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  • दो घरों के बीच बटा एक आदमी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    दो घरों के बीच बंटा एक आदमी

     

    शहर से थोड़ा दूर बसे एक छोटे से गांव में शान अपने परिवार का सबसे बड़ा बेटा था। पिता की तबीयत अक्सर खराब रहती थी और घर की जिम्मेदारी धीरे-धीरे शान के कंधों पर आ गई थी। मां की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि बेटे का घर बस जाए, ताकि वह भी चैन से जी सके।

     

    शान की उम्र करीब पच्चीस साल थी, जब उसकी शादी परिवार वालों ने नंदिनी से कर दी।

     

    नंदिनी बहुत साधारण परिवार की शांत और समझदार लड़की थी। वह ज्यादा बोलती नहीं थी, लेकिन उसके मन में अपने पति और नए परिवार के लिए बहुत सम्मान था।

     

    शादी के बाद शान को नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा।

     

    जाते समय नंदिनी ने पूछा, “आप इतनी जल्दी चले जाएंगे?”

     

    शान ने मुस्कुराकर कहा, “क्या करूं? नौकरी है। कुछ साल मेहनत कर लूं, फिर तुम्हें भी अपने पास बुला लूंगा।”

     

    नंदिनी ने विश्वास से सिर हिला दिया।

     

    “मुझे आप पर भरोसा है।”

     

    शान शहर चला गया।

     

    कुछ महीनों बाद नंदिनी ने एक बेटे को जन्म दिया। उसका नाम रखा गया आरव।

     

    शान जब घर आया और पहली बार बेटे को गोद में उठाया तो उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “इतना छोटा है…”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “आपका बेटा है।”

     

    शान ने बच्चे के माथे को चूमा।

     

    “मैं इसके लिए बहुत कुछ करूंगा।”

     

    समय बीतता गया।

     

    दो साल बाद उनके घर दूसरा बेटा हुआ। उसका नाम रखा गया अंश।

     

    अब नंदिनी की पूरी दुनिया अपने दोनों बच्चों और शान के इर्द-गिर्द घूमती थी।

     

    शान हर महीने पैसे भेजता था। फोन पर बच्चों से बातें करता और नंदिनी से कहता—

     

    “बस थोड़ा और वक्त। फिर मैं तुम्हें और बच्चों को अपने पास ले आऊंगा।”

     

    नंदिनी हर बार यही कहती—

     

    “ठीक है, मैं इंतजार करूंगी।”

     

    लेकिन शहर की जिंदगी ने धीरे-धीरे शान को बदलना शुरू कर दिया।

     

    उसी शहर में उसके ऑफिस में रिया नाम की एक लड़की काम करती थी। दोनों की दोस्ती हुई और धीरे-धीरे वह दोस्ती ऐसी जगह पहुंच गई, जहां शान को अपनी पहली शादी, अपने बच्चों और नंदिनी का इंतजार सब कुछ छोटा लगने लगा।

     

    एक दिन रिया ने उससे कहा—

     

    “तुम हमेशा कहते हो कि तुम्हारा परिवार गांव में है। लेकिन तुम यहां अकेले रहते हो। आखिर कब तक?”

     

    शान ने नजरें झुका लीं।

     

    “मुझे पता नहीं।”

     

    रिया ने कहा, “अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो पुराने रिश्ते को खत्म कर दो।”

     

    शान चुप रहा।

     

    उसके मन में नंदिनी का चेहरा आया।

     

    लेकिन उसने उस आवाज को दबा दिया।

     

    कुछ ही समय बाद शान ने रिया से दूसरी शादी कर ली।

     

    उसने अपने परिवार को इसकी भनक तक नहीं लगने दी।

     

    गांव में नंदिनी अब भी उसका इंतजार कर रही थी।

     

    एक शाम दोनों बच्चे आंगन में खेल रहे थे।

     

    आरव ने पूछा, “मां, पापा कब आएंगे?”

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा, “जल्दी आएंगे बेटा।”

     

    अंश ने मासूमियत से पूछा, “पापा हमारे लिए खिलौना लाएंगे?”

     

    नंदिनी ने दोनों को गले लगा लिया।

     

    “हां, बहुत सारे खिलौने लाएंगे।”

     

    लेकिन उस रात नंदिनी के फोन पर शान का संदेश आया—

     

    “कुछ दिनों तक मुझे फोन मत करना। काम बहुत ज्यादा है।”

     

    नंदिनी को पहली बार कुछ अजीब लगा।

     

    उसने कई बार फोन किया, लेकिन शान ने फोन नहीं उठाया।

     

    कुछ दिन बाद शान के एक पुराने दोस्त ने नंदिनी को सच बता दिया।

     

    “भाभी… शान ने शहर में दूसरी शादी कर ली है।”

     

    नंदिनी कुछ पल तक बिल्कुल शांत बैठी रही।

     

    उसे लगा जैसे किसी ने उसके कानों में गलत बात कह दी हो।

     

    “क्या?”

     

    “मुझे बहुत पहले से पता था, लेकिन हिम्मत नहीं हुई बताने की।”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने अपने दोनों बच्चों को देखा।

     

    आरव और अंश अभी भी अपने पिता का इंतजार कर रहे थे।

     

    उस रात नंदिनी ने पहली बार अपने बच्चों के सामने रोने से खुद को रोक नहीं पाया।

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “मां, आपको क्या हुआ?”

     

    नंदिनी ने जल्दी से आंसू पोंछे।

     

    “कुछ नहीं बेटा।”

     

    “पापा ने आपको कुछ कहा?”

     

    नंदिनी ने उसे सीने से लगा लिया।

     

    “नहीं… तुम्हारे पापा ने कुछ नहीं कहा।”

     

    लेकिन उसके दिल में बहुत कुछ टूट चुका था।

     

    कुछ महीनों तक नंदिनी ने शान से कोई सवाल नहीं किया।

     

    वह बस अपने दोनों बच्चों को पालती रही।

     

    उधर शान अपनी दूसरी पत्नी रिया के साथ शहर में रहने लगा।

     

    शुरुआत में उसे लगा कि उसने अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा फैसला लिया है।

     

    लेकिन कुछ ही महीनों बाद रिया को शान की पहली शादी और बच्चों के बारे में पता चल गया।

     

    एक दिन उसने पूछा—

     

    “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि तुम्हारे दो बच्चे हैं?”

     

    शान चुप रहा।

     

    रिया ने गुस्से में कहा—

     

    “तुमने मेरे साथ भी झूठ बोला।”

     

    शान के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    जिस झूठ को वह अपनी पहली पत्नी से छिपा रहा था, वही झूठ अब उसके दूसरे रिश्ते को भी तोड़ने लगा था।

     

    एक दिन ऑफिस से लौटते समय शान को खबर मिली कि उसके पिता बहुत बीमार हैं।

     

    वह तुरंत गांव पहुंचा।

     

    घर के बाहर वही पुराना आंगन था।

     

    नंदिनी बच्चों के साथ बैठी थी।

     

    शान को देखते ही दोनों बच्चे दौड़ पड़े।

     

    “पापा!”

     

    आरव उससे लिपट गया।

     

    अंश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पापा, आप इतने दिनों बाद आए!”

     

    शान की आंखें भर आईं।

     

    उसने दोनों बच्चों को गले लगा लिया।

     

    फिर उसकी नजर नंदिनी पर पड़ी।

     

    वह पहले से बहुत शांत लग रही थी।

     

    शान ने धीमे से कहा—

     

    “नंदिनी…”

     

    नंदिनी ने सिर्फ इतना पूछा—

     

    “अब क्यों आए हो?”

     

    शान के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    “पापा बीमार हैं।”

     

    “मैं जानती हूं।”

     

    कुछ देर चुप्पी रही।

     

    फिर नंदिनी ने कहा—

     

    “तुमने दूसरी शादी कर ली, यह सुनकर मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का नहीं हुआ कि तुमने मुझे छोड़ दिया।”

     

    शान ने उसकी तरफ देखा।

     

    नंदिनी की आंखों में आंसू थे।

     

    “मुझे दुख इस बात का हुआ कि तुमने अपने बच्चों को भी छोड़ दिया।”

     

    शान सिर झुका कर खड़ा रहा।

     

    “आरव हर रात पूछता था कि पापा कब आएंगे। अंश तुम्हारे लिए दरवाजे पर बैठा रहता था।”

     

    शान की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “तुम्हें मुझसे प्यार नहीं था, ठीक है। लेकिन बच्चों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?”

     

    यह सवाल शान के दिल में उतर गया।

     

    वह पहली बार खुद को आईने में देख रहा था।

     

    उसे याद आया कि उसने कभी बच्चों से वादा किया था कि वह उनके लिए सब कुछ करेगा।

     

    लेकिन वह वादा भी वह भूल गया था।

     

    शान ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    नंदिनी ने सिर हिला दिया।

     

    “माफी मांगना आसान है शान। लेकिन जो साल तुमने हमसे छीन लिए, वो वापस नहीं आएंगे।”

     

    शान कुछ नहीं बोल पाया।

     

    उस दिन उसने अपने पिता के सामने भी सब सच स्वीकार कर लिया।

     

    पिता ने कमजोर आवाज में कहा—

     

    “बेटा, घर छोड़ना आसान होता है… लेकिन जिम्मेदारी से भागकर कोई खुश नहीं रह सकता।”

     

    शान के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    वह अपने बच्चों के पास गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “पापा, अब आप हमारे साथ रहोगे?”

     

    शान की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उसने बेटे को गले लगाकर कहा—

     

    “मैं तुम्हें फिर कभी अकेला महसूस नहीं होने दूंगा।”

     

    लेकिन नंदिनी ने तुरंत कहा—

     

    “बच्चों से किया वादा निभाना। मेरे लिए नहीं।”

     

    शान ने सिर झुका लिया।

     

    उसे समझ आ चुका था कि परिवार केवल एक छत के नीचे रहने का नाम नहीं है।

     

    परिवार वह रिश्ता है जिसमें किसी एक की खुशी के लिए दूसरे की पूरी जिंदगी नहीं कुचली जाती।

     

    शान ने अपनी गलतियों की जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया।

     

    उसने दूसरी पत्नी से भी सच-सच बात की और अपने दोनों बच्चों की जिम्मेदारी स्वीकार की।

     

    नंदिनी ने उसे वापस पति के रूप में स्वीकार किया या नहीं, यह फैसला उसने तुरंत नहीं किया।

     

    लेकिन एक मां होने के नाते उसने बच्चों को उनके पिता से दूर भी नहीं किया।

     

    समय के साथ शान रोज बच्चों से मिलने लगा।

     

    वह उनके स्कूल जाता, उनके साथ बैठता और उनकी छोटी-छोटी बातें सुनता।

     

    उसे अब समझ आ चुका था कि पैसे भेज देना पिता होने की पूरी जिम्मेदारी नहीं थी।

     

    कभी-कभी बच्चों को सिर्फ पिता की जरूरत होती है।

     

    और नंदिनी?

     

    उसने खुद को फिर से संभालना सीख लिया।

     

    उसने शान को माफ करने में समय लिया, क्योंकि टूटे हुए भरोसे को जोड़ना शब्दों से नहीं, सालों की सच्चाई से होता है।

     

    शान को आखिरकार समझ आया कि उसने दूसरी शादी करके कोई नया जीवन नहीं पाया था।

     

    उसने बस अपने पुराने जीवन की जिम्मेदारियों से भागने की कोशिश की थी।

     

    और जिम्मेदारियों से भागने वाला इंसान चाहे कितनी भी दूर चला जाए…

     

    एक दिन उसे अपने किए हुए फैसलों के सामने वापस खड़ा होना ही पड़ता है।

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Bound by Fate

     

    भाग 3

     

    राधे राधे दोस्तों ❤️

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

    अगली सुबह

     

    सुबह के आठ बजे

     

    खिड़की से आती सूरज की हल्की किरणें धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थीं। कमरे में रात की खामोशी अब भी मौजूद थी।

     

    तभी बेड पर लेटी लड़की के हाथों में हल्की-सी हरकत हुई। उसकी पलकों में कंपन हुआ। कुछ ही सेकंड बाद उसने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोल दीं। कमरे में अभी भी हल्का अंधेरा था, बस कमरे के पर्दों से छनकर आती सूरज की किरणें कमरे को हल्की रोशनी से भर रही थीं।

     

    आंखें खुलते ही उसने छत की तरफ देखा। कुछ पल तक वह यूं ही देखती रही। फिर उसकी नजरें कमरे में घूमने लगीं। लेकिन उसे कुछ भी पहचान में नहीं आया।

     

    वह कहां थी?

     

    उसने उठकर बैठने की कोशिश की। लेकिन शरीर में इतनी कमजोरी थी कि वह ठीक से बैठ भी नहीं पाई।

     

    उसने दोबारा कोशिश की। इस बार किसी तरह उठकर बैठ गई।

     

    उसका सिर भारी था। शरीर में दर्द था और गला बिल्कुल सूख रहा था। उसने अपने कपड़ों की तरफ देखा।

     

    उसने जो लाल सूट पहना था…

     

    वो अब वहां नहीं था।

     

    उसकी जगह उसने एक मुलायम-सा ढीला कुर्ता पहन रखा था।

     

    वो घबरा गई।

     

    तभी…

     

    दरवाजा खुला।

     

    लड़की ने तुरंत नजरें उठाईं।

     

    सामने दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था।

     

    वही आदमी…

     

    जिसने पिछली रात उसे सड़क से उठाया था।

     

    रूद्रांश शेखावत।

     

    गेहुआं रंग… लगभग छह फुट दो इंच लंबा कद… गहरी नीली आंखें… शार्प जॉलाइन… हल्की बियर्ड… सख्त चेहरे की बनावट…

     

    और चेहरे पर एक ऐसा अजीब-सा आकर्षण, जिससे नजरें हटाना आसान नहीं था।

     

    उसका शरीर बेहद फिट था और उसकी पूरी personality में एक अलग ही रौब था।

     

    वह जितना हैंडसम था…

     

    उतना ही रहस्यमयी भी।

     

    रूद्रांश की नजर जैसे ही लड़की पर पड़ी, उसने शांत स्वर में कहा,

     

    “आखिर तुम होश में आ ही गईं।”

     

    उसकी आवाज सुनकर लड़की का ध्यान टूटा। उसने घबराकर उसे देखा और अनजाने में ब्लैंकेट को अपनी मुट्ठियों में कस लिया।

     

    रूद्रांश ने तुरंत ही उसकी घबराहट नोटिस कर ली। वह कुछ कदम आगे बढ़ा, लेकिन उससे उचित दूरी बनाकर रुक गया।

     

    “हे, डरो मत।”

     

    उसकी आवाज इस बार थोड़ी नरम थी।

     

    “तुम यहां बिल्कुल सेफ हो।”

     

    लड़की की आंखों में अब भी डर और उलझन थी।

     

    उसने मुश्किल से अपनी आवाज निकाली।

     

    “आ… आप कौन हैं?”

     

    कुछ पल रुककर उसने पूछा,

     

    “और मैं यहां कैसे आई?”

     

    रूद्रांश के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।

     

    “ये सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए।”

     

    फिर वह बेड के पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला,

     

    “लेकिन चलो… पहले मैं ही बता देता हूं।”

     

    उसने लड़की की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “मेरा नाम रूद्रांश शेखावत है। शायद तुमने मेरा नाम सुना होगा।”

     

    लड़की चुप रही।

     

    रूद्रांश ने आगे पूछा,

     

    “अब तुम बताओ… तुम कौन हो?”

     

    वह कुछ पल चुप रही।

     

    जैसे अपने ही नाम को याद करने की कोशिश कर रही हो।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    “म… मेरा नाम…”

     

    वह रुक गई।

     

    उसने अपनी आंखें बंद कीं।

     

    कुछ सोचने के बाद बहुत धीमी आवाज में बोली,

     

    “ई… ईशानी…”

     

    रूद्रांश के चेहरे के भाव सामान्य रहे।

     

    “ओके…”

     

    उसने सिर थोड़ा झुकाया।

     

    “तो मिस ईशानी… कल रात तुम उस सुनसान सड़क पर अकेली क्या कर रही थीं?”

     

    लेकिन उसकी तेज निगाहें ईशानी के चेहरे के भावों को परख रही थीं।

     

    ईशानी का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसकी आंखों में बेचैनी फैल गई।

     

    वह कुछ याद करने की कोशिश करने लगी।

     

    लेकिन…

     

    कुछ भी साफ याद नहीं आया।

     

    सिर्फ धुंधली-सी तस्वीरें।

     

    उसने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    अचानक सिर में तेज दर्द उठा।

     

    “आह…”

     

    उसके मुंह से दर्द भरी आवाज निकली।

     

    रूद्रांश तुरंत उठ खड़ा हुआ।

     

    “रिलैक्स!”

     

    उसने गंभीर लेकिन शांत आवाज में कहा,

     

    “फिलहाल, कुछ याद करने की जरूरत नहीं है।”

     

    ईशानी ने उसकी तरफ देखा।

     

    रूद्रांश कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    उसे समझ आ गया कि मामला उसकी सोच से कहीं ज्यादा उलझा हुआ था।

     

    वह अपनी जेब की तरफ हाथ ले गया।

     

    सिगरेट निकालने वाला था…

     

    लेकिन फिर रुक गया।

     

    उसने सिगरेट वापस जेब में रख दी।

     

    वो हमेशा ऐसा ही करता था।

     

    जब कोई चीज उसे परेशान करती या कोई मामला उसकी समझ से बाहर होता, तो वह सिगरेट जला लेता था।

     

    लेकिन आज…

     

    पता नहीं क्यों, उसके सामने बैठी ये लड़की उसकी उस आदत को भी रोक रही थी।

     

    रूद्रांश ने आखिरकार कहा,

     

    “शायद तुमने काफी समय से ठीक से कुछ खाया नहीं, इसलिए मैं तुम्हारे खाने के लिए कुछ भिजवा रहा हूँ। उसके बाद तुम्हें दवाई भी लेनी है।”

     

    कहकर वह कमरे से बाहर निकला और उसने दरवाजा भी बंद कर दिया।

     

    ईशानी कुछ पल तक उसी दरवाजे को देखती रही।

     

    फिर उसने धीरे से अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    वह याद करने की कोशिश करने लगी।

     

    कुछ…

     

    बहुत धुंधली तस्वीरें उसके दिमाग में उभरने लगीं।

     

    एक मंडप…

     

    चारों तरफ लोग…

     

    कोई उसका हाथ जबरदस्ती पकड़कर उसे खींच रहा था…

     

    उसकी चीख…

     

    किसी की तेज आवाज…

     

    फिर अंधेरा…

     

    और उसके बाद…

     

    बारिश में भागती हुई वो खुद।

     

    अचानक उसे किसी पुरुष की गुस्से से भरी आवाज सुनाई दी।

     

    “तुम कहीं नहीं जा सकतीं!”

     

    ईशानी का पूरा शरीर कांप उठा।

     

    उसने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं।

     

    एक पल के लिए उसे किसी के हाथ में चमकती हुई अंगूठी दिखाई दी…

     

    फिर लाल रंग…

     

    बहुत सारा लाल रंग…

     

    और उसके कानों में किसी लड़की के रोने की आवाज गूंजने लगी।

     

    लेकिन इससे पहले कि वह उस आवाज को पहचान पाती, सब कुछ फिर से धुंधला हो गया।

     

    ईशानी ने अचानक आंखें खोल दीं।

     

    उसकी सांसें तेज हो चुकी थीं।

     

    उसने अपने सीने पर हाथ रखा।

     

    दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था।

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं…”

     

    उसकी आवाज कांप रही थी।

     

    “मैं किसी से भाग रही थी…”

     

    वह कुछ पल के लिए चुप हुई।

     

    फिर उसकी आंखों में डर उतर आया।

     

    “लेकिन किससे?”

     

    उसने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    “और… क्यों?”

     

    कमरे में उसकी कांपती आवाज गूंजकर रह गई।

     

    उसे नहीं पता था कि उसकी यादों में छिपा सच उसकी जिंदगी को दोबारा तोड़ने वाला था…

     

    या फिर उसी सच की वजह से उसे एक ऐसा

    रिश्ता मिलने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना तक नहीं की थी।

     

    लेकिन एक बात तय थी…

     

    उसकी याददाश्त में छिपा हर राज उसे धीरे-धीरे उसी रात की तरफ ले जाने वाला था।

     

    और उस रात से जुड़ा एक नाम…

     

    शायद उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच बनने वाला था।

     

    रूद्रांश शेखावत।

    क्या रूद्रांश और ईशानी की ये मुलाकात महज एक इत्तेफाक थी…

    या तकदीर ने दोनों को एक-दूसरे से मिलाने के लिए ये खेल रचा था?

    जानने के लिए पढ़िए Bound by Fate ❤️

    आपके कीमती Likes, Reviews और Comments का इंतजार रहेगा। ❤️

     

  • अधूरी इबादत भाग~46

    अधूरी इबादत भाग~46

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~46 वो थी… वो है… 

     

    काम्या रैना अपने कमरे में आई तो दरवाज़ा बंद करते ही जैसे उसके अंदर की तमाम आवाज़ें गूँजने लगीं। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था, पर चेहरा अब भी ठंडा, सख्त और संजीदा था…. जैसे कोई मलबे के नीचे दबे सच को पहचान गया हो।

    उसने मोबाइल उठाया, तेज़ी से Instagram खोला, वो लगभग भूल ही चुकी थी कि रूहानी कब से गायब थी सोशल मीडिया से। 

    लेकिन आज, उसने रूहानी के तीन-तीन नए पोस्ट देखे। पहली पोस्ट, जो कुछ एक हफ्ते पहले ली गई थी, किसी जमे हुए वक़्त का दरवाज़ा खोल रही थी…..

    Chapter 1 – Rebuilding Ruins #RuhaniReturns

    तस्वीरें थीं, रूहानी के पुराने स्टूडियो की….. धूल से भरी खिड़कियाँ, टूटे मनीक्विन्स, बिखरे स्केच, और एक शांत-सी रूहानी, खड़ी हुई अपने खंडहरों के बीच। 

    काम्या ने उस तस्वीर को ज़ूम करके देखा। रूहानी की आँखों में डर नहीं था, दर्द था, मगर उस दर्द में भी एक तरह की शांति थी…. जैसे किसी ने खुद को माफ़ कर दिया हो।

    दूसरी पोस्ट ने जैसे काम्या की साँसें रोक दीं। 

    Chapter 2 – Her Comeback is Her Voice. #RuhaniReturns 

    रूहानी के नए स्टूडियो की झलक, minimalist décor, dreamy pastels, mood boards से भरी दीवारें और बीच में खड़ी थी रूहानी, एक मजबूत औरत के रूप में, जो अपने हाथों से खुद को फिर से गढ़ चुकी थी। 

    रूहानी की आँखें अब पहले जैसी नहीं लग रही थीं, उनमें कोई डर या दुःख नहीं था, बल्कि चुनौती थी, खुद से भी और दुनिया से भी।

    तीसरी पोस्ट, जैसे एक तीर की तरह सीधा काम्या के दिल को चीर गया। 

    एक डिजिटल इनविटेशन, Grand Opening of Ruhani Studio – This Friday, 6 PM। 

    उसी फॉन्ट में, उसी लाल और सुनहरे रंग के कॉम्बिनेशन में, जैसा रूहानी अपने पुराने दिनों में डिज़ाइन किया करती थी।

    काम्या ने फोन को एकटक घूरा। फिर उसे लगा जैसे उसकी साँस रुक गई हो। 

    एक गुस्से की लहर उसके अंदर दौड़ी, पर वो गुस्सा सिर्फ रूहानी पर नहीं था। वो अपने आप पर भी थी… 

    उसने कैसे समझ लिया था कि रूहानी अगर उस दिन टूटी थी तो फिर कभी जुड़ेगी नहीं….. 

    कैसे मान लिया था कि एक औरत जिसे उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा धोखा मिला था, वो फिर कभी नहीं उठ पाएगी।

    “Unbelievable…” काम्या के होंठों से निकला, पर वो शब्द सिर्फ तंज नहीं था, वो एक डर था… एक ऐसा डर जो किसी अतीत से उठी राख से फिर जलने वाले शोले को देखकर पैदा होता है।

    उसने खुद को आईने में देखा। 

    “She’s back… and this time, it’s not just about designs. It’s war.”

    उसके चेहरे की रंगत अब तेज़ थी। गालों पर हल्की सी जलन, माथे की नसें तन गईं थीं। 

    उसने फोन उठाया, किसी को कॉल करने के लिए…. शायद अपनी टीम को, शायद अपने PR को…. मगर उंगलियाँ ठिठक गईं।

    क्योंकि कहीं ना कहीं, काम्या जानती थी, कि जो जंग वो अब देख रही थी… उसमें रूहानी सिर्फ एक फाइटर नहीं थी। वो खुद को फिर से लिख रही थी, एक ऐसी किताब की तरह जिसे काम्या ने अधूरा समझकर बंद कर दिया था।

    और काम्या… उसे ये कतई मंजूर नहीं था। रूहानी को वापसी करते हुए देखना, फिर से….. उसकी आंखों के सामने, उसी शहर में… और शायद, उसी एकांश के दिल में एक बार फिर से जगह बनाते हुए।

    काम्या की आँखों में उस वक़्त एक अजीब सी दहशत थी…. जैसे किसी ने उसकी आत्मा के भीतर उतरकर वहाँ कुछ ऐसा बो दिया हो जो वो चाहकर भी उखाड़ नहीं सकती। 

    एकांश की जुबां से रूहानी का नाम सुनकर और उस एक नाम के पीछे की सारी भावनाएँ देखकर, काम्या के भीतर की सारी दीवारें ढह चुकी थीं। उसका आत्मविश्वास, जो सालों की मेहनत से गढ़ा गया था, पहली बार चटक गया था।

    रूहानी का अस्तित्व अब उसके लिए सिर्फ एक बीती कहानी नहीं, एक ज़िंदा चुनौती बन चुका था। वह डर गई थी…. नहीं, डर से भी कहीं गहरी कोई अनुभूति थी ये, जैसे किसी को खोने से पहले ही उसकी छाया से जलन होना।

    और उस डर में डूबी काम्या ने बिना एक पल गंवाए रूहानी को मैसेज कर दिया — “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती। वो मेरा था… और हमेशा रहेगा।”

    उसके अंदर एक बेचैनी थी, एक अंधा आवेग जो उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था। 

    वह तेज़ी से हॉल की ओर गई, जहाँ एकांश को देखने की बेचैनी ने उसे घेर लिया था। पर जो देखा, वो अप्रत्याशित था।

    एकांश ज़मीन पर था, सोफे से गिरा हुआ, पीठ सीधी फर्श से लगी और आँखें छत की तरफ स्थिर…. बिना पलक झपकाए। जैसे वक़्त थम गया हो उसके लिए, या जैसे कोई अदृश्य भार हो, जो उसे उठने नहीं दे रहा।

    काम्या का दिल काँप उठा। उसके होंठों से कोई आवाज़ नहीं निकली, बस कदम तेज़ी से भागे और वो एकांश के पास जा पहुँची।

    घुटनों के बल बैठकर उसने एकांश को अपनी गोद में उठाया और उसके चेहरे को दोनों हथेलियों में थामकर काँपती आवाज़ में कहा— “मेरे प्यार में ऐसी कौन सी कमी रह गई है, एकांश? मैं क्या भर नहीं पाई? मैं हर उस रूप में खुद को ढालती रही हूँ जैसी तुम्हें चाहिए थी। रूहानी… रूहानी मेरे सामने कुछ भी नहीं है। ना नाम में, ना चेहरे में, ना शोहरत में।”

    एकांश ने उसकी आँखों में देखा। उसमें आँसू नहीं थे, मगर कुछ था….. एक थकावट, एक शिकस्त, और एक गूंगी चीख़ जो शायद सालों से अंदर दब रही थी।

    काम्या ने उसे सीने से लगा लिया, जैसे किसी टूटी हुई चीज़ को समेटना चाहती हो। एकांश की साँसें थोड़ी देर में स्थिर हो गईं, और तभी काम्या ने उसके चेहरे पर हल्के-हल्के चुम्बनों की बौछार शुरू कर दी…. कपोलों पर, माथे पर, पलकों के पास। उसका हर स्पर्श इस बात का गवाह था कि वो किसी और को वहाँ जगह नहीं लेने देगी।

    और फिर, वहीं हॉल में, उनके बीच की दूरी सिमटने लगी। वो एक दुस्स्वप्न से जागे प्रेमियों की तरह एक-दूसरे में शरण लेने लगे….. बिना कहे, बिना समझाए, बस उस क्षण को थामे हुए, जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।

    रात के सन्नाटे में जब दोनों अपने कमरे के बिस्तर पर थे, तब एकांश गहरी नींद में खो गया था। लेकिन काम्या… अब भी जाग रही थी।

    वो एकांश के बालों में अपनी उंगलियाँ फेर रही थी, बड़े सलीके से, जैसे किसी टूटे हुए विश्वास को सहेज रही हो। उसकी आँखों में कोई आँसू नहीं था, बस एक निश्चय था….. एक ठंडी आग जो धीमे-धीमे उसकी आत्मा में जल रही थी।

    उसने मन ही मन खुद से वादा किया, “अब चाहे जो करना पड़े… मैं करूँगी। लेकिन एकांश के लबों पर दोबारा ‘रूहानी’ का नाम नहीं आने दूँगी।”

    कमरे में गहरी नींद की एक परत थी, पर काम्या के भीतर अब एक नई रात जाग चुकी थी… एक ऐसी रात, जो शायद अब कभी सुबह होने नहीं देगी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    एकांश की आंखें जैसे किसी पुराने ख्वाब के जमे हुए कांच को तोड़ रही थीं। 

    “Stitch & Soul” का बोर्ड देखते ही उसके सीने में एक अजीब सी कसक उठी थी, मगर उसने खुद को संभाल लिया था। 

    पर अब, जैसे ही दरवाज़े की दहलीज़ पार की, हवा में तैरती वही जानी-पहचानी खुशबू…. वो हल्की सी सैंडलवुड की परफ्यूम, जो रूहानी हमेशा लगाती थी…. उसकी सांसों में समा गई।

    उसके कदम थम गए। सामने, रंग-बिरंगी fairy lights के बीच, pastel shades में सजे हॉल के बीचोंबीच रूहानी खड़ी थी। उसके चेहरे पर सुकून और एक artist जैसी शांति थी।

    एकांश की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसकी उंगलियां अनायास सिहर उठीं।

    “रूहानी?” उसने लगभग फुसफुसाते हुए खुद से कहा, जैसे किसी भूली हुई धुन को फिर से सुन लिया हो।

    उसी क्षण, उसके बाजू में खड़ी काम्या ने अपना हाथ कसकर उसकी बांह में डाल दिया और तीखी मुस्कान के साथ कहा, “हमें नहीं बुलाया गया इस खास इवेंट में?”

    उसकी आवाज़ में मिठास कम और चुनौती ज़्यादा थी।

    ———————–

    क्या एकांश की साँसें वाकई थम गई थीं… या बस वक़्त ने कुछ कहने से पहले उसे रोक लिया था?

    क्या रूहानी की वापसी सिर्फ़ एक स्टूडियो की शुरुआत थी… या किसी अधूरे हिसाब का इशारा?

    काम्या की मुस्कान के पीछे जो चुप्पी थी, क्या वो किसी तूफ़ान का इंतज़ार था?

  • महादेव माता पार्वती की नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बारिश में कैलाश की नोक-झोंक

    कैलाश पर्वत पर उस दिन सुबह से ही बादल घिरे हुए थे। ठंडी हवा चल रही थी और थोड़ी देर बाद बारिश की बूंदें गिरने लगीं। कैलाश का वातावरण और भी सुंदर हो गया था।

     

    माता पार्वती कैलाश के बाहर बैठकर बारिश देख रही थीं। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। तभी उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। महादेव हमेशा की तरह शांत बैठे ध्यान में मग्न थे।

     

    पार्वती जी ने कुछ देर उन्हें देखा और फिर बोलीं,

    “महादेव!”

     

    महादेव ने आँखें नहीं खोलीं।

     

    “महादेव…!”

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं आया।

     

    पार्वती जी थोड़ा पास गईं और बोलीं,

    “मैं आपसे बात कर रही हूँ।”

     

    महादेव ने धीरे से आँखें खोलीं।

     

    “कहो देवी।”

     

    पार्वती जी ने बाहर होती बारिश की ओर इशारा किया।

    “देखिए कितनी सुंदर बारिश हो रही है। चलिए बाहर चलते हैं।”

     

    महादेव ने शांत स्वर में कहा,

    “देवी, आप बाहर जाइए। मैं यहीं ठीक हूँ।”

     

    पार्वती जी ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “आप यहीं ठीक हैं? मतलब मेरे साथ बारिश में चलना आपको अच्छा नहीं लगता?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “ऐसी बात नहीं है।”

     

    “तो फिर चलिए।”

     

    “लेकिन मैं अभी ध्यान कर रहा था।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

    “आपका ध्यान तो हर समय चलता रहता है। कभी मेरे लिए भी समय निकाल लिया कीजिए।”

     

    महादेव कुछ बोलते, उससे पहले ही माता पार्वती उठकर बाहर चली गईं।

     

    वहाँ खड़े नंदी यह सब देख रहे थे। उन्होंने महादेव की तरफ देखा और फिर धीरे से अपना सिर हिला दिया।

     

    महादेव बोले,

    “नंदी, देवी आज कुछ अधिक ही नाराज़ लग रही हैं।”

     

    नंदी ने जैसे मन ही मन कहा हो—‘स्वामी, यह तो आपको ही समझना होगा।’

     

    महादेव बाहर आए। पार्वती जी बारिश में कुछ दूर खड़ी थीं। उन्होंने महादेव को आते देखा तो मुस्कुराने लगीं, लेकिन तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

     

    महादेव उनके पास जाकर बोले,

    “देवी, अब तो मैं आ गया।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “अब आने का क्या फायदा?”

     

    “क्यों?”

     

    “जब मैंने बुलाया था तब नहीं आए।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “तो क्या अब वापस चला जाऊँ?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको बस मौका चाहिए वापस जाने का!”

     

    महादेव ने हँसते हुए कहा,

    “नहीं देवी, मैं तो बस पूछ रहा था।”

     

    पार्वती जी ने बारिश की बूंदों को हथेली पर लेते हुए कहा,

    “मुझे बारिश बहुत पसंद है।”

     

    महादेव बोले,

    “यह तो मैं जानता हूँ।”

     

    “फिर भी आप मेरे साथ नहीं आए।”

     

    “अब तो आ गया।”

     

    “वो भी मेरे नाराज़ होने के बाद।”

     

    महादेव कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

    “देवी, अगर आप नाराज़ न होतीं तो शायद मुझे अपनी गलती का पता ही नहीं चलता।”

     

    पार्वती जी का गुस्सा थोड़ा कम हुआ।

     

    “अच्छा! तो आपको मानना है कि गलती आपकी थी?”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

    “हाँ।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

    “तो फिर क्षमा माँगिए।”

     

    महादेव ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “क्षमा कीजिए देवी।”

     

    पार्वती जी मुस्कुराने लगीं।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    “आपको मनाने में देर करूँगा तो बारिश खत्म हो जाएगी।”

     

    माता पार्वती हँस पड़ीं।

     

    तभी तेज हवा चली और बारिश की कुछ बूंदें महादेव के चेहरे पर पड़ीं। महादेव ने ऊपर देखा।

     

    “लगता है आज बादल भी बहुत प्रसन्न हैं।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “बादल प्रसन्न हैं या आपको देखकर हँस रहे हैं?”

     

    महादेव ने पूछा,

    “मुझे देखकर क्यों?”

     

    “क्योंकि आप बारिश में भी ऐसे ही बैठे रहेंगे जैसे ध्यान में बैठे हों।”

     

    महादेव हँसने लगे।

     

    “देवी, आप आज मेरी बहुत परीक्षा ले रही हैं।”

     

    “और आप हमेशा की तरह भोले बने हुए हैं।”

     

    दोनों कुछ देर बारिश में चलते रहे।

     

    अचानक पार्वती जी ने पीछे से पानी की कुछ बूंदें महादेव पर उछाल दीं।

     

    महादेव ने पलटकर देखा।

     

    “देवी!”

     

    पार्वती जी मासूम बनकर बोलीं,

    “क्या हुआ?”

     

    “आपने मुझ पर पानी डाला?”

     

    “मैंने? नहीं तो।”

     

    महादेव ने आसपास देखा।

     

    “यह पानी फिर कहाँ से आया?”

     

    पार्वती जी हँसने लगीं।

     

    “बारिश हो रही है महादेव। पानी तो आएगा ही।”

     

    महादेव समझ गए कि यह माता की शरारत थी।

     

    उन्होंने भी हाथ से थोड़ा पानी उठाया और पार्वती जी की ओर उछाल दिया।

     

    पार्वती जी पीछे हट गईं।

     

    “महादेव! आपने मुझ पर पानी डाला?”

     

    महादेव बोले,

    “मैंने? नहीं तो।”

     

    “अभी आपने ही डाला!”

     

    “बारिश हो रही है देवी। पानी तो आएगा ही।”

     

    पार्वती जी उनकी नकल सुनकर हँस पड़ीं।

     

    “आप भी ना!”

     

    तभी नंदी दूर से यह सब देख रहे थे। महादेव ने उन्हें देखा।

     

    “नंदी, तुम भी आ जाओ।”

     

    नंदी धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “नंदी को बीच में मत लाइए।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ये हमेशा आपका साथ देते हैं।”

     

    महादेव बोले,

    “नंदी मेरे वाहन हैं।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “और मैं आपकी पत्नी हूँ।”

     

    महादेव तुरंत बोले,

    “इसमें कोई संदेह नहीं देवी।”

     

    “तो फिर कभी मेरा पक्ष भी लिया कीजिए।”

     

    महादेव ने गंभीर होकर कहा,

    “मैं तो हमेशा आपका ही पक्ष लेता हूँ।”

     

    पार्वती जी ने आश्चर्य से पूछा,

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर अभी मेरी बात क्यों नहीं मान रहे थे?”

     

    महादेव कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले,

    “क्योंकि मैं चाहता था कि आप खुद मुझे बाहर लेकर आएँ।”

     

    पार्वती जी ने पूछा,

    “क्यों?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि जब आप मुझे अपने साथ चलने के लिए कहती हैं, तब कैलाश की सारी शांति भी मुझे छोटी लगने लगती है।”

     

    पार्वती जी कुछ पल उन्हें देखती रहीं।

     

    उनके चेहरे की नाराज़गी पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

    “आप कभी-कभी बहुत अच्छी बातें भी कर लेते हैं।”

     

    महादेव बोले,

    “कभी-कभी?”

     

    “हाँ, कभी-कभी।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    बारिश अब और तेज हो चुकी थी। चारों ओर पानी की बूंदों की आवाज गूँज रही थी।

     

    पार्वती जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “महादेव, चलिए।”

     

    महादेव ने उनका हाथ थाम लिया।

     

    “कहाँ?”

     

    “बारिश में थोड़ा और घूमने।”

     

    “अभी तो आप कह रही थीं कि मैं आपके साथ नहीं आया।”

     

    “अब शिकायत खत्म।”

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “हाँ, लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “आज आप ध्यान नहीं करेंगे।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “ठीक है।”

     

    “और मुझे अकेला भी नहीं छोड़ेंगे।”

     

    “यह भी ठीक है।”

     

    “और…”

     

    महादेव ने हँसकर पूछा,

    “और कितनी शर्तें हैं देवी?”

     

    पार्वती जी भी मुस्कुरा दीं।

    “बस एक आखिरी।”

    “कहो।”

    “आज की बारिश मेरे साथ देखेंगे।”

     

    महादेव ने उनकी ओर देखा और बोले,

    “यह शर्त तो मैं हर जन्म में मान लूँगा।”

    माता पार्वती मुस्कुरा उठीं।

    कैलाश पर बारिश होती रही। नंदी कुछ दूर खड़े उन्हें देखते रहे और शायद सोच रहे थे कि दुनिया में सबसे बड़ा रहस्य कोई मंत्र नहीं, बल्कि महादेव और माता पार्वती की यह छोटी-छोटी नोक-झोंक है, जिसमें नाराज़गी भी प्रेम होती है और मनाना भी प्रेम।

     

    उस दिन कैलाश की बारिश कुछ ज्यादा ही सुंदर थी, क्योंकि उसमें बादलों की बूंदों के साथ महादेव और माता पार्वती की हँसी भी घुली हुई थी।

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 2

    राधे राधे दोस्तों ❤️

     

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

     

    करीब एक घंटे बाद…

     

    गाड़ी एक बड़े और आलीशान विला के सामने आकर रुकी।

     

    गाड़ी की हेडलाइट पड़ते ही सामने खड़ा गार्ड तुरंत चौकन्ना हो गया और उसने विला का बड़ा-सा गेट खोल दिया।

     

    गाड़ी अंदर दाखिल हुई और कुछ ही सेकंड बाद पोर्च में जाकर रुक गई। बारिश अब भी तेज थी। ड्राइवर तुरंत बाहर निकला और उसने पिछली सीट का दरवाजा खोला।

     

    रूद्रांश गाड़ी से बाहर आया। उसकी नजर लड़की पर गई। वह अब भी बेहोश थी। चेहरा हल्का पीला पड़ चुका था। होंठ सूख गए थे और भीगे हुए कपड़े उसके शरीर से चिपके हुए थे।

     

    रूद्रांश ने बिना कुछ सोचे उसे अपनी बाहों में उठा लिया।

     

    तभी पास खड़े एक नौकर ने हैरानी से पूछा, “सर… ये कौन हैं?” क्योंकि आजतक कभी किसी ने रुद्रांश के साथ किसी लड़की को नहीं देखा था। 

     

    रूद्रांश ने उसकी तरफ घूरकर देखा। “फालतू सवाल मत पूछो। जल्दी जाकर दरवाजा खोलो।”

     

    नौकर तुरंत दरवाजा खोलकर एक तरफ हट गया। रूद्रांश लड़की को लेकर अंदर चला गया। विला अंदर से बेहद शानदार था।

     

    ऊंची छतों से लटकते खूबसूरत झूमर, सफेद संगमरमर की चमचमाती फर्श, दीवारों पर लगी महंगी पेंटिंग्स और सलीके से सजाया गया विशाल हॉल…

     

    हर चीज रूद्रांश की हैसियत की कहानी बयां कर रही थी। 

    लेकिन इस वक्त उसे इनमें से किसी चीज की परवाह नहीं थी।

     

    वह सीधे सीढ़ियों से ऊपर गया और एक कमरे का दरवाजा खोलकर लड़की को बेड पर लिटा दिया। पीछे आया नौकर दरवाजे पर ही रुक गया। “साहब… डॉक्टर को बुला दूं?”

     

    रूद्रांश ने लड़की की तरफ देखते हुए कहा, “हां। और जल्दी।”

     

    “जी, साहब।” नौकर तुरंत वहां से चला गया।

     

    कमरे में अब सिर्फ रूद्रांश और वो अनजान लड़की थे। रूद्रांश कुछ पल तक उसे देखता रहा।

     

    उसने अपने गीले बालों पर हाथ फेरा और फिर अपना जैकेट उतारकर पास रखी कुर्सी पर डाल दिया।

     

    उसकी नजर लड़की के चेहरे पर टिक गई। “तुम आखिर हो कौन?”

     

    उसने धीमे से कहा। लेकिन सामने लेटी उस लड़की के पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    या शायद… उस जवाब तक पहुंचने के लिए रूद्रांश को उसकी जिंदगी के कई बंद दरवाजे खोलने पड़ने वाले थे।

     

    और उसे अभी ये अंदाजा भी नहीं था कि जिस लड़की को वह आज रात सिर्फ इंसानियत के नाते अपने घर लेकर आया है… वही लड़की बहुत जल्द उसकी पूरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत…

     

    और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाली है। 

     

    फिर उसने कॉरिडोर में रेलिंग के पास खड़े होकर अपने विला में काम कर रही एक फीमेल हाउस हेल्प को आवाज लगाई। “जेनिफ़र!”

     

    आवाज पूरे हॉल में गूंजी। कुछ ही सेकंड में एक अधेड़ उम्र की महिला तेजी से वहां पहुंची।

     

    वो जेनिफ़र थी। पिछले कई सालों से वो रूद्रांश के विला में काम कर रही थी और उसे अच्छी तरह जानती थी।

    “जी, सर?”

     

    रूद्रांश ने कहा, ” जल्दी से मेरे रूम में आओ और उस लड़की के कापड़े चेंज कर दो। “

    जेनिफर तुरंत ऊपर आ गई।

    फिर वह कुछ पल के लिए रुका और क्लोसेट की तरफ बढ़ गया।

     

    उसने वहां से अपना एक ढीला-सा कुर्ता निकाला और जेनिफ़र की तरफ बढ़ा दिया। “ये पहना देना।”

     

    जेनिफ़र ने तुरंत कुर्ता ले लिया। उसकी नजर अब लड़की पर थी। उसके कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे और ठंड की वजह से उसका शरीर हल्का-हल्का कांप रहा था।

    जेनिफ़र ने ध्यान से देखा तो उसकी कलाई पर चोट के गहरे निशान नजर आए।

     

    गर्दन के पास भी खरोंचें थीं। चेहरे पर चोट के हल्के निशान अब पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रहे थे।

    जेनिफ़र के चेहरे पर चिंता उभर आई।

    उसे देखकर साफ लग रहा था कि इस लड़की ने सिर्फ बारिश में रात नहीं बिताई थी…

    बल्कि वो किसी बहुत बुरे दौर से गुजरकर यहां तक पहुंची थी।

     

    जेनिफ़र ने बिना कोई सवाल किए जल्दी से उसके कपड़े बदल दिए और बाहर चली गई।

     

    तब तक रूद्रांश भी अपने कपड़े बदल चुका था। कुछ देर बाद… रूद्रांश कमरे में वापस आया।

    वह बेड के सिरहाने जाकर बैठ गया और सामने लेटी लड़की को गौर से देखने लगा।

     

    अब वह पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रही थी। गोरा रंग… बड़ी-बड़ी आंखें, जिन पर घनी और लंबी पलकें थीं… गुलाबी होंठ… और निचले होंठ के ठीक नीचे एक छोटा-सा तिल।

     

    छोटी-सी नाक, जिसमें एक नन्ही-सी नोज पिन चमक रही थी। वो लड़की किसी मासूम-सी तस्वीर की तरह लग रही थी।

     

    रूद्रांश की नजर कुछ पल उसके चेहरे पर ठहर गई।

    उसे खुद समझ नहीं आया कि वह इस अनजान लड़की को इतनी गौर से क्यों देख रहा था। बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी।

     

    खिड़की के शीशों पर गिरती बूंदों की आवाज कमरे में एक अजीब-सी खामोशी पैदा कर रही थी। कमरे में जल रही हल्की पीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

    चेहरा बेहद मासूम था…

     

    लेकिन उन बंद आंखों के पीछे जैसे कोई बहुत गहरा राज छिपा हुआ था। कुछ ही देर बाद डॉक्टर भी वहां पहुंच गए।

     

    रूद्रांश तुरंत उठकर एक तरफ हो गया। डॉक्टर ने अपना बैग खोला और लड़की की जांच शुरू कर दी।

    उन्होंने उसकी नब्ज चेक की। फिर उसकी कलाई, गर्दन और चेहरे पर मौजूद चोटों को ध्यान से देखा।

     

    रूद्रांश की गहरी नजरें लगातार डॉक्टर पर टिकी हुई थीं।

    जैसे वह डॉक्टर की हर बात से इस लड़की के बारे में कुछ समझ लेना चाहता हो।

     

    कुछ देर जांच करने के बाद डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

    “मिस्टर शेखावत…”

     

    रूद्रांश की नजरें डॉक्टर पर टिक गईं। “क्या हुआ है इसे?”

     

    डॉक्टर ने गंभीर आवाज में कहा, “ऐसा लग रहा है कि इस लड़की के साथ काफी ज्यादती हुई है। इसके शरीर पर कई जगह चोटों के निशान हैं। कुछ चोटें पुरानी हैं और कुछ बिल्कुल ताजा।”

     

    रूद्रांश की आंखों में अचानक गुस्सा उतर आया।

    उसकी उंगलियां धीरे-धीरे मुट्ठी में बदल गईं।

    लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    डॉक्टर ने आगे कहा, “मुझे लगता है कि ये लड़की किसी बहुत बड़े सदमे से गुजरी है। इसी वजह से इसकी हालत ऐसी है।”

     

    रूद्रांश की नजर एक बार फिर लड़की पर चली गई।

    उसका मासूम चेहरा देखकर उसके जबड़े कस गए।

    डॉक्टर कुछ पल रुके और फिर बोले, “और एक बात…”

    रूद्रांश ने उनकी तरफ देखा। “इसे शायद कई घंटों से कुछ भी खाने को नहीं मिला है। शरीर में काफी कमजोरी है। इसी वजह से ये बेहोश हुई होगी।”

     

    डॉक्टर ने अपने बैग से एक इंजेक्शन निकाला। “मैंने इसे इंजेक्शन दे दिया है। उम्मीद है कि सुबह तक इसे होश आ जाएगा।” फिर उन्होंने कुछ दवाइयां निकालकर रूद्रांश की तरफ बढ़ा दीं। “होश में आने के बाद इसे कुछ हल्का और पौष्टिक खाना दीजिएगा। और ये दवाइयां समय पर देनी होंगी।”

     

    रूद्रांश ने बिना कुछ कहे सारी दवाइयां ले लीं।

    डॉक्टर अपना सामान समेटकर कमरे से बाहर चले गए।

    दरवाजा बंद होते ही कमरे में फिर से खामोशी छा गई।

    रूद्रांश धीरे से बेड पर बैठ गया।

    लड़की की सांसें अब पहले से थोड़ी सामान्य थीं।

    उसका चेहरा अभी भी पीला था और माथे पर हल्की शिकन थी।

     

    जैसे नींद में भी कोई बुरा सपना उसका पीछा कर रहा हो।

    रूद्रांश कुछ देर उसे देखता रहा।

    फिर धीमी आवाज में बोला, “आखिर हो कौन तुम?”

     

    कोई जवाब नहीं आया। उसने उसकी तरफ देखते हुए दोबारा कहा, “और किसने तुम्हें इस हालत में पहुंचाया?”

    खामोशी…

     

    बाहर बारिश लगभग थम चुकी थी। रात और गहरी हो गई थी। रूद्रांश ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली।

    उसने सिगरेट होंठों के बीच रखी और लाइटर निकालने ही वाला था कि एक पल के लिए उसकी नजर सामने सो रही लड़की पर गई।

     

    कुछ सेकंड तक वह उसे देखता रहा। फिर उसने सिगरेट वापस अपनी जेब में रख ली।

    शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि उसने ऐसा क्यों किया।

     

    रूद्रांश उठकर सोफे पर जाकर

    • लेट गया।

    वह इस अनजान लड़की के बारे में सोचता रहा।

    लेकिन कब उसकी आंखें लग गईं…

    उसे खुद पता नहीं चला।

     

    कहानी आगे जारी रहेगी…🙏🏻

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 1

     

    राधे राधे दोस्तों ❤️

     

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

     

     

    दिल्ली, इंडिया

     

    रात के बारह बजे। सर्दियों की वो काली रात बारिश में पूरी तरह डूबी हुई थी। आसमान पर काले बादल छाए थे और तेज बारिश के साथ हल्का-हल्का कोहरा सड़क को अपने आगोश में लिए हुए था।

     

    मौसम ऐसा था कि कोई भी समझदार इंसान अपने घर से बाहर निकलने के बारे में सोचता तक नहीं।

     

    लेकिन… उस सुनसान सड़क के बीचों-बीच एक लड़की चली जा रही थी।

     

    सड़क ज्यादा चौड़ी नहीं थी। दोनों तरफ घना जंगल था, जिसके ऊंचे-ऊंचे पेड़ तेज हवा के साथ झूम रहे थे। बारिश की तेज आवाज़ और हवा की सनसनाहट के अलावा वहां दूर-दूर तक किसी इंसान के होने का कोई निशान नहीं था।

     

    लेकिन उस लड़की को शायद इन चीजों से कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। वो लगातार चलती जा रही थी।

     

    ना उसे बारिश की परवाह थी… ना ठंड की… और ना ही इस सुनसान रास्ते की।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी जिंदगी से ही हार चुकी हो। शायद वो रो भी रही थी। लेकिन बारिश की तेज बूंदें उसके आंसुओं को अपने साथ बहा ले जा रही थीं। करीब से देखने पर उसके चेहरे पर हल्के-हल्के चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

     

    उसने चटक लाल रंग का सूट पहन रखा था। वो बिल्कुल किसी नई-नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी। लेकिन उसके कपड़े बारिश में पूरी तरह भीग चुके थे।

     

    उसकी कलाइयों में लाल चूड़ियां थीं, जिनमें से कुछ टूट चुकी थीं। हाथों पर लगी मेहंदी बारिश में फीकी पड़ चुकी थी। मांग में लगा सिंदूर लगभग धुल चुका था, लेकिन उसकी हल्की-सी लालिमा अब भी बाकी थी।

     

    और गले में… एक मंगलसूत्र था, वो लड़की बेहद खूबसूरत थी। लेकिन उस खूबसूरत चेहरे पर इस वक्त सिर्फ दर्द था। बहुत गहरा दर्द, आखिर कौन थी वो?

     

    और इतनी रात को इस सुनसान जंगल वाली सड़क पर अकेली क्यों चल रही थी?

     

    तभी… दूर से आती एक गाड़ी की हेडलाइट ने उसकी आंखों पर तेज रोशनी डाली।

     

    लड़की ने पलटकर भी नहीं देखा। गाड़ी लगातार उसकी तरफ बढ़ती चली आ रही थी।

     

    पों… पों…! ड्राइवर ने जोर-जोर से हॉर्न बजाया।

     

    लेकिन लड़की अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। सड़क इतनी संकरी थी कि गाड़ी को दूसरी तरफ से निकालने की कोई गुंजाइश भी नहीं थी।

     

    ड्राइवर ने आखिरी वक्त पर पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिए।

     

    चीईईईईईई…!

     

    टायरों की तेज आवाज के साथ गाड़ी लड़की से कुछ ही इंच की दूरी पर जाकर रुकी। गाड़ी के अंदर अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    ड्राइवर ने घबराकर पीछे की सीट की तरफ देखा।

     

    वहां बैठा आदमी पहले से ही उसे घूर रहा था। उसकी आंखों में साफ गुस्सा था।

     

    ड्राइवर सहम गया। “साहब… मेरी कोई गलती नहीं है। सामने अचानक एक लड़की रोड के बीचों-बीच खड़ी हो गई थी। अगर मैं ब्रेक नहीं लगाता तो…”

     

    वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया। पीछे बैठा आदमी झुंझलाकर बोला, “साला… सबको मरने के लिए मेरी कार के सामने ही आना होता है।”

     

    उसने गुस्से में अपनी घड़ी की तरफ देखा और फिर सामने खड़ी लड़की को। “अगर कुछ हो जाता ना, तो कल सुबह हर न्यूज़ चैनल पर एक ही खबर चलती…”

    उसके होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आई। “रूद्रांश शेखावत की गाड़ी से लड़की की मौत।”

     

    ड्राइवर ने कुछ नहीं कहा। वह सामने खड़ी लड़की को देखने लगा। हेडलाइट की तेज रोशनी में अब उसका चेहरा साफ नजर आ रहा था।

     

    बारिश लगातार हो रही थी। लेकिन उसकी आंखों में उमड़ रहा दर्द शायद इस बारिश से भी ज्यादा गहरा था।

     

    रूद्रांश ने आखिरकार गुस्से में गाड़ी का दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। बारिश की ठंडी बूंदें कुछ ही सेकंड में उसके बालों और कपड़ों को भिगोने लगीं।

     

    उसने इसकी परवाह नहीं की। महंगे जूते कीचड़ में धंस गए, लेकिन उसकी नजरें सामने खड़ी लड़की पर टिकी थीं।

     

    वह उसके पास जाकर रुक गया। “मरना है तो किसी और जगह जाकर मरो।”

    उसकी आवाज में गुस्सा था। “मेरी गाड़ी के सामने नहीं।”

     

    लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया। उसकी आंखें बुरी तरह सूजी हुई थीं, होंठ कांप रहे थे। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    रूद्रांश ने गौर से उसे देखा। उसके चेहरे पर हल्की चोटों के निशान थे।

     

    भीगे बाल उसके चेहरे से चिपके हुए थे। पलकों पर बारिश की बूंदें ठहरी हुई थीं।

    और उसकी आंखें… जैसे बिल्कुल खाली थीं।

     

    मानो उन आंखों में रोने के लिए भी अब कुछ बाकी नहीं बचा था। रूद्रांश का गुस्सा कुछ कम हुआ।

     

    उसने दोबारा पूछा, “कौन हो तुम?”

    कोई जवाब नहीं। “इस वक्त यहां क्या कर रही हो?”

     

    लड़की ने धीरे से अपनी गर्दन दूसरी तरफ घुमा ली रूद्रांश ने गहरी सांस ली। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस लड़की के साथ ऐसा क्या हुआ है।

     

    उसने अपना हाथ उसके कंधे पर रखने की कोशिश की।

    “देखो… अगर तुम्हें कोई परेशानी है, तो”

     

    लड़की ने अचानक उसका हाथ झटक दिया।

    वह एक कदम पीछे हट गई। “मुझे छोड़ दो…”

     

    उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि बारिश के शोर में लगभग खो गई। रूद्रांश ने उसकी तरफ देखा।

    लड़की ने कांपती आवाज में दोबारा कहा, “मुझे कहीं नहीं जाना…”

     

    उस एक वाक्य में इतना दर्द था कि कुछ पल के लिए रूद्रांश भी चुप रह गया। उसने लड़की को गौर से देखा।

    लाल दुल्हन का जोड़ा… टूटी हुई चूड़ियां… धुला हुआ सिंदूर… मंगलसूत्र… और चेहरे पर चोटों के निशान।

     

    ये कोई सामान्य मामला नहीं था। रूद्रांश ने आसपास नजर दौड़ाई। चारों तरफ घना जंगल था। इतनी रात को इस सुनसान सड़क पर ये लड़की अकेली थी।

    और शायद किसी बड़ी मुसीबत से भागकर यहां तक पहुंची थी। “तुम्हें जाना तो पड़ेगा।”

     

    इस बार रूद्रांश की आवाज पहले से थोड़ी नरम थी। “लेकिन उससे पहले मुझे ये बताओ कि हुआ क्या है?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में अचानक डर उभर आया। उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले…

     

    लेकिन आवाज नहीं निकली। अगले ही पल उसका शरीर लड़खड़ाया। “अरे…”

     

    रूद्रांश ने झटके से उसे संभाल लिया। लड़की बेहोश हो चुकी थी। “अब ये और बचा था!”

     

    रूद्रांश ने झुंझलाकर कहा, लेकिन उसके हाथों की पकड़ लड़की को संभालने में बेहद सावधान थी।

     

    उसने एक नजर उसके चेहरे पर डाली। इतनी खूबसूरत लड़की… और इस हालत में। उसके चेहरे पर चोटों के निशान देखकर रूद्रांश की भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर किसने इसके साथ ऐसा किया होगा। लेकिन यहां खड़े रहना ठीक नहीं था। उसने लड़की को अपनी बाहों में उठाया और गाड़ी की तरफ बढ़ गया। ड्राइवर तुरंत नीचे उतरा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।

     

    रूद्रांश ने लड़की को पिछली सीट पर आराम से लिटाया और खुद उसके पास बैठ गया। “गाड़ी स्टार्ट करो।”

     

    “जी, साहब।” ड्राइवर ने तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा दी।

    गाड़ी की रफ्तार बढ़ते ही बाहर की बारिश और जंगल पीछे छूटने लगे।

     

    लेकिन रूद्रांश के दिमाग में सवालों का तूफान शुरू हो चुका था। ये लड़की कौन थी? इसके साथ आखिर हुआ क्या था? और वो इस हालत में अकेली वहां क्यों घूम रही थी?

     

    उसकी नजर बार-बार लड़की पर जा रही थी। उसके भीगे बाल चेहरे पर चिपके हुए थे। कलाई पर टूटी हुई लाल चूड़ियों के कुछ टुकड़े अब भी मौजूद थे।

     

    रूद्रांश ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा और फिर नजरें सामने कर लीं। उसे खुद नहीं पता था कि वह इस अनजान लड़की की मदद क्यों कर रहा था।

     

    लेकिन एक बात तय थी… आज रात उसकी जिंदगी में कुछ

    ऐसा आने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

     

    कहानी आगे जारी रहेगी। 

    प्लीज आप सब अपना साथ बनाएं रखें।

  • अधूरी इबादत भाग~45

    अधूरी इबादत भाग~45

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग ~45 रूहानी, सब ठीक है?

     

    कमरे की नीली रौशनी में, मोबाइल अब भी कान से सटा था। रूहानी की आँखें उस जली हुई स्केच की राख पर टिकी थीं, जैसे उस राख में से एक आवाज़ उठ रही हो… एकांश की। 

    कॉल अब भी चालू था, पर दोनों तरफ़ खामोशी पसरी हुई थी। एक बेचैन, धड़कनों से भरी खामोशी।

    फिर… एक गहरी साँस की आवाज़ आई दूसरी ओर से।

    “रूहानी…” आवाज़ टूटी हुई थी, जैसे किसी ने बरसों से दबे ज़ख्म को फिर से छुआ हो।

    रूहानी की आँखें भीगने लगीं, पर आवाज़ में कोई कंपन नहीं आया। वो जानती थी, वो एक शब्द… सिर्फ एक … उसे फिर उसी दलदल में घसीट सकता था, जहाँ से उसने खुद को बड़ी मुश्किल से खींचा था।

    और तभी…&

    रूहानी के बंद दरवाज़े के उस पार से एक और आवाज़ आई। भारी, स्थिर, लेकिन एकदम साफ़। 

    ‘रूहानी, सब ठीक है?’ अद्वैत की ज़ोर से, जिसे एकांश ने भी साफ़-साफ़ सुना।`

    उसकी आवाज़ सुनते ही रूहानी जैसे एकदम यथार्थ में लौट आई। दिल में अचानक एक अजीब सी सरसराहट उठी। 

    फोन के उस छोर पर एकांश का दिल ज़ोर से धड़क उठा।_

    उसने अपने गले को साफ़ किया, जैसे कुछ कहने वाला हो…. कुछ पूछने….. पर रूहानी की आवाज़ उससे पहले आई।

    थोड़ी धीमी, पर पत्थर सी सख्त।

    “अब कभी मत कॉल करना, एकांश। “मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करने वाली।”

    और बिना किसी और शब्द, बिना किसी झिझक के, उसने कॉल काट दिया।

    दूसरी ओर, एकांश का हाथ अब भी हवा में था। स्क्रीन पर “Call Ended” लिखा चमक रहा था…. जैसे किसी फैसले की मुहर लग गई हो।

    वो धीमे से सोफे पर से गिर पड़ा। पीठ फर्श से टकराई और उसकी आँखें टकटकी लगाए छत को देखने लगीं।

    उसके अंदर कुछ सचमुच टूट गया था….. पहली बार।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी ने दरवाज़ा खोला। उसके चेहरे पर एक थकी हुई उदासी की परत साफ़ दिख रही थी, फिर भी उसने होठों पर एक भिनी, बनावटी मुस्कान थमी हुई थी…. मानो उस कभी न भूले गए दर्द को अब भी सज़ा के रखा हो, जैसे वो टीस अब उसकी पहचान बन गई हो। 

    उसकी नज़र सीधी जाकर अद्वैत की आँखों से टकराई, जो दरवाज़े पर खड़ा था। उसकी आँखों में चिंता थी, पर आवाज़ बेहद नर्म थी।

    “क्या हुआ रूहानी… मैं बस पानी लेने आया था… लेकिन तुम्हारे कमरे से कुछ जलने की गंध आ रही है। तुम ठीक तो हो ना? कुछ हुआ तो नहीं?”

    रूहानी ने एक लंबी साँस ली, जैसे अंदर कुछ भारी था जिसे वो शब्दों में हल्का करना चाहती थी। उसका लहजा थका हुआ, मगर बेहद शालीन था। “तुम्हें अपने ही घर में मेरी वजह से परेशानी हुई… इसके लिए I’m really sorry…”

    वो पल भर को रुकी, फिर निगाहें झुकाकर बोली, “कुछ ख़ास नहीं था… कुछ बेकार, पुराने sketches थे। जिनकी अब कोई ज़रूरत नहीं रही… वही जल रहे थे… जिसकी smell तुम्हें आ गई होगी।”

    अद्वैत वहीं दरवाज़े पर खड़ा था, पर उसकी आँखें बार-बार कमरे के भीतर झाँक रही थीं। वहाँ एक हल्की रोशनी थी, जलते कागज़ की लपटें धीमी लय में हिल रही थीं, जैसे हर चित्र अपने अंदर कोई चीख़ लिए जा रहा हो। तभी उसकी नज़र उस अधजले sketch पर पड़ी… जिसमें रूहानी ने एकांश का चेहरा बनाया था।

    वो पल अचानक खिंच गया। हवा भारी हो गई। अद्वैत की साँसें धीमी पड़ गईं, और उसकी निगाह उस चेहरे से हट नहीं रही थी…. वो चेहरा जो अब रूहानी के अतीत की राख बन चुका था।

    रूहानी ने उसकी चुप्पी भांप ली। उसकी आवाज़ में कोई उलाहना नहीं था, सिर्फ एक शांत सवाल: 

    “कोई और बात भी है क्या, अद्वैत?”

    अद्वैत जैसे किसी गहरे ख्याल से बाहर निकला, हल्का मुस्कुराया, “नहीं… नहीं, और कुछ नहीं। Good night.

    और जैसे ही वो आगे बढ़ा, रूहानी ने दरवाज़ा बिना एक पल गंवाए बंद कर लिया, जैसे अब किसी और सवाल 

    लिए कोई जगह न हो।

    उधर, अद्वैत सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते बार-बार उसी जलते हुए sketch के बारे में सोच रहा था। वो चेहरा, वो आग की लपटों में लिपटा एकांश… उसका सौतेला छोटा भाई।

    रूहानी एकांश को कैसे जानती है? और अगर जानती है, तो अब उसके चेहरे को आग के हवाले क्यों कर रही है?

    उसका हर क़दम अब किसी पुराने रहस्य के बोझ तले दबता जा रहा था… और दिल के किसी कोने में, एक अनजानी बेचैनी करवटें लेने लगी थी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    दोपहर से ही रूहानी, अद्वैत, मीना और इवेंट प्लानर की टीम “Stitch & Soul” के स्टूडियो में जैसे अपनी सांसें बुन रही थी… हर टांका, हर मोड़, एक नए सफ़र का हिस्सा बनता जा रहा था। 

    ये सिर्फ एक स्टूडियो की ओपनिंग नहीं थी, ये एक दिल का दोबारा धड़कना था… और साथ ही मीना की 11-12 साल की बेटी गुनगुन का जन्मदिन भी।

    थीम थी…. Canvas of Dreams।

    स्टूडियो की हर दीवार पर नए सपनों की ख़ामोश दस्तक थी। फेयरी लाइट्स दीवारों से लिपटी थीं, जैसे किसी जादुई जंगल में चमकते जुगनू। छत से लटकते छोटे-छोटे origami stars और butterflies हवा में डोल रहे थे, मानो बच्चों के ख्वाबों ने कोई आकार ले लिया हो।

    हर बच्चे को जैसे ही रंग-ब्रश और छोटा सा कैनवस थमाया गया, उनकी आँखें चमक उठीं।

     रूहानी ने कहा, “जो भी ख्वाब देखो… उसे यहाँ उतार दो। कोई नियम नहीं है…. सिर्फ इमेजिनेशन।”

    गुनगुन ने pastel-colored gown पहना हुआ था, जो रूहानी ने खुद डिजाइन किया था…. वो फ्रॉक जैसे मीना की याद में गूंथा हुआ हो। उसमें लाल और सुनहरे रंग की कलियाँ थीं, चुनरी एकदम हल्की और मोतियों की बारिश जैसी। उसके बालों में छोटे-छोटे सफेद फूल सजे थे, और माथे पर एक नन्हीं सी रंगीन बिंदी — बिल्कुल कहानी की परी की तरह। वो जैसे हल्के पाँव ज़मीन पर उड़ती आ रही हो, और हँसी उसकी सबसे प्यारी जादू की छड़ी हो।

    मीना के चेहरे पर एक अलग ही सुकून था। उसे शायद यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी बेटी आज इस महफिल की centerpiece है।

    किचन के कोने में सजे थे cupcakes — हर एक पर एक अलग रंग का दिल। छोटे से rainbow cake पर बड़े प्यार से लिखा था: “To Gungun, with all the colors of the world.”

    रूहानी ने गुनगुन को एक sketchbook दी थी, उसके पहले पन्ने पर लिखा, “हर रंग तुम्हारा अपना है… दुनिया से छिपाना मत।”

    अद्वैत एक कोने में खड़ा था, लेकिन उसके भीतर कुछ बह रहा था। उसकी नज़रें बार-बार रूहानी की तरफ लौट जातीं। वो वहाँ मेहमान की तरह खड़ा था, पर महसूस कुछ और कर रहा था…. जैसे किसी पुराने संगीत के टुकड़े को फिर से सुनना, जिसे कभी दिल ने बारीकी से सीखा था।

    रूहानी की आँखों में अब softness थी, पर वो softness कमज़ोरी नहीं थी वो वो ताक़त थी जो सिर्फ टूटकर संभलने वालों को मिलती है।

    cake-cutting की तैयारी हो चुकी थी। मैं cake के पास आई, वो बीच में खड़ी थी, बाईं ओर मीना, दाईं ओर उसका भाई चीकू। पास में अद्वैत और रूहानी, दोनों के चेहरों पर हल्की सी मुस्कान। *

    रूहानी ने हाथ में lighter लिया, मोमबत्तियाँ  कि…..

    दरवाज़े के पास से एक जानी-पहचानी आई,  नहीं बुलाया गया इस खास इवेंट में?”

    रूहानी का हाथ रुक गया। मोमबत्तियों की लौ काँपी। Adwait ने पीछे मुड़कर देखा, और उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

    दरवाज़े पर कोई था, जिसे सबने कहीं न कहीं दफ़न कर दिया था… लेकिन वो आज लौट आया था… जैसे7 अधूरी स्केच की परछाई अचानक कैनवस के बीच उतर आए।

    ——————

    क्या वाक़ई रूहानी ने अतीत को जलाकर ख़त्म कर दिया था… या वो राख किसी नई आग की शुरुआत थी?

    जिसे सबने दफ़न कर दिया था, वो दरवाज़े पर क्यों लौट आया था? क्या वो बस एक परछाई था… या कोई ऐसा सच जो अब सामने आना ही था?

    क्या गुनगुन के जन्मदिन की ये रंगीन शाम किसी और की काली रात में बदलने वाली थी?

     

  • अधूरी इबादत भाग~44

    अधूरी इबादत भाग~44

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~44 सुलगते स्केच

     

    रूहानी ने रात के खाने के बाद मीना को फ़ोन किया। मीना से उसने अपनी बात बड़ी ही आत्मीयता से साझा की कि वह चाहती है कि मीना की बेटी का जन्मदिन उसके नए स्टूडियो की उद्घाटन समारोह के साथ मनाया जाए। 

    मीना को इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं थी, उसकी आवाज़ में सहमति और थोड़ी प्रसन्नता झलक रही थी। रूहानी ने मुस्कराते हुए उसे जल्दी आने के लिए कहा और फ़ोन रख दिया।

    लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। फ़ोन रखने के बाद भी रूहानी की आंखों में नींद नहीं उतरी। बिस्तर पर करवटें बदलती रही…. एक बेचैनी, एक उलझन सी मन में थी, जैसे किसी पुरानी याद ने धीरे से दस्तक दी हो।

    अंततः, जब नींद ने उसका हाथ थामने से इनकार कर दिया, तो वह चुपचाप, बहुत धीरे-धीरे बिस्तर से उठ खड़ी हुई। मन बोझिल था, और दिल किसी अनकहे सन्नाटे से भरा हुआ। 

    उसकी चाल में थकान थी, जैसे हर कदम बीते हुए वक़्त के किसी बोझ को ढो रहा हो। बिना आवाज़ किए वह अद्वैत के स्टडी रूम की ओर बढ़ी, जहाँ अब भी उसकी ख़ुशबू, उसकी आदतें और उसका सहेजा हुआ सन्नाटा बाकी था।

    दरवाज़ा बंद कर उसने नज़रें कमरे के कोनों में दौड़ाईं, मेज़, किताबें, कागज़… और वो ख़त, जो इस बार ईशिता का नहीं, अद्वैत का था। शायद वो उसे छुपाकर रखना भूल गया था।

    उसने धीरे से ख़त उठा लिया…. लग रहा था, ये कुछ ही देर पहले लिखा गया है।

    उसने खिड़की खोली। ठंडी हवा का झोंका भीतर आया, जैसे बीते पलों की वो ख़ामोश चाँदनी साथ ले आया हो, जो कभी दो लोगों के बीच का मौन चुपचाप तोड़ जाया करती थी।

    रूहानी फर्श पर बैठ गई। चाँद की रोशनी उसके चेहरे पर गिरी और वो पल फिर से आँखों में उतर आया… जब अदालत की ठंडी मेज़ पर उसने अद्वैत के साथ दस्तख़त किए थे। न सात फेरे थे, न मंगलसूत्र, बस काग़ज़ों की चुप्पी और एक अधूरा वादा…. जो कभी “हमेशा” नहीं था, फिर भी दिल ने मान लिया था। 

    उसने गहरी साँस ली… और पढ़ना शुरू किया।

    💌 प्रिय ईशिता,

    जब तुमने कहा था—“हमेशा,” मैंने उस एक लफ़्ज़ को अपनी रूह की सबसे भीतरी दीवार पर लिख लिया था। 

    मुझे लगा था, उस दिन से लेकर आख़िरी साँस तक, मेरी दुनिया में सिर्फ़ तुम होगी…. तुम्हारे साथ जीने का सपना, तुम्हारे साथ बूढ़ा होने की ख्वाहिश।

    पर अब….. जब तुम नहीं हो मुझे शादी करनी पड़ी। 

    नहीं…. नहीं…… मात्र क़ानूनी तौर पर एक रिश्ता दर्ज है, मगर उसमें वो धड़कन नहीं है, वो तुम नहीं हो।

    इस बंधन में न तुम्हारी हँसी है, न तुम्हारी बाँहों की वो पनाह, जहाँ मैं हर बार टूटकर समेटा जाता था।

    आज भी तुम्हारी तस्वीर मेरे कमरे में है, जहाँ तुमने उसे पहली बार रखा था….. एक मुस्कान के साथ। 

    हर बार जब मेरी नज़र उस पर टिकती है, तो यूँ लगता है जैसे वो आँखें मुझसे पूछ रही हों…. 

    “क्या अब भी वही हो, अद्वैत?” 

    और सच कहूँ, हाँ… मैं अब भी वहीं हूँ। जहाँ तुमने मुझे छोड़ा था।

    रूहानी… हम्म्म… वह अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है…… एक साल के लिए, एक समझौते की तरह। 

    कभी-कभी मुझे लगता है कि यह समय का एक अजीब सा खेल है। तुम तो जानती हो, मैं समझौतों में यकीन नहीं रखता था। लेकिन ज़िंदगी कभी-कभी तुम्हें ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ सबसे अनचाहे रास्ते ही सबसे ज़रूरी लगने लगते हैं।

    आज उसने मुझे अपने नए स्टूडियो की ओपनिंग में बुलाया। उसकी आँखों में चमक थी, लेकिन उसकी आवाज़ में वो थकान थी जिसे शब्द छिपा नहीं पाए। 

    उसने मुस्कराकर कहा, “अगर फीस लोगे तो अपनी बचत से दूँगी।” जैसे कोई कुछ साबित करना चाहता हो, शायद मुझे नहीं… खुद को।

    तुम होती तो हँसकर कहती, “अद्वैत, तुम कभी नहीं बदलोगे।” 

    और मैं जवाब देता, “हाँ ईशिता, तुम्हारे बिना क्या बदलूँ?”

    रूहानी की आँखों में कभी-कभी तुम्हारी सी ज़िद नज़र आती है….. वही जो तुमने देखी थी जब मैंने अपनी पहली किताब लिखी थी। पर उसमें तुम्हारे जैसा सुकून नहीं है। 

    लेकिन उसकी दुनिया अलग है, उलझनों से भरी… उसके संघर्ष अलग हैं। मैं उसे देखता हूँ, वो अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रही है। कभी उसकी हँसी में एक हल्की सी उदासी झलकती है…. एक ऐसी खामोशी, जो बहुत कुछ कहती है। 

    आज रात कमरे में बस पीली रौशनी थी। वो चाहती थी कि मैं कुछ कहूँ… और मैंने चाहा कि कह पाऊँ। 

    लेकिन मेरे होंठों पर सिर्फ़ तुम थी। मेरे शब्द हमेशा तुम्हारे लिए थे, ईशिता… सिर्फ़ तुम्हारे लिए।

    लोग कहते हैं… “आगे बढ़ो।” 

    पर वो नहीं जानते कि आगे बढ़ने के लिए पीछे छूटना पड़ता है। 

    और तुम कभी पीछे नहीं छूटी… तुम तो मेरी हर साँस में बसी रही। हर सन्नाटे में, हर अधूरे वाक्य में।

    मैं नहीं जानता ये समझौता क्या रंग लाएगा, रूहानी क्या खोज रही है, और मैं कहाँ जाऊँगा… पर एक बात जानता हूँ….

    मेरी सबसे ख़ूबसूरत कहानी, 

    जो आज भी अधूरी है… 

    वो सिर्फ़ तुम्हारी है।

    तुम्हारी याद में, 

    अद्वैत

    उस ख़त की आख़िरी पंक्ति पर आते-आते, रूहानी की उंगलियाँ काँपने लगीं। उसकी आँखें ख़ामोश थीं लेकिन भीतर एक सुनामी फूट रही थी। खिड़की के पार रात अब और भी स्याह हो चुकी थी, लेकिन अंदर का अँधेरा… उससे कहीं ज़्यादा गहरा था।

    °°°°°°°°°°°°°

    अपने कमरे में लौटने के बाद रूहानी धीमे-धीमे चलती हुई अपनी अलमारी के पास पहुंची। अलमारी खोलते हुए उसकी उंगलियों में कंपन था। 

    उसने नीचे की दराज से वो पुरानी फाइल निकाली, जिसे वो छूने से भी डरती थी….. वही फाइल जिसमें वो स्केच थे, जो उसने एकांश के लिए बनाए थे।

    कुछ स्केच अधूरे थे, जैसे उनकी कहानी। कुछ के कोनों पर जले हुए निशान थे…. जैसे दिल के किसी हिस्से को समय ने धीरे-धीरे राख में बदला हो। उसने एक-एक करके उन्हें फर्श पर फैलाया, हर स्केच से जैसे कोई चीख़ बाहर आ रही थी। 

    वो मुस्कुराता चेहरा, वो आँखें जो रूहानी की आँखों में डूब जाया करती थीं, और वो अधूरा स्केच जिसमें रूहानी ने एकांश का चेहरा खत्म करने से पहले ही पेंसिल छोड़ दी थी।

    अचानक वो पल कौंध गया….. वो विश्वासघात, वो ठंडापन, जो अब भी उसकी रगों में काँपती थी। उसकी साँसें तेज़ हो गईं, चेहरा पसीने से भीग गया। 

    वो सारे स्केच को समेटी , जैसे ज़हर को एक जगह इकट्ठा कर रही हो, और फिर कमरे के कोने में उन्हें पहाड़ कर दिया। 

    “अब तुमसे जुड़ा कुछ भी मेरे पास नहीं रहेगा…” वह बुदबुदाई, और माचिस जलाकर स्केच को आग लगा दी।

    लपटें धीरे-धीरे फैलने लगीं। रूहानी की आँखें उस आग में डूब गईं, मानो वहीं अपना हर अधूरा जवाब खोज रही हो। उसके चेहरे पर आँसू नहीं थे, पर जो सूनापन था, वो किसी चीख से कम नहीं था। 

    वो उठी, और मोबाइल से उस जलते हुए पल की एक तस्वीर लेने लगी…. जैसे वो राख होते पलों को आख़िरी बार बंद करना चाहती हो।

    लेकिन तभी…

    उसका फोन कंपन करने लगा। 

    स्क्रीन पर नाम चमका…. एकांश कॉलिंग।

    रूहानी का हाथ बीच हवा में रुक गया।

    ————–

    एकांश को अभी क्यों याद आई रूहानी?

    क्या रूहानी फोन उठाएगी… या इस बार वो जवाबों को सुलगा देगी, हमेशा के लिए? 

    क्या ये रिश्ता महज़ एक समझौता है… या किसी अनजाने मोड़ पर दिल फिर से धड़कने लगेगा? 

     

  • अधूरी इबादत भाग~43

    अधूरी इबादत भाग~43

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~43 फासलों के बीच हम 

     

    काम्या रैना… एक ऐसा नाम जो किसी पहचान की मोहताज नहीं था। मशहूर फैशन डिज़ाइनर, कई national और international fashion weeks की consistent शो-स्टॉपर, luxury lifestyle magazine के कवर पर चमकता चेहरा और Pune के सबसे रईस इलाके में बने उस glass-walled penthouse की रानी… जहाँ से शहर की चकाचौंध रातों में उसकी ही तरह तन्हा चमकती दिखती थी।

    सिल्क की emerald green slit gown, six-inch high heels, diamond-studded smartwatch, curated nail art और एक flawless attitude….. ऐसा लग रह था जैसे काम्या किसी magazine shoot से निकल कर सीधी अपने रूम में आ गई हो। 

    उसके माता-पिता दूसरे शहर में रहते थे, पर दौलत और रुतबे में वो किसी राजा-रानी से कम नहीं थे। 

    और उसका पति? एकांश राठौड़….. 

    फेमस फोटो और वीडियो ग्राफर, जो कभी दुनियाभर की शादियाँ, शूट्स और फिल्म फेस्ट कवर करता था, अब शादी के बाद सिर्फ काम्या के लिए काम करता था। 

    उनकी शादी उतनी ही ग्रैंड थी, जितनी उनकी दुनिया…. लेकिन उस दुनिया के पर्दे के पीछे, कुछ अधूरा सा पल रहा था।

    जब एकांश के चीखने की आवाज़ें घर की साज़-सज्जा में दरार की तरह गूंजने लगीं, तो काम्या का धैर्य टूटा। वो अपने रूम से निकली, बालों में लगा महँगा क्लिप अब भी चमक रहा था, लेकिन चेहरे पर एक भी शिकन की जगह अब लावा बह रहा था।

    उसने देखा एकांश की उथल-पुथल में डूबा हुआ था। उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखों में जैसे कोई भटका हुआ तूफ़ान हो जो दिशा भूल गया हो। उसका पूरा जिस्म काँप रहा था, पर वो कंपन भीतर के दर्द का नहीं, किसी खोए हुए पल को दोबारा छू लेने की बेतुकी कोशिश का था। 

    “ये सब क्यों कर रहे हो, एकांश?” उसने पूछा—आवाज़ सख्त, आँखें सवालों से भरी।

    मगर एकांश… वो जैसे किसी और ही दुनिया में था। उसकी आँखों में एक पागलपन था, चेहरा पसीने से तर, होठ बुदबुदा रहे थे। 

    वो जैसे हवा में किसी के होने का भ्रम जी रहा था। और उस भ्रम में, वो नाम निकल गया… “रूहानी।”

    बस… इतना ही सुनना था, काम्या का चेहरा गुस्से से जल उठा, उसने एक झटके में एकांश की बाँह पकड़ी और पूरे ज़ोर से झटकते हुए तमाचा जड़ दिया।

    “होश में आओ, एकांश! You dammit… what the hell is wrong with you!” उसकी आवाज़ दीवारों से टकरा रही थी।

    एकांश ठिठक गया। पलकें फड़कने लगीं। चेहरा जैसे गर्म रेत पर गिरा हो… वो एक पल को देखता रहा, फिर बुदबुदाया, “I’m sorry…” और बिना एक और शब्द बोले अपने कमरे की ओर चला गया। 

    कुछ देर बाद, कपड़े बदलकर, चेहरा धोकर, बाल सँवारकर… वो ड्रॉइंग रूम में लौटा तो देखा, काम्या वही थी, पर अब उसका चेहरा शांत था। पहली बार उसके हाथ में कोई luxury purse नहीं, बल्कि first aid box था। 

    वो professionally composed expression, जो वो runway पर रखती थी, अब भी था… बस उस calmness के नीचे कुछ टूटा हुआ तैर रहा था।

    एकांश चुपचाप उसके बगल बैठ गया। उसके चेहरे पर अब कोई ग़ुस्सा नहीं था… कोई प्यार भी नहीं। सिर्फ एक खालीपन था, जो ointment की ठंडक से भी नहीं भर पा रहा था। 

    काम्या उसके और पास खिसक आई, जैसे कई मुद्दों को hold पर रख दिया हो। उसने उसका हाथ उठाया और बहुत नर्मी से, उस जख्मी जगह पर ointment लगाने लगी। उसकी उंगलियाँ expert थीं…. न सख्त, न बहुत कोमल… बस उतनी ही कि घाव भर सके, बिना कुछ कहे।

    कमरे की हवा गाढ़ी हो चुकी थी, जैसे हर साँस किसी अधूरे वादे की राख समेटे चल रही हो। एकांश की उंगलियाँ अभी भी उस पट्टी की गर्माहट महसूस कर रही थीं, जो काम्या ने उसके जख्मी हाथ पर बांधी थी। 

    उसकी नज़रें फर्श पर जमी थीं, लेकिन ज़हन में अब भी रूहानी की छाया गूंज रही थी…. जैसे वो अभी भी वहाँ खड़ी हो, और कोई उसे ज़बरदस्ती वापस खींच रहा हो।

    काम्या के होंठों पर एक फीकी मुस्कान तैर रही थी…. वो मुस्कान जिसमें नमी नहीं, नफ़रत की नोंक छुपी थी।

    “तुम्हारे ज़ख्म की मरहम तो लगा दी, अब दिल के लिए भी कुछ चाहिए?” उसकी आवाज़ हल्की थी, लेकिन हर शब्द किसी surgical blade की तरह काटता चला गया। 

    “या वो कोई और लगाए?”

    एकांश ने आंखें उठाईं, धीमे से कहा, “काम्या… प्लीज़… अभी नहीं।”

    लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले ही काम्या का गुस्सा दहाड़ बनकर फूट पड़ा, “कब? जब तुम पूरी तरह उस Illusion के साथ जीने लगो?”

    उसका चेहरा अब केवल गुस्से से नहीं, अपमान की पीड़ा से भी तप रहा था। उसकी नथुने फड़फड़ा रही थीं, जैसे दिल की आग सांसों के रास्ते बाहर निकलने को मचल रही हो।

    “क्या तुम्हें ज़रा भी अंदाज़ा है कि तुम्हारी ये हालत देखकर कैसा लगता है?” उसकी आँखों में आँसू की नहीं, जवाब की मांग थी।

    एकांश ने हल्की साँस ली, जैसे भीतर कुछ जकड़ रहा हो, “मैंने कभी नहीं कहा था कि मैं परफेक्ट हूं।”

    “नहीं,” काम्या ने दाँत भींचते हुए कहा, “तुमने सिर्फ ये साबित किया है कि मैं irrelevant हूं। तुम्हारे लिए, मैं बस एक नाम हूं… एक well-dressed distraction… nothing more.”

    एकांश की निगाहें अब उसके चेहरे से हटकर सामने की दीवार पर टिक गईं। दीवार पर टँगा वो बड़ा सा मिरर अब उसके अंदर झाँक रहा था। 

    ठंडेपन से उसने कहा, “तुम्हें जो चाहिए था….. status, success, lifestyle…… सब कुछ तो है न। और मैं… एकांश राठौड़… वो भी तो मिल गया न तुम्हें। फिर शिकायत किस बात की?”

    काम्या की आँखों में कुछ काँपा, दर्द की परत में दबा हुआ सच। वो फुसफुसाई, “मैंने तुमसे सौदे नहीं किए थे, एकांश… मैंने तुमसे सच में प्यार किया….. पर तुमने मुझे कभी उस क़ीमत पर चाहा ही नहीं।”

    कुछ पल के लिए कमरे में फिर वही सन्नाटा। 

    एकांश ने नज़रें झुकाईं, जैसे अपने शब्दों की ही सच्चाई उसे कचोट रही हो। उसकी उँगलियाँ आपस में उलझ रही थीं…. जैसे सोच और शर्म एक-दूसरे से टकरा रही हों।

    उसकी आवाज़ आई, धीमी और डूबती हुई, जैसे किसी पुराने कमरे में कोई खिड़की खुली छोड़ दी गई हो और अब हवा की सिसकियाँ भीतर घुस रही हों।

    “काम्या… हर किसी का दर्द से जूझने का अपना तरीका होता है,” उसने कहा, मानो ये शब्द नहीं, कोई टूटी हुई ढाल हो जिसे वो अपने खिलाफ उठाने की कोशिश कर रहा हो।

    “मेरा तरीका… शायद थोड़ा उलझा हुआ है, लेकिन… मैं कोशिश कर रहा हूँ, सच में।”

    काम्या का चेहरा अब सख़्त था, लेकिन उसकी आँखों में कोई तूफ़ान हिलोरें मार रहा था। “तुम्हारा ‘तरीका’… एक दूसरी औरत के नाम को बड़बड़ाना है, उसे अपने hallucinations में छूना… और फिर sorry बोलकर बाथरूम में छुप जाना?”

    एकांश का सिर झटका, “रूहानी कोई ‘दूसरी औरत’ नहीं है।”

    उस एक वाक्य ने जैसे काम्या के भीतर किसी मृत volcano को जगा दिया। उसने एकदम शांत लहजे में कहा, “हां… और मैं कभी पहली नहीं थी।”

    वो उठी। हाई हील्स की खनक ने जैसे कमरे की चुप्पी को चीर दिया—हर कदम ऐसा, मानो फर्श पर नहीं, किसी गहरे राज़ पर रखा जा रहा हो। 

    एकांश वहीं बैठा रह गया….. उस खाली first-aid box के पास, जो अब पट्टी से ज़्यादा, उसके अंदर की टूट-फूट की गवाही दे रहा था।

    फिर उसने जेब से मोबाइल निकाला। उंगलियाँ काँप रही थीं, जैसे दिल और दिमाग आपस में लड़ रहे हों। उसने फोन अनलॉक किया। Contacts खोले।

    स्क्रॉल किया…

    “Ruhani 💔” 

    नाम अब भी सेव था, delete कभी कर नहीं पाया था।

    उसने स्क्रीन को कुछ सेकंड देखा, जैसे उसमें रूहानी की आँखें झाँक रही हों… पूछ रही हों,”अब क्यों?”

    थोड़ी देर वो यूँ ही बैठा रहा। कमरे में सिर्फ मोबाइल की नीली रौशनी थी और अचानक, उसने call button दबा दिया।

    Tring… tring… tring…

    हर रिंग एक heartbeat जैसी थी, धीमी, भारी, और किसी अनकही उम्मीद से भरी।

    फिर… क्लिक। call connect हो गया। पर दूसरी तरफ… सन्नाटा।

    न कोई “Hello” न कोई सांस न कोई हलचल….. बस… एक breathing silence जैसे किसी बंद कमरे में कोई अपनी साँसें रोककर सुन रहा हो।

    एकांश की उँगलियाँ काँप गईं। उसने धीमे से फुसफुसाया, “रूहानी…?”

    कोई जवाब नहीं।

    ——————————-

    क्या उस breathing silence के पीछे वाकई कोई था… या ये भी एकांश की उसी उलझी हुई दुनिया का हिस्सा था?

    अगर रूहानी सच में सुन रही थी… तो अब वो क्या सोच रही होगी?

    काम्या के हर कदम की खनक अब किसी गहरे राज़ को जगा रही है… क्या वो राज़ कभी उजाला देखेगा?

     

  • अधूरी इबादत भाग~42

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~42 क्या वो लौट आई? 

     

    रूहानी कैब की खिड़की से बाहर देख रही थी, शहर की भीड़ में खोए चेहरों को, तेज़ भागती गाड़ियों को और उन धूप की किरणों को जो शाम होते-होते सुनहरी उदासी में बदल जाती थीं। 

    मन में हल्की-सी थकावट थी, पर साथ ही एक जिद भी थी, टूटे दिन की टहनियों से उम्मीद के फूल उगाने की कोशिश।

    स्टूडियो की ओपनिंग सेरेमनी की तारीख तय हो चुकी थी, और उसने सोचा कि अगर उसी दिन मीना की बेटी गुनगुन का बर्थडे भी मना लिया जाए, तो बच्ची की आँखों में अपनापन महसूस करने की चमक भी आ जाएगी।

    “वैसे भी… मैं गुनगुन के लिए ड्रेस डिज़ाइन तो कर ही रही हूँ,” रूहानी ने खुद से बुदबुदाते हुए सोचा, एक मुलायम मुस्कान के साथ।

    कैब रुकी, वो उतरी, हाथ में कुछ सैंपल्स और पर्स थामे, और धीरे-धीरे घर की ओर कदम बढ़ाए। दरवाज़ा खोलते ही सबसे पहले हॉल की खामोशी ने उसका स्वागत किया, वो खामोशी जो किसी की कमी से ज्यादा, किसी सोच में डूबे होने का संकेत लग रही थी। 

    अद्वैत वहां नहीं था, जबकि आमतौर पर इस वक़्त वो वही होता था, कॉफी मग के साथ या किसी किताब में उलझा हुआ।

    रूहानी ने मोबाइल निकाला, कॉल लगाया। पहली ही बेल में उठा लिया अद्वैत ने।

    “कहाँ हो?” उसने सीधा पूछा।

    “स्टडी रूम में,” अद्वैत की आवाज़ आई, थोड़ी थकी हुई, पर हमेशा की तरह स्थिर।

    “नीचे हॉल में आओगे? कुछ बात करनी है,” रूहानी ने कहा, आवाज़ में ना कोई झिझक थी, ना कोई बनावट, सिर्फ़ एक सादगी थी, जिसमें रिश्तों के सारे स्पेस टंगे हुए थे।

    फोन कटते ही उसने काँच की मेज पर सैंपल्स फैला दिए, हर रंग, हर डिज़ाइन जैसे गुनगुन के चेहरे की मुस्कान की कल्पना बनकर उसके आगे बिछ गए थे। 

    मन में अब भी हल्की हिचकिचाहट थी, न जाने अद्वैत को उसका सुझाव कैसा लगेगा। पर फिर भी, वो जानती थी कि जिन रिश्तों में maturity हो, वहाँ छोटी-छोटी बातें भी बन सकती हैं।

    “काश लोग ऐसे ही छोटी खुशियों को बाँटने में उतना ही उत्साहित हों, जितना कि बड़े इवेंट्स की प्लानिंग में होते हैं,” रूहानी ने बेजान टेबल की ओर देखते हुए कहा, जैसे कोई पेंटिंग अधूरी छोड़कर रंग सोच रहा हो।

    अद्वैत जब स्टडी रूम से नीचे आया, तो उसकी चाल में हमेशा वाली थकान नहीं थी, लेकिन एक अजीब-सी उदासी उसके चेहरे पर छाई हुई थी। 

    रूहानी सोफ़े पर बैठी हुई थी, सामने मेज़ पर इनविटेशन कार्ड और कुछ सैंपल्स फैले थे। कमरा हल्के पीले लैंप की रोशनी में डूबा हुआ था, जो दोनों की मौजूदगी को और भी गहरा बनाता जा रहा था।

    अद्वैत ने सीधे रूहानी के चेहरे को देखकर पूछा, “क्या बात करनी थी अभी? डिनर का टाइम तो वैसे भी होने वाला है।”

    रूहानी ने नज़रें उठाईं, फिर शांत लहजे में कहा, “इसीलिए तो अब बात करनी सोची… क्योंकि तुम तो डिनर के टाइम कभी बात नहीं करते हो?”

    उसकी आवाज़ में शिकवा नहीं था, बस एक स्मृति थी, उन नियमों की, जो दोनों ने बिना ज़्यादा कहे बना लिए थे।

    अद्वैत थोड़ा मुस्कराया, “तो आज तुमने मुझे नियम तोड़ने से पहले बुला लिया?”

    रूहानी ने नजर झुकाकर कहा, “शायद… या शायद ये भी एक रूल है जो मैंने खुद के लिए बना लिया।”

    वो उठी और मेज़ से एक इनविटेशन कार्ड उठाकर अद्वैत की ओर बढ़ाया।

    “ये लो… तुम्हारे लिए,” उसने कहा।

    अद्वैत ने कार्ड लिया, उस पर उंगलियाँ फिराईं, जैसे हर अक्षर को महसूस करना चाहता हो।

    “Well… thank you, इतनी बड़ी रकम देने के लिए,” रूहानी बोली, “और तुमने actual reason भी नहीं पूछा, पता नहीं क्यों… लेकिन मैं ही बता देती हूँ। मैंने विमान नगर के पास धनौरी में अपना नया स्टूडियो खरीदा है stich & soul।”

    अद्वैत ने कार्ड को देखा, फिर उसकी तरफ़ नज़रें उठाईं, बिलकुल खाली, जैसे उसका मन कुछ पलों के लिए वहीं अटका हो गया हो।

    “दो दिन बाद मेरे studio की opening ceremony है,” रूहानी ने धीमे से जोड़ा।

    वो बोल रही थी, लेकिन आँखें बार-बार अद्वैत के चेहरे पर टिक जा रही थीं, जैसे कुछ खोज रही हो वहाँ।

    “तो… तुम्हें इनवाइट करना बनता है,” उसने मुस्कराते हुए कहा, “आख़िर कुछ तो रिश्ता है हमारा… नाम का ही सही।”

    फिर हल्का सा रुककर, जैसे खुद से कह रही हो, “मतलब… कुछ मर्यादाएँ तो निभानी पड़ती हैं, है न?”

    अद्वैत कुछ नहीं बोला। उसके होंठ थोड़े खुले थे, लेकिन शब्द कहीं अटक से गए थे।

    “Chief guest के तौर पर आ सकते हो,” रूहानी ने हिम्मत से कहा, “I mean… अगर तुम्हारे schedule में fit हो।”

    वो पल थोड़े अजीब थे, एक formal आमंत्रण, जो उस रिश्ते के भीतर से निकला था जिसमें कभी personal होने की इजाज़त नहीं थी।

    अद्वैत की चुप्पी देख रूहानी खुद ही हँस पड़ी, एक हल्की, almost sarcastic हँसी।

    “Oh sorry, I forget…” उसने कहा, “तुम अपनी fee भी तो लोगे, right?”

    अद्वैत की भौंहें थोड़ी उठीं, लेकिन अब भी उसने कुछ नहीं कहा।

    “So… Mr. Bestselling Writer, Mr. Adwait Awasthi… आप कितना charge करेंगे?” उसकी आवाज़ में अब एक playful taunt था, जो वो अक्सर खुद को ढाल देने के लिए इस्तेमाल करती थी।

    फिर कुछ याद आया उसे, और उसका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।

    “Ouch,” उसने कहा, “मैं तो सही में भूल गई… तुम तो यही बोलोगे ना कि ‘मेरे ही पैसे मुझे वापस कर रही हो?’”

    अद्वैत की आँखें अब उसकी तरफ़ सीधी टिक चुकी थीं, पर होंठ अब भी बंद थे।

    “Don’t worry,” रूहानी ने कंधे उचकाते हुए कहा, “मेरी little savings हैं… उसमें से दे दूँगी।”

    उसके चेहरे पर एक pride थी, लेकिन उस pride में एक अकेलापन भी छुपा था, जैसे वो दुनिया को साबित करना चाहती हो कि वो खुद के लिए काफी है, पर उसके भीतर कहीं एक कोना अब भी चाहता था कि कोई बिना कहे उसे थाम ले, बिना शर्तों के।

    अद्वैत ने कार्ड को देखा, फिर उसकी ओर बढ़ा, एक पल को कुछ कहने के लिए होंठ खुले, लेकिन वो फिर रुक गया।

    कमरे की हवा थोड़ी भारी हो गई थी, जैसे शब्दों के बजाय अब खामोशियाँ ही संवाद कर रही हों।

    और रूहानी?

    वो वही खड़ी थी, अपनी बनाई हुई सीमाओं के भीतर, फिर भी उम्मीद से थोड़ा आगे… जैसे चाहती हो कि इस बार कोई रेखा पार कर जाए… सिर्फ़ एक बार… बस एक बार।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    एकांश ने जैसे ही वो आवाज़ सुनी, उसकी पलकों की सिलवटें थरथरा उठीं, जैसे बरसों से सूखे पड़े किसी पुराने खत के अक्षर अचानक ज़िंदा हो उठे हों।

    गर्दन धीमी-सी हरकत में उठी, मानो उसे डर हो कि अगर ज़रा भी जल्दी की, तो वह मंज़र बिखर जाएगा। और फिर… उसने देखा।

    वो वही थी …. रूहानी।

    उसके सामने खड़ी, बिल्कुल वैसी ही जैसे उसकी यादों में थी, वही मासूम आँखें, जिनमें एक वक़्त उसकी पूरी कायनात सांस लेती थी। 

    वही धीमी साँसें, जो कभी उसके दिल की धड़कनों से ताल मिलाया करती थीं और वही हल्के मुस्कुराते होंठ, जिनमें उसकी ज़िन्दगी की सबसे गहरी तसल्ली लिपटी थी।

    “एकांश…” वो बोली, बेहद नर्मी से, जैसे किसी टूटते हुए सपने की आवाज़ हो, धीमी, लेकिन सीधी दिल में उतर जाने वाली।

    एकांश के भीतर कुछ दरक गया। उसका पूरा वजूद जैसे किसी पुराने मंदिर की मूर्ति की तरह थरथरा उठा, जिसमें सालों से किसी ने आस्था नहीं जगाई थी। 

    वो उठ खड़ा हुआ और धीमे-धीमे उसके पास गया। कांपते हाथों से उसके चेहरे को छूने लगा…. उसके गाल, उसकी ठोड़ी। हर स्पर्श में वो अपने टूटे हिस्सों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था।

    वो रो नहीं रहा था, लेकिन उसकी आँखें… जैसे किसी अंधे कुएँ में उतरी हुई थीं….. गहरी, नम, और खोई हुईं। वो अब शब्दों में नहीं, सिर्फ स्पर्श में जी रहा था। जैसे ज़िन्दगी ने भाषा छोड़ दी हो।

    रूहानी चुप रही। ना कोई विरोध, ना कोई सवाल। जैसे वो कोई हक़ीक़त नहीं, एकांश की टूटी हुई कल्पना की सजीव मूर्ति हो…. जो सिर्फ उसके लिए वहाँ खड़ी थी।

    एकांश ने उसे बाँहों में खींच लिया। उसकी साँसें अब तेज़ थीं, अधूरी थीं। उसके होठों ने उसकी त्वचा को छुआ…. माथे से होते हुए उसकी गर्दन तक। 

    हर चुम्बन में एक अधूरा वादा था, हर साँस में एक बुझता हुआ इश्क़। एक वो इश्क़ जिसे वक़्त ने अधूरा छोड़ दिया था, और आज ये लम्हा जैसे उसे पूरा करने आया था।

    “तुम मेरी हो… हमेशा से,” वो बुदबुदाया, उसकी गर्दन में मुंह छुपाए हुए, “अब कोई फ़ासला नहीं… कोई वादा नहीं… बस तुम और मैं…”

    लेकिन…

    जैसे ही उसके होठ नीचे फिसले, जैसे ही उसका स्पर्श उस सरहद की ओर बढ़ा जहाँ इज़्ज़त और इच्छा की लकीरें धुंधली पड़ने लगती हैं…

    चटाक!!

    एक ज़ोरदार तमाचा उसकी दुनिया को झकझोर गया। जैसे कोई शीशा हो, जिसमें वो रूहानी को देख रहा था और अचानक किसी ने उसे पत्थर मार दिया हो। सब कुछ चकनाचूर।

    वो पीछे हटा। चेहरा सुलग उठा, और उसकी आँखों ने काँपते हुए सामने देखा …. 

    वो रूहानी नहीं थी।

    उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ, आँखों में जलता हुआ तूफ़ान। उसकी नथुने फड़फड़ा रही थीं, जैसे हर साँस एक ज्वालामुखी को थामे हुए हो। उसने कसकर एकांश की बाहें झटक दीं…. जैसे किसी ज़हर को अपनी त्वचा से दूर फेंक रही हो।

    “होश में आओ, एकांश! You dammit… what the hell is wrong with you!” उसकी आवाज़ में वो सब कुछ था… जलन, गुस्सा, और टूटता हुआ भरोसा।

    एकांश वहीं खड़ा रह गया। जैसे किसी सपने से गिर पड़ा हो… हकीकत की सख़्त ज़मीन पर, नंगे पाँव, बेआवाज़।

    उसके हाथ अब भी हवा में थे… किसी को छूने की मुद्रा में, लेकिन अब वहाँ कोई नहीं था। 

    ——————

    क्या अद्वैत उस इन्विटेशन कार्ड के साथ रूहानी के जज़्बात पढ़ पाएगा, या फिर वो भी उस रिश्ते की तरह अनकहे रह जाएंगे? 

    क्या एकांश वाक़ई रूहानी को देख रहा था… या बस अपनी ही अधूरी चाहत को छूने की नाकाम कोशिश कर रहा था? 

    कौन थी वो… जो एकांश की बाँहों में थी?