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  • 😱आहट 😱— उस बंद कमरे का राज़ (part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    रात के करीब बारह बज रहे थे। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी और आसमान में बार-बार बिजली चमक रही थी। शहर से लगभग तीस किलोमीटर दूर, पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी—रुद्रपुर हवेली।

     

    कई सालों से उस हवेली में कोई नहीं रहता था।

     

    गाँव के लोग कहते थे कि रात के समय हवेली के अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आती है। कभी किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनाई देती, तो कभी ऐसा लगता जैसे कोई दरवाज़े पर खड़ा होकर धीरे-धीरे दस्तक दे रहा हो।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली के मुख्य दरवाज़े पर हमेशा एक पुरानी लोहे की कुंडी लगी रहती थी।

     

    फिर भी…

     

    हर रात वहाँ से आहट आती थी।

     

    उसी हवेली को खरीदने के लिए उस रात आरव वहाँ पहुँचा था।

     

    आरव शहर का रहने वाला था और पेशे से फोटोग्राफर। कुछ महीनों पहले उसके पिता की मृत्यु हुई थी और उन्हें विरासत में रुद्रपुर हवेली मिली थी। पिता ने अपनी जिंदगी में कभी इस हवेली का ज़िक्र नहीं किया था।

     

    जब वकील ने कागज़ात देते हुए कहा था, “यह संपत्ति आपके पिता के नाम थी,” तो आरव को विश्वास ही नहीं हुआ था।

     

    उसने उसी दिन तय कर लिया था कि वह हवेली देखने जाएगा।

     

    गाँव में पहुँचते ही एक बूढ़े आदमी ने उसे रोक लिया।

     

    “बाबूजी, हवेली में रात मत बिताइएगा।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “क्यों? भूत है क्या?”

     

    बूढ़े के चेहरे का रंग अचानक उड़ गया।

     

    उसने धीमी आवाज़ में कहा, “भूत होता तो अच्छा था।”

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “मतलब?”

     

    बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “वहाँ जो है… वह किसी को जाने नहीं देता।”

     

    आरव ने बात को मज़ाक समझकर अपनी कार आगे बढ़ा दी।

     

    कुछ देर बाद वह हवेली के सामने खड़ा था।

     

    हवेली देखकर ही उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    तीन मंज़िल की विशाल इमारत, जिसकी दीवारों पर काई जम चुकी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़े के ऊपर एक पुरानी पत्थर की मूर्ति लगी थी।

     

    आरव ने जेब से चाबी निकाली।

     

    चाबी ताले में लगाते ही अचानक…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अंदर से आवाज़ आई।

     

    आरव ठिठक गया।

     

    उसने दरवाज़े की ओर देखा।

     

    फिर आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    जैसे कोई दूसरी तरफ से दरवाज़ा खटखटा रहा हो।

     

    आरव ने धीरे से पूछा, “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    मोबाइल की टॉर्च जलाकर वह अंदर गया।

     

    धूल से ढकी फर्श, दीवारों पर पुराने चित्र और छत से लटकता एक टूटा हुआ झूमर।

     

    हवा में एक अजीब सी गंध थी—जैसे कई वर्षों से बंद कमरे में नमी और पुराने कपड़ों की गंध मिली हुई हो।

     

    आरव ने अपना सामान नीचे रखा और हवेली का निरीक्षण करने लगा।

     

    तभी उसकी नज़र सीढ़ियों के पास टंगी एक तस्वीर पर पड़ी।

     

    तस्वीर में उसके पिता खड़े थे।

     

    लेकिन उनके साथ एक महिला भी थी।

     

    आरव उस महिला को पहचानता नहीं था।

     

    तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

     

    17 जुलाई 1998

     

    आरव के पिता उस समय अविवाहित थे।

     

    फिर यह महिला कौन थी?

     

    आरव ने तस्वीर उतारी और ध्यान से देखने लगा।

     

    तभी ऊपर की मंज़िल से कुछ गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव चौंक गया।

     

    उसने टॉर्च ऊपर की ओर की।

     

    सीढ़ियों पर अंधेरा पसरा हुआ था।

     

    “शायद कोई लकड़ी गिरी होगी,” उसने खुद से कहा।

     

    वह ऊपर जाने लगा।

     

    पहली मंज़िल पर पहुँचते ही उसे एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर मोटी जंजीर बंधी थी।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    दरवाज़े के ऊपर लाल रंग से कुछ लिखा था।

     

    धूल हटाने पर शब्द साफ़ दिखाई दिए—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    आरव कुछ पल तक उस चेतावनी को देखता रहा।

     

    फिर उसने जंजीर को छुआ।

     

    उसी क्षण…

     

    उसके पीछे किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    जैसे कोई गीले पैरों से फर्श पर चल रहा हो।

     

    आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर…

     

    गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान धीरे-धीरे उसकी ओर आ रहे थे।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    आरव की साँसें तेज़ हो गईं।

     

    निशान उसके ठीक सामने आकर रुक गए।

     

    लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

     

    अचानक उसके कान के पास किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “तुम… वापस क्यों आए?”

     

    आरव के पूरे शरीर में झटका लगा।

     

    वह पीछे हट गया।

     

    “क… कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर नीचे से दरवाज़ा बंद होने की तेज़ आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव दौड़कर नीचे पहुँचा।

     

    मुख्य दरवाज़ा बंद था।

     

    उसने कुंडी खींची।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    तभी उसकी नज़र सामने की दीवार पर पड़ी।

     

    वहाँ एक पुरानी घड़ी लगी थी।

     

    घड़ी की दोनों सुइयाँ बारह बजे पर अटकी हुई थीं।

     

    और तभी…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही आवाज़ फिर सुनाई दी।

     

    इस बार आवाज़ हवेली के अंदर से नहीं…

     

    बल्कि उसके पीछे वाले बंद कमरे से आ रही थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उस कमरे की ओर बढ़ा।

     

    कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    उसने टॉर्च अंदर की।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    सिर्फ बीच में एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक सफेद कपड़ा पड़ा था।

     

    आरव ने कपड़ा हटाया।

     

    नीचे एक पुरानी डायरी थी।

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर उसके पिता की लिखावट थी।

     

    सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “अगर आरव कभी इस हवेली में आए, तो उसे सच मत बताना।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    उसने अगला पन्ना पलटा।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “वह हर रात बारह बजे आती है।”

     

    आरव ने घड़ी की ओर देखा।

     

    बारह बजकर एक मिनट हो चुका था।

     

    अचानक पीछे से फिर आवाज़ आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ बहुत करीब थी।

     

    आरव ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।

     

    दरवाज़े के बाहर कोई खड़ा था।

     

    सफेद कपड़ों में एक औरत।

     

    उसका चेहरा लंबे काले बालों से ढका हुआ था।

     

    आरव कुछ बोल पाता, उससे पहले वह औरत धीरे-धीरे सिर उठाने लगी।

     

    और उसी क्षण हवेली की सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने दोबारा आँखें खोलीं…

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके हाथ में पकड़ी डायरी के आखिरी पन्ने पर अब एक नई लाइन लिखी थी—

     

    “तुम्हें सच जानना है तो कल रात ऊपर वाले बंद कमरे का दरवाज़ा खोलना।”

     

    और उसके ठीक नीचे…

     

    आरव का नाम लिखा था।

     

    “आरव…”

     

    बाहर बारिश और तेज़ हो चुकी थी।

     

    और हवेली की तीसरी मंज़िल से एक बार फिर किसी के चलने की आवाज़ आने लगी।

     

    छप… छप… छप…

     

    आरव समझ चुका था…

     

    वह हवेली में अकेला नहीं था।

  • Dil sabhal ja jara part – 20

    Dil sabhal ja jara part – 20

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    part – 20 rat ka rahasya me call 

     

     

     

    शिमला की वो रात खास थी। ठाकुर हाउस की हर दीवार पर खुशियों की चमक थी, लेकिन बाहर की बर्फीली हवा में एक अजीब सी सनसनी फैली हुई थी। शादी का दिन गुजर चुका था – मंडप की घंटियां, फेरों की धुन, विदाई की रस्में सब बीत चुकी थीं। प्रिया अब श्रीमती प्रिया आरव ठाकुर थी। घरवाले थककर सो चुके थे, मेहमान जा चुके थे, और ठाकुर हाउस अब शांत हो चुका था। सिर्फ कुछ लाइट्स जल रही थीं – हॉल की, और ऊपर के कमरों की।

     

    आरव सीढ़ियां चढ़ रहा था। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था। शेरवानी अभी भी पहनी थी, पगड़ी उतार चुका था। बालों में थोड़ी सी बर्फ की बूंदें लगी थीं, जो बाहर से आते वक्त गिरी थीं। वो कमरे की ओर जा रहा था – अपना और प्रिया का कमरा। आज पहली रात थी – वो रात जो हर नए जोड़े के लिए यादगार होती है। आरव की आंखों में खुशी थी, लेकिन थोड़ी घबराहट भी। “प्रिया… मेरी पत्नी। आज से हम एक हैं,” वो मन ही मन सोच रहा था। उसके कदम धीमे थे, जैसे वो हर पल को जीना चाहता हो।

     

    कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला था। अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी – कैंडल्स की। आरव ने दरवाजा धक्का दिया। प्रिया अंदर थी, बिस्तर पर बैठी। लाल साड़ी में, माथे पर सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, हाथों में मेहंदी। वो इंतजार कर रही थी – शर्म से झुकी आंखों से, मुस्कुराहट दबाए होंठों से। कमरा सजा हुआ था – गुलाब की पंखुड़ियां बिस्तर पर बिखरीं, कैंडल्स की लौ कमरे को गर्माहट दे रही थी, और हवा में हल्की सी खुशबू – जूही की।

     

    प्रिया ने सिर उठाया। आरव को देखकर उसकी आंखें चमक उठीं। “आरव… आ गए?”

     

    आरव मुस्कुराया। दरवाजा बंद किया और उसके पास आया। “हां प्रिया… तेरी पहली रात का इंतजार कर रहा था।”

     

    प्रिया शर्मा गई। वो उठी और आरव के करीब आई। “आरव… आज से हमारा नया जीवन शुरू।”

     

    आरव ने उसके हाथ थामे। “हां प्रिया। तू मेरी पत्नी है। मेरी हमसफर। मैं तुझे हमेशा खुश रखूंगा।”

     

    दोनों की नजरें मिलीं। आरव ने प्रिया को अपनी बाहों में भर लिया। वो हल्का सा किस – माथे पर। फिर गाल पर। प्रिया की सांस तेज़ हो गई। वो आरव की शेरवानी के बटन खोलने लगी। “आरव… आज रात सिर्फ हमारी है।”

     

    आरव ने उसे बिस्तर की ओर ले जाया। “हां प्रिया। सिर्फ हमारी।”

     

    दोनों करीब आए। आरव ने प्रिया की साड़ी का पल्लू सरकाया। प्रिया की आंखें बंद हो गईं। वो पल… वो पहला पल जो दोनों के लिए खास था। लेकिन तभी… आरव का फोन बज उठा। कमरे में सन्नाटा था, और फोन की रिंग उस सन्नाटे को तोड़ रही थी।

     

    आरव रुक गया। “कौन होगा इतनी रात को?”

     

    प्रिया ने कहा, “आरव… छोड़ो। साइलेंट कर दो।”

     

    आरव ने फोन देखा। अनजान नंबर। वो इग्नोर करने वाला था, लेकिन फिर रिंग आई। वो उठा। “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ से भारी, अजनबी आवाज आई। “आरव ठाकुर? बधाई हो शादी की। लेकिन रात अभी पूरी नहीं हुई। अगर मेरे बारे में जानना चाहते हो कि मैं कौन हूं, तो अभी के अभी मेरे बताए पते पर पहुंचो। अकेले। वरना… प्रिया की खुशी छिन जाएगी। पता है – पुरानी हवेली के पीछे वाला जंगल, वो टूटा हुआ पुल। दस मिनट में।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। “कौन बोल रहा है? क्या चाहते हो?”

     

    आवाज हंसी। “समय कम है। आओ तो जानोगे। और हां, किसी को मत बताना। पुलिस या कोई और… तो खेल खत्म।”

     

    फोन कट गया। आरव कांप रहा था। प्रिया ने पूछा, “आरव… क्या हुआ? कौन था?”

     

    आरव ने मुस्कुराने की कोशिश की। “कुछ नहीं प्रिया। काम का कॉल। मैं थोड़ी देर में आता हूं।”

     

    प्रिया ने रोकना चाहा। “आरव… रात के दो बजे? कौन काम?”

     

    आरव ने उसे गले लगाया। “ट्रस्ट मी प्रिया। सब ठीक होगा। तू इंतजार कर।”

     

    आरव कमरे से निकला। दिल तेज़ धड़क रहा था। वो नीचे गया, कार की चाबी ली। बाहर बर्फ गिर रही थी, रात का सन्नाटा। वो पुरानी हवेली की ओर चला। रास्ते में सोच रहा था – “कौन हो सकता है? विक्रम? या कोई और? प्रिया को खतरा?”

     

    हवेली पहुंचा। पीछे जंगल। टूटा पुल। अंधेरा था। आरव ने फोन की लाइट जलाई। “कौन है? दिखो!”

     

    एक छाया आगे आई। एक आदमी – चेहरा ढका हुआ। “आरव… वेलकम। अब सुनो। मैं कौन हूं? वो जो सालों से इंतजार कर रहा था। तेरी शादी… लेकिन ये नहीं चलेगी।”

     

    आरव ने पूछा, “क्यों? क्या चाहते हो?”

     

    आदमी ने मास्क उतारा। वो… कोई अनजान था। लेकिन उसके हाथ में एक पुराना लेटर। “ये पढ़। फिर पता चलेगा।”

     

    आरव ने लेटर लिया। अंदर लिखा था – “आरव, प्रिया तेरी बहन है। असली में। डायरी का राज़ अधूरा था।”

     

    आरव चौंका। “ये झूठ है!”

     

    आदमी हंसा। “नहीं। और अगर शादी जारी रही तो… प्रिया को पता चलेगा। और सब खत्म।”

     

    आरव का दिल बैठ गया। सस्पेंस गहरा हो गया। वो कौन था? और क्या सच में…?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 19

    Dil sabhal ja jara part – 19

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 19 Dulhan ki tyari or chhupa huaa khatra 

     

     

     

    ठाकुर हाउस में शादी का दिन आ चुका था। मार्च की सुबह थी, हवा में हल्की ठंडक, लेकिन धूप खिली हुई थी। घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था – लाल और गोल्डन फूलों की मालाएं, लाइट्स की चमक, और बाहर मंडप तैयार। मेहमानों की भीड़ थी, लेकिन सबकी नजरें दुल्हन पर थीं। प्रिया अपने कमरे में थी। कमरा फूलों से सजा था, आईने के सामने कुर्सी लगी थी। शिमला की बेस्ट पार्लर टीम आ चुकी थी – चार लड़कियां, मेकअप किट्स, हेयर स्टाइल टूल्स लेकर।

     

    पार्लर की लीड आर्टिस्ट, नेहा, प्रिया के बाल संभाल रही थी। “मैम, आपके बाल तो सिल्क जैसे हैं। आज ओपन रखेंगे या बन?”

     

    प्रिया मुस्कुराई। “बन। ट्रेडिशनल लुक।”

     

    दूसरी लड़की, सोनिया, मेहंदी चेक कर रही थी। “वाह मैम, मेहंदी का कलर तो डार्क आया है। दूल्हा बहुत प्यार करते हैं।”

     

    प्रिया शर्मा गई। “हां… बहुत।”

     

    तीसरी आर्टिस्ट, रिया (नाम संयोग से), मेकअप शुरू कर रही थी। “मैम, आईलाइनर थिक रखें? आंखें बड़ी हैं आपकी, हाइलाइट होंगी।”

     

    प्रिया ने हां कहा। चौथी लड़की ज्वेलरी सेट कर रही थी – मांगटीका, नथ, कान के झुमके।

     

    कमरे में रिया (प्रिया की बेस्ट फ्रेंड) भी थी। वो एक्साइटेड। “प्रिया यार, आज तू दुल्हन बनेगी। आरव भैया… मतलब आरव… तो दूल्हा। मैं अभी भी बिलीव नहीं कर पा रही!”

     

    प्रिया हंसी। “रिया, मैं भी कभी-कभी सपना लगता है।”

     

    पार्लर वाली नेहा ने बालों में फूल लगाते हुए कहा, “मैम, आपकी स्टोरी तो फिल्म जैसी है। पहले भाई-बहन जैसे, अब शादी। लोग बातें कर रहे थे, लेकिन आज देखकर सब चुप हो जाएंगे। आप कितनी खूबसूरत जोड़ी लग रहे हो।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “थैंक्स नेहा। प्यार होता है तो सब मुमकिन है।”

     

    मेकअप चल रहा था। फाउंडेशन, ब्लश, लिपस्टिक – रेड, मैचिंग लहंगे से। लहंगा हैवी था – रेड वेलवेट, गोल्डन एम्ब्रॉयडरी, दुपट्टा लंबा। प्रिया आईने में खुद को देख रही थी। “लग रही हूं दुल्हन?”

     

    सोनिया ने कहा, “मैम, परी जैसी। दूल्हा देखकर बेहोश हो जाएगा।”

     

    सब हंस पड़े। रिया ने फोटोज लीं। “ये आरव को नहीं दिखाऊंगी। सरप्राइज रहेगा।”

     

    तैयारियां पूरी होने में दो घंटे लगे। आखिर में दुपट्टा सेट किया गया। प्रिया खड़ी हुई। आईने में खुद को देखा। आंखें नम हो गईं। “मां… देख रही हो ना? आज तेरी बेटी दुल्हन बन रही है।”

     

    रिया ने गले लगाया। “प्रिया… तू सबसे खूबसूरत दुल्हन है।”

     

    दूसरी तरफ, आरव अपने कमरे में तैयार हो रहा था। शेरवानी – क्रिम कलर, गोल्डन बटन, मैचिंग पगड़ी। उसका बेस्ट फ्रेंड, विक्रांत (अब अच्छा दोस्त बन चुका था), मदद कर रहा था। “आरव यार, तू तो राजकुमार लग रहा है। प्रिया देखकर पिघल जाएगी।”

     

    आरव मुस्कुराया। “विक्रांत, थैंक्स यार। तूने बहुत सपोर्ट किया।”

     

    विक्रांत ने पगड़ी सेट की। “यार, तुम्हारी स्टोरी इंस्पायरिंग है। मैं खुश हूं तुम दोनों के लिए।”

     

    आरव तैयार हो गया। आईने में खुद को देखा। “आज प्रिया मेरी हो जाएगी। हमेशा के लिए।”

     

    तभी उसका फोन बजा। अनजान नंबर। आरव ने रिसीव किया। “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ से भारी, विकृत आवाज आई। “आरव ठाकुर? बधाई हो शादी की। लेकिन आज का दिन तुम्हारा आखिरी खुशी का दिन होगा। प्रिया को कुछ नहीं होगा, लेकिन तू… तुझे सजा मिलेगी। पुरानी साजिशों की।”

     

    आरव चौंका। “कौन बोल रहा है?”

     

    आवाज हंसी। “विक्रम नहीं। कोई और। जो सालों से इंतजार कर रहा था। ठाकुर और राठौर की दुश्मनी… वो अभी खत्म नहीं हुई। आज मंडप में देखना।”

     

    फोन कट गया। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। विक्रांत ने पूछा, “क्या हुआ यार?”

     

    आरव ने कहा, “कुछ नहीं। गलत नंबर।”

     

    लेकिन अंदर से डर गया। वो पापा के पास गया। “पापा… सिक्योरिटी चेक करो। कुछ अनजान कॉल आया।”

     

    पापा ने कहा, “बेटा, चिंता मत कर। सब ठीक होगा।”

     

    लेकिन आरव का मन बैचेन था।

     

    नीचे मंडप में मेहमान इकट्ठे हो रहे थे। कुछ ताने फिर शुरू। एक अंकल ने दूसरे से कहा, “देखो, भाई-बहन जैसे थे, अब शादी। पैसों का खेल है।”

     

    लेकिन ज्यादातर मेहमान खुश थे। रिया ने म्यूजिक शुरू करवाया।

     

    प्रिया तैयार हो चुकी थी। दुल्हन बनकर नीचे आने वाली थी। रिया ने कहा, “प्रिया… तैयार? दूल्हा इंतजार कर रहा है।”

     

    प्रिया ने आईने में आखिरी बार देखा। “हां रिया। तैयार हूं।”

     

    बारात आने वाली थी – नहीं, घर में ही शादी थी। आरव नीचे मंडप में जाएगा। प्रिया को दुल्हन बनकर लाया जाएगा।

     

    आरव मंडप में खड़ा था। घोड़ी पर नहीं, लेकिन दूल्हा बनकर। मन बैचेन। वो कॉल… कौन था? विक्रम तो जेल में था। कोई और?

     

    प्रिया ऊपर से नीचे आ रही थी। दुपट्टा सिर पर, लड़कियां सहारा दे रही थीं। सबकी नजरें उस पर। “वाह… कितनी खूबसूरत।”

     

    आरव ने देखा। उसकी सांस रुक गई। प्रिया… उसकी दुल्हन।

     

    प्रिया मंडप में आई। आरव के पास बैठी। पंडित जी मंत्र पढ़ने लगे।

     

    लेकिन आरव का फोन वाइब्रेट कर रहा था। अनजान मैसेज – “अब देखो।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा। मेहमानों में कोई अनजान चेहरा? सिक्योरिटी थी, लेकिन…

     

    फेरे शुरू हुए। प्रिया और आरव हाथ थामे घूम रहे थे। प्रिया मुस्कुरा रही थी। आरव भी, लेकिन अंदर डर।

     

    आखिरी फेरे में अचानक लाइट्स चली गईं। अंधेरा। चीखें।

     

    लाइट्स आईं। मंडप में एक लिफाफा पड़ा था। आरव ने उठाया। अंदर फोटो – प्रिया की पुरानी, आश्रम की। और चिट – “ये शादी नहीं होगी। प्रिया को ले जाऊंगा।”

     

    आरव चौंका। प्रिया ने देखा। “आरव… क्या है?”

     

    आरव ने कहा, “कुछ नहीं प्रिया।”

     

    लेकिन उसकी आंखें डर गईं। कौन था वो? विक्रम? या कोई नया दुश्मन?

     

    शादी जारी थी। सिंदूर डाला गया। मंगलसूत्र पहनाया गया। सब तालियां बजा रहे थे।

     

    लेकिन आरव का मन बैचेन। वो कॉल… वो लिफाफा… खतरा अभी बाकी था।

     

    शादी पूरी हुई। प्रिया और आरव पति-पत्नी बन गए। 

     

    रात को विदाई के समय प्रिया रो रही थी। आरव ने गले लगाया। “प्रिया… 

     

  • Dil sabhal ja jara part – 18

    Dil sabhal ja jara part – 18

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    Part – 18 hamara ghar 

     

     

     

     

    शिमला की सर्दियां अब अपने चरम पर थीं। जनवरी की शुरुआत हो चुकी थी, और ठाकुर हाउस की छत पर बर्फ की मोटी चादर जम गई थी। मीडिया का शोर धीरे-धीरे कम हो रहा था – लोग नई खबरों में व्यस्त हो गए थे। लेकिन प्रिया और आरव के लिए ये समय सबसे खूबसूरत था। वो समय जब उनका प्यार अब छिपा नहीं, बल्कि खुलकर जीया जा रहा था। घरवाले ने अपनाया था, रिया सबसे बड़ी सपोर्टर बनी थी, और दोनों अब एक-दूसरे के साथ हर पल को जी रहे थे।

     

    एक सुबह प्रिया किचन में थी। वो आरव के लिए उसकी फेवरेट कॉफी बना रही थी – ब्लैक, बिना शुगर। आरव पीछे से आया, उसकी कमर में हाथ डाले। “गुड मॉर्निंग, मेरी जान।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। पीछे मुड़ी और उसके होंठों पर हल्का सा किस किया। “गुड मॉर्निंग भैया… नहीं, अब तो सिर्फ आरव।”

     

    आरव ने उसे गोद में उठा लिया। “हां, सिर्फ तेरा आरव।”

     

    रिया किचन में आई। “ओये होये! सुबह-सुबह रोमांस? मैं अंदर जा रही हूं।”

     

    दोनों हंस पड़े। आरव ने प्रिया को नीचे उतारा। “रिया, आज प्लान है। हम तीनों बाहर जाएंगे। जाखू टेंपल। बर्फ देखने।”

     

    प्रिया की आंखें चमक उठीं। “सच? चलो!”

     

    तीनों बाहर निकले। कार में आरव ड्राइव कर रहा था, प्रिया उसके बगल में, रिया पीछे। रास्ते में पुरानी गानों की प्लेलिस्ट चल रही थी। प्रिया ने आरव का हाथ थामा। आरव ने उसकी उंगलियों को चूमा। रिया ने पीछे से कहा, “यार, तुम दोनों अब कपल गो्ल्स हो।”

     

    जाखू टेंपल पहुंचे। ऊपर बर्फ की चादर, बंदर घूम रहे थे, हवा ठंडी लेकिन साफ। तीनों टहलने लगे। प्रिया ने बर्फ का गोला बनाया और आरव पर फेंका। आरव ने पकड़ा और प्रिया को गले लगा लिया। “पकड़ी गई!”

     

    रिया फोटोज ले रही थी। “ये फोटोज मैं सेव करूंगी। ब्लैकमेल के लिए।”

     

    प्रिया ने कहा, “रिया, तू सबसे बेस्ट है।”

     

    शाम को घर लौटे। पापा और आदित्य अंकल टीवी देख रहे थे। पापा ने कहा, “बच्चो, आज न्यूज में तुम्हारी स्टोरी फिर आई। लेकिन पॉजिटिव। लोग कह रहे हैं – प्यार जीत गया।”

     

    प्रिया और आरव मुस्कुराए। आदित्य अंकल ने कहा, “बेटी, मैं गर्व करता हूं तुम पर। तुमने स्ट्रगल किया, और सच्चा प्यार पाया।”

     

    रात को डिनर के बाद प्रिया और आरव पुरानी हवेली गए – जो अब रेनोवेट हो रही थी। वो हवेली जो मम्मी की फेवरेट थी। अब वो उनका स्पेशल प्लेस बन गई थी। हवेली के बगीचे में बर्फ जमी थी। दोनों हाथ थामे टहल रहे थे।

     

    आरव ने कहा, “प्रिया… ये हवेली हमारा घर बनेगी। हमारा अपना। जहां सिर्फ हम होंगे।”

     

    प्रिया ने उसे गले लगाया। “हां आरव। हमारा घर। जहां हमारी यादें होंगी। हमारे बच्चे खेलेंगे।”

     

    आरव ने उसे किस किया। “हां प्रिया। हमारे बच्चे। तेरी आंखें, मेरी मुस्कान।”

     

    दोनों बगीचे के झूले पर बैठे। आरव ने प्रिया को गोद में लिया। “प्रिया… याद है बचपन में मैं तुझे झूला झुलाता था?”

     

    प्रिया ने कहा, “अब मैं बड़ी हो गई। लेकिन तुम्हारी गोद में अभी भी छोटी लगती हूं।”

     

    आरव ने उसके होंठों को गहराई से चूमा। “प्रिया… तू हमेशा मेरी छोटी राजकुमारी रहेगी। मेरी पत्नी बनेगी एक दिन।”

     

    प्रिया ने जवाब में किस किया। “हां आरव। तेरी पत्नी। तेरी हमसफर।”

     

    रात गहरा गई। दोनों हवेली के एक कमरे में रुके। फायरप्लेस जलाया। प्रिया आरव की बाहों में थी। “आरव… आज सबसे खुश हूं।”

     

    आरव ने उसके बाल सहलाए। “प्रिया… मैं भी। तूने मुझे पूरा किया।”

     

    दोनों सो गए – गले लगे। पहली बार पूरी रात साथ। कोई डर नहीं, कोई गिल्ट नहीं। सिर्फ प्यार।

     

    सुबह हुई। घर लौटे। रिया ने चिढ़ाया, “कहां थे रात भर? हवेली में?”

     

    प्रिया शर्मा गई। आरव ने कहा, “रिया, जलन हो रही है?”

     

    रिया हंसी। “नहीं भैया। खुश हूं। तुम दोनों परफेक्ट हो।”

     

    लेकिन बाहर विक्रम बाहर आ चुका था। वो अवनी से मिला। “अवनी, अब आखिरी वार। प्रिया और आरव को अलग कर दूंगा। पुराना प्रूफ है – रानी की डायरी का दूसरा पेज। जहां लिखा है कि प्रिया राजेश की बेटी नहीं। अगर फैमिली को पता चला तो…”

     

    अवनी मुस्कुराई। “करो।”

     

    लेकिन प्रिया और आरव तैयार थे। उनका प्यार अब इतना मजबूत था कि कोई साजिश नहीं तोड़ सकती।

     

    शाम को दोनों छत पर थे। बर्फ देख रहे थे। आरव ने प्रिया को रिंग दी – सिंपल, लेकिन डायमंड वाली। “प्रिया… विल यू मैरी मी?”

     

    प्रिया रो पड़ी। “यस आरव। हजार बार यस।”

     

    दोनों गले लगे। किस किया। हमारा घर – अब सच होने वाला था।

     

    प्यार की जीत हो चुकी थी। बचपन से शुरू हुआ सफर अब शादी तक पहुंच रहा था।

     

     

    ठाकुर हाउस में अब खुशियों का माहौल था। फरवरी की शुरुआत हो चुकी थी, और शिमला की बर्फ अब पिघलने लगी थी – जैसे प्रिया और आरव के प्यार के आगे सारी ठंडक गायब हो रही हो। शादी की तारीख फिक्स हो चुकी थी – मार्च के पहले हफ्ते में। हवेली को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा था। फूलों की मालाएं, लाइट्स, डेकोरेटर्स की टीम दिन-रात लगी हुई थी। प्रिया की शादी की शॉपिंग चल रही थी – लहंगे, ज्वेलरी, मेहंदी की डिजाइन। रिया सबसे एक्टिव थी – वो प्रिया की बेस्ट फ्रेंड और सिस्टर-इन-लॉ दोनों बनने वाली थी।

     

    एक सुबह ठाकुर हाउस में मेहमान आने शुरू हो गए। दूर के रिश्तेदार, पापा के बिजनेस पार्टनर्स, पुराने फैमिली फ्रेंड्स। हाउस में रौनक थी। प्रिया रेड लहंगे में ट्रायल कर रही थी। आरव बाहर मेहमानों का स्वागत कर रहा था।

     

    पहले मेहमान आए – पापा के पुराने दोस्त, अंकल वर्मा और उनकी पत्नी। अंकल वर्मा ने आरव को गले लगाया। “बेटा, बधाई हो। शादी की खबर सुनी।”

     

    फिर आंटी ने प्रिया को देखा। मुस्कुराई, लेकिन आंखों में कुछ और था। “प्रिया बेटी… बहुत खूबसूरत लग रही हो। लेकिन… सुना है तुम दोनों… पहले भाई-बहन जैसे थे?”

     

    प्रिया थोड़ा असहज हो गई। आरव ने बीच में कहा, “आंटी, हमारा रिश्ता सच्चा है। प्यार है।”

     

    आंटी ने हल्के से तंज कसा। “हां बेटा, प्यार तो अंधा होता है। लेकिन लोग क्या कहेंगे? पहले भाई कहकर बुलाती थी, अब पति?”

     

    रिया ने बीच में कट किया। “आंटी, प्यार में क्या पुराना-नया। जो दिल कहे वही सही।”

     

    आंटी चुप हो गईं, लेकिन फुसफुसाहट शुरू हो गई।

     

    दूसरे मेहमान – चाची जी (दूर की रिश्तेदार)। वो प्रिया के पास आईं। लहंगा देखा। “वाह बेटी, दुल्हन तो बन गई। लेकिन आरव तो तेरा भाई था ना? अब पति? अजीब नहीं लगता?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “चाची जी, रिश्ते दिल से होते हैं। हमारा प्यार सालों पुराना है।”

     

    चाची जी ने ताना मारा। “हां हां, सालों पुराना। पहले भाई-बहन वाला, अब पति-पत्नी। समाज क्या कहेगा? लोग तो कह रहे हैं – ठाकुर फैमिली में क्या हो रहा है?”

     

    आरव ने सुना। वो पास आया। “चाची जी, समाज जो कहे कहे। हम खुश हैं। हमारा प्यार सच्चा है।”

     

    चाची जी हंसकर टाल गईं, लेकिन दूसरे मेहमानों से फुसफुसाने लगीं।

     

    शाम को मेहंदी की रस्म थी। प्रिया हाथों में मेहंदी लगवा रही थी। लड़कियां गाना गा रही थीं। आरव दूर खड़ा देख रहा था। एक पुरानी सहेली – नेहा – प्रिया के पास आई। “प्रिया यार, बधाई हो। लेकिन सच बता… आरव को भाई मानती थी ना? अब…?”

     

    प्रिया ने हंसकर कहा, “नेहा, प्यार होता है। रिश्ते बदलते हैं।”

     

    नेहा ने तंज कसा। “हां, बदलते हैं। लेकिन इतना जल्दी? लोग तो कह रहे हैं – भाई से पति? ड्रामा किंग-क्वीन हो तुम दोनों।”

     

    रिया ने फिर बचाया। “नेहा, जलन हो रही है? प्रिया और आरव का प्यार परफेक्ट है। तू अपनी शादी देख।”

     

    नेहा चली गई। लेकिन ताने जारी थे। कुछ मेहमान खुले में, कुछ पीठ पीछे। “अरे, पहले तो भाई-बहन कहते थे, अब शादी? पैसों की वजह से?” “नहीं यार, प्यार है। लेकिन अजीब लगता है।”

     

    प्रिया का मन भारी हो गया। वो बाहर बालकनी में गई। आरव पीछे आया। “प्रिया… ताने सुनकर दुखी है?”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। “आरव… लोग क्या-क्या कह रहे हैं। पहले भाई-बहन, अब पति-पत्नी। लगता है हम गलत हैं।”

     

    आरव ने उसे गले लगाया। “प्रिया… लोग हमेशा बोलते हैं। लेकिन हमारा प्यार सच्चा है। तूने मुझे चुना, मैंने तुझे। सालों की कमी पूरी हुई है। ये ताने कुछ दिन के हैं। हमारी जिंदगी हमारी है।”

     

    प्रिया ने उसके सीने पर सिर रखा। “आरव… तुम सही कहते हो। मैं तुम्हारे साथ हूं। ताने सह लूंगी।”

     

    आरव ने उसके होंठ चूमे। “प्रिया… तू मेरी बहादुर लड़की है। हम साथ हैं।”

     

    रात को सगाई की रिंग सेरेमनी थी। प्रिया और आरव ने रिंग्स पहनाईं। मेहमान तालियां बजा रहे थे, लेकिन कुछ की आंखें तंज भरी थीं। एक अंकल ने पापा से कहा, “राजेश भाई, बधाई। लेकिन ये रिश्ता… पहले भाई-बहन जैसे थे ना?”

     

    पापा ने मुस्कुराकर कहा, “प्यार होता है भाई साहब। बच्चे खुश हैं। बस।”

     

    सेरेमनी के बाद प्रिया और आरव हवेली के बगीचे में अकेले थे। प्रिया ने कहा, “आरव… ताने सुनकर अच्छा नहीं लगता। लेकिन तुम्हारे साथ हूं तो सब सह लूंगी।”

     

    आरव ने उसे गोद में उठाया। “प्रिया… ताने देने वाले हमारी खुशी नहीं देख सकते। लेकिन हम जीएंगे – अपना प्यार, अपनी जिंदगी। तू मेरी दुल्हन बनेगी। मेरी पत्नी। हमारा घर बनेगा।”

     

    प्रिया ने उसे किस किया। “हां आरव। हमारा घर। हमारी जिंदगी।”

     

    दोनों गले लगे। बर्फ गिर रही थी, लेकिन उनके प्यार में गर्मी थी। ताने थे, लेकिन प्यार मजबूत था।

     

    अगले दिन शादी की तैयारियां और तेज हो गईं। डेकोरेशन, कार्ड्स, डांस प्रैक्टिस। रिया ने कहा, “प्रिया, ताने देने वाले शादी में आएंगे तो डांस करेंगे। हम दिखाएंगे हम कितने खुश हैं।”

     

    प्रिया हंसी। “हां रिया। हम जीतेंगे।”

     

    आरव ने प्रिया को रिंग पहनाई फिर से – प्राइवेट में। “प्रिया… जल्दी दुल्हन बन जा मेरी।”

     

    प्रिया ने कहा, “हां आरव। तेरी दुल्हन। हमेशा।”

     

    शादी की तैयारियां चल रही थीं। ताने थे, लेकिन प्यार उनसे बड़ा था। प्रिया और आरव का सफर अब शादी तक पहुंच चुका था।

     

    विक्रम दूर से देख रहा था। उसका प्लान फेल हो गया। अब वो हार मान चुका था।

     

    शादी का दिन करीब था। खुशियां थीं। प्यार की जीत थी।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 17

    Dil sabhal ja jara part – 17

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 17 dil se dil tak 

     

     

     

     

    ठाकुर हाउस की पुरानी लाइब्रेरी में शाम का धुंधला उजाला फैला था। फायरप्लेस की लौ धीरे-धीरे जल रही थी, और बाहर बर्फ की हल्की बूंदें खिड़की पर टपक रही थीं। घर में सब सो चुके थे। रिया अपने कमरे में, पापा और आदित्य अंकल भी। सिर्फ प्रिया और आरव जाग रहे थे। दोनों सोफे पर बैठे थे – करीब, लेकिन अभी भी एक छोटी सी दूरी। मीडिया का तूफान थम चुका था, लेकिन उसके घाव अभी ताज़ा थे। लोग बातें कर रहे थे, सोशल मीडिया पर ट्रोल्स, लेकिन दोनों ने फैसला किया था – वो चुप नहीं रहेंगे।

     

    प्रिया ने चाय का मग आरव की ओर बढ़ाया। “भैया… ले। ठंड लग रही है।”

     

    आरव ने मग लिया। उनकी उंगलियां छुईं। आरव ने प्रिया की ओर देखा। “प्रिया… आजकल नींद आती है तुझे?”

     

    प्रिया ने सिर झुका लिया। “नहीं भैया। हर रात सोचती हूं… हम सही कर रहे हैं ना?”

     

    आरव ने उसका हाथ अपने हाथों में लिया। धीरे से सहलाया। “प्रिया… मैं भी सोचता हूं। सालों तक तुझे बहन माना। तेरी हर खुशी में अपनी खुशी देखी। लेकिन जब सच पता चला… कि खून का रिश्ता नहीं… तो दिल ने कुछ और कहा। मैंने लड़ाई लड़ी खुद से। गिल्ट फील किया। सोचा कि मैं गलत हूं। लेकिन प्रिया… तुझे देखकर जो सुकून मिलता है, वो कहीं और नहीं मिलता। तू मेरी जिंदगी का वो हिस्सा है जो कभी खाली था।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो आरव के करीब सरकी। “भैया… मैं भी डरती थी। तुम मेरे भाई हो। तुमने मुझे बचाया, सहारा दिया। अनाथ आश्रम से लेकर आज तक। मैंने कभी सोचा नहीं कि तुम्हारे लिए कुछ और फील कर सकती हूं। लेकिन जब तुम दूर होने लगे… जब तुम्हारी नजरें बदलने लगीं… तो मुझे एहसास हुआ कि तुम्हारे बिना मैं अधूरी हूं। तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी केयर… वो भाई वाली नहीं लगती अब। वो प्यार लगता है। गहरा, सच्चा प्यार।”

     

    आरव ने उसे और करीब खींचा। प्रिया का सिर उसके सीने पर था। “प्रिया… मैंने कभी किसी को इतना प्यार नहीं किया। मम्मी के बाद तू ही मेरी दुनिया थी। लेकिन अब तू मेरी जिंदगी है। हर सांस में तू है। तेरी मुस्कान में मेरा सुकून। तेरी आंखों में मेरा भविष्य। मैं जानता हूं दुनिया क्या कहेगी। लेकिन प्रिया… दिल तो दिल है। वो नियम नहीं मानता।”

     

    प्रिया ने ऊपर देखा। उसकी आंखें आरव की आंखों में डूब गईं। “भैया… मुझे डर लगता है कि अगर हम अलग हुए तो? मीडिया, लोग… सब हमें जज करेंगे। लेकिन तुम्हारे साथ हूं तो सब सह लूंगी। तुम मेरे हो। सिर्फ मेरे।”

     

    आरव ने उसके गाल को छुआ। उंगलियां उसके होंठों पर फिसलीं। “प्रिया… तू मेरी है। हमेशा से। मैंने तुझे खोया था एक बार। अब कभी नहीं खोऊंगा। चाहे दुनिया खिलाफ हो, मैं तेरे साथ हूं। तेरी हर खुशी, हर गम में। तेरी हर सांस में।”

     

    प्रिया ने उसके होंठों को छुआ – धीरे से, फिर गहराई से। वो किस लंबा था, भावनाओं से भरा। आरव ने उसे अपनी बाहों में कस लिया। “प्रिया… मैं तुझे इतना प्यार करता हूं कि शब्द कम पड़ जाते हैं। तू मेरी ताकत है, मेरी कमजोरी है। तू मेरी हर चीज है।”

     

    प्रिया ने उसके सीने पर सिर रखा। आंसू बह रहे थे, लेकिन खुशी के। “भैया… तुम मेरे पहले प्यार हो। आखिरी प्यार हो। मैंने कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी मुझे तुम्हारे इतना करीब लाएगी। तुम्हारा इंतजार किया सालों… बिना जानें। अब जब तुम मेरे हो… तो लगता है सब स्ट्रगल वर्थ था।”

     

    आरव ने उसके बालों को चूमा। “प्रिया… हमारा प्यार कोई गलती नहीं। वो सच्चाई है। सालों की कमी का मिलन है। मैं तुझे हर खुशी दूंगा। तेरे सपनों को पूरा करूंगा। तेरे साथ हर कदम चलूंगा।”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया… मुझे तुम्हारी जरूरत है। हर पल। तुम्हारे बिना… सब खाली लगता है। तुम मेरे हो… सिर्फ मेरे।”

     

    आरव ने उसे फिर किस किया – गहरा, जुनूनी। दोनों की सांसें एक हो गईं। फायरप्लेस की लौ उनकी आंखों में झलक रही थी। आरव ने उसके कान में फुसफुसाया, “प्रिया… मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूंगा। ये वादा है। दिल से।”

     

    प्रिया ने जवाब दिया, “और मैं तुझे। हमेशा।”

     

    दोनों गले लगे रहे। रात गहरा गई। बाहर बर्फ गिर रही थी, लेकिन अंदर दिलों में गर्माहट थी – गहरी, अटूट। वो भावनाएं जो सालों से दबी थीं, अब बाहर आ चुकी थीं। प्यार की गहराई में डूब चुके थे दोनों। कोई डर नहीं, सिर्फ एक-दूसरे का साथ।

     

    सुबह हुई। रिया ने दोनों को देखा – सोफे पर, गले लगे सो रहे। वो मुस्कुराई और चुपके से चली गई।

     

     

    ठाकुर हाउस की पुरानी लाइब्रेरी में शाम का धुंधला उजाला अब और गहरा हो चुका था। फायरप्लेस की लौ धीरे-धीरे बुझ रही थी, और बाहर बर्फ की बूंदें खिड़की पर चिपककर जम रही थीं। प्रिया और आरव अभी भी सोफे पर थे – करीब, हाथ थामे। मीडिया का तूफान थम चुका था, लेकिन उसके बाद का सन्नाटा और भारी लग रहा था। घरवाले चुप थे, लेकिन उनकी नजरें सब कुछ कह रही थीं। प्रिया ने आरव का हाथ छोड़ा और उठकर खिड़की के पास चली गई। बाहर का नजारा देखा – बर्फीली पहाड़ियां, कोहरा।

     

    “भैया… कभी-कभी लगता है जैसे ये सब सपना हो। हम यहां, साथ। लेकिन बचपन… वो तो यादों में ही बसा है। मुझे कुछ याद नहीं, लेकिन तुम्हें तो होगा। बताओ ना… हमारा बचपन कैसा था?”

     

    आरव मुस्कुराया। वो भी उठा और प्रिया के पीछे खड़ा हो गया। उसके कंधों पर हाथ रखे। “प्रिया… बचपन? वो तो मेरी सबसे प्यारी यादें हैं। तू तब छोटी सी गुड़िया थी। चार साल की। मैं दस का। मम्मी कहती थीं, ‘आरव, अपनी छोटी को कभी अकेला मत छोड़ना।’ और मैं वादा करता – ‘मम्मी, कभी नहीं।’”

     

    प्रिया ने पलटा। आंखों में चमक। “भैया… बताओ। विस्तार से। मुझे लगता है, अगर मैं यादें सुनूंगी तो शायद मेरी भी यादें लौट आएं।”

     

    आरव ने प्रिया को सोफे पर फिर बिठाया। खुद उसके बगल में। फायरप्लेस में लकड़ी डाली। लौ फिर भड़क उठी। “ठीक है प्रिया। शुरू से बताता हूं। याद है वो पुराना बंगला? ठाकुर हवेली का बगीचा? वहां मम्मी हमें ले जातीं। तू छोटी-छोटी दौड़ती, फूल तोड़ती। एक बार तूने गुलाब का फूल तोड़ा, लेकिन कांटा चुभ गया। रोने लगी। मैंने तुझे गोद में उठाया। ‘भैया सब ठीक कर देंगे।’ फिर तेरी उंगली चूस ली – जैसे मम्मी करतीं। तू हंस पड़ी। ‘भैया मेरा हीरो!’”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो आरव के हाथ को कसकर पकड़ लिया। “भैया… लगता है जैसे मैं देख रही हूं। तू कितना केयरिंग था।”

     

    आरव ने उसके हाथ को चूमा। “हां प्रिया। तू मेरी जिम्मेदारी थी। मम्मी रानी… वो तुझे कितना प्यार करतीं। शाम को झूला झुलातीं। तू झूले पर चढ़ती, मैं पीछे धक्का मारता। ‘और तेज भैया!’ तू चिल्लाती। मम्मी हंसतीं। ‘आरव, धीरे। छोटी गिर जाएगी।’ लेकिन तू कभी नहीं गिरती। हम तीनों साथ खेलते। मम्मी गाना गातीं – ‘तेरे आने से पहले… जिंदगी सूनी थी।’ तू मेरी गोद में सो जाती। मैं तुझे कमरे में ले जाता। तेरा सिर सहलाता। लगता था तू मेरी बेटी जैसी।”

     

    प्रिया रो पड़ी। “मम्मी… कितनी खुश थीं ना? और पापा?”

     

    आरव ने गहरी सांस ली। “पापा व्यस्त रहते। होटल्स का काम। लेकिन जब आते, तो तुझे गोद में उठाते। ‘मेरी राजकुमारी!’ कहते। तू उनकी मूंछें खींचती। सब हंसते। लेकिन प्रिया… घर में तनाव भी था। विक्रम की मां… वो जलती थीं। मम्मी को नीचा दिखातीं। लेकिन मम्मी कभी नहीं बोलीं। तुझे बचाने के लिए सब सहती रहीं।”

     

    प्रिया ने आरव के सीने पर सिर रखा। “भैया… अगर मुझे याद होता तो… मैं मम्मी को कभी न जाने देती।”

     

    आरव ने उसके बाल सहलाए। “प्रिया… तू न गई होती तो आज ये प्यार न होता। तू लौटी तो सब लौट आया। बचपन की वो यादें… अब हमारे प्यार का हिस्सा हैं।”

     

    प्रिया ने ऊपर देखा। “भैया… और क्या? कोई मजेदार याद?”

     

    आरव हंसा। “हां। एक बार तूने मम्मी की साड़ी पहन ली। घूंघट ओढ़ा। ‘मैं दुल्हन हूं!’ चिल्लाई। मैं दूल्हा बना। मम्मी ने शादी की रस्में कीं। तू मेरी गोद में बैठी, मैं तुझे घुमाता। मम्मी फोटो खींचतीं। वो फोटो अभी भी है – अलमारी में। तू हंस रही थी, मैं शर्मा रहा था। मम्मी कहतीं, ‘एक दिन असली शादी होगी।’”

     

    प्रिया शर्मा गई। “भैया… लगता है मम्मी जानती थीं।”

     

    आरव ने उसके गाल को छुआ। “शायद प्रिया। वो हमेशा कहतीं, ‘आरव, प्रिया को कभी मत छोड़ना। वो तेरी जिंदगी है।’ मैं समझा नहीं था। लेकिन अब… अब समझ आया।”

     

    प्रिया ने उसके होंठों को छुआ। “भैया… तू मेरी जिंदगी है। बचपन से। अनजाने में।”

     

    आरव ने उसे किस किया – गहरा, भावुक। “प्रिया… तू मेरी छोटी थी। अब मेरी सब कुछ है। वो झूला, वो फूल, वो हंसी… सब अब हमारे प्यार में है।”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया… अगर मैं वापस न आती तो?”

     

    आरव ने उसे कस लिया। “तब भी तुझे खोजता। हर जन्म में। तू मेरी हो प्रिया। बचपन से।”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 16

    Dil sabhal ja jara part – 16

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    Part – 16 dil ki गहराइयां 

     

    ठाकुर हाउस में अब एक नई चुप्पी छा गई थी – वो चुप्पी जो दो दिलों के बीच के अनकहे पलों से भरी होती है। प्रिया और आरव अब एक-दूसरे से नजरें नहीं चुराते थे। नजरें मिलतीं तो लंबी हो जातीं, और फिर मुस्कुराहट में बदल जातीं। वो मुस्कुराहट जो सालों की कमी को भर रही थी। घरवाले कुछ-कुछ समझ रहे थे, लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता। रिया सबसे ज्यादा खुश थी – वो चुपके से दोनों को चिढ़ाती, लेकिन अब मजाक में नहीं, बल्कि सपोर्ट में।

     

    एक शाम बर्फबारी फिर शुरू हो गई। घर में लाइट्स डिम थीं, फायरप्लेस जल रहा था। राजेश पापा और आदित्य अंकल बाहर गए थे – किसी पुराने दोस्त की पार्टी में। रिया अपने कमरे में थी, हेडफोन लगाकर म्यूजिक सुन रही। घर में सिर्फ प्रिया और आरव।

     

    प्रिया लाइब्रेरी में किताब पढ़ रही थी। आरव अंदर आया। हाथ में दो मग – हॉट चॉकलेट। “प्रिया… ठंड है। ले।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर लिया। “थैंक्स भैया।”

     

    आरव उसके बगल में सोफे पर बैठ गया। करीब। उनकी कंधें छू रहे थे। फायरप्लेस की लौ दोनों के चेहरों पर नाच रही थी। आरव ने प्रिया के बालों में उलझी बर्फ की बूंद हटाई। “प्रिया… आज तू बहुत खूबसूरत लग रही है।”

     

    प्रिया शर्मा गई। “भैया… तुम भी।”

     

    आरव ने उसका हाथ लिया। धीरे से उंगलियां आपस में घुमाईं। “प्रिया… मुझे अब डर नहीं लगता। तू मेरे साथ है ना?”

     

    प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “हां भैया। हमेशा।”

     

    आरव ने उसे करीब खींचा। प्रिया का सिर उसके सीने पर टिका। उसकी धड़कन सुनाई दे रही थी – तेज़, लेकिन सुकून भरी। आरव ने उसके बालों को सहलाया। “प्रिया… सालों से मैं तुझे खोजता रहा। अब तू मिली है… पूरी तरह।”

     

    प्रिया ने ऊपर देखा। आरव का चेहरा करीब था। उसने धीरे से प्रिया के होंठों को छुआ – पहला किस। नरम, गर्म, लंबा। प्रिया की आंखें बंद हो गईं। वो जवाब में करीब आई। दोनों के होंठ मिले – धीरे, लेकिन गहराई से। वो किस सालों के इंतजार का था, कमी का, और अब मिलन का। आरव के हाथ प्रिया की कमर पर थे, प्रिया के हाथ उसके गले में। फायरप्लेस की लौ चटक रही थी, बाहर बर्फ गिर रही थी।

     

    किस टूटा। दोनों सांसें तेज़। आरव ने प्रिया के माथे पर होंठ रखे। “प्रिया… मैं तुझे कभी दुख नहीं दूंगा।”

     

    प्रिया ने उसे फिर किस किया – इस बार खुद से। “भैया… तू मेरा पहला और आखिरी प्यार है।”

     

    दोनों सोफे पर लेट गए। आरव की बाहों में प्रिया। वो बातें करने लगे – बचपन की, मां की, भविष्य की। आरव ने कहा, “प्रिया… एक दिन सबको बताएंगे। धीरे-धीरे। लेकिन तू मेरी है।”

     

    प्रिया ने कहा, “हां। तेरी हूं।”

     

    रात गहरा गई। दोनों फायरप्लेस के सामने लेटे रहे। हाथ थामे, होंठ मिले, आंखें बंद। रोमांस अब गहरा हो चुका था – वो गहराई जो सिर्फ स्पर्श में नहीं, दिलों के मिलन में थी। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अब प्यार में बदल चुका था। प्रिया का डर अब सुकून में।

     

    सुबह हुई। रिया नीचे आई। दोनों को सोफे पर देखा – प्रिया आरव की बाहों में सो रही थी। रिया मुस्कुराई। चुपके से कंबल ओढ़ाया और ऊपर चली गई।

     

    लेकिन बाहर तूफान आ रहा था। राजेश पापा को अनाम लेटर मिल चुका था। वो आदित्य अंकल से बात कर रहे थे। “आदित्य जी… आरव और प्रिया… कुछ गलत तो नहीं?”

     

    आदित्य ने कहा, “राजेश, बच्चे बड़े हो गए हैं। लेकिन प्रिया मेरी बेटी है। अगर कुछ है तो बात करनी होगी।”

     

    पापा ने आरव को बुलाया। “आरव… प्रिया से तेरा रिश्ता… क्या है?”

     

    आरव चौंका। “पापा… वो मेरी…”

     

    पापा ने लेटर दिखाया। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। “पापा… मैं प्रिया से प्यार करता हूं। बहन से ज्यादा।”

     

    पापा स्तब्ध। “आरव… ये… ये गलत है। तुमने उसे बहन माना सालों।”

     

    आरव ने कहा, “पापा… खून का रिश्ता नहीं है। और प्यार… दिल से है।”

     

    प्रिया आई। सब सुन लिया। वो रो पड़ी। “पापा… मैं भी आरव से प्यार करती हूं।”

     

    आदित्य अंकल ने कहा, “बच्चो… ये आसान नहीं। समाज, फैमिली… सब देखेगा।”

     

    लेकिन राजेश पापा ने गहरी सांस ली। “अगर तुम दोनों खुश हो… तो मैं साथ हूं। रानी भी यही चाहती।”

     

    सब रो पड़े। फैमिली ने अपनाया। रिया ने ताली बजाई। “फाइनली!”

     

    लेकिन अवनी और विक्रम का प्लान फेल हो गया। विक्रम जेल में और गुस्सा। “अवनी, अब आखिरी हथियार। मीडिया को बता दो। ठाकुर फैमिली का स्कैंडल।”

     

    अगले दिन न्यूज चैनल्स पर ब्रेकिंग – “ठाकुर फैमिली में अनैतिक रिश्ता? भाई-बहन का प्यार?”

     

    प्रिया और आरव बाहर निकले। कैमरे, माइक। आरव ने प्रिया का हाथ थामा। “हम साथ हैं। प्यार में कुछ गलत नहीं।”

     

    प्रिया ने कहा, “हमारा प्यार सच्चा है।”

     

    मीडिया का तूफान आया। लेकिन दोनों मजबूत थे। रोमांस अब गहरा था – चुनौतियों के बीच और मजबूत।

     

    आरव ने प्रिया को गले लगाया। “प्रिया… दुनिया कुछ भी कहे, तू मेरी है।”

     

    प्रिया ने कहा, “और तू मेरा। हमेशा।”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 15

    Dil sabhal ja jara part – 15

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 15 pahla sparsh

    शिमला में अब बर्फबारी रुक-रुक कर हो रही थी। ठाकुर हाउस की छत पर बर्फ की मोटी परत जम चुकी थी, और बाहर का तापमान माइनस में था। घर के अंदर हीटर की गर्माहट थी, लेकिन प्रिया और आरव के दिलों में एक अलग ही आग सुलग रही थी – धीमी, लेकिन लगातार। वो अनकहा वादा, वो बर्फीली रात का गले लगना, अब दोनों के बीच एक अदृश्य धागा बन चुका था। दोनों एक-दूसरे से बात करते, हंसते, लेकिन हर बात में एक नई गहराई थी। नजरें मिलतीं तो लंबी हो जातीं, और फिर शर्मा कर हट जातीं।

     

    प्रिया रातों में सोचती – “भैया का प्यार… वो कितना गहरा है। सालों का इंतजार, कमी, और अब ये एहसास। लेकिन अगर मैंने भी दिल खोल दिया तो क्या होगा? फैमिली? रिया? विक्रांत?” वो खुद से लड़ रही थी। आरव को खोने का डर था, लेकिन रिश्ता बदलने का डर भी।

     

    आरव का कॉन्फ्लिक्ट अब थोड़ा शांत हो रहा था। प्रिया के साथ बिताए पल उसे सुकून दे रहे थे। वो जानता था कि जल्दबाजी नहीं करनी। लेकिन हर छोटी चीज उसे प्रिया की ओर खींचती – उसकी मुस्कान, उसकी आवाज, उसकी मौजूदगी। वो खुद से कहता, “धीरे चल आरव। प्रिया को वक्त दे। वो तेरी है – दिल से।”

     

    एक दिन कॉलेज बंद था – बर्फबारी की वजह से। घर में सब थे। रिया ने प्लान बनाया। “चलो, आज स्नोमैन बनाते हैं! बचपन जैसा।”

     

    राजेश पापा और आदित्य अंकल हंस पड़े। “हम बूढ़े हो गए बेटा। तुम जाओ।”

     

    प्रिया, रिया और आरव लॉन में निकले। बर्फ गीली थी – परफेक्ट स्नोमैन के लिए। रिया ने बेस बनाना शुरू किया। “प्रिया, तू आंखें बना। भैया, नाक!”

     

    आरव और प्रिया साथ-साथ काम कर रहे थे। आरव ने बड़ा गोला घुमाया। प्रिया ने मदद की। उनके हाथ बार-बार छू रहे थे। हर स्पर्श में करंट दौड़ता। आरव ने प्रिया की तरफ देखा। प्रिया शर्मा गई।

     

    रिया ने चिढ़ाया। “ओहो, दोनों कितने रोमांटिक हो रहे हैं स्नोमैन बनाते हुए!”

     

    आरव ने बर्फ का गोला रिया पर फेंका। “चुप रिया!”

     

    तीनों हंसने लगे। बर्फ की लड़ाई शुरू हो गई। प्रिया भागी, आरव पीछे। आरव ने उसे पकड़ लिया – पीठ से गले लगाकर। “पकड़ी गई!”

     

    प्रिया हंस रही थी, लेकिन आरव के स्पर्श में सांस रुक गई। वो पीछे मुड़ी। दोनों की नजरें मिलीं। बर्फ उनके बालों पर गिर रही थी। आरव का हाथ प्रिया की कमर पर था। वो छोड़ना नहीं चाहता था। प्रिया ने भी हाथ उसकी जैकेट पर रखा।

     

    रिया दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी। “मैं अंदर जा रही हूं। ठंड लग रही है।” वो चली गई – जानबूझकर।

     

    अब सिर्फ आरव और प्रिया। बर्फ में खड़े। आरव ने धीरे से प्रिया के गाल से बर्फ हटाई। “प्रिया… ठंड लग रही है?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “नहीं भैया।”

     

    आरव ने उसका चेहरा हाथों में लिया। “प्रिया… मैं अब और नहीं लड़ सकता। तू मेरे दिल में है। हर पल।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। “भैया… मैं भी… तुम्हारे बिना अधूरी हूं। लेकिन डर लगता है।”

     

    आरव ने कहा, “डर मत। हम साथ हैं। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”

     

    उसने प्रिया को और करीब खींचा। पहली बार – होठों पर नहीं, माथे पर किस। एक लंबा, गर्म स्पर्श। प्रिया की आंखें बंद हो गईं। वो पहला स्पर्श – प्यार का, लेकिन सम्मान का। आरव ने पीछे हटकर कहा, “सॉरी अगर…”

     

    प्रिया ने उसे रोका। “नहीं भैया। अच्छा लगा।”

     

    दोनों मुस्कुराए। हाथ थामे घर की ओर चले। रिया दरवाजे पर खड़ी थी। “वाह! आखिरकार!”

     

    प्रिया शर्मा गई। “रिया!”

     

    आरव ने हंसकर कहा, “रिया, तू कुछ नहीं देखी।”

     

    लेकिन रिया की आंखें चमक रही थीं। वो समझ गई थी।

     

    शाम को विक्रांत का फोन आया। “प्रिया, कल मिलें? कुछ इम्पॉर्टेंट बात है।”

     

    प्रिया ने कहा, “विक्रांत… कल देखते हैं।”

     

    वो फोन काटकर आरव के पास गई। दोनों लाइब्रेरी में बैठे। आरव किताब पढ़ रहा था। प्रिया उसके बगल में। “भैया… विक्रांत मिलना चाहता है।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया। लेकिन उसने खुद को कंट्रोल किया। “जा प्रिया। अगर तुझे अच्छा लगे तो। मैं तेरी खुशी चाहता हूं।”

     

    प्रिया ने उसका हाथ पकड़ा। “भैया… मेरी खुशी तुम हो।”

     

    आरव मुस्कुराया। “प्रिया… तूने मुझे जीत लिया।”

     

    दोनों करीब आए। आरव ने प्रिया के हाथ चूमे। पहला रोमांटिक स्पर्श – धीमा, इमोशनल।

     

    अगले दिन प्रिया विक्रांत से मिली। विक्रांत ने कहा, “प्रिया… मुझे तुझसे प्यार हो गया है। दोस्ती से ज्यादा।”

     

    प्रिया चुप रही। “विक्रांत… तू बहुत अच्छा है। लेकिन मेरा दिल… कहीं और है।”

     

    विक्रांत की आंखें नम हो गईं। “आरव?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “हां। हमारा रिश्ता… कॉम्प्लिकेटेड है। लेकिन सच्चा।”

     

    विक्रांत ने मुस्कुराकर कहा, “प्रिया, मैं खुश हूं कि तू खुश है। दोस्त हमेशा रहूंगा।”

     

    प्रिया ने उसे गले लगाया – दोस्त की तरह। “थैंक्स विक्रांत। तू बेस्ट है।”

     

    विक्रांत चला गया। प्रिया का मन हल्का हो गया।

     

    घर लौटकर प्रिया ने आरव को बताया। आरव ने उसे गले लगाया। “प्रिया… तूने मुझे चुना?”

     

    प्रिया ने कहा, “हमेशा भैया। तू मेरा पहला और आखिरी प्यार है।”

     

    आरव ने उसे माथे पर फिर किस किया। “धीरे-धीरे प्रिया। सब ठीक हो जाएगा।”

     

    लेकिन अवनी ने ये सब देख लिया। वो विक्रम को फोन की। “विक्रम, प्रिया और आरव साथ हैं। अब प्लान बी। फैमिली को बता दो। राजेश अंकल को कहो कि आरव और प्रिया का रिश्ता गलत है।”

     

    विक्रम हंसा। “अच्छा। अब ठाकुर हाउस में तूफान आएगा।”

     

    रात को राजेश पापा को एक अनाम लेटर मिला – “आपके बेटे और बेटी का रिश्ता नॉर्मल नहीं। सावधान।”

     

    पापा चौंके। लेकिन कुछ बोले नहीं।

     

    प्रिया और आरव बालकनी में थे। हाथ थामे। बर्फ गिर रही थी। आरव ने कहा, “प्रिया… चाहे दुनिया कुछ कहे, मैं तेरा हूं।”

     

    प्रिया ने सिर उसके कंधे पर रखा। “और मैं तेरी।”

     

    पहला स्पर्श, पहला वादा। प्यार अब खुल रहा था – धीरे, लेकिन मजबूती

    से। लेकिन बाहर तूफान आने वाला था। फैमिली का, समाज का।

     

    क्या वो साथ रह पाएंगे? या सब छिन जाएगा?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 14

    Dil sabhal ja jara part – 14

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 14: “अनकहे वादे”

    शिमला की बर्फ अब पूरी तरह जम चुकी थी। सड़कें सफेद चादर ओढ़े थीं, और ठाकुर हाउस का लॉन एक बर्फीला मैदान बन गया था। प्रिया और आरव के बीच वो रात की बात – वो अनकहा कन्फेशन – अब हवा में तैर रही थी। दोनों एक-दूसरे से बचते थे, लेकिन बचना मुश्किल हो रहा था। प्रिया कॉलेज जाती, आरव काम पर – लेकिन हर शाम घर लौटने पर नजरें मिल ही जातीं। वो नजरें जो पहले भाई-बहन वाली थीं, अब कुछ और कहने लगी थीं। प्रिया का मन उलझा था। आरव का एहसास जानकर उसे डर लगता था, लेकिन साथ ही एक अजीब सा सुकून भी मिलता। “भैया… तुम्हारा प्यार… क्या वो सच्चा है? या सिर्फ सालों की कमी का दर्द?”

    आरव के लिए हर दिन एक जंग था। सुबह उठते ही वो खुद से वादा करता – “आज प्रिया से दूर रहूंगा। उसे कन्फ्यूज नहीं करूंगा।” लेकिन शाम होते-होते मन हार मान लेता। प्रिया की हंसी सुनकर, उसकी छोटी-छोटी आदतें देखकर – जैसे वो चाय बनाते वक्त बालों को पीछे करना – आरव का दिल पिघल जाता। वो जानता था कि ये एहसास गलत नहीं, लेकिन समाज, फैमिली, और प्रिया के मन का बोझ इसे मुश्किल बना रहा था। रात को वो अपनी डायरी में लिखता – “प्रिया, तू मेरी बहन थी, लेकिन अब… अब तू मेरी दुनिया है। मैं कैसे कहूं कि मैं बिना तेरे के अधूरा हूं? लेकिन अगर तू खुश नहीं हुई तो ये प्यार शाप बनेगा।”

    एक सुबह ब्रेकफास्ट टेबल पर रिया ने फिर कॉमेडी शुरू की। “प्रिया, आज विक्रांत का मैसेज आया? वो तो रोज पूछता है – ‘प्रिया कहां है?’ लगता है प्रपोजल प्लान कर रहा है!”

    प्रिया ने चाय का कप रखा। “रिया, चुप कर। अभी कुछ नहीं।”

    राजेश पापा ने अखबार से नजरें हटाईं। “प्रिया बेटी, विक्रांत अच्छा लड़का लगता है। लेकिन जल्दबाजी मत करना। जिंदगी लंबी है।”

    आदित्य अंकल ने मुस्कुराकर कहा, “हां बेटी। दिल की सुन, लेकिन दिमाग से सोच।”

    आरव चुपचाप बैठा था। रिया की बात सुनकर उसका चेहरा सख्त हो गया। वो उठा और बोला, “मैं ऑफिस जा रहा हूं।”

    प्रिया ने पुकारा, “भैया, ड्रॉप कर दूं कॉलेज?”

    आरव ने पीठ फेरते हुए कहा, “नहीं प्रिया। तू रिया के साथ जा।”

    प्रिया का दिल बैठ गया। आरव की दूरी अब दर्द दे रही थी।

    कॉलेज में विक्रांत इंतजार कर रहा था। “प्रिया, कल का प्रोजेक्ट कंपलीट हो गया? चल, लाइब्रेरी में देखते हैं।”

    प्रिया ने हां कहा। दोनों लाइब्रेरी के कोने में बैठे। विक्रांत ने किताबें खोलीं। “प्रिया, तू आजकल चुप क्यों लग रही है? कुछ हुआ?”

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बस, फैमिली मैटर्स। एग्जाम भी हैं।”

    विक्रांत ने उसका हाथ धीरे से छुआ। “प्रिया, तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। अगर कुछ शेयर करना हो तो बता।”

    प्रिया ने हाथ हटा लिया। विक्रांत अच्छा था – सच्चा, सपोर्टिव। लेकिन उसके स्पर्श में वो स्पार्क नहीं था जो आरव की नजरों में था। “विक्रांत, थैंक्स। लेकिन अभी… अभी सब कुछ सेटल नहीं हुआ।”

    विक्रांत ने सिर हिलाया। “कोई बात नहीं। मैं इंतजार करूंगा। दोस्ती से ज्यादा कुछ मत समझना।”

    दोपहर को अवनी ने फिर अपना जाल बिछाया। वो प्रिया के पास आई। “प्रिया, विक्रांत से सावधान रह। उसकी दादी ने ही तेरी मां को फंसाया था। विक्रम ने प्रूफ भेजा है – पुराना कोर्ट केस।”

    प्रिया ने फाइल ली। अंदर पुराने पेपर्स थे – 1990 का एक केस, जहां राठौर फैमिली ने ठाकुर होटल्स पर जमीन हड़पने का आरोप लगाया था। लेकिन प्रिया को शक हुआ। “अवनी, ये पुरानी बातें क्यों उछाल रही हो?”

    अवनी ने मुस्कुराया। “बस, सच्चाई जानना चाहती हूं। आरव को भी दिखा दे। वो तो विक्रांत से जलता ही है।”

    प्रिया घर लौटी। आरव को फाइल दिखाई। आरव ने पढ़ी। उसका गुस्सा फिर भड़क गया। “प्रिया, मैंने कहा था विक्रांत से दूर रह। ये फैमिली दुश्मन है।”

    प्रिया ने कहा, “भैया, ये झूठा प्रूफ लगता है। विक्रांत ने कुछ नहीं किया।”

    आरव चीखा, “तू उसे बचाती क्यों है? क्या वो तुझे पसंद है?”

    प्रिया रो पड़ी। “भैया… तुम्हारा गुस्सा… सिर्फ दुश्मनी का नहीं लगता।”

    आरव चुप हो गया। वो कमरे से बाहर निकल गया। लॉन में खड़ा हो गया। बर्फ में कदम रखे। ठंड काट रही थी, लेकिन अंदर का दर्द ज्यादा था। “प्रिया… मैं तुझे खो दूंगा। विक्रांत को। या खुद को। ये जंग… कब खत्म होगी?”

    रात को प्रिया आरव के कमरे में गई। दरवाजा खुला था। आरव डायरी लिख रहा था। प्रिया ने देखा – “प्रिया, तू मेरी कमजोरी है। मैं तुझे प्यार करता हूं, लेकिन ये प्यार मुझे मार रहा है। बहन का रिश्ता टूटने का डर, प्यार का बोझ – सब मिलकर मुझे तोड़ रहे हैं। मैं तुझे खुश देखना चाहता हूं, लेकिन खुद को क्यों नहीं बचा पा रहा?”

    प्रिया की आंखें भर आईं। “भैया… ये पढ़ लिया।”

    आरव चौंका। डायरी बंद की। “प्रिया… सॉरी। तू मत पढ़ती।”

    प्रिया उसके पास बैठी। “भैया, तुम्हारी जंग… अकेले क्यों लड़ रहे हो? मैं भी लड़ रही हूं। तुम्हारे एहसास जानकर… मुझे भी डर लगता है। लेकिन तुम्हारे बिना… अधूरा लगता है।”

    आरव ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… तू क्या फील करती है?”

    प्रिया ने सिर झुका लिया। “भैया… तुम मेरे लिए सब कुछ हो। पहले भाई, अब… अब कुछ और। लेकिन समाज क्या कहेगा? फैमिली? और विक्रांत?”

    आरव ने उसके हाथ पकड़े। “विक्रांत… वो अच्छा है। लेकिन मेरा दिल तुझे किसी और को नहीं सौंप पा रहा। मैं जानता हूं ये सेल्फिश है। लेकिन प्रिया, मैं तुझे सालों खो चुका। अब फिर से खोने का हौसला नहीं।”

    प्रिया रो पड़ी। “भैया… हम क्या करें?”

    आरव ने उसे गले लगा लिया। “वक्त देंगे प्रिया। धीरे-धीरे। लेकिन मैं वादा करता हूं – तेरी खुशी के लिए सब कुछ करूंगा। चाहे खुद को दर्द देकर।”

    दोनों गले लगे रहे। कमरे में सन्नाटा था। बाहर बर्फ की आवाज। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अभी खत्म नहीं हुआ था – वो प्यार को एक्सेप्ट कर रहा था, लेकिन गिल्ट अभी भी चुभ रहा था। “क्या मैं प्रिया को दुख दूंगा? या ये प्यार हमें जोड़ेगा?”

    अगले दिन रिया ने नोटिस किया। “प्रिया, तुम और भैया के बीच कुछ तो हो रहा है। बताओ ना!”

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “रिया, अभी कुछ नहीं। लेकिन… सब ठीक होगा।”

    विक्रांत का मैसेज आया – “प्रिया, मिलें? कुछ इम्पॉर्टेंट।”

    प्रिया ने हां कहा। वो मिले। विक्रांत ने कहा, “प्रिया, अवनी के प्रूफ झूठे हैं। मैंने चेक किया। लेकिन… मुझे लगता है तू परेशान है। आरव से?”

    प्रिया ने सिर हिलाया। “हां। फैमिली मैटर्स।”

    विक्रांत ने कहा, “प्रिया, अगर तुझे किसी की जरूरत हो तो मैं हूं। दोस्त की तरह।”

    प्रिया मुस्कुराई। “थैंक्स विक्रांत। तू सच्चा दोस्त है।”

    लेकिन मन में आरव था। शाम को घर लौटकर प्रिया ने आरव को देखा। वो लॉन में बर्फ के गोले बना रहा था – बचपन जैसा। प्रिया हंस पड़ी। “भैया, क्या कर रहे हो?”

    आरव ने गोला फेंका। “पकड़ प्रिया! याद है बचपन में?”

    प्रिया ने पकड़ा। दोनों हंसने लगे। बर्फ की होली खेली। ठंड थी, लेकिन दिल गर्म हो गया। आरव ने प्रिया के बालों से बर्फ हटाई। “प्रिया… तू हमेशा मेरी रहेगी। चाहे जो हो।”

    प्रिया ने कहा, “हां भैया। हमेशा।”

    अवनी घर के बाहर खड़ी थी। फोन पर विक्रम से बात कर रही थी। “विक्रम, आरव और प्रिया करीब आ रहे हैं। लेकिन विक्रांत को इस्तेमाल कर। उसे बता कि प्रिया आरव को पसंद करती है।”

    विक्रम ने हंसकर कहा, “अच्छा प्लान। अब असली ड्रामा शुरू।”

    रात को आरव अकेला लॉन में था। बर्फ में लेटा। प्रिया आई। “भैया, ठंड लग जाएगी।”

    आरव ने हाथ बढ़ाया। “प्रिया… आ, साथ लेट। सितारे देख।”

    दोनों लेटे। बर्फ ठंडी थी, लेकिन हाथ थामे थे। आरव ने कहा, “प्रिया, मैं वादा करता हूं। तेरे एहसास का सम्मान करूंगा। धीरे-धीरे।”

    प्रिया ने सिर उसके कंधे पर रखा। “हां भैया। धीरे-धीरे।”

    बर्फ गिर रही थी। अनकहे वादे बन रहे थे। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अभी था – लेकिन प्रिया के साथ, वो हल्का लग रहा था। प्यार की शुरुआत हो चुकी थी – स्लो, इमोशनल, और अनकही।

    विक्रांत घर पर अकेला था। प्रिया का मैसेज पढ़ा – “थैंक्स दोस्त।” वो मुस्कुराया, लेकिन आंखें उदास। “प्रिया… क्या मैं सिर्फ दोस्त रह जाऊंगा?”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 13

    Dil sabhal ja jara part – 13

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 13 dil ka jang 

     

     

     

     

    शिमला की बर्फीली रातें अब और लंबी लगने लगी थीं। ठाकुर हाउस में हर कमरे में हीटर चल रहा था, लेकिन आरव के दिल में एक अलग ही ठंडक फैल गई थी। वो रातों में सो नहीं पाता था। बालकनी में खड़ा होकर बर्फ गिरते देखता, और मन में तूफान मचता। प्रिया… उसका नाम ही अब उसके लिए एक पहेली बन गया था। वो प्रिया जिसे उसने सालों खोया मानकर जिया, जिसे वापस पाकर लगा था जिंदगी पूरी हो गई। लेकिन अब? अब वो एहसास जो दिल में धीरे-धीरे पनप रहा था, वो उसे खुद से ही लड़वा रहा था।

     

    आरव अपने कमरे में लेटा था। छत को घूर रहा था। यादें एक-एक करके आ रही थीं। बचपन की वो शामें, जब मम्मी रानी उसे और छोटी प्रिया को बगीचे में घुमाती थीं। प्रिया तब मुश्किल से चार साल की थी – छोटी सी गुड़िया, जो आरव की उंगली पकड़कर चलती। “भैया… झूला झुलाओ ना!” उसकी मासूम आवाज अभी भी कानों में गूंजती। आरव मुस्कुराया, लेकिन मुस्कान में दर्द था। वो समय जब एक्सीडेंट हुआ, प्रिया लापता हो गई – वो रातें जब वो रोता रहता, पापा उदास रहते। सालों तक वो खुद को दोष देता रहा – अगर मैं प्रिया को टाइटली पकड़ता तो शायद…

     

    लेकिन अब प्रिया वापस थी। बड़ी हो गई थी। उसकी आंखों में वही चमक, वही स्ट्रेंथ। आरव ने उसे बहन की तरह अपनाया था। लेकिन डायरी का वो राज़ – कि वो खून का भाई नहीं – सब बदल दिया। पहले तो लगा बस रिश्ता नाम का है, दिल से तो बहन ही है। लेकिन धीरे-धीरे वो नजरें बदलने लगीं। प्रिया को देखकर दिल का धड़कना तेज़ हो जाता। उसकी हंसी पर मन बहक जाता। वो छोटी-छोटी बातें – प्रिया का बालों को कान के पीछे करना, उसका शॉल ओढ़ना – सब आरव को अजीब सा सुकून देतीं। लेकिन साथ ही गिल्ट। “ये गलत है। वो मुझे भाई मानती है। मैं उसका सहारा हूं, प्यार नहीं।”

     

    आरव उठा और खिड़की के पास गया। बाहर बर्फ गिर रही थी। वो सिगरेट जलाई – ये आदत नई थी, तनाव कम करने की कोशिश में। धुंआ बाहर निकाला और खुद से बोला, “आरव, क्या हो रहा है तुझे? प्रिया तेरी बहन है। दिल से। उसे ऐसा कुछ मत फील कर। वो विक्रांत से दोस्ती कर रही है, तुझे खुश होना चाहिए।” लेकिन अंदर ही अंदर जलन थी। विक्रांत का नाम सुनते ही मन में आग लग जाती। “क्यों? क्यों मुझे बुरा लगता है जब वो विक्रांत से बात करती है?”

     

    अगली सुबह ठाकुर हाउस में ब्रेकफास्ट की टेबल पर सब इकट्ठे थे। राजेश पापा न्यूज पेपर पढ़ रहे थे, आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) चाय पी रहे थे, रिया जैम लगाकर टोस्ट खा रही थी। प्रिया नीचे आई – सादे स्वेटर में, बाल खुले। आरव की नजर उस पर टिक गई। प्रिया मुस्कुराई। “गुड मॉर्निंग भैया।”

    आरव की आवाज कांपी। “गुड मॉर्निंग प्रिया। सोई अच्छे से?”

    “हां भैया। लेकिन रात को बर्फ की आवाज से नींद टूटी।”

    आरव ने उसके लिए चाय बनाई। “ले, गरम चाय। ठंड न लग जाए।”

    प्रिया ने लिया। उनके हाथ छुए। आरव का दिल धड़का। वो जल्दी से मुड़ा। रिया ने नोटिस किया। “भैया, आजकल आप प्रिया को स्पेशल ट्रीटमेंट दे रहे हो। चाय खुद बना रहे हो?”

    आरव ने हंसने की कोशिश की। “रिया, बहन है ना। केयर तो करूंगा।”

    लेकिन अंदर वो लड़ रहा था। “ये केयर भाई वाली है या…?”

    कॉलेज में प्रिया और विक्रांत फिर मिले। विक्रांत ने कहा, “प्रिया, वो लेटर विक्रम का झूठ है। मैंने चेक किया – मेरी दादी की डायरी में कोई ऐसा जिक्र नहीं। वो हमें अलग करना चाहता है।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “मुझे पता है विक्रांत। लेकिन अवनी ने ये अफवाह फैलाई है। लोग बातें कर रहे हैं।”

    विक्रांत ने उसका कंधा थपथपाया। “चिंता मत कर। हम साथ हैं। दोस्त की तरह।”

    प्रिया मुस्कुराई। लेकिन मन में आरव था। “क्यों भैया के बारे में सोच रही हूं?”

     

    शाम को घर लौटते वक्त आरव फिर कार लेकर आया। आज रिया नहीं थी। सिर्फ आरव और प्रिया। रास्ते में सन्नाटा था। प्रिया ने चुप्पी तोड़ा। “भैया, आज तुम चुप क्यों हो?”

    आरव ने कार साइड में रोकी। “प्रिया… मुझे कुछ कहना है।”

     

    प्रिया का दिल धड़का। “क्या भैया?”

    आरव ने उसकी आंखों में देखा। “तू खुश है ना? विक्रांत से मिलकर?”

    प्रिया ने कहा, “हां भैया। वो अच्छा दोस्त है। लेकिन तुम क्यों पूछ रहे हो?”

    आरव ने सांस ली। “प्रिया, मैं… मैं तुझे देखकर खुश हूं। लेकिन कभी-कभी लगता है कि तू दूर जा रही है। 

     

    प्रिया ने उसका हाथ पकड़ा। “भैया, तुम मेरे सबसे करीब हो। कोई नहीं आएगा हमारे बीच।”

    आरव का दिल पिघल गया। वो प्रिया के हाथ को देखता रहा। उस स्पर्श में कुछ था – गर्माहट, जो भाई-बहन वाली नहीं लग रही थी। वो खुद से लड़ रहा था। “प्रिया, अगर मैं कहूं कि मैं तुझे… बहन से ज्यादा मानता हूं?”

    प्रिया चौंकी। “भैया…?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “सॉरी। भूल जा। मैं कन्फ्यूज हूं। सालों से तुझे बहन माना, अब राज़ खुलने के बाद… दिल नहीं मानता। लेकिन मैं गलत हूं। तू मुझे भाई मानती है। मैं वो रिश्ता नहीं तोड़ूंगा।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। “भैया… मैं भी कन्फ्यूज हूं। तुम मेरे लिए सब कुछ हो। लेकिन ये नया एहसास… मुझे डर लगता है। अगर हमारा रिश्ता बदल गया तो?”

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया। “कुछ नहीं बदलेगा प्रिया। मैं तुझे कभी दुख नहीं दूंगा। लेकिन ये एहसास… ये मुझे अंदर से खा रहा है। मैं खुद से लड़ रहा हूं।”

     

    दोनों रो पड़े। कार में सन्नाटा था, बाहर बर्फ गिर रही थी। आरव का इमोशनल कॉन्फ्लिक्ट अब पीक पर था – प्यार का एहसास, गिल्ट का बोझ, और रिश्ते को बचाने की जंग। वो जानता था कि प्रिया को दबाव नहीं दे सकता, लेकिन दिल नहीं मान रहा था।

     

    अगले दिनों आरव ने दूरी बनाने की कोशिश की। प्रिया से कम बात करता, घर से जल्दी निकलता। लेकिन प्रिया नोटिस कर रही थी। एक रात प्रिया उसके कमरे में गई। “भैया, क्या हुआ? तुम मुझसे दूर क्यों हो रहे हो?”

    आरव ने किताब बंद की। “प्रिया… मैं तुझे दुख नहीं देना चाहता। मेरे एहसास… वो तेरे लिए बोझ हैं।”

     

    प्रिया उसके पास बैठी। “भैया, तुम्हारे एहसास मेरे लिए बोझ नहीं। मैं भी सोच रही हूं। लेकिन धीरे-धीरे। हमें वक्त चाहिए।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… तू मेरी जिंदगी है। मैं तुझे खो नहीं सकता।”

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “तुम भी मेरी हो भैया।”

    उस रात आरव ने डायरी में लिखा – “प्रिया, मैं तुझे प्यार करता हूं। लेकिन ये प्यार रिश्ते को तोड़ेगा या जोड़ेगा? मैं लड़ रहा हूं – खुद से, समाज से, पुराने रिश्तों से। लेकिन तेरी खुशी से ऊपर कुछ नहीं।”

     

    दूसरी तरफ विक्रांत प्रिया को मैसेज करता रहा। “प्रिया, क्या हुआ? मिलना क्यों नहीं?”

    प्रिया ने जवाब दिया, “बिजी हूं। बाद में बात करते हैं।”

    अवनी का प्लान काम कर रहा था। वो विक्रम से मिलकर आई थी। “विक्रम, आरव और प्रिया के बीच कुछ हो रहा है। अगर वो मिल गए तो ठाकुर प्रॉपर्टी हमारी नहीं रहेगी।”

    विक्रम ने हंसकर कहा, आरव को बताओ कि विक्रांत का बैकग्राउंड संदिग्ध है।”

    अगले दिन कॉलेज में अवनी ने आरव को एक फाइल दी। “आरव, विक्रांत की दादी ने तुम्हारी मां की मौत में हाथ था। प्रूफ देखो।”

    आरव ने फाइल पढ़ी। पुराने लेटर्स, जो दिखाते थे कि राठौर फैमिली ने ठाकुरों को बदनाम करने की साजिश की थी। आरव का गुस्सा फूट पड़ा। वो घर आया और प्रिया से कहा, “विक्रांत से दूर रह। वो दुश्मन है।”

    प्रिया ने कहा, “भैया, वो झूठ है।”

    लेकिन आरव चीखा, “नहीं प्रिया! मैं तुझे खो नहीं सकता। वो तुझे चोट पहुंचाएगा।”

     

    प्रिया रो पड़ी। “भैया… तुम्हारा गुस्सा… सिर्फ दुश्मनी का है या कुछ और का?”

    आरव चुप हो गया। उसका कॉन्फ्लिक्ट अब बाहर आ रहा था – प्यार, जलन, प्रोटेक्शन। वो खुद से हार रहा था।

     

    रात को बर्फ गिर रही थी। आरव बाहर खड़ा था। प्रिया आई। “भैया… हम बात करेंगे?”

    आरव ने उसे देखा। “प्रिया… मैं नहीं लड़ सकता अब। मैं तुझे प्यार करता हूं। बहन से ज्यादा। लेकिन ये गलत है।”

    प्रिया की सांस रुक गई। वो पीछे हटी। “भैया…?”

    आरव रो पड़ा। “सॉरी प्रिया। मैं दूर जाऊंगा। तुझे दुख नहीं दूंगा।”

     

    प्रिया ने उसे रोका। “नहीं भैया। मैं भी… मैं भी कुछ फील कर रही हूं। लेकिन डर लगता है।”

    दोनों गले लगे। बर्फ गिर रही थी। दिल की जंग शुरू हो चुकी थी – इमोशंस की, रिश्तों की। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अब खुला था – प्यार का बोझ, गिल्ट की चुभन, और प्रिया को खोने का डर। वो धीरे-धीरे उस एहसास को एक्सेप्ट कर रहा था, लेकिन स्ट्रगल खत्म नहीं हुआ था।

    विक्रांत का फोन फिर बजा। प्रिया ने उठाया नहीं।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 12

    Dil sabhal ja jara part – 12

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    Part – 12 barfili rato ka raj 

    शिमला में अब ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। दिसंबर की शुरुआत हो चुकी थी और पहाड़ियों पर बर्फ की चादर बिछने लगी थी। ठाकुर हाउस की छत पर बर्फ जमा हो रही थी, और लॉन में हर सुबह पाला पड़ता। प्रिया अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी, लेकिन उसका मन कहीं और भटक रहा था। विक्रांत के साथ दोस्ती गहरी हो रही थी – वो दोनों लाइब्रेरी में घंटों बैठते, पुरानी दुश्मनी के कागजात पढ़ते, और कभी-कभी हल्की-फुल्की बातें करते। लेकिन प्रिया का ध्यान बार-बार आरव की ओर जाता।

     

    आरव अब पहले जैसा नहीं रहा था। वो प्रिया से नजरें मिलाने में हिचकिचाता, बात करते वक्त उसकी आवाज में एक अजीब सी कंपकंपी आ जाती। रात को जब सब सो जाते, वो लॉन में अकेला टहलता, सिगरेट पीता (जो पहले कभी नहीं पीता था), और दूर पहाड़ियों को देखता रहता। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसके दिल में क्या हो रहा है। प्रिया उसके लिए बचपन से छोटी बहन थी – वो जिसे उसने खोया था और फिर पाया। लेकिन अब जब खून का रिश्ता नहीं रहा, तो वो पुराने एहसास नए रंग लेने लगे थे। वो एहसास जो वो खुद से छिपा रहा था – प्रिया को देखकर दिल का तेज़ धड़कना, उसकी मुस्कान पर मन का बहक जाना, उसकी हर छोटी बात पर ध्यान देना। लेकिन वो खुद को कोसता – “ये गलत है। वो मेरी बहन है। मैं उसका भाई हूं।”

     

    एक शाम प्रिया और विक्रांत कॉलेज की कैंटीन में बैठे थे। विक्रांत ने एक पुराना फोटो दिखाया – अपनी दादी और ठाकुर हरि सिंह की एक साथ तस्वीर। “देख प्रिया, ये 1945 की है। दोनों मुस्कुरा रहे हैं। दुश्मनी बाद में बनी।”

     

    प्रिया ने फोटो छुआ। “विक्रांत, शायद हमारी मुलाकात संयोग नहीं। हम पुरानी गलतियां सुधार रहे हैं।”

     

    विक्रांत ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… मुझे तुझसे बात करके बहुत सुकून मिलता है। तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है।”

     

    प्रिया मुस्कुराई, लेकिन उसका मन कहीं और था। “विक्रांत, तू भी मेरा अच्छा दोस्त है।”

     

    बस दोस्त। अभी और कुछ नहीं।

     

    घर लौटते वक्त आरव कार में था। प्रिया बैक सीट पर बैठी। रिया आगे। रिया ने कहा, “भैया, आज प्रिया और विक्रांत फिर लाइब्रेरी में थे। पुरानी दुश्मनी खत्म करने का मिशन चल रहा है।”

     

    आरव का हाथ स्टीयरिंग पर कस गया। “अच्छा है।”

     

    लेकिन उसकी आवाज में कुछ था। प्रिया ने आईने से उसे देखा। आरव की आंखें सड़क पर थीं, लेकिन चेहरा तना हुआ।

     

    रात को डिनर के बाद प्रिया अपनी डायरी लिख रही थी। आरव कमरे में आया। “प्रिया… सो नहीं रही?”

     

    “नहीं भैया। एग्जाम की तैयारी।”

     

    आरव उसके पास बैठ गया। “विक्रांत से मिलकर कैसा लग रहा है?”

     

    प्रिया ने पेन रखा। “अच्छा लग रहा है। वो सच्चा दोस्त है।”

     

    आरव चुप रहा। फिर बोला, “अगर वो तेरे से… कुछ और कहे तो?”

     

    प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “भैया… तुम आजकल ऐसे क्यों पूछ रहे हो? जैसे… जल रहे हो।”

     

    आरव चौंका। वो उठ खड़ा हुआ। “जल? नहीं प्रिया। बस… तेरी खुशी चाहता हूं। तूने इतना स्ट्रगल किया है, कोई गलत इंसान तेरे जीवन में न आए।”

     

    लेकिन उसकी आंखें कुछ और कह रही थीं। प्रिया ने उसका हाथ पकड़ा। “भैया… तुम मेरे लिए सबसे इम्पॉर्टेंट हो। कोई भी आए या जाए, तुम हमेशा रहोगे।”

     

    आरव का दिल पिघल गया। उसने प्रिया के हाथ को धीरे से दबाया। उस पल दोनों के बीच एक अनकही करंट दौड़ गई। आरव ने हाथ छुड़ा लिया और बाहर चला गया। बाहर बर्फ गिर रही थी। वो लॉन में खड़ा हो गया। दिल चीख रहा था – “मैं तुझे प्यार करने लगा हूं प्रिया… लेकिन बोल नहीं सकता।”

     

    प्रिया कमरे में अकेली रह गई। उसका दिल भी तेज़ धड़क रहा था। आरव की नजरें, उसका स्पर्श – वो भाई वाला नहीं लग रहा था। वो खुद से सवाल कर रही थी – “क्या मैं भी…?” लेकिन वो जवाब से डर रही थी।

     

    अगले दिन 

     

    कॉलेज में अवनी ने प्रिया को एक पुराना लेटर थमाया। “ये विक्रम ने जेल से भिजवाया है। पढ़।”

     

    लेटर में लिखा था – “प्रिया, विक्रांत से दूर रह। राठौर फैमिली ने ही तेरी मां की मौत की साजिश रची थी। 1947 की जमीन की लड़ाई में ठाकुरों को हराने के लिए उन्होंने ब्रिटिश एजेंट से मिलकर रानी को निशाना बनाया। सच ढूंढ।”

     

    प्रिया कांप गई। वो विक्रांत के पास गई। “ये सच है?”

     

    विक्रांत हैरान। “प्रिया… विक्रम झूठ बोल रहा है। बदला लेने के लिए। मेरी दादी ने कभी ऐसा नहीं लिखा।”

     

    लेकिन प्रिया का मन डोल गया। वो घर लौटी और आरव को लेटर दिखाया। आरव ने पढ़ा। उसका चेहरा लाल हो गया। “प्रिया… अगर ये सच भी है तो पुरानी बात है। लेकिन विक्रांत से दूर रह।”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया… तुम क्यों इतना गुस्सा हो रहे हो?”

     

    आरव चीखा, “क्योंकि मैं तुझे खोना नहीं चाहता! क्योंकि… क्योंकि तू मेरे लिए बहुत खास है!”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया। प्रिया की आंखें बड़ी हो गईं। आरव ने सिर पकड़ लिया। “सॉरी प्रिया… मैं… मैं नहीं जानता क्या बोल रहा हूं।”

     

    वो बाहर भाग गया। प्रिया पीछे दौड़ी। बर्फ गिर रही थी। लॉन में आरव खड़ा था। प्रिया उसके पास गई। “भैया… क्या मतलब था तुम्हारा?”

     

    आरव ने पलटा। आंखें लाल। “प्रिया… मैं तुझे बहन की तरह प्यार करता हूं… लेकिन अब… अब वो प्यार बदल रहा है। मैं खुद से लड़ रहा हूं। तू मेरी जिंदगी है। विक्रांत या कोई और तेरे करीब आए, मुझे बर्दाश्त नहीं होता।”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। वो पीछे हटी। “भैया… तुम…?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “मैं गलत हूं प्रिया। तू मुझे भाई मानती है। मैं वो रिश्ता नहीं तोड़ना चाहता। लेकिन दिल… दिल नहीं मानता।”

     

    प्रिया रो पड़ी। वो आरव के पास गई और उसे गले लगा लिया। “भैया… मैं भी कन्फ्यूज हूं। तुम मेरे लिए सबसे बड़े सहारे हो। लेकिन अब… अब ये एहसास नया है। मुझे वक्त चाहिए।”

     

    दोनों बर्फ में खड़े रहे। गले लगे। आंसू बह रहे थे। आरव के मन में वो एहसास अब बाहर आ चुका था – प्रिया के लिए प्यार, जो भाई वाले प्यार से आगे बढ़ चुका था। धीरे-धीरे, बिना जल्दबाजी के।

     

    प्रिया सो नहीं पाई। आरव भी नहीं। दोनों अलग-अलग कमरों में, लेकिन दिल एक-दूसरे के पास।

     

    बर्फीली रात के बाद ठाकुर हाउस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। प्रिया और आरव दोनों एक-दूसरे से नजरें चुरा रहे थे। ब्रेकफास्ट टेबल पर राजेश पापा और आदित्य अंकल बातें कर रहे थे, रिया चुपके से दोनों को देख रही थी, लेकिन आरव और प्रिया चुप। आरव की प्लेट में टोस्ट पड़ा था, लेकिन वो बस कॉफी पी रहा था। उसकी आंखें लाल थीं – रात भर नींद नहीं आई थी।

     

    रात को जो हुआ था, वो उसके दिमाग में बार-बार घूम रहा था। प्रिया को गले लगाना, उसके आंसू महसूस करना, और फिर वो कबूलनामा – “तू मेरे लिए बहुत खास है…”। वो शब्द उसके मुंह से निकल गए थे, और अब वो खुद को कोस रहा था। “मैंने क्या कर दिया? वो मुझे भाई मानती है। बचपन से। मैंने उसका विश्वास कैसे तोड़ सकता हूं?”

     

    आरव उठा और अपने कमरे में चला गया। दरवाजा बंद किया। अंदर अकेला बैठा, सिर पकड़ लिया। उसका मन दो हिस्सों में बंट गया था।

     

    एक तरफ था वो आरव जो प्रिया को छोटी बहन मानता था – वो जो उसे बचपन में गोद में उठाता था, जो उसके लापता होने पर सालों रोया था, जो उसे वापस पाकर सबसे खुश हुआ था। वो आरव जो प्रिया की हर खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार था, जो उसे विक्रांत या किसी और से दूर रखना चाहता था सिर्फ इसलिए क्योंकि वो उसकी “छोटी बहन” थी। वो रिश्ता जो सालों से उसकी जिंदगी का सहारा था।

     

    दूसरी तरफ था वो आरव जो अब प्रिया को एक और नजर से देखने लगा था। जब खून का रिश्ता टूटा, तो दिल ने पुरानी सीमाएं तोड़ दीं। प्रिया की मुस्कान अब उसे सिर्फ प्यारी नहीं, बल्कि दिल को छूने वाली लगती थी। उसकी आंखें देखकर मन बहकता था। उसकी हंसी सुनकर दिल में एक अजीब सी गुदगुदी होती। वो एहसास जो वो खुद से छिपा रहा था – प्यार। लेकिन वो प्यार जो गलत लग रहा था। “समाज क्या कहेगा? फैमिली क्या कहेगी? प्रिया खुद क्या सोचेगी?”

     

    आरव ने आईने के सामने खड़ा होकर खुद से बात की। “आरव ठाकुर… तू पागल हो गया है। वो तेरी बहन है। तूने उसे बचाया है, उसका सहारा बना है। अब ये क्या? अगर तूने कुछ कहा तो वो तुझसे दूर हो जाएगी। तेरी जिंदगी खाली हो जाएगी।”

     

    लेकिन दिल नहीं मान रहा था। वो प्रिया की हर छोटी बात याद कर रहा था – कैसे वो मुस्कुराती है, कैसे साड़ी में खूबसूरत लगती है, कैसे उसकी हिम्मत देखकर वो प्रेरित होता है। वो सोच रहा था कि अगर प्रिया किसी और की हो गई – विक्रांत की या किसी और की – तो वो जी नहीं पाएगा। लेकिन साथ ही डर था – अगर उसने अपने एहसास कबूले तो प्रिया उसे हमेशा के लिए खो देगी।

     

    दोपहर को आरव अपने NGO के आश्रम गया। वहां छोटे-छोटे अनाथ बच्चे थे। वो उन्हें पढ़ाता, खेलता। एक छोटी लड़की – नाम था नेहा – आरव के पास आई। “अंकल, आप उदास क्यों हो?”

     

    आरव ने उसे गोद में उठाया। “कुछ नहीं बेटा। बस थक गया हूं।”

     

    नेहा ने कहा, “अंकल, जब मैं उदास होती हूं तो अपनी दीदी को याद करती हूं जो ऊपर है। आप भी किसी को याद कर रहे हो?”

     

    आरव की आंखें भर आईं। वो प्रिया को याद कर रहा था। वो बच्ची को गले लगाकर बोला, “हां बेटा… बहुत याद आ रही है।”

     

    वहां से लौटते वक्त आरव ने फैसला किया – अपने एहसास दबा देगा। प्रिया की खुशी सबसे ऊपर है। अगर वो विक्रांत को पसंद करेगी तो वो सपोर्ट करेगा। लेकिन अंदर से वो टूट रहा था।

     

    घर लौटा तो प्रिया लॉन में खड़ी थी। बर्फ पिघल रही थी, धूप निकली थी। आरव उसके पास गया। “प्रिया… कल रात के लिए सॉरी। मैंने कुछ गलत कहा। तू मुझे भाई ही मान। मैं वैसा ही रहूंगा।”

     

    प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “भैया… तुमने कुछ गलत नहीं कहा। मैं भी कन्फ्यूज हूं। लेकिन तुम मेरे लिए हमेशा भाई रहोगे। वो रिश्ता मैं नहीं खोना चाहती।”

     

    आरव ने मुस्कुराने की कोशिश की। “हां… बस भाई।”

     

    लेकिन उसके दिल में तूफान था। वो मुस्कुराया, लेकिन अंदर से रो रहा था। वो प्रिया से दूर जाने लगा, लेकिन प्रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया। “भैया… दूर मत जाना। मुझे तुम्हारी जरूरत है।”

     

    आरव रुक गया। उसने प्रिया को गले लगा लिया। इस बार भाई की तरह। लेकिन उसका दिल चीख रहा था – “मैं तुझे प्यार करता हूं प्रिया… लेकिन चुप रहूंगा। तेरी खुशी के लिए।”

     

    शाम को विक्रांत का कॉल आया। प्रिया ने उठाया। “प्रिया… कल बर्फ में वॉक चलें? सिर्फ दोस्तों की तरह।”

     

    प्रिया ने आरव की तरफ देखा। आरव मुस्कुराया। “जा प्रिया। एंजॉय कर।”

     

    लेकिन उसकी मुस्कान के पीछे दर्द था। वो कमरे में गया और दरवाजा बंद कर लिया। अकेले में रोया। उसका इमोशनल कॉन्फ्लिक्ट चरम पर था – प्यार और भाई वाले रिश्ते के बीच फंसा। वो प्रिया को खोना नहीं चाहता था, लेकिन अपना प्यार भी कबूल नहीं कर सकता था।

     

    रिया ने प्रिया से कहा, “यार, आरव भैया आज बहुत उदास हैं। लगता है वो तुझसे…”

     

    प्रिया ने कहा, “रिया… मुझे वक्त चाहिए। सब समझने के लिए।”

     

    रात को आरव छत पर खड़ा था। बर्फीली हवा चल रही थी। वो प्रिया की तस्वीर देख रहा था – बचपन की। “प्रिया… मैं तेरा भाई हूं। हमेशा रहूंगा। मेरा प्यार दबा दूंगा।”

     

    लेकिन दिल नहीं मान रहा था। वो एहसास और मजबूत हो रहा था। धीरे-धीरे।

     

    दूसरी तरफ विक्रांत भी प्रिया को पसंद करने लगा था। लेकिन आरव का दर्द कोई नहीं देख रहा था।

     

    अवनी ने विक्रम को फोन किया। “अब प्रिया और आरव आपस में उलझ गए हैं। हमारा प्लान काम कर रहा है।”

     

     

    आरव प्यार

    जो वो छिपा रहा था, दर्द जो वो सह रहा था। क्या वो कभी कबूलेगा? या हमेशा चुप रहेगा?

     

    जाने के लिए बने रहिए मेरी स्टोरी के साथ।