।”

     

    कुछ पल की खामोशी।

     

    “लेकिन तुम्हारे खून ने बहुत कुछ किया है।”

     

    हारुतो के पिता आगे आए।

     

    “उसे छोड़ दो!”

     

    शिनिगामी ने अपना सिर पिता की तरफ घुमाया।

     

    “तुम पहले ही मर चुके हो।”

     

    पिता ने कहा,

     

    “लेकिन मैं उसका पिता हूँ।”

     

    शिनिगामी हँसा।

     

    “मृत लोग पिता नहीं होते।”

     

    अचानक उसके हाथ में पकड़ी घंटी बज उठी।

     

    टन…

     

    पिता जमीन पर गिर पड़े।

     

    हारुतो चीख पड़ा।

     

    “पापा!”

     

    उसने उन्हें उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उनके शरीर से धुआँ निकल रहा था।

     

    पिता ने कमजोर आवाज़ में कहा,

     

    “हारुतो… मंदिर के पीछे वाला दरवाज़ा…”

     

    “क्या?”

     

    “वहीं से सब शुरू हुआ था।”

     

    शिनिगामी उनकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    पिता ने आखिरी बार कहा,

     

    “अपनी दादी को ढूँढो।”

     

    हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

     

    “दादी तो—”

     

    “वह अभी जिंदा है।”

     

    अगले ही पल पिता का शरीर राख में बदल गया।

     

    हारुतो चीख उठा।

     

    लेकिन शिनिगामी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब केवल तुम बचे हो।”

     

    हारुतो मंदिर के पीछे बने लकड़ी के दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    नीचे जाने वाली पत्थर की सीढ़ियाँ थीं।

     

    वह तेजी से नीचे उतरने लगा।

     

    सीढ़ियाँ इतनी लंबी थीं कि उसे लग रहा था जैसे वह जमीन के अंदर नहीं, बल्कि किसी दूसरी दुनिया में जा रहा हो।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।

     

    एक चित्र में गाँव के लोग एक काले कपड़े पहने आदमी के सामने खड़े थे।

     

    दूसरे चित्र में वही आदमी एक घंटी पकड़े हुए था।

     

    तीसरे चित्र में…

     

    एक बच्चा था।

     

    उस बच्चे के सामने वही शिनिगामी खड़ा था।

     

    हारुतो रुक गया।

     

    चित्र के नीचे पुराने जापानी अक्षरों में कुछ लिखा था।

     

    वह उसे पूरी तरह पढ़ नहीं पा रहा था, लेकिन एक शब्द पहचान गया।

     

    “कुरोमोरी।”

     

    तभी पीछे से कदमों की आवाज़ आई।

     

    हारुतो ने पीछे देखा।

     

    सीढ़ियों के ऊपर कोई खड़ा था।

     

    उसकी दादी।

     

    “हारुतो…”

     

    हारुतो दौड़कर उनके पास गया।

     

    “दादी!”

     

    दादी ने उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “सच क्या है?”

     

    दादी कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “आज तुम्हें सब जानना होगा।”

     

    वे उसे एक विशाल भूमिगत कमरे में ले गईं।

     

    कमरे के बीचों-बीच पत्थर की एक वेदी थी।

     

    उसके ऊपर वही लोहे की घंटी रखी थी।

     

    दादी ने कहा,

     

    “सौ साल पहले तुम्हारे परदादा ने मौत से बात करने की कोशिश की थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “तुम्हारी परदादी मर रही थीं।”

     

    हारुतो चुप रहा।

     

    “उन्होंने एक पुरानी किताब में एक अनुष्ठान पढ़ा। उस अनुष्ठान के जरिए उन्होंने मृत्यु को रोकने की कोशिश की।”

     

    “और शिनिगामी पैदा हुआ?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। शिनिगामी पहले से था।”

     

    उन्होंने घंटी की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे परदादा ने उसे इंसानों की दुनिया में बुलाया।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “शुरुआत में शिनिगामी ने सौदा किया।”

     

    “कैसा सौदा?”

     

    “वह एक इंसान की जान बचाएगा… बदले में हर पचास साल में उसी परिवार की एक आत्मा उसे देनी होगी।”

     

    हारुतो के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    “और अगर परिवार ने मना किया?”

     

    दादी ने कहा,

     

    “तो वह पूरे गाँव की मौत चुनता।”

     

    हारुतो ने चारों तरफ देखा।

     

    “इसलिए गाँव के लोग उसे नहीं रोकते थे?”

     

    “वे डरते थे।”

     

    अचानक कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    हारुतो…

     

    हारुतो…

     

    हारुतो…

     

    दादी ने जल्दी से वेदी के नीचे से एक पुरानी किताब निकाली।

     

    “लेकिन तुम्हारे परदादा ने एक और गलती की थी।”

     

    “क्या?”

     

    दादी ने किताब खोली।

     

    आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस दिन परिवार का अंतिम वंशज जन्म लेगा, उसी दिन शिनिगामी की शक्ति समाप्त की जा सकती है।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “अंतिम वंशज मैं हूँ?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    दादी ने घंटी की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे बजाना होगा।”

     

    हारुतो ने घंटी उठाई।

     

    “बस इतना?”

     

    “नहीं।”

     

    दादी की आँखों में डर था।

     

    “घंटी तभी काम करेगी जब उसे शिनिगामी के सामने बजाया जाए।”

     

    “और फिर?”

     

    “जिस व्यक्ति ने घंटी बजाई… उसे अपनी सबसे प्यारी याद हमेशा के लिए खोनी होगी।”

     

    हारुतो ने किताब नीचे रख दी।

     

    “कौन-सी याद?”

     

    दादी ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई।

     

    “तुम्हारी माँ की।”

     

    हारुतो पलट गया।

     

    शिनिगामी कमरे के प्रवेश द्वार पर खड़ा था।

     

    उसके पीछे अंधेरा फैलता जा रहा था।

     

    दादी ने हारुतो को अपने पीछे कर लिया।

     

    “भागो!”

     

    लेकिन शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    दादी हवा में उठ गईं।

     

    हारुतो चीख पड़ा।

     

    “दादी!”

     

    शिनिगामी ने कहा,

     

    “तुम्हारे परिवार ने मुझे जन्म दिया।”

     

    फिर उसने दादी को जमीन पर फेंक दिया।

     

    “अब तुम्हारे परिवार का अंत होगा।”

     

    हारुतो ने घंटी उठाई।

     

    शिनिगामी उसकी तरफ बढ़ने लगा।

     

    हर कदम के साथ जमीन काँप रही थी।

     

    हारुतो पीछे हटता गया।

     

    उसके दिमाग में माँ की यादें घूमने लगीं।

     

    माँ का चेहरा।

     

    माँ की हँसी।

     

    बचपन में उसका हाथ पकड़कर चलना।

     

    बारिश में उसके लिए छाता लेकर आना।

     

    और आखिरी दिन…

     

    जब माँ ने मरने से पहले उससे कहा था—

     

    “डरना मत।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    शिनिगामी उसके सामने आ चुका था।

     

    “घंटी बजाओ।”

     

    हारुतो ने उसे देखा।

     

    “अगर मैं बजाऊँगा तो?”

     

    “तुम अपनी माँ को हमेशा के लिए भूल जाओगे।”

     

    हारुतो काँपने लगा।

     

    “और अगर नहीं बजाया?”

     

    शिनिगामी मुस्कुराया।

     

    “तो तुम्हारी दादी मरेंगी।”

     

    हारुतो ने दादी की तरफ देखा।

     

    वह जमीन पर पड़ी थीं।

     

    बहुत कमजोर।

     

    लेकिन उन्होंने आँखें खोलकर कहा,

     

    “बजा दो।”

     

    “दादी…”

     

    “तुम्हारी माँ ने भी यही चाहा होता।”

     

    हारुतो ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने घंटी उठाई।

     

    और पूरी ताकत से बजा दी।

     

    टन————————!

     

    आवाज़ पूरे भूमिगत कमरे में गूँज उठी।

     

    शिनिगामी पीछे हट गया।

     

    उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    उसका चेहरा फटने लगा।

     

    और पहली बार…

     

    उसके चेहरे पर आँखें दिखाई दीं।

     

    सैकड़ों आँखें।

     

    हर आँख में किसी मरे हुए इंसान का चेहरा था।

     

    शिनिगामी चीखने लगा।

     

    “नहीं!!!”

     

    हारुतो ने दूसरी बार घंटी बजाई।

     

    टन————————!

     

    पूरा मंदिर काँपने लगा।

     

    ऊपर गाँव के घरों की खिड़कियाँ टूटने लगीं।

     

    जंगल के पेड़ एक साथ झुक गए।

     

    और फिर तीसरी बार…

     

    हारुतो ने घंटी बजाई।

     

    टन————————!

     

    अचानक सब कुछ शांत हो गया।

     

    शिनिगामी गायब था।

     

    कमरे में सिर्फ हारुतो और उसकी दादी थे।

     

    दादी धीरे-धीरे उठीं।

     

    “खत्म हो गया।”

     

    हारुतो ने उनकी तरफ देखा।

     

    “सच में?”

     

    दादी मुस्कुराईं।

     

    “हाँ।”

     

    हारुतो ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल उसने पूछा,

     

    “दादी… मेरी माँ कौन थी?”

     

    दादी का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    हारुतो ने फिर पूछा,

     

    “मेरी माँ कौन थी?”

     

    दादी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    हारुतो अपनी माँ को पूरी तरह भूल चुका था।

     

    उसके चेहरे की कोई तस्वीर उसे याद नहीं थी।

     

    उसकी आवाज़…

     

    उसकी हँसी…

     

    कुछ भी नहीं।

     

    वह रोने लगा।

     

    दादी ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम्हारी माँ बहुत अच्छी औरत थी।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “क्या वह मुझसे प्यार करती थी?”

     

    दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बहुत ज्यादा।”

     

    सुबह होने लगी।

     

    कुरोमोरी के ऊपर पहली बार कई वर्षों बाद साफ सूरज निकला।

     

    जंगल की धुंध गायब हो गई।

     

    गाँव के लोग अपने घरों से बाहर आने लगे।

     

    सब कुछ सामान्य लग रहा था।

     

    लेकिन उसी शाम…

     

    हारुतो अपने घर में अकेला बैठा था।

     

    उसने पुराने सामान की एक पेटी खोली।

     

    अंदर उसकी माँ की एक तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर उठाई।

     

    वह तस्वीर में मौजूद औरत को देख रहा था।

     

    लेकिन उसके दिल में कोई पहचान नहीं थी।

     

    बस एक अजीब-सी खाली जगह थी।

     

    तभी…

     

    तस्वीर के पीछे कुछ गिरा।

     

    एक छोटी लोहे की घंटी।

     

    हारुतो ने उसे उठाया।

     

    उस पर खून से एक शब्द लिखा था—

     

    “समाप्त नहीं।”

     

    हारुतो के हाथ से घंटी गिर गई।

     

    उसी समय बाहर जंगल से…

     

    टन…

     

    एक घंटी बजी।

     

    हारुतो खिड़की की तरफ मुड़ा।

     

    जंगल के बीच एक काली आकृति खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह शिनिगामी नहीं था।

     

    वह उसकी माँ थी।

     

    वह दूर से उसे देख रही थी।

     

    और उसके होंठों पर एक मुस्कान थी।

     

    हारुतो ने धीरे से खिड़की खोली।

     

    हवा के साथ उसकी माँ की आवाज़ आई—

     

    “बेटा… तुमने मुझे याद तो नहीं रखा… लेकिन मैंने तुम्हें कभी नहीं भुलाया।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    और जंगल के भीतर वह आकृति धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो गई।

     

    उस रात के बाद कुरोमोरी में कभी शिनिगामी की घंटी नहीं बजी।

     

    लेकिन गाँव के बुजुर्ग आज भी कहते हैं—

     

    अगर किसी रात जापान के किसी सुनसान जंगल में आपको आधी रात को घंटी की आवाज़ सुनाई दे…

     

    तो पीछे मुड़कर मत देखना।

     

    क्योंकि हो सकता है…

     

    मौत आपको बुला नहीं रही हो।

     

    हो सकता है…

     

    वह सिर्फ यह देख रही हो कि आपको अब भी कौन याद है।

     

    समाप्त।

  • 😱 शिनिगामी 😱( मौत का संदेशवाहक)😱

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    “हारुतो… तुम्हारे पिता वापस आ गए हैं।”

     

    तहखाने में खड़ा हारुतो पत्थर की तरह जम गया।

     

    ऊपर से किसी के कदमों की आवाज़ आ रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    धीरे-धीरे वे कदम सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगे।

     

    हारुतो ने अपनी साँस रोक ली।

     

    उसे दादी की बात याद आई—

     

    “जो भी सुनो… पीछे मत देखना।”

     

    लेकिन तभी ऊपर से उसके पिता की आवाज़ आई।

     

    “हारुतो?”

     

    वह आवाज़ बिल्कुल वैसी ही थी।

     

    गहरी।

     

    शांत।

     

    जैसी आवाज़ वह बचपन से सुनता आया था।

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “पापा…?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ सेकंड बाद आवाज़ फिर आई।

     

    “बेटा, बाहर आओ।”

     

    हारुतो ने तहखाने के दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।

     

    तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।

     

    उसके पिता हमेशा उसे “हारु” कहकर बुलाते थे।

     

    कभी “हारुतो” नहीं।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह दरवाज़े से कुछ कदम पीछे हट गया।

     

    फिर ऊपर से उसकी दादी की चीख सुनाई दी।

     

    “हारुतो! दरवाज़ा मत खोलना!”

     

    और उसके तुरंत बाद…

     

    एक भारी आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    हारुतो ने काँपते हाथों से दरवाज़े की कुंडी पकड़ी।

     

    उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।

     

    ऊपर का कमरा खाली था।

     

    लालटेन टूटी हुई थी।

     

    फर्श पर दादी की चादर पड़ी थी।

     

    लेकिन दादी कहीं नहीं थीं।

     

    हारुतो ने उन्हें पुकारा।

     

    “दादी?”

     

    कोई उत्तर नहीं।

     

    तभी उसे फर्श पर कुछ दिखाई दिया।

     

    काले रंग की मिट्टी से बने पैरों के निशान।

     

    वे दरवाज़े से शुरू होकर घर के पीछे वाले कमरे तक जा रहे थे।

     

    हारुतो उनके पीछे चल पड़ा।

     

    कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    अंदर से सड़ी हुई गंध आ रही थी।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    और जो उसने देखा, उसे देखकर उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    कमरे की दीवार पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    गाँव के लोगों की तस्वीरें।

     

    बच्चे।

     

    बूढ़े।

     

    औरतें।

     

    पुरुष।

     

    हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    कुछ तारीखें बहुत पुरानी थीं।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि कई तस्वीरों में लोगों के चेहरों पर लाल निशान बने थे।

     

    हारुतो ने एक तस्वीर उठाई।

     

    वह उसकी माँ की थी।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    12 अक्टूबर 2006

     

    और उसके नीचे एक शब्द था—

     

    “मृत।”

     

    हारुतो का गला सूख गया।

     

    उसकी माँ की मृत्यु भी 12 अक्टूबर 2006 को हुई थी।

     

    उसने अगली तस्वीर उठाई।

     

    उसके पिता की तस्वीर थी।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “मृत — 3 अगस्त 2014।”

     

    हारुतो के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    उसका पिता जिंदा था।

     

    कम से कम वह यही सोचता आया था।

     

    उसके पिता पिछले बारह वर्षों से शहर में काम कर रहे थे।

     

    हर महीने पैसे भेजते थे।

     

    हर कुछ दिनों में फोन करते थे।

     

    लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।

     

    पिछले तीन महीनों से उसके पिता ने उसे फोन नहीं किया था।

     

    उन्होंने सिर्फ संदेश भेजे थे।

     

    छोटे-छोटे संदेश।

     

    “मैं ठीक हूँ।”

     

    “जल्द घर आऊँगा।”

     

    “दरवाज़ा रात में मत खोलना।”

     

    हारुतो के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी कमरे के कोने से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    हारुतो धीरे से मुड़ा।

     

    वहाँ एक छोटी लड़की बैठी थी।

     

    उसके बाल उसके पूरे चेहरे को ढके हुए थे।

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो काले खाली गड्ढे।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे भी यही सवाल पूछा था।”

     

    अचानक कमरे की सारी तस्वीरें अपने-आप हिलने लगीं।

     

    फिर एक साथ गिरने लगीं।

     

    धड़… धड़… धड़…

     

    लड़की गायब हो गई।

     

    हारुतो कमरे से भागकर बाहर आया।

     

    घर का मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था।

     

    बाहर बारिश रुक चुकी थी।

     

    लेकिन जंगल की तरफ से धुंध गाँव में उतर रही थी।

     

    और उस धुंध के भीतर…

     

    एक आदमी खड़ा था।

     

    लंबा कोट।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    हाथ में पुरानी छतरी।

     

    हारुतो की आँखें फैल गईं।

     

    “पापा?”

     

    आदमी ने सिर उठाया।

     

    वह सचमुच उसका पिता था।

     

    हारुतो दौड़कर उसके पास गया।

     

    “पापा!”

     

    उसके पिता ने उसे गले लगा लिया।

     

    उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था।

     

    हारुतो काँप गया।

     

    “आप इतने साल कहाँ थे?”

     

    पिता ने कुछ नहीं कहा।

     

    हारुतो ने उनका चेहरा देखा।

     

    चेहरा वही था।

     

    लेकिन आँखें…

     

    उनमें कोई भाव नहीं था।

     

    “पापा?”

     

    पिता ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी दादी ने गलती की।”

     

    हारुतो ने घबराकर पूछा,

     

    “दादी कहाँ हैं?”

     

    पिता ने जंगल की तरफ देखा।

     

    “वह उसे रोकने गई है।”

     

    “किसे?”

     

    पिता ने उत्तर नहीं दिया।

     

    तभी जंगल के भीतर से घंटी बजी।

     

    टन…

     

    पिता का चेहरा बदल गया।

     

    “भागो।”

     

    “लेकिन—”

     

    “भागो!”

     

    उनकी आवाज़ अचानक इतनी तेज़ थी कि हारुतो पीछे हट गया।

     

    जंगल से कोई चीज़ उनकी तरफ आ रही थी।

     

    पेड़ों के बीच एक काली आकृति दिखाई दी।

     

    लंबे हाथ।

     

    झुका हुआ शरीर।

     

    और हाथ में वही लोहे की घंटी।

     

    शिनिगामी।

     

    हारुतो के पिता ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “अगर वह तुम्हारा नाम पुकारे, तो जवाब मत देना।”

     

    दोनों गाँव की तरफ भागने लगे।

     

    पीछे से घंटी लगातार बज रही थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    हर घंटी के साथ गाँव का एक घर अंधेरे में डूबता जा रहा था।

     

    पहले मंदिर की बत्तियाँ बुझीं।

     

    फिर स्कूल।

     

    फिर गाँव के घर।

     

    एक-एक करके पूरा गाँव अंधेरे में डूब गया।

     

    कुछ ही मिनटों में पूरा कुरोमोरी काली धुंध में घिर चुका था।

     

    पिता हारुतो को गाँव के पुराने मंदिर में ले गए।

     

    मंदिर का दरवाज़ा बंद करते हुए उन्होंने कहा,

     

    “यह जगह कुछ समय के लिए उसे रोक सकती है।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “आपको यह सब कैसे पता है?”

     

    पिता चुप रहे।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    पिता ने उसकी ओर देखा।

     

    “मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

     

    “नहीं!”

     

    हारुतो की आवाज़ काँप रही थी।

     

    “मेरे पिता की मौत 2014 में हो चुकी थी।”

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर उसके पिता ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हें सच पता चल गया।”

     

    मंदिर के अंदर एक पुरानी घंटी लटकी थी।

     

    पिता ने उसे देखा।

     

    “बारह साल पहले मैं मर गया था।”

     

    हारुतो की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “तो फिर आप…”

     

    “मैं यहाँ अपनी इच्छा से नहीं हूँ।”

     

    “कौन लाया आपको?”

     

    पिता ने धीमे स्वर में कहा,

     

    “शिनिगामी।”

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    “क्यों?”

     

    पिता ने मंदिर के फर्श पर बने एक पुराने निशान की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक गोल घेरा बना था।

     

    उसके चारों ओर जापानी अक्षरों जैसे चिन्ह खुदे थे।

     

    “हर पचास साल में शिनिगामी एक परिवार चुनता है।”

     

    “उस परिवार के किसी एक व्यक्ति को मृत्यु के बाद उसका सेवक बनना पड़ता है।”

     

    हारुतो ने डरते हुए पूछा,

     

    “और हमारा परिवार?”

     

    पिता ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “हमारा परिवार पिछले सौ साल से चुना जा रहा है।”

     

    तभी मंदिर के बाहर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

     

    ठक…

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    फिर दूसरी दस्तक।

     

    ठक… ठक…

     

    पिता ने हारुतो के मुँह पर उंगली रख दी।

     

    बाहर से दादी की आवाज़ आई।

     

    “हारुतो… दरवाज़ा खोलो।”

     

    हारुतो ने राहत की साँस ली।

     

    “दादी!”

     

    वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “वह दादी हैं!”

     

    पिता ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    बाहर से फिर आवाज़ आई।

     

    “हारुतो… मैं हूँ।”

     

    हारुतो दरवाज़े के पास गया और नीचे की दरार से बाहर देखने लगा।

     

    उसे दादी के पैर दिखाई दिए।

     

    वह वहीं खड़ी थीं।

     

    लेकिन…

     

    उनके पैरों के पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।

     

    हारुतो पीछे हट गया।

     

    बाहर खड़ी चीज़ अचानक हँसने लगी।

     

    फिर दादी की आवाज़ बदल गई।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बहुत कुछ बता दिया।”

     

    दरवाज़े पर एक लंबी काली उँगली दिखाई दी।

     

    “लेकिन एक बात नहीं बताई…”

     

    पिता का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    काली उँगली धीरे-धीरे दरवाज़े पर ऊपर की तरफ चलने लगी।

     

    “तुम्हारे परिवार को शिनिगामी ने क्यों चुना।”

     

    हारुतो ने पिता की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    पिता ने आँखें बंद कर लीं।

     

    बाहर से आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पूर्वजों ने…”

     

    एक लंबी खामोशी हुई।

     

    फिर दरवाज़े के पीछे से फुसफुसाहट आई—

     

    “पहले शिनिगामी को बनाया था।”

     

    मंदिर के अंदर अचानक सारी मोमबत्तियाँ जल उठीं।

     

    और सामने रखी बुद्ध की मूर्ति के पीछे…

     

    एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    हारुतो ने उसे पहले कभी नहीं देखा था।

     

    दरवाज़े पर खून से एक ही वाक्य लिखा था—

     

    “जिसने शिनिगामी को जन्म दिया, उसका अंतिम वंशज ही उसे खत्म कर सकता है।”

     

    हारुतो ने काँपते हुए पूछा,

     

    “अंतिम वंशज कौन है?”

     

    उसके पिता ने उसकी तरफ देखा।

     

    और पहली बार…

     

    उनकी आँखों में डर दिखाई दिया।

     

    “तुम।”

     

    उसी पल मंदिर की घंटी अपने-आप बज उठी।

     

    टन…

     

    और दूर जंगल से किसी ने चीखकर कहा—

     

    “हारुतो!!!”

     

    तीसरी घंटी बजते ही मंदिर की सारी खिड़कियाँ टूट गईं।

     

    काली धुंध अंदर भरने लगी।

     

    और उस धुंध के बीच…

     

    एक बहुत लंबी आकृति धीरे-धीरे मंदिर के अंदर प्रवेश कर गई।

     

    उसके चेहरे पर इस बार कोई आँखें नहीं थीं।

     

    लेकिन वह सीधे हारुतो को देख रही थी।

     

    शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    और उसकी हथेली पर एक नया नाम उभर आया—

     

    “हारुतो — मृत्यु: आज रात।”

  • 😱 शिनिगामी 😱( मौत का संदेशवाहक )😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    जापान के एक छोटे-से पहाड़ी गाँव कुरोमोरी में सूरज ढलने के बाद कोई घर से बाहर नहीं निकलता था।

     

    गाँव के चारों तरफ घना जंगल था। उस जंगल के पेड़ इतने पुराने थे कि उनकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ आसमान को ढक लेती थीं। दिन में भी जंगल के भीतर अजीब-सी धुंध रहती थी।

     

    लेकिन गाँव की सबसे डरावनी चीज़ जंगल नहीं था।

     

    वह थी…

     

    रात के बारह बजे बजने वाली घंटी।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि अगर किसी ने आधी रात को जंगल की तरफ से घंटी की आवाज़ सुन ली, तो अगले तीन दिनों के भीतर किसी की मौत निश्चित होती है।

     

    और अगर घंटी तीन बार बजे…

     

    तो मरने वाला इंसान नहीं होता।

     

    वह कोई ऐसी चीज़ होती थी, जिसे इंसानों की दुनिया में होना ही नहीं चाहिए।

     

    गाँव में रहने वाला सत्रह वर्षीय हारुโต इन बातों को अंधविश्वास समझता था।

     

    उसका पिता शहर में काम करता था और उसकी माँ की कई साल पहले मृत्यु हो चुकी थी। हारुतो अपनी दादी के साथ रहता था।

     

    एक रात तेज़ बारिश हो रही थी।

     

    हवा खिड़कियों से टकरा रही थी।

     

    दादी ने घर की सारी खिड़कियाँ बंद करते हुए कहा,

     

    “आज रात दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    हारुतो किताब पढ़ते हुए हँसा।

     

    “दादी, फिर वही कहानी?”

     

    दादी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

     

    “यह कहानी नहीं है।”

     

    हारुतो चुप हो गया।

     

    दादी धीरे से उसके पास आईं और बोलीं,

     

    “आज से ठीक पचास साल पहले… इसी रात… गाँव में पहली बार वह घंटी बजी थी।”

     

    “और?”

     

    “उस रात मेरे पिता गायब हुए थे।”

     

    हारुतो ने किताब बंद कर दी।

     

    “गायब?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “उनकी लाश कभी नहीं मिली।”

     

    कुछ पल के लिए कमरे में सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई देती रही।

     

    तभी…

     

    टन…

     

    हारुतो का दिल धक से रह गया।

     

    दादी के हाथ से लालटेन लगभग गिर गई।

     

    दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    फिर…

     

    टन…

     

    दूसरी घंटी।

     

    दादी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उन्होंने फुसफुसाकर कहा,

     

    “खिड़की के पास मत जाना।”

     

    हारुतो ने पूछा,

     

    “लेकिन घंटी कहाँ से—”

     

    टन…

     

    तीसरी घंटी।

     

    कमरे की लालटेन अचानक बुझ गई।

     

    पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

     

    दादी काँपने लगीं।

     

    “वह आ गया…”

     

    हारुतो ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    “कौन?”

     

    दादी ने काँपते हुए कहा,

     

    “शिनिगामी।”

     

    जापानी लोककथाओं में शिनिगामी को मृत्यु से जुड़ी आत्मिक सत्ता माना जाता है।

     

    लेकिन कुरोमोरी के लोगों के लिए शिनिगामी सिर्फ मौत का देवता नहीं था।

     

    वह मौत का चुनाव करने वाला था।

     

    दादी ने हारुतो का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अगर वह तुम्हारा नाम पुकारे… तो जवाब मत देना।”

     

    “और अगर मैं जवाब दे दूँ?”

     

    दादी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो वह तुम्हें देख लेगा।”

     

    अचानक बाहर से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छपाक…

     

    बारिश में कोई नंगे पैर चल रहा था।

     

    छपाक… छपाक…

     

    आवाज़ घर के सामने आकर रुक गई।

     

    हारुतो की साँसें तेज़ हो गईं।

     

    फिर दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दादी ने हारुतो का मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया।

     

    बाहर से आवाज़ आई।

     

    “हारुतो…”

     

    उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    वह आवाज़ उसकी माँ की थी।

     

    वही आवाज़…

     

    जो उसने दस साल से नहीं सुनी थी।

     

    “हारुतो… दरवाज़ा खोलो।”

     

    उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “माँ…?”

     

    दादी ने उसका मुँह और कसकर दबा दिया।

     

    “नहीं!”

     

    बाहर से फिर आवाज़ आई।

     

    “बेटा… मुझे बहुत ठंड लग रही है।”

     

    हारुतो दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा।

     

    दादी ने उसे पीछे खींच लिया।

     

    “वह तुम्हारी माँ नहीं है!”

     

    अचानक बाहर की आवाज़ बदल गई।

     

    अब वह भारी और खुरदरी थी।

     

    “तो तुमने उसे पहचान लिया…”

     

    दरवाज़े के नीचे से काला पानी अंदर आने लगा।

     

    लेकिन वह पानी बारिश का नहीं था।

     

    उसमें से सड़ी हुई मिट्टी और लोहे जैसी गंध आ रही थी।

     

    हारुतो ने मोबाइल नीचे किया।

     

    दरवाज़े के दूसरी तरफ दो लंबे पैर दिखाई दे रहे थे।

     

    लेकिन…

     

    उन पैरों के पंजे उल्टी दिशा में मुड़े हुए थे।

     

    दादी ने फुसफुसाकर मंत्र जैसा कुछ बोलना शुरू किया।

     

    अचानक दरवाज़े पर जोरदार प्रहार हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    पूरा घर हिल गया।

     

    फिर दूसरा प्रहार।

     

    धड़ाम!

     

    तीसरे प्रहार के बाद दरवाज़े पर एक लंबी काली दरार बन गई।

     

    उस दरार के भीतर से एक आँख दिखाई दी।

     

    लाल…

     

    बिल्कुल लाल।

     

    हारुतो चीखने ही वाला था कि दादी ने उसे खींचकर पुराने तहखाने में पहुँचा दिया।

     

    उन्होंने फर्श के नीचे छिपा एक लकड़ी का दरवाज़ा खोला।

     

    “अंदर जाओ!”

     

    “आप?”

     

    “मैं उसके लिए हूँ।”

     

    हारुतो ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं!”

     

    दादी ने उसे धक्का देकर अंदर कर दिया।

     

    “जो भी सुनो… पीछे मत देखना।”

     

    लकड़ी का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    अंदर घुप्प अंधेरा था।

     

    हारुतो ने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    तहखाने की दीवारों पर सैकड़ों नाम लिखे थे।

     

    केंजी।

     

    मासाओ।

     

    युकी।

     

    अकीरा।

     

    कुछ नामों पर लाल निशान बने थे।

     

    सबसे नीचे एक नया नाम लिखा था।

     

    हारुतो।

     

    उसकी साँस रुक गई।

     

    “यह… यहाँ किसने लिखा?”

     

    तभी उसके पीछे से किसी ने धीरे से फुसफुसाया,

     

    “तुम्हारी दादी ने।”

     

    हारुतो पलटा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    उसका मोबाइल अपने-आप बंद हो गया।

     

    और उसी क्षण…

     

    तहखाने के दूसरे छोर से एक आदमी की धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    “हारुतो…”

     

    वह पीछे हटने लगा।

     

    अंधेरे में एक लंबी आकृति खड़ी थी।

     

    काले कपड़े।

     

    बहुत लंबे हाथ।

     

    सफेद चेहरा।

     

    और आँखों की जगह दो गहरे काले गड्ढे।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी लोहे की घंटी थी।

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    टन…

     

    घंटी बजी।

     

    हारुतो के कानों में अचानक हजारों लोगों की चीखें सुनाई देने लगीं।

     

    आकृति उसके सामने आकर रुक गई।

     

    फिर उसने अपना सिर टेढ़ा किया।

     

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाया था…”

     

    हारुतो काँपने लगा।

     

    “क्या…?”

     

    शिनिगामी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    “लेकिन अब… तुम्हारी बारी है।”

     

    हारुतो ने पीछे हटते हुए दीवार को छुआ।

     

    तभी उसकी उँगलियाँ किसी ठंडी चीज़ से टकराईं।

     

    एक पुरानी तस्वीर।

     

    उसने मोबाइल दोबारा चालू किया।

     

    तस्वीर में गाँव के लगभग बीस लोग खड़े थे।

     

    बीच में उसकी दादी थीं।

     

    उनके पास एक जवान आदमी खड़ा था।

     

    हारुतो ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    वह आदमी…

     

    उसका पिता था।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

     

    1976

     

    हारुतो के हाथ काँपने लगे।

     

    उसका पिता तो 1989 में पैदा हुआ था।

     

    तभी तस्वीर में खड़ा उसका पिता धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा।

     

    हारुतो ने तस्वीर गिरा दी।

     

    शिनिगामी गायब था।

     

    लेकिन तहखाने की दीवार पर एक नई आवाज़ गूँजी—

     

    टन…

     

    फिर फुसफुसाहट आई।

     

    “भागो, हारुतो…”

     

    “क्योंकि अगली घंटी तुम्हारे लिए नहीं…”

     

    कुछ पल की खामोशी।

     

    फिर…

     

    “तुम्हारे पिता के लिए है।”

     

    उसी क्षण ऊपर से दादी की चीख सुनाई दी।

     

    और उसके बाद…

     

    घर के बाहर किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “हारुतो… तुम्हारे पिता वापस आ गए हैं।”

  • भूतिया गुड़िया (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    सब कुछ अचानक बदल चुका था।

     

    पुरानी काली हवेली अब नई दिखाई दे रही थी।

     

    दीवारों पर दीपक जल रहे थे।

     

    आँगन में एक बच्ची खेल रही थी।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके पास लाल फ्रॉक वाली गुड़िया थी।

     

    लेकिन कुछ ही दूरी पर एक और बच्ची खड़ी थी।

     

    वह तारा थी।

     

    तारा की आँखों में डर था।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    एक कमरे से किसी आदमी की आवाज़ आ रही थी।

     

    “तुम दोनों में से एक ही इस घर की वारिस होगी।”

     

    यह रुद्र प्रताप की आवाज़ थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उस कमरे की तरफ बढ़ा।

     

    दरवाज़े के पीछे रुद्र प्रताप खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी काली किताब थी।

     

    वह कुछ मंत्र पढ़ रहा था।

     

    आरव समझ गया कि यह सिर्फ किसी बच्ची की हत्या की कहानी नहीं थी।

     

    इसके पीछे कोई भयानक रहस्य था।

     

    तभी सावित्री कमरे में आई।

     

    “आप ये क्या कर रहे हैं?”

     

    रुद्र ने किताब बंद कर दी।

     

    “जिसे मैंने शुरू किया है, उसे पूरा करना होगा।”

     

    “लेकिन ये हमारी बेटियाँ हैं!”

     

    रुद्र ने ठंडी आवाज़ में कहा, “बेटियाँ नहीं… रास्ता हैं।”

     

    आरव ने किताब के पन्नों पर नजर डाली।

     

    उसमें लिखा था कि हवेली के नीचे एक प्राचीन शक्ति बंद थी। उसे जगाने के लिए एक मासूम बच्चे की आत्मा चाहिए थी।

     

    रुद्र ने मीरा को चुना था।

     

    लेकिन तारा ने उसे देख लिया था।

     

    इसीलिए उसने तारा को कुएँ में धकेल दिया।

     

    लेकिन योजना असफल हो गई।

     

    तारा मरने के बाद भी मीरा के पास लौट आई।

     

    रुद्र ने मीरा को उसी कमरे में बंद कर दिया।

     

    और फिर…

     

    वह रात आई।

     

    मीरा ने अपनी गुड़िया को सीने से लगाया और रोते हुए कहा—

     

    “तारा मुझे लेने आएगी।”

     

    कमरे के अंदर अचानक ठंडी हवा चली।

     

    गुड़िया की आँखें चमक उठीं।

     

    तारा की आत्मा वहाँ प्रकट हुई।

     

    उसने मीरा का हाथ पकड़ा।

     

    दोनों बच्चियाँ एक-दूसरे से लिपट गईं।

     

    रुद्र कमरे में पहुँचा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उन्हें छुआ, वह चीख पड़ा।

     

    उसकी त्वचा काली पड़ने लगी।

     

    कमरे की दीवारों से काली परछाइयाँ निकलने लगीं।

     

    रुद्र भागने लगा।

     

    लेकिन दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    फिर दोनों बच्चियों की आवाज़ गूँजी—

     

    “अब तुम्हारी बारी है।”

     

    कुछ ही सेकंड में कमरा शांत हो गया।

     

    रुद्र गायब था।

     

    सिर्फ उसकी काली किताब जमीन पर पड़ी थी।

     

    आरव यह सब देख रहा था।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “अब तुम समझ गए।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    मीरा और तारा उसके सामने खड़ी थीं।

     

    लेकिन अब वे डरावनी नहीं लग रही थीं।

     

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

     

    “हमें आज़ाद करो।”

     

    आरव ने पूछा, “कैसे?”

     

    तारा ने अपनी गुड़िया की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे तोड़ना होगा।”

     

    आरव ने गुड़िया उठाई।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उसे जमीन पर पटकने की कोशिश की, उसका हाथ रुक गया।

     

    उसकी उँगलियाँ सुन्न हो गईं।

     

    गुड़िया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    फिर एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “उसे मत छूना।”

     

    कमरे में अचानक अंधेरा छा गया।

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    एक विशाल काली परछाई आरव के सामने खड़ी हो गई।

     

    वह रुद्र की आत्मा थी।

     

    “यह गुड़िया मेरी है।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    रुद्र की आत्मा ने कहा, “मैंने इसे बनाया है। इसमें मीरा की आत्मा कैद है। और तारा उसकी रखवाली करती है।”

     

    आरव ने कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    परछाई हँसी।

     

    “तुम्हें लगता है ये दोनों तुम्हें आज़ाद करना चाहती हैं?”

     

    तभी मीरा चीखी—

     

    “आरव! गुड़िया तोड़ दो!”

     

    आरव ने पूरी ताकत से गुड़िया को जमीन पर दे मारा।

     

    धड़ाम!

     

    गुड़िया का सिर टूट गया।

     

    एक तेज चीख पूरे घर में गूँज गई।

     

    रुद्र की परछाई पीछे हट गई।

     

    लेकिन अगले ही पल गुड़िया के टूटे हुए शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    धुआँ पूरे कमरे में फैल गया।

     

    आरव को लगा कि कोई उसके गले को दबा रहा है।

     

    तभी तारा ने मीरा का हाथ पकड़ा।

     

    दोनों ने एक साथ कहा—

     

    “आज हमारा खेल खत्म होगा।”

     

    अचानक कमरे में तेज सफेद रोशनी फैल गई।

     

    रुद्र की आत्मा चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    एक पल बाद सब शांत हो गया।

     

    आरव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    जब उसकी आँखें खुलीं, वह हवेली के उसी पुराने कमरे में था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    उसके हाथ में गुड़िया का टूटा हुआ सिर था।

     

    लेकिन अब उसके चेहरे पर कोई डरावनी मुस्कान नहीं थी।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    आरव ने राहत की साँस ली।

     

    वह घर लौट आया।

     

    गाँव वालों को पूरी कहानी बताई।

     

    बूढ़े ने उसकी बात सुनकर कहा—

     

    “अब शायद दोनों बच्चियों को मुक्ति मिल गई है।”

     

    काली हवेली को बाद में पूरी तरह बंद कर दिया गया।

     

    उस कमरे को ईंटों से चुनवा दिया गया।

     

    कुछ दिनों बाद आरव शहर लौट गया।

     

    उसने उस घटना के बारे में किसी से बात नहीं की।

     

    लेकिन एक रात…

     

    लगभग तीन महीने बाद…

     

    आरव अपने कमरे में बैठा था।

     

    अचानक उसे एक आवाज़ सुनाई दी।

     

    टक… टक… टक…

     

    उसने दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फर्श पर एक छोटी-सी लाल गुड़िया पड़ी थी।

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उसने गुड़िया उठाई।

     

    उसके गले में एक नया लॉकेट था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “तारा।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    तभी उसके पीछे से एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    उसने धीरे-धीरे पलटकर देखा।

     

    कमरे के कोने में मीरा खड़ी थी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    और उसके पीछे…

     

    तारा खड़ी थी।

     

    दोनों ने एक साथ कहा—

     

    “हमने कहा था ना… खेल अभी खत्म नहीं हुआ।”

     

    अचानक कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ दो जोड़ी काली आँखें चमक रही थीं।

     

    फिर एक गुड़िया की हँसी सुनाई दी—

     

    “ही… ही… ही…”

     

    और उसी रात से आरव के घर के सामने रहने वाले लोगों ने एक अजीब चीज़ देखनी शुरू कर दी।

     

    हर रात ठीक तीन बजे आरव की खिड़की में दो छोटी बच्चियाँ दिखाई देती थीं।

     

    एक लाल फ्रॉक पहने हुए।

     

    दूसरी सफेद कपड़ों में।

     

    और उनके बीच में…

     

    एक गुड़िया।

     

    कहते हैं, अगर कोई उस खिड़की की तरफ लगातार देखता रहे…

     

    तो कुछ देर बाद उन दोनों बच्चियों में से एक धीरे-धीरे अपना हाथ उठाती है…

     

    और खिड़की के शीशे पर उँगली से सिर्फ एक शब्द लिखती है—

     

    “खेलोगे?”

     

    उसके बाद वह घर कभी खाली नहीं रहता।

     

    क्योंकि जहाँ वह गुड़िया पहुँचती है…

     

    वहाँ से उसकी कहानी कभी खत्म नहीं होती।

     

    समाप्त… या शायद नहीं।

  • महादेव भक्त से मिलने पहुंचे

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    महादेव अपने भक्त से मिलने आए

     

    रतीराम और मतिराम दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे। दोनों की हालत पिछले कई सालों से खराब चल रही थी। घर में खाने तक के लाले पड़े रहते थे। कभी मजदूरी मिल जाती तो चूल्हा जल जाता, वरना दोनों परिवारों को खाली पेट ही सोना पड़ता।

     

    लेकिन गरीबी से ज्यादा उन्हें एक और चीज ने तोड़ दिया था—शराब।

     

    शाम होते ही दोनों गांव के बाहर बनी छोटी-सी शराब की दुकान पर पहुंच जाते और अपनी सारी कमाई वहीं उड़ा देते।

     

    उस दिन भी दोनों ने दिनभर मजदूरी की थी। शाम को हाथ में आए कुछ पैसे लेकर शराब की दुकान पर पहुंचे और खूब शराब पी ली।

     

    रतीराम लड़खड़ाते हुए बोला, “मतिराम… हमारी किस्मत ही खराब है रे। देख, दिनभर हड्डियां तोड़ो और रात को भी पेट खाली।”

     

    मतिराम ने हंसते हुए कहा, “किस्मत खराब नहीं है रतीराम… भगवान ही हमारे खिलाफ हैं।”

     

    रतीराम ने बोतल का आखिरी घूंट पीते हुए कहा, “हां… भगवान अगर होते तो हमारी ये हालत क्यों होती?”

     

    दोनों सड़क पर हिलते-डुलते आगे बढ़ने लगे।

     

    रात काफी हो चुकी थी। गांव की सड़क लगभग सुनसान थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।

     

    अचानक सामने से उन्हें एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    उसके हाथ में लकड़ी की एक पुरानी छड़ी थी। कपड़े बेहद साधारण थे और वह इतना धीरे-धीरे चल रहा था कि हर कदम पर ऐसा लगता जैसे अभी गिर जाएगा।

     

    मतिराम ने उसे देखकर कहा, “अरे हटो बाबा… सड़क के बीच में क्यों चल रहे हो?”

     

    बूढ़ा कुछ बोल पाता, उससे पहले दोनों उससे टकरा गए।

     

    धड़ाम!

     

    बूढ़ा सड़क पर गिर पड़ा।

     

    रतीराम और मतिराम भी लड़खड़ाकर कुछ कदम पीछे हो गए।

     

    मतिराम झल्लाकर बोला, “अरे बाबा! देखकर नहीं चल सकते?”

     

    बूढ़े ने धीरे से सिर उठाया।

     

    उसके चेहरे पर अजीब सी शांति थी।

     

    उसने कहा, “गलती तुम्हारी थी बेटा… फिर भी तुम मुझे ही दोष दे रहे हो?”

     

    रतीराम कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    उस बूढ़े की आंखों में उसे कुछ ऐसा दिखाई दे रहा था, जिसे वह समझ नहीं पा रहा था।

     

    उसने मतिराम से कहा, “चल, इसे उठा देते हैं।”

     

    दोनों ने बूढ़े को उठाया।

     

    बूढ़ा खड़ा हुआ और अपनी छड़ी के सहारे कुछ कदम आगे बढ़ा। फिर अचानक रुक गया।

     

    “रतीराम…”

     

    रतीराम के पैर वहीं जम गए।

     

    उसने घबराकर पूछा, “आप… मेरा नाम कैसे जानते हो?”

     

    बूढ़ा पलटा।

     

    “मतिराम… तुम भी यही सोच रहे हो न कि मैंने तुम्हारा नाम कैसे जाना?”

     

    मतिराम का नशा जैसे एक पल में उतरने लगा।

     

    वह बोला, “आप कौन हैं?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “जिसे तुमने आज शाम दोष दिया था… उसी को तुम सालों से पुकारते भी आए हो।”

     

    रतीराम और मतिराम एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    रतीराम बोला, “हमने तो भगवान को कभी देखा ही नहीं।”

     

    बूढ़े ने कहा, “लेकिन तुम्हारे घर के कोने में शिव की एक छोटी-सी मूर्ति आज भी रखी है।”

     

    रतीराम की आंखें फैल गईं।

     

    वह मूर्ति उसकी मां ने उसे बचपन में दी थी।

     

    मां के गुजरने के बाद भी उसने वह मूर्ति संभालकर रखी थी।

     

    बूढ़ा बोला, “तुम भूल गए रतीराम, लेकिन तुम्हारी मां नहीं भूली थी।”

     

    रतीराम के चेहरे पर डर और हैरानी साफ दिखाई देने लगी।

     

    बूढ़ा धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम बचपन में रोज मेरे सामने बैठकर प्रार्थना करते थे। कहते थे—’महादेव, जब मैं बड़ा होऊंगा तो गरीबों की मदद करूंगा। किसी भूखे को खाली हाथ नहीं लौटाऊंगा।’”

     

    रतीराम की आंखों में बचपन की तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    उसे अपनी मां याद आ गई।

     

    मंदिर की घंटियां याद आ गईं।

     

    और वह छोटी सी शिव प्रतिमा भी याद आ गई।

     

    वह कांपती आवाज में बोला, “लेकिन… मैं बदल गया।”

     

    बूढ़े ने कहा, “गरीबी ने तुम्हें नहीं बदला बेटा… तुम्हारे फैसलों ने बदला।”

     

    मतिराम चुपचाप खड़ा था।

     

    तभी बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और तुम मतिराम… तुम्हें याद है वह बरसात का दिन?”

     

    मतिराम ने सिर झुका लिया।

     

    “कौन सा दिन?”

     

    “जब तुम्हारे पास सिर्फ दो रोटियां थीं और तुमने उनमें से एक रोटी रास्ते में बैठे बूढ़े को दे दी थी?”

     

    मतिराम के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    वह घटना उसे धुंधली-सी याद थी।

     

    बूढ़े ने कहा, “उस दिन तुमने कहा था ‘बाबा, मेरे पास ज्यादा नहीं है, लेकिन आधा आपका है।’”

     

    मतिराम की आंखें भर आईं।

     

    “वो तो बहुत साल पहले की बात है।”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “भगवान के लिए साल पुराने नहीं होते। कर्म पुराने नहीं होते। इंसान भूल जाता है, लेकिन कर्म अपना रास्ता नहीं भूलते।”

     

    अचानक हवा तेज चलने लगी।

     

    बूढ़े की छड़ी जमीन पर गिर गई।

     

    रतीराम उसे उठाने के लिए झुका।

     

    लेकिन जैसे ही उसने सिर उठाया…

     

    वह बूढ़ा वहां नहीं था।

     

    सड़क के बीच सिर्फ उसकी लकड़ी की छड़ी पड़ी थी।

    दोनों घबरा गए।

     

    अचानक दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।

    टन… टन… टन…

    रतीराम की नजर आसमान की तरफ उठी।

     

    बादलों के बीच से चांद की रोशनी निकली और उसी रोशनी में उसे एक विशाल त्रिशूल की परछाईं दिखाई दी।

     

    मतिराम कांपते हुए बोला, “रतीराम… वो बूढ़ा कोई साधारण इंसान नहीं था।”

     

    रतीराम की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उसने हाथ जोड़ लिए।

     

    “महादेव…”

     

    तभी उनके कानों में एक शांत आवाज आई

     

    “मैं तुम्हें सजा देने नहीं आया था। मैं तुम्हें तुम्हारा रास्ता याद दिलाने आया था।”

     

    दोनों सड़क पर बैठ गए।

     

    रतीराम रोते हुए बोला, “महादेव… हमने आपको दोष दिया। अपनी गलतियों का दोष भी आपके सिर डाल दिया। हमें माफ कर दीजिए।”

     

    आवाज फिर आई”माफी शब्दों से नहीं, कर्मों से मांगो।”

     

    अगली सुबह गांव वालों ने देखा कि रतीराम और मतिराम शराब की दुकान पर नहीं गए।

     

    दोनों मजदूरी करने निकले।

     

    शाम को जब मजदूरी मिली तो रतीराम ने पैसे घर ले जाकर अपनी पत्नी के हाथ में रख दिए।

     

    पत्नी ने हैरानी से पूछा, “आज शराब नहीं पी?”

     

    रतीराम मुस्कुराया।

     

    “आज समझ आया है कि गरीबी हमारी दुश्मन नहीं थी… हमारी गलत आदतें थीं।”

     

    उधर मतिराम ने रास्ते में एक भूखे बच्चे को देखा।

     

    उसने अपनी मजदूरी से खाना खरीदा और बच्चे को दे दिया।

    बच्चे ने मुस्कुराकर कहा, “भगवान आपको खुश रखे।”

     

    मतिराम कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

    उसे वही बूढ़ा याद आ गया।

     

    कुछ दिनों बाद दोनों ने गांव के पुराने शिव मंदिर की सफाई शुरू कर दी।

     

    जिस मंदिर में कभी रतीराम बचपन में बैठकर महादेव से प्रार्थना करता था, वहां अब फिर दीपक जलने लगा।

     

    एक शाम रतीराम ने मंदिर में सिर झुकाकर कहा

     

    “महादेव, उस रात आपने बूढ़े का रूप लेकर हमें नहीं बचाया था… आपने हमें हमारे ही पुराने रूप से मिलाया था।”

     

    मतिराम ने कहा, “और हमारे कर्मों की याद दिलाकर हमें दूसरा मौका दिया।”

    मंदिर की घंटी अचानक अपने आप बज उठी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

    रतीराम मुस्कुराया।

     

    “चल मतिराम… लगता है महादेव ने हमारी बात सुन ली।”

     

    मतिराम ने हाथ जोड़कर कहा”महादेव को सुनाने के लिए शब्द नहीं चाहिए होते… सच्चा मन चाहिए।”

     

    उस दिन के बाद दोनों ने शराब छोड़ दी।

    गरीबी तुरंत खत्म नहीं हुई।

     

    मुश्किलें भी खत्म नहीं हुईं।

    लेकिन अब उनके पास मुश्किलों से लड़ने की हिम्मत थी।

    और गांव वाले अक्सर कहते थे

    “जिस रात दो नशे में डूबे आदमी एक बूढ़े से टकराए थे, उसी रात उनकी जिंदगी बदल गई थी। क्योंकि वह बूढ़ा कोई इंसान नहीं… स्वयं महादेव थे, जो अपने भूले हुए भक्तों को उनका रास्ता याद दिलाने आए थे।”

  • ताक़तवर पेड़

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जादुई जंगल का ताकतवर पेड़

     

    बहुत दूर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच एक ऐसा जंगल था, जिसका नाम था मायावी वन।

     

    कहा जाता था कि यह कोई साधारण जंगल नहीं था। वहाँ पेड़ चलते थे, नदियाँ अपना रास्ता बदल लेती थीं और रात के समय आसमान में ऐसे सितारे दिखाई देते थे जो आम दुनिया में कभी नहीं दिखते थे।

     

    लेकिन उस जंगल की सबसे बड़ी पहचान एक पेड़ था।

     

    उसका नाम था अमरवृक्ष।

     

    लोग कहते थे कि अगर कोई इंसान उस पेड़ तक पहुँचकर उसे अपने हाथों से छू ले, तो उसके अंदर ऐसी शक्ति आ जाती थी कि वह दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान बन सकता था।

     

    वह हवा को अपने इशारे पर मोड़ सकता था, पानी को रोक सकता था और अपनी ताकत से बड़े-बड़े पत्थर तक उठा सकता था।

     

    लेकिन समस्या यह थी कि आज तक कोई उस पेड़ तक पहुँच ही नहीं पाया था।

     

    कई राजा, सैनिक और जादूगर उसे खोजने जंगल में गए थे।

     

    कुछ वापस लौट आए, लेकिन वे पेड़ तक नहीं पहुँच सके।

     

    और कुछ तो कभी वापस ही नहीं आए।

     

    धीरे-धीरे लोगों ने मान लिया कि अमरवृक्ष सिर्फ एक कहानी है।

     

    लेकिन पहाड़ों के पास रहने वाला एक सत्रह साल का लड़का सोहन इन बातों पर विश्वास करता था।

     

    उसके पिता बचपन से उसे उस पेड़ की कहानी सुनाते आए थे।

     

    एक दिन सोहन ने पूछा, “पिताजी, अगर वह पेड़ सच में इतना ताकतवर है तो किसी ने उसे देखा क्यों नहीं?”

     

    उसके पिता ने कहा, “क्योंकि वह पेड़ ताकत हर किसी को नहीं देता।”

     

    “तो किसे देता है?”

     

    पिता कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “जिसके दिल में ताकत पाने की लालच नहीं होती।”

     

    सोहन को यह बात समझ नहीं आई।

     

    “लेकिन कोई उस पेड़ को ढूंढेगा ही क्यों अगर उसे ताकत नहीं चाहिए?”

     

    पिता मुस्कुराए।

    “यही तो अमरवृक्ष की सबसे बड़ी पहेली है।”

     

    कुछ साल बाद सोहन के पिता अचानक गायब हो गए।

     

    उनके कमरे में सिर्फ एक पुराना नक्शा मिला।

     

    नक्शे पर मायावी वन बना था और उसके बीच लाल स्याही से एक निशान लगाया गया था।

     

    सोहन समझ गया कि उसके पिता अमरवृक्ष की तलाश में गए थे।

    उसने उसी दिन जंगल जाने का फैसला कर लिया।

     

    अगली सुबह वह अपना छोटा सा बैग लेकर मायावी वन की तरफ निकल पड़ा।

    जंगल के अंदर जाते ही उसे महसूस हुआ कि यहाँ कुछ अलग था।

     

    हवा बिल्कुल शांत थी।

    फिर अचानक एक पेड़ की शाखा उसके सामने आकर रास्ता रोकने लगी।

    सोहन पीछे हट गया।

     

    शाखा धीरे-धीरे वापस ऊपर चली गई।

    “तो कहानी सच है,” सोहन ने खुद से कहा।

    वह आगे बढ़ता गया।

    कुछ दूर जाने के बाद उसे तीन रास्ते दिखाई दिए।

    नक्शे पर भी तीन रास्ते बने थे।

     

    पहले रास्ते के ऊपर लिखा था जो सबसे आसान दिखे, वही सबसे खतरनाक है।”

     

    दूसरे रास्ते के ऊपर लिखा था“जो डराए, जरूरी नहीं कि वह दुश्मन हो।”

     

    और तीसरे रास्ते पर लिखा था“जिसे चुनोगे, वही तुम्हें बदलेगा।”

     

    सोहन काफी देर तक तीनों रास्तों को देखता रहा।

     

    आखिर उसने दूसरा रास्ता चुना।

     

    जैसे ही वह आगे बढ़ा, जंगल अचानक अंधेरा हो गया।

     

    उसके सामने एक विशाल काला भेड़िया आकर खड़ा हो गया।

     

    सोहन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    भेड़िया गुर्राया।

     

    सोहन ने हाथ में पकड़ी लकड़ी कसकर पकड़ ली।

     

    लेकिन भेड़िया अचानक मुड़ा और आगे चलने लगा।

     

    सोहन को अपने पिता की बात याद आई—

     

    “जो डराए, जरूरी नहीं कि वह दुश्मन हो।”

     

    वह भेड़िए के पीछे चल पड़ा।

     

    कुछ दूर जाकर भेड़िया एक चट्टान के पास रुका और गायब हो गया।

     

    वहाँ पत्थर पर एक छोटा सा चिन्ह बना था।

     

    सोहन ने नक्शे को उससे मिलाया।

     

    “ये रास्ता सही है!”

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    लेकिन तभी जमीन हिलने लगी।

     

    पेड़ों के बीच से आवाज आई—

     

    “वापस चले जाओ…”

     

    सोहन रुक गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “तुम्हें ताकत चाहिए… इसलिए तुम यहाँ तक आए हो।”

     

    सोहन ने कहा, “नहीं!”

     

    जंगल में हँसी गूँज उठी।

     

    “हर इंसान ताकत चाहता है।”

     

    सोहन कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा, “मुझे ताकत चाहिए… लेकिन खुद के लिए नहीं।”

     

    जंगल अचानक शांत हो गया।

     

    सोहन ने आगे कहा

    “मेरे पिता को इस जंगल ने मुझसे छीन लिया है। मैं उन्हें ढूंढने आया हूँ। अगर अमरवृक्ष सच में उन्हें जानता है, तो मैं उसके पास जाऊँगा।”

     

    अचानक उसके सामने रास्ता खुल गया।

     

    पेड़ों के बीच से सुनहरी रोशनी आने लगी।

    सोहन की आँखें उस रोशनी से चौंधिया गईं।

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

    और फिर जो उसने देखा, उसे देखकर उसकी सांस रुक गई।

    एक विशाल पेड़ उसके सामने खड़ा था।

     

    उसका तना चाँदी जैसा चमक रहा था।

     

    उसकी शाखाएँ आसमान तक फैली थीं और उन पर हजारों सुनहरे पत्ते लगे थे।

     

    हर पत्ता हवा के बिना भी हिल रहा था।

    सोहन समझ गय यही अमरवृक्ष था।

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास गया।

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

    लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियाँ पेड़ को छूने वाली थीं, सामने अचानक उसके पिता दिखाई दिए।

     

    “सोहन!”

    वह खुशी से चिल्लाया।

    “पिताजी!”

    सोहन उनकी तरफ दौड़ा।

    लेकिन पिता धुंध की तरह गायब हो गए।

    सोहन समझ गया कि यह पेड़ की परीक्षा थी।

    तभी अमरवृक्ष से आवाज आई

    “अगर तुम्हें शक्ति मिल जाए, तो तुम सबसे पहले क्या करोगे?”

    सोहन ने कहा, “मैं अपने पिता को ढूंढूँगा।”

    “और उसके बाद?”

    “मैं उन लोगों की मदद करूँगा जिन्हें अपनी रक्षा करने के लिए किसी ताकतवर इंसान की जरूरत है।”

    “और अगर तुम्हारे पास दुनिया की सबसे बड़ी ताकत आ जाए?”

    सोहन ने कुछ पल सोचा।

    फिर बोला

    “तो मैं कोशिश करूँगा कि उस ताकत का इस्तेमाल किसी को डराने के लिए न हो।”

    पेड़ की शाखाएँ चमकने लगीं।

    सुनहरी रोशनी पूरे जंगल में फैल गई।

     

    सोहन ने धीरे से पेड़ को छू लिया।

    अचानक उसके शरीर के चारों तरफ तेज हवा घूमने लगी।

    जमीन हिलने लगी।

    उसके हाथों में चमकती रोशनी दिखाई दी।

    उसके अंदर एक ऐसी शक्ति जाग चुकी थी जिसकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी।

    लेकिन तभी पेड़ ने कहा“तुमने मेरी शक्ति पा ली है।”

    सोहन ने आश्चर्य से पूछा, “तो अब मैं दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान हूँ?”

    पेड़ ने उत्तर दिया नहीं।”

    सोहन चौंक गया।

    “क्यों?”

    “क्योंकि असली ताकत शरीर में नहीं होती।”

     

    पेड़ की जड़ें अचानक चमकने लगीं।

     

    और जमीन के नीचे से एक रास्ता खुल गया।

    सोहन ने नीचे देखा।

     

    वहाँ एक छोटी सी गुफा थी।

    गुफा की दीवार पर उसके पिता का नाम लिखा था।

     

    सोहन की आँखें भर आईं।

    वह समझ गया कि उसके पिता अभी जीवित हो सकते हैं।

     

    लेकिन तभी पेड़ की आवाज फिर गूँजी“अगर तुम उन्हें बचाना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी नई शक्ति की पहली परीक्षा देनी होगी।”

    सोहन ने पूछा “कैसी परीक्षा?”

    अचानक जंगल के दूसरे छोर से एक भयानक गर्जना सुनाई दी।

    पेड़ों के पत्ते कांपने लगे।

    सोहन ने पीछे मुड़कर देखा।

    अंधेरे के बीच दो विशाल चमकती आँखें दिखाई दे रही थीं।

     

    पेड़ ने कहा“वह इस जंगल का रक्षक है।”

     

    सोहन ने अपनी मुट्ठी बांधी।

    अब उसे समझ आ गया था कि अमरवृक्ष तक पहुँचना ही असली मंजिल नहीं थी।