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  • Dil sabhal ja jara part – 11

    Dil sabhal ja jara part – 11

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 11 “दिल की अनकही हलचल”

     

    शिमला की सर्दियां शुरू हो चुकी थीं। सुबह-सुबह कोहरा इतना घना कि ठाकुर हाउस का लॉन भी धुंधला दिखता। प्रिया अपनी बालकनी में खड़ी थी, हाथ में गर्म चाय का मग, और मन में उलझनें। विक्रांत और ठाकुर-राठौर की पुरानी दुश्मनी का सच अब सबके सामने था। अवनी ने कॉलेज में अफवाह फैला दी थी – “प्रिया और विक्रांत साथ घूम रहे हैं, लेकिन उनके खानदान सदियों से दुश्मन हैं।”

     

    प्रिया को बुरा लग रहा था। विक्रांत अच्छा दोस्त बन रहा था, लेकिन अब हर मुलाकात पर एक अनजाना दबाव महसूस होता। और सबसे बड़ी उलझन थी आरव भैया की।

     

    आरव पिछले कुछ दिनों से थोड़ा अलग लग रहा था। पहले जहां वो प्रिया को हर समय चिढ़ाता, हंसाता था, अब उसकी नजरें प्रिया पर टिकतीं और फिर जल्दी हट जातीं। बात करते वक्त आवाज में एक अजीब सी गर्माहट आ जाती। प्रिया ने नोटिस किया, लेकिन समझ नहीं पाई। आखिर आरव तो उसका भाई था – दिल से, अगर खून से नहीं भी।

     

    एक शाम कॉलेज से लौटते वक्त आरव कार लेकर आया। रिया भी साथ थी। रिया ने बैक सीट पर बैठते हुए कहा, “भैया, आज प्रिया को विक्रांत ने फिर मैसेज किया था। कॉफी के लिए पूछ रहा था।”

     

    आरव का चेहरा एक पल को सख्त हो गया। उसने आईने से प्रिया को देखा। “तू जाएगी?”

     

    प्रिया ने कंधे उचकाए। “नहीं भैया। अभी एग्जाम हैं। और… दुश्मनी वाली बात भी है ना।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली, लेकिन खुद को छिपाने की कोशिश की। “हां, सही है। पुरानी बातें भूलना आसान नहीं।”

     

    घर पहुंचकर रिया कमरे में प्रिया के पास आई। “यार, तुझे नहीं लगता आरव भैया थोड़े… जल रहे हैं? विक्रांत का नाम लेते ही मूड ऑफ!”

     

    प्रिया हंस पड़ी। “पागल, वो बस प्रोटेक्टिव हैं। भाई हैं ना।”

     

    रिया ने आंख मारी। “भाई? खून का नहीं ना? और भैया की नजरें… कुछ और कह रही हैं।”

     

    प्रिया चुप हो गई। रिया की बात मन में घर कर गई।

     

    रात को डिनर के बाद आरव और प्रिया लॉन में टहल रहे थे। ठंड थी, प्रिया ने शॉल ओढ़ी। आरव ने अपनी जैकेट उतारकर उसके कंधों पर डाल दी। “ठंड लग जाएगी।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “भैया, तुम्हें खुद ठंड नहीं लगेगी?”

     

    आरव ने पास आकर कहा, “तुझे ठंड लगे, ये मुझे बर्दाश्त नहीं।”

     

    उनकी आंखें मिलीं। एक पल को समय रुक सा गया। आरव की नजरें प्रिया के चेहरे पर टिकीं – बालों की लट, आंखें, होंठ। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि प्रिया उसके लिए सिर्फ बहन नहीं… कुछ और है। वो एहसास जो सालों से दबा था, अब धीरे-धीरे बाहर आ रहा था। लेकिन वो खुद से लड़ रहा था। “ये गलत है… वो मेरी बहन है… दिल से।”

     

    प्रिया ने भी कुछ फील किया। आरव की नजरों में वो गर्माहट नई थी। पहले भाई वाली, अब… कुछ और। उसका चेहरा गर्म हो गया। वो जल्दी से नजरें हटा ली। “भैया… चलो अंदर चलते हैं।”

     

    आरव ने सिर हिलाया। लेकिन रात को वो सो नहीं पाया। पुरानी यादें आ रही थीं – छोटी प्रिया को गोद में उठाना, उसके साथ खेलना। लेकिन अब प्रिया बड़ी हो गई थी। खूबसूरत, स्ट्रॉन्ग, और उसके दिल के सबसे करीब।

     

    अगले दिन कॉलेज में नया ट्विस्ट आया।

     

    विक्रांत प्रिया के पास आया। “प्रिया, मुझे कुछ दिखाना है। दादी की डायरी में एक पुराना लेटर मिला – ठाकुर और राठौर की दुश्मनी का असली कारण।”

     

    लाइब्रेरी के कोने में दोनों बैठे। लेटर में लिखा था – “1947 में ठाकुर हरि सिंह और राठौर विक्रम सिंह सबसे अच्छे दोस्त थे। दोनों ने मिलकर एक बड़ा बागान खरीदा था। लेकिन आजादी के बाद एक तीसरा आदमी – ब्रिटिश अफसर का एजेंट – ने दोनों को आपस में लड़वा दिया। झूठी अफवाह फैलाई कि एक ने दूसरे को धोखा दिया। असल में वो एजेंट जमीन हड़पना चाहता था। दोनों खानदानों ने सालों लड़ाई की, लेकिन जमीन एजेंट ले उड़ा।”

     

    प्रिया हैरान। “तो दुश्मनी झूठी थी? किसी तीसरे की साजिश?”

     

    विक्रांत ने कहा, “हां। दादी लिखती हैं कि अगर कभी ठाकुर और राठौर फिर मिलें तो सच बाहर लाएं।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। “तो हम… मिल गए।”

     

    विक्रांत ने उसका हाथ छुआ। “प्रिया, शायद ये संकेत है। हम पुरानी गलतियां सुधार सकते हैं।”

     

    प्रिया ने हाथ नहीं छुड़ाया, लेकिन दिल में आरव की याद आई। वो कन्फ्यूज हो गई।

     

    शाम को घर लौटकर प्रिया ने आरव को लेटर दिखाया। आरव ने पढ़ा। उसका चेहरा बदल गया। “तो विक्रांत ने ये बताया?”

     

    प्रिया ने हां कहा। आरव ने कुछ देर चुप रहकर कहा, “अच्छा है। पुरानी दुश्मनी खत्म हो।”

     

    लेकिन उसकी आवाज में कुछ था – जलन? दर्द?

     

    रात को प्रिया अपने कमरे में थी। आरव दरवाजे पर खड़ा था। “प्रिया… विक्रांत से मिलकर अच्छा लगा?”

     

    प्रिया ने कहा, “हां भैया। वो अच्छा लड़का है। और अब दुश्मनी भी झूठी निकली।”

     

    आरव पास आया। “लेकिन… अगर वो तेरे करीब आए तो?”

     

    प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “भैया… तुम क्यों ऐसा पूछ रहे हो?”

     

    आरव ने सांस रोकी। उसका दिल चीख रहा था – “क्योंकि मैं तुझे खोना नहीं चाहता। क्योंकि तू मेरे लिए सिर्फ बहन नहीं…” लेकिन वो बोल नहीं पाया। बस बोला, “बस… तेरी खुशी चाहता हूं।”

     

    वो चला गया। प्रिया बिस्तर पर लेट गई। उसका दिल भी उलझा था। आरव की नजरें, उसकी केयर – वो भाई वाली थी या कुछ और? और विक्रांत की दोस्ती – वो आगे बढ़ेगी या नहीं?

     

    बाहर बर्फ गिरने लगी थी। शिमला की पहली बर्फ। रोमांच शुरू हो रहा था – दिल का रोमांच। आरव के मन में प्रिया के लिए वो एहसास धीरे-धीरे पनप रहा था जो वो खुद से छिपा रहा था। प्रिया भी कुछ फील कर रही थी, लेकिन समझ नहीं पा रही।

     

    और विक्रांत? वो भी प्रिया को पसंद करने लगा था। लेकिन अब त्रिकोण बनने की शुरुआत थी – धीरे-धीरे, बिना किसी जल्दबाजी के।

     

    अवनी दूर से सब देख रही थी। मुस्कुरा रही थी। “अब असली खेल शुरू होगा।”

     

    बर्फ गिर रही थी। दिलों में नई हलचल शुरू हो रही थी।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 10

    Dil sabhal ja jara part – 10

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 10 aarav ka chhupa huaa pakch 

    कॉलेज का सेशन अब अंतिम चरण में था। एग्जाम नजदीक थे, लेकिन ठाकुर हाउस में एक नई हलचल थी। प्रिया विक्रांत की फैमिली स्टोरी से इतनी प्रभावित हुई थी कि उसने रिया से कहा, “यार, हम सबके राज़ खुल रहे हैं। लेकिन आरव भैया के बारे में हमें क्या पता? वो तो हमेशा प्रोटेक्टिव रहते हैं, अपनी बात कभी नहीं बताते।”

     

    रिया ने आंखें चमकाईं। “सच में! चल, आज भैया से पूछते हैं। पूरी फैमिली हिस्ट्री।”

     

    शाम को ठाकुर हाउस के बड़े ड्राइंग रूम में सब इकट्ठे थे। राजेश पापा न्यूज पढ़ रहे थे, आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) चाय पी रहे थे, कमला दाई किचन से समोसे लेकर आईं। आरव लैपटॉप पर होटल्स का काम देख रहा था। प्रिया और रिया सोफे पर बैठीं।

     

    रिया ने सीधा हमला किया। “आरव भैया, अब आपकी बारी! हमने विक्रांत की पूरी राजघराना स्टोरी सुनी। प्रिया की तो पूरी जिंदगी फिल्म बन गई। अब आप बताओ – ठाकुर फैमिली की असली हिस्ट्री क्या है? सिर्फ होटल्स और प्रॉपर्टी नहीं, पूरा बैकग्राउंड!”

     

    आरव ने लैपटॉप बंद किया और मुस्कुराया। “रिया, तू कभी नहीं सुधरेगी। ठीक है, आज बताता हूं। लेकिन ये लंबी कहानी है।”

     

    सब ध्यान से सुनने लगे। आरव ने गहरी सांस ली और शुरू किया।

     

    “ठाकुर फैमिली की जड़ें हिमाचल के पुराने राजपूत खानदान से हैं। मेरे परदादाजी – ठाकुर हरि सिंह – 1900 के आसपास शिमला के पास एक छोटी रियासत के मुखिया थे। ब्रिटिश टाइम में वो राजा नहीं थे, लेकिन जमींदार जरूर थे। बड़े-बड़े सेब के बागान, जंगल, और शिमला में दो-तीन पुराने बंगले। ब्रिटिश अफसरों से अच्छे रिश्ते थे, इसलिए प्रिवी पर्स मिलता था। परदादाजी बहुत शौकीन थे – शिकार, घुड़सवारी, और पोलो। शिमला के मॉल रोड पर उनका बंगला आज भी है – वो जो अब म्यूजियम बन गया है।”

     

    प्रिया हैरान थी। “भैया, ये तो पता नहीं था!”

     

    आरव हंसा। “सुन तो पूरी। आजादी के बाद प्रिवी पर्स खत्म हुआ। परदादाजी ने समझदारी दिखाई। सेब के बागानों को कमर्शियल बना दिया। 1960 में मेरे दादाजी – ठाकुर विजय सिंह – ने पहला होटल खोला – ‘ठाकुर पैलेस’। वो शिमला का पहला लग्जरी होटल था। विदेशी टूरिस्ट आते थे। दादाजी बहुत सख्त थे। आर्मी बैकग्राउंड था उनका। 1962 के इंडो-चाइना वॉर में फाइट किया। लेकिन घर में अनुशासन इतना कि कोई बोलने की हिम्मत नहीं करता था।”

     

    राजेश पापा ने सिर हिलाया। “तेरे दादाजी ने मुझे भी सिखाया था बिजनेस।”

     

    आरव आगे बोला, “दादाजी की दो शादियां हुईं। पहली पत्नी से कोई बच्चा नहीं। दूसरी शादी से पापा (राजेश ठाकुर) पैदा हुए। लेकिन दूसरी पत्नी को घर वाले नहीं अपनाते थे। दादाजी की मौत 1988 में हुई – हार्ट अटैक। उसके बाद होटल्स का बिजनेस पापा ने संभाला। पापा ने चेन बढ़ाई – अब शिमला, मनाली, धर्मशाला में 5 होटल्स हैं। लेकिन मम्मी (रानी) से शादी लव मैरिज थी। मम्मी गरीब फैमिली से थीं – दिल्ली की। दादाजी-दादी को पसंद नहीं थी। फिर भी पापा ने शादी की। मैं तब 10 साल का था।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। आरव ने उसकी तरफ देखा और धीरे से कहा, “मम्मी बहुत अच्छी थीं। मुझे और तुझे बहुत प्यार करती थीं। लेकिन घर में तनाव रहता था। विक्रम की मां (मेरी सौतेली मां) हमेशा जलती थीं। प्रॉपर्टी का लालच था। मम्मी की मौत के बाद सब बदल गया। पापा टूट गए। मैं अकेला हो गया। कॉलेज गया दिल्ली, फिर बिजनेस संभालने लगा। लेकिन अंदर से हमेशा कमी महसूस होती थी – छोटी बहन की।”

     

    रिया ने पूछा, “भैया, और कोई राज़? जैसे विक्रांत की दादी वाला?”

     

    आरव चुप हुआ। फिर बोला, “हां, एक बड़ा राज़ है। ठाकुर और राठौर फैमिली की पुरानी दुश्मनी। 1940 के दशक में परदादाजी और विक्रांत के परदादाजी (महाराजा विक्रम सिंह) के बीच जमीन का विवाद था। शिमला के पास एक बड़ा जंगल – दोनों दावा करते थे। कोर्ट केस चला। आखिर में ठाकुर फैमिली हार गई। परदादाजी ने बदला लिया – राठौर की एक प्रॉपर्टी पर कब्जा करने की कोशिश की। बात इतनी बढ़ी कि दोनों खानदानों में सालों दुश्मनी रही। शादियां तक रुक गईं।”

     

    प्रिया चौंकी। “तो विक्रांत और हमारी फैमिली… दुश्मन?”

     

    आरव ने सिर हिलाया। “हां। इसलिए जब विक्रांत कॉलेज में आया तो मुझे शक हुआ। लेकिन अब लगता है वो अच्छा लड़का है। पुरानी बातें पुरानी रहनी चाहिए।”

     

    कमला दाई ने कहा, “बेटा, तेरे दादाजी ने एक गलती और की थी। रानी बहू को अपनाने से इंकार किया। कहा कि गरीब घर की लड़की ठाकुर खानदान में नहीं आएगी। लेकिन राजेश ने नहीं मानी।”

     

    राजेश पापा ने पहली बार खुलकर बोला। “मैंने रानी से प्यार किया था। लेकिन गलती की कि उसे फैमिली के प्रेशर से बचा नहीं सका। प्रिया के लापता होने के बाद मैंने खुद को कभी माफ नहीं किया।”

     

    आरव ने आगे कहा, “और मेरा अपना राज़ – मैं होटल्स नहीं संभालना चाहता था। बचपन में आर्मी जॉइन करना चाहता था। लेकिन पापा की तबीयत खराब होने लगी तो जिम्मेदारी ले ली। अब NGO चलाता हूं चुपके से – अनाथ बच्चों के लिए। शिमला के बाहर एक छोटा सा आश्रम सपोर्ट करता हूं।”

     

    प्रिया की आंखें चमक उठीं। “भैया… ये तो पता नहीं था!”

     

    आरव शर्मा गया। “बस, छोटा सा काम। ताकि कोई और प्रिया जैसा अकेला न महसूस करे।”

     

    रिया ने ताली बजाई। “वाह भैया! हीरो हो तुम। लेकिन प्रिया, अब समझी क्यों आरव इतना प्रोटेक्टिव है? बहन के लिए कुछ भी!”

     

    सब हंसे। लेकिन प्रिया के मन में नया सवाल – अगर ठाकुर और राठौर की दुश्मनी है, तो विक्रांत और वो करीब कैसे आएंगे?

     

    रात को प्रिया बालकनी में खड़ी थी। आरव आया। “क्या सोच रही है?”

     

    “भैया, तुमने इतना कुछ सहा। लेकिन कभी शिकायत नहीं की।”

     

    आरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “तू आ गई ना। अब सब ठीक है।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। भाई का प्यार – सबसे बड़ा सहारा। रोमांस? विक्रांत अच्छा है, लेकिन अभी दोस्ती ही काफी थी।

     

    अगले दिन कॉलेज में अवनी ने विक्रांत को कोने में लिया। “विक्रांत, प्रिया से दूर रह। ठाकुर और राठौर कभी एक नहीं हो सकते।”

     

    विक्रांत ने पूछा, “क्यों?”

     

    अवनी मुस्कुराई। “क्योंकि तेरे दादाजी ने ठाकुर की जमीन छीनी थी। और अब प्रिया सब वापस लेना चाहती है।”

     

     

  • Dil sabhal ja jara

    Dil sabhal ja jara

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part – 9 Vikrant ka raj

     

    ठाकुर हाउस में अब सब कुछ नॉर्मल लगने लगा था। आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) कुछ दिन शिमला में रुके थे। उन्होंने राजेश पापा से लंबी बातें कीं, पुरानी यादें ताजा कीं, और प्रिया को दोनों पापाओं का प्यार मिल रहा था। आरव और प्रिया का रिश्ता और गहरा हो गया था – भाई-बहन वाला नहीं, बल्कि दोस्ती और समझदारी वाला। लेकिन प्रिया अभी भी किसी रोमांटिक रिश्ते के लिए तैयार नहीं थी। विक्रांत के मैसेज आते थे, लेकिन वो सिर्फ “हाय-हैलो” तक ही जवाब देती।

     

    एक दिन कॉलेज की लाइब्रेरी में प्रिया और रिया बैठी थीं। रिया ने किताब बंद की और बोली, “यार, विक्रांत तुझसे बहुत इंप्रेस्ड है। रोज क्लास में तेरी तरफ देखता रहता है। तू क्यों इतना दूर भाग रही है?”

     

    प्रिया ने किताब में नजरें गड़ाए कहा, “रिया, अभी मन नहीं है। इतने राज़ खुल रहे हैं, जिंदगी स्थिर नहीं हुई। विक्रांत अच्छा है, लेकिन मुझे उसके बारे में ज्यादा पता नहीं।”

     

    रिया ने आंखें घुमाई। “अरे, पता कर ले! मैंने थोड़ा पूछताछ किया है। देहरादून से है, फैमिली बैकग्राउंड अच्छा है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि उसकी फैमिली में कोई पुराना राज़ है। अवनी ने तो कुछ हिंट भी दिया था।”

     

    प्रिया चौंकी। “अवनी? वो क्यों बोलेगी?”

     

    “जलन। लेकिन शायद सच हो। चल, आज विक्रांत से पूछते हैं।”

     

    उसी शाम कॉलेज कैंटीन में विक्रांत प्रिया के पास आया। “प्रिया, कल संडे है। लाइब्रेरी ग्रुप स्टडी? या फिर माल रोड पर वॉक?”

     

    प्रिया ने पहली बार खुलकर मुस्कुराया। “विक्रांत, स्टडी तो ठीक है, लेकिन पहले तू अपनी फैमिली के बारे में बता। कहां से है तू? घर में कौन-कौन?”

     

    विक्रांत थोड़ा रुक गया। फिर मुस्कुराया। “चलो, आज बताता हूं। पूरी स्टोरी।”

     

    तीनों (प्रिया, रिया, विक्रांत) कॉलेज के पीछे वाली बेंच पर बैठ गए। सनसेट हो रहा था। विक्रांत ने गहरी सांस ली और अपनी कहानी शुरू की।

     

    “मेरा पूरा नाम विक्रांत सिंह राठौर है। मैं देहरादून का हूं, मसूरी के पास एक छोटे से हिल स्टेशन का। मेरी फैमिली पुरानी राजघराने से ताल्लुक रखती है – राठौर राजपूत। मेरे दादाजी महाराजा विक्रम सिंह राठौर थे, गढ़वाल के छोटे से रियासत के आखिरी राजा। आजादी के बाद प्रिवी पर्स खत्म हो गया, जमीनें चली गईं, लेकिन नाम और कुछ पुरानी प्रॉपर्टी बची रही।”

     

    प्रिया और रिया ध्यान से सुन रहे थे।

     

    “दादाजी बहुत सख्त थे। ब्रिटिश टाइम में उन्होंने इंडियन आर्मी में सर्व किया, फिर आजादी के बाद राजनीति में आए। लेकिन 1980 में एक बड़ा स्कैंडल हुआ। दादाजी पर आरोप लगा कि उन्होंने अपनी रियासत की जमीन अवैध तरीके से बेची। कोर्ट केस चला, प्रॉपर्टी जब्त हो गई। दादाजी का दिल टूट गया। 1985 में हार्ट अटैक से गुजर गए।”

     

    विक्रांत की आवाज में दर्द था।

     

    “उसके बाद मेरे पापा – कर्नल अजय सिंह राठौर – ने फैमिली संभाली। पापा आर्मी में थे। कश्मीर में पोस्टिंग, 1999 कारगिल वॉर में फाइट किया। वीर चक्र मिला। लेकिन घर की हालत खराब थी। पापा ने देहरादून में एक छोटा सा स्कूल खोला – ‘राठौर मिलिट्री एकेडमी’। आज वो मिडिल क्लास फैमिली का अच्छा स्कूल है। मां – राधा राठौर – स्कूल की प्रिंसिपल हैं। सख्त, लेकिन बच्चों से बहुत प्यार करती हैं।”

     

    रिया ने पूछा, “भाई-बहन?”

     

    विक्रांत हंसा। “एक छोटी बहन है – वैष्णवी। 16 साल की, बिल्कुल शैतान। घुड़सवारी करती है, पोलो खेलती है। हमारी पुरानी प्रॉपर्टी में एक छोटा सा स्टेबल बचा है, वहां घोड़े पालते हैं। वैष्णवी का सपना है ओलंपिक में घुड़सवारी में मेडल लाना।”

     

    प्रिया ने पूछा, “तो तू शिमला क्यों आया? देहरादून में ही पढ़ सकता था।”

     

    विक्रांत चुप हुआ। फिर बोला, “ये असली वजह है। फैमिली में एक पुराना राज़ है। मेरे दादाजी की दूसरी शादी थी – पहली पत्नी से कोई बच्चा नहीं हुआ, तो दूसरी शादी की। लेकिन दूसरी पत्नी – मेरी दादी – को घर वाले नहीं अपनाते थे। दादाजी की मौत के बाद दादी को घर से निकाल दिया गया। वो शिमला चली गईं। वहां एक छोटा सा घर था – पुरानी प्रॉपर्टी का हिस्सा। दादी ने अकेले जीवन गुजारा। 5 साल पहले गुजर गईं।”

     

    “उनकी वसीयत में लिखा था कि उनका शिमला वाला घर और कुछ ज्वेलरी उनके पोते को मिलेगी – अगर वो शिमला कॉलेज में पढ़ाई करे। दादी चाहती थीं कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें। पापा नहीं चाहते थे कि मैं आऊं, क्योंकि पुराने घाव थे। लेकिन मैं आ गया। घर अब मेरा है – छोटा सा, पुराना बंगला माल रोड के पास। मैं वीकेंड पर वहां रहता हूं।”

     

    प्रिया की आंखें चौड़ी हो गईं। “तो तू अकेला रहता है?”

     

    “हां। एक पुरानी केयरटेकर आंटी है – लक्ष्मी आंटी। वो दादी की टाइम से हैं। घर में दादी की पुरानी चीजें हैं – डायरी, फोटोज, ज्वेलरी। मैं धीरे-धीरे सब समझ रहा हूं।”

     

    रिया ने कॉमेडी ऐड की। “वाह, राजकुमार! पुराना बंगला, घोड़े, ज्वेलरी। प्रिया, अब तो मान जा!”

     

    प्रिया हंसी, लेकिन विक्रांत की आंखों में दर्द देख रही थी।

     

    विक्रांत ने आगे बताया, “सबसे बड़ा राज़ ये है कि दादी को घर से निकालने की वजह सिर्फ प्रॉपर्टी नहीं थी। दादी ने दादाजी की मौत के पीछे साजिश का शक जताया था। कहा था कि बड़े भाई (मेरे पापा के चाचा) ने जहर दिया था। लेकिन प्रूफ नहीं था। दादी अकेली लड़ती रहीं। आखिर में हार गईं। मैं शिमला इसलिए आया क्योंकि दादी की डायरी में लिखा था – ‘सच ढूंढो, विक्रांत। राठौर खानदान का नाम साफ करो।’”

     

    प्रिया ने उसका हाथ थामा। “विक्रांत… तू अकेला नहीं है अब। हम हैं ना।”

     

    विक्रांत मुस्कुराया। “थैंक्स प्रिया। तेरी स्टोरी सुनकर मुझे लगा कि तू समझेगी। तूने भी तो इतना स्ट्रगल किया है।”

     

    रिया ने चिढ़ाया। “अब दोनों अनाथ राजकुमार-राजकुमारी मिल गए। परफेक्ट जोड़ी!”

     

    दोनों शर्मा गए। लेकिन प्रिया को अच्छा लगा। विक्रांत का बैकग्राउंड सुनकर उसे लगा कि वो भी स्ट्रगलर है – बाहर से चमक, अंदर दर्द।

     

    अगले संडे प्रिया और रिया विक्रांत के बंगले पर गईं। पुराना विक्टोरियन स्टाइल बंगला – बड़ा गार्डन, पुरानी फर्नीचर। लक्ष्मी आंटी ने स्वागत किया। “बेटा, तुम्हारी दादी बहुत अच्छी थीं। सबको मिस करती थीं।”

     

    विक्रांत ने दादी की डायरी दिखाई। उसमें पुराने लेटर्स थे – दादाजी के भाई की धमकियां, प्रॉपर्टी के पेपर्स। प्रिया ने पढ़ा। “विक्रांत, ये सीरियस है। हमें इंवेस्टिगेट करना चाहिए।”

     

    विक्रांत ने कहा, “हां। लेकिन डर लगता है। अगर सच में मर्डर था तो… फैमिली बिखर जाएगी।”

     

    रिया ने कहा, “डरो मत। हम तीनों मिलकर करेंगे। प्रिया तो एक्सपर्ट हो गई राज़ खोलने में!”

     

    शाम को बंगले के गार्डन में तीनों बैठे। चाय पीते हुए विक्रांत ने प्रिया से कहा, “प्रिया, मुझे तेरी स्ट्रेंथ से इंस्पिरेशन मिलती है। तूने कभी हार नहीं मानी।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “तू भी नहीं मान रहा। हम साथ हैं।”

     

    कोई रोमांटिक कन्फेशन नहीं। बस दोस्ती गहरी हो रही थी। धीरे-धीरे।

     

    रात को ठाकुर हाउस लौटकर प्रिया ने आरव को सब बताया। आरव ने कहा, “प्रिया, विक्रांत अच्छा लग रहा है। लेकिन सावधानी से। अगर उसकी फैमिली में भी साजिश है तो…”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया, मैं समझदार हूं। अभी सिर्फ दोस्ती है।”

     

    आरव मुस्कुराया। लेकिन उसके दिल में कुछ और था। वो खुद नहीं समझ पा रहा था।

     

    अवनी कॉलेज में फिर घूर रही थी। वो विक्रम से मिली थी जेल में। विक्रम ने कहा था, “अवनी, प्रिया और विक्रांत को करीब मत आने दे। राठौर और ठाकुर का पुराना दुश्मनी है। अगर दोनों

    मिल गए तो हमारा खेल खत्म।”

     

    क्या पुरानी दुश्मनी थी? नया राज़ खुलने वाला था।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 8

    Dil sabhal ja jara part – 8

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 8 pita ki talas 

     

    ट्रेन की सीटी के साथ दिल्ली स्टेशन पर प्रिया उतरी। ठंडी हवा उसके चेहरे पर लगी, लेकिन दिल में गर्माहट नहीं थी। हाथ में मां की डायरी, जेब में पेंडेंट, और मन में सवालों का तूफान। शिमला से दिल्ली का सफर छोटा था, लेकिन प्रिया के लिए ये बीस साल पुराना राज़ खोलने वाला था। वो एक छोटे से गेस्ट हाउस में रुकी – बजट के अंदर, क्योंकि वो अभी भी अपनी स्कॉलरशिप वाली लड़की ही महसूस करती थी।

     

    सुबह हुई। प्रिया ने सर्च किया – डॉक्टर आदित्य शर्मा, रिटायर्ड कार्डियोलॉजिस्ट। एक पुराना हॉस्पिटल का एड्रेस मिला: “सर गंगा राम हॉस्पिटल, राजिंदर नगर”। लेकिन आदित्य अब वहां नहीं थे। एक कॉन्टैक्ट नंबर मिला – एक पुराने सहकर्मी का। प्रिया ने कॉल किया। आवाज कांपी, लेकिन हिम्मत बांधी।

     

    “हैलो… डॉक्टर आदित्य शर्मा से बात करनी है।”

     

    दूसरी तरफ से एक बुजुर्ग आवाज आई। “बेटी, आदित्य जी तो रिटायर हो चुके हैं। अब साउथ दिल्ली में एक छोटे से अपार्टमेंट में रहते हैं। लेकिन… आप कौन?”

     

    प्रिया ने हिचकिचाते हुए कहा, “एक पुरानी दोस्त की बेटी। मिलना चाहती हूं। एड्रेस?”

     

    एड्रेस मिल गया। प्रिया ने टैक्सी ली। रास्ते में वो डायरी पढ़ती रही। मां के शब्द: “आदित्य… मेरा पहला प्यार। हमारी शादी टूट गई क्योंकि उसके परिवार ने मना कर दिया। फिर रानी बनकर राजेश से शादी की। लेकिन प्रिया… वो तेरी है।”

     

    दिल्ली की भीड़भाड़ वाली सड़कें प्रिया को घुटन महसूस करा रही थीं। अपार्टमेंट पहुंची – पुराना, लेकिन साफ। फ्लैट नंबर 304। प्रिया ने बेल बजाई। दरवाजा खुला। सामने एक साठ के करीब आदमी खड़े थे – सफेद बाल, चश्मा, सादा कुर्ता-पायजामा। चेहरा थका हुआ, लेकिन आंखें गर्म।

     

    “जी… आप?” आदित्य ने पूछा।

     

    प्रिया की आंखें भर आईं। “अंकल… मैं प्रिया हूं। रानी की बेटी।”

     

    आदित्य का चेहरा सफेद पड़ गया। वो पीछे हटे, जैसे किसी पुरानी याद ने जोर का धक्का मारा हो। “प्रिया? रानी की…?” वो कमरे में चले गए। प्रिया अंदर आई। छोटा सा फ्लैट – दीवारों पर पुरानी तस्वीरें, किताबें, और एक टेबल पर मेडिकल जर्नल्स।

     

    आदित्य ने पानी का गिलास थमाया। हाथ कांप रहे थे। “बेटी… बैठ। बताओ, कैसे पहुंची यहां?”

     

    प्रिया ने डायरी निकाली और मां का लेटर दिखाया। आदित्य ने पढ़ा। आंसू गिर पड़े। “रानी… वो तो कहती थीं कि बच्चा राजेश का है। लेकिन… आंखें… तेरी आंखें मेरी जैसी हैं।”

     

    प्रिया ने पूछा, “अंकल… आप मेरा पिता हैं ना?”

     

    आदित्य ने सिर हिलाया। फिर धीरे-धीरे अपना बैकग्राउंड बताना शुरू किया। वो कुर्सी पर बैठे, जैसे बीस साल पुरानी कहानी को फिर से जी रहे हों।

     

    “मैं आदित्य शर्मा, 1965 में जन्मा। दिल्ली के एक मिडिल क्लास परिवार में। पिता सरकारी क्लर्क थे, मां टीचर। बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहता था। एम्स से एमबीबीएस किया, फिर कार्डियोलॉजी में स्पेशलाइजेशन। 90 के दशक में सर गंगा राम हॉस्पिटल में जॉइन किया। वहां रानी से मिला। वो नर्स थी – हंसमुख, मेहनती। हमारी लव स्टोरी फिल्मी थी। हॉस्पिटल के गार्डन में कॉफी पीते, रातों को ड्यूटी के बाद बातें करते।”

     

    प्रिया सुन रही थी। “फिर?”

     

    “हम शादी करना चाहते थे। लेकिन मेरा परिवार… ब्राह्मण, और रानी का बैकग्राउंड अलग। उसके पिता ने भी मना किया। फिर राजेश ठाकुर आया – अमीर, प्रभावशाली। रानी ने मजबूरी में शादी कर ली। मैंने हार मान ली। हॉस्पिटल छोड़ दिया, प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की। लेकिन दिल टूटा। सालों तक सिंगल रहा। फिर 2005 में एक छोटी सी NGO शुरू की – ‘हृदय सेवा’। गरीबों के लिए फ्री हार्ट चेकअप। आज भी चल रही है, लेकिन छोटे स्तर पर।”

     

    प्रिया ने पूछा, “मां के बारे में… एक्सीडेंट?”

     

    आदित्य की आंखें नम हो गईं। “रानी ने कभी नहीं बताया कि तू मेरी बेटी है। लेकिन एक्सीडेंट की खबर सुनी तो… टूट गया। राजेश ने कहा बच्ची भी मर गई। मैंने विश्वास कर लिया। उसके बाद जीवन… बस चलता रहा। कोई शादी नहीं, कोई बच्चे नहीं। बस काम। अब रिटायर्ड हूं, पेंशन पर जीता हूं। NGO को देखता हूं।”

     

    प्रिया ने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। “अंकल… पापा… अब मैं हूं ना।”

     

    आदित्य रो पड़े। “प्रिया… तू… मेरी बेटी। रानी की तरह स्ट्रॉन्ग। लेकिन ठाकुर फैमिली? राजेश?”

     

    प्रिया ने सब बताया – आश्रम, शिमला, आरव, विक्रम की साजिश। आदित्य सुनते रहे। फिर बोले, “बेटी, मैं तेरे साथ हूं। लेकिन राजेश को क्या कहेंगे? वो तुझे अपना मानते हैं।”

     

    “पापा… राजेश अंकल ने मुझे अपनाया। लेकिन सच तो सच है।”

     

    दोपहर को दोनों NGO गए। ‘हृदय सेवा’ एक छोटा सा क्लिनिक था – गरीब इलाके में। आदित्य ने प्रिया को दिखाया – मरीजों की लाइन, फ्री मेडिसिन। “ये मेरा परिवार था। अब तू भी इसमें शामिल हो।”

     

    प्रिया को अच्छा लगा। वो एक छोटी बच्ची का चेकअप करने में मदद की। आदित्य मुस्कुराए। “तू डॉक्टर बनेगी?”

     

    “शायद। लेकिन पहले कॉलेज कंपलीट।”

     

    शाम को प्रिया ने फैसला लिया – अभी शिमला लौटेगी। लेकिन आदित्य को साथ ले जाएगी। “पापा, शिमला चलिए। आरव से मिलिए। सबको बताएंगे।”

     

    आदित्य हिचकिचाए। “बेटी, अचानक… राजेश क्या कहेंगे?”

     

    “वो समझेंगे। वो अच्छे हैं।”

     

    ट्रेन में दोनों बैठे। आदित्य ने पुरानी तस्वीरें दिखाईं – रानी के साथ। प्रिया ने देखा। “मां कितनी खूबसूरत।”

     

    “हां… और तू वैसी ही।”

     

    शिमला पहुंचे। ठाकुर हाउस में आरव इंतजार कर रहा था। प्रिया की चिट मिलने के बाद वो चिंतित था। रिया भी। दरवाजा खुला तो आरव ने प्रिया को गले लगाया। “कहां गई थी? डर गया था।”

     

    प्रिया ने आदित्य को इंट्रोड्यूस किया। “भैया… ये आदित्य शर्मा। मेरा… असली पिता।”

     

    आरव चौंका। रिया की आंखें बड़ी हो गईं। “क्या?”

     

    प्रिया ने डायरी दिखाई। सबने सुना। आरव ने आदित्य को देखा। पहले शॉक, फिर मुस्कुराहट। “अंकल… वेलकम। चाहे खून का हो या न हो, प्रिया हमारी बहन है। आप भी फैमिली।”

     

    पापा राजेश आए। आदित्य से मिले। दोनों पुराने दोस्त जैसे बात की। राजेश ने कहा, “आदित्य जी, प्रिया ने मुझे भी अपनाया। आप भी आइए।”

     

    रिया ने कहा “अब दो पापा? प्रिया, तू लकी है! लेकिन भैया, अब प्रिया को दो गुना प्रोटेक्ट करना पड़ेगा।”

     

    सब हंसे। लेकिन प्रिया का दिल हल्का था। रोमांस? अभी दूर। विक्रांत का मैसेज आया – “लौट आई? कॉफी?” प्रिया ने सिर्फ “हां, कल” लिखा। धीरे-धीरे।

     

    रात को प्रिया अपनी बालकनी में खड़ी थी। दो पिता, एक भाई, दोस्त। जिंदगी पूरी हो रही थी। लेकिन अवनी का वो तंज – “कुछ राज़ बाकी” – अभी गूंज रहा था। क्या और कुछ छिपा है?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 7

    Dil sabhal ja jara part – 7

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 7 dil ki uljhane

     

    ठाकुर हाउस की सुबह अब प्रिया के लिए नई रूटीन बन चुकी थी। वो जल्दी उठती, मां की तस्वीर के सामने दो मिनट खामोशी से खड़ी रहती, फिर किचन में पापा के लिए चाय बनाती। आरव नीचे आता तो दोनों भाई-बहन जैसे पहले की तरह हंसते-बोलते ब्रेकफास्ट करते। लेकिन अब हर हंसी के पीछे एक अनकही उलझन थी – रानी मां की डायरी का वो आखिरी पेज।

     

    प्रिया ने अभी तक किसी को नहीं बताया कि वो दिल्ली जाकर आदित्य शर्मा को ढूंढने का प्लान बना रही है। आरव को भी नहीं। उसे डर था कि अगर आरव को पता चला कि वो खून का भाई नहीं है, तो उनका रिश्ता बदल जाएगा। और प्रिया नहीं चाहती थी कि कुछ बदले। आरव उसके लिए अब भी वही था – ढाल, सहारा, सबसे करीबी।

     

    कॉलेज में दिन नॉर्मल चल रहे थे। विक्रांत क्लास में प्रिया के पास बैठता, नोट्स शेयर करता, लेकिन अब प्रिया थोड़ा दूर रहने लगी थी। विक्रांत की मुस्कुराहट अच्छी लगती थी, लेकिन दिल अभी किसी के लिए तैयार नहीं था। वो बस मुस्कुराकर बात टाल देती।

     

    एक दिन लंच में विक्रांत ने कहा, “प्रिया, वीकेंड पर माल रोड पर कॉफी पीने चलेंगी? सिर्फ दोस्तों की तरह।”

     

    प्रिया ने हिचकिचाते हुए कहा, “विक्रांत… अभी मैं थोड़ा बिजी हूं। फैमिली मैटर्स। बाद में देखते हैं।”

     

    विक्रांत ने निराश होकर मुस्कुराया। “कोई बात नहीं। जब मन करे बताना।”

     

    रिया ने साइड से देखकर प्रिया को चिढ़ाया, “यार, इतना अच्छा लड़का और तू मना कर रही है? कम से कम ट्राई तो कर!”

     

    प्रिया ने धीरे से कहा, “रिया, दिल अभी कहीं और उलझा हुआ है। समझ नहीं आ रहा क्या करूं।”

     

    रिया ने गंभीर होकर पूछा, “आरव से संबंधित?”

     

    प्रिया चुप रही। बस सिर हिलाया।

     

    शाम को घर लौटते वक्त आरव कार लेकर आया। “चल प्रिया, आज मैं ड्राइव करूंगा। रिया भी आ जा।”

     

    रास्ते में रिया ने कॉमेडी शुरू की। “आरव भैया, आपकी कार में एसी क्यों नहीं चल रहा? गर्मी लग रही है!”

     

    आरव ने शीशा नीचे किया। “रिया, हिमाचल में गर्मी? तू मुंबई की आदत से परेशान है।”

     

    रिया ने प्रिया को कोहनी मारी। “देख प्रिया, तेरे भैया कितने कंजूस हैं। अमीर होकर भी एसी नहीं चलाते।”

     

    प्रिया हंस पड़ी। आरव ने आईने से देखकर कहा, “रिया, अगली बार तुझे पैदल छोड़ दूंगा।”

     

    घर पहुंचकर तीनों लॉन में बैठे। सनसेट देख रहे थे। आरव ने प्रिया से पूछा, “क्या हुआ? आज क्लास में चुप थी।”

     

    प्रिया ने कहा, “बस थकान है भैया।”

     

    आरव ने उसके सिर पर हाथ रखा। “प्रिया, अब तू घर में है। कोई टेंशन नहीं। जो भी हो, मुझे बता। हम साथ हैं।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो कुछ बोल नहीं पाई। बस मुस्कुराई। उस पल उसे लगा कि चाहे खून का रिश्ता हो या न हो, आरव से ज्यादा करीबी कोई नहीं। लेकिन डायरी का राज़ उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।

     

    रात को प्रिया ने अकेले में दिल्ली के डॉक्टर आदित्य शर्मा को सर्च किया। एक पुराना आर्टिकल मिला – दिल्ली के बड़े हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजिस्ट थे। अब रिटायर्ड। फोटो में एक सज्जन पुरुष थे, जिनकी आंखें… प्रिया से मिलती-जुलती थीं।

     

    प्रिया ने मन ही मन फैसला किया – अकेले जाएगी दिल्ली। बिना किसी को बताए।

     

    अगले दिन कॉलेज में अवनी ने फिर तंज कसा। “प्रिया, अब तो तू ठाकुर हाउस की मालकिन है। फिर हॉस्टल की तरह सादे कपड़े क्यों?”

     

    रिया ने जवाब दिया, “अवनी, स्टाइल पैसे से नहीं दिल से आता है। तू कितना भी मेकअप कर ले, अंदर से खाली है।”

     

    अवनी गुस्से में चली गई। लेकिन जाते-जाते बोली, “प्रिया, कुछ राज़ अभी बाकी हैं। जल्दी सबके सामने आएंगे।”

     

    प्रिया को लगा अवनी कुछ जानती है। लेकिन वो इग्नोर कर गई।

     

    शाम को आरव ने प्रिया को सरप्राइज दिया। पुरानी हवेली को रेनोवेट करवाने का प्लान। “प्रिया, वो हवेली मम्मी की फेवरेट थी। हम उसे दोबारा बनवाएंगे। तू डिजाइन कर।”

     

    प्रिया खुश हो गई। दोनों पुरानी हवेली गए। कमला दाई भी साथ थी। वहां बैठकर पुरानी यादें शेयर कीं। आरव ने बताया कैसे छोटा होने पर मम्मी उसे और प्रिया को झूला झुलाती थीं।

     

    प्रिया की आंखें भर आईं। “भैया… मुझे कुछ याद नहीं। लेकिन अब लगता है जैसे सब वापस आ रहा है।”

     

    आरव ने कहा, “प्रिया, तू मेरे लिए हमेशा छोटी बहन रहेगी। चाहे कुछ भी हो।”

     

    प्रिया ने उसे गले लगाया। उस पल दोनों के दिल में एक अजीब सा सुकून था। लेकिन प्रिया को पता था कि सच छिपाना अब ज्यादा दिन नहीं चल सकता।

     

    रात को विक्रांत का मैसेज आया – “हाय, गुड नाइट। बस सोचा पूछ लूं सब ठीक तो है?”

     

    प्रिया ने जवाब दिया – “हां, थैंक्स। गुड नाइट।”

     

    बस इतना। कोई इमोजी। कोई एक्स्ट्रा बात। रोमांस अभी दूर था। दिल अभी उलझनों में था।

     

    अगली सुबह प्रिया ने ट्रेन की टिकट बुक कर ली – दिल्ली के लिए। अकेले। रिया को भी नहीं बताया। सिर्फ एक चिट लिखी – “थोड़े दिन के लिए बाहर जा रही हूं। चिंता मत करना। जल्दी लौटूंगी।”

     

    ट्रेन में बैठते वक्त प्रिया ने पेंडेंट छुआ। “मां… अब सच जानने का वक्त आ गया है।”

     

    शिमला पीछे छूट रहा था। ठाकुर हाउस, आरव, रिया – सब। लेकिन प्रिया का मन भारी था। क्या दिल्ली से लौटकर सब वही रहेगा? या सब बदल जाएगा?

     

    दूसरी तरफ ठाकुर हाउस में आरव को प्रिया की चिट मिली। वो चिंतित हो गया। “प्रिया कहां गई? अकेले?”

     

    रिया ने कहा, “शायद कुछ पर्सनल। लेकिन भैया, तू इतना टेंशन क्यों ले रहा है? प्रिया बड़ी हो गई है।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली। “रिया, प्रिया मेरे लिए सिर्फ बहन नहीं… कुछ और भी है। समझ नहीं आ रहा।”

     

    रिया चौंकी। “मतलब?”

     

    आरव चुप हो गया। बाहर बारिश शुरू हो गई। दोनों की आंखों में एक ही सवाल – प्रिया कब लौटेगी, और लौटेगी तो क्या साथ लाएगी?

     

    दिल्ली की ट्रेन तेज़ चल रही थी। प्रिया खिड़की से बाहर देख रही थी। नया राज़ खुलने वाला था।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 6

    Dil sabhal ja jara part – 6

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    part – 6 nai survat or purana raj 

     

     

     

    ठाकुर हाउस की बड़ी सी ड्राइंग रूम में सुबह की धूप पड़ रही थी। प्रिया पहली बार अपने असली घर में पूरी रात सोकर उठी थी। उसका कमरा – जो बीस साल से बंद था – अब साफ-सुथरा था। पुरानी गुड़ियां, किताबें, और दीवार पर मां रानी की तस्वीर। प्रिया ने तस्वीर को छुआ और मुस्कुराई। “मां… मैं घर आ गई।”

     

    नीचे ब्रेकफास्ट टेबल पर पापा, आरव और प्रिया बैठे थे। विक्रम और चाची पुलिस कस्टडी में थे। न्यूज चैनल्स पर स्टोरी चल रही थी – “ठाकुर फैमिली की लापता बेटी 20 साल बाद लौटी”। पापा ने प्रिया को गले लगाया। “बेटी, आज से तू इस घर की मालकिन है। जो चाहे कर।”

     

    आरव ने हंसकर कहा, “पापा, पहले कॉलेज तो कंपलीट करने दो। प्रिया अब भी स्कॉलरशिप वाली स्टूडेंट है।”

     

    प्रिया हंसी। “हां भैया, मैं अपनी पढ़ाई खुद पूरी करूंगी। पैसे से नहीं, मेहनत से।”

     

    तभी दरवाजा खटका और रिया अंदर घुसी – हाथ में बड़ा सा बैग। “हाय फैमिली! मैं तो अब यहां शिफ्ट हो रही हूं। प्रिया की बेस्ट फ्रेंड हूं ना!” वो आरव को देखकर आंख मारी। “और भैया को भी सताने का हक है।”

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया। “रिया, तू यहां आएगी तो घर में कभी शांति नहीं रहेगी।”

     

    रिया ने टेबल पर रखा बैग खोला – अंदर ढेर सारी चॉकलेट्स, चिप्स और एक बड़ा सा बॉक्स। “ये प्रिया के लिए गिफ्ट्स! अमीर बन गई है तो अब डाइटिंग छोड़।”

     

    पापा हंस पड़े। “रिया बेटी, तू भी इसी घर की है। जब मन करे आ जाना।”

     

    प्रिया को पहली बार फैमिली का मजा आ रहा था। कॉमेडी, हंसी-मजाक। लेकिन अंदर कुछ खटक रहा था – क्या सब इतनी आसानी से नॉर्मल हो जाएगा?

     

    कॉलेज में वापसी। प्रिया और रिया हॉस्टल से सामान पैक करके ठाकुर हाउस शिफ्ट हो गईं। लेकिन कॉलेज जाना जारी। क्लास में एंट्री करते ही सबकी नजरें। अवनी अब चुप थी – विक्रम के गिरफ्तार होने से उसका घमंड टूट गया था। लेकिन उसने प्रिया को घूरकर कहा, “अब अमीर बन गई ना? लेकिन याद रख, कुछ राज़ अभी बाकी हैं।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “अवनी, अब मैं डरने वाली नहीं।”

     

    क्लास में एक नया लड़का था – नाम था विक्रांत। लंबा, हैंडसम, देहरादून से ट्रांसफर। स्माइल मार्का। प्रोफेसर ने उसे प्रिया के पास बिठाया। “प्रिया, न्यू स्टूडेंट है। हेल्प करना।”

     

    विक्रांत ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाय प्रिया। सुना है तू ठाकुर फैमिली की है। लेकिन न्यूज में जो स्टोरी चली, वो कमाल की है। तू रियल लाइफ हीरोइन है।”

     

    प्रिया शर्मा गई। “थैंक्स… लेकिन बस नॉर्मल स्टूडेंट हूं।”

     

    लंच में विक्रांत प्रिया और रिया के साथ बैठा। आरव भी आया। आरव ने विक्रांत को देखा और थोड़ा अजीब सा फील हुआ। “हाय ब्रो, विक्रांत यहां नया है।”

     

    आरव ने ठंडे से कहा, “वेलकम। लेकिन प्रिया मेरी बहन है। ख्याल रखना।”

     

    विक्रांत हंसा। “आरव भाई, चिल। मैं बस दोस्ती कर रहा हूं।”

     

    रिया ने साइड में प्रिया को कोहनी मारी। “यार, नया क्रश? आरव तो जल रहा है।”

     

    प्रिया हंसी। “पागल, आरव मेरा भाई है। वो बस प्रोटेक्टिव है।”

     

    लेकिन अंदर प्रिया को विक्रांत अच्छा लग रहा था। उसकी बातें, हंसी, तरीका – सब नया था। पहले आरव से जो लगाव था, वो भाई वाला निकला। अब पहली बार किसी से सच्चा रोमांस का फील हो रहा था।

     

    शाम को ठाकुर हाउस में पार्टी थी – प्रिया की वेलकम पार्टी। पापा ने सारे रिश्तेदारों को बुलाया। घर सजा हुआ था। प्रिया ने पहली बार साड़ी पहनी – मां की पुरानी रेड साड़ी। सबने तारीफ की।

     

    पार्टी में रिया ने कॉमेडी शुरू की। वो डांस फ्लोर पर आरव को खींचकर लाई। “भैया, अब डांस करो। बहन आ गई है तो खुश हो ना!”

     

    आरव शर्मा रहा था। “रिया, मैं डांस नहीं करता।”

     

    रिया ने म्यूजिक तेज किया और आरव के साथ जबरदस्ती ठुमके लगाए। आरव बार-बार गिरते-गिरते बचा। सब हंस पड़े। प्रिया भी हंस-हंसकर लोटपोट हो गई। “भैया, तू तो प्रो डांसर निकला!”

     

    तभी विक्रांत आया – आरव ने उसे भी इनवाइट किया था। वो प्रिया के पास आया। “वाह प्रिया, साड़ी में कातिल लग रही हो। डांस करेगी?”

     

    प्रिया हिचकिचाई। लेकिन आरव ने पीठ थपथपाई। “जा प्रिया, एंजॉय कर।”

     

    विक्रांत और प्रिया डांस करने लगे। स्लो रोमांटिक सॉन्ग। विक्रांत ने धीरे से कहा, “प्रिया, तेरी स्टोरी सुनकर मुझे लगा तू बहुत स्ट्रॉन्ग है। मुझे तेरे जैसी लड़की चाहिए।”

     

    प्रिया का चेहरा लाल हो गया। “विक्रांत… अभी तो मिले हैं।”

     

    विक्रांत ने मुस्कुराया। “धीरे-धीरे सब होगा।”

     

    आरव दूर से देख रहा था। उसे अजीब लग रहा था। “ये लड़का ठीक तो है ना?”

     

    रिया ने आरव को चिढ़ाया। “भाई साहब, जल रहे हो? प्रिया को कोई पसंद करने लगा है!”

     

    आरव ने गुस्से से कहा, “चुप रिया! मैं बस प्रोटेक्ट कर रहा हूं।”

     

    पार्टी के बाद प्रिया अपने कमरे में थी। विक्रांत का मैसेज आया – “गुड नाइट। आज बहुत अच्छा लगा।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। पहली बार दिल में हल्की सी गुदगुदी।

     

    लेकिन तभी बड़ा ट्विस्ट।

     

    रात को प्रिया की अलमारी में एक पुराना बॉक्स मिला। कमला दाई ने कहा था कि मां का सामान है। बॉक्स खोला तो अंदर एक डायरी थी – रानी मां की। आखिरी पेज पर लिखा था:

     

    “अगर मुझे कुछ हुआ तो प्रिया को सच बताना। उसका असली पिता राजेश ठाकुर नहीं है। राजेश ने मुझे जबरदस्ती शादी की थी। प्रिया का असली पिता मेरा पहला प्यार था – डॉक्टर आदित्य शर्मा। वो दिल्ली में रहता है। प्रिया को उसके हक से वंचित मत करना।”

     

    प्रिया का हाथ कांप गया। पापा… राजेश ठाकुर उसके असली पिता नहीं? आरव उसका सगा भाई नहीं?

     

    वो रो पड़ी। डायरी लेकर आरव के पास गई। आरव ने पढ़ा। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। “प्रिया… ये… अगर सच है तो मैं तेरा भाई नहीं हूं?”

     

    दोनों चुप। बाहर चांदनी थी। प्रिया ने कहा, “आरव… कल आदित्य शर्मा को ढूंढेंगे। लेकिन तू हमेशा मेरा भाई रहेगा। खून से नहीं, दिल से।”

     

    आरव ने उसे गले लगाया। “हां प्रिया। तू मेरी बहन है। हमेशा।”

     

    लेकिन प्रिया के दिल में अब नया सवाल – अगर आरव भाई नहीं, तो पहले जो फीलिंग्स थे… वो क्या थे? और अब विक्रांत?

     

    रिया कमरे में आई। सारी बात सुनी। कॉमेडी मोड ऑन। “अरे वाह! अब प्रिया फ्री है? आरव, अब तू प्रिया को डेट कर सकता है!”

     

    आरव और प्रिया दोनों चिल्लाए, “रिया!”

     

    रिया हंसकर भागी। “मजाक था यार! लेकिन रोमांस तो अब शुरू होगा!”

     

    रात गहरा गई। प्रिया खिड़की पर खड़ी थी। विक्रांत का मैसेज फिर आया – “सपनों में मिलते हैं।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। लेकिन डायरी हाथ में थी। नया

    राज़ खुल चुका था। क्या प्रिया का असली पिता जिंदा है? और आरव के साथ उसका रिश्ता अब क्या होगा?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 5

    Dil sabhal ja jara part – 5

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    रात के ग्यारह बज चुके थे। कॉलेज गेट के बाहर बारिश तेज़ हो गई थी। प्रिया और आरव दोनों भीग रहे थे, लेकिन कोई हिल नहीं रहा था। अभी-अभी एक काली एसयूवी उन्हें कुचलने की कोशिश करके भागी थी। आरव ने प्रिया को धक्का देकर बचाया था, लेकिन उसका हाथ छिल गया था। खून बह रहा था।

    प्रिया ने आरव का हाथ पकड़ा। “आरव… तू ठीक तो है?”

    आरव ने दर्द सहते हुए मुस्कुराया। “अब तू मेरे साथ है ना, तो सब ठीक है। चल, कहीं सूखी जगह चलते हैं।”

    दोनों कॉलेज के पास वाली छोटी सी कॉफी शॉप में घुस गए। रात को खुली रहती थी। अंदर सिर्फ एक वेटर था। दोनों कोने की टेबल पर बैठ गए। आरव ने कॉफी ऑर्डर की। प्रिया की आंखें अभी भी डरी हुई थीं।

    “आरव… वो विक्रम था ना? तेरा सौतेला भाई?”

    आरव ने सिर हिलाया। “हां। पापा की दूसरी शादी से। वो हमेशा से जलता था मम्मी और हमसे। मम्मी की मौत के बाद उसने सब संभाल लिया। होटल्स, प्रॉपर्टी – सब उसके कंट्रोल में। अगर तू वापस आई तो कानूनी तौर पर आधी प्रॉपर्टी तेरी हो जाएगी। वो ये नहीं होने देगा।”

    प्रिया की आंखें सख्त हो गईं। “मैं डरने वाली नहीं हूं। मैंने बीस साल स्ट्रगल किया है। अब हक के लिए लड़ूंगी।”

    आरव ने उसका हाथ थामा। “अब तू अकेली नहीं है। मैं तेरे साथ हूं। लेकिन सावधानी से चलना होगा। पहले सबूत इकट्ठा करें। कमला दाई की गवाही, पुराने पेपर्स, डीएनए टेस्ट।”

    प्रिया ने कहा, “कल सुबह हम कमला दाई को हवेली से ले आएंगे। उसे सुरक्षित जगह रखेंगे।”

    आरव ने हां कहा। “और रिया को भी साथ रख। वो तेरी अच्छी दोस्त है।”

    कॉफी पीते हुए दोनों ने प्लान बनाया। रात को आरव ने प्रिया को हॉस्टल छोड़ा। गेट पर खड़े होकर बोला, “प्रिया… मुझे अफसोस है कि मैं छोटा था तब। कुछ कर नहीं सका। लेकिन अब मैं तेरी ढाल बनूंगा।”

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। “आरव… तू मेरा भाई है। पहली बार मुझे फैमिली का फील हो रहा है।”

    दोनों गले मिले। भाई-बहन का पहला गले मिलना।

    अगली सुबह प्रिया और रिया जल्दी उठे। आरव कार लेकर आया। तीनों पुरानी हवेली की ओर चले। रास्ते में आरव ने बताया, “पापा को अभी कुछ नहीं पता कि मैं तुझे मिला हूं। विक्रम ने शायद उसे भी नहीं बताया।”

    हवेली पहुंचते ही कमला दाई बाहर खड़ी थी। जैसे इंतजार कर रही हो। उसने सामान का छोटा बैग तैयार रखा था। “बेटी… मैं तैयार हूं। अब डर नहीं लगता। सच बाहर आना चाहिए।”

    चारों एक छोटे से गेस्ट हाउस में रुके – आरव ने पहले से बुक करवाया था। शहर से बाहर, सुरक्षित। वहां कमला दाई ने और डिटेल्स बताईं।

    “रानी बहू बहुत बहादुर थीं। वो जानती थीं कि घर में साजिश हो रही है। इसलिए वो तुझे लेकर भागने वाली थीं। लेकिन कार में कुछ गड़बड़ की गई। मैंने सुना था विक्रम के ड्राइवर से – ब्रेक काटे गए थे।”

    प्रिया ने पूछा, “क्या कोई प्रूफ है?”

    कमला दाई ने अपना पुराना बॉक्स खोला। अंदर एक पुराना लेटर था – रानी ठाकुर का लिखा हुआ। “अगर मुझे कुछ हुआ तो प्रिया को बचा लेना। ये लोग प्रॉपर्टी के लिए कुछ भी कर सकते हैं।”

    आरव ने लेटर पढ़ा। उसकी आंखें लाल हो गईं। “मम्मी… मैं कुछ नहीं कर सका।”

    रिया ने कहा, “अब हम करेंगे। पहले डीएनए टेस्ट। आरव और प्रिया का। फिर पुलिस।”

    लेकिन आरव ने मना किया। “पुलिस में विक्रम के लोग हैं। पहले मीडिया। कोई बड़ा न्यूज चैनल। सच सबके सामने आएगा।”

    दोपहर को चारों शहर लौटे। आरव ने अपने एक पुराने दोस्त को फोन किया – जो पत्रकार था। शाम को मीटिंग फिक्स हुई।

    लेकिन इससे पहले अवनी का रोल आया। हॉस्टल में अवनी ने प्रिया को देखा और तंज कसा, “क्या बात है? आरव के साथ घूम रही है? स्कॉलरशिप वाली अब अमीरों की दोस्त बन गई?”

    रिया ने जवाब दिया, “अवनी, अपनी औकात देख। प्रिया जल्दी सबको दिखाएगी अपनी असली औकात।”

    अवनी हंसकर चली गई, लेकिन उसकी आंखों में शक था। बाद में पता चला कि अवनी विक्रम की गर्लफ्रेंड है। उसने विक्रम को बता दिया कि प्रिया और आरव साथ घूम रहे हैं।

    शाम को पत्रकार से मीटिंग हुई। नाम था राहुल शर्मा। आरव का कॉलेज फ्रेंड। राहुल ने सारी स्टोरी सुनी। कमला दाई की गवाही रिकॉर्ड की। लेटर देखा। “ये बहुत बड़ी स्टोरी है। ठाकुर फैमिली का काला सच। लेकिन डेंजर है। विक्रम बदला ले सकता है।”

    प्रिया ने कहा, “मैं तैयार हूं।”

    राहुल ने कहा, “कल सुबह डीएनए टेस्ट करवाते हैं। प्राइवेट लैब में। फिर स्टोरी पब्लिश।”

    रात को गेस्ट हाउस में सब सोए। लेकिन आधी रात को दरवाजा पीटा गया। बाहर पुलिस थी। “प्रिया शर्मा? आप चोरी के आरोप में गिरफ्तार हैं।”

    सब चौंक गए। आरव ने पूछा, “किस चोरी?”

    पुलिस वाले ने कहा, “ठाकुर हवेली से सामान चोरी का केस। विक्रम ठाकुर की शिकायत।”

    प्रिया समझ गई – ये झूठा केस है। उसे डराने के लिए। पुलिस उसे ले जाने लगी। आरव ने रोका, लेकिन पुलिस वाले नहीं माने।

    रिया ने चीखकर कहा, “ये झूठ है! हम सब गवाह हैं!”

    लेकिन पुलिस प्रिया को ले गई। थाने में विक्रम पहले से बैठा था। मुस्कुराते हुए बोला, “प्रिया जी, स्वागत है। अब खेल शुरू होगा।”

    प्रिया को लॉकअप में डाल दिया गया। अकेली, ठंडी कोठरी। वो रोने लगी। लेकिन अंदर से आवाज आई – “डर मत बेटी।”

    वो कमला दाई थी? नहीं। पास की सेल में एक औरत थी। लेकिन प्रिया को हिम्मत मिली।

    सुबह आरव और रिया वकील लेकर आए। आरव ने पापा को फोन किया। पहली बार। “पापा, प्रिया जिंदा है। वो मेरी बहन है। और विक्रम ने उसे फंसाया है।”

    पापा की आवाज कांपी। “क्या? प्रिया… जिंदा है?”

    आरव ने सब बताया। पापा चुप रहे। फिर बोले, “मैं आ रहा हूं।”

    दोपहर को ठाकुर हाउस में मीटिंग हुई। पापा, विक्रम, चाची, आरव, और प्रिया (बेल पर छूटकर)। कमला दाई भी आई।

    विक्रम ने ड्रामा किया। “पापा, ये लड़की झूठी है। पैसे के लिए आ गई है।”

    लेकिन पापा ने प्रिया को देखा। आंखें नम। “प्रिया… तेरी आंखें… रानी जैसी।”

    प्रिया ने लेटर दिखाया। कमला दाई ने गवाही दी। डीएनए रिपोर्ट आ गई – 99.9% मैच। प्रिया और आरव सगे भाई-बहन।

    पापा रो पड़े। “मैंने कुछ नहीं किया था। मुझे लगा एक्सीडेंट था।”

    लेकिन विक्रम चीखा, “ये सब झूठ है!”

    तभी पुलिस आई – असली वाली। राहुल ने स्टोरी लीक कर दी थी। न्यूज चैनल्स बाहर खड़े थे। “ठाकुर फैमिली का काला सच – बेटी को मारने की साजिश।”

    विक्रम भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़ा गया। चाची भी।

    प्रिया ने पापा को गले लगाया। “पापा… मैं वापस आ गई।”

    आरव मुस्कुराया। “अब हम तीनों साथ हैं। मम्मी की आत्मा को शांति मिलेगी।”

    शाम को ठाकुर हाउस में प्रिया पहली बार अपने कमरे में गई। वही पुराना कमरा। गुड़ियां अभी भी थीं। वो खिड़की से बाहर देखी – शिमला की पहाड़ियां।

    रिया ने कहा, “यार, अब तू अमीर हो गई। लेकिन मेरी दोस्त वही रहेगी ना?”

    प्रिया हंसी। “हमेशा।”

    रात को आरव और प्रिया छत पर बैठे। स्टार्स देख रहे थे।

    आरव ने कहा, “प्रिया… सॉरी कि मैंने तुझे पहचाना नहीं शुरू में।”

    प्रिया ने कहा, “तूने तो मुझे बचाया। अब हमारा नया सफर शुरू। कॉलेज, पढ़ाई, और फैमिली।”

    लेकिन दूर कहीं विक्रम पुलिस कस्टडी में था। उसकी आंखें जल रही थीं। “ये खत्म नहीं हुआ। प्रिया… मैं वापस आऊंगा।”

    बारिश रुक चुकी थी। नई सुबह होने वाली थी। प्रिया की जिंदगी अब अनाथ से राजकुमारी बन चुकी थी। लेकिन संघर्ष अभी बाकी था।

    क्या विक्रम बदला लेगा? या प्रिया नई जिंदगी जी पाएगी?

     

  • Dil sabhal ja jara part 4

    Dil sabhal ja jara part 4

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

    एपिसोड -bsach ka samna 

     

    सुबह की धुंद शिमला की पहाड़ियों पर छाई हुई थी। हॉस्टल का रूम 204 अब प्रिया के लिए सुरक्षित नहीं लग रहा था। रात का वो फोन कॉल – “ठाकुर फैमिली ने तुझे मरने के लिए छोड़ा था” – उसके कानों में गूंज रहा था। प्रिया बिस्तर पर बैठी थी, घुटने मुंह से लगाए, आंखें लाल। रिया उसके पास बैठी चाय का कप थमा रही थी।

    “प्रिया, अब और चुप नहीं रह सकतीं। हमें कुछ करना होगा। या तो पुलिस, या फिर… हम खुद सच ढूंढें।” रिया की आवाज में दृढ़ता थी।

    प्रिया ने गहरी सांस ली। “रिया, अगर मैं आरव की बहन हूं, तो वो मुझे क्यों नहीं पहचानता? और अगर फैमिली ने मुझे मरने के लिए छोड़ा, तो क्यों? मैं सिर्फ पांच साल की थी।”

    रिया ने कहा, “शायद प्रॉपर्टी का मामला। ठाकुर होटल्स बहुत बड़ा बिजनेस है। तू अगर असली वारिस हुई तो… कोई और नहीं चाहता होगा कि तू वापस आए।”

    प्रिया ने पेंडेंट को छुआ। “आज हम उस पुरानी हवेली के पास जाएंगे जहां एक्सीडेंट हुआ था। शायद कुछ क्लू मिले। लेकिन आरव को कुछ नहीं बताएंगे।”

    दोनों कॉलेज गईं, लेकिन प्रिया का मन क्लास में नहीं लगा। आरव ने कई बार मैसेज किया – “क्या हुआ? कल शाम से बात क्यों नहीं कर रही?” प्रिया ने सिर्फ “बिजी हूं” लिखकर टाल दिया। उसका दिल टूट रहा था। जिस लड़के से उसे लगाव हो रहा था, अगर वो उसका भाई है… या इससे भी बुरा, अगर उसकी फैमिली ने उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश की…

    लंच के बाद दोनों चुपके से कॉलेज से निकल गईं। शिमला की पुरानी सड़क पर बस पकड़ी। एक्सीडेंट वाली जगह माल रोड से थोड़ा ऊपर, जाखू हिल के पास थी। पुराना न्यूज आर्टिकल में एड्रेस था – “ठाकुर हवेली के पास घाटी रोड”।

    बस से उतरकर दोनों पैदल चलने लगीं। रास्ता सुनसान था। पुराने पेड़, टूटे-फूटे साइनबोर्ड। आखिरकार एक पुराना बोर्ड दिखा – “ठाकुर हवेली – Private Property. No Trespassing”।

    हवेली दूर से दिख रही थी – बड़ी, पुरानी, लेकिन अब खंडहर जैसी। दीवारें टूट रही थीं, बगीचा उजड़ा हुआ। गेट पर ताला लगा था। प्रिया ने गेट के पास वाली दीवार से झांका। अंदर वो बगीचा था – फोटो वाला। वही झूला, वही फूलों की क्यारियां, लेकिन अब सब सूखे। प्रिया की आंखें भर आईं। “रिया… ये वही जगह है। मैं यहां खेली थी।”

    रिया ने उसका हाथ थामा। “चल, अंदर चलते हैं।”

    दोनों दीवार फांदकर अंदर घुस गईं। हवेली का मुख्य दरवाजा बंद था, लेकिन साइड से एक छोटा गेट खुला था। अंदर धूल की मोटी परत, पुराने फर्नीचर पर चादरें। प्रिया हर कमरे में गई। एक कमरे में बच्चों का सामान बिखरा था – पुरानी गुड़ियां, किताबें। प्रिया ने एक गुड़िया उठाई। उस पर लिखा था – “प्रिया की गुड़िया”।

    उसका दिल जोरों से धड़का। “रिया… मैं यहीं की हूं।”

    तभी ऊपर से आवाज आई – खांसने की। दोनों चौंक गईं। सीढ़ियां चढ़ीं। ऊपर एक छोटे कमरे में एक बूढ़ी औरत बैठी थी – सफेद साड़ी, कमजोर शरीर। वो उन्हें देखकर बोली, “कौन हो तुम लोग? यहां कोई नहीं आता।”

    प्रिया ने कांपती आवाज में पूछा, “आंटी… आप यहां रहती हैं?”

    बूढ़ी औरत ने प्रिया को गौर से देखा। अचानक उसकी आंखें चौड़ी हो गईं। “तू… तू प्रिया है? रानी बहू की बेटी?”

    प्रिया की सांस रुक गई। “आप मुझे जानती हैं?”

    बूढ़ी औरत – नाम था कमला दाई – रोने लगी। “हाय राम… तू जिंदा है? सबने तो कहा था तू मर गई। मैं ही तो तुझे कार से निकालकर भागी थी उस रात।”

    रिया और प्रिया हैरान। प्रिया ने पूछा, “क्या हुआ था उस रात?”

    कमला दाई ने गहरी सांस ली और बताना शुरू किया।

    “बीस साल पहले की बात है। रानी बहू बहुत अच्छी थीं। बड़े साहब (आरव के पापा) से लव मैरिज की थी। लेकिन घर में सब नाराज थे क्योंकि रानी गरीब घर की थी। फिर तू पैदा हुई। सब खुश थे, लेकिन बड़े साहब की दूसरी पत्नी – मतलब तेरी सौतेली मां – वो नहीं चाहती थी कि तू वारिस बने। प्रॉपर्टी सब उसकी संतान को जाना था।

    एक रात रानी बहू तुझे लेकर कहीं जा रही थीं। किसी को शक था कि वो सब छोड़कर भागना चाहती थीं। कार को एक्सीडेंट दिखाया गया – ब्रेक फेल। मैं नौकरानी थी, पीछे-पीछे जा रही थी। एक्सीडेंट के बाद मैं दौड़ी। रानी बहू जा चुकी थीं, लेकिन तू कार में रो रही थी। मैंने तुझे निकाला और भाग गई। डर था कि अगर घर वाले पता चले तो तुझे भी मार देंगे। मैंने तुझे दूर हिमाचल के अनाथ आश्रम में छोड़ा। साथ में फोटो और पेंडेंट रखा, ताकि एक दिन तू सच जान सके।”

    प्रिया रो रही थी। “तो आरव मेरा सगा भाई है?”

    “हां बेटी। आरव तेरा बड़ा भाई है। वो तब दस साल का था। उसे कुछ नहीं पता। बड़े साहब ने सबको कहा कि तू मर गई।”

    रिया ने पूछा, “लेकिन अब वो कॉल और चिट्स?”

    कमला दाई ने डरते हुए कहा, “शायद तेरी सौतेली मां या उसका बेटा – विक्रम। वो नहीं चाहते कि तू वापस आए। प्रॉपर्टी का केस चल रहा है। अगर तू जिंदा निकली तो सब उनसे छिन जाएगा।”

    प्रिया का गुस्सा और दुख एक साथ फूट पड़ा। “मैंने बीस साल अनाथ रहकर गुजारे। और वो आराम से जी रहे हैं?”

    कमला दाई ने कहा, “बेटी, अब मत लड़ना। भाग जा यहां से। वो लोग ताकतवर हैं।”

    लेकिन प्रिया ने सिर हिलाया। “नहीं दाई। अब मैं चुप नहीं रहूंगी। मुझे अपना हक चाहिए। और आरव को सच बताना होगा।”

    दोनों हवेली से बाहर निकले। शाम हो चुकी थी। रास्ते में प्रिया चुप थी। रिया ने कहा, “अब क्या प्लान?”

    “कल आरव से मिलूंगी। उसे सब बताऊंगी।”

    रात को हॉस्टल में प्रिया ने डायरी में लिखा – “आज मुझे अपनी मां का नाम पता चला। अपना घर पता चला। लेकिन अब घर वापसी इतनी आसान नहीं।”

    तभी दरवाजा खटका। बाहर अवनी खड़ी थी। मुस्कुराते हुए बोली, “प्रिया, आरव तुझे ढूंढ रहा है। बाहर गेट पर इंतजार कर रहा है। कुछ इम्पॉर्टेंट बात है।”

    प्रिया चौंकी। इतनी रात को? लेकिन वो गई। गेट पर आरव खड़ा था, चिंतित चेहरा। “प्रिया, मुझे तुझसे बात करनी है। कल तू अचानक भागी क्यों?”

    प्रिया ने हिम्मत की। “आरव… मुझे कुछ बताना है। बहुत बड़ा सच।”

    आरव ने कहा, “पहले तू मेरी सुन। मुझे पता चला है कि तू हवेली गई थी आज। कमला दाई से मिली?”

    प्रिया का खून जम गया। “तुझे कैसे पता?”

    आरव की आंखें ठंडी हो गईं। “क्योंकि मैंने ही तुझे फॉलो करवाया था। प्रिया… तू मेरी बहन है। मुझे शक था शुरू से – तेरी आंखें, पेंडेंट। मैंने पापा से कन्फर्म किया।”

    प्रिया रो पड़ी। “तो तुझे पता था? फिर क्यों नहीं बताया?”

    आरव ने उसे गले लगा लिया। “क्योंकि डर था। पापा और चाची (सौतेली मां) नहीं चाहते कि तू वापस आए। वो लोग खतरनाक हैं। मैं तुझे बचाना चाहता हूं। आज रात ही यहां से भाग चल। मैं साथ हूं।”

    प्रिया पीछे हटी। “नहीं आरव। मैं भागूंगी नहीं। मुझे अपना हक चाहिए। मां की मौत का बदला चाहिए।”

    आरव ने कहा, “ठीक है। तो मैं तेरे साथ हूं। लेकिन पहले सबूत इकट्ठा करें। कमला दाई को साथ लाएं।”

    तभी अंधेरे से एक कार आई। तेज स्पीड में। सीधा प्रिया और आरव की ओर। आरव ने प्रिया को धक्का देकर बचाया। कार निकल गई। नंबर प्लेट पर लिखा था – ठाकुर हाउस।

    आरव चीखा, “विक्रम! वो मेरा सौतेला भाई है। अब जंग शुरू हो गई है।”

    प्रिया का चेहरा सख्त हो गया। “अब मैं लड़ूंगी। अपने भाई के साथ।”

    रात गहरा गई। बारिश फिर शुरू हो गई। प्रिया की जिंदगी में अब प्यार नहीं, सिर्फ संघर्ष था। लेकिन अब वो अकेली नहीं थी – उसके साथ उसका सगा भाई था।

    क्या प्रिया और आरव फैमिली के खिलाफ जीत पाएंगे? या खतरा और बड़ा हो जाएगा?

     

     

    सुबह की धुंद शिमला की पहाड़ियों पर छाई हुई थी। हॉस्टल का रूम 204 अब प्रिया के लिए सुरक्षित नहीं लग रहा था। रात का वो फोन कॉल – “ठाकुर फैमिली ने तुझे मरने के लिए छोड़ा था” – उसके कानों में गूंज रहा था। प्रिया बिस्तर पर बैठी थी, घुटने मुंह से लगाए, आंखें लाल। रिया उसके पास बैठी चाय का कप थमा रही थी।

    “प्रिया, अब और चुप नहीं रह सकतीं। हमें कुछ करना होगा। या तो पुलिस, या फिर… हम खुद सच ढूंढें।” रिया की आवाज में दृढ़ता थी।

    प्रिया ने गहरी सांस ली। “रिया, अगर मैं आरव की बहन हूं, तो वो मुझे क्यों नहीं पहचानता? और अगर फैमिली ने मुझे मरने के लिए छोड़ा, तो क्यों? मैं सिर्फ पांच साल की थी।”

    रिया ने कहा, “शायद प्रॉपर्टी का मामला। ठाकुर होटल्स बहुत बड़ा बिजनेस है। तू अगर असली वारिस हुई तो… कोई और नहीं चाहता होगा कि तू वापस आए।”

    प्रिया ने पेंडेंट को छुआ। “आज हम उस पुरानी हवेली के पास जाएंगे जहां एक्सीडेंट हुआ था। शायद कुछ क्लू मिले। लेकिन आरव को कुछ नहीं बताएंगे।”

    दोनों कॉलेज गईं, लेकिन प्रिया का मन क्लास में नहीं लगा। आरव ने कई बार मैसेज किया – “क्या हुआ? कल शाम से बात क्यों नहीं कर रही?” प्रिया ने सिर्फ “बिजी हूं” लिखकर टाल दिया। उसका दिल टूट रहा था। जिस लड़के से उसे लगाव हो रहा था, अगर वो उसका भाई है… या इससे भी बुरा, अगर उसकी फैमिली ने उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश की…

    लंच के बाद दोनों चुपके से कॉलेज से निकल गईं। शिमला की पुरानी सड़क पर बस पकड़ी। एक्सीडेंट वाली जगह माल रोड से थोड़ा ऊपर, जाखू हिल के पास थी। पुराना न्यूज आर्टिकल में एड्रेस था – “ठाकुर हवेली के पास घाटी रोड”।

    बस से उतरकर दोनों पैदल चलने लगीं। रास्ता सुनसान था। पुराने पेड़, टूटे-फूटे साइनबोर्ड। आखिरकार एक पुराना बोर्ड दिखा – “ठाकुर हवेली – Private Property. No Trespassing”।

    हवेली दूर से दिख रही थी – बड़ी, पुरानी, लेकिन अब खंडहर जैसी। दीवारें टूट रही थीं, बगीचा उजड़ा हुआ। गेट पर ताला लगा था। प्रिया ने गेट के पास वाली दीवार से झांका। अंदर वो बगीचा था – फोटो वाला। वही झूला, वही फूलों की क्यारियां, लेकिन अब सब सूखे। प्रिया की आंखें भर आईं। “रिया… ये वही जगह है। मैं यहां खेली थी।”

    रिया ने उसका हाथ थामा। “चल, अंदर चलते हैं।”

    दोनों दीवार फांदकर अंदर घुस गईं। हवेली का मुख्य दरवाजा बंद था, लेकिन साइड से एक छोटा गेट खुला था। अंदर धूल की मोटी परत, पुराने फर्नीचर पर चादरें। प्रिया हर कमरे में गई। एक कमरे में बच्चों का सामान बिखरा था – पुरानी गुड़ियां, किताबें। प्रिया ने एक गुड़िया उठाई। उस पर लिखा था – “प्रिया की गुड़िया”।

    उसका दिल जोरों से धड़का। “रिया… मैं यहीं की हूं।”

    तभी ऊपर से आवाज आई – खांसने की। दोनों चौंक गईं। सीढ़ियां चढ़ीं। ऊपर एक छोटे कमरे में एक बूढ़ी औरत बैठी थी – सफेद साड़ी, कमजोर शरीर। वो उन्हें देखकर बोली, “कौन हो तुम लोग? यहां कोई नहीं आता।”

    प्रिया ने कांपती आवाज में पूछा, “आंटी… आप यहां रहती हैं?”

    बूढ़ी औरत ने प्रिया को गौर से देखा। अचानक उसकी आंखें चौड़ी हो गईं। “तू… तू प्रिया है? रानी बहू की बेटी?”

    प्रिया की सांस रुक गई। “आप मुझे जानती हैं?”

    बूढ़ी औरत – नाम था कमला दाई – रोने लगी। “हाय राम… तू जिंदा है? सबने तो कहा था तू मर गई। मैं ही तो तुझे कार से निकालकर भागी थी उस रात।”

    रिया और प्रिया हैरान। प्रिया ने पूछा, “क्या हुआ था उस रात?”

    कमला दाई ने गहरी सांस ली और बताना शुरू किया।

    “बीस साल पहले की बात है। रानी बहू बहुत अच्छी थीं। बड़े साहब (आरव के पापा) से लव मैरिज की थी। लेकिन घर में सब नाराज थे क्योंकि रानी गरीब घर की थी। फिर तू पैदा हुई। सब खुश थे, लेकिन बड़े साहब की दूसरी पत्नी – मतलब तेरी सौतेली मां – वो नहीं चाहती थी कि तू वारिस बने। प्रॉपर्टी सब उसकी संतान को जाना था।

    एक रात रानी बहू तुझे लेकर कहीं जा रही थीं। किसी को शक था कि वो सब छोड़कर भागना चाहती थीं। कार को एक्सीडेंट दिखाया गया – ब्रेक फेल। मैं नौकरानी थी, पीछे-पीछे जा रही थी। एक्सीडेंट के बाद मैं दौड़ी। रानी बहू जा चुकी थीं, लेकिन तू कार में रो रही थी। मैंने तुझे निकाला और भाग गई। डर था कि अगर घर वाले पता चले तो तुझे भी मार देंगे। मैंने तुझे दूर हिमाचल के अनाथ आश्रम में छोड़ा। साथ में फोटो और पेंडेंट रखा, ताकि एक दिन तू सच जान सके।”

    प्रिया रो रही थी। “तो आरव मेरा सगा भाई है?”

    “हां बेटी। आरव तेरा बड़ा भाई है। वो तब दस साल का था। उसे कुछ नहीं पता। बड़े साहब ने सबको कहा कि तू मर गई।”

    रिया ने पूछा, “लेकिन अब वो कॉल और चिट्स?”

    कमला दाई ने डरते हुए कहा, “शायद तेरी सौतेली मां या उसका बेटा – विक्रम। वो नहीं चाहते कि तू वापस आए। प्रॉपर्टी का केस चल रहा है। अगर तू जिंदा निकली तो सब उनसे छिन जाएगा।”

    प्रिया का गुस्सा और दुख एक साथ फूट पड़ा। “मैंने बीस साल अनाथ रहकर गुजारे। और वो आराम से जी रहे हैं?”

    कमला दाई ने कहा, “बेटी, अब मत लड़ना। भाग जा यहां से। वो लोग ताकतवर हैं।”

    लेकिन प्रिया ने सिर हिलाया। “नहीं दाई। अब मैं चुप नहीं रहूंगी। मुझे अपना हक चाहिए। और आरव को सच बताना होगा।”

    दोनों हवेली से बाहर निकले। शाम हो चुकी थी। रास्ते में प्रिया चुप थी। रिया ने कहा, “अब क्या प्लान?”

    “कल आरव से मिलूंगी। उसे सब बताऊंगी।”

    रात को हॉस्टल में प्रिया ने डायरी में लिखा – “आज मुझे अपनी मां का नाम पता चला। अपना घर पता चला। लेकिन अब घर वापसी इतनी आसान नहीं।”

    तभी दरवाजा खटका। बाहर अवनी खड़ी थी। मुस्कुराते हुए बोली, “प्रिया, आरव तुझे ढूंढ रहा है। बाहर गेट पर इंतजार कर रहा है। कुछ इम्पॉर्टेंट बात है।”

    प्रिया चौंकी। इतनी रात को? लेकिन वो गई। गेट पर आरव खड़ा था, चिंतित चेहरा। “प्रिया, मुझे तुझसे बात करनी है। कल तू अचानक भागी क्यों?”

    प्रिया ने हिम्मत की। “आरव… मुझे कुछ बताना है। बहुत बड़ा सच।”

    आरव ने कहा, “पहले तू मेरी सुन। मुझे पता चला है कि तू हवेली गई थी आज। कमला दाई से मिली?”

    प्रिया का खून जम गया। “तुझे कैसे पता?”

    आरव की आंखें ठंडी हो गईं। “क्योंकि मैंने ही तुझे फॉलो करवाया था। प्रिया… तू मेरी बहन है। मुझे शक था शुरू से – तेरी आंखें, पेंडेंट। मैंने पापा से कन्फर्म किया।”

    प्रिया रो पड़ी। “तो तुझे पता था? फिर क्यों नहीं बताया?”

    आरव ने उसे गले लगा लिया। “क्योंकि डर था। पापा और चाची (सौतेली मां) नहीं चाहते कि तू वापस आए। वो लोग खतरनाक हैं। मैं तुझे बचाना चाहता हूं। आज रात ही यहां से भाग चल। मैं साथ हूं।”

    प्रिया पीछे हटी। “नहीं आरव। मैं भागूंगी नहीं। मुझे अपना हक चाहिए। मां की मौत का बदला चाहिए।”

    आरव ने कहा, “ठीक है। तो मैं तेरे साथ हूं। लेकिन पहले सबूत इकट्ठा करें। कमला दाई को साथ लाएं।”

    तभी अंधेरे से एक कार आई। तेज स्पीड में। सीधा प्रिया और आरव की ओर। आरव ने प्रिया को धक्का देकर बचाया। कार निकल गई। नंबर प्लेट पर लिखा था – ठाकुर हाउस।

    आरव चीखा, “विक्रम! वो मेरा सौतेला भाई है। अब जंग शुरू हो गई है।”

    प्रिया का चेहरा सख्त हो गया। “अब मैं लड़ूंगी। अपने भाई के साथ।”

    रात गहरा गई। बारिश फिर शुरू हो गई। प्रिया की जिंदगी में अब प्यार नहीं, सिर्फ संघर्ष था। लेकिन अब वो अकेली नहीं थी – उसके साथ उसका सगा भाई था।

    क्या प्रिया और आरव फैमिली के खिलाफ जीत पाएंगे? या खतरा और बड़ा हो जाएगा?

     

  • अधूरी इबादत भाग~48

    अधूरी इबादत भाग~48

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~48 luxury नफ़रत 

     

    स्टूडियो की चमकती लाइट्स अब धीमी पड़ने लगी थीं, जैसे उस शाम का जादू अब धीरे-धीरे स्याही में घुल रहा हो। बच्चे थक चुके थे, रंग फीके पड़ने लगे थे और भीड़ अब बिखरने को तैयार थी। 

    उसी पल, जब मीना के शब्दों ने एक हलचल पैदा की थी, अद्वैत ने एक पल को रूहानी की ओर देखा। उसके चेहरे पर चिंता थी, लेकिन उसकी आवाज़ शांत रही, एकदम स्थिर।

    “मैं खुद छोड़कर आता हूँ मीना और बच्चों को। रात हो चुकी है, बस थोड़ी ही देर लगेगी,” अद्वैत ने धीमे मगर दृढ़ स्वर में कहा।

    रूहानी ने उसकी आँखों में देखा, कुछ पल को ठहरी रही। 

    “ठीक है,” बस इतना ही कहा उसने। 

    अद्वैत बच्चों के साथ बाहर निकल गया और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, कमरे की हवा बदल गई। 

    माहौल में एक अजीब सी बेचैनी तैरने लगी, जो अब तक किसी कोने में दबे चुपचाप सांस ले रही थी।

    काम्या ने ज़रा भी देर नहीं की, रूहानी को वो सब कहने की , जो वो कब से अपने अंदर दबायी हुयी थी। 

    उसका लहजा तेज़ था, आंखों में वही ताना मारने वाली चमक, “वाह रूहानी, वाह। एकांश नहीं मिला तो उसके बड़े भाई को ही फंसा लिया तुमने? अब समझ आया तुम्हारी comeback story का असली twist।”

    रूहानी के भीतर काम्या के हर शब्द से एक तीखी जलन उठ रही थी…. जैसे किसी ने जानबूझकर उसके सबसे गहरे ज़ख्म को छू लिया हो। उसे समझ नहीं आ रहा था कि काम्या की दुश्मनी इतनी पुरानी और ज़हरीली क्यों थी, जबकि रूहानी ने कभी उसे कुछ बुरा कहा या किया नहीं था। 

    रूहानी को जितना याद था, वो कभी काम्या से नहीं उलझी। ऐसा लगता है जैसे कल की ही तो बात हो जब वो काम्या से पहली बार मिली थी……

    flashback 

    रूहानी India Fashion Week के competition के semi-final में पहुँच चुकी थी। 

    वो hall white noise से भरा था….. हाथों में fabric के टुकड़े, मशीनों की गूंज और vision boards पर टिके सपनों की हलचल। Designers की दुनिया की वो खामोश चीख, जो हर sketch के पीछे होती है। 

    और उसी भीड़ में, पहली बार… 

    वो आई।

    न कोई grand entry… न drama… लेकिन उसकी मौजूदगी वैसी थी जैसे किसी ने हल्के से नज़र फेरकर भी कमरे की gravity बदल दी हो।

    पहले सिर्फ आवाज़ आई…. किसी volunteer से कुछ specific demand करती हुई। आवाज़ में एक किस्म की थकान भी थी और ताक़त भी।

    “Excuse me, मैं चाहती हूं कि मेरी mannequin exact 5’8 की हो। Long torso. And please, no cheap satin.”

    रूहानी ने अनजाने ही उस दिशा में देखा।

    वहाँ एक लड़की खड़ी थी….. sleek black ponytail में हर बाल discipline में, उसके चेहरे पर minimal makeup, लेकिन dark eyeliner जैसे उसकी आँखों की नीयत पर spotlight डाल रहा हो। 

    उसके चेहरे पर दिख रही परिपक्वता की गहरी रेखाएँ और आँखों में एक अनुभवी चमक साफ़ बता रही थी कि वो रूहानी और एकांश से कहीं ज़्यादा दुनिया देख चुकी थी।

    Branded sneakers, high-waisted pants और एक ivory crop blazer…. ऐसा लग रहा था मानो उसने ये साबित करने की कसम खाई हो कि elegance loud नहीं होता।

    लेकिन सबसे पहले जो महसूस हुआ….. वो था उसकी परफ्यूम की खुशबू।

    हल्का musky, मगर lingering…. जैसे कोई राज़ जो उसकी skin से लिपटा हो। ये किसी आम परफ्यूम की खुशबू नहीं थी, बल्कि किसी एक्सक्लूसिव फ्रेंच परफ्यूमरी से निकली वो खास महक थी जो सिर्फ समझदार और ऊँचे तबके के लोगों की पसंद होती है…. हल्की, लेकिन अपनी मौजूदगी का एहसास कराने वाली और देर तक ठहरने वाली।

    एकांश उसी वक़्त, एक angle से shot लेने के लिए camera adjust कर रहा था और काम्या ने, शायद उसी moment में, पलटकर उसे देखा।

    दोनों में से किसी ने अपनी नज़र एक दूसरे से नहीं हटाई क्यूंकि उसकी नज़र ने तो जैसे एकांश को ठहरने पर मजबूर कर दिया।

    काम्या मुस्कुराई…… वैसी मुस्कान जो सामने वाले की confident back को थामे हुए spine में एक ठंडी लहर छोड़ जाए।

    रूहानी ने उसकी नज़र को, उसकी मुस्कान को चुपचाप देखा। फिर एकांश को भी….. 

    किसी ने कुछ नहीं कहा था उस वक़्त। लेकिन हालात ने बहुत कुछ कह दिया था।

    रूहानी के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उठने लगी थी, जैसे एक अनकही चुनौती उसके सामने आकर खड़ी हो गई हो। 

    flashback end 

    रूहानी ने एक सांस ली, ठंडी और धीमी, फिर पूरे होश में पलटी। उसकी आँखें अब नर्म नहीं थीं, वो अब किसी artist की नहीं, एक जले हुए मन की लग रही थीं।

    “जिसे जो आता है, वो अगले के लिए भी वैसा ही सोचता है। तुम्हें छल करना आता है, तो तुम हर औरत में वही ढूँढ़ती हो। लेकिन अफ़सोस… मैं तुम्हारी दुनिया की नहीं हूँ।” 

    काम्या ने भी कहा, “रूहानी तुम हो क्या….. only an emotional fool loser” 

    “Enough, Kamyaa,” एकांश ने कड़वी आवाज़ में कहा, “ये सही वक्त नहीं है, इन सब बातो का”

    “तो कब होगा सही वक्त?” काम्या अब सह नहीं पा रही थी। उसकी आँखों में एक ऐसा डर था जिसे वो गुस्से की आग में छिपा रही थी। 

    “जब तुम फिर से अपनी पुरानी मोहब्बत को दोबारा अपनी ज़िंदगी में वापस ले आओगे?…. तब”

    एकांश कुछ कहने ही वाला था कि रूहानी उसकी ओर मुड़ी, आँखों में ज्वाला थी, पर आवाज़ एकदम ठंडी। 

    “Mr. and Mrs. Rathore… oh sorry, Mrs. Kamya Raina,” उसने हर शब्द को नफासत से काटा, “इस गलतफहमी में मत रहना कि रूहानी अब कभी किसी धोखेबाज़ के पास वापस लौट कर जाएगी।”

    इतना कहकर वह मुड़ गई, उसकी चाल तेज़ थी, पर आँखों के किनारे गीले थे।

    काम्या चुपचाप एकांश की तरफ मुड़ी। उसकी हँसी अब सच्ची नहीं थी, बस तेज़ थी।

    “देख लिया ना तुमने?” वो बोली, “She moved on… and you still…” 

    वो वाक्य अधूरा रह गया। लेकिन उसकी गूंज देर तक स्टूडियो की दीवारों से टकराती रही… जैसे कोई पुरानी धुन, जो खत्म तो हो गई हो, मगर दिल से उतरने का नाम न ले।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    कमरे की हवा ठहर गई थी। रूहानी अपने नए स्टूडियो के एक रिहर्सल रूम में बैठी, अतीत के पन्ने पलट रही थी। चांदनी रात में अपनी ख़ामोशी में……

    तभी, पीछे से एकांश आया, कुछ बात करने के लिए। एकांश की आँखों में कोई साया था…. गुज़रे वक़्त का, अधूरी बातों का और उस खामोश इल्ज़ाम का, जो अब भी रूहानी की नज़रों में झलकता था। 

    उसने धीरे से कहा, “क्या अब भी मुझसे नफरत करती हो?”

    रूहानी ने गहरी साँस ली, पलकों को बंद किया जैसे कोई बहुत पुराना ज़ख्म फिर से धड़क उठा हो। 

    “नफरत एक luxury होती है” उसकी आवाज़ बिल्कुल सपाट थी, “जिसे वही अफ़ोर्ड कर सकता है जिसे मोहब्बत से फुर्सत हो। मैं उस level से निकल चुकी हूँ।”

    एकांश की नज़रें जैसे नीचे गिर गईं…. जैसे वो खुद से ही शर्मिंदा हो। लेकिन उसने अँधेरे में एक तीर मारा, “तुम जानती हो न की तुम झूठ नहीं बोल पाती हो”

    रूहानी की नज़रों में न कोई ग़ुस्सा था, न ही दर्द। बस एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वो उस तकलीफ़ से ऊपर उठ चुकी हो।

    “और तुम मुझे नहीं जानते सही से….. मैं बहुत आगे निकल आई हूँ,” उसने कहा, “अब वापसी का कोई रास्ता भी नहीं बचा।”

    एकांश की आवाज़ में अब एक काँपती हुई जिज्ञासा थी, “तो फिर उस दिन… जब मैं भाई के घर आया और तुम मुझे देखकर बेहोश हो गई थी… वो क्या था, रूहानी?”

    वो जवाब देने ही वाली थी कि तभी बाहर से एक आवाज़ आई. …. खटाक ….. क्योंकि रूम में हल्का अँधेरा था और गलती से किसी स्टाफ ने बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया था। 

    अब रूहानी और एकांश उस रूम में आमने-सामने रह गए थे….. एक बंद दरवाज़े के भीतर, जहाँ बाहर की कोई आवाज़ नहीं पहुँच सकती थी।

    रूहानी की सांसे उलझने लगी, वो दौड़कर दरवाजे तक पहुंची लेकिन आसपास कोई नहीं था , उसने आवाज़ भी लगायी पर कोई नहीं सुना। 

    एकांश धीरे धीरे उसके पास आ रहा था ….. 

    तभी बाहर थोड़ी दूर से काम्या की आवाज़ आई, “एकांश! कहाँ हो sweetheart?”

    ————-

    क्या रूहानी की साँसों की ये उलझन, सिर्फ एक बंद कमरे की घुटन थी… या फिर अतीत की कोई अधूरी दस्तक?

    क्या ये महज़ इत्तिफ़ाक था कि दरवाज़ा बंद हो गया… या कोई चाहता था कि ये दो छायाएँ फिर आमने-सामने आएँ… एक आख़िरी बार?

    अब जब बाहर काम्या की आवाज़ गूँज रही थी… क्या रूहानी उस आवाज़ से भागेगी, या उस सवाल का सामना करेगी जिसे अब तक वो खुद से भी छुपा रही थी? 

     

  • अधूरी इबादत भाग~47

    अधूरी इबादत भाग~47

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~47 उँगलियाँ जो छू गईं 

     

    दरवाज़े की ओर उठती निगाहें, एक क्षण के लिए जैसे ठहर सी गईं। 

    रूहानी की साँसों में अचानक एक बोझ-सा उतर आया था, जैसे किसी भूले हुए जख्म पर फिर से कोई उंगली रख दी गई हो। 

    लेकिन अद्वैत की आवाज़, शांत, स्थिर और कहीं न कहीं संभालने वाली, ने उस पल को टूटने नहीं दिया।

    “गुनगुन, cake कट करो, सब wait कर रहे हैं।”

    रूहानी ने एक गहरी साँस ली और जैसे किसी अदृश्य धागे ने उसकी आँखों को एकांश से हटा दिया। उसकी नज़र अब फिर से गुनगुन के पास लौट आई, जहाँ मासूमियत और रंगों का जश्न था।

    अद्वैत दूर से सब देख रहा था। वो नज़रें पढ़ना नहीं जानता था, लेकिन उसके भीतर कुछ था जो महसूस कर सकता था और वो साफ़ महसूस कर रहा था कि रूहानी की मुस्कान अब पहले जैसी नहीं रही। 

    उसमें हल्की सी थकान थी, एक अधूरी साँस, जो अभी तक पूरी नहीं हुई थी।

    वो धीरे से उसके पास आकर खड़ा हो गया, एक भी शब्द बिना कहे, बस एक साथ होने की ख़ामोश मौजूदगी।

    मीना ने एकांश और काम्या को भीतर बुलाया, और दोनों बिना किसी झिझक के आकर रूहानी और अद्वैत की दूसरी तरफ खड़े हो गए। 

    एकांश की नज़रें कहीं गहराई से रूहानी को देखने लगीं…. जैसे कोई पुराना सपना अब किसी और की हकीकत बन गया हो।

    गुनगुन ने केक काटा, चीकू ने सबसे पहले उसकी नाक पर क्रीम पोती और सब हँस पड़े…. वो बेपरवाह हँसी, जो थोड़ी देर के लिए हर अजनबीपन को छुपा लेती है।

    लेकिन तभी, स्टाफ एक दूसरा केक ले आया…. सफेद और हल्के lavender icing से सजा हुआ। उस पर लिखा था: “To Stitch & Soul — A Dream Reborn.”

    रूहानी की आँखों में हल्की हैरानी तैर गई। “ये…?”

    अद्वैत झुका, बहुत हल्के से और रूहानी के कान के पास कहा — “यह सिर्फ गुनगुन का दिन नहीं है… आज इस स्टूडियो का भी नया जन्म हुआ है। और ये तो तुम्हारा आइडिया था कि दोनों celebrations एक साथ हों।”

    उसके शब्दों में कोई मोहब्बत का प्रदर्शन नहीं था, न ही कोई dramatic gesture… बस एक समझ थी, और acknowledgment।

    रूहानी की साँस एक पल को रुक गई। उसकी आँखें हल्की सी भीग गईं… एकदम अनकहे और अनजाने से। उसे खुद समझ नहीं आया कि ये खुशी थी, या relief… या शायद कोई ऐसी soft recognition, जो किसी ने बहुत दिन बाद उसे दी थी…. बिना माँगे, बिना शर्त, जैसे उसकी अधूरी इबादत आज मुकम्मल होने को थी। 

    और अद्वेत… वो अब भी उसके पास खड़ा था…. जैसे कोई उधार की गर्माहट हो… जो बिना कहे भी बहुत कुछ दे जाता है।

    रूहानी अब तक उसी केक को देख रही थी… सफेद, नर्म, और उस पर सजी नाज़ुक सी lavender icing की परत जैसे किसी ख्वाब की सतह हो। 

    उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी, लेकिन भीतर कुछ उलझा हुआ भी। तभी अद्वैत की हथेली ने उसके कंधे को छुआ…. वो छुअन न तो बहुत करीबी थी, न ही पूरी तरह अजनबी।

    “रूहानी, केक काटो… darling,” अद्वैत ने हलकी आवाज़ में कहा, लेकिन उसके आख़िरी शब्द ने जैसे समय को धीमा कर दिया।

    रूहानी की पलकें फड़कीं, उसकी नज़र चौंकते हुए अद्वैत के चेहरे तक पहुँची। वो मुस्कुरा रहा था…. उस तरह की मुस्कान जो भीड़ के बीच दिखाई जाती है, सिर्फ इसलिए कि बाकी सब कुछ ‘सही’ लगे।

    रूहानी ने खुद को संभालते हुए केक काटा। अभी उसने उस छोटे से टुकड़े को अपनी उँगलियों के बीच पकड़ा ही था कि अद्वैत ने बहुत सहजता से उसका हाथ थाम लिया और केक का टुकड़ा खुद के मुँह में डाल लिया।

    वो क्षण… नाज़ुक, अनजाना, और बहुत ज़्यादा निकटता से भरा… रूहानी को पूरी तरह surprise कर गया। उसके अंदर कुछ अकबका गया, जैसे कोई अलार्म बजने लगा हो जिसे सिर्फ वही सुन सकती थी।

    अभी वो कुछ समझती कि अद्वैत ने केक का एक छोटा टुकड़ा फिर से काटा और उसके होठों तक लाकर पूछा, “May I?”

    रूहानी ने अनजाने में सिर हिलाया…. उसकी चेतना अब भी उस टोन की तह तक नहीं पहुँच पाई थी।

    अद्वैत ने अपनी उंगलियों को बेहद संतुलन के साथ उसके होठों के करीब लाया, शायद इस कोशिश में कि कहीं भी touch न हो….

    लेकिन वो corner, वो millisecond…. जब उसकी उंगलियाँ रूहानी के होंठों से हल्का सा छू गईं, सब कुछ बदल गया।

    रूहानी का चेहरा एकदम कड़क हो गया। वो तुरंत एक कदम पीछे हटी, और खुद को संभालते हुए स्टाफ से बोली, “Cake सबको distribute कर दो।”

    वो बोल रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ में एक किस्म की घबराहट थी। जैसे कुछ छू गया था…. कोई भूला हुआ जज़्बा या कोई बंधा हुआ डर।

    अद्वैत वही खड़ा रहा, बिना कोई प्रतिक्रिया दिए। लेकिन उसके भीतर कुछ खिंच गया था। वो जानता था, उनका रिश्ता कोई फिल्मी मोहब्बत नहीं था…. ये एक समझौता था, काग़ज़ पर लिखा हुआ। 

    लेकिन जब उसकी उंगलियाँ रूहानी के होंठों से छू गईं और उसने उसकी पलकों की थरथराहट देखी…. तो उसे पहली बार महसूस हुआ कि कुछ है… कोई अनकहा स्पेस, जो दोनों के बीच मौजूद तो है, पर परखा नहीं गया।

    उसके होठों की मुस्कान अब पहले जैसी नहीं थी…. उसमें एक बेचैनी थी। और आँखों में… शायद एक सवाल… क्या मैंने हद पार कर दी?

    एकांश की आँखों के कोने में कुछ सिकुड़ गया था, जैसे वहाँ कोई अनकहा धुआँ जमा हो रहा हो, लेकिन चेहरा अब भी उतना ही शांत….. उतना ही सधा हुआ। 

    वो हर छोटी हरकत देख रहा था… अद्वैत की उँगलियों का रूहानी के हाथों के पास रुकना, रूहानी की हल्की झिझक, फिर वो केक वाला पल… 

    काम्या उसके पास खड़ी थी, लेकिन एकांश के अंदर कुछ और चल रहा था…. एक सन्नाटा, जो बाहर की रौशनी में भी ठंडा था।

    तभी काम्या मुस्कुराती हुई आगे बढ़ी, “Beautiful studio,” उसके लहज़े में शहद था, मगर नीचे छुपा हुआ कोई काँटा भी।

    रूहानी ने सिर्फ मुस्कराकर सर हिलाया, लेकिन उसकी पलकों के नीचे हल्की थकान थी। काम्या की आँखों में कुछ था…. शायद एक मीठा जहर।

    “मैंने expect नहीं किया था कि तुम फिर से अपना नया studio खोलने का भी सोचोगी,” काम्या ने कहा, आँखें रूहानी की ड्रेस से लेकर उसके चेहरे तक दौड़ती रहीं, “…well, तुमने शादी भी कर ली — ये जानकर ज़्यादा हैरानी हुई मुझे।”

    अद्वैत वहीं पास खड़ा था। उसका चेहरा अब थोड़ा सख़्त हुआ, लेकिन आवाज़ अब भी ठंडी और संतुलित रही।

    “Congratulate करने का तुम्हारा तरीका थोड़ा casual नहीं है क्या?”

    काम्या ने हँसते हुए कहा, “Oh sorry, Adwait, I forget that.”

    फिर वो मुड़ी, एकांश अब तक पीछे खड़ा था, उसकी चुप्पी अब तक सबसे ज़्यादा मुखर थी। काम्या ने उसका हाथ पकड़कर उसे आगे लाया, “चलो, Ruhani का gift साथ में देते हैं।”

    एकांश ने थोड़ा रुककर gift box आगे बढ़ाया… सुनहरे wrapping में बंधा….।

    लेकिन उससे पहले कि वो रूहानी की ओर पहुँच पाता, अद्वैत ने झटके से वो gift अपने हाथों में ले लिया, और ठहरे हुए लहज़े में कहा, “Ruhani के special event पर सबसे पहला gift तो मुझे देना चाहिए, ना?”

    एक क्षण के लिए एकांश की उंगलियाँ हवा में ठहर गईं…. जैसे किसी ने उस पर से कोई हक़ खींच लिया हो।

    काम्या ने एक नकली हँसी के साथ, अपनी नज़रों को घुमाते हुए कहा, “Yes, of course…”

    माहौल में अब रौशनी कम और चुप्पियाँ ज़्यादा थीं। fairy lights की धीमी टिमटिमाहट के बीच, रूहानी की नज़र एक पल को तीन चेहरों पर ठहर गई…. 

    एक वर्तमान में खड़ा अद्वैत, जो अभी भी अजनबी लगता था; 

    एक अतीत से लौटे हुए एकांश, जिसकी आंखों में अब भी वो अधूरापन था; 

    और काम्या, जो सबकी नज़रों में बेनक़ाब थी, रूहानी के लिए अब भी एक ऐसा नाम थी जिसमें साज़िशें छुपी थीं; क्योंकि उसने कभी भी रूहानी के लिए दिल से कुछ अच्छा नहीं चाहा था। 

    रूहानी का गला सूख गया। उसने नज़रें फेर लीं, लेकिन दिल में कुछ भारी सा अटक गया।

    तभी मीना तेज़ क़दमों से अद्वैत के पास आई, और घबराई हुई आवाज़ में बोली, “Sir, मुझे अभी घर लौटना होगा… गुनगुन और चीकू के पापा की तबियत अचानक बहुत बिगड़ गई है।”

    अद्वैत ने चौंककर उसे देखा।

    ———————-

    मीना की इस अचानक खबर का सच, सिर्फ बीमारी था… या कुछ और भी था जो छुपाया जा रहा था?

    एकांश की उंगलियाँ जो हवा में रुक गई थीं…. क्या वो सिर्फ एक gift से दूर हुई थीं, या किसी पुराने हक़ से भी?

    रूहानी… क्या वो वाक़ई अद्वैत की ‘darling’ बन चुकी थी, या ये बस एक नाम था, एक मुखौटा… किसी और नाम को छुपाने के लिए?