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टैग: प्यार एक खुबसूरत एहसास

  • Dil sabhal ja jara part – 6

    Dil sabhal ja jara part – 6

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    part – 6 nai survat or purana raj 

     

     

     

    ठाकुर हाउस की बड़ी सी ड्राइंग रूम में सुबह की धूप पड़ रही थी। प्रिया पहली बार अपने असली घर में पूरी रात सोकर उठी थी। उसका कमरा – जो बीस साल से बंद था – अब साफ-सुथरा था। पुरानी गुड़ियां, किताबें, और दीवार पर मां रानी की तस्वीर। प्रिया ने तस्वीर को छुआ और मुस्कुराई। “मां… मैं घर आ गई।”

     

    नीचे ब्रेकफास्ट टेबल पर पापा, आरव और प्रिया बैठे थे। विक्रम और चाची पुलिस कस्टडी में थे। न्यूज चैनल्स पर स्टोरी चल रही थी – “ठाकुर फैमिली की लापता बेटी 20 साल बाद लौटी”। पापा ने प्रिया को गले लगाया। “बेटी, आज से तू इस घर की मालकिन है। जो चाहे कर।”

     

    आरव ने हंसकर कहा, “पापा, पहले कॉलेज तो कंपलीट करने दो। प्रिया अब भी स्कॉलरशिप वाली स्टूडेंट है।”

     

    प्रिया हंसी। “हां भैया, मैं अपनी पढ़ाई खुद पूरी करूंगी। पैसे से नहीं, मेहनत से।”

     

    तभी दरवाजा खटका और रिया अंदर घुसी – हाथ में बड़ा सा बैग। “हाय फैमिली! मैं तो अब यहां शिफ्ट हो रही हूं। प्रिया की बेस्ट फ्रेंड हूं ना!” वो आरव को देखकर आंख मारी। “और भैया को भी सताने का हक है।”

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया। “रिया, तू यहां आएगी तो घर में कभी शांति नहीं रहेगी।”

     

    रिया ने टेबल पर रखा बैग खोला – अंदर ढेर सारी चॉकलेट्स, चिप्स और एक बड़ा सा बॉक्स। “ये प्रिया के लिए गिफ्ट्स! अमीर बन गई है तो अब डाइटिंग छोड़।”

     

    पापा हंस पड़े। “रिया बेटी, तू भी इसी घर की है। जब मन करे आ जाना।”

     

    प्रिया को पहली बार फैमिली का मजा आ रहा था। कॉमेडी, हंसी-मजाक। लेकिन अंदर कुछ खटक रहा था – क्या सब इतनी आसानी से नॉर्मल हो जाएगा?

     

    कॉलेज में वापसी। प्रिया और रिया हॉस्टल से सामान पैक करके ठाकुर हाउस शिफ्ट हो गईं। लेकिन कॉलेज जाना जारी। क्लास में एंट्री करते ही सबकी नजरें। अवनी अब चुप थी – विक्रम के गिरफ्तार होने से उसका घमंड टूट गया था। लेकिन उसने प्रिया को घूरकर कहा, “अब अमीर बन गई ना? लेकिन याद रख, कुछ राज़ अभी बाकी हैं।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “अवनी, अब मैं डरने वाली नहीं।”

     

    क्लास में एक नया लड़का था – नाम था विक्रांत। लंबा, हैंडसम, देहरादून से ट्रांसफर। स्माइल मार्का। प्रोफेसर ने उसे प्रिया के पास बिठाया। “प्रिया, न्यू स्टूडेंट है। हेल्प करना।”

     

    विक्रांत ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाय प्रिया। सुना है तू ठाकुर फैमिली की है। लेकिन न्यूज में जो स्टोरी चली, वो कमाल की है। तू रियल लाइफ हीरोइन है।”

     

    प्रिया शर्मा गई। “थैंक्स… लेकिन बस नॉर्मल स्टूडेंट हूं।”

     

    लंच में विक्रांत प्रिया और रिया के साथ बैठा। आरव भी आया। आरव ने विक्रांत को देखा और थोड़ा अजीब सा फील हुआ। “हाय ब्रो, विक्रांत यहां नया है।”

     

    आरव ने ठंडे से कहा, “वेलकम। लेकिन प्रिया मेरी बहन है। ख्याल रखना।”

     

    विक्रांत हंसा। “आरव भाई, चिल। मैं बस दोस्ती कर रहा हूं।”

     

    रिया ने साइड में प्रिया को कोहनी मारी। “यार, नया क्रश? आरव तो जल रहा है।”

     

    प्रिया हंसी। “पागल, आरव मेरा भाई है। वो बस प्रोटेक्टिव है।”

     

    लेकिन अंदर प्रिया को विक्रांत अच्छा लग रहा था। उसकी बातें, हंसी, तरीका – सब नया था। पहले आरव से जो लगाव था, वो भाई वाला निकला। अब पहली बार किसी से सच्चा रोमांस का फील हो रहा था।

     

    शाम को ठाकुर हाउस में पार्टी थी – प्रिया की वेलकम पार्टी। पापा ने सारे रिश्तेदारों को बुलाया। घर सजा हुआ था। प्रिया ने पहली बार साड़ी पहनी – मां की पुरानी रेड साड़ी। सबने तारीफ की।

     

    पार्टी में रिया ने कॉमेडी शुरू की। वो डांस फ्लोर पर आरव को खींचकर लाई। “भैया, अब डांस करो। बहन आ गई है तो खुश हो ना!”

     

    आरव शर्मा रहा था। “रिया, मैं डांस नहीं करता।”

     

    रिया ने म्यूजिक तेज किया और आरव के साथ जबरदस्ती ठुमके लगाए। आरव बार-बार गिरते-गिरते बचा। सब हंस पड़े। प्रिया भी हंस-हंसकर लोटपोट हो गई। “भैया, तू तो प्रो डांसर निकला!”

     

    तभी विक्रांत आया – आरव ने उसे भी इनवाइट किया था। वो प्रिया के पास आया। “वाह प्रिया, साड़ी में कातिल लग रही हो। डांस करेगी?”

     

    प्रिया हिचकिचाई। लेकिन आरव ने पीठ थपथपाई। “जा प्रिया, एंजॉय कर।”

     

    विक्रांत और प्रिया डांस करने लगे। स्लो रोमांटिक सॉन्ग। विक्रांत ने धीरे से कहा, “प्रिया, तेरी स्टोरी सुनकर मुझे लगा तू बहुत स्ट्रॉन्ग है। मुझे तेरे जैसी लड़की चाहिए।”

     

    प्रिया का चेहरा लाल हो गया। “विक्रांत… अभी तो मिले हैं।”

     

    विक्रांत ने मुस्कुराया। “धीरे-धीरे सब होगा।”

     

    आरव दूर से देख रहा था। उसे अजीब लग रहा था। “ये लड़का ठीक तो है ना?”

     

    रिया ने आरव को चिढ़ाया। “भाई साहब, जल रहे हो? प्रिया को कोई पसंद करने लगा है!”

     

    आरव ने गुस्से से कहा, “चुप रिया! मैं बस प्रोटेक्ट कर रहा हूं।”

     

    पार्टी के बाद प्रिया अपने कमरे में थी। विक्रांत का मैसेज आया – “गुड नाइट। आज बहुत अच्छा लगा।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। पहली बार दिल में हल्की सी गुदगुदी।

     

    लेकिन तभी बड़ा ट्विस्ट।

     

    रात को प्रिया की अलमारी में एक पुराना बॉक्स मिला। कमला दाई ने कहा था कि मां का सामान है। बॉक्स खोला तो अंदर एक डायरी थी – रानी मां की। आखिरी पेज पर लिखा था:

     

    “अगर मुझे कुछ हुआ तो प्रिया को सच बताना। उसका असली पिता राजेश ठाकुर नहीं है। राजेश ने मुझे जबरदस्ती शादी की थी। प्रिया का असली पिता मेरा पहला प्यार था – डॉक्टर आदित्य शर्मा। वो दिल्ली में रहता है। प्रिया को उसके हक से वंचित मत करना।”

     

    प्रिया का हाथ कांप गया। पापा… राजेश ठाकुर उसके असली पिता नहीं? आरव उसका सगा भाई नहीं?

     

    वो रो पड़ी। डायरी लेकर आरव के पास गई। आरव ने पढ़ा। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। “प्रिया… ये… अगर सच है तो मैं तेरा भाई नहीं हूं?”

     

    दोनों चुप। बाहर चांदनी थी। प्रिया ने कहा, “आरव… कल आदित्य शर्मा को ढूंढेंगे। लेकिन तू हमेशा मेरा भाई रहेगा। खून से नहीं, दिल से।”

     

    आरव ने उसे गले लगाया। “हां प्रिया। तू मेरी बहन है। हमेशा।”

     

    लेकिन प्रिया के दिल में अब नया सवाल – अगर आरव भाई नहीं, तो पहले जो फीलिंग्स थे… वो क्या थे? और अब विक्रांत?

     

    रिया कमरे में आई। सारी बात सुनी। कॉमेडी मोड ऑन। “अरे वाह! अब प्रिया फ्री है? आरव, अब तू प्रिया को डेट कर सकता है!”

     

    आरव और प्रिया दोनों चिल्लाए, “रिया!”

     

    रिया हंसकर भागी। “मजाक था यार! लेकिन रोमांस तो अब शुरू होगा!”

     

    रात गहरा गई। प्रिया खिड़की पर खड़ी थी। विक्रांत का मैसेज फिर आया – “सपनों में मिलते हैं।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। लेकिन डायरी हाथ में थी। नया

    राज़ खुल चुका था। क्या प्रिया का असली पिता जिंदा है? और आरव के साथ उसका रिश्ता अब क्या होगा?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 5

    Dil sabhal ja jara part – 5

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    रात के ग्यारह बज चुके थे। कॉलेज गेट के बाहर बारिश तेज़ हो गई थी। प्रिया और आरव दोनों भीग रहे थे, लेकिन कोई हिल नहीं रहा था। अभी-अभी एक काली एसयूवी उन्हें कुचलने की कोशिश करके भागी थी। आरव ने प्रिया को धक्का देकर बचाया था, लेकिन उसका हाथ छिल गया था। खून बह रहा था।

    प्रिया ने आरव का हाथ पकड़ा। “आरव… तू ठीक तो है?”

    आरव ने दर्द सहते हुए मुस्कुराया। “अब तू मेरे साथ है ना, तो सब ठीक है। चल, कहीं सूखी जगह चलते हैं।”

    दोनों कॉलेज के पास वाली छोटी सी कॉफी शॉप में घुस गए। रात को खुली रहती थी। अंदर सिर्फ एक वेटर था। दोनों कोने की टेबल पर बैठ गए। आरव ने कॉफी ऑर्डर की। प्रिया की आंखें अभी भी डरी हुई थीं।

    “आरव… वो विक्रम था ना? तेरा सौतेला भाई?”

    आरव ने सिर हिलाया। “हां। पापा की दूसरी शादी से। वो हमेशा से जलता था मम्मी और हमसे। मम्मी की मौत के बाद उसने सब संभाल लिया। होटल्स, प्रॉपर्टी – सब उसके कंट्रोल में। अगर तू वापस आई तो कानूनी तौर पर आधी प्रॉपर्टी तेरी हो जाएगी। वो ये नहीं होने देगा।”

    प्रिया की आंखें सख्त हो गईं। “मैं डरने वाली नहीं हूं। मैंने बीस साल स्ट्रगल किया है। अब हक के लिए लड़ूंगी।”

    आरव ने उसका हाथ थामा। “अब तू अकेली नहीं है। मैं तेरे साथ हूं। लेकिन सावधानी से चलना होगा। पहले सबूत इकट्ठा करें। कमला दाई की गवाही, पुराने पेपर्स, डीएनए टेस्ट।”

    प्रिया ने कहा, “कल सुबह हम कमला दाई को हवेली से ले आएंगे। उसे सुरक्षित जगह रखेंगे।”

    आरव ने हां कहा। “और रिया को भी साथ रख। वो तेरी अच्छी दोस्त है।”

    कॉफी पीते हुए दोनों ने प्लान बनाया। रात को आरव ने प्रिया को हॉस्टल छोड़ा। गेट पर खड़े होकर बोला, “प्रिया… मुझे अफसोस है कि मैं छोटा था तब। कुछ कर नहीं सका। लेकिन अब मैं तेरी ढाल बनूंगा।”

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। “आरव… तू मेरा भाई है। पहली बार मुझे फैमिली का फील हो रहा है।”

    दोनों गले मिले। भाई-बहन का पहला गले मिलना।

    अगली सुबह प्रिया और रिया जल्दी उठे। आरव कार लेकर आया। तीनों पुरानी हवेली की ओर चले। रास्ते में आरव ने बताया, “पापा को अभी कुछ नहीं पता कि मैं तुझे मिला हूं। विक्रम ने शायद उसे भी नहीं बताया।”

    हवेली पहुंचते ही कमला दाई बाहर खड़ी थी। जैसे इंतजार कर रही हो। उसने सामान का छोटा बैग तैयार रखा था। “बेटी… मैं तैयार हूं। अब डर नहीं लगता। सच बाहर आना चाहिए।”

    चारों एक छोटे से गेस्ट हाउस में रुके – आरव ने पहले से बुक करवाया था। शहर से बाहर, सुरक्षित। वहां कमला दाई ने और डिटेल्स बताईं।

    “रानी बहू बहुत बहादुर थीं। वो जानती थीं कि घर में साजिश हो रही है। इसलिए वो तुझे लेकर भागने वाली थीं। लेकिन कार में कुछ गड़बड़ की गई। मैंने सुना था विक्रम के ड्राइवर से – ब्रेक काटे गए थे।”

    प्रिया ने पूछा, “क्या कोई प्रूफ है?”

    कमला दाई ने अपना पुराना बॉक्स खोला। अंदर एक पुराना लेटर था – रानी ठाकुर का लिखा हुआ। “अगर मुझे कुछ हुआ तो प्रिया को बचा लेना। ये लोग प्रॉपर्टी के लिए कुछ भी कर सकते हैं।”

    आरव ने लेटर पढ़ा। उसकी आंखें लाल हो गईं। “मम्मी… मैं कुछ नहीं कर सका।”

    रिया ने कहा, “अब हम करेंगे। पहले डीएनए टेस्ट। आरव और प्रिया का। फिर पुलिस।”

    लेकिन आरव ने मना किया। “पुलिस में विक्रम के लोग हैं। पहले मीडिया। कोई बड़ा न्यूज चैनल। सच सबके सामने आएगा।”

    दोपहर को चारों शहर लौटे। आरव ने अपने एक पुराने दोस्त को फोन किया – जो पत्रकार था। शाम को मीटिंग फिक्स हुई।

    लेकिन इससे पहले अवनी का रोल आया। हॉस्टल में अवनी ने प्रिया को देखा और तंज कसा, “क्या बात है? आरव के साथ घूम रही है? स्कॉलरशिप वाली अब अमीरों की दोस्त बन गई?”

    रिया ने जवाब दिया, “अवनी, अपनी औकात देख। प्रिया जल्दी सबको दिखाएगी अपनी असली औकात।”

    अवनी हंसकर चली गई, लेकिन उसकी आंखों में शक था। बाद में पता चला कि अवनी विक्रम की गर्लफ्रेंड है। उसने विक्रम को बता दिया कि प्रिया और आरव साथ घूम रहे हैं।

    शाम को पत्रकार से मीटिंग हुई। नाम था राहुल शर्मा। आरव का कॉलेज फ्रेंड। राहुल ने सारी स्टोरी सुनी। कमला दाई की गवाही रिकॉर्ड की। लेटर देखा। “ये बहुत बड़ी स्टोरी है। ठाकुर फैमिली का काला सच। लेकिन डेंजर है। विक्रम बदला ले सकता है।”

    प्रिया ने कहा, “मैं तैयार हूं।”

    राहुल ने कहा, “कल सुबह डीएनए टेस्ट करवाते हैं। प्राइवेट लैब में। फिर स्टोरी पब्लिश।”

    रात को गेस्ट हाउस में सब सोए। लेकिन आधी रात को दरवाजा पीटा गया। बाहर पुलिस थी। “प्रिया शर्मा? आप चोरी के आरोप में गिरफ्तार हैं।”

    सब चौंक गए। आरव ने पूछा, “किस चोरी?”

    पुलिस वाले ने कहा, “ठाकुर हवेली से सामान चोरी का केस। विक्रम ठाकुर की शिकायत।”

    प्रिया समझ गई – ये झूठा केस है। उसे डराने के लिए। पुलिस उसे ले जाने लगी। आरव ने रोका, लेकिन पुलिस वाले नहीं माने।

    रिया ने चीखकर कहा, “ये झूठ है! हम सब गवाह हैं!”

    लेकिन पुलिस प्रिया को ले गई। थाने में विक्रम पहले से बैठा था। मुस्कुराते हुए बोला, “प्रिया जी, स्वागत है। अब खेल शुरू होगा।”

    प्रिया को लॉकअप में डाल दिया गया। अकेली, ठंडी कोठरी। वो रोने लगी। लेकिन अंदर से आवाज आई – “डर मत बेटी।”

    वो कमला दाई थी? नहीं। पास की सेल में एक औरत थी। लेकिन प्रिया को हिम्मत मिली।

    सुबह आरव और रिया वकील लेकर आए। आरव ने पापा को फोन किया। पहली बार। “पापा, प्रिया जिंदा है। वो मेरी बहन है। और विक्रम ने उसे फंसाया है।”

    पापा की आवाज कांपी। “क्या? प्रिया… जिंदा है?”

    आरव ने सब बताया। पापा चुप रहे। फिर बोले, “मैं आ रहा हूं।”

    दोपहर को ठाकुर हाउस में मीटिंग हुई। पापा, विक्रम, चाची, आरव, और प्रिया (बेल पर छूटकर)। कमला दाई भी आई।

    विक्रम ने ड्रामा किया। “पापा, ये लड़की झूठी है। पैसे के लिए आ गई है।”

    लेकिन पापा ने प्रिया को देखा। आंखें नम। “प्रिया… तेरी आंखें… रानी जैसी।”

    प्रिया ने लेटर दिखाया। कमला दाई ने गवाही दी। डीएनए रिपोर्ट आ गई – 99.9% मैच। प्रिया और आरव सगे भाई-बहन।

    पापा रो पड़े। “मैंने कुछ नहीं किया था। मुझे लगा एक्सीडेंट था।”

    लेकिन विक्रम चीखा, “ये सब झूठ है!”

    तभी पुलिस आई – असली वाली। राहुल ने स्टोरी लीक कर दी थी। न्यूज चैनल्स बाहर खड़े थे। “ठाकुर फैमिली का काला सच – बेटी को मारने की साजिश।”

    विक्रम भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़ा गया। चाची भी।

    प्रिया ने पापा को गले लगाया। “पापा… मैं वापस आ गई।”

    आरव मुस्कुराया। “अब हम तीनों साथ हैं। मम्मी की आत्मा को शांति मिलेगी।”

    शाम को ठाकुर हाउस में प्रिया पहली बार अपने कमरे में गई। वही पुराना कमरा। गुड़ियां अभी भी थीं। वो खिड़की से बाहर देखी – शिमला की पहाड़ियां।

    रिया ने कहा, “यार, अब तू अमीर हो गई। लेकिन मेरी दोस्त वही रहेगी ना?”

    प्रिया हंसी। “हमेशा।”

    रात को आरव और प्रिया छत पर बैठे। स्टार्स देख रहे थे।

    आरव ने कहा, “प्रिया… सॉरी कि मैंने तुझे पहचाना नहीं शुरू में।”

    प्रिया ने कहा, “तूने तो मुझे बचाया। अब हमारा नया सफर शुरू। कॉलेज, पढ़ाई, और फैमिली।”

    लेकिन दूर कहीं विक्रम पुलिस कस्टडी में था। उसकी आंखें जल रही थीं। “ये खत्म नहीं हुआ। प्रिया… मैं वापस आऊंगा।”

    बारिश रुक चुकी थी। नई सुबह होने वाली थी। प्रिया की जिंदगी अब अनाथ से राजकुमारी बन चुकी थी। लेकिन संघर्ष अभी बाकी था।

    क्या विक्रम बदला लेगा? या प्रिया नई जिंदगी जी पाएगी?

     

  • Dil sabhal ja jara part 4

    Dil sabhal ja jara part 4

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

    एपिसोड -bsach ka samna 

     

    सुबह की धुंद शिमला की पहाड़ियों पर छाई हुई थी। हॉस्टल का रूम 204 अब प्रिया के लिए सुरक्षित नहीं लग रहा था। रात का वो फोन कॉल – “ठाकुर फैमिली ने तुझे मरने के लिए छोड़ा था” – उसके कानों में गूंज रहा था। प्रिया बिस्तर पर बैठी थी, घुटने मुंह से लगाए, आंखें लाल। रिया उसके पास बैठी चाय का कप थमा रही थी।

    “प्रिया, अब और चुप नहीं रह सकतीं। हमें कुछ करना होगा। या तो पुलिस, या फिर… हम खुद सच ढूंढें।” रिया की आवाज में दृढ़ता थी।

    प्रिया ने गहरी सांस ली। “रिया, अगर मैं आरव की बहन हूं, तो वो मुझे क्यों नहीं पहचानता? और अगर फैमिली ने मुझे मरने के लिए छोड़ा, तो क्यों? मैं सिर्फ पांच साल की थी।”

    रिया ने कहा, “शायद प्रॉपर्टी का मामला। ठाकुर होटल्स बहुत बड़ा बिजनेस है। तू अगर असली वारिस हुई तो… कोई और नहीं चाहता होगा कि तू वापस आए।”

    प्रिया ने पेंडेंट को छुआ। “आज हम उस पुरानी हवेली के पास जाएंगे जहां एक्सीडेंट हुआ था। शायद कुछ क्लू मिले। लेकिन आरव को कुछ नहीं बताएंगे।”

    दोनों कॉलेज गईं, लेकिन प्रिया का मन क्लास में नहीं लगा। आरव ने कई बार मैसेज किया – “क्या हुआ? कल शाम से बात क्यों नहीं कर रही?” प्रिया ने सिर्फ “बिजी हूं” लिखकर टाल दिया। उसका दिल टूट रहा था। जिस लड़के से उसे लगाव हो रहा था, अगर वो उसका भाई है… या इससे भी बुरा, अगर उसकी फैमिली ने उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश की…

    लंच के बाद दोनों चुपके से कॉलेज से निकल गईं। शिमला की पुरानी सड़क पर बस पकड़ी। एक्सीडेंट वाली जगह माल रोड से थोड़ा ऊपर, जाखू हिल के पास थी। पुराना न्यूज आर्टिकल में एड्रेस था – “ठाकुर हवेली के पास घाटी रोड”।

    बस से उतरकर दोनों पैदल चलने लगीं। रास्ता सुनसान था। पुराने पेड़, टूटे-फूटे साइनबोर्ड। आखिरकार एक पुराना बोर्ड दिखा – “ठाकुर हवेली – Private Property. No Trespassing”।

    हवेली दूर से दिख रही थी – बड़ी, पुरानी, लेकिन अब खंडहर जैसी। दीवारें टूट रही थीं, बगीचा उजड़ा हुआ। गेट पर ताला लगा था। प्रिया ने गेट के पास वाली दीवार से झांका। अंदर वो बगीचा था – फोटो वाला। वही झूला, वही फूलों की क्यारियां, लेकिन अब सब सूखे। प्रिया की आंखें भर आईं। “रिया… ये वही जगह है। मैं यहां खेली थी।”

    रिया ने उसका हाथ थामा। “चल, अंदर चलते हैं।”

    दोनों दीवार फांदकर अंदर घुस गईं। हवेली का मुख्य दरवाजा बंद था, लेकिन साइड से एक छोटा गेट खुला था। अंदर धूल की मोटी परत, पुराने फर्नीचर पर चादरें। प्रिया हर कमरे में गई। एक कमरे में बच्चों का सामान बिखरा था – पुरानी गुड़ियां, किताबें। प्रिया ने एक गुड़िया उठाई। उस पर लिखा था – “प्रिया की गुड़िया”।

    उसका दिल जोरों से धड़का। “रिया… मैं यहीं की हूं।”

    तभी ऊपर से आवाज आई – खांसने की। दोनों चौंक गईं। सीढ़ियां चढ़ीं। ऊपर एक छोटे कमरे में एक बूढ़ी औरत बैठी थी – सफेद साड़ी, कमजोर शरीर। वो उन्हें देखकर बोली, “कौन हो तुम लोग? यहां कोई नहीं आता।”

    प्रिया ने कांपती आवाज में पूछा, “आंटी… आप यहां रहती हैं?”

    बूढ़ी औरत ने प्रिया को गौर से देखा। अचानक उसकी आंखें चौड़ी हो गईं। “तू… तू प्रिया है? रानी बहू की बेटी?”

    प्रिया की सांस रुक गई। “आप मुझे जानती हैं?”

    बूढ़ी औरत – नाम था कमला दाई – रोने लगी। “हाय राम… तू जिंदा है? सबने तो कहा था तू मर गई। मैं ही तो तुझे कार से निकालकर भागी थी उस रात।”

    रिया और प्रिया हैरान। प्रिया ने पूछा, “क्या हुआ था उस रात?”

    कमला दाई ने गहरी सांस ली और बताना शुरू किया।

    “बीस साल पहले की बात है। रानी बहू बहुत अच्छी थीं। बड़े साहब (आरव के पापा) से लव मैरिज की थी। लेकिन घर में सब नाराज थे क्योंकि रानी गरीब घर की थी। फिर तू पैदा हुई। सब खुश थे, लेकिन बड़े साहब की दूसरी पत्नी – मतलब तेरी सौतेली मां – वो नहीं चाहती थी कि तू वारिस बने। प्रॉपर्टी सब उसकी संतान को जाना था।

    एक रात रानी बहू तुझे लेकर कहीं जा रही थीं। किसी को शक था कि वो सब छोड़कर भागना चाहती थीं। कार को एक्सीडेंट दिखाया गया – ब्रेक फेल। मैं नौकरानी थी, पीछे-पीछे जा रही थी। एक्सीडेंट के बाद मैं दौड़ी। रानी बहू जा चुकी थीं, लेकिन तू कार में रो रही थी। मैंने तुझे निकाला और भाग गई। डर था कि अगर घर वाले पता चले तो तुझे भी मार देंगे। मैंने तुझे दूर हिमाचल के अनाथ आश्रम में छोड़ा। साथ में फोटो और पेंडेंट रखा, ताकि एक दिन तू सच जान सके।”

    प्रिया रो रही थी। “तो आरव मेरा सगा भाई है?”

    “हां बेटी। आरव तेरा बड़ा भाई है। वो तब दस साल का था। उसे कुछ नहीं पता। बड़े साहब ने सबको कहा कि तू मर गई।”

    रिया ने पूछा, “लेकिन अब वो कॉल और चिट्स?”

    कमला दाई ने डरते हुए कहा, “शायद तेरी सौतेली मां या उसका बेटा – विक्रम। वो नहीं चाहते कि तू वापस आए। प्रॉपर्टी का केस चल रहा है। अगर तू जिंदा निकली तो सब उनसे छिन जाएगा।”

    प्रिया का गुस्सा और दुख एक साथ फूट पड़ा। “मैंने बीस साल अनाथ रहकर गुजारे। और वो आराम से जी रहे हैं?”

    कमला दाई ने कहा, “बेटी, अब मत लड़ना। भाग जा यहां से। वो लोग ताकतवर हैं।”

    लेकिन प्रिया ने सिर हिलाया। “नहीं दाई। अब मैं चुप नहीं रहूंगी। मुझे अपना हक चाहिए। और आरव को सच बताना होगा।”

    दोनों हवेली से बाहर निकले। शाम हो चुकी थी। रास्ते में प्रिया चुप थी। रिया ने कहा, “अब क्या प्लान?”

    “कल आरव से मिलूंगी। उसे सब बताऊंगी।”

    रात को हॉस्टल में प्रिया ने डायरी में लिखा – “आज मुझे अपनी मां का नाम पता चला। अपना घर पता चला। लेकिन अब घर वापसी इतनी आसान नहीं।”

    तभी दरवाजा खटका। बाहर अवनी खड़ी थी। मुस्कुराते हुए बोली, “प्रिया, आरव तुझे ढूंढ रहा है। बाहर गेट पर इंतजार कर रहा है। कुछ इम्पॉर्टेंट बात है।”

    प्रिया चौंकी। इतनी रात को? लेकिन वो गई। गेट पर आरव खड़ा था, चिंतित चेहरा। “प्रिया, मुझे तुझसे बात करनी है। कल तू अचानक भागी क्यों?”

    प्रिया ने हिम्मत की। “आरव… मुझे कुछ बताना है। बहुत बड़ा सच।”

    आरव ने कहा, “पहले तू मेरी सुन। मुझे पता चला है कि तू हवेली गई थी आज। कमला दाई से मिली?”

    प्रिया का खून जम गया। “तुझे कैसे पता?”

    आरव की आंखें ठंडी हो गईं। “क्योंकि मैंने ही तुझे फॉलो करवाया था। प्रिया… तू मेरी बहन है। मुझे शक था शुरू से – तेरी आंखें, पेंडेंट। मैंने पापा से कन्फर्म किया।”

    प्रिया रो पड़ी। “तो तुझे पता था? फिर क्यों नहीं बताया?”

    आरव ने उसे गले लगा लिया। “क्योंकि डर था। पापा और चाची (सौतेली मां) नहीं चाहते कि तू वापस आए। वो लोग खतरनाक हैं। मैं तुझे बचाना चाहता हूं। आज रात ही यहां से भाग चल। मैं साथ हूं।”

    प्रिया पीछे हटी। “नहीं आरव। मैं भागूंगी नहीं। मुझे अपना हक चाहिए। मां की मौत का बदला चाहिए।”

    आरव ने कहा, “ठीक है। तो मैं तेरे साथ हूं। लेकिन पहले सबूत इकट्ठा करें। कमला दाई को साथ लाएं।”

    तभी अंधेरे से एक कार आई। तेज स्पीड में। सीधा प्रिया और आरव की ओर। आरव ने प्रिया को धक्का देकर बचाया। कार निकल गई। नंबर प्लेट पर लिखा था – ठाकुर हाउस।

    आरव चीखा, “विक्रम! वो मेरा सौतेला भाई है। अब जंग शुरू हो गई है।”

    प्रिया का चेहरा सख्त हो गया। “अब मैं लड़ूंगी। अपने भाई के साथ।”

    रात गहरा गई। बारिश फिर शुरू हो गई। प्रिया की जिंदगी में अब प्यार नहीं, सिर्फ संघर्ष था। लेकिन अब वो अकेली नहीं थी – उसके साथ उसका सगा भाई था।

    क्या प्रिया और आरव फैमिली के खिलाफ जीत पाएंगे? या खतरा और बड़ा हो जाएगा?

     

     

    सुबह की धुंद शिमला की पहाड़ियों पर छाई हुई थी। हॉस्टल का रूम 204 अब प्रिया के लिए सुरक्षित नहीं लग रहा था। रात का वो फोन कॉल – “ठाकुर फैमिली ने तुझे मरने के लिए छोड़ा था” – उसके कानों में गूंज रहा था। प्रिया बिस्तर पर बैठी थी, घुटने मुंह से लगाए, आंखें लाल। रिया उसके पास बैठी चाय का कप थमा रही थी।

    “प्रिया, अब और चुप नहीं रह सकतीं। हमें कुछ करना होगा। या तो पुलिस, या फिर… हम खुद सच ढूंढें।” रिया की आवाज में दृढ़ता थी।

    प्रिया ने गहरी सांस ली। “रिया, अगर मैं आरव की बहन हूं, तो वो मुझे क्यों नहीं पहचानता? और अगर फैमिली ने मुझे मरने के लिए छोड़ा, तो क्यों? मैं सिर्फ पांच साल की थी।”

    रिया ने कहा, “शायद प्रॉपर्टी का मामला। ठाकुर होटल्स बहुत बड़ा बिजनेस है। तू अगर असली वारिस हुई तो… कोई और नहीं चाहता होगा कि तू वापस आए।”

    प्रिया ने पेंडेंट को छुआ। “आज हम उस पुरानी हवेली के पास जाएंगे जहां एक्सीडेंट हुआ था। शायद कुछ क्लू मिले। लेकिन आरव को कुछ नहीं बताएंगे।”

    दोनों कॉलेज गईं, लेकिन प्रिया का मन क्लास में नहीं लगा। आरव ने कई बार मैसेज किया – “क्या हुआ? कल शाम से बात क्यों नहीं कर रही?” प्रिया ने सिर्फ “बिजी हूं” लिखकर टाल दिया। उसका दिल टूट रहा था। जिस लड़के से उसे लगाव हो रहा था, अगर वो उसका भाई है… या इससे भी बुरा, अगर उसकी फैमिली ने उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश की…

    लंच के बाद दोनों चुपके से कॉलेज से निकल गईं। शिमला की पुरानी सड़क पर बस पकड़ी। एक्सीडेंट वाली जगह माल रोड से थोड़ा ऊपर, जाखू हिल के पास थी। पुराना न्यूज आर्टिकल में एड्रेस था – “ठाकुर हवेली के पास घाटी रोड”।

    बस से उतरकर दोनों पैदल चलने लगीं। रास्ता सुनसान था। पुराने पेड़, टूटे-फूटे साइनबोर्ड। आखिरकार एक पुराना बोर्ड दिखा – “ठाकुर हवेली – Private Property. No Trespassing”।

    हवेली दूर से दिख रही थी – बड़ी, पुरानी, लेकिन अब खंडहर जैसी। दीवारें टूट रही थीं, बगीचा उजड़ा हुआ। गेट पर ताला लगा था। प्रिया ने गेट के पास वाली दीवार से झांका। अंदर वो बगीचा था – फोटो वाला। वही झूला, वही फूलों की क्यारियां, लेकिन अब सब सूखे। प्रिया की आंखें भर आईं। “रिया… ये वही जगह है। मैं यहां खेली थी।”

    रिया ने उसका हाथ थामा। “चल, अंदर चलते हैं।”

    दोनों दीवार फांदकर अंदर घुस गईं। हवेली का मुख्य दरवाजा बंद था, लेकिन साइड से एक छोटा गेट खुला था। अंदर धूल की मोटी परत, पुराने फर्नीचर पर चादरें। प्रिया हर कमरे में गई। एक कमरे में बच्चों का सामान बिखरा था – पुरानी गुड़ियां, किताबें। प्रिया ने एक गुड़िया उठाई। उस पर लिखा था – “प्रिया की गुड़िया”।

    उसका दिल जोरों से धड़का। “रिया… मैं यहीं की हूं।”

    तभी ऊपर से आवाज आई – खांसने की। दोनों चौंक गईं। सीढ़ियां चढ़ीं। ऊपर एक छोटे कमरे में एक बूढ़ी औरत बैठी थी – सफेद साड़ी, कमजोर शरीर। वो उन्हें देखकर बोली, “कौन हो तुम लोग? यहां कोई नहीं आता।”

    प्रिया ने कांपती आवाज में पूछा, “आंटी… आप यहां रहती हैं?”

    बूढ़ी औरत ने प्रिया को गौर से देखा। अचानक उसकी आंखें चौड़ी हो गईं। “तू… तू प्रिया है? रानी बहू की बेटी?”

    प्रिया की सांस रुक गई। “आप मुझे जानती हैं?”

    बूढ़ी औरत – नाम था कमला दाई – रोने लगी। “हाय राम… तू जिंदा है? सबने तो कहा था तू मर गई। मैं ही तो तुझे कार से निकालकर भागी थी उस रात।”

    रिया और प्रिया हैरान। प्रिया ने पूछा, “क्या हुआ था उस रात?”

    कमला दाई ने गहरी सांस ली और बताना शुरू किया।

    “बीस साल पहले की बात है। रानी बहू बहुत अच्छी थीं। बड़े साहब (आरव के पापा) से लव मैरिज की थी। लेकिन घर में सब नाराज थे क्योंकि रानी गरीब घर की थी। फिर तू पैदा हुई। सब खुश थे, लेकिन बड़े साहब की दूसरी पत्नी – मतलब तेरी सौतेली मां – वो नहीं चाहती थी कि तू वारिस बने। प्रॉपर्टी सब उसकी संतान को जाना था।

    एक रात रानी बहू तुझे लेकर कहीं जा रही थीं। किसी को शक था कि वो सब छोड़कर भागना चाहती थीं। कार को एक्सीडेंट दिखाया गया – ब्रेक फेल। मैं नौकरानी थी, पीछे-पीछे जा रही थी। एक्सीडेंट के बाद मैं दौड़ी। रानी बहू जा चुकी थीं, लेकिन तू कार में रो रही थी। मैंने तुझे निकाला और भाग गई। डर था कि अगर घर वाले पता चले तो तुझे भी मार देंगे। मैंने तुझे दूर हिमाचल के अनाथ आश्रम में छोड़ा। साथ में फोटो और पेंडेंट रखा, ताकि एक दिन तू सच जान सके।”

    प्रिया रो रही थी। “तो आरव मेरा सगा भाई है?”

    “हां बेटी। आरव तेरा बड़ा भाई है। वो तब दस साल का था। उसे कुछ नहीं पता। बड़े साहब ने सबको कहा कि तू मर गई।”

    रिया ने पूछा, “लेकिन अब वो कॉल और चिट्स?”

    कमला दाई ने डरते हुए कहा, “शायद तेरी सौतेली मां या उसका बेटा – विक्रम। वो नहीं चाहते कि तू वापस आए। प्रॉपर्टी का केस चल रहा है। अगर तू जिंदा निकली तो सब उनसे छिन जाएगा।”

    प्रिया का गुस्सा और दुख एक साथ फूट पड़ा। “मैंने बीस साल अनाथ रहकर गुजारे। और वो आराम से जी रहे हैं?”

    कमला दाई ने कहा, “बेटी, अब मत लड़ना। भाग जा यहां से। वो लोग ताकतवर हैं।”

    लेकिन प्रिया ने सिर हिलाया। “नहीं दाई। अब मैं चुप नहीं रहूंगी। मुझे अपना हक चाहिए। और आरव को सच बताना होगा।”

    दोनों हवेली से बाहर निकले। शाम हो चुकी थी। रास्ते में प्रिया चुप थी। रिया ने कहा, “अब क्या प्लान?”

    “कल आरव से मिलूंगी। उसे सब बताऊंगी।”

    रात को हॉस्टल में प्रिया ने डायरी में लिखा – “आज मुझे अपनी मां का नाम पता चला। अपना घर पता चला। लेकिन अब घर वापसी इतनी आसान नहीं।”

    तभी दरवाजा खटका। बाहर अवनी खड़ी थी। मुस्कुराते हुए बोली, “प्रिया, आरव तुझे ढूंढ रहा है। बाहर गेट पर इंतजार कर रहा है। कुछ इम्पॉर्टेंट बात है।”

    प्रिया चौंकी। इतनी रात को? लेकिन वो गई। गेट पर आरव खड़ा था, चिंतित चेहरा। “प्रिया, मुझे तुझसे बात करनी है। कल तू अचानक भागी क्यों?”

    प्रिया ने हिम्मत की। “आरव… मुझे कुछ बताना है। बहुत बड़ा सच।”

    आरव ने कहा, “पहले तू मेरी सुन। मुझे पता चला है कि तू हवेली गई थी आज। कमला दाई से मिली?”

    प्रिया का खून जम गया। “तुझे कैसे पता?”

    आरव की आंखें ठंडी हो गईं। “क्योंकि मैंने ही तुझे फॉलो करवाया था। प्रिया… तू मेरी बहन है। मुझे शक था शुरू से – तेरी आंखें, पेंडेंट। मैंने पापा से कन्फर्म किया।”

    प्रिया रो पड़ी। “तो तुझे पता था? फिर क्यों नहीं बताया?”

    आरव ने उसे गले लगा लिया। “क्योंकि डर था। पापा और चाची (सौतेली मां) नहीं चाहते कि तू वापस आए। वो लोग खतरनाक हैं। मैं तुझे बचाना चाहता हूं। आज रात ही यहां से भाग चल। मैं साथ हूं।”

    प्रिया पीछे हटी। “नहीं आरव। मैं भागूंगी नहीं। मुझे अपना हक चाहिए। मां की मौत का बदला चाहिए।”

    आरव ने कहा, “ठीक है। तो मैं तेरे साथ हूं। लेकिन पहले सबूत इकट्ठा करें। कमला दाई को साथ लाएं।”

    तभी अंधेरे से एक कार आई। तेज स्पीड में। सीधा प्रिया और आरव की ओर। आरव ने प्रिया को धक्का देकर बचाया। कार निकल गई। नंबर प्लेट पर लिखा था – ठाकुर हाउस।

    आरव चीखा, “विक्रम! वो मेरा सौतेला भाई है। अब जंग शुरू हो गई है।”

    प्रिया का चेहरा सख्त हो गया। “अब मैं लड़ूंगी। अपने भाई के साथ।”

    रात गहरा गई। बारिश फिर शुरू हो गई। प्रिया की जिंदगी में अब प्यार नहीं, सिर्फ संघर्ष था। लेकिन अब वो अकेली नहीं थी – उसके साथ उसका सगा भाई था।

    क्या प्रिया और आरव फैमिली के खिलाफ जीत पाएंगे? या खतरा और बड़ा हो जाएगा?

     

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 1

     

    राधे राधे दोस्तों ❤️

     

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

     

     

    दिल्ली, इंडिया

     

    रात के बारह बजे। सर्दियों की वो काली रात बारिश में पूरी तरह डूबी हुई थी। आसमान पर काले बादल छाए थे और तेज बारिश के साथ हल्का-हल्का कोहरा सड़क को अपने आगोश में लिए हुए था।

     

    मौसम ऐसा था कि कोई भी समझदार इंसान अपने घर से बाहर निकलने के बारे में सोचता तक नहीं।

     

    लेकिन… उस सुनसान सड़क के बीचों-बीच एक लड़की चली जा रही थी।

     

    सड़क ज्यादा चौड़ी नहीं थी। दोनों तरफ घना जंगल था, जिसके ऊंचे-ऊंचे पेड़ तेज हवा के साथ झूम रहे थे। बारिश की तेज आवाज़ और हवा की सनसनाहट के अलावा वहां दूर-दूर तक किसी इंसान के होने का कोई निशान नहीं था।

     

    लेकिन उस लड़की को शायद इन चीजों से कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। वो लगातार चलती जा रही थी।

     

    ना उसे बारिश की परवाह थी… ना ठंड की… और ना ही इस सुनसान रास्ते की।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी जिंदगी से ही हार चुकी हो। शायद वो रो भी रही थी। लेकिन बारिश की तेज बूंदें उसके आंसुओं को अपने साथ बहा ले जा रही थीं। करीब से देखने पर उसके चेहरे पर हल्के-हल्के चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

     

    उसने चटक लाल रंग का सूट पहन रखा था। वो बिल्कुल किसी नई-नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी। लेकिन उसके कपड़े बारिश में पूरी तरह भीग चुके थे।

     

    उसकी कलाइयों में लाल चूड़ियां थीं, जिनमें से कुछ टूट चुकी थीं। हाथों पर लगी मेहंदी बारिश में फीकी पड़ चुकी थी। मांग में लगा सिंदूर लगभग धुल चुका था, लेकिन उसकी हल्की-सी लालिमा अब भी बाकी थी।

     

    और गले में… एक मंगलसूत्र था, वो लड़की बेहद खूबसूरत थी। लेकिन उस खूबसूरत चेहरे पर इस वक्त सिर्फ दर्द था। बहुत गहरा दर्द, आखिर कौन थी वो?

     

    और इतनी रात को इस सुनसान जंगल वाली सड़क पर अकेली क्यों चल रही थी?

     

    तभी… दूर से आती एक गाड़ी की हेडलाइट ने उसकी आंखों पर तेज रोशनी डाली।

     

    लड़की ने पलटकर भी नहीं देखा। गाड़ी लगातार उसकी तरफ बढ़ती चली आ रही थी।

     

    पों… पों…! ड्राइवर ने जोर-जोर से हॉर्न बजाया।

     

    लेकिन लड़की अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। सड़क इतनी संकरी थी कि गाड़ी को दूसरी तरफ से निकालने की कोई गुंजाइश भी नहीं थी।

     

    ड्राइवर ने आखिरी वक्त पर पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिए।

     

    चीईईईईईई…!

     

    टायरों की तेज आवाज के साथ गाड़ी लड़की से कुछ ही इंच की दूरी पर जाकर रुकी। गाड़ी के अंदर अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    ड्राइवर ने घबराकर पीछे की सीट की तरफ देखा।

     

    वहां बैठा आदमी पहले से ही उसे घूर रहा था। उसकी आंखों में साफ गुस्सा था।

     

    ड्राइवर सहम गया। “साहब… मेरी कोई गलती नहीं है। सामने अचानक एक लड़की रोड के बीचों-बीच खड़ी हो गई थी। अगर मैं ब्रेक नहीं लगाता तो…”

     

    वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया। पीछे बैठा आदमी झुंझलाकर बोला, “साला… सबको मरने के लिए मेरी कार के सामने ही आना होता है।”

     

    उसने गुस्से में अपनी घड़ी की तरफ देखा और फिर सामने खड़ी लड़की को। “अगर कुछ हो जाता ना, तो कल सुबह हर न्यूज़ चैनल पर एक ही खबर चलती…”

    उसके होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आई। “रूद्रांश शेखावत की गाड़ी से लड़की की मौत।”

     

    ड्राइवर ने कुछ नहीं कहा। वह सामने खड़ी लड़की को देखने लगा। हेडलाइट की तेज रोशनी में अब उसका चेहरा साफ नजर आ रहा था।

     

    बारिश लगातार हो रही थी। लेकिन उसकी आंखों में उमड़ रहा दर्द शायद इस बारिश से भी ज्यादा गहरा था।

     

    रूद्रांश ने आखिरकार गुस्से में गाड़ी का दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। बारिश की ठंडी बूंदें कुछ ही सेकंड में उसके बालों और कपड़ों को भिगोने लगीं।

     

    उसने इसकी परवाह नहीं की। महंगे जूते कीचड़ में धंस गए, लेकिन उसकी नजरें सामने खड़ी लड़की पर टिकी थीं।

     

    वह उसके पास जाकर रुक गया। “मरना है तो किसी और जगह जाकर मरो।”

    उसकी आवाज में गुस्सा था। “मेरी गाड़ी के सामने नहीं।”

     

    लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया। उसकी आंखें बुरी तरह सूजी हुई थीं, होंठ कांप रहे थे। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    रूद्रांश ने गौर से उसे देखा। उसके चेहरे पर हल्की चोटों के निशान थे।

     

    भीगे बाल उसके चेहरे से चिपके हुए थे। पलकों पर बारिश की बूंदें ठहरी हुई थीं।

    और उसकी आंखें… जैसे बिल्कुल खाली थीं।

     

    मानो उन आंखों में रोने के लिए भी अब कुछ बाकी नहीं बचा था। रूद्रांश का गुस्सा कुछ कम हुआ।

     

    उसने दोबारा पूछा, “कौन हो तुम?”

    कोई जवाब नहीं। “इस वक्त यहां क्या कर रही हो?”

     

    लड़की ने धीरे से अपनी गर्दन दूसरी तरफ घुमा ली रूद्रांश ने गहरी सांस ली। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस लड़की के साथ ऐसा क्या हुआ है।

     

    उसने अपना हाथ उसके कंधे पर रखने की कोशिश की।

    “देखो… अगर तुम्हें कोई परेशानी है, तो”

     

    लड़की ने अचानक उसका हाथ झटक दिया।

    वह एक कदम पीछे हट गई। “मुझे छोड़ दो…”

     

    उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि बारिश के शोर में लगभग खो गई। रूद्रांश ने उसकी तरफ देखा।

    लड़की ने कांपती आवाज में दोबारा कहा, “मुझे कहीं नहीं जाना…”

     

    उस एक वाक्य में इतना दर्द था कि कुछ पल के लिए रूद्रांश भी चुप रह गया। उसने लड़की को गौर से देखा।

    लाल दुल्हन का जोड़ा… टूटी हुई चूड़ियां… धुला हुआ सिंदूर… मंगलसूत्र… और चेहरे पर चोटों के निशान।

     

    ये कोई सामान्य मामला नहीं था। रूद्रांश ने आसपास नजर दौड़ाई। चारों तरफ घना जंगल था। इतनी रात को इस सुनसान सड़क पर ये लड़की अकेली थी।

    और शायद किसी बड़ी मुसीबत से भागकर यहां तक पहुंची थी। “तुम्हें जाना तो पड़ेगा।”

     

    इस बार रूद्रांश की आवाज पहले से थोड़ी नरम थी। “लेकिन उससे पहले मुझे ये बताओ कि हुआ क्या है?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में अचानक डर उभर आया। उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले…

     

    लेकिन आवाज नहीं निकली। अगले ही पल उसका शरीर लड़खड़ाया। “अरे…”

     

    रूद्रांश ने झटके से उसे संभाल लिया। लड़की बेहोश हो चुकी थी। “अब ये और बचा था!”

     

    रूद्रांश ने झुंझलाकर कहा, लेकिन उसके हाथों की पकड़ लड़की को संभालने में बेहद सावधान थी।

     

    उसने एक नजर उसके चेहरे पर डाली। इतनी खूबसूरत लड़की… और इस हालत में। उसके चेहरे पर चोटों के निशान देखकर रूद्रांश की भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर किसने इसके साथ ऐसा किया होगा। लेकिन यहां खड़े रहना ठीक नहीं था। उसने लड़की को अपनी बाहों में उठाया और गाड़ी की तरफ बढ़ गया। ड्राइवर तुरंत नीचे उतरा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।

     

    रूद्रांश ने लड़की को पिछली सीट पर आराम से लिटाया और खुद उसके पास बैठ गया। “गाड़ी स्टार्ट करो।”

     

    “जी, साहब।” ड्राइवर ने तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा दी।

    गाड़ी की रफ्तार बढ़ते ही बाहर की बारिश और जंगल पीछे छूटने लगे।

     

    लेकिन रूद्रांश के दिमाग में सवालों का तूफान शुरू हो चुका था। ये लड़की कौन थी? इसके साथ आखिर हुआ क्या था? और वो इस हालत में अकेली वहां क्यों घूम रही थी?

     

    उसकी नजर बार-बार लड़की पर जा रही थी। उसके भीगे बाल चेहरे पर चिपके हुए थे। कलाई पर टूटी हुई लाल चूड़ियों के कुछ टुकड़े अब भी मौजूद थे।

     

    रूद्रांश ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा और फिर नजरें सामने कर लीं। उसे खुद नहीं पता था कि वह इस अनजान लड़की की मदद क्यों कर रहा था।

     

    लेकिन एक बात तय थी… आज रात उसकी जिंदगी में कुछ

    ऐसा आने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

     

    कहानी आगे जारी रहेगी। 

    प्लीज आप सब अपना साथ बनाएं रखें।

  • Dil sabhal ja jara part – 3

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    Part – 3 chhupa huaa raj 

     

    सुबह की पहली किरण हॉस्टल की खिड़की से अंदर आई और प्रिया की आंखों पर पड़ी। वो रात भर सो नहीं पाई थी। वो लिफाफा… वो चिट… “तेरी मां का नाम रानी था। वो शिमला में ही मरी। मत ढूंढना, खतरा है।” ये शब्द उसके दिमाग में चक्कर काट रहे थे। उसने चिट को कई बार पढ़ा, फिर उसे डायरी के बीच में छिपा दिया। हाथ कांप रहे थे। 

     

    रिया अभी भी सो रही थी। प्रिया चुपके से उठी, चेहरा धोया और तैयार हुई। आज कॉलेज का दूसरा दिन था। लेकिन उसका मन क्लास में नहीं, उस चिट में था। मां का नाम रानी? पहली बार उसे अपनी मां का नाम पता चला। लेकिन कैसे? कौन रख गया वो लिफाफा उसके बैग में? हॉस्टल में कोई अंदर आया था? या पार्टी के दौरान? 

     

    कैंटीन में नाश्ता करते हुए प्रिया ने रिया को बताया। रिया की आंखें चौड़ी हो गईं। “क्या? यार ये तो सीरियस है! कोई तुझे जानबूझकर डरा रहा है। पुलिस को बताएं?”

     

    “नहीं रिया,” प्रिया ने धीरे से कहा। “पहले खुद समझना चाहती हूं। अगर पुलिस में गई तो शायद आश्रम वाले को पता चल जाए। सुलेखा आंटी चिंता करेंगी।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “ठीक है। लेकिन अकेले मत करना कुछ। मैं साथ हूं। आज शाम को लाइब्रेरी चलेंगे। शिमला के पुराने न्यूज पेपर्स देखेंगे। शायद कुछ मिल जाए ‘रानी’ नाम की औरत के बारे में।”

     

    प्रिया ने थैंक्स कहा। लेकिन अंदर से डर लग रहा था। 

     

    क्लास शुरू हुई। इंग्लिश लिटरेचर। प्रोफेसर शेकスピयर की ‘रोमियो एंड जूलियट’ पढ़ा रही थीं। प्रिया की सीट खिड़की के पास थी। वो बाहर देख रही थी – पहाड़, कोहरा। तभी उसे लगा कोई उसे देख रहा है। उसने पलटा। आरव दो बेंच पीछे बैठा मुस्कुरा रहा था। उसने एक नोट फेंका – “लंच टुगेदर?”

     

    प्रिया ने मुस्कुरा कर हां में सिर हिलाया। उसका दिल थोड़ा हल्का हुआ। आरव की मौजूदगी में उसे सुकून मिलता था। 

     

    लंच ब्रेक में रिया, आरव और उनका ग्रुप साथ बैठा। आरव ने प्रिया के लिए प्लेट में एक्स्ट्रा सैंडविच रखा। “खा ना, दुबली हो जाएगी वरना।”

     

    रिया हंस पड़ी। “आरव भाई, इतना केयर? कुछ तो गड़बड़ है।”

     

    आरव ने शरमाते हुए कहा, “बस दोस्ती। प्रिया नई है ना।”

     

    लेकिन प्रिया की नजर अवनी पर पड़ी। अवनी दूसरे टेबल से उन्हें घूर रही थी। उसकी आंखों में जलन साफ दिख रही थी। प्रिया ने नजरें झुका लीं। 

     

    लंच के बाद आरव ने प्रिया को साइड में लिया। “कल पार्टी में सॉरी। अवनी वैसी है – अमीर घर की बिगड़ी हुई। लेकिन तू मत लेना दिल पर। मैं हूं ना।”

     

    प्रिया ने पहली बार खुलकर बात की। “आरव, मुझे अच्छा लगता है जब तू बात करता है। घर जैसा फील होता है।”

     

    आरव की आंखें चमक उठीं। “सच? तो आज शाम कॉलेज के पीछे वाली हिल पर चलेंगी? सनसेट देखने। सिर्फ हम दोनों।”

     

    प्रिया हिचकिचाई। लेकिन फिर हां कह दिया। 

     

    दोपहर की क्लास के बाद प्रिया और रिया लाइब्रेरी गईं। पुरानी लाइब्रेरी थी – ऊंची अलमारियां, धूल भरी किताबें। लाइब्रेरियन अंकल ने कहा, “पुराने न्यूजपेपर्स माइक्रोफिल्म में हैं। कंप्यूटर पर देख लो।”

     

    दोनों कंप्यूटर पर बैठ गए। प्रिया ने सर्च किया – “शिमला एक्सीडेंट रानी”। कुछ पुराने आर्टिकल मिले। एक २० साल पुराना हेडलाइन – “शिमला के मशहूर ठाकुर फैमिली की बहू रानी ठाकुर की कार एक्सीडेंट में मौत। बच्ची लापता।”

     

    प्रिया का दिल बैठ गया। ठाकुर फैमिली? आरव का सरनेम भी ठाकुर था। क्या कनेक्शन?

     

    आर्टिकल में लिखा था – “रानी ठाकुर, ठाकुर होटल्स की मालकिन, देर रात कार एक्सीडेंट में मरीं। उनकी पांच साल की बेटी प्रिया कार में थी, लेकिन एक्सीडेंट के बाद लापता हो गई। पुलिस को शक है कि कोई अपहरण भी हो सकता है।”

     

    प्रिया की उंगलियां ठंडी पड़ गईं। प्रिया… पांच साल की… लापता। क्या वो वही प्रिया है? और ठाकुर फैमिली – आरव की फैमिली?

     

    रिया ने उसका हाथ थामा। “प्रिया… ये… तू ही तो है ना?”

     

    प्रिया की आंखों से आंसू छलक पड़े। “रिया… अगर ये सच है तो मैं… मैं अमीर घर की हूं? फिर मुझे अनाथ आश्रम में क्यों छोड़ा गया?”

     

    रिया ने कहा, “शायद कोई साजिश। लेकिन आरव को पता है क्या?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। आज शाम उससे मिलने जा रही हूं। पूछूंगी?”

     

    “नहीं!” रिया ने डरते हुए कहा। “अगर फैमिली ने ही तुझे छोड़ा है तो खतरा हो सकता है। वो अनजान कॉल, वो चिट – सब कनेक्टेड लग रहा है।”

     

    प्रिया चुप हो गई। उसका दिमाग घूम रहा था। 

     

    शाम हुई। सनसेट का टाइम। प्रिया कॉलेज के पीछे वाली हिल पर पहुंची। आरव पहले से वहां था – हाथ में दो कॉफी कप। “हाय! ठंड है ना, कॉफी पी।”

     

    दोनों एक बड़े पत्थर पर बैठ गए। सूरज डूब रहा था – लाल-नारंगी रंग पहाड़ियों पर बिखर रहा था। आरव ने कहा, “प्रिया, मुझे तुझसे बात करके अच्छा लगता है। तू अलग है। बाकी लड़कियां सिर्फ शॉपिंग, पार्टी की बात करती हैं। तू… सपनों की बात करती है।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की। फिर हिम्मत करके पूछा, “आरव… तेरी फैमिली में कोई रानी नाम की थी?”

     

    आरव अचानक चुप हो गया। उसका चेहरा बदल गया। “रानी? वो… मेरी मम्मी का नाम था। दो साल पहले नहीं… बीस साल पहले एक्सीडेंट में गुजर गईं। क्यों पूछ रही है?”

     

    प्रिया का दिल जोरों से धड़का। “बस ऐसे ही। सुना था कहीं।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली। “हां… मम्मी की मौत के बाद फैमिली बिखर गई। पापा ने दूसरी शादी कर ली। और एक छोटी बहन थी… प्रिया। वो भी एक्सीडेंट में लापता हो गई। कभी नहीं मिली।”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। वो उठ खड़ी हुई। “आरव… मैं… मुझे जाना है।”

     

    “क्या हुआ?” आरव ने उसका हाथ पकड़ा। “प्रिया, तू ठीक तो है?”

     

    प्रिया ने हाथ छुड़ाया और भागी। हॉस्टल की ओर। आंसू नहीं रुक रहे थे। अगर आरव की लापता बहन प्रिया है, तो वो खुद आरव की… बहन? नहीं, वो नहीं हो सकता। लेकिन नाम, उम्र, शिमला – सब मैच कर रहा था।

     

    हॉस्टल पहुंचते ही वो रिया के पास गई। सारी बात बताई। रिया हैरान। “यार ये तो बड़ा ट्विस्ट है! तू आरव की बहन हो सकती है?”

     

    “नहीं रिया,” प्रिया रोते हुए बोली। “अगर मैं उसकी बहन हूं तो मुझे क्यों छोड़ा गया? और वो पेंडेंट… वो फोटो… सब ठाकुर हवेली जैसा लगता है।”

     

    रिया ने कहा, “कल हम उस पुरानी हवेली के पास जाएंगे। जहां एक्सीडेंट हुआ था। शायद कुछ क्लू मिले।”

     

    रात को प्रिया सो नहीं पाई। उसने पेंडेंट को छुआ। “मां… अगर तू रानी ठाकुर थी, तो मुझे क्यों छोड़ा?”

     

    तभी उसका फोन बजा। वही अनजान नंबर। प्रिया ने रिसीव किया।

     

    “प्रिया… तू बहुत करीब पहुंच गई है। आरव से दूर रह। वो तेरा भाई है। लेकिन सच जानने की कोशिश मत करना। ठाकुर फैमिली ने तुझे मरने के लिए छोड़ा था। अगली बार तेरी बारी होगी।”

     

    फोन कट गया। प्रिया चीख पड़ी। रिया उठी। “क्या हुआ?”

     

    प्रिया रोते हुए बोली, “रिया… कोई मुझे मारना चाहता है।”

     

    बाहर बारिश शुरू हो गई थी। हवा जोरों से चल रही थी। प्रिया की जिंदगी में प्यार की शुरुआत हुई थी, लेकिन अब मौत का साया मंडरा रहा था। आरव भाई है? या कुछ और?

     और ठाकुर फैमिली का राज़ क्या है?

     

    अगली सुबह क्या होगा? प्रिया सच ढूंढेगी या भाग जाएगी?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    Part – 2 pahli mulakat 

    शिमला की ठंडी हवा बस की खिड़की से अंदर आ रही थी। प्रिया ने अपनी पतली शॉल कसकर लपेटी और फोन को जेब में डाल दिया। वो अनजान कॉल अभी भी उसके दिमाग में गूंज रही थी – “कॉलेज मत जाना… वरना…”। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसने चारों तरफ देखा। बस में ज्यादातर लोकल लोग थे – कुछ पर्यटक, कुछ स्टूडेंट्स। कोई उसे घूर नहीं रहा था, लेकिन प्रिया को लगा जैसे कोई उसे देख रहा हो।

    बस आखिरकार शिमला बस स्टैंड पर रुकी। प्रिया उतरी। बाहर ठंड थी, लेकिन धूप निकली हुई थी। पहाड़ियों पर बर्फ की चमक दूर से दिख रही थी। शहर व्यस्त था – रिक्शा, टैक्सी, दुकानें। प्रिया ने अपना छोटा बैग कंधे पर टिकाया और कॉलेज की ओर चल पड़ी। कॉलेज बस स्टैंड से करीब दो किलोमीटर दूर था। उसने पैदल ही जाना ठाना – पैसे बचाने थे।

    रास्ते में वो बार-बार फोटो वाली डायरी छूती रही। पेंडेंट गले में झूल रहा था। “शिमला… क्या यहीं कहीं मेरा अतीत छिपा है?” उसने मन ही मन सोचा। लेकिन वो अनजान कॉल उसे चैन नहीं लेने दे रहा था।

    कॉलेज गेट पर पहुंचते ही प्रिया रुक गई। बड़ा सा लोहे का गेट, ऊपर लिखा था – “Shimla Women’s College – Established 1950″। अंदर हरे-भरे लॉन, पुरानी ब्रिटिश स्टाइल की इमारतें, और लड़कियां हंसती-बोलती घूम रही थीं। ज्यादातर लड़कियां ब्रांडेड कपड़ों में थीं – जींस, जैकेट्स, महंगे बैग। प्रिया ने अपनी सादी नीली सलवार-कमीज देखी और अचानक खुद को बहुत छोटा महसूस किया।

    एडमिशन ऑफिस में लाइन लगी थी। प्रिया ने अपना लेटर दिखाया। स्टाफ की मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा, “प्रिया शर्मा? स्कॉलरशिप वाली? वेलकम डियर। तुम्हारा हॉस्टल रूम 204 है। दूसरी मंजिल। सामान रखो और फिर प्रिंसिपल मैम से मिलना।”

    प्रिया ने थैंक यू कहा और हॉस्टल की ओर बढ़ी। हॉस्टल बिल्डिंग कॉलेज के पीछे थी – तीन मंजिला, पुरानी लेकिन साफ-सुथरी। सीढ़ियां चढ़ते वक्त उसके पैर भारी लग रहे थे। रूम 204 के दरवाजे पर उसने दस्तक दी।

    “आ जा!” अंदर से चुलबुली आवाज आई।

    प्रिया ने दरवाजा खोला। रूम छोटा लेकिन आरामदायक था – दो बेड, दो अलमारियां, एक टेबल, और खिड़की से पहाड़ दिख रहे थे। एक बेड पर एक लड़की बैठी थी – बालों में हाईलाइट्स, लिपस्टिक लगाए, मोबाइल पर स्क्रॉल कर रही। वो देखते ही उठी और बोली, “हाय! तू नई रूममेट है? मैं रिया मेहता। मुंबई से। और तू?”

    “प्रिया… प्रिया शर्मा।” प्रिया ने शर्माते हुए कहा और बैग नीचे रखा।

    रिया ने उसे ऊपर से नीचे देखा और फिर मुस्कुराई। “क्यूट लग रही है यार! सादगी का स्टाइल। चल, सामान रख और चाय पीते हैं। कैंटीन चलेंगी?”

    प्रिया ने हां कहा। रिया बहुत बातूनी थी। रास्ते में बताती गई – “ये कॉलेज टॉप है। अमीर लड़कियां ज्यादा हैं। लेकिन पार्टीज कमाल की होती हैं। तू क्या कोर्स कर रही है? बीए?”

    “हां… इंग्लिश ऑनर्स।” प्रिया ने धीरे से कहा।

    कैंटीन में पहुंचते ही प्रिया को लगा जैसे अलग दुनिया में आ गई हो। बड़ी-बड़ी टेबल्स, कॉफी मशीन, पिज्जा-बर्गर के मेन्यू। रिया ने दो चाय और समोसे ऑर्डर किए। बैठते हुए बोली, “बता ना, तू कहां से है? फैमिली? बॉयफ्रेंड?”

    प्रिया हिचकिचाई। फिर बोली, “हिमाचल के छोटे कस्बे से। अनाथ आश्रम में पली हूं। फैमिली… कोई नहीं।”

    रिया चुप हो गई। फिर प्रिया का हाथ थामा और बोली, “सॉरी यार। मैं बेवकूफ हूं। लेकिन तू स्ट्रॉन्ग है। यहां सबके पास्ट होते हैं। मैं भी… पापा-मम्मी अलग हो गए हैं। लेकिन हम फ्यूचर बनाएंगे ना?”

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। पहली बार किसी ने उसे जज नहीं किया। दोनों चाय पीते रहे। रिया ने कॉलेज की गॉसिप बताई – कौन सी लड़की किससे डेट कर रही, कौन सी टीचर स्ट्रिक्ट है।

    फिर क्लास का टाइम हुआ। पहली क्लास इंग्लिश की थी। हॉल बड़ा था, करीब सौ लड़कियां। प्रोफेसर ने कहा, “न्यू सेशन, न्यू स्टूडेंट्स। सब अपना इंट्रोडक्शन दें।”

    प्रिया की बारी आई। वो उठी, आवाज कांपी – “मेरा नाम प्रिया शर्मा है। मैं हिमाचल से हूं। स्कॉलरशिप पर आई हूं।”

    सब शांत। कुछ लड़कियां फुसफुसाईं। तभी पीछे से एक लड़के की आवाज आई – “प्रिया? कूल नेम। मैं आरव ठाकुर। वेलकम टू कॉलेज।”

    प्रिया ने पलटा। हॉल के आखिरी बेंच पर एक लड़का बैठा था – लंबा, गोरा, हल्की दाढ़ी, ब्रांडेड जैकेट। मुस्कुरा रहा था। आंखें गर्म। प्रिया का दिल एक पल को धड़का। लेकिन वो जल्दी से बैठ गई।

    क्लास के बाद रिया ने कहा, “वो आरव है यार। कॉलेज का क्रश। अमीर फैमिली, शिमला के बड़े बिजनेसमैन का बेटा। लेकिन घमंडी नहीं। सबको हेल्प करता है।”

    प्रिया ने कुछ नहीं कहा, लेकिन मन में कुछ हलचल हुई।

    शाम को हॉस्टल में प्रिया ने अपना सामान व्यवस्थित किया। डायरी निकाली। फोटो देखी। तभी रिया बोली, “कल फ्रेशर्स पार्टी है। तुझे ड्रेस चाहिए। मेरी अलमारी से ले ले।”

    प्रिया ने मना किया, लेकिन रिया नहीं मानी। एक ब्लू कुर्ती दी – “ये पहनना। क्यूट लगेगी।”

    रात को प्रिया सो नहीं पाई। वो अनजान कॉल सोच रही थी। उसने फोन चेक किया – नंबर सेव नहीं था। ब्लॉक कर दिया। लेकिन डर लगा।

    अगले दिन क्लास में आरव ने प्रिया के पास नोट्स रख दिए। “ये ले, अगर मिस हो गया हो तो।” प्रिया ने थैंक्स कहा। लंच में रिया ने जबरदस्ती उसे अपने ग्रुप में बिठाया। आरव भी था।

    आरव ने पूछा, “सेटल हो गई? कोई प्रॉब्लम हो तो बता। मैं सीनियर हूं।”

    प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “थैंक यू। सब ठीक है।”

    आरव ने अपनी स्टोरी शेयर की – “मेरा घर शिमला में ही है। पापा होटल बिजनेस करते हैं। लेकिन मम्मी… दो साल पहले गुजर गईं। तब से थोड़ा अकेला फील करता हूं।”

    प्रिया को लगा जैसे कोई अपना सा मिल गया। दोनों की आंखें मिलीं। एक पल को दुनिया रुक सी गई।

    शाम को फ्रेशर्स पार्टी। हॉल सजा हुआ था – लाइट्स, म्यूजिक, डांस फ्लोर। प्रिया रिया की कुर्ती में थी। पहली बार मेकअप किया था। वो आईने में खुद को देखकर शर्मा गई।

    पार्टी में एंट्री करते ही रिया ने कहा, “वाह यार! बॉम्ब लग रही है।”

    डांस शुरू हुआ। प्रिया कोने में खड़ी थी। तभी आरव आया। सफेद शर्ट, ब्लैक जैकेट। हैंडसम। उसने हाथ बढ़ाया – “डांस करेगी?”

    प्रिया हिचकिचाई। “मुझे नहीं आता।”

    “कोई नहीं। मैं सिखाता हूं।”

    आरव ने उसका हाथ पकड़ा। धीरे-धीरे डांस शुरू हुआ। संगीत रोमांटिक था। प्रिया का दिल तेज़ धड़क रहा था। पहली बार किसी लड़के ने इतना क्लोज फील किया।

    तभी एक लड़की आई – लंबे बाल, रेड ड्रेस। अवनी शर्मा। कॉलेज की क्वीन बी। वो आरव के पास आई और बोली, “आरव, डांस?” फिर प्रिया को घूरकर कहा, “स्कॉलरशिप वाली? यहां अमीरों का क्लब है बेबी। बाहर जाकर पढ़ाई कर।”

    सब हंस पड़े। प्रिया का चेहरा लाल हो गया। आंखें भर आईं। वो भागी। बाहर लॉन में अकेली बैठ गई। रोने लगी। “मैं यहां क्यों आई? सब मुझे जज करेंगे।”

    तभी आरव आया। “प्रिया… सॉरी। अवनी वैसी है। तू मत रो। तू स्पेशल है। तेरी आंखों में कुछ है… जो मुझे अच्छा लगता है।”

    प्रिया ने आंसू पोंछे। “थैंक यू आरव। लेकिन मैं… मैं अनाथ हूं। मेरे पास कुछ नहीं।”

    आरव ने उसका हाथ थामा। “मेरे पास सब है, लेकिन खुशी नहीं। तू मुझे खुशी दे सकती है।”

    प्रिया ने हाथ छुड़ाया और रूम की ओर चली गई। दिल में तूफान था – प्यार की शुरुआत? या फिर खतरे की?

    रूम में पहुंचते ही उसने बैग खोला। अंदर एक लिफाफा था – जो पहले नहीं था। अंदर एक चिट – “प्रिया, तेरी मां का नाम रानी था। वो शिमला में ही मरी। मत ढूंढना, खतरा है।”

    प्रिया कांप गई। ये लिफाफा कैसे आया? कौन रख गया? और आरव… क्या वो जानता है कुछ?

    रात गहरा गई। बाहर हवा चल रही थी। प्रिया की नई जिंदगी शुरू हो चुकी थी – दोस्ती, प्यार, और छिपे राजों के साथ।

     

  • मेरा बच्चा मेरी जान

    मेरा बच्चा मेरी जान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    मीरा और अजय की मुलाकात कॉलेज में हुई थी। दोनों एक-दूसरे की कंपनी में बहुत खुश रहने लगे थे। मीरा की मुस्कान अजय के दिल की धड़कन को तेज कर देती थी, और अजय की हंसी मीरा के चेहरे पर एक चमक ला देती थी। धीरे-धीरे, उनके बीच एक गहरा रिश्ता बन गया। 

     

    एक दिन, जब वे दोनों पार्क में टहल रहे थे, अजय ने हिम्मत जुटाकर मीरा से कहा, “क्या तुम मुझसे शादी करोगी?” मीरा का दिल खुशी से झूम उठा। उसने बिना एक पल सोचे हुए कहा, “हाँ! मुझे भी तुमसे शादी करनी है।” दोनों ने अपनी खुशियों का जश्न मनाया, लेकिन खुशी जल्दी ही चिंता में बदल गई।

     

    जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, अजय ने अपने परिवार को मीरा के बारे में बताया। लेकिन अजय के परिवार ने इस रिश्ते का विरोध किया। उनके विचार अलग थे। अजय के माता-पिता चाहते थे कि उनका बेटा किसी ऐसे परिवार से शादी करे जो उनके सामाजिक मान-मर्यादा के अनुरूप हो। 

     

    मीरा यह सब सुनकर बहुत दुखी हुई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि प्यार में आने के बाद भी उनके रिश्ते को स्वीकृति क्यों नहीं मिल रही। 

     

    जब कोई उसकी शादी के लिए नहीं माना तो अजय और मीरा ने अपनी शादी की योजनाएँ चुपचाप बनानी शुरू कर दीं। उन्होंने समझ लिया था कि अगर वे अपने परिवारों से बिना किसी संघर्ष के शादी कर लेंगे, तो यह उनके लिए बेहतर होगा। दोनों की प्रेम कहानी में इस पल ने एक नया मोड़ ले लिया। 

     

    एक सुबह, जब सूरज की पहली किरणें धरती पर बिखर रही थीं, अजय और मीरा ने एक छोटे से मंदिर में शादी करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने निकटतम मित्रों को बुलाया, जो उनके इस फैसले में उनका समर्थन कर रहे थे। विवाह का दिन आया और दोनों ने एक-दूसरे के साथ फेरे लेकर अपने जीवन को एक नई दिशा देने की ठानी।

     

    शादी के बाद, अजय और मीरा ने एक छोटे से शहर में रहने का निर्णय लिया। उन्होंने एक नया जीवन शुरू किया, जिसमें केवल प्रेम और समझ ही थी। अब वे दोनों एक-दूसरे के साथ हर सुख-दुख में खड़े रहे। मीरा ने एक स्कूल में अध्यापन कार्य करना शुरू किया, जबकि अजय ने एक प्रौद्योगिकी कंपनी जॉइन की। दोनों की जिंदगी में काम और प्यार का अच्छा संतुलन बन गया था।

     

    लेकिन अपने परिवार से दूर रहने का दर्द कभी-कभी उन्हें तड़पाता था। मीरा अक्सर सोचती थी कि उनके परिवार का क्या हाल होगा, और अजय भी अपने माता-पिता की याद में उदास हो जाता था। एक दिन, मीरा ने अजय से कहा, “हमने अपने प्यार के लिए साहस दिखाया, लेकिन क्या हम अपने परिवारों के साथ भी बातचीत नहीं कर सकते?

     

    अजय ने उसकी बात पर विचार किया और दोनों ने मिलकर फैसला किया कि वे अपने परिवार से बात करेंगे। उन्होंने अपने परिवारों को एक साथ बुलाया ताकि उन्हें अपने रिश्ते की सच्चाई बताई जा सके। मीरा ने अजय के माता-पिता से आदर से बात की। उसने उन्हें अपनी भावनाएं और अजय के साथ अपने रिश्ते की गहराई समझाने की कोशिश की। हालांकि पहले तो अजय के माता-पिता त्यार नहीं हुए,

     

    कुछ समय बाद मीरा प्रेगनेट हुई ये बात अजय के घर पता चला अजय के माता-पिता ने इस खुशी को सुनकर अपने मन में संदेह और विचारों के बीच द्वंद्व अनुभव किया। वे शुरुआत में इस रिश्ते को लेकर चिंतित थे, लेकिन अब उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उन्हें लगा कि मीरा और अजय का परिवार बढ़ने जा रहा है, और यह अवसर उन्हें एक नयी सोच पर विचार करने के लिए मजबूर कर रहा था।

     

    जब अजय के माता-पिता मीरा के पास पहुंचे, तो उनके चेहरे पर खुशी की चमक थी। उन्होंने मीरा से कहा, “हमने जो किया, उसमें हमें शायद गलतफहमी थी। अब तबियत ठीक आने पर हम सबको एक साथ मिलकर खुशी मनाने की जरूरत है।” मीरा ने अजय के माता-पिता की बात सुनकर राहत की सांस ली। उसने उन्हें बताया, “मैं जानती हूँ कि हम आपके लिए अजनबी हैं, लेकिन मेरा प्यार और अजय की खुशी ही सबसे महत्वपूर्ण हैं।”

     

    कुछ समय में मीरा ने एक बेटी को जन्म दिया सब लोग बहुत खुश अजय के माता पिता भी बहुत खुश हुए । कुछ समय मीरा के बेटी का अचानक तबियत खराब हो गया   सब बच्चे को लेकर हॉस्पिटल जाते है डॉक्टर बताते है बची चल नहीं सकती  है 

     

    जब मीरा और अजय ने डॉक्टर की बात सुनी, तो उनकी दुनिया जैसे थम गई। उनके चारों ओर का माहौल अचानक ही भयानक और अंधेरे से भर गया। मीरा ने अपने छोटे से बच्ची को अपने क arms में कस के पकड़ लिया, उसका दिल बुरी तरह से टूट रहा था। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह इस स्थिति में क्या करे।

     

    अजय ने मीरा के कंधे पर हाथ रखा और उसने कहा, “हमाक पास कोई और रास्ता नहीं है। हमें लड़ना होगा। हम अपनी बेटी के लिए सब कुछ करेंगे।” लेकिन अजय के शब्दों में वो विश्वास नहीं था, जिसे वह खुद भी महसूस कर सके। उसने डॉक्टर से और जानकारी मांगी। 

     

    डॉक्टर ने कहा, “यह मामला गंभीर है। हमें आज ही कुछ परीक्षण करने होंगे। लेकिन, हमें ईमानदार रहना होगा – स्थिति बहुत कठिन है।” उन दोनों को हर एक पल में अपनी बेटी की सांसों को बचाने का प्रयास करते हुए, हर मिनट का इंतज़ार हुआ, उम्मीद और डर के बीच झूलते हुए।

     

    कुछ घंटों बाद, डॉक्टर ने कहा कि उन्हें एक और विशेषज्ञ की सलाह लेना होगी। अजय ने मीरा से कहा, “हमारे पास समय कम है, हमें हर संभव प्रयास करना होगा।” उन्होंने विशेषज्ञ से बात की, जो एक उच्च स्तरीय अस्पताल से आई थी। 

     

    डॉक्टर ने आश्वासन दिया कि वे अपनी पूरी कोशिश करेंगे। मीरा और अजय ने अपनी बेटी के लिए प्रार्थना की और सकारात्मक सोचते रहने का प्रयास किया। समय बीतता गया, लेकिन निराशा का अंधेरा उनके पास आ रहा था। 

     

    आखिरकार, जब उनकी बच्ची को ऑपरेशन थिएटर में ले जाने का समय आया, तब मीरा का दिल टूट रहा था। उसने अपने पति से कहा, “क्या हमें यह सब मिलकर सहन करना पड़ेगा? हमारी छोटी सी बेबी इतनी जल्दी हमें छोड़कर नहीं जा सकती।” 

     

    अजय ने मीरा को गले लगाया और कहा, “हम उसे एक मौका देंगे, हम उसे नहीं छोड़ेंगे। उसे हमारी जरूरत है।” दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामे रखा, आँसुओं के साथ प्रार्थना की। 

     

    कुछ समय बीतने के बाद, डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने कहा, “हमने सफलतापूर्वक ऑपरेशन कर लिया है, लेकिन उसे अब कुछ समय चाहिए। स्थिति स्थिर है, लेकिन आपको संयम रखना होगा।” मीरा और अजय ने राहत की सांस ली, लेकिन उनकी चिंता अभी खत्म नहीं हुई थी।

     

    हॉस्पिटल के दिनों में, मीरा और अजय ने अपनी बेटी का हर क्षण संभाला। जब भी वे अस्पताल में अपने बेटे को देखते, उनकी आंखों में वो प्यार और दुख मिक्स होकर आता। 

     

    थोड़े समय बाद, अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी मीरा की बेटी को घर पर थोड़ी देखभाल की जरूरत थी। इस समय ने उन्हें एक-दूसरे का सहारा बनने का मौका दिया। 

     

    मीरा ने कहा, “हमें अपनी बेटी को दिखाना होगा कि हम कितने सशक्त हैं। हम हर दर्द और मुश्किल का सामना कर सकते हैं, जब हम एक-दूसरे के साथ हैं।” अजय ने भी हामी भरी, “हम अपने परिवार को और भी मजबूत बनाएंगे।”

     

    धीरे-धीरे, मीरा और अजय की बेटी ने सुधार दिखाना शुरू किया। वे हर दिन उसकी देखभाल करते, उसे प्यार से सहलाते, और उसे बताते कि वह कितनी खास है। उनका परिवार, जो पहले संघर्ष का सामना कर रहा था, अब एक नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहा था। 

     

    इस कठिनाइयों ने अजय और मीरा के रिश्ते को और मजबूत किया। उन्होंने यह महसूस किया कि सच्चा प्यार सिर्फ खुशी नहीं लाता, बल्कि कठिन समय में भी साहस और समर्थन का एहसास कराता है। 

     

    समय के साथ, उनकी बेटी पूरी तरह से स्वस्थ हो गई, और अजय तथा मीरा ने मिलकर एक जीने योग्य जीवन की दिशा में अपने कदम बढ़ाए। उनकी कहानी सिर्फ एक संघर्ष की नहीं, बल्कि प्यार की शक्ति की थी जो हर बाधा को पार कर सकती है।

     

  • सावन

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    🌧️ सावन 🌿

    सावन आया, बदली छाई,

    मिट्टी ने फिर खुशबू पाई।

    बूंदों ने जब गीत सुनाया,

    मन ने भी कुछ याद किया।

    पेड़ों पर झूले, होंठों पर गान,

    हर ओर बिखरा प्रेम का अरमान।

    ठंडी हवा जब छूकर जाए,

    सावन दिल को फिर महकाए। ❤️

  • कहीं देर न हो जाए साजन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    रात के बारह बज रहे थे।

    कमरे में सिर्फ एक दीया जल रहा था। उसकी काँपती लौ दीवार पर मेरी परछाईं बना रही थी। खिड़की के बाहर हवा चल रही थी। नीम के पेड़ की पत्तियाँ सरसरा रही थीं। मैं चारपाई पर बैठी थी। गोद में एक पुरानी चिट्ठी थी—उसकी लिखी हुई। किनारे मुड़े हुए, स्याही फीकी पड़ चुकी थी।

     

    मैं बार-बार वही पंक्ति पढ़ रही थी “जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए साजन।”

     

    साजन।

    वह मुझे यही कहकर बुलाता था।

     

    मेरा नाम सुमित्रा है। इस गाँव में मेरा जन्म हुआ, यहीं मेरी शादी तय हुई, और यहीं मैं पिछले सात साल से उसका इंतजार कर रही हूँ। लोग कहते हैं कि इंतजार भी एक उम्र होती है। मेरी उम्र इंतजार में ही कट गई।

     

    वह था किशन। गाँव का ही लड़का। गेहूँ के खेतों में काम करने वाला, लेकिन सपनों में शहर बसाने वाला। पहली बार मैंने उसे मेले में देखा था। वह लाल पगड़ी बाँधे हुए था। आँखें इतनी तेज कि लग रहा था जैसे सूरज उनमें उतर आया हो। उसने मुझे देखा और मुस्कुरा दिया। बस। उसी मुस्कान ने मेरी जिंदगी बदल दी।

     

    फिर शुरू हुई वह खट्टी-मीठी बातें। नदी किनारे मिलना, खेत की मेड़ पर बैठकर सपने देखना, और रात को चुपके से खिड़की के नीचे आकर गाना—

    “सुमित्रा… कहीं देर न हो जाए साजन…”

     

    मैं हँसती—“क्या देर हो जाएगी? मैं तो यहीं हूँ।”

    वह गंभीर हो जाता—“पता नहीं। जिंदगी बड़ी चंचल है। कभी-कभी खुशियाँ भी देर कर देती हैं।”

     

    शादी तय हो गई। दोनों घर राजी। तारीख भी तय हो गई—अगले साल फागुन की एक तारीख। लेकिन उससे पहले किशन को शहर जाना पड़ा। मजदूरी के लिए। पिता बीमार थे, कर्ज चढ़ा हुआ था। उसने कहा—“एक साल। सिर्फ एक साल। पैसे जमा करके लौटूँगा। फिर कभी नहीं जाऊँगा।”

     

    मैंने उसकी उँगली पकड़ी थी। “जल्दी आना। कहीं देर न हो जाए साजन।”

    वह हँसा था। “देर कैसे होगी? तुम इंतजार करोगी तो मैं हवा से भी तेज दौड़कर आऊँगा।”

     

    वह चला गया।

    पहले महीने चिट्ठियाँ आईं। हर चिट्ठी में वही बात—“जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए।”

    फिर चिट्ठियाँ कम होने लगीं। कभी-कभी दो-दो महीने बाद आतीं। पैसे भेजता था। घर का कर्ज उतरने लगा। पिताजी की दवाइयाँ चलने लगीं।

     

    तीसरे साल एक चिट्ठी आई जिसमें लिखा था—“यहाँ काम बढ़ गया है। थोड़ा और समय लगेगा। तुम घबराना मत। मैं आ रहा हूँ।”

     

    मैंने जवाब में लिखा—“आ जाना। कहीं देर न हो जाए साजन। मैं थकने लगी हूँ इंतजार करते-करते।”

     

    जवाब नहीं आया।

     

    पाँचवें साल गाँव में अफवाह उड़ी कि किशन ने शहर में किसी और से शादी कर ली है। लोग मेरे घर आने लगे। सहानुभूति दिखाने वाले, ताने देने वाले, और रिश्ते लेकर आने वाले। पिताजी ने कहा—“कब तक बैठेगी? उम्र निकल रही है।”

    माँ रोती रहीं।

    मैंने सिर्फ इतना कहा—“वह आएगा। उसने वादा किया है।”

     

    सात साल हो गए।

    अब घर में सिर्फ मैं और माँ बची हूँ। पिताजी चल बसے۔ भाई शहर में बस गए। गाँव वाले मुझे ‘वह औरत’ कहकर बुलाते हैं जो बावली हो गई है इंतजार में।

     

    हर शाम मैं उसी खिड़की के पास बैठती हूँ जहाँ कभी किशन खड़ा होता था। दीया जलाती हूँ। और वही चिट्ठी पढ़ती हूँ।

     

    आज भी वही कर रही थी कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई।

    रात के बारह बज रहे थे। कौन आ सकता है?

     

    मैंने दीया उठाया और दरवाजा खोला।

    बाहर एक आदमी खड़ा था। चेहरा दुबला, बाल सफेद मिश्रित, कंधे झुके हुए। हाथ में एक छोटी सी गठरी।

     

    मैंने पहचाना नहीं।

    फिर उसने सिर उठाया। आँखें वही थीं—सूरज वाली।

     

    “सुमित्रा…” उसकी आवाज काँप रही थी। “कहीं देर तो नहीं हो गई ना?”

     

    मेरे हाथ से दीया गिर गया। अंधेरा हो गया। लेकिन मैंने उसे देख लिया था।

    “किशन…?”

     

    वह अंदर आया। दरवाजा बंद किया। फिर बस खड़ा रहा। जैसे हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हो।

     

    “बोल… कहाँ रहा इतने साल?” मेरी आवाज में गुस्सा था, दर्द था, और एक अजीब सी राहत भी।

     

    वह बैठ गया फर्श पर। “जेल में।”

     

    सन्नाटा।

    “जेल?”

     

    “हाँ। शहर में एक मिल में काम करता था। मालिक ने मजदूरों की मजदूरी मार ली। हमने विरोध किया। झड़प हो गई। एक आदमी मर गया। पुलिस ने हमें पकड़ लिया। मुझे सात साल की सजा हुई। मैंने तुम्हें चिट्ठी लिखी… लेकिन जेल से चिट्ठी नहीं जाने दी उन्होंने। फिर जब छूटा तो सोचा था कि सीधे गाँव आऊँगा। लेकिन शरीर ने साथ नहीं दिया। तपेदिक हो गया था। अस्पताल में छह महीने पड़ा रहा। आज ठीक होकर आया हूँ।”

     

    उसने गठरी खोली। अंदर कुछ पुरानी चिट्ठियाँ थीं—मेरी लिखी हुई। और एक छोटी सी डिब्बी।

     

    “यह तुम्हारे लिए। हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर मैंने एक चूड़ी रखी। सात चूड़ियाँ हैं। सोचता था कि जब आऊँगा तो खुद पहनाऊँगा।”

     

    मैं रो पड़ी।

    “तुमने कहा था कहीं देर न हो जाए… और देर हो गई किशन। मेरे पिताजी नहीं रहे। मेरी जवानी चली गई। गाँव वाले मुझे बावली कहते हैं।”

     

    वह मेरे पास घुटनों के बल आया। “माफ कर देना। मैंने वादा तोड़ा। लेकिन हर रात जेल में वही दोहराता रहा—‘कहीं देर न हो जाए साजन’। तुम्हारा नाम लेकर सोता था। तुम्हारा नाम लेकर उठता था।”

     

    मैंने उसका चेहरा देखा। वह पहले जैसा नहीं था। लेकिन आँखें वैसी ही थीं।

     

    “अब क्या होगा?” मैंने पूछा।

     

    “जो तुम कहोगी। अगर तुम कहो तो मैं लौट जाऊँ। अगर तुम कहो तो यहीं रहूँ। मेरे पास कुछ नहीं बचा—न जवानी, न पैसा, न इज्जत। बस एक अधूरा वादा बचा है।”

     

    मैं उठी। दीया फिर से जलाया। फिर उसकी डिब्बी से एक-एक चूड़ी निकाली। सात चूड़ियाँ। लाल, हरी, पीली… जैसे सात साल के इंतजार के रंग हों।

     

    “पहनाओ,” मैंने कहा।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे। उसने मेरी कलाई पर चूड़ियाँ पहनाईं। एक-एक करके। जब आखिरी चूड़ी पहनाई तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “अब देर नहीं हुई,” मैंने कहा। “तुम आ गए। बस इतना काफी है।”

     

    उस रात हमने बातें कीं। सालों की बातें। जेल की बातें, इंतजार की बातें, डर की बातें। सुबह होते-होते वह मेरे कंधे पर सर रखकर सो गया। मैं जागती रही। उसकी साँसें गिनती रही।

     

    गाँव में सुबह होते ही हलचल मच गई। “किशन लौट आया!”

    कुछ लोग खुश हुए, कुछ ने नाक-भौं सिकोड़ी। “अब क्या करेगा? जेल का पाला हुआ।”

    माँ ने उसे गले लगा लिया। रोती रहीं।

     

    फिर दिन बीतने लगे।

    किशन ने फिर से खेत संभाले। शरीर कमजोर था, लेकिन हिम्मत मजबूत। मैं उसके साथ काम करने लग गई। लोग देखते रहे। बातें बनाते रहे। लेकिन हमें फर्क नहीं पड़ा।

     

    एक दिन नदी किनारे हम दोनों बैठे थे। वही जगह जहाँ कभी सपने देखते थे।

     

    किशन ने कहा, “सुमित्रा, अब शादी कर लें?”

     

    मैं मुस्कुराई। “सात साल बाद? लोग हँसेंगे।”

     

    “हँसने दो। हमने काफी रो लिया।”

     

    शादी हुई। छोटी सी। सिर्फ माँ, दो-चार रिश्तेदार और पुराने दोस्त। कोई धूमधाम नहीं। बस एक मंडप, एक पुरोहित और दो लोग जो सालों बाद एक-दूसरे के हुए।

     

    रात को जब सब चले गए तो किशन ने मेरा हाथ पकड़ा। “अब कोई देर नहीं रहेगी। न आने में, न जाने में। मैं जहाँ भी रहूँगा, तुम्हारे साथ रहूँगा।”

     

    मैंने सिर उसके सीने पर रख दिया। “कहीं देर न हो जाए साजन… यह वाक्य अब डराता नहीं। अब तो लगता है कि देर होकर भी सब कुछ समय पर हुआ।”

     

    साल बीतते गए।

    हमारे घर में एक बेटी हुई। नाम रखा हमने—आस।

    आस बड़ी हुई। खेतों में दौड़ती, नदी में खेलती। किशन उसे बाँहों में लेकर गाता—“मेरी आस… कहीं देर न हो जाए।”

     

    एक शाम किशन बहुत थका हुआ घर लौटा। बुखार था। मैंने सिर पर कपड़ा रखा। दवा दी। रात भर जागती रही।

     

    सुबह उसने मेरा हाथ पकड़ा। “सुमित्रा… लग रहा है इस बार देर हो जाएगी।”

     

    मेरा दिल धड़कने लगा। “मत बोलो ऐसा। तुम ठीक हो जाओगे।”

     

    वह मुस्कुराया। “ठीक हो या न हो… तुमसे मिल लिया। इंतजार खत्म हो गया। अब कोई देर नहीं।”

     

    दो दिन बाद वह चल बसा।

    आराम से। जैसे कोई लंबी यात्रा पूरी करके सो गया हो।

     

    गाँव वाले आए। फिर वही सहानुभूति, वही बातें।

    मैंने रोया। खूब रोया। लेकिन अंदर कोई खालीपन नहीं था।

     

    अब सालों बीत गए। आस बड़ी हो गई। उसकी शादी हो गई। मैं अकेली रहती हूँ उसी घर में। हर रात दीया जलाती हूँ। खिड़की के पास बैठती हूँ।

     

    और कभी-कभी हवा के साथ वही आवाज आती है “कहीं देर न हो जाए साजन…”

     

    मैं मुस्कुरा देती हूँ।

    “नहीं साजन। अब कोई देर नहीं।

    तुम आ गए थे।

    समय पर आ गए थे।

    और मेरा इंतजार… कभी व्यर्थ नहीं गया।”

     

    क्योंकि कुछ मुलाकातें देर से होती हैं।

    लेकिन जब होती हैं तो जिंदगी भर के इंतजार को अर्थ दे देती हैं।

    और कुछ वाक्य… बस वाक्य नहीं होते।

    वे एक पूरा जीवन बन जाते हैं।

     

    “कहीं देर न हो जाए साजन।”

    यह वाक्य अब डर नहीं।

    यह मेरी साँस है।

    यह मेरी याद है।

     

     

    1. यह मेरा किशन है।
  • बेवफाई भाग 2

    बेवफाई भाग 2

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

     

    Part 2

     

    छह महीने बाद, 

     

    अगले छह महीने रिया ने खुद को पूरी तरह काम में डुबो दिया। वह एक छोटे से डिजाइन स्टूडियो में काम करती थी। आरव से अलग होने के बाद उसने खुद को संभालना सीखा।

     

    पहले वह हर रात रोती थी। फिर रोना बंद हो गया। पहले उसे आरव की याद आती थी। फिर उसने खुद को याद करना शुरू किया। उसने अपने स्टूडियो को बड़ा किया।

     

    नई टीम बनाई। और छह महीने बाद… रिया का नाम मुंबई के युवा फैशन डिजाइनरों में गिना जाने लगा।

    वो रिया जिसे कुछ महीनों पहले तक कोई नहीं जानता था आज उसने अपना एक मुकाम हासिल कर लिया था। 

     

    एक दिन उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला। क्लाइंट का नाम देखकर वह कुछ सेकंड के लिए चुप रह गई।

     

    आरव मल्होत्रा। उसकी कंपनी। रिया ने फाइल बंद कर दी। “मैं ये प्रोजेक्ट नहीं करूंगी।”

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद उसे क्लाइंट की शर्तों के बारे में पता चला।

     

    प्रोजेक्ट किसी और डिजाइनर को नहीं दिया जा सकता था। उसे ही करना था।

     

    रिया ने गहरी सांस ली। “ठीक है।”

     

    उसे क्या पता था कि यह मुलाकात उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच सामने लाने वाली थी।

     

     

    अगले दिन वह आरव के ऑफिस पहुंची। दरवाजा खोलते ही उसकी नजर आरव पर पड़ी।

     

    छह महीने में वह बदल चुका था।

     

    चेहरे पर पहले से ज्यादा थकान थी। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे। लेकिन सबसे ज्यादा अजीब था…

    उसकी आंखों में दर्द। रिया ने फाइल टेबल पर रखी।

     

    “प्रोजेक्ट की सारी डिटेल्स मैंने देख ली हैं।”

     

    आरव उसे देखता रहा। “तुम ठीक हो?”

     

    रिया ने ठंडी आवाज में कहा, “ये सवाल अब तुम्हें पूछने का अधिकार नहीं है।”

     

    आरव चुप हो गया। दोनों के बीच कुछ सेकंड की खामोशी रही।

     

    फिर रिया ने कहा, “काम की बात करें?”

     

    आरव ने सिर हिलाया, “हां।”

     

    दोनों प्रोफेशनल हो गए, कम से कम बाहर से।

     

    लेकिन हर मुलाकात में कुछ अनकहा रह जाता।

     

    एक दिन अचानक आरव ने पूछा, “तुमने दोबारा शादी क्यों नहीं की?”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा। “तुमने की?”

     

    आरव चुप हो गया। रिया मुस्कुरा दी। “मुझे भी जवाब नहीं चाहिए।”

     

    वह वहां से जाने लगी। तभी आरव ने कहा, “रिया…”

     

    वह रुक गई। “मैंने तुम्हारे साथ बेवफाई नहीं की थी।”

     

    रिया के चेहरे पर कठोरता आ गई। “फिर मीरा कौन थी?”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं। “वो मेरी बहन है।”

     

    रिया जैसे पत्थर की बन गई। “क्या?”

     

    आरव बोला, “मेरी छोटी बहन।”

     

    रिया कुछ बोल नहीं पाई। आरव ने टेबल की दराज खोली और एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    उसमें मेडिकल रिपोर्ट्स थीं। “मीरा को कैंसर था।”

     

    रिया के हाथ कांपने लगे। “क्या?”

     

    आरव, “डॉक्टर ने कहा था कि उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है।” आरव की आवाज टूटने लगी।

     

    “मीरा मेरी वजह से नहीं… मेरी वजह से नहीं, बल्कि इसलिए मेरी जिंदगी में वापस आई थी क्योंकि उसकी आखिरी इच्छा थी कि मैं उसे अपनी जिंदगी में खुश देखूं।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले।“तो तलाक?”

     

    आरव, “वो भी झूठ था।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “क्योंकि मुझे लगा… अगर मैं तुम्हें अपने से दूर कर दूंगा, तो तुम सुरक्षित रहोगी।”

     

    रिया ने हैरानी से उसे देखा। “किससे?”

     

    आरव ने धीरे से कहा, “मेरे पिता से।”

     

    रिया कुछ समझ नहीं पाई।

     

    आरव ने बताया कि उसके पिता एक बड़े घोटाले में फंस चुके थे और उनके दुश्मन आरव के परिवार को नुकसान पहुंचाना चाहते थे।

     

    कुछ लोगों ने रिया को धमकी देना शुरू कर दिया था।

     

    आरव ने पुलिस को सब बताया था, लेकिन जब तक सबूत नहीं मिलते, वह उसे सुरक्षित रखना चाहता था।

     

    इसलिए उसने दुनिया के सामने मीरा के साथ रिश्ता होने का नाटक किया, क्योंकि किसी को नहीं पता था आरव की कोई छोटी बहन है। 

     

    और जिससे लोग समझें कि उसका और रिया का रिश्ता खत्म हो चुका है। “लेकिन तुमने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए। “क्योंकि मुझे डर था कि अगर तुम्हें पता चल गया तो तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी।”

     

    रिया ने धीमे से कहा, “और तुमने सोचा कि झूठ बोलकर मुझे बचा लोगे?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “मैं गलत था।”

     

    रिया की आंखों में दर्द था। “हां… तुम गलत थे।”

     

    वह उसके करीब आई। और उसका कॉलर पकड़ते हुए टूटी आवाज में बोली, “तुमने मेरी जान तो बचा ली, आरव…”

     

    उसकी आवाज कांप गई। “लेकिन मेरे अंदर का भरोसा मार दिया।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बहते रहे। “मैं जानता हूं।”

     

    “मैंने छह महीने तुम्हें नफरत किया।”

     

    “मैंने भी।”

     

    “मैं हर रात सोचती थी कि तुमने मुझे धोखा दिया।”

     

    “मैं हर रात तुम्हारी तस्वीर देखकर खुद को कोसता था।” आरव ने दर्द भरी आवाज में कहा। 

     

    दोनों चुप हो गए। कुछ रिश्तों में प्यार खत्म नहीं होता।

    बस दर्द इतना बढ़ जाता है कि प्यार दिखाई देना बंद हो जाता है।

     

     

    कुछ दिनों बाद मीरा खुद रिया से मिलने आई। वह बहुत कमजोर थी। उसने रिया का हाथ पकड़ लिया। “भाभी…”

    रिया की आंखें भर आईं। “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

     

    मीरा मुस्कुराई। “लेकिन एक गलती मेरी थी।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    मीरा, “मैंने भाई से कहा था कि अगर वो आपसे सच बताएगा तो आप उसे कभी माफ नहीं करेंगी।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुरा दी। “और अब?”

     

    मीरा ने कहा, “अब लगता है कि प्यार में सबसे बड़ी बेवफाई झूठ बोलना नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी। “बल्कि सामने वाले को सच जानने का अधिकार न देना है।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। मीरा चली गई। रिया बहुत देर तक वहीं बैठी रही।

     

     

    एक साल बाद। समुद्र के किनारे वही जगह जहां कभी आरव ने उसे प्रपोज किया था।

     

    आरव वहां खड़ा था। रिया धीरे-धीरे उसके पास आई।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “तुम यहाँ आई।”

     

    रिया मुस्कुरा दी। “हां।”

     

    आरव, “क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो?”

     

    रिया ने कुछ पल उसे देखा। “माफ कर दिया।”

     

    आरव की आंखों में उम्मीद जगी।

     

    “लेकिन…” रिया ने उसकी बात रोक दी। “भरोसा वापस आने में वक्त लगेगा।”

     

    आरव ने सिर हिलाया। “मैं इंतजार करूंगा।”

     

    रिया उसके पास आई। “और अगर फिर कभी मुझे बचाने के लिए मुझसे झूठ बोला…”

     

    आरव मुस्कुरा दिया। “तो?”

     

    “तो इस बार सच में तलाक ले लूंगी।”

     

    दोनों हंस पड़े। आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। इस बार रिया ने अपना हाथ नहीं खींचा।

     

    समुद्र की लहरें उनके पैरों को छूकर लौट रही थीं।

     

    रिया ने आरव के कंधे पर सिर रख दिया। कभी-कभी रिश्तों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किसने बेवफाई की।

     

    सवाल यह होता है कि, क्या उस बेवफाई के बाद भरोसा दोबारा जन्म ले सकता है? रिया और आरव के रिश्ते ने एक बात सीखी थी,

     

    प्यार हमेशा रिश्ते को नहीं बचाता।

    लेकिन सच्चाई, पछतावा और दोबारा भरोसा बनाने की कोशिश… कभी-कभी टूटे हुए रिश्ते को पहले से भी

    ज्यादा मजबूत बना देती है।

     

    और शायद…

     

    उनकी कहानी में बेवफाई किसी तीसरे इंसान की नहीं थी। बेवफाई उस झूठ की थी, जिसने दो सच्चे दिलों को छह महीनों तक एक-दूसरे से दूर रखा।

     

    समाप्त….

    आपका एक लाइक मेरे लिए बहुत कीमती है।