दो अजनबी भाई — राम और श्याम शहर की एक बड़ी कंपनी में राम की नौकरी को करीब दो साल हो चुके थे। राम शांत स्वभाव का लड़का था। वह अपने काम से काम रखता और ऑफिस में किसी से ज्यादा घुलता-मिलता नहीं था। उसी ऑफिस में एक दिन नया लड़का आया—श्याम। श्याम की उम्र करीब राम के बराबर ही थी। चेहरे पर हमेशा हल्की मुस्कान रहती और बात करने का अंदाज ऐसा था कि सामने वाला कुछ ही मिनटों में उससे घुल-मिल जाता। पहले दिन ही श्याम को राम के पास वाली सीट मिली। श्याम ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “भाई, मैं श्याम हूं। उम्मीद है तुम मुझे देखकर परेशान नहीं होगे।” राम हंस पड़ा। “परेशान तो नहीं होऊंगा, लेकिन ज्यादा सवाल पूछे तो जरूर हो जाऊंगा।” श्याम ने तुरंत हाथ बढ़ाया। “पक्का दोस्त?” राम ने उसका हाथ पकड़ लिया। “पक्का दोस्त।” बस, उसी दिन से दोनों की दोस्ती शुरू हो गई। कुछ ही दिनों में राम और श्याम ऑफिस के सबसे अच्छे दोस्तों में गिने जाने लगे। दोनों साथ लंच करते, काम में एक-दूसरे की मदद करते और ऑफिस खत्म होने के बाद चाय पीने भी चले जाते। लेकिन दोनों की जिंदगी के बारे में एक अजीब बात थी। राम अपने परिवार के बारे में ज्यादा बात नहीं करता था। और श्याम भी अपने परिवार का जिक्र आते ही बात बदल देता था। एक दिन लंच करते समय श्याम ने पूछा, “राम, तुम्हारे घर में कौन-कौन है?” राम कुछ पल चुप रहा। “मां-पापा हैं।” “भाई-बहन?” राम ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं।” श्याम मुस्कुराया। “मेरे भी मां-पापा हैं। लेकिन मेरी मां हमेशा कहती हैं कि अगर मेरा एक भाई होता तो शायद मैं इतना जिद्दी नहीं होता।” राम हंसते हुए बोला, “मेरी मां भी कभी-कभी कहती थीं कि काश मेरा कोई भाई होता।” दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे। फिर श्याम ने मजाक में कहा, “लगता है हम दोनों को भाई की कमी थी, इसलिए दोस्त बन गए।” राम ने भी हंसते हुए कहा, “शायद।” उन्हें क्या पता था कि उनकी यह बात सच से इतनी करीब थी। दरअसल, राम और श्याम सगे भाई थे। लेकिन दोनों को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी। करीब पच्चीस साल पहले राम और श्याम का जन्म एक ही परिवार में हुआ था। परिस्थितियों के कारण बचपन में दोनों अलग हो गए थे। राम को उसके नाना-नानी अपने साथ ले गए थे, जबकि श्याम अपने माता-पिता के साथ दूसरे शहर चला गया था। समय बीतता गया। राम बड़ा होकर अपने नाना-नानी को ही अपना माता-पिता समझता रहा। श्याम भी अपने घर में यही मानकर बड़ा हुआ कि उसका कोई भाई नहीं है। उनके माता-पिता ने कभी पुराने रिश्तों की बात नहीं की थी। लेकिन किस्मत ने दोनों भाइयों को एक ही ऑफिस में ला खड़ा किया था। एक शाम ऑफिस में अचानक बिजली चली गई। पूरा ऑफिस अंधेरे में डूब गया। श्याम ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और मजाक किया, “अगर भूत आया तो तुम मुझे बचाना।” राम हंस पड़ा। “पहले तुम मुझे बचाना। तुम मुझसे ज्यादा बहादुर दिखते हो।” श्याम ने कहा, “ठीक है भाई।” राम ने मजाक में उसे देखा। “भाई मत बोलना।” श्याम हंस पड़ा। “क्यों? अच्छा नहीं लगता?” राम कुछ पल चुप रहा। “पता नहीं… अजीब सा लगता है।” श्याम ने उसकी बात को मजाक समझकर छोड़ दिया। अगले दिन ऑफिस में एक जरूरी प्रोजेक्ट की मीटिंग थी। राम और श्याम को एक ही टीम में रखा गया। दोनों ने पूरी मेहनत की और प्रोजेक्ट सफल हो गया। कंपनी के मालिक ने दोनों की तारीफ करते हुए कहा, “तुम दोनों की सोच बिल्कुल एक जैसी है। लगता है जैसे कई सालों से साथ काम कर रहे हो।” श्याम ने राम की तरफ देखकर कहा, “हमारी दोस्ती ही ऐसी है।” राम मुस्कुराया। लेकिन उसी शाम एक ऐसी घटना हुई जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। श्याम ऑफिस से घर जाने ही वाला था कि उसके पिता का फोन आया। “श्याम, आज जल्दी घर आ जाना। तुम्हारी मां की तबीयत थोड़ी खराब है।” श्याम तुरंत घर निकल गया। घर पहुंचते ही उसने देखा कि उसकी मां के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी। श्याम ने पूछा, “मां, क्या हुआ?” मां ने कांपती आवाज में कहा, “आज मुझे तुम्हारे पुराने दिनों की एक चीज मिली।” उन्होंने तस्वीर श्याम की तरफ बढ़ाई। श्याम ने तस्वीर देखी। उसमें एक छोटी उम्र की महिला अपने साथ दो छोटे बच्चों को पकड़े हुए थी। एक बच्चा बिल्कुल श्याम जैसा दिख रहा था। और दूसरा… श्याम की नजर उस दूसरे बच्चे के चेहरे पर टिक गई। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। “मां… ये दूसरा बच्चा कौन है?” उसकी मां की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने धीरे से कहा, “तुम्हारा बड़ा भाई।” श्याम जैसे पत्थर का हो गया। “मेरा… भाई?” मां ने सिर झुका लिया। “हां। लेकिन हालात ऐसे बने कि तुम दोनों अलग हो गए। हमें कभी मौका ही नहीं मिला तुम्हें सब सच बताने का।” श्याम के हाथ से तस्वीर लगभग गिर गई। उसी समय उसे राम का चेहरा याद आया। राम की आवाज। उसकी मुस्कान। उसकी आदतें। यहां तक कि दोनों की कुछ छोटी-छोटी पसंद भी एक जैसी थीं। श्याम ने तस्वीर को गौर से देखा। फिर अचानक उसकी नजर तस्वीर के पीछे लिखे नाम पर पड़ी। “राम।” श्याम की सांस रुक गई। अगली सुबह वह ऑफिस पहुंचा तो राम अपनी सीट पर बैठा काम कर रहा था। श्याम कुछ देर तक उसे देखता रहा। राम ने पूछा, “क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रहे हो?” श्याम ने धीरे से कहा, “राम… तुम्हारे पास अपने बचपन की कोई पुरानी तस्वीर है?” राम ने हैरानी से पूछा, “अचानक क्यों?” “बस दिखाओ।” राम ने अपना फोन खोला और एक पुरानी तस्वीर निकाली। श्याम की आंखें फैल गईं। वही चेहरा। वही तस्वीर में मौजूद मां। वही बचपन। श्याम की आंखों में आंसू आ गए। राम घबरा गया। “श्याम, क्या हुआ?” श्याम ने कांपते हाथों से अपनी जेब से वही पुरानी तस्वीर निकाली। राम ने तस्वीर देखी। कुछ पल तक वह कुछ बोल ही नहीं पाया। फिर उसने तस्वीर को पलटा। पीछे वही नाम लिखा था। राम और श्याम। राम की आंखों से आंसू निकल पड़े। “तुम… मेरे भाई हो?” श्याम ने कुछ नहीं कहा। बस आगे बढ़कर राम को गले लगा लिया। दोनों भाई काफी देर तक एक-दूसरे को पकड़े खड़े रहे। जिस रिश्ते से दोनों अनजान थे, वही रिश्ता उनकी दोस्ती की सबसे बड़ी वजह बन चुका था। राम रोते हुए बोला, “इतने सालों से मैं सोचता रहा कि मेरा कोई भाई नहीं है।” श्याम ने कहा, “और मैं सोचता रहा कि मेरी जिंदगी में भाई की कमी क्यों महसूस होती है।” राम ने उसकी पीठ थपथपाई। “शायद इसलिए… क्योंकि दिल को पहले से पता था कि मेरा भाई कहीं है।” दोनों हंसते हुए रोने लगे। उस दिन ऑफिस में बाकी लोगों को कुछ समझ नहीं आया कि दोनों एक-दूसरे को देखकर बार-बार क्यों मुस्कुरा रहे हैं। कुछ दिनों बाद दोनों अपने माता-पिता के सामने साथ खड़े थे। पुराने रिश्तों की सारी गलतफहमियां धीरे-धीरे दूर होने लगीं। राम और श्याम ने तय किया कि अब वे कभी एक-दूसरे से दूर नहीं होंगे। श्याम ने मजाक करते हुए कहा, “वैसे एक बात बताऊं?” राम ने पूछा, “क्या?” “तुम मेरे दोस्त तो पहले ही बन गए थे।” राम मुस्कुराया। “और अब?” श्याम ने उसे गले लगाते हुए कहा, “अब तुम मेरे दोस्त नहीं… मेरे भाई हो।” राम ने हंसकर कहा, “लेकिन ऑफिस में दोस्त ही रहेंगे।” दोनों हंस पड़े। कभी दो अजनबी एक ही ऑफिस में मिले थे। फिर दोस्त बने। और आखिर में उन्हें पता चला कि जिस इंसान को वे अपना सबसे अच्छा दोस्त समझ रहे थे… वही इंसान उनका अपना सगा भाई था। कभी-कभी जिंदगी रिश्ते पहले नहीं बताती, बस लोगों को मिलाती है। रिश्ता बाद में सामने आता है।
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दो अजनबी भाई
पढ़ने का समय : 6 मिनट -
भूतिया गुड़िया (part-2)
पढ़ने का समय : 6 मिनटआरव की आँखें खुलीं तो सुबह हो चुकी थी।
उसकी माँ उसके पास बैठी थी और पिता डॉक्टर को बुलाने के लिए बाहर गए थे।
आरव ने घबराकर पूछा, “गुड़िया कहाँ है?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
आरव तुरंत उठकर कमरे में देखने लगा।
मेज खाली थी।
बिस्तर के नीचे कुछ नहीं था।
अलमारी बंद थी।
लेकिन दीवार पर लिखा हुआ वाक्य अब भी मौजूद था—
“मीरा अभी घर नहीं आई है…”
आरव ने काँपती आवाज़ में पूछा, “माँ, आपको ये दिखाई दे रहा है?”
माँ ने सिर हिला दिया।
“हाँ।”
उसी समय बाहर से किसी बच्चे के हँसने की आवाज़ आई।
दोनों ने खिड़की की तरफ देखा।
खिड़की के बाहर कोई नहीं था।
आरव ने उसी दिन गाँव के बुजुर्ग से मिलने का फैसला किया।
वही बूढ़ा आदमी, जिसने उसे हवेली के बारे में चेतावनी दी थी, गाँव के मंदिर के पास बैठा था।
आरव उसके सामने बैठ गया।
“बाबा, मुझे मीरा के बारे में बताइए।”
बूढ़े का चेहरा सफेद पड़ गया।
“तुमने उसे देख लिया?”
आरव ने सिर हिलाया।
“मैं उसकी गुड़िया घर ले आया था।”
बूढ़े ने अपना माथा पकड़ लिया।
“तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी।”
“मीरा कौन थी?”
बूढ़े ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहना शुरू किया।
लगभग पचास साल पहले काली हवेली में एक परिवार रहता था—ठाकुर रुद्र प्रताप, उनकी पत्नी सावित्री और उनकी सात साल की बेटी मीरा।
मीरा बहुत खुशमिजाज बच्ची थी।
उसके पास एक लाल फ्रॉक वाली गुड़िया थी, जिसका नाम उसने खुद “गुड़िया” रखा था।
लेकिन एक रात मीरा अचानक गायब हो गई।
पूरा गाँव उसे खोजने लगा।
तीन दिन बाद हवेली के बंद कमरे से उसकी आवाज़ सुनाई दी।
“माँ… मुझे बाहर निकालो…”
सावित्री ने कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाज़ा बाहर से नहीं, अंदर से बंद था।
जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो मीरा वहाँ नहीं थी।
सिर्फ उसकी गुड़िया कमरे के बीचोंबीच रखी थी।
और दीवार पर खून से लिखा था—
“वह खेलना चाहती है।”
उस दिन के बाद सावित्री पागल हो गई।
वह हर रात कहती थी कि मीरा उसके कमरे में आती है।
कुछ दिनों बाद सावित्री भी गायब हो गई।
ठाकुर रुद्र प्रताप ने हवेली छोड़ दी।
लेकिन जाने से पहले उन्होंने उस कमरे को हमेशा के लिए बंद कर दिया।
बूढ़े ने कहानी खत्म की।
आरव ने पूछा, “मीरा की मौत कैसे हुई?”
बूढ़े ने धीमे स्वर में कहा, “किसी को नहीं पता।”
“और गुड़िया?”
बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।
“गुड़िया को कभी हवेली से बाहर नहीं आना चाहिए था।”
आरव ने पूछा, “क्यों?”
बूढ़े ने जवाब दिया, “क्योंकि वह गुड़िया नहीं है।”
आरव चुप हो गया।
“वह मीरा का घर है।”
उस रात आरव ने गुड़िया को ढूँढने का फैसला किया।
वह घर के हर कमरे में खोजने लगा।
अचानक उसे ऊपर की मंजिल से हँसी सुनाई दी।
“ही… ही… ही…”
वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया।
गलियारे के आखिर में वही पुराना कमरा था।
दरवाज़ा खुला हुआ था।
अंदर गुड़िया कुर्सी पर बैठी थी।
आरव ने दूर से ही कहा, “तुम यहाँ कैसे आई?”
गुड़िया ने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी उसके पीछे कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
आरव ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।
दरवाज़ा नहीं खुला।
कमरे में अचानक ठंड बढ़ने लगी।
फिर एक बच्ची की आवाज़ आई—
“मेरे साथ खेलोगे?”
आरव ने पीछे देखा।
गुड़िया अब कुर्सी पर नहीं थी।
वह कमरे के कोने में खड़ी थी।
उसकी आँखें लाल थीं।
आरव ने दीवार पर देखा।
वहाँ अचानक एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।
तस्वीर में मीरा खड़ी थी।
उसके हाथ में वही गुड़िया थी।
लेकिन तस्वीर के पीछे एक और बच्ची दिखाई दे रही थी।
वह बच्ची मीरा जैसी ही दिखती थी।
आरव ने तस्वीर उतार ली।
पीछे लिखा था—
“मीरा अकेली नहीं थी।”
तभी कमरे में किसी के रोने की आवाज़ गूँजी।
“मुझे भी बाहर निकालो…”
आरव ने चारों तरफ देखा।
दीवार के पीछे से आवाज़ आ रही थी।
उसने दीवार पर हाथ मारा।
एक जगह खोखली आवाज़ आई।
आरव ने पास पड़ा लोहे का डंडा उठाया और दीवार तोड़ने लगा।
कुछ ही देर में दीवार में एक छोटा-सा छेद हो गया।
अंदर एक पुरानी लकड़ी की पेटी थी।
उसने पेटी बाहर निकाली।
पेटी खोलते ही उसके अंदर पुराने कागज़, एक चाँदी की पायल और बच्चों के कई बाल मिले।
सबसे नीचे एक डायरी थी।
डायरी सावित्री की थी।
आरव ने उसे पढ़ना शुरू किया।
पहले कुछ पन्नों में मीरा के बारे में सामान्य बातें थीं।
फिर एक पन्ने पर लिखा था—
“रुद्र ने मुझसे झूठ बोला। मीरा कमरे में अकेली नहीं थी।”
अगले पन्ने पर—
“वह बच्ची मीरा की बहन थी।”
आरव के हाथ काँपने लगे।
लेकिन मीरा की कोई बहन गाँव में कभी नहीं जानी गई थी।
अगले पन्ने पर लिखा था—
“उसका नाम तारा था।”
फिर एक और वाक्य—
“रुद्र ने तारा को कुएँ में धकेल दिया।”
आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
तभी कमरे के बाहर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।
धड़धड़धड़…
फिर अचानक सन्नाटा।
आरव ने गुड़िया की तरफ देखा।
गुड़िया जमीन पर पड़ी थी।
उसके पास दीवार पर ताजा खून से लिखा था—
“मीरा नहीं… तारा।”
आरव पीछे हटने लगा।
तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—
“तुमने मेरा नाम पढ़ लिया।”
आरव ने पलटकर देखा।
उसके सामने एक छोटी बच्ची खड़ी थी।
उसके बाल चेहरे पर बिखरे थे।
आँखें पूरी तरह काली थीं।
और उसके गले में वही चाँदी की पायल थी जो पेटी में रखी थी।
आरव चीख पड़ा।
बच्ची मुस्कुराई।
“अब तुम भी मेरे साथ खेलोगे।”
अचानक कमरे की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।
तेज हवा चलने लगी।
गुड़िया जमीन से उठकर हवा में तैरने लगी।
और फिर एक साथ दो आवाज़ें आईं—
“हम दोनों को घर चाहिए।”
आरव ने किसी तरह दरवाज़ा खोलकर भागना शुरू किया।
लेकिन नीचे पहुँचते ही उसने देखा—
पूरा घर बदल चुका था।
जहाँ पहले टूटी हुई हवेली थी, वहाँ अब रोशनी से भरा एक पुराना घर दिखाई दे रहा था।
दीवारों पर लोग चल रहे थे।
बच्चे खेल रहे थे।
और बीच में मीरा और तारा खड़ी थीं।
आरव समझ गया—
वह वर्तमान में नहीं था।
वह उस रात में पहुँच चुका था…
जिस रात दोनों बच्चियाँ गायब हुई थीं।
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😱भूतिया गुड़िया 😱 (part-1)
पढ़ने का समय : 5 मिनटउत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव देवगढ़ में एक पुरानी हवेली थी। गाँव के लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे। हवेली लगभग सौ साल पुरानी थी और पिछले बीस वर्षों से पूरी तरह खाली पड़ी थी।
कहते थे कि उस हवेली में रात के समय किसी बच्ची के रोने की आवाज़ आती थी।
कभी किसी को ऊपर की मंजिल पर किसी के चलने की आहट सुनाई देती, तो कभी बंद खिड़कियों के पीछे से एक छोटी बच्ची का चेहरा दिखाई देता।
लेकिन सबसे डरावनी बात थी—वह गुड़िया।
गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि हवेली के अंदर एक पुरानी गुड़िया रखी थी। वह साधारण गुड़िया नहीं थी। उसकी आँखें काँच की थीं, लेकिन रात में वे आँखें खुद-ब-खुद घूमती थीं।
लोगों का मानना था कि जिस दिन वह गुड़िया हवेली से बाहर निकली, उस दिन देवगढ़ में एक भयानक अनहोनी हुई थी।
कई सालों तक कोई हवेली के पास तक नहीं गया।
लेकिन फिर एक दिन शहर से आरव अपने माता-पिता के साथ देवगढ़ आया।
आरव की उम्र पच्चीस साल थी। वह पुराने मकानों और ऐतिहासिक जगहों की तस्वीरें खींचने का शौकीन था। उसके पिता ने गाँव के पास एक पुराना पुश्तैनी मकान खरीदा था, इसलिए परिवार कुछ समय के लिए देवगढ़ आया था।
गाँव में आते ही आरव ने काली हवेली के बारे में सुना।
उसने चाय की दुकान पर बैठे बूढ़े आदमी से पूछा, “बाबा, लोग उस हवेली में जाते क्यों नहीं?”
बूढ़े ने उसकी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, “क्योंकि जो वहाँ गया है, वह पहले जैसा वापस नहीं आया।”
आरव हँस पड़ा।
“बाबा, ये सब गाँव की कहानियाँ हैं।”
बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “कहानियाँ नहीं हैं बेटा। चेतावनी हैं।”
आरव ने बात मज़ाक में टाल दी।
उस रात लगभग ग्यारह बजे आरव अपने कमरे में बैठा तस्वीरें देख रहा था। तभी उसे खिड़की के बाहर से किसी बच्ची के हँसने की आवाज़ सुनाई दी।
“ही… ही… ही…”
आरव ने तुरंत खिड़की खोली।
बाहर अंधेरा था।
दूर काली हवेली दिखाई दे रही थी।
उसी समय उसे हवेली की दूसरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की-सी रोशनी दिखाई दी।
आरव की आँखें सिकुड़ गईं।
“वहाँ कोई है?”
रोशनी कुछ सेकंड बाद गायब हो गई।
अगली सुबह आरव ने तय कर लिया कि वह हवेली के अंदर जाएगा।
दोपहर में वह कैमरा लेकर हवेली पहुँच गया।
हवेली का मुख्य दरवाज़ा जंग लगा हुआ था। आरव ने जैसे ही उसे धक्का दिया, दरवाज़ा अपने आप चरमराते हुए खुल गया।
अंदर धूल की मोटी परत थी।
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। कई चित्रों के चेहरे खुरचे हुए थे।
आरव तस्वीरें लेने लगा।
तभी उसे ऊपर से कुछ गिरने की आवाज़ आई।
धड़ाम!
आरव रुक गया।
“कोई है?”
कोई जवाब नहीं आया।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
सीढ़ियों पर उसे छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।
धूल पर बने वे निशान किसी बच्चे के थे।
आरव ने कैमरे से उनकी तस्वीर खींची।
जैसे ही वह ऊपर पहुँचा, गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा दिखाई दिया।
दरवाज़े पर मोटी लोहे की जंजीर लगी थी।
लेकिन जंजीर जमीन पर पड़ी थी।
दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।
आरव ने दरवाज़ा धक्का देकर खोला।
कमरा अंधेरा था।
उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
कमरे में पुराने खिलौने पड़े थे।
टूटी हुई गाड़ियाँ।
लकड़ी के घोड़े।
एक पुराना पालना।
और कमरे के बीच में एक छोटी-सी कुर्सी।
उस कुर्सी पर बैठी थी—
एक गुड़िया।
गुड़िया बेहद पुरानी थी।
उसके सुनहरे बाल कंधों तक थे। उसने लाल रंग की पुरानी फ्रॉक पहन रखी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
लेकिन उसकी सबसे डरावनी चीज़ थीं उसकी आँखें।
दो बड़ी काली आँखें।
आरव उसके पास गया।
गुड़िया के गले में एक छोटा-सा लॉकेट था।
लॉकेट पर लिखा था—
“मीरा”
आरव ने कैमरा निकाला और उसकी तस्वीर खींची।
कैमरे की स्क्रीन देखते ही वह चौंक गया।
तस्वीर में गुड़िया कुर्सी पर नहीं थी।
वह कैमरे की तरफ देखकर खड़ी थी।
आरव ने दोबारा असली गुड़िया की तरफ देखा।
गुड़िया अभी भी कुर्सी पर बैठी थी।
उसने कैमरे की स्क्रीन फिर देखी।
अब तस्वीर में गुड़िया गायब थी।
आरव के हाथ काँपने लगे।
तभी पीछे से किसी बच्ची की आवाज़ आई।
“मेरी गुड़िया मुझे दे दो…”
आरव बिजली की तरह पलटा।
कमरे में कोई नहीं था।
उसने गुड़िया उठाई और तेजी से कमरे से बाहर निकल आया।
घर पहुँचकर उसने गुड़िया को अपने कमरे की मेज पर रख दिया।
उसकी माँ ने पूछा, “ये कहाँ से लाए?”
“पुरानी हवेली से मिली है। बहुत सुंदर है।”
माँ का चेहरा अचानक उतर गया।
“इसे वापस रख आओ।”
आरव हँसते हुए बोला, “माँ, आप भी गाँव वालों की बातों पर विश्वास करने लगीं?”
माँ ने गुड़िया को ध्यान से देखा।
“इसके गले में क्या लिखा है?”
“मीरा।”
माँ कुछ पल चुप रही।
फिर बोली, “आरव… इसे रात में कमरे से बाहर मत निकालना।”
उस रात आरव देर तक जागता रहा।
करीब दो बजे उसे लगा कि कमरे में कोई धीरे-धीरे चल रहा है।
टक… टक… टक…
उसने आँखें खोलीं।
गुड़िया मेज पर बैठी थी।
आरव ने राहत की साँस ली और फिर आँखें बंद कर लीं।
कुछ सेकंड बाद उसे किसी के फुसफुसाने की आवाज़ सुनाई दी।
“आरव…”
उसकी आँखें खुल गईं।
गुड़िया अब मेज पर नहीं थी।
वह उसके बिस्तर के पास जमीन पर खड़ी थी।
आरव का शरीर ठंडा पड़ गया।
गुड़िया की गर्दन धीरे-धीरे उसकी तरफ घूमी।
उसके होंठ हिले।
और फिर एक बच्ची की आवाज़ आई—
“तुम मुझे वापस क्यों नहीं ले गए?”
आरव चीखते हुए बिस्तर से गिर पड़ा।
सुबह जब उसकी माँ कमरे में आई, तो आरव बेहोश पड़ा था।
लेकिन गुड़िया गायब थी।
कमरे की खिड़की बंद थी।
दरवाज़ा अंदर से बंद था।
और दीवार पर लाल रंग से एक वाक्य लिखा था—
“मीरा अभी घर नहीं आई है…”
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चोटी चुड़ैल (Last part-3)
पढ़ने का समय : 6 मिनटअमावस्या की रात आ चुकी थी।
पूरा गाँव अंधेरे में डूबा हुआ था।
आसमान में चाँद का नामोनिशान नहीं था।
सौरभ अपने हाथ में लाल धागा, राधिका की गुड़िया और एक छोटी-सी चाकू जैसी धारदार वस्तु लिए बरगद के पेड़ की ओर बढ़ रहा था।
उसके साथ दीनानाथ बाबा भी थे।
हवा बिल्कुल शांत थी।
पेड़ के पास पहुँचते ही अचानक तापमान गिर गया।
सौरभ की साँस से धुआँ निकलने लगा।
बाबा ने कहा—
“यही जगह है।”
बरगद के तने पर लाल रंग के पुराने निशान बने हुए थे।
सौरभ ने गुड़िया जमीन पर रख दी।
अचानक पीछे से बच्चे की हँसी सुनाई दी।
“तुम आ गए।”
सौरभ पलटा।
राधिका पेड़ के नीचे खड़ी थी।
आज उसके बाल खुले हुए थे।
लाल फ्रॉक हवा में हिल रही थी।
लेकिन उसका चेहरा पहले से ज्यादा डरावना था।
“मुझे आजाद कर दो।”
सौरभ ने पूछा—
“कैसे?”
राधिका ने अपने हाथ की तरफ इशारा किया।
“तुम्हारा खून।”
सौरभ ने अपनी हथेली पर हल्का-सा कट लगाया।
खून की कुछ बूंदें गुड़िया पर गिराईं।
जैसे ही पहली बूंद गिरी, जमीन काँपने लगी।
बरगद के पेड़ से एक भयानक आवाज आई।
धड़ाम!
काली धुंध पूरे पेड़ को घेरने लगी।
बाबा पीछे हट गए।
“यह ठीक नहीं हो रहा!”
राधिका चीखी—
“भैरवनाथ आ गया!”
काली धुंध से एक विशाल आकृति बाहर निकली।
लंबे बाल।
काला चेहरा।
और लाल चमकती आँखें।
वह तांत्रिक की आत्मा थी।
“तुमने मुझे फिर धोखा दिया!”
राधिका काँपते हुए बोली—
“आज मैं तुझसे नहीं डरूँगी।”
भैरवनाथ ने हाथ उठाया।
पेड़ की जड़ें जमीन से बाहर निकलकर राधिका के पैरों से लिपट गईं।
सौरभ ने उसे छुड़ाने की कोशिश की।
लेकिन एक अदृश्य ताकत ने उसे पीछे फेंक दिया।
बाबा ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।
भैरवनाथ ने उनकी ओर देखा।
“बूढ़े… तुम्हारी वजह से ही यह आत्मा अब तक जीवित है।”
बाबा जमीन पर गिर पड़े।
सौरभ ने लाल धागा उठाया।
उसे याद आया कि डायरी में लिखा था—
“जिसे बाँधा गया है, उसे उसी बंधन से मुक्त किया जा सकता है।”
उसने लाल धागा बरगद की जड़ पर बाँध दिया।
भैरवनाथ चीख उठा।
“नहीं!”
सौरभ ने धागे को कसकर खींचा।
राधिका की आँखों से आँसू बहने लगे।
“सौरभ… मुझे याद है।”
“क्या?”
“जिस रात मैं मरी थी… तुम्हारे दादा मुझे बचाना चाहते थे।”
सौरभ स्तब्ध रह गया।
“लेकिन बाबा ने कहा था कि उन्होंने तुम्हें धोखा दिया।”
राधिका ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“फिर?”
“तांत्रिक ने सबको धोखा दिया था।”
भैरवनाथ गरजा—
“चुप!”
राधिका चीख पड़ी।
“मेरे मरने के बाद तुम्हारे दादा ने मुझे बचाने की कोशिश की थी। उन्होंने तांत्रिक को रोकने के लिए अपनी जान दे दी।”
सौरभ की आँखों में आँसू आ गए।
“तो फिर मेरे परिवार का दोष क्या था?”
राधिका ने उसकी तरफ देखा।
“डर।”
“डर?”
“उन्होंने सच सामने लाने की हिम्मत नहीं की।”
कुछ पल के लिए सब शांत हो गया।
फिर भैरवनाथ ने सौरभ की ओर झपट्टा मारा।
सौरभ जमीन पर गिर गया।
उसकी हथेली से खून निकल रहा था।
खून की एक बूंद बरगद की जड़ पर गिरी।
अचानक पूरा पेड़ लाल रोशनी से चमक उठा।
राधिका चीखी—
“यही है!”
सौरभ ने पूछा—
“क्या?”
“तुम्हारे खून ने बंधन तोड़ दिया है!”
पेड़ की जड़ें टूटने लगीं।
भैरवनाथ पीछे हटने लगा।
“नहीं!”
राधिका उसके सामने आ गई।
“आज मेरी मौत का हिसाब होगा।”
भैरवनाथ ने उसे पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन राधिका ने उसका हाथ पकड़ लिया।
दोनों के चारों तरफ काली आग जलने लगी।
कुछ ही क्षणों में भैरवनाथ की चीख पूरे जंगल में गूँज उठी।
फिर सब शांत हो गया।
राधिका जमीन पर खड़ी थी।
अब उसका चेहरा डरावना नहीं था।
वह एक सामान्य छोटी बच्ची जैसी लग रही थी।
उसने सौरभ को देखा और मुस्कुराई।
“धन्यवाद।”
सौरभ ने पूछा—
“अब तुम चली जाओगी?”
राधिका ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“फिर कभी नहीं आओगी?”
वह मुस्कुराई।
“अगर कोई मुझे याद रखेगा, तो मैं कभी पूरी तरह नहीं जाऊँगी।”
इतना कहकर उसके शरीर से हल्की सफेद रोशनी निकलने लगी।
कुछ ही सेकंड में वह रोशनी आसमान में विलीन हो गई।
बरगद का पेड़ सूखकर गिर पड़ा।
सुबह गाँव वालों ने देखा कि वर्षों से बंद पड़ा मंदिर भी टूट चुका था।
दीनानाथ बाबा ने सबको राधिका की पूरी कहानी बताई।
गाँव वालों ने बरगद के पास उसकी याद में एक छोटा-सा मंदिर बनवा दिया।
कुछ महीनों तक सब ठीक रहा।
सौरभ भी अपनी सामान्य जिंदगी में लौट आया।
लेकिन एक रात…
वह अपने कमरे में सो रहा था।
समय था—
3:03 AM
अचानक उसकी खिड़की पर आवाज हुई।
टक… टक…
सौरभ की आँख खुल गई।
उसने धीरे से खिड़की की तरफ देखा।
बाहर कोई नहीं था।
फिर आवाज आई—
टक… टक… टक…
सौरभ बिस्तर से उठा।
खिड़की के शीशे पर भाप जमने लगी।
धीरे-धीरे उस पर छोटे अक्षर दिखाई देने लगे।
“सौरभ…”
उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
फिर एक और शब्द लिखा—
“पीछे देखो।”
सौरभ ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
कमरे के कोने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।
लाल फ्रॉक।
लंबे बाल।
लेकिन इस बार वह राधिका नहीं थी।
उस बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—
“मैं राधिका नहीं हूँ।”
सौरभ के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
“तो तुम कौन हो?”
बच्ची ने सिर टेढ़ा किया।
“मैं उसकी छोटी बहन हूँ।”
सौरभ ने घबराकर पूछा—
“लेकिन राधिका की कोई बहन नहीं थी!”
बच्ची की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
उसकी आँखें धीरे-धीरे काली होने लगीं।
“अब है।”
कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।
अंधेरे में उसकी आवाज गूँजी—
“और मेरी कहानी अभी शुरू हुई है।”
फिर…
टक… टक… टक…
खिड़की पर दस्तक हुई।
सौरभ ने आँखें बंद कर लीं।
जब उसने आँखें खोलीं…
कमरा खाली था।
लेकिन उसकी मेज पर एक नई लाल फ्रॉक रखी थी।
उस फ्रॉक के ऊपर एक कागज पड़ा था।
उस पर लिखा था—
“अगली अमावस्या को मिलना, सौरभ।”
और नीचे एक छोटी-सी मुस्कान बनी थी।
“तुम्हारी नई चुड़ैल।”
End
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चोटी चुड़ैल (part-2)
पढ़ने का समय : 6 मिनटसौरभ ने दीनानाथ बाबा की बात सुनकर पूछा—
“मेरे परिवार को जानता है?”
बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया।
बाहर फिर दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
सौरभ दरवाजे की तरफ बढ़ा।
बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“दरवाजा मत खोलना।”
“लेकिन बाहर कौन है?”
“वही… जिसका नाम लेना भी ठीक नहीं।”
अचानक बाहर से एक बच्चे की आवाज आई—
“सौरभ…”
सौरभ जम गया।
वही छोटी लड़की।
“मुझे पता है तुम अंदर हो।”
फिर हँसी सुनाई दी।
“बाहर आओ।”
बाबा ने कमरे की सारी लाइटें बंद कर दीं।
कुछ देर बाद दस्तक बंद हो गई।
सौरभ ने पूछा—
“बाबा, राधिका को किसने मारा था?”
बाबा ने गहरी साँस ली।
“करीब बीस साल पहले इस गाँव में एक तांत्रिक आया था। उसका नाम भैरवनाथ था।”
“तांत्रिक?”
“हाँ। वह दावा करता था कि वह आत्माओं को बुला सकता है।”
बाबा ने बताया कि राधिका के माता-पिता बहुत गरीब थे। एक रात राधिका अचानक गायब हो गई।
गाँव वालों ने खोज शुरू की।
अगली सुबह वह बरगद के पेड़ के पास मिली।
लेकिन उसके शरीर पर चोट के निशान थे।
गाँव के लोगों ने तांत्रिक पर शक किया।
लेकिन वह उसी रात गाँव छोड़कर चला गया।
“फिर लोग राधिका को चुड़ैल क्यों कहने लगे?”
बाबा ने कहा—
“क्योंकि उसकी आत्मा शांत नहीं हुई।”
“क्या उसने लोगों को नुकसान पहुँचाया?”
“नहीं।”
सौरभ चौंका।
“फिर?”
“वह सिर्फ उन लोगों के सामने आती थी जो उसकी मौत का सच जानते थे।”
सौरभ को कुछ याद आया।
“आप सच जानते हैं?”
बाबा ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“क्या हुआ था उस रात?”
बाबा की आँखों से आँसू निकल आए।
“मैं वहाँ था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“मैंने देखा था कि राधिका को तांत्रिक के पास ले जाया गया था।”
“किसने?”
बाबा ने सौरभ की ओर देखा।
“तुम्हारे दादा ने।”
सौरभ पीछे हट गया।
“मेरे दादा?”
“हाँ।”
सौरभ को विश्वास नहीं हुआ।
“लेकिन क्यों?”
“तुम्हारे दादा चाहते थे कि तांत्रिक तुम्हारे पिता की बीमारी ठीक कर दे।”
“और बदले में?”
“तांत्रिक ने एक मासूम बच्चे की बलि माँगी।”
सौरभ की आँखें फैल गईं।
“नहीं…”
“राधिका को उसी रात वहाँ लाया गया।”
बाबा की आवाज टूट गई।
“लेकिन राधिका की बलि नहीं दी गई। उसने भागने की कोशिश की। तांत्रिक ने उसे पकड़ लिया।”
“फिर?”
“मैं डर गया था। मैं भाग आया।”
कुछ देर बाद सौरभ ने पूछा—
“मेरे दादा?”
बाबा ने कहा—
“वह भी अगले दिन गायब हो गए।”
तभी कमरे के कोने से छोटी लड़की की हँसी सुनाई दी।
दोनों ने उधर देखा।
राधिका खड़ी थी।
वह सौरभ को देख रही थी।
“तुम्हारे दादा ने मुझे मारा नहीं था।”
सौरभ ने धीरे से पूछा—
“तो फिर किसने?”
राधिका ने अपना हाथ उठाया।
उसकी उंगली गाँव के पुराने मंदिर की तरफ थी।
“वहाँ।”
अगले ही पल वह गायब हो गई।
सौरभ और बाबा मंदिर की ओर निकल पड़े।
मंदिर वर्षों से बंद पड़ा था।
दरवाजा खोलते ही अंदर से सड़ी हुई गंध आई।
दीवारों पर पुराने तांत्रिक चिन्ह बने थे।
एक कोने में लकड़ी का संदूक रखा था।
सौरभ ने संदूक खोला।
अंदर एक पुरानी डायरी थी।
उस पर लिखा था—
भैरवनाथ।
सौरभ ने डायरी खोली।
पहले कुछ पन्नों पर अजीब मंत्र और तंत्र की बातें थीं।
फिर एक जगह राधिका का नाम लिखा था।
“यह लड़की मेरी साधना के लिए उपयुक्त है।”
सौरभ के हाथ काँपने लगे।
अगले पन्ने पर लिखा था—
“लेकिन बलि पूरी नहीं हुई।”
और आखिरी पन्ने पर—
“उसकी आत्मा को बरगद से बाँध दिया गया है।”
सौरभ ने बाबा की तरफ देखा।
“इसका मतलब?”
बाबा ने कहा—
“राधिका की आत्मा उस पेड़ से बंधी है।”
“उसे मुक्त कैसे किया जाए?”
बाबा ने डायरी के आखिरी पन्ने को देखा।
उसमें तीन चीजें लिखी थीं—
लाल धागा।
राधिका की गुड़िया।
और उस व्यक्ति का खून जिसने उसे धोखा दिया।
सौरभ समझ गया।
“जिसने उसे धोखा दिया… वह मेरे दादा थे?”
बाबा ने सिर हिलाया।
“लेकिन वे तो मर चुके हैं।”
तभी मंदिर के पीछे से आवाज आई—
“उनका खून अभी भी जिंदा है।”
सौरभ और बाबा ने पीछे देखा।
राधिका वहाँ खड़ी थी।
उसके हाथ में एक पुरानी गुड़िया थी।
वह गुड़िया सौरभ की तरफ बढ़ाते हुए बोली—
“तुम्हारे खून से ही मैं आजाद हो सकती हूँ।”
सौरभ पीछे हट गया।
“मेरा खून?”
राधिका ने सिर हिलाया।
“तुम्हारे दादा का खून तुम्हारे अंदर है।”
अचानक मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।
टन… टन… टन…
बाबा ने सौरभ को खींच लिया।
“भागो!”
लेकिन मंदिर का दरवाजा बंद हो चुका था।
दीवारों से काली परछाइयाँ निकलने लगीं।
राधिका का चेहरा बदलने लगा।
उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो गईं।
उसने चीखते हुए कहा—
“मुझे आजाद करो!”
सौरभ ने देखा कि उसके पीछे एक लंबी काली आकृति खड़ी थी।
वह राधिका से भी ज्यादा डरावनी थी।
बाबा चीख पड़े—
“भैरवनाथ!”
वह तांत्रिक की आत्मा थी।
उसने राधिका की गर्दन पकड़ ली।
“तू मेरी साधना अधूरी छोड़कर भागी थी।”
राधिका चीखने लगी।
सौरभ ने मंदिर में पड़ा लोहे का त्रिशूल उठाया और उस काली आकृति की ओर बढ़ा।
“उसे छोड़ दो!”
भैरवनाथ हँसा।
“तुम्हें लगता है तुम मुझे रोक सकते हो?”
उसने हाथ उठाया।
सौरभ हवा में उठ गया।
तभी राधिका ने अपनी पूरी ताकत से तांत्रिक को पीछे धकेल दिया।
“भागो, सौरभ!”
“लेकिन तुम?”
“मैं बाद में आऊँगी।”
मंदिर का दरवाजा अचानक खुल गया।
सौरभ और बाबा बाहर भागे।
पीछे से भयानक चीख सुनाई दी।
मंदिर की दीवारें काँप रही थीं।
सौरभ ने पलटकर देखा।
राधिका दरवाजे पर खड़ी थी।
उसने आखिरी बार कहा—
“कल अमावस्या है।”
“उस रात मेरा फैसला होगा।”
फिर दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
बाबा ने सौरभ की तरफ देखा।
“हमें कल रात बरगद के पेड़ के पास जाना होगा।”
“और अगर नहीं गए?”
बाबा ने डरते हुए कहा—
“तो राधिका कभी आजाद नहीं होगी।”
सौरभ ने पूछा—
“और अगर गए?”
बाबा ने दूर अंधेरे में देखा।
“तो शायद हममें से कोई भी वापस नहीं आएगा।”
उसी रात सौरभ के घर की दीवार पर लाल अक्षरों में तीन शब्द उभर आए—
“अमावस्या का इंतजार।”
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😱 चोटी चुड़ैल 😱 part -1
पढ़ने का समय : 5 मिनटरात के करीब बारह बज रहे थे।
सौरभ अपनी बाइक से गाँव की सुनसान सड़क पर चला जा रहा था। शहर से गाँव तक का रास्ता करीब पैंतीस किलोमीटर का था, लेकिन उस रात उसे यह रास्ता पहले से कहीं ज्यादा लंबा लग रहा था।
आसमान पर बादल छाए हुए थे।
चाँद कभी बादलों के पीछे छिप जाता और कभी अचानक निकलकर सड़क को हल्की सफेद रोशनी से भर देता।
सौरभ ने बाइक की रफ्तार थोड़ी बढ़ा दी।
तभी उसकी नजर सड़क के किनारे लगे एक पुराने बरगद के पेड़ पर पड़ी।
पेड़ के नीचे कोई बच्ची खड़ी थी।
सौरभ ने बाइक धीमी कर दी।
बच्ची की उम्र मुश्किल से आठ या नौ साल होगी।
उसने लाल रंग की पुरानी-सी फ्रॉक पहन रखी थी।
उसके बाल बहुत लंबे थे और चेहरा बालों से आधा ढका हुआ था।
सौरभ ने बाइक रोक दी।
“बेटा… इतनी रात को यहाँ अकेली क्या कर रही हो?”
बच्ची ने कोई जवाब नहीं दिया।
सौरभ ने चारों तरफ देखा।
आसपास कोई घर नहीं था।
सिर्फ जंगल, खेत और वह पुराना बरगद का पेड़।
“तुम्हारा घर कहाँ है?”
बच्ची ने धीरे से हाथ उठाया और सड़क के दूसरी तरफ इशारा किया।
“वहाँ।”
सौरभ ने उस दिशा में देखा।
अंधेरे में एक टूटा हुआ मकान दिखाई दे रहा था।
“चलो, मैं छोड़ देता हूँ।”
बच्ची ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“क्यों?”
उसने पहली बार अपना चेहरा ऊपर उठाया।
उसकी आँखें बिल्कुल काली थीं।
सौरभ का दिल जोर से धड़कने लगा।
बच्ची मुस्कुराई।
“आप मुझे घर नहीं छोड़ सकते।”
“क्यों?”
उसने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“क्योंकि मेरा घर अब वहाँ नहीं है।”
सौरभ कुछ समझ नहीं पाया।
अचानक तेज हवा चली।
पेड़ की शाखाएँ जोर-जोर से हिलने लगीं।
सौरभ ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं।
जब उसने दोबारा देखा…
बच्ची गायब थी।
वहाँ सिर्फ उसकी लाल फ्रॉक का एक छोटा-सा टुकड़ा पड़ा था।
सौरभ ने तुरंत बाइक स्टार्ट की और गाँव की ओर निकल गया।
घर पहुँचने के बाद भी वह घटना उसके दिमाग से नहीं निकली।
उसने माँ को सब कुछ बताया।
माँ का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“कहाँ देखा उसे?”
“पुराने बरगद के पास।”
माँ कुछ सेकंड चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“तुमने उससे बात की?”
“हाँ।”
“उसने तुम्हें छुआ तो नहीं?”
“नहीं।”
माँ ने राहत की साँस ली।
“भगवान का शुक्र है।”
सौरभ ने पूछा—
“आप उसे जानती हैं?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
“माँ?”
“उस पेड़ के पास दोबारा मत जाना।”
“लेकिन क्यों?”
माँ ने धीमी आवाज में कहा—
“क्योंकि वहाँ एक छोटी लड़की मरी थी।”
सौरभ चौंक गया।
“कैसे?”
“करीब बीस साल पहले। उसका नाम राधिका था।”
“क्या हुआ था उसे?”
माँ ने दरवाजा बंद कर दिया।
“कहते हैं कि वह रात में घर से निकल गई थी। सुबह उसका शव उसी बरगद के पेड़ से लटका मिला।”
सौरभ की रीढ़ में ठंड दौड़ गई।
“लेकिन लोग उसे चुड़ैल क्यों कहते हैं?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि उसकी मौत के बाद गाँव में बच्चों के गायब होने की घटनाएँ शुरू हो गई थीं।”
सौरभ चुप हो गया।
उसी रात करीब तीन बजे उसे नींद खुली।
कमरे में अजीब ठंड थी।
उसने मोबाइल देखा।
3:03 AM
तभी खिड़की पर हल्की आवाज हुई।
टक… टक…
सौरभ ने ध्यान नहीं दिया।
फिर आवाज आई—
टक… टक… टक…
उसने पर्दा हटाया।
खिड़की के बाहर वही छोटी लड़की खड़ी थी।
सौरभ के मुँह से चीख निकलते-निकलते रह गई।
बच्ची मुस्कुरा रही थी।
उसने शीशे पर अपनी उंगली से कुछ लिखा।
सौरभ ने गौर से देखा।
शीशे पर भाप जम गई थी।
और उस पर लिखा था—
“मुझे ढूँढो।”
सौरभ पीछे हट गया।
अचानक लड़की ने अपना सिर एक तरफ झुका लिया।
उसकी गर्दन असामान्य तरीके से मुड़ गई।
फिर उसने अपना हाथ उठाया और घर के पीछे की तरफ इशारा किया।
सौरभ ने खिड़की से बाहर देखा।
वहाँ अंधेरे में एक पुराना कुआँ था।
उसे अचानक लगा कि कोई उसे बुला रहा है।
“सौरभ…”
वह आवाज लड़की की थी।
“सौरभ… मुझे वहाँ से निकालो…”
सौरभ ने खिड़की बंद कर दी।
सुबह जब उसने खिड़की खोली, वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान बने हुए थे।
वे निशान खिड़की से शुरू होकर उसके बिस्तर तक जा रहे थे।
और बिस्तर के पास आकर खत्म हो रहे थे।
उस रात सौरभ ने तय कर लिया कि वह इस रहस्य का पता लगाएगा।
शाम होते ही वह गाँव के सबसे बुजुर्ग आदमी, दीनानाथ बाबा, के पास पहुँचा।
बाबा ने राधिका का नाम सुनते ही सौरभ को घूरकर देखा।
“तुमने उसे देख लिया?”
“हाँ।”
बाबा ने सिर झुका लिया।
“फिर अब वह तुम्हें भी देख चुकी है।”
“मुझे क्या करना चाहिए?”
बाबा ने एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर में एक छोटी लड़की खड़ी थी।
वही लाल फ्रॉक।
वही लंबे बाल।
वही चेहरा।
सौरभ ने तस्वीर हाथ में लेते हुए पूछा—
“इसके साथ हुआ क्या था?”
बाबा ने कहा—
“राधिका चुड़ैल नहीं थी।”
सौरभ ने हैरानी से पूछा—
“तो फिर?”
बाबा की आँखें भर आईं।
“उसे चुड़ैल बनाया गया था।”
“किसने?”
बाबा ने जवाब नहीं दिया।
तभी बाहर किसी बच्चे के हँसने की आवाज आई।
दोनों ने दरवाजे की ओर देखा।
दरवाजे के नीचे से एक लाल फ्रॉक का टुकड़ा अंदर सरक आया।
और उसके साथ एक छोटी-सी आवाज आई—
“बाबा… झूठ मत बोलो।”
दीनानाथ बाबा का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने सौरभ का हाथ पकड़ लिया।
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
“क्यों?”
बाबा ने काँपते हुए कहा—
“क्योंकि राधिका को मारने वाला अभी भी जिंदा है।”
उसी क्षण घर के बाहर से जोरदार दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
बाबा ने फुसफुसाकर कहा—
“और वह आदमी… तुम्हारे परिवार को जानता है।”
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SATVI RAAT KA SHRAP (LAST PART-3)
पढ़ने का समय : 7 मिनटसौरभ की नजर खिड़की पर जमी हुई थी।
उसकी माँ वहाँ खड़ी थीं।
लेकिन वह उसकी माँ नहीं थीं।
काली आँखें।
सफेद चेहरा।
और होंठों पर ऐसी मुस्कान, जिसे देखकर सौरभ के शरीर का हर रोम काँप उठा।
उसके पीछे उसके पिता की परछाईं खड़ी थी।
“सौरभ,” आवाज आई, “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”
“पापा… आप?”
“मैं मर चुका हूँ।”
सौरभ की आँखों से आँसू निकल आए।
“फिर आप यहाँ कैसे?”
“क्योंकि मौत के बाद भी कुछ वादे खत्म नहीं होते।”
“मुझे सब सच बताइए।”
परछाईं कुछ देर शांत रही।
फिर उसने कहा—
“पंद्रह साल पहले तुम्हारे पिता, आरव के पिता और कुछ दूसरे लोगों ने इस मकान में एक पुरानी रस्म के बारे में पढ़ा था। उनका मानना था कि इस रस्म से इंसान को मृत्यु से बचाया जा सकता है।”
“उन्होंने क्या किया?”
“उन्होंने मौत को बुलाने की कोशिश की।”
सौरभ ने डरते हुए पूछा—
“और?”
“मौत आई… लेकिन वह किसी एक व्यक्ति को लेने नहीं आई। उसने कहा कि जिस परिवार ने उसे बुलाया है, उसकी एक पीढ़ी उसे देनी होगी।”
सौरभ की साँस अटक गई।
“फिर आपने क्या किया?”
“हमने सौदा करने की कोशिश की।”
“किसके साथ?”
परछाईं ने सामने खड़ी बूढ़ी औरत की ओर देखा।
“उससे।”
सौरभ ने औरत की तरफ देखा।
वह शांत खड़ी थी।
“वह इंसान नहीं है?”
“नहीं।”
“फिर कौन है?”
“मौत की रखवाली करने वाली।”
बूढ़ी औरत हँसी।
“तुम्हारे पिता ने मुझे धोखा दिया था, सौरभ। उन्होंने तुम्हें शहर भेज दिया और सोचा कि मैं तुम्हें भूल जाऊँगी।”
सौरभ ने पूछा—
“आपको मुझसे क्या चाहिए?”
“तुम्हारा जीवन।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हारे बदले अपनी जान दी थी। लेकिन सौदा पूरा नहीं हुआ।”
सौरभ के पिता की परछाईं बोली—
“मैंने उसे रोकने के लिए खुद को दे दिया था। लेकिन वह जानती थी कि एक दिन तुम वापस आओगे।”
“तो मैं क्या करूँ?”
परछाईं ने धीरे से कहा—
“मौत का दरवाजा बंद करो।”
“कैसे?”
“तीन दस्तकें पूरी होने से पहले।”
सौरभ ने पुराने मकान की तरफ देखा।
“लेकिन दो दस्तक तो हो चुकी हैं।”
“हाँ।”
“और तीसरी?”
परछाईं ने सिर झुका लिया।
“तीसरी दस्तक तुम खुद दोगे।”
सौरभ समझ नहीं पाया।
तभी बूढ़ी औरत ने अपनी हथेली खोली।
उसमें एक पुरानी चाबी थी।
“इसे लो।”
सौरभ ने चाबी नहीं ली।
“किसकी है?”
“उस कमरे की, जिसे तुम्हारे पिता ने कभी नहीं खोला।”
सौरभ ने ऊपर देखा।
वही कमरा।
जिसके दरवाजे पर लिखा था—
“इसे कभी मत खोलना।”
बूढ़ी औरत ने कहा—
“अगर तुमने दरवाजा खोला, तो तुम्हें अपनी माँ मिल जाएगी।”
“और अगर नहीं खोला?”
“तो तुम्हारी माँ हमेशा के लिए मेरे साथ रहेगी।”
सौरभ ने चाबी उठा ली।
वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।
हर कदम के साथ घर की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।
“सौरभ…”
“वापस जाओ…”
“दरवाजा मत खोलना…”
लेकिन वह आगे बढ़ता रहा।
ऊपर पहुँचकर उसने दरवाजे में चाबी लगाई।
चाबी घूम गई।
दरवाजा खुला।
अंदर एक छोटा-सा कमरा था।
बीच में लकड़ी की कुर्सी पर उसकी माँ बैठी थीं।
उनके हाथ बंधे थे।
सौरभ दौड़कर उनके पास गया।
“माँ!”
उन्होंने सिर उठाया।
“सौरभ… भाग जाओ।”
“मैं आपको लेने आया हूँ।”
“मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ।”
सौरभ रुक गया।
“क्या?”
उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
“सौरभ, मैं तुम्हारी माँ हूँ… लेकिन मेरे अंदर अब कुछ और भी है।”
कमरे की दीवारें काँपने लगीं।
पीछे से बूढ़ी औरत की आवाज आई—
“अब तीसरी दस्तक का समय है।”
दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
ठक…
सौरभ ने दरवाजे की ओर देखा।
ठक…
उसकी माँ ने चीखकर कहा—
“मत खोलना!”
फिर तीसरी आवाज आने वाली थी।
सौरभ ने अचानक पिता की डायरी याद की।
“जो व्यक्ति तीसरी दस्तक के बाद दरवाजा खोलता है, वह वापस नहीं लौटता।”
उसने कमरे में चारों तरफ देखा।
दीवार पर वही निशान बना था, जो तस्वीर के पीछे था।
एक गोल घेरे के अंदर तीन रेखाएँ।
उसे समझ आया।
मौत का दरवाजा कोई साधारण दरवाजा नहीं था।
वह पूरा कमरा ही दरवाजा था।
और उस दरवाजे को बंद करने के लिए किसी को अंदर रहना था।
सौरभ ने अपनी माँ की रस्सियाँ खोल दीं।
“माँ, आप बाहर जाएँ।”
“और तुम?”
“मैं इसे खत्म करूँगा।”
“नहीं!”
सौरभ ने दरवाजा खोला और माँ को बाहर धकेल दिया।
बूढ़ी औरत गलियारे में खड़ी थी।
वह मुस्कुराई।
“बहुत अच्छा।”
“अब मेरा क्या होगा?”
“तुम्हें मेरे साथ आना होगा।”
सौरभ ने दरवाजा बंद कर दिया।
अंदर पूरी तरह अंधेरा हो गया।
कुछ सेकंड बाद—
ठक… ठक… ठक…
तीसरी दस्तक पूरी हो चुकी थी।
लेकिन सौरभ ने दरवाजा नहीं खोला।
वह कमरे के बीच खड़ा होकर पिता की डायरी से वह आखिरी मंत्र पढ़ने लगा, जो आखिरी पन्ने पर लिखा था।
हवा तेज हो गई।
दीवारों से चीखें आने लगीं।
किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया—
“तुम अपने पिता जैसे ही हो।”
सौरभ ने आँखें बंद कर लीं।
“लेकिन मैं उनका सौदा पूरा करने नहीं आया।”
अचानक कमरे के बीच एक काला दरवाजा दिखाई दिया।
उसके पीछे अनगिनत चेहरे थे।
कुछ बूढ़े।
कुछ जवान।
कुछ बच्चे।
और सबसे आगे—
आरव।
वह सौरभ को देखकर मुस्कुराया।
“अब इसे बंद कर दो।”
सौरभ ने आगे बढ़कर दरवाजे को धक्का दिया।
लेकिन वह बंद नहीं हुआ।
तभी उसे पिता की आवाज सुनाई दी—
“दरवाजा बाहर से नहीं, अंदर से बंद होता है।”
सौरभ समझ गया।
उसे उस दरवाजे के दूसरी तरफ जाना था।
उसने आखिरी बार अपनी माँ के बारे में सोचा।
फिर वह दरवाजे के अंदर चला गया।
अगले ही पल—
पूरा मकान हिलने लगा।
बाहर खड़ी उसकी माँ ने देखा कि पुराना मकान आग के बिना ही जलने लगा।
कुछ ही सेकंड में वह धुएँ में बदल गया।
सुबह तक वहाँ केवल जली हुई जमीन बची थी।
सौरभ नहीं मिला।
पुलिस आई।
मकान की तलाशी हुई।
कुछ नहीं मिला।
सिर्फ एक पुरानी काली डायरी मिली।
उसके आखिरी पन्ने पर एक नई लाइन लिखी थी—
“दरवाजा बंद हो चुका है।”
पंद्रह साल बाद तक उस कस्बे में उस मकान का नाम कोई नहीं लेता था।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
कई साल बाद, एक रात सौरभ की माँ अपने घर में अकेली बैठी थीं।
रात के ठीक 2:13 बजे दरवाजे पर आवाज हुई।
ठक… ठक… ठक…
वह डर गईं।
उन्होंने दरवाजे के पास जाकर पूछा—
“कौन?”
बाहर से कोई जवाब नहीं आया।
फिर आवाज आई—
ठक… ठक… ठक…
माँ की आँखों में आँसू आ गए।
“सौरभ?”
कुछ देर खामोशी रही।
फिर बाहर से एक धीमी आवाज आई—
“माँ… दरवाजा मत खोलना।”
माँ पीछे हट गईं।
लेकिन तभी दरवाजे के नीचे से एक पुरानी काली डायरी अंदर सरक आई।
माँ ने काँपते हाथों से उसे उठाया।
डायरी अपने आप खुल गई।
आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“मैंने मौत का दरवाजा बंद कर दिया था।”
नीचे एक और वाक्य दिखाई दिया।
स्याही अभी गीली थी।
“लेकिन माँ… किसी ने अंदर से उसे फिर खोल दिया है।”
और उसी क्षण—
घर के अंदर, ठीक उनके पीछे…
ठक… ठक… ठक…
दस्तक हुई।
माँ ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
कमरे के बीच एक काला दरवाजा खड़ा था।
उस दरवाजे के पीछे सौरभ खड़ा था।
लेकिन उसके चेहरे पर इंसानी मुस्कान नहीं थी।
उसने धीरे से कहा—
“माँ… अब मेरी बारी खत्म हुई।”
एक पल की खामोशी।
फिर उसने मुस्कुराकर कहा—
“अब आपकी बारी है।”
End
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😱 SATVI RAAT KA SHRAP😱 (part-2)
पढ़ने का समय : 6 मिनटकमरे में अंधेरा था।
सौरभ अपनी माँ का हाथ पकड़े खड़ा था। बाहर से आती ठंडी हवा के साथ दरवाजे के नीचे से धुआँ-सा अंदर घुस रहा था।
फिर अचानक लाइट वापस जल गई।
दरवाजे के बाहर कोई नहीं था।
माँ ने काँपते हुए पूछा—
“वो चली गई?”
सौरभ ने जवाब नहीं दिया।
उसकी नजर दरवाजे पर थी।
दरवाजे की लकड़ी पर तीन गहरे निशान बने हुए थे।
जैसे किसी ने नुकीले नाखूनों से उसे खरोंचा हो।
माँ ने तुरंत कहा—
“इस घर से दूर रहो, सौरभ।”
“लेकिन मुझे सच जानना है।”
“कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें जानने के बाद इंसान पहले जैसा नहीं रहता।”
सौरभ ने तस्वीर जेब में रख ली।
अगली सुबह वह सीधे पुराने मकान की तरफ निकल गया।
दिन का उजाला था, फिर भी मकान अजीब लग रहा था।
मुख्य दरवाजा बंद था।
लेकिन इस बार ताला बाहर नहीं लगा था।
सौरभ ने दरवाजा धक्का देकर खोला।
अंदर धूल की मोटी परत थी।
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। कुछ जगहों पर मकड़ी के जाले थे।
लेकिन सबसे अजीब बात थी—
घर के अंदर धूल के बीच पैरों के निशान बने हुए थे।
एक छोटे बच्चे के पैरों के निशान।
वे सीढ़ियों से ऊपर जा रहे थे।
सौरभ ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई और उनके पीछे चल पड़ा।
ऊपर एक लंबा गलियारा था।
गलियारे के अंत में एक दरवाजा था।
दरवाजे पर मोटे अक्षरों में लिखा था—
“इसे कभी मत खोलना।”
सौरभ ने दरवाजे को छुआ।
उसी समय उसके मोबाइल की स्क्रीन अपने आप बंद हो गई।
और पीछे से बच्चे की आवाज आई—
“आप भी आए हो?”
सौरभ तेजी से पलटा।
गलियारा खाली था।
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
फिर वही आवाज—
“मुझे बाहर निकाल दो।”
सौरभ का दिल जोर से धड़कने लगा।
आवाज उस बंद कमरे के अंदर से आ रही थी।
उसने दरवाजे के पास कान लगाया।
अंदर से हल्की सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं।
“कौन हो तुम?”
“मैं… आरव हूँ।”
सौरभ को तस्वीर में दिख रहा बच्चा याद आया।
“तुम इस घर में रहते थे?”
“हाँ।”
“तुम्हारे परिवार को क्या हुआ था?”
कुछ देर तक खामोशी रही।
फिर बच्चे ने कहा—
“हमने दरवाजा खोला था।”
सौरभ ने पूछा—
“कौन सा दरवाजा?”
अंदर से उत्तर आया—
“मौत का।”
अचानक दरवाजा जोर से हिलने लगा।
धड़ाम!
सौरभ पीछे गिर गया।
अंदर से किसी औरत के चीखने की आवाज आई—
“भागो!”
सौरभ उठकर नीचे भागा।
जैसे ही वह मुख्य दरवाजे तक पहुँचा, उसने देखा कि दरवाजा गायब था।
उसकी जगह केवल एक खाली दीवार थी।
“नहीं…!”
उसने दीवार को पीटना शुरू कर दिया।
तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
सौरभ ने डरकर पलटकर देखा।
एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।
सफेद साड़ी।
पीला चेहरा।
गहरी काली आँखें।
और होंठों पर हल्की मुस्कान।
“तुम्हें दरवाजा नहीं मिल रहा?”
सौरभ पीछे हट गया।
“तुम कौन हो?”
वह औरत मुस्कुराई।
“जिसे तुम्हारे परिवार ने पंद्रह साल पहले धोखा दिया था।”
“मेरे परिवार ने?”
“तुम्हारे पिता जानते थे।”
सौरभ के चेहरे का रंग उड़ गया।
“क्या जानते थे?”
औरत ने अपनी उंगली होंठों पर रखी।
“आज रात… अपने पिता की पुरानी डायरी पढ़ना।”
अगले ही पल वह गायब हो गई।
और मुख्य दरवाजा वापस अपनी जगह पर था।
सौरभ भागकर घर पहुँचा।
उसने माँ से पिता की डायरी के बारे में पूछा।
माँ ने बहुत मना किया।
लेकिन आखिरकार उन्होंने एक पुराना संदूक खोला।
उसमें कपड़ों के नीचे एक काली डायरी रखी थी।
सौरभ ने डायरी खोली।
पहले कई पन्नों पर सामान्य बातें थीं।
फिर एक पन्ने पर लिखा था—
“13 दिसंबर 2011”
“आज हम उस मकान में पहुँचे। स्थानीय लोग कहते हैं कि घर अशुभ है। लेकिन हमें विश्वास नहीं।”
अगला पन्ना।
“आज रात पहली बार दस्तक सुनाई दी।”
अगला पन्ना।
“दस्तक हमेशा तीन बार होती है।”
अगला।
“जो व्यक्ति तीसरी दस्तक के बाद दरवाजा खोलता है, वह वापस नहीं लौटता।”
सौरभ का हाथ काँपने लगा।
फिर अगले पन्ने पर लिखा था—
“हमने गलती कर दी।”
उसके बाद कई पन्ने खाली थे।
फिर एक आखिरी पन्ना।
“अगर कभी मेरी संतान इस डायरी को पढ़े, तो उसे सच बताना होगा।”
सौरभ ने पन्ना पलटा।
“मौत का दरवाजा केवल खून के रिश्ते से खुलता है।”
नीचे लिखा था—
“वह अब सौरभ को लेने आएगी।”
सौरभ की साँस रुक गई।
तभी घर की सारी घड़ियाँ एक साथ बंद हो गईं।
समय था—
2:13 AM
माँ चीख पड़ीं।
“सौरभ!”
मुख्य दरवाजे पर दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
फिर दस्तक दोबारा हुई।
ठक… ठक… ठक…
इस बार घर की सभी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।
बाहर घना अंधेरा था।
और उस अंधेरे में वही पुराना मकान दिखाई दे रहा था।
लेकिन अब उसके ऊपर की खिड़की में रोशनी नहीं थी।
बल्कि वहाँ कोई खड़ा था।
एक बच्चा।
सौरभ ने ध्यान से देखा।
वह वही बच्चा था—
आरव।
बच्चे ने हाथ उठाकर उसे इशारा किया।
फिर अपने गले पर उंगली फेरते हुए संकेत किया—
“वह आ गई।”
सौरभ ने पीछे देखा।
कमरे के कोने में एक काली परछाईं खड़ी थी।
धीरे-धीरे वह परछाईं इंसानी आकार लेने लगी।
एक औरत का चेहरा उभरा।
वही सफेद साड़ी।
वही काली आँखें।
माँ ने चीखते हुए सौरभ को खींच लिया।
“भागो!”
दोनों बाहर की ओर दौड़े।
लेकिन जैसे ही उन्होंने दरवाजा खोला, सामने वही पुराना मकान था।
उनका अपना घर गायब हो चुका था।
सौरभ ने पीछे मुड़कर देखा।
अब वहाँ उसकी माँ नहीं थी।
वह अकेला खड़ा था।
पुराने मकान के सामने।
और मुख्य दरवाजे पर वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“तुम्हारे पिता ने मुझे वादा किया था कि पंद्रह साल बाद उनका बेटा खुद यहाँ आएगा।”
सौरभ ने काँपते हुए पूछा—
“मेरी माँ कहाँ है?”
औरत ने ऊपर की मंजिल की तरफ इशारा किया।
“जहाँ तुम्हारा परिवार पंद्रह साल पहले गया था।”
सौरभ ने ऊपर देखा।
एक खिड़की में उसकी माँ खड़ी थी।
वह शीशे पर हाथ मार रही थीं।
लेकिन उनकी आवाज बाहर नहीं आ रही थी।
औरत ने धीरे से दरवाजा खोला।
“अंदर आओ, सौरभ।”
सौरभ पीछे हटने लगा।
तभी उसके पीछे से उसके पिता की आवाज आई—
“बेटा… दरवाजा मत खोलना।”
सौरभ जम गया।
उसने पीछे देखा।
अंधेरे में उसके पिता की परछाईं खड़ी थी।
वे उसे देखकर बोले—
“क्योंकि जो अंदर है… वह तुम्हारी माँ नहीं है।”
सौरभ ने वापस ऊपर खिड़की की तरफ देखा।
वहाँ खड़ी उसकी माँ धीरे-धीरे मुस्कुराने लगी थीं।
उनकी आँखें अब पूरी तरह काली थीं।
और उनके पीछे वही बच्चा खड़ा था।
आरव।
उसने शीशे पर उंगली से तीन शब्द लिखे—
“तीसरी दस्तक बाकी।”
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😱 SATVI RAAT KA SHRAP 😱 (PART-1) (A REAL HORROR STORY)
पढ़ने का समय : 6 मिनटरात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
शहर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर स्थित उस छोटे-से कस्बे में सर्दियों की रातें कुछ ज्यादा ही खामोश हुआ करती थीं। सड़कें सुनसान थीं, पेड़ों की शाखाएँ तेज हवा में ऐसे हिल रही थीं, जैसे कोई अंधेरे में खड़ा होकर हाथ हिला रहा हो।
सौरभ अपनी बाइक से घर लौट रहा था।
उस दिन ऑफिस में काम कुछ ज्यादा ही हो गया था। ऊपर से बाइक रास्ते में दो बार बंद हो चुकी थी। जब वह कस्बे के आखिरी मोड़ पर पहुँचा, तभी उसकी नजर सड़क के किनारे खड़े एक पुराने मकान पर पड़ी।
मकान कई सालों से बंद लग रहा था।
दीवारों पर काई जमी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर जंग लगा बड़ा-सा ताला लटक रहा था।
लेकिन उस रात वहाँ कुछ अलग था।
ऊपर वाली मंजिल की एक खिड़की में हल्की पीली रोशनी जल रही थी।
सौरभ ने बाइक धीमी कर दी।
“इस घर में तो कोई रहता ही नहीं…” उसने खुद से कहा।
उसके पिता अक्सर इस मकान का जिक्र किया करते थे।
कहा करते थे कि लगभग पंद्रह साल पहले यहाँ रहने वाला पूरा परिवार एक ही रात गायब हो गया था। पुलिस ने बहुत खोजबीन की, लेकिन किसी का पता नहीं चला। उसके बाद से मकान बंद पड़ा था।
सौरभ ने कई बार उस घर को देखा था, लेकिन कभी वहाँ रोशनी नहीं देखी थी।
उसने बाइक रोकी।
कुछ पल तक वह खिड़की को देखता रहा।
फिर अचानक—
ठक… ठक… ठक…
आवाज आई।
सौरभ का दिल एक पल के लिए रुक-सा गया।
आवाज मकान के अंदर से नहीं, बल्कि उसके पीछे से आई थी।
वह तुरंत पलटा।
सड़क खाली थी।
हवा में सूखे पत्ते उड़ रहे थे।
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं आया।
सौरभ ने चारों तरफ देखा और फिर बाइक स्टार्ट कर दी।
लेकिन जैसे ही उसने बाइक आगे बढ़ाई, पीछे से फिर आवाज आई—
ठक… ठक… ठक…
इस बार आवाज साफ थी।
जैसे कोई लकड़ी के दरवाजे पर दस्तक दे रहा हो।
सौरभ ने पीछे मुड़कर देखा।
पुराने मकान का मुख्य दरवाजा अब खुला हुआ था।
उसका शरीर ठंडा पड़ गया।
“ये… कैसे?”
कुछ सेकंड पहले वहाँ ताला लगा था।
वह वापस जाने वाला था, लेकिन तभी उसकी नजर दरवाजे के अंदर पड़े अंधेरे पर गई।
अंधेरे के बीच एक सफेद आकृति खड़ी थी।
सौरभ ने आँखें मलीं।
अगले ही पल वह आकृति गायब थी।
उसने बाइक तेज कर दी।
वह बिना पीछे देखे घर पहुँचा।
घर के बाहर बाइक खड़ी करके जैसे ही वह अंदर जाने लगा, उसकी माँ ने दरवाजा खोल दिया।
“इतनी देर क्यों हो गई?”
“ऑफिस में काम था।”
माँ ने उसे गौर से देखा।
“तुम ठीक तो हो?”
सौरभ ने उस पुराने मकान के बारे में बताना चाहा, लेकिन फिर चुप रह गया।
“हाँ… बस थक गया हूँ।”
रात को करीब दो बजे उसकी नींद खुली।
कमरे में अजीब-सी ठंड थी।
खिड़की बंद थी, फिर भी पर्दे हवा में हिल रहे थे।
सौरभ ने मोबाइल उठाया।
स्क्रीन पर समय था—
2:13 AM
तभी उसे आवाज सुनाई दी।
ठक… ठक… ठक…
उसने तुरंत सिर उठाया।
आवाज उसके कमरे के दरवाजे से आ रही थी।
सौरभ कुछ देर तक बिस्तर पर बैठा रहा।
उसका गला सूख गया था।
फिर आवाज दोबारा आई।
ठक… ठक… ठक…
“कौन है?”
बाहर कोई नहीं बोला।
सौरभ धीरे-धीरे बिस्तर से उठा।
दरवाजे के पास जाकर उसने नीचे की दरार से बाहर देखने की कोशिश की।
वहाँ कोई पैर नहीं थे।
उसने राहत की साँस ली।
तभी दरवाजे पर एक धीमी आवाज आई—
“सौरभ…”
वह पीछे हट गया।
आवाज किसी बूढ़ी औरत की थी।
“सौरभ… दरवाजा खोलो…”
उसने काँपते हुए पूछा—
“क… कौन?”
कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर आवाज आई—
“मैं… बहुत देर से इंतजार कर रही हूँ।”
सौरभ ने तुरंत पीछे हटकर कमरे की लाइट जला दी।
उसी क्षण दस्तक बंद हो गई।
उसने पूरी रात दरवाजा नहीं खोला।
सुबह जब उसने दरवाजा खोला, तो बाहर कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर कुछ पड़ा था।
एक पुरानी, काली-सफेद तस्वीर।
सौरभ ने तस्वीर उठाई।
तस्वीर में एक परिवार खड़ा था।
एक आदमी।
एक औरत।
और उनके बीच लगभग दस साल का एक लड़का।
सौरभ ने तस्वीर को पलटा।
पीछे लाल स्याही से एक तारीख लिखी थी—
13 दिसंबर 2011
और उसके नीचे सिर्फ चार शब्द थे—
“पहली दस्तक हो चुकी है।”
सौरभ के हाथ काँपने लगे।
उसे अचानक याद आया कि आज तारीख क्या थी।
13 दिसंबर 2026।
ठीक पंद्रह साल बाद।
वह तस्वीर लेकर अपनी माँ के पास गया।
“माँ, ये लोग कौन हैं?”
माँ ने तस्वीर देखते ही उसे हाथ से गिरा दिया।
उनका चेहरा सफेद पड़ गया।
“ये तस्वीर तुम्हें कहाँ मिली?”
“मेरे कमरे के बाहर।”
माँ कुछ बोल नहीं पाईं।
सौरभ ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“माँ, सच बताओ।”
कुछ देर बाद माँ ने धीमी आवाज में कहा—
“ये उसी पुराने मकान का परिवार है।”
सौरभ की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
“लेकिन ये लोग गायब हुए थे, ना?”
माँ ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“तो फिर ये तस्वीर मेरे कमरे के बाहर कैसे आई?”
माँ की आँखों में डर था।
उन्होंने धीरे से कहा—
“क्योंकि शायद… वो लोग गायब नहीं हुए थे।”
“फिर?”
माँ ने कमरे का दरवाजा बंद किया।
“तुम्हारे पिता ने मरने से पहले मुझसे एक बात कही थी।”
“क्या?”
माँ की आवाज काँप रही थी।
“उन्होंने कहा था कि उस मकान में रहने वाला परिवार मौत का शिकार नहीं हुआ था… उन्होंने खुद मौत को घर में बुलाया था।”
सौरभ कुछ समझ नहीं पाया।
“लेकिन क्यों?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि उस घर में एक दरवाजा था… जो किसी दूसरी जगह नहीं, बल्कि मौत तक खुलता था।”
अचानक कमरे के बाहर से आवाज आई—
ठक… ठक… ठक…
दोनों जम गए।
माँ ने सौरभ का हाथ कसकर पकड़ लिया।
फिर बाहर से वही बूढ़ी आवाज आई—
“सौरभ…”
इस बार आवाज बिल्कुल पास थी।
“कल रात तुमने मुझे दरवाजा नहीं खोला था…”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर—
ठक… ठक… ठक…
“आज… मैं खुद अंदर आऊँगी।”
कमरे की लाइट अचानक बुझ गई।
और अंधेरे में सौरभ को किसी के धीरे-धीरे हँसने की आवाज सुनाई दी।
“अब दूसरी दस्तक बाकी है…”
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😱SATVI RAAT KA SHRAP😱 (PART-1)
पढ़ने का समय : 5 मिनटउत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव भैरवपुर में शाम के बाद लोग अपने घरों के दरवाज़े जल्दी बंद कर लेते थे। गाँव में बिजली की समस्या तो थी ही, लेकिन लोग अंधेरे से ज्यादा एक आवाज़ से डरते थे।
वह आवाज़ थी—
ठक… ठक… ठक…
गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि अगर आधी रात के बाद किसी के दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हो और बाहर से कोई उसका नाम पुकारे, तो दरवाज़ा कभी नहीं खोलना चाहिए।
क्योंकि वह इंसान नहीं होता।
उसे गाँव वाले कहते थे—
“मौत की दस्तक।”
कहानी के मुताबिक लगभग बीस साल पहले गाँव में एक बूढ़ा डाकिया रहता था, जिसका नाम हरिराम था। एक बरसाती रात वह एक चिट्ठी लेकर गाँव के आखिरी घर तक गया था। रात के करीब बारह बजे उसने उस घर का दरवाज़ा खटखटाया।
अंदर से एक आदमी ने पूछा—
“कौन?”
हरिराम ने कहा—
“डाकिया हूँ।”
दरवाज़ा खुला।
अगली सुबह उस घर में रहने वाले सभी लोग मृत मिले।
और हरिराम का शरीर गाँव से लगभग दो किलोमीटर दूर पुराने कुएँ के पास मिला।
उस दिन के बाद से हर कुछ वर्षों में आधी रात को किसी घर के दरवाज़े पर दस्तक होती।
और जिस घर के दरवाज़े पर वह दस्तक होती…
उस घर में अगले दिन मौत हो जाती।
गाँव के लोग इसे अंधविश्वास मानते थे, लेकिन किसी ने भी कभी उस दस्तक का सामना करने की हिम्मत नहीं की।
इसी गाँव में कई साल बाद विवान अपने पिता की मौत के बाद वापस आया।
विवान शहर में रहता था और भूत-प्रेत जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता था।
उसके पिता का पुराना घर गाँव के बिल्कुल आखिरी छोर पर था।
विवान ने घर की सफाई शुरू की।
शाम को उसका बचपन का दोस्त समीर उससे मिलने आया।
समीर ने घर में कदम रखते ही पूछा,
“तू यहाँ रात में अकेला रहेगा?”
विवान हँस पड़ा।
“क्यों? भूत आ जाएगा?”
समीर ने मज़ाक नहीं किया।
उसने धीरे से कहा,
“तेरे पिताजी की मौत से पहले भी तीन रात तक इस घर के बाहर दस्तक हुई थी।”
विवान कुछ पल चुप रहा।
“तुम्हें कैसे पता?”
“उन्होंने मुझे बताया था।”
विवान ने बात को टाल दिया।
रात करीब दस बजे समीर चला गया।
विवान ने खाना खाया और अपने पिता के कमरे में पुरानी चीज़ें देखने लगा।
अलमारी के नीचे उसे एक लोहे का छोटा संदूक मिला।
उसमें पुराने कागज़, कुछ तस्वीरें और एक डायरी थी।
डायरी उसके पिता की थी।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर कभी आधी रात को मेरे दरवाज़े पर दस्तक हो… दरवाज़ा मत खोलना।”
विवान ने भौंहें सिकोड़ लीं।
अगले पन्ने पर सिर्फ़ तीन शब्द लिखे थे—
“वह वापस आ गई।”
विवान को अजीब लगा।
वह डायरी लेकर बिस्तर पर बैठ गया।
रात के करीब 11:45 बजे अचानक घर की बिजली चली गई।
पूरा घर अंधेरे में डूब गया।
विवान ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
तभी बाहर कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे।
फिर अचानक सभी कुत्ते एक साथ चुप हो गए।
घर में ऐसा सन्नाटा छा गया कि विवान को अपनी साँसों की आवाज़ तक सुनाई देने लगी।
घड़ी ने बारह बजाए।
टन… टन… टन…
और फिर—
ठक…
विवान जम गया।
कुछ सेकंड बाद—
ठक… ठक…
तीन दस्तक।
उसने पिता की डायरी की तरफ देखा।
उसके हाथ काँपने लगे।
फिर बाहर से आवाज़ आई—
“विवान…”
उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।
आवाज़ बिल्कुल उसके पिता की थी।
विवान धीरे-धीरे मुख्य दरवाज़े के पास गया।
बाहर से फिर आवाज़ आई—
“बेटा… दरवाज़ा खोल।”
विवान की आँखों में आँसू आ गए।
उसके पिता की मौत को केवल कुछ दिन हुए थे।
वह दरवाज़ा खोलने ही वाला था कि डायरी का एक पन्ना हवा से पलट गया।
उस पर लिखा था—
“वह तुम्हारी पहचान और आवाज़ दोनों चुरा सकती है। लेकिन वह घर के अंदर तभी आ सकती है जब तुम उसे बुलाओ।”
विवान ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।
बाहर आवाज़ फिर आई।
इस बार आवाज़ गुस्से में थी।
“दरवाज़ा खोल!”
विवान पीछे हट गया।
कुछ देर तक दस्तक होती रही।
फिर अचानक सब शांत हो गया।
सुबह होने पर विवान ने दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन दरवाज़े के सामने मिट्टी में गीले पैरों के निशान थे।
वे निशान दरवाज़े तक आए थे।
और फिर वापस नहीं गए थे।
विवान ने नीचे देखा।
दरवाज़े के ठीक सामने एक पुराना पीला लिफाफा पड़ा था।
उस पर उसके पिता का नाम लिखा था।
विवान ने लिफाफा खोला।
अंदर एक छोटी-सी चिट्ठी थी।
उसमें लिखा था—
“विवान, अगर तू यह चिट्ठी पढ़ रहा है, तो पहली दस्तक हो चुकी है। अब तीन रातें बाकी हैं।”
नीचे सिर्फ़ एक चेतावनी थी—
“दूसरी दस्तक पर वह घर के अंदर होगी।”
विवान के हाथ से चिट्ठी गिर गई।
तभी घर के अंदर से आवाज़ आई—
ठक… ठक… ठक…
विवान धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।
मुख्य दरवाज़ा उसके सामने था।
लेकिन दस्तक…
घर के अंदर वाले कमरे के दरवाज़े से आ रही थी।
