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  • बंद कमरे की आवाज़ भाग 2 — कमरे के अंदर कौन था?

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव पूरी ताकत से हवेली के मुख्य दरवाज़े की ओर भागा।

     

    उसने दरवाज़े को खींचा।

     

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    “खुल जा!”

     

    वह बार-बार दरवाज़ा पीटने लगा।

     

    पीछे से कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे उसके करीब आ रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर पानी के छोटे-छोटे निशान बन रहे थे।

     

    जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति उसकी तरफ चलकर आ रहा हो।

     

    अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “भागोगे कहाँ?”

     

    आरव चीख पड़ा और पीछे हट गया।

     

    उसी समय मुख्य दरवाज़ा अचानक खुल गया।

     

    वह बिना पीछे देखे हवेली से बाहर भागा।

     

    गाँव पहुँचकर उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

     

    लेकिन उस रात उसे नींद नहीं आई।

     

    बार-बार वही आवाज़ उसके कानों में गूँज रही थी—

     

    “अब तुमने मुझे सुन लिया है।”

     

    सुबह होते ही आरव ने अपने नाना को सब कुछ बता दिया।

     

    नाना बहुत देर तक चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने संदूक से एक पुरानी डायरी निकाली।

     

    डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे।

     

    “ये तुम्हारे परनाना की डायरी है,” नाना ने कहा।

     

    “उन्होंने उस हवेली में कई साल काम किया था।”

     

    आरव ने डायरी खोली।

     

    एक पन्ने पर लिखा था—

     

    “मीरा उस कमरे में नहीं मरी थी।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “उस कमरे में मीरा के अलावा भी कोई था।”

     

    आरव ने जल्दी से अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “ठाकुर साहब ने एक रात मुझे कमरे के बाहर पहरा देने को कहा। उन्होंने कहा कि मीरा पागल हो चुकी है और किसी से बात करती रहती है। रात करीब बारह बजे अंदर से बच्ची के रोने की आवाज़ आई। फिर उसने कहा—’मुझे बचा लो। वो मुझे लेने आ गया है।’”

     

    अगली पंक्ति पढ़ते ही आरव का हाथ काँपने लगा।

     

    “मैंने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। तभी अंदर से ठाकुर साहब की आवाज़ आई—’दरवाज़ा मत खोलना। वो मीरा नहीं है।’”

     

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    नाना बोले—

     

    “आगे पढ़ो।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “दरवाज़े के नीचे से खून बाहर आने लगा। लेकिन कमरे में मीरा के अलावा कोई नहीं था। सुबह जब दरवाज़ा खोला गया तो मीरा गायब थी। कमरे की दीवार पर एक निशान बना था—एक काले हाथ का निशान।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा—

     

    “क्या वो निशान अभी भी है?”

     

    नाना ने कहा—

     

    “शायद।”

     

    आरव ने उसी दिन हवेली लौटने का फैसला किया।

     

    इस बार उसके साथ उसका दोस्त कबीर भी गया।

     

    कबीर को पूरी कहानी बताने के बाद दोनों हवेली में दाखिल हुए।

     

    “अगर कुछ हुआ तो तुरंत भागेंगे,” कबीर ने कहा।

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    दोनों ऊपर पहुँचे।

     

    वह काला कमरा अब खुला हुआ था।

     

    दरवाज़ा आधा टूटा था।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    कमरा देखने में बिल्कुल साधारण था।

     

    एक पुराना लकड़ी का पलंग।

     

    टूटी हुई अलमारी।

     

    दीवार पर कुछ पुराने निशान।

     

    और सामने की दीवार पर…

     

    काला हाथ।

     

    आरव उसके करीब गया।

     

    निशान ऐसा था जैसे किसी ने काले रंग से हाथ लगाकर दीवार पर छाप छोड़ी हो।

     

    लेकिन जैसे ही उसने हाथ उसके करीब किया…

     

    दीवार से आवाज़ आई।

     

    “आरव…”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “तूने भी सुना?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    फिर कमरे के कोने से बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    दोनों ने उधर देखा।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का बक्सा पड़ा था।

     

    बक्सा अपने आप हिल रहा था।

     

    कबीर ने कहा—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    लेकिन आरव ने बक्से का ढक्कन उठा दिया।

     

    अंदर एक पुरानी लाल रंग की गुड़िया थी।

     

    उसके साथ एक छोटी-सी चाँदी की पायल और एक कागज़ रखा था।

     

    कागज़ पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “मीरा ने दरवाज़ा नहीं खोला था। किसी और ने खोला था।”

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    कबीर ने उसे खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    फिर कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    एक नहीं…

     

    दर्जनों आवाज़ें।

     

    “हमें बाहर निकालो…”

     

    “बहुत अंधेरा है…”

     

    “हमें बचाओ…”

     

    “दरवाज़ा खोलो…”

     

    आरव ने कान बंद कर लिए।

     

    लेकिन आवाज़ें और तेज़ हो गईं।

     

    तभी दीवार पर बना काला हाथ धीरे-धीरे हिलने लगा।

     

    उसकी उँगलियाँ दीवार से अलग हुईं।

     

    कबीर चीख पड़ा।

     

    काला निशान दीवार से बाहर निकल रहा था।

     

    अब वह एक हाथ जैसा दिख रहा था।

     

    फिर दूसरा हाथ।

     

    फिर एक सिर।

     

    और धीरे-धीरे एक पूरा शरीर दीवार से बाहर आने लगा।

     

    वह वही छोटी लड़की थी जिसे आरव ने पिछली बार देखा था।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर आँखें थीं।

     

    और उसकी आँखें…

     

    पूरी तरह सफेद थीं।

     

    उसने आरव को देखकर कहा—

     

    “तुम वापस क्यों आए?”

     

    आरव काँपते हुए बोला—

     

    “मीरा कहाँ है?”

     

    लड़की मुस्कुराई।

     

    “मीरा तो उस रात ही मर गई थी।”

     

    “फिर तुम कौन हो?”

     

    उसने अपना सिर टेढ़ा किया।

     

    “जिसे उसने कमरे में बंद किया था।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    लड़की ने धीरे-धीरे कमरे की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “उसके पिता ने।”

     

    आरव को डायरी की बात याद आई।

     

    लड़की बोली—

     

    “मीरा ने मुझे देखा था। उसने मुझे बाहर निकालना चाहा। लेकिन उसके पिता ने दरवाज़ा बंद कर दिया।”

     

    “तुम इंसान थीं?”

     

    लड़की की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “मैं कभी इंसान नहीं थी।”

     

    अचानक कमरे की दीवारें काँपने लगीं।

     

    फर्श के नीचे से चीखें आने लगीं।

     

    आरव ने देखा कि कमरे के फर्श पर कई पुराने हाथों के निशान उभर रहे थे।

     

    लड़की आगे बढ़ी।

     

    “मीरा ने मुझे रोकने की कोशिश की थी। इसलिए मैंने उसे अपने साथ ले लिया।”

     

    “कहाँ?”

     

    लड़की ने फर्श की तरफ देखा।

     

    “नीचे।”

     

    उसी क्षण फर्श टूट गया।

     

    कबीर गिरते-गिरते बचा।

     

    नीचे एक गहरी सुरंग दिखाई दी।

     

    सुरंग के भीतर से ठंडी हवा आ रही थी।

     

    और उसी हवा में एक बच्ची की आवाज़ सुनाई दी—

     

    “आरव…”

     

    इस बार आवाज़ अलग थी।

     

    मासूम।

     

    डरी हुई।

     

    “आरव… मुझे बचा लो।”

     

    आरव ने पहचान लिया।

     

    “मीरा!”

     

    सफेद आँखों वाली लड़की अचानक चीखने लगी।

     

    “उसकी बात मत सुनो!”

     

    आरव ने सुरंग की ओर देखा।

     

    वहाँ अंधेरे में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में वही चाँदी की पायल थी।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “मुझे यहाँ से बाहर निकालो।”

     

    आरव सुरंग में उतरने लगा।

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तू पागल है? हमें यहाँ से निकलना चाहिए!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अगर मीरा सच में यहाँ है, तो हमें उसे बचाना होगा।”

     

    दोनों सुरंग में उतर गए।

     

    पीछे खड़ी सफेद आँखों वाली लड़की उन्हें देखती रही।

     

    फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “जब सच जान जाओगे…”

     

    “तब तुम खुद बाहर नहीं निकलना चाहोगे।”

     

    सुरंग बहुत लंबी थी।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उन्हें दीवार पर पुराने नाम लिखे मिले।

     

    दर्जनों नाम।

     

    और सबसे नीचे…

     

    मीरा।

     

    उसके ठीक नीचे एक और नाम लिखा था।

     

    आरव ने टॉर्च पास की।

     

    नाम देखकर उसके हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    आरव।

     

    कबीर ने काँपते हुए पूछा—

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    तभी पीछे से सुरंग का रास्ता बंद हो गया।

     

    और अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “क्योंकि तुम पहले भी यहाँ आ चुके हो।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    अंधेरे में एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    वह चेहरा…

     

    खुद आरव का था।

  • बंद कमरे की आवाज़ भाग 1 — आधी रात की दस्तक

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    शहर से लगभग पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुरानी हवेली खड़ी थी, जिसे लोग काली हवेली के नाम से जानते थे। हवेली करीब सौ साल पुरानी थी और पिछले पच्चीस वर्षों से पूरी तरह बंद पड़ी थी।

     

    गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि हवेली के अंदर एक कमरा ऐसा था, जिसका दरवाज़ा कभी नहीं खोला गया। उस कमरे से रात के समय आवाज़ें आती थीं।

     

    कभी किसी बच्चे के रोने की।

     

    कभी किसी औरत के धीरे-धीरे गुनगुनाने की।

     

    और कभी…

     

    दरवाज़ा खटखटाने की।

     

    गाँव वाले उस हवेली के पास से दिन में भी गुजरने से बचते थे।

     

    लेकिन आरव को इन बातों पर विश्वास नहीं था।

     

    आरव शहर में पढ़ा-लिखा एक युवा था और कुछ दिनों के लिए अपने नाना के गाँव आया था। उसे बचपन से ही पुराने मकानों और रहस्यमयी जगहों के बारे में जानने का शौक था।

     

    एक शाम चाय की दुकान पर बैठे-बैठे उसने हवेली का जिक्र छेड़ दिया।

     

    “लोग कहते हैं उस हवेली में भूत है,” आरव ने हँसते हुए कहा, “लेकिन किसी ने देखा भी है उसे?”

     

    चाय वाले बूढ़े हरिराम ने उसकी ओर गंभीरता से देखा।

     

    “देखने की जरूरत नहीं पड़ती बेटा। कुछ चीज़ें दिखाई नहीं देतीं… महसूस होती हैं।”

     

    “और वो बंद कमरा?”

     

    हरिराम का चेहरा अचानक उतर गया।

     

    “उसके बारे में मत पूछो।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “क्यों?”

     

    हरिराम ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “क्योंकि जो उस कमरे की आवाज़ सुन लेता है… वह फिर पहले जैसा नहीं रहता।”

     

    आरव ने इसे भी गाँव की कहानी समझकर टाल दिया।

     

    लेकिन उसी रात करीब दो बजे उसकी नींद अचानक खुल गई।

     

    कमरे में अजीब-सी ठंड थी।

     

    खिड़की बंद थी, फिर भी पर्दा धीरे-धीरे हिल रहा था।

     

    आरव ने उठकर खिड़की देखी।

     

    सब कुछ सामान्य था।

     

    वह वापस बिस्तर पर जाने ही वाला था कि…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    आरव रुक गया।

     

    “कौन?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ सेकंड बाद फिर आवाज़ हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ के साथ एक धीमी फुसफुसाहट भी सुनाई दी।

     

    “आरव…”

     

    उसका शरीर सिहर उठा।

     

    आवाज़ किसी बच्चे की थी।

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    बाहर सन्नाटा था।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के छोटे-छोटे निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान दरवाज़े से शुरू होकर…

     

    सीधे हवेली की दिशा में जा रहे थे।

     

    आरव ने तुरंत दरवाज़ा बंद कर लिया।

     

    सुबह उसने अपने नाना से इस बारे में पूछा।

     

    नाना कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तुमने हवेली की आवाज़ सुनी है?”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि ये पहली बार नहीं हुआ।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    नाना ने गहरी साँस ली।

     

    “पच्चीस साल पहले उस हवेली में ठाकुर वीरेंद्र सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे। उनकी पत्नी, उनका बेटा और उनकी छोटी बेटी—मीरा।”

     

    “फिर?”

     

    “एक रात हवेली में आग लगी। ठाकुर और उनकी पत्नी तो बाहर निकल आए, लेकिन मीरा अंदर रह गई।”

     

    आरव ने पूछा, “क्या उसकी मौत हो गई?”

     

    नाना ने सिर हिलाया।

     

    “कहते हैं कि आग लगने से पहले मीरा को हवेली के एक कमरे में बंद कर दिया गया था।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मीरा लगातार कह रही थी कि कमरे की दीवार के पीछे से कोई उसे बुलाता है।”

     

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा गई।

     

    नाना ने आगे कहा—

     

    “लोगों ने सोचा बच्ची डर गई है। लेकिन उस रात उसने अपने पिता से कहा था—”

     

    नाना की आवाज़ काँपने लगी।

     

    “पापा… कमरे में कोई और भी है।”

     

    आरव के रोंगटे खड़े हो गए।

     

    “उसके बाद?”

     

    “सुबह कमरा खोला गया। मीरा वहाँ नहीं थी।”

     

    “क्या?”

     

    “कमरा अंदर से बंद था। खिड़की भी बंद। लेकिन बच्ची गायब थी।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    “फिर हवेली में आग लगी।”

     

    “और उसके बाद से वह कमरा बंद है?”

     

    “हाँ।”

     

    आरव के मन में अब डर के साथ जिज्ञासा भी पैदा हो चुकी थी।

     

    उस दिन दोपहर को उसने हवेली जाने का फैसला किया।

     

    नाना ने बहुत मना किया।

     

    लेकिन आरव नहीं माना।

     

    हवेली का मुख्य दरवाज़ा जंग लगा हुआ था। उसे धक्का देते ही वह भयानक आवाज़ के साथ खुल गया।

     

    अंदर धूल, मकड़ी के जाले और सड़ती लकड़ी की गंध थी।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे।

     

    आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।

     

    ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के पास उसे एक पुरानी तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर में चार लोग थे।

     

    ठाकुर वीरेंद्र सिंह।

     

    उनकी पत्नी।

     

    एक छोटा लड़का।

     

    और एक छोटी लड़की।

     

    मीरा।

     

    आरव तस्वीर को ध्यान से देखने लगा।

     

    अचानक…

     

    तस्वीर में मीरा की आँखों पर उसे कुछ अजीब दिखाई दिया।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आँखें तस्वीर के अंदर से उसे देख रही हों।

     

    आरव ने तस्वीर नीचे रख दी।

     

    उसी समय ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    ऊपर एक लंबा गलियारा था।

     

    गलियारे के आखिरी छोर पर एक काला दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर लोहे की मोटी जंजीर बंधी थी।

     

    यही था वह बंद कमरा।

     

    आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    तभी…

     

    अंदर से आवाज़ आई।

     

    “आरव…”

     

    वह पीछे हट गया।

     

    आवाज़ बिल्कुल साफ थी।

     

    “आरव… मुझे बाहर निकालो।”

     

    आरव का गला सूख गया।

     

    वह भागना चाहता था।

     

    लेकिन तभी अंदर से एक बच्ची रोने लगी।

     

    “मुझे बहुत डर लग रहा है…”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम… मीरा हो?”

     

    कुछ पल तक कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर अंदर से धीमी आवाज़ आई—

     

    “नहीं…”

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “मीरा तो बहुत पहले चली गई।”

     

    दरवाज़े के नीचे से अचानक काला पानी जैसा कुछ बाहर आने लगा।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    और तभी कमरे के अंदर से किसी ने जोर से दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    जंजीरें हिलने लगीं।

     

    आरव भागने के लिए मुड़ा।

     

    लेकिन सीढ़ियों के नीचे…

     

    एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था।

     

    बाल उसके चेहरे को ढके हुए थे।

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम… कौन हो?”

     

    लड़की ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    उसके चेहरे पर आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो गहरे काले गड्ढे थे।

     

    और उसके होंठों पर एक अजीब मुस्कान थी।

     

    उसने कहा—

     

    “तुमने दरवाज़ा क्यों खोला?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    बंद कमरे की जंजीर…

     

    अपने आप खुल चुकी थी।

     

    और कमरे के अंदर से किसी के कदमों की आवाज़ आ रही थी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कोई कमरे से बाहर आ रहा था।

     

    आरव ने दौड़ लगा दी।

     

    लेकिन उसके पीछे से एक आवाज़ गूँजी—

     

    “आरव…”

     

    “अब तुमने मुझे सुन लिया है।”

     

    और उसी क्षण…

     

    हवेली का मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

  • कातिल कौन? भाग 3 — असली कातिल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    रात के ठीक बारह बजे अर्जुन पुराने थिएटर के सामने खड़ा था।

     

    थिएटर वर्षों से बंद था।

     

    दरवाज़े पर जंग लगी थी और अंदर घना अंधेरा था।

     

    अर्जुन ने अपनी पिस्तौल निकाली और धीरे-धीरे अंदर प्रवेश किया।

     

    “सुमन!”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    अंदर टूटी हुई कुर्सियाँ और पुराने पोस्टर पड़े थे।

     

    अचानक पीछे से आवाज़ आई—

     

    “आपको अकेले आने को कहा था।”

     

    अर्जुन पलटा।

     

    एक आदमी अंधेरे में खड़ा था।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    अर्जुन ने पिस्तौल तान दी।

     

    “सुमन कहाँ है?”

     

    वह आदमी हँसा।

     

    “पहले आपको यह समझना होगा कि आप किसे बचाने आए हैं।”

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “अपना चेहरा दिखाओ।”

     

    वह व्यक्ति धीरे-धीरे रोशनी में आया।

     

    अर्जुन की आँखें फैल गईं।

     

    वह आदमी था—

     

    इंस्पेक्टर विक्रम।

     

    अर्जुन का अपना साथी।

     

    “तुम?”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “हाँ।”

     

    अर्जुन ने पिस्तौल सीधी कर दी।

     

    “सुमन कहाँ है?”

     

    “जिंदा है।”

     

    “उसे कहाँ रखा है?”

     

    विक्रम ने थिएटर के पीछे बने कमरे की ओर इशारा किया।

     

    “लेकिन उसे बचाने से पहले आपको पूरी कहानी सुननी होगी।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुमने विवेक और विनय को मारा?”

     

    विक्रम ने कुछ क्षण उसे देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    अर्जुन कुछ नहीं बोला।

     

    विक्रम आगे बढ़ा।

     

    “लेकिन वजह वह नहीं है जो तुम सोच रहे हो।”

     

    “तो वजह क्या है?”

     

    “दस साल पहले मेरी बहन माधवी थी।”

     

    अर्जुन का चेहरा बदल गया।

     

    माधवी…

     

    विवेक की पत्नी।

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “माधवी को पता चल गया था कि कंपनी के दो करोड़ रुपये किसने चुराए थे।”

     

    “विवेक और विनय?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन तुमने कहा था कि विवेक ने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    विक्रम हँसा।

     

    “वह कहानी थी।”

     

    “सच क्या है?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “विवेक और विनय दोनों ने पैसे चुराए थे। माधवी ने उन्हें पकड़ लिया। उसने पुलिस में जाने की धमकी दी।”

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने माधवी को डराने की कोशिश की। उस रात कार में उसका पीछा किया गया। उसकी कार का ब्रेक काट दिया गया।”

     

    अर्जुन ने धीमे से पूछा—

     

    “और वह मर गई।”

     

    विक्रम ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन केस में इसे हादसा बताया गया।”

     

    “क्योंकि पुलिस रिकॉर्ड बदल दिया गया था।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “उस समय के थानेदार ने।”

     

    अर्जुन चुप हो गया।

     

    विक्रम बोला—

     

    “वही थानेदार तुम्हारा पिता था।”

     

    अर्जुन के हाथ से पिस्तौल लगभग ढीली पड़ गई।

     

    “मेरे… पिता?”

     

    “हाँ।”

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    “अगर झूठ है तो यह देखो।”

     

    विक्रम ने एक पुरानी फाइल अर्जुन की ओर फेंक दी।

     

    अर्जुन ने फाइल खोली।

     

    उसमें माधवी की दुर्घटना की रिपोर्ट थी।

     

    लेकिन आखिरी पन्ने पर एक नोट था—

     

    “दुर्घटना नहीं। ब्रेक से छेड़छाड़ की संभावना।”

     

    उस रिपोर्ट के नीचे उसके पिता के हस्ताक्षर थे।

     

    अर्जुन की आँखों में गुस्सा भर आया।

     

    “मेरे पिता ने केस क्यों दबाया?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “क्योंकि उन्हें रिश्वत दी गई थी।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    “विवेक और विनय ने।”

     

    कुछ क्षण तक दोनों के बीच सन्नाटा रहा।

     

    फिर अर्जुन ने पूछा—

     

    “तो तुमने उन्हें मार दिया?”

     

    “हाँ।”

     

    “सुमन?”

     

    “वह गवाह थी।”

     

    “उसे क्यों उठाया?”

     

    “क्योंकि वह उस रात वहाँ थी।”

     

    अर्जुन ने चौंककर पूछा—

     

    “वह क्या जानती थी?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “उसने माधवी की कार को उस रात जाते देखा था।”

     

    “और उसने दस साल तक चुप्पी क्यों साधे रखी?”

     

    “क्योंकि विवेक उसे पैसे देता रहा।”

     

    अर्जुन ने गहरी साँस ली।

     

    “लेकिन राहुल?”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “वह निर्दोष है।”

     

    “और नैना?”

     

    “वह भी।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तो लाल बैग में खून क्यों था?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “मैंने रखा था। राहुल को फँसाने के लिए।”

     

    “और सुमन के कमरे में खून?”

     

    “नकली।”

     

    अर्जुन ने धीरे से पूछा—

     

    “लेकिन एक बात समझ नहीं आई। विवेक की हत्या के बाद जो कागज़ मिला था—’कातिल तुम्हारे बहुत करीब है’—वह किसने लिखा?”

     

    विक्रम की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “विवेक ने।”

     

    “क्या?”

     

    “उसे पता था कि मैं उसके पीछे हूँ। उसने मरने से पहले सच का इशारा करने की कोशिश की।”

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “तो उसने तुम्हें पहचाना था?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसने तुम्हें अंदर क्यों आने दिया?”

     

    विक्रम कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि वह जानता था कि मैं उसे मारने वाला हूँ।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “और उसने विरोध नहीं किया?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “उसने सिर्फ एक बात कही थी।”

     

    “क्या?”

     

    “उसने कहा था—’तुम्हें लगता है तुम न्याय कर रहे हो, लेकिन एक दिन तुम्हें भी अपने किए का जवाब देना पड़ेगा।’”

     

    अर्जुन ने पिस्तौल नीचे नहीं की।

     

    “सुमन को बाहर लाओ।”

     

    विक्रम पीछे मुड़ा।

     

    लेकिन तभी थिएटर के पीछे से आवाज़ आई—

     

    “अर्जुन!”

     

    अर्जुन दौड़कर वहाँ पहुँचा।

     

    सुमन कुर्सी से बंधी थी।

     

    अर्जुन ने उसे खोल दिया।

     

    विक्रम भागने लगा।

     

    अर्जुन ने उसका पीछा किया।

     

    दोनों थिएटर की छत पर पहुँच गए।

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “मैंने जो किया गलत था, लेकिन उन लोगों को सजा मिलनी चाहिए थी।”

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “सजा देने का अधिकार तुम्हें नहीं था।”

     

    विक्रम ने पिस्तौल निकाली।

     

    अर्जुन ने भी हथियार तान दिया।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों आमने-सामने खड़े रहे।

     

    फिर विक्रम ने पिस्तौल नीचे कर दी।

     

    “शायद तुम सही हो।”

     

    उसने हथियार जमीन पर रख दिया।

     

    पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

     

    मामला अदालत पहुँचा।

     

    जाँच में पुराने रिकॉर्ड दोबारा खोले गए।

     

    माधवी की मौत को फिर से जाँचा गया।

     

    विवेक और विनय के आर्थिक घोटाले का सच भी सामने आया।

     

    राहुल और नैना को निर्दोष पाया गया।

     

    सुमन ने अदालत में गवाही दी।

     

    और कई सालों बाद माधवी के परिवार को न्याय मिला।

     

    लेकिन कहानी का सबसे दुखद हिस्सा कुछ और था।

     

    विक्रम ने अदालत में अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

     

    सजा सुनाए जाने से पहले उसने अर्जुन से सिर्फ एक बात कही—

     

    “तुम्हारे पिता ने कानून को बेचा था। मैंने कानून को अपने हाथ में लिया। फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों गलत थे।”

     

    अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह बाहर निकल आया।

     

    आसमान में बारिश हो रही थी।

     

    कई महीनों बाद एक शाम अर्जुन अपने घर में पुरानी फाइलें देख रहा था।

     

    उसे अपने पिता की एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “माधवी की मौत का असली सच मैं जानता हूँ। लेकिन अगर मैंने सच बताया तो मेरा परिवार खत्म हो जाएगा।”

     

    अर्जुन कुछ देर तक उस पन्ने को देखता रहा।

     

    फिर उसने डायरी बंद कर दी।

     

    उसे समझ आ गया था कि इस कहानी में सिर्फ एक कातिल नहीं था।

     

    एक ने लालच में अपराध किया।

     

    एक ने सच छिपाया।

     

    एक ने बदला लेने के लिए हत्या की।

     

    और कई लोगों ने डर के कारण चुप्पी साध ली।

     

    लेकिन कानून की नजर में…

     

    कातिल सिर्फ एक था।

     

    इंस्पेक्टर विक्रम।

     

    और आखिरकार…

     

    कातिल पकड़ा गया।

     

    कहानी समाप्त।

  • कातिल कौन? भाग 2 — दूसरा शिकार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    दूसरी सुबह पुलिस को शहर के पुराने रेलवे गोदाम से एक फोन आया।

     

    गोदाम कई वर्षों से बंद पड़ा था।

     

    अंदर एक आदमी की लाश मिली थी।

     

    इंस्पेक्टर अर्जुन राठौड़ तुरंत वहाँ पहुँचा।

     

    लाश देखकर वह कुछ क्षण के लिए चुप रह गया।

     

    मृत व्यक्ति की पहचान हुई—

     

    विनय कपूर।

     

    विनय एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था।

     

    अर्जुन ने उसकी जेब की तलाशी ली।

     

    एक छोटी चाबी मिली।

     

    और उसके साथ एक कागज़।

     

    कागज़ पर लिखा था—

     

    “पहली मौत सिर्फ शुरुआत थी।”

     

    अर्जुन के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देने लगी।

     

    दो हत्याएँ।

     

    दोनों के बीच कोई संबंध जरूर था।

     

    विनय के फोन की जाँच की गई।

     

    उसकी आखिरी कॉल भी विवेक के नंबर पर थी।

     

    लेकिन वह कॉल हत्या से तीन दिन पहले की थी।

     

    अर्जुन ने अपनी टीम से कहा—

     

    “विवेक और विनय के बीच संबंध खोजो।”

     

    कुछ घंटों बाद एक पुरानी फाइल सामने आई।

     

    दोनों लगभग दस साल पहले एक ही कंपनी में काम करते थे।

     

    और उस कंपनी में एक महिला भी काम करती थी।

     

    माधवी।

     

    वही माधवी जो विवेक की पत्नी थी।

     

    अर्जुन के लिए अब मामला और गंभीर हो गया।

     

    उसने पुराने रिकॉर्ड निकलवाए।

     

    दस साल पहले कंपनी में आर्थिक घोटाला हुआ था।

     

    कंपनी के खाते से लगभग दो करोड़ रुपये गायब हुए थे।

     

    जाँच में विवेक और विनय दोनों के नाम सामने आए थे।

     

    लेकिन मामला दबा दिया गया।

     

    क्यों?

     

    क्योंकि कंपनी के मालिक ने अचानक शिकायत वापस ले ली थी।

     

    अर्जुन ने मालिक से पूछताछ की।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे इस मामले के बारे में कुछ नहीं पता।”

     

    अर्जुन ने सामने फाइल रख दी।

     

    “दस साल पुरानी रिपोर्ट में आपका हस्ताक्षर है।”

     

    मालिक चुप हो गया।

     

    “सच बताइए।”

     

    वह आखिरकार बोला—

     

    “माधवी को सब पता था।”

     

    “क्या?”

     

    “उसे पता था कि पैसे किसने चुराए थे।”

     

    “किसने?”

     

    वह डरते हुए बोला—

     

    “विनय।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “और विवेक?”

     

    “विवेक ने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विवेक भी इसमें शामिल था।”

     

    अर्जुन को जैसे पूरा मामला समझ आने लगा।

     

    लेकिन तभी एक और बात सामने आई।

     

    विनय की हत्या वाली जगह के पास लगे पुराने कैमरे की फुटेज मिली।

     

    रात 1:14 बजे एक व्यक्ति गोदाम के अंदर जाता दिखाई दिया।

     

    उसने चेहरा ढक रखा था।

     

    कद मध्यम था।

     

    वह व्यक्ति कुछ देर बाद बाहर आया।

     

    लेकिन उसके हाथ में एक चीज थी—

     

    एक लाल रंग का बैग।

     

    अर्जुन ने फुटेज को बार-बार देखा।

     

    फिर उसे कुछ अजीब दिखाई दिया।

     

    वह व्यक्ति चलते समय हल्का-सा लंगड़ा रहा था।

     

    अर्जुन को तुरंत एक नाम याद आया—

     

    राहुल।

     

    राहुल के दाहिने पैर में पुरानी चोट थी।

     

    पुलिस उसके घर पहुँची।

     

    राहुल वहाँ नहीं था।

     

    कमरे की तलाशी ली गई।

     

    अलमारी में एक लाल बैग मिला।

     

    उसमें खून से सना कपड़ा था।

     

    और एक पुराना मोबाइल।

     

    अर्जुन ने मोबाइल चालू किया।

     

    उसमें सिर्फ एक वीडियो था।

     

    वीडियो में विवेक बैठा था।

     

    उसके सामने कैमरा रखा था।

     

    विवेक कह रहा था—

     

    “अगर मेरी हत्या हो जाए तो समझ लेना कि मैंने जो सच छिपाया था, वह अब किसी के लिए खतरा बन चुका है।”

     

    वीडियो अचानक बंद हो गया।

     

    अर्जुन ने तुरंत राहुल की तलाश शुरू कर दी।

     

    रात करीब दस बजे राहुल खुद पुलिस स्टेशन पहुँचा।

     

    उसने कहा—

     

    “मैंने किसी को नहीं मारा।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “फिर तुम्हारा बैग हत्या की जगह क्यों मिला?”

     

    राहुल का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “तुम विनय को जानते थे?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    राहुल चुप रहा।

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास दो विकल्प हैं। सच बताओ या गिरफ्तार हो जाओ।”

     

    राहुल ने आखिरकार कहा—

     

    “विनय ने मेरे भाई को ब्लैकमेल किया था।”

     

    “किस बात पर?”

     

    “दस साल पुराने घोटाले पर।”

     

    “और तुम्हारे भाई ने पैसे दिए?”

     

    “हाँ।”

     

    “कितने?”

     

    “हर साल।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम्हें यह सब कैसे पता?”

     

    राहुल ने कहा—

     

    “क्योंकि मैं खुद विनय से मिला था।”

     

    “कब?”

     

    “विवेक की हत्या से एक दिन पहले।”

     

    अर्जुन ने उसे घूरा।

     

    “तुमने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”

     

    राहुल ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि मुझे डर था।”

     

    “किससे?”

     

    राहुल ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय पुलिस स्टेशन के बाहर गोली चलने की आवाज़ आई।

     

    सभी अधिकारी बाहर भागे।

     

    सड़क पर कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर एक लिफाफा पड़ा था।

     

    अर्जुन ने उसे उठाया।

     

    अंदर एक कागज़ था—

     

    “गलत आदमी को पकड़ रहे हो।”

     

    और नीचे लिखा था—

     

    “अगली लाश तुम्हारे बहुत करीब होगी।”

     

    अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उसने तुरंत नैना और सुमन को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया।

     

    लेकिन रात करीब दो बजे पुलिस स्टेशन में बिजली चली गई।

     

    सिर्फ दस सेकंड के लिए।

     

    जब रोशनी वापस आई…

     

    सुमन गायब थी।

     

    उसके कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था।

     

    खिड़की बंद थी।

     

    लेकिन कमरे के फर्श पर खून की कुछ बूंदें थीं।

     

    अर्जुन ने दरवाज़ा तोड़कर अंदर प्रवेश किया।

     

    सुमन वहाँ नहीं थी।

     

    टेबल पर सिर्फ एक कागज़ पड़ा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “वह मरने वाली नहीं थी। उसे सच बोलने के लिए ले जाया गया है।”

     

    अर्जुन ने तुरंत आसपास के कैमरों की फुटेज देखी।

     

    करीब 1:58 बजे एक व्यक्ति पुलिस स्टेशन के पीछे दिखाई दिया।

     

    उसने सुमन को बाहर ले जाते समय अपना चेहरा छिपाया हुआ था।

     

    लेकिन कैमरे ने उसके हाथ की घड़ी साफ रिकॉर्ड की।

     

    काली घड़ी।

     

    अर्जुन को याद आया—

     

    वही घड़ी उसने नैना के हाथ में देखी थी।

     

    अगली सुबह नैना को हिरासत में लिया गया।

     

    उसने कोई विरोध नहीं किया।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “सुमन कहाँ है?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “तुम्हारी घड़ी कैमरे में दिखाई दी है।”

     

    नैना कुछ सेकंड चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “हाँ। मैं वहाँ थी।”

     

    अर्जुन ने टेबल पर हाथ मारा।

     

    “तो सुमन को तुमने उठाया?”

     

    नैना ने धीरे से कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “तो कौन?”

     

    नैना ने उसकी आँखों में देखा।

     

    और बहुत धीमी आवाज़ में बोली—

     

    “आप जिसे खोज रहे हैं… वह आपसे एक कदम आगे है।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “आपके अपने विभाग में कोई।”

     

    अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “विवेक की हत्या के बाद सबसे पहले घटनास्थल पर कौन पहुँचा था?”

     

    अर्जुन चुप हो गया।

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “आप।”

     

    उसी क्षण अर्जुन के फोन पर एक संदेश आया।

     

    एक अज्ञात नंबर से।

     

    संदेश में एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में सुमन एक अंधेरे कमरे में बंधी हुई थी।

     

    उसके पीछे एक व्यक्ति खड़ा था।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन हाथ में वही काली घड़ी थी।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “अगर कातिल को पकड़ना है, तो आज रात पुराने थिएटर में अकेले आना।”

     

    अर्जुन ने फोन बंद किया।

     

    अब उसे यकीन था—

     

    कातिल पुलिस से एक कदम आगे था।

     

    लेकिन उसे यह नहीं पता था कि पुराने थिएटर में उसका सामना सिर्फ कातिल से नहीं…

     

    बल्कि दस साल पुराने उस राज से होने वाला था, जिसके कारण पहली हत्या हुई थी।

  • कातिल कौन? भाग 1 — पहली लाश

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे शहर के पुराने इलाके में अचानक बिजली चली गई।

     

    पूरी गली अंधेरे में डूब गई।

     

    उसी समय विवेक मिश्रा अपने घर की बालकनी में खड़ा फोन पर किसी से बात कर रहा था।

     

    “मैंने कहा ना, मुझे अब किसी से डर नहीं लगता,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।

     

    दूसरी तरफ से कुछ कहा गया।

     

    विवेक का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “तुम… ये कैसे जानते हो?”

     

    कुछ सेकंड वह चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “ठीक है। कल सुबह मिलते हैं। लेकिन आज रात मुझे फोन मत करना।”

     

    उसने फोन काट दिया।

     

    विवेक ने कमरे की खिड़की बंद की और पर्दा खींच दिया।

     

    उसे क्या पता था कि अगले कुछ घंटों में उसकी जिंदगी खत्म होने वाली थी।

     

    सुबह करीब छह बजे उसकी पड़ोसी सुमन ने पुलिस को फोन किया।

     

    “साहब… विवेक जी के घर का दरवाज़ा खुला है। अंदर कुछ गड़बड़ लग रही है।”

     

    पुलिस कुछ ही मिनटों में वहाँ पहुँच गई।

     

    इंस्पेक्टर अर्जुन राठौड़ ने घर के अंदर कदम रखा।

     

    विवेक अपने अध्ययन कक्ष में जमीन पर पड़ा था।

     

    उसकी मौत हो चुकी थी।

     

    कमरे में सामान बिखरा हुआ था, लेकिन चोरी के कोई स्पष्ट निशान नहीं थे।

     

    टेबल पर एक गिलास पानी रखा था।

     

    उसके पास एक कागज़ पड़ा था।

     

    कागज़ पर सिर्फ चार शब्द लिखे थे—

     

    “कातिल तुम्हारे बहुत करीब है।”

     

    अर्जुन ने कागज़ को ध्यान से देखा।

     

    “फिंगरप्रिंट?”

     

    फोरेंसिक अधिकारी ने कहा—

     

    “कुछ निशान हैं, लेकिन अभी स्पष्ट नहीं हैं।”

     

    अर्जुन ने कमरे का निरीक्षण किया।

     

    खिड़की अंदर से बंद थी।

     

    मुख्य दरवाज़े पर जबरदस्ती घुसने के निशान नहीं थे।

     

    मतलब विवेक ने हत्यारे को खुद अंदर आने दिया था।

     

    पुलिस ने विवेक के फोन की जाँच शुरू की।

     

    आखिरी कॉल रात 11:32 बजे हुई थी।

     

    नंबर सेव नहीं था।

     

    अर्जुन ने नंबर पर फोन किया।

     

    फोन बंद था।

     

    जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि विवेक एक स्थानीय कंपनी में अकाउंटेंट था।

     

    उसकी जिंदगी देखने में बिल्कुल सामान्य थी।

     

    पत्नी की दो साल पहले मृत्यु हो चुकी थी।

     

    उनकी एक बेटी थी—नैना, जो दूसरे शहर में पढ़ती थी।

     

    विवेक का छोटा भाई राहुल उसी शहर में रहता था।

     

    पुलिस ने राहुल से पूछताछ की।

     

    “आपके भाई से आखिरी बार कब बात हुई?”

     

    राहुल ने कहा—

     

    “कल शाम। करीब आठ बजे।”

     

    “किस बारे में?”

     

    “कुछ खास नहीं।”

     

    अर्जुन ने उसे गौर से देखा।

     

    “आप परेशान लग रहे हैं।”

     

    राहुल ने नजरें झुका लीं।

     

    “भाई से मेरा कुछ समय से झगड़ा चल रहा था।”

     

    “किस बात पर?”

     

    “पैसों को लेकर।”

     

    “कितने पैसे?”

     

    राहुल चुप रहा।

     

    अर्जुन ने दोबारा पूछा—

     

    “कितने?”

     

    “दस लाख।”

     

    कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    राहुल ने बताया कि उनके पिता की पुरानी जमीन बेचकर मिले पैसे विवेक के पास थे। राहुल अपना हिस्सा मांग रहा था।

     

    “लेकिन मैंने उसे नहीं मारा,” उसने कहा।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “आप रात में कहाँ थे?”

     

    “अपने घर पर।”

     

    “कोई गवाह?”

     

    “नहीं।”

     

    यही बात राहुल को पहला संदिग्ध बना रही थी।

     

    लेकिन पुलिस को एक और नाम मिला।

     

    सुमन।

     

    वही पड़ोसी जिसने पुलिस को फोन किया था।

     

    अर्जुन ने उससे पूछा—

     

    “आपको कैसे पता चला कि विवेक के घर कुछ हुआ है?”

     

    सुमन ने कहा—

     

    “सुबह मैंने दरवाज़ा खुला देखा।”

     

    “क्या आपने अंदर जाकर देखा?”

     

    “नहीं। मैं डर गई थी।”

     

    अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “लेकिन आपने पुलिस को फोन करने से पहले किसे फोन किया था?”

     

    सुमन चौंक गई।

     

    “मैंने… किसी को नहीं।”

     

    अर्जुन ने अपना फोन उसकी तरफ किया।

     

    कॉल रिकॉर्ड में रात 11:47 बजे सुमन की विवेक को कॉल दिखाई दे रही थी।

     

    सुमन का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “हाँ… मैंने फोन किया था।”

     

    “क्यों?”

     

    “बस… एक जरूरी बात करनी थी।”

     

    “क्या बात?”

     

    सुमन चुप रही।

     

    अर्जुन ने सख्त आवाज़ में पूछा—

     

    “आपने रात में विवेक को क्यों फोन किया था?”

     

    सुमन ने आखिरकार कहा—

     

    “क्योंकि उसने मुझे धमकी दी थी।”

     

    “किस बात की?”

     

    “उसने कहा था कि अगर मैंने किसी को सच बता दिया तो वह मुझे बर्बाद कर देगा।”

     

    अर्जुन चौंक गया।

     

    “कौन सा सच?”

     

    सुमन ने जवाब नहीं दिया।

     

    इसी बीच पुलिस को विवेक के घर से एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर तीन नाम लिखे थे—

     

    राहुल।

     

    सुमन।

     

    और…

     

    नैना।

     

    तीनों के सामने एक-एक सवाल लिखा था।

     

    राहुल के सामने—

     

    “पैसे?”

     

    सुमन के सामने—

     

    “उस रात का सच?”

     

    नैना के सामने—

     

    “माँ की मौत?”

     

    अर्जुन की नजर वहीं टिक गई।

     

    विवेक की पत्नी की मौत दो साल पहले हुई थी।

     

    क्या वह हादसा था?

     

    या हत्या?

     

    अर्जुन ने नैना को तुरंत शहर बुलाया।

     

    अगली शाम नैना पुलिस स्टेशन पहुँची।

     

    वह शांत थी।

     

    बहुत ज्यादा शांत।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम्हारे पिता की हत्या हुई है।”

     

    नैना ने बिना किसी भाव के कहा—

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तुम आखिरी बार उनसे कब मिली थीं?”

     

    “तीन दिन पहले।”

     

    “क्या तुम्हारा उनसे झगड़ा हुआ था?”

     

    “हाँ।”

     

    “किस बात पर?”

     

    नैना ने कुछ सेकंड उसे देखा।

     

    फिर बोली—

     

    “मेरी माँ की मौत के बारे में।”

     

    अर्जुन आगे झुका।

     

    “तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारी माँ की मौत कैसे हुई थी?”

     

    नैना ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “मेरे पिता ने उन्हें नहीं मारा था…”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    फिर बोली—

     

    “लेकिन वह उन्हें बचा भी सकते थे।”

     

    अर्जुन चौंक गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “मेरी माँ की मौत कोई हादसा नहीं था। मेरे पिता जानते थे कि उस रात क्या हुआ था।”

     

    “और तुमने उनसे सच पूछा?”

     

    “हाँ।”

     

    “उन्होंने क्या कहा?”

     

    नैना की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “उन्होंने कहा कि अगर मैंने सच जान लिया… तो मैं उस कातिल को पहचान जाऊँगी।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “किस कातिल को?”

     

    नैना ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “मैं नहीं जानती।”

     

    उसी समय पुलिस स्टेशन में एक कांस्टेबल दौड़ता हुआ आया।

     

    “सर! विवेक के घर से एक और चीज मिली है।”

     

    “क्या?”

     

    उसने एक छोटा-सा लिफाफा अर्जुन को दिया।

     

    लिफाफे के अंदर एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में विवेक, उसकी पत्नी और तीन लोग खड़े थे।

     

    राहुल।

     

    सुमन।

     

    और एक तीसरा व्यक्ति…

     

    जिसका चेहरा काले मार्कर से मिटा दिया गया था।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “इन चारों में से एक कातिल है।”

     

    अर्जुन ने तस्वीर को पलटा।

     

    पीछे एक और लाइन थी—

     

    “लेकिन असली कातिल वही है जिस पर कोई शक नहीं करेगा।”

     

    अर्जुन ने कमरे में मौजूद तीनों संदिग्धों की तस्वीरें सामने रखीं।

     

    राहुल।

     

    सुमन।

     

    नैना।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “खेल अभी शुरू हुआ है।”

     

    उसे नहीं पता था कि अगले दिन…

     

    इस केस में दूसरी लाश मिलने वाली थी।

  • 😱भानगढ़ का किला😱 भाग 3 — श्राप का अंत😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    सूरज की पहली किरण आसमान पर दिखाई दे चुकी थी।

     

    लेकिन गोपाल का कोई पता नहीं था।

     

    आदित्य खाई के किनारे खड़ा था।

     

    “गोपाल!”

     

    उसकी आवाज़ पहाड़ियों से टकराकर वापस आई।

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    मीरा रोते हुए बोली—

     

    “वह गिर गया होगा।”

     

    कबीर ने नीचे देखने की कोशिश की।

     

    लेकिन खाई इतनी गहरी थी कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी पीछे से एक धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    तीनों ने पलटकर देखा।

     

    काली परछाईं अब पहले से छोटी हो चुकी थी।

     

    उसकी आवाज़ कमजोर थी।

     

    “सूरज…”

     

    “मुझे रोक नहीं सकता।”

     

    आदित्य समझ गया कि पायल अभी तक नष्ट नहीं हुई थी।

     

    “गोपाल पायल लेकर कहाँ गया?”

     

    परछाईं मुस्कुराई।

     

    “जहाँ से सब शुरू हुआ था।”

     

    “कहाँ?”

     

    “किले के नीचे।”

     

    अचानक जमीन काँपी।

     

    किले की दीवार का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा।

     

    उसके पीछे एक सीढ़ी दिखाई दी।

     

    सीढ़ियाँ जमीन के अंदर जा रही थीं।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “हमें नीचे जाना होगा।”

     

    मीरा ने डरते हुए पूछा—

     

    “लेकिन सूरज निकल चुका है।”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “तभी तो।”

     

    तीनों सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

     

    जितना नीचे जाते, हवा उतनी ठंडी होती जाती।

     

    कुछ देर बाद वे एक विशाल भूमिगत कमरे में पहुँचे।

     

    कमरे के बीच में एक पत्थर का चबूतरा था।

     

    उस पर गोपाल बैठा था।

     

    उसके हाथ में पायल थी।

     

    लेकिन उसकी आँखें बंद थीं।

     

    आदित्य दौड़कर उसके पास गया।

     

    “गोपाल!”

     

    गोपाल ने आँखें खोलीं।

     

    “तुम यहाँ क्यों आए?”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “तुम्हें लेने।”

     

    गोपाल ने सिर हिलाया।

     

    “मैं नहीं जा सकता।”

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने अपनी हथेली दिखाई।

     

    उसकी नसें काली पड़ चुकी थीं।

     

    “पायल ने मुझे पकड़ लिया है।”

     

    मीरा ने पायल की ओर देखा।

     

    उसमें से काला धुआँ निकल रहा था।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “रूहानी ने हमें आधा सच बताया था।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “पायल तोड़ने से श्राप खत्म नहीं होगा।”

     

    आदित्य चौंका।

     

    “फिर?”

     

    “पायल को उस जगह रखना होगा जहाँ रूहानी ने पहली बार तांत्रिक का सामना किया था।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “वह जगह कहाँ है?”

     

    गोपाल ने सामने की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    वहाँ एक पत्थर का दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर वही निशान बना था।

     

    आदित्य उसके पास गया।

     

    जैसे ही उसने हाथ लगाया, दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे में सिर्फ एक पुरानी मूर्ति थी।

     

    उसके सामने राख से बना गोल घेरा था।

     

    और उस घेरे के बीच एक पत्थर पर लिखा था—

     

    “डर को खत्म करने के लिए उसे पहचानना पड़ता है।”

     

    अचानक कमरे में रूहानी दिखाई दी।

     

    इस बार उसका चेहरा शांत था।

     

    उसने कहा—

     

    “मैंने तांत्रिक को नहीं मारा था।”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “लेकिन हमने देखा था।”

     

    रूहानी ने सिर हिलाया।

     

    “वह दृश्य झूठ था।”

     

    तीनों चौंक गए।

     

    “झूठ?”

     

    रूहानी बोली—

     

    “तांत्रिक ने अपनी मौत का भ्रम पैदा किया था। उसने मेरे डर का इस्तेमाल किया। उसने मुझे विश्वास दिलाया कि मैंने उसे मार दिया है।”

     

    “फिर असली घटना क्या थी?”

     

    रूहानी ने कहा—

     

    “उस रात उसने मुझे पायल पहनाई। वह पायल कोई साधारण चीज़ नहीं थी। उसमें उसकी आत्मा का एक हिस्सा बंद था।”

     

    “और तुम?”

     

    “मैंने पायल उतारने की कोशिश की। लेकिन उसने मुझे रोक लिया।”

     

    रूहानी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “उसने कहा था कि जब तक कोई उसके डर को स्वीकार नहीं करेगा, वह इस किले में रहेगा।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “तो इतने वर्षों से जो लोग डरते रहे…”

     

    “उनका डर उसे शक्ति देता रहा।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन अगर हम उससे नहीं डरें तो?”

     

    रूहानी मुस्कुराई।

     

    “तभी उसका अंत होगा।”

     

    अचानक पूरा कमरा अंधेरे से भर गया।

     

    काली परछाईं फिर सामने आ गई।

     

    इस बार वह बहुत विशाल थी।

     

    उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी—

     

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते!”

     

    आदित्य पीछे हट गया।

     

    लेकिन फिर उसे दीवार पर लिखा वाक्य याद आया।

     

    डर को खत्म करने के लिए उसे पहचानना पड़ता है।

     

    उसने परछाईं की ओर देखा।

     

    “तू तांत्रिक नहीं है।”

     

    परछाईं रुक गई।

     

    “तू सिर्फ हमारा डर है।”

     

    वह चीखी।

     

    “मैं इस किले का मालिक हूँ!”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “नहीं। तू तभी शक्तिशाली है जब हम तुझसे डरते हैं।”

     

    मीरा आगे बढ़ी।

     

    “और अब हम नहीं डरेंगे।”

     

    कबीर भी उनके साथ खड़ा हो गया।

     

    गोपाल ने पायल उठाई।

     

    काली परछाईं अचानक उसकी तरफ झपटी।

     

    गोपाल ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “आज नहीं।”

     

    उसने पायल पत्थर के घेरे में फेंक दी।

     

    जैसे ही पायल जमीन पर गिरी…

     

    एक जोरदार विस्फोट जैसी आवाज़ हुई।

     

    काले धुएँ ने पूरे कमरे को भर दिया।

     

    परछाईं चीखने लगी।

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    किले के ऊपर पत्थर गिरने लगे।

     

    रूहानी ने चिल्लाकर कहा—

     

    “भागो!”

     

    आदित्य ने गोपाल को उठाया।

     

    चारों सुरंग की ओर भागे।

     

    पीछे से परछाईं की अंतिम चीख सुनाई दी—

     

    “तुम मुझे रोक नहीं सकते!”

     

    रूहानी की आवाज़ आई—

     

    “आज से कोई तुम्हें याद भी नहीं करेगा।”

     

    एक तेज़ सफेद रोशनी कमरे में फैल गई।

     

    फिर…

     

    सब शांत हो गया।

     

    चारों किसी तरह सीढ़ियों से ऊपर पहुँचे।

     

    बाहर सुबह पूरी तरह हो चुकी थी।

     

    भानगढ़ का किला पहली बार उन्हें डरावना नहीं लग रहा था।

     

    हवा शांत थी।

     

    पक्षियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

     

    गोपाल जमीन पर बैठ गया।

     

    उसके हाथ की काली नसें गायब हो चुकी थीं।

     

    उसने हैरानी से अपनी हथेली देखी।

     

    “मैं बच गया।”

     

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

     

    “रूहानी?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    आदित्य ने पीछे मुड़कर महल की ओर देखा।

     

    ऊपर की टूटी हुई खिड़की में एक महिला खड़ी थी।

     

    रूहानी।

     

    उसने हल्की मुस्कान के साथ हाथ हिलाया।

     

    फिर धीरे-धीरे धूप में विलीन हो गई।

     

    कुछ दिनों बाद आदित्य ने अपनी डॉक्यूमेंट्री पूरी की।

     

    लेकिन उसने उसमें रूहानी और उस रात की सारी घटना शामिल नहीं की।

     

    लोग शायद विश्वास नहीं करते।

     

    या शायद…

     

    बहुत ज्यादा विश्वास कर लेते।

     

    उसने सिर्फ इतना बताया कि भानगढ़ की असली कहानी डर की नहीं…

     

    बल्कि उन लोगों की है जो डर को सच मान लेते हैं।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तू सच में मानता है कि सब खत्म हो गया?”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    गोपाल चुपचाप बैठा रहा।

     

    फिर उसने अपनी जेब से कुछ निकाला।

     

    वह वही चाँदी की पायल थी।

     

    आदित्य का चेहरा बदल गया।

     

    “ये तुम्हारे पास कैसे आई?”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “जब हम बाहर निकले थे, ये मेरी जेब में थी।”

     

    मीरा ने डरते हुए पूछा—

     

    “तो क्या श्राप अभी भी…”

     

    गोपाल ने पायल को ध्यान से देखा।

     

    पायल अब काली नहीं थी।

     

    वह बिल्कुल साफ और चमकदार थी।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    उसी समय पायल से एक बहुत हल्की आवाज़ आई।

     

    छन…

     

    चारों चुप हो गए।

     

    फिर दूसरी आवाज़ आई।

     

    छन…

     

    और उसके बाद जैसे किसी महिला ने बहुत धीमे से कहा—

     

    “धन्यवाद।”

     

    आदित्य मुस्कुरा दिया।

     

    उसने पायल को एक कपड़े में लपेटकर सुरक्षित रख दिया।

     

    उस दिन के बाद भानगढ़ के किले में उन्हें फिर कभी कोई अजीब आवाज़ सुनाई नहीं दी।

     

    न कोई पायल।

     

    न किसी के रोने की आवाज़।

     

    न किसी के कदम।

     

    और न ही वह काली परछाईं।

     

    रूहानी आखिरकार आज़ाद हो चुकी थी।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने एक बात सच साबित कर दी—

     

    हर भूत बुरा नहीं होता।

     

    कभी-कभी जिसे हम भूत समझते हैं…

     

    वह खुद किसी पुराने डर का कैदी होता है।

     

    और जब डर खत्म हो जाता है…

     

    तो श्राप भी खत्म हो जाता है।

     

    समाप्त।

  • 😱भानगढ़ का किला😱 भाग 2 — रूहानी का रहस्य😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    गीले पैरों के निशान किले के पुराने महल की ओर जा रहे थे।

     

    रात पूरी तरह उतर चुकी थी।

     

    आसमान पर बादल थे और चाँद दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आदित्य आगे चल रहा था।

     

    उसके पीछे मीरा, कबीर और गोपाल थे।

     

    कुछ दूरी पर जाकर निशान अचानक एक पत्थर की दीवार के सामने खत्म हो गए।

     

    गोपाल ने दीवार को ध्यान से देखा।

     

    “यहाँ कभी रास्ता हुआ करता था।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “अब?”

     

    “अब बंद है।”

     

    आदित्य ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    उसे अंदर से हल्की धड़कन जैसी आवाज़ सुनाई दी।

     

    धक… धक… धक…

     

    उसने हाथ तुरंत पीछे खींच लिया।

     

    “इस दीवार के पीछे कुछ है।”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “हमें यहाँ नहीं रुकना चाहिए।”

     

    लेकिन मीरा ने दीवार के एक हिस्से पर हाथ रखा।

     

    अचानक पत्थर अपने आप पीछे हट गया।

     

    दीवार के अंदर एक संकरा रास्ता खुल गया।

     

    अंदर से ठंडी हवा बाहर आई।

     

    और साथ ही किसी महिला के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    गोपाल ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “यही है…”

     

    “क्या?”

     

    “रूहानी का कमरा।”

     

    वे अंदर चले गए।

     

    कमरा बहुत पुराना था।

     

    बीच में पत्थर की एक चौकी थी।

     

    उस पर एक टूटा हुआ आईना रखा था।

     

    दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

     

    और एक कोने में लोहे का संदूक पड़ा था।

     

    आदित्य ने संदूक खोला।

     

    अंदर कुछ पुराने कागज़ और एक डायरी थी।

     

    डायरी पर लिखा था—

     

    “रूहानी की आखिरी रात।”

     

    आदित्य ने डायरी खोल दी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मेरा नाम रूहानी है। मैं राजमहल में नृत्य करती हूँ। लेकिन पिछले कुछ दिनों से महल में एक तांत्रिक आया है। वह मुझे अपने वश में करना चाहता है।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैंने उसे मना कर दिया। उसने कहा कि वह मुझे इस किले की दीवारों में कैद कर देगा।”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “क्या वही तांत्रिक किले के श्राप का कारण था?”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “आगे पढ़ो।”

     

    आदित्य ने अगला पन्ना पलटा।

     

    “आज रात तांत्रिक ने मुझे एक मंत्र दिखाया। उसने कहा कि इस मंत्र से मेरी आत्मा हमेशा के लिए किले से बंध जाएगी। मैंने उसकी बात नहीं मानी।”

     

    अगले पन्ने पर स्याही फैली हुई थी।

     

    बस एक वाक्य साफ दिखाई दे रहा था—

     

    “मैंने उसे नहीं मारा। लेकिन किसी और ने उसे मार दिया।”

     

    सब चुप हो गए।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “किसी और ने?”

     

    आदित्य ने डायरी के अगले पन्ने पलटे।

     

    वहाँ सिर्फ एक चित्र था।

     

    चित्र में एक महिला थी।

     

    उसके पीछे एक काला साया।

     

    साए के नीचे लिखा था—

     

    “वह जो महल के नीचे रहता है।”

     

    अचानक कमरे का आईना हिलने लगा।

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    आईने में चारों दिखाई दे रहे थे।

     

    लेकिन उनके पीछे…

     

    एक पाँचवीं आकृति खड़ी थी।

     

    लंबे बाल।

     

    सफेद चेहरा।

     

    रूहानी।

     

    कबीर ने पलटकर देखा।

     

    पीछे कोई नहीं था।

     

    फिर आईने में देखा।

     

    रूहानी अभी भी वहीं थी।

     

    इस बार वह मीरा के बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

     

    मीरा चीख पड़ी।

     

    आईना अचानक टूट गया।

     

    काँच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए।

     

    और उनमें से एक टुकड़े पर खून जैसा लाल निशान दिखाई दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “रूहानी कातिल नहीं थी।”

     

    गोपाल ने धीरे से कहा—

     

    “तो फिर असली कातिल कौन था?”

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    आदित्य ने उसे खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    फिर दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    “रूहानी…”

     

    “रूहानी…”

     

    “रूहानी…”

     

    एक आवाज़ बाकी आवाज़ों से अलग थी।

     

    वह पुरुष की थी।

     

    “तुमने मेरा रहस्य क्यों खोला?”

     

    कमरे की दीवार पर एक काली परछाईं उभरने लगी।

     

    वह धीरे-धीरे इंसान के आकार में बदल गई।

     

    गोपाल काँपने लगा।

     

    “ये वही है…”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    “तांत्रिक।”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “सदियाँ बीत गईं…”

     

    “फिर भी लोग मेरा नाम ढूँढते हैं।”

     

    आदित्य ने साहस करके पूछा—

     

    “तुमने रूहानी को श्राप दिया था?”

     

    परछाईं ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    चारों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “तो किसने दिया?”

     

    परछाईं ने जवाब दिया—

     

    “उसने खुद को बचाने के लिए जो किया… वही उसका श्राप बन गया।”

     

    तभी कमरे में तेज़ हवा चली।

     

    दीवार पर एक दृश्य दिखाई देने लगा।

     

    रूहानी उसी कमरे में खड़ी थी।

     

    तांत्रिक उसके सामने मंत्र पढ़ रहा था।

     

    लेकिन अचानक रूहानी ने जमीन से एक पत्थर उठाया और तांत्रिक के सिर पर मार दिया।

     

    तांत्रिक जमीन पर गिर गया।

     

    रूहानी डर गई।

     

    वह भागने लगी।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने देखा कि तांत्रिक अभी जिंदा था।

     

    उसने एक आखिरी मंत्र पढ़ा।

     

    उसकी आत्मा एक काले धुएँ में बदल गई।

     

    और रूहानी की चाँदी की पायल से जा चिपकी।

     

    तांत्रिक ने कहा—

     

    “जब तक यह पायल इस किले में रहेगी, मैं भी रहूँगा।”

     

    रूहानी ने पायल उतारने की कोशिश की।

     

    लेकिन पायल उसके पैर से चिपक चुकी थी।

     

    वह चीखने लगी।

     

    “मुझे बचाओ!”

     

    तभी दृश्य समाप्त हो गया।

     

    मीरा रोने लगी।

     

    “तो रूहानी भी फँसी हुई थी।”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “और तांत्रिक उसकी आत्मा का इस्तेमाल करके लोगों को डराता रहा।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “तो इसे खत्म कैसे करें?”

     

    परछाईं फिर सामने आ गई।

     

    “पायल तोड़ दो।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “बस?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “पायल टूटेगी तो मेरी शक्ति खत्म हो जाएगी। लेकिन…”

     

    “लेकिन क्या?”

     

    “जिसके हाथ से पायल टूटेगी, उसका डर हमेशा के लिए इस किले में कैद हो जाएगा।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आदित्य ने पायल उठाई।

     

    “मैं इसे तोड़ूँगा।”

     

    मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं!”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “अगर हमने इसे नहीं तोड़ा तो ये लोगों को हमेशा डराता रहेगा।”

     

    गोपाल ने अचानक कहा—

     

    “रुको।”

     

    उसकी आवाज़ काँप रही थी।

     

    “पायल तोड़ने के लिए सिर्फ हिम्मत नहीं चाहिए।”

     

    “क्या चाहिए?”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “जिसने रूहानी को धोखा दिया था, उसका खून।”

     

    आदित्य चौंका।

     

    “वो आदमी तो सदियों पहले मर चुका है।”

     

    गोपाल ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।

     

    “वह आदमी नहीं…”

     

    “उसका वंश।”

     

    गोपाल ने बताया कि किले के आसपास रहने वाले एक पुराने परिवार के बारे में कहा जाता था कि वे उसी तांत्रिक के वंशज थे।

     

    और संयोग से…

     

    गोपाल का परिवार भी उसी वंश से जुड़ा था।

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    गोपाल ने अपनी जेब से चाकू निकाला और अपनी हथेली पर हल्का-सा कट लगाया।

     

    एक बूंद खून पायल पर गिर गई।

     

    अचानक पायल लाल रोशनी से चमकने लगी।

     

    कमरा काँपने लगा।

     

    काली परछाईं चीख उठी—

     

    “नहीं!”

     

    रूहानी की आत्मा आईने के टूटे हुए टुकड़ों में दिखाई दी।

     

    उसने कहा—

     

    “अब आखिरी काम बाकी है।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    रूहानी ने कहा—

     

    “पायल को किले की सबसे ऊँची दीवार से नीचे फेंक दो।”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “लेकिन वहाँ पहुँचना असंभव है।”

     

    रूहानी बोली—

     

    “अगर सूर्योदय से पहले पायल किले से बाहर चली गई…”

     

    “तो श्राप समाप्त हो जाएगा।”

     

    अचानक काली परछाईं उन पर झपटी।

     

    कमरे की दीवार टूट गई।

     

    चारों भागे।

     

    पीछे से भयानक चीखें आने लगीं।

     

    आदित्य पायल लेकर आगे दौड़ रहा था।

     

    कबीर और मीरा उसके साथ थे।

     

    गोपाल पीछे मुड़कर देख रहा था।

     

    काली परछाईं उनका पीछा कर रही थी।

     

    वे किले की ऊँची दीवार के पास पहुँचे।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही रास्ता बंद हो गया।

     

    सामने सिर्फ एक गहरी खाई थी।

     

    आदित्य ने नीचे देखा।

     

    सूरज उगने में कुछ ही मिनट बाकी थे।

     

    काली परछाईं उनके पीछे खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम पायल बाहर नहीं ले जा सकते।”

     

    आदित्य ने पायल को कसकर पकड़ लिया।

     

    तभी गोपाल ने पीछे से आवाज़ दी—

     

    “आदित्य!”

     

    आदित्य पलटा।

     

    गोपाल मुस्कुरा रहा था।

     

    उसने कहा—

     

    “किसी एक को यहीं रहना होगा।”

     

    और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता…

     

    गोपाल ने पायल आदित्य के हाथ से छीन ली।

     

    वह खाई की ओर भागा।

     

    काली परछाईं उसके पीछे दौड़ी।

     

    गोपाल ने आखिरी बार पीछे देखा।

     

    फिर चिल्लाया—

     

    “भागो!”

     

    और वह पायल लेकर अंधेरे में गायब हो गया।

     

    सूरज की पहली किरण आसमान पर दिखाई देने लगी।

     

    लेकिन आदित्य, मीरा और कबीर के सामने अब सिर्फ एक सवाल था—

     

    क्या गोपाल सच में मर गया था… या वह खुद किले का अगला हिस्सा बन चुका था?

  • 😱भानगढ़ का किला😱 भाग 1 — किले में पहली रात😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    राजस्थान की सूखी पहाड़ियों के बीच बसा भानगढ़ का किला दिन में भी किसी रहस्य से कम नहीं लगता था।

     

    ऊँची-ऊँची टूटी दीवारें, सुनसान गलियाँ, पुराने महल के खंडहर और दूर तक फैली वीरानी…

     

    लेकिन शाम होते ही उस जगह का माहौल पूरी तरह बदल जाता था।

     

    स्थानीय लोग कहते थे कि सूरज ढलने के बाद किले के अंदर कोई नहीं जाता।

     

    क्योंकि रात में वहाँ से पायल की आवाज़ आती थी।

     

    कभी किसी औरत के रोने की।

     

    और कभी…

     

    किसी के धीरे-धीरे अपना नाम पुकारने की।

     

    लेकिन आदित्य इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    वह एक युवा डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता था और उसे भारत की रहस्यमयी ऐतिहासिक जगहों पर फिल्में बनाना पसंद था।

     

    उसके साथ उसकी दोस्त मीरा, कैमरा संभालने वाला कबीर और स्थानीय गाइड गोपाल थे।

     

    गोपाल ने किले के मुख्य रास्ते पर पहुँचते ही कहा—

     

    “एक बात पहले ही बता देता हूँ। सूरज डूबने के बाद हम यहाँ नहीं रुकेंगे।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “क्यों? भूत पकड़ लेगा?”

     

    गोपाल ने उसकी तरफ देखा।

     

    “भूत से ज्यादा डर उस चीज़ का है जो खुद को भूत नहीं मानती।”

     

    कबीर की हँसी अचानक रुक गई।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “हमें सिर्फ कुछ फुटेज चाहिए। अगर अंधेरा होने लगेगा तो निकल जाएँगे।”

     

    गोपाल ने सिर हिला दिया।

     

    चारों किले के अंदर जाने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया।

     

    हवा भी अजीब तरह से ठंडी लग रही थी।

     

    किले के पुराने बाजार के खंडहरों के बीच से गुजरते हुए मीरा ने एक टूटी हुई दुकान की दीवार पर कुछ देखा।

     

    वहाँ लाल रंग से एक निशान बना था।

     

    “ये क्या है?”

     

    गोपाल ने निशान देखा और तुरंत दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    “इसे मत छूना।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ दूर जाने के बाद वे महल के पास पहुँचे।

     

    महल का एक हिस्सा बाकी जगहों से अलग था।

     

    उसकी दीवारें काली थीं।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “यहाँ रात में कोई नहीं आता।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने धीरे से कहा—

     

    “कहते हैं इसी हिस्से में राजदरबार की एक दासी रहती थी। उसका नाम था रूहानी।”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “रूहानी?”

     

    “हाँ। लोग कहते हैं वह बहुत खूबसूरत थी। एक तांत्रिक उस पर मोहित हो गया था। उसने रूहानी को पाने के लिए जादू किया।”

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “ये तो पुरानी लोककथा है।”

     

    गोपाल बोला—

     

    “लोककथा हो या सच… लेकिन उस रात किले में बहुत कुछ हुआ था।”

     

    “क्या?”

     

    “रूहानी ने तांत्रिक का विरोध किया। तांत्रिक ने गुस्से में किले को श्राप दे दिया।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    गोपाल कुछ कहता, उससे पहले अचानक ऊपर से पत्थर गिरा।

     

    धड़ाम!

     

    सभी चौंक गए।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “हमें वापस चलना चाहिए।”

     

    लेकिन आदित्य ने कैमरा ऊपर कर दिया।

     

    “यही तो हमें चाहिए।”

     

    उन्होंने शूटिंग जारी रखी।

     

    शाम होने लगी।

     

    आसमान नारंगी से धीरे-धीरे काला होने लगा।

     

    गोपाल बार-बार घड़ी देख रहा था।

     

    “हमें अब निकलना होगा।”

     

    लेकिन तभी कैमरे में कुछ दिखाई दिया।

     

    मीरा ने स्क्रीन देखी।

     

    “आदित्य…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “वहाँ कौन खड़ा है?”

     

    कैमरे में उनसे लगभग पचास मीटर दूर एक महिला खड़ी दिखाई दे रही थी।

     

    उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

     

    बाल बहुत लंबे थे।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आदित्य ने कैमरा नीचे किया।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    फिर कैमरा स्क्रीन पर देखा।

     

    महिला अभी भी वहीं थी।

     

    “ये कैसे संभव है?”

     

    कबीर ने कैमरा लिया।

     

    तभी स्क्रीन पर महिला ने अपना सिर उठाया।

     

    और सीधे कैमरे की तरफ देखने लगी।

     

    कबीर के हाथ काँप गए।

     

    “आदित्य… इसे बंद कर।”

     

    स्क्रीन अचानक काली हो गई।

     

    उसी समय दूर से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छन… छन… छन…

     

    गोपाल का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “भागो।”

     

    चारों तेजी से मुख्य द्वार की तरफ भागे।

     

    लेकिन रास्ता जैसे बदल गया था।

     

    जिस रास्ते से वे आए थे, वहाँ अब एक ऊँची दीवार खड़ी थी।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “ये रास्ता तो यहाँ था!”

     

    गोपाल ने घबराकर कहा—

     

    “किला रास्ते बदलता नहीं… हमें भटका रहा है।”

     

    अचानक पीछे से किसी औरत की आवाज़ आई—

     

    “रुक जाओ…”

     

    चारों जम गए।

     

    आवाज़ बहुत पास से आई थी।

     

    मीरा ने धीरे से पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर वही आवाज़ दूसरी तरफ से आई—

     

    “मीरा…”

     

    मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “इसे मेरा नाम कैसे पता?”

     

    आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरे पीछे रहो।”

     

    वे एक टूटे हुए कमरे में घुस गए।

     

    कमरे का दरवाज़ा उन्होंने अंदर से बंद कर लिया।

     

    कुछ सेकंड तक बाहर सन्नाटा रहा।

     

    फिर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    बाहर से जवाब आया—

     

    “गोपाल…”

     

    गोपाल ने घबराकर कहा—

     

    “मैं यहाँ हूँ।”

     

    दरवाज़े के बाहर से फिर आवाज़ आई—

     

    “दरवाज़ा खोलो।”

     

    गोपाल आगे बढ़ा।

     

    आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “वो मेरी आवाज़ है,” गोपाल ने कहा।

     

    आदित्य ने धीरे से पूछा—

     

    “अगर तुम अंदर हो… तो बाहर कौन बोल रहा है?”

     

    गोपाल पीछे हट गया।

     

    कुछ पल बाद बाहर से वही आवाज़ बदल गई।

     

    अब वह आदित्य की आवाज़ थी।

     

    “गोपाल, दरवाज़ा खोलो।”

     

    फिर कबीर की।

     

    “जल्दी खोलो!”

     

    फिर मीरा की।

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    मीरा ने अपने कान बंद कर लिए।

     

    बाहर से अचानक जोर-जोर से हँसी आने लगी।

     

    दरवाज़ा हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “ये हमें अंदर आने के लिए मजबूर कर रहा है।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    गोपाल ने जवाब दिया—

     

    “किले का श्राप।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक काला निशान उभर आया।

     

    वही निशान जो उन्होंने रास्ते में देखा था।

     

    लेकिन इस बार उसके नीचे एक शब्द लिखा था—

     

    “रूहानी।”

     

    मीरा ने डरते हुए कहा—

     

    “ये नाम किसका है?”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “जिससे हमें डरना चाहिए था।”

     

    उसी समय कमरे की छत से धूल गिरने लगी।

     

    और फर्श के नीचे से किसी महिला की धीमी आवाज़ आई—

     

    “तुम लोग बहुत देर से आए हो…”

     

    आदित्य ने नीचे देखा।

     

    फर्श के बीच एक पतली दरार बन चुकी थी।

     

    उस दरार के अंदर से सफेद रोशनी निकल रही थी।

     

    और फिर…

     

    एक हाथ धीरे-धीरे जमीन से बाहर आया।

     

    चारों चीख पड़े।

     

    हाथ के साथ एक चाँदी की पायल भी बाहर निकली।

     

    आदित्य ने पायल को देखा।

     

    उसी क्षण उसके कैमरे की स्क्रीन अपने आप चालू हो गई।

     

    स्क्रीन पर एक दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक पुराना महल।

     

    एक महिला भाग रही थी।

     

    उसके पीछे एक आदमी मंत्र पढ़ रहा था।

     

    और महिला चिल्ला रही थी—

     

    “मुझे छोड़ दो!”

     

    फिर दृश्य बदल गया।

     

    महिला ने कैमरे की तरफ देखा।

     

    वह रूहानी थी।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    आवाज़ बहुत धीमी थी—

     

    “मुझे श्राप नहीं दिया गया था…”

     

    फिर स्क्रीन काली हो गई।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “उसने क्या कहा?”

     

    मीरा ने काँपते हुए जवाब दिया—

     

    “उसने कहा… उसे श्राप नहीं दिया गया था।”

     

    बाहर अचानक तेज़ हवा चलने लगी।

     

    दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    वे निशान धीरे-धीरे आगे जा रहे थे।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “अब हमें उस जगह जाना होगा जहाँ ये निशान जा रहे हैं।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अगर हमने रूहानी की कहानी नहीं समझी…”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    “तो शायद हम इस किले से कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे।”

     

    और चारों उन रहस्यमयी पैरों के निशानों का पीछा करते हुए किले के उस हिस्से की ओर बढ़ गए…

     

    जहाँ पिछले सौ साल से कोई नहीं गया था।

  • 😱राजगीर की आखिरी हवेली 😱 भाग 3 — आखिरी रात😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    कमरे में अंधेरा गहराता जा रहा था।

     

    राघव, अमन और छोटू दीवार से सटे खड़े थे।

     

    सामने उसके पिता के रूप में खड़ा वह साया धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहा था।

     

    उसकी आवाज़ बिल्कुल सुरेश जैसी थी।

     

    “राघव… मेरे पास आओ।”

     

    राघव के कदम पीछे हट गए।

     

    “तुम मेरे पिता नहीं हो।”

     

    साया मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “क्योंकि मेरे पिता मुझे कभी इस तरह नहीं बुलाते थे।”

     

    साया कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसका चेहरा विकृत होने लगा।

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “इसे मत देखना।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “इसे कैसे खत्म करें?”

     

    अनामिका बोली—

     

    “हवेली के डर को खत्म करना होगा।”

     

    “कैसे?”

     

    “जिस याद से यह पैदा हुआ है, उसे स्वीकार करके।”

     

    राघव को डायरी याद आई।

     

    उसने अपने पिता की आखिरी डायरी का फटा हुआ हिस्सा ढूँढना शुरू किया।

     

    कुछ देर बाद उसे मेज के नीचे एक पुराना कागज़ मिला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मैंने उस बच्ची को बचाने की कोशिश नहीं की। मैं डर गया था। लेकिन मैंने उसके डर को हमेशा के लिए अपने बेटे से दूर रखने की कोशिश की।”

     

    राघव की आँखें भर आईं।

     

    “मेरे पिता…”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता बुरे नहीं थे। लेकिन उन्होंने गलती की थी।”

     

    “उन्होंने तुम्हें क्यों छोड़ा?”

     

    “क्योंकि उस रात उन्हें चुनना था। मुझे बचाना या खुद बचना।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “और उन्होंने खुद को चुना?”

     

    अनामिका ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    कमरे में अचानक एक जोरदार चीख गूँजी।

     

    साया दीवार से टकराया।

     

    “झूठ!”

     

    उसकी आवाज़ पूरे कमरे में फैल गई।

     

    “उसने मुझे नहीं छोड़ा था। मैंने उसे छोड़ा था।”

     

    राघव चौंका।

     

    “क्या?”

     

    अनामिका ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने आखिरी समय पर मुझे बाहर निकाल दिया था।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन जब वह मुझे लेकर भाग रहे थे, हवेली के मालिक ने उन्हें पकड़ लिया।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    “उसने तुम्हारे पिता को धमकी दी कि अगर वह मुझे बाहर ले गए तो वह तुम्हारे परिवार को नुकसान पहुँचाएगा।”

     

    राघव की साँस रुक गई।

     

    “मेरे परिवार को?”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “तुम तब छोटे बच्चे थे।”

     

    “इसलिए मेरे पिता ने…”

     

    “हाँ। उन्होंने मुझे वापस कमरे में बंद कर दिया।”

     

    राघव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “और तुम मर गईं।”

     

    अनामिका ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन मरते समय मैंने उसे माफ कर दिया था।”

     

    साया अचानक चीखने लगा।

     

    “नहीं!”

     

    अनामिका ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी शक्ति मेरी नफरत से थी।”

     

    “और अब मेरे अंदर नफरत नहीं है।”

     

    साया पीछे हटने लगा।

     

    राघव को अचानक समझ आया।

     

    यह साया अनामिका की आत्मा नहीं था।

     

    यह उसके डर, गुस्से और अधूरे दर्द से पैदा हुई एक अलग शक्ति थी।

     

    राघव ने कहा—

     

    “तो हमें इसे नष्ट नहीं करना।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “इसे सच बताना होगा।”

     

    राघव साए के सामने खड़ा हो गया।

     

    “तुम अनामिका नहीं हो।”

     

    साया चीखा—

     

    “मैं वही हूँ!”

     

    “नहीं।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “तुम उसके डर हो।”

     

    साया पीछे हट गया।

     

    “तुम उसके दर्द हो।”

     

    साया का शरीर काँपने लगा।

     

    “तुम उसकी मौत नहीं हो।”

     

    राघव की आवाज़ और मजबूत हो गई।

     

    “और अब कोई तुमसे नहीं डरेगा।”

     

    साया ने जोर से चीख मारी।

     

    पूरी हवेली काँपने लगी।

     

    छत से पत्थर गिरने लगे।

     

    दरवाज़े अपने आप खुलने लगे।

     

    दीवारों पर लगी सारी तस्वीरें नीचे गिर गईं।

     

    छोटू रोने लगा।

     

    अमन ने उसे पकड़ लिया।

     

    तभी कमरे के बीच अनामिका दिखाई दी।

     

    उसने राघव की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “मुझे बाहर ले चलो।”

     

    राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

     

    दोनों कमरे से बाहर निकले।

     

    अमन और छोटू उनके पीछे थे।

     

    साया लगातार उनका पीछा कर रहा था।

     

    वे सीढ़ियों से नीचे भागे।

     

    मुख्य दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन दरवाज़े के सामने वही काला साया खड़ा था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम बाहर नहीं जा सकते।”

     

    राघव रुका।

     

    अनामिका उसके पीछे खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “राघव…”

     

    “तुम्हें मेरी एक मदद करनी होगी।”

     

    “क्या?”

     

    “मेरी आखिरी चीज़ बाहर ले जाओ।”

     

    उसने अपनी गर्दन से लॉकेट उतारकर राघव को दे दिया।

     

    “इसे उस जगह ले जाना जहाँ मेरे पिता ने मुझे पहली बार बंद किया था।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “वहीं क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरी कहानी वहीं खत्म हुई थी।”

     

    “और अब?”

     

    “वहीं से मेरी कहानी आजाद होगी।”

     

    राघव ने लॉकेट कसकर पकड़ लिया।

     

    वह दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    साया उसके पीछे आया।

     

    अचानक अनामिका साए के सामने खड़ी हो गई।

     

    “इसे जाने दो।”

     

    साया गरजा—

     

    “तुम मुझे रोक नहीं सकती!”

     

    अनामिका मुस्कुराई।

     

    “मैं अकेली नहीं हूँ।”

     

    तभी हवेली की दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरों से एक-एक करके रोशनी निकलने लगी।

     

    उन तस्वीरों में दिखाई देने वाले सभी लोग धीरे-धीरे अनामिका के पीछे खड़े हो गए।

     

    जैसे वे वर्षों से इसी क्षण का इंतजार कर रहे हों।

     

    साया पीछे हट गया।

     

    राघव, अमन और छोटू हवेली से बाहर निकल गए।

     

    जैसे ही राघव ने लॉकेट जमीन पर रखा…

     

    पूरी हवेली के अंदर से एक जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    फिर…

     

    सन्नाटा।

     

    कई सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई।

     

    हवेली की खिड़कियों में जलती हुई रोशनी एक-एक करके बुझ गई।

     

    और फिर मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    राघव ने हवेली की ओर देखा।

     

    पहली मंजिल की खिड़की में अनामिका खड़ी थी।

     

    उसने मुस्कुराकर हाथ हिलाया।

     

    फिर वह धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    सुबह होने तक हवेली बिल्कुल शांत हो चुकी थी।

     

    गाँव के लोग वहाँ पहुँचे।

     

    रामजी ने हवेली को देखा और कई वर्षों बाद पहली बार उसके अंदर कदम रखा।

     

    “अब कुछ नहीं है,” उन्होंने कहा।

     

    राघव ने पूछा—

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    रामजी मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि इतने सालों में पहली बार मुझे यहाँ डर नहीं लग रहा।”

     

    कुछ दिनों बाद राघव पटना लौट गया।

     

    उसने इस घटना पर एक किताब लिखने का फैसला किया।

     

    लेकिन उसने कहानी का अंत बदल दिया।

     

    उसने लिखा—

     

    “हर भूत बदला लेने नहीं लौटता। कुछ आत्माएँ सिर्फ इसलिए लौटती हैं ताकि उनकी अधूरी कहानी पूरी हो सके।”

     

    कई महीनों बाद राघव को गाँव से एक पत्र मिला।

     

    पत्र में सिर्फ एक फोटो थी।

     

    वह सिंह हवेली की थी।

     

    लेकिन फोटो देखकर राघव के हाथ काँपने लगे।

     

    फोटो में हवेली बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

     

    सारी खिड़कियाँ बंद थीं।

     

    लेकिन पहली मंजिल की खिड़की पर…

     

    एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    फोटो के पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “अब मुझे डर नहीं लगता।”

     

    राघव समझ गया।

     

    अनामिका आखिरकार आज़ाद हो चुकी थी।

     

    और सिंह हवेली का वह डर…

     

    जिसने वर्षों तक पूरे गाँव को अपने कब्जे में रखा था…

     

    हमेशा के लिए खत्म हो गया था।

     

    लेकिन उस दिन के बाद गाँव वालों ने एक बात जरूर देखी।

     

    हवेली के बंद कमरे नंबर 13 के बाहर हर अमावस्या की रात…

     

    एक छोटी-सी लाल गुड़िया रखी मिलती थी।

     

    कोई नहीं जानता था कि उसे वहाँ कौन रखता था।

     

    लेकिन उसके साथ हमेशा एक छोटा-सा कागज़ होता था।

     

    उस पर लिखा रहता—

     

    “जिससे डरते हो, उसका सामना करो। क्योंकि कई बार अंधेरे में छिपा राक्षस नहीं… सिर्फ एक अधूरी कहानी होती है।”

     

    और इस तरह…

     

    राजगीर की उस आखिरी हवेली का रहस्य हमेशा के लिए खत्म हो गया।

     

    समाप्त।

  • 😱राजगीर की आखिरी हवेली😱 भाग 2 — बंद कमरे का राज😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    राघव कुछ सेकंड तक हवेली के बंद दरवाज़े को देखता रहा।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “राघव, हमें पुलिस के पास जाना चाहिए।”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “छोटू अंदर है।”

     

    “लेकिन हम अंदर गए तो हम भी फँस सकते हैं।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “वह बच्चा है। मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”

     

    दोनों फिर हवेली के अंदर चले गए।

     

    इस बार अंदर पहले से ज्यादा अंधेरा था।

     

    मुख्य दरवाज़ा उनके पीछे अपने आप बंद हो गया।

     

    अमन ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर ऊपर से आवाज़ आई—

     

    “भैया…”

     

    दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

     

    पहली मंजिल पर पहुँचकर राघव रुक गया।

     

    गलियारे के दोनों तरफ कई कमरे थे।

     

    लेकिन सभी दरवाज़े खुले थे।

     

    सिर्फ कमरा नंबर 13 बंद था।

     

    राघव ने पूछा—

     

    “छोटू कहाँ गया होगा?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “शायद उसी कमरे में।”

     

    दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी आ रही थी।

     

    राघव ने धीरे से दरवाज़ा खोला।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे पैरों के निशान बने थे।

     

    वे निशान कमरे की पिछली दीवार तक जा रहे थे।

     

    राघव ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    उसे अंदर से आवाज़ सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने पूछा—

     

    “दीवार के पीछे कोई है?”

     

    राघव ने जोर से दीवार थपथपाई।

     

    अंदर से जवाब आया।

     

    ठक… ठक…

     

    फिर छोटू की आवाज़—

     

    “भैया…”

     

    राघव चिल्लाया—

     

    “छोटू! डरो मत। हम तुम्हें निकालेंगे।”

     

    अंदर से छोटू रोते हुए बोला—

     

    “जल्दी करो…”

     

    “यहाँ कोई और भी है।”

     

    राघव और अमन ने दीवार के पास की पुरानी अलमारी हटाई।

     

    उसके पीछे लकड़ी का एक छोटा दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़ा खोलते ही संकरी सुरंग दिखाई दी।

     

    अंदर से सड़ी हुई मिट्टी की गंध आ रही थी।

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये हवेली के नीचे जाती है।”

     

    दोनों सुरंग में उतर गए।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उन्हें छोटू दिखाई दिया।

     

    वह एक कोने में बैठा काँप रहा था।

     

    राघव उसके पास पहुँचा।

     

    “छोटू!”

     

    छोटू ने उसे पकड़ लिया।

     

    “भैया, मुझे यहाँ एक लड़की लाई थी।”

     

    “कौन लड़की?”

     

    “वही… काली आँखों वाली।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “उसने तुम्हारे साथ क्या किया?”

     

    छोटू ने सामने की तरफ इशारा किया।

     

    “वो वहाँ गई है।”

     

    सुरंग के आखिरी हिस्से में एक बड़ा कमरा था।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    कुछ बहुत पुरानी।

     

    कुछ नई।

     

    राघव ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसमें गाँव के लोग थे।

     

    एक तस्वीर में रामजी चायवाला भी था।

     

    दूसरी में राघव के पिता।

     

    राघव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “मेरे पिता यहाँ क्यों हैं?”

     

    अमन ने दूसरी तस्वीर उठाई।

     

    “देख…”

     

    तस्वीर में राघव के पिता के साथ एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    वही लड़की।

     

    काली आँखों वाली।

     

    पीछे तारीख लिखी थी—

     

    1999।

     

    राघव को याद आया कि उसके पिता कई वर्षों तक इसी इलाके में काम करते थे।

     

    लेकिन उन्होंने कभी इस हवेली का जिक्र नहीं किया था।

     

    कमरे के बीच में एक पुरानी मेज थी।

     

    उस पर एक डायरी रखी थी।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “यह कहानी उस रात से शुरू हुई जब मैंने अपनी बेटी को खो दिया।”

     

    राघव ने डायरी पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी उसके पिता की थी।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “मेरा नाम सुरेश है। वर्ष 1999 में मुझे इस हवेली में एक रात रुकना पड़ा। उस रात मैंने एक छोटी लड़की को देखा। उसका नाम था अनामिका।”

     

    राघव का हाथ काँपने लगा।

     

    आगे लिखा था—

     

    “अनामिका इस हवेली में रहने वाले परिवार की बेटी थी। लेकिन उसके माता-पिता कहते थे कि वह पैदा होने के बाद ही मर गई थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो यह लड़की कौन थी?”

     

    राघव पढ़ता गया।

     

    “मैंने उसे रात में गलियारे में खेलते देखा। उसने मुझसे कहा कि उसके माता-पिता ने उसे कमरे नंबर 13 में बंद कर दिया है।”

     

    अगला पन्ना फटा हुआ था।

     

    फिर लिखा था—

     

    “मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर एक बच्ची थी। लेकिन जैसे ही मैंने उसका हाथ पकड़ा, उसने मेरी तरफ देखकर कहा—’आप मेरे पापा नहीं हैं।’”

     

    राघव ने पढ़ना बंद कर दिया।

     

    “फिर?”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैंने पीछे देखा। कमरे में एक आदमी खड़ा था। उसका चेहरा बिल्कुल मेरे जैसा था।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये तो…”

     

    राघव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    “उसने कहा—’जिस दिन तुमने उसे देखा, उसी दिन से वह तुम्हारे पीछे आएगी।’”

     

    इसके बाद कई पन्नों पर सिर्फ एक ही वाक्य लिखा था—

     

    “उसे घर मत ले जाना।”

     

    राघव ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी कमरे की लाइट अपने आप जल गई।

     

    सामने अनामिका खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “फिर उन्होंने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए सब कुछ भूलने का फैसला किया।”

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मैं इस हवेली की बेटी नहीं हूँ।”

     

    “फिर?”

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैं वह हूँ जिसे इस हवेली ने बनाया है।”

     

    कमरे की दीवारें हिलने लगीं।

     

    अनामिका बोली—

     

    “बहुत साल पहले यहाँ एक आदमी ने अपने परिवार को धोखा दिया। उसने अपनी संपत्ति बचाने के लिए अपनी ही बेटी को कमरे में बंद कर दिया।”

     

    “वह लड़की मर गई?”

     

    “हाँ।”

     

    “और फिर?”

     

    “उसका डर हवेली में रह गया।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “लेकिन तुम?”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “मैं उसी डर का चेहरा हूँ।”

     

    अचानक उसके चेहरे की त्वचा काली पड़ने लगी।

     

    उसकी आँखें और बड़ी हो गईं।

     

    वह चीखने लगी—

     

    “हर वह व्यक्ति जो इस कमरे का दरवाज़ा खोलता है… उसका डर मेरा हिस्सा बन जाता है!”

     

    अमन ने छोटू को पीछे किया।

     

    “राघव, भाग!”

     

    लेकिन राघव वहीं खड़ा रहा।

     

    “तुम मुझे यहाँ क्यों लाई?”

     

    अनामिका शांत हो गई।

     

    उसने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे खत्म करने की कोशिश की थी।”

     

    राघव चौंक गया।

     

    “उन्होंने क्या किया?”

     

    “उन्होंने कमरे नंबर 13 की दीवार में मेरी आखिरी याद बंद कर दी।”

     

    “कौन सी याद?”

     

    अनामिका ने सामने की दीवार की ओर देखा।

     

    वहाँ एक छोटी लकड़ी की पेटी दिखाई दी।

     

    राघव ने पेटी खोली।

     

    अंदर एक पुराना लॉकेट था।

     

    लॉकेट खोलते ही एक तस्वीर दिखाई दी।

     

    तस्वीर में एक आदमी था।

     

    राघव का पिता।

     

    और उसके साथ…

     

    अनामिका।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “सच जानने के बाद भी मैंने उसे बचाया नहीं।”

     

    राघव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मेरे पिता ने उसे मरने दिया?”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    अचानक सुरंग के बाहर से कदमों की आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    कोई उनकी तरफ आ रहा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    जवाब आया—

     

    “मैं सुरेश हूँ।”

     

    राघव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसके पिता का नाम सुरेश था।

     

    लेकिन उसके पिता की मृत्यु पाँच साल पहले हो चुकी थी।

     

    कदमों की आवाज़ और करीब आई।

     

    अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।

     

    चेहरा…

     

    राघव के पिता जैसा।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुमने मुझे बुलाया था, बेटा?”

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    अनामिका चीख पड़ी—

     

    “ये तुम्हारे पिता नहीं हैं!”

     

    आदमी का चेहरा अचानक बदलने लगा।

     

    उसकी आँखें काली हो गईं।

     

    मुँह असामान्य रूप से फैल गया।

     

    और उसने कहा—

     

    “लेकिन अब तुम्हें मेरे साथ रहना होगा।”

     

    सुरंग का रास्ता अचानक बंद हो गया।

     

    कमरे की दीवारों पर लाल अक्षरों में एक वाक्य उभर आया—

     

    “एक जाएगा, बाकी तीन बचेंगे।”

     

    राघव ने छोटू, अमन और अनामिका की तरफ देखा।

     

    उसे समझ आ गया था कि हवेली अब एक बलि चाहती थी।

     

    लेकिन वह यह नहीं जानता था कि इस हवेली का असली रहस्य…

     

    उसके अपने परिवार से जुड़ा हुआ था।

     

    और उस रात…

     

    उसे अपने पिता की सबसे बड़ी गलती का सामना करना था।