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टैग: प्यार एक खुबसूरत एहसास

  • Dil sabhal ja jara part – 3

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    Part – 3 chhupa huaa raj 

     

    सुबह की पहली किरण हॉस्टल की खिड़की से अंदर आई और प्रिया की आंखों पर पड़ी। वो रात भर सो नहीं पाई थी। वो लिफाफा… वो चिट… “तेरी मां का नाम रानी था। वो शिमला में ही मरी। मत ढूंढना, खतरा है।” ये शब्द उसके दिमाग में चक्कर काट रहे थे। उसने चिट को कई बार पढ़ा, फिर उसे डायरी के बीच में छिपा दिया। हाथ कांप रहे थे। 

     

    रिया अभी भी सो रही थी। प्रिया चुपके से उठी, चेहरा धोया और तैयार हुई। आज कॉलेज का दूसरा दिन था। लेकिन उसका मन क्लास में नहीं, उस चिट में था। मां का नाम रानी? पहली बार उसे अपनी मां का नाम पता चला। लेकिन कैसे? कौन रख गया वो लिफाफा उसके बैग में? हॉस्टल में कोई अंदर आया था? या पार्टी के दौरान? 

     

    कैंटीन में नाश्ता करते हुए प्रिया ने रिया को बताया। रिया की आंखें चौड़ी हो गईं। “क्या? यार ये तो सीरियस है! कोई तुझे जानबूझकर डरा रहा है। पुलिस को बताएं?”

     

    “नहीं रिया,” प्रिया ने धीरे से कहा। “पहले खुद समझना चाहती हूं। अगर पुलिस में गई तो शायद आश्रम वाले को पता चल जाए। सुलेखा आंटी चिंता करेंगी।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “ठीक है। लेकिन अकेले मत करना कुछ। मैं साथ हूं। आज शाम को लाइब्रेरी चलेंगे। शिमला के पुराने न्यूज पेपर्स देखेंगे। शायद कुछ मिल जाए ‘रानी’ नाम की औरत के बारे में।”

     

    प्रिया ने थैंक्स कहा। लेकिन अंदर से डर लग रहा था। 

     

    क्लास शुरू हुई। इंग्लिश लिटरेचर। प्रोफेसर शेकスピयर की ‘रोमियो एंड जूलियट’ पढ़ा रही थीं। प्रिया की सीट खिड़की के पास थी। वो बाहर देख रही थी – पहाड़, कोहरा। तभी उसे लगा कोई उसे देख रहा है। उसने पलटा। आरव दो बेंच पीछे बैठा मुस्कुरा रहा था। उसने एक नोट फेंका – “लंच टुगेदर?”

     

    प्रिया ने मुस्कुरा कर हां में सिर हिलाया। उसका दिल थोड़ा हल्का हुआ। आरव की मौजूदगी में उसे सुकून मिलता था। 

     

    लंच ब्रेक में रिया, आरव और उनका ग्रुप साथ बैठा। आरव ने प्रिया के लिए प्लेट में एक्स्ट्रा सैंडविच रखा। “खा ना, दुबली हो जाएगी वरना।”

     

    रिया हंस पड़ी। “आरव भाई, इतना केयर? कुछ तो गड़बड़ है।”

     

    आरव ने शरमाते हुए कहा, “बस दोस्ती। प्रिया नई है ना।”

     

    लेकिन प्रिया की नजर अवनी पर पड़ी। अवनी दूसरे टेबल से उन्हें घूर रही थी। उसकी आंखों में जलन साफ दिख रही थी। प्रिया ने नजरें झुका लीं। 

     

    लंच के बाद आरव ने प्रिया को साइड में लिया। “कल पार्टी में सॉरी। अवनी वैसी है – अमीर घर की बिगड़ी हुई। लेकिन तू मत लेना दिल पर। मैं हूं ना।”

     

    प्रिया ने पहली बार खुलकर बात की। “आरव, मुझे अच्छा लगता है जब तू बात करता है। घर जैसा फील होता है।”

     

    आरव की आंखें चमक उठीं। “सच? तो आज शाम कॉलेज के पीछे वाली हिल पर चलेंगी? सनसेट देखने। सिर्फ हम दोनों।”

     

    प्रिया हिचकिचाई। लेकिन फिर हां कह दिया। 

     

    दोपहर की क्लास के बाद प्रिया और रिया लाइब्रेरी गईं। पुरानी लाइब्रेरी थी – ऊंची अलमारियां, धूल भरी किताबें। लाइब्रेरियन अंकल ने कहा, “पुराने न्यूजपेपर्स माइक्रोफिल्म में हैं। कंप्यूटर पर देख लो।”

     

    दोनों कंप्यूटर पर बैठ गए। प्रिया ने सर्च किया – “शिमला एक्सीडेंट रानी”। कुछ पुराने आर्टिकल मिले। एक २० साल पुराना हेडलाइन – “शिमला के मशहूर ठाकुर फैमिली की बहू रानी ठाकुर की कार एक्सीडेंट में मौत। बच्ची लापता।”

     

    प्रिया का दिल बैठ गया। ठाकुर फैमिली? आरव का सरनेम भी ठाकुर था। क्या कनेक्शन?

     

    आर्टिकल में लिखा था – “रानी ठाकुर, ठाकुर होटल्स की मालकिन, देर रात कार एक्सीडेंट में मरीं। उनकी पांच साल की बेटी प्रिया कार में थी, लेकिन एक्सीडेंट के बाद लापता हो गई। पुलिस को शक है कि कोई अपहरण भी हो सकता है।”

     

    प्रिया की उंगलियां ठंडी पड़ गईं। प्रिया… पांच साल की… लापता। क्या वो वही प्रिया है? और ठाकुर फैमिली – आरव की फैमिली?

     

    रिया ने उसका हाथ थामा। “प्रिया… ये… तू ही तो है ना?”

     

    प्रिया की आंखों से आंसू छलक पड़े। “रिया… अगर ये सच है तो मैं… मैं अमीर घर की हूं? फिर मुझे अनाथ आश्रम में क्यों छोड़ा गया?”

     

    रिया ने कहा, “शायद कोई साजिश। लेकिन आरव को पता है क्या?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। आज शाम उससे मिलने जा रही हूं। पूछूंगी?”

     

    “नहीं!” रिया ने डरते हुए कहा। “अगर फैमिली ने ही तुझे छोड़ा है तो खतरा हो सकता है। वो अनजान कॉल, वो चिट – सब कनेक्टेड लग रहा है।”

     

    प्रिया चुप हो गई। उसका दिमाग घूम रहा था। 

     

    शाम हुई। सनसेट का टाइम। प्रिया कॉलेज के पीछे वाली हिल पर पहुंची। आरव पहले से वहां था – हाथ में दो कॉफी कप। “हाय! ठंड है ना, कॉफी पी।”

     

    दोनों एक बड़े पत्थर पर बैठ गए। सूरज डूब रहा था – लाल-नारंगी रंग पहाड़ियों पर बिखर रहा था। आरव ने कहा, “प्रिया, मुझे तुझसे बात करके अच्छा लगता है। तू अलग है। बाकी लड़कियां सिर्फ शॉपिंग, पार्टी की बात करती हैं। तू… सपनों की बात करती है।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की। फिर हिम्मत करके पूछा, “आरव… तेरी फैमिली में कोई रानी नाम की थी?”

     

    आरव अचानक चुप हो गया। उसका चेहरा बदल गया। “रानी? वो… मेरी मम्मी का नाम था। दो साल पहले नहीं… बीस साल पहले एक्सीडेंट में गुजर गईं। क्यों पूछ रही है?”

     

    प्रिया का दिल जोरों से धड़का। “बस ऐसे ही। सुना था कहीं।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली। “हां… मम्मी की मौत के बाद फैमिली बिखर गई। पापा ने दूसरी शादी कर ली। और एक छोटी बहन थी… प्रिया। वो भी एक्सीडेंट में लापता हो गई। कभी नहीं मिली।”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। वो उठ खड़ी हुई। “आरव… मैं… मुझे जाना है।”

     

    “क्या हुआ?” आरव ने उसका हाथ पकड़ा। “प्रिया, तू ठीक तो है?”

     

    प्रिया ने हाथ छुड़ाया और भागी। हॉस्टल की ओर। आंसू नहीं रुक रहे थे। अगर आरव की लापता बहन प्रिया है, तो वो खुद आरव की… बहन? नहीं, वो नहीं हो सकता। लेकिन नाम, उम्र, शिमला – सब मैच कर रहा था।

     

    हॉस्टल पहुंचते ही वो रिया के पास गई। सारी बात बताई। रिया हैरान। “यार ये तो बड़ा ट्विस्ट है! तू आरव की बहन हो सकती है?”

     

    “नहीं रिया,” प्रिया रोते हुए बोली। “अगर मैं उसकी बहन हूं तो मुझे क्यों छोड़ा गया? और वो पेंडेंट… वो फोटो… सब ठाकुर हवेली जैसा लगता है।”

     

    रिया ने कहा, “कल हम उस पुरानी हवेली के पास जाएंगे। जहां एक्सीडेंट हुआ था। शायद कुछ क्लू मिले।”

     

    रात को प्रिया सो नहीं पाई। उसने पेंडेंट को छुआ। “मां… अगर तू रानी ठाकुर थी, तो मुझे क्यों छोड़ा?”

     

    तभी उसका फोन बजा। वही अनजान नंबर। प्रिया ने रिसीव किया।

     

    “प्रिया… तू बहुत करीब पहुंच गई है। आरव से दूर रह। वो तेरा भाई है। लेकिन सच जानने की कोशिश मत करना। ठाकुर फैमिली ने तुझे मरने के लिए छोड़ा था। अगली बार तेरी बारी होगी।”

     

    फोन कट गया। प्रिया चीख पड़ी। रिया उठी। “क्या हुआ?”

     

    प्रिया रोते हुए बोली, “रिया… कोई मुझे मारना चाहता है।”

     

    बाहर बारिश शुरू हो गई थी। हवा जोरों से चल रही थी। प्रिया की जिंदगी में प्यार की शुरुआत हुई थी, लेकिन अब मौत का साया मंडरा रहा था। आरव भाई है? या कुछ और?

     और ठाकुर फैमिली का राज़ क्या है?

     

    अगली सुबह क्या होगा? प्रिया सच ढूंढेगी या भाग जाएगी?

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • Dil sabhal ja jara part – 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    Part – 2 pahli mulakat 

    शिमला की ठंडी हवा बस की खिड़की से अंदर आ रही थी। प्रिया ने अपनी पतली शॉल कसकर लपेटी और फोन को जेब में डाल दिया। वो अनजान कॉल अभी भी उसके दिमाग में गूंज रही थी – “कॉलेज मत जाना… वरना…”। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसने चारों तरफ देखा। बस में ज्यादातर लोकल लोग थे – कुछ पर्यटक, कुछ स्टूडेंट्स। कोई उसे घूर नहीं रहा था, लेकिन प्रिया को लगा जैसे कोई उसे देख रहा हो।

    बस आखिरकार शिमला बस स्टैंड पर रुकी। प्रिया उतरी। बाहर ठंड थी, लेकिन धूप निकली हुई थी। पहाड़ियों पर बर्फ की चमक दूर से दिख रही थी। शहर व्यस्त था – रिक्शा, टैक्सी, दुकानें। प्रिया ने अपना छोटा बैग कंधे पर टिकाया और कॉलेज की ओर चल पड़ी। कॉलेज बस स्टैंड से करीब दो किलोमीटर दूर था। उसने पैदल ही जाना ठाना – पैसे बचाने थे।

    रास्ते में वो बार-बार फोटो वाली डायरी छूती रही। पेंडेंट गले में झूल रहा था। “शिमला… क्या यहीं कहीं मेरा अतीत छिपा है?” उसने मन ही मन सोचा। लेकिन वो अनजान कॉल उसे चैन नहीं लेने दे रहा था।

    कॉलेज गेट पर पहुंचते ही प्रिया रुक गई। बड़ा सा लोहे का गेट, ऊपर लिखा था – “Shimla Women’s College – Established 1950″। अंदर हरे-भरे लॉन, पुरानी ब्रिटिश स्टाइल की इमारतें, और लड़कियां हंसती-बोलती घूम रही थीं। ज्यादातर लड़कियां ब्रांडेड कपड़ों में थीं – जींस, जैकेट्स, महंगे बैग। प्रिया ने अपनी सादी नीली सलवार-कमीज देखी और अचानक खुद को बहुत छोटा महसूस किया।

    एडमिशन ऑफिस में लाइन लगी थी। प्रिया ने अपना लेटर दिखाया। स्टाफ की मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा, “प्रिया शर्मा? स्कॉलरशिप वाली? वेलकम डियर। तुम्हारा हॉस्टल रूम 204 है। दूसरी मंजिल। सामान रखो और फिर प्रिंसिपल मैम से मिलना।”

    प्रिया ने थैंक यू कहा और हॉस्टल की ओर बढ़ी। हॉस्टल बिल्डिंग कॉलेज के पीछे थी – तीन मंजिला, पुरानी लेकिन साफ-सुथरी। सीढ़ियां चढ़ते वक्त उसके पैर भारी लग रहे थे। रूम 204 के दरवाजे पर उसने दस्तक दी।

    “आ जा!” अंदर से चुलबुली आवाज आई।

    प्रिया ने दरवाजा खोला। रूम छोटा लेकिन आरामदायक था – दो बेड, दो अलमारियां, एक टेबल, और खिड़की से पहाड़ दिख रहे थे। एक बेड पर एक लड़की बैठी थी – बालों में हाईलाइट्स, लिपस्टिक लगाए, मोबाइल पर स्क्रॉल कर रही। वो देखते ही उठी और बोली, “हाय! तू नई रूममेट है? मैं रिया मेहता। मुंबई से। और तू?”

    “प्रिया… प्रिया शर्मा।” प्रिया ने शर्माते हुए कहा और बैग नीचे रखा।

    रिया ने उसे ऊपर से नीचे देखा और फिर मुस्कुराई। “क्यूट लग रही है यार! सादगी का स्टाइल। चल, सामान रख और चाय पीते हैं। कैंटीन चलेंगी?”

    प्रिया ने हां कहा। रिया बहुत बातूनी थी। रास्ते में बताती गई – “ये कॉलेज टॉप है। अमीर लड़कियां ज्यादा हैं। लेकिन पार्टीज कमाल की होती हैं। तू क्या कोर्स कर रही है? बीए?”

    “हां… इंग्लिश ऑनर्स।” प्रिया ने धीरे से कहा।

    कैंटीन में पहुंचते ही प्रिया को लगा जैसे अलग दुनिया में आ गई हो। बड़ी-बड़ी टेबल्स, कॉफी मशीन, पिज्जा-बर्गर के मेन्यू। रिया ने दो चाय और समोसे ऑर्डर किए। बैठते हुए बोली, “बता ना, तू कहां से है? फैमिली? बॉयफ्रेंड?”

    प्रिया हिचकिचाई। फिर बोली, “हिमाचल के छोटे कस्बे से। अनाथ आश्रम में पली हूं। फैमिली… कोई नहीं।”

    रिया चुप हो गई। फिर प्रिया का हाथ थामा और बोली, “सॉरी यार। मैं बेवकूफ हूं। लेकिन तू स्ट्रॉन्ग है। यहां सबके पास्ट होते हैं। मैं भी… पापा-मम्मी अलग हो गए हैं। लेकिन हम फ्यूचर बनाएंगे ना?”

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। पहली बार किसी ने उसे जज नहीं किया। दोनों चाय पीते रहे। रिया ने कॉलेज की गॉसिप बताई – कौन सी लड़की किससे डेट कर रही, कौन सी टीचर स्ट्रिक्ट है।

    फिर क्लास का टाइम हुआ। पहली क्लास इंग्लिश की थी। हॉल बड़ा था, करीब सौ लड़कियां। प्रोफेसर ने कहा, “न्यू सेशन, न्यू स्टूडेंट्स। सब अपना इंट्रोडक्शन दें।”

    प्रिया की बारी आई। वो उठी, आवाज कांपी – “मेरा नाम प्रिया शर्मा है। मैं हिमाचल से हूं। स्कॉलरशिप पर आई हूं।”

    सब शांत। कुछ लड़कियां फुसफुसाईं। तभी पीछे से एक लड़के की आवाज आई – “प्रिया? कूल नेम। मैं आरव ठाकुर। वेलकम टू कॉलेज।”

    प्रिया ने पलटा। हॉल के आखिरी बेंच पर एक लड़का बैठा था – लंबा, गोरा, हल्की दाढ़ी, ब्रांडेड जैकेट। मुस्कुरा रहा था। आंखें गर्म। प्रिया का दिल एक पल को धड़का। लेकिन वो जल्दी से बैठ गई।

    क्लास के बाद रिया ने कहा, “वो आरव है यार। कॉलेज का क्रश। अमीर फैमिली, शिमला के बड़े बिजनेसमैन का बेटा। लेकिन घमंडी नहीं। सबको हेल्प करता है।”

    प्रिया ने कुछ नहीं कहा, लेकिन मन में कुछ हलचल हुई।

    शाम को हॉस्टल में प्रिया ने अपना सामान व्यवस्थित किया। डायरी निकाली। फोटो देखी। तभी रिया बोली, “कल फ्रेशर्स पार्टी है। तुझे ड्रेस चाहिए। मेरी अलमारी से ले ले।”

    प्रिया ने मना किया, लेकिन रिया नहीं मानी। एक ब्लू कुर्ती दी – “ये पहनना। क्यूट लगेगी।”

    रात को प्रिया सो नहीं पाई। वो अनजान कॉल सोच रही थी। उसने फोन चेक किया – नंबर सेव नहीं था। ब्लॉक कर दिया। लेकिन डर लगा।

    अगले दिन क्लास में आरव ने प्रिया के पास नोट्स रख दिए। “ये ले, अगर मिस हो गया हो तो।” प्रिया ने थैंक्स कहा। लंच में रिया ने जबरदस्ती उसे अपने ग्रुप में बिठाया। आरव भी था।

    आरव ने पूछा, “सेटल हो गई? कोई प्रॉब्लम हो तो बता। मैं सीनियर हूं।”

    प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “थैंक यू। सब ठीक है।”

    आरव ने अपनी स्टोरी शेयर की – “मेरा घर शिमला में ही है। पापा होटल बिजनेस करते हैं। लेकिन मम्मी… दो साल पहले गुजर गईं। तब से थोड़ा अकेला फील करता हूं।”

    प्रिया को लगा जैसे कोई अपना सा मिल गया। दोनों की आंखें मिलीं। एक पल को दुनिया रुक सी गई।

    शाम को फ्रेशर्स पार्टी। हॉल सजा हुआ था – लाइट्स, म्यूजिक, डांस फ्लोर। प्रिया रिया की कुर्ती में थी। पहली बार मेकअप किया था। वो आईने में खुद को देखकर शर्मा गई।

    पार्टी में एंट्री करते ही रिया ने कहा, “वाह यार! बॉम्ब लग रही है।”

    डांस शुरू हुआ। प्रिया कोने में खड़ी थी। तभी आरव आया। सफेद शर्ट, ब्लैक जैकेट। हैंडसम। उसने हाथ बढ़ाया – “डांस करेगी?”

    प्रिया हिचकिचाई। “मुझे नहीं आता।”

    “कोई नहीं। मैं सिखाता हूं।”

    आरव ने उसका हाथ पकड़ा। धीरे-धीरे डांस शुरू हुआ। संगीत रोमांटिक था। प्रिया का दिल तेज़ धड़क रहा था। पहली बार किसी लड़के ने इतना क्लोज फील किया।

    तभी एक लड़की आई – लंबे बाल, रेड ड्रेस। अवनी शर्मा। कॉलेज की क्वीन बी। वो आरव के पास आई और बोली, “आरव, डांस?” फिर प्रिया को घूरकर कहा, “स्कॉलरशिप वाली? यहां अमीरों का क्लब है बेबी। बाहर जाकर पढ़ाई कर।”

    सब हंस पड़े। प्रिया का चेहरा लाल हो गया। आंखें भर आईं। वो भागी। बाहर लॉन में अकेली बैठ गई। रोने लगी। “मैं यहां क्यों आई? सब मुझे जज करेंगे।”

    तभी आरव आया। “प्रिया… सॉरी। अवनी वैसी है। तू मत रो। तू स्पेशल है। तेरी आंखों में कुछ है… जो मुझे अच्छा लगता है।”

    प्रिया ने आंसू पोंछे। “थैंक यू आरव। लेकिन मैं… मैं अनाथ हूं। मेरे पास कुछ नहीं।”

    आरव ने उसका हाथ थामा। “मेरे पास सब है, लेकिन खुशी नहीं। तू मुझे खुशी दे सकती है।”

    प्रिया ने हाथ छुड़ाया और रूम की ओर चली गई। दिल में तूफान था – प्यार की शुरुआत? या फिर खतरे की?

    रूम में पहुंचते ही उसने बैग खोला। अंदर एक लिफाफा था – जो पहले नहीं था। अंदर एक चिट – “प्रिया, तेरी मां का नाम रानी था। वो शिमला में ही मरी। मत ढूंढना, खतरा है।”

    प्रिया कांप गई। ये लिफाफा कैसे आया? कौन रख गया? और आरव… क्या वो जानता है कुछ?

    रात गहरा गई। बाहर हवा चल रही थी। प्रिया की नई जिंदगी शुरू हो चुकी थी – दोस्ती, प्यार, और छिपे राजों के साथ।

     

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    Lakshmi Kumari

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  • मेरा बच्चा मेरी जान

    मेरा बच्चा मेरी जान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    मीरा और अजय की मुलाकात कॉलेज में हुई थी। दोनों एक-दूसरे की कंपनी में बहुत खुश रहने लगे थे। मीरा की मुस्कान अजय के दिल की धड़कन को तेज कर देती थी, और अजय की हंसी मीरा के चेहरे पर एक चमक ला देती थी। धीरे-धीरे, उनके बीच एक गहरा रिश्ता बन गया। 

     

    एक दिन, जब वे दोनों पार्क में टहल रहे थे, अजय ने हिम्मत जुटाकर मीरा से कहा, “क्या तुम मुझसे शादी करोगी?” मीरा का दिल खुशी से झूम उठा। उसने बिना एक पल सोचे हुए कहा, “हाँ! मुझे भी तुमसे शादी करनी है।” दोनों ने अपनी खुशियों का जश्न मनाया, लेकिन खुशी जल्दी ही चिंता में बदल गई।

     

    जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, अजय ने अपने परिवार को मीरा के बारे में बताया। लेकिन अजय के परिवार ने इस रिश्ते का विरोध किया। उनके विचार अलग थे। अजय के माता-पिता चाहते थे कि उनका बेटा किसी ऐसे परिवार से शादी करे जो उनके सामाजिक मान-मर्यादा के अनुरूप हो। 

     

    मीरा यह सब सुनकर बहुत दुखी हुई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि प्यार में आने के बाद भी उनके रिश्ते को स्वीकृति क्यों नहीं मिल रही। 

     

    जब कोई उसकी शादी के लिए नहीं माना तो अजय और मीरा ने अपनी शादी की योजनाएँ चुपचाप बनानी शुरू कर दीं। उन्होंने समझ लिया था कि अगर वे अपने परिवारों से बिना किसी संघर्ष के शादी कर लेंगे, तो यह उनके लिए बेहतर होगा। दोनों की प्रेम कहानी में इस पल ने एक नया मोड़ ले लिया। 

     

    एक सुबह, जब सूरज की पहली किरणें धरती पर बिखर रही थीं, अजय और मीरा ने एक छोटे से मंदिर में शादी करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने निकटतम मित्रों को बुलाया, जो उनके इस फैसले में उनका समर्थन कर रहे थे। विवाह का दिन आया और दोनों ने एक-दूसरे के साथ फेरे लेकर अपने जीवन को एक नई दिशा देने की ठानी।

     

    शादी के बाद, अजय और मीरा ने एक छोटे से शहर में रहने का निर्णय लिया। उन्होंने एक नया जीवन शुरू किया, जिसमें केवल प्रेम और समझ ही थी। अब वे दोनों एक-दूसरे के साथ हर सुख-दुख में खड़े रहे। मीरा ने एक स्कूल में अध्यापन कार्य करना शुरू किया, जबकि अजय ने एक प्रौद्योगिकी कंपनी जॉइन की। दोनों की जिंदगी में काम और प्यार का अच्छा संतुलन बन गया था।

     

    लेकिन अपने परिवार से दूर रहने का दर्द कभी-कभी उन्हें तड़पाता था। मीरा अक्सर सोचती थी कि उनके परिवार का क्या हाल होगा, और अजय भी अपने माता-पिता की याद में उदास हो जाता था। एक दिन, मीरा ने अजय से कहा, “हमने अपने प्यार के लिए साहस दिखाया, लेकिन क्या हम अपने परिवारों के साथ भी बातचीत नहीं कर सकते?

     

    अजय ने उसकी बात पर विचार किया और दोनों ने मिलकर फैसला किया कि वे अपने परिवार से बात करेंगे। उन्होंने अपने परिवारों को एक साथ बुलाया ताकि उन्हें अपने रिश्ते की सच्चाई बताई जा सके। मीरा ने अजय के माता-पिता से आदर से बात की। उसने उन्हें अपनी भावनाएं और अजय के साथ अपने रिश्ते की गहराई समझाने की कोशिश की। हालांकि पहले तो अजय के माता-पिता त्यार नहीं हुए,

     

    कुछ समय बाद मीरा प्रेगनेट हुई ये बात अजय के घर पता चला अजय के माता-पिता ने इस खुशी को सुनकर अपने मन में संदेह और विचारों के बीच द्वंद्व अनुभव किया। वे शुरुआत में इस रिश्ते को लेकर चिंतित थे, लेकिन अब उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उन्हें लगा कि मीरा और अजय का परिवार बढ़ने जा रहा है, और यह अवसर उन्हें एक नयी सोच पर विचार करने के लिए मजबूर कर रहा था।

     

    जब अजय के माता-पिता मीरा के पास पहुंचे, तो उनके चेहरे पर खुशी की चमक थी। उन्होंने मीरा से कहा, “हमने जो किया, उसमें हमें शायद गलतफहमी थी। अब तबियत ठीक आने पर हम सबको एक साथ मिलकर खुशी मनाने की जरूरत है।” मीरा ने अजय के माता-पिता की बात सुनकर राहत की सांस ली। उसने उन्हें बताया, “मैं जानती हूँ कि हम आपके लिए अजनबी हैं, लेकिन मेरा प्यार और अजय की खुशी ही सबसे महत्वपूर्ण हैं।”

     

    कुछ समय में मीरा ने एक बेटी को जन्म दिया सब लोग बहुत खुश अजय के माता पिता भी बहुत खुश हुए । कुछ समय मीरा के बेटी का अचानक तबियत खराब हो गया   सब बच्चे को लेकर हॉस्पिटल जाते है डॉक्टर बताते है बची चल नहीं सकती  है 

     

    जब मीरा और अजय ने डॉक्टर की बात सुनी, तो उनकी दुनिया जैसे थम गई। उनके चारों ओर का माहौल अचानक ही भयानक और अंधेरे से भर गया। मीरा ने अपने छोटे से बच्ची को अपने क arms में कस के पकड़ लिया, उसका दिल बुरी तरह से टूट रहा था। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह इस स्थिति में क्या करे।

     

    अजय ने मीरा के कंधे पर हाथ रखा और उसने कहा, “हमाक पास कोई और रास्ता नहीं है। हमें लड़ना होगा। हम अपनी बेटी के लिए सब कुछ करेंगे।” लेकिन अजय के शब्दों में वो विश्वास नहीं था, जिसे वह खुद भी महसूस कर सके। उसने डॉक्टर से और जानकारी मांगी। 

     

    डॉक्टर ने कहा, “यह मामला गंभीर है। हमें आज ही कुछ परीक्षण करने होंगे। लेकिन, हमें ईमानदार रहना होगा – स्थिति बहुत कठिन है।” उन दोनों को हर एक पल में अपनी बेटी की सांसों को बचाने का प्रयास करते हुए, हर मिनट का इंतज़ार हुआ, उम्मीद और डर के बीच झूलते हुए।

     

    कुछ घंटों बाद, डॉक्टर ने कहा कि उन्हें एक और विशेषज्ञ की सलाह लेना होगी। अजय ने मीरा से कहा, “हमारे पास समय कम है, हमें हर संभव प्रयास करना होगा।” उन्होंने विशेषज्ञ से बात की, जो एक उच्च स्तरीय अस्पताल से आई थी। 

     

    डॉक्टर ने आश्वासन दिया कि वे अपनी पूरी कोशिश करेंगे। मीरा और अजय ने अपनी बेटी के लिए प्रार्थना की और सकारात्मक सोचते रहने का प्रयास किया। समय बीतता गया, लेकिन निराशा का अंधेरा उनके पास आ रहा था। 

     

    आखिरकार, जब उनकी बच्ची को ऑपरेशन थिएटर में ले जाने का समय आया, तब मीरा का दिल टूट रहा था। उसने अपने पति से कहा, “क्या हमें यह सब मिलकर सहन करना पड़ेगा? हमारी छोटी सी बेबी इतनी जल्दी हमें छोड़कर नहीं जा सकती।” 

     

    अजय ने मीरा को गले लगाया और कहा, “हम उसे एक मौका देंगे, हम उसे नहीं छोड़ेंगे। उसे हमारी जरूरत है।” दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामे रखा, आँसुओं के साथ प्रार्थना की। 

     

    कुछ समय बीतने के बाद, डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने कहा, “हमने सफलतापूर्वक ऑपरेशन कर लिया है, लेकिन उसे अब कुछ समय चाहिए। स्थिति स्थिर है, लेकिन आपको संयम रखना होगा।” मीरा और अजय ने राहत की सांस ली, लेकिन उनकी चिंता अभी खत्म नहीं हुई थी।

     

    हॉस्पिटल के दिनों में, मीरा और अजय ने अपनी बेटी का हर क्षण संभाला। जब भी वे अस्पताल में अपने बेटे को देखते, उनकी आंखों में वो प्यार और दुख मिक्स होकर आता। 

     

    थोड़े समय बाद, अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी मीरा की बेटी को घर पर थोड़ी देखभाल की जरूरत थी। इस समय ने उन्हें एक-दूसरे का सहारा बनने का मौका दिया। 

     

    मीरा ने कहा, “हमें अपनी बेटी को दिखाना होगा कि हम कितने सशक्त हैं। हम हर दर्द और मुश्किल का सामना कर सकते हैं, जब हम एक-दूसरे के साथ हैं।” अजय ने भी हामी भरी, “हम अपने परिवार को और भी मजबूत बनाएंगे।”

     

    धीरे-धीरे, मीरा और अजय की बेटी ने सुधार दिखाना शुरू किया। वे हर दिन उसकी देखभाल करते, उसे प्यार से सहलाते, और उसे बताते कि वह कितनी खास है। उनका परिवार, जो पहले संघर्ष का सामना कर रहा था, अब एक नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहा था। 

     

    इस कठिनाइयों ने अजय और मीरा के रिश्ते को और मजबूत किया। उन्होंने यह महसूस किया कि सच्चा प्यार सिर्फ खुशी नहीं लाता, बल्कि कठिन समय में भी साहस और समर्थन का एहसास कराता है। 

     

    समय के साथ, उनकी बेटी पूरी तरह से स्वस्थ हो गई, और अजय तथा मीरा ने मिलकर एक जीने योग्य जीवन की दिशा में अपने कदम बढ़ाए। उनकी कहानी सिर्फ एक संघर्ष की नहीं, बल्कि प्यार की शक्ति की थी जो हर बाधा को पार कर सकती है।

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • सावन

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    🌧️ सावन 🌿

    सावन आया, बदली छाई,

    मिट्टी ने फिर खुशबू पाई।

    बूंदों ने जब गीत सुनाया,

    मन ने भी कुछ याद किया।

    पेड़ों पर झूले, होंठों पर गान,

    हर ओर बिखरा प्रेम का अरमान।

    ठंडी हवा जब छूकर जाए,

    सावन दिल को फिर महकाए। ❤️

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • कहीं देर न हो जाए साजन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    रात के बारह बज रहे थे।

    कमरे में सिर्फ एक दीया जल रहा था। उसकी काँपती लौ दीवार पर मेरी परछाईं बना रही थी। खिड़की के बाहर हवा चल रही थी। नीम के पेड़ की पत्तियाँ सरसरा रही थीं। मैं चारपाई पर बैठी थी। गोद में एक पुरानी चिट्ठी थी—उसकी लिखी हुई। किनारे मुड़े हुए, स्याही फीकी पड़ चुकी थी।

     

    मैं बार-बार वही पंक्ति पढ़ रही थी “जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए साजन।”

     

    साजन।

    वह मुझे यही कहकर बुलाता था।

     

    मेरा नाम सुमित्रा है। इस गाँव में मेरा जन्म हुआ, यहीं मेरी शादी तय हुई, और यहीं मैं पिछले सात साल से उसका इंतजार कर रही हूँ। लोग कहते हैं कि इंतजार भी एक उम्र होती है। मेरी उम्र इंतजार में ही कट गई।

     

    वह था किशन। गाँव का ही लड़का। गेहूँ के खेतों में काम करने वाला, लेकिन सपनों में शहर बसाने वाला। पहली बार मैंने उसे मेले में देखा था। वह लाल पगड़ी बाँधे हुए था। आँखें इतनी तेज कि लग रहा था जैसे सूरज उनमें उतर आया हो। उसने मुझे देखा और मुस्कुरा दिया। बस। उसी मुस्कान ने मेरी जिंदगी बदल दी।

     

    फिर शुरू हुई वह खट्टी-मीठी बातें। नदी किनारे मिलना, खेत की मेड़ पर बैठकर सपने देखना, और रात को चुपके से खिड़की के नीचे आकर गाना—

    “सुमित्रा… कहीं देर न हो जाए साजन…”

     

    मैं हँसती—“क्या देर हो जाएगी? मैं तो यहीं हूँ।”

    वह गंभीर हो जाता—“पता नहीं। जिंदगी बड़ी चंचल है। कभी-कभी खुशियाँ भी देर कर देती हैं।”

     

    शादी तय हो गई। दोनों घर राजी। तारीख भी तय हो गई—अगले साल फागुन की एक तारीख। लेकिन उससे पहले किशन को शहर जाना पड़ा। मजदूरी के लिए। पिता बीमार थे, कर्ज चढ़ा हुआ था। उसने कहा—“एक साल। सिर्फ एक साल। पैसे जमा करके लौटूँगा। फिर कभी नहीं जाऊँगा।”

     

    मैंने उसकी उँगली पकड़ी थी। “जल्दी आना। कहीं देर न हो जाए साजन।”

    वह हँसा था। “देर कैसे होगी? तुम इंतजार करोगी तो मैं हवा से भी तेज दौड़कर आऊँगा।”

     

    वह चला गया।

    पहले महीने चिट्ठियाँ आईं। हर चिट्ठी में वही बात—“जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए।”

    फिर चिट्ठियाँ कम होने लगीं। कभी-कभी दो-दो महीने बाद आतीं। पैसे भेजता था। घर का कर्ज उतरने लगा। पिताजी की दवाइयाँ चलने लगीं।

     

    तीसरे साल एक चिट्ठी आई जिसमें लिखा था—“यहाँ काम बढ़ गया है। थोड़ा और समय लगेगा। तुम घबराना मत। मैं आ रहा हूँ।”

     

    मैंने जवाब में लिखा—“आ जाना। कहीं देर न हो जाए साजन। मैं थकने लगी हूँ इंतजार करते-करते।”

     

    जवाब नहीं आया।

     

    पाँचवें साल गाँव में अफवाह उड़ी कि किशन ने शहर में किसी और से शादी कर ली है। लोग मेरे घर आने लगे। सहानुभूति दिखाने वाले, ताने देने वाले, और रिश्ते लेकर आने वाले। पिताजी ने कहा—“कब तक बैठेगी? उम्र निकल रही है।”

    माँ रोती रहीं।

    मैंने सिर्फ इतना कहा—“वह आएगा। उसने वादा किया है।”

     

    सात साल हो गए।

    अब घर में सिर्फ मैं और माँ बची हूँ। पिताजी चल बसے۔ भाई शहर में बस गए। गाँव वाले मुझे ‘वह औरत’ कहकर बुलाते हैं जो बावली हो गई है इंतजार में।

     

    हर शाम मैं उसी खिड़की के पास बैठती हूँ जहाँ कभी किशन खड़ा होता था। दीया जलाती हूँ। और वही चिट्ठी पढ़ती हूँ।

     

    आज भी वही कर रही थी कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई।

    रात के बारह बज रहे थे। कौन आ सकता है?

     

    मैंने दीया उठाया और दरवाजा खोला।

    बाहर एक आदमी खड़ा था। चेहरा दुबला, बाल सफेद मिश्रित, कंधे झुके हुए। हाथ में एक छोटी सी गठरी।

     

    मैंने पहचाना नहीं।

    फिर उसने सिर उठाया। आँखें वही थीं—सूरज वाली।

     

    “सुमित्रा…” उसकी आवाज काँप रही थी। “कहीं देर तो नहीं हो गई ना?”

     

    मेरे हाथ से दीया गिर गया। अंधेरा हो गया। लेकिन मैंने उसे देख लिया था।

    “किशन…?”

     

    वह अंदर आया। दरवाजा बंद किया। फिर बस खड़ा रहा। जैसे हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हो।

     

    “बोल… कहाँ रहा इतने साल?” मेरी आवाज में गुस्सा था, दर्द था, और एक अजीब सी राहत भी।

     

    वह बैठ गया फर्श पर। “जेल में।”

     

    सन्नाटा।

    “जेल?”

     

    “हाँ। शहर में एक मिल में काम करता था। मालिक ने मजदूरों की मजदूरी मार ली। हमने विरोध किया। झड़प हो गई। एक आदमी मर गया। पुलिस ने हमें पकड़ लिया। मुझे सात साल की सजा हुई। मैंने तुम्हें चिट्ठी लिखी… लेकिन जेल से चिट्ठी नहीं जाने दी उन्होंने। फिर जब छूटा तो सोचा था कि सीधे गाँव आऊँगा। लेकिन शरीर ने साथ नहीं दिया। तपेदिक हो गया था। अस्पताल में छह महीने पड़ा रहा। आज ठीक होकर आया हूँ।”

     

    उसने गठरी खोली। अंदर कुछ पुरानी चिट्ठियाँ थीं—मेरी लिखी हुई। और एक छोटी सी डिब्बी।

     

    “यह तुम्हारे लिए। हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर मैंने एक चूड़ी रखी। सात चूड़ियाँ हैं। सोचता था कि जब आऊँगा तो खुद पहनाऊँगा।”

     

    मैं रो पड़ी।

    “तुमने कहा था कहीं देर न हो जाए… और देर हो गई किशन। मेरे पिताजी नहीं रहे। मेरी जवानी चली गई। गाँव वाले मुझे बावली कहते हैं।”

     

    वह मेरे पास घुटनों के बल आया। “माफ कर देना। मैंने वादा तोड़ा। लेकिन हर रात जेल में वही दोहराता रहा—‘कहीं देर न हो जाए साजन’। तुम्हारा नाम लेकर सोता था। तुम्हारा नाम लेकर उठता था।”

     

    मैंने उसका चेहरा देखा। वह पहले जैसा नहीं था। लेकिन आँखें वैसी ही थीं।

     

    “अब क्या होगा?” मैंने पूछा।

     

    “जो तुम कहोगी। अगर तुम कहो तो मैं लौट जाऊँ। अगर तुम कहो तो यहीं रहूँ। मेरे पास कुछ नहीं बचा—न जवानी, न पैसा, न इज्जत। बस एक अधूरा वादा बचा है।”

     

    मैं उठी। दीया फिर से जलाया। फिर उसकी डिब्बी से एक-एक चूड़ी निकाली। सात चूड़ियाँ। लाल, हरी, पीली… जैसे सात साल के इंतजार के रंग हों।

     

    “पहनाओ,” मैंने कहा।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे। उसने मेरी कलाई पर चूड़ियाँ पहनाईं। एक-एक करके। जब आखिरी चूड़ी पहनाई तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “अब देर नहीं हुई,” मैंने कहा। “तुम आ गए। बस इतना काफी है।”

     

    उस रात हमने बातें कीं। सालों की बातें। जेल की बातें, इंतजार की बातें, डर की बातें। सुबह होते-होते वह मेरे कंधे पर सर रखकर सो गया। मैं जागती रही। उसकी साँसें गिनती रही।

     

    गाँव में सुबह होते ही हलचल मच गई। “किशन लौट आया!”

    कुछ लोग खुश हुए, कुछ ने नाक-भौं सिकोड़ी। “अब क्या करेगा? जेल का पाला हुआ।”

    माँ ने उसे गले लगा लिया। रोती रहीं।

     

    फिर दिन बीतने लगे।

    किशन ने फिर से खेत संभाले। शरीर कमजोर था, लेकिन हिम्मत मजबूत। मैं उसके साथ काम करने लग गई। लोग देखते रहे। बातें बनाते रहे। लेकिन हमें फर्क नहीं पड़ा।

     

    एक दिन नदी किनारे हम दोनों बैठे थे। वही जगह जहाँ कभी सपने देखते थे।

     

    किशन ने कहा, “सुमित्रा, अब शादी कर लें?”

     

    मैं मुस्कुराई। “सात साल बाद? लोग हँसेंगे।”

     

    “हँसने दो। हमने काफी रो लिया।”

     

    शादी हुई। छोटी सी। सिर्फ माँ, दो-चार रिश्तेदार और पुराने दोस्त। कोई धूमधाम नहीं। बस एक मंडप, एक पुरोहित और दो लोग जो सालों बाद एक-दूसरे के हुए।

     

    रात को जब सब चले गए तो किशन ने मेरा हाथ पकड़ा। “अब कोई देर नहीं रहेगी। न आने में, न जाने में। मैं जहाँ भी रहूँगा, तुम्हारे साथ रहूँगा।”

     

    मैंने सिर उसके सीने पर रख दिया। “कहीं देर न हो जाए साजन… यह वाक्य अब डराता नहीं। अब तो लगता है कि देर होकर भी सब कुछ समय पर हुआ।”

     

    साल बीतते गए।

    हमारे घर में एक बेटी हुई। नाम रखा हमने—आस।

    आस बड़ी हुई। खेतों में दौड़ती, नदी में खेलती। किशन उसे बाँहों में लेकर गाता—“मेरी आस… कहीं देर न हो जाए।”

     

    एक शाम किशन बहुत थका हुआ घर लौटा। बुखार था। मैंने सिर पर कपड़ा रखा। दवा दी। रात भर जागती रही।

     

    सुबह उसने मेरा हाथ पकड़ा। “सुमित्रा… लग रहा है इस बार देर हो जाएगी।”

     

    मेरा दिल धड़कने लगा। “मत बोलो ऐसा। तुम ठीक हो जाओगे।”

     

    वह मुस्कुराया। “ठीक हो या न हो… तुमसे मिल लिया। इंतजार खत्म हो गया। अब कोई देर नहीं।”

     

    दो दिन बाद वह चल बसा।

    आराम से। जैसे कोई लंबी यात्रा पूरी करके सो गया हो।

     

    गाँव वाले आए। फिर वही सहानुभूति, वही बातें।

    मैंने रोया। खूब रोया। लेकिन अंदर कोई खालीपन नहीं था।

     

    अब सालों बीत गए। आस बड़ी हो गई। उसकी शादी हो गई। मैं अकेली रहती हूँ उसी घर में। हर रात दीया जलाती हूँ। खिड़की के पास बैठती हूँ।

     

    और कभी-कभी हवा के साथ वही आवाज आती है “कहीं देर न हो जाए साजन…”

     

    मैं मुस्कुरा देती हूँ।

    “नहीं साजन। अब कोई देर नहीं।

    तुम आ गए थे।

    समय पर आ गए थे।

    और मेरा इंतजार… कभी व्यर्थ नहीं गया।”

     

    क्योंकि कुछ मुलाकातें देर से होती हैं।

    लेकिन जब होती हैं तो जिंदगी भर के इंतजार को अर्थ दे देती हैं।

    और कुछ वाक्य… बस वाक्य नहीं होते।

    वे एक पूरा जीवन बन जाते हैं।

     

    “कहीं देर न हो जाए साजन।”

    यह वाक्य अब डर नहीं।

    यह मेरी साँस है।

    यह मेरी याद है।

     

     

    1. यह मेरा किशन है।
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    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • बेवफाई भाग 2

    बेवफाई भाग 2

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

     

    Part 2

     

    छह महीने बाद, 

     

    अगले छह महीने रिया ने खुद को पूरी तरह काम में डुबो दिया। वह एक छोटे से डिजाइन स्टूडियो में काम करती थी। आरव से अलग होने के बाद उसने खुद को संभालना सीखा।

     

    पहले वह हर रात रोती थी। फिर रोना बंद हो गया। पहले उसे आरव की याद आती थी। फिर उसने खुद को याद करना शुरू किया। उसने अपने स्टूडियो को बड़ा किया।

     

    नई टीम बनाई। और छह महीने बाद… रिया का नाम मुंबई के युवा फैशन डिजाइनरों में गिना जाने लगा।

    वो रिया जिसे कुछ महीनों पहले तक कोई नहीं जानता था आज उसने अपना एक मुकाम हासिल कर लिया था। 

     

    एक दिन उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला। क्लाइंट का नाम देखकर वह कुछ सेकंड के लिए चुप रह गई।

     

    आरव मल्होत्रा। उसकी कंपनी। रिया ने फाइल बंद कर दी। “मैं ये प्रोजेक्ट नहीं करूंगी।”

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद उसे क्लाइंट की शर्तों के बारे में पता चला।

     

    प्रोजेक्ट किसी और डिजाइनर को नहीं दिया जा सकता था। उसे ही करना था।

     

    रिया ने गहरी सांस ली। “ठीक है।”

     

    उसे क्या पता था कि यह मुलाकात उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच सामने लाने वाली थी।

     

    —

     

    अगले दिन वह आरव के ऑफिस पहुंची। दरवाजा खोलते ही उसकी नजर आरव पर पड़ी।

     

    छह महीने में वह बदल चुका था।

     

    चेहरे पर पहले से ज्यादा थकान थी। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे। लेकिन सबसे ज्यादा अजीब था…

    उसकी आंखों में दर्द। रिया ने फाइल टेबल पर रखी।

     

    “प्रोजेक्ट की सारी डिटेल्स मैंने देख ली हैं।”

     

    आरव उसे देखता रहा। “तुम ठीक हो?”

     

    रिया ने ठंडी आवाज में कहा, “ये सवाल अब तुम्हें पूछने का अधिकार नहीं है।”

     

    आरव चुप हो गया। दोनों के बीच कुछ सेकंड की खामोशी रही।

     

    फिर रिया ने कहा, “काम की बात करें?”

     

    आरव ने सिर हिलाया, “हां।”

     

    दोनों प्रोफेशनल हो गए, कम से कम बाहर से।

     

    लेकिन हर मुलाकात में कुछ अनकहा रह जाता।

     

    एक दिन अचानक आरव ने पूछा, “तुमने दोबारा शादी क्यों नहीं की?”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा। “तुमने की?”

     

    आरव चुप हो गया। रिया मुस्कुरा दी। “मुझे भी जवाब नहीं चाहिए।”

     

    वह वहां से जाने लगी। तभी आरव ने कहा, “रिया…”

     

    वह रुक गई। “मैंने तुम्हारे साथ बेवफाई नहीं की थी।”

     

    रिया के चेहरे पर कठोरता आ गई। “फिर मीरा कौन थी?”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं। “वो मेरी बहन है।”

     

    रिया जैसे पत्थर की बन गई। “क्या?”

     

    आरव बोला, “मेरी छोटी बहन।”

     

    रिया कुछ बोल नहीं पाई। आरव ने टेबल की दराज खोली और एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    उसमें मेडिकल रिपोर्ट्स थीं। “मीरा को कैंसर था।”

     

    रिया के हाथ कांपने लगे। “क्या?”

     

    आरव, “डॉक्टर ने कहा था कि उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है।” आरव की आवाज टूटने लगी।

     

    “मीरा मेरी वजह से नहीं… मेरी वजह से नहीं, बल्कि इसलिए मेरी जिंदगी में वापस आई थी क्योंकि उसकी आखिरी इच्छा थी कि मैं उसे अपनी जिंदगी में खुश देखूं।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले।“तो तलाक?”

     

    आरव, “वो भी झूठ था।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “क्योंकि मुझे लगा… अगर मैं तुम्हें अपने से दूर कर दूंगा, तो तुम सुरक्षित रहोगी।”

     

    रिया ने हैरानी से उसे देखा। “किससे?”

     

    आरव ने धीरे से कहा, “मेरे पिता से।”

     

    रिया कुछ समझ नहीं पाई।

     

    आरव ने बताया कि उसके पिता एक बड़े घोटाले में फंस चुके थे और उनके दुश्मन आरव के परिवार को नुकसान पहुंचाना चाहते थे।

     

    कुछ लोगों ने रिया को धमकी देना शुरू कर दिया था।

     

    आरव ने पुलिस को सब बताया था, लेकिन जब तक सबूत नहीं मिलते, वह उसे सुरक्षित रखना चाहता था।

     

    इसलिए उसने दुनिया के सामने मीरा के साथ रिश्ता होने का नाटक किया, क्योंकि किसी को नहीं पता था आरव की कोई छोटी बहन है। 

     

    और जिससे लोग समझें कि उसका और रिया का रिश्ता खत्म हो चुका है। “लेकिन तुमने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए। “क्योंकि मुझे डर था कि अगर तुम्हें पता चल गया तो तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी।”

     

    रिया ने धीमे से कहा, “और तुमने सोचा कि झूठ बोलकर मुझे बचा लोगे?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “मैं गलत था।”

     

    रिया की आंखों में दर्द था। “हां… तुम गलत थे।”

     

    वह उसके करीब आई। और उसका कॉलर पकड़ते हुए टूटी आवाज में बोली, “तुमने मेरी जान तो बचा ली, आरव…”

     

    उसकी आवाज कांप गई। “लेकिन मेरे अंदर का भरोसा मार दिया।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बहते रहे। “मैं जानता हूं।”

     

    “मैंने छह महीने तुम्हें नफरत किया।”

     

    “मैंने भी।”

     

    “मैं हर रात सोचती थी कि तुमने मुझे धोखा दिया।”

     

    “मैं हर रात तुम्हारी तस्वीर देखकर खुद को कोसता था।” आरव ने दर्द भरी आवाज में कहा। 

     

    दोनों चुप हो गए। कुछ रिश्तों में प्यार खत्म नहीं होता।

    बस दर्द इतना बढ़ जाता है कि प्यार दिखाई देना बंद हो जाता है।

     

    —

     

    कुछ दिनों बाद मीरा खुद रिया से मिलने आई। वह बहुत कमजोर थी। उसने रिया का हाथ पकड़ लिया। “भाभी…”

    रिया की आंखें भर आईं। “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

     

    मीरा मुस्कुराई। “लेकिन एक गलती मेरी थी।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    मीरा, “मैंने भाई से कहा था कि अगर वो आपसे सच बताएगा तो आप उसे कभी माफ नहीं करेंगी।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुरा दी। “और अब?”

     

    मीरा ने कहा, “अब लगता है कि प्यार में सबसे बड़ी बेवफाई झूठ बोलना नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी। “बल्कि सामने वाले को सच जानने का अधिकार न देना है।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। मीरा चली गई। रिया बहुत देर तक वहीं बैठी रही।

     

    —

     

    एक साल बाद। समुद्र के किनारे वही जगह जहां कभी आरव ने उसे प्रपोज किया था।

     

    आरव वहां खड़ा था। रिया धीरे-धीरे उसके पास आई।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “तुम यहाँ आई।”

     

    रिया मुस्कुरा दी। “हां।”

     

    आरव, “क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो?”

     

    रिया ने कुछ पल उसे देखा। “माफ कर दिया।”

     

    आरव की आंखों में उम्मीद जगी।

     

    “लेकिन…” रिया ने उसकी बात रोक दी। “भरोसा वापस आने में वक्त लगेगा।”

     

    आरव ने सिर हिलाया। “मैं इंतजार करूंगा।”

     

    रिया उसके पास आई। “और अगर फिर कभी मुझे बचाने के लिए मुझसे झूठ बोला…”

     

    आरव मुस्कुरा दिया। “तो?”

     

    “तो इस बार सच में तलाक ले लूंगी।”

     

    दोनों हंस पड़े। आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। इस बार रिया ने अपना हाथ नहीं खींचा।

     

    समुद्र की लहरें उनके पैरों को छूकर लौट रही थीं।

     

    रिया ने आरव के कंधे पर सिर रख दिया। कभी-कभी रिश्तों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किसने बेवफाई की।

     

    सवाल यह होता है कि, क्या उस बेवफाई के बाद भरोसा दोबारा जन्म ले सकता है? रिया और आरव के रिश्ते ने एक बात सीखी थी,

     

    प्यार हमेशा रिश्ते को नहीं बचाता।

    लेकिन सच्चाई, पछतावा और दोबारा भरोसा बनाने की कोशिश… कभी-कभी टूटे हुए रिश्ते को पहले से भी

    ज्यादा मजबूत बना देती है।

     

    और शायद…

     

    उनकी कहानी में बेवफाई किसी तीसरे इंसान की नहीं थी। बेवफाई उस झूठ की थी, जिसने दो सच्चे दिलों को छह महीनों तक एक-दूसरे से दूर रखा।

     

    समाप्त….

    आपका एक लाइक मेरे लिए बहुत कीमती है।

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • अंजानी चाहत

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अंजानी चाहत

     

    सुबह की पहली किरण जब खिड़की से छनकर कमरे में घुसी, तब अर्णव की आँखें खुल गईं। उसने बिस्तर पर करवट बदली और छत की ओर देखा। सपना अभी भी आँखों के सामने घूम रहा था—एक अजनबी चेहरा, एक मुस्कान, और एक आवाज़ जो उसके नाम को ऐसे पुकार रही थी जैसे वह सदियों से उसे जानती हो। अर्णव ने माथा सहलाया। पिछले कई महीनों से यही सपना बार-बार आ रहा था। कोई चेहरा साफ़ नहीं दिखता था, सिर्फ़ एक धुँधली सी आकृति, और एक तीव्र चाहत जो छाती में चुभती थी।

     

    अर्णव दिल्ली के एक साधारण से अपार्टमेंट में रहता था। वह एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर था, दिन भर कंप्यूटर के सामने बैठा रहता, और रातें नींद की कमी से गुज़रतीं। उसकी ज़िंदगी में कुछ ख़ास नहीं था—न कोई गहरा रिश्ता, न कोई बड़ा सपना। सिर्फ़ एक अजीब सी ख़ालीपन, एक अनजानी चाहत जो कभी-कभी इतनी तेज़ हो जाती कि वह रात भर जागता रहता।

     

    उस दिन वह काम पर नहीं जा सका। मन बेचैन था। उसने कॉफ़ी बनाई, बालकनी में खड़ा होकर शहर को देखा। नीचे सड़क पर लोग भागते-दौड़ते दिख रहे थे, जैसे कोई मंज़िल हो उनके पास। अर्णव सोचने लगा—मेरी मंज़िल कहाँ है? क्या मैं किसी को खो चुका हूँ जिसे मैं जानता तक नहीं?

     

    शाम को उसने फैसला किया कि वह बाहर निकलेगा। पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमना उसे हमेशा शांत करता था। चाँदनी चौक की भीड़, मसाले की खुशबू, रिक्शों की घंटी—ये सब उसे ज़िंदा महसूस कराते थे। वह जामा मस्जिद के पास पहुँचा, सीढ़ियों पर बैठ गया। आसमान में सूरज डूब रहा था, आसमान लाल-नारंगी हो रहा था। तभी उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी।

     

    वह सफ़ेद सलवार कमीज़ में थी, बाल खुले हुए, और हाथ में एक पुरानी किताब। वह सीढ़ियों के दूसरी तरफ़ बैठी थी, किताब में डूबी हुई। अर्णव की साँस रुक गई। वह चेहरा… सपने वाला चेहरा नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा था जो उसके अंदर की बेचैनी को और तेज़ कर गया। लड़की ने सिर उठाया, और उनकी नज़रें मिलीं। एक पल के लिए समय रुक गया। फिर उसने मुस्कुरा दिया—हल्की सी, शर्मीली सी मुस्कान।

     

    अर्णव ने हिम्मत जुटाई और पास गया। “माफ़ कीजिए… क्या आप यहाँ अकेली हैं?”

     

    लड़की ने किताब बंद की। “हाँ। मैं अक्सर यहाँ आती हूँ। शांति मिलती है।”

     

    “मेरा नाम अर्णव है।”

     

    “मैं दृष्टि।”

     

    दृष्टि। नाम सुनते ही अर्णव के मन में कुछ हिला। जैसे कोई पुरानी याद जाग उठी हो। उन्होंने बातचीत शुरू की। दृष्टि एक लाइब्रेरियन थी, पुरानी किताबों से प्यार करती थी। अर्णव ने बताया कि वह डिज़ाइनर है। बातें होती रहीं—किताबों की, शहर की, अकेलेपन की। सूरज डूब चुका था, लेकिन वे उठना नहीं चाहते थे।

     

    “क्या आपको कभी लगता है कि आप किसी को ढूँढ रहे हैं जिसे आपने कभी देखा ही नहीं?” अर्णव ने अचानक पूछ लिया।

     

    दृष्टि ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “हाँ… बहुत बार। जैसे कोई अधूरा सपना हो जो बार-बार याद आता है।”

     

    उस रात अर्णव घर लौटा तो नींद नहीं आई। दृष्टि का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। वह चाहत जो पहले धुँधली थी, अब साफ़ होने लगी थी। अगले दिन वह फिर उसी जगह गया। दृष्टि वहाँ थी। फिर अगले दिन भी। धीरे-धीरे उनकी मुलाक़ातें नियमित हो गईं। वे पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते, चाय पीते, किताबों की दुकानों में घंटों बिताते।

     

    एक शाम दृष्टि ने कहा, “अर्णव, मुझे लगता है मैं तुम्हें पहले से जानती हूँ। जैसे कोई पुरानी कहानी हो।”

     

    अर्णव की धड़कन तेज़ हो गई। “मुझे भी। मेरे सपनों में एक चेहरा आता है… और जब मैंने तुम्हें देखा, तो वह चाहत और तेज़ हो गई।”

     

    वे दोनों चुप हो गए। हवा में कोई अनकही बात तैर रही थी। दृष्टि ने अपना हाथ अर्णव के हाथ पर रखा। “शायद हमने पहले भी एक-दूसरे को खोया है।”

     

    उनकी दोस्ती प्यार में बदलने लगी। अर्णव पहली बार किसी के इतना क़रीब महसूस कर रहा था। दृष्टि की हँसी, उसकी बात करने का अंदाज़, यहाँ तक कि उसके बालों की खुशबू—सब कुछ जाना-पहचाना लग रहा था। एक रात वे यमुना किनारे बैठे थे। चाँद चमक रहा था। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा।

     

    “दृष्टि… मैं तुमसे प्यार करता हूँ। लेकिन यह प्यार साधारण नहीं लगता। जैसे यह किसी और जन्म से चला आ रहा हो।”

     

    दृष्टि की आँखें नम हो गईं। “मैं भी… लेकिन मुझे डर लगता है। जैसे यह खुशी अस्थायी हो।”

     

    उसके बाद के दिन खुशियों भरे थे। वे साथ घूमते, फ़िल्में देखते, रात भर बातें करते। अर्णव का अकेलापन ख़त्म हो रहा था। लेकिन साथ ही एक अजीब सी बेचैनी भी बढ़ रही थी। उसके सपने और तीव्र हो गए थे। अब सपने में चेहरा साफ़ दिखने लगा था—दृष्टि का ही चेहरा, लेकिन पुराने ज़माने के कपड़ों में। एक महल, एक बगीचा, और फिर आग… चीखें… बिछड़ना।

     

    एक रात अर्णव चीखते हुए जागा। पसीने से लथपथ। उसने फ़ोन उठाया और दृष्टि को कॉल किया।

     

    “क्या हुआ?” दृष्टि की नींद भरी आवाज़ आई।

     

    “सपना… फिर से। तुम जल रही थी… मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

     

    दृष्टि चुप रही। फिर धीरे से बोली, “अर्णव, मेरे भी ऐसे ही सपने आते हैं। मैंने कभी किसी को नहीं बताया। लगता है हम किसी पुरानी त्रासदी के हिस्से हैं।”

     

    अगले दिन वे मिले। दृष्टि ने एक पुरानी डायरी निकाली। “यह मेरी दादी की थी। उन्होंने कहा था कि हमारे परिवार में एक कहानी चलती आ रही है… दो प्रेमियों की, जो कभी मिल नहीं पाए। एक राजकुमारी और एक साधारण सिपाही। महल में आग लग गई थी, और वे दोनों मर गए। लेकिन कहा जाता है कि उनकी आत्माएँ अब भी एक-दूसरे को ढूँढती हैं।”

     

    अर्णव की साँस रुक गई। “क्या तुम सोचती हो… हम वही हैं?”

     

    दृष्टि ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। लेकिन जब मैं तुम्हें देखती हूँ, तो लगता है जैसे सदियों का इंतज़ार ख़त्म हो गया हो।”

     

    उनकी चाहत और गहरी हो गई। लेकिन साथ ही एक डर भी। जैसे किस्मत फिर से उन्हें अलग करने वाली हो। अर्णव ने दृष्टि से शादी का प्रस्ताव रखा। दृष्टि रो पड़ी, लेकिन हाँ कह दी।

     

    शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं। दोनों परिवार खुश थे। लेकिन अर्णव के अंदर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सपने अब सिर्फ़ रात को नहीं, दिन में भी आते थे। वह कभी-कभी दृष्टि को देखकर घबरा जाता—जैसे वह फिर से खो जाएगी।

     

    एक दिन, शादी से एक हफ़्ता पहले, अर्णव को एक पुराना पत्र मिला। कोई अनजान पता था। पत्र में लिखा था—

     

    “तुम फिर मिल गए हो। लेकिन इस बार भी समय कम है। आग फिर लगेगी। बचा लो उसे, वरना चाहत फिर अधूरी रह जाएगी।”

     

    अर्णव काँप उठा। उसने दृष्टि को बताया। दोनों डरे हुए थे, लेकिन उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। “हम इस बार नहीं हारेंगे,” दृष्टि ने कहा।

     

    शादी का दिन आ गया। मंडप सजा था, मेहमान आए थे। अर्णव और दृष्टि फेरे ले रहे थे। अचानक कहीं से धुआँ उठने लगा। किसी ने चीख दी—“आग!” तंबू में आग लग गई थी। लोग भागने लगे। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा और बाहर निकाला। लेकिन भीड़ में वे बिछड़ गए।

     

    अर्णव पागलों की तरह उसे ढूँढ रहा था। धुआँ चारों तरफ़ था। तभी उसने देखा—दृष्टि एक कोने में फँसी हुई थी, आग उसके क़रीब पहुँच रही थी। अर्णव बिना सोचे दौड़ा। उसने दृष्टि को गोद में उठाया और बाहर निकाला। दोनों सुरक्षित थे, लेकिन अर्णव के हाथ जल गए थे।

     

    हॉस्पिटल में दृष्टि उसके बिस्तर के पास बैठी थी। आँखों में आँसू। “तुमने मुझे बचा लिया… इस बार।”

     

    अर्णव मुस्कुराया, दर्द के बावजूद। “अब कोई आग हमें अलग नहीं कर सकती।”

     

    डॉक्टरों ने कहा कि जलन ठीक हो जाएगी। लेकिन उस रात अर्णव को फिर सपना आया। इस बार सपना अलग था। कोई आग नहीं थी। सिर्फ़ एक बगीचा, फूल, और दृष्टि मुस्कुरा रही थी। एक आवाज़ गूँजी—“अब तुम्हारी चाहत पूरी हो गई। इस जन्म में रहो, प्यार करो, और अगले जन्म की चिंता मत करो।”

     

    अर्णव जागा। कमरे में दृष्टि बैठी थी, उसका हाथ थामे हुए। “सपना अच्छा था?” उसने पूछा।

     

    अर्णव ने उसके हाथ को चूमा। “हाँ। अब कोई अनजानी चाहत नहीं रही। सब कुछ जाना-पहचाना है।”

     

    उसके बाद की ज़िंदगी शांत और खुशहाल रही। अर्णव और दृष्टि ने एक छोटा सा घर लिया, पुरानी दिल्ली के पास। वे किताबें पढ़ते, साथ चाय पीते, और कभी-कभी जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर शहर को देखते। अर्णव के हाथ के निशान रह गए, लेकिन वे निशान अब दर्द नहीं, बल्कि एक याद थे—कि इस बार उन्होंने भाग्य को हरा दिया था।

     

    साल बीतते गए। उनके बच्चे हुए। घर में हँसी-खुशी भरी रही। लेकिन कभी-कभी रात में, जब चाँद चमकता, तो अर्णव और दृष्टि एक-दूसरे की आँखों में देखते और मुस्कुरा देते। जैसे कोई पुरानी कहानी याद आ गई हो, जो अब पूरी हो चुकी थी।

     

    एक दिन, बहुत साल बाद, अर्णव बूढ़ा हो चुका था। वह बालकनी में बैठा था। दृष्टि उसके पास आई, सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    “अर्णव, क्या तुम्हें अब भी लगता है कि हम पहले मिले थे?”

     

    अर्णव ने उसकी तरफ़ देखा। आँखों में वही चमक थी जो पहली मुलाक़ात में थी। “हाँ। और मैं जानता हूँ कि हम फिर मिलेंगे। लेकिन इस बार, जब भी मिलें, कोई आग नहीं होगी। सिर्फ़ प्यार होगा।”

     

    दृष्टि मुस्कुराई। “अंजानी चाहत अब जानी-पहचानी हो गई है।”

     

    हवा में पुरानी खुशबू तैर रही थी—मसाले की, किताबों की, और एक प्यार की जो जन्मों से चला आ रहा था। अर्णव ने आँखें बंद कीं। उसके मन में अब कोई बेचैनी नहीं थी। सिर्फ़ एक शांति, एक पूर्णता।

     

    और कहीं दूर, स

    मय की धारा में, दो आत्माएँ मुस्कुरा रही थीं। क्योंकि उनकी अनजानी चाहत आख़िरकार पूरी हो गई थी।

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • Mera pahla pyar

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    मेरा पहला प्यार

    कुछ लोग ज़िंदगी में देर से आते हैं और हमेशा के लिए रह जाते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत जल्दी आकर हमेशा के लिए याद बन जाते हैं। मेरी ज़िंदगी में भी एक ऐसी ही याद थी—मेरा पहला प्यार।

    मेरा नाम आरव है। आज मैं एक सफल इंसान हूँ। अच्छी नौकरी, अच्छा घर, हर वह चीज़ है जिसकी कभी चाहत थी। लेकिन जब भी बारिश की पहली बूंदें धरती पर गिरती हैं, जब भी किसी पुराने गीत की धुन कानों में पड़ती है, तो मेरी यादें सात साल पीछे चली जाती हैं। उस छोटे से शहर में… जहाँ मैंने पहली बार किसी को दिल से चाहा था।

    उसका नाम था नैना।

    मैं पहली बार उससे कॉलेज के पहले दिन मिला था। सफेद सलवार-सूट, हल्की-सी मुस्कान और बड़ी-बड़ी आँखें… जैसे किसी ने चाँद का एक टुकड़ा धरती पर भेज दिया हो। वह क्लास में नई थी और घबराई हुई लग रही थी।

    मैंने उसके पास जाकर कहा, “अगर चाहो तो मैं तुम्हें पूरी क्लास दिखा सकता हूँ।”

    वह हल्का-सा मुस्कुराई और बोली, “धन्यवाद… मुझे सच में किसी की मदद की ज़रूरत थी।”

    बस, वहीं से हमारी दोस्ती शुरू हुई।

    दिन बीतते गए। हम साथ पढ़ते, साथ कैंटीन जाते, लाइब्रेरी में घंटों बैठते। वह बहुत समझदार थी। उसे किताबें पढ़ना पसंद था, जबकि मुझे गिटार बजाना। मैं उसके लिए अक्सर कॉलेज के गार्डन में बैठकर धुन बजाता और वह मुस्कुराकर सुनती रहती।

    धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं रही। उसके बिना एक दिन भी अधूरा लगता था। उसकी हँसी मेरी खुशी बन गई थी और उसकी उदासी मेरी बेचैनी।

    लेकिन मैंने कभी अपने दिल की बात नहीं कही। डरता था… कहीं दोस्ती भी न खो दूँ।

    एक दिन कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। मैंने पहली बार स्टेज पर एक गीत गाया। पूरा गीत मैं नैना को देखकर गा रहा था। शायद वह समझ गई थी कि उस गीत के पीछे छिपी हर भावना उसी के लिए थी।

    कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह मेरे पास आई।

    उसने पूछा, “क्या यह गीत… किसी खास के लिए था?”

    मैं कुछ पल चुप रहा। फिर हिम्मत करके कहा, “हाँ… तुम्हारे लिए।”

    कुछ सेकंड तक वह बिना कुछ बोले मुझे देखती रही। फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए।

    मैं घबरा गया।

    “अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो…”

    उसने मेरी बात बीच में ही रोक दी।

    “बुरा नहीं लगा, आरव… लेकिन मैं भी तुम्हें यही बताना चाहती थी।”

    उस दिन पहली बार उसने मेरा हाथ थामा था।

    उस पल ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया थम गई हो।

    हमारा रिश्ता बहुत खूबसूरत था। उसमें दिखावा नहीं था। महंगे तोहफे नहीं थे। बस एक-दूसरे के लिए सच्ची परवाह थी।

    हम छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढ़ लेते थे। कभी सड़क किनारे चाय पीना, कभी बारिश में भीगना, कभी बिना वजह घंटों बातें करना… यही हमारी दुनिया थी।

    कॉलेज का आखिरी साल शुरू हुआ।

    हम दोनों ने अपने-अपने सपनों के लिए मेहनत शुरू कर दी। मैं नौकरी की तैयारी कर रहा था और नैना आगे पढ़ना चाहती थी।

    लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी योजनाओं के हिसाब से नहीं चलती।

    एक शाम नैना ने मुझे मिलने बुलाया।

    वह पहले जैसी खुश नहीं थी।

    उसने धीमी आवाज़ में कहा, “पापा ने मेरी शादी तय कर दी है।”

    मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

    “लेकिन… तुमने उन्हें हमारे बारे में बताया?”

    “बताया था… लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। उनके लिए परिवार की इज़्ज़त सबसे ज़्यादा मायने रखती है।”

    मैंने कहा, “तो चलो… हम दोनों मिलकर उन्हें समझाएँगे।”

    वह मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी थी।

    “कुछ रिश्ते समझाने से नहीं बदलते, आरव।”

    उस दिन हम दोनों बहुत रोए।

    पहली बार मुझे महसूस हुआ कि प्यार करना आसान है, लेकिन उसे निभा पाना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।

    अगले कुछ दिनों तक हम रोज़ मिलते रहे। हर मुलाकात आखिरी जैसी लगती थी।

    फिर वह दिन भी आ गया जब नैना हमेशा के लिए चली गई।

    उसने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा—

    “अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज़ होती है… तो मैं तुम्हें फिर ढूँढ़ लूँगी।”

    मैंने उसे जाते हुए देखा… और पहली बार महसूस किया कि कुछ लोगों का जाना, ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल देता है।

    उसके बाद मैंने खुद को काम में डुबो दिया।

    समय बीतता गया।

    लोग कहते हैं कि समय हर घाव भर देता है।

    लेकिन सच यह है कि समय सिर्फ दर्द के साथ जीना सिखाता है।

    सात साल बाद मैं एक बिज़नेस कॉन्फ्रेंस के लिए उसी शहर गया।

    सब कुछ बदल चुका था।

    नई इमारतें, नई सड़कें…

    लेकिन कॉलेज के सामने वाली वही छोटी-सी चाय की दुकान आज भी थी।

    मैं वहीं जाकर बैठ गया।

    अचानक किसी ने पीछे से मेरा नाम पुकारा।

    “आरव…”

    मैंने मुड़कर देखा।

    वह नैना थी।

    चेहरे पर पहले जैसी मासूमियत थी, लेकिन आँखों में ज़िंदगी के कई अनुभव उतर आए थे।

    कुछ पल तक हम दोनों कुछ नहीं बोले।

    फिर उसने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे हो?”

    मैंने भी मुस्कुराने की कोशिश की।

    “ठीक हूँ… तुम?”

    “मैं भी ठीक हूँ।”

    हमने साथ बैठकर चाय पी।

    बहुत सारी बातें हुईं।

    उसने बताया कि उसकी शादी हो चुकी है। उसका एक छोटा बेटा भी है।

    मैंने भी अपनी ज़िंदगी के बारे में बताया।

    हम दोनों ने एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं की।

    क्योंकि अब शिकायतों की उम्र बीत चुकी थी।

    जाते-जाते उसने कहा, “जानते हो, पहला प्यार कभी खत्म नहीं होता। बस उसकी जगह बदल जाती है।”

    मैंने पूछा, “कैसी जगह?”

    वह मुस्कुराई।

    “दिल से निकलकर दुआओँ में।”

    मैं उसे दूर जाते हुए देखता रहा।

    इस बार मेरी आँखों में आँसू नहीं थे।

    बस एक सुकून था।

    क्योंकि अब मुझे समझ आ चुका था कि हर प्रेम कहानी का अंत शादी नहीं होती।

    कुछ प्रेम कहानियाँ इसलिए अधूरी रह जाती हैं ताकि इंसान को सिखा सकें कि सच्चा प्यार पाने का नहीं, निभाने का नाम है।

    आज भी जब बारिश होती है, मैं मुस्कुरा देता हूँ।

    क्योंकि मुझे याद आता है कि मेरी ज़िंदगी में भी कभी कोई था, जिसने मुझे बिना किसी शर्त के प्यार किया था।

    वह मेरा पहला प्यार था।

    और शायद… आखिरी भी।

    कहते हैं कि इंसान अपने पहले प्यार को कभी नहीं भूलता।

    मैं भी नहीं भूला।

    मैंने बस उसे यादों की सबसे सुरक्षित जगह पर रख दिया है, जहाँ न समय पहुँच सकता है, न दूरियाँ, न मजबूरियाँ।

    कुछ रिश्ते साथ चलकर पूरे होते हैं, और कुछ दूर होकर भी हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

    नैना अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं है, लेकिन मेरी दुआओँ का हिस्सा आज भी है।

    और शायद यही पहले प्यार की सबसे खूबसूरत पहचान है—वह कभी नफ़रत में नहीं बदलता।

    वह हमेशा एक मीठी याद बनकर दिल के किसी कोने में मुस्कुराता रहता है।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • प्रेम…

    प्रेम…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

                          प्रेम ….

    मैं अपने दर्द भी भूल जाऊं जो तेरी बाहों में आऊं 

    ना चाहतें हैं मुझे सुनहरे सपनों की,

    ना चाहते है मुझे किसी अपने की,

    तेरे कंधे पर सर रखकर सुकून 

    दिल में उतर जाता है,

    मैं कैसे कहूं तुम पर मुझे कितना प्यार आता है,

    तुम मेरी भीगती आंखों को अपनी

    हथेलियों में थाम लो,

    मैं कहता हूं मैं ठीक हूं फिर भी

    तुम खुद के गले से लगा लो,

    ना जाने ये कैसी कशिश है जो तेरी

    आंखों से नजरें मेरी हटती नहीं ,

    मैं जाना चाहूं कहीं भी दूर तुमसे फिर भी

    शाम ढले दिल मेरा तेरा ही नाम पुकारे ,

    प्यार भरा रिश्ता ये तुम्हारा मुझ को

    लगता है जग में सबसे प्यारा , तुम से

    मिलकर सुकून दिल में उतर जाता है ,

    तेरे होठों की हंसी मेरे अल्फ़ाज़ से

    मिलकर एक ख्वाहिश सी दिल में जगाती है ,

    मैं एक घायल परिंदा तेरी बाहों में

    सिमट कर नयी सांसों को पाता हूं 

     

     

     

     

     

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    shalini rawat

    NSW उभरते लेखक – 🥈 लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।

  • अधूरी मोहब्बत

    अधूरी मोहब्बत

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    मोहब्बत की क्या बात करूँ,

    अधूरी ही सही, पर मेरे साथ है।

    दिन भर तुम यूँ दूर रहते हो,

    जैसे अपने काम में बहुत व्यस्त हो।

    शाम ढलते ही तुम्हारी याद यूँ आती है,

    जैसे तुम काम से लौटकर घर आए हो।

    जब भी बैठूँ एक कप चाय लेकर,

    तेरी मीठी-सी याद मुझे सताए।

    जब भी कुछ बनाने का सोचूँ,

    सबसे पहले तेरी पसंद याद आए।

    रात जैसे-जैसे गहराती है,

    तेरी याद मुझे और रुलाती है।

    आँखें जब भी बंद करूँ,

    बस तेरा ही चेहरा नज़र आता है।

    आँसू भले ही आँखों में हों,

    पर होठों पर तेरी याद मुस्कान बन जाती है।

    अधूरी सही मेरी मोहब्बत,

    पर तेरी याद आज भी पूरी मेरी है

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇