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  • हरियाला बगान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    वह हरा-भरा बगान जहां कोई नहीं जा सकता था

     

    एक छोटे से गांव के किनारे एक बहुत बड़ा बगान था। चारों तरफ घने पेड़, रंग-बिरंगे फूल और हरी घास से ढकी जमीन थी। दूर से देखने पर वह जगह इतनी खूबसूरत लगती कि हर कोई उसके अंदर जाने का मन बना लेता।

     

    लेकिन गांव में एक अजीब बात मशहूर थी।

     

    उस बगान में कोई नहीं जा सकता था।

     

    गांव के बुजुर्ग कहते थे कि जो भी वहां जाने की कोशिश करता है, वह रास्ता भूल जाता है।

     

    किसी ने कहा था कि वहां रात को पेड़ बातें करते हैं।

     

    किसी ने कहा था कि बगान के बीचों-बीच एक ऐसा पेड़ है, जिसके नीचे बैठकर इंसान अपनी सबसे बड़ी इच्छा मांग सकता है।

     

    लेकिन किसी ने आज तक उस पेड़ को देखा नहीं था।

     

    गांव में रहने वाला लियो इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    वह बीस साल का एक जिज्ञासु लड़का था। उसे हमेशा उन चीजों के पीछे का सच जानने की आदत थी, जिनसे बाकी लोग डरते थे।

     

    एक दिन उसने अपने दादा से पूछा—

     

    “दादा, आखिर उस बगान में ऐसा क्या है?”

     

    दादा ने गंभीर होकर कहा—

     

    “उसके बारे में ज्यादा मत पूछना।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि वह बगान किसी को अपने अंदर आने नहीं देता।”

     

    लियो हंस पड़ा।

     

    “बगान कोई इंसान थोड़ी है, जो किसी को रोक देगा।”

     

    दादा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें जो मजाक लगता है, उसके पीछे कई लोगों की जिंदगी जुड़ी है।”

     

    लियो चुप हो गया।

     

    उस रात वह अपने कमरे में सो रहा था कि अचानक उसकी खिड़की के बाहर से फूलों की खुशबू आई।

     

    वह उठकर बाहर आया।

     

    खिड़की से दूर बगान दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन आज वहां कुछ अलग था।

     

    बगान के बीचों-बीच हल्की सुनहरी रोशनी चमक रही थी।

     

    लियो ने सोचा शायद उसकी आंखों का भ्रम होगा।

     

    लेकिन रोशनी फिर चमकी।

     

    अगली सुबह उसने दादा से पूछा—

     

    “कल रात बगान में रोशनी क्यों थी?”

     

    दादा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “तुमने देखी?”

     

    “हां।”

     

    दादा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “इसका मतलब है कि बगान ने तुम्हें बुलाया है।”

     

    लियो हैरान हो गया।

     

    “बगान किसी को बुला भी सकता है?”

     

    दादा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बस इतना कहा—

     

    “अगर जाना ही है तो अकेले जाना। और चाहे कुछ भी हो, वहां से कोई चीज अपने साथ मत लाना।”

     

    लियो उसी शाम बगान के पास पहुंच गया।

     

    जैसे ही उसने पहला कदम आगे बढ़ाया, तेज हवा चली।

     

    पेड़ों की पत्तियां एक साथ हिलने लगीं।

     

    लियो ने पीछे देखा।

     

    गांव अब पहले से बहुत दूर दिखाई दे रहा था।

     

    उसने आगे कदम बढ़ाया।

     

    कुछ दूर चलने के बाद उसे एक बड़ा पत्थर दिखाई दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जो यहां अपने स्वार्थ से आता है, वह रास्ता खो देता है।”

     

    लियो मुस्कुराया।

     

    “मैं तो सिर्फ सच जानने आया हूं।”

     

    वह आगे बढ़ गया।

     

    बगान के अंदर का नजारा बाहर से भी ज्यादा खूबसूरत था।

     

    हर तरफ फूल थे।

     

    छोटी-छोटी धाराएं बह रही थीं।

     

    पक्षियों की आवाजें गूंज रही थीं।

     

    लेकिन अजीब बात यह थी कि उसे एक भी जानवर डरता हुआ नहीं दिखा।

     

    कुछ देर बाद वह बगान के बीचों-बीच पहुंच गया।

     

    वहां एक बहुत पुराना पेड़ खड़ा था।

     

    उसकी शाखाएं इतनी फैली थीं कि पूरा मैदान उसकी छांव में आ जाता था।

     

    पेड़ के तने पर एक छोटा-सा निशान बना था।

     

    वही निशान जो लियो ने बचपन में अपने दादा की पुरानी डायरी में देखा था।

     

    लियो ने पेड़ को छुआ।

     

    अचानक उसके सामने एक दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक बहुत पुराना गांव।

     

    लोग सूखे खेतों में परेशान घूम रहे थे।

     

    पानी नहीं था।

     

    फसलें बर्बाद हो चुकी थीं।

     

    फिर उसने देखा कि गांव के कुछ लोगों ने इसी बगान के पेड़ काटने शुरू कर दिए।

     

    जैसे ही पेड़ काटे गए, बगान की हरियाली खत्म होने लगी।

     

    दृश्य बदल गया।

     

    एक बूढ़ा आदमी गांव वालों के सामने खड़ा था।

     

    उसने कहा—

     

    “अगर तुमने इस बगान को बचाया नहीं, तो तुम्हारे गांव की जमीन भी बंजर हो जाएगी।”

     

    लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं मानी।

     

    कुछ लोगों ने पेड़ काटने की कोशिश की।

     

    तभी अचानक तेज आंधी आई।

     

    सभी लोग भाग गए।

     

    उस दिन के बाद बगान के चारों तरफ एक अदृश्य सीमा बन गई।

     

    कोई इंसान उसके अंदर नहीं जा सका।

     

    लियो ने आंखें खोलीं।

     

    वह समझ चुका था।

     

    यह बगान किसी जादू की वजह से बंद नहीं था।

     

    यह लोगों के लालच से खुद को बचा रहा था।

     

    तभी उसके पीछे किसी की आवाज आई—

     

    “अब तुम समझ गए?”

     

    लियो पलटा।

     

    वहां एक बूढ़ी महिला खड़ी थी।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “मैं इस बगान की रखवाली करती हूं।”

     

    लियो ने पूछा—

     

    “तो इतने सालों से किसी को अंदर क्यों नहीं आने दिया?”

     

    “क्योंकि जो भी यहां आया, उसने कुछ लेने की कोशिश की।”

     

    “और मैं?”

     

    “तुम पहली बार कुछ लेने नहीं, सच जानने आए हो।”

     

    लियो ने पूछा—

     

    “अब मुझे क्या करना होगा?”

     

    बूढ़ी महिला ने कहा—

     

    “बगान तुम्हें एक मौका देगा।”

     

    “कैसा मौका?”

     

    “तुम यहां से एक चीज ले जा सकते हो।”

     

    लियो की नजर पेड़ पर गई।

     

    “क्या?”

     

    “एक सुनहरा फल।”

     

    पेड़ पर एक ही फल लगा था।

     

    वह चमक रहा था।

     

    बूढ़ी महिला ने कहा—

     

    “इसे खाने से तुम्हारी जिंदगी बदल सकती है। तुम्हारे परिवार की गरीबी खत्म हो सकती है।”

     

    लियो कुछ देर उस फल को देखता रहा।

     

    फिर उसने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    बूढ़ी महिला चौंकी।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे दादा ने कहा था कि यहां से कुछ साथ लेकर मत जाना।”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “तुम्हें धन नहीं चाहिए?”

     

    “चाहिए। लेकिन अगर उसके लिए इस बगान से कुछ छीनना पड़े तो नहीं।”

     

    बूढ़ी महिला ने हाथ उठाया।

     

    अचानक पूरा बगान सुनहरी रोशनी से भर गया।

     

    पेड़ों की पत्तियां हवा में झूमने लगीं।

     

    “आज से यह बगान तुम्हारे लिए बंद नहीं रहेगा।”

     

    लियो हैरान रह गया।

     

    “लेकिन गांव के बाकी लोगों के लिए?”

     

    “जब तक वे इसे पाने की जगह बचाने की सोच नहीं बदलेंगे, तब तक नहीं।”

     

    लियो गांव वापस आया।

     

    उसने अपने दादा को पूरी बात बताई।

     

    दादा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुमने वही किया जो तुम्हारे पिता नहीं कर पाए।”

     

    लियो ने पूछा—

     

    “मेरे पिता?”

     

    दादा ने बताया कि कई साल पहले लियो के पिता भी उस बगान में गए थे। उन्होंने भी सुनहरा फल पाने की कोशिश की थी। लेकिन बगान ने उन्हें बाहर निकाल दिया था।

     

    उस दिन से वह बदल गए थे।

     

    लियो को पहली बार अपने पिता की अधूरी कहानी समझ आई।

     

    अगले दिन लियो ने गांव वालों को इकट्ठा किया।

     

    उसने कहा—

     

    “हम इस बगान से कुछ लेने की कोशिश करते रहे। लेकिन अगर हम इसकी हरियाली बचाएंगे, तो यह खुद हमें बहुत कुछ देगा।”

     

    गांव वालों ने पहले उसकी बात नहीं मानी।

     

    लेकिन लियो ने हार नहीं मानी।

     

    उसने गांव के सूखे तालाब की सफाई शुरू की।

     

    बच्चे उसके साथ आ गए।

     

    फिर बुजुर्ग भी।

     

    कुछ ही महीनों में गांव बदलने लगा।

     

    लोगों ने पेड़ लगाना शुरू किया।

     

    पानी बचाना शुरू किया।

     

    और एक सुबह गांव वालों ने देखा कि बगान की सीमा के पास लगी पुरानी बेल अपने आप हट गई थी।

     

    पहली बार गांव के लोगों के लिए रास्ता खुला था।

     

    लेकिन इस बार कोई दौड़कर अंदर नहीं गया।

     

    सबने दूर खड़े होकर उस हरे-भरे बगान को देखा।

     

    लियो मुस्कुराया।

     

    उसे समझ आ गया था कि बगान का रहस्य कोई जादुई फल नहीं था।

     

    उसका असली रहस्य यह था कि प्रकृति उन लोगों के लिए अपने दरवाजे खोल देती है, जो उसे जीतना नहीं, बचाना जानते हैं।

     

    उस दिन से वह बगान गांव की सबसे सुरक्षित जगह बन गया।

     

    और वहां जाने वाले हर व्यक्ति को एक ही बात याद दिलाई जाती—

     

    “हरियाली सिर्फ देखने की चीज नहीं, संभालने की जिम्मेदारी भी है।”

  • अकेले ही काफी है

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    हम अकेले ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं

     

    “अब हमें किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।”

     

    सरला ने खिड़की के बाहर देखते हुए धीमी आवाज में कहा।

     

    सामने कुर्सी पर बैठे उसके पति गोविंद ने चश्मा उतारा और पत्नी की तरफ देखा।

     

    “किससे उम्मीद की तुमने?”

     

    सरला हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “किससे नहीं की?”

     

    गोविंद कुछ नहीं बोले।

     

    दोनों की उम्र सत्तर के पार हो चुकी थी। कभी उनका घर बच्चों की आवाजों से भरा रहता था। सुबह से शाम तक भागदौड़ रहती थी। तीन बच्चे थे—दो बेटे और एक बेटी। गोविंद ने पूरी जिंदगी नौकरी करके बच्चों को पढ़ाया, उनकी जरूरतें पूरी कीं और उनके भविष्य के लिए अपनी छोटी-छोटी खुशियां तक छोड़ दीं।

     

    जब बच्चे बड़े हुए तो तीनों अपने-अपने शहरों में चले गए।

     

    शुरुआत में हर दिन फोन आता था।

     

    “पापा, खाना खा लिया?”

     

    “मां, दवा समय पर लेना।”

     

    “जल्दी ही मिलने आएंगे।”

     

    सरला उन बातों को सुनकर खुश हो जाती।

     

    वह हर बार कहती—

     

    “बस तुम लोग खुश रहो, हमें और क्या चाहिए।”

     

    लेकिन धीरे-धीरे फोन कम होने लगे।

     

    फिर हफ्ते में एक बार।

     

    फिर महीने में।

     

    और आखिरकार कभी-कभी।

     

    एक शाम सरला ने गोविंद से कहा—

     

    “हमने बच्चों को बहुत प्यार दिया था ना?”

     

    गोविंद ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हां।”

     

    “फिर वो इतने दूर कैसे हो गए?”

     

    गोविंद ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    शायद उनके पास भी इस सवाल का जवाब नहीं था।

     

    एक दिन गोविंद अचानक सीढ़ियों से उतरते समय लड़खड़ा गए।

     

    सरला घबरा गई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं। पैर थोड़ा फिसल गया।”

     

    सरला ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें डॉक्टर के पास जाना चाहिए।”

     

    “कल चलेंगे।”

     

    “कल नहीं। अभी।”

     

    दोनों डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखीं और आराम करने को कहा।

     

    सरला ने उसी रात बड़े बेटे रोहन को फोन किया।

     

    “बेटा, तुम्हारे पापा की तबीयत थोड़ी खराब है।”

     

    रोहन ने चिंतित होकर कहा—

     

    “मां, दवा दिलवा देना। मैं अभी ऑफिस में बहुत व्यस्त हूं। अगले महीने आने की कोशिश करूंगा।”

     

    सरला ने फोन रख दिया।

     

    उसने कुछ नहीं कहा।

     

    गोविंद समझ गए।

     

    “क्या बोला?”

     

    “कुछ नहीं। काम में व्यस्त है।”

     

    कुछ दिनों बाद छोटी बेटी नैना का फोन आया।

     

    “मां, पापा कैसे हैं?”

     

    “अब ठीक हैं।”

     

    “अच्छा हुआ। बच्चों के स्कूल चल रहे हैं, इसलिए अभी आना मुश्किल है।”

     

    सरला ने कहा—

     

    “ठीक है बेटा।”

     

    फोन कट गया।

     

    सरला कुछ देर मोबाइल को देखती रही।

     

    गोविंद ने पूछा—

     

    “दुख हुआ?”

     

    सरला ने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    लेकिन उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    गोविंद उसके पास आकर बैठ गए।

     

    “रो लो। मेरे सामने रोने में शर्म कैसी?”

     

    सरला ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे बच्चों से शिकायत नहीं है। बस कभी-कभी लगता है कि हमने उन्हें अपने से इतना दूर कर दिया कि अब उन्हें हमारी जरूरत ही नहीं रही।”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “शायद उनकी अपनी जिंदगी है।”

     

    “हां,” सरला ने कहा, “लेकिन क्या हमारी जिंदगी में अब उनका कोई हिस्सा नहीं?”

     

    उस सवाल का जवाब दोनों में से किसी के पास नहीं था।

     

    समय बीतता गया।

     

    एक सर्द रात सरला की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    गोविंद घबरा गए।

     

    उन्होंने पड़ोसी अमन को फोन किया।

     

    अमन तुरंत आया और दोनों को अस्पताल ले गया।

     

    कुछ घंटों बाद डॉक्टर ने कहा—

     

    “अब खतरा नहीं है, लेकिन इन्हें अकेले नहीं रहना चाहिए।”

     

    गोविंद ने तुरंत बच्चों को फोन किया।

     

    इस बार उन्होंने पहली बार आवाज में शिकायत कर दी।

     

    “बेटा, अपनी मां को देखने आ जाओ।”

     

    रोहन ने कहा—

     

    “पापा, मैं कोशिश करता हूं।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “पापा, दो दिन में आने की कोशिश करूंगी।”

     

    छोटे बेटे विवेक ने तो फोन तक नहीं उठाया।

     

    दो दिन गुजर गए।

     

    तीन दिन।

     

    चार दिन।

     

    कोई नहीं आया।

     

    अमन रोज अस्पताल आता रहा।

     

    सरला को जब होश आया तो उसने सबसे पहले पूछा—

     

    “बच्चे आए?”

     

    गोविंद कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “नहीं।”

     

    सरला ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके चेहरे पर दुख था, लेकिन इस बार उसने आंसू नहीं बहाए।

     

    “गोविंद…”

     

    “हां।”

     

    “अब हमें किसी से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।”

     

    गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हां।”

     

    “हम अकेले ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं।”

     

    गोविंद ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बिल्कुल।”

     

    अस्पताल से लौटने के बाद दोनों ने अपनी जिंदगी का तरीका बदल लिया।

     

    उन्होंने किसी बच्चे से नाराजगी नहीं की।

     

    किसी को बुरा नहीं कहा।

     

    बस अपनी उम्मीदें कम कर दीं।

     

    सुबह गोविंद सरला के लिए चाय बनाते।

     

    सरला उनकी दवा समय पर देती।

     

    दोनों साथ बैठकर अखबार पढ़ते।

     

    शाम को छत पर कुर्सियां डालकर घंटों बातें करते।

     

    कभी पुरानी यादें याद करते।

     

    कभी बच्चों के बचपन की तस्वीरें देखते।

     

    एक दिन सरला ने पुराना फोटो एलबम खोला।

     

    उसमें तीनों बच्चे छोटे थे।

     

    रोहन गोविंद की उंगली पकड़े खड़ा था।

     

    नैना सरला की गोद में थी।

     

    विवेक जमीन पर बैठा मुस्कुरा रहा था।

     

    सरला की आंखें भर आईं।

     

    “देखो, कितने छोटे थे।”

     

    गोविंद ने तस्वीर को देखा।

     

    “हमने इन्हें बड़ा कर दिया।”

     

    “और खुद बूढ़े हो गए।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    अमन खड़ा था।

     

    उसके हाथ में दवाइयां थीं।

     

    “अंकल, आंटी, ये दवाइयां ले आया हूं।”

     

    सरला ने कहा—

     

    “बेटा, तुम रोज क्यों परेशान होते हो?”

     

    अमन हंसकर बोला—

     

    “क्योंकि आप दोनों मेरे अपने जैसे हैं।”

     

    सरला ने पहली बार महसूस किया कि रिश्ते हमेशा खून से नहीं बनते।

     

    कुछ रिश्ते व्यवहार से बनते हैं।

     

    कुछ परवाह से।

     

    और कुछ सिर्फ इसलिए बनते हैं क्योंकि कोई बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहता है।

     

    कुछ महीनों बाद रोहन अचानक घर आया।

     

    उसने दरवाजे पर खड़े होकर कहा—

     

    “मां…”

     

    सरला ने उसे देखा।

     

    “आ गए?”

     

    रोहन ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    सरला चुप रही।

     

    रोहन की आंखों में आंसू थे।

     

    “मुझे लगा था कि पैसे भेज देना और फोन कर लेना ही काफी है। लेकिन जब पिछले महीने मेरे ऑफिस में एक सहकर्मी ने अपनी मां को अस्पताल ले जाने के लिए छुट्टी ली, तब मुझे समझ आया कि मां-बाप को सिर्फ पैसों की नहीं, अपने बच्चों की जरूरत होती है।”

     

    सरला ने कुछ नहीं कहा।

     

    गोविंद ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तुम्हें समझ आ गया, यही बहुत है।”

     

    रोहन रोते हुए अपनी मां के पैरों के पास बैठ गया।

     

    “मैंने आपको अकेला छोड़ दिया।”

     

    सरला ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम हमें छोड़कर गए थे, बेटा। लेकिन मां-बाप बच्चों को छोड़ना नहीं सीखते।”

     

    रोहन ने मां को गले लगा लिया।

     

    कुछ दिनों बाद नैना भी आई।

     

    विवेक भी।

     

    घर फिर से बच्चों की आवाजों से भर गया।

     

    लेकिन इस बार सरला और गोविंद की सोच बदल चुकी थी।

     

    उन्होंने बच्चों से कोई शिकायत नहीं की।

     

    बस इतना कहा—

     

    “अपनी जिंदगी जियो। हमें तुमसे बड़ी-बड़ी चीजें नहीं चाहिए। कभी-कभी फोन कर लिया करो। और अगर हम तुम्हें याद आएं तो मिलने आ जाना।”

     

    विवेक ने कहा—

     

    “पापा, अब हम आपको अकेला नहीं छोड़ेंगे।”

     

    गोविंद मुस्कुराए।

     

    “यह वादा आज मत करो। बस इतना करना कि जब जिंदगी बहुत व्यस्त हो जाए, तब भी हमें याद रखना।”

     

    रात को जब बच्चे सो गए तो सरला और गोविंद बरामदे में बैठे थे।

     

    सरला ने धीमे से पूछा—

     

    “तुम्हें लगता है हमने बच्चों को माफ कर दिया?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “हमने उन्हें कभी छोड़ा ही नहीं था, तो माफ क्या करना।”

     

    सरला ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “एक बात कहूं?”

     

    “कहो।”

     

    “सच में… हम अकेले ही एक-दूसरे के लिए काफी हैं।”

     

    गोविंद मुस्कुराए।

     

    “हां। लेकिन अगर बच्चे कभी साथ बैठ जाएं, तो अच्छा जरूर लगता है।”

     

    सरला भी मुस्कुरा दी।

     

    उसे समझ आ गया था कि बुढ़ापे में सबसे बड़ी जरूरत किसी से शिकायत करने की नहीं होती।

     

    बस एक ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो चुपचाप आपके पास बैठकर कह सके—

     

    “चिंता मत करो, मैं हूं ना।”

     

    और गोविंद और सरला के पास एक-दूसरे के लिए यही सबसे बड़ी दौलत थी।

  • मुझे शादी नहीं करनी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    पापा, मुझे शादी नहीं करनी

     

    “पापा, पर मुझे शादी नहीं करनी! आप समझते क्यों नहीं?”

     

    पल्लवी की आवाज पूरे घर में गूंज गई। उसकी आंखों में आंसू थे और चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था।

     

    सामने उसके पिता महेश चुपचाप बैठे थे। उनके हाथ में पल्लवी की शादी का कार्ड था, जिसे वह बार-बार देख रहे थे।

     

    “पल्लवी, बेटा… इतनी जोर से मत बोलो। पड़ोसी क्या सोचेंगे?”

     

    “मुझे किसी पड़ोसी की परवाह नहीं है!”

     

    पल्लवी ने कार्ड उठाकर मेज पर रख दिया।

     

    “मुझे शादी नहीं करनी। बस! आप लोग मेरी बात क्यों नहीं समझ रहे?”

     

    उसकी मां सुशीला रोते हुए बोलीं, “बेटी, हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। तुम्हारी भलाई के लिए ही तो सोच रहे हैं।”

     

    “अगर मेरी भलाई चाहते हैं तो मेरी बात सुनिए!”

     

    घर में अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    पल्लवी की शादी अगले महीने कुणाल नाम के लड़के से तय हुई थी। कुणाल अच्छे परिवार से था, नौकरी करता था और परिवार के सभी लोगों को वह बहुत पसंद था।

     

    लेकिन पल्लवी उसे शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी।

     

    महेश ने धीरे से कहा, “कुणाल में ऐसी क्या कमी है?”

     

    “कमी कुणाल में नहीं है, पापा।”

     

    “तो फिर?”

     

    पल्लवी कुछ पल चुप रही।

     

    “कमी इस रिश्ते में नहीं… मेरे अंदर है।”

     

    महेश ने हैरानी से उसे देखा।

     

    “क्या मतलब?”

     

    पल्लवी ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं अभी शादी के लिए तैयार नहीं हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं अपनी जिंदगी का फैसला खुद करना चाहती हूं।”

     

    महेश ने गहरी सांस ली।

     

    “तुम्हें पढ़ने से किसने रोका? तुम्हें नौकरी करने से किसने रोका? हमने हमेशा तुम्हारा साथ दिया है।”

     

    “तो शादी के मामले में मेरी इच्छा क्यों नहीं पूछी?”

     

    यह सवाल सुनकर महेश चुप हो गए।

     

    पल्लवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “आपने लड़का देखा, परिवार देखा, नौकरी देखी… लेकिन मुझसे यह नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूं।”

     

    सुशीला उसके पास आईं।

     

    “बेटी, हमने तुमसे पूछा था।”

     

    पल्लवी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं मां। आपने पूछा था कि लड़का कैसा है। आपने ये नहीं पूछा कि मैं शादी के लिए तैयार हूं या नहीं।”

     

    महेश को अपनी गलती महसूस होने लगी।

     

    लेकिन समाज का डर उनके मन में था।

     

    उन्होंने कहा, “रिश्ता बहुत अच्छा है। हमने हां कर दी है। अब पीछे हटना अच्छा नहीं लगेगा।”

     

    पल्लवी ने गुस्से में कहा—

     

    “तो मेरी जिंदगी से ज्यादा जरूरी लोगों की बातें हैं?”

     

    महेश ने कुछ नहीं कहा।

     

    पल्लवी अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया।

     

    वह बिस्तर पर बैठकर रोने लगी।

     

    कुछ देर बाद उसकी मां कमरे में आईं।

     

    “पल्लवी…”

     

    “मां, मुझे अकेला छोड़ दो।”

     

    “मैं जानती हूं तुम परेशान हो।”

     

    पल्लवी ने आंसू पोंछे।

     

    “मां, मैं शादी के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन मैं सिर्फ इसलिए शादी नहीं करना चाहती क्योंकि उम्र हो गई है।”

     

    सुशीला उसके पास बैठ गईं।

     

    “क्या कोई और बात है?”

     

    पल्लवी कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, मैं अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हूं। मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं। मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि इतनी जल्दी मेरी शादी कर दी जाएगी।”

     

    सुशीला की आंखें भी भर आईं।

     

    “तुमने हमें पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “मैंने कई बार कोशिश की थी। लेकिन हर बार आपने कहा कि अच्छा रिश्ता बार-बार नहीं मिलता।”

     

    सुशीला के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    अगले दिन महेश ने पल्लवी से बात करने का फैसला किया।

     

    उन्होंने उसके कमरे में जाकर कहा—

     

    “बेटा, बैठो। आज मैं तुम्हारी बात सुनने आया हूं। बिना कोई फैसला सुनाए।”

     

    पल्लवी ने पहली बार अपने पिता की तरफ उम्मीद से देखा।

     

    महेश ने कहा—

     

    “मुझे बताओ, तुम असल में चाहती क्या हो?”

     

    पल्लवी ने धीरे से कहा—

     

    “मैं आगे पढ़ना चाहती हूं। फिर नौकरी करना चाहती हूं। और जब मुझे लगेगा कि मैं शादी के लिए तैयार हूं, तब शादी करूंगी।”

     

    महेश ने पूछा—

     

    “और अगर तब तक कुणाल जैसा रिश्ता नहीं मिला तो?”

     

    पल्लवी मुस्कुराई।

     

    “तो नहीं मिलेगा। शादी जिंदगी भर का रिश्ता है, पापा। सिर्फ इसलिए नहीं होनी चाहिए कि अभी अच्छा रिश्ता मिल गया है।”

     

    महेश की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उन्हें अचानक अपना बचपन याद आया।

     

    जब वह खुद अपनी पसंद की पढ़ाई करना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने कहा था कि परिवार की जिम्मेदारी पहले है।

     

    उन्होंने हमेशा उस बात का दुख अपने अंदर रखा था।

     

    और आज वह अनजाने में अपनी बेटी के साथ वही करने जा रहे थे।

     

    महेश ने पल्लवी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    पल्लवी चौंक गई।

     

    “पापा…”

     

    “मैंने सोचा कि मैं तुम्हारे लिए अच्छा कर रहा हूं। लेकिन मैंने तुम्हारी खुशी पूछना ही भूल गया।”

     

    पल्लवी रोते हुए अपने पिता से लिपट गई।

     

    “मुझे आपसे लड़ना नहीं था पापा। मैं बस चाहती थी कि आप मेरी बात सुनें।”

     

    महेश ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब तुम्हारी शादी तब होगी जब तुम खुद तैयार होगी।”

     

    अगले दिन महेश ने कुणाल के परिवार को बुलाया।

     

    घर में सभी थोड़े परेशान थे।

     

    कुणाल भी चुप बैठा था।

     

    महेश ने कहा—

     

    “हमें यह रिश्ता रोकना होगा।”

     

    कुणाल के पिता नाराज हुए।

     

    “लेकिन अचानक ऐसा क्यों?”

     

    महेश ने साफ कहा—

     

    “क्योंकि मेरी बेटी शादी के लिए तैयार नहीं है।”

     

    कुछ देर चुप्पी रही।

     

    तभी कुणाल ने पहली बार बात की।

     

    “अंकल, मैं पल्लवी से एक बात कहना चाहता हूं।”

     

    पल्लवी सामने आई।

     

    कुणाल ने कहा—

     

    “मुझे खुशी है कि तुमने अपनी बात साफ-साफ कही।”

     

    पल्लवी ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

     

    कुणाल मुस्कुराया।

     

    “मैं भी शादी जल्दी नहीं करना चाहता था। लेकिन परिवार के सामने बोल नहीं पाया।”

     

    महेश ने उसे देखा।

     

    “तो तुम भी तैयार नहीं थे?”

     

    कुणाल ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उसके पिता नाराज होकर बोले—

     

    “तुमने हमें बताया क्यों नहीं?”

     

    कुणाल ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

     

    “शायद मुझे भी पल्लवी की तरह अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं थी।”

     

    घर का माहौल अचानक बदल गया।

     

    दो परिवारों के बीच तनाव की जगह समझदारी ने ले ली।

     

    पल्लवी ने कुणाल से कहा—

     

    “शायद हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं।”

     

    कुणाल ने कहा—

     

    “शायद। और अगर कभी शादी का फैसला हुआ भी, तो हमारी मर्जी से होगा।”

     

    कुछ महीनों बाद पल्लवी ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर दी।

     

    महेश अब हर फैसला लेने से पहले उससे पूछते।

     

    एक दिन पल्लवी कॉलेज से घर लौटी तो उसने देखा कि उसके पिता उसके लिए मिठाई लेकर बैठे हैं।

     

    “क्या हुआ पापा?”

     

    महेश मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा कॉलेज में स्कॉलरशिप के लिए चयन हो गया।”

     

    पल्लवी खुशी से अपने पिता से लिपट गई।

     

    “पापा!”

     

    महेश ने कहा—

     

    “मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    पल्लवी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आपको बुरा नहीं लगता कि मैं अभी शादी नहीं कर रही?”

     

    महेश ने हंसकर कहा—

     

    “पहले मुझे लगता था कि बेटी की शादी कर देना मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।”

     

    फिर उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब समझ आया है कि बेटी को अपनी जिंदगी का फैसला लेने लायक बनाना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।”

     

    पल्लवी मुस्कुराई।

     

    उस दिन उसे लगा कि उसने शादी से इनकार करके अपने पिता को नहीं खोया।

     

    बल्कि पहली बार उसने अपने पिता को अपने साथ खड़ा पाया था।

     

    और महेश ने भी सीख लिया था—

     

    बेटी की जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला उसकी शादी नहीं, उसकी खुशी होती है।

  • गोल्डन फिश रहस्मयी लड़का

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गोल्डन फिश और रहस्यमयी लड़का

     

    समुद्र से कुछ दूर बसे एक छोटे से तटीय शहर में एड्रियन नाम का 20 साल का लड़का रहता था। वह एक साधारण परिवार से था और अपने छोटे से घर में अपनी मां के साथ रहता था। उसके पिता कई साल पहले इस दुनिया से जा चुके थे।

     

    एड्रियन ज्यादा लोगों से घुलता-मिलता नहीं था। उसे समुद्र के किनारे घंटों बैठना पसंद था। उसका मानना था कि समुद्र के पास बैठकर इंसान अपने मन की सबसे बड़ी परेशानी भी भूल सकता है।

     

    एक शाम वह हमेशा की तरह समुद्र किनारे गया।

     

    उस दिन समुद्र कुछ ज्यादा ही उफान पर था। आसमान में बादल थे और तेज हवाएं चल रही थीं।

     

    एड्रियन वापस लौटने ही वाला था कि उसकी नजर रेत पर पड़ी एक चमकती हुई चीज पर गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    वह पास गया।

     

    वहां एक छोटी-सी सुनहरी मछली पड़ी थी।

     

    मछली बहुत खूबसूरत थी। उसके शरीर से हल्की सुनहरी रोशनी निकल रही थी।

     

    एड्रियन ने उसे सावधानी से उठाया और पास पड़े पानी के एक छोटे गड्ढे में डाल दिया।

     

    मछली कुछ पल तक शांत रही।

     

    फिर अचानक उसने इंसानी आवाज में कहा—

     

    “मुझे वापस समुद्र में मत छोड़ना।”

     

    एड्रियन डर के मारे पीछे हट गया।

     

    “तुम… बोल सकती हो?”

     

    मछली ने अपनी पूंछ हिलाई।

     

    “हां।”

     

    एड्रियन ने चारों तरफ देखा।

     

    “ये सपना तो नहीं है?”

     

    मछली ने कहा, “नहीं। और अगर तुमने मेरी मदद की तो मैं तुम्हारी भी मदद कर सकती हूं।”

     

    एड्रियन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    “मेरा नाम सेलेना है।”

     

    एड्रियन ने हैरानी से कहा, “एक मछली का नाम सेलेना?”

     

    “मैं कोई साधारण मछली नहीं हूं।”

     

    एड्रियन को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ।

     

    वह उसे अपने घर ले आया और एक बड़े कांच के बर्तन में पानी भरकर उसमें रख दिया।

     

    रात भर एड्रियन उसे देखता रहा।

     

    अगली सुबह उसने पूछा—

     

    “तुमने कहा था कि तुम मेरी मदद कर सकती हो। कैसे?”

     

    सेलेना ने कहा—

     

    “मैं तुम्हारी एक इच्छा पूरी कर सकती हूं।”

     

    एड्रियन मुस्कुराया।

     

    “तो मैं बहुत अमीर बनना चाहता हूं।”

     

    सेलेना कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “सोच लो। धन मांगना आसान है, लेकिन उसके साथ आने वाली चीजें हमेशा अच्छी नहीं होतीं।”

     

    एड्रियन ने कुछ नहीं मांगा।

     

    उसने कहा—

     

    “पहले मुझे बताओ कि तुम यहां आई कैसे?”

     

    सेलेना की आवाज अचानक गंभीर हो गई।

     

    “मैं समुद्र के उस हिस्से से आई हूं, जहां इंसानों का पहुंचना आसान नहीं। मेरे पीछे कुछ लोग पड़े हैं। अगर उन्होंने मुझे ढूंढ लिया तो मैं उनके हाथ लग जाऊंगी।”

     

    एड्रियन ने पूछा—

     

    “कौन लोग?”

     

    “एक आदमी है… विक्टर।”

     

    विक्टर शहर का एक बहुत अमीर और प्रभावशाली व्यापारी था। लोग कहते थे कि उसे समुद्र से जुड़ी पुरानी चीजों और रहस्यमयी वस्तुओं को इकट्ठा करने का जुनून था।

     

    सेलेना ने बताया कि विक्टर को उसके बारे में पता चल गया था।

     

    “वह मुझे पकड़कर मेरी शक्ति का इस्तेमाल करना चाहता है।”

     

    एड्रियन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन मैं तुम्हें उसके पास नहीं जाने दूंगा।”

     

    सेलेना ने पूछा—

     

    “तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता?”

     

    एड्रियन हंस पड़ा।

     

    “पहले लगा था। अब तुम मुझे मछली कम और दोस्त ज्यादा लगती हो।”

     

    उस दिन से सेलेना और एड्रियन की दोस्ती गहरी होने लगी।

     

    एड्रियन रोज उससे बातें करता।

     

    सेलेना भी उसे समुद्र के बारे में अनोखी बातें बताती।

     

    एक दिन उसने एड्रियन से कहा—

     

    “तुम्हारी मां बहुत परेशान रहती हैं।”

     

    एड्रियन ने सिर झुका लिया।

     

    “हम पर बहुत कर्ज है। मां चाहती हैं कि मैं अपनी पढ़ाई छोड़कर काम करूं।”

     

    सेलेना ने कहा—

     

    “तुम चाहो तो अपनी पहली इच्छा मांग सकते हो।”

     

    एड्रियन कुछ देर सोचता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “मैं चाहता हूं कि मेरी मां का कर्ज खत्म हो जाए।”

     

    सेलेना ने अपनी पूंछ पानी में घुमाई।

     

    अगली सुबह बैंक से खबर आई कि एड्रियन की मां के पुराने कर्ज की पूरी रकम किसी अज्ञात व्यक्ति ने चुका दी थी।

     

    एड्रियन हैरान था।

     

    उसे समझ आ गया कि सेलेना ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया था।

     

    लेकिन उसी दिन शहर में एक और खबर फैल गई।

     

    विक्टर को पता चल गया था कि सुनहरी मछली शहर में है।

     

    विक्टर ने अपने आदमियों को हर समुद्र किनारे भेज दिया।

     

    एड्रियन घबरा गया।

     

    “सेलेना, अब क्या होगा?”

     

    “हमें मुझे वापस समुद्र में पहुंचाना होगा।”

     

    “लेकिन अगर विक्टर ने तुम्हें रास्ते में पकड़ लिया तो?”

     

    “इसलिए तुम्हें मेरी मदद करनी होगी।”

     

    उस रात एड्रियन सेलेना को एक पुराने रास्ते से समुद्र तक ले गया।

     

    लेकिन जैसे ही वे समुद्र के पास पहुंचे, सामने विक्टर खड़ा था।

     

    उसके साथ कई आदमी थे।

     

    विक्टर मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार मुझे मेरी सुनहरी मछली मिल ही गई।”

     

    एड्रियन उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    “ये तुम्हारी नहीं है।”

     

    विक्टर ने कहा—

     

    “तुम नहीं जानते कि इसके पास कितनी ताकत है।”

     

    “मुझे उसकी ताकत नहीं चाहिए।”

     

    विक्टर हंसा।

     

    “तुम मूर्ख हो। अगर तुम्हारे पास यह मछली रहे तो तुम दुनिया के सबसे अमीर इंसान बन सकते हो।”

     

    एड्रियन ने कहा—

     

    “शायद। लेकिन किसी की आजादी छीनकर मिली दौलत मेरे किसी काम की नहीं।”

     

    विक्टर ने अपने आदमियों को आगे बढ़ने का इशारा किया।

     

    तभी समुद्र में अचानक तेज लहर उठी।

     

    आसमान में बिजली चमकी।

     

    सेलेना के शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

     

    विक्टर पीछे हट गया।

     

    सेलेना ने एड्रियन से कहा—

     

    “अब मुझे समुद्र में फेंक दो!”

     

    एड्रियन ने बिना देर किए उसे समुद्र में छोड़ दिया।

     

    जैसे ही सेलेना पानी में गई, समुद्र की लहरें अचानक शांत हो गईं।

     

    विक्टर और उसके आदमी कुछ समझ पाते, उससे पहले समुद्र की एक बड़ी लहर आई और उन्हें पीछे की ओर बहा ले गई।

     

    कुछ देर बाद सब शांत हो गया।

     

    एड्रियन समुद्र के किनारे बैठा रहा।

     

    उसे लगा कि उसने अपना सबसे अच्छा दोस्त खो दिया।

     

    तभी पानी के अंदर से सेलेना की आवाज आई—

     

    “एड्रियन!”

     

    वह चौंककर समुद्र की तरफ देखने लगा।

     

    सेलेना पानी के ऊपर आई।

     

    “तुमने मेरी आजादी बचाई। इसलिए आज से तुम्हें किसी जादुई इच्छा की जरूरत नहीं।”

     

    एड्रियन ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    सेलेना मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि तुम्हारे अंदर पहले से ही वह चीज है जो दुनिया के सबसे अमीर इंसानों के पास भी नहीं होती—एक साफ दिल।”

     

    एड्रियन की आंखें नम हो गईं।

     

    “क्या मैं तुम्हें फिर कभी देख पाऊंगा?”

     

    सेलेना ने कहा—

     

    “जब भी तुम्हें लगे कि तुम बिल्कुल अकेले हो, समुद्र के किनारे आ जाना।”

     

    इतना कहकर वह गहरे पानी में चली गई।

     

    एड्रियन कई देर तक समुद्र को देखता रहा।

     

    उस दिन के बाद उसकी जिंदगी धीरे-धीरे बदलने लगी।

     

    उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, एक छोटी-सी नौकरी शुरू की और अपनी मां का ख्याल रखने लगा।

     

    कई साल बाद भी वह हर रविवार समुद्र के किनारे जरूर जाता।

     

    लोग उसे देखकर पूछते—

     

    “तुम यहां किसका इंतजार करते हो?”

     

    एड्रियन बस मुस्कुरा देता।

     

    उसे पता था कि समुद्र की गहराइयों में उसकी एक ऐसी दोस्त रहती है, जिसे दुनिया शायद कभी देख भी न पाए।

     

    और कभी-कभी जब सूरज ढलने लगता, समुद्र की लहरों के बीच उसे एक हल्की सुनहरी चमक दिखाई देती।

     

    तब एड्रियन समझ जाता—

     

    सेलेना अब भी उसे याद करती है।

     

    और यही उस सुनहरी मछली की सबसे बड़ी जादुई शक्ति थी—उसने एड्रियन को दौलत नहीं दी थी।

     

    उसने उसे यह सिखाया था कि असली खुशी किसी जादुई इच्छा में नहीं, बल्कि किसी के लिए बिना किसी स्वार्थ के खड़े रहने में होती है।

  • भाग 4 — दहेज की पहली बेड़ियाँ

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    नंदिनी की हवेली अब शांत थी।

     

    वह हवेली, जहाँ कभी रात के सन्नाटे में चीखें सुनाई देती थीं…

     

    जहाँ पायल की आवाज लोगों की नींद उड़ा देती थी…

     

    जहाँ एक बेटी के सपनों को दहेज की आग में जला दिया गया था…

     

    आज वहाँ पहली बार सुबह की चिड़ियों की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    लेकिन आरती के मन में तूफान था।

     

    राघव गिरफ्तार हो चुका था।

     

    कमला ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था।

     

    नंदिनी की मौत का सच सबके सामने आ चुका था।

     

    फिर भी आरती को लगता था कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई।

     

    उस रात वह अकेली हवेली में गई।

     

    विवेक ने उसे रोकना चाहा।

     

    “आरती, वहाँ अकेले मत जाओ।”

     

    आरती ने कहा—

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि माँ ने कहा था कि उनकी आखिरी बेड़ी अभी टूटी नहीं है।”

     

    विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं भी चलूँगा।”

     

    दोनों हवेली में दाखिल हुए।

     

    अंदर अजीब शांति थी।

     

    न कोई आवाज…

     

    न कोई हवा…

     

    न कोई पायल।

     

    आरती उसी कमरे में पहुँची जहाँ उसे नंदिनी की डायरी मिली थी।

     

    उसने दीवार पर लगी तस्वीर के सामने दीपक जलाया।

     

    “माँ… मैं आ गई।”

     

    कुछ पल तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर अचानक दीपक की लौ काँपने लगी।

     

    कमरे का तापमान गिर गया।

     

    आरती ने धीरे से कहा—

     

    “माँ?”

     

    पीछे से पायल की आवाज आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    नंदिनी धीरे-धीरे कमरे में दिखाई दी।

     

    लेकिन आज वह पहले जैसी डरावनी नहीं थी।

     

    उसका चेहरा शांत था।

     

    जले हुए निशान गायब थे।

     

    लाल साड़ी बिल्कुल साफ थी।

     

    आरती की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “माँ…”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “बेटी।”

     

    आरती उसके पास जाना चाहती थी, लेकिन डर रही थी।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “डर मत।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “क्या अब आपको मुक्ति मिल गई?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    नंदिनी ने हवेली की दीवारों की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि मेरी कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “अब क्या बाकी है?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “जब तक इस गाँव में किसी बेटी के पिता से दहेज माँगा जाएगा, तब तक मेरी आत्मा को चैन नहीं मिलेगा।”

     

    आरती ने दृढ़ आवाज में कहा—

     

    “मैं दहेज के खिलाफ लड़ूँगी।”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अकेली?”

     

    “नहीं।”

     

    आरती ने विवेक का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम दोनों।”

     

    नंदिनी की आँखों में गर्व उतर आया।

     

    उसने कहा—

     

    “यही मेरी आखिरी इच्छा है।”

     

    अगली सुबह आरती ने एक फैसला किया।

     

    उसने गाँव के चौक में सभी लोगों को बुलाया।

     

    गाँव में चर्चा फैल गई।

     

    “नंदिनी की बेटी कुछ कहने वाली है।”

     

    “क्या वह हवेली बेचने वाली है?”

     

    “क्या वह राघव के खिलाफ बोलेगी?”

     

    दोपहर तक चौक लोगों से भर गया।

     

    आरती सामने खड़ी हुई।

     

    उसके हाथ में नंदिनी की पुरानी डायरी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “आज मैं अपनी माँ की कहानी सुनाने आई हूँ।”

     

    पूरा चौक शांत हो गया।

     

    आरती ने डायरी का एक-एक पन्ना लोगों के सामने पढ़ना शुरू किया।

     

    दहेज की माँग…

     

    पिता की मजबूरी…

     

    मारपीट…

     

    धमकियाँ…

     

    और आखिर में वह रात…

     

    जब नंदिनी को जिंदा जला दिया गया था।

     

    कई औरतें रोने लगीं।

     

    एक बूढ़ा आदमी सिर झुकाकर बैठ गया।

     

    फिर आरती ने कहा—

     

    “मेरी माँ की हत्या सिर्फ एक आदमी ने नहीं की थी।”

     

    लोग उसकी तरफ देखने लगे।

     

    “उसकी हत्या उस सोच ने की थी, जो कहती है कि बेटी की शादी में पैसा देना जरूरी है।”

     

    “उस सोच ने की थी, जो कहती है कि लड़के वाले ज्यादा बड़े हैं।”

     

    “उस सोच ने की थी, जो कहती है कि अगर बेटी ससुराल में अत्याचार सह रही है तो उसे चुप रहना चाहिए।”

     

    आरती की आवाज तेज होती गई।

     

    “और सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि हम सब उस सोच को किसी न किसी रूप में जिंदा रखते हैं।”

     

    चौक में सन्नाटा छा गया।

     

    एक आदमी ने कहा—

     

    “लेकिन बेटी, समाज की परंपरा है।”

     

    आरती ने उसकी तरफ देखकर कहा—

     

    “हर पुरानी चीज परंपरा नहीं होती।”

     

    “अगर कोई परंपरा किसी इंसान की जिंदगी छीन ले, तो उसे बचाना नहीं चाहिए… उसे बदलना चाहिए।”

     

    तालियों की आवाज गूँज उठी।

     

    लेकिन तभी भीड़ के पीछे से एक लड़की आगे आई।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “दीदी… मेरे घर वाले भी मेरी शादी में दहेज देने के लिए जमीन बेच रहे हैं।”

     

    आरती उसके पास गई।

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मुझे शादी नहीं रोकनी… बस ऐसा घर चाहिए जहाँ मुझे दहेज के लिए अपमानित न किया जाए।”

     

    आरती ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो हम तुम्हारे साथ हैं।”

     

    एक के बाद एक कई लड़कियाँ सामने आने लगीं।

     

    किसी से बाइक माँगी जा रही थी।

     

    किसी से कार।

     

    किसी से सोना।

     

    किसी से लाखों रुपये।

     

    आरती ने उसी दिन एक अभियान शुरू किया—

     

    “बेटी की शादी, बिना दहेज की जिम्मेदारी।”

     

    गाँव के युवाओं ने साथ दिया।

     

    महिलाओं ने साथ दिया।

     

    धीरे-धीरे आसपास के गाँवों में भी यह अभियान फैलने लगा।

     

    लोगों ने तय किया कि जो परिवार दहेज माँगेगा, उसके साथ शादी नहीं की जाएगी।

     

    कई लड़कों ने खुले मंच पर कहा—

     

    “हम दहेज नहीं लेंगे।”

     

    उनमें विवेक भी था।

     

    उसने कहा—

     

    “मैंने अपनी पत्नी से एक रुपया भी दहेज नहीं लिया। क्योंकि मुझे पत्नी चाहिए थी, सामान नहीं।”

     

    आरती मुस्कुराई।

     

    उसे लगा जैसे उसकी माँ की आत्मा कहीं दूर से यह सब देख रही है।

     

    लेकिन उसी रात कुछ अजीब हुआ।

     

    हवेली के पुराने कमरे में एक आखिरी बार पायल की आवाज आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    आरती अकेली कमरे में गई।

     

    वहाँ नंदिनी खड़ी थी।

     

    इस बार उसके हाथ में वही पुराना लाल कपड़ा था।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “बेटी… तुमने मेरी बेड़ियाँ तोड़ दीं।”

     

    आरती रो पड़ी।

     

    “माँ, मैं तुम्हें बचा नहीं सकी।”

     

    नंदिनी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम बच्ची थीं। तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

     

    “मुझे बहुत देर से पता चला कि आप मेरी माँ हैं।”

     

    “लेकिन तुम्हें मेरा दर्द समझने में एक पल भी नहीं लगा।”

     

    आरती ने नंदिनी को गले लगाने की कोशिश की।

     

    इस बार नंदिनी ने उसे रोक नहीं दिया।

     

    दोनों एक-दूसरे से लिपट गईं।

     

    आरती को पहली बार अपनी माँ का स्पर्श महसूस हुआ।

     

    वह स्पर्श ठंडा नहीं था।

     

    बहुत गर्म था।

     

    माँ की ममता जैसा।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “अब मुझे जाना होगा।”

     

    आरती ने रोते हुए पूछा—

     

    “क्या आप फिर कभी नहीं आएँगी?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “जब भी कोई बेटी दहेज के खिलाफ आवाज उठाएगी, समझ लेना मैं वहीं हूँ।”

     

    “जब भी कोई पिता अपनी बेटी को बोझ समझने से इनकार करेगा, समझ लेना मैं वहीं हूँ।”

     

    “और जब कोई लड़का कहेगा कि उसे दहेज नहीं, जीवनसाथी चाहिए… समझ लेना मेरी आत्मा मुस्कुरा रही है।”

     

    नंदिनी धीरे-धीरे प्रकाश में बदलने लगी।

     

    आरती चिल्लाई—

     

    “माँ!”

     

    नंदिनी की आखिरी आवाज आई—

     

    “बेटी… किसी की बेटी को मेरी तरह मत मरने देना।”

     

    और फिर सब शांत हो गया।

     

    पायल की आवाज हमेशा के लिए बंद हो गई।

     

    हवेली की दीवारों पर पड़े काले निशान धीरे-धीरे मिटने लगे।

     

    जिस कमरे में वर्षों से अंधेरा था, वहाँ सूरज की रोशनी भर गई।

     

    कुछ महीनों बाद उस हवेली को तोड़कर वहाँ एक नया भवन बनाया गया।

     

    उसका नाम रखा गया—

     

    “नंदिनी स्मृति केंद्र।”

     

    वहाँ गरीब परिवारों की बेटियों को पढ़ाई में मदद दी जाने लगी।

     

    दहेज के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रम होने लगे।

     

    कानूनी सहायता दी जाने लगी।

     

    और सबसे महत्वपूर्ण—

     

    लड़कियों को यह सिखाया जाने लगा कि वे किसी भी अत्याचार को अपनी किस्मत समझकर स्वीकार न करें।

     

    एक साल बाद उसी गाँव में आरती एक शादी में गई।

     

    दूल्हा साधारण कपड़ों में आया था।

     

    न कोई महंगी गाड़ी…

     

    न बैंड-बाजा…

     

    न दहेज की लंबी सूची।

     

    लड़के के पिता ने सबके सामने कहा—

     

    “हमें दहेज नहीं चाहिए। हमें सिर्फ आपकी बेटी की खुशी चाहिए।”

     

    आरती की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसे लगा जैसे कहीं दूर से पायल की बहुत हल्की आवाज आई—

     

    छन…

     

    छन…

     

    फिर हवा में एक फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “अब मैं खुश हूँ।”

     

    आरती ने आसमान की तरफ देखा।

     

    सूरज चमक रहा था।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “माँ… आपकी बेटी हार नहीं मानी।”

     

    हवा चली।

     

    नंदिनी की तस्वीर पर रखा लाल फूल जमीन पर गिरा।

     

    लेकिन इस बार वह डरावना संकेत नहीं था।

     

    वह एक आशीर्वाद था।

     

    कहानी की अंतिम सीख

     

    दहेज किसी बेटी की शादी की कीमत नहीं है।

     

    दहेज एक ऐसी सामाजिक बेड़ी है, जो केवल बेटी को नहीं, पूरे परिवार को जकड़ लेती है।

     

    हमें यह समझना होगा कि—

     

    – बेटी किसी पर बोझ नहीं है।

    – शादी कोई सौदा नहीं है।

    – दहेज लेना सम्मान नहीं, लालच है।

    – दहेज देना मजबूरी हो सकती है, लेकिन दहेज की माँग को सही मान लेना गलत है।

    – बेटियों को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और अपने अधिकारों की जानकारी देना सबसे बड़ा उपहार है।

    – बेटों को बचपन से सिखाना चाहिए कि पत्नी जीवनसाथी है, दहेज लाने वाली नहीं।

     

    और सबसे जरूरी बात—

     

    अगर आपके सामने किसी बेटी के साथ दहेज के नाम पर अन्याय हो रहा है, तो चुप मत रहिए।

     

    क्योंकि नंदिनी की कहानी सिर्फ एक डरावनी कहानी नहीं है।

     

    यह उन हजारों बेटियों की आवाज है, जिनके सपने दहेज की आग में जल गए।

     

    और शायद इस कहानी की सबसे बड़ी हॉरर यही है कि—

     

    भूतों से डरने वाला इंसान कुछ समय बाद सामान्य हो जाता है,

    लेकिन दहेज जैसी बुराई को देखकर भी चुप रहने वाला समाज धीरे-धीरे अपनी इंसानियत खो देता है।

     

    इसलिए आज एक संकल्प लें—

     

    न दहेज लेंगे, न देंगे,

    और न किसी बेटी पर दहेज का अत्याचार होने देंगे।

     

    क्योंकि जिस दिन समाज यह संकल्प सच में निभा लेगा…

     

    उस दिन नंदिनी जैसी किसी माँ की आत्मा को फिर कभी भटकना नहीं पड़ेगा।

  • भाग 3 — राघव का लौटना

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    हवेली के मुख्य दरवाजे पर लगातार दस्तक हो रही थी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “विवेक… बेटा, दरवाजा खोलो।”

     

    आवाज बिल्कुल किसी बूढ़े पिता जैसी थी।

     

    विवेक दरवाजे के पास खड़ा काँप रहा था।

     

    आरती ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    कमला जमीन पर बैठी बुदबुदा रही थी—

     

    “हे भगवान… वह वापस आ गया…”

     

    विवेक ने माँ की तरफ देखा।

     

    “माँ, आखिर सच क्या है?”

     

    कमला ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों में पंद्रह साल पुराना डर फिर से लौट आया था।

     

    “तेरे पिता जिंदा थे।”

     

    “लेकिन आपने मुझे बताया कि उनकी मौत हो गई थी।”

     

    “मैंने झूठ बोला था।”

     

    “क्यों?”

     

    कमला रोने लगी।

     

    “क्योंकि अगर मैं सच बता देती तो शायद तू भी मर जाता।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “राघव ने नंदिनी को क्यों मारा?”

     

    कमला ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    “पैसों के लिए।”

     

    हवेली के बाहर दस्तक और तेज हो गई।

     

    ठक! ठक! ठक!

     

    “विवेक… मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

     

    विवेक ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    फिर माँ से पूछा—

     

    “अगर वह मेरे पिता हैं, तो आप उन्हें अंदर आने से क्यों रोक रही हैं?”

     

    कमला ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि राघव अब इंसान नहीं रहा।”

     

    अचानक दरवाजे के नीचे से काला धुआँ अंदर आने लगा।

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    धुआँ धीरे-धीरे फर्श पर फैलने लगा।

     

    उसके बीच एक आकृति बनने लगी।

     

    एक आदमी…

     

    लंबा कद…

     

    झुका हुआ चेहरा…

     

    और आँखें पूरी तरह काली।

     

    आरती चीख पड़ी।

     

    कमला ने कहा—

     

    “मत देखो उसकी आँखों में!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    विवेक ने उस आकृति की तरफ देख लिया।

     

    अचानक वह आदमी गायब हो गया।

     

    और विवेक जमीन पर गिर पड़ा।

     

    आरती उसके पास पहुँची।

     

    “विवेक!”

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे।

     

    “पिताजी… मुझे माफ कर दीजिए…”

     

    आरती घबरा गई।

     

    “विवेक! होश में आओ!”

     

    कुछ सेकंड बाद विवेक ने आँखें खोलीं।

     

    उसने डरते हुए कहा—

     

    “मैंने उन्हें देखा।”

     

    “किसे?”

     

    “अपने पिता को।”

     

    “उन्होंने क्या कहा?”

     

    विवेक का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “उन्होंने कहा… नंदिनी को उन्होंने नहीं मारा।”

     

    कमला अचानक चिल्लाई—

     

    “झूठ!”

     

    विवेक ने माँ की तरफ देखा।

     

    “उन्होंने कहा कि नंदिनी की मौत के पीछे कोई और था।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    विवेक कुछ बोलता, उससे पहले ऊपर से भारी चीज गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों ऊपर की तरफ भागे।

     

    पुराने कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    अंदर दीवार पर नंदिनी की तस्वीर लगी थी।

     

    लेकिन तस्वीर बदल चुकी थी।

     

    अब नंदिनी की गोद में एक छोटी बच्ची दिखाई दे रही थी।

     

    आरती के रोंगटे खड़े हो गए।

     

    “ये बच्ची कौन है?”

     

    कमला ने रोते हुए कहा—

     

    “नंदिनी की बेटी।”

     

    आरती ने चौंककर पूछा—

     

    “लेकिन आपने कहा था कि बच्चा पैदा होने से पहले ही मर गया था।”

     

    कमला ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने कहा था कि बच्चा मर गया था… लेकिन मुझे नहीं पता था कि सच क्या है।”

     

    तभी पीछे से नंदिनी की आवाज आई—

     

    “वह मरी नहीं थी।”

     

    कमरे में अचानक ठंडी हवा भर गई।

     

    नंदिनी सामने दिखाई दी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर डरावनी मुस्कान नहीं थी।

     

    उसकी आँखों में माँ का दर्द था।

     

    “मेरी बेटी जिंदा थी।”

     

    आरती की आँखें भर आईं।

     

    “फिर कहाँ है वह?”

     

    नंदिनी ने अपनी उँगली हवेली के पुराने कुएँ की तरफ कर दी।

     

    “उस रात मुझे रसोई में ले जाया गया था।”

     

    उसकी आवाज काँपने लगी।

     

    “राघव ने मुझसे कहा था कि मेरे पिता पैसे नहीं देंगे, इसलिए मुझे इस घर में रहने का कोई अधिकार नहीं।”

     

    आरती सुनती रही।

     

    “मैंने उसके सामने हाथ जोड़कर कहा था कि मुझे मत मारो।”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    “लेकिन लालच इंसान से उसकी आत्मा छीन लेता है।”

     

    कमला रोते हुए बोली—

     

    “बस करो नंदिनी…”

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुमने देखा था कमला।”

     

    कमला काँपने लगी।

     

    “हाँ… मैंने सब देखा था।”

     

    “फिर तुमने मुझे बचाया क्यों नहीं?”

     

    कमला जमीन पर गिर गई।

     

    “मैं डर गई थी।”

     

    नंदिनी की आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी—

     

    “तुम डर गई थीं… और मेरी जिंदगी खत्म हो गई।”

     

    आरती ने नंदिनी से पूछा—

     

    “उस रात आखिर हुआ क्या था?”

     

    नंदिनी ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—

     

    “राघव ने मुझे रसोई में बंद कर दिया था। वह मुझसे दो लाख रुपये माँग रहा था। मैंने कहा कि मेरे पिता के पास कुछ नहीं है।”

     

    “फिर?”

     

    “उसने मेरे ऊपर मिट्टी का तेल डाल दिया।”

     

    कमरा अचानक धुएँ से भरने लगा।

     

    आरती ने अपनी नाक ढक ली।

     

    नंदिनी की आवाज और धीमी हो गई।

     

    “लेकिन आग लगने से पहले मैंने अपनी बेटी को बचा लिया।”

     

    आरती ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    “मैंने उसे पुराने कपड़ों में लपेटकर पिछली खिड़की से बाहर फेंक दिया था।”

     

    आरती के आँसू निकल आए।

     

    “फिर बच्ची कहाँ गई?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “एक बूढ़ी औरत ने उसे उठा लिया।”

     

    कमला ने अचानक सिर उठाया।

     

    “नहीं…”

     

    आरती ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप उस बूढ़ी औरत को जानती हैं?”

     

    कमला ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी हवेली के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    धीरे…

     

    बहुत धीरे…

     

    जैसे कोई लकड़ी की छड़ी के सहारे चल रहा हो।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    विवेक ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    हवेली के कुएँ के पास एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में एक पुराना लाल कपड़ा था।

     

    वह ऊपर देखकर हवेली की तरफ मुस्कुरा रही थी।

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन है वह?”

     

    कमला के मुँह से धीरे से निकला—

     

    “वही…”

     

    “कौन?”

     

    “वही औरत… जिसने नंदिनी की बच्ची को बचाया था।”

     

    आरती नीचे जाने लगी।

     

    विवेक ने उसे रोकना चाहा।

     

    “रुको।”

     

    लेकिन आरती ने कहा—

     

    “अगर वह बच्ची आज भी जिंदा है, तो हमें उसे ढूँढना होगा।”

     

    तीनों हवेली से बाहर निकले।

     

    बूढ़ी औरत कुएँ के पास खड़ी थी।

     

    उसने आरती को देखकर कहा—

     

    “तुम नंदिनी की बहू हो?”

     

    आरती ने सिर हिलाया।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “नहीं… तुम उसकी बेटी जैसी हो।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “आप नंदिनी की बच्ची को जानती हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी मुट्ठी खोली।

     

    उसमें एक छोटा-सा चाँदी का लॉकेट था।

     

    “यह उसकी माँ ने मुझे दिया था।”

     

    आरती ने लॉकेट देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मेरी गुड़िया।”

     

    “वह बच्ची कहाँ है?”

     

    बूढ़ी औरत ने सामने सड़क की तरफ देखा।

     

    “बहुत दूर नहीं।”

     

    “कहाँ?”

     

    “शहर में।”

     

    “उसका नाम?”

     

    बूढ़ी औरत ने आरती की आँखों में देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “उसका नाम… आरती है।”

     

    आरती का शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    विवेक ने उसकी तरफ देखा।

     

    कमला के चेहरे पर डर जम गया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “हाँ बेटी… तुम ही नंदिनी की बेटी हो।”

     

    हवा जैसे एक पल के लिए रुक गई।

     

    आरती के हाथ से लॉकेट गिर गया।

     

    “नहीं… यह सच नहीं हो सकता।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें मरने से बचाया था।”

     

    आरती की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “तो मेरे पिता कौन हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब देने के बजाय पीछे देखा।

     

    हवेली के दरवाजे पर एक काली आकृति खड़ी थी।

     

    राघव।

     

    वह मुस्कुरा रहा था।

     

    उसने कहा—

     

    “अब मेरी बेटी को कोई मुझसे नहीं छीन सकता।”

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    “आप… मेरे पिता हैं?”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    आरती के भीतर वर्षों का खालीपन अचानक भर गया।

     

    लेकिन वह खुशी नहीं थी।

     

    वह डर था।

     

    नफरत थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल—

     

    अगर राघव उसका पिता था…

     

    तो उसने उसकी माँ को क्यों मारा?

     

    राघव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें मुझसे छीन लिया था।”

     

    आरती चिल्लाई—

     

    “आपने मेरी माँ को मारा!”

     

    राघव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “नहीं।”

     

    “तो किसने?”

     

    राघव ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “इस घर ने।”

     

    आरती कुछ समझ नहीं पाई।

     

    राघव ने कहा—

     

    “दहेज के लालच ने नंदिनी को मारा था। लेकिन उसके पीछे सिर्फ मैं नहीं था।”

     

    कमला रोते हुए बोली—

     

    “राघव, सच मत बताओ।”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब सच छिपाने का समय खत्म हो गया है।”

     

    वह आरती के पास आया।

     

    “तुम्हारी माँ को मारने के बाद मैंने उसकी आत्मा को हवेली में कैद कर दिया था।”

     

    आरती ने काँपते हुए पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “ताकि उसका दर्द हमेशा इस घर में रहे।”

     

    नंदिनी अचानक प्रकट हुई।

     

    उसने राघव की तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे कैद नहीं किया था।”

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    नंदिनी बोली—

     

    “मेरे दर्द को इस घर की दीवारों ने कैद किया था।”

     

    फिर उसकी नजर आरती पर पड़ी।

     

    “लेकिन अब मेरी बेटी आ गई है।”

     

    नंदिनी ने हाथ बढ़ाया।

     

    आरती धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    माँ और बेटी के बीच केवल कुछ कदम का फासला था।

     

    आरती ने रोते हुए कहा—

     

    “माँ…”

     

    नंदिनी ने उसे गले लगाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उसका शरीर धुएँ में बदल गया।

     

    आरती ने हवा को पकड़ने की कोशिश की।

     

    “माँ!”

     

    नंदिनी की आवाज दूर से आई—

     

    “बेटी… मुझे मुक्त करने के लिए मेरा बदला मत लेना।”

     

    आरती रोते हुए बोली—

     

    “फिर क्या करूँ?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “दहेज के खिलाफ लड़ना।”

     

    “लोगों को बताना कि मेरी मौत सिर्फ मेरी नहीं थी।”

     

    “हर उस बेटी की आवाज बनना, जो दहेज के कारण चुप है।”

     

    अचानक हवेली में तेज रोशनी हुई।

     

    राघव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    कमला ने पुलिस को फोन कर दिया।

     

    कुछ ही देर में पुलिस हवेली पहुँच गई।

     

    पुराने कमरे की तलाशी ली गई।

     

    दीवार के पीछे से नंदिनी की डायरी, पुराने कागजात और कई ऐसे सबूत मिले जिनसे साबित हो गया कि नंदिनी की मौत हादसा नहीं थी।

     

    राघव को गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    कमला ने अदालत में सच बयान दिया।

     

    पंद्रह साल बाद नंदिनी को इंसाफ मिलने की उम्मीद जगी।

     

    लेकिन आरती के लिए असली लड़ाई अब शुरू हुई थी।

     

    उसने अपने पति विवेक से कहा—

     

    “मैं इस घर में नहीं रहूँगी।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “फिर कहाँ जाओगी?”

     

    आरती ने नंदिनी की तस्वीर हाथ में लेते हुए कहा—

     

    “जहाँ मेरी माँ का सपना पूरा हो सके।”

     

    “मैं उन बेटियों के लिए काम करूँगी जिन्हें दहेज के नाम पर डराया जाता है।”

     

    विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

     

    आरती ने हवेली की तरफ आखिरी बार देखा।

     

    ऊपर की खिड़की में नंदिनी दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    उसकी पायल की आवाज धीरे-धीरे दूर होती गई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    और फिर हवेली हमेशा के लिए शांत हो गई।

     

    लेकिन जाते-जाते आरती को एक आवाज सुनाई दी—

     

    “बेटी… अब किसी और माँ को अपनी बेटी के लिए रोने मत देना।”

     

    आरती ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसके आँसू गालों पर थे।

     

    लेकिन इस बार उन आँसुओं में डर नहीं था।

     

    एक संकल्प था।

     

    दहेज के खिलाफ लड़ने का संकल्प।

     

    क्रमशः… भाग 4 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    किसी भी अन्याय को केवल इसलिए स्वीकार मत कीजिए क्योंकि वह वर्षों से चला आ रहा है।

     

    नंदिनी की सबसे बड़ी जीत यह नहीं थी कि उसके हत्यारे को सजा मिली।

     

    उसकी असली जीत यह थी कि उसकी बेटी ने उसके दर्द को अपनी ताकत बना लिया।

     

    दहेज की बेड़ियाँ तभी टूटेंगी, जब बेटियाँ अपने अधिकार के लिए आवाज उठाएँगी और परिवार उनका साथ देगा।

     

    याद रखिए—

     

    शादी दो परिवारों का रिश्ता है, सौदेबाजी नहीं।

    बेटी कोई सामान नहीं, एक इंसान है।

    और इंसान की कीमत कभी दहेज से नहीं लगाई जा सकती।

  • भाग 2 — हवेली का बंद कमरा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    सुबह की पहली किरण हवेली की टूटी हुई खिड़की से अंदर आई, लेकिन आरती की आँखों से रात का डर अभी तक नहीं गया था।

     

    वह पूरी रात सो नहीं पाई थी।

     

    उसके सामने बार-बार वही चेहरा आ रहा था—

     

    जला हुआ चेहरा…

     

    लाल साड़ी…

     

    आँखों में आँसू…

     

    और वह आवाज—

     

    “मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”

     

    आरती ने सोचा था कि सुबह होते ही वह अपने पति विवेक को सब कुछ बता देगी।

     

    लेकिन जब वह कमरे से बाहर निकली, तो हवेली बिल्कुल सामान्य लग रही थी।

     

    रसोई में उसकी सास कमला चाय बना रही थी।

     

    विवेक अखबार पढ़ रहा था।

     

    आरती ने काँपती आवाज में पूछा—

     

    “विवेक… क्या इस घर में पहले कभी नंदिनी नाम की कोई लड़की रहती थी?”

     

    अखबार पढ़ते-पढ़ते विवेक के हाथ रुक गए।

     

    उसने धीरे से आरती की तरफ देखा।

     

    “तुमने ये नाम कहाँ सुना?”

     

    आरती समझ गई कि कुछ तो छिपाया जा रहा है।

     

    “बस ऐसे ही…”

     

    कमला अचानक जोर से बोली—

     

    “इस घर में किसी नंदिनी का नाम मत लेना!”

     

    आरती चौंक गई।

     

    कमला की आँखों में डर था।

     

    सिर्फ डर नहीं…

     

    ऐसा डर, जैसे किसी पुराने जख्म को अचानक किसी ने छू लिया हो।

     

    विवेक ने माँ को शांत करते हुए कहा—

     

    “माँ, रहने दो।”

     

    फिर आरती से बोला—

     

    “तुमने शायद सपना देखा होगा।”

     

    आरती ने कुछ नहीं कहा।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल पैदा हो चुका था—

     

    अगर नंदिनी केवल सपना थी, तो माँ इतनी डर क्यों गई?

     

    उस दिन दोपहर में आरती पूरे घर में घूम रही थी।

     

    हवेली बहुत बड़ी थी।

     

    पुरानी दीवारों पर जगह-जगह सीलन थी।

     

    कई कमरों पर ताले लगे थे।

     

    एक लंबा गलियारा हवेली की पिछली तरफ जाता था।

     

    वहीं उसे लोहे का एक पुराना दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर मोटा ताला लगा था।

     

    आरती ने हाथ बढ़ाकर ताले को छूना चाहा।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “उस दरवाजे के पास मत जाना।”

     

    आरती पलटी।

     

    विवेक खड़ा था।

     

    “क्यों?”

     

    “बस मत जाना।”

     

    “उस कमरे में क्या है?”

     

    विवेक ने नजरें चुरा लीं।

     

    “पुराना सामान।”

     

    आरती ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “पुराने सामान से इतना डर क्यों लगता है?”

     

    विवेक चुप रहा।

     

    उस रात आरती ने फैसला किया कि वह सच्चाई जानकर रहेगी।

     

    आधी रात को जब पूरा घर सो गया, वह धीरे से उठी।

     

    उसने गलियारे में कदम रखा।

     

    हवा अचानक ठंडी हो गई।

     

    उसकी साँस से भाप निकलने लगी।

     

    फिर उसे वही आवाज सुनाई दी—

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    पायल की आवाज उसी बंद कमरे के पीछे से आ रही थी।

     

    आरती धीरे-धीरे दरवाजे तक पहुँची।

     

    अचानक ताला अपने आप गिर गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    कुछ पल तक उसने दरवाजे को देखा।

     

    फिर साहस करके उसे खोल दिया।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    उसने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    कमरे में पुराने संदूक, टूटी हुई कुर्सियाँ और धूल से ढके सामान पड़े थे।

     

    दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    आरती ने रोशनी तस्वीर पर डाली।

     

    वह नंदिनी की तस्वीर थी।

     

    लाल जोड़े में मुस्कुराती हुई नंदिनी।

     

    आरती की आँखें नम हो गईं।

     

    तस्वीर के नीचे कुछ लिखा था—

     

    “नंदिनी — इस घर की बहू।”

     

    लेकिन उसके ठीक नीचे किसी ने काले रंग से दूसरा वाक्य लिख दिया था—

     

    “इस घर की सबसे बड़ी गलती।”

     

    आरती का दिल काँप उठा।

     

    तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरती ने तुरंत दरवाजा खींचा।

     

    वह नहीं खुला।

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर कमरे में किसी के रोने की आवाज आई।

     

    “बाबा… मुझे घर ले चलो…”

     

    आरती का शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    वह आवाज नंदिनी की थी।

     

    “बाबा… मैं घर जाना चाहती हूँ…”

     

    आरती रोने लगी।

     

    “नंदिनी… तुम यहाँ हो?”

     

    अचानक संदूक अपने आप खुल गया।

     

    उसके अंदर लाल कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी पड़ी थी।

     

    आरती ने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कोई बेटी यह डायरी पढ़ रही है, तो समझ लेना कि मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरती ने काँपते हाथों से पन्ने पलटे।

     

    नंदिनी ने अपनी जिंदगी का हर दर्द उसमें लिखा था।

     

    दहेज की माँग…

     

    मारपीट…

     

    भूखे रहना…

     

    पिता से पैसे माँगने का दबाव…

     

    और फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “आज उन्होंने कहा है कि अगर पिताजी ने दो लाख रुपये नहीं दिए, तो मेरी जिंदगी खत्म कर देंगे।”

     

    आरती की आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    अगला पन्ना आधा जला हुआ था।

     

    उस पर केवल कुछ शब्द पढ़े जा सकते थे—

     

    “मुझे रसोई में बुलाया गया है… अगर मैं वापस न आऊँ तो…”

     

    इसके बाद कुछ नहीं था।

     

    आरती ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी कमरे में किसी महिला की धीमी हँसी गूँजी।

     

    “सच जानना चाहती हो?”

     

    आरती ने पलटकर देखा।

     

    नंदिनी उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा पहले से ज्यादा भयानक था।

     

    लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा नहीं…

     

    दर्द था।

     

    आरती ने कहा—

     

    “तुम्हें किसने मारा?”

     

    नंदिनी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली हवेली के बाहर बने पुराने कुएँ की तरफ थी।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “जिसे तुम अपना पति समझती हो… उसके परिवार ने मेरी जिंदगी छीनी थी।”

     

    आरती के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “विवेक?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “विवेक उस समय पैदा भी नहीं हुआ था।”

     

    आरती ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन नंदिनी ने अगला वाक्य कहा—

     

    “लेकिन उसके पिता जानते हैं कि मेरे साथ क्या हुआ था।”

     

    आरती के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    तभी दरवाजा खुल गया।

     

    आरती भागकर अपने कमरे में पहुँची।

     

    विवेक जाग रहा था।

     

    उसने पूछा—

     

    “तुम कहाँ गई थीं?”

     

    आरती ने डायरी उसके सामने रख दी।

     

    विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तुम्हें ये कहाँ मिली?”

     

    “उस कमरे में।”

     

    विवेक ने डायरी उठाई।

     

    कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “आरती, हमें यह घर छोड़ देना चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    विवेक ने जवाब नहीं दिया।

     

    तभी नीचे से उसकी माँ की चीख सुनाई दी।

     

    “विवेक!”

     

    दोनों दौड़कर नीचे गए।

     

    कमला सीढ़ियों के पास खड़ी काँप रही थी।

     

    उसके सामने जमीन पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

     

    वही तस्वीर जिसमें नंदिनी थी।

     

    लेकिन अब तस्वीर में नंदिनी अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक आदमी खड़ा दिखाई दे रहा था।

     

    विवेक ने तस्वीर उठाई।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “ये कौन है?” आरती ने पूछा।

     

    विवेक ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “मेरे पिता।”

     

    आरती ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    तस्वीर में नंदिनी के पीछे खड़ा आदमी मुस्कुरा रहा था।

     

    लेकिन उसके हाथ में कुछ था।

     

    एक लाल रंग का कपड़ा।

     

    वही लाल कपड़ा जो नंदिनी ने अपनी डायरी में आखिरी दिन पहना था।

     

    कमला अचानक फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    “मैंने उसे नहीं मारा था…”

     

    आरती ने कहा—

     

    “तो किसने मारा?”

     

    कमला ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुम्हारे ससुर ने।”

     

    हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    “लेकिन फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”

     

    कमला ने काँपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मैं डर गई थी।”

     

    “किससे?”

     

    कमला ने हवेली की ऊपरी मंजिल की ओर देखा।

     

    “उससे… जो नंदिनी की मौत के बाद इस घर में आया था।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    कमला ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “नंदिनी की आत्मा नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    “उसका बदला।”

     

    उसी समय ऊपर से जोरदार आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पुराना बंद कमरा फिर से खुल चुका था।

     

    और अंदर से किसी बच्ची के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    “माँ… मुझे बचा लो…”

     

    कमला के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “नहीं… ये फिर शुरू हो गया।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “माँ, बच्ची कौन है?”

     

    कमला ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरती ने उसकी ओर देखा।

     

    “माँजी… सच बताइए।”

     

    कमला की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “नंदिनी मरने से पहले गर्भवती थी।”

     

    आरती के मुँह से चीख निकल गई।

     

    “क्या?”

     

    कमला ने कहा—

     

    “उस रात सिर्फ नंदिनी नहीं मरी थी… उसका अजन्मा बच्चा भी मर गया था।”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    तेज हवा अंदर आने लगी।

     

    ऊपर से पायल की आवाज आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    फिर एक और आवाज गूँजी—

     

    “जिसने मेरी जिंदगी छीनी… उसकी नस्ल में कोई बेटी चैन से नहीं रहेगी।”

     

    विवेक ने आरती का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा।”

     

    दोनों दरवाजे की तरफ दौड़े।

     

    लेकिन दरवाजा बंद था।

     

    तभी आरती ने देखा—

     

    दीवार पर धीरे-धीरे लाल अक्षरों में कुछ लिखा जा रहा था।

     

    “भागने से पहले सच पूरा जानो।”

     

    और उसके नीचे एक नाम उभर आया—

     

    “राघव।”

     

    वही राघव…

     

    नंदिनी का पति।

     

    विवेक का पिता।

     

    जिसे पंद्रह साल पहले हवेली से गायब बताया गया था।

     

    आरती ने विवेक की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता मरे नहीं थे?”

     

    विवेक की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “नहीं…”

     

    “तो कहाँ हैं?”

     

    विवेक ने काँपते हुए कहा—

     

    “यही तो मैं आज तक नहीं जानता था।”

     

    उसी क्षण हवेली के बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    तीनों जम गए।

     

    फिर बाहर से एक बूढ़ी आवाज आई—

     

    “दरवाजा खोलो… मैं राघव हूँ।”

     

    कमला ने चीखते हुए अपने कान बंद कर लिए।

     

    आरती ने विवेक की तरफ देखा।

     

    विवेक धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने कुंडी पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया…

     

    उसके पीछे नंदिनी खड़ी थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    विवेक रुक गया।

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    उसने कहा—

     

    “क्योंकि बाहर खड़ा आदमी तुम्हारा पिता नहीं है।”

     

    अचानक बाहर से वही आवाज फिर आई—

     

    “विवेक… दरवाजा खोलो बेटा…”

     

    और इस बार आवाज के पीछे किसी और की धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    एक ऐसी हँसी…

     

    जिसमें इंसानियत का नामोनिशान नहीं था।

     

    क्रमशः… भाग 3 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    दहेज केवल एक परिवार की समस्या नहीं है। यह चुप रहने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बन जाती है।

     

    नंदिनी की सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं थी कि उससे पैसे माँगे गए। उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि लोग जानते थे कि उसके साथ गलत हो रहा है, फिर भी डर के कारण चुप रहे।

     

    इसलिए जब भी किसी बेटी पर दहेज का दबाव बनाया जाए, उसे अकेला मत छोड़िए।

     

    गलत के सामने चुप रहना भी कभी-कभी गलत का साथ देना बन जाता है।

     

    और याद रखिए—

     

    बेटी की कीमत दहेज से नहीं, उसके सपनों से होती है।

    जिस घर को बेटी की जरूरत है, उसे दहेज की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

  • भाग 1 — दहेज की पहली बेड़ियाँ

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    रात के करीब बारह बज रहे थे।गाँव के आखिरी छोर पर बनी उस पुरानी हवेली में आज फिर वही आवाज गूँज रही थी—

     

    “मुझे मेरा दहेज वापस चाहिए…”

     

    हवेली की दीवारें जैसे उस आवाज को पकड़कर बार-बार दोहरा रही थीं।

     

    “मेरा दहेज… मेरा जीवन… मेरा इंसाफ…”

     

    लेकिन इस आवाज की कहानी आज से नहीं, लगभग पंद्रह साल पहले शुरू हुई थी।

     

    उस समय उस गाँव में रहने वाले रामदीन की बेटी नंदिनी की शादी तय हुई थी।

     

    नंदिनी बहुत साधारण लड़की थी। चेहरे पर हमेशा मुस्कान, आँखों में बड़े-बड़े सपने और दिल में अपने माता-पिता के लिए अथाह प्रेम।

     

    रामदीन गरीब किसान था। उसके पास ज्यादा जमीन नहीं थी, लेकिन उसने अपनी बेटी को कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी।

     

    शादी की तारीख नजदीक आती गई।

     

    एक शाम लड़के वालों का फोन आया।

     

    “देखिए रामदीन जी,” लड़के के पिता ने कहा, “हमने तो कुछ माँगा नहीं है, लेकिन आजकल समाज में इज्जत भी कोई चीज होती है।”

     

    रामदीन चुप रहा।

     

    “बस एक मोटरसाइकिल, थोड़ा सोना और पचास हजार रुपये… इससे ज्यादा कुछ नहीं।”

     

    रामदीन के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा, “भाई साहब… मैं गरीब आदमी हूँ। इतना सब कहाँ से लाऊँगा?”

     

    दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर जवाब आया—

     

    “तो फिर शादी भी कहाँ से होगी?”

     

    फोन कट गया।

     

    उस रात रामदीन अपनी चारपाई पर बैठकर देर तक रोता रहा।

     

    नंदिनी ने पिता को देख लिया।

     

    “बाबा… क्या हुआ?”

     

    रामदीन ने आँसू पोंछते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटी।”

     

    “आप मुझसे झूठ बोल रहे हैं।”

     

    रामदीन ने सिर झुका लिया।

     

    “तेरी शादी में दहेज माँग रहे हैं।”

     

    नंदिनी कुछ पल बिल्कुल शांत रही।

     

    फिर उसने पिता का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “बाबा, अगर मेरी खुशी की कीमत आपकी जिंदगी है, तो मुझे ऐसी शादी नहीं करनी।”

     

    रामदीन ने बेटी की ओर देखा।

     

    “लेकिन समाज क्या कहेगा?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “समाज मेरे साथ दुख बाँटने नहीं आएगा बाबा। फिर समाज के डर से मैं अपना जीवन क्यों बर्बाद करूँ?”

     

    रामदीन की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    लेकिन तभी नंदिनी की माँ बोली—

     

    “बेटी, बात इतनी आसान नहीं है। अगर रिश्ता टूट गया तो लोग तुझे ही दोष देंगे।”

     

    नंदिनी चुप हो गई।

     

    कुछ दिनों बाद रामदीन ने अपनी छोटी-सी जमीन का एक हिस्सा बेच दिया।

     

    मोटरसाइकिल खरीदी गई।

     

    गहने बनवाए गए।

     

    पचास हजार रुपये का इंतजाम करने के लिए उसने साहूकार से भारी ब्याज पर कर्ज लिया।

     

    शादी हो गई।

     

    ढोल बजे।

     

    बारात आई।

     

    नंदिनी लाल जोड़े में विदा हुई।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि जिस घर में वह दुल्हन बनकर जा रही थी, वही घर उसकी जिंदगी की सबसे डरावनी कैद बनने वाला था।

     

    ससुराल में पहले कुछ दिन सब ठीक रहा।

     

    फिर एक रात नंदिनी के पति राघव ने कहा—

     

    “पापा कह रहे थे कि तुम्हारे पिता ने कार का वादा किया था।”

     

    नंदिनी चौंक गई।

     

    “कार? बाबा ने तो अपनी जमीन बेचकर मोटरसाइकिल दी है।”

     

    राघव ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब तुम लोग हमें बेवकूफ बनाकर लाए हो?”

     

    उस रात पहली बार नंदिनी के चेहरे से मुस्कान गायब हुई।

     

    दिन बीतते गए।

     

    माँग बढ़ती गई।

     

    कभी कार।

     

    कभी दो लाख रुपये।

     

    कभी नया फर्नीचर।

     

    कभी सोने की चेन।

     

    नंदिनी हर बार कहती—

     

    “मेरे पिता अब कुछ नहीं दे सकते।”

     

    और हर बार उसे यही जवाब मिलता—

     

    “तो फिर तू भी यहाँ ज्यादा दिन नहीं रह पाएगी।”

     

    एक दिन नंदिनी ने अपने पिता को फोन किया।

     

    “बाबा… मुझे घर ले चलो।”

     

    रामदीन की आवाज काँप गई।

     

    “क्या हुआ बेटी?”

     

    “कुछ नहीं बाबा… बस आपकी बहुत याद आ रही है।”

     

    वह अपने पिता को सच्चाई नहीं बता पाई।

     

    क्योंकि वह जानती थी कि उसके पिता के पास अब देने के लिए कुछ नहीं था।

     

    कुछ सप्ताह बाद एक रात हवेली में जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    “बचाओ!”

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    सुबह खबर फैली—

     

    नंदिनी रसोई में लगी आग में जल गई।

     

    उसकी मौत को हादसा बताया गया।

     

    रामदीन जब पहुँचा तो बेटी का चेहरा तक पहचान में नहीं आ रहा था।

     

    वह फूट-फूटकर रोया।

     

    “मेरी बेटी को जला दिया तुम लोगों ने!”

     

    लेकिन सबूत नहीं था।

     

    मामला धीरे-धीरे दब गया।

     

    हवेली फिर शांत हो गई।

     

    लेकिन नंदिनी शांत नहीं हुई।

     

    शादी के ठीक पंद्रहवें दिन से हवेली में अजीब घटनाएँ होने लगीं।

     

    रात को किसी के पायल पहनकर चलने की आवाज आती।

     

    रसोई में बंद बर्तन अपने आप गिरने लगते।

     

    और हर अमावस्या की रात हवेली की ऊपरी मंजिल से एक औरत की आवाज आती—

     

    “मेरा दहेज वापस करो…”

     

    राघव की माँ ने इसे वहम बताया।

     

    लेकिन एक रात राघव ने खुद वह आवाज सुनी।

     

    वह ऊपर गया।

     

    कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था।

     

    उसने दरवाजा तोड़ा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर राख से लिखा था—

     

    “बेटी की कीमत लगाने वालों का घर कभी आबाद नहीं होता।”

     

    राघव डरकर पीछे हट गया।

     

    तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “तुमने मेरी कीमत लगाई थी ना?”

     

    राघव पलटा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर लाल साड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था।

     

    उसी रात हवेली की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    और बाहर तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    राघव की माँ चीखती हुई नीचे भागी।

     

    तभी ऊपर से पायल की आवाज आई—

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    धीरे-धीरे वह आवाज सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।

     

    एक कदम…

     

    फिर दूसरा…

     

    फिर तीसरा…

     

    राघव और उसकी माँ दरवाजे के पास खड़े काँप रहे थे।

     

    आवाज बिल्कुल उनके सामने आकर रुक गई।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई—

     

    “जिस घर में दहेज माँगा जाता है… वहाँ दुल्हन नहीं आती… उसकी मजबूरी आती है।”

     

    और उसी क्षण हवेली की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

     

    सुबह जब गाँव वाले हवेली पहुँचे, तो राघव की माँ बेहोश मिली।

     

    राघव गायब था।

     

    उस दिन के बाद वह कभी वापस नहीं आया।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    पंद्रह साल बाद एक नई दुल्हन उस हवेली में आई।

     

    उसका नाम था आरती।

     

    उसे हवेली के पुराने इतिहास के बारे में कुछ नहीं पता था।

     

    वह अपने पति के साथ कमरे में पहुँची।

     

    रात को उसने अपने सामान में से लाल साड़ी निकाली।

     

    तभी उसे कमरे के कोने से पायल की आवाज सुनाई दी।

     

    छन…

     

    छन…

     

    आरती ने पलटकर देखा।

     

    एक औरत खिड़की के पास खड़ी थी।

     

    लाल साड़ी…

     

    जला हुआ चेहरा…

     

    और आँखों से बहते आँसू।

     

    आरती चीखने ही वाली थी कि वह औरत बोली—

     

    “डर मत बेटी… मैं तुझे डराने नहीं आई।”

     

    आरती काँपते हुए बोली—

     

    “आप… कौन हैं?”

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “मैं नंदिनी हूँ।”

     

    आरती के हाथ से साड़ी गिर गई।

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखकर कहा—

     

    “मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”

     

    आरती रोने लगी।

     

    “लेकिन मैं क्या करूँ?”

     

    नंदिनी की आवाज कठोर हो गई—

     

    “आवाज उठाओ।”

     

    फिर वह धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    जाते-जाते उसने कहा—

     

    “जिस दिन बेटियाँ डरना बंद कर देंगी… उस दिन दहेज की बेड़ियाँ टूट जाएँगी।”

     

    आरती ने उस रात फैसला कर लिया।

     

    वह चुप नहीं रहेगी।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि सुबह होते ही उसके सामने ऐसा सच आने वाला है, जो नंदिनी की मौत से भी ज्यादा भयानक था…

     

    क्रमशः… भाग 2 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    दहेज केवल पैसों की माँग नहीं है। यह किसी बेटी के आत्मसम्मान, सपनों और जीवन की कीमत लगाने की सोच है।

     

    बेटी बोझ नहीं है। दहेज परंपरा नहीं, सामाजिक बुराई है।

     

    अगर किसी रिश्ते की शुरुआत ही लालच से हो रही है, तो वहाँ प्रेम और सम्मान की उम्मीद करना अपने जीवन के साथ अन्याय है।

     

    डरकर चुप रहना समस्या को बढ़ाता है, जबकि आवाज उठाना बदलाव की पहली सीढ़ी है।

  • काली हवेली का आख़िरी कमरा (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    तेरहवीं घंटी की आवाज़ के बाद पूरी हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव सामने खड़ी उस काली परछाईं को देख रहा था।

     

    उसकी आँखें लाल थीं और शरीर धुएँ की तरह हिल रहा था। उसके चेहरे पर कोई निश्चित आकार नहीं था। कभी वह बूढ़े आदमी जैसा दिखाई देता, कभी जवान, और कभी बिल्कुल आरव जैसा।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “जिसे तुम दोस्त समझते हो, वह अभी भी ज़िंदा है।”

     

    “तो उसे मेरे सामने लाओ!”

     

    परछाईं ने हाथ उठाया।

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक तस्वीर दिखाई दी।

     

    उसमें कबीर एक छोटे से कमरे में बंद था।

     

    वह दरवाज़ा पीट रहा था।

     

    “आरव! मुझे यहाँ से निकाल!”

     

    आरव ने तस्वीर पर हाथ मारा।

     

    “कबीर!”

     

    तस्वीर के अंदर कबीर ने आरव को देखा।

     

    “तेरहवीं चाबी!”

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    वही पुरानी चाबी उसकी मुट्ठी में थी।

     

    कबीर चिल्लाया—

     

    “दीवार के पीछे का दरवाज़ा खोलो!”

     

    तभी तस्वीर गायब हो गई।

     

    आरव ने दीवार को ध्यान से देखा।

     

    उस पर मीरा की तस्वीर बनी हुई थी।

     

    आरव ने चाबी तस्वीर के बीच लगा दी।

     

    क्लिक!

     

    दीवार दो हिस्सों में बँट गई।

     

    पीछे एक संकरी सीढ़ी थी।

     

    आरव नीचे उतरने लगा।

     

    हर सीढ़ी के साथ तापमान गिरता जा रहा था।

     

    नीचे पहुँचकर उसे एक विशाल कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीचों-बीच कबीर बंधा हुआ था।

     

    “आरव!”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन तभी कबीर ने चीखकर कहा—

     

    “रुको!”

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    कबीर के पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।

     

    “आरव, ये कबीर नहीं है।”

     

    आरव ने चौंककर कबीर को देखा।

     

    कबीर मुस्कुराने लगा।

     

    उसकी मुस्कान धीरे-धीरे फैलती गई।

     

    फिर उसका चेहरा बदलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में वहाँ वही काली परछाईं खड़ी थी।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”

     

    परछाईं ने कहा—

     

    “मैंने कुछ नहीं किया। तुम्हारे परिवार ने किया था।”

     

    तभी कमरे की दीवारों पर पुरानी घटनाएँ दिखाई देने लगीं।

     

    आरव ने देखा—

     

    तीस साल पहले रुद्र प्रताप ने इसी कमरे में एक अनुष्ठान किया था।

     

    उसकी बेटी मीरा गंभीर बीमारी से मर रही थी।

     

    रुद्र अपनी बेटी को बचाना चाहता था।

     

    उसने एक अजीब शक्ति को बुलाया।

     

    उस शक्ति ने कहा था—

     

    “मैं मीरा को जीवन दूँगा, लेकिन बदले में तुम्हारे परिवार की हर पीढ़ी से एक व्यक्ति मुझे अपना जीवन देगा।”

     

    रुद्र ने हामी भर दी।

     

    मीरा बच गई।

     

    लेकिन उसी रात रुद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ।

     

    उसने उस शक्ति को कैद करने के लिए कमरा 13 बनवाया।

     

    लेकिन शक्ति ने पूरे परिवार को एक-एक करके मार दिया।

     

    मीरा को भी।

     

    मरने से पहले मीरा ने उस शक्ति को हवेली में बंद कर दिया।

     

    लेकिन एक शर्त थी—

     

    हर इक्कीस साल बाद रुद्र के परिवार का कोई वंशज हवेली में आएगा और उसकी जगह कैद हो जाएगा।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो मेरे पिता?”

     

    मीरा ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए अपना नाम और शहर बदल दिया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और तुम?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “मैंने तुम्हें यहाँ इसलिए बुलाया क्योंकि मुझे लगा था कि तुम ही इस श्राप को खत्म कर सकते हो।”

     

    परछाईं जोर से हँसी।

     

    “वह श्राप खत्म नहीं कर सकता।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    परछाईं ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—

     

    “क्योंकि अब तुम मेरे हो।”

     

    अचानक आरव के हाथ में जलन होने लगी।

     

    उसकी हथेली पर एक काला निशान बन गया।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “आरव! चाबी को आग में डालो!”

     

    कमरे के बीच एक पुरानी लोहे की भट्टी जल रही थी।

     

    आरव ने चाबी उसमें फेंक दी।

     

    आग अचानक नीली हो गई।

     

    परछाईं दर्द से चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    पूरा कमरा काँपने लगा।

     

    दीवारों में दरारें पड़ गईं।

     

    मीरा ने आरव से कहा—

     

    “जल्दी! आख़िरी दरवाज़ा खोलो!”

     

    आरव ने सामने देखा।

     

    वहाँ एक छोटा-सा लकड़ी का दरवाज़ा था।

     

    उस पर कोई ताला नहीं था।

     

    लेकिन उसके ऊपर लिखा था—

     

    “जिसे सच स्वीकार है, वही इसे खोल सकता है।”

     

    आरव ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

     

    उसके सामने उसके पिता दिखाई दिए।

     

    वह रो रहे थे।

     

    “बेटा, मुझे माफ करना।”

     

    आरव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “आपने मुझे क्यों छोड़ा?”

     

    उसके पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर मैं तुम्हें अपने पास रखता, तो वह तुम्हें ढूँढ लेता।”

     

    दृश्य गायब हो गया।

     

    फिर आरव ने अपनी माँ को देखा।

     

    फिर बचपन की यादें।

     

    फिर वह रात जब उसके पिता अचानक घर छोड़कर चले गए थे।

     

    आरव समझ गया कि उसके माता-पिता ने उससे नफरत नहीं की थी।

     

    वे उसे बचा रहे थे।

     

    उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    अंदर कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ एक आईना।

     

    आरव आईने के सामने खड़ा हुआ।

     

    आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    और उसके पीछे वह काली परछाईं।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “आरव, तुम्हें फैसला करना होगा।”

     

    “कैसा फैसला?”

     

    “या तो तुम हवेली से बाहर जाओ और श्राप हमेशा के लिए तुम्हारे परिवार के साथ रहेगा…”

     

    “या?”

     

    “या तुम यहीं रहकर इसे खत्म कर दो।”

     

    आरव ने परछाईं की तरफ देखा।

     

    “अगर मैं यहीं रह गया तो?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “तुम्हारा शरीर नहीं रहेगा। लेकिन तुम्हारी आत्मा इस हवेली को हमेशा के लिए बंद कर देगी।”

     

    आरव कुछ सेकंड तक चुप रहा।

     

    फिर उसने फैसला कर लिया।

     

    उसने आईने को उठाया और पूरी ताकत से जमीन पर पटक दिया।

     

    छन्न्न्न!

     

    आईना टूटते ही भयंकर चीख सुनाई दी।

     

    काली परछाईं टूटने लगी।

     

    उसका शरीर धुएँ में बदल गया।

     

    “तुम नहीं जानते कि तुमने क्या किया है!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब इस हवेली में कोई नहीं फँसेगा।”

     

    परछाईं ने आख़िरी बार चीखते हुए कहा—

     

    “अगर मैं खत्म हुआ… तो तुम्हारी यादें भी खत्म होंगी!”

     

    अचानक आरव के सिर में तेज दर्द हुआ।

     

    उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं तो सुबह हो चुकी थी।

     

    वह जंगल के बाहर सड़क पर पड़ा था।

     

    उसके पास कबीर भी बेहोश पड़ा था।

     

    कुछ देर बाद कबीर ने आँखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    “हाँ?”

     

    “हम बच गए?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    वहाँ अब कोई हवेली नहीं थी।

     

    सिर्फ एक जला हुआ खंडहर था।

     

    दोनों धीरे-धीरे सड़क की तरफ चलने लगे।

     

    लेकिन आरव को कुछ अजीब महसूस हो रहा था।

     

    उसे अपने बचपन की कोई याद नहीं आ रही थी।

     

    उसे अपने माता-पिता के चेहरे याद नहीं थे।

     

    उसे अपना पुराना घर याद नहीं था।

     

    यहाँ तक कि उसे यह भी याद नहीं था कि वह कबीर को कब से जानता था।

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला।

     

    उसके हाथ में एक छोटी-सी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन अब वह मुस्कुरा रही थी।

     

    तस्वीर के पीछे एक आख़िरी वाक्य लिखा था—

     

    “धन्यवाद, आरव। अब मैं आज़ाद हूँ।”

     

    आरव ने तस्वीर को सीने से लगा लिया।

     

    तभी दूर जंगल के अंदर से किसी बच्ची की हँसी सुनाई दी।

     

    आरव और कबीर दोनों रुक गए।

     

    कबीर ने घबराकर पूछा—

     

    “तुमने भी सुना?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    दोनों ने पीछे मुड़कर जंगल की तरफ देखा।

     

    वहाँ कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ पेड़ों के बीच हवा चल रही थी।

     

    आरव ने राहत की साँस ली और आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन उसे पता नहीं था…

     

    कि उसकी जेब में रखी तस्वीर के अंदर मीरा अब अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक नया चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    वही काली परछाईं।

     

    और तस्वीर के नीचे धीरे-धीरे नए शब्द उभर रहे थे—

     

    “हवेली खत्म हुई है… श्राप नहीं।”

     

    समाप्त।

  • काली हवेली का आख़िरी कमरा — भाग 2: तेरहवीं चाबी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    आरव पूरी रात सो नहीं पाया।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी चाबी थी, जिस पर 13 लिखा हुआ था।

     

    सुबह होते ही उसने अपने दोस्त कबीर को फोन किया।

     

    “कबीर, मुझे तुमसे मिलना है। अभी।”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

     

    फिर कबीर ने धीमी आवाज़ में पूछा—

     

    “तुम भैरवगढ़ गए थे?”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    बस इतना कहा—

     

    “तुम जहाँ हो, वहीं रहो। मैं आ रहा हूँ।”

     

    करीब एक घंटे बाद कबीर आरव के कमरे में पहुँचा।

     

    आरव ने बिना कुछ कहे उसके सामने चाबी रख दी।

     

    चाबी देखते ही कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये तुम्हें कहाँ मिली?”

     

    “काली हवेली में।”

     

    कबीर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

     

    “तुम वहाँ गए थे?”

     

    आरव ने पूरी घटना बता दी।

     

    मीरा…

     

    आख़िरी कमरा…

     

    तेरह नंबर की चाबी…

     

    और वह तस्वीर।

     

    कबीर चुपचाप सुनता रहा।

     

    फिर उसने अपने बैग से एक पुरानी डायरी निकाली।

     

    “मेरे दादा ने ये डायरी मुझे मरने से पहले दी थी।”

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “भैरवगढ़ की हवेली में जो दिखाई देता है, वह सच नहीं होता। और जो दिखाई नहीं देता, वही सबसे खतरनाक है।”

     

    आरव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ रुद्र प्रताप सिंह का नाम था।

     

    कबीर बोला—

     

    “मेरे दादा इस हवेली में चौकीदार थे। उन्होंने बताया था कि रुद्र प्रताप की बेटी मीरा को बचपन से एक अजीब बीमारी थी। वह अक्सर कहती थी कि उसे घर की दीवारों के अंदर से कोई बुलाता है।”

     

    “कौन?”

     

    “उसे नहीं पता था।”

     

    कबीर ने डायरी का एक और पन्ना खोला।

     

    उसमें हवेली का नक्शा बना था।

     

    लेकिन नक्शे में एक ऐसी मंज़िल दिखाई दे रही थी जो हवेली में मौजूद ही नहीं थी।

     

    तहखाना — कमरा 13।

     

    आरव ने चाबी उठाई।

     

    “तो मुझे वहाँ जाना होगा।”

     

    कबीर ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे दादा ने लिखा है कि कमरा 13 का दरवाज़ा खोलने वाला कभी वापस नहीं आया।”

     

    कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मीरा ने मुझे बुलाया है।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और अगर मीरा तुम्हें बचाना नहीं, फँसाना चाहती हो तो?”

     

    आरव के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    शाम होते ही दोनों भैरवगढ़ के लिए निकल पड़े।

     

    रास्ते भर बारिश होती रही।

     

    जब वे उस जगह पहुँचे, जहाँ पिछली रात आरव को हवेली दिखाई दी थी, वहाँ अब भी सिर्फ घना जंगल था।

     

    कबीर ने डायरी निकालकर नक्शा देखा।

     

    “हवेली यहीं होनी चाहिए।”

     

    दोनों कुछ देर तक तलाश करते रहे।

     

    अचानक आरव की नजर एक पुराने कुएँ पर पड़ी।

     

    कुएँ के किनारे वही निशान बना था जो डायरी के नक्शे पर था।

     

    कबीर ने पत्थर हटाया।

     

    नीचे सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    लगभग पचास सीढ़ियों के बाद एक पत्थर की सुरंग सामने आई।

     

    सुरंग के अंत में लोहे का दरवाज़ा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    13

     

    आरव ने चाबी ताले में लगाई।

     

    ताला अपने आप खुल गया।

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

     

    अंदर एक बड़ा कमरा था।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में कोई न कोई इंसान था।

     

    कुछ लोग रो रहे थे।

     

    कुछ चिल्ला रहे थे।

     

    कुछ सीधे कैमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    कबीर ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “आरव…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    कबीर ने तस्वीर आरव को दिखाई।

     

    उसमें एक छोटे बच्चे की तस्वीर थी।

     

    नीचे नाम लिखा था—

     

    “देवेंद्र — उम्र 8 वर्ष।”

     

    कबीर काँपने लगा।

     

    “ये मेरे दादा हैं।”

     

    आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    तस्वीर में छोटा देवेंद्र उसी कमरे में खड़ा था।

     

    उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन यह तस्वीर लगभग चालीस साल पुरानी थी।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    तभी कमरे के अंदर से आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि वह कभी यहाँ से गया ही नहीं।”

     

    दोनों ने पीछे देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह बच्ची नहीं लग रही थी।

     

    उसका चेहरा बूढ़ा दिखाई दे रहा था।

     

    बाल सफेद थे।

     

    आँखें काली।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुम मीरा नहीं हो।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “मैं मीरा हूँ।”

     

    “तो तुम्हारी उम्र…?”

     

    “इस हवेली में उम्र नहीं बढ़ती।”

     

    मीरा ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “यहाँ हर इंसान की एक रात बंद है।”

     

    अचानक एक तस्वीर जमीन पर गिर गई।

     

    उसमें रुद्र प्रताप सिंह थे।

     

    उनके हाथ में वही तेरह नंबर की चाबी थी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    पीछे कुछ लिखा था—

     

    “रुद्र ने दरवाज़ा खोला था, लेकिन बाहर कुछ और निकला।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्या निकला?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे दादा जानते थे।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    दरवाज़ा काला था।

     

    उसके ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था—

     

    “जिसे अंदर बुलाया गया है, वही बाहर जा सकता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मुझे क्यों बुलाया गया?”

     

    मीरा चुप रही।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “क्योंकि तुम रुद्र के परिवार से जुड़े हो।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि तुम्हारे परिवार का नाम क्या है।”

     

    आरव ने घबराकर कहा—

     

    “मेरा नाम आरव मल्होत्रा है। मेरा रुद्र प्रताप से कोई संबंध नहीं।”

     

    मीरा हँसने लगी।

     

    “नाम बदलने से खून नहीं बदलता।”

     

    कमरे की सारी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    फिर एक तस्वीर दीवार से गिरकर आरव के पैरों के पास आ गिरी।

     

    उसमें एक नवजात बच्चा था।

     

    गोद में उसे पकड़े एक आदमी खड़ा था।

     

    वह आदमी रुद्र प्रताप था।

     

    और बच्चे के नीचे लिखा था—

     

    “आरव।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    “ये झूठ है।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें सच से दूर रखा।”

     

    कबीर ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “जब आरव 21 साल का होगा, दरवाज़ा फिर खुलेगा।”

     

    आरव ने अपनी उम्र याद की।

     

    वह अगले दिन 21 साल का होने वाला था।

     

    उसी समय हवेली के अंदर से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    फिर किसी आदमी की भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “समय पूरा हो गया।”

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वही… जिसने हम सबको कैद किया है।”

     

    अचानक काला दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    उस अंधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    कबीर ने आरव का हाथ पकड़ा।

     

    “भागो!”

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    लेकिन रास्ता गायब हो चुका था।

     

    कमरे की दीवारें धीरे-धीरे उनके करीब आने लगीं।

     

    मीरा चीखी—

     

    “आरव! अंदर जाओ!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुम अंदर नहीं गए, तो वह बाहर आ जाएगा!”

     

    आरव ने काले दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    अंधेरे से एक हाथ बाहर निकला।

     

    वह हाथ इंसान जैसा था…

     

    लेकिन उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    आरव ने हिम्मत जुटाई और दरवाज़े के अंदर कदम रख दिया।

     

    कबीर उसके पीछे गया।

     

    दरवाज़ा उनके पीछे बंद हो गया।

     

    अंदर एक लंबा कमरा था।

     

    कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा आरव जैसा था।

     

    लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह धीरे से मुस्कुराया।

     

    “आख़िरकार तुम आ ही गए।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आदमी ने सिर उठाया।

     

    “मैं वही हूँ…”

     

    उसने कहा,

     

    “…जिसे तुम्हारे परिवार ने तीस साल पहले इस हवेली में बंद किया था।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    आदमी आगे झुका।

     

    “लेकिन अब मुझे आज़ाद होने के लिए सिर्फ तुम्हारे खून की जरूरत है।”

     

    अचानक पीछे से कबीर की चीख सुनाई दी।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कबीर गायब था।

     

    दरवाज़ा भी गायब था।

     

    और सामने बैठा वह आदमी धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठ रहा था।

     

    “अब हम दोनों अकेले हैं, आरव।”

     

    तभी दूर कहीं घड़ी ने बारह बजने की आवाज़ की।

     

    टन… टन… टन…

     

    तेरहवीं घंटी बजते ही आदमी का चेहरा बदल गया।

     

    अब वह आदमी नहीं था।

     

    वह एक भयानक काली परछाईं बन चुका था।

     

    और उसके पीछे दीवार पर खून से एक वाक्य लिखा जा रहा था—