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टैग: प्यार एक खुबसूरत एहसास

  • अंजानी चाहत

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अंजानी चाहत

     

    सुबह की पहली किरण जब खिड़की से छनकर कमरे में घुसी, तब अर्णव की आँखें खुल गईं। उसने बिस्तर पर करवट बदली और छत की ओर देखा। सपना अभी भी आँखों के सामने घूम रहा था—एक अजनबी चेहरा, एक मुस्कान, और एक आवाज़ जो उसके नाम को ऐसे पुकार रही थी जैसे वह सदियों से उसे जानती हो। अर्णव ने माथा सहलाया। पिछले कई महीनों से यही सपना बार-बार आ रहा था। कोई चेहरा साफ़ नहीं दिखता था, सिर्फ़ एक धुँधली सी आकृति, और एक तीव्र चाहत जो छाती में चुभती थी।

     

    अर्णव दिल्ली के एक साधारण से अपार्टमेंट में रहता था। वह एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर था, दिन भर कंप्यूटर के सामने बैठा रहता, और रातें नींद की कमी से गुज़रतीं। उसकी ज़िंदगी में कुछ ख़ास नहीं था—न कोई गहरा रिश्ता, न कोई बड़ा सपना। सिर्फ़ एक अजीब सी ख़ालीपन, एक अनजानी चाहत जो कभी-कभी इतनी तेज़ हो जाती कि वह रात भर जागता रहता।

     

    उस दिन वह काम पर नहीं जा सका। मन बेचैन था। उसने कॉफ़ी बनाई, बालकनी में खड़ा होकर शहर को देखा। नीचे सड़क पर लोग भागते-दौड़ते दिख रहे थे, जैसे कोई मंज़िल हो उनके पास। अर्णव सोचने लगा—मेरी मंज़िल कहाँ है? क्या मैं किसी को खो चुका हूँ जिसे मैं जानता तक नहीं?

     

    शाम को उसने फैसला किया कि वह बाहर निकलेगा। पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमना उसे हमेशा शांत करता था। चाँदनी चौक की भीड़, मसाले की खुशबू, रिक्शों की घंटी—ये सब उसे ज़िंदा महसूस कराते थे। वह जामा मस्जिद के पास पहुँचा, सीढ़ियों पर बैठ गया। आसमान में सूरज डूब रहा था, आसमान लाल-नारंगी हो रहा था। तभी उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी।

     

    वह सफ़ेद सलवार कमीज़ में थी, बाल खुले हुए, और हाथ में एक पुरानी किताब। वह सीढ़ियों के दूसरी तरफ़ बैठी थी, किताब में डूबी हुई। अर्णव की साँस रुक गई। वह चेहरा… सपने वाला चेहरा नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा था जो उसके अंदर की बेचैनी को और तेज़ कर गया। लड़की ने सिर उठाया, और उनकी नज़रें मिलीं। एक पल के लिए समय रुक गया। फिर उसने मुस्कुरा दिया—हल्की सी, शर्मीली सी मुस्कान।

     

    अर्णव ने हिम्मत जुटाई और पास गया। “माफ़ कीजिए… क्या आप यहाँ अकेली हैं?”

     

    लड़की ने किताब बंद की। “हाँ। मैं अक्सर यहाँ आती हूँ। शांति मिलती है।”

     

    “मेरा नाम अर्णव है।”

     

    “मैं दृष्टि।”

     

    दृष्टि। नाम सुनते ही अर्णव के मन में कुछ हिला। जैसे कोई पुरानी याद जाग उठी हो। उन्होंने बातचीत शुरू की। दृष्टि एक लाइब्रेरियन थी, पुरानी किताबों से प्यार करती थी। अर्णव ने बताया कि वह डिज़ाइनर है। बातें होती रहीं—किताबों की, शहर की, अकेलेपन की। सूरज डूब चुका था, लेकिन वे उठना नहीं चाहते थे।

     

    “क्या आपको कभी लगता है कि आप किसी को ढूँढ रहे हैं जिसे आपने कभी देखा ही नहीं?” अर्णव ने अचानक पूछ लिया।

     

    दृष्टि ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “हाँ… बहुत बार। जैसे कोई अधूरा सपना हो जो बार-बार याद आता है।”

     

    उस रात अर्णव घर लौटा तो नींद नहीं आई। दृष्टि का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। वह चाहत जो पहले धुँधली थी, अब साफ़ होने लगी थी। अगले दिन वह फिर उसी जगह गया। दृष्टि वहाँ थी। फिर अगले दिन भी। धीरे-धीरे उनकी मुलाक़ातें नियमित हो गईं। वे पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते, चाय पीते, किताबों की दुकानों में घंटों बिताते।

     

    एक शाम दृष्टि ने कहा, “अर्णव, मुझे लगता है मैं तुम्हें पहले से जानती हूँ। जैसे कोई पुरानी कहानी हो।”

     

    अर्णव की धड़कन तेज़ हो गई। “मुझे भी। मेरे सपनों में एक चेहरा आता है… और जब मैंने तुम्हें देखा, तो वह चाहत और तेज़ हो गई।”

     

    वे दोनों चुप हो गए। हवा में कोई अनकही बात तैर रही थी। दृष्टि ने अपना हाथ अर्णव के हाथ पर रखा। “शायद हमने पहले भी एक-दूसरे को खोया है।”

     

    उनकी दोस्ती प्यार में बदलने लगी। अर्णव पहली बार किसी के इतना क़रीब महसूस कर रहा था। दृष्टि की हँसी, उसकी बात करने का अंदाज़, यहाँ तक कि उसके बालों की खुशबू—सब कुछ जाना-पहचाना लग रहा था। एक रात वे यमुना किनारे बैठे थे। चाँद चमक रहा था। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा।

     

    “दृष्टि… मैं तुमसे प्यार करता हूँ। लेकिन यह प्यार साधारण नहीं लगता। जैसे यह किसी और जन्म से चला आ रहा हो।”

     

    दृष्टि की आँखें नम हो गईं। “मैं भी… लेकिन मुझे डर लगता है। जैसे यह खुशी अस्थायी हो।”

     

    उसके बाद के दिन खुशियों भरे थे। वे साथ घूमते, फ़िल्में देखते, रात भर बातें करते। अर्णव का अकेलापन ख़त्म हो रहा था। लेकिन साथ ही एक अजीब सी बेचैनी भी बढ़ रही थी। उसके सपने और तीव्र हो गए थे। अब सपने में चेहरा साफ़ दिखने लगा था—दृष्टि का ही चेहरा, लेकिन पुराने ज़माने के कपड़ों में। एक महल, एक बगीचा, और फिर आग… चीखें… बिछड़ना।

     

    एक रात अर्णव चीखते हुए जागा। पसीने से लथपथ। उसने फ़ोन उठाया और दृष्टि को कॉल किया।

     

    “क्या हुआ?” दृष्टि की नींद भरी आवाज़ आई।

     

    “सपना… फिर से। तुम जल रही थी… मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

     

    दृष्टि चुप रही। फिर धीरे से बोली, “अर्णव, मेरे भी ऐसे ही सपने आते हैं। मैंने कभी किसी को नहीं बताया। लगता है हम किसी पुरानी त्रासदी के हिस्से हैं।”

     

    अगले दिन वे मिले। दृष्टि ने एक पुरानी डायरी निकाली। “यह मेरी दादी की थी। उन्होंने कहा था कि हमारे परिवार में एक कहानी चलती आ रही है… दो प्रेमियों की, जो कभी मिल नहीं पाए। एक राजकुमारी और एक साधारण सिपाही। महल में आग लग गई थी, और वे दोनों मर गए। लेकिन कहा जाता है कि उनकी आत्माएँ अब भी एक-दूसरे को ढूँढती हैं।”

     

    अर्णव की साँस रुक गई। “क्या तुम सोचती हो… हम वही हैं?”

     

    दृष्टि ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। लेकिन जब मैं तुम्हें देखती हूँ, तो लगता है जैसे सदियों का इंतज़ार ख़त्म हो गया हो।”

     

    उनकी चाहत और गहरी हो गई। लेकिन साथ ही एक डर भी। जैसे किस्मत फिर से उन्हें अलग करने वाली हो। अर्णव ने दृष्टि से शादी का प्रस्ताव रखा। दृष्टि रो पड़ी, लेकिन हाँ कह दी।

     

    शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं। दोनों परिवार खुश थे। लेकिन अर्णव के अंदर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सपने अब सिर्फ़ रात को नहीं, दिन में भी आते थे। वह कभी-कभी दृष्टि को देखकर घबरा जाता—जैसे वह फिर से खो जाएगी।

     

    एक दिन, शादी से एक हफ़्ता पहले, अर्णव को एक पुराना पत्र मिला। कोई अनजान पता था। पत्र में लिखा था—

     

    “तुम फिर मिल गए हो। लेकिन इस बार भी समय कम है। आग फिर लगेगी। बचा लो उसे, वरना चाहत फिर अधूरी रह जाएगी।”

     

    अर्णव काँप उठा। उसने दृष्टि को बताया। दोनों डरे हुए थे, लेकिन उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। “हम इस बार नहीं हारेंगे,” दृष्टि ने कहा।

     

    शादी का दिन आ गया। मंडप सजा था, मेहमान आए थे। अर्णव और दृष्टि फेरे ले रहे थे। अचानक कहीं से धुआँ उठने लगा। किसी ने चीख दी—“आग!” तंबू में आग लग गई थी। लोग भागने लगे। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा और बाहर निकाला। लेकिन भीड़ में वे बिछड़ गए।

     

    अर्णव पागलों की तरह उसे ढूँढ रहा था। धुआँ चारों तरफ़ था। तभी उसने देखा—दृष्टि एक कोने में फँसी हुई थी, आग उसके क़रीब पहुँच रही थी। अर्णव बिना सोचे दौड़ा। उसने दृष्टि को गोद में उठाया और बाहर निकाला। दोनों सुरक्षित थे, लेकिन अर्णव के हाथ जल गए थे।

     

    हॉस्पिटल में दृष्टि उसके बिस्तर के पास बैठी थी। आँखों में आँसू। “तुमने मुझे बचा लिया… इस बार।”

     

    अर्णव मुस्कुराया, दर्द के बावजूद। “अब कोई आग हमें अलग नहीं कर सकती।”

     

    डॉक्टरों ने कहा कि जलन ठीक हो जाएगी। लेकिन उस रात अर्णव को फिर सपना आया। इस बार सपना अलग था। कोई आग नहीं थी। सिर्फ़ एक बगीचा, फूल, और दृष्टि मुस्कुरा रही थी। एक आवाज़ गूँजी—“अब तुम्हारी चाहत पूरी हो गई। इस जन्म में रहो, प्यार करो, और अगले जन्म की चिंता मत करो।”

     

    अर्णव जागा। कमरे में दृष्टि बैठी थी, उसका हाथ थामे हुए। “सपना अच्छा था?” उसने पूछा।

     

    अर्णव ने उसके हाथ को चूमा। “हाँ। अब कोई अनजानी चाहत नहीं रही। सब कुछ जाना-पहचाना है।”

     

    उसके बाद की ज़िंदगी शांत और खुशहाल रही। अर्णव और दृष्टि ने एक छोटा सा घर लिया, पुरानी दिल्ली के पास। वे किताबें पढ़ते, साथ चाय पीते, और कभी-कभी जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर शहर को देखते। अर्णव के हाथ के निशान रह गए, लेकिन वे निशान अब दर्द नहीं, बल्कि एक याद थे—कि इस बार उन्होंने भाग्य को हरा दिया था।

     

    साल बीतते गए। उनके बच्चे हुए। घर में हँसी-खुशी भरी रही। लेकिन कभी-कभी रात में, जब चाँद चमकता, तो अर्णव और दृष्टि एक-दूसरे की आँखों में देखते और मुस्कुरा देते। जैसे कोई पुरानी कहानी याद आ गई हो, जो अब पूरी हो चुकी थी।

     

    एक दिन, बहुत साल बाद, अर्णव बूढ़ा हो चुका था। वह बालकनी में बैठा था। दृष्टि उसके पास आई, सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    “अर्णव, क्या तुम्हें अब भी लगता है कि हम पहले मिले थे?”

     

    अर्णव ने उसकी तरफ़ देखा। आँखों में वही चमक थी जो पहली मुलाक़ात में थी। “हाँ। और मैं जानता हूँ कि हम फिर मिलेंगे। लेकिन इस बार, जब भी मिलें, कोई आग नहीं होगी। सिर्फ़ प्यार होगा।”

     

    दृष्टि मुस्कुराई। “अंजानी चाहत अब जानी-पहचानी हो गई है।”

     

    हवा में पुरानी खुशबू तैर रही थी—मसाले की, किताबों की, और एक प्यार की जो जन्मों से चला आ रहा था। अर्णव ने आँखें बंद कीं। उसके मन में अब कोई बेचैनी नहीं थी। सिर्फ़ एक शांति, एक पूर्णता।

     

    और कहीं दूर, स

    मय की धारा में, दो आत्माएँ मुस्कुरा रही थीं। क्योंकि उनकी अनजानी चाहत आख़िरकार पूरी हो गई थी।

     

  • Mera pahla pyar

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    मेरा पहला प्यार

    कुछ लोग ज़िंदगी में देर से आते हैं और हमेशा के लिए रह जाते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत जल्दी आकर हमेशा के लिए याद बन जाते हैं। मेरी ज़िंदगी में भी एक ऐसी ही याद थी—मेरा पहला प्यार।

    मेरा नाम आरव है। आज मैं एक सफल इंसान हूँ। अच्छी नौकरी, अच्छा घर, हर वह चीज़ है जिसकी कभी चाहत थी। लेकिन जब भी बारिश की पहली बूंदें धरती पर गिरती हैं, जब भी किसी पुराने गीत की धुन कानों में पड़ती है, तो मेरी यादें सात साल पीछे चली जाती हैं। उस छोटे से शहर में… जहाँ मैंने पहली बार किसी को दिल से चाहा था।

    उसका नाम था नैना

    मैं पहली बार उससे कॉलेज के पहले दिन मिला था। सफेद सलवार-सूट, हल्की-सी मुस्कान और बड़ी-बड़ी आँखें… जैसे किसी ने चाँद का एक टुकड़ा धरती पर भेज दिया हो। वह क्लास में नई थी और घबराई हुई लग रही थी।

    मैंने उसके पास जाकर कहा, “अगर चाहो तो मैं तुम्हें पूरी क्लास दिखा सकता हूँ।”

    वह हल्का-सा मुस्कुराई और बोली, “धन्यवाद… मुझे सच में किसी की मदद की ज़रूरत थी।”

    बस, वहीं से हमारी दोस्ती शुरू हुई।

    दिन बीतते गए। हम साथ पढ़ते, साथ कैंटीन जाते, लाइब्रेरी में घंटों बैठते। वह बहुत समझदार थी। उसे किताबें पढ़ना पसंद था, जबकि मुझे गिटार बजाना। मैं उसके लिए अक्सर कॉलेज के गार्डन में बैठकर धुन बजाता और वह मुस्कुराकर सुनती रहती।

    धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं रही। उसके बिना एक दिन भी अधूरा लगता था। उसकी हँसी मेरी खुशी बन गई थी और उसकी उदासी मेरी बेचैनी।

    लेकिन मैंने कभी अपने दिल की बात नहीं कही। डरता था… कहीं दोस्ती भी न खो दूँ।

    एक दिन कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। मैंने पहली बार स्टेज पर एक गीत गाया। पूरा गीत मैं नैना को देखकर गा रहा था। शायद वह समझ गई थी कि उस गीत के पीछे छिपी हर भावना उसी के लिए थी।

    कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह मेरे पास आई।

    उसने पूछा, “क्या यह गीत… किसी खास के लिए था?”

    मैं कुछ पल चुप रहा। फिर हिम्मत करके कहा, “हाँ… तुम्हारे लिए।”

    कुछ सेकंड तक वह बिना कुछ बोले मुझे देखती रही। फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए।

    मैं घबरा गया।

    “अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो…”

    उसने मेरी बात बीच में ही रोक दी।

    “बुरा नहीं लगा, आरव… लेकिन मैं भी तुम्हें यही बताना चाहती थी।”

    उस दिन पहली बार उसने मेरा हाथ थामा था।

    उस पल ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया थम गई हो।

    हमारा रिश्ता बहुत खूबसूरत था। उसमें दिखावा नहीं था। महंगे तोहफे नहीं थे। बस एक-दूसरे के लिए सच्ची परवाह थी।

    हम छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढ़ लेते थे। कभी सड़क किनारे चाय पीना, कभी बारिश में भीगना, कभी बिना वजह घंटों बातें करना… यही हमारी दुनिया थी।

    कॉलेज का आखिरी साल शुरू हुआ।

    हम दोनों ने अपने-अपने सपनों के लिए मेहनत शुरू कर दी। मैं नौकरी की तैयारी कर रहा था और नैना आगे पढ़ना चाहती थी।

    लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी योजनाओं के हिसाब से नहीं चलती।

    एक शाम नैना ने मुझे मिलने बुलाया।

    वह पहले जैसी खुश नहीं थी।

    उसने धीमी आवाज़ में कहा, “पापा ने मेरी शादी तय कर दी है।”

    मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

    “लेकिन… तुमने उन्हें हमारे बारे में बताया?”

    “बताया था… लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। उनके लिए परिवार की इज़्ज़त सबसे ज़्यादा मायने रखती है।”

    मैंने कहा, “तो चलो… हम दोनों मिलकर उन्हें समझाएँगे।”

    वह मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी थी।

    “कुछ रिश्ते समझाने से नहीं बदलते, आरव।”

    उस दिन हम दोनों बहुत रोए।

    पहली बार मुझे महसूस हुआ कि प्यार करना आसान है, लेकिन उसे निभा पाना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।

    अगले कुछ दिनों तक हम रोज़ मिलते रहे। हर मुलाकात आखिरी जैसी लगती थी।

    फिर वह दिन भी आ गया जब नैना हमेशा के लिए चली गई।

    उसने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा—

    “अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज़ होती है… तो मैं तुम्हें फिर ढूँढ़ लूँगी।”

    मैंने उसे जाते हुए देखा… और पहली बार महसूस किया कि कुछ लोगों का जाना, ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल देता है।

    उसके बाद मैंने खुद को काम में डुबो दिया।

    समय बीतता गया।

    लोग कहते हैं कि समय हर घाव भर देता है।

    लेकिन सच यह है कि समय सिर्फ दर्द के साथ जीना सिखाता है।

    सात साल बाद मैं एक बिज़नेस कॉन्फ्रेंस के लिए उसी शहर गया।

    सब कुछ बदल चुका था।

    नई इमारतें, नई सड़कें…

    लेकिन कॉलेज के सामने वाली वही छोटी-सी चाय की दुकान आज भी थी।

    मैं वहीं जाकर बैठ गया।

    अचानक किसी ने पीछे से मेरा नाम पुकारा।

    “आरव…”

    मैंने मुड़कर देखा।

    वह नैना थी।

    चेहरे पर पहले जैसी मासूमियत थी, लेकिन आँखों में ज़िंदगी के कई अनुभव उतर आए थे।

    कुछ पल तक हम दोनों कुछ नहीं बोले।

    फिर उसने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे हो?”

    मैंने भी मुस्कुराने की कोशिश की।

    “ठीक हूँ… तुम?”

    “मैं भी ठीक हूँ।”

    हमने साथ बैठकर चाय पी।

    बहुत सारी बातें हुईं।

    उसने बताया कि उसकी शादी हो चुकी है। उसका एक छोटा बेटा भी है।

    मैंने भी अपनी ज़िंदगी के बारे में बताया।

    हम दोनों ने एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं की।

    क्योंकि अब शिकायतों की उम्र बीत चुकी थी।

    जाते-जाते उसने कहा, “जानते हो, पहला प्यार कभी खत्म नहीं होता। बस उसकी जगह बदल जाती है।”

    मैंने पूछा, “कैसी जगह?”

    वह मुस्कुराई।

    “दिल से निकलकर दुआओँ में।”

    मैं उसे दूर जाते हुए देखता रहा।

    इस बार मेरी आँखों में आँसू नहीं थे।

    बस एक सुकून था।

    क्योंकि अब मुझे समझ आ चुका था कि हर प्रेम कहानी का अंत शादी नहीं होती।

    कुछ प्रेम कहानियाँ इसलिए अधूरी रह जाती हैं ताकि इंसान को सिखा सकें कि सच्चा प्यार पाने का नहीं, निभाने का नाम है।

    आज भी जब बारिश होती है, मैं मुस्कुरा देता हूँ।

    क्योंकि मुझे याद आता है कि मेरी ज़िंदगी में भी कभी कोई था, जिसने मुझे बिना किसी शर्त के प्यार किया था।

    वह मेरा पहला प्यार था।

    और शायद… आखिरी भी।

    कहते हैं कि इंसान अपने पहले प्यार को कभी नहीं भूलता।

    मैं भी नहीं भूला।

    मैंने बस उसे यादों की सबसे सुरक्षित जगह पर रख दिया है, जहाँ न समय पहुँच सकता है, न दूरियाँ, न मजबूरियाँ।

    कुछ रिश्ते साथ चलकर पूरे होते हैं, और कुछ दूर होकर भी हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

    नैना अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं है, लेकिन मेरी दुआओँ का हिस्सा आज भी है।

    और शायद यही पहले प्यार की सबसे खूबसूरत पहचान है—वह कभी नफ़रत में नहीं बदलता।

    वह हमेशा एक मीठी याद बनकर दिल के किसी कोने में मुस्कुराता रहता है।

  • प्रेम…

    प्रेम…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

                          प्रेम ….

    मैं अपने दर्द भी भूल जाऊं जो तेरी बाहों में आऊं 

    ना चाहतें हैं मुझे सुनहरे सपनों की,

    ना चाहते है मुझे किसी अपने की,

    तेरे कंधे पर सर रखकर सुकून 

    दिल में उतर जाता है,

    मैं कैसे कहूं तुम पर मुझे कितना प्यार आता है,

    तुम मेरी भीगती आंखों को अपनी

    हथेलियों में थाम लो,

    मैं कहता हूं मैं ठीक हूं फिर भी

    तुम खुद के गले से लगा लो,

    ना जाने ये कैसी कशिश है जो तेरी

    आंखों से नजरें मेरी हटती नहीं ,

    मैं जाना चाहूं कहीं भी दूर तुमसे फिर भी

    शाम ढले दिल मेरा तेरा ही नाम पुकारे ,

    प्यार भरा रिश्ता ये तुम्हारा मुझ को

    लगता है जग में सबसे प्यारा , तुम से

    मिलकर सुकून दिल में उतर जाता है ,

    तेरे होठों की हंसी मेरे अल्फ़ाज़ से

    मिलकर एक ख्वाहिश सी दिल में जगाती है ,

    मैं एक घायल परिंदा तेरी बाहों में

    सिमट कर नयी सांसों को पाता हूं 

     

     

     

     

     

  • अधूरी मोहब्बत

    अधूरी मोहब्बत

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    मोहब्बत की क्या बात करूँ,

    अधूरी ही सही, पर मेरे साथ है।

    दिन भर तुम यूँ दूर रहते हो,

    जैसे अपने काम में बहुत व्यस्त हो।

    शाम ढलते ही तुम्हारी याद यूँ आती है,

    जैसे तुम काम से लौटकर घर आए हो।

    जब भी बैठूँ एक कप चाय लेकर,

    तेरी मीठी-सी याद मुझे सताए।

    जब भी कुछ बनाने का सोचूँ,

    सबसे पहले तेरी पसंद याद आए।

    रात जैसे-जैसे गहराती है,

    तेरी याद मुझे और रुलाती है।

    आँखें जब भी बंद करूँ,

    बस तेरा ही चेहरा नज़र आता है।

    आँसू भले ही आँखों में हों,

    पर होठों पर तेरी याद मुस्कान बन जाती है।

    अधूरी सही मेरी मोहब्बत,

    पर तेरी याद आज भी पूरी मेरी है

  • तेरी मेरी”

    तेरी मेरी”

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    तेरी मेरी कहानी कुछ अधूरी सी है,

    पर इसमें भी एक मिठास पूरी  है।

    न मिले तो क्या हुआ हम दोनों,

    रूह की डोर अब भी जुड़ी है।

     

    तेरी हँसी में मेरी धड़कन में छिपी है,

    तेरी खामोशी में मेरी साँसें बसी है।

    तू दूर सही, पर एहसास पास है,

    तेरे बिना भी तू मेरे आस-पास है।

     

    तेरी मेरी राहें जुदा सही लगे,

    पर मंज़िल में अब भी तू ही बसी।

    हर शाम तेरे नाम से ढलती है,

    हर सुबह तेरी याद में खिलती है।

     

    ना वादा है, ना कसमें हैं,

    बस एहसासों की हल्की सरगम है।

    तेरी मेरी ये नज़रों की बात, कह न पाए,

    पर सब कुछ कह गई रात हैं।

     

    Lakshmi Kumari………….

     

     

  • जो है अब तू है…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    *तुझे एक बार फिर बता दूँ…. तेरे अलावा कोई नहीं है मेरा…*

     

    न कोई ऐसा जिससे दिल की बात कह सकूँ, न *कोई ऐसा जिसके सामने बिना डरे टूट सकूँ..*.. 

    दुनिया में लोग बहुत हैं, पर अपना सिर्फ तुझे माना है मैंने…

     

    *शायद इसी लिए तेरी छोटी सी बेरुख़ी भी दिल को बहुत तकलीफ़ देती है…*

     

    क्योंकि जहाँ पूरा भरोसा होता है, वहीं सबसे ज़्यादा डर भी होता है…

     

    तू साथ रहे या न रहे, ये तेरी मर्जी है….

     

    *मगर सच इतना सा है कि मेरे दिल ने तेरे बाद किसी और को अपना माना ही नहीं…*💝💕💘

  • आपका होना एक तरफ…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दुनिया की हर ख़ुशी एक तरफ़, और तेरा साथ एक तरफ़,

     

    *आने वाले कल को जीत लेंगे, बस थामे रखना मेरा हाथ एक तरफ़।*💝💝

  • विडियो सबूत

    विडियो सबूत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक फैसला जिसमें सबकी सहमति होती है। जानेंगे इस भाग में उस फैसले की रहस्य चलिए चलें कहानी की ओर…
    ” अब इसके साथ बहस करने का कोई फायदा नहीं है दीदी, अब इसको प्रिंसिपल मैम के पास हीं लेकर चलना चाहिए।”
    राधा सख्त होते हुए कठोर आवाज में बोली थी।
    ” हां इसे अब प्रिंसिपल मैम के पास हीं लेकर चलते हैं। अब वही इसके साथ जो भी करना होगा करेंगे।”
    शीला भी राधा के बात से सहमत होते हुए बोली थी। चार सहेलियों में दो के स्वभाव कड़क, तो दो के सरल व सॉफ्ट जैसा की हम लोगों ने देखा की कैसे रूपा और चांदनी बात बात पे हमेशा एक्शन व अटैक मोड में रहती थी। तो वहीं शीला और राधा का सॉफ्ट व नॉर्मल बिहेवियर रही है। रूपा और चांदनी को अगर फ्री छोड़ दिया जाए, तो वो दोनो कमल के हलक से जान निकाल ले।
    ” इसे ऐसे हीं नहीं छोड़ सकते हैं दीदी, इसने हमलोगों को बहुत हर्ट किया है दीदी।”
    रूपा के पैर रह रह कर फड़फड़ा जाती थी। जिसको रूपा कमल के पीठ और उसके कंधे पर अपनी लात मार कर शांत कर लेती थी।रूपा कमल के रीढ़ के हड्डियों पर अपनी लात की चोट जमाते हुए बोली थी।
    ” हां दीदी, रूपा ठिक कह रही है। इसे हम ऐसे हीं नहीं छोड़ सकते हैं। इसको एक ऐसी सजा दे देते हैं। कि जिसे ये ज़िन्दगी भर याद रखेगा, हमेशा दिमाग में रहेगा की किसी लड़की से पाला पड़ा था। और ये अपने जिवन में कभी भी किसी भी लड़की के तरफ अपनी आंख उठा कर नही देखेगा। और अपनी गंदी नजर किसी लड़की पर डालने से पहले हजार बार सोचेगा।”
    चांदनी अपनी लहजा सख्त रखते हुए सभी को देखकर बोली थी।
    ” मैं तो कहती हूं। इसके हांथ पैर तोड़ देते हैं।”
    रूपा गुस्से में आकर जोर से बोली थी। और कमल को लात मारकर गिरा दी थी। कमल जब हांथ पैर टूटने का बात सुना, तो उसका रूह कांप गया। वो अपने मन में बिना हांथ और बिना पैर के उसके जीवन कैसा होगा इमेजिन करने लगा था। की वो बिना पैर के चल फीर कैसे सकेगा, और बिना हांथ के खाना कैसे खा सकेगा या फीर कोई भी काम कैसे कर सकेगा। यही सब सोच कर उसका मन विचलीत हो रहा था। वो चाह रहा था की जल्द से जल्द यह मेटर उसके जिंदगी से खत्म हो जाए। सबने अपने तरफ से अपनी अपनी बात रख दी थी। अब सबकी नजर शीला पर हीं जा कर रूक गयी थी। क्योंकी फैसला उसे हीं करनी थी। सभी दोस्तों में सबसे बड़ी भी वही थी, और राधा चांदनी रूपा तीनो भी शीला के कोई भी बात या उसके लिए कोई भी फैसले को ना हीं कोई भी मना कर ती थी। और ना हीं कोई भी चुनौती देती थी।शीला जो भी स्टेन्ड लेगी उसे सभी को माननी पड़ेगी। ऐसा नही है की शीला की बात मानना इन सब की मजबूरी थी। बल्की ये सभी के दिल में शीला के लिये इज्जत और सम्मान थे। और विस्वास थे, की हमारी दीदी हमारे लिए कभी कुछ गलत नहीं करेंगे,या कुछ गलत होने देंगे। कोई भी रिश्ता एक दुसरे के इज्जत सम्मान देने विस्वास करने और एक दुसरे के फैसले में साथ देने से हीं रिश्ता सही और सुचारू रूप से चलती है।
    ” अब क्या किया जाए।”
    चांदनी अपनी बात पुरी भी नहीं की थी। की बीच में हीं चांदनी की बात काटते हुए कमल बोला
    ” मुझे माफ करदो।”
    और बोलते हुए चांदनी के पैर पर गीर कर नाक रगड़ने लगा था। जोर जोर से रोने लगा था। कमल के आंखों से आंसू के धार भी बहने लगा था।
    ” ठीक है तो, इसे लेकर प्रिंसिपल मैम के पास चलते हैं।
    शीला सभी के तरफ देखकर बोली थी।
    ” ठीक है दीदी, चलते हैं।”
    एक साथ तीनो सहेली बोलती है। और रूपा कमल को बाल पकर कर घसीटते हुए ले जाने की कोशिश करती है। बल्कि कुछ दूर घसीट भी देती है।
    पर चांदनी और शीला उसे ऐसा नहीं करने के लिए इशारे से रोकती है। और दोनो कमल के एक एक बांह पकर कर खड़ा होने में कमल का मदद करती है। और दोनो साइड से दोनो लड़की उसके दोनो बांह पकड़े हुए आगे बढ़ जाती है। उसके पिछे पिछे राधा और रूपा भी चल पड़ती है। शीला की पलटन मीटिंग हॉल के तरफ चल पड़ी थी। शीला को फैसला लेनी थी वह फैसला वो ले चुकी थी। उसके फैसले में उसके तीनो सहेलियों का भी समर्थन मिल चुकी थी।क्लास रूम से सभी बाहर जा चुके थे।
    मीटिंग हॉल
    मीटिंग हॉल में चहल पहल तेज हो गए थे ! सभी स्टूडेंट्स और सभी टीचर्स भी अपने अपने जगह लेकर बैठ चुके थे। प्रिंसिपल मैम भी स्टेज पर आ चुकी थी। मीटिंग की कार्यवाही भी सुरू हो गयी थी।
    उस में से एक टीचर मंच संचालन कर रहे थे। जिनका नाम था। प्रोफेसर दया नन्द। वे बारी बारी से प्रोफेसरों को माइक से आमंत्रीत कर रहे थे। और जिस प्रोफेसर के नाम वो माइक से अनाउंस करते थे। वो आकर अपना वक्तव्य देते थे।
    ” तो बच्चों, जैसा की आपको बताया गया है। की इस   बार होने वाले भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव हमारे अपने कॉलेज में धूम धाम से मनाया जाएगा। जिसमे तैयारी हम सभी टीचर्स के साथ साथ आप सभी स्टूडेंट्स को भी करनी है।”
    प्रोफेसर दयानन्द मंच से माइक पर बोल रहे थे। यह बात सुनकर नीचे स्टूडेंट के बीच भी काना फूसी स्टार्ट हो गयी थी।
    ” ये क्या बात हुई, इतनी सी बात बताने के लिए इतना बड़ा अरेंजमेंट किया गया है। ये बात तो सभी के क्लास रूम में भी तो बता सकते थे।”
    नीचे बैठे स्टूडेंट में से एक स्टूडेंट बोला था।
    ” हां, इसमें नई बात कौनसी है। कृष्ण जी का तो जन्मोत्सव तो हर साल मनाया जाता है। हमारे कॉलेज में नया क्या बोल दिया इन्होने।”
    एक दुसरे स्टूडेंट ने पहले स्टूडेंट के तरफ देखकर जवाब देते हुए बोला था।
    ” नया बस यही है की, कॉलेज में ईस बार मनाया जायेगा। सुना नही तुमने।”
    पहले स्टूडेंट बोलकर दूसरे स्टूडेंट को देख कर हंसने लगा था। साथ में और भी स्टूडेंट्स भी हंसने लगे थे।
    ” इस बार क्या, हर बार तो मनाया गया है। हमारे कॉलेज में कृष्ण जन्मोत्सव।”
    एक लड़की सभी के तरफ देखते हुए बोली थी।
    ” लेकिन दयानन्द सर ने इस बार बोले हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है?”
    एक और लड़की बोल पड़ी थी। सभी लोग तरह तरह के बाते कर रहे थे। इसी बीच मंच से माइक पर अनाउंस होता है।
    ” अब मैं प्रोफेसर भाटी से आग्रह करूंगा। की वो माइक पर आयेंगे और भगवान श्री कृष्ण के जिवन लीला के बारे में हम लोगों को बतायेंगे और मानव जिवन में श्री कृष्ण के उपदेश की क्या भुमिका है।आयेंगे और हमें समझायेंगे। मिस्टर भाटी कॉम ऑन ऑफ द स्टेज। बच्चो जोरदार तालियों से सर का स्वागत करेंगे।”
    प्रोफेसर दयानन्द माइक हांथ मे लिए बोल रहे होते हैं।
    आगे की कहानी पढ़िए अगले भाग में….प्यार एक अहसास

  • सवाल का जबाव जिसका इंतजार सभी को है।

    सवाल का जबाव जिसका इंतजार सभी को है।

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    कहानी के इस भाग में एक रहस्य से पर्दा उठता है। जिसका इंतजार लगभग सभी को रहता है। चलिए कहानी की ओर चलें…
    ” अब रोने की बारी उनकी है। जिसने तुम्हें रूलाने की कोशिश की है । अब तुम्हें रोने की कोई जरूरत नहीं है। “
    शीला बोलती हुई,राधा को ढांढस बंधा रही थी। शीला और चांदनी दोनो मिलकर  राधा और रूपा को रस्सी के बंधन से आजाद कर चुकी थी । चारो सहेलियां एक दुसरे से आपस में लिपट कर रोने लगी थी। अब इन सभी के जिन्दगी में जो दु:ख के बादल छाये थे वो अब छट चुके थे। इन सबके जिवन में तुफान लाने वाला सख्श धराशाई होकर बेसुध फर्श पर परा था।
    “अब जब सब कुछ ठीक हो गया है तो, हमें यहां से चलना चाहिए।”
    बोलकर चांदनी बारी बारी से तीनो के तरफ देखती है।
    ” हां हमें चलना चाहिए इससे पहले की कोई और प्रोबलम खड़ा हो हमें यहां से निकल जाना चाहिए।”
    शीला भी अपने आप को शांत करते हुए आंख से आंसू के बुंद को साफ करते हुए बोली थी ।
    ” हां दीदी जायेंगे पर इसे ऐसे छोड़कर नहीं इसको इसके किए की सजा देने के बाद।”
    रूपा कठोर होते हुए बोली थी। राधा को बहुत बरा सदमा लगा था। वो अभी भी बहुत डरी हुई थी। उसे अभी भी यकिन नही हो रहा था की सब कुछ नॉर्मल हो गया है। और वो मन ही मन अपने आप को कोस भी रही थी। की ये जो कुछ भी हुआ है, सब उसी के वजह से हुआ है। और वो उसी के वजह से आज रूपा और चांदनी शीला के जान का भी खतरा हो सकता था।
    ” क्या इसको ऐसे हीं छोड़ दोगे दीदी आप लोग?”
    शीला और चांदनी के तरफ देखकर कमल के तरफ अपनी उंगली से इशारा करते हुए राधा बोली थी। और एक बार फीर राधा के आंख से आंसू बहने लगे थे।
    ” नहीं दीदी, हम लोग इस कमीने को छोड़ेंगे नहीं। बल्कि पुलिस में देंगे।”
    रूपा राधा के आंख से आंसू पोंछते हुए बोली थी। रूपा की बात सुनकर सभी रूपा को आशचर्य से देखने लगे थे। तीनो के मन में एक साथ एक बात चली थी। की रूपा कितनी समझदार है, वो कितनी समझदारी की बात कर रही है। पर राधा रूपा को समझदार के साथ साथ बहुत हिम्मत वाली भी मानने लगी थी। आज जिस तरह से रूपा कमल के साथ डटकर मुकाबला की थी। उसको कमल से मार भी खानी परी थी। पर वो जिस तरह से अपना हिम्मत नहीं हारी थी। रूपा की यही सब गुण राधा के नजर में रूपा को महान बना रही थी।
    अभी उधर ये सब चारो सहेलियों में चल हीं रहा था। कि इधर धीरे धीरे  कमल के हांथ पैर हिलने लग गया था। उसको होस आने लगा था। कमल का आंख धीरे धीरे खुलता है। कमल का हालत बिल्कुल भी ठीक नहीं था। उसके बदन में अभी भी बहुत अ सहनीय दर्द हो रहा था। उसके मुंह से बहुत सारा खून भी बह गया था। ज्यादा खून बह जाने के कारण हीं कमल को होश नहीं आ पाया था। जब कमल का आंख खुलता है। तो वो नजर घुमाकर सभी लड़कियों के तरफ देखता है। वो कुछ बोलना चाहता है, पर वो कुछ भी बोल नहीं पाता हैं। उसके शरीर के अंदर इतनी भी शक्ती नहीं बच पाई थी। की वो कुछ बोल भी पाये। यही सब सोचकर कमल अपने आप को बहुत लाचार और कमजोर महसूस कर रहा था।
    ” इसको मीटिंग हॉल में लेकर चलते हैं। वहां ले जा कर प्रिंसिपल मैम के हवाले कर देते हैं। अब वही  इसके साथ जो करना होगा करेंगे।”
    शीला अपनी समझदारी से सभी के तरफ देखते हुए बोली थी।
    ” दीदी पुलिस को कॉल करके बुला लेते हैं ना, इसको पुलिस के हवाले कर देंगे।”
    बोल कर रूपा शीला को प्रश्नवाचक मुद्रा में देखने लगी थी।
    ” नही इसको प्रिंसिपल मैम के पास लेकर चलते हैं।”
    शीला रूपा को जबाव देते हुए बोली थी।
    ” नहीं दीदी इस भेड़िये को खुला छोड़ना ठीक नहीं होगा।”
    रूपा शीला से बोली थी। कमल को होश में आने के बाद उसके दिमाग में एक हीं बात राऊंड मारते हुए चल रहा था। की ये दोनो क्लास रूम में कैसे आया था। और आकर उसका बना बनाया सारा खेल बिगाड़ दिया था। कमल का बात सही भी था। अगर उस टाइम शीला और चांदनी आ कर, कमल पर अटैक नहीं किया होता तो अभी सारा सिचुएशन उसके अंडर में होता। और शीला और चांदनी से उसको इतना मार नहीं पड़ा होता तो वो,अभी फर्श पर नहीं पड़ा होता।
    ” तुम दोनो अंदर कैसे आए?”
    कमल दर्द से कराहते हुए हिम्मत करते हुए शीला और चांदनी से अपनी बात पुछ हीं लिया था। ये आवाज चारो सहेलियों के कान में जैसे ही गई सभी आशचर्य से उस आती हुई आवाज के तरफ मुड़कर देखी। सभी सहेलियों के चेहरे के हाव भाव एक दम से बदल गये थे। सभी एक्शन मोड में आ गयी थी। सभी एक साथ एक बार फिर से कमल पर अटैक करने चल पड़ी थी। यह सीन देखकर कमल के होश उड़ गये थे। डर के मारे उसके पसीने छुटने लगे थे। वो सोचने लगा अब उसके शरीर में और मार बर्दास्त करने की छमता नहीं है। अब अगर और मार पड़ा तो वो जिन्दा बच नहीं पायेगा। इसी लिए अब वो दिमाग से काम लेना चाहा। कमल हिम्मत करके उठकर बैठ गया था।
    ” तो तुम्हें जानना है। की हम क्लास रूम के अंदर कैसे आए?”
    चांदनी कमल पर चीखते हुए जोर से बोली थी।
    ” हां इसे बता हीं देते हैं। की हम दोनो क्लास रूम के अंदर कैसे आए।”
    शीला चांदनी के तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर बोली थी। हालाकी राधा और रूपा भी कमल के इस सवाल का जबाव जानना चाहती थी। वो दोनो भी अपनी दीदी के तरफ देखने लगी थी। सभी चलकर कमल के पास पहूंच गये थे। रूपा का लात कमल के पीठ पर पड़ता है। जो कमल अभी अभी उठकर बैठा हीं था। एक भारी चीख कमल के मुंह से निकल जाता है।
    ” पहले इसको इसके सवाल का जबाव सुनने दो बहन, फिर उसके बाद तुम इस पर अपना बॉक्सिंग का प्रेक्टिस कर लेना।”
    शीला रूपा को रोकते हुए बोली थी। सुनकर रूपा रूक जाती है।
    “इसमें तुम्हारी हीं बेवकूफी है भेड़िए।”
    चांदनी गुस्से से दांत पीस कर कमल के तरफ मुड़कर बोली थी।
    ” मैं चाहती तो, तुम्हें वहीं सबक सीखा सकती थी। जब तुम्हें रस्सी और डंडा लिये क्लास रूम के तरफ आते हुए देखी थी। और छुपकर तुम्हारा पीछा करने लगी थी।”
    बीना रूके शीला बोलते रही।
    ” .मैं जानना चाहती थी। की आखिर बात क्या है। तुम रस्सी और डंडे लेकर क्या करने वाले हो। और सोने पे सुहागा तो तब हुआ, जब तुम्हारा दोनो हांथ खाली नहीं होने के वजह से तुमने दरवाजा लॉक नहीं किया। इसी बात का फायदा हमने उठायी और दोनो भीतर आके दरवाजे बंद कर ली थी। ताकी तुम्हें भी बचकर भागने नहीं दूं।”
    चांदनी ने कमल को पुरी बात बतायी थी ।
    ” दीदी जब आप पहले हीं आ गईं थी तो, आपने हमें पहले हीं क्यों नहीं बचाई थी। आप अपनी आंखों के सामने हमें रस्सी से बंधते और पिटते हुए देखी थी।”
    रूपा बोलकर शीला और चांदनी के तरफ सवालिया नजर से देखने लगी थी।
    ” इसका मतलब, दीदी मैं आपके आंखों के सामने बेहोश हुई थी।”
    राधा भी शीला और चांदनी से सवाल की थी। इस पर शीला और चांदनी कुछ भी नहीं बोलती है। बस दोनो अपना शर हां में हिला देती है।
    ये सुनकर कमल के पैर के नीचे से जमीन खिसक गयी थी। उसमे अब हिम्मत भी नहीं थी। की वो उन सब से फाइट कर सके तो उसने अपनी जान बचाने का एक तरीका निकाला जो एक हारा हुआ हर इंसान लगभग यही करता है। और कमल ने भी वही किया था। वो झुक कर शीला के पैर पकर लिया था।
    ” मुझे माफ कर दो,मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गयी है। प्लीज मुझे माफ कर दो और मुझे जाने दो।”
    कमल शीला के पैरों में गिरकर नाक रगड़ते हुए बोला था।
    ” कमीने सुअर की औलाद, तुम्हें माफ कर दूं। निकल गयी सारी हेकड़ी, अब रेप नहीं करेगा मेरी दीदी का हां।”
    रूपा गुस्से में अपनी आंखे लाल करते हुए कमल से बोली थी । और धमा धम दो लात उसको रसीद करदी थी। कमल रूपा के पैर की चोट खा कर पुरी तरह से हिल गया था। अब उसको समझ आने लगा था। की उसकी ग़लती छोटी नहीं है।
    ” अब पछतावा आ रहा है। अपने किये पर पहले ये क्यों नहीं सोचा अपना अंजाम ये सब करने से पहले।”
    चांदनी जो राधा के कंधे में अपनी बांह डाली हुई थी। कमल से  बोली थी।
    “माफी तो तुम्हें मिलने से रही, पर तुम्हे जेल जरूर मिलेगी।”
    रूपा कमल को बाल से खींचते हुए बोली थी।
    ” अब इसके साथ बहस करने से, कोई फायदा नही है दीदी।”
    कहानी और भी मजेदार होने वाली है ! पढिए अगले भाग में….प्यार एक अहसास

  • टूटा घमंड

    टूटा घमंड

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कमल राधा को भी बांध दिया था। उसके बाद जो कुछ भी हुआ था।ये बात तो आप लोग जानते हीं हैं की कैसे तीनो के बीच की बहस और लड़ाई इतनी बढ़ गई थी। जो कमल राधा को रेप करने तक की बात भी बोल दिया था। रेप की बात सुनकर राधा और रूपा बहुत घबरा गई थी। दोनो लड़की पसीने से पानी पानी हो गयी थी।
    रेप एक ऐसा शब्द है। जो ये  शब्द  जीस कसी के नाम के साथ जुड़ जाती है। तो उसकी जिंदगी, जीते जी नरक बन जाती है। ये समाज बालात्कार को समाजिक और कानूनी एक बहुत हीं जघन्य अपराध के श्रेणी में रखा है। इस अपराध को करने वाले के खीलाफ बहुत सख्त कानून बनाया गया है। और इसमें सख्त से सख्त सजा देने का प्रवधान भी किया गया है। इसके अंदर सजा आजीवन जेल में रहने से लेकर फांसी की सजा तक भी दी जा सकती है।
    आइए हमलोग अपनी कहानी के ओर बढ़ते हैं।
    कमल का हौसला अब ज्यादा बढ़ गया था। वो दोनो लड़की पर कंट्रोल जो कर लिया था। राधा और रूपा अपने उपर से रस्सियों के बंधन से छुटने के लिये हांथ पैर तो नही मार सकती थी। क्योंकी बंधे हुए थे। बस अपनी ताकत लगाकर कसमसाने से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही थी।
    ” देख तेरी ना करने की जिद्द ने तुम्हें कहां लाकर खड़ी कर दी है।तुम्हे शायद मालुम नही, मुझे ना सुनने की बिल्कुल भी आदत नहीं है। जब मैं अपनी मम्मी पापा के ना कहे को बर्दाश्त नहीं कर सकता हूं। तो तुम्हारा कैसे करूंगा?”
    ” कमल राधा के तरफ देखते हुए बोला था। राधा सिर्फ लाचारी से कमल को देखती रहती है। कमल के बात में सच्चाई थी। वो एक अमीर बाप का बेटा था। उसके मॉम डैड उसे बहुत प्यार करते थे ! वे उसके हर जायज नजायज जिद्द को पुरा कर रहे थे। कोई भी चीज का मांग अगर कमल करता था। तो वो उसे लाकर हर हाल में देते थे । कमल के मॉम डैड कमल के पालन पोसन में किसी भी प्रकार के कोई कमी नहीं होने दिये थे। इसी लार प्यार का नतीजा है। की आज उनका बेटा एक रेपिस्ट बनने जा रहा था।
    ” तुम अपनी सोच कमीने, यहां से तुम बचकर नही जाएगा जिन्दा।”
    रूपा कमल पर चिल्ला कर जोर से बोली थी ।
    ” तू इसी तरह फरफराती रह, तुम लोग कुछ नहीं बिगाड़ सकती हो मेरा। कुछ भी नहीं करोगी तुम लोग। “
    कमल रूपा से बोला और राधा के तरफ बढ़ा और उसकी गले में बांह डालकर अपने दुसरे हांथ से उसके गाल गर्दन को टच करते हुए हांथ नीचे के तरफ बढ़ा दिया था। ये देखकर रूपा को बहुत गुस्सा आ रही थी। वो कमल को कच्चा चबा जाना चाहती थी।
    रूपा सोच रही थी। अगर अभी वो बंधी नहीं होती, और उसके हांथ पांव खुले होते तो वो कमल को अच्छा खासा सबक सीखा सकती थी। बंधे होने से वो अपने आपको बहुत हीं लाचार और मजबूर फील कर रही थी। वो यहां से निकलने का मन में तड़किव सोच रही थी। रूपा को आभास हो गयी थी। की रूपा राधा कमल के अलावा भी कोई क्लास रूम में मौजुद है। मगर कौन,वो सोची कही कमल और लोगों को तो नहीं बुला रखा है। हम दोनो से अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए। वो क्लास रूम के चारो तरफ अपनी नजर घुमाके देखने लगी थी। रूपा फिर सोची अगर कमल किसी को बुलाया होता तो वो हम लोगों के सामने लाता हमसे बदला लेने के लिए। फीर मन हीं मन बोली, नही नही शायद यह हमारा वहम है।अगर कमल किसी को बुलाया हुआ होता तो वो उसे छुपने को थोड़ी बोलता।
    रूपा राधा के सामने थी। पर कुछ दूरी थी, और बीच में कमल था। अगर रूपा राधा को कुछ भी बताती की उसने क्या महसूस किया है।तो उस बात को कमल भी सुन सकता था। इस लिए रूपा कुछ नहीं बोली। और सोची कोई तो है पर कौन? रूपा अभी ये सब सोच हीं रही थी कि तभी कमल राधा को कस कर पकड़ कर अपने सीने से चिपका लेता है। और अपना चेहरा राधा के चेहरे के सामने ले जा कर राधा को चूमना चाहता है। कमल का मुंह राधा के मुंह से सटने हीं वाला था। की तभी एक साथ दो मुक्का कमल के दोनो जबड़े  पर आकर पड़ा। हमला अचानक हुआ था। मुक्के के थ्रो इतना जबरदस्त था। की कमल के बत्तीसी हिल गया था। उसके मुंह से खून बहने लगा था। वो समझ नहीं पा रहा था की उस पर हमला कौन किया था। जब की वो क्लास रूम के दरवाजे को लॉक कर के रखा था। तो बाहर से कोई कैसे आ सकता था। सवाल हीं नही पैदा हो सकता है की कोई बाहर से आ जाए, क्लास रूम के अन्दर।
    उसे अच्छे से याद था। कि जब वो दुबारा वापस क्लास रूम में आया था। तो दरवाजे को अच्छे से लॉक किया था। फीर ये कौन अंदर आगया था और कैसे? यही सवाल लिए कमल उपर की तरफ देखता है। देखकर कमल भौचक्का रह गया था। ये कैसे हो सकता है। ये दोनो अन्दर कैसे आ सकती हैं। दर्द तो बहुत हो रहा था कमल को पर इन सवालों के जबाव जानने के लिए। धीमी और रूआंसी आवाज में बोलता है।
    तुम, तुम यहां कैसे आई?”
    अब आप समझ हीं गये होंगे की वहां कौन आ गयी थी। कमल ये बोला हीं था की आठ दस लात सात आठ मुक्का कमल को और रसीद हो गया था। कमल दर्द से चीख उठा था। चांदनी और शीला कुछ भी बोल नही रही थी। बस उनके हांथ और पांव चल रहे थे।कमल को लग रहा था। कि जैसे अब उसके शरीर से जान नीकल हीं जायेगा। दोनो फाइटर बिल्कुल भी नहीं रूक रहे थे। ताबड़तोड़ लात और मुक्का बरसा रहे थे। मार मार के दोनो सहेली कमल का कचूमर बाहर कर दिया था। जब मार खा खा कर कमल बेहोशी से फर्श पर बेसुध हो गया था। तब दोनो दोस्त अपनी फाइट को विराम दी थी।
    ” तुम दोनो को डरने की कोई जरूरत नहीं है। हम आ गये हैं।
    चांदनी अपने दोनो हाथों को मोड़कर अपने सीने से चिपका कर बोली थी।
    ” हां तुम लोग डरो मत, तुम्हारी दीदी तुम लोगों को कुछ नही होने देगी।”
    शीला भी राधा और रूपा को देख कर बोली थी।
    थैंक्यू दीदी, जो आप लोग यहां आ गयी ।
    राधा को बोलते हुए आंसू बहने लगे थे।
    ” देखो, तुम्हे रोने की कोई जरूरत नही है। “
    चांदनी राधा के पास जाकर उसके आंख से आंसू पोछने लगती है।
    ” हां बहन, अब रोने की बारी उनकी है। जिन्होने तुम्हारे आंखों में आंसू दिए हैं। चुप हो जाओ राधा। “
    शीला बोलते हुए राधा के कंधे पर हाथ फेर रही थी। और शीला और चांदनी दोनो के बंधे रस्सी को खोलने लगती है।
    आगे कि कहानी पढिए अगले भाग में….