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टैग: प्यार एक खुबसूरत एहसास

  • Dil sabhal ja jara part – 26

    Dil sabhal ja jara part – 26

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 26 ankahi mulakat 

    स्कूल की घंटी बजी। दिन खत्म हो चुका था। बच्चे चहल-पहल करते हुए गेट की ओर दौड़ रहे थे, बैग्स लहराते हुए, हंसते-खेलते। प्रिया अपनी क्लास से बाहर निकली। उसका चेहरा थका हुआ था, लेकिन आंखों में एक हल्की सी संतुष्टि थी – बच्चों ने उसे मैम कहकर बुलाया था, उनकी मासूम बातें सुनकर मन थोड़ा हल्का हुआ था। वो अपना बैग कंधे पर टिकाया और गेट की ओर बढ़ी। सफेद सलवार-कमीज में, बाल खुले, चेहरा सादा – कोई मेकअप नहीं, सिर्फ होंठों पर हल्की लिप बाम। वो खुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी चाल में एक उदासी थी, कदम भारी थे। मन में आरव की यादें घूम रही थीं – “आरव… आज बच्चों ने स्टोरी सुनी। तुम होते तो कहते, ‘प्रिया, तू बेस्ट टीचर है।’”

     

    स्कूल से थोड़ा दूर, एक पेड़ की छांव में एक काली कार खड़ी थी। विक्रांत अंदर बैठा था। उसने स्कूल गेट की ओर देखा। प्रिया को आते देखा। उसका दिल धड़क गया। चेहरा देखकर चौंका – प्रिया उदास लग रही थी, पहले वाली चमक नहीं थी आंखों में। विक्रांत ने कार स्टार्ट नहीं की। वो इंतजार कर रहा था – स्कूल खत्म होने का। वो स्कूल के अंदर प्रिया से मिलना नहीं चाहता था। क्यों? क्योंकि वो खुद नहीं समझ पा रहा था कि क्या कहेगा। शिमला की यादें ताजा थीं – प्रिया का आरव के साथ होना, वो शादी जिसमें वो गया था लेकिन रह नहीं सका। वो प्रिया को पसंद करने लगा था – गहराई से। लेकिन जानता था प्रिया उसे सिर्फ दोस्त मानती है। शादी में गया था, लेकिन फेरे शुरू होने से पहले चला आया था। प्रिया की शादी किसी और के साथ देख नहीं सकता था। उसी रात मुंबई आ गया था – अपनी नानी (प्रिंसिपल मैडम) के पास। आरव की मौत की खबर उसे नहीं पता थी। वो सोचता था प्रिया और आरव खुशहाल जीवन जी रहे होंगे शिमला में। लेकिन अब प्रिया को मुंबई में देखकर हैरान था। “प्रिया यहां? स्कूल में जॉब? आरव के साथ नहीं? क्या हुआ?”

     

    विक्रांत की नजरें प्रिया पर टिकी थीं। उसका चेहरा गंभीर था, आंखों में सवालों का तूफान। वो कार से बाहर नहीं निकला। इंतजार करता रहा। प्रिया स्कूल गेट से निकली। अकेली पैदल चल रही थी – बस स्टॉप की ओर। उसका चेहरा उदास, आंखें नीचे, जैसे मन कहीं और हो। विक्रांत ने कार आगे बढ़ाई। प्रिया के ठीक आगे रोकी। शीशा नीचे किया। “प्रिया… अंदर बैठो।”

     

    प्रिया रुक गई। विक्रांत को देखकर चौंकी। उसकी आंखें बड़ी हो गईं, चेहरा सफेद पड़ गया। “विक्रांत… तुम… यहां?”

     

    विक्रांत ने दरवाजा खोला। उसकी आवाज में चिंता थी, लेकिन संयम। “हां प्रिया। बैठो। मैं ड्रॉप कर दूंगा।”

     

    प्रिया कुछ नहीं बोली। उसकी आंखें नम हो गईं, लेकिन आंसू नहीं बहने दिए। वो चुपचाप कार में बैठ गई। दरवाजा बंद किया। सीट बेल्ट लगाई। पूरी तरह चुप। उसका चेहरा खिड़की की ओर, बाहर देख रही थी, लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मन में तूफान – “विक्रांत… तुम यहां? आरव के बाद… तुम्हें देखकर सब याद आ गया। शिमला, वो दिन, वो दोस्ती। लेकिन अब… अब सब खत्म।”

     

    विक्रांत ने कार स्टार्ट की। वो ड्राइव कर रहा था, लेकिन नजरें बार-बार प्रिया पर जा रही थीं। प्रिया की उदासी उसे काट रही थी। वो सोच रहा था – “प्रिया… पहले कितनी हंसती थी। आंखों में चमक थी। अब… ये उदासी क्यों? आरव के साथ खुश नहीं है? या कुछ और? शादी के बाद मुंबई क्यों? स्कूल में जॉब? आरव कहां है?” विक्रांत का दिल दुख रहा था। वो प्रिया को पसंद करता था – बहुत। लेकिन जानता था प्रिया का दिल आरव के पास था। शादी में गया था, लेकिन रह नहीं सका। “प्रिया को आरव के साथ देख नहीं सकता था। इसलिए चला आया। लेकिन अब… ये क्या हुआ?”

     

    रास्ता लंबा था। ट्रैफिक। विक्रांत ने रेडियो ऑन किया – हल्का म्यूजिक। लेकिन प्रिया चुप। विक्रांत ने हिम्मत करके पूछा, “प्रिया… सब ठीक है? तुम… यहां मुंबई में?”

     

    प्रिया चुप रही। उसकी आंखें खिड़की से बाहर। आंसू बह रहे थे, लेकिन चुपके से। वो कुछ नहीं बोली।

     

    विक्रांत का मन बैचेन हो गया। “प्रिया… बात करो ना। मैं… मैं तुम्हें देखकर हैरान हूं। शादी के बाद… आरव के साथ नहीं हो?”

     

    प्रिया का दिल बैठ गया। वो पलटी। विक्रांत की ओर देखा। उसकी आंखें लाल, चेहरा दर्द से भरा। लेकिन बोली नहीं। सिर्फ सिर हिलाया – ना में।

     

    विक्रांत चौंका। “क्या मतलब? आरव…?”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन बोली नहीं। वो फिर खिड़की की ओर मुड़ गई।

     

    विक्रांत को कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसकी नजरें प्रिया पर टिकी थीं – वो उदासी, वो चुप्पी। “प्रिया… कुछ हुआ है? आरव ठीक है ना?”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। वो रो पड़ी। चुपके से, लेकिन हिचकियां लेते हुए। विक्रांत ने कार साइड में रोकी। “प्रिया… क्या हुआ? बताओ ना।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “विक्रांत… घर पहुंचकर।”

     

    विक्रांत ने फिर कार स्टार्ट की। उसका मन बैचेन। “आरव… क्या हुआ उसे? प्रिया इतनी टूट क्यों गई है?”

     

    घर पहुंचे। प्रिया कार से उतरी। विक्रांत भी उतरा। “प्रिया… मैं अंदर आऊं?”

     

    प्रिया ने कहा, “नहीं विक्रांत। कल बात करेंगे।”

     

    विक्रांत चला गया। लेकिन उसका मन बैचेन। प्रिया अंदर गई। रो पड़ी। “आरव… विक्रांत आ गया। लेकिन तुम नहीं हो।”

     

    प्रिया घर पहुंची। अपार्टमेंट में गई। आदित्य पापा ने देखा। “बेटी… क्या हुआ? चेहरा उदास क्यों?”

     

    प्रिया रो पड़ी। “पापा… विक्रांत… वो यहां है। स्कूल में।”

     

    आदित्य चौंके। “क्या? वो शिमला वाला?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “हां पापा। वो मुझसे मिला। लेकिन मैं कुछ नहीं बोली। आरव की याद… सब टूट गया।”

     

    रिया आई। “प्रिया… क्या हुआ?”

     

    प्रिया ने बताया। रिया ने गले लगाया। “प्रिया… वो पुराना दोस्त है। लेकिन तू उदास मत हो।”

     

    लेकिन प्रिया का मन टूट चुका था। विक्रांत की मुलाकात ने पुरानी यादें ताजा कर दीं। “आरव… विक्रांत आ गया। लेकिन तू कहां हो?”

     

    विक्रांत घर लौटा। नानी से कहा, “नानी… प्रिया यहां है। लेकिन बदली हुई। उदास। आरव कहां है?”

     

    नानी ने कहा, “बेटा… आरव… उसकी मौत हो गई। एक्सीडेंट में।”

     

    विक्रांत चौंका। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। “क्या? मौत? कब?”

     

    नानी ने बताया। विक्रांत रो पड़ा। “प्रिया… इतना दर्द? मैं नहीं जानता था। अब… अब मैं क्या करूं?”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 25

    Dil sabhal ja jara part – 25

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    Part  – 25 “स्कूल की नई शुरुआत और छिपा हुआ दर्द”

     

    मुंबई की सुबहें अब प्रिया के लिए एक नई रूटीन बन चुकी थीं। अपार्टमेंट से निकलकर लोकल ट्रेन, फिर बस, और आखिरकार साउथ मुंबई के उस छोटे से स्कूल तक पहुंचना जहां उसे टीचर की जॉब मिल गई थी। स्कूल का नाम था “सेंट मेरीज़ प्राइमरी स्कूल” – पुरानी बिल्डिंग, हरा-भरा कंपाउंड, और बच्चों की चहल-पहल। प्रिया ने पहला दिन सफेद सलवार-कमीज में शुरू किया था, बाल बंधे हुए, चेहरे पर हल्का मेकअप – खुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश। आईने में देखकर खुद से कहा था, “प्रिया… मुस्कुरा। आरव यही चाहता होगा।” लेकिन आईने में उसकी आंखें उदास थीं, मुस्कान नकली लग रही थी।

     

    स्कूल पहुंचते ही गेट पर सिक्योरिटी गार्ड ने स्माइल दी। “मैम, गुड मॉर्निंग। न्यू टीचर हो ना?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की। “हां… गुड मॉर्निंग।”

     

    अंदर स्टाफ रूम में गई। कुछ टीचर्स पहले से थे। एक मैम ने वेलकम किया। “प्रिया जी, वेलकम। क्लास 5 की इंग्लिश हैंडल करोगी। बच्चे बहुत अच्छे हैं।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “थैंक यू मैम।”

     

    क्लासरूम में घुसी। बच्चे कुर्सियों पर बैठे थे – 30-35 छोटे-छोटे चेहरे, उत्सुक आंखें। प्रिया ने बोर्ड पर अपना नाम लिखा। “गुड मॉर्निंग चिल्ड्रन। मैं आपकी नई टीचर प्रिया मैम हूं।”

     

    बच्चों ने कोरस में कहा, “गुड मॉर्निंग मैम!”

     

    प्रिया मुस्कुराई – इस बार थोड़ी सच्ची मुस्कान। बच्चों की मासूमियत उसे अच्छी लग रही थी। वो पढ़ाने लगी – एक छोटी सी स्टोरी। बच्चे ध्यान से सुन रहे थे। एक बच्ची ने हाथ उठाया। “मैम, आप शिमला से हो ना? वहां बर्फ गिरती है?”

     

    प्रिया का दिल धड़का। शिमला… आरव की याद। लेकिन वो खुद को संभाला। “हां बेटा। बहुत बर्फ गिरती है।”

     

    बच्चे उत्साहित हो गए। “मैम, फोटो दिखाओ ना!”

     

    प्रिया ने हंसकर कहा, “अगले दिन लाऊंगी।”

     

    वो खुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश कर रही थी – हंस रही थी, बच्चों से बात कर रही थी, लेकिन उसका दिल ही जानता था कि वो अंदर से टूट चुकी थी। हर हंसी के पीछे दर्द छिपा था। ब्रेक में स्टाफ रूम में अकेली बैठी चाय पी रही थी। एक बच्चे की हंसी सुनकर आरव की याद आई – वो कैसे उसे चिढ़ाता था। आंखें भर आईं। वो जल्दी से आंसू पोंछे। “आरव… देखो, मैं कोशिश कर रही हूं। लेकिन तुम्हारी कमी… हर पल खलती है।”

     

    लंच ब्रेक में सीनियर टीचर, मिसेज गुप्ता (50 के करीब, सख्त लेकिन केयरिंग), प्रिया के पास आईं। “प्रिया बेटी, कैसा लगा पहला दिन?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा मैम। बच्चे बहुत क्यूट हैं।”

     

    मिसेज गुप्ता ने प्रिया के चेहरे पर उदासी पढ़ ली। लेकिन कुछ नहीं बोलीं। फिर अचानक स्टाफ रूम में अनाउंसमेंट जैसा बोलीं, “सुनो सब! आज हमारे स्कूल में एक स्पेशल गेस्ट आ रहा है। प्रिंसिपल मैडम का नाती। दिल्ली से आ रहा है। बड़ा होशियार लड़का है। सब लोग अच्छे से रहना। कोई शरारत नहीं। क्लास में डिसिप्लिन बनाए रखना।”

     

    सब टीचर्स मुस्कुराईं। एक जूनियर टीचर ने कहा, “मैम, प्रिंसिपल मैडम का नाती? वो तो बहुत अमीर फैमिली से है ना?”

     

    मिसेज गुप्ता ने कहा, “हां। लेकिन बहुत अच्छा लड़का है। नाम है… विक्रांत राठौर।”

     

    प्रिया का हाथ कांप गया। चाय का कप टेबल पर गिरते-गिरते बचा। “विक्रांत… राठौर?”

     

    मिसेज गुप्ता ने कहा, “हां बेटी। तुम जानती हो क्या?”

     

    प्रिया का चेहरा सफेद पड़ गया। विक्रांत… शिमला वाला विक्रांत? वो जो उसका दोस्त था, जो उसे पसंद करता था। क्या वही? मुंबई में? प्रिंसिपल का नाती?

     

    प्रिया की सांस तेज़ हो गई। “मैम… वो… कितने साल का है?”

     

    “22-23 का होगा। कॉलेज कंपलीट करके आया है। प्रिंसिपल मैडम चाहती हैं वो यहां कुछ समय स्पेंड करे, स्कूल को समझे।”

     

    प्रिया का दिल धड़कने लगा। “आरव… क्या ये संयोग है? या कुछ और?”

     

    बच्चों की घंटी बजी। प्रिया क्लास की ओर गई, लेकिन मन कहीं और था। “विक्रांत… अगर वही है तो… यहां क्यों?”

     

    स्कूल के गेट पर एक कार रुकी। बाहर निकला एक लड़का – लंबा, हैंडसम, मुस्कुराता हुआ। विक्रांत। प्रिंसिपल मैडम उसे गले लगाईं। “मेरा पोता… आ गया।”

     

    विक्रांत ने स्कूल देखा। उसकी नजर प्रिया पर पड़ी – दूर क्लासरूम की खिड़की से। वो चौंका। “प्रिया… यहां?”

     

    प्रिया की आंखें बड़ी हो गईं। दिल में तूफान। “विक्रांत… मुंबई में? प्रिंसिपल का नाती?”

     

    कौन है ये विक्रांत? शिमला वाला वही? या संयोग? जाने के लिए बने रहिए । 

     

  • Dil sabhal ja jara part – 24

    Dil sabhal ja jara part – 24

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 24: “नई शुरुआत की राह”

    मुंबई की वो शामें प्रिया के लिए कभी न खत्म होने वाली रातों जैसी लगती थीं। अपार्टमेंट की बालकनी से समुद्र की लहरें दिखती थीं, लेकिन उन लहरों की आवाज प्रिया को आरव की हंसी की याद दिलाती थी। वो हंसी जो कभी शिमला के ठाकुर हाउस में गूंजती थी। प्रिया बालकनी में खड़ी थी, हाथ में एक पुरानी फोटो – वो शादी वाली फोटो जहां आरव उसे रिंग पहना रहा था। उसकी आंखें नम थीं, चेहरा थका हुआ, और होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान – वो मुस्कान जो दर्द छिपाने की कोशिश में लगाई गई थी, लेकिन आंखों से झलकता दुख उसे धोखा दे रहा था। प्रिया की उंगलियां फोटो पर फिसल रही थीं, जैसे वो आरव के चेहरे को छू रही हो। “आरव… कितनी खुश थी मैं उस दिन। तुम्हारी आंखों में वो चमक… वो प्यार। अब वो चमक कहां है? मैं यहां अकेली हूं, और तुम… तुम कहां हो?” उसकी आवाज कांप रही थी, आंसू गाल पर बहकर फोटो पर गिर पड़े।

     

    अंदर से आदित्य पापा की आवाज आई। “प्रिया बेटी… शाम हो गई। अंदर आ जाओ। चाय पी लो।”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। एक गहरी सांस ली और मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन वो मुस्कान नकली थी, आंखों तक नहीं पहुंच रही थी। वो अंदर आई। लिविंग रूम में आदित्य पापा सोफे पर बैठे थे, चाय का ट्रे रखा था। उनका चेहरा प्रिया को देखकर और उदास हो गया। आदित्य की आंखें प्रिया के थके चेहरे पर टिक गईं – वो आंखें जो एक पिता की तरह दुख महसूस कर रही थीं। “बेटी… आज फिर बालकनी में खड़ी थी? कितना सोचेगी आरव के बारे में? कितना रोएगी?”

     

    प्रिया सोफे पर बैठ गई। उसकी आंखें नीचे थीं, उंगलियां चाय के मग से खेल रही थीं। “पापा… क्या करूं? आरव… वो हर पल याद आता है। यहां मुंबई में आई हूं, लेकिन दिल शिमला में अटका है। वो ठाकुर हाउस, वो बर्फीली रातें, वो आरव की हंसी… सब मुझे सताता है। मैं भूलना चाहती हूं, लेकिन भूलती नहीं।”

     

    आदित्य ने गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं – वो लकीरें जो एक पिता के दिल का दर्द बयां कर रही थीं। वो प्रिया के करीब सरके और उसके कंधे पर हाथ रखा। वो स्पर्श गर्म था, सहारे वाला। “प्रिया… मैं देख रहा हूं तुझे। रोज उदास रहती है। घर में अकेली बैठी, कुछ नहीं करती। बस यादों में खोई रहती है। बेटी, जिंदगी आगे बढ़नी चाहिए। आरव चला गया, लेकिन तू तो है। तू क्यूं खुद को कैद करके रख रही है? तू कोई जॉब क्यों नहीं कर लेती? बाहर निकल, लोगों से मिल, काम कर। ऐसे घर में अकेली रहोगी तो कभी आरव को भूल नहीं पाओगी।”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, लेकिन उनमें एक जिद थी – वो जिद जो दर्द से पैदा हुई थी। वो मग रखी और आवाज कांपते हुए बोली, “पापा… जॉब? बाहर निकलूं? लेकिन पापा, मैं कहीं भी रहूं तो भी आरव को नहीं भूल सकती हूं। वो मेरी सांसों में है, मेरी हर याद में है। जॉब करूंगी तो क्या? दिन भर काम, लेकिन शाम को घर लौटूंगी तो फिर वही अकेलापन। आरव की यादें मुझे छोड़ेंगी नहीं। मैं भूलना भी नहीं चाहती। वो मेरा प्यार था, मेरा पति था। उसे भूलकर कैसे जिऊं?”

     

    आदित्य का चेहरा और गंभीर हो गया। उनकी आंखें प्रिया के चेहरे पर टिकी थीं – वो आंखें जो एक पिता का दर्द और समझदारी दोनों बयां कर रही थीं। वो प्रिया का हाथ थामे। “बेटी… मैंने नहीं कहा भूल जा। ठीक है, मत भूलो। आरव को याद रखो। लेकिन क्या तू चाहती है कि आरव तुझे ऐसे उदास देखकर वो भी उदास रहे? क्योंकि आरव जहां भी होगा, तुझे देख रहा होगा। वो तेरी खुशी चाहता था, तेरी मुस्कान। अगर तू ऐसे उदास रही, तो उसकी आत्मा को दुख होगा। तू उसके लिए खुश होने की कोशिश कर। जॉब कर, नई जिंदगी बना। आरव को भूल मत, लेकिन उसके लिए जी।”

     

    प्रिया की आंखों में आंसू आ गए। वो चुप हो गई। आदित्य की बातें उसके दिल में उतर रही थीं – धीरे-धीरे, लेकिन गहराई से। उसका चेहरा उदास था, लेकिन अब उसमें एक सोच थी। वो मग उठाई और चाय पीने लगी, लेकिन स्वाद नहीं आ रहा था। “पापा… आप सही कहते हैं। आरव… वो मुझे उदास नहीं देखना चाहते होंगे। वो कहते थे – ‘प्रिया, तू स्ट्रॉन्ग है।’ मैं कोशिश करूंगी। लेकिन पापा, आसान नहीं है। हर पल लगता है वो मेरे साथ है।”

     

    आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, आसान नहीं है। लेकिन शुरू कर। मैं तेरे साथ हूं। NGO में आ, काम कर। या कोई और जॉब ढूंढ। बाहर निकल।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी आंखों में अब एक फैसला था – दर्द भरी, लेकिन मजबूत। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। आरव के लिए।”

     

    उसी समय दरवाजा खुला। रिया अंदर आई। उसका चेहरा थका हुआ था, आंखें सूजी। वो प्रिया के पास बैठी। “प्रिया… क्या बात हो रही है?”

     

    प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… पापा कह रहे हैं जॉब कर लूं। उदास रहने से बेहतर है।”

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द था। वो आदित्य की ओर देखी। “हां प्रिया… अंकल सही कह रहे हैं। तू घर में बैठकर क्या करेगी? यादों में डूबकर खुद को तोड़ेगी? आरव भैया… वो चाहते होंगे हम आगे बढ़ें। मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जॉब ढूंढेंगे।”

     

    प्रिया ने रिया की आंखों में देखा। रिया हंस रही थी, लेकिन आंखें नम थीं। “रिया… तू भी उदास है ना? आरव… वो तेरे लिए भी भाई था। तू कहती नहीं, लेकिन मैं जानती हूं। रातों में रोती है ना?”

     

    रिया की आंखों से आंसू गिर पड़े। वो चुप हो गई। फिर बोली, “हां प्रिया… उदास हूं। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई जैसे थे। उनकी मौत… मुझे भी तोड़ गई। मैं हंसती हूं, लेकिन अंदर से खाली हूं। लेकिन मैं तेरे लिए स्ट्रॉन्ग बन रही हूं। हम साथ हैं।”

     

    प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। आदित्य ने उन्हें देखा, उनका दिल भी भर आया। “बेटियों… रोओ नहीं। आगे बढ़ो। आरव की यादें साथ रखो, लेकिन जिंदगी जीओ।”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। उसका चेहरा अब तय था। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। लेकिन रिया… तू भी। हम साथ करेंगे।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “हां प्रिया। साथ।”

     

    अगले दिन से प्रिया और रिया जॉब ढूंढने लगीं। प्रिया ने अपना रिज्यूम बनाया – कॉलेज की पढ़ाई, स्कॉलरशिप, NGO का एक्सपीरियंस। वो ऑनलाइन सर्च कर रही थी – टीचिंग जॉब्स, NGO पोजीशंस, काउंसलिंग। उसकी उंगलियां कीबोर्ड पर चल रही थीं, लेकिन मन अभी भी आरव में था। “आरव… देखो, मैं कोशिश कर रही हूं। तेरे लिए।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… ये जॉब देख। मुंबई में एक स्कूल में टीचर की वैकेंसी। तू बच्चों से प्यार करती है।”

     

    प्रिया ने देखा। उसकी आंखें चमकीं – पहली बार। “हां रिया… अप्लाई करती हूं।”

     

    आदित्य ने देखा। वो खुश हुए। “बेटी… अच्छा है। आगे बढ़ रही हो।”

     

     

    लेकिन शाम को प्रिया फिर उदास। बालकनी में खड़ी आरव की फोटो देख रही थी। “आरव… जॉब मिल जाएगी। लेकिन तू नहीं मिलेगा।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… चल, बाहर घूम आएं।”

     

    दोनों बाहर निकलीं। मुंबई की सड़कें – भीड़, लाइट्स। लेकिन प्रिया को आरव की कमी खल रही थी। “आरव… यहां सब भाग रहे हैं। लेकिन मेरा दिल रुका हुआ है।”

     

    धीरे-धीरे प्रिया इंटरव्यू देने लगी। पहला इंटरव्यू – NGO में। वो तैयार हुई – सादे कपड़े, बाल बंधे। इंटरव्यूअर ने पूछा, “आपका एक्सपीरियंस?”

     

    प्रिया ने कहा, “मैंने शिमला में NGO में काम किया। बच्चों को पढ़ाया।” लेकिन उसकी आवाज में दर्द था।

     

    इंटरव्यू के बाद प्रिया रो पड़ी। “रिया… मैं नहीं कर पाऊंगी। हर जगह आरव याद आता है।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… कोशिश कर। आरव चाहते होंगे।”

     

    प्रिया ने फिर कोशिश की। दूसरा इंटरव्यू – स्कूल में। वो बच्चों को देखकर मुस्कुराई – पहली बार सच्ची मुस्कान। “आरव… बच्चों में तुम्हारी हंसी है।”

     

    इंटरव्यूअर ने कहा, “आप सिलेक्टेड हैं।”

     

    प्रिया खुश हुई। लेकिन घर लौटकर रो पड़ी। “आरव… मैं जी रही हूं। लेकिन तेरे बिना।”

     

    रिया ने गले लगाया। “प्रिया… मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जीएंगे।”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 23

    Dil sabhal ja jara part – 23

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    part – 23 nai jagah ka akela pan 

     

    मुंबई की ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी। अप्रैल की गर्म हवा प्रिया और रिया के चेहरों पर लगी। शिमला की ठंडक से बिल्कुल उलट – यहां उमस थी, भीड़ थी, शोर था। प्रिया ने अपना छोटा सा सूटकेस उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ। सफेद सलवार-कमीज पहनी थी – विधवा की तरह नहीं, लेकिन दिल से वो खुद को विधवा ही महसूस कर रही थी। गले में मंगलसूत्र अभी भी था, लेकिन वो अब यादों का बोझ लगता था। रिया उसके बगल में थी – उसका सूटकेस, और प्रिया का सहारा। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और प्लेटफॉर्म से बाहर निकलीं।

     

    आदित्य पापा बाहर कार लेकर इंतजार कर रहे थे। उन्हें देखकर प्रिया की आंखें फिर भर आईं। वो दौड़ी और पापा से लिपट गई। “पापा…”

     

    आदित्य ने उसे गले लगाया। उनकी आंखें भी नम थीं। “बेटी… आ गई। अब सब ठीक होगा।”

     

    रिया ने भी गले लगाया। “अंकल… थैंक्स कि हमें अपनाया।”

     

    कार में बैठे। मुंबई की सड़कें – ट्रैफिक, हॉर्न, ऊंची इमारतें। प्रिया खिड़की से बाहर देख रही थी, लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसका मन शिमला में था – ठाकुर हाउस में, आरव के साथ। “आरव… तुम कहां हो? मुझे अकेला छोड़कर…”

     

    आदित्य पापा का अपार्टमेंट साउथ मुंबई में था – छोटा, लेकिन आरामदायक। दो बेडरूम, बालकनी से समुद्र दिखता था। प्रिया को एक कमरा दिया गया। रिया को दूसरा। सामान रखते वक्त प्रिया ने अपना सूटकेस खोला। अंदर आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – जो एक्सीडेंट में बच गया था। प्रिया ने उसे छुआ और रो पड़ी। “आरव… तुम्हारी खुशबू अभी भी है।”

     

    रिया ने उसे गले लगाया। “प्रिया… रो मत। हम साथ हैं।”

     

    लेकिन रात हुई तो अकेलापन शुरू हो गया। प्रिया अपने कमरे में थी। नई जगह – नई दीवारें, नई छत, नई हवा। लेकिन दिल पुराना था। वो बिस्तर पर लेटी, छत को देख रही थी। आंसू बह रहे थे। “आरव… यहां सब नया है। लेकिन तुम नहीं हो। मुझे तुम्हारी कमी हर पल खल रही है। शिमला में तुम्हारी यादें थीं – वो लॉन जहां हम बर्फ में खेलते थे, वो हवेली जहां हमारा घर बनने वाला था, वो कमरा जहां हमारी पहली रात… लेकिन यहां? यहां सिर्फ अकेलापन है।”

     

    प्रिया उठी। बालकनी में गई। मुंबई की लाइट्स चमक रही थीं, दूर समुद्र की लहरें सुनाई दे रही थीं। लेकिन प्रिया को शिमला की बर्फ याद आ रही थी। “आरव… याद है? वो रात जब तुमने मुझे प्रपोज किया था। बर्फ गिर रही थी, तुमने रिंग दी। मैं कितनी खुश थी। अब वो रिंग हाथ में है, लेकिन तुम नहीं।” प्रिया ने रिंग को चूमा। आंसू गिर पड़े। वो फर्श पर बैठ गई, घुटने मुंह से लगाए रोने लगी। “आरव… मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई देती है। ‘प्रिया… मेरी जान।’ लेकिन अब वो आवाज सिर्फ याद है।”

     

    रिया कमरे में आई। प्रिया को बालकनी में रोते देखा। वो पास बैठी। “प्रिया… मैं जानती हूं। मुझे भी नींद नहीं आ रही। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई थे। उनकी हंसी, उनकी चिढ़ाना… सब याद आता है।”

     

    प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “रिया… यहां सब नया है। लेकिन दिल पुराना दर्द लिए बैठा है। मैं सोचती हूं – आरव अगर होते तो क्या कहते? ‘प्रिया, मुंबई एंजॉय कर। मैं तेरे साथ हूं।’ लेकिन वो नहीं हैं।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… हम साथ हैं। धीरे-धीरे सब ठीक होगा।”

     

    लेकिन प्रिया का मन नहीं मान रहा था। वो रात भर जागती रही। आरव की यादें उसे सताती रहीं – वो पहली मुलाकात कॉलेज में, वो डांस पार्टी, वो हवेली की रातें, वो किस, वो गले लगना। “आरव… तुमने कहा था हमारा घर बनेगा। बच्चे होंगे। लेकिन अब? अब सिर्फ मैं हूं। अकेली।”

     

    सुबह हुई। आदित्य पापा NGO ले गए। ‘हृदय सेवा’ – गरीब बच्चों और दिल के मरीजों के लिए। प्रिया ने काम शुरू किया – बच्चों को पढ़ाना, मरीजों से बात करना। लेकिन हर चेहरे में आरव दिखता। एक बच्चा हंसा तो आरव की हंसी याद आई। प्रिया रो पड़ी। आदित्य ने पूछा, “बेटी… क्या हुआ?”

     

    “पापा… सबमें आरव दिखता है।”

     

    आदित्य ने गले लगाया। “समय लगेगा बेटी। लेकिन तू मजबूत है।”

     

    रिया भी NGO में मदद करने लगी। दोनों शाम को घर लौटतीं। मुंबई की भीड़ में खो जातीं, लेकिन अकेलापन नहीं जाता। प्रिया समुद्र किनारे जाती। लहरें देखती। “आरव… शिमला में बर्फ थी, यहां लहरें।

    लेकिन तुम्हारी कमी हर जगह है।”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 22

    Dil sabhal ja jara part – 22

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 22: “अंत की शुरुआत”

     

    शिमला का अस्पताल रात के तीन बजे भी जगमगा रहा था। इमरजेंसी वार्ड की लाइट्स कड़क थीं, और हवा में दवाइयों और डिसइन्फेक्टेंट की तेज़ महक फैली थी। प्रिया, रिया, राजेश पापा और आदित्य अंकल हॉस्पिटल के गलियारे में दौड़ते हुए आए थे। प्रिया की लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मंगलसूत्र गले में लटक रहा था, लेकिन चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसके हाथ कांप रहे थे, आंखें सूजी हुईं। वो रोते हुए चीख रही थी, “आरव… आरव कहां है?”

     

    रिया उसे सहारा दे रही थी। “प्रिया… शांत हो। वो ठीक होगा।”

     

    राजेश पापा डॉक्टर से बात कर रहे थे। डॉक्टर – मिडिल एज, सफेद कोट, थका हुआ चेहरा – ने गहरी सांस ली। “मिस्टर ठाकुर… बहुत अफसोस की बात है। पेशेंट को हम बचा नहीं पाए। एक्सीडेंट बहुत गंभीर था। कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। हेड इंजरी, इंटरनल ब्लीडिंग… हमने पूरी कोशिश की, लेकिन…”

     

    प्रिया की चीख गलियारे में गूंज गई। “नहीं! ये झूठ है! आरव… वो मर नहीं सकता! वो मुझसे वादा करके गया था!”

     

    वो डॉक्टर के सामने गिर पड़ी। रिया ने उसे संभाला। राजेश पापा का चेहरा पत्थर हो गया। आदित्य अंकल रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”

     

    डॉक्टर ने कहा, “और एक बात… एक्सीडेंट इतना भयानक था कि पेशेंट का चेहरा… पूरी तरह खराब हो गया है। पहचानना मुश्किल है। सिर्फ कपड़ों और कार से हमने कन्फर्म किया। बॉडी… देखना चाहेंगे?”

     

    प्रिया चीखी, “नहीं! मैं नहीं देखूंगी! आरव जिंदा है! वो मुझे छोड़कर नहीं जा सकता!”

     

    लेकिन राजेश पापा ने कहा, “देखना पड़ेगा।”

     

    वे सब मोर्चरी की ओर गए। ठंडी, सफेद जगह। एक बॉडी ट्रॉली पर पड़ी थी, सफेद चादर से ढकी। डॉक्टर ने चादर हटाई। चेहरा… कुचला हुआ, खून से सना, पहचान के बाहर। सिर्फ शेरवानी के टुकड़े, पगड़ी का हिस्सा।

     

    प्रिया ने देखा और बेहोश हो गई। रिया ने पकड़ा। “प्रिया!”

     

    राजेश पापा रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”

     

    आदित्य अंकल ने चादर फिर ढकी। “ये आरव है।”

     

    सब रो रहे थे। प्रिया को व्हीलचेयर पर बिठाया गया। वो बुदबुदा रही थी, “आरव… तुम वादा करके गए थे। आज हमारी पहली रात थी। तुम मुझे छोड़कर कैसे चले गए?”

     

    रिया रोते हुए बोली, “प्रिया… संभल। आरव भैया… वो हमें देख रहे होंगे।”

     

    घर लौटे। ठाकुर हाउस अब सूना लग रहा था। प्रिया अपने कमरे में थी – वही कमरा जो कल तक खुशियों से भरा था। अब वो बिस्तर पर लेटी रो रही थी। “आरव… तुम झूठे हो। वादा किया था ना… हमेशा साथ रहने का।”

     

    रिया उसके पास बैठी। “प्रिया… भगवान की मर्जी। लेकिन आरव भैया की आत्मा को शांति मिलेगी अगर तू स्ट्रॉन्ग रहेगी।”

     

    प्रिया ने कहा, “रिया… वो कॉल… वो कुछ गलत था। आरव परेशान था। किसी ने बुलाया था उसे।”

     

    राजेश पापा कमरे में आए। “प्रिया बेटी… आरव का फोन मिला है कार में। अनजान कॉल्स थे। पुलिस जांच कर रही है।”

     

    प्रिया उठी। “पापा… ये एक्सीडेंट नहीं। मर्डर है। कोई साजिश है।”

     

    लेकिन सब थके हुए थे। रात गुजर गई। सुबह हुई। अंतिम संस्कार की तैयारियां। प्रिया सफेद साड़ी में। चेहरा सूजा हुआ। वो अर्थी के पास खड़ी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर।”

     

    अग्नि जली। सब रो रहे थे। प्रिया ने चंदन की लकड़ी डाली। “आरव… मैं तुम्हारे बिना कैसे जिऊंगी?”

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल – “क्या सच में आरव था वो? चेहरा… पहचान नहीं हो रही थी।”

     

     

     

    ठाकुर हाउस अब सूना और उदास लग रहा था। वो घर जो कल तक शादी की रौनक से गूंज रहा था, आज मातम में डूबा हुआ था। दीवारों पर अभी भी फूलों की मालाएं लटक रही थीं, लेकिन उनकी खुशबू अब दर्द की तरह चुभ रही थी। हॉल में आरव की बड़ी सी फोटो लगी थी – शादी वाली, मुस्कुराते हुए। उसके सामने अगरबत्ती जल रही थी, और फूल चढ़ाए गए थे। प्रिया सफेद साड़ी में, सिर पर पल्लू, फोटो के सामने बैठी थी। उसकी आंखें सूजी हुईं, चेहरा सफेद, होंठ कांप रहे थे। वो घंटों से वहीं बैठी थी, जैसे कोई प्रतिमा। हाथ में आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – वो जो एक्सीडेंट से बचकर मिला था। वो उसे छाती से लगाए बैठी थी, आंसू लगातार बह रहे थे, लेकिन आवाज नहीं निकल रही थी। अंदर से वो पूरी तरह टूट चुकी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर। हमारी शादी… हमारी पहली रात… सब अधूरा रह गया।”

     

    रिया उसके पास बैठी थी। उसकी आंखें भी लाल थीं, लेकिन वो खुद को संभाल रही थी – प्रिया के लिए। वो प्रिया का हाथ थामे थी। “प्रिया… कुछ खा ले। कल से कुछ नहीं खाया तूने।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। आवाज नहीं निकली। सिर्फ आंसू। रिया की आंखें भी भर आईं। “आरव भैया… वो हमें देख रहे हैं। वो नहीं चाहेंगे कि तू ऐसे टूट जाए।”

     

    लेकिन प्रिया का दिल मान नहीं रहा था। वो फोटो को देख रही थी। “रिया… वो झूठ बोलकर गया था। कहा था काम का कॉल। लेकिन वो… वो किसी खतरे में गया। और मैं रोक नहीं पाई।”

     

    आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा उदास था, लेकिन आंखों में दृढ़ता। वो प्रिया के पास बैठे। “बेटी… मैं जानता हूं दर्द क्या होता है। रानी को खोया था मैंने। लेकिन जिंदगी रुकती नहीं। तू मेरे साथ मुंबई चल। वहां नई शुरुआत करेंगे। मैं अकेला हूं, तू अकेली। साथ रहेंगे।”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। आंखें नम, लेकिन आवाज में कमजोरी। “पापा… मैं यहां से नहीं जा सकती। ये घर… आरव का घर है। यहां उसकी हर याद है। मैं कैसे छोड़ दूं?”

     

    आदित्य अंकल ने उसका कंधा थामा। “बेटी… यादें दिल में रहती हैं। यहां रहकर तू खुद को और दुख देगी। मुंबई में नया जीवन। मैं तेरी देखभाल करूंगा। तू मेरी इकलौती बेटी है।”

     

    प्रिया रो पड़ी। “पापा… मैं टूट गई हूं। आरव के बिना… कुछ नहीं बचा। लेकिन यहां उसकी खुशबू है, उसकी यादें हैं। मैं नहीं जा पाऊंगी।”

     

    राजेश पापा (आरव के पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा बुझा हुआ था। वो प्रिया के सामने बैठे। “प्रिया बेटी… आदित्य जी सही कह रहे हैं। यहां रहकर तू खुद को सजा देगी। आरव नहीं चाहेगा कि तू ऐसे जिए।”

     

    प्रिया ने राजेश पापा की ओर देखा। आंसू बह रहे थे। “पापा… आप भी मुझे छोड़ देंगे? ये घर… आरव का घर। मैं अकेली कैसे रहूंगी?”

     

    राजेश पापा की आंखें भर आईं। वो प्रिया को गले लगा लिया। “बेटी… तू मेरी बेटी है। हमेशा रहेगी। लेकिन आदित्य जी तेरे असली पिता हैं। उनके साथ जा। नई जिंदगी शुरू कर। आरव की आत्मा को शांति मिलेगी।”

     

    प्रिया सिसकियां ले रही थी। “पापा… मैं अकेली नहीं जा सकती। रिया… रिया भी मेरे साथ जाएगी। वो भी टूट गई है। आरव उसका भी भाई था। वो बाहर से मजबूत दिखाती है, लेकिन अंदर से… वो भी रो रही है हर रात।”

     

    सबने रिया की ओर देखा। रिया की आंखें नीची थीं। वो चुप थी, लेकिन कंधे कांप रहे थे। राजेश पापा ने रिया के पास जाकर कहा, “रिया बेटी… सच्च है?”

     

    रिया ने सिर उठाया। आंसू बह रहे थे। “पापा… हां। आरव भैया मेरे भी भाई थे। प्रिया की तरह। मैं मजबूत दिखाती हूं, लेकिन अंदर से… सब खाली हो गया।”

     

    राजेश पापा ने रिया को गले लगाया। “बेटी… अगर प्रिया जाना चाहती है तो तू भी जा। दोनों साथ रहोगी। मैं अकेला रह लूंगा। लेकिन तुम्हारी खुशी महत्वपूर्ण है।”

     

    प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… चल ना। मुंबई। नई शुरुआत। यहां हर कोना आरव की याद दिलाता है। हम साथ रहेंगे।”

     

    रिया ने प्रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “हां प्रिया… चलते हैं। लेकिन दिल यहां रह जाएगा।”

     

    आदित्य अंकल ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बेटियां… मैं खुश हूं। मुंबई में हमारा घर तुम्हारा घर है।”

     

    राजेश पापा ने कहा, “ठीक है। पैकिंग शुरू करो। मैं टिकट बुक करवाता हूं।”

     

    प्रिया उठी। कमरे में गई। आरव की फोटो देखी। “आरव… मैं जा रही हूं। लेकिन तू मेरे दिल में है। हमेशा।”

     

    रिया ने सामान पैक करना शुरू किया। दोनों साथ थीं। टूटे हुए, लेकिन एक-दूसरे का सहारा।

     

    घर अब और सूना हो गया। राजेश पापा अकेले हॉल में बैठे। आरव की फोटो देख रहे थे। “आरव… प्रिया… माफ करना। मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

     

    प्रिया और रिया मुंबई जाने वाली थीं। नई जिंदगी। लेकिन दिलों में आरव की याद हमेशा रहेगी।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 21

    Dil sabhal ja jara part – 21

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    Part- 21: “टूटते रिश्ते का दर्द”

    आरव ठाकुर हाउस के गलियारे में तेज़ कदमों से चल रहा था। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि लगता था छाती से बाहर निकल आएगी। वो कॉल… वो लिफाफा… वो शब्द – “प्रिया तेरी बहन है। असली में। डायरी का राज़ अधूरा था।” उसके दिमाग में बार-बार गूंज रहे थे। वो आदमी कौन था? वो चेहरा… वो आवाज… सब धुंधला था। लेकिन शब्द साफ थे, जैसे चाकू की धार। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया था, हाथ कांप रहे थे। वो सीढ़ियां उतरते हुए खुद से बुदबुदाया, “ये नहीं हो सकता। झूठ है। सब झूठ। प्रिया… मेरी प्रिया… मेरी पत्नी। वो मेरी बहन नहीं हो सकती।”

    लेकिन वो लेटर… वो फोटो… सब कुछ इतना असली लग रहा था। आरव कार की ओर बढ़ा। बाहर रात का सन्नाटा था, बर्फ हल्की-हल्की गिर रही थी, जैसे आसमान भी उसके दर्द पर रो रहा हो। वो कार में बैठा, इंजन स्टार्ट किया। दिमाग में तूफान था। “अगर ये सच है तो… हमारी शादी… हमारा प्यार… सब गलत। मैंने क्या कर दिया? प्रिया… वो निर्दोष है। वो नहीं जानती। मैं उसे कैसे बताऊं? कैसे सहूं?”

    आरव ने कार तेज़ चलाई। सड़कें खाली थीं, शिमला की पहाड़ी रोड्स पर बर्फ की पतली परत थी, जो गाड़ी के टायरों से चिपक रही थी। वो स्पीड बढ़ाता गया – 60, 80, 100। हवा कान में सीटी बजा रही थी। उसके दिमाग में फ्लैशबैक्स आने लगे। बचपन की वो शामें, जब प्रिया छोटी सी थी। “भैया… मुझे गोद लो ना!” वो हंसती, दौड़ती। आरव उसे उठाता, घुमाता। “प्रिया, तू मेरी छोटी राजकुमारी है।” फिर वो रात – एक्सीडेंट की खबर। “प्रिया लापता है।” सालों का दर्द, इंतजार। फिर प्रिया की वापसी। “आरव… मैं तेरी बहन हूं?” नहीं, वो राज़ खुला – खून का रिश्ता नहीं। फिर प्यार… वो किस, वो स्पर्श, वो रातें। “प्रिया… तू मेरी है।” लेकिन अब? “अगर वो मेरी असली बहन है तो… मैंने क्या कर दिया? हमने क्या कर दिया?”

    आरव की आंखें नम हो गईं। वो चीखा, “नहीं! ये झूठ है!” कार और तेज़। पहाड़ी मोड़ आ रहा था, लेकिन वो ब्रेक नहीं लगाया। दिमाग में सिर्फ एक सवाल – “क्या करूं? प्रिया से कहूं? या चुप रहूं? शादी हो गई। वो मेरी पत्नी है। लेकिन अगर सच है तो… गलत है। पाप है। मैं उसे दुख नहीं दे सकता। खुद को मार लूं? या भाग जाऊं?” वो रो रहा था। आंसू गालों पर बह रहे थे, कार की विंडस्क्रीन धुंधली हो रही थी। “प्रिया… सॉरी। मैं तुझे खुश रखना चाहता था। लेकिन अब…”

    वहीं कमरे में प्रिया बिस्तर पर बैठी थी। लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मेहंदी की खुशबू कमरे में फैली हुई थी। वो इंतजार कर रही थी – आरव का। उसका दिल उछल रहा था। “आरव… जल्दी आओ ना। आज हमारी पहली रात है।” लेकिन समय गुजर रहा था। घड़ी की सुई आगे बढ़ रही थी। प्रिया का मन घबरा रहा था। “क्यों इतनी देर? वो कॉल… कौन था? आरव का चेहरा… कुछ गलत लग रहा था।” वो उठी, खिड़की के पास गई। बाहर बर्फ गिर रही थी। दिल में एक अजीब सी बेचैनी। “कुछ गलत होने वाला है। मुझे पता है। आरव… कहां हो तुम?”

    प्रिया ने फोन उठाया। आरव को कॉल किया। रिंग जा रही थी, लेकिन कोई जवाब नहीं। “आरव… पिक करो ना।” बेचैनी बढ़ गई। वो कमरे में चक्कर लगाने लगी। मंगलसूत्र को छू रही थी। “आरव… तुम ठीक हो ना? वो कॉल… काम का था? लेकिन इतनी रात को कौन काम?” मन में बुरे ख्याल आने लगे। “कहीं कोई खतरा तो नहीं? विक्रम? या कोई और?” प्रिया की सांस तेज़ हो गई। वो दरवाजे की ओर गई। “आरव… जल्दी आओ। मुझे डर लग रहा है।”

    आरव की कार अब पहाड़ी रोड पर थी। स्पीड 120। मोड़ आया। वो ब्रेक लगाने की कोशिश की, लेकिन दिमाग कहीं और था। “प्रिया… अगर सच है तो मैं उसे देख नहीं सकता। मैं खुद को सजा दूंगा।” कार स्लिप हुई। बर्फ की वजह से। वो स्टियरिंग संभालने की कोशिश की, लेकिन देर हो गई। कार सड़क से उतरी, पेड़ से टकराई। धमाका। कांच टूटा, कार पलटी। आरव का सिर स्टीयरिंग से टकराया। खून बहने लगा। दर्द। अंधेरा। “प्रिया… सॉरी…”

    प्रिया कमरे में थी। फोन फिर बजाया। कोई जवाब नहीं। दिल जोरों से धड़क रहा था। “आरव… कुछ गलत हुआ है। मुझे पता है।” वो बाहर निकली। रिया के कमरे में गई। “रिया… उठ। आरव… वो कहीं गया है।”

    रिया उठी। “क्या? कहां?”

    प्रिया रो रही थी। “पता नहीं। एक कॉल आया था। उसके बाद चला गया। फोन नहीं उठा रहा।”

    रिया ने कहा, “चल, पापा को बताते हैं।”

    लेकिन तभी फोन आया। हॉस्पिटल से। “आरव ठाकुर का एक्सीडेंट हो गया है। जल्दी आएं।”

    प्रिया का दिल बैठ गया। “आरव…”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 20

    Dil sabhal ja jara part – 20

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    part – 20 rat ka rahasya me call 

     

     

     

    शिमला की वो रात खास थी। ठाकुर हाउस की हर दीवार पर खुशियों की चमक थी, लेकिन बाहर की बर्फीली हवा में एक अजीब सी सनसनी फैली हुई थी। शादी का दिन गुजर चुका था – मंडप की घंटियां, फेरों की धुन, विदाई की रस्में सब बीत चुकी थीं। प्रिया अब श्रीमती प्रिया आरव ठाकुर थी। घरवाले थककर सो चुके थे, मेहमान जा चुके थे, और ठाकुर हाउस अब शांत हो चुका था। सिर्फ कुछ लाइट्स जल रही थीं – हॉल की, और ऊपर के कमरों की।

     

    आरव सीढ़ियां चढ़ रहा था। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था। शेरवानी अभी भी पहनी थी, पगड़ी उतार चुका था। बालों में थोड़ी सी बर्फ की बूंदें लगी थीं, जो बाहर से आते वक्त गिरी थीं। वो कमरे की ओर जा रहा था – अपना और प्रिया का कमरा। आज पहली रात थी – वो रात जो हर नए जोड़े के लिए यादगार होती है। आरव की आंखों में खुशी थी, लेकिन थोड़ी घबराहट भी। “प्रिया… मेरी पत्नी। आज से हम एक हैं,” वो मन ही मन सोच रहा था। उसके कदम धीमे थे, जैसे वो हर पल को जीना चाहता हो।

     

    कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला था। अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी – कैंडल्स की। आरव ने दरवाजा धक्का दिया। प्रिया अंदर थी, बिस्तर पर बैठी। लाल साड़ी में, माथे पर सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, हाथों में मेहंदी। वो इंतजार कर रही थी – शर्म से झुकी आंखों से, मुस्कुराहट दबाए होंठों से। कमरा सजा हुआ था – गुलाब की पंखुड़ियां बिस्तर पर बिखरीं, कैंडल्स की लौ कमरे को गर्माहट दे रही थी, और हवा में हल्की सी खुशबू – जूही की।

     

    प्रिया ने सिर उठाया। आरव को देखकर उसकी आंखें चमक उठीं। “आरव… आ गए?”

     

    आरव मुस्कुराया। दरवाजा बंद किया और उसके पास आया। “हां प्रिया… तेरी पहली रात का इंतजार कर रहा था।”

     

    प्रिया शर्मा गई। वो उठी और आरव के करीब आई। “आरव… आज से हमारा नया जीवन शुरू।”

     

    आरव ने उसके हाथ थामे। “हां प्रिया। तू मेरी पत्नी है। मेरी हमसफर। मैं तुझे हमेशा खुश रखूंगा।”

     

    दोनों की नजरें मिलीं। आरव ने प्रिया को अपनी बाहों में भर लिया। वो हल्का सा किस – माथे पर। फिर गाल पर। प्रिया की सांस तेज़ हो गई। वो आरव की शेरवानी के बटन खोलने लगी। “आरव… आज रात सिर्फ हमारी है।”

     

    आरव ने उसे बिस्तर की ओर ले जाया। “हां प्रिया। सिर्फ हमारी।”

     

    दोनों करीब आए। आरव ने प्रिया की साड़ी का पल्लू सरकाया। प्रिया की आंखें बंद हो गईं। वो पल… वो पहला पल जो दोनों के लिए खास था। लेकिन तभी… आरव का फोन बज उठा। कमरे में सन्नाटा था, और फोन की रिंग उस सन्नाटे को तोड़ रही थी।

     

    आरव रुक गया। “कौन होगा इतनी रात को?”

     

    प्रिया ने कहा, “आरव… छोड़ो। साइलेंट कर दो।”

     

    आरव ने फोन देखा। अनजान नंबर। वो इग्नोर करने वाला था, लेकिन फिर रिंग आई। वो उठा। “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ से भारी, अजनबी आवाज आई। “आरव ठाकुर? बधाई हो शादी की। लेकिन रात अभी पूरी नहीं हुई। अगर मेरे बारे में जानना चाहते हो कि मैं कौन हूं, तो अभी के अभी मेरे बताए पते पर पहुंचो। अकेले। वरना… प्रिया की खुशी छिन जाएगी। पता है – पुरानी हवेली के पीछे वाला जंगल, वो टूटा हुआ पुल। दस मिनट में।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। “कौन बोल रहा है? क्या चाहते हो?”

     

    आवाज हंसी। “समय कम है। आओ तो जानोगे। और हां, किसी को मत बताना। पुलिस या कोई और… तो खेल खत्म।”

     

    फोन कट गया। आरव कांप रहा था। प्रिया ने पूछा, “आरव… क्या हुआ? कौन था?”

     

    आरव ने मुस्कुराने की कोशिश की। “कुछ नहीं प्रिया। काम का कॉल। मैं थोड़ी देर में आता हूं।”

     

    प्रिया ने रोकना चाहा। “आरव… रात के दो बजे? कौन काम?”

     

    आरव ने उसे गले लगाया। “ट्रस्ट मी प्रिया। सब ठीक होगा। तू इंतजार कर।”

     

    आरव कमरे से निकला। दिल तेज़ धड़क रहा था। वो नीचे गया, कार की चाबी ली। बाहर बर्फ गिर रही थी, रात का सन्नाटा। वो पुरानी हवेली की ओर चला। रास्ते में सोच रहा था – “कौन हो सकता है? विक्रम? या कोई और? प्रिया को खतरा?”

     

    हवेली पहुंचा। पीछे जंगल। टूटा पुल। अंधेरा था। आरव ने फोन की लाइट जलाई। “कौन है? दिखो!”

     

    एक छाया आगे आई। एक आदमी – चेहरा ढका हुआ। “आरव… वेलकम। अब सुनो। मैं कौन हूं? वो जो सालों से इंतजार कर रहा था। तेरी शादी… लेकिन ये नहीं चलेगी।”

     

    आरव ने पूछा, “क्यों? क्या चाहते हो?”

     

    आदमी ने मास्क उतारा। वो… कोई अनजान था। लेकिन उसके हाथ में एक पुराना लेटर। “ये पढ़। फिर पता चलेगा।”

     

    आरव ने लेटर लिया। अंदर लिखा था – “आरव, प्रिया तेरी बहन है। असली में। डायरी का राज़ अधूरा था।”

     

    आरव चौंका। “ये झूठ है!”

     

    आदमी हंसा। “नहीं। और अगर शादी जारी रही तो… प्रिया को पता चलेगा। और सब खत्म।”

     

    आरव का दिल बैठ गया। सस्पेंस गहरा हो गया। वो कौन था? और क्या सच में…?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 19

    Dil sabhal ja jara part – 19

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 19 Dulhan ki tyari or chhupa huaa khatra 

     

     

     

    ठाकुर हाउस में शादी का दिन आ चुका था। मार्च की सुबह थी, हवा में हल्की ठंडक, लेकिन धूप खिली हुई थी। घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था – लाल और गोल्डन फूलों की मालाएं, लाइट्स की चमक, और बाहर मंडप तैयार। मेहमानों की भीड़ थी, लेकिन सबकी नजरें दुल्हन पर थीं। प्रिया अपने कमरे में थी। कमरा फूलों से सजा था, आईने के सामने कुर्सी लगी थी। शिमला की बेस्ट पार्लर टीम आ चुकी थी – चार लड़कियां, मेकअप किट्स, हेयर स्टाइल टूल्स लेकर।

     

    पार्लर की लीड आर्टिस्ट, नेहा, प्रिया के बाल संभाल रही थी। “मैम, आपके बाल तो सिल्क जैसे हैं। आज ओपन रखेंगे या बन?”

     

    प्रिया मुस्कुराई। “बन। ट्रेडिशनल लुक।”

     

    दूसरी लड़की, सोनिया, मेहंदी चेक कर रही थी। “वाह मैम, मेहंदी का कलर तो डार्क आया है। दूल्हा बहुत प्यार करते हैं।”

     

    प्रिया शर्मा गई। “हां… बहुत।”

     

    तीसरी आर्टिस्ट, रिया (नाम संयोग से), मेकअप शुरू कर रही थी। “मैम, आईलाइनर थिक रखें? आंखें बड़ी हैं आपकी, हाइलाइट होंगी।”

     

    प्रिया ने हां कहा। चौथी लड़की ज्वेलरी सेट कर रही थी – मांगटीका, नथ, कान के झुमके।

     

    कमरे में रिया (प्रिया की बेस्ट फ्रेंड) भी थी। वो एक्साइटेड। “प्रिया यार, आज तू दुल्हन बनेगी। आरव भैया… मतलब आरव… तो दूल्हा। मैं अभी भी बिलीव नहीं कर पा रही!”

     

    प्रिया हंसी। “रिया, मैं भी कभी-कभी सपना लगता है।”

     

    पार्लर वाली नेहा ने बालों में फूल लगाते हुए कहा, “मैम, आपकी स्टोरी तो फिल्म जैसी है। पहले भाई-बहन जैसे, अब शादी। लोग बातें कर रहे थे, लेकिन आज देखकर सब चुप हो जाएंगे। आप कितनी खूबसूरत जोड़ी लग रहे हो।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “थैंक्स नेहा। प्यार होता है तो सब मुमकिन है।”

     

    मेकअप चल रहा था। फाउंडेशन, ब्लश, लिपस्टिक – रेड, मैचिंग लहंगे से। लहंगा हैवी था – रेड वेलवेट, गोल्डन एम्ब्रॉयडरी, दुपट्टा लंबा। प्रिया आईने में खुद को देख रही थी। “लग रही हूं दुल्हन?”

     

    सोनिया ने कहा, “मैम, परी जैसी। दूल्हा देखकर बेहोश हो जाएगा।”

     

    सब हंस पड़े। रिया ने फोटोज लीं। “ये आरव को नहीं दिखाऊंगी। सरप्राइज रहेगा।”

     

    तैयारियां पूरी होने में दो घंटे लगे। आखिर में दुपट्टा सेट किया गया। प्रिया खड़ी हुई। आईने में खुद को देखा। आंखें नम हो गईं। “मां… देख रही हो ना? आज तेरी बेटी दुल्हन बन रही है।”

     

    रिया ने गले लगाया। “प्रिया… तू सबसे खूबसूरत दुल्हन है।”

     

    दूसरी तरफ, आरव अपने कमरे में तैयार हो रहा था। शेरवानी – क्रिम कलर, गोल्डन बटन, मैचिंग पगड़ी। उसका बेस्ट फ्रेंड, विक्रांत (अब अच्छा दोस्त बन चुका था), मदद कर रहा था। “आरव यार, तू तो राजकुमार लग रहा है। प्रिया देखकर पिघल जाएगी।”

     

    आरव मुस्कुराया। “विक्रांत, थैंक्स यार। तूने बहुत सपोर्ट किया।”

     

    विक्रांत ने पगड़ी सेट की। “यार, तुम्हारी स्टोरी इंस्पायरिंग है। मैं खुश हूं तुम दोनों के लिए।”

     

    आरव तैयार हो गया। आईने में खुद को देखा। “आज प्रिया मेरी हो जाएगी। हमेशा के लिए।”

     

    तभी उसका फोन बजा। अनजान नंबर। आरव ने रिसीव किया। “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ से भारी, विकृत आवाज आई। “आरव ठाकुर? बधाई हो शादी की। लेकिन आज का दिन तुम्हारा आखिरी खुशी का दिन होगा। प्रिया को कुछ नहीं होगा, लेकिन तू… तुझे सजा मिलेगी। पुरानी साजिशों की।”

     

    आरव चौंका। “कौन बोल रहा है?”

     

    आवाज हंसी। “विक्रम नहीं। कोई और। जो सालों से इंतजार कर रहा था। ठाकुर और राठौर की दुश्मनी… वो अभी खत्म नहीं हुई। आज मंडप में देखना।”

     

    फोन कट गया। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। विक्रांत ने पूछा, “क्या हुआ यार?”

     

    आरव ने कहा, “कुछ नहीं। गलत नंबर।”

     

    लेकिन अंदर से डर गया। वो पापा के पास गया। “पापा… सिक्योरिटी चेक करो। कुछ अनजान कॉल आया।”

     

    पापा ने कहा, “बेटा, चिंता मत कर। सब ठीक होगा।”

     

    लेकिन आरव का मन बैचेन था।

     

    नीचे मंडप में मेहमान इकट्ठे हो रहे थे। कुछ ताने फिर शुरू। एक अंकल ने दूसरे से कहा, “देखो, भाई-बहन जैसे थे, अब शादी। पैसों का खेल है।”

     

    लेकिन ज्यादातर मेहमान खुश थे। रिया ने म्यूजिक शुरू करवाया।

     

    प्रिया तैयार हो चुकी थी। दुल्हन बनकर नीचे आने वाली थी। रिया ने कहा, “प्रिया… तैयार? दूल्हा इंतजार कर रहा है।”

     

    प्रिया ने आईने में आखिरी बार देखा। “हां रिया। तैयार हूं।”

     

    बारात आने वाली थी – नहीं, घर में ही शादी थी। आरव नीचे मंडप में जाएगा। प्रिया को दुल्हन बनकर लाया जाएगा।

     

    आरव मंडप में खड़ा था। घोड़ी पर नहीं, लेकिन दूल्हा बनकर। मन बैचेन। वो कॉल… कौन था? विक्रम तो जेल में था। कोई और?

     

    प्रिया ऊपर से नीचे आ रही थी। दुपट्टा सिर पर, लड़कियां सहारा दे रही थीं। सबकी नजरें उस पर। “वाह… कितनी खूबसूरत।”

     

    आरव ने देखा। उसकी सांस रुक गई। प्रिया… उसकी दुल्हन।

     

    प्रिया मंडप में आई। आरव के पास बैठी। पंडित जी मंत्र पढ़ने लगे।

     

    लेकिन आरव का फोन वाइब्रेट कर रहा था। अनजान मैसेज – “अब देखो।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा। मेहमानों में कोई अनजान चेहरा? सिक्योरिटी थी, लेकिन…

     

    फेरे शुरू हुए। प्रिया और आरव हाथ थामे घूम रहे थे। प्रिया मुस्कुरा रही थी। आरव भी, लेकिन अंदर डर।

     

    आखिरी फेरे में अचानक लाइट्स चली गईं। अंधेरा। चीखें।

     

    लाइट्स आईं। मंडप में एक लिफाफा पड़ा था। आरव ने उठाया। अंदर फोटो – प्रिया की पुरानी, आश्रम की। और चिट – “ये शादी नहीं होगी। प्रिया को ले जाऊंगा।”

     

    आरव चौंका। प्रिया ने देखा। “आरव… क्या है?”

     

    आरव ने कहा, “कुछ नहीं प्रिया।”

     

    लेकिन उसकी आंखें डर गईं। कौन था वो? विक्रम? या कोई नया दुश्मन?

     

    शादी जारी थी। सिंदूर डाला गया। मंगलसूत्र पहनाया गया। सब तालियां बजा रहे थे।

     

    लेकिन आरव का मन बैचेन। वो कॉल… वो लिफाफा… खतरा अभी बाकी था।

     

    शादी पूरी हुई। प्रिया और आरव पति-पत्नी बन गए। 

     

    रात को विदाई के समय प्रिया रो रही थी। आरव ने गले लगाया। “प्रिया… 

     

  • Dil sabhal ja jara part – 18

    Dil sabhal ja jara part – 18

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    Part – 18 hamara ghar 

     

     

     

     

    शिमला की सर्दियां अब अपने चरम पर थीं। जनवरी की शुरुआत हो चुकी थी, और ठाकुर हाउस की छत पर बर्फ की मोटी चादर जम गई थी। मीडिया का शोर धीरे-धीरे कम हो रहा था – लोग नई खबरों में व्यस्त हो गए थे। लेकिन प्रिया और आरव के लिए ये समय सबसे खूबसूरत था। वो समय जब उनका प्यार अब छिपा नहीं, बल्कि खुलकर जीया जा रहा था। घरवाले ने अपनाया था, रिया सबसे बड़ी सपोर्टर बनी थी, और दोनों अब एक-दूसरे के साथ हर पल को जी रहे थे।

     

    एक सुबह प्रिया किचन में थी। वो आरव के लिए उसकी फेवरेट कॉफी बना रही थी – ब्लैक, बिना शुगर। आरव पीछे से आया, उसकी कमर में हाथ डाले। “गुड मॉर्निंग, मेरी जान।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। पीछे मुड़ी और उसके होंठों पर हल्का सा किस किया। “गुड मॉर्निंग भैया… नहीं, अब तो सिर्फ आरव।”

     

    आरव ने उसे गोद में उठा लिया। “हां, सिर्फ तेरा आरव।”

     

    रिया किचन में आई। “ओये होये! सुबह-सुबह रोमांस? मैं अंदर जा रही हूं।”

     

    दोनों हंस पड़े। आरव ने प्रिया को नीचे उतारा। “रिया, आज प्लान है। हम तीनों बाहर जाएंगे। जाखू टेंपल। बर्फ देखने।”

     

    प्रिया की आंखें चमक उठीं। “सच? चलो!”

     

    तीनों बाहर निकले। कार में आरव ड्राइव कर रहा था, प्रिया उसके बगल में, रिया पीछे। रास्ते में पुरानी गानों की प्लेलिस्ट चल रही थी। प्रिया ने आरव का हाथ थामा। आरव ने उसकी उंगलियों को चूमा। रिया ने पीछे से कहा, “यार, तुम दोनों अब कपल गो्ल्स हो।”

     

    जाखू टेंपल पहुंचे। ऊपर बर्फ की चादर, बंदर घूम रहे थे, हवा ठंडी लेकिन साफ। तीनों टहलने लगे। प्रिया ने बर्फ का गोला बनाया और आरव पर फेंका। आरव ने पकड़ा और प्रिया को गले लगा लिया। “पकड़ी गई!”

     

    रिया फोटोज ले रही थी। “ये फोटोज मैं सेव करूंगी। ब्लैकमेल के लिए।”

     

    प्रिया ने कहा, “रिया, तू सबसे बेस्ट है।”

     

    शाम को घर लौटे। पापा और आदित्य अंकल टीवी देख रहे थे। पापा ने कहा, “बच्चो, आज न्यूज में तुम्हारी स्टोरी फिर आई। लेकिन पॉजिटिव। लोग कह रहे हैं – प्यार जीत गया।”

     

    प्रिया और आरव मुस्कुराए। आदित्य अंकल ने कहा, “बेटी, मैं गर्व करता हूं तुम पर। तुमने स्ट्रगल किया, और सच्चा प्यार पाया।”

     

    रात को डिनर के बाद प्रिया और आरव पुरानी हवेली गए – जो अब रेनोवेट हो रही थी। वो हवेली जो मम्मी की फेवरेट थी। अब वो उनका स्पेशल प्लेस बन गई थी। हवेली के बगीचे में बर्फ जमी थी। दोनों हाथ थामे टहल रहे थे।

     

    आरव ने कहा, “प्रिया… ये हवेली हमारा घर बनेगी। हमारा अपना। जहां सिर्फ हम होंगे।”

     

    प्रिया ने उसे गले लगाया। “हां आरव। हमारा घर। जहां हमारी यादें होंगी। हमारे बच्चे खेलेंगे।”

     

    आरव ने उसे किस किया। “हां प्रिया। हमारे बच्चे। तेरी आंखें, मेरी मुस्कान।”

     

    दोनों बगीचे के झूले पर बैठे। आरव ने प्रिया को गोद में लिया। “प्रिया… याद है बचपन में मैं तुझे झूला झुलाता था?”

     

    प्रिया ने कहा, “अब मैं बड़ी हो गई। लेकिन तुम्हारी गोद में अभी भी छोटी लगती हूं।”

     

    आरव ने उसके होंठों को गहराई से चूमा। “प्रिया… तू हमेशा मेरी छोटी राजकुमारी रहेगी। मेरी पत्नी बनेगी एक दिन।”

     

    प्रिया ने जवाब में किस किया। “हां आरव। तेरी पत्नी। तेरी हमसफर।”

     

    रात गहरा गई। दोनों हवेली के एक कमरे में रुके। फायरप्लेस जलाया। प्रिया आरव की बाहों में थी। “आरव… आज सबसे खुश हूं।”

     

    आरव ने उसके बाल सहलाए। “प्रिया… मैं भी। तूने मुझे पूरा किया।”

     

    दोनों सो गए – गले लगे। पहली बार पूरी रात साथ। कोई डर नहीं, कोई गिल्ट नहीं। सिर्फ प्यार।

     

    सुबह हुई। घर लौटे। रिया ने चिढ़ाया, “कहां थे रात भर? हवेली में?”

     

    प्रिया शर्मा गई। आरव ने कहा, “रिया, जलन हो रही है?”

     

    रिया हंसी। “नहीं भैया। खुश हूं। तुम दोनों परफेक्ट हो।”

     

    लेकिन बाहर विक्रम बाहर आ चुका था। वो अवनी से मिला। “अवनी, अब आखिरी वार। प्रिया और आरव को अलग कर दूंगा। पुराना प्रूफ है – रानी की डायरी का दूसरा पेज। जहां लिखा है कि प्रिया राजेश की बेटी नहीं। अगर फैमिली को पता चला तो…”

     

    अवनी मुस्कुराई। “करो।”

     

    लेकिन प्रिया और आरव तैयार थे। उनका प्यार अब इतना मजबूत था कि कोई साजिश नहीं तोड़ सकती।

     

    शाम को दोनों छत पर थे। बर्फ देख रहे थे। आरव ने प्रिया को रिंग दी – सिंपल, लेकिन डायमंड वाली। “प्रिया… विल यू मैरी मी?”

     

    प्रिया रो पड़ी। “यस आरव। हजार बार यस।”

     

    दोनों गले लगे। किस किया। हमारा घर – अब सच होने वाला था।

     

    प्यार की जीत हो चुकी थी। बचपन से शुरू हुआ सफर अब शादी तक पहुंच रहा था।

     

     

    ठाकुर हाउस में अब खुशियों का माहौल था। फरवरी की शुरुआत हो चुकी थी, और शिमला की बर्फ अब पिघलने लगी थी – जैसे प्रिया और आरव के प्यार के आगे सारी ठंडक गायब हो रही हो। शादी की तारीख फिक्स हो चुकी थी – मार्च के पहले हफ्ते में। हवेली को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा था। फूलों की मालाएं, लाइट्स, डेकोरेटर्स की टीम दिन-रात लगी हुई थी। प्रिया की शादी की शॉपिंग चल रही थी – लहंगे, ज्वेलरी, मेहंदी की डिजाइन। रिया सबसे एक्टिव थी – वो प्रिया की बेस्ट फ्रेंड और सिस्टर-इन-लॉ दोनों बनने वाली थी।

     

    एक सुबह ठाकुर हाउस में मेहमान आने शुरू हो गए। दूर के रिश्तेदार, पापा के बिजनेस पार्टनर्स, पुराने फैमिली फ्रेंड्स। हाउस में रौनक थी। प्रिया रेड लहंगे में ट्रायल कर रही थी। आरव बाहर मेहमानों का स्वागत कर रहा था।

     

    पहले मेहमान आए – पापा के पुराने दोस्त, अंकल वर्मा और उनकी पत्नी। अंकल वर्मा ने आरव को गले लगाया। “बेटा, बधाई हो। शादी की खबर सुनी।”

     

    फिर आंटी ने प्रिया को देखा। मुस्कुराई, लेकिन आंखों में कुछ और था। “प्रिया बेटी… बहुत खूबसूरत लग रही हो। लेकिन… सुना है तुम दोनों… पहले भाई-बहन जैसे थे?”

     

    प्रिया थोड़ा असहज हो गई। आरव ने बीच में कहा, “आंटी, हमारा रिश्ता सच्चा है। प्यार है।”

     

    आंटी ने हल्के से तंज कसा। “हां बेटा, प्यार तो अंधा होता है। लेकिन लोग क्या कहेंगे? पहले भाई कहकर बुलाती थी, अब पति?”

     

    रिया ने बीच में कट किया। “आंटी, प्यार में क्या पुराना-नया। जो दिल कहे वही सही।”

     

    आंटी चुप हो गईं, लेकिन फुसफुसाहट शुरू हो गई।

     

    दूसरे मेहमान – चाची जी (दूर की रिश्तेदार)। वो प्रिया के पास आईं। लहंगा देखा। “वाह बेटी, दुल्हन तो बन गई। लेकिन आरव तो तेरा भाई था ना? अब पति? अजीब नहीं लगता?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “चाची जी, रिश्ते दिल से होते हैं। हमारा प्यार सालों पुराना है।”

     

    चाची जी ने ताना मारा। “हां हां, सालों पुराना। पहले भाई-बहन वाला, अब पति-पत्नी। समाज क्या कहेगा? लोग तो कह रहे हैं – ठाकुर फैमिली में क्या हो रहा है?”

     

    आरव ने सुना। वो पास आया। “चाची जी, समाज जो कहे कहे। हम खुश हैं। हमारा प्यार सच्चा है।”

     

    चाची जी हंसकर टाल गईं, लेकिन दूसरे मेहमानों से फुसफुसाने लगीं।

     

    शाम को मेहंदी की रस्म थी। प्रिया हाथों में मेहंदी लगवा रही थी। लड़कियां गाना गा रही थीं। आरव दूर खड़ा देख रहा था। एक पुरानी सहेली – नेहा – प्रिया के पास आई। “प्रिया यार, बधाई हो। लेकिन सच बता… आरव को भाई मानती थी ना? अब…?”

     

    प्रिया ने हंसकर कहा, “नेहा, प्यार होता है। रिश्ते बदलते हैं।”

     

    नेहा ने तंज कसा। “हां, बदलते हैं। लेकिन इतना जल्दी? लोग तो कह रहे हैं – भाई से पति? ड्रामा किंग-क्वीन हो तुम दोनों।”

     

    रिया ने फिर बचाया। “नेहा, जलन हो रही है? प्रिया और आरव का प्यार परफेक्ट है। तू अपनी शादी देख।”

     

    नेहा चली गई। लेकिन ताने जारी थे। कुछ मेहमान खुले में, कुछ पीठ पीछे। “अरे, पहले तो भाई-बहन कहते थे, अब शादी? पैसों की वजह से?” “नहीं यार, प्यार है। लेकिन अजीब लगता है।”

     

    प्रिया का मन भारी हो गया। वो बाहर बालकनी में गई। आरव पीछे आया। “प्रिया… ताने सुनकर दुखी है?”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। “आरव… लोग क्या-क्या कह रहे हैं। पहले भाई-बहन, अब पति-पत्नी। लगता है हम गलत हैं।”

     

    आरव ने उसे गले लगाया। “प्रिया… लोग हमेशा बोलते हैं। लेकिन हमारा प्यार सच्चा है। तूने मुझे चुना, मैंने तुझे। सालों की कमी पूरी हुई है। ये ताने कुछ दिन के हैं। हमारी जिंदगी हमारी है।”

     

    प्रिया ने उसके सीने पर सिर रखा। “आरव… तुम सही कहते हो। मैं तुम्हारे साथ हूं। ताने सह लूंगी।”

     

    आरव ने उसके होंठ चूमे। “प्रिया… तू मेरी बहादुर लड़की है। हम साथ हैं।”

     

    रात को सगाई की रिंग सेरेमनी थी। प्रिया और आरव ने रिंग्स पहनाईं। मेहमान तालियां बजा रहे थे, लेकिन कुछ की आंखें तंज भरी थीं। एक अंकल ने पापा से कहा, “राजेश भाई, बधाई। लेकिन ये रिश्ता… पहले भाई-बहन जैसे थे ना?”

     

    पापा ने मुस्कुराकर कहा, “प्यार होता है भाई साहब। बच्चे खुश हैं। बस।”

     

    सेरेमनी के बाद प्रिया और आरव हवेली के बगीचे में अकेले थे। प्रिया ने कहा, “आरव… ताने सुनकर अच्छा नहीं लगता। लेकिन तुम्हारे साथ हूं तो सब सह लूंगी।”

     

    आरव ने उसे गोद में उठाया। “प्रिया… ताने देने वाले हमारी खुशी नहीं देख सकते। लेकिन हम जीएंगे – अपना प्यार, अपनी जिंदगी। तू मेरी दुल्हन बनेगी। मेरी पत्नी। हमारा घर बनेगा।”

     

    प्रिया ने उसे किस किया। “हां आरव। हमारा घर। हमारी जिंदगी।”

     

    दोनों गले लगे। बर्फ गिर रही थी, लेकिन उनके प्यार में गर्मी थी। ताने थे, लेकिन प्यार मजबूत था।

     

    अगले दिन शादी की तैयारियां और तेज हो गईं। डेकोरेशन, कार्ड्स, डांस प्रैक्टिस। रिया ने कहा, “प्रिया, ताने देने वाले शादी में आएंगे तो डांस करेंगे। हम दिखाएंगे हम कितने खुश हैं।”

     

    प्रिया हंसी। “हां रिया। हम जीतेंगे।”

     

    आरव ने प्रिया को रिंग पहनाई फिर से – प्राइवेट में। “प्रिया… जल्दी दुल्हन बन जा मेरी।”

     

    प्रिया ने कहा, “हां आरव। तेरी दुल्हन। हमेशा।”

     

    शादी की तैयारियां चल रही थीं। ताने थे, लेकिन प्यार उनसे बड़ा था। प्रिया और आरव का सफर अब शादी तक पहुंच चुका था।

     

    विक्रम दूर से देख रहा था। उसका प्लान फेल हो गया। अब वो हार मान चुका था।

     

    शादी का दिन करीब था। खुशियां थीं। प्यार की जीत थी।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 17

    Dil sabhal ja jara part – 17

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 17 dil se dil tak 

     

     

     

     

    ठाकुर हाउस की पुरानी लाइब्रेरी में शाम का धुंधला उजाला फैला था। फायरप्लेस की लौ धीरे-धीरे जल रही थी, और बाहर बर्फ की हल्की बूंदें खिड़की पर टपक रही थीं। घर में सब सो चुके थे। रिया अपने कमरे में, पापा और आदित्य अंकल भी। सिर्फ प्रिया और आरव जाग रहे थे। दोनों सोफे पर बैठे थे – करीब, लेकिन अभी भी एक छोटी सी दूरी। मीडिया का तूफान थम चुका था, लेकिन उसके घाव अभी ताज़ा थे। लोग बातें कर रहे थे, सोशल मीडिया पर ट्रोल्स, लेकिन दोनों ने फैसला किया था – वो चुप नहीं रहेंगे।

     

    प्रिया ने चाय का मग आरव की ओर बढ़ाया। “भैया… ले। ठंड लग रही है।”

     

    आरव ने मग लिया। उनकी उंगलियां छुईं। आरव ने प्रिया की ओर देखा। “प्रिया… आजकल नींद आती है तुझे?”

     

    प्रिया ने सिर झुका लिया। “नहीं भैया। हर रात सोचती हूं… हम सही कर रहे हैं ना?”

     

    आरव ने उसका हाथ अपने हाथों में लिया। धीरे से सहलाया। “प्रिया… मैं भी सोचता हूं। सालों तक तुझे बहन माना। तेरी हर खुशी में अपनी खुशी देखी। लेकिन जब सच पता चला… कि खून का रिश्ता नहीं… तो दिल ने कुछ और कहा। मैंने लड़ाई लड़ी खुद से। गिल्ट फील किया। सोचा कि मैं गलत हूं। लेकिन प्रिया… तुझे देखकर जो सुकून मिलता है, वो कहीं और नहीं मिलता। तू मेरी जिंदगी का वो हिस्सा है जो कभी खाली था।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो आरव के करीब सरकी। “भैया… मैं भी डरती थी। तुम मेरे भाई हो। तुमने मुझे बचाया, सहारा दिया। अनाथ आश्रम से लेकर आज तक। मैंने कभी सोचा नहीं कि तुम्हारे लिए कुछ और फील कर सकती हूं। लेकिन जब तुम दूर होने लगे… जब तुम्हारी नजरें बदलने लगीं… तो मुझे एहसास हुआ कि तुम्हारे बिना मैं अधूरी हूं। तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी केयर… वो भाई वाली नहीं लगती अब। वो प्यार लगता है। गहरा, सच्चा प्यार।”

     

    आरव ने उसे और करीब खींचा। प्रिया का सिर उसके सीने पर था। “प्रिया… मैंने कभी किसी को इतना प्यार नहीं किया। मम्मी के बाद तू ही मेरी दुनिया थी। लेकिन अब तू मेरी जिंदगी है। हर सांस में तू है। तेरी मुस्कान में मेरा सुकून। तेरी आंखों में मेरा भविष्य। मैं जानता हूं दुनिया क्या कहेगी। लेकिन प्रिया… दिल तो दिल है। वो नियम नहीं मानता।”

     

    प्रिया ने ऊपर देखा। उसकी आंखें आरव की आंखों में डूब गईं। “भैया… मुझे डर लगता है कि अगर हम अलग हुए तो? मीडिया, लोग… सब हमें जज करेंगे। लेकिन तुम्हारे साथ हूं तो सब सह लूंगी। तुम मेरे हो। सिर्फ मेरे।”

     

    आरव ने उसके गाल को छुआ। उंगलियां उसके होंठों पर फिसलीं। “प्रिया… तू मेरी है। हमेशा से। मैंने तुझे खोया था एक बार। अब कभी नहीं खोऊंगा। चाहे दुनिया खिलाफ हो, मैं तेरे साथ हूं। तेरी हर खुशी, हर गम में। तेरी हर सांस में।”

     

    प्रिया ने उसके होंठों को छुआ – धीरे से, फिर गहराई से। वो किस लंबा था, भावनाओं से भरा। आरव ने उसे अपनी बाहों में कस लिया। “प्रिया… मैं तुझे इतना प्यार करता हूं कि शब्द कम पड़ जाते हैं। तू मेरी ताकत है, मेरी कमजोरी है। तू मेरी हर चीज है।”

     

    प्रिया ने उसके सीने पर सिर रखा। आंसू बह रहे थे, लेकिन खुशी के। “भैया… तुम मेरे पहले प्यार हो। आखिरी प्यार हो। मैंने कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी मुझे तुम्हारे इतना करीब लाएगी। तुम्हारा इंतजार किया सालों… बिना जानें। अब जब तुम मेरे हो… तो लगता है सब स्ट्रगल वर्थ था।”

     

    आरव ने उसके बालों को चूमा। “प्रिया… हमारा प्यार कोई गलती नहीं। वो सच्चाई है। सालों की कमी का मिलन है। मैं तुझे हर खुशी दूंगा। तेरे सपनों को पूरा करूंगा। तेरे साथ हर कदम चलूंगा।”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया… मुझे तुम्हारी जरूरत है। हर पल। तुम्हारे बिना… सब खाली लगता है। तुम मेरे हो… सिर्फ मेरे।”

     

    आरव ने उसे फिर किस किया – गहरा, जुनूनी। दोनों की सांसें एक हो गईं। फायरप्लेस की लौ उनकी आंखों में झलक रही थी। आरव ने उसके कान में फुसफुसाया, “प्रिया… मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूंगा। ये वादा है। दिल से।”

     

    प्रिया ने जवाब दिया, “और मैं तुझे। हमेशा।”

     

    दोनों गले लगे रहे। रात गहरा गई। बाहर बर्फ गिर रही थी, लेकिन अंदर दिलों में गर्माहट थी – गहरी, अटूट। वो भावनाएं जो सालों से दबी थीं, अब बाहर आ चुकी थीं। प्यार की गहराई में डूब चुके थे दोनों। कोई डर नहीं, सिर्फ एक-दूसरे का साथ।

     

    सुबह हुई। रिया ने दोनों को देखा – सोफे पर, गले लगे सो रहे। वो मुस्कुराई और चुपके से चली गई।

     

     

    ठाकुर हाउस की पुरानी लाइब्रेरी में शाम का धुंधला उजाला अब और गहरा हो चुका था। फायरप्लेस की लौ धीरे-धीरे बुझ रही थी, और बाहर बर्फ की बूंदें खिड़की पर चिपककर जम रही थीं। प्रिया और आरव अभी भी सोफे पर थे – करीब, हाथ थामे। मीडिया का तूफान थम चुका था, लेकिन उसके बाद का सन्नाटा और भारी लग रहा था। घरवाले चुप थे, लेकिन उनकी नजरें सब कुछ कह रही थीं। प्रिया ने आरव का हाथ छोड़ा और उठकर खिड़की के पास चली गई। बाहर का नजारा देखा – बर्फीली पहाड़ियां, कोहरा।

     

    “भैया… कभी-कभी लगता है जैसे ये सब सपना हो। हम यहां, साथ। लेकिन बचपन… वो तो यादों में ही बसा है। मुझे कुछ याद नहीं, लेकिन तुम्हें तो होगा। बताओ ना… हमारा बचपन कैसा था?”

     

    आरव मुस्कुराया। वो भी उठा और प्रिया के पीछे खड़ा हो गया। उसके कंधों पर हाथ रखे। “प्रिया… बचपन? वो तो मेरी सबसे प्यारी यादें हैं। तू तब छोटी सी गुड़िया थी। चार साल की। मैं दस का। मम्मी कहती थीं, ‘आरव, अपनी छोटी को कभी अकेला मत छोड़ना।’ और मैं वादा करता – ‘मम्मी, कभी नहीं।’”

     

    प्रिया ने पलटा। आंखों में चमक। “भैया… बताओ। विस्तार से। मुझे लगता है, अगर मैं यादें सुनूंगी तो शायद मेरी भी यादें लौट आएं।”

     

    आरव ने प्रिया को सोफे पर फिर बिठाया। खुद उसके बगल में। फायरप्लेस में लकड़ी डाली। लौ फिर भड़क उठी। “ठीक है प्रिया। शुरू से बताता हूं। याद है वो पुराना बंगला? ठाकुर हवेली का बगीचा? वहां मम्मी हमें ले जातीं। तू छोटी-छोटी दौड़ती, फूल तोड़ती। एक बार तूने गुलाब का फूल तोड़ा, लेकिन कांटा चुभ गया। रोने लगी। मैंने तुझे गोद में उठाया। ‘भैया सब ठीक कर देंगे।’ फिर तेरी उंगली चूस ली – जैसे मम्मी करतीं। तू हंस पड़ी। ‘भैया मेरा हीरो!’”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो आरव के हाथ को कसकर पकड़ लिया। “भैया… लगता है जैसे मैं देख रही हूं। तू कितना केयरिंग था।”

     

    आरव ने उसके हाथ को चूमा। “हां प्रिया। तू मेरी जिम्मेदारी थी। मम्मी रानी… वो तुझे कितना प्यार करतीं। शाम को झूला झुलातीं। तू झूले पर चढ़ती, मैं पीछे धक्का मारता। ‘और तेज भैया!’ तू चिल्लाती। मम्मी हंसतीं। ‘आरव, धीरे। छोटी गिर जाएगी।’ लेकिन तू कभी नहीं गिरती। हम तीनों साथ खेलते। मम्मी गाना गातीं – ‘तेरे आने से पहले… जिंदगी सूनी थी।’ तू मेरी गोद में सो जाती। मैं तुझे कमरे में ले जाता। तेरा सिर सहलाता। लगता था तू मेरी बेटी जैसी।”

     

    प्रिया रो पड़ी। “मम्मी… कितनी खुश थीं ना? और पापा?”

     

    आरव ने गहरी सांस ली। “पापा व्यस्त रहते। होटल्स का काम। लेकिन जब आते, तो तुझे गोद में उठाते। ‘मेरी राजकुमारी!’ कहते। तू उनकी मूंछें खींचती। सब हंसते। लेकिन प्रिया… घर में तनाव भी था। विक्रम की मां… वो जलती थीं। मम्मी को नीचा दिखातीं। लेकिन मम्मी कभी नहीं बोलीं। तुझे बचाने के लिए सब सहती रहीं।”

     

    प्रिया ने आरव के सीने पर सिर रखा। “भैया… अगर मुझे याद होता तो… मैं मम्मी को कभी न जाने देती।”

     

    आरव ने उसके बाल सहलाए। “प्रिया… तू न गई होती तो आज ये प्यार न होता। तू लौटी तो सब लौट आया। बचपन की वो यादें… अब हमारे प्यार का हिस्सा हैं।”

     

    प्रिया ने ऊपर देखा। “भैया… और क्या? कोई मजेदार याद?”

     

    आरव हंसा। “हां। एक बार तूने मम्मी की साड़ी पहन ली। घूंघट ओढ़ा। ‘मैं दुल्हन हूं!’ चिल्लाई। मैं दूल्हा बना। मम्मी ने शादी की रस्में कीं। तू मेरी गोद में बैठी, मैं तुझे घुमाता। मम्मी फोटो खींचतीं। वो फोटो अभी भी है – अलमारी में। तू हंस रही थी, मैं शर्मा रहा था। मम्मी कहतीं, ‘एक दिन असली शादी होगी।’”

     

    प्रिया शर्मा गई। “भैया… लगता है मम्मी जानती थीं।”

     

    आरव ने उसके गाल को छुआ। “शायद प्रिया। वो हमेशा कहतीं, ‘आरव, प्रिया को कभी मत छोड़ना। वो तेरी जिंदगी है।’ मैं समझा नहीं था। लेकिन अब… अब समझ आया।”

     

    प्रिया ने उसके होंठों को छुआ। “भैया… तू मेरी जिंदगी है। बचपन से। अनजाने में।”

     

    आरव ने उसे किस किया – गहरा, भावुक। “प्रिया… तू मेरी छोटी थी। अब मेरी सब कुछ है। वो झूला, वो फूल, वो हंसी… सब अब हमारे प्यार में है।”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया… अगर मैं वापस न आती तो?”

     

    आरव ने उसे कस लिया। “तब भी तुझे खोजता। हर जन्म में। तू मेरी हो प्रिया। बचपन से।”