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  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित ने मोबाइल अपनी जेब में रख लिया।

     

    सामने उसका पुराना घर खड़ा था।

     

    ऊपरी मंजिल की वही खिड़की अब पूरी तरह अंधेरी थी।

     

    उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अमित, अकेले मत जाना।”

     

    अमित ने माँ की तरफ देखा।

     

    “मैसेज में साफ लिखा है कि मुझे अकेले जाना है।”

     

    बूढ़ी औरत ने तुरंत कहा,

     

    “वह नैना का संदेश नहीं है।”

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    “क्योंकि नैना तुम्हें अकेले नहीं बुलाएगी।”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    “फिर कौन बुला रहा है?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी लालटेन जमीन पर रख दी।

     

    “वही जो चाहता है कि तुम उसके सामने अपनी पहचान भूल जाओ।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “अगर मैं नहीं गया तो?”

     

    “तो वह खुद बाहर आएगा।”

     

    कुछ क्षणों तक तीनों खामोश रहे।

     

    फिर घर के अंदर से अचानक किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “भैया…”

     

    अमित का दिल काँप उठा।

     

    यह वही आवाज थी जिसे उसने बचपन की धुंधली यादों में सुना था।

     

    नैना की आवाज।

     

    उसने माँ की तरफ देखा।

     

    माँ ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “जाओ।”

     

    “माँ?”

     

    “अगर वह सच में नैना है… तो शायद आज उसे आजाद करने का यही मौका है।”

     

    अमित ने दरवाजा खोला।

     

    घर के अंदर अंधेरा था।

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    हर कदम के साथ फर्श चरमराता।

     

    चर्र…

     

    चर्र…

     

    चर्र…

     

    अचानक पीछे से बूढ़ी औरत की आवाज आई—

     

    “अमित!”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    “कुछ भी हो जाए, अगर तुम्हें पीछे से अपनी माँ की आवाज सुनाई दे, तो मत मुड़ना।”

     

    अमित ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    ऊपर पहुँचकर बंद कमरे का दरवाजा खुला हुआ था।

     

    अंदर से हल्की नीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    अमित ने दरवाजे पर कदम रखा।

     

    कमरा पहले जैसा नहीं था।

     

    पुराना सामान गायब था।

     

    दीवारें साफ थीं।

     

    बीच में वही बड़ा आईना रखा था।

     

    और उसके सामने एक छोटी बच्ची बैठी थी।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    दो चोटियाँ।

     

    पीठ अमित की तरफ।

     

    अमित धीरे से बोला,

     

    “नैना?”

     

    बच्ची ने सिर उठाया।

     

    “भैया…”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम सच में नैना हो?”

     

    बच्ची ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तुम इतने साल कहाँ थीं?”

     

    “यहीं।”

     

    “मुझे क्यों नहीं बुलाया?”

     

    “मैं बुलाती रही।”

     

    “लेकिन मुझे कुछ याद नहीं था।”

     

    “उन्होंने तुम्हारी यादें छीन ली थीं।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    बच्ची ने आईने की तरफ देखा।

     

    “उसने।”

     

    अमित ने आईने में देखा।

     

    इस बार उसमें कमरे का प्रतिबिंब नहीं था।

     

    बल्कि एक लंबा गलियारा दिखाई दे रहा था।

     

    गलियारे के अंत में एक आदमी खड़ा था।

     

    अमित ने आँखें सिकोड़कर देखा।

     

    वह उसके पिता थे।

     

    अमित के पिता की मृत्यु पाँच साल पहले हो चुकी थी।

     

    फिर भी वह आईने में बिल्कुल जीवित खड़े थे।

     

    अमित की साँस रुक गई।

     

    “पापा…”

     

    आईने में खड़े आदमी ने हाथ उठाया।

     

    “अमित…”

     

    अमित एक कदम आगे बढ़ा।

     

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत जाना।”

     

    “लेकिन पापा—”

     

    “वह पापा नहीं हैं।”

     

    आईने के अंदर खड़ा आदमी मुस्कुराया।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

     

    पहले आँखें काली हुईं।

     

    फिर त्वचा झुर्रीदार हो गई।

     

    फिर उसका चेहरा बूढ़ी औरत जैसा हो गया।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    नैना बोली,

     

    “अब समझे?”

     

    “यह कौन है?”

     

    नैना ने कहा,

     

    “वह जो हर किसी का चेहरा पहन सकती है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “उसका नाम क्या है?”

     

    नैना ने चुप्पी साध ली।

     

    “तुम्हें पता है?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो बताओ।”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर मैंने उसका नाम लिया तो वह मुझे फिर से पकड़ लेगी।”

     

    अमित कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “लेकिन उसे रोकने के लिए उसका असली नाम जानना जरूरी है।”

     

    नैना ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हें उसका नाम पहले से पता है।”

     

    “मुझे?”

     

    “हाँ।”

     

    “कहाँ?”

     

    नैना ने आईने की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारी यादों में।”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    अचानक उसके दिमाग में तस्वीरें दौड़ने लगीं।

     

    एक पुराना मंदिर।

     

    एक कुआँ।

     

    उसके पिता किसी आदमी से बात कर रहे थे।

     

    फिर वही आदमी काले कपड़ों में एक किताब खोलता है।

     

    किताब के पन्ने पर एक नाम लिखा था।

     

    अमित उसे पढ़ने की कोशिश करता है।

     

    लेकिन शब्द धुंधले हो जाते हैं।

     

    उसने आँखें खोल दीं।

     

    “मुझे याद नहीं।”

     

    नैना बोली,

     

    “याद आएगा।”

     

    तभी कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अमित दौड़कर दरवाजे तक गया।

     

    कुंडी हिलाई।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    नैना ने कहा,

     

    “अब वह आ रही है।”

     

    “कौन?”

     

    “वही।”

     

    कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    “अमित…”

     

    “अमित…”

     

    “अमित…”

     

    आवाजें अलग-अलग लोगों की थीं।

     

    उसकी माँ।

     

    उसके पिता।

     

    रवि।

     

    बूढ़ी औरत।

     

    और फिर…

     

    अमित की अपनी आवाज।

     

    “अमित, पीछे देखो।”

     

    अमित ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं नहीं देखूँगा।”

     

    फुसफुसाहट तेज हो गई।

     

    “पीछे देखो।”

     

    “पीछे देखो।”

     

    “पीछे देखो।”

     

    अमित ने कान बंद कर लिए।

     

    नैना उसके सामने खड़ी थी।

     

    “भैया, मेरी तरफ देखो।”

     

    अमित ने आँखें खोलीं।

     

    नैना का चेहरा बदल रहा था।

     

    एक पल वह छोटी बच्ची थी।

     

    अगले पल वह उसकी माँ जैसी दिखने लगी।

     

    फिर उसके पिता जैसी।

     

    फिर बूढ़ी औरत जैसी।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “तुम नैना नहीं हो।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “बहुत देर से समझे।”

     

    अमित का काला धागा अचानक जलने लगा।

     

    उसने दर्द से हाथ पकड़ लिया।

     

    धागे से धुआँ निकल रहा था।

     

    आईने में काली परछाईं दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे आईने से बाहर आने लगी।

     

    पहले उसके हाथ निकले।

     

    फिर सिर।

     

    फिर पूरा शरीर।

     

    अमित ने देखा कि उसका चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ खाली काला स्थान।

     

    उसने धीमी आवाज में पूछा—

     

    “तुम मुझे क्यों चाहती हो?”

     

    परछाईं ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने वादा किया था।”

     

    “क्या वादा?”

     

    “तुम्हें मुझे देने का।”

     

    अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “लेकिन मैं तो बच गया था।”

     

    “हाँ।”

     

    “कैसे?”

     

    परछाईं ने आईने की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी बहन की वजह से।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “नैना?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “वह तुम्हारी बहन नहीं थी।”

     

    अमित के चेहरे पर डर फैल गया।

     

    “झूठ।”

     

    “तो उससे पूछो।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    नैना की आँखों से काला तरल बहने लगा।

     

    “भैया… मुझे माफ कर दो।”

     

    “तुमने क्या किया?”

     

    “मैंने तुम्हें बचाने के लिए…”

     

    वह रुक गई।

     

    “…उससे एक समझौता किया था।”

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा,

     

    “कैसा समझौता?”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं उसकी दुनिया में रहूँगी।”

     

    “और बदले में?”

     

    “तुम्हें छोड़ दिया जाएगा।”

     

    अमित की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “तो तुम इतने साल से यहाँ हो?”

     

    “हाँ।”

     

    “और अब?”

     

    “अब मेरा समय खत्म हो गया है।”

     

    परछाईं आगे बढ़ी।

     

    “अब तुम्हारी बारी है।”

     

    अमित पीछे हटते-हटते आईने से जा टकराया।

     

    आईने की सतह पानी जैसी लहराने लगी।

     

    उसके अंदर से आवाज आई—

     

    “बस एक कदम।”

     

    “और तुम मेरे साथ।”

     

    अमित ने नैना की तरफ देखा।

     

    “मुझे क्या करना होगा?”

     

    नैना ने कहा,

     

    “आईने को तोड़ दो।”

     

    अमित ने पास पड़ी लोहे की कुर्सी उठा ली।

     

    परछाईं उसकी तरफ झपटी।

     

    अमित ने पूरी ताकत से कुर्सी आईने पर दे मारी।

     

    धड़ाम!

     

    आईना टूट गया।

     

    कमरे में तेज चीख गूँजी।

     

    ऐसी चीख कि पूरा घर काँप उठा।

     

    परछाईं पीछे हट गई।

     

    नैना चीखने लगी—

     

    “भैया! जल्दी!”

     

    अमित ने दूसरी बार कुर्सी उठाई।

     

    लेकिन तभी उसके पीछे से उसके पिता की आवाज आई—

     

    “अमित…”

     

    उसका हाथ रुक गया।

     

    आवाज बिल्कुल उसके पिता जैसी थी।

     

    “बेटा…”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “पापा?”

     

    नैना चीखी—

     

    “पीछे मत देखना!”

     

    लेकिन अमित ने धीरे-धीरे गर्दन घुमा दी।

     

    और जो उसने देखा…

     

    उसे देखकर उसकी पूरी दुनिया बदल गई।

     

    उसके पीछे उसके पिता नहीं थे।

     

    वहाँ अमित खुद खड़ा था।

     

    लेकिन इस बार उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब समझे?”

     

    फिर उसने फुसफुसाया—

     

    “जिसे तुम छह भागों से ढूँढ रहे हो… वह हमेशा से तुम्हारे अंदर था।”

     

    आईना पूरी तरह टूट गया।

     

    और कमरे की सारी रोशनियाँ एक साथ बुझ गईं।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित की माँ ने उसका हाथ इतनी मजबूती से पकड़ रखा था कि उसकी उंगलियाँ सुन्न होने लगी थीं।

     

    दोनों घर के बाहर खड़े थे।

     

    पीछे से अभी भी वही आवाज आ रही थी।

     

    “भैया…”

     

    अमित की आँखें बंद थीं।

     

    उसका दिल कह रहा था कि वह पीछे मुड़कर देखे।

     

    आखिर वह उसकी बहन थी।

     

    वही बहन, जिसकी यादें उसके दिमाग से मिटा दी गई थीं।

     

    लेकिन उसकी माँ लगातार फुसफुसा रही थीं—

     

    “पीछे मत देखना… चाहे कुछ भी हो जाए।”

     

    अचानक पीछे से हँसी की आवाज आई।

     

    “माँ… आप अभी भी झूठ बोल रही हो?”

     

    अमित की माँ काँप गईं।

     

    आवाज अब नैना जैसी नहीं थी।

     

    वह किसी बूढ़ी औरत जैसी भारी और डरावनी हो गई थी।

     

    फिर आवाज बदलकर अमित के पिता जैसी हो गई—

     

    “अमित, बेटा… पीछे देखो।”

     

    अमित ने दाँत भींच लिए।

     

    “यह मुझे क्यों बुला रहा है?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “क्योंकि उसे तुम्हारी जरूरत है।”

     

    “किसलिए?”

     

    “अपनी दुनिया में वापस आने के लिए।”

     

    अमित ने पहली बार माँ की तरफ गौर से देखा।

     

    “माँ, मुझे सच बताइए। उस रात क्या हुआ था?”

     

    माँ चुप रहीं।

     

    “मैंने क्या किया था?”

     

    माँ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुमने कुछ नहीं किया था।”

     

    “तो फिर मेरी यादें क्यों मिटाई गईं?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता डर गए थे।”

     

    “किससे?”

     

    माँ ने पीछे घर की तरफ देखा।

     

    “नैना से नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    माँ ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “उस चीज से जो नैना के पीछे आई थी।”

     

    अमित का शरीर ठंडा पड़ गया।

     

    “क्या चीज?”

     

    “हम उसे नाम नहीं देते।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस चीज का नाम लिया जाता है, वह उसके पास पहुँच जाती है।”

     

    कुछ पल तक दोनों चुप रहे।

     

    अचानक घर की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।

     

    धड़ाम!

     

    अंदर से ठंडी हवा का झोंका बाहर आया।

     

    ऊपरी मंजिल की खिड़की में एक छोटी बच्ची खड़ी दिखाई दी।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    दो चोटियाँ।

     

    चेहरा सफेद।

     

    वह अमित को देख रही थी।

     

    फिर उसने हाथ उठाया।

     

    और मुस्कुराई।

     

    अमित की माँ ने उसे तुरंत दूसरी दिशा में खींच लिया।

     

    “इधर मत देखो!”

     

    लेकिन अमित के कदम रुक गए।

     

    उसने पूछा,

     

    “माँ… क्या वह नैना है?”

     

    माँ ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “लेकिन उसका चेहरा—”

     

    “वह नैना का चेहरा पहनती है।”

     

    अमित ने घबराकर पूछा,

     

    “तो असली नैना कहाँ है?”

     

    माँ ने काँपती आवाज में कहा,

     

    “शायद अभी भी उसी कमरे में।”

     

    “आपने कहा था वह मर गई।”

     

    “उसका शरीर मर गया था।”

     

    अमित ने माँ की तरफ देखा।

     

    “लेकिन उसकी आत्मा?”

     

    माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय सड़क के दूसरी तरफ से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।

     

    अमित ने सामने देखा।

     

    सड़क के बीच बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    वही लालटेन।

     

    वही सफेद साड़ी।

     

    अमित ने राहत की साँस ली।

     

    “आप यहाँ कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी माँ की तरफ देखा।

     

    दोनों महिलाएँ एक-दूसरे को पहचानती थीं।

     

    अमित यह देखकर हैरान रह गया।

     

    “आप दोनों एक-दूसरे को जानती हैं?”

     

    माँ ने नजरें झुका लीं।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “बहुत पहले से।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “आपने मुझे इस रास्ते पर भेजा था?”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर मैं वहाँ पहुँचा कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने अमित की माँ की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हारी माँ ने रास्ता खोला था।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “माँ?”

     

    माँ रोने लगीं।

     

    “मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।”

     

    “आपने क्या किया?”

     

    माँ ने जवाब देने की कोशिश की, लेकिन आवाज नहीं निकली।

     

    बूढ़ी औरत बोली,

     

    “बारह साल पहले तुम्हारे पिता ने एक वादा किया था।”

     

    “किससे?”

     

    “उसी से जो तुम्हारे घर में है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “कैसा वादा?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “अगर वह तुम्हारे परिवार को छोड़ देगी, तो हर बार एक बच्चा उसके पास भेजा जाएगा।”

     

    अमित की साँस अटक गई।

     

    “एक बच्चा?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो नैना?”

     

    “पहली थी।”

     

    अमित की आँखें फैल गईं।

     

    “और मैं?”

     

    बूढ़ी औरत चुप रही।

     

    अमित समझ गया।

     

    “दूसरा?”

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “लेकिन मैं तो बच गया।”

     

    “क्योंकि उस रात किसी ने नियम तोड़ दिया था।”

     

    “किसने?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी माँ की तरफ देखा।

     

    माँ फूट-फूटकर रोने लगीं।

     

    “मैंने।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “आपने क्या किया?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें जंगल तक पहुँचने से पहले ही रोकने की कोशिश की थी। लेकिन तुम्हारे पिता ने मुझे कमरे में बंद कर दिया।”

     

    “फिर?”

     

    “नैना को उसने कमरे में भेज दिया।”

     

    अमित की आँखों के सामने धुंध छाने लगी।

     

    धीरे-धीरे उसे सब याद आने लगा।

     

    वह रात।

     

    बारिश।

     

    बिजली की चमक।

     

    नैना का रोना।

     

    उसके पिता का गुस्सा।

     

    और वह पुराना आईना।

     

    उसके पिता ने नैना से कहा था—

     

    “बस एक बार पीछे देखो।”

     

    नैना डरते हुए पीछे मुड़ी थी।

     

    आईने में उसके पीछे एक काली परछाईं खड़ी थी।

     

    अमित चीखना चाहता था।

     

    लेकिन उसकी आवाज नहीं निकल रही थी।

     

    फिर उसके पिता ने उसे खींचकर कमरे से बाहर कर दिया था।

     

    और दरवाजा बंद कर दिया था।

     

    अमित ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब याद आ रहा है…”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    “बेटा…”

     

    अमित ने माँ को दूर कर दिया।

     

    “आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    “मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।”

     

    “मुझसे मेरी बहन छीनकर?”

     

    माँ रोती रहीं।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “अब पछताने का समय नहीं है।”

     

    “क्या करना होगा?”

     

    “आज रात अमावस्या है।”

     

    अमित ने आसमान की तरफ देखा।

     

    बादलों के पीछे चाँद बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    “इसका मतलब?”

     

    “आज वह पूरी तरह बाहर आ सकती है।”

     

    “और अगर हमने उसे रोक दिया?”

     

    “तो वह हमेशा के लिए तुम्हारे घर से चली जाएगी।”

     

    “कैसे रोकेंगे?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी लालटेन उठाई।

     

    “तुम्हें उसी कमरे में वापस जाना होगा।”

     

    अमित ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    बूढ़ी औरत बोली,

     

    “तुम्हें जाना ही होगा।”

     

    “वहाँ वह है।”

     

    “हाँ।”

     

    “और अगर उसने मुझे पकड़ लिया?”

     

    “तो तुम्हारी जगह वह ले लेगी।”

     

    अमित ने अपनी माँ की तरफ देखा।

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “लेकिन तुम्हारे पास एक मौका है।”

     

    “क्या?”

     

    “उसे आईने के सामने अपना असली नाम बताना होगा।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “नैना का?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “उसका असली नाम।”

     

    “लेकिन आपने कहा था कि उसका नाम नहीं लेना चाहिए।”

     

    “तभी तो मुश्किल है।”

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “आपको उसका नाम पता है?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह सिर्फ घर की तरफ देखने लगी।

     

    ऊपर खिड़की में खड़ी बच्ची अब वहाँ नहीं थी।

     

    लेकिन जमीन पर लालटेन की रोशनी में छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    वे घर से निकलकर सड़क तक आ रहे थे।

     

    फिर अचानक रुक गए।

     

    बूढ़ी औरत ने उन निशानों को देखा और फुसफुसाई—

     

    “वह बाहर आ चुकी है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    बूढ़ी औरत ने पहली बार डरते हुए कहा—

     

    “जिसे हमने बारह साल से नैना समझ रखा था।”

     

    तभी अमित के मोबाइल पर एक संदेश आया।

     

    नंबर अनजान था।

     

    संदेश में सिर्फ एक लाइन थी—

     

    “भैया, अगर सच में मुझे बचाना चाहते हो तो अकेले कमरे में वापस आओ।”

     

    अमित ने संदेश पढ़ा।

     

    उसने माँ और बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    फिर घर की ओर बढ़ गया।

     

    लेकिन उसे पता नहीं था कि कमरे के अंदर उसका इंतजार नैना नहीं…

     

    बल्कि कोई और कर रहा था।

     

    और इस बार—

     

    वह उसे पीछे मुड़ने पर मजबूर करने वाला था।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अमित कुछ सेकंड तक सीढ़ियों पर खड़े अपने ही चेहरे को देखता रहा।

     

    सामने खड़ा दूसरा अमित बिल्कुल उसकी तरह था।

     

    वही आँखें।

     

    वही बाल।

     

    वही कपड़े।

     

    यहाँ तक कि उसकी दाहिनी भौंह के ऊपर बचपन में लगी चोट का छोटा-सा निशान भी बिल्कुल वैसा ही था।

     

    अमित के गले से आवाज नहीं निकल रही थी।

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “डर गए?”

     

    अमित ने खुद को संभालते हुए पूछा,

     

    “तू कौन है?”

     

    सामने वाला हँसा।

     

    “मैंने बताया ना… तुम्हारी जगह लेने आया हूँ।”

     

    “मेरी जगह?”

     

    “हाँ।”

     

    “कहाँ?”

     

    “हर जगह।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    उसी समय ऊपर बंद कमरे से बच्चे के रोने की आवाज फिर आई।

     

    “माँ…”

     

    अमित ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    “ऊपर कौन है?”

     

    दूसरे अमित ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह सिर्फ मुस्कुराता रहा।

     

    अमित ने सीढ़ियों पर चढ़ने की कोशिश की।

     

    लेकिन जैसे ही उसने पहला कदम आगे बढ़ाया, दूसरे अमित ने उसका रास्ता रोक लिया।

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहाँ तुम्हारे सारे सवालों के जवाब हैं।”

     

    “तो मैं वहीं जाऊँगा।”

     

    “और अगर जवाब पसंद नहीं आया तो?”

     

    अमित ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “फिर भी जाऊँगा।”

     

    दूसरा अमित कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    फिर अचानक एक तरफ हट गया।

     

    “जाओ।”

     

    अमित धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    हर कदम के साथ उसका दिल तेज धड़क रहा था।

     

    ऊपर पहुँचते ही उसने बंद कमरे को देखा।

     

    दरवाजे पर वही पुराना ताला लगा था।

     

    उसने जेब से बूढ़ी औरत की दी हुई चाबी निकाली।

     

    चाबी ताले में डालते ही—

     

    क्लिक!

     

    ताला खुल गया।

     

    नीचे खड़ा दूसरा अमित अचानक चिल्लाया—

     

    “मत खोलो!”

     

    अमित रुक गया।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दूसरा अमित अब मुस्कुरा नहीं रहा था।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दे रहा था।

     

    “तू डर रहा है?” अमित ने पूछा।

     

    दूसरा अमित कुछ नहीं बोला।

     

    अमित ने दरवाजा खोल दिया।

     

    दरवाजा चरमराता हुआ अंदर की तरफ खुला।

     

    कमरे से बासी हवा का झोंका बाहर आया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    अमित ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    कमरे में पुराने सामान रखे थे।

     

    एक टूटी हुई अलमारी।

     

    कुछ पुराने खिलौने।

     

    एक लकड़ी की मेज।

     

    दीवार पर धूल से ढकी तस्वीरें।

     

    और कमरे के बीच में एक पुराना आईना।

     

    अमित धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    आईने के सामने पहुँचते ही उसके कदम रुक गए।

     

    आईने में उसका प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन कुछ अजीब था।

     

    वह प्रतिबिंब अमित की तरह खड़ा नहीं था।

     

    अमित सीधा खड़ा था।

     

    आईने वाला अमित थोड़ा झुका हुआ था।

     

    अमित ने अपना हाथ उठाया।

     

    आईने में हाथ उठ गया।

     

    लेकिन एक पल देर से।

     

    अमित का दिल जोर से धड़का।

     

    उसने दोबारा हाथ हिलाया।

     

    इस बार भी प्रतिबिंब एक पल बाद हिला।

     

    “यह क्या है?”

     

    पीछे से आवाज आई—

     

    “यही तुम्हारा असली घर है।”

     

    अमित ने पलटकर देखा।

     

    दूसरा अमित दरवाजे पर खड़ा था।

     

    “तू अंदर कैसे आया?”

     

    “यह कमरा मुझे भी पहचानता है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “तुम दोनों का क्या संबंध है?”

     

    दूसरा अमित चुप रहा।

     

    तभी कमरे के एक कोने से किसी बच्चे के खिलखिलाने की आवाज आई।

     

    अमित ने टॉर्च उस तरफ घुमाई।

     

    वहाँ एक छोटी-सी लकड़ी की कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर एक पुरानी गुड़िया बैठी थी।

     

    उसकी आँखें काली थीं।

     

    अमित ने गुड़िया को देखा।

     

    अचानक गुड़िया की गर्दन धीरे-धीरे उसकी तरफ घूम गई।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    दूसरा अमित बोला,

     

    “उसे मत छूना।”

     

    “यह क्या है?”

     

    “वह यहाँ बहुत पहले से है।”

     

    “कब से?”

     

    दूसरे अमित ने धीरे से कहा,

     

    “जब से तुम्हारी बहन मरी थी।”

     

    अमित का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी कोई बहन नहीं थी।”

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें यही बताया गया था।”

     

    अमित के दिमाग में जैसे कोई पुराना दरवाजा खुलने लगा।

     

    उसे बचपन की कुछ धुंधली यादें दिखाई देने लगीं।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    दो चोटियाँ।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    वह उसे “दीदी” कहकर बुला रहा था।

     

    फिर एक कमरा।

     

    बहुत तेज बारिश।

     

    किसी के रोने की आवाज।

     

    और उसकी माँ चिल्ला रही थीं—

     

    “पीछे मत देखना!”

     

    अमित ने सिर पकड़ लिया।

     

    “ये यादें… मुझे क्यों नहीं याद थीं?”

     

    दूसरा अमित धीरे से बोला,

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने उन्हें मिटाने की कोशिश की थी।”

     

    “मेरे पिता?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    दूसरा अमित आईने की तरफ देखने लगा।

     

    “क्योंकि उस रात जो हुआ था, उसके बाद तुम बदल गए थे।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं?”

     

    “नहीं।”

     

    दूसरे अमित ने आईने की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारा वह हिस्सा।”

     

    अमित ने आईने में देखा।

     

    इस बार उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।

     

    लेकिन अमित नहीं मुस्कुरा रहा था।

     

    आईने वाला अमित धीरे-धीरे अपना मुँह खोलने लगा।

     

    उसके होंठ हिले—

     

    “भैया…”

     

    अमित के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    वही आवाज।

     

    वही बच्ची की आवाज।

     

    “भैया… तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गए?”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे कुछ याद नहीं।”

     

    आईने में बच्ची का चेहरा दिखाई दिया।

     

    वह धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।

     

    पहले पाँच साल की बच्ची।

     

    फिर दस साल की।

     

    फिर एक किशोरी।

     

    फिर अचानक उसका चेहरा काला पड़ गया।

     

    आँखें खाली हो गईं।

     

    और उसने कहा—

     

    “तुम्हें याद करना ही पड़ेगा।”

     

    कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अमित ने दौड़कर दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    दूसरा अमित कमरे के कोने में खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अब बदलने लगा था।

     

    त्वचा काली पड़ रही थी।

     

    आँखें लाल हो रही थीं।

     

    अमित चीखा—

     

    “तू इंसान नहीं है!”

     

    दूसरा अमित हँसने लगा।

     

    “अब समझे?”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    तभी कमरे की दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर नीचे गिर गई।

     

    काँच टूट गया।

     

    तस्वीर में चार लोग थे।

     

    अमित के पिता।

     

    उसकी माँ।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    और…

     

    अमित।

     

    लेकिन तस्वीर देखकर अमित की साँस रुक गई।

     

    तस्वीर में अमित की उम्र लगभग आठ साल थी।

     

    उसके पास खड़ी बच्ची के चेहरे पर लाल निशान था।

     

    और तस्वीर के पीछे किसी ने तारीख लिखी थी—

     

    15 अगस्त 2010

     

    अमित ने काँपते हुए कहा,

     

    “यह मेरी बहन है?”

     

    दूसरे अमित ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “उसका नाम क्या था?”

     

    “नैना।”

     

    अमित की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    “नैना को क्या हुआ था?”

     

    कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    फिर आईने के अंदर से वही बच्ची बोली—

     

    “भैया ने मुझे पीछे देखने को कहा था।”

     

    अमित का दिल बैठ गया।

     

    “नहीं…”

     

    “भैया ने कहा था कि पीछे कोई नहीं है।”

     

    “नहीं!”

     

    “मैंने पीछे देखा।”

     

    अमित अपने कान बंद करने लगा।

     

    “बस करो!”

     

    आईने में नैना का चेहरा अचानक विकृत हो गया।

     

    “और फिर… उसने मुझे देख लिया।”

     

    अमित चीख पड़ा।

     

    उसी समय कमरे की लाइट अपने आप जल गई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    नीचे से उसकी माँ की आवाज आई—

     

    “अमित!”

     

    अमित सीढ़ियों की तरफ भागा।

     

    नीचे उसकी माँ खड़ी थीं।

     

    उनके चेहरे पर आँसू थे।

     

    “बेटा… तुम यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    अमित दौड़कर उनके पास पहुँचा।

     

    “माँ, नैना कौन थी?”

     

    माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारी बहन।”

     

    “फिर आपने मुझसे इतने साल झूठ क्यों बोला?”

     

    माँ रोने लगीं।

     

    “क्योंकि वह मरने के बाद भी घर से नहीं गई।”

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा—

     

    “वह क्या चाहती है?”

     

    माँ ने पीछे देखा।

     

    ऊपर कमरे के दरवाजे पर दूसरा अमित खड़ा था।

     

    माँ ने उसे देखते ही अमित का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    “क्यों?”

     

    माँ चिल्लाईं—

     

    “क्योंकि वह नैना नहीं है!”

     

    अमित ने ऊपर देखा।

     

    दूसरा अमित मुस्कुरा रहा था।

     

    और उसके पीछे आईने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    वह बच्ची धीरे-धीरे आईने से बाहर निकल रही थी।

     

    माँ ने अमित को खींचते हुए कहा—

     

    “अगर उसने तुम्हें छू लिया, तो तुम्हारी जगह वह ले लेगी।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “फिर असली नैना कहाँ है?”

     

    माँ ने काँपते हुए कहा—

     

    “वह तो उसी रात मर गई थी।”

     

    अमित ने पीछे देखा।

     

    ऊपर खड़ी परछाईं अब सीढ़ियों से उतर रही थी।

     

    लेकिन उसके कदमों की आवाज नहीं आ रही थी।

     

    वह धीरे-धीरे नीचे आ रही थी।

     

    और उसके पीछे…

     

    आईने से बाहर निकल चुकी छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    अमित की माँ ने दरवाजा खोलते हुए कहा—

     

    “बाहर निकलो!”

     

    दोनों बाहर भागे।

     

    लेकिन जैसे ही अमित ने घर के बाहर कदम रखा, उसके पीछे से एक मासूम आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    अमित रुक गया।

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पीछे मत देखना!”

     

    लेकिन तभी आवाज फिर आई—

     

    “भैया… अगर तुमने पीछे नहीं देखा… तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि मैं सच में नैना नहीं हूँ?”

     

    अमित की आँखें बंद हो गईं।

     

    उसके सामने अब सिर्फ एक सवाल था—

     

    क्या वह अपनी बहन की आवाज पर भरोसा करे… या बूढ़ी औरत की चेतावनी पर?

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित के हाथ से मोबाइल लगभग गिर ही गया।

     

    उसकी माँ की आखिरी बात उसके कानों में बार-बार गूँज रही थी—

     

    “तुम्हारा कमरा अंदर से बंद है… और अंदर से तुम्हारी आवाज आ रही है।”

     

    कमरे में कुछ देर तक बिल्कुल सन्नाटा रहा।

     

    बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी, लेकिन हवा अभी भी तेज चल रही थी। खिड़की के बाहर पेड़ों की शाखाएँ अंधेरे में हिल रही थीं।

     

    अमित ने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    “मुझे घर जाना होगा।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    “मेरी माँ अकेली हैं।”

     

    “अगर तुम अभी घर गए, तो शायद तुम्हारी माँ तुम्हें पहचान भी न पाए।”

     

    अमित का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “आप कहना क्या चाहती हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई और कमरे के दूसरे हिस्से में चली गई।

     

    “तुम्हारे घर में जो है, वह तुम्हारी आवाज में बोल सकता है। तुम्हारा चेहरा भी बना सकता है। लेकिन एक चीज नहीं बना सकता।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी परछाईं।”

     

    अमित कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “मतलब?”

     

    “वह इंसान की तरह दिख सकता है, इंसान की तरह बोल सकता है, लेकिन उसकी परछाईं नहीं होती।”

     

    अमित ने तुरंत अपनी तरफ देखा।

     

    लालटेन की रोशनी में उसकी परछाईं फर्श पर साफ दिखाई दे रही थी।

     

    उसने राहत की साँस ली।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “इसका मतलब तुम अभी वही हो जो तुम समझ रहे हो।”

     

    “और मेरे घर में?”

     

    “वहाँ जाकर देखना होगा।”

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने कमरे के कोने से एक पुराना कपड़ा उठाया। उसके नीचे एक लकड़ी का संदूक रखा था।

     

    उसने संदूक खोला।

     

    अंदर पुराने कागज, एक लोहे की चाबी और कुछ काले धागे रखे थे।

     

    उसने चाबी अमित की हथेली पर रख दी।

     

    “यह किसकी है?”

     

    “तुम्हारे घर की।”

     

    अमित चौंक गया।

     

    “आपके पास मेरे घर की चाबी कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यह तुम्हारे घर की मुख्य चाबी नहीं है। यह उस कमरे की चाबी है जिसे तुम्हारे परिवार ने वर्षों से बंद रखा है।”

     

    अमित का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “मेरे घर में ऐसा कोई कमरा नहीं है।”

     

    बूढ़ी औरत हल्का सा मुस्कुराई।

     

    “हर घर में कुछ कमरे ऐसे होते हैं जिनके बारे में घर वाले भूल जाना चाहते हैं।”

     

    अमित को अचानक अपने बचपन की एक बात याद आई।

     

    जब वह छोटा था, घर की ऊपरी मंजिल पर एक कमरा हमेशा बंद रहता था।

     

    उसकी माँ उसे कभी वहाँ जाने नहीं देती थीं।

     

    जब भी अमित पूछता, माँ कहतीं—

     

    “वहाँ पुराना सामान रखा है।”

     

    एक बार उसने उस कमरे का दरवाजा खोलने की कोशिश की थी।

     

    उसी रात उसके पिता ने उसे बहुत डाँटा था।

     

    अगले दिन उस कमरे पर नया ताला लगा दिया गया था।

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “उस कमरे में क्या है?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब दिया,

     

    “वही, जिसकी वजह से वह तुम्हारे घर तक पहुँच चुका है।”

     

    अमित ने चाबी मुट्ठी में कस ली।

     

    “मुझे वापस जाना होगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “आप मेरे साथ चलेंगी?”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिला दिया।

     

    “मैं इस घर से बाहर नहीं जा सकती।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि बहुत साल पहले मैंने भी पीछे मुड़कर देखा था।”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    बूढ़ी औरत ने दरवाजा खोला।

     

    बारिश लगभग रुक चुकी थी।

     

    बाहर उसकी बाइक खड़ी थी।

     

    लेकिन अमित ने जैसे ही बाइक की तरफ देखा, उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    बाइक के पीछे की सीट पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    एक नहीं।

     

    दो नहीं।

     

    बल्कि छोटे-छोटे पैरों के निशान।

     

    जैसे कोई बच्चा बारिश में भीगकर बाइक पर बैठा हो।

     

    अमित ने पीछे हटते हुए पूछा,

     

    “ये किसके निशान हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने उन्हें देखा और तुरंत नजरें झुका लीं।

     

    “उसे मत देखो।”

     

    “लेकिन—”

     

    “बाइक पर बैठो।”

     

    अमित बाइक पर बैठ गया।

     

    बूढ़ी औरत उसके पास आई और उसकी कलाई पर काला धागा बाँध दिया।

     

    “जब तक सूरज नहीं निकलता, इसे मत उतारना।”

     

    “और अगर यह टूट गया?”

     

    बूढ़ी औरत ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “तो किसी भी आवाज का जवाब मत देना।”

     

    अमित ने बाइक स्टार्ट की।

     

    इस बार इंजन पहली कोशिश में चालू हो गया।

     

    वह सड़क पर निकल पड़ा।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसने पीछे से वही आवाज सुनी—

     

    “अमित…”

     

    उसने आँखें बंद करके एक पल के लिए साँस रोकी।

     

    फिर बाइक और तेज कर दी।

     

    आवाज फिर आई।

     

    इस बार वह उसकी माँ की आवाज थी।

     

    “बेटा… रुक जाओ।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह जानता था कि उसकी माँ घर पर थीं।

     

    फिर भी दिल बार-बार कह रहा था कि शायद सच में माँ उसे पुकार रही हैं।

     

    “बेटा… मुझे छोड़कर मत जाओ।”

     

    अमित का हाथ ब्रेक की तरफ बढ़ा।

     

    तभी उसकी नजर कलाई पर बँधे काले धागे पर पड़ी।

     

    उसे बूढ़ी औरत की बात याद आई।

     

    “किसी भी आवाज का जवाब मत देना।”

     

    उसने ब्रेक नहीं लगाया।

     

    कुछ मिनट बाद जंगल खत्म हो गया।

     

    सड़क पर स्ट्रीट लाइट दिखाई देने लगीं।

     

    अमित को लगा कि वह बच गया।

     

    लेकिन तभी उसकी बाइक अपने आप धीमी होने लगी।

     

    उसने एक्सीलेटर दबाया।

     

    बाइक नहीं बढ़ी।

     

    अचानक इंजन बंद हो गया।

     

    सामने उसका घर था।

     

    अमित ने घर की तरफ देखा।

     

    ऊपरी मंजिल की खिड़की में रोशनी जल रही थी।

     

    उसका वही कमरा।

     

    वह कमरा जो सालों से बंद था।

     

    अमित बाइक से उतरा।

     

    घर के बाहर उसकी माँ की चप्पलें पड़ी थीं।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    “माँ?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    अमित अंदर गया।

     

    घर में अजीब शांति थी।

     

    टेबल पर एक गिलास पानी रखा था।

     

    टीवी चल रहा था, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ काली-सफेद झिलमिलाहट थी।

     

    “माँ?”

     

    इस बार ऊपर से आवाज आई—

     

    “अमित… मैं ऊपर हूँ।”

     

    यह उसकी माँ की आवाज थी।

     

    अमित सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    पहली सीढ़ी पर कदम रखते ही उसके मोबाइल में एक संदेश आया।

     

    उसने स्क्रीन देखी।

     

    संदेश उसकी माँ के नंबर से था।

     

    “अमित, घर मत आना।”

     

    अमित जम गया।

     

    उसने तुरंत ऊपर देखा।

     

    “माँ?”

     

    ऊपर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “अमित… जल्दी ऊपर आओ।”

     

    अमित के माथे पर पसीना आ गया।

     

    उसने फोन मिलाया।

     

    माँ का नंबर व्यस्त था।

     

    उसी समय नीचे मुख्य दरवाजा धीरे-धीरे बंद होने लगा।

     

    चर्ररर…

     

    अमित ने पीछे देखा।

     

    दरवाजा पूरी तरह बंद हो चुका था।

     

    वह दौड़कर दरवाजे तक गया और हैंडल घुमाया।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    तभी ऊपर से किसी के धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने की आवाज आने लगी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    अमित ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    ऊपर अंधेरे में कोई खड़ा था।

     

    पहले सिर्फ पैर दिखाई दिए।

     

    फिर शरीर।

     

    फिर चेहरा।

     

    वह चेहरा देखकर अमित की साँस रुक गई।

     

    वह खुद था।

     

    सीढ़ियों पर खड़ा दूसरा अमित धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।

     

    उसने वही कपड़े पहन रखे थे।

     

    वही चेहरा।

     

    वही आवाज।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम बहुत देर से आए।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “तू कौन है?”

     

    दूसरा अमित सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।

     

    “मैं?”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “मैं वही हूँ, जो आज रात तुम्हारी जगह घर जाएगा।”

     

    अमित ने अपनी कलाई की तरफ देखा।

     

    काला धागा अभी भी बँधा था।

     

    दूसरे अमित ने भी अपनी कलाई दिखाई।

     

    उस पर भी वही काला धागा था।

     

    अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    फिर दूसरा अमित धीरे से बोला—

     

    “तुम्हें लगता है बूढ़ी औरत ने तुम्हें बचाने के लिए वह धागा दिया था?”

     

    वह एक कदम और नीचे आया।

     

    “नहीं अमित… उसने तुम्हें पहचानने के लिए दिया था।”

     

    अमित कुछ बोल नहीं पाया।

     

    दूसरे अमित ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि मैं कौन हूँ।”

     

    वह बिल्कुल उसके सामने आ गया।

     

    “असली सवाल यह है कि हम दोनों में से… असली अमित कौन है?”

     

    उसी क्षण ऊपर वाले बंद कमरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    और कमरे के अंदर से एक धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “माँ… उसने फिर से पीछे देख लिया।”

     

    अमित ने डरकर ऊपर देखा।

     

    और पहली बार उसे महसूस हुआ कि इस घर का रहस्य जंगल से भी ज्यादा पुराना है।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित कुछ पल तक उस बूढ़ी औरत को देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर ऐसा डर था, जैसा अमित ने पहले कभी किसी इंसान के चेहरे पर नहीं देखा था।

     

    दरवाजा बंद हो चुका था।

     

    बाहर बारिश अब पहले से भी तेज हो गई थी।

     

    टप-टप की आवाज अब लगातार पड़ती बूंदों की तेज आवाज में बदल चुकी थी। मकान के चारों तरफ अंधेरा था। सिर्फ बूढ़ी औरत के हाथ में पकड़ी लालटेन की पीली रोशनी कमरे के एक छोटे से हिस्से को रोशन कर रही थी।

     

    अमित ने घबराकर पूछा,

     

    “आपने कहा था कि मैं जिसे रास्ते में छोड़कर आया हूँ, वह वापस आ गया है। आखिर कौन है वो?”

     

    बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह धीरे-धीरे कमरे के कोने में गई और एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठ गई।

     

    “बैठ जाओ,” उसने कहा।

     

    अमित बैठने ही वाला था कि बाहर से दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    अमित वहीं रुक गया।

     

    बूढ़ी औरत की आँखें दरवाजे पर टिक गईं।

     

    फिर दूसरी दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “कौन है?”

     

    बूढ़ी औरत ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “चुप!”

     

    उसकी उंगलियाँ ठंडी थीं।

     

    “कोई आवाज मत करना।”

     

    अमित ने हैरानी से उसे देखा।

     

    कुछ सेकंड तक बाहर बिल्कुल शांति रही।

     

    फिर दरवाजे के दूसरी तरफ से आवाज आई—

     

    “अमित…”

     

    अमित का दिल जैसे सीने से बाहर निकलने लगा।

     

    वह आवाज उसी की थी।

     

    बिल्कुल उसकी अपनी आवाज।

     

    “दरवाजा खोलो… मैं बाहर हूँ।”

     

    अमित के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    वह आँखें बंद करके कुछ बुदबुदा रही थी।

     

    “यह तुम्हारी आवाज में क्यों बोल रहा है?” अमित ने फुसफुसाकर पूछा।

     

    बूढ़ी औरत ने आँखें खोलीं।

     

    “क्योंकि अब यह तुम्हें पहचान चुका है।”

     

    “कौन है यह?”

     

    “जिसे तुम जानना चाहते हो, उसके बारे में पूछना बंद करो।”

     

    बाहर से फिर आवाज आई।

     

    “अमित… दरवाजा खोलो।”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल सामान्य थी।

     

    ऐसी जैसे कोई परेशान होकर अपने दोस्त को बुला रहा हो।

     

    अमित के दिमाग में अचानक रवि का चेहरा घूम गया।

     

    “रवि!”

     

    उसने कहा,

     

    “शायद मेरा दोस्त मुझे ढूँढते हुए यहाँ आया है।”

     

    बूढ़ी औरत ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “तुम्हारा दोस्त यहाँ नहीं है।”

     

    “लेकिन आवाज—”

     

    “वह आवाज तुम्हारे दोस्त की भी हो सकती है।”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    बाहर अचानक किसी ने दरवाजे को खरोंचना शुरू कर दिया।

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपने लंबे नाखून लकड़ी पर घिस रहा हो।

     

    अमित ने डरकर पीछे कदम किया।

     

    “मैं यहाँ से जाना चाहता हूँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने इस समय दरवाजा खोला, तो तुम अकेले नहीं जाओगे।”

     

    अमित कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    बूढ़ी औरत ने सामने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ कई पुराने कागज टंगे हुए थे।

     

    हर कागज पर किसी इंसान का नाम लिखा था।

     

    अमित धीरे-धीरे उनके पास गया।

     

    पहला नाम था—

     

    रमेश — 1998

     

    दूसरा—

     

    सुरेश — 2003

     

    तीसरा—

     

    नरेश — 2007

     

    फिर कई नाम।

     

    कुछ नामों के आगे तारीखें थीं।

     

    लेकिन आखिरी कागज देखकर अमित की साँस रुक गई।

     

    उस पर लिखा था—

     

    अमित — 15 अगस्त 2026

     

    उसने पीछे मुड़कर बूढ़ी औरत को देखा।

     

    “यह क्या है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “यह मेरा नाम है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “और आज की तारीख भी।”

     

    “मुझे यह भी पता है।”

     

    अमित की आवाज काँपने लगी।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    बूढ़ी औरत धीरे-धीरे उठी।

     

    “क्योंकि तुम पहले नहीं हो।”

     

    “क्या?”

     

    “हर कुछ साल में कोई न कोई उस रास्ते से गुजरता है।”

     

    वह दीवार पर लगे पुराने कागजों की तरफ देखने लगी।

     

    “उसे पीछे से कोई पुकारता है। वह आवाज सुनता है। अगर वह पीछे मुड़कर देख ले… तो फिर वह कभी अपने घर नहीं पहुँचता।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “और अगर पीछे न देखे?”

     

    बूढ़ी औरत कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “तो वह मेरे घर तक पहुँच जाता है।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर सुबह होने तक उसे यहाँ रहना पड़ता है।”

     

    “और उसके बाद?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “उसके बाद फैसला होता है कि वह वापस जाएगा या नहीं।”

     

    अमित को लगा जैसे उसका सिर घूम रहा है।

     

    “किसका फैसला?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    अमित उछल पड़ा।

     

    “ऊपर कौन है?”

     

    बूढ़ी औरत ने तुरंत कहा,

     

    “कोई नहीं।”

     

    “लेकिन आवाज तो—”

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहाँ जो रहता है, वह इंसान नहीं है।”

     

    अमित की नजर सीढ़ियों पर गई।

     

    लकड़ी की पुरानी सीढ़ियाँ अंधेरे में गायब हो रही थीं।

     

    उसे ऐसा लगा जैसे ऊपर कोई खड़ा उसे देख रहा है।

     

    “मुझे कोई दिखाई दे रहा है,” अमित ने कहा।

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “सीढ़ियों के ऊपर…”

     

    वह धीरे-धीरे ऊपर देखने लगी।

     

    अचानक उसका चेहरा बदल गया।

     

    “नीचे आओ!”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    ऊपर सीढ़ियों के अंतिम पायदान पर एक काली परछाईं खड़ी थी।

     

    वह बिल्कुल स्थिर थी।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन उसकी दो सफेद आँखें साफ दिखाई दे रही थीं।

     

    अमित की साँस अटक गई।

     

    परछाईं ने धीरे-धीरे सिर झुकाया।

     

    फिर उसी आवाज में बोली—

     

    “अमित…”

     

    अमित ने कान बंद कर लिए।

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई और तेज आवाज में कुछ मंत्र जैसा बोलना शुरू कर दिया।

     

    परछाईं अचानक गायब हो गई।

     

    कुछ सेकंड बाद ऊपर से किसी के भागने की आवाज आई।

     

    धड़…

     

    धड़…

     

    धड़…

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा,

     

    “वह क्या था?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “तुम्हारा पीछा करने वाला।”

     

    “लेकिन वह ऊपर कैसे पहुँच गया?”

     

    “वह जहाँ चाहे पहुँच सकता है।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैंने उसका क्या बिगाड़ा है?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर वह मेरे पीछे क्यों पड़ा है?”

     

    बूढ़ी औरत कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने दीवार पर लगे अमित के नाम वाले कागज को उतार लिया।

     

    कागज के पीछे कुछ लिखा था।

     

    उसने अमित को वह कागज दिया।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसने तुम्हें रास्ते पर पुकारा, वह तुम्हें लेने नहीं आया था।”

     

    अमित ने पढ़कर पूछा,

     

    “तो फिर?”

     

    बूढ़ी औरत ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “वह तुम्हें घर तक पहुँचाना चाहता था।”

     

    अमित ने हैरानी से पूछा,

     

    “घर तक?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    बूढ़ी औरत ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    फिर बोली—

     

    “क्योंकि असली खतरा इस जंगल में नहीं है।”

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “तो कहाँ है?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हारे घर में।”

     

    अमित का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल अचानक बज उठा।

     

    ट्रिन…

     

    ट्रिन…

     

    ट्रिन…

     

    कमरे में मौजूद दोनों लोग जम गए।

     

    अमित ने काँपते हाथों से मोबाइल निकाला।

     

    स्क्रीन पर उसके घर का नंबर दिखाई दे रहा था।

     

    माँ कॉल कर रही थीं।

     

    अमित ने कॉल उठाई।

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ सन्नाटा था।

     

    फिर उसकी माँ की घबराई हुई आवाज सुनाई दी—

     

    “अमित… बेटा, तुम कहाँ हो?”

     

    “माँ, मैं रास्ते में हूँ।”

     

    दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर माँ ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “नहीं बेटा… तुम रास्ते में नहीं हो।”

     

    अमित का दिल बैठ गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    माँ ने कहा—

     

    “तुम्हारा कमरा अंदर से बंद है।”

     

    अमित कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर उसकी माँ फुसफुसाईं—

     

    “और अंदर से तुम्हारी आवाज आ रही है।”

     

    कॉल अचानक कट गई।

     

    अमित ने धीरे-धीरे बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    बूढ़ी औरत ने सिर्फ इतना कहा—

     

    “अब तुम्हें समझ आया कि पीछे देखना मना क्यों है?”

  • 😱पीछे देखना मना है..!!😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।आसमान पर बादल इतने घने थे कि चाँद का कहीं नामोनिशान नहीं था। सुनसान सड़क पर दूर-दूर तक कोई इंसान दिखाई नहीं दे रहा था। सड़क के दोनों तरफ खड़े पेड़ हवा के साथ इस तरह झूम रहे थे, जैसे अँधेरे में कोई उन्हें हिला रहा हो।

     

    अमित अपनी बाइक तेज चला रहा था।

     

    उसका घर शहर से लगभग बीस किलोमीटर दूर था और आज ऑफिस में काम ज्यादा होने के कारण उसे निकलने में देर हो गई थी। आमतौर पर वह मुख्य सड़क से जाता था, लेकिन आज बारिश के कारण मुख्य रास्ते पर लंबा जाम लगा हुआ था।

     

    तभी उसे अपने दोस्त रवि की कही बात याद आई।

     

    “अगर कभी देर रात घर जाना हो, तो पुराने जंगल वाले रास्ते से मत जाना।”

     

    अमित ने उस समय हँसते हुए पूछा था, “क्यों? वहाँ भूत रहता है क्या?”

     

    रवि ने मजाक नहीं किया था।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा था, “भूत से भी ज्यादा खतरनाक चीज है वहाँ।”

     

    “क्या?”

     

    रवि कुछ देर चुप रहा था।

     

    फिर बोला था, “वहाँ एक नियम है। अगर पीछे से कोई आवाज आए, तो पीछे मुड़कर मत देखना।”

     

    अमित को वह बात याद आते ही हल्की हँसी आ गई।

     

    “क्या बेवकूफी है,” उसने खुद से कहा।

     

    लेकिन उसी समय उसकी बाइक की हेडलाइट एक पुराने पत्थर के बोर्ड पर पड़ी।

     

    पुराना जंगल मार्ग — 7 किलोमीटर

     

    अमित ने बाइक रोक दी।

     

    मुख्य सड़क से जाने में कम से कम एक घंटा लगना था। दूसरी तरफ यह रास्ता सिर्फ सात किलोमीटर का था।

     

    उसने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बाइक जंगल वाले रास्ते पर मोड़ दी।

     

    शुरुआत में रास्ता बिल्कुल सामान्य था। कच्ची सड़क, दोनों तरफ पेड़ और बीच-बीच में पानी से भरे गड्ढे।

     

    लेकिन करीब दो किलोमीटर आगे जाने के बाद अचानक मोबाइल का नेटवर्क गायब हो गया।

     

    अमित ने फोन निकाला।

     

    कोई सिग्नल नहीं था।

     

    “कमाल है।”

     

    उसने फोन वापस जेब में रख लिया।

     

    कुछ देर बाद उसे लगा कि उसके पीछे कोई बाइक चल रही है।

     

    पहले आवाज बहुत हल्की थी।

     

    घर्र… घर्र… घर्र…

     

    अमित ने शीशे में देखने की कोशिश की।

     

    लेकिन शीशा बारिश की बूंदों से धुंधला था।

     

    उसने बाइक थोड़ी तेज कर दी।

     

    पीछे आने वाली आवाज भी तेज हो गई।

     

    घर्र… घर्र… घर्र…

     

    अब उसे साफ महसूस हो रहा था कि कोई उसके पीछे है।

     

    उसने दोबारा शीशे में देखने के लिए गर्दन थोड़ी घुमाई।

     

    तभी उसे रवि की बात याद आई।

     

    “पीछे से कोई आवाज आए, तो पीछे मुड़कर मत देखना।”

     

    अमित का हाथ अपने आप ब्रेक पर चला गया।

     

    लेकिन उसने बाइक नहीं रोकी।

     

    पीछे से अचानक किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “अमित…”

     

    उसके शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    उसने बाइक और तेज कर दी।

     

    उस आवाज ने फिर पुकारा।

     

    “अमित… रुक जाओ…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके पीछे से आई थी।

     

    अमित का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि जंगल के बीच कोई उसका नाम कैसे जानता है।

     

    उसने अपने आप से कहा—

     

    “नहीं देखना है… बस आगे देखना है।”

     

    सड़क अब और ज्यादा सुनसान हो गई थी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ रास्ते के ऊपर झुककर एक सुरंग जैसी बना रही थीं।

     

    अचानक बाइक की हेडलाइट टिमटिमाई।

     

    एक बार।

     

    दो बार।

     

    फिर पूरी तरह बंद हो गई।

     

    अमित ने ब्रेक लगा दिया।

     

    चारों तरफ घुप्प अँधेरा।

     

    सिर्फ बारिश की आवाज।

     

    टप… टप… टप…

     

    और उसके पीछे किसी के कदमों की आवाज।

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    कोई पानी भरे रास्ते पर धीरे-धीरे उसकी तरफ आ रहा था।

     

    अमित की साँस रुकने लगी।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं।

     

    “जो भी है… चला जाएगा।”

     

    लेकिन कदमों की आवाज रुक गई।

     

    अब उसके बिल्कुल पीछे कोई खड़ा था।

     

    उसे अपनी गर्दन के पीछे ठंडी हवा महसूस हुई।

     

    फिर किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “तुमने पीछे क्यों नहीं देखा?”

     

    अमित का पूरा शरीर काँपने लगा।

     

    उसने किसी तरह बाइक स्टार्ट करने की कोशिश की।

     

    पहली बार इंजन नहीं चला।

     

    दूसरी बार भी नहीं।

     

    तीसरी बार—

     

    बाइक अचानक स्टार्ट हो गई।

     

    हेडलाइट जल उठी।

     

    अमित ने बिना पीछे देखे बाइक दौड़ा दी।

     

    कुछ मीटर आगे जाने के बाद उसे सड़क के किनारे एक पुराना मकान दिखाई दिया।

     

    मकान के बाहर एक लालटेन जल रही थी।

     

    उसे लगा शायद वहाँ कोई इंसान होगा।

     

    उसने बाइक रोक दी।

     

    मकान के दरवाजे पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    सफेद साड़ी।

     

    झुकी हुई कमर।

     

    और हाथ में लालटेन।

     

    अमित ने पूछा—

     

    “माँजी… यहाँ से शहर का रास्ता किधर है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह सिर्फ अमित को घूरती रही।

     

    फिर उसकी नजर अमित के पीछे चली गई।

     

    उसका चेहरा अचानक डर से सफेद पड़ गया।

     

    “तुम अकेले नहीं हो,” उसने काँपती आवाज में कहा।

     

    अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या मतलब?”

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन नीचे कर दी।

     

    “तुम्हारे पीछे जो है… उसे तुमने देखा नहीं?”

     

    अमित ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा—

     

    “अच्छा किया।”

     

    फिर उसने दरवाजा खोलते हुए कहा—

     

    “अंदर आ जाओ।”

     

    अमित बाइक छोड़कर मकान की तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन दरवाजे के पास पहुँचते ही बूढ़ी औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    उसकी पकड़ आश्चर्यजनक रूप से मजबूत थी।

     

    वह फुसफुसाई—

     

    “एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “आज रात अगर कोई तुम्हें तुम्हारे नाम से पुकारे…”

     

    बूढ़ी औरत की आँखें अमित की आँखों में गड़ गईं।

     

    “तो किसी भी हालत में पीछे मत देखना।”

     

    अमित कुछ पूछ पाता, उससे पहले जंगल की तरफ से वही आवाज आई—

     

    “अमित…”

     

    इस बार आवाज बूढ़ी औरत ने भी सुन ली।

     

    उसके हाथ से लालटेन लगभग छूट गई।

     

    वह काँपते हुए बोली—

     

    “हे भगवान… यह इतनी जल्दी वापस कैसे आ गया?”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “क्या वापस आया?”

     

    बूढ़ी औरत ने दरवाजा बंद करते हुए कहा—

     

    “जिसे तुम रास्ते में छोड़कर आए हो।”

     

    अमित के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    क्योंकि उसे अचानक एहसास हुआ—

     

    जब वह बाइक चला रहा था, तब पीछे से जो कदमों की आवाज आ रही थी…

     

    वह सड़क पर नहीं थी।

     

    वह आवाज उसकी बाइक के साथ-साथ चल रही थी।

  • भाग 6: आखिरी रहस्य

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    सुबह तक काली हवेली पूरी तरह मलबे में बदल चुकी थी।

     

    गाँव वाले दूर खड़े होकर उस जगह को देख रहे थे।

     

    हरिराम बाबा भी वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने आरव, निखिल, करण और मोहित को देखा।

     

    चारों जिंदा थे।

     

    बाबा ने राहत की साँस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    वह मलबे की तरफ देखता रहा।

     

    उसके मन में सिर्फ मीरा का चेहरा था।

     

    कुछ देर बाद पुलिस भी आई।

     

    हवेली के अंदर से पुराने कागज, तस्वीरें और कई साल पुरानी चीजें मिलीं।

     

    लेकिन सबसे अजीब चीज थी—

     

    एक पुराना रजिस्टर।

     

    उसमें उन सभी लोगों के नाम लिखे थे जो पिछले पैंतीस सालों में हवेली के आसपास गायब हुए थे।

     

    हर नाम के सामने एक तारीख थी।

     

    सबसे आखिरी नाम था—

     

    मोहित।

     

    आरव का दिल बैठ गया।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    मोहित तो उसके सामने खड़ा था।

     

    हरिराम बाबा ने रजिस्टर देखा।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “इसे यहीं छोड़ दो।”

     

    लेकिन आरव को यकीन नहीं हुआ।

     

    उसने आखिरी पन्ना पलटा।

     

    वहाँ एक और नाम लिखा था—

     

    आरव।

     

    उसके सामने तारीख थी—

     

    आज की।

     

    आरव ने घबराकर पन्ना बंद कर दिया।

     

    “बाबा…”

     

    हरिराम बाबा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मुझे भी यही डर था।”

     

    “क्या?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “हवेली में सिर्फ एक आत्मा नहीं थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तो कितनी?”

     

    बाबा ने मलबे की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “जितने लोग वहाँ मरे, उतनी ही।”

     

    मोहित धीरे-धीरे उनके पास आया।

     

    “लेकिन हमने तो उस आत्मा को खत्म कर दिया।”

     

    बाबा ने सिर हिलाया।

     

    “तुमने सिर्फ उस आत्मा को रोका है।”

     

    “खत्म नहीं किया?”

     

    “नहीं।”

     

    तभी हवा का एक ठंडा झोंका आया।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    मलबे के बीच वही छोटा आईने का टुकड़ा पड़ा था।

     

    वह उसे उठाने के लिए आगे बढ़ा।

     

    हरिराम बाबा ने चिल्लाया—

     

    “उसे मत छूना!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    आरव ने आईना उठा लिया।

     

    आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    फिर धीरे-धीरे उसके पीछे मीरा दिखाई दी।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मीरा…”

     

    मीरा ने कुछ नहीं कहा।

     

    उसने सिर्फ पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर आईने में देखा।

     

    मीरा के पीछे…

     

    एक लंबा आदमी खड़ा था।

     

    वही काली आत्मा।

     

    आरव के हाथ से आईने का टुकड़ा गिर गया।

     

    छन्न!

     

    आईना टूट गया।

     

    उसी पल मोहित ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे फिर वही आवाज सुनाई दे रही है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    मोहित ने काँपते हुए कहा—

     

    “दरवाजा खोलो…”

     

    सभी चुप हो गए।

     

    हरिराम बाबा ने मलबे की तरफ देखा।

     

    “कौन सा दरवाजा?”

     

    मोहित ने उंगली से जमीन के नीचे की तरफ इशारा किया।

     

    “तीसरा कमरा।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन हवेली तो गिर चुकी है।”

     

    मोहित ने सिर हिलाया।

     

    “कमरा नहीं गिरा।”

     

    सभी ने मलबे की तरफ देखा।

     

    वहाँ पत्थरों के बीच एक लोहे का छोटा दरवाजा दिखाई दे रहा था।

     

    उस पर वही शब्द लिखे थे—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    हरिराम बाबा पीछे हट गए।

     

    “इसे बंद ही रहने दो।”

     

    लेकिन अंदर से आवाज आई।

     

    पहले बहुत धीमी।

     

    फिर साफ।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव का शरीर ठंडा पड़ गया।

     

    फिर एक लड़की की आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे मीरा याद आई।

     

    उसने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया।

     

    बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अगर अंदर कोई जिंदा है तो?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “पैंतीस साल तक कोई जिंदा नहीं रह सकता।”

     

    अंदर से फिर आवाज आई—

     

    “भैया… मुझे बाहर निकालो…”

     

    आरव के आँसू निकल आए।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मीरा?”

     

    अंदर से जवाब आया—

     

    “हाँ।”

     

    आरव ने दरवाजे पर हाथ रख दिया।

     

    तभी पीछे से मोहित चिल्लाया—

     

    “आरव! मत खोलना!”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    मोहित की आँखें फिर काली हो चुकी थीं।

     

    वह धीरे-धीरे मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि…”

     

    उसकी आवाज बदल गई।

     

    “मीरा अंदर नहीं है।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    मोहित ने कहा—

     

    “वह तो आज़ाद हो चुकी है।”

     

    दरवाजे के अंदर से अचानक एक भारी पुरुष आवाज आई—

     

    “लेकिन मैं अभी भी अंदर हूँ।”

     

    हरिराम बाबा ने तुरंत आरव को पीछे खींच लिया।

     

    दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    गाँव वाले डरकर पीछे हटने लगे।

     

    और फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    सुबह तक उस जगह को मिट्टी और पत्थरों से पूरी तरह बंद कर दिया गया।

     

    उस दिन के बाद गाँव में किसी ने काली हवेली का नाम तक नहीं लिया।

     

    आरव ने शहर वापस जाकर अपनी जिंदगी शुरू कर दी।

     

    लेकिन एक चीज कभी सामान्य नहीं हुई।

     

    हर रात ठीक 12:00 बजे उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक होती।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    पहली रात उसने ध्यान नहीं दिया।

     

    दूसरी रात भी नहीं।

     

    तीसरी रात उसने दरवाजा खोल दिया।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें काली हवेली के सामने पाँच बच्चे खड़े थे।

     

    मीरा।

     

    आरव।

     

    उसका छोटा भाई।

     

    और दो बच्चे जिन्हें वह पहचानता नहीं था।

     

    तस्वीर के पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “हवेली में पाँच कमरे थे।”

     

    आरव ने काँपते हुए तस्वीर पलटी।

     

    नीचे एक और लाइन लिखी थी—

     

    “तुमने अभी तक सिर्फ तीसरा कमरा खोला है।”

     

    उसी पल उसके कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    अंधेरे में एक बच्चे की आवाज आई—

     

    “भैया… चौथा कमरा खोलोगे?”

     

    और दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    समाप्त… !!

  • भाग 5: आखिरी दरवाजा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव, निखिल और करण धीरे-धीरे होश में आए।

     

    मोहित गायब था।

     

    मीरा ने ऊपर की मंजिल की तरफ देखा।

     

    “वह उसे पुराने कमरे में ले गया है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन सा कमरा?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “जहाँ से सब शुरू हुआ था।”

     

    तीनों सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    इस बार सीढ़ियाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    लेकिन हर सीढ़ी पर किसी न किसी का नाम लिखा था।

     

    पहली सीढ़ी पर—

     

    मोहन।

     

    दूसरी पर—

     

    सुरेश।

     

    तीसरी पर—

     

    कमला।

     

    और सबसे ऊपर—

     

    मोहित।

     

    करण डर गया।

     

    “ये सारे नाम कौन हैं?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वे लोग जिन्होंने कभी इस हवेली से बाहर निकलने की कोशिश की थी।”

     

    ऊपर पहुँचते ही उन्हें एक बड़ा कमरा दिखाई दिया।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    अंदर मोहित कुर्सी पर बैठा था।

     

    उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे।

     

    आरव दौड़कर उसकी तरफ गया।

     

    “मोहित!”

     

    मोहित ने आँखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने रस्सी खोलनी शुरू की।

     

    तभी कमरे में हँसी गूँजी।

     

    हा… हा… हा…

     

    काली परछाईं उनके सामने दिखाई दी।

     

    “तुमने आईना तोड़ दिया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब तू कुछ नहीं कर सकता।”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “आईना सिर्फ दरवाजा था।”

     

    उसने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “असली कैद यहाँ है।”

     

    दीवार पर अचानक दर्जनों हाथों के निशान उभर आए।

     

    मोहित चिल्लाया—

     

    “आरव! भागो!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    दीवार से काले हाथ बाहर निकल आए।

     

    उन्होंने निखिल और करण को पकड़ लिया।

     

    आरव ने उन्हें छुड़ाने की कोशिश की।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “घंटी!”

     

    आरव को याद आया।

     

    हरिराम बाबा ने उसे एक पुरानी घंटी दी थी।

     

    वह घंटी उसकी जेब में थी।

     

    आरव ने घंटी निकालकर जोर से बजाई।

     

    टनननन…!

     

    काली परछाईं पीछे हट गई।

     

    सारे हाथ गायब हो गए।

     

    मोहित जमीन पर गिर पड़ा।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “इसे खत्म करने का सिर्फ एक तरीका है।”

     

    “क्या?”

     

    “जिसने पहली बार आत्मा दी थी, उसे आखिरी आत्मा वापस लेनी होगी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन वह आदमी तो मर चुका है।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वह आदमी नहीं…”

     

    उसने टूटी हुई आईने की तरफ देखा।

     

    “…उसकी आत्मा अभी भी यहीं है।”

     

    अचानक कमरे के बीचोंबीच काली परछाईं फिर दिखाई दी।

     

    उसने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    “तुम्हें अपने भाई की याद है?”

     

    आरव रुक गया।

     

    “मेरा भाई?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “तुम्हारा एक छोटा भाई था।”

     

    आरव की आँखों के सामने एक और याद आई।

     

    उसकी माँ उसे और उसके छोटे भाई को लेकर हवेली आई थी।

     

    लेकिन वह बच्चा…

     

    कभी घर वापस नहीं गया।

     

    आरव काँप गया।

     

    “वह कहाँ है?”

     

    परछाईं ने कहा—

     

    “यहीं।”

     

    अचानक कमरे के कोने में एक छोटा लड़का दिखाई दिया।

     

    वह करीब छह साल का था।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा—

     

    “भैया…”

     

    आरव की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “तू जिंदा है?”

     

    लड़का मुस्कुराया।

     

    “मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था।”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “वह तुम्हारा भाई नहीं है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    लड़के का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

     

    वह वही बिना आँखों वाला आदमी बन गया।

     

    आरव समझ गया।

     

    “तुमने मेरी यादों का इस्तेमाल किया।”

     

    काली आत्मा चीखी—

     

    “और अब तुम्हारी आत्मा मेरी होगी!”

     

    आरव ने घंटी उठाई।

     

    लेकिन तभी मोहित उसके सामने आ गया।

     

    “आरव, घंटी मुझे दे।”

     

    आरव ने उसे घंटी दे दी।

     

    मोहित ने घंटी बजाई।

     

    टनननन…

     

    काली आत्मा चीखने लगी।

     

    लेकिन घंटी की आवाज सुनकर मोहित की आँखें फिर काली हो गईं।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “अब समझे?”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “मोहित?”

     

    मोहित ने कहा—

     

    “मैं शुरू से उसके साथ था।”

     

    निखिल और करण डरकर पीछे हट गए।

     

    मोहित ने घंटी जमीन पर फेंक दी।

     

    काली आत्मा उसके शरीर के अंदर समाने लगी।

     

    मीरा चीख पड़ी—

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने तुरंत टूटा हुआ आईने का सबसे बड़ा टुकड़ा उठाया।

     

    उसने उसे मोहित के सामने कर दिया।

     

    आईने में मोहित का असली चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “आरव…”

     

    वह फुसफुसाया।

     

    “मुझे बचा।”

     

    आरव समझ गया।

     

    काली आत्मा अभी पूरी तरह उसके अंदर नहीं गई थी।

     

    उसने आईने का टुकड़ा मोहित के सामने रखते हुए कहा—

     

    “तू मोहित नहीं है!”

     

    मोहित चीखने लगा।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने पूरी ताकत से कहा—

     

    “तू मेरे दोस्त को छोड़!”

     

    काली आत्मा पीछे हटने लगी।

     

    मीरा ने घंटी उठा ली।

     

    उसने उसे आखिरी बार बजाया।

     

    टनननन…!

     

    हवेली की पूरी दीवारें हिलने लगीं।

     

    छत से धूल गिरने लगी।

     

    काली आत्मा चीखते हुए टूटी हुई आईने की तरफ खिंचने लगी।

     

    लेकिन जाने से पहले उसने आरव की तरफ देखकर कहा—

     

    “हवेली गिर सकती है… लेकिन मैं नहीं।”

     

    अचानक पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

     

    और जब रोशनी वापस आई…

     

    काली आत्मा गायब थी।

     

    मोहित जमीन पर बेहोश पड़ा था।

     

    लेकिन हवेली की नींव जोर-जोर से काँप रही थी।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “अब हमें जाना होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और तुम?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “मेरा काम पूरा हो गया।”

     

    अचानक उसके शरीर से हल्की सफेद रोशनी निकलने लगी।

     

    आरव समझ गया।

     

    “मीरा…”

     

    उसने आखिरी बार मुस्कुराकर कहा—

     

    “इस बार मुझे जाने देना।”

     

    और वह रोशनी बनकर हवा में गायब हो गई।

     

    तीनों दोस्त मोहित को उठाकर बाहर भागे।

     

    पीछे से पूरी काली हवेली जोरदार आवाज के साथ गिर गई।

     

    लेकिन मलबे के बीच…

     

    एक छोटा-सा आईने का टुकड़ा अब भी चमक रहा था।

  • भाग 4: आरव का असली राज

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    तीसरे कमरे का दरवाजा खुल चुका था।

     

    आरव कुछ कदम दूर खड़ा था।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    मोहित, निखिल और करण उसके पीछे खड़े थे।

     

    मीरा दरवाजे के पास जाकर रुक गई।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “आरव… अगर तुम अंदर गए, तो तुम्हें सब याद आ जाएगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और अगर नहीं गया?”

     

    मीरा ने सिर झुका लिया।

     

    “तो वह हमेशा तुम्हारे अंदर रहेगा।”

     

    आरव ने हिम्मत जुटाई और कमरे के अंदर कदम रख दिया।

     

    जैसे ही वह अंदर गया, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    “आरव!”

     

    बाहर से निखिल की आवाज आई।

     

    लेकिन आरव जवाब नहीं दे पाया।

     

    कमरे के अंदर सिर्फ एक पुराना आईना था।

     

    आईने के सामने एक लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

     

    आरव धीरे-धीरे आईने के पास गया।

     

    उसने उसमें अपना चेहरा देखा।

     

    लेकिन कुछ गलत था।

     

    आईने में आरव नहीं था।

     

    वहाँ एक दस साल का बच्चा खड़ा था।

     

    बच्चा रो रहा था।

     

    उसके सामने वही छोटी लड़की मीरा खड़ी थी।

     

    और पीछे एक आदमी हाथ में लालटेन लिए खड़ा था।

     

    आरव ने आईने को छुआ।

     

    अचानक उसकी आँखों के सामने पुरानी यादें घूमने लगीं।

     

    वह बच्चा सच में आरव था।

     

    पैंतीस साल पहले वह इस हवेली में आया था।

     

    उसकी माँ इस हवेली में काम करती थी।

     

    आरव तब सिर्फ दस साल का था।

     

    मीरा उसी हवेली के मालिक की बेटी थी।

     

    दोनों दोस्त बन गए थे।

     

    लेकिन हवेली का मालिक एक अजीब आदमी था।

     

    वह रात में तीसरे कमरे में जाकर घंटों किसी से बातें करता था।

     

    एक दिन आरव ने चुपके से उसका पीछा किया।

     

    उसने कमरे के अंदर एक आईना देखा।

     

    आईने के सामने मालिक खड़ा होकर कह रहा था—

     

    “मुझे और समय चाहिए।”

     

    आईने के अंदर से किसी ने जवाब दिया—

     

    “बदले में क्या दोगे?”

     

    मालिक ने कहा—

     

    “एक आत्मा।”

     

    उसी समय आरव ने आवाज कर दी।

     

    मालिक ने उसे पकड़ लिया।

     

    मीरा भी वहाँ पहुँच गई।

     

    मालिक ने दोनों बच्चों को कमरे में बंद कर दिया।

     

    फिर आईने के सामने खड़े होकर बोला—

     

    “एक को मैं दूँगा…”

     

    मीरा ने आरव को धक्का देकर पीछे किया।

     

    “भागो!”

     

    लेकिन तभी आईने के अंदर से काला हाथ बाहर निकला।

     

    उसने मीरा को पकड़ लिया।

     

    मीरा चीखती रही।

     

    आरव उसे बचाने के लिए आगे बढ़ा।

     

    लेकिन मालिक ने आरव के सिर पर वार कर दिया।

     

    आरव जमीन पर गिर गया।

     

    उसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा।

     

    सुबह गाँव वालों ने उसे हवेली के बाहर पाया।

     

    उसे कुछ भी याद नहीं था।

     

    लेकिन मीरा कभी नहीं मिली।

     

    आरव ने आईने से हाथ हटाया।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।

     

    “मीरा…”

     

    पीछे से आवाज आई—

     

    “हाँ।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    “तुम मर गई थीं?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं उस दिन नहीं मरी थी।”

     

    “फिर?”

     

    “उस आईने ने मुझे अपने अंदर कैद कर लिया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और वह आदमी?”

     

    मीरा का चेहरा अचानक डर से भर गया।

     

    “वह भी मरा नहीं था।”

     

    कमरे की छत से भारी आवाज आई—

     

    “मैं कभी गया ही नहीं।”

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    एक काली परछाईं छत से नीचे उतर रही थी।

     

    धीरे-धीरे वह एक आदमी का रूप लेने लगी।

     

    वही हवेली का मालिक।

     

    उसका चेहरा सड़ा हुआ था।

     

    आँखों की जगह दो काले गड्ढे थे।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम वापस आ ही गए।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुमने मुझे क्यों बुलाया?”

     

    वह हँसा।

     

    “क्योंकि अधूरा सौदा पूरा होना बाकी था।”

     

    “कौन सा सौदा?”

     

    उसने आईने की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी आत्मा के बदले मेरी आजादी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर मैं मना कर दूँ?”

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तो तुम्हारे दोस्त बारी-बारी से मेरे साथ रहेंगे।”

     

    अचानक कमरे के बाहर से करण की चीख सुनाई दी।

     

    “आरव!”

     

    फिर निखिल की आवाज आई—

     

    “भागो!”

     

    आरव दरवाजे की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन दरवाजा बंद था।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “आईना तोड़ दो!”

     

    आरव ने पास रखी लोहे की कुर्सी उठाई।

     

    पूरी ताकत से आईने पर मारी।

     

    छन्न्न्न!

     

    आईना टूट गया।

     

    लेकिन उसके टूटते ही कमरे में सैकड़ों आवाजें गूँज उठीं।

     

    “बचाओ…”

     

    “हमें बाहर निकालो…”

     

    “हमें जाने दो…”

     

    काले मालिक की परछाईं चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    आईने के टुकड़ों से धुआँ निकलने लगा।

     

    मीरा ने आरव का हाथ पकड़ा।

     

    “भागो!”

     

    दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    आरव बाहर दौड़ा।

     

    लेकिन गलियारा खाली था।

     

    निखिल और करण जमीन पर बेहोश पड़े थे।

     

    मोहित गायब था।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    फिर उसे दूर से मोहित की आवाज सुनाई दी—

     

    “आरव…”

     

    वह आवाज हवेली की सबसे ऊपरी मंजिल से आ रही थी।

     

    और उसके साथ एक दूसरी आवाज भी थी—

     

    “अब आखिरी आत्मा मेरी होगी।”

  • भाग 3: मोहित के अंदर कौन था?

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    मोहित गलियारे में खड़ा था।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    आरव ने उसे देखते ही कहा—

     

    “मोहित… तुम ठीक हो?”

     

    मोहित मुस्कुराया।

     

    लेकिन वह मुस्कान उसकी नहीं थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैं मोहित नहीं हूँ।”

     

    निखिल पीछे हट गया।

     

    “तो फिर कौन हो?”

     

    मोहित ने सिर टेढ़ा किया।

     

    “तुम्हें सच में नहीं पता?”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    धड़ाम!

     

    हवा रुक गई।

     

    टॉर्च की रोशनी भी बार-बार झपकने लगी।

     

    आरव ने मीरा की तरफ देखा।

     

    वह लड़की अब गलियारे के एक कोने में खड़ी काँप रही थी।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम इसे पहचानती हो?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कौन है?”

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वही जिसने मेरे भाई को मारा था।”

     

    आरव के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई।

     

    उसने मोहित की तरफ देखा।

     

    मोहित अब धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    “तुम लोगों ने सोचा था कि तीसरा कमरा बंद करके सब खत्म हो जाएगा?”

     

    उसने हँसते हुए कहा—

     

    “दरवाजा सिर्फ कमरे का था।”

     

    वह रुका।

     

    “लेकिन रास्ता…”

     

    उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।

     

    “…हमेशा इंसान के अंदर होता है।”

     

    निखिल ने काँपते हुए पूछा—

     

    “मोहित को क्या हुआ है?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वह सिर्फ उसका शरीर है।”

     

    आरव ने तुरंत मोहित की तरफ कदम बढ़ाया।

     

    “मोहित! अगर तुम मेरी आवाज सुन सकते हो तो वापस आओ!”

     

    कुछ पल के लिए मोहित का चेहरा बदल गया।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “आरव…”

     

    उसकी असली आवाज वापस आ गई।

     

    “मुझे बचा…”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने मोहित का हाथ पकड़ा, मोहित ने उसका गला पकड़ लिया।

     

    उसकी ताकत अचानक कई गुना बढ़ गई।

     

    आरव दीवार से जा टकराया।

     

    “आरव!”

     

    करण और निखिल ने मोहित को पीछे खींचा।

     

    मोहित जोर-जोर से हँसने लगा।

     

    “तुम उसे नहीं बचा सकते।”

     

    अचानक तीसरे कमरे के अंदर से फिर वही आदमी की आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    आरव ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    जंजीर अपने आप उठकर दरवाजे पर लिपट गई।

     

    फिर दरवाजे के बीच एक छोटी-सी दरार दिखाई दी।

     

    उस दरार के पीछे एक चेहरा था।

     

    आरव का चेहरा।

     

    वह चेहरा अंदर से उसे देख रहा था।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    “ये… मैं हूँ?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “तो कौन?”

     

    “तुम्हारा भाई।”

     

    आरव को अचानक अपने बचपन की एक धुंधली याद आई।

     

    एक पुराना घर।

     

    एक छोटी लड़की।

     

    एक लड़का।

     

    और एक आदमी…

     

    जो किसी बच्चे को घसीटते हुए तीसरे कमरे की तरफ ले जा रहा था।

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे कुछ याद क्यों नहीं?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हें याद नहीं रहने दिया गया।”

     

    “किसने?”

     

    मीरा ने धीरे से उस कमरे की तरफ इशारा किया।

     

    “उसने।”

     

    तभी हवेली की दीवारों से बच्चों के रोने की आवाज आने लगी।

     

    एक नहीं।

     

    दर्जनों।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    दीवारों पर लगे पुराने चित्र बदलने लगे।

     

    हर चित्र में वही परिवार दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन हर तस्वीर में लड़की मीरा थी।

     

    और उसके बगल में खड़ा लड़का…

     

    हर तस्वीर में थोड़ा बड़ा होता जा रहा था।

     

    फिर आखिरी तस्वीर में लड़का जवान था।

     

    उसका चेहरा आरव जैसा था।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “मैं… यहाँ पहले आ चुका हूँ।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “कब?”

     

    “पैंतीस साल पहले।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    “लेकिन मैं तो…”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “तुम्हारा शरीर आज का है।”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    “लेकिन तुम्हारी कहानी बहुत पुरानी है।”

     

    अचानक मोहित जमीन पर गिर गया।

     

    उसकी काली आँखें सामान्य होने लगीं।

     

    वह जोर-जोर से साँस लेने लगा।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    मोहित ने काँपते हुए कहा—

     

    “मैंने अंदर देखा है।”

     

    “क्या?”

     

    “उस कमरे में…”

     

    उसने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    “एक आईना है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो?”

     

    मोहित की आवाज धीमी हो गई।

     

    “उस आईने में हम चार नहीं…”

     

    वह रुक गया।

     

    “हमारे पीछे सैकड़ों लोग खड़े हैं।”

     

    उसी समय गलियारे के आखिर में एक बड़ा आईना दिखाई दिया।

     

    जो कुछ सेकंड पहले वहाँ नहीं था।

     

    चारों धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़े।

     

    आईने में उनकी परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    आरव।

     

    निखिल।

     

    करण।

     

    मोहित।

     

    लेकिन उनके पीछे…

     

    मीरा नहीं थी।

     

    उसकी जगह एक लंबा आदमी खड़ा था।

     

    वह धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।

     

    फिर उसने आईने के अंदर से अपना हाथ उठाया।

     

    और काँच पर उंगली से लिखा—

     

    “आरव, तुम्हें अपनी माँ से एक सवाल पूछना है।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “क्या सवाल?”

     

    आईने पर अगली लाइन अपने आप लिखी गई—

     

    “तुम्हारा जन्मदिन किस दिन है?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    उसे अचानक एहसास हुआ…

     

    उसे अपना जन्मदिन याद ही नहीं था।

     

    और उसी क्षण…

     

    तीसरे कमरे का दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    अंदर से किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “भैया… घर चलो।”

     

    आरव ने उस अंधेरे कमरे की तरफ देखा।

     

    और पहली बार उसे महसूस हुआ कि शायद…

     

    वह इस हवेली में भटककर नहीं आया था।

     

    उसे यहाँ बुलाया गया था।