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  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-2)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अगली सुबह रघु ने दीवार पर बना निशान देखा तो उसके होश उड़ गए।

     

    उसने रात की बात किसी को नहीं बताई।

     

    उसे डर था कि अगर घरवालों को पता चला तो उसकी खूब पिटाई होगी।

     

    लेकिन उसी दिन एक अजीब घटना हुई।

     

    मुन्ना के घर के बाहर भी वही निशान बना था।

     

    फिर छोटू के दरवाजे पर भी।

     

    और कालू के घर की पिछली दीवार पर भी।

     

    चारों दोस्त दोपहर में गाँव के पुराने पीपल के पेड़ के नीचे मिले।

     

    मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

     

    “ये हमारे घरों तक कैसे आया?”

     

    रघु चुप था।

     

    छोटू बोला—

     

    “हमें गाँव के पंडित जी के पास जाना चाहिए।”

     

    चारों पंडित हरिदास के घर पहुँचे।

     

    पंडित जी गाँव के सबसे बुजुर्ग लोगों में से एक थे। उन्होंने चारों की बात ध्यान से सुनी और फिर कुछ देर चुप रहे।

     

    “तुम लोग श्मशान के पेड़ के पास गए थे?”

     

    रघु ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    पंडित जी ने गहरी साँस ली।

     

    “मैंने तुम्हारे दादा-दादियों को भी इस पेड़ की कहानी बताते सुना था। लेकिन उस पेड़ का रहस्य आज तक किसी ने नहीं जाना।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “कौन थी वो औरत?”

     

    पंडित जी ने कहा—

     

    “उसका नाम गौरी था।”

     

    फिर उन्होंने एक पुरानी कहानी सुनानी शुरू की।

     

    करीब पचास साल पहले गौरी इसी गाँव में रहती थी। वह बहुत गरीब परिवार की लड़की थी। उसकी शादी गाँव के ही एक आदमी से हुई थी, जिसका नाम भैरव था।

     

    भैरव बहुत लालची और क्रूर आदमी था।

     

    गौरी के पिता ने शादी में अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया था, लेकिन भैरव की लालच खत्म नहीं हुई।

     

    एक दिन उसने गौरी के पिता से और पैसे माँगे।

     

    पैसे नहीं मिले।

     

    कुछ दिनों बाद गौरी अचानक गायब हो गई।

     

    गाँव में खबर फैली कि वह अपने मायके चली गई है।

     

    लेकिन उसके पिता को विश्वास नहीं हुआ।

     

    उन्होंने कई दिनों तक उसे खोजा।

     

    एक रात उन्हें श्मशान के पास गौरी की चप्पल मिली।

     

    अगले दिन भैरव भी गाँव से गायब हो गया।

     

    किसी को कुछ समझ नहीं आया।

     

    कई साल बाद श्मशान के पास खुदाई के दौरान कुछ हड्डियाँ मिलीं।

     

    लेकिन यह साबित नहीं हो पाया कि वे गौरी की थीं।

     

    पंडित जी बोले—

     

    “लोगों का मानना है कि गौरी को उसी बरगद के नीचे मार दिया गया था।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “लेकिन वह हमें क्यों डरा रही है?”

     

    पंडित जी ने उसकी ओर गंभीर नजरों से देखा।

     

    “शायद इसलिए क्योंकि उसके साथ जो हुआ, उसका सच अभी भी दबा हुआ है।”

     

    चारों लड़के एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    उस रात रघु के घर फिर अजीब घटना हुई।

     

    रात करीब दो बजे उसकी खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    ठंडी हवा कमरे में भर गई।

     

    रघु की आँख खुली।

     

    उसे लगा कि कमरे के कोने में कोई खड़ा है।

     

    वही सफेद साड़ी।

     

    लंबे बाल।

     

    रघु ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    वह आकृति धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    फिर उसके कान में आवाज आई—

     

    “सच… पेड़ के नीचे…”

     

    और वह गायब हो गई।

     

    सुबह रघु ने यह बात मुन्ना को बताई।

     

    दोनों ने तय किया कि उन्हें श्मशान जाकर देखना होगा।

     

    इस बार वे दिन में गए।

     

    पेड़ के पास उन्हें जमीन पर एक पुरानी लोहे की अंगूठी मिली।

     

    अंगूठी पर एक नाम खुदा था—

     

    “भैरव”

     

    रघु के हाथ काँपने लगे।

     

    उन्होंने पेड़ के आसपास जमीन को ध्यान से देखा।

     

    एक जगह मिट्टी बाकी जमीन से अलग थी।

     

    उन्होंने वहाँ खुदाई शुरू की।

     

    कुछ ही देर में फावड़ा किसी लोहे की चीज से टकराया।

     

    खनन!

     

    मिट्टी हटाई गई।

     

    नीचे एक पुराना लकड़ी का संदूक था।

     

    संदूक पर जंग लगा ताला लगा था।

     

    रघु ने ताला तोड़ा।

     

    अंदर एक पुरानी साड़ी, कुछ चूड़ियाँ और एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी थी।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “गौरी की आखिरी बातें।”

     

    रघु ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी में लिखा था कि भैरव गौरी को मारने की धमकी देता था।

     

    गौरी ने अपनी एक सहेली को बताया था कि भैरव ने गाँव के साहूकार से कर्ज लिया था और उस कर्ज को चुकाने के लिए वह गौरी के पिता से पैसे मांग रहा था।

     

    आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मुझे कुछ हो जाए तो समझ लेना, मुझे श्मशान वाले बरगद के पास ले जाया गया है।”

     

    चारों लड़के डर गए।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    वे पलटे।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर पेड़ की शाखा से एक लाल कपड़ा नीचे गिरा।

     

    रघु ने कपड़ा उठाया।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में गौरी खड़ी थी।

     

    और उसके पीछे भैरव था।

     

    लेकिन तस्वीर का सबसे डरावना हिस्सा यह था कि गौरी के चेहरे पर लाल स्याही से एक बड़ा निशान बना था।

     

    उसी हाथ के निशान जैसा…

     

    जो उनके घरों पर बना था।

     

    अचानक मुन्ना चिल्लाया—

     

    “रघु! पीछे देख!”

     

    पेड़ के पीछे सफेद साड़ी वाली वही औरत खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    उसकी आँखों से खून बह रहा था।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ पेड़ की तरफ उठाया।

     

    और फिर जमीन की ओर इशारा किया।

     

    रघु समझ गया।

     

    “उसे कुछ और दिखाना है।”

     

    चारों ने उस जगह खुदाई शुरू कर दी।

     

    कुछ गहराई पर उन्हें इंसानी हड्डियाँ मिलीं।

     

    साथ में एक टूटी हुई चूड़ी थी।

     

    पंडित जी को बुलाया गया।

     

    उन्होंने हड्डियों को देखकर कहा—

     

    “ये शायद गौरी की हैं।”

     

    लेकिन तभी गाँव का एक बूढ़ा आदमी आगे आया।

     

    उसका नाम था रामसेवक।

     

    उसने हड्डियों को देखते ही अपना चेहरा छिपा लिया।

     

    रघु ने पूछा—

     

    “काका, आप कुछ जानते हैं?”

     

    रामसेवक की आँखों में डर था।

     

    वह बोला—

     

    “हाँ… मैं जानता हूँ।”

     

    सब उसकी ओर देखने लगे।

     

    रामसेवक ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “गौरी को भैरव ने नहीं मारा था…”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “तो किसने?”

     

    रामसेवक ने चारों तरफ देखा।

     

    फिर धीमे से बोला—

     

    “उसे गाँव के तीन लोगों ने मिलकर मारा था।”

     

    “कौन लोग?”

     

    रामसेवक कुछ बोल पाता, उससे पहले श्मशान के पेड़ से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    हवा तेज हो गई।

     

    पेड़ की सारी शाखाएँ एक साथ हिलने लगीं।

     

    और जमीन पर मिट्टी से अपने आप तीन शब्द लिखे गए—

     

    “नाम बताओ…”

     

    रामसेवक डर के मारे जमीन पर बैठ गया।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं सब बताऊँगा… लेकिन पहले मुझे अपने पाप का प्रायश्चित करना होगा।”

     

    रघु ने पूछा—

     

    “आप उन लोगों में से एक थे?”

     

    रामसेवक की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उसने सिर झुका दिया।

     

    “हाँ।”

     

    उसी क्षण पेड़ के पीछे से गौरी की आवाज आई—

     

    “सच… सबको सच बताओ…”

  • 😱 श्मशान का पेड़ 😱 (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव बरवा में चारों तरफ खेत, आम के बाग और कच्ची पगडंडियाँ थीं। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना श्मशान घाट था। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची घास उगी रहती थी और पास में एक सूखी नदी बहती थी, जिसमें साल के ज्यादातर दिनों में सिर्फ थोड़ा-सा पानी रहता था।

     

    लेकिन उस श्मशान घाट की सबसे डरावनी चीज थी—वहाँ खड़ा एक विशाल बरगद का पेड़।

     

    गाँव के लोग उसे “श्मशान का पेड़” कहते थे।

     

    पेड़ इतना पुराना था कि उसकी जड़ें जमीन से बाहर निकलकर साँपों की तरह दूर-दूर तक फैली थीं। उसकी मोटी शाखाएँ पूरे श्मशान घाट पर इस तरह फैली थीं, जैसे कोई विशालकाय हाथ आसमान को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।

     

    गाँव में उस पेड़ को लेकर तरह-तरह की कहानियाँ मशहूर थीं।

     

    बुजुर्ग कहते थे कि करीब पचास साल पहले एक औरत की उसी पेड़ के नीचे मौत हुई थी। किसी ने कहा कि उसने आत्महत्या की थी, तो किसी का कहना था कि उसकी हत्या हुई थी। लेकिन उसकी मौत का सच कभी सामने नहीं आया।

     

    उसके बाद से रात में पेड़ के पास से गुजरने वाले लोगों को किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई देती थी।

     

    “हाय… मुझे बचा लो…”

     

    गाँव के बुजुर्ग हमेशा बच्चों को समझाते थे—

     

    “सूरज डूबने के बाद श्मशान की तरफ मत जाना।”

     

    लेकिन गाँव का एक लड़का था—रघु।

     

    रघु की उम्र लगभग सत्रह साल थी। वह बहुत निडर था और गाँव के लड़कों में सबसे ज्यादा शरारती भी। उसे भूत-प्रेत की कहानियों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।

     

    उसके तीन दोस्त थे—मुन्ना, छोटू और कालू।

     

    एक दिन शाम को चारों लड़के गाँव के बाहर क्रिकेट खेल रहे थे। तभी मुन्ना ने कहा—

     

    “रघु, आज रात तू हमारे साथ श्मशान वाले पेड़ तक चलकर दिखा।”

     

    रघु हँस पड़ा।

     

    “इसमें कौन-सी बड़ी बात है?”

     

    छोटू बोला, “सुना है, जो उस पेड़ को आधी रात में छू ले, उसके पीछे कोई आत्मा घर तक आती है।”

     

    रघु ने मजाक उड़ाते हुए कहा—

     

    “अरे, तुम लोगों ने भूत देखा भी है कभी?”

     

    कालू ने धीरे से कहा—

     

    “मेरे चाचा ने देखा था।”

     

    “क्या देखा था?”

     

    “एक औरत… सफेद साड़ी में। उसका चेहरा नहीं था।”

     

    तीनों लड़के कुछ पल के लिए चुप हो गए।

     

    रघु ने हँसते हुए कहा—

     

    “आज रात मैं उस पेड़ को छूकर वापस आऊँगा। अगर भूत मिला तो उसे भी क्रिकेट खिलाऊँगा।”

     

    चारों ने तय कर लिया कि रात को करीब ग्यारह बजे वे श्मशान जाएँगे।

     

    रात हुई।

     

    गाँव में धीरे-धीरे सन्नाटा फैलने लगा। घरों के दरवाजे बंद हो गए। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। आसमान में बादल थे और चाँद कभी दिखाई देता, कभी बादलों के पीछे छिप जाता।

     

    रघु अपने घर से चुपचाप निकला।

     

    उसके हाथ में एक टॉर्च थी।

     

    मुन्ना, छोटू और कालू पहले से ही गाँव के बाहर उसका इंतजार कर रहे थे।

     

    चारों धीरे-धीरे श्मशान की ओर चल पड़े।

     

    जैसे-जैसे वे श्मशान के पास पहुँचे, हवा ठंडी होती गई।

     

    पेड़ों के पत्ते बिना हवा के ही हिलने लगे।

     

    छोटू ने डरते हुए पूछा—

     

    “रघु… वापस चलें?”

     

    रघु ने कहा—

     

    “डरपोक मत बन।”

     

    कुछ दूर जाने के बाद श्मशान का विशाल बरगद दिखाई देने लगा।

     

    टॉर्च की रोशनी उसकी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाओं पर पड़ी तो ऐसा लगा जैसे पेड़ की शाखाएँ किसी बूढ़े आदमी की उंगलियाँ हों।

     

    अचानक…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीन बार किसी चीज के जमीन पर गिरने की आवाज आई।

     

    चारों रुक गए।

     

    “ये आवाज कहाँ से आई?” मुन्ना ने फुसफुसाकर पूछा।

     

    रघु ने टॉर्च घुमाई।

     

    कुछ दिखाई नहीं दिया।

     

    फिर अचानक दूर से किसी औरत के रोने की आवाज आई।

     

    “हूँ… हूँ… मुझे बचा लो…”

     

    छोटू का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “रघु… चल यहाँ से।”

     

    रघु ने खुद को संभालते हुए कहा—

     

    “किसी जानवर की आवाज होगी।”

     

    वह धीरे-धीरे पेड़ के पास पहुँचा।

     

    पेड़ के तने पर एक अजीब निशान बना था। वह निशान किसी हाथ जैसा था।

     

    रघु ने टॉर्च पास की।

     

    तभी उसे लगा कि पेड़ के पीछे कोई खड़ा है।

     

    सफेद कपड़े में एक औरत।

     

    रघु ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    कुछ नहीं था।

     

    वह पीछे हटा।

     

    तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “रघु…”

     

    रघु का शरीर जम गया।

     

    उसने तुरंत पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    “तुम लोगों ने मेरा नाम लिया?”

     

    मुन्ना ने काँपते हुए कहा—

     

    “नहीं…”

     

    “मैंने भी नहीं,” छोटू बोला।

     

    कालू तो बोल ही नहीं पा रहा था।

     

    तभी पेड़ की सबसे ऊँची शाखा से एक सूखी टहनी टूटकर जमीन पर गिरी।

     

    रघु ने हिम्मत करके पेड़ के तने को छू लिया।

     

    उसी क्षण टॉर्च बंद हो गई।

     

    चारों तरफ घना अंधेरा छा गया।

     

    और फिर…

     

    किसी औरत की जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    “भागोऽऽऽ!”

     

    चारों लड़के चीखते हुए गाँव की ओर भागे।

     

    रघु सबसे आगे था।

     

    लेकिन दौड़ते समय उसे ऐसा महसूस हुआ कि कोई उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा है।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    अंधेरे में एक सफेद साड़ी पहने औरत खड़ी थी।

     

    उसके लंबे बाल जमीन तक लटक रहे थे।

     

    रघु की सांस रुक गई।

     

    वह औरत धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगी।

     

    लेकिन उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    सिर्फ दो चमकती हुई आँखें थीं।

     

    रघु ने आँखें बंद कीं और पूरी ताकत से गाँव की तरफ भागा।

     

    घर पहुँचने के बाद उसने दरवाजा बंद किया और चारपाई पर गिर पड़ा।

     

    उस रात उसे नींद नहीं आई।

     

    सुबह जब वह उठा तो उसके कमरे की दीवार पर मिट्टी से एक निशान बना था।

     

    वही निशान…

     

    जो श्मशान के पेड़ पर बना था।

     

    और उसके नीचे लिखा था—

     

    “तुमने मुझे देखा है… अब मैं तुम्हें देखती रहूँगी।”

  • राजा जनक की अनदेखी कहानी

    राजा जनक की अनदेखी कहानी

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

    मिथिला की अग्नि परीक्षा: जब राजमहल जल रहा था

    यह उन दिनों की बात है जब मिथिलापुरी ज्ञान, कला और समृद्धि के शिखर पर थी। राजा जनक, जिन्हें ‘विदेह’ कहा जाता था, वे राज्य के सिंहासन पर तो बैठते थे, राजकाज भी पूरी कुशलता से करते थे, लेकिन भीतर से वे संसार के सभी मोह-माया से पूरी तरह मुक्त थे। उनका मानना था कि वे केवल एक निमित्त मात्र हैं, सब कुछ परमात्मा का है।

     

    एक दिन, राजा जनक अपनी विशाल राजसभा में बैठे थे। विद्वान शास्त्रों पर चर्चा कर रहे थे और संगीत का वातावरण था। तभी, राजद्वार पर एक सैनिक हाँफता हुआ आया। उसने घबराते हुए सूचना दी, “महाराज! क्षमा करें… नगर के दूसरे छोर पर भीषण आग लग गई है। तेज़ हवा के कारण आग तेज़ी से राजमहल की ओर बढ़ रही है।”

     

    पूरी सभा में हड़कंप मच गया। मंत्री और दरबारी चिंता में पड़ गए। स्वयं महारानी सुनयना भी घबराकर राजा जनक की ओर देखने लगीं। राजमहल में शाही खज़ाना, कीमती रत्न, महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और अनगिनत कलाकृतियाँ थीं।

    लेकिन, राजा जनक के चेहरे पर रत्ती भर भी शिकन नहीं आई। वे शांत बैठे रहे और उन्होंने संगीत रुकवाने से भी मना कर दिया।

     

    कुछ देर बाद, एक मंत्री ने अधीर होकर कहा, “महाराज! आग राजमहल के बहुत निकट आ चुकी है। कृपया आदेश दें, सेवक खज़ाने और राजसी वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना शुरू करें। यदि विलंब हुआ, तो सब कुछ भस्म हो जाएगा।”

    राजा जनक ने बहुत मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया, “मंत्रीवर, आप लोग व्यर्थ ही चिंता कर रहे हैं। मेरी मिथिलापुरी में जो कुछ भी है, वह सब प्रजा का है और ईश्वर की कृपा से है।”

     

    उन्होंने आगे कहा, “मैं ‘विदेह’ हूँ। मेरा अपना कुछ भी नहीं है, जो जलने का भय हो। यदि यह राजमहल प्रारब्ध वश जल रहा है, तो इसे जलने दो। मैं अपनी मानसिक शांति को इस भौतिक संपत्ति के नष्ट होने के डर से अशांत नहीं होने दूँगा।”

    दरबारी अवाक रह गए। वे राजा की इस विरक्ति को देखकर हैरान थे। आग की लपटें अब राजमहल की खिड़कियों से दिखने लगी थीं। धुएँ से पूरा दरबार भर गया था। लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे।

     

    उसी क्षण, एक और चमत्कार हुआ। जैसे ही आग की लपटें उस कक्ष के दरवाज़े तक पहुँचीं जहाँ राजा जनक बैठे थे, हवा की दिशा अचानक बदल गई। देखते ही देखते, राजमहल के चारों ओर की आग बुझने लगी और धीरे-धीरे शांत हो गई।

     

    राजमहल का वह हिस्सा, जहाँ राजा जनक अपनी सभा के साथ पूर्ण स्थिरता और शांति से बैठे थे, पूरी तरह सुरक्षित बच गया। बाकी नगर में भी जहाँ-जहाँ भक्तों ने ईश्वर का नाम लिया, वहाँ आग ने कम क्षति पहुँचाई।

    जब धुआँ छँटा, तो सबने देखा कि राजा जनक उसी भाव-विभोर अवस्था में बैठे हैं। उन्हें आग के ताप का तनिक भी अनुभव नहीं हुआ था।

     

    यह घटना पूरे राज्य में फैल गई। प्रजा ने इसे कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि राजा जनक के सत्य और आत्म-ज्ञान की शक्ति का परिणाम माना।

     

    इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि राजा जनक सचमुच ‘विदेह’ थे—वे शरीर में रहते हुए भी शरीर के प्रति आसक्त नहीं थे, और राजमहल के स्वामी होते हुए भी उसके मोह में नहीं फँसे थे। उनका यही निस्वार्थ और अनासक्त भाव उनकी

    सबसे बड़ी शक्ति थी।

  • मीरा बाई विवाह की एक अनकही कहानी

    मीरा बाई विवाह की एक अनकही कहानी

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

     

     

    इतिहास के पन्नों में जब भी प्रेम और समर्पण की बात आती है, तो राधा के बाद सबसे पहला और प्रखर नाम मीराबाई का आता है। मीरा केवल एक रानी नहीं थीं, वे एक ऐसी विद्रोहिणी थीं जिन्होंने समाज की रूढ़ियों को तोड़कर अपने आराध्य को ही अपना सब कुछ मान लिया था। उनका जीवन एक राजसी महल से शुरू होकर वृंदावन की गलियों और द्वारका के रणछोड़ मंदिर तक की एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा है।

     

    इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वह विवाह था, जिसने एक ओर उन्हें मेवाड़ के राजघराने की बहू बनाया, और दूसरी ओर उनके और उनके गिरधर गोपाल के बीच की दूरी को और कम कर दिया। यह कहानी सिर्फ दो लोगों के मिलने की नहीं, बल्कि एक आत्मा के परमात्मा से विवाह की प्रस्तावना है।

     

     

    कहानी शुरू होती है राजस्थान के पाली जिले में स्थित छोटे से गाँव कुड़की से, जहाँ वि.सं. 1555 (लगभग 1498 ई.) में मीरा का जन्म हुआ। उनके पिता राव रतन सिंह थे, जो मेड़ता के शासक राव दूदा के पुत्र थे। मीरा अभी बहुत छोटी थीं जब उनकी माँ का देहांत हो गया। इसलिए, उनका लालन-पालन उनके दादा राव दूदा के संरक्षण में मेड़ता के किले में हुआ।

    राव दूदा एक अत्यंत धार्मिक और वीर पुरुष थे। मेड़ता का माहौल भक्तिमय था। घर में संतों का आना-जाना था, भजन-कीर्तन होते थे। बचपन से ही मीरा ने इन सब को अपनी आँखों में और अपने हृदय में उतारा।

     

    एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब मीरा बहुत छोटी थीं, एक बार उनके घर में कोई साधु आए। उनके पास एक बहुत सुंदर कृष्ण की मूर्ति थी। मीरा उस मूर्ति पर मोहित हो गईं। उन्होंने हठ पकड़ लिया कि वे उसी मूर्ति के साथ खेलेंगी और उसे ही अपना पति मानेंगी। साधु ने पहले तो बच्ची की नासमझी समझकर मना किया, लेकिन मीरा के दृढ़ प्रेम को देखकर वे पिघल गए और उन्होंने वह मूर्ति मीरा को दे दी।

     

    उस दिन से, वह छोटी सी कृष्ण की मूर्ति मीरा की सगी साथी बन गई। वे उसके साथ खेलतीं, उसे लाड़ लड़ातीं, उसे ही अपना सब कुछ मानतीं। यह बचपन का भोलापन कब एक गहरे, अटूट प्रेम में बदल गया, किसी को पता ही नहीं चला।

     

    समय बीतता गया और मीरा यौवन की देहरी पर कदम रखने लगीं। वे न केवल अत्यंत रूपवती थीं, बल्कि उनके सुसंस्कार और मधुर व्यवहार की चर्चा भी दूर-दूर तक थी। उस समय उत्तर भारत में राजपूतों की शक्ति को संगठित करने की आवश्यकता थी।

     

    मेवाड़ का सिसोदिया राजवंश उस समय राजपूताना में सबसे शक्तिशाली माना जाता था। मेवाड़ के महाराणा सांगा, जो एक पराक्रमी योद्धा थे, अपने बड़े पुत्र कुँवर भोजराज के लिए एक योग्य वधू की तलाश में थे। राव दूदा और महाराणा सांगा के बीच अच्छे संबंध थे। जब सांगा ने मीरा के रूप, गुण और कुल की ख्याति सुनी, तो उन्होंने मेड़ता में विवाह का प्रस्ताव भेजा।

     

    राजनीतिक दृष्टि से यह एक बहुत मजबूत गठबंधन था। मेड़ता के राठौड़ और चित्तौड़ के सिसोदिया—दोनों मिलकर दिल्ली के सुल्तानों और अन्य आक्रांताओं का बेहतर सामना कर सकते थे। राव दूदा ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

     

     

    जब मीरा को इस विवाह के बारे में पता चला, तो उनके कोमल हृदय पर जैसे वज्र गिर गया। वे तो पहले ही अपना मन, अपना तन, अपना सर्वस्व गिरधर गोपाल को समर्पित कर चुकी थीं। उनके लिए किसी अन्य पुरुष के बारे में सोचना भी पाप था।

     

    लेकिन, उस समय की राजपूती परंपराओं में लड़कियों के पास अपने विवाह के निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं था। वे अपने पिता और कुल की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकती थीं। मीरा एक गहरे अंतर्द्वंद्व (Dilemma) में फँस गईं। एक ओर कर्तव्य की बेड़ियाँ थीं, और दूसरी ओर प्रेम की पुकार।

     

    कहा जाता है कि मीरा ने अपनी कुलदेवी की पूजा की और अपने इष्टदेव कृष्ण से प्रार्थना की। उन्होंने इस रिश्ते को स्वीकार तो किया, लेकिन एक शर्त के साथ—कि वे अपनी कृष्ण मूर्ति को हमेशा अपने साथ रखेंगी और उनकी पूजा-अर्चना में कोई बाधा नहीं डाली जाएगी।

     

     

    मेड़ता में विवाह की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हो गईं। वि.सं. 1573 (लगभग 1516 ई.) में मीरा का विवाह मेवाड़ के युवराज कुँवर भोजराज के साथ अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ। यह विवाह पूरे राजपूताना में चर्चा का विषय था।

    बारात चित्तौड़गढ़ से आई थी, जो अपनी वीरता और भव्यता के लिए प्रसिद्ध था। मीरा को राजसी आभूषणों से सजाया गया। वे एक अप्सरा जैसी लग रही थीं, लेकिन उनके चेहरे पर वह स्वाभाविक खुशी नहीं थी जो एक दुल्हन के चेहरे पर होनी चाहिए। उनकी आँखों में अपने आराध्य से बिछड़ने का डर और एक अज्ञात भविष्य के प्रति चिंता थी।

    विदाई का समय आया। मीरा की डोली जब मेड़ता के किले से निकली, तो पूरा मेड़ता भावुक हो गया। राव दूदा ने अपनी लाड़ली पोती को वह कृष्ण मूर्ति उपहार में दी, जिसे वह बचपन से पूजती आ रही थीं। यह मूर्ति ही अब मीरा का एकमात्र संबल थी।

     

     

    मीराबाई अब मेवाड़ की वधू बनकर चित्तौड़गढ़ पहुँचीं, जो अरावली की पहाड़ियों पर बना एक अभेद्य दुर्ग है। यह दुर्ग वीरता की कहानियों और जौहर की ज्वालाओं का साक्षी रहा है। मीरा का यहाँ भव्य स्वागत किया गया।

    कुँवर भोजराज एक वीर योद्धा थे और वे मीरा के प्रति बहुत संवेदनशील और उदार थे। उन्होंने मीरा की भावनाओं को समझा। इतिहासकार बताते हैं कि भोजराज ने मीरा की पूजा के लिए महल में एक अलग मंदिर बनवाया, जिसे आज भी मीरा मंदिर के नाम से जाना जाता है (जो कुंभ श्याम मंदिर के परिसर में है)।

     

    शुरुआत में, मीरा ने एक आदर्श बहू और पत्नी की भूमिका निभाने की पूरी कोशिश की। उन्होंने राजघराने की सभी रीतियों का पालन किया। लेकिन उनका मन राजकाज या सांसारिक सुखों में नहीं लगता था। जैसे ही उन्हें समय मिलता, वे अपने मंदिर में चली जातीं और घंटों कृष्ण की भक्ति में लीन रहतीं।

     

    मीरा का जीवन जितना बाहर से शांत और भव्य था, अंदर से उतना ही अशांत और चुनौतियों भरा था। राजघराने की परंपराएँ कठोर थीं और पर्दा प्रथा का कड़ाई से पालन होता था। एक महारानी का मंदिरों में जाना, साधु-संतों के साथ बैठना और भजन गाना—यह सब राज परिवार की मर्यादा के विरुद्ध माना जाता था।

     

    मीरा की सास, महाराणा सांगा की पत्नी (कुँवर भोजराज की माता), इस बात से बहुत खफा थीं। उन्हें लगता था कि मीरा का यह व्यवहार उनके कुल की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रहा है। वे मीरा को ताने देतीं और उन्हें रोकने का प्रयास करतीं।

    मीरा की ननद, उदयसिंह की बहन (कुछ स्रोतों के अनुसार कुँवरबाई), भी अक्सर मीरा की आलोचना करती थीं। वे मीरा पर व्यंग्य कसतीं कि उन्होंने लोक-लाज त्याग दी है। मीरा के लिए इन तानों को सहना बहुत कठिन था, लेकिन वे सब कुछ सहती रहीं। उनका उत्तर केवल उनके प्रेमपूर्ण भजन थे।

     

    इन्हीं कठिन परिस्थितियों में मीरा की कविताओं और भजनों का जन्म हुआ। उनके शब्द उनके हृदय की गहराई से निकलते थे। उन्होंने राजस्थानी, ब्रज और गुजराती मिश्रित भाषा में हजारों पद रचे, जिन्हें ‘मीरा पदावली’ के नाम से जाना जाता है।

     

    उनके भजनों में दो धाराएँ थीं—एक तरफ गहरी विरह वेदना (Separation Pain) थी, जिसमें वे अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने के लिए तड़पती थीं। वे खुद को एक ‘बिरहिन’ मानती थीं। दूसरी तरफ, उस मिलन की खुशी और उस अद्वैत प्रेम का वर्णन था, जहाँ आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं।

     

    “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो…”

    “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई…”

    ये भजन आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। उस समय इन भजनों ने पूरे समाज में एक नई चेतना जगा दी। वे राजमहल की चारदीवारी से बाहर निकलकर आम लोगों के दिलों पर छाने लगीं।

     

    मीरा के विवाह के कुछ ही वर्ष बीते थे (लगभग 1521 ई. में), जब मेवाड़ पर एक और विपत्ति आ गई। दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ हुए खातोली के युद्ध में कुँवर भोजराज घायल हो गए और बाद में उनका देहांत हो गया।

    मीरा अभी बहुत युवा थीं और इस घटना ने उन्हें पूरी तरह तोड़कर रख दिया। सांसारिक दृष्टि से, उनका पति, उनका सहारा और उनका रक्षक अब इस दुनिया में नहीं था। राजपूती परंपरा के अनुसार, उस समय सती प्रथा का प्रचलन था, लेकिन मीरा ने सती होने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे तो पहले ही गिरधर गोपाल को अपना पति मान चुकी हैं और वे उन्हीं की ‘सती’ हैं।

     

    भोजराज के निधन के बाद, मीरा का जीवन और भी कठिन हो गया। ससुराल में अब उनके पास कोई ऐसा नहीं था जो उनकी समझ रखता हो। उनका देवर, महाराणा विक्रमादित्य, जो अब गद्दी पर बैठा था, वह और भी रूढ़िवादी और क्रूर था।

     

    महाराणा विक्रमादित्य को मीरा का साधु-संतों के साथ उठना-बैठना और राजघराने की मर्यादा का उल्लंघन करना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने कई बार मीरा को मारने का प्रयास किया।

     

    सबसे प्रसिद्ध कथा विष के प्याले की है। महाराणा ने एक विष का प्याला मीरा के पास भेजा और कहलाया कि यह अमृत है, जिसे पीकर आपको प्रभु का आशीर्वाद मिलेगा। मीरा जानती थीं कि इसमें विष है, लेकिन उन्होंने बिना किसी डर या संकोच के, “कृष्णार्पण” कहकर उस विष को पी लिया।

     

    जनश्रुति है कि प्रभु की कृपा से वह विष मीरा के लिए अमृत बन गया और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा।

    दूसरी कथा में, महाराणा ने मीरा के कमरे में एक फूलों की टोकरी में एक जहरीला काला नाग (कोबरा) रखवाया और उनसे कहा कि इसमें शालिग्राम (विष्णु का प्रतीक पत्थर) हैं। जब मीरा ने टोकरी खोली, तो सचमुच वह नाग एक सुंदर शालिग्राम में बदल गया।

     

    इन चमत्कारों ने लोगों के मन में मीरा के प्रति श्रद्धा और बढ़ा दी। वे अब केवल एक विधवा राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि एक साक्षात् संत और देवी मानी जाने लगीं।

     

    दिन-प्रतिदिन के अत्याचारों और राजघराने की घुटन भरी ज़िंदगी से तंग आकर, मीरा ने चित्तौड़ छोड़ने का निर्णय लिया। वे अब समझ चुकी थीं कि उनकी असली दुनिया चित्तौड़ का राजमहल नहीं, बल्कि उनके गिरधर गोपाल की सेवा है।

     

    उन्होंने एक अंतिम पद गाया, जिसमें उन्होंने अपनी विवशता और अपने निर्णय को स्पष्ट किया:

    “राणा जी, म्हाँने या बदनामी लागे प्यारी।

    सूली ऊपर सेज हमारी, सोवन किस विधि होय?

    गगन ऊपर मंदिर हमारा, तहाँ बसै प्रभु मोय।”

    (अर्थात्: हे राणा, मुझे यह सांसारिक बदनामी अब प्यारी लगने लगी है क्योंकि यह मुझे मेरे प्रभु के करीब लाती है। काँटों की सेज पर मैं कैसे सोऊँ? मेरा मंदिर तो गगन के ऊपर है, जहाँ मेरे प्रभु निवास करते हैं।)

    कहा जाता है कि मीरा चित्तौड़ से निकलकर पहले मेड़ता गई, और फिर वहाँ से वृंदावन की पवित्र भूमि की ओर प्रस्थान कर गईं। वे अब एक साधारण जोगन थीं, जिनके हाथों में एकतारा था और मुँह पर कृष्ण का नाम।

     

    वृंदावन, जो कृष्ण की बाल लीलाओं का साक्षी है, वहाँ पहुँचकर मीरा को परम शांति मिली। उन्होंने खुद को पूरी तरह भक्ति में लीन कर दिया।

    यहाँ एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना का उल्लेख मिलता है। उस समय वृंदावन में गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का बहुत प्रभाव था, जिसके प्रमुख संत रूप गोस्वामी थे। रूप गोस्वामी ने नियम बना रखा था कि वे किसी भी स्त्री से नहीं मिलेंगे।

    जब उन्हें पता चला कि मेवाड़ की महारानी मीराबाई उनसे मिलने आई हैं, तो उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया। इस पर मीरा ने एक बहुत ही मार्मिक संदेश भेजा:

    “मैं जानती थी कि वृंदावन में केवल एक ही पुरुष (कृष्ण) है, और बाकी सब गोपियाँ हैं। आज मुझे पता चला कि यहाँ रूप गोस्वामी भी एक पुरुष हैं।”

     

    इस संदेश ने रूप गोस्वामी को हिला दिया। वे अपनी गलती समझ गए और तुरंत मीरा से मिलने दौड़े। उन्होंने मीरा के चरणों में गिरकर उनसे क्षमा माँगी और उन्हें अपना शिष्य बना लिया।

     

    वृंदावन में कुछ समय बिताने के बाद, मीरा को लगा कि अभी भी उनकी यात्रा पूरी नहीं हुई है। वे वहाँ से द्वारका (गुजरात) के लिए चल पड़ीं, जो कृष्ण की कर्मभूमि और अंतिम विश्राम स्थल है।

     

    द्वारका में, वे रणछोड़ दास (कृष्ण) के मंदिर में रहने लगीं। उन्होंने अपना पूरा समय भजन-कीर्तन और पूजा में बिताया। उनका स्वास्थ्य अब गिरने लगा था, क्योंकि उन्होंने शरीर की बहुत उपेक्षा की थी। वे अत्यंत कमजोर हो गई थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक दिव्य चमक थी।

     

    मीराबाई के जीवन का अंतिम क्षण इतिहास और आस्था का एक अद्भुत संगम है। कहा जाता है कि वि.सं. 1603 (लगभग 1546 ई.) में एक दिन, मीरा मंदिर में गर्भगृह के सामने खड़ी होकर भावविभोर होकर गा रही थीं।

    “म्हाँने चाकर राखो जी, गिरधर लाला चाकर राखो जी…”

    गाते-गाते वे इतनी तल्लीन हो गईं कि ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वे मूर्ति की ओर खिंची चली जा रही हैं। मंदिर के कपाट बंद थे। जब पुजारियों ने कपाट खोले, तो देखा कि मीराबाई अपनी देह में नहीं थीं, बल्कि उनकी साड़ी का एक हिस्सा उस कृष्ण मूर्ति के चरणों से लिपटा हुआ था।

     

    मीराबाई अपने प्रियतम गिरधर गोपाल में समा चुकी थीं। आत्मा परमात्मा से पूर्णतया एक हो गई थी।

    उपसंहार: विवाह जो विच्छेद नहीं, मिलन बना

    मीराबाई का विवाह कुँवर भोजराज के साथ हुआ था, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। लेकिन उनका असली विवाह उस दिन हो गया था, जिस दिन उन्होंने बचपन में वह कृष्ण मूर्ति अपने हाथों में ली थी।

     

    भोजराज के साथ उनका विवाह एक सामाजिक समझौता था, जिसे उन्होंने एक कर्तव्य के रूप में निभाया। लेकिन उनका हृदय, उनकी आत्मा और उनका समर्पण केवल कृष्ण के लिए था।

     

    ससुराल की प्रताड़ना, विष के प्याले और राजसी सुखों का त्याग—इन सबने मिलकर एक साधारण राजकुमारी को एक अमर संत बना दिया। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं, समर्पण है। मीराबाई आज भी हमारे बीच मौजूद हैं—उनके भजनों में, उनकी कविताओं में और उन लाखों लोगों की आस्था में जो प्रेम और भक्ति की शक्ति में विश्वास करते हैं।

     

     

    उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा विवाह दो शरीरों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन होता है, जिसे मृत्यु भी अलग नहीं कर सकती।

  • नीले समंदर का रहस्य

    नीले समंदर का रहस्य

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     

    धरती का दो-तिहाई हिस्सा नीले पानी से घिरा हुआ है। इस अनंत, गहरे और रहस्यमयी समंदर के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसके बारे में इंसानों ने केवल कहानियों और कल्पनाओं में ही सुना है। यह जल-परियों (Mermaids) और जलीय जीवों का साम्राज्य था, जिसे ‘अटलांटिस का उपवन’ या स्थानीय भाषा में ‘जल-लोक’ कहा जाता था।

    इस जल-लोक के पानी के भीतर सूरज की किरणें जब छनकर पहुँचती थीं, तो चारों तरफ मोतियों और हीरों जैसी चमक फैल जाती थी। यहाँ पानी के बड़े-बड़े महल थे जो मूँगों (Coral reefs) और रंग-बिरंगे पत्थरों से बने थे। इस जादुई दुनिया की सबसे खास बात यह थी कि यहाँ के जीव-जंतु इंसान की तरह बातें कर सकते थे, और जल-परियाँ अपने खूबसूरत संगीत से पूरे समंदर को महका देती थीं।

    इसी जल-लोक में एक बहुत ही प्यारी, नटखट और जिज्ञासु जल-परी रहती थी, जिसका नाम था मरीना। मरीना की उम्र लगभग पंद्रह वर्ष थी। उसके बाल सुनहरे और समुद्र की लहरों की तरह लंबे और लहराते हुए थे। उसकी पूँछ नीले और हरे रंग के चमकीले छिलकों से ढकी थी, जो पानी के भीतर इंद्रधनुषीय रंग बिखेरती थी।

     

    मरीना को बाकी परियों की तरह सिर्फ तैरना या सुंदर मोतियों से खेलना पसंद नहीं था। उसे हमेशा समंदर की सतह के ऊपर की दुनिया यानी ‘धरती’ के बारे में जानने की तीव्र उत्सुकता रहती थी। वह अक्सर चुपके से समंदर की सतह पर जाती और इंसानों के जहाजों, उड़ते हुए पक्षियों और आसमान में चमकते चाँद को निहारती रहती थी।

    जल-लोक के राजा, जो मरीना के पिता थे, ने हमेशा अपनी बेटियों को चेतावनी दी थी कि इंसानों की दुनिया बहुत खतरनाक और स्वार्थी है। वे मछलियाँ पकड़ते हैं, समंदर के पानी को गंदा करते हैं और अगर उन्होंने किसी जल-परी को देख लिया, तो वे उन्हें कैद कर सकते हैं। लेकिन मरीना का मासूम दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि जो लोग इतने सुंदर गीत गाते हैं और चमकीले शहर बसाते हैं, वे बुरे हो सकते हैं।

     

    एक शाम, जब समंदर शांत था और क्षितिज पर सूरज डूब रहा था, मरीना तैरती हुई बहुत ऊपर, पानी की सतह के करीब आ गई। उसने देखा कि कुछ दूरी पर एक बड़ी लकड़ी की नाव पर कुछ इंसान मजे से मछली पकड़ रहे थे और गिटार बजाकर गा रहे थे। मरीना उनके गीतों की धुन पर मंत्रमुग्ध होकर चट्टान के पीछे छिपकर उन्हें देखने लगी।

    तभी, अचानक मौसम का मिजाज बदल गया। आसमान में काले-काले बादल घिर आए, तेज ठंडी हवाएँ चलने लगीं और समंदर में भयानक लहरें उठने लगीं। वह कोई सामान्य हवा नहीं थी, बल्कि एक चक्रवात (Storm) था, जिसने कुछ ही पलों में विकराल रूप ले लिया।

     

    नाव पर सवार लोग चीखने-चिल्लाने लगे। एक बहुत बड़ी लहर आई और उसने उस छोटी सी नाव को पूरी तरह पलट दिया। नाव पर सवार सभी लोग पानी में डूबने लगे। उनमें से एक युवा लड़का, जिसकी उम्र लगभग सत्रह-अठारह वर्ष रही होगी, पानी में संघर्ष कर रहा था। उसका नाम आर्यन था। आर्यन तैरना जानता था, लेकिन सिर पर चोट लगने के कारण वह बेहोश होने लगा और धीरे-धीरे पानी की गहराई में डूबने लगा।

     

    मरीना का दिल यह सब देखकर पसीज गया। उसने अपने पिता की वह चेतावनी भुला दी कि “इंसानों से दूर रहना।” उसने बिना एक पल गंवाए अपनी ताकतवर पूँछ को फड़फड़ाया और सीधे उस डूबते हुए लड़के की तरफ तेजी से तैरी।

     

    मरीना ने पानी के भीतर ही आर्यन को अपनी बाहों में थामा। उसका शरीर भारी था, लेकिन मरीना की जल-परी वाली जादुई ताकतों ने उसे असीम ऊर्जा दी। उसने आर्यन को अपनी पीठ पर लादा और अपनी पूरी ताकत से समंदर के एक सुरक्षित और सुनसान किनारे (रेत के एक छोटे से टापू) की तरफ तैरने लगी।

     

    कुछ ही देर में, मरीना आर्यन को खींचते हुए एक शांत और सुरक्षित समुद्र तट पर ले आई। उसने आर्यन को धीरे से रेत पर लिटा दिया। आर्यन बेहोश था और उसके मुँह से पानी निकल रहा था। मरीना ने अपनी हथेलियों से उसके सीने को सहलाया और समंदर के जादुई पानी की कुछ बूंदें उसके होठों पर डालीं।

     

    कुछ ही पलों में आर्यन ने खाँसी के साथ अपनी आँखें खोलीं। उसने धुंधली आँखों से देखा कि उसके सामने एक बेहद खूबसूरत युवती बैठी है, जिसके बाल पानी में भीगे हुए थे और पैरों की जगह एक चमकदार नीली और हरी पूँछ थी। आर्यन को लगा कि शायद वह सपना देख रहा है या फिर उसे कोई भ्रम हो रहा है।

     

    आर्यन ने काँपते हुए स्वर में पूछा, “तुम… तुम कौन हो? क्या तुम कोई परी हो?”

    मरीना मुस्कुराई, लेकिन वह बोल नहीं सकती थी जब वह पानी से बाहर होती थी, क्योंकि जल-परियों की जुबान केवल पानी के भीतर ही काम करती है, या फिर जब वे अपनी जादुई शक्ति से इंसानी रूप लें। लेकिन उस वक्त मरीना के पास इतनी शक्ति नहीं थी। उसने अपने हाथों से इशारों में उसे सुरक्षित होने का भरोसा दिलाया।

     

    तभी दूर से कुछ लोगों के चिल्लाने की आवाज आई—”आर्यन! आर्यन! तुम कहाँ हो?” आर्यन के दोस्त और परिवार के लोग उसे ढूँढते हुए उसी तट की तरफ आ रहे थे।

    आर्यन ने मुड़कर देखा और जब वह वापस पलटा, तो चट्टान के पीछे केवल पानी में लहरों की हलचल दिखाई दे रही थी। मरीना पानी के अंदर वापस जा चुकी थी। उसके दिल में आर्यन के लिए एक अजीब सा अपनापन और कसक पैदा हो गई थी। वह समझ गई थी कि इंसानों की दुनिया से उसका यह पहला परिचय उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाला है।

     

    जब मरीना वापस जल-लोक पहुँची, तो उसका दिल बहुत बेचैन था। वह हर वक्त बस आर्यन के बारे में सोचती रहती थी। उसने अपनी इस बात का जिक्र अपनी सबसे करीबी सहेली जारा से किया। जारा ने उसे समझाया, “मरीना, यह बहुत खतरनाक है। इंसान और जल-परियों की दुनिया कभी एक नहीं हो सकती। अगर राजा को पता चला, तो वह बहुत क्रोधित होंगे।”

     

    लेकिन प्रेम और जिज्ञासा की भावना नियमों से बहुत बड़ी होती है। मरीना ने जल-लोक के सबसे पुराने और बुद्धिमान जीव—एक विशाल नीली व्हेल और प्राचीन कछुए ‘ओल्ड सेज’ से मदद माँगने का फैसला किया। वह उस प्राचीन गुफा में गई जहाँ समंदर का जादू निवास करता था।

     

    वहाँ उसने समंदर की देवी के सामने प्रार्थना की। उसकी सच्ची और निश्छल भावना को देखकर समंदर की देवी ने उसे एक विशेष वरदान दिया। देवी ने उसे एक जादुई मोती दिया और कहा, “मरीना, यह मोती तुम्हें केवल एक बार इंसान का रूप दे सकता है। जब तुम इस मोती को अपने दिल के पास रखोगी, तो तुम्हारी पूँछ पैरों में बदल जाएगी और तुम इंसानों की भाषा बोल सकोगी। लेकिन याद रखना, यह जादू केवल तीन दिनों के लिए रहेगा। अगर तीसरे दिन सूर्यास्त तक तुमने समुद्र का पानी नहीं छुआ, तो तुम हमेशा के लिए इंसान बन जाओगी और कभी वापस जल-लोक नहीं लौट पाओगी।”

     

    मरीना ने बिना किसी डर के उस जादुई मोती को स्वीकार कर लिया। उसे आर्यन से दोबारा मिलने और उसकी दुनिया को करीब से देखने का अवसर मिल गया था।

     

    अगली सुबह, जब सूरज की किरणें समंदर के तट पर पड़ीं, मरीना पानी के किनारे उथले हिस्से में आई। उसने उस जादुई मोती को अपने सीने से लगाया। एक तेज़ नीली रोशनी ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। जब रोशनी कम हुई, तो उसकी नीली पूँछ गायब हो चुकी थी और उसकी जगह इंसानों जैसे दो कोमल पैर आ गए थे। उसने एक खूबसूरत सूती गाउन पहन रखा था, जो समंदर के झाग जैसा सफेद था।

     

    मरीना ने पहली बार रेत पर अपने पैरों से कदम रखा। उसे चलना थोड़ा अजीब लग रहा था, लेकिन उसकी आँखों में चमक थी। वह सीधे उसी शहर की तरफ बढ़ी जिसके पास आर्यन रहता था। वह शहर समुद्र के किनारे बसा एक सुंदर और छोटा सा मछुआरों का गाँव था, जहाँ रंग-बिरंगे घर बने हुए थे।

     

    मरीना ने रास्ते में एक घर के बाहर बैठे एक बूढ़े आदमी से पूछा, “क्या आप आर्यन को जानते हैं?”

    बूढ़े आदमी ने अचरज से उसे देखा और कहा, “हाँ बेटा, आर्यन तो वही लड़का है जो कल समंदर के तूफान में डूबते-डूबते बचा था। वह सामने वाले नीले घर में रहता है।”

    मरीना तेजी से उस नीले घर की तरफ बढ़ी और दरवाजा खटखटाया। जब दरवाजा खुला, तो सामने खुद आर्यन खड़ा था। आर्यन ने जब उसे देखा, तो वह हैरान रह गया। उसे कल रात वाली घटना और वह जल-परी याद आ गई। उसने तुरंत पहचान लिया कि यह वही लड़की है जिसने उसकी जान बचाई थी, भले ही इस बार उसके पैर थे।

     

    आर्यन ने खुशी से कहा, “तुम! तुम वही हो ना? कल रात… समंदर किनारे… तुमने मेरी जान बचाई थी!”

    मरीना ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ आर्यन, मैं ही हूँ। मेरा नाम मरीना है।”

     

    अगले दो दिनों तक आर्यन ने मरीना को अपनी पूरी दुनिया दिखाई। उन्होंने गाँव के बाजारों का दौरा किया, फूलों के बागों में घूमे, और एक-दूसरे के साथ अपने जीवन की बातें साझा कीं। आर्यन को मरीना की हर बात में एक अनोखा सम्मोहन महसूस होता था। मरीना जब भी समंदर या हवाओं के बारे में बात करती, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ जाती थी। आर्यन को कब मरीना से प्यार हो गया, उसे खुद पता नहीं चला। मरीना का दिल भी आर्यन के प्यार में पूरी तरह डूब चुका था।

     

    लेकिन, इस प्रेम कहानी में खलल डालने के लिए एक शख्स तैयार बैठा था—गगन। गगन उस गाँव का सबसे चालाक और लालची मछुआरा था। कुछ दिन पहले जब समंदर में तूफान आया था, तो गगन ने दूर से देखा था कि एक अजीब सी परछाई (जल-परी) आर्यन को बचाकर बाहर ला रही है। गगन ने ठान लिया था कि वह उस रहस्यमयी जीव को पकड़कर राजा या बड़े वैज्ञानिकों को बेचेगा ताकि वह रातों-रात अमीर बन सके।

     

    गगन ने आर्यन पर नजर रखनी शुरू कर दी। उसने देखा कि आर्यन एक अजनबी लड़की के साथ घूम रहा है जिसके बारे में गाँव में किसी को कुछ नहीं पता। गगन को शक हुआ कि यह वही रहस्यमयी जल-परी है जिसने मानव रूप धारण कर लिया है।

     

    तीसरे दिन की शाम आ चुकी थी। सूर्यास्त होने में अब बस कुछ ही घंटे बाकी थे। मरीना को याद आया कि अगर वह समय पर समंदर में वापस नहीं गई, तो वह हमेशा के लिए इंसानी दुनिया में कैद हो जाएगी और कभी अपने परिवार से नहीं मिल पाएगी। उसके मन में एक तरफ आर्यन का प्यार था, तो दूसरी तरफ अपने जल-लोक का परिवार।

    मरीना ने भारी मन से आर्यन से कहा, “आर्यन, मुझे अब जाना होगा। मेरा समय पूरा होने वाला है।”

     

    आर्यन ने उसका हाथ थामते हुए कहा, “नहीं मरीना, तुम कहीं नहीं जाओगी। मैं तुमसे प्यार करता हूँ। तुम यहीं मेरे साथ इस दुनिया में रहो।”

    मरीना की आँखों में आँसू आ गए। वह भी आर्यन से दूर नहीं जाना चाहती थी, लेकिन तभी वहाँ अचानक गगन अपने कुछ साथियों के साथ आ गया। गगन के हाथ में एक मोटा जाल और एक भारी जंजीर थी।

     

    गगन ने चीखते हुए कहा, “पकड़ो इस लड़की को! यह कोई साधारण इंसान नहीं है, यह वही समंदर की परी है, जो हमारे जाल की मछलियों को भगाती है और हमारे रहस्यों को चुराती है!”

     

    आर्यन बीच में आ गया और उसने गुस्से से कहा, “दूर रहो इससे गगन! यह मेरी दोस्त है!”

    गगन ने धक्का देकर आर्यन को जमीन पर गिरा दिया और अपने आदमियों को आदेश दिया कि वे मरीना को पकड़ लें। गगन के हाथ में एक विशेष धातु का कांटा था जो जल-परियों की शक्तियों को कमजोर कर सकता था।

     

    गगन ने मरीना को पकड़ने की कोशिश की। मरीना घबरा गई। उसे पता था कि अगर उसे किसी ने नुकसान पहुँचाया या समय निकल गया, तो सब कुछ खत्म हो जाएगा। उसके पास अपनी जल-परी वाली शक्तियाँ वापस पाने का केवल एक ही तरीका था—तुरंत समंदर के पानी को छूना।

    मरीना ने अपनी पूरी ताकत इकट्ठा की और गगन को धक्का देकर गाँव के उस रास्ते की तरफ भागी जो सीधे समुद्र तट की ओर जाता था। पीछे से गगन और उसके आदमी उसका पीछा कर रहे थे। आर्यन भी उठकर उनके पीछे भागा ताकि वह मरीना की रक्षा कर सके।

     

    दौड़ते-दौड़ते मरीना समंदर की रेतीली ढलान पर आ गई। सामने नीला समंदर अपनी लहरों के साथ उसका इंतजार कर रहा था। लेकिन तभी गगन ने एक भारी पत्थर उसकी तरफ फेंका, जो मरीना के पैरों पर लगा। मरीना दर्द से कराहती हुई रेत पर गिर पड़ी। सूर्यास्त होने ही वाला था—आसमान में लालिमा छा चुकी थी।

     

    गगन उसके करीब आ गया और उसने जादुई मोती को देखने की कोशिश की जो मरीना के गले में चमक रहा था। गगन ने कहा, “लाओ इधर, यह जादुई चीज मुझे दे दो!”

    ठीक उसी समय, आर्यन वहाँ पहुँच गया। आर्यन ने पीछे से आकर गगन को कसकर दबोच लिया और दोनों के बीच हाथापाई शुरू हो गई। आर्यन ने चिल्लाकर कहा, “मरीना! जल्दी करो! समंदर बस कुछ कदम दूर है!”

     

    मरीना ने अपनी बची-कुची ताकत का इस्तेमाल किया। वह घसीटते हुए रेत पर आगे बढ़ी और जैसे ही उसने अपना हाथ पानी के अंदर डुबोया, एक तेज़ जादुई विस्फोट हुआ। समंदर की लहरें उफ़्फ़ान पर आ गईं और एक बहुत बड़ी पानी की चादर ने मरीना को घेर लिया।

     

    रोशनी इतनी तेज़ थी कि गगन और उसके साथी अपनी आँखें बंद करने पर मजबूर हो गए। जब रोशनी शांत हुई, तो वहाँ कोई लड़की नहीं थी। वहाँ पानी के भीतर एक खूबसूरत नीली पूँछ वाली जल-परी तैर रही थी, जिसकी आँखों में आँसू थे लेकिन चेहरे पर एक सुकून का भाव था।

    अध्याय 8: दो दुनियाओं का मिलन और अमर प्रेम

    मरीना पानी के अंदर तैरते हुए समंदर की सतह पर आई। उसने देखा कि आर्यन सुरक्षित खड़ा है और गगन अपनी नाकामी पर गुस्से से काँप रहा है।

     

    मरीना ने पानी के भीतर से अपनी जादुई आवाज में गाना शुरू किया। वह कोई साधारण गीत नहीं था, बल्कि समंदर का वह प्राचीन संगीत था जो दिलों के बंधन को जोड़ता है। उस संगीत के प्रभाव से गगन और उसके आदमियों को एक गहरी नींद आने लगी और वे वहीं रेत पर बैठ गए।

    आर्यन ने पानी के करीब आकर नम आँखों से कहा, “मरीना… क्या तुम जा रही हो?”

     

    मरीना ने पानी से बाहर अपना हाथ निकाला और आर्यन के हाथ को छुआ। उसने जल-लोक की भाषा और इंसानी भाषा के बीच के सेतु को पार करते हुए कहा, “आर्यन, मेरा दिल हमेशा तुम्हारे पास रहेगा। जल-लोक मेरा घर है, लेकिन मेरा प्यार इस समंदर के किनारे तुम्हारे साथ बंधा हुआ है। जब भी तुम्हें मेरी याद आए, इस समंदर की लहरों को सुनना, तुम्हें मेरा गीत सुनाई देगा।”

     

    आर्यन ने उसका हाथ थामे हुए कहा, “मैं हर शाम इस समंदर के किनारे तुम्हारा इंतजार करूंगा, मरीना। जब तक सांस चलेगी, मेरा प्यार कम नहीं होगा।”

    सूर्यास्त पूरा हो चुका था। मरीना ने एक प्यारी सी मुस्कान दी और अपनी चमकदार पूँछ को हवा में लहराते हुए नीले समंदर की अगाध गहराइयों में वापस उतर गई। पानी के बुलबुले धीरे-धीरे शांत हो गए।

     

    वर्षों बीत गए। वह गाँव आज भी समंदर के किनारे बसा है। लोग कहते हैं कि आज भी जब पूर्णिमा की रात होती है और समंदर में शांत लहरें उठती हैं, तो एक जल-परी का मधुर संगीत सुनाई देता है। और उस तट पर एक बूढ़ा व्यक्ति (जो कभी युवा आर्यन था) अपनी आँखों में प्यार और इंतज़ार की चमक लिए समंदर को निहारता रहता है।

    यह कहानी इस बात की गवाही देती है कि प्यार की कोई सीमा

    नहीं होती चाहे वह जमीन की दुनिया हो या समंदर की गहराई, सच्चा प्रेम हमेशा अमर रहता है।

  • यहाँ ‘इच्छाधारी नागिन के प्यार’

    यहाँ ‘इच्छाधारी नागिन के प्यार’

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

     

    नागिन की अमर प्रेम कहानी: प्रतिशोध से मिलन तक

    प्राचीन काल से ही इच्छाधारी नागिनों की कहानियाँ भारतीय लोककथाओं का हिस्सा रही हैं। ये कहानियाँ अक्सर बदले, रहस्य और अलौकिक शक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। लेकिन इन सबके बीच, एक ऐसी कहानी भी है जो नफरत से शुरू होकर निस्वार्थ प्रेम और बलिदान की मिसाल बन गई। यह कहानी है इच्छाधारी नागिन ‘चंद्रमुखी’ और राजकुमार ‘आदित्य’ की।

     

    चंद्रमुखी नागलोक की राजकुमारी थी। वह अपूर्व सुंदरी थी और उसके पास इच्छाधारी होने की अद्भुत शक्तियाँ थीं। अपनी इच्छा के अनुसार वह कोई भी रूप धारण कर सकती थी। एक पूर्णिमा की रात, वह मानव रूप धारण कर धरती पर एक शिव मंदिर में दर्शन करने आई।

     

    उसी समय, पास के राज्य का राजकुमार आदित्य भी उसी मंदिर में आया। जब आदित्य की नज़र चंद्रमुखी पर पड़ी, तो वह जैसे मोहित हो गया। चंद्रमुखी ने भी पहली बार किसी मानव के प्रति अपने हृदय में एक अजीब सी धड़कन महसूस की। वह साधारण आकर्षण नहीं था, बल्कि आत्माओं का मिलन था।

     

    दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ। चंद्रमुखी ने अपनी पहचान छिपाई, लेकिन आदित्य को उससे गहरा प्रेम हो गया। चंद्रमुखी भी आदित्य की सादगी और निश्छल प्रेम पर अपना दिल हार बैठी। वे दोनों अपने प्रेम के स्वप्नलोक में खोए हुए थे।

     

    लेकिन, नियति को कुछ और ही मंजूर था। नागलोक के नियमों के अनुसार, एक इच्छाधारी नागिन का मानव से विवाह वर्जित था। जब नागलोक के राजा (चंद्रमुखी के पिता) को इस प्रेम के बारे में पता चला, तो वे क्रोधित हो गए। उन्होंने चंद्रमुखी को वापस बुला लिया और उसे सख्त हिदायत दी कि वह आदित्य को भूल जाए।

    चंद्रमुखी के लिए यह असहनीय था। उसने अपने पिता के सामने गिड़गिड़ाया, लेकिन वे नहीं माने। तब चंद्रमुखी ने एक कठोर निर्णय लिया। उसने अपनी अलौकिक शक्तियों का त्याग कर दिया और एक साधारण मानव के रूप में धरती पर रहने का संकल्प लिया।

     

    जब आदित्य को इस बात का पता चला, तो वह भी राजमहल छोड़कर चंद्रमुखी के पास आ गया। दोनों ने एक छोटे से गाँव में अपना जीवन शुरू किया। उनका प्रेम परीक्षा की इस घड़ी में और भी मजबूत हो गया।

     

    लेकिन, उनकी खुशियाँ ज्यादा दिन नहीं टिकीं। नागलोक का सेनापति, जो चंद्रमुखी से एकतरफा प्रेम करता था, इस अपमान को सहन नहीं कर सका। उसने आदित्य को मारने की योजना बनाई।

    एक दिन, जब आदित्य जंगल से गुजर रहा था, सेनापति ने उस पर जानलेवा हमला किया। आदित्य गंभीर रूप से घायल हो गया। जब चंद्रमुखी को यह पता चला, तो वह भागकर जंगल में पहुँची। उसने देखा कि आदित्य मरणासन्न अवस्था में पड़ा है।

     

    उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसे पता था कि अब सिर्फ एक ही रास्ता है—उसे अपनी ‘नागमणि’ का एक अंश आदित्य के शरीर में डालना होगा ताकि उसकी जान बच सके। लेकिन ऐसा करने से चंद्रमुखी की सारी शक्तियाँ हमेशा के लिए समाप्त हो जाएँगी और वह साधारण मानव से भी कमजोर हो जाएगी।

     

    बिना एक पल सोचे, चंद्रमुखी ने अपनी नागमणि का अंश आदित्य के शरीर में प्रवाहित कर दिया। तेज़ रोशनी हुई और चंद्रमुखी बेहोश होकर गिर पड़ी। आदित्य धीरे-धीरे होश में आने लगा, लेकिन चंद्रमुखी की जान खतरे में थी।

     

    जब चंद्रमुखी की आँख खुली, तो उसने देखा कि आदित्य जीवित है। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर संतोष का भाव था। आदित्य को जब पूरी सच्चाई पता चली, तो उसने चंद्रमुखी को गले लगा लिया।

    उस दिन से, चंद्रमुखी ने अपनी सारी शक्तियाँ खो दीं। वह एक साधारण मानव बन गई थी, लेकिन आदित्य के लिए वह अब भी एक देवी थी। उनका प्रेम किसी जादू से कम नहीं था।

     

    उनकी कहानी दूर-दूर तक फैल गई। लोग उन्हें प्रेम की अमरता का प्रतीक मानने लगे। चंद्रमुखी और आदित्य का प्रेम इस बात का प्रमाण था कि सच्चा प्यार अलौकिक शक्तियों, नियमों और बाधाओं से परे होता है।

    यह कहानी हमें सिखाती है कि जब हम किसी से निस्वार्थ प्रेम करते हैं, तो हम अपने सुख और स्वार्थ का त्याग करने से भी नहीं हिचकिचाते। इच्छाधारी नागिन चंद्रमुखी का प्रेम न केवल उसके बदले को भूलने में सक्षम था, बल्कि अपने प्रेमी के जीवन को बचाने के लिए खुद को मिटाने में भी समर्थ था। उनका मिलन एक अंतहीन प्रेम कहानी का प्रतीक बन गया।

     

  • सोन परी की जादुई दुनिया

    सोन परी की जादुई दुनिया

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

     

    यह कहानी है एक सात साल की प्यारी और नटखट बच्ची की, जिसका नाम था फ्रूटी। फ्रूटी एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार में रहती थी जहाँ उसके माता-पिता दोनों ही नौकरी करते थे। सुबह होते ही उसके माता-पिता अपने-अपने दफ्तर के लिए निकल जाते और शाम को देर से लौटते। घर में फ्रूटी अकेली रह जाती, या फिर उसकी देखभाल के लिए एक सख्त मिजाज आया (घरेलू सहायिका) रहती, जो उसे टीवी देखने से रोकती, समय पर होमवर्क कराने के लिए डाँटती और उसे खेलने के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं देती थी।

    फ्रूटी बहुत ही कल्पनाशील बच्ची थी। वह घंटों खिड़की के पास बैठकर आसमान में उड़ते बादलों को देखा करती थी। उसे परियों की कहानियाँ सुनना बहुत पसंद था। उसकी दादी ने उसे बचपन में परियों की कई कहानियाँ सुनाई थीं—परियों की रानी, उनका चमकता हुआ परी लोक, जादू की छड़ी और पंखों वाले खूबसूरत लिबास। फ्रूटी अक्सर सोचती थी कि काश उसकी जिंदगी में भी कोई परी आ जाए, जो उसकी सुननी सहेली बन सके, जिसके साथ वह खेल सके और अपने दिल की सारी बातें साझा कर सके।

    एक दिन फ्रूटी स्कूल से लौटी तो उसका मन बहुत उदास था। उसे स्कूल में एक ड्राइंग प्रतियोगिता में भाग लेना था, लेकिन उसकी अध्यापिका ने उसे डाँट दिया क्योंकि वह अपनी पेंटिंग समय पर पूरी नहीं कर पाई थी। घर आने पर आया ने भी उसके बस्ते को देखकर नाराजगी जताई और बिना बात के डाँट दिया। फ्रूटी अपने कमरे में आई, पलंग पर बैठकर फफक-फफक कर रोने लगी। उसने आसमान की तरफ देखते हुए रोते हुए कहा, “हे भगवान! अगर परियाँ सच में होती हैं, तो आप किसी परी को मेरे पास क्यों नहीं भेजते? क्या कोई मेरी सुनने वाला नहीं है?”

    वह रोते-रोते ही थक गई और उसकी आँखें बंद हो गईं। कमरे में सन्नाटा छा गया। खिड़की से आती शाम की ठंडी हवा ने उसके आँसू सुखा दिए। किसी को क्या पता था कि उस नन्हीं बच्ची की पुकार उस दुनिया तक पहुँच चुकी थी, जहाँ इंसानों की पहुँच नहीं होती—परी लोक तक।

    आसमान के उस पार, बादलों की ओट में एक बेहद खूबसूरत दुनिया बसी थी, जिसे ‘परी लोक’ कहा जाता था। यह जगह सोने की तरह चमकने वाले महलों, बहती हुई दूधिया नदियों और संगीत जैसी सुरीली हवाओं से भरी हुई थी। यहाँ हर तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले रहते थे जो कभी मुरझाते नहीं थे। परी लोक पर न्याय और प्रेम की मूरत, ‘परी माँ’ का शासन था।

    परी माँ का दरबार सजा हुआ था। सभी परियाँ अपनी-अपनी जगहों पर बैठी थीं। तभी परी लोक के जादुई आईने में धरती पर रोती हुई नन्हीं फ्रूटी की तस्वीर उभरी। परी माँ ने उस तस्वीर को देखकर गहरी साँस ली और कहा, “धरती पर इंसानों की दुनिया में भौतिकता बढ़ रही है। वहाँ के बच्चे बड़े-बड़े महलों में रहते हैं, लेकिन उनके पास अपनों का प्यार और समय नहीं होता। नन्हीं फ्रूटी बहुत अकेली है। उसकी पुकार ने हमारे परी लोक की दीवारों को छू लिया है।”

    दरबार में बैठी सभी परियों ने फ्रूटी की मदद करने की इच्छा जताई। लेकिन परी माँ ने अपनी विशेष शक्ति से फौरन निर्णय लिया। उन्होंने अपनी सबसे खास, दयालु और ऊर्जावान परी की ओर देखा, जिनके सोने जैसे सुनहरे पंख और सुनहरी पोशाक पूरे दरबार को जगमगा रही थी। उनका नाम था—सोन परी।

    परी माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “सोन परी! यह कार्य केवल तुम्हारे बस का है। तुम जाओ धरती पर और उस नन्हीं फ्रूटी की जिंदगी में खुशियों के रंग भर दो। उसकी हर मुश्किल में उसकी ढाल बनो, लेकिन एक बात याद रखना—तुम्हारी शक्तियाँ तभी तक काम करेंगी जब तक तुम किसी अच्छे उद्देश्य के लिए उनका उपयोग करोगी और अपनी असली पहचान को इंसानों की दुनिया में छिपा कर रखोगी।”

    सोन परी ने आदर से अपना सिर झुकाया और कहा, “जैसी आपकी आज्ञा, परी माँ। मैं अभी धरती के लिए रवाना होती हूँ।”

    सोन परी ने अपने सुनहरे पंख फड़फड़ाए और एक तेज़ सुनहरी रोशनी के साथ वह परी लोक से सीधे फ्रूटी के कमरे में जा उतरीं। जब फ्रूटी की आँख खुली, तो उसका कमरा किसी साधारण कमरे जैसा नहीं लग रहा था। पूरे कमरे में सुनहरे रंग की चमक फैली हुई थी, और हवा में फूलों की भीनी-भीनी खुशबू महक रही थी।

    फ्रूटी ने अपनी आँखें मलते हुए पलंग पर उठकर देखा। उसके सामने एक बेहद खूबसूरत महिला खड़ी थीं। उन्होंने सुनहरे रंग का खूबसूरत गाउन पहना हुआ था, उनके सिर पर जगमगाता हुआ ताज था और पीठ पर दो सुनहरे पंख थे, जो हल्की रोशनी बिखेर रहे थे। उनके चेहरे पर ममता और अपनापन का ऐसा भाव था जिसे देखते ही फ्रूटी का सारा डर छूमंतर हो गया।

    फ्रूटी ने आँखें फाड़कर आश्चर्य से पूछा, “आप… आप कौन हैं? क्या आप कोई परी हैं?”

    सोन परी ने मुस्कुराते हुए प्यार से अपना हाथ फ्रूटी के सिर पर फेरा और कहा, “हाँ फ्रूटी! मैं सोन परी हूँ। तुम्हारी पुकार ने मुझे आसमान से खींचकर यहाँ बुला लिया है। अब तुम अकेली नहीं हो। मैं तुम्हारी दोस्त हूँ।”

    फ्रूटी खुशी से उछल पड़ी। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने सोन परी को गले से लगा लिया और बोली, “क्या सचमुच? मेरी कोई परी दोस्त है? आप कहीं चली तो नहीं जाएंगी?”

    सोन परी ने हँसते हुए कहा, “नहीं फ्रूटी, मैं यहीं तुम्हारे पास रहूँगी। जब भी तुम्हें मेरी जरूरत होगी, मैं तुम्हारे पास आ जाऊँगी। बस तुम्हें अपनी जादुई अंगूठी से मुझे याद करना होगा।”

    सोन परी ने अपनी उंगली से एक चमकती हुई छोटी सी सुनहरी अंगूठी निकाली और फ्रूटी की उंगली में पहना दी। उन्होंने कहा, “इस अंगूठी को छूकर जब तुम मेरा नाम लोगी, तो मैं तुरंत तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगी। लेकिन याद रखना, इस राज़ को किसी को नहीं बताना है—न अपने मम्मी-पापा को और न ही अपनी आया को।”

    फ्रूटी ने उत्साह से सिर हिलाया, “वादा! मैं किसी को नहीं बताऊँगी।”

    उसी क्षण, घर की डोरबेल बजी। फ्रूटी के माता-पिता दफ्तर से लौट आए थे। सोन परी ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलो फ्रूटी, तुम्हारे मम्मी-पापा आ गए हैं। मैं अभी जाती हूँ, लेकिन हम जल्द ही फिर मिलेंगे।” और एक चमकती हुई रोशनी के साथ सोन परी हवा में ओझल हो गईं। फ्रूटी ने अपनी उंगली की अंगूठी को छुआ और उसके चेहरे पर एक बहुत बड़ी मुस्कान आ गई। उसकी जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रहने वाली थी।

    अगले कुछ दिनों में फ्रूटी की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। अब उसका अकेलापन गायब हो चुका था। जब भी उसके माता-पिता काम पर चले जाते और आया उसे डाँटती, फ्रूटी चुपके से अपने कमरे में जाती, अंगूठी को छूती और सोन परी को बुला लेती।

    सोन परी सिर्फ एक जादुई शख्सियत नहीं थीं, बल्कि वह फ्रूटी की मार्गदर्शक भी थीं।

     

    एक दिन फ्रूटी का गणित का होमवर्क बहुत कठिन था और वह रो रही थी। सोन परी ने चुटकी बजाई और किताबों के पन्ने अपने आप पलटने लगे, लेकिन साथ ही उन्होंने फ्रूटी को प्यार से समझाया भी कि जादू सिर्फ मदद के लिए है, मेहनत तुम्हें खुद ही करनी होगी ताकि तुम्हारा दिमाग तेज हो सके।

     

    एक अन्य दिन, जब फ्रूटी उदास थी क्योंकि उसकी सहेली ने उसके साथ खेलना बंद कर दिया था, तो सोन परी ने उसके कमरे को एक जादुई खेल के मैदान में बदल दिया। वहाँ हवा में तैरने वाले खिलौने थे और रंग-बिरंगे गुब्बारे थे, जिनके साथ दोनों ने मिलकर खूब मस्ती की।

    सोन परी ने फ्रूटी को जीवन के बहुत से मूल्य सिखाए। उन्होंने सिखाया कि दूसरों की मदद कैसे करनी चाहिए, बड़ों का आदर कैसे करना चाहिए और हर परिस्थिति में मुस्कुराते रहना चाहिए। फ्रूटी के माता-पिता ने भी गौर किया कि उनकी बेटी अब पहले से ज्यादा खुश, समझदार और तरोताजा रहने लगी थी। उन्हें हैरानी होती थी कि जो बच्ची बात-बात पर रोती थी, वह अब हमेशा मुस्कुराती रहती थी।

    लेकिन हर कहानी में सुख के साथ परीक्षा की घड़ी भी आती है। परी लोक में सिर्फ भलाई और उजाला ही नहीं था, बल्कि वहाँ कुछ ऐसी शक्तियाँ भी थीं जो नकारात्मकता और अहंकार से भरी हुई थीं। उनमें सबसे प्रमुख थीं—काली परी।

    काली परी और उनके सहयोगी ‘अलटामा’ का यह मानना था कि इंसानों की दुनिया में प्यार, मासूमियत और जादू का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। काली परी हमेशा इस ताक में रहती थीं कि कब सोन परी से कोई गलती हो और वह परी लोक के नियमों का उल्लंघन करके सोन परी को नीचा दिखा सकें। काली परी जानती थीं कि सोन परी को फ्रूटी से बहुत लगाव हो गया है, और यही लगाव सोन परी की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकता था।

    एक शाम, जब फ्रूटी अपने स्कूल के प्रोजेक्ट के लिए कुछ रंग ढूँढ रही थी, तभी कमरे का तापमान अचानक बहुत ठंडा हो गया। खिड़कियाँ अपने आप बंद होने लगीं और कमरे की सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे बैंगनी और धुएँ जैसी नीली रोशनी में बदलने लगी।

    फ्रूटी डरकर बिस्तर के कोने में दुकक गई। उसने काँपते हुए कहा, “सोन परी… आप कहाँ हैं?”

    कमरे के बीचों-बीच हवा में एक काली परछाई उभरी। धीरे-धीरे वह परछाई एक भयानक और गुस्से से भरी हुई सूरत में बदल गई। उसने काले रंग के पंख फैला रखे थे और उसके चेहरे पर एक अजीब सी क्रूर हँसी थी। वह थीं—काली परी।

    काली परी ने अपनी भारी और गूँजती हुई आवाज में कहा, “तो यह है वो नन्हीं लड़की, जिसके लिए हमारी महान सोन परी अपने सारे कर्तव्य भूलकर इस छोटी सी दुनिया में बैठी रहती है!”

    फ्रूटी ने डरते हुए पूछा, “आप कौन हैं? सोन परी को क्यों परेशान कर रही हैं?”

    काली परी ने ठहाका लगाते हुए कहा, “मैं काली परी हूँ! और तुम्हारी उस तथाकथित सोन परी की असलियत बहुत जल्द सबके सामने आने वाली है। तुम दोनों की यह दोस्ती परी लोक के नियमों के खिलाफ है। सोन परी को इंसानों से इतना मोह नहीं रखना चाहिए।”

    ठीक उसी समय, कमरे के दरवाजे पर एक तेज़ सुनहरी चमक फूटी और वहाँ सोन परी प्रकट हो गईं। उनके चेहरे पर चिंता और दृढ़ता दोनों भाव थे।

    सोन परी ने कड़े शब्दों में कहा, “काली परी! फ्रूटी एक मासूम बच्ची है। उसे डराने की कोशिश मत करो। अगर तुम्हें कोई शिकायत है, तो सीधे परी लोक में परी माँ के सामने बात करो।”

    काली परी ने मुस्कुराते हुए कहा, “शिकायत मैं वहीं करूँगी, सोन परी! लेकिन उससे पहले मैं यह देखना चाहती हूँ कि तुम इस छोटी सी बच्ची को बचाने के लिए अपनी कौन सी जादुई ताकत गँवाती हो।” और एक भयानक अट्टहास के साथ काली परी वहाँ से गायब हो गई।

    काली परी के जाने के बाद फ्रूटी बहुत घबरा गई थी। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने सोन परी का हाथ पकड़कर कहा, “सोन परी, क्या वह बुरी परी आपको वापस परी लोक खींच ले जाएगी? क्या आप मुझे छोड़कर चली जाएंगी?”

    सोन परी ने फ्रूटी के आँसू पोछे और उसे गले से लगाते हुए कहा, “घबराओ मत, फ्रूटी! सच्चाई और प्यार की ताकत सबसे बड़ी होती है। जब तक मेरे दिल में तुम्हारी और इंसानों की भलाई की भावना है, तब तक कोई भी काली शक्ति मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। लेकिन… हमें सावधान रहना होगा।”

    अगले ही दिन, काली परी ने अपनी चाल चलनी शुरू कर दी। उसने फ्रूटी के जीवन में मुश्किलें पैदा करनी शुरू कर दीं। फ्रूटी के स्कूल के बस्ते से उसकी जरूरी किताबें गायब हो गईं, उसके प्रोजेक्ट का सामान नष्ट हो गया, और यहाँ तक कि उसकी माँ के दफ्तर में भी कुछ अनहोनी हो गई जिससे उसके माता-पिता बहुत तनाव में आ गए। घर का माहौल फिर से उदास हो गया।

    आया ने फ्रूटी पर शक करना शुरू कर दिया कि वह ठीक से ध्यान नहीं देती। फ्रूटी अंदर ही अंदर बहुत टूट रही थी। उसे लगा कि शायद उसकी वजह से ही सोन परी और उसके परिवार पर यह संकट आया है।

    एक रात, फ्रूटी ने अकेले में अपनी अंगूठी को छुआ और रोते हुए कहा, “सोन परी, मुझे माफ कर दीजिए। मेरी वजह से आप पर और मेरे मम्मी-पापा पर मुसीबत आ गई है। शायद मुझे आपको कभी नहीं बुलाना चाहिए था।”

    सोन परी तुरंत प्रकट हुईं। उन्होंने फ्रूटी के कंधे पर हाथ रखा और बहुत प्यार से समझाया, “फ्रूटी, कभी भी यह मत सोचना कि तुम्हारी वजह से कुछ बुरा हुआ है। मुश्किलें जिंदगी का हिस्सा हैं। असली ताकत तब दिखती है जब हम मुश्किलों के सामने हार मानने के बजाय उनका सामना करते हैं। क्या तुम मेरा साथ दोगी?

    फ्रूटी ने अपने आँसू पोंछे और दृढ़ता से सिर हिलाया, “हाँ, सोन परी! मैं डरूँगी नहीं। हम दोनों मिलकर उस काली परी को हरा देंगे।”

    सोन परी जानती थी कि इस समस्या का समाधान केवल परी लोक में ही हो सकता है। उन्हें परी माँ के सामने जाकर यह साबित करना था कि फ्रूटी के साथ उनकी यह दोस्ती सिर्फ एक व्यक्तिगत मोह नहीं, बल्कि इंसानों की दुनिया में उम्मीद और अच्छाई का बीज बोने का जरिया है।

    सोन परी ने फ्रूटी से कहा, “फ्रूटी, आज रात मुझे परी लोक जाना होगा। वहाँ एक बड़ी सभा बैठी है जहाँ काली परी ने मेरे खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। लेकिन जाने से पहले मैं तुम्हें अपनी विशेष शक्ति का एक अंश देती हूँ, ताकि तुम इस जादुई लॉकेट को पहनकर सुरक्षित रह सको।”

    सोन परी ने अपने हाथों से एक चमकता हुआ सुनहरी लॉकेट फ्रूटी के गले में पहना दिया। लॉकेट पहनते ही फ्रूटी के अंदर एक असीम ऊर्जा और साहस का संचार हो गया। इसके बाद, सोन परी एक सुनहरी रोशनी के साथ परी लोक के लिए रवाना हो गईं।

    परी लोक का दरबार खचाखच भरा हुआ था। परी माँ अपने सिंहासन पर विराजमान थीं। काली परी ने अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए सबके सामने आरोप लगाया कि सोन परी ने इंसानों की दुनिया में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप किया है और नियमों को तोड़ा है।

    परी माँ ने गंभीर मुद्रा में सोन परी से पूछा, “सोन परी, क्या यह सच है कि तुमने इंसानों के बीच रहकर अपने कर्तव्यों की सीमा लाँघी है?”

    सोन परी ने बिना डरे, आदर के साथ सिर झुकाकर कहा, “परी माँ, मैंने नियमों को तोड़ा नहीं है, बल्कि उनके असली अर्थ को निभाया है। प्रेम, करुणा और उम्मीद—यही तो परी लोक की असली ताकत है। फ्रूटी अकेली थी, उसके पास अपनों का प्यार नहीं था। अगर एक परी इंसानों के आंसुओं को न पोंछ सके, तो ऐसे परी लोक का क्या फायदा जो सिर्फ बादलों में चमकता हो और धरती के दुखों से अनजान रहे?”

    दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी परियाँ सोन परी के पक्ष में सोचने लगीं। तभी, दूर धरती से एक जादुई किरण परी लोक के दरबार में पहुँची। वह फ्रूटी की पुकार थी। फ्रूटी ने अपने गले के लॉकेट को छूकर मन ही मन पुकारा था, “सोन परी, हम सब आपके साथ हैं!”

    फ्रूटी की उस सच्ची और मासूम पुकार ने परी लोक के विशाल आईने को रोशन कर दिया। परी माँ ने जब उस दृश्य को देखा, तो उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। उन्होंने समझ लिया कि सोन परी का कदम पूरी तरह सही था।

    परी माँ ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, “काली परी! तुम्हारे आरोप निराधार हैं। सोन परी ने हमारे लोक के नियमों का उल्लंघन नहीं किया, बल्कि उन्हें सार्थक बनाया है। प्रेम और भलाई से बड़ी कोई शक्ति नहीं है।”

    काली परी गुस्से में लाल हो गईं, लेकिन वह परी माँ के आदेश के आगे कुछ नहीं कह सकीं। वह काले बादलों के साथ परी लोक के अंधेरे कोने में लौट गईं। दरबार में सभी ने सोन परी के पक्ष में जयजयकार की।

    अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरण फ्रूटी की खिड़की से अंदर आई, तो पूरा कमरा पहले से कहीं ज्यादा चमक रहा था। फ्रूटी की नींद खुली तो उसने देखा कि उसके माता-पिता उसके कमरे में खड़े हैं और उनके चेहरे पर एक बहुत प्यारी मुस्कान है। उसके पिता ने उसे गले से लगाया और कहा, “बेटी, हमारी दफ्तर की सारी परेशानियाँ दूर हो गई हैं, और आज हम छुट्टी पर हैं। हम पूरा दिन तुम्हारे साथ बिताएंगे!”

    फ्रूटी खुशी से उछल पड़ी। उसने तुरंत अपनी खिड़की की तरफ देखा। खिड़की की मुंडेर पर सोन परी खड़ी थीं। उन्होंने अपनी सुनहरी छड़ी से हवा में एक खूबसूरत दिल का निशान बनाया और मुस्कुराते हुए फ्रूटी की तरफ देखा।

    फ्रूटी ने मन ही मन कहा, “धन्यवाद, सोन परी!”

    सोन परी ने मुस्कुराते हुए हवा में हाथ हिलाया और धीरे-धीरे बादलों के पीछे परी लोक की तरफ ओझल हो गईं। लेकिन फ्रूटी जानती थी कि सोन परी कहीं नहीं गई हैं। वह हमेशा उसकी उंगली की उस अंगूठी में, उसके दिल में और उसके आसपास की हर अच्छी चीज में मौजूद रहेंगी।

    1. फ्रूटी की जिंदगी अब अकेली नहीं थी। उसके पास उसके मम्मी-पापा का प्यार था, और सबसे बढ़कर—एक जादुई दोस्त, सोन परी का अटूट साथ था। और इस तरह, हँसी-खुशी और जादू के साये में फ्रूटी का बचपन एक खूबसूरत परी कथा की तरह आगे बढ़ने लगा।
  • कदमों की आवाज

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    कदमों की आवाज

     

    रात के करीब बारह बज रहे थे। पूरे गांव में सन्नाटा पसरा था। सिर्फ राघव के पुराने मकान में ऊपर जाती लकड़ी की सीढ़ियां थीं, जो हर रात किसी के कदमों की आवाज से गूंजती थीं।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    पहले एक कदम।

     

    फिर दूसरा।

     

    फिर तीसरा।

     

    और फिर अचानक सब शांत।

     

    राघव उस आवाज से पिछले तीन महीने से परेशान था।

     

    मकान उसे अपने नाना से मिला था। नाना की मौत के बाद राघव अपनी पत्नी नंदिनी के साथ वहां रहने आया था।

     

    पहली रात ही नंदिनी ने पूछा था,

     

    “राघव, ऊपर कोई गया है क्या?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “नहीं, ऊपर तो कोई है ही नहीं।”

     

    नंदिनी ने हंसकर कहा,

     

    “तो फिर आवाज कैसी थी?”

     

    राघव ने बात टाल दी।

     

    लेकिन अगली रात फिर वही हुआ।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज नीचे से ऊपर जा रही थी।

     

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “ये आवाज सीढ़ियों से आ रही है।”

     

    राघव ने टॉर्च उठाई और सीढ़ियों के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगा।

     

    पहली सीढ़ी।

     

    दूसरी।

     

    तीसरी।

     

    जैसे ही वह पांचवीं सीढ़ी पर पहुंचा, ऊपर से किसी के भागने की आवाज आई।

     

    ठक-ठक-ठक-ठक!

     

    राघव ने तुरंत टॉर्च ऊपर की।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    लेकिन सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक छोटी-सी लाल रिबन पड़ी थी।

     

    राघव ने उसे उठा लिया।

     

    नंदिनी ने पूछा,

     

    “ये किसकी है?”

     

    राघव कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    “पता नहीं।”

     

    अगली सुबह राघव गांव के सबसे बुजुर्ग आदमी गोविंद काका के पास गया।

     

    उसने घर की बात बताई।

     

    काका का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “क्या तुम्हें सीढ़ियों पर कोई रिबन मिली?”

     

    राघव चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    काका कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “उस घर की सीढ़ियों की आवाज नई नहीं है।”

     

    “मतलब?”

     

    “करीब बीस साल पहले तुम्हारी नाना की बेटी… तुम्हारी मौसी आरती… इसी घर में रहती थी।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मेरी तो कोई मौसी नहीं थी।”

     

    गोविंद काका ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें यही बताया गया था।”

     

    राघव का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “सच क्या है?”

     

    काका ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “आरती एक रात ऊपर के कमरे में गई थी। उसके बाद वह कभी नीचे नहीं आई।”

    “क्या हुआ था उसके साथ?”

     

    काका ने सिर झुका लिया।

     

    “उस रात भी सीढ़ियों पर कदमों की आवाज आई थी।”

     

    राघव के हाथ से रिबन गिरते-गिरते बची।

    “फिर?”

     

    “तुम्हारे नाना ने कहा कि आरती घर छोड़कर चली गई। लेकिन गांव वालों को यकीन नहीं हुआ।”

     

    राघव घर वापस लौट आया।

     

    उसने उसी दिन ऊपर का बंद कमरा खोलने का फैसला किया।

     

    कमरे के दरवाजे पर पुराना ताला लगा था।

     

    चाबी उसे नाना की अलमारी से मिली।

     

    ताला खुलते ही धूल की मोटी परत हवा में उड़ गई।

     

    कमरे के अंदर एक पुरानी लकड़ी की मेज, कुछ किताबें और दीवार पर लगी एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके बालों में लाल रिबन लगी थी।

    राघव का दिल बैठ गया।

     

    वह रिबन बिल्कुल वही थी जो उसे सीढ़ियों पर मिली थी।

     

    तस्वीर के नीचे लिखा था आरती उम्र 12 साल।

    नंदिनी ने तस्वीर देखते हुए पूछा,“ये तुम्हारी मौसी हैं?”

     

    राघव ने धीरे से सिर हिलाया।

    “शायद…”

     

    तभी कमरे के बाहर से आवाज आई।

    ठक… ठक… ठक…

     

    दोनों जम गए।

    आवाज सीढ़ियों से आ रही थी।

     

    नंदिनी ने फुसफुसाकर कहा,

    “राघव… कोई ऊपर आ रहा है।”

     

    कदम धीरे-धीरे ऊपर आ रहे थे।

    ठक…ठक…ठक…

     

    राघव ने दरवाजे की ओर देखा।

    कदम दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गए।

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

    फिर दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।

     

    टक… टक…

    नंदिनी डरते हुए पीछे हट गई।

     

    राघव ने हिम्मत करके दरवाजा खोला।

    बाहर कोई नहीं था।

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान सीढ़ियों से शुरू होकर कमरे के अंदर आ रहे थे।

    और जाकर तस्वीर के सामने खत्म हो रहे थे।

     

    राघव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    अब तस्वीर में आरती के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

    उसकी आंखें जैसे सीधे राघव को देख रही थीं।

     

    उसी रात राघव ने नाना की पुरानी डायरी ढूंढ निकाली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था

    “मैंने आरती को नहीं मारा। लेकिन उसे बचाया भी नहीं।”

     

    राघव की आंखें फैल गईं।

    अगली लाइन पढ़कर उसके हाथ कांपने लगे।

     

    “उस रात आरती ने सीढ़ियों पर किसी को देखा था। वह डरकर ऊपर भागी। मैं उसके पीछे गया। लेकिन मैंने जो देखा, उसके बाद मैं खुद डर गया।”

     

    आगे का पन्ना फटा हुआ था।

     

    राघव ने पूरी डायरी उलट-पलट दी।

    आखिर में एक छोटी-सी पर्ची मिली।

     

    उस पर लिखा था“जिस रात कदमों की आवाज सुनाई दे, सीढ़ियों पर पीछे मुड़कर मत देखना।”

    राघव ने नंदिनी को कुछ नहीं बताया।

     

    लेकिन उसी रात ठीक बारह बजे फिर आवाज शुरू हो गई।

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज बहुत तेज थी।

    राघव और नंदिनी नीचे कमरे में बैठे थे।

     

    आवाज धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आने लगी।ठक… ठक… ठक…

    नंदिनी ने राघव का हाथ पकड़ लिया।

    “राघव… ये नीचे आ रही है।”

    राघव ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    अंधेरे में किसी की परछाई दिखाई दी छोटी-सी।

    जैसे कोई बच्ची धीरे-धीरे सीढ़ियां उतर रही हो।

     

    राघव के मुंह से अचानक निकला,

    “आरती?”

    परछाई रुक गई।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई,“भैया…”

     

    राघव की आंखों में आंसू आ गए।

    “तुम्हें क्या हुआ था?”

     

    आवाज आई,मैं गिरी नहीं थी…

     

    राघव ने पूछा,तो?

    “मुझे धक्का दिया गया था।”

     

    नंदिनी ने राघव की तरफ देखा“किसने?”

     

    कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर जवाब आया“नाना ने नहीं…”

     

    राघव की सांस रुक गई।

    “फिर किसने?”

     

    परछाई ने धीरे से अपना हाथ ऊपर उठाया।

    और सीढ़ियों के ऊपर खड़े एक आदमी की ओर इशारा किया।

     

    राघव ने पलटकर देखा।

    ऊपर उसके नाना खड़े थे।

    लेकिन वह तो बीस साल पहले मर चुके थे।

    राघव पीछे हट गया।

     

    नाना की परछाई धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे आने लगी।

     

    आरती की आवाज फिर सुनाई दी“उन्होंने मुझे नहीं धक्का दिया था…”

    राघव ने कांपते हुए पूछा,“फिर?”

    “उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    नाना की परछाई के हाथ में एक पुरानी लालटेन थी।

    अचानक राघव को सब समझ आने लगा।

     

    उस रात आरती सीढ़ियों से गिर गई थी। नाना उसे बचाने दौड़े थे। लेकिन आरती गंभीर रूप से घायल हो गई थी।

     

    नाना उसे अस्पताल ले जाने के बजाय डर गए।

    क्योंकि उसी समय घर के पुराने कागजों में एक बड़ा राज छिपा था आरती ने नाना को किसी जमीन के धोखे का सच पता चलते सुन लिया था।

     

    नाना डर गए कि अगर आरती बच गई तो सबको सच बता देगी।

    उन्होंने मदद बुलाने में देर कर दी।

    और आरती चली गई।

     

    नाना ने पूरी जिंदगी यह सच छिपाए रखा।

    तभी पुलिस की गाड़ी की आवाज बाहर सुनाई दी।

    राघव ने चौंककर दरवाजा खोला।

    उसने अपने नाना की डायरी पुलिस को सौंप दी।

    सालों पुराना सच सामने आ गया।

     

    अगली रात पहली बार उस घर की सीढ़ियों पर कोई कदमों की आवाज नहीं आई।

    राघव और नंदिनी चैन की सांस लेकर सोने चले गए।

    लेकिन आधी रात को राघव की नींद अचानक खुल गई। ठक… ठक… ठक…

    वही आवाज।

    वह धीरे से बिस्तर से उठा।सीढ़ियों की तरफ देखा।

    इस बार वहां कोई परछाई नहीं थी।

    बस आखिरी सीढ़ी पर लाल रिबन पड़ी थी।

    राघव ने उसे उठाया।

    तभी पीछे से एक बच्ची की बहुत धीमी आवाज आई“भैया…”

    राघव पलटा।वहां कोई नहीं था।

    लेकिन दीवार पर लगी आरती की पुरानी तस्वीर में अब उसके साथ एक और बच्चा खड़ा था।

    वह बच्चा बिल्कुल राघव जैसा दिख रहा था।

    तस्वीर के नीचे एक नई तारीख लिखी थी“अगली रात…”

    और उसके नीचे सिर्फ तीन शब्द थे“सीढ़ियां फिर गिनना।”

  • कोई मरता नहीं था

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस घर में कोई मरता नहीं था

     

    शहर से करीब पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गांव था देवगढ़। गांव के आखिरी छोर पर एक बहुत पुराना मकान था, जिसे लोग “अमर हवेली” कहते थे।

     

    अजीब बात ये थी कि उस घर में पिछले सौ सालों से रहने वाला कोई भी इंसान कभी मरा नहीं था।

     

    लोगों को यह बात सुनने में अच्छी लगती थी, लेकिन गांव का कोई आदमी उस घर के पास तक नहीं जाता था।

     

    कहा जाता था कि जो भी उस घर में रहने जाता है, वह बूढ़ा तो होता है, बीमार भी पड़ता है, लेकिन उसकी मौत कभी नहीं होती।

     

    इसी गांव में एक दिन अमन नाम का लड़का अपनी मां के साथ आया। उसके पिता की मौत कई साल पहले हो चुकी थी और उसकी मां को गांव में पुश्तैनी जमीन मिली थी।

     

    अमन ने घर के बारे में सुना तो हंसते हुए बोला,

     

    “मां, लोग भी न… कुछ भी कहानी बना लेते हैं। कोई इंसान मरता नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है?”

     

    पास खड़े बूढ़े हरिदास ने उसकी बात सुन ली।

     

    उन्होंने अमन की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “बेटा, कहानी नहीं है। मैंने अपनी आंखों से उस घर के लोगों को देखा है।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “तो फिर वो लोग अभी तक जिंदा हैं?”

     

    हरिदास का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “हां… लेकिन जिंदा रहना और जिंदगी जीना दो अलग बातें हैं।”

     

    अमन कुछ समझ नहीं पाया।

     

    उस रात अमन और उसकी मां गांव के एक पुराने मकान में रुके। आधी रात को अचानक उनके दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने दरवाजा खोला।

     

    सामने हरिदास खड़े थे।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

     

    “कल अगर कोई तुम्हें अमर हवेली में जाने को कहे… तो मत जाना।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    हरिदास ने जवाब नहीं दिया।

     

    बस जाते-जाते इतना बोले,

     

    “उस घर में मौत नहीं आती… लेकिन वहां से कोई वापस भी नहीं आता।”

     

    अगली सुबह अमन अपनी मां के साथ खेत देखने निकला। रास्ते में उसकी मुलाकात एक बूढ़ी औरत से हुई।

     

    औरत ने अमन को देखते ही कहा,

     

    “तुम उसी घर के नए मालिक हो न?”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    औरत ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारे परिवार का नंबर आ गया है।”

     

    अमन को उसकी बात अजीब लगी।

     

    “कौन-सा नंबर?”

     

    औरत कुछ बोलती, उससे पहले उसकी मां ने अमन को वहां से चलने के लिए कहा।

     

    उस शाम उन्हें पुराने कागज मिले, जिनमें लिखा था कि अमर हवेली उनके परिवार की ही थी।

     

    अमन ने जिद की,

     

    “मां, हमें वो घर देखना चाहिए।”

     

    मां ने मना किया।

     

    लेकिन अमन अकेला ही हवेली पहुंच गया।

     

    लोहे का बड़ा दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    अंदर धूल से भरा आंगन था। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    लेकिन उन चित्रों में एक चीज अजीब थी।

     

    हर तस्वीर में एक ही परिवार दिखाई दे रहा था।

     

    और हर तस्वीर के नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    1920… 1935… 1951… 1970… 1992… 2010…

     

    अमन ने गौर से देखा।

     

    तस्वीरों में मौजूद लोग उम्र में लगभग एक जैसे थे।

     

    तभी पीछे से आवाज आई,

     

    “तुम आ ही गए।”

     

    अमन पलटा।

     

    एक बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।

     

    उसकी आंखें बिल्कुल स्थिर थीं।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “इस घर का रखवाला।”

     

    “यहां कौन रहता है?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे अपने लोग।”

     

    अमन ने दीवार पर लगी तस्वीर की ओर इशारा किया।

     

    “ये लोग कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “तुम्हारे दादा… परदादा… और उनसे भी पहले के लोग।”

     

    अमन के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “लेकिन ये सब तो मर चुके हैं।”

     

    बूढ़ा धीरे-धीरे उसके करीब आया।

     

    “नहीं। इस घर में कोई नहीं मरता।”

     

    अचानक ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने ऊपर देखा।

     

    बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    लेकिन तभी एक कमरे का दरवाजा खुला।

     

    अंदर से एक आदमी बाहर आया।

     

    अमन उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।

     

    “पापा?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “अमन…”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आप जिंदा हैं?”

     

    उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बस कहा,

     

    “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    अमन उसके पास जाने लगा।

     

    तभी बूढ़े ने चिल्लाकर कहा,

     

    “भागो!”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियां बंद हो गईं।

     

    दरवाजे अपने आप बंद हो गए।

     

    और दीवारों पर लगी तस्वीरों के चेहरे बदलने लगे।

     

    अब हर तस्वीर में अमन दिखाई दे रहा था।

     

    कहीं वह बच्चा था।

     

    कहीं बूढ़ा।

     

    कहीं बिल्कुल वैसा ही जैसा अभी था।

     

    अमन घबराकर दरवाजे की ओर भागा।

     

    लेकिन रास्ते में उसके पिता खड़े थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “अगर बाहर गए तो मैं हमेशा के लिए अकेला रह जाऊंगा।”

     

    अमन रुक गया।

     

    “आप मेरे पिता नहीं हैं।”

     

    उस आदमी की मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगा।

     

    और उसके पीछे दर्जनों लोग खड़े दिखाई दिए।

     

    वे सभी अमन के परिवार के पुराने सदस्य थे।

     

    सबकी आंखें अमन पर थीं।

     

    तभी बूढ़ा चिल्लाया,

     

    “इसे बाहर निकालो!”

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    फर्श पर बनी एक काली रेखा चमकी और अमन उसके बीच खिंचता चला गया।

     

    अगले ही पल सब शांत हो गया।

     

    सुबह अमन की मां हवेली के बाहर पहुंची।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    अंदर अमन नहीं था।

     

    सिर्फ एक नई तस्वीर दीवार पर टंगी थी।

     

    उस तस्वीर में अमन खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    नीचे तारीख लिखी थी

    11 अगस्त 2026

     

    मां चीख पड़ी।

     

    तभी पीछे से हरिदास की आवाज आई,

     

    “अब समझ आया कि इस घर में कोई क्यों नहीं मरता?”

     

    मां ने कांपते हुए पूछा,“क्यों?”

     

    हरिदास ने कहा,

     

    “क्योंकि मौत उन्हें लेने आती ही नहीं…”

     

    उन्होंने हवेली की तरफ देखा।

     

    “यह घर इंसानों को मारता नहीं है। यह उनकी मौत अपने अंदर कैद कर लेता है।”

    मां ने रोते हुए पूछा,

     

    “तो अमन?”

     

    हरिदास ने धीरे से कहा,

     

    “अब वह जिंदा है… हमेशा जिंदा रहेगा।”

    मां ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन हरिदास ने अगली बात कही तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “लेकिन वह अब इंसानों की दुनिया में नहीं है।”

     

    उसी समय हवेली के अंदर से अमन की आवाज आई

     

    “मां…”

     

    मां दौड़कर अंदर जाने लगी।

     

    हरिदास ने उसे रोक लिया।

    “मत जाना!”

    “वो मेरा बेटा है!”

    हरिदास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “वह आवाज अमन की नहीं है।”

     

    अंदर से फिर आवाज आई“मां… मुझे बचा लो…”

    मां दरवाजे पर खड़ी रोती रही।

     

    और हवेली की दीवार पर लगी नई तस्वीर में अमन की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    उसकी जगह उसके चेहरे पर डर दिखाई देने लगा।

    फिर तस्वीर के नीचे लिखी तारीख अपने आप बदल गई।

    11 अगस्त 2026 मिट गई।

     

    उसकी जगह लिखा आया अगला नाम: अमन की मां।

     

    और उसी पल हवेली का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    धड़ाम!

    उस दिन के बाद देवगढ़ गांव में एक और बात मशहूर हो गई “जिस घर में कोई मरता नहीं था, वहां रहने वालों की उम्र जरूर बढ़ती थी… लेकिन हर पीढ़ी के साथ वह घर एक नए इंसान को अपना बना लेता था।”

    और सबसे डरावनी बात?

    बस उसकी दीवार पर अब एक नई तस्वीर के लिए जगह खाली थी।

  • बारिश की श्रापित मेढकी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश का मेढ़क और सात जन्मों की मेढ़की

     

    शहर से थोड़ा दूर एक पुराना जंगल था। उस जंगल के बीचों-बीच एक टूटी हुई हवेली थी, जिसके बारे में कहा जाता था कि वहां कभी एक बहुत ही घमंडी राजकुमार रहता था।

     

    उस राजकुमार का नाम था एडविन।

     

    एडविन देखने में बेहद सुंदर और राजसी था, लेकिन उसके अंदर घमंड कूट-कूटकर भरा हुआ था। उसे अपनी दौलत, अपने महल और अपनी खूबसूरती पर बहुत नाज था।

     

    एक दिन तेज बारिश हो रही थी। एडविन अपने घोड़े पर बैठकर जंगल के रास्ते से गुजर रहा था। रास्ते में उसे एक बूढ़ी औरत दिखाई दी, जो बारिश में भीगती हुई सड़क किनारे बैठी थी।

     

    बूढ़ी औरत ने हाथ उठाकर कहा,

     

    “बेटा, मुझे थोड़ा सहारा दे दो। बारिश रुकने तक मुझे कहीं बैठने की जगह चाहिए।”

     

    एडविन ने घमंड से उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरे पास तुम्हारे लिए समय नहीं है। रास्ते से हटो।”

     

    बूढ़ी औरत ने फिर कहा,

     

    “बस थोड़ी देर के लिए मुझे अपने महल में जगह दे दो।”

     

    एडविन हंस पड़ा।

     

    “तुम जैसी गरीब औरत मेरे महल में? वहां तुम्हारे लिए जगह नहीं है।”

     

    बूढ़ी औरत की आंखों में अचानक एक अजीब सी चमक आई।

     

    उसने शांत आवाज में कहा,”जिस खूबसूरती और राजसी जिंदगी पर तुम्हें इतना घमंड है, वही तुमसे छिन जाएगी। अब तुम तब तक इंसान नहीं बनोगे, जब तक तुम्हें सच्चा प्यार नहीं मिल जाता।”

     

    एडविन कुछ समझ पाता, उससे पहले ही आसमान में बिजली चमकी।

     

    अगले ही पल वह गायब हो गया।

    जब उसकी आंख खुली तो वह एक छोटे से गंदे पानी के गड्ढे में पड़ा था।

    वह अब राजकुमार नहीं था।वह एक मेढ़क बन चुका था।

     

    एडविन ने पानी में अपना चेहरा देखा और घबरा गया।

     

    “ये क्या हो गया?”

    उसने बोलने की कोशिश की, लेकिन उसके मुंह से सिर्फ टर्र-टर्र की आवाज निकली।

    दिन बीतते गए।

     

    बारिश आती तो नालियों और सड़कों का पानी बहकर जंगल के उस हिस्से में जमा हो जाता। वही गंदा पानी अब एडविन का घर बन गया था।

     

    महल की जगह कीचड़ थी।

    मखमली बिस्तर की जगह गीली मिट्टी थी।

     

    और राजसी भोजन की जगह छोटे-छोटे कीड़े।

     

    एडविन को धीरे-धीरे अपनी पुरानी जिंदगी याद आती और वह दुखी हो जाता।

     

    उधर उसी जंगल में एक छोटी सी मेढ़की रहती थी।

     

    उसका नाम था लिली।

     

    लेकिन लिली भी कोई साधारण मेढ़की नहीं थी।

     

    वह एक जादुई मेढ़की थी, जिसे भी एक श्राप मिला हुआ था।

     

    उसे अपनी जिंदगी के सात जन्म मेढ़की बनकर बिताने थे।

     

    लेकिन उसके श्राप में एक शर्त थी।

     

    “जब तक कोई इंसान तुम्हें तुम्हारे रूप के कारण नहीं, बल्कि तुम्हारे दिल के कारण सच्चा प्यार नहीं देगा, तब तक तुम अपने असली रूप में वापस नहीं आ पाओगी।”

     

    लिली को यह बात बचपन से पता थी।

     

    इसीलिए वह हमेशा सोचती थी कि शायद उसके लिए इंसानी प्यार कभी लिखा ही नहीं गया।

     

    एक शाम बहुत तेज बारिश हुई।

     

    बारिश का पानी बहते-बहते उसी गंदे गड्ढे में आ गया जहां एडविन रहता था।

     

    अचानक एक छोटी सी आवाज आई।

     

    “बचाओ!”

     

    एडविन ने देखा, लिली तेज पानी में बह रही थी।

     

    वह तुरंत पानी में कूद पड़ा।

     

    उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर लिली को एक पत्थर के पीछे पहुंचा दिया।

     

    लिली ने कांपते हुए उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे बचाया?”

     

    एडविन ने कुछ नहीं कहा।

     

    वह बस चुपचाप दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    लिली मुस्कुराई।

     

    “तुम बाकी मेढ़कों जैसे नहीं हो।”

     

    एडविन के मन में पहली बार किसी ने उसके लिए अच्छी बात कही थी।

     

    अगले दिन से दोनों साथ रहने लगे।

     

    लिली बहुत बातूनी थी।

     

    वह हर छोटी-बड़ी बात एडविन को बताती।

     

    कभी कहती,

     

    “देखो, आज बारिश का पानी कितना साफ है।”

     

    कभी कहती,

     

    “उस पेड़ पर जो पीला फूल खिला है, वो मुझे बहुत पसंद है।”

     

    एडविन पहले उसकी बातें सुनकर परेशान होता, लेकिन धीरे-धीरे उसे लिली की आवाज अच्छी लगने लगी।

     

    एक दिन लिली ने पूछा,

     

    “तुम हमेशा इतने उदास क्यों रहते हो?”

     

    एडविन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “क्योंकि मैं पहले कोई और था।”

     

    “कौन?”

     

    “एक राजकुमार।”

     

    लिली हंस पड़ी।

     

    “तुम? राजकुमार?”

     

    एडविन को बुरा लगा।

     

    “हंस क्यों रही हो?”

     

    लिली ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि राजकुमार तो बहुत घमंडी होते हैं। तुम तो इतने शांत हो।”

     

    एडविन ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं भी घमंडी था। बहुत ज्यादा।”

     

    फिर उसने उसे अपना पूरा सच बता दिया।

     

    लिली काफी देर तक चुप रही।

     

    उसने कहा,

     

    “शायद तुम्हें ये श्राप सजा देने के लिए नहीं, बदलने के लिए मिला है।”

     

    ये बात एडविन के दिल में उतर गई।

     

    समय गुजरता गया।

     

    बारिश का मौसम खत्म होने लगा।

     

    लेकिन एडविन और लिली की दोस्ती गहरी होती गई।

     

    एक रात अचानक जंगल में भयंकर बारिश शुरू हो गई।

     

    नाले का पानी तेजी से बढ़ने लगा।

     

    लिली पानी में फंस गई।

     

    एडविन उसे बचाने के लिए दौड़ा, लेकिन तेज बहाव में खुद भी बहने लगा।

     

    लिली चिल्लाई,

     

    “एडविन!”

     

    उसने पास की एक बेल पकड़ ली और पूरी ताकत से एडविन की तरफ बढ़ी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे को पकड़ लिया।

     

    काफी कोशिश के बाद वे एक बड़े पत्थर पर पहुंच गए।

     

    बारिश में दोनों चुपचाप बैठे रहे।

     

    लिली ने धीरे से कहा,

     

    “अगर तुम कभी इंसान बन गए तो मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

     

    एडविन ने उसकी तरफ देखा।

     

    पहली बार उसके मन में अपने पुराने महल, सोने और राजगद्दी से ज्यादा किसी और की चिंता थी।

     

    उसने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता मैं इंसान बनूंगा या नहीं। लेकिन इतना जानता हूं कि तुम्हें भूलना मेरे लिए सबसे मुश्किल होगा।”

     

    लिली की आंखों में चमक आ गई।

     

    अगली सुबह सूरज निकला।

     

    दोनों गंदे पानी के उसी छोटे से तालाब के किनारे बैठे थे।

     

    अचानक आसमान से सुनहरी रोशनी उतरी।

     

    वही बूढ़ी औरत उनके सामने आ खड़ी हुई।

     

    लिली डर गई।

     

    एडविन तुरंत उसके आगे आ गया।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “डरो मत। मैं तुम्हें सजा देने नहीं आई।”

     

    उसने एडविन की तरफ देखा।

     

    “राजकुमार, तुम्हारा घमंड खत्म हो चुका है। अब तुमने समझ लिया है कि किसी की कीमत उसके रूप या हैसियत से नहीं होती।”

     

    फिर उसने लिली की तरफ देखा।

     

    “और तुम्हारा श्राप भी अब खत्म हो सकता है।”

     

    अचानक दोनों के चारों तरफ सुनहरी रोशनी फैल गई।

     

    कुछ ही पलों में वहां दो इंसान खड़े थे।

     

    एडविन फिर से राजकुमार बन चुका था।

     

    और लिली एक सुंदर लड़की के रूप में उसके सामने खड़ी थी।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखकर हैरान रह गए।

     

    बूढ़ी औरत ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “सच्चा प्यार वही है जो बुरे समय में साथ रहे। तुम्हें इंसान बनाने वाली चीज कोई जादू नहीं, बल्कि तुम्हारा बदला हुआ दिल था।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    एडविन ने लिली की तरफ देखा।

     

    अब उसके सामने एक राजकुमार नहीं, बल्कि वही साधारण दिल वाला लड़का खड़ा था जिसे लिली ने गंदे पानी के बीच जाना था।

     

    एडविन ने कहा,

     

    “मुझे राजमहल वापस मिल गया, लेकिन अगर तुम मेरे साथ नहीं हो तो वो महल मेरे लिए फिर से खाली है।”

     

    लिली मुस्कुराई।

     

    “और मुझे अपने सात जन्मों का श्राप खत्म होने की खुशी से ज्यादा इस बात की खुशी है कि मुझे मेरा दोस्त वापस मिल गया।”

     

    उस दिन के बाद एडविन ने कभी अपनी दौलत और हैसियत पर घमंड नहीं किया।

     

    उसने जंगल के पास रहने वाले गरीब लोगों के लिए एक बड़ा आश्रय बनवाया, जहां बारिश के दिनों में कोई भी इंसान भीगने के लिए मजबूर न हो।

     

    और जब भी बारिश होती, एडविन और लिली उस पुराने तालाब के पास जरूर जाते।

     

    क्योंकि वहीं गंदे पानी के बीच एक घमंडी राजकुमार ने अपना घमंड खोया था…

     

    और वहीं एक मेढ़की ने उसे सिखाया था कि सच्चा प्यार चेहरे से नहीं, दिल से पहचाना जाता है।